वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 241–250

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 241–250

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वेदार्थपारिजातः २११ प्रकाशनप्रयोजकसन्निकर्षादिलक्षणसम्बन्धस्याप्यसंभवः, श्रोत्रादिवच्चक्षुषोऽपि रूपाप्रकाशत्वप्रसङ्गात् । न चार्थस्यापि शब्दवाचकत्वं किं न स्यात्, प्रतिनियतशक्तित्वाद्भावानाम्, ज्ञानज्ञेययोर्ज्ञाव्यज्ञापकताशक्तिच्छन्दार्थयोः प्रतिपाद्यप्रतिपादक-शक्तिरपि नियता | कि, चक्षूरूपर्योघटप्रदीपयोर्यथा प्रकाश्यप्रकाशक भावप्रतिनियमस्तथैव प्रकृतेऽपि बोध्यम् । ननु तादृशसम्बन्धरूपयोग्यतावशाद् यदि शब्दोऽयं प्रतिपादयेत्तदाऽगृहीतसंगतिकस्य भूभवनसंबन्धोत्थितस्यापि प्रतिपादकत्वमस्तु विशेषाभावादिति चेन्न, गृहीतव्याप्तिसम्बन्ध एव धूगो धूमध्वजं गमयति । येनैव पुरुषेण साध्यसाधनयो-रविनाभावो गृहीतः तं प्रत्येव साधनं साध्यस्य गमकमितिः तथैव येनैव गव्दार्थयोः सम्बन्धो गृहीतः तं प्रत्येव शब्दोऽर्थस्य arte इत्यभ्युपगमे विरोधाभावात् । यत्तुकं संकेतः पुरुषेच्छाकृतः, न तदिच्छ्या वस्तुव्यवस्था युक्ता । अतोऽर्थोऽपि वाचकः स्यादेव पुरुषेच्छाया निरङ्कुशलात् । तदपि न, यतो धूमधूमध्वजयोर्यथा नैसर्गिकोऽविनाभावः सम्बन्धः, तद्वयुत्पादने तु भूयो -दर्शनादिनिमित्तमास्थीयते, तथैव शब्दार्थयोरपि स्वाभाविक एवं प्रतिपाद्यप्रतिपादकशक्त्यात्मा सम्बन्धः, तद्वयुत्पत्तये तु संकेत: समाश्रीयते । कार्यशक्तिव्यतिक्रमे चक्षूरूपादीनामपि प्रकाश्यप्रकाशकशक्तिव्यतिक्रमप्रसक्तिः स्यात्, चक्षुःप्रदीपादीनां प्रकाश्यत्वं रूपघटादीनां प्रकाशकत्वं च स्यात् । न च तत्र प्रतीतिनिरोधः, तस्यात्रापि सत्त्वात् । अत एवोक्तं जैमिनिना-- ' औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्ध: ' ( मी ० सू ० ११११५ ) नैयायिकादिमते ईश्वरकृतः संकेतः सर्गात्प्रभृति प्रलयपर्यन्तमनुत्रर्तते । मीमांसक-रीत्या तु नित्यसिद्ध एव सः । वृद्धव्यवहारादिभिस्वद्वयुत्पत्तिस्तु सर्वत्र समानेव । को प्रकाशित करने वाले सन्निकर्षादि सम्बन्ध भी नहीं बनेंगे, यह कहना ठीक नहीं, ऐसा होने पर श्रोत्र की तरह क्षुरिन्द्रिय को भी रूप का अप्रकाशक कहना होगा । दोनों में सम्बन्ध होने पर वर्थ भी शब्द का वाचक क्यो नहीं होगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रत्येक पदार्थ में अपनी - अपनी शक्ति नियत होती है । ज्ञान और ज्ञेय ( ज्ञान के विषय ) में ज्ञाप्यनापकता शक्ति की तरह शब्द और अर्थ में प्रतिपाच - प्रतिपादक शक्ति भी मिल रूप से रहती है । दूसरी बात यह है कि चक्षु और रूप में तथा बट और प्रदीप मे जैसे प्रकाश्य प्रकाशक भाव व्यवस्थित रहता है, उसी प्रकार शब्द मीर अर्थ में भी समान लेना चाहिये । यदि केवल सम्बन्ध रूप योग्यता के वन पर हा शब्द के द्वारा अर्थ का प्रतिपादन मान लिया जाय तो अज्ञात सम्बन्ध वाले ( पृथिवी ) शब्द से भवन ( मकान ) रूप वर्ष भी ज्ञान होना चाहिये और पृथिवी वाचक भ्रू शब्द भवन रूप नर्थ का भी बाचक हो जाना चाहिये, क्योंकि पृपिकी से चन का बन्ध तो है ही । किन्तु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि जैसे व्याप्ति सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त किए हुए व्यक्ति को ही धूम से gases ( वह्नि ) का शान हो पाता है, जिस व्यक्ति में साध्य - साधन दोनों में अविनाभाव ( व्याप्ति सम्बन्ध ) ज्ञात किया है, उसी व्यक्ति के लिए साधन ( हेतु ) साध्य ( अग्ति ) का बोधक हो सकता है, ठीक उसी तरह जिस व्यक्ति ने शब्द और अर्थ में सम्बन्ध जान लिया हो उनी व्यक्ति के लिए यह शब्द अर्थ का वाचक हो पाता है --- ऐसा मानने पर कोई विरोध नहीं होगा । यह जो कहा गया है कि संकेत पुरुष ने अपनी इच्छा से किया है, किन्तु किसी पुरुष इच्छा के अनुसार वस्तु की व्यवस्था करना तो ठीक नहीं । इसलिए अर्थ भी शब्द का वाचक हो ही सकता है, क्योंकि पुरुष की इच्छा पर कोई अंकुश नहीं. लगा सकता, पर यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि घूम और घूम ber ( अग्नि ) का अविनाभाव सम्बन्ध अवश्य स्वाभाविक होता है, afer उस सम्बन्ध के स्वरूप को बनाने में तो भूयदर्शनादि ( बार - बार घूम और अग्नि के दर्शन ) को कारण मानना पड़ता है; उसी तरह शब्द और अर्थ का भी प्रतिपाद्यप्रतिपादक शक्ति रूप सम्बन्ध स्वाभाविक ही है, लेकिन उसके ज्ञान के लिए संकेत को स्वीकार करनापड़ता | कार्य को शक्ति में व्यतिक्रम होने पर चक्षु और रूप में प्रका tureres शक्ति का व्यतिक्रम होने लगेगा | चक्षु और trafe में retou तथा रूप और घट आदि में प्रकाशकत्व मानने का प्रसंग प्राप्त होगा । यदि कहें कि ऐसा मानने पर प्रतीति का विरोध होगा तो वह विरोध यहाँ पर भी बैठा ही है । इसीलिए जैमिनि ने कहा है कि- ' औत्पत्तिकस्तु चन्दस्यार्थेन सम्बन्धः ' ( शब्द और अर्थ का सम्बन्ध स्वाभाविक होता है ) । नैयायिकादि विद्वानों के मत में ईश्वर का संकेत सृष्टि से लेकर प्रलय तक चलता रहता है, किन्तु मीमांसकों की रीति के अनुसार वह संकेत नित्यसिद्ध हो है । उसका ज्ञान व्याकरण, कोश, वृद्ध व्यवहार आदि उपायों से होता है, यह तो सभी मतवादी मानते हैं ।.

