वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 231–240

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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वेदार्थपारिजातः २०१ ज्ञानेच्छाकृतीनां नित्यत्वेऽपि कार्यापेक्षया ज्ञानेच्छाकृतीनां क्रमेणैवोपयोगाच्च । न चैषां नित्यत्वे सृष्टेनित्यत्वापत्त्या प्रलया-सिद्धिरिति वाच्यम्, सृष्टेरनित्यधर्माधर्मनिमित्तकत्वेन नित्यत्वानुपपत्तेः । वेदान्तरीत्या तु यथा प्रसुप्तस्य स्वापाव्यवहित-प्राकालिकाद् एतावत्कालानन्तरे मया प्रबोद्धव्यमित्येवमात्मकात् सङ्कल्पाद् निद्राभङ्गज्ञानोदयौ भवतः, तथैव प्रलयाव्यव -हितप्राक्कालिकपरमेश्वरीयसङ्कल्पादेव गुणवैषम्यधर्माधर्मफलाभिमुख्याभ्यां परमेश्वरीयज्ञानेच्छाकृतिभिर्विश्वसृष्टिर्जायते । एतेन ' प्रलयान्ते मनांसि तत्संयोगाश्च किमनधि तानि चिकीर्षाप्रयत्नो प्रसुवते अधिष्ठितानि वा? आद्ये तैरेव हेतुव्यभिचारः, अन्ते तदधिष्ठानार्थं प्रयत्नान्तरापेक्षा, तथा चानवस्था । न च तत्प्रवाहानादित्वेन तत्समाधानं सम्भवति, प्रलये प्रवाहविच्छे-दात् ' इत्यपि निरस्तं वेदितव्यम्, सङ्कल्पसंस्कारस्य तदानीमप्यविच्छेदात् नित्यत्वपक्षे तादृग्दोषस्य निरालम्बनत्वाच्च । अदृष्टविशेषाद्धेतुसमवधानानुपपत्त्यैव कुड्यादिभ्यः शक्रमूर्धादिरिव शय्याप्रासादादिभ्यस्तनुभुवनादीनां वैलक्षण्येऽपि न बुद्धिमत्कर्तृकत्वव्यभिचारः, कार्यत्वस्यावैशेष्यात् । यथा कुड्यादिवैलक्षण्येनैव शक्रमूर्धादर्मनुष्यकार्यत्वाभावेऽपि नाकार्यत्वम्, तथैव तनुभुवनादेर्जीवकार्यत्वाभावेऽपि नाकार्यत्वम्, सावयवत्वेन कार्यत्वस्य निश्चयात् । अत एव यथा शक्रमूषदिर्मनुष्यविल-क्षणकर्तृत्वं तथैव तन्वादेर्जीवविलक्षण सर्वज्ञपरमेश कर्तृत्वं सिद्धयति । न च यथा देहवत्प्रयत्नमन्तरेण घटादिकारणेष्वप्रवर्तमानेष्वपि पृथिव्यादिकारणानि न देहवतः प्रयत्नमपेक्षन्ते स्वप्रवृत्ति प्रति तथैव चेतनमात्रमपि नापेक्षिष्यन्ते । किन्त्वदृष्टपरिपाकवत् क्षेत्रज्ञसंयोगादेव प्रवत्र्त्स्यन्तीति किं तदभिज्ञेनेति पावेगा, अत: इसमें ज्ञान की सत्ता अनिवार्य रूप से माननी पड़ेगी । ईश्वरीय ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न के नित्य होने पर भी कार्य की अपेक्षा के अनुसार उनका क्रमिक उपयोग ही होगा । ईश्वर में ज्ञान, इच्छा और कृति की निरता मानने पर सृष्टि भी नित्य माननी पड़ेगी, सब प्रलय कैसे सिद्ध हो पावेगा? इसका उत्तर है कि सृष्टि के निमित्त धर्माधर्मादि अनित्य है, बतः सृष्टि की निश्यता किसी प्रकार नहीं मानी पा सकी । वेन्स की पद्धति से तो जैसे सोये हुए व्यक्ति के शयन करने से जनहित पूर्व दिये गये अपने इस संकल के अनुसार कि मुझे तनी देर के बाद उठ जाना है, निद्रा का भंग मोर ज्ञान का उदय होता है, उसी प्रकार प्रलय के अवय-बहित पूर्व काल में ये गये घर के संकल्प के अनुसार हो गुणों का वैषम्य और धर्माधर्म के फलाभिमुख होने पर परमेश्वर के ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न के जल से विश्व की नूतन सृष्टि होती है । ऐसा मानने से इस शंका का भी समाधान हो जाता है कि " ब्रलय के क्रन्द और उनके संयोग बिना अधिक के ही चिकीर्षा और प्रयत्न को पेश करते हैं या उनका कोई वषिष्ठान होता है? अविष्ठित होने पर उनसे हेतु का व्यभिचार मानना पड़ेगा । अन्त में उसके अधिष्ठान के लिये दूसरा प्रयत्न मानना पड़ेगा और इस प्रकार अन-दोष होगा | प्रवाह की बनादिता को यान कर भी इसका समाधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्य में प्रवाह भी विभिन्न हो जाता है ", क्योंजि संकल्प का संस्कार तो प्रलयावस्था में भी अविछिन्न रहता है । विकीर्षा और प्रयत्न को जब नित्य मान लिया जाता है, तो इस प्रकार के दोषों की कोई संभावना ही नहीं रह जाती । यद्यपि अष्ट विशेष से हेतु का अनुसन्धान न होने के कारण हो जैसे भित्ति प्रभृति से इन्द्र के घर प्रभृति देवी अंश भिन्न है, इसी तरह से शय्या, प्रासाद प्रभृति से भी रातु, मुक्त प्रभृति पदार्थ विलक्षण है, तथापि इन सब में कहीं पर भी बुद्धिमत्कर्तृकत्व हेतु का व्यभिचार नहीं होता, क्योंकि सभी में कार्यत्व हेतु समान रूप से विद्यमान है । जैसे भिति प्रभृति से विलक्षण होने के कारण इन्द्र के शिरप्रभूति पदार्थों के मनुष्य कृत न होने पर भी वे किसी के भी बनाये हुए नहीं है, ऐसा तो नहीं ही कहा जा सकता, उसी तरह से तनु, मुबन प्रभृति के जीवक न होने पर भी उनमें कार्यत्व का अभाव नहीं है, क्योंकि सावयवत्व हेतु से उनमें कार्यत्व को सिद्धि हो जाती है । इसीलिये जैसे इन्द्र के शिर प्रभृति पदार्थो की मनुष्यकृत कार्यों से विलक्षणता है, उसी तरह से शरीर प्रभृति पदार्थों को भी क्षण सर्वज्ञ परमेश्वरकर्तृकता सिद्ध हो जाती है । प्रश्न है कि शरीरवारी के प्रयत्न के बिना घटादि की कारण सामग्री की प्रवृत्ति यद्यपि नहीं होती, तथापि पृथिवी प्रभृति की कारण सामग्री को किसी देहवारी को भी अपेक्षा नहीं रहती, इसी पद्धति से उसको किसी चैन की भी अपेक्षा नहीं रहेगी, किन्तु अदृष्ट के कारण जीव के संयोग से ही इस सामग्री की प्रवृत्ति हो जायगी, ऐसी अवस्था में लदभिज्ञ ईश्वर को मानने की क्या आवश्यकता है? उत्तर २६

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२०२ वार्थपारिजातः वाच्यम्, क्षेत्रज्ञादृष्टादीनां जडत्वात्पज्ञत्वाभ्यां समवधायकत्वानुपपत्या तत्प्रतिक्षिप्तत्वात् । कुम्भकारादिजीवानां शरीरा-बच्छेदेनेव ज्ञानेच्छाप्रयत्नानामुत्पत्तिनियमेन शरीरापेक्षत्वेऽपि परमेशवर्तनीनां ज्ञानेच्छाकृतीनां नित्यत्वेन शरीरानपेक्षणात् । ' अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्ण: ' ( २० उ ० ३।२२ ) इति शरीरानपेक्षस्य तस्य कर्तृत्वश्रवणाच्च । परमेश्वरस्यापि शरीरग्रहणसम्भवाच्चोत्पत्तिमत्त्वस्याप्रयोकत्वमपि प्रतिक्षिप्तमेव । नित्येतरत्सर्वं सर्वज्ञपूर्वकम्, अचेतनोपादान-त्वादुत्पत्तिमत्त्वाच्च यन्नैवं ततैवम्, यथा परमाण्वादीत्यपि प्रयोगो निर्दष्ट एव । नन्वेवं सर्वस्य द्विकर्तृत्वेन तस्यापीश्वरकर्तृत्वं तस्याप्येवमित्यनवस्थानाद् घटादीनामपि पक्षकुक्षिनिक्षेपाद् दृष्टान्ता-भावापत्तिश्च स्यात् न च व्यतिरेकी हेतुः सम्भवति, कादाचित्कादृष्टपरिपाकादेव देशकालादिनियतकार्योत्पादोपपत्या व्यतिरेकाव्यभिचारस्यानिश्चयादिति चेन्न नित्ये परमेश्वरे सकर्तृकत्वप्रयोजकानामुत्पत्तिमत्त्वादिहेतूनामभावेन तददोषात् । अत एव नित्येतरत् सर्व पक्षतयोपात्तम् । दृष्टान्ताभावोऽपि न दूषणम्, व्यतिरेकिणि हेतौ तदनपेक्षणात् । न चादृष्टपरिपाकात् कार्योत्पादोपपत्त्या व्यतिरेकाव्यभिचारानिश्चयोऽपि समवधायक चेतनकर्तारमन्तराऽदृष्टमात्रात् कार्योत्पादासम्भवस्यासकृदा-वेदितत्वात् । अत एवैकेश्वरानुमाने नानवस्थाप्रसङ्गोऽपि, एकेनैव तेन कार्योत्पत्त्युपपत्त्या परमेश्वरान्तरकल्पनाया अप्रसङ्गात् । मनु बुद्धिशरीरादीनां कर्माशयमूलकत्वेनेश्वरे तदभावात् कथं ज्ञानचिकीर्षादिसम्भव:? तस्यापि कर्माशयाभ्युपगमे येन कर्माशयेनास्य ज्ञानेच्छाशरीरादयो जनयितव्याः सोऽविज्ञातोऽधिष्ठितच चक्षुरादिजननाय न पर्याप्तः । न च तज्जन्येन है कि यह पहले ही कहा जा चुका है कि जीव की जल्पज्ञता और जहष्ट की जड़ता के कारण के कारण समग्र को जुटा नहीं सकते । कुरुय कार प्रभृति जीव शरीरधारी हैं, अतः वे उसी रूप में ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न के आश्रय हो सकते है, बस यहीं पर यद्यपि शरीर की अपेक्षा माननी ही पड़ेगी, किन्तु परमेर में विद्यमान ज्ञान, इच्छा और कृति तो नित्य हैं, अत: इनके लिये शरीर की कोई पापपयस्ता नहीं है । " वह बिना पैर के दौड़ता है, बिना हाथ के ग्रहण करता है, बिना आँख के है और काम के दिन ही सुनता है " इल तार श्रुति में ईश्वर का शरीरानपेक्ष कर्तृत्व चुना जाता है, परमेश्वर भी कभी शरीर ग्रहण कर ही सकता है, इसलिये उत्पत्तिमत्व की अध्योजकता का खण्डन किया गया है । मित्य से भभी पदार्थ पज्ञकृत हैं, क्योंकि इनके अधीन अचेतन है और ये अचेतन उपादान से उत्पन्न होते हैं, जो पदार्थ बनेनोपादान नहीं है, वे सर्वज्ञकृत भी नहीं हैं, जैसे कि परमाणु प्रभृति नित्य पदार्थ, इस निर्दष्ट अनुमान से भी उक्त बात सिद्ध होती है । पुनः प्रश्न उठता है कि इस तरह से सभी पदार्थों के वो कर्ता हुए तो परमेश्वर का भी कोई कर्ता होना और फिर उस कर्ता का भी दूसरा कोई कर्ता, इस सरह से अनवस्था होगी । दूसरी बात पट प्रभृति भी तो पक्षकोटि में ही नष्ट है, अत: यह कोई दृष्टान्त भी नहीं मिलेगा । व्यतिरेकी हेतु भी यहाँ नहीं हो सकता, क्योंकि धर्माधर्म के आकस्कि परिपाक से ही नियत देशकाल आदि से युक्त कार्य की उत्पत्ति बन जायगी, ऐसी अवस्था में व्यतिरेक के गव्यभिचार का निश्चय कैसे होगा? उत्तर है कि नित्य परमेश्वर में सकर्तृकत्व के प्रयोजक उत्पत्तिम प्रभृति हेतुत्रों का यमाव है, अतः आपके द्वारा बताया दोष यहीं नहीं लागू होगा । इसीलिये नित्य से भिन्न लमी पदार्थ पक्ष के रूप में गृहीत होते हैं । दृष्टान्त का अभाव भी यहाँ दूषण नहीं है, क्योंकि व्यतिरेकी हेतु में हृष्टान्त की अपेक्षा नहीं मानी जाती । वाट के परिपाक से कार्य की उत्पत्ति बन जाने से व्यतिरेक के अव्यविचार का निश्चय भी नहीं होना । इस आपत्ति के ers में हम बार - बार कह चुके हैं कि किसी वेतन संयोजक के बिना केवल अष्ट से कभी भी कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती । इसी लिये जब कि अनुमान से एक ईश्वर सिद्ध होगा तो अनवस्था का भी कोई प्रसंग नहीं आवेगा, क्योंकि जब एक ईश्वर से भी सभी कार्यों की उत्पत्ति हो सकती है, तो फिर दूसरे ईश्वर की कल्पना क्यों की जायगी? यह ray f कया गया था कि " बुद्धि, शरीर प्रभृति अवस्था में उसमें ज्ञान, fast प्रभृति की उत्पत्ति कैसे होगी? के ज्ञान, इच्छा, शरीर प्रभृति उत्पन्न होंगे, वह अविज्ञात और पदार्थों का कारण कर्माशय है, ईश्वर में कर्माशय है नहीं, ऐसी यदि ईश्वर में भी कर्माशय माना जाता है तो जिस कर्माशय से ईश्वर अधिष्ठित होकर चक्षु प्रभृति की उत्पत्ति में समर्थ नहीं हो सकता!

पृष्ठ 233

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येवार्थपारिवास: २०३ शरीरादिना तत्सम्भव:, अन्योन्याश्रयात् । न च प्राम्भवीयशरीरान्तरादिना तदुपपत्तिः जन्यसमये तस्यातिवृत्तित्वात्, इत्यादि तुच्छम् जन्यज्ञानादीनां कर्माशयापेक्षत्वेऽपि नित्यानां तदनपेक्षणात् । कर्माशयपूर्वकत्वं ज्ञानादीनां त्वनभ्युपगमपरा-gana | नित्या सर्वनिषा बुद्धिस्तु साधितैव । यदुक्तम् परमेश्वरस्य प्राप्ताखिलप्रापणीयस्य प्राप्तव्याभावादत एव क्रोडासाध्यसुखस्यापि प्राप्तत्वान्न क्रीडार्थ-मपि प्रवृत्तिः । नापि कारुण्येन परार्थं प्रवृत्तिः, सुखभयस्यैव लोकस्य सृष्टिप्रसङ्गात् ' इति, तदप्यसङ्गतम्, धर्माधर्मसापेक्षस्य परमेश्वरस्य विचित्रप्रपञ्चनिर्माण बाधानुपपत्तेः । न च दुःखहेतोरधर्मस्य कारुण्येनाधिष्ठानं नोपपद्यत इति वाच्यम्, तस्यापि पापक्षयवैराग्यादिजननाद्युपायतया कारुण्येन तदधिष्ठानोपपत्तेः । न च दुखोत्पादस्यश्वराधीनतया तस्य तत्र वैमुख्येन तदनुत्पादे तदत्यन्तविमोक्षरूपस्यापवर्गस्यानायाससिद्धत्वात् कृतं कारुण्येन परार्थप्रवृत्येति वाच्यम्, सृष्टिमन्तरा तत्त्वसाक्षात्कारानुप-पत्तेः । तत्त्वसाक्षात्कारमन्त रानाद्यविद्याकामकर्मलक्षणबन्धनिवृत्तिपूर्वक परमानन्दावाप्तिलक्षणो मोक्षो न सिद्ध्यति, ' ऋते ज्ञानान मुक्ति: ', ' तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति ' ( वा ० सं ० ३१११८ तथा श्वे ० उ ० ६।१५ ३१८ ) इति श्रुतिविरोधात् । तत्त्वसाक्षात्कारस्तु वेदान्तश्रवणादिसाधनमन्तरा नोत्पद्यने, श्रवणादिकञ्च देहादिसृष्टिमन्तरा नोपपद्यत इति कुतः सृष्टिमन्तरा तद्वैमुख्यमात्रेण मोक्षसिद्धि:? एतेन नेश्वरः कर्ता, प्रयोजनाभावात् अनित्यमीश्वरज्ञानं ज्ञानत्वात् - इत्यादीनि प्रत्यनुमानानि निरस्तानि वेदितव्यानि } सृष्टिप्रयोजनस्योक्तत्वात् ज्ञाननित्यत्वस्य साधितत्वात् ईश्वरस्य व तज्ज्ञानस्य च धर्मिणोऽप्रसिद्ध हेतोराश्रयासिद्धत्वात्, प्रसिद्धौ धर्मिग्राहरुविरोधाच्च । कर्माशय जन्य शरीर से भी इसकी उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि इस तरह कन्योन्याभय दोष होगा | पूर्व जन्म के परोशनार से इसकी उत्पत्ति नहीं बनेगी, क्योंकि नुतन के मय उसकी निवृत्ति हुई रहती है " । वस्तुतः इस कथन में कुछ सार नहीं है, क्योंकि जन्य ज्ञानादि के लिये हा काजय की अपेक्षा रहती है, नित्य ताप, इच्छादि के लिये इसकी कोई आवश्यकता नहीं रहती । ज्ञानादि को कर्माशय गुहा का हम वकार नहीं करते । सर्वोपयत्र नित्य जाम की सिद्धि की जा चुली है । प्राप्त होने वाला दुह भी उसकी बात है, तब उसकी प्रवृति यह भी कहा गया है कि पत्र को सब कुछ बात है, उसमें कुछ ई मा नहीं है । इसीलिये क्रीन से क्री के लिये भी नहीं होगी । गुरे के ऊपर करणा से उसकी प्रवृति ही क्यों न बनायेगा | हर कथन को भी हम असंगत मानते क्योकि अपंण में निर्माण में कोई वादा नहीं है । वारणाय परमात्मा दुःष के हेतु का नहीं होगी, क्योंकि करुणा होने पर वह सारी सृष्टि सुख धर्माधर्म की सहायता से अधिष्ठाता की हो सकता है? वजन का उत्तर यह है कि यह दुआ भी पाप के साथ और वैराग्य यादि की उत्पत्ति में सहायक होता है, इसका व्दारा भी भगवान् करुणावा मापन के कल्याण के लिये हो लेता है । आप यह नहीं कह सकते कि " दुःख की उत्पति ईश्वर के अधीन है, वह ईश्वर बुन में विमुख हो जाय तो उसकी उत्पांत ही नहीं होगी और दुःख का अत्याविना हो सो वर्ग कहता है, तो इस प्रकार यह अपवर्ग जोन के लिये बनाया सिद्ध हो जायगा, ऐभी नववा में करुणावच ईश्वर की जीव के अपवर्ग के ज्ञान के लिये प्रवृत्ति मानना व्यर्थ है, क्योकि दिला सृष्टि के तत्व का साक्षात्कार नहीं हो सकता और तस्थ के साक्षात्कार के बाद विद्या और नाना प्रकार की इच्छाओं एवं कर्मों के कन्चन से नाव छुटकारा नहीं पा सकता, इनकी निवृति के दिना परम आनन्द की प्राप्ति रूप मोक्ष सिद्ध ही नहीं हो सकता । ऐसा न जानने पर " ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती ", " उस ग्रह को जानकर ही मनुष्य अमृत पद ( पोथ ) को प्राप्त करता है " इत्यादि श्रुतियों का विशेष होगा | तत्व का साम re कार वेदान्त श्रवण प्रभृति साधनों के बिला नहीं हो सकता और श्रवण - मनन आदि कार्य देहादि की सृष्टि ही मोक्ष की सिद्धि कैसे हो सकती है? इस प्रतिपादन से " ईश्वर कर्ता नहीं " ईश्वर का ज्ञान अनित्य है, क्योंकि दीव के ज्ञान की तरह वह भी ज्ञान ही क्योंकि सृष्टि का प्रयोजन बताया जा चुका है और ज्ञान की नित्यता को भी के fear नहीं होंगे, केवल सृष्टि से विमुख होने से है, क्योंकि सृष्टि करने में उसका कोई प्रयोजन नहीं है ", हैं ", इस तरह के विरोधी अनुमान निरस्त हो जाते हैं, सिद्ध कर दिया गया है । ईश्वर के और उसके ज्ञान के प्रसंग में यदि धर्म को अप्रसिद्ध माना जाता है, तो हेतु आश्रयासिद्धि नामक Tere से दुष्ट होगा और प्रसिद्ध मानने पर धर्मग्राहक प्रमाण से विशेष होगा ।

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२०४ वेदार्थपारिजातः यदुक्तम् ' क्षित्यादिषु सावयवत्वेन कार्यत्वानुमानमपि न सम्भवति, क्षित्यादिकमकार्यम्, अशक्यक्रियत्वाद अशक्यो-पादानविज्ञानत्वाद महाभूतशब्दवाच्यत्वाच्चेत्याद्यनुमानः सत्प्रतिपचितत्वादिति ', तदपि न क्षोदक्षमम्, आभाससमानयोगक्षेम-त्वात् । तथाहि — कुतोऽशक्यक्रियत्वादिकं ज्ञायते? जीवेषु तददर्शनादिति चेत्, तदपि मन्दम्, नहि यदस्मदादिषु न दृष्टं तदन्यत्रापि न सम्भवति । नहीदानीं सार्वभौमः सम्राड् नोपलभ्यत इति तत्सत्त्वमन्यदापि बाधमर्हति । स्मर्यन्ते पुराणादिषु तादृक्सम्राजरचेदत्रापि स्मरणं समानमेव । प्रजापतिविश्वामित्रादयः स्यर्यन्ते विचित्रशक्तिमन्तः, अत्रापि पुण्यविशेषोपचयेनाति-शयता दृष्टेति सम्भावनया जीवानामपि विशेषकार्यकर्तृत्वानुमानाच्च । किच, नहि सिद्धं साध्यते, तस्य सिद्धत्वादेव | यस्योत्पत्तिदृष्टा न तस्य कार्यत्वं साधनीयम्, यस्य न दृष्टा तस्यैव साध्यते सा । कार्यत्वसिद्धयैव तेनैव धर्मिग्राहकमानेन तदनुगुणा शक्तिर्ज्ञानं चापि सिद्धयत्येव । तृतीयहेतुस्त्वप्रयोजकः, अनु-कूलतर्काभावात् । सावयवत्वकार्यत्वयोस्तु घटादिषु दृष्टः कार्यकारणभाव एव व्याप्तिसाधकः । सातिशयानां परिमाणानां परममहत्त्वस्याकाशेऽणुत्वस्य परमाणौ काष्ठाप्राप्तिर्दृष्टा । विज्ञानञ्च लोके एक - द्वि - बहु-विषयतया सातिशयं दृष्टमिति तदपि कचित् काष्ठां प्राप्तम् । विदितसपस्तवेदितव्ये परमेश्वरे तत्काष्ठाप्राप्तिर्युता, " तत्र निरतिशयं सर्वज्ञवीजम् " ( ११२५ ) इति पातञ्जलसूत्रात् । पूर्वप ने यह भी कहा है कि " सावा हेतु से पृथिवी प्रभृति में कार्य का अनुमान नहीं किया जा सकता, क्योंकि पृथ्नो प्रभृति कार्य नहीं है, क्योंकि उनकी बना पाता शरण है, इतकी साधन - सामग्री को जान पाना कठिन है और ये महाभूत शब्द के बाप है, इत्यादि विरोधी अनुमानों से कार्यत्व हेतु सरप्रतिपक्ष नामक हेलाभा से सुट है ", यह कथन भी करो दिये गये वहीं का उतर देने में समर्थ है, क्योंकि आपके किये गये सभी अनुमान वर्क की कसौटी पर करे नहीं उतरते, इसदिये है, अर्थात् के विध्याज्ञान की तरह तभी एक टिक पाते है जब तक कि तर्कों में सही थिति बात नहीं हो जाती । साथ यह बताइये कि सृष्टि क्यों नहीं भी जा सकती? जीन पल्क, नहीं, सकुन आदि वहीं बना सकते, इसलिये इन काना जाना सम्भव नहीं है । यह दुर्ब, क्योंकि वो हमें नहीं देखा नाना, ह अन्यत्र भी नहीं है ऐसा कैसे सकते हैं । आजकल सर्वसम्राट् नही है, इसका मतलब यह नहीं है कि ऐ उम्राट् फर्मी था ही पड़ीं । पुराणों में यदि उस के बनादों की स्मृति सुरक्षित है, तो हमारा प्रतिपादित सिद्धान्त की उन्हीं पुरुषों में सुरक्षित: प्रतिविमादिभृतिका शक्तियों का वर्णन वही शिक्षा अन्दयों से पुण्य विशेष से वृद्धि होने पर विशेष जाता है, इस अवस्था में प्रभ्य जीवों में यी विष कर्म को करने का सामर्थ्य को सिद्धि अनुमान द्वारा ईतीहै । अपि च, सिद्ध को नहीं साधा जाया, क्योंकि यह तो मिद्ध ही है । जिसकी उत्पत्ति देखी रात के कार्य को सिद्ध नहीं करना है । जिसकी उत्पति नहीं देगी तो में कार्य जो सिद्ध करना है । जब पर्यटन की सिद्धि हो गई तो ती धर्मो के ग्राहक प्रमाण से तदनुरूप पक्ति और साम की भी सिद्धि हो जाती अर्थात् कार्य की विभाग इसके बनाने पाले की भी विचित्र शक्ति चीर प्रशारण ज्ञान की सिद्धि हो ही जायगी । आपका तृतीय हेतु अभीष्ट सिद्धि में सवर्थ है, क्योंकि उसकी सहायता के लिये कोई अनुकूल तर्क नहीं है । बाका नादि महाभूत होते हुए भी पैदा होने वाले भी हों, इसमें क्या बाधा है? सावयवत्व ( बापत वाला ) और कार्यत्न ( पैदा होने वाला ) से दो व्याति की सिद्धि पादि में देखे भये कार्यकारणयाव के आधार पर हो जायगी । परिमाणों की सातिशयता का जब हम विचार करते हैं, तो आकाश में परम महत्व को बीर परमाणु में अणुव की मि स्थिति कमको दिखाई देती है । यहाँ स्थिति लोक में विज्ञान की है, किसी को एक free का किसी को दो या तीन विषय का ज्ञान हैं । इस ज्ञान की भी पराकाष्ठा कहीं होनी चाहिये | जिसको समस्त ज्ञातव्य वस्तुओं का ज्ञान है, ऐसे परमेश्वर में ही ज्ञान की पराकाष्ठा मानना उचित होगा, " उस ईश्वर में सर्वविषयक निरतिशय ज्ञान की स्थिति है ' यह पातंजल ( योग ) सुन इस विषय में प्रमाण है ।

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२०५ ननु यतः पर नास्ति सा काष्ठा, तदा भवतु तत्प्राप्तिः, न च तया सर्वविषयत्वप्राप्तिः, भूयिष्ठविषयत्वे तु नेष्ट-सिद्धि: । यथा पार्थिवान्तरापेक्षया पार्थिवगोलस्य बहुतराकाशव्यापित्वेऽपि न सर्वव्यापिता । ' यतः परं न सम्भाव्यते सा काष्ठा ' इत्यपि न सम्भवति, सातिशयानां घटादिकार्यद्रव्याणां परासम्भावनीयातिशायित्वादर्शनात्, अन्यथैकेनैव स्पर्शवता सर्वव्याप्त्या तादृशान्यानवकाशप्रसङ्गात् । यद्यसाधारणगुणस्यैवायं धर्म इति, तदपि न युक्तम्, मनुष्य - वात- हरिण - हरि - पत-त्रिणां प्रयत्नविशेषाद्दूरान्तिकप्राप्तिदर्शनेनासम्भावनीयपरातिशयस्य विशेषस्यादर्शनेन व्यभिचारात् । निरवशेषगन्तव्य-देशप्राप्त्या हि निरतिशयः प्रयत्नो भवेत् । गन्तव्यस्य नभसोऽनन्ततया कथं तत्सम्भवेत्? किन, परममहत्त्वस्य पर्यवसानमाकाशे गदितम् । यदि तत्परिमितम्, ततः कुतस्तस्यासम्भाव्यपरावस्थत्वम्? यद्यानन्त्यमेवाकाशस्य न परिमितत्वम्, तदापि किमानन्त्यम्? यदि परिच्छेदाभाव एवानन्त्यम्, तद्वदेवेश्वरज्ञानस्याप्यानन्त्यम्, सैव च काप्राप्तिरिति, तदपि न युक्तम्, तस्यात्मीयज्ञानस्य साकल्येनापरिज्ञानेऽल्पज्ञत्वापत्तिः । ज्ञाने वा कथमानन्त्यम्? परिच्छेदनान्तरीयकेणेयत्तावधारणेनापास्तत्वादिति । तत्रोच्यते --- असाधारण्ये गुणत्वे सति सातिशयानां काष्ठाप्राप्तिरित्युक्त दोषाभावात् । न च प्रयत्नविशेषाद-न्तिकदूरप्राप्तो काष्ठान्प्राप्तिरिति वाच्यम्, सर्वातिशायिपरेशप्रयत्नस्य काष्ठात्रापरिष्टत्वात् । " पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ” ( ऋ ० सं ० १०१ ९ ०१३ ), " अत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ” ( ऋ ० सं ० १०१ ९ ०११ ) इत्यादिश्रुतिभिः परमेश्वरस्य प्रश्न है कि काला उसने कहा जाता है, जिसके बागे कुछ न हो, इस लक्षण में काष्ठा प्राप्ति मानी जा सकती है, किन्तु इव वणी विषयी भी गांव तो ही यहीं, इ प्राणिी बधित विषयों तक ले गाय तो उसे भी इष्टसिद्धि नहीं होगा । जैसे कि अन्य पदार्थों की परीक्षा मृगाय वर्वाधिक मापी को किंतु को सर्वव्यापक यहीं कहा जाता । इससे चाल काष्ठा पाणी दीप वितान पैदा की वाले दमों का सर्वाधिक निय घमण कोई दिखाई नहीं से रूप वेगास दोन ना सके । घंटे से होकर बड़े से जा न ही नदी ही यहीं पड़ा हो ही नहीं पता हो ही नहीं रुक are of c एतशान् मय के होना हो जाय के लिये कोई नहीं रह पायगा: यदि असाधाय शुभ जी कयन साफ वो यह जी का नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य, परत, हरिण, उदर और पक्षी माने मौत के प्रयोग की के पास पहुंचते है, पर अति की संभावना वासी विशेषता नहीं देशी छाती, ना की रिवार हा गर्भ त देश को शांति होने पर हो पवन की निसंदेशरता भावी जावो | यह पत्तव्य आकाश के अनन्त ज्ञान से कसे हा सकती है? नभ वाश से परप महत्व का पर्यवसान बाया गया है । यदि वह परिचित हैं तो उसी परावस्था कवच केले हो भरणी? यदि आकाश प्रत ही है को यह परिमित नहीं हो सका । फिर यह भी बताइये कि परिचित यावन्ध्य क्या है? यदि वॉशाद के अभाव को वन्तता पहने है, सा उसी तरह से ईश्वर के ज्ञान में भी आनन्त्य माना बायवा वीर यहीं राष्ठा प्राप्ति भा होगी । यह का भी इसलिये ठीक नहीं होगा कि ईश्वर को अपने शान का सम्पूर्ण रूप से ज्ञान है या नहीं? यदि नहीं तो उसक अल्पज्ञ बनना पड़ेगा और यदि ज्ञान है तो फिर उसका ज्ञा r ar न्स नहीं रहा । ईश्वर के ज्ञान की सीमा हो गईं, दिना सीमा हुए सम्पूर्ण ज्ञान हो नहीं सकता, इस रीति में ईश्वर के ज्ञान की अनन्तता भी खण्डित हो ही जाती है । न स शंकानों का उत्तर वह है - गुण की अवधारणता में सातिशय पदार्थों की काष्य प्राप्ति होती है, ऐसा बनने पर कोई दोष नहीं होगा | प्रयत्न विशेष से पास और दूर की वस्तु की प्राप्ति को काष्ठा - प्राप्ति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि हम केवल fart परमेश्वर के प्रयत्न की ही काष्ठा - प्राप्ति अभिप्रेत है । " इस परमेश्वर का एक अंश ग्रह द्वारा जगत् है, और इसके अमृत स्वभाव के तीन अंश दिव्यलोक में हैं ", " यह परमात्मा दशांगुल रूप धारण कर इस जगत् में छाये हुए हैं " इस प्रकार की श्रुतियों परमेश्वर को सारे प्रपंच से ऊपर जब कहती है, तो उससे परमेश्वर के प्रयत्न की निरतिशयता का भी समर्थन हो जाता है । इस तरह

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२०६ मेदार्थपारिजातः सर्वप्रपञ्चातिक्रान्तत्वेन तत्र प्रयत्ननिरतिशयत्वस्याप्युपपत्तेः । न चैवमीश्वरस्यात्पज्ञत्वप्रसङ्गः, अनन्तस्यानन्तत्वेन ज्ञाने सर्वज्ञत्वानपायात् । तत्रेयत्तावधारणस्यैव भ्रान्तिमूलकत्वेनाल्पज्ञत्वप्रयोजकत्वाचच! यदुक्तम् --विवादाध्यासितमनेककर्तृकं कार्यत्वात् विचित्रसन्निवेश सार्वभौमसदनवदिति जगतोऽनेककर्तृकत्वज्ञान-सिद्धा पक्षधर्मताया दौर्बल्येन सर्वज्ञसर्वकर्तुरेकस्येश्वरस्यासिद्धि: ' इति तदपि तुच्छम् अस्मदादिषु पृथिव्यादिनिर्माणानुगुण-सामर्थ्याद्यभावदर्शनादनुमानेन तादृक्सामर्थ्यवतां साधनेऽनेनादृष्कल्पनापेक्षया तादृगेवेश्वरकल्पनायां लाघवादन्यत्र गौरवाच्च । पुण्यविशेषैस्तद्वतां साधनेऽनेकेश्वरपक्षोक्तदोषाश्च प्रसज्येरन् । एतेन भूभूधरादिनिष्ठ कार्यत्वं न बुद्धिमदेककर्तृकत्वसाधकम् समूहनिष्ठत्वात्, बट - पट - स्तम्भादिसमूहनिष्ठकार्यत्व-वदित्यपास्तम्, एकस्याप्यनेकवस्तुसमूह्कार्यकरणसामर्थ्यदर्शनेन हेतार्व्यभिचारित्वाच्च । यदुक्तम् --- ' क्षित्यादिगतं कार्यत्वं युगपदुत्पद्यमानसर्वगतं क्रमिकोत्पद्यमान सर्वगतं वा? आद्ये आश्रयासिद्धिः, द्वितीये विरोध इति, तदपि तुच्छम्, तदुभयसाधारणस्य हेतुत्वे बाधाभावात् । जगदेक चेतनाधीनम्, अचेतनारब्धत्वात्, नीरोगस्वशरीरवत् । एकचेतनाधीनोत्पत्तिस्थितिकत्व से बैंक चेतनाधीनत्व-मित्यनेनापीश्वरसिद्धिः सम्भवति । न च नीरोगस्यापि शरीरस्य पितृ - पुत्राद्यनेकचेतनादृष्टजन्यत्वेन तदुत्पत्तिस्थित्योस्तद-ardhar नाधीनत्वाभावेन दृष्टान्ते साध्यवैकल्यमिति वाच्यम्, तत्रादृष्टाद्वारकत्वे सतीति हेतोविशेषणीयत्वेन दोषाभावात् । से ईश्वर अल्पज्ञ नहीं हो जायगा, क्योंकि अनन्त की अनन्ता के कारण इसके शाम में सर्वज्ञता रहेगी ही । इसमें इशा का अवधारण भ्रान्ति के कारण ही हो सकता है और वही बल्पज्ञता का भी प्रयोजक हो सकता है । यह अनुमान किया गया था कि - ' ' विवाद के विषय पृथिवी साग, पर्वत प्रभृति पार्थो के अनेक कती है, क्योंकि विभिन रूप - रंग वाले सार्वभौम राजा के महल की तरह ही ये भी कार्य है । जजपद के अनेक कर्तानों की तिथि इन अनुदान से हो गई तो उस अवस्था में पता के दुर्बल पढ़ जाने से सर्वेश, एक ईश्वर की सिद्धि नहीं हो पादेन " हक भी इतरत्रये बहुत हल्का है हम लोगों में कृषियों प्रभृति है निर्माण के अनुष्य ज्ञान और सामर्थ्य का अमल है, अतः हर तरह के सामर्थ्य अनुपात सिद्धि होगी तो इसकी समर्थ्य वाले एक वाचे ईश्वर की विद्धि धनुतान से ही होगी । ईश्वर को मारने में फ्री लाघव है । तब ताहरा वाले अनेक परों की कल्पना क्यों की साथ क्योंकि ऐसा भी होना । पुष्पविशेष से पुण्यवानों को शिद्धि अप में भी के ही दो उपस्थित होगे जो कि ईश्वर को मानने वाले के पक्ष में हैं । उक्त प्रतिपादन के इस बात का ण्डन हो जाता है कि " की, पर्वत आदि किसी एक विधान के द्वारा मारे गये कार्य नहीं हैं, ट, पट, स्तम्भ यादि सामूहिक कार्यों के निर्माता देखे गये हैं, एक नहीं, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदि भी सामूहिक कार्य ही है, अतः इनके भी निर्माता अनेक हो होने चाहिये ", क्योंकि एक व्यक्ति भी अनेक वस्तुओं के समूह रूप कार्य के उत्पन्न करते देखे गये हैं. इसलिये बाप का हेतु धाभिवारी भी है । यह जो बाप ने कहा है कि " पृथिवी आदि कार्य व एक साथ उत्पन्न होने वाले हैं, हैं? प्रथम पक्ष में आश्रयासिद्धि और दूसरे पक्ष में विरोध होगा ", किन्तु यह कथन भी तुच्छ है, उत्पद्यमान और क्रमिक रूप से उद्यमान सभी कार्यों में विद्यमान हैं, अतः इसमें कोई दोष नहीं है । अथवा पय क्रमशः उपन्न होने वाले क्योंकि कार्यत्य युगपत् ( एक साथ } यह जगत् एक चेतन के अधीन है, क्योंकि अचेतन से मारन्य है, जैसे कि अपना नीरोग शरीर | एक चेतनाथ उत्पत्ति और स्थिति को ही एक चेतनाधीन पद से कहा जाता है, अत: इस अनुमान से भी ईश्वर की सिद्धि हो जायगी । नीरोग शरीर पिता, पुत्र आदि अनेक चेतन प्राणियों के अदृष्ट से उत्पन्न होता है, अतः उसकी उत्पत्ति और स्थिति छन अनेक चेतनों के अधीन है, एक चेतन के अधीन नहीं, इस तरह से यद्यपि दृष्टान्त में साध्यविकलता दोष उपस्थित होगा, किन्तु हेतु में ' अष्टाद्वारकता ' यह विशेषण जोड़ देने से इस दोष का परिहार हो जायगा, क्योंकि यहाँ पर पिता पुत्र प्रभृति चेतनों की उपादानता मदृष्ट के द्वारा ही है और ईश्वर के द्वारा उत्पन्न होने वाले जगत् में ऐसा नहीं है ।

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देवार्थपारिशवतः २०७ एवमेव शरोरस्थितिः किं स्वावयवसमवेता, उत प्राणनम्? आद्येऽवयवाधीनत्वान्न चेतनापेक्षा घटादिवत् । द्वितीये क्षित्यादीनां शरीरत्वाभावेन पक्षेऽसम्भव इति पक्षपक्षानुगत स्थित्यनुपलम्भ इत्यपि निरस्तम्, तदधीनसत्तास्फूर्ति-मत्स्यैव चेतनाधीनस्थितिपदार्थत्वेनाव्यभिचारात् । यदुक्तम् --- ' अशरीरत्वादीश्वरो न कर्ता, मुक्तात्मवदिति प्रत्यनुमानेन तद्वाध: ' इति, तत्र, ज्ञानविशेष राहित्य स्यो-पाधित्वेन तस्याकिञ्चित्करत्वात् । तपोयोगादिलब्धसामर्थ्यानामनेकेषां जीवानां विश्वकर्तृ स्वकल्पनापेक्षयैकेश्वर कल्पनायां लाघवमुक्तमेव, अनेकेषां स्वातन्त्र्येण कर्तुत्वे वैमत्यावश्यम्भावित्वेन कार्यानुत्पादप्रसङ्गात् । धर्मजनितःवेन हीश्वरत्वस्य य एवं तादृग्वर्मवान् स एवेश्वरः स्यात् तद्वशाच्चेश्वर बहुत्वप्रसक्तः । तत्र चैकस्यैश्वर्ये-णान्येषामैश्वर्य समे न्यूने वा गोपपत्तिः । न्यूनत्वे यदेवातिशयि तदेवैश्वयं स्यात्, इतरेषां तु भाक्तमेवैश्वर्यं स्यात् । साम्येऽ-विरोधेन सम्भूयेशितृत्वे परिषद् इव न कस्यापीश्वरत्वम्, सम्भूयेशितृत्वात् । प्रत्येकमीशत्वे तेषु केनचिदेवेशतायाः कृतत्वात्, अन्येषां नरर्थस्यात् । स्वतन्त्राणां बहूनामेकाभिप्रायासम्भवेन विरुद्धाभिप्राये न कस्यचित् कार्यस्योत्पादः । उत्पादे च परस्परविद्धस्वभागं जगदुपलभ्येत । वस्तुतस्तु मीमांसकानामपि नेश्वरस्य तत्सर्वज्ञतायाश्च खण्डने तात्पर्यम्, किन्त्वनुमानस्वातन्त्रखण्डन एव । अत एवोत्तरगीमांसकः-- " तं त्वोपनिषदं पुरुषं पृच्छामि " ( बृ ० उ ० ३१ ९ १२६ ), नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' ' ( तै ० ब्रा ० इस तरह से अपने अत्रों में समवायसम से रहने को ही शरीर की स्थिति कहते हैं या श्वास - प्रश्वास लेने को? प्रथम पक्ष में शरीर की स्थिति श्री सीता दोन मे उसमें घटादि को तरह वेतन की आवश्यकता नहीं रहेगी, क्योंकि वह अपने अवयवों में रहने के लिये वेतन की अपेक्षा नहीं रखता ऐसे ही शरीर को अपने में उसे चेतन की क्या आवश्यकता है? द्विपक्ष में पृथिवी नाहि दे गये के नहीं स्यानिये पक्ष में हेतु असंभव हो जायगा, आप जीन पक्ष हैं और कौन सपक्ष ( दृष्टान्त ) है, इस बात या 14 नहीं एक पावेगा इसका नवाबान भी इस प्रकार हो जाता कि चेतनाधोन स्थिति ' इस पत्र का अर्थ हो मैं तदयोग साफूर्ति यतः यहाँ पर टोष नहीं । सी सचा वेतन के अधीन हो और जिसकी स्फुटितन यघोष हो, उसी की बंगलीन स्थिति वाला पदार्थ कहा जाता है । यह ओ कहा यम है कि ' रात होने से ईश्वर कर्ता वहीं है, जो कि मुक्तात्मा ' इस विपरीत अनुपान में ईश्वर का कर्तृत्व बाधित हो जायगा ", किन्तु इस अनुमान से ज्ञान विशेष राहित्य उपाधि है, अतः यह सांपाषिक अनुमान किसी काम का नहीं है । तप, योग पार्टि से नामर्थ्यादिशय मात्र मात्र कक्षा एक ईश्वर को दिन का कर्ता मानते में लाघन है । एक बात और भी यह है कि अनंत जीव यदि स्वरूप कर्ता माने जायेंगे, तो उनमें मतभेद का होना अवश्यंभावी है, ऐसी अवस्था में कोई कार्य उत्पन्न हो न हो सकेगा । ईश्वरस्य धर्म के उत्पन्न होता है, अतः जो ईश्वर धर्म से युक्त है, वही ईश्वर है, इस ईश्वरल धर्म के कारण ईश्वर की अनेकता को ग्रापति उ सकती है, एक ऐववर्य से ही दूसरों का ऐश्वर्य मानने पर उनकी समता और न्यूनता की उत्पत्ति नहीं बनेगी, क्योंकिन्यूनता में जिसमें दर्बाधिक ऐश्वर्य होगा, वही ईश्वर होगा, अन्यत्र ईश्वरत्व लाक्षणिक माना जायगा । समान ऐश्वर्य मानने पर भी बिना विरोध के सबका मिलकर ऐश्वर्य उसी प्रकार का माना जायगा, जैसा कि परिषद का स्वरूप रहता है, इसमें कोई भी ईश्वर नहीं होता, क्योंकि सभी मिलकर समान स्तर पर किसी निर्णय पर पहुँचते हैं । प्रत्येक का ईशित्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसमें से कोई एक हो अध्यक्ष का कार्य करता है, ऐसी अवस्था में अन्यत्र ईशित्व निरर्थक हो जायगा । स्वतन्त्र अनेक व्यक्तियों के एक अभिप्राय के न रहने के कारण यदि वे विरुद्ध बभिप्राय वाले हैं, तो कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं हो सकेगा और यदि उत्पन्न भी होगा तो परस्पर विरोधी स्वभाव वाला ही जगत् बन पावेगा । में तो भीमकों का तात्पर्य ईश्वर के खण्डन में अथवा उसकी सर्वेशता के खण्डन में नहीं है, किन्तु वे खण्डन करते हैं केवल अनुमान के स्वतन्त्र प्रामाण्य का । इसी लिये अनुमान सिद्ध ईश्वर का खण्डन करने पर भी वेदों से सिद्ध ईश्वर का खण्डन के नहीं करते | उत्तर सीमलक ( वेदान्ती ) के मत में " मैं उस उपनिषदों से हो जाने जा सकने वाले पुरुष ( ब्रह्म ) के विषय में पूछता हूँ ", " वेद को

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बेदार्थवरितः २०७ एवमेव शरोरस्थितिः किं स्वावयवसमवेता, उत प्राणनम्? आद्येऽवयवाधीनत्वान्न चेतनापेक्षा घटादिवत् । द्वितीये क्षित्यादीनां शरीरत्वाभावेन पक्षेऽसम्भव इति पक्षसपक्षानुगत स्थित्यनुपलम्भ इत्यपि निरस्तम्, तदधीनसत्तास्फूर्ति-वस्यैव चेतनाधीनस्थितिपदार्थत्वेनाव्यभिचारात् । यदुक्तम्-- ' अशरीरत्वादीश्वरो न कर्ता, मुक्तात्मवदिति प्रत्यनुमानेन तद्वाध: ' इति, तत्र, ज्ञानविशेष राहित्य स्यो-पाधित्वेन तस्याकिञ्चित्करत्वात् । तपोयोगादिलब्धसामर्थ्यानामनेकेषां जीवानां विश्वकर्तृत्वकल्पनापेक्षयैकेश्वर कल्पनायां लाघवमुक्तमेव, अनेकेषां स्वातन्त्र्येण कर्तृत्वे वैमत्यावश्यम्भावित्वेन कार्यानुत्पादप्रसङ्गात् । धर्मजनितत्वेन हीश्वरत्वस्य य एवं तादृग्धर्मवान् स एवेश्वरः स्यात्, तद्वशाच्चेश्वर बहुत्वप्रसक्तः । तत्र चैकस्यैश्वर्य-णान्येषामैश्वर्य समे न्यूने वा गोपपत्तिः । न्यूनत्वे यदेवातिशयि तदेवैश्वर्यं स्यात्, इतरेषां तु भाक्तमेवैश्वर्य स्यात् । साम्येऽप्य-विरोधेन सम्भूयेशितृत्वे परिषद् इन न कस्यापीश्वरत्वम्, सम्भूयेशितृत्वात् । प्रत्येकमीशत्वे तेषु केनचिदेवेशतायाः कृतत्वात्, अन्येषां नैरर्थस्यात् । स्वतन्त्राणां बहूनामेकाभिप्रायासम्भवेन विरुद्धाभिप्रात्त्वे न कस्यचित् कार्यस्योत्पादः । उत्पादे च परस्परविद्धस्वभानं जगदुपलभ्येत । वस्तुतस्तु मीमांसकानामपि नेव्वरस्य तत्सर्वज्ञतायाश्च खण्डने तात्पर्यम्, किन्त्वनुमानस्वातन्त्रखण्डन एव । अत एपोत्तरगीमांसकै: -- " तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि " ( बृ ० उ ० ३ शश २६ ), " नावेदविन्मते तं बृहन्तम् ' ( तै ० ब्रा ० इसी तरह से अपने अवों में सवाय सम्बन्ध में रहने को ही शरीर की स्थिति कहते हैं या श्वास - प्रश्वास लेते को? प्रथ का पक्ष में शरीर की स्थिति में पता होने से उसमें हादि की तरह वेतन की आवश्यकता नहीं रहेगी, क्योंकि वह वपते अत्रयों में रहने के लिये चेतन की अपेक्षा नहीं पता ऐसे ही शरीर मो व वयो में महे | उसे चेतन की क्या आवश्यकता है? द्वितीय एक में घृथिवी भवि ने मके के पक्षि में हेतु असं हो जायगा, अतः फोन पक्ष है और कौन सपक्ष ( हृष्टान्त ) है, इस बात का नहीं तारकृति अतः यहीं पर यावान भी इस प्रकार हो जाता कि चेतन स्थिति ' इस पत्र का हो है तदान सत वेतन के अधीन हो और जिसकी स्फति संतम दोष हो । वर्षत्र हो, उसी को बाताधीन स्थिति भाजा पदार्थ कहा जाता है । यह भी कहा गए है कि होने से ईश्वर कर्ता नहीं है, जो कि मुक्तात्मा ' इस विपरीत अनुमान से ईश्वर का कर्तृत्व शक्ति हो जागना ", किन्तु इस अनुमान में ज्ञान विशेष राहित्य उपाधि है अतः यह सोपाधिक अनुमान किसी काम का नहीं है । योग पादि से पापयतिशय यह में कि अनेक जीव यदि स्वरूप हो न हो सकेगा । जीवों की अपेक्षा एक ईश्वर को दिन का कर्ता मानने में लाघव है । एक बात और भी माने जायेंगे, तो उनमें मतभेद का होना अवश्यंभावी है, ऐसी अवस्था में कोई कार्य ईश्वरस्य धर्म पे उत्पन्न होता है, अतः जो ईश्वरत्व धर्म से युक्त है, वही ईश्वर में, इस ईश्वरत्व धर्म के कारण ईश्वर की अनेकता को आपत्ति उठ सकती, एक ऐश्वर्य से ही दूसरों का ऐश्वर्य मानने पर उनकी समता और न्यूनता की उत्पत्ति नहीं बनेगी, क्योंकि में जिसमें दर्बाधिक ऐश्वर्य होगा, वही ईश्वर होगा, अन्यत्र ईश्वरत्व लाक्षणिक माना जायगा । समान ऐश्वर्य मानने पर भी बिना विरोध के सब का मिलकर ऐश्वर्य उसी प्रकार का माना जायगा, जैसा कि परिषद का स्वरूप रहता है, इसमें कोई भी ईश्वर नहीं होता, क्योंकि सभी मिलकर समान स्तर पर किसी निर्णय पर पहुँचते हैं । प्रत्येक का ईशित्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसमें से कोई एक हो अध्यक्ष का कार्य करता है, ऐसी अवस्था में अन्य ईशित्व निरर्थक हो जायगा । स्वतन्त्र अनेक व्यक्तियों के एक अभिप्राय के न रहने के कारण यदि के विरुद्ध बनाय वाले हैं, तो कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं हो सकेगा और यदि उत्पन्न भी होगा तो परस्पर विरोधी स्वभाव वाला ही जगत् बन पावेगा । वास्तव में तो मीमांसकों का तात्पर्य ईश्वर के ause में reet उसकी सर्वशता के खण्डन में नहीं है, किन्तु वे खण्डन करते हैं केवल अनुमान के स्वतन्त्र प्रामाण्य का । इसी लिये अनुमान सिद्ध ईश्वर का खण्डन करने पर भी वेदों से सिद्ध ईश्वर का खण्डन वे नहीं करते | उत्तर सीमांतक ( वेदान्ती ) के मत में " मैं उस उपनिषदों से ही जाने जा सकने वाले पुरुष ( ब्रह्म ) के विषय में पूछता हूँ ", " वेद को

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वैवार्थपारिवातः २०६ मात्रस्य कुलालादेर्घटादिलयाधिकरणत्वं सम्भवति । अत एव बादरायणं सूत्रम् - " प्रकृतिश्व प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ” प्रकृतिञ्चकाराद निमित्तञ्च ब्रह्मेवेति वक्ति । वेदान्तिसम्मत ईश्वरो निःश्वसितमिव बुद्धिप्रयत्नविशेषानपेक्षकृत्रिमं वेर्द निःश्वासन्यायेन कल्पादादाविर्भावयति, " अस्य महतो गूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेद: " ( वृ ० उ ० २२४ १० ) इत्यादि-श्रुतिभ्यः । वय गाय यदुक्तं वस्तुसम्बन्धाभावाच्छन्दस्यार्थवोधनमशक्यमेव, तथाहि किं शब्दार्थयोः तादात्म्यलक्षणः, तदुत्पत्तिस्वभावो वा सम्बन्धः संभवति । नाद्यः, भिन्नदेशस्वेन तयोः प्रतीयमानत्वात् मुखे हि शब्दो भूमावर्थश्च प्रतीयेते । तत्तादात्म्ये क्षुर-मोदकाद्युच्चारणे मुखस्य पाटनपूरणादिप्रसङ्गः स्यात् । नान्त्यः अङ्गुल्यो करिशतमिति शब्दानामर्थाभावेऽप्युत्पत्तिदर्शनात्, स्थानकरणप्रयत्नप्रभवत्वाच्च नार्थप्रभवत्वं युक्तं तेषाम् । तेनार्थासंस्पर्शित्वात् शब्दा न बाह्येऽर्थेऽवबोधं जनयन्ति, न वा प्रामाण्यभाजो भवन्ति । तदुक्तम्-यस प्रतिबन्धो वा को बाह्येष्वपि वस्तु । प्रतिपादयतां तानि येनेषां स्यात्प्रमाणता ॥ भिन्नाक्षग्रह्णादिभ्यो नैकात्म्यं न तदुद्भवः । व्यभिचारान्न चान्यस्य युज्यते व्यभिचारिता || विकल्पवासनोद्भूताः समारोपितगोचराः । जायन्ते बुद्धयस्तत्र केवलं नार्थगोचराः ॥ इति । प्रयत्न आदि विशेष सामग्री की सहायता न देव को कहन के प्रारंभ में प्रकट करता है, " इस महान भूत ब्रह्म के ॠग्वेद प्रभृति वेब निश्वास हैं " इस श्रुति से यही प्रतीत होता है, अर्थात् किसी भी व्यक्ति को बनास लेने के लिये कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता और न ही श्वास लेने में बुद्धि का ही उपयोग करना पड़ता है, क्योंकि क्या बिना बुद्धि के उपयोग और बिना प्रयत्न के स्वाभाविक रूप से ही प्रकट होते रहते हैं । ठीक इसी तरह से भगवान् भी विश्व किसी प्रयत्न के बिना बुद्धि के उपयोग के स्वाभाविक रूप से ही सृष्टि के प्रारम्भ में पहली सृष्टि में जैम स्वर, द ( ) और पूर्वी वाले वेष, बसे ही स्वर वर्ण और अनुपूर्वी वाले वेदों को स्वाभा विक रूप से ही प्रकट कर देता है । इसलिये भगवान् भी वेदों का एनपिता नहीं है, यह भी कहा जा सकता है, क्योंकि किसी ग्रन्थ की रचना करने वाला उसकी रचना के लिये प्रयत्न भी करता है और बुद्धि का उपयोग भी । बिना प्रयत्न और बुद्धि के रचना करने वाला नहीं कहा जा सकता । भगवान् विना प्रवल और बिना बुद्धि के उपयोग के ही वेदों का ज्ञान सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा को क देता है, इसलिये वेदों की अपीरुषेयता देबाली मानते है । शब्द का प्रामाण्य यह जो कहा गया है कि यत्तु के साथ सह का म्बन्ध न होने से उसका बोध होना संभव ही नहीं है, क्योंकि शब्द का अर्थ के साथ ' तादात्म्य ' सम्बन्ध क्षेत्र ' धनुरात्तिस्थान ' ( शब्द से उत्पत्ति वाला स्वभाव ) सम्बन्ध होगा? शक और म की भिन्न - भिन्न देश में स्थिति होने से उनका ' सवास्थ ' बन्ध तो हो नहीं सकता | शब्द की स्थिति मुख में होती हैं और अर्थ ( वस्तु ) की स्थिति भूमि पर रहती है, ऐसी परिस्थिति में भी उन दोनों का यदि सदात्म्य माना जाय तो क्षुर ( छुरी ), मोदक ( लड्डू ) शब्दों का उच्चारण किये जाने पर मुख का पाटन ( विवरण ), तथा पुरन ( भर जाना ) होते कोणा । यतः शब्द और वर्ष दोनों में तादात्म्य सम्बन्ध नहीं हो सकता । उसी तरह शब्द और अर्थ दानों में ' दुत्पत्तिस्वभाव ' सम्बन्ध भी नहीं हो सकता, क्योंकि ' अङ्गुल्य करितम् ' ( उगली के सिरे पर की हादी ) कहने से में जाता है कि वस्तु के न रहने पर भी शब्दों की उत्पत्ति में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है । शब्दों की उत्पत्ति हो पतत् स्थानों में इन्द्रिय - प्रयत्न से होती है, न कि अर्थ से । इसलिये शब्दों का अर्थ से साथ कोई सम्बन्ध न होने से बाह्य देश में स्थित अर्थ का ज्ञान शब्दों के द्वारा नहीं हो सकता और न ही शब्द प्रमाण माना जा सकता है । Eat after को " वसां प्रतिबन्धो पा " से " नार्थगोचरा: " तक के पचों से बताया गया है । देख

पृष्ठ 240

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 240 का मूल पृष्ठ
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* देवार्थपारिकः नतु चात्रापि पुरुषदोषाणामेप महिना न शब्दानामिति चेन्न, दोषवताऽपि मूकादिपुरुषस्यानुच्चारितशब्दस्येदृश-विप्लवोत्पादनपाटवासंभवात् । किञ्चासत्यपि पुरुषहृदयकालुष्ये प्रयुज्यमानान्यर्थग्राहिवाक्यानि विप्लवभावं जनयन्त्येव । शब्दानामेवैष स्वभाषो न वक्तृपुरुषदाषाणाम् । किञ्च वाधकप्रत्ययोत्पत्तावपि शब्दो मिथ्याज्ञानं जनयत्येव नेन्द्रियवदुदास्ते । यद्यपि चक्षुरादीनामप्यलीककच कूर्चकादिप्रतीतिकारणत्वमस्ति, नथापि न तेषामर्थासंस्पर्शित्वम् । तेषां तिमिरादिदोषकलु-षितानां तथाविधभ्रमकारणत्वं न स्वतः । विभ्रमेषु नेदं रजतमिति बाधबुद्धी जातायां विभ्रमो निवर्तते । शब्दस्तु शतकृत्वोऽपि बाध्यमानोऽपि विकल्पमयथार्थ जनयत्येव । तस्मात् - " त्रिकल्पयानयः शब्दा विकल्पाः शव्दयोनयः । तेषामन्योन्यसम्बन्धे नार्थ शब्दाः स्पृशन्त्यमी ॥ ' इति, तन्न, नद्यास्तीरे फलानि सन्तीलाप्तवाक्यात्प्रवृत्तस्य तदर्थप्राप्त्याऽतिरस्कृतबाह्यार्थयथार्थ-प्रत्ययार्थासंस्पर्शित्वासिद्धेः । अत एव शब्दार्थयोः सम्बन्धाभावोऽपि निरस्तः । शब्दोऽर्थेन संबद्ध एव तं प्रकाशयति, प्रति-नियतप्रत्यय हेतुत्वात् चक्षुर्वंत् । यद्वा शाब्दप्रत्ययः संबद्धाभ्यामर्थशब्दाभ्यां जन्यते, प्रतिनियतप्रत्ययत्वात्, दण्डीत्यादिप्रत्ययवत् । ननु तादात्म्यतदुत्पत्तिलक्षणसम्बन्धस्य निराकृतत्वात् कथं सम्बन्धतासिद्धिरिति चेन्न तदभावेऽपि प्रतिपाद्यप्रतिपादकलक्षण-सम्बन्धस्य सत्त्वात् । न च तदभावे सोऽपि कथमिति वाच्यम्, चक्षूरूपयोस्तदभावेऽपि तद्दर्शनात् । चक्षूरूपयोस्तादात्म्यं तदुत्पत्तिः संयोगो या बौद्धैरभ्युपेयते प्रतीतिविरोधानुषङ्गात् अप्राप्यकारित्वक्षतिप्रसङ्गाच्च । न च तादात्म्यतदुत्पत्त्यभावेऽपि रूप-यदि यह कहें कि ' यह पुरुषदोष का हो प्रभाव है, शब्दों का नहीं ' । तो यह कहना ठीक न होगा, क्योंकि दोषयुक्त गूंगे पुरुषों के अनुयाति शब्द ( संकेत ) में उस प्रकार के विप्लवोत्पादन ( व्यभिचार ) की पटुता का होना संभव नहीं । दूसरी बात यह है कि पुरुष के हृदय में किसी प्रकार का कालुष्य न रहने पर भी यथावत् प्रयोग किये जाने वाले अर्थग्राहरू वाक्य विप्लव को पैदा करते ही हैं, वह तो शब्दों का स्वभाव है, बोलने वाले पुरुष के दोष उसमें कारण नहीं है । यह भी कह सकते हैं कि वाधक ज्ञान ( ऐसा नहीं है ) के होने पर भी शब्द, मिथ्याज्ञान को पैदा करते ही हैं, इन्द्रिय की तरह उदासीन ( क्रियाशुन्य ) नहीं रहते । हाँ, चक्षुरादि इन्द्रियाँ मो afta ( front ) कन- कूर्चकादि ( केशोण्ड्रक = बालों का समूह आदि ) को प्रतीति कराती हैं, तथापि उनका अर्थ ( वस्तु ) से कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उन्हें तो तिमिरादि दोष से लुषित होने के कारण उस प्रकार के भ्रम होने मे कारण माना गया है, भ्रमप्रतीति कराने में वे स्वयं कारण नहीं हैं । यहाँ भ्रम ज्ञान होता है, वहाँ ' नेदं रजलम् ' इस प्रकार बाघ ज्ञान होते ही भ्रम ज्ञान निवृत्त हो जाता है । किन्तु शब्द तो सैकड़ों बार बाधित होते रहने पर भी अत्रयवार्थ मूत विज्ञान को पैदा करता ही रहता है । इसलिये कहना होगा कि शब्द और विकल्प दोनों परस्पर एक दूसरे के उत्पादक ( कारण ) हैं, अत: शब्दों का अर्थ ( वस्तु ) के साथ कोई सम्बन्ध नही है | परन्तु यह सब का उचित नहीं है, क्योंकि किसी बात के मुख से ' नदी के तट पर फल है ' इस बाप को सुनकर प्रवृत्त हुए पुरुष को अर्थ प्राप्ति हो जान से बाह्य पदार्थ की यथार्थ रूप में प्रतीति ( ज्ञान ) होने में कोई सन्देह नहीं रहता । अतः शब्द और दोनों में सम्बन्ध नहीं है, यह कैसे कहा जा सकता है? इस स शब्द और अर्थ दोनों के परस्पर सम्बन्ध नहीं है, इस बात का भी खण्डन हो जाता है । चक्षु की तरह शब्द भो अर्थ से सम्बन्धित होकर हो उसे प्रकाशित करता है, क्योंकि वह व्यवस्थित ज्ञान कराने का साधन है । अथवा शब्द से होने वाला ज्ञान परस्पर एक दूसरे से सम्बन्धित अर्थ और शब्द के द्वारा ही हुआ करता है, क्योंकि वह व्यवस्थित ज्ञान का हेतु होता है । अर्थात् उन - उन निश्चित शब्दों से हो उन निश्चित अर्थो का ज्ञान होता है । जैसे दण्डो कहने से दण्डविशिष्ट पुरुष को ही प्रतीति हो पाता है । अर्थात् दण्ड और पुरुष दोनों के संयोग सम्बन्ध होने पर और दण्ड, पुरुष तथा उनके संयोग का ज्ञान होने पर ही दण्डी ( दण्डधारी ) पुरुष इस प्रकार का ज्ञान होता है, ठोक वैसे हो शब्द, अर्थ और उनका परस्पर सम्बन्ध इन तीनों का ज्ञान होने पर ही शब्द से अर्थ का ज्ञान होता है । यदि कहें कि तादात्म्य तदुत्पत्ति रूप सम्बन्ध का निराकरण कर देने से सम्बन्ध सिद्धि कैसे हो सकेगी, तो यह कथन संगत नहीं है । सादात्म्य तदुत्पत्ति कर सम्बन्ध के त रहने पर भी प्रतिपाद्यप्रतिपादक-रूप सम्बन्ध तो रहता ही हैं । यदि कहें कि तादात्म्य तदुत्पत्ति सम्बन्ध के Tara में यह प्रतिपाद्यप्रतिपादक भाव सम्बन्ध मो कैसे बनेगा? तो यह कहना ठीक नहीं । तादात्म्य तदुत्पत्ति सम्बन्ध के न रहने पर भी चक्षु और रूप में ग्राह्यग्राहक मात्र सम्बन्ध देखा जाता है | लेकिन बौद्ध बता कि वह कौन सा सम्बन्ध है? क्या वह तादात्म्य, तदुत्पत्ति अथवा संयोग है? इनमें से किसी सम्बन्ध को मान लेने पर प्रतीति- विरोध तथा अप्राप्यकारित्व के सिद्धान्त का भंग हो जायगा | तादात्म्य तदुत्पत्ति के अभाव में रूप