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२१३ वैदार्थपारिजातः यदप्युक्तं ' शब्दस्य औत्पत्तिकी शक्तिः किमेकार्थप्रत्यायनेऽनेकार्थप्रत्यायने वा? प्रथमे संकेतशतैरपि ततोऽर्थान्तरे धूमादनग्निवत् प्रतीत्यनापत्तिः । द्वितीये युगपदनेकार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । प्रतिनियतेऽर्थे प्रतीतिश्व न स्यात् ' इति, तदप्यकिञ्चित्करम्,

सर्वे सर्वार्थ ति रीत्या सर्वशब्दानां सर्वार्थवाचकत्वेऽपि बाधाभावात् ।

सर्वाकारपरिच्छेद्यशक्रोऽप पाचकेऽपि वा । गर्दाकारार्थविज्ञानसमर्थे नियमः कृतः ॥

( मी ० श्लो ० प्र ०, इलो ० २२८ ) सर्वशब्दाना सर्वार्थप्रत्यायणशक्तियुक्तत्वात् कचिद्देशे केनचिदर्थेन व्यवहारः । अत एव चानधिगतसम्बन्धे श्रुते सति संदेहो भर्वात कमर्थं प्रत्याययितुमनेन शब्दः प्रयुक्तः स्यादिति न्यायमञ्जरीकारः । न चैवमपि युगपत् सर्वार्थप्रति-पत्तिप्रसक्तिः, प्रतिनियतेऽर्थे ततोऽप्रतिपत्तिच्च स्याताम्, प्रतिनियतसङ्केतवशात् तेषां प्रतिनियतार्थप्रतिपादकत्वोपपत्तेः । अत एवैकस्यापि शब्दस्य देशादिभेदेन प्रतिनियतः संकेतोऽनुभूयते । मालवादी कर्कटिकाशब्दस्य फलविशेषे गुर्जरादौ तु योन्याम् । चौरशब्दस्य द्राविडेषु तण्डुलादावन्यत्र तु तस्करे प्रसिद्धिः । यवशब्द आर्यैर्दीर्घशुके प्रयुज्यते म्लेच्छैस्तु प्रियङ्गी । रूपप्रकाशने योग्यस्यापि चक्षुषः प्रत्यासन्ने निमिरवशादसन्निहिते दूरतिमिरवशाच्च न प्रकाशकत्वम्, विशिष्टाञ्जनादि-वशाद् अन्धकारान्तरितेऽपि ज्ञानजनकत्वम्, काचकालादिवशाच्च पोवरूपाभावेऽपि शंखे पीतज्ञानजनकत्वं दृश्यते । ततो यथानेकरूपप्रकाशनयोग्यस्यापि चक्षुषो दूरतिमिरादिवशात् प्रतिनियतदूररूपादिज्ञानजनकत्वम्, तथैवानेकार्थप्रत्यायन-समर्थस्यापि शब्दस्य प्रतिनियतसंकेतवशात् प्रतिनियतार्थप्रतिपादकत्वमविरुद्धम् | योगसिद्धानां सर्वशब्दानां सर्वार्थवाचक-त्वं सर्वदोषराहित्यादुपपद्यते । तदुक्तम् --- ' समयापेक्षणं चेह तत्क्षयोपशमं विना । तत्कर्तृत्वेनासयलं योगिनां तु न विद्यते ॥ सर्ववाचकभावत्याच्छब्दानां चित्रशक्तितः । वाच्यस्य च तथान्यन्न नागोऽपि समयेऽपि हि । ' इति । यह जो कहा गया है कि शब्द की स्वाभाविक शक्ति एक अर्थ का ज्ञान कराने में है, अपण अनेक अर्थ का ज्ञान कराने में? प्रथम पक्ष में सैकड़ों संकेतों से भी दूसरे अर्थ का ज्ञान वैसे ही नहीं होगा, जैसे घूम से अग्नि से भिन्न अन्य किसी वस्तु का ज्ञान होता ही नहीं । द्वितीय पक्ष में युगपत् ( एक साथ ) अनेक अर्थों का ज्ञान होने लगेगा । फलतः सुनिश्चित अर्थ का ज्ञान नहीं हो पायेगा | किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं है । ' समस्त शब्द समस्त अर्थों के वाचक होते हैं इस रीति के बानुसार संसार के सभी शब्द सभी अवाक होते हैं, ऐसा मान ने भी कोई बाधा नहीं है । कहा भी है- समस्त शब्दों में समस्त अर्थों के बोधन का सामर्थ्य होने से किसी देश किसी अर्थ का व्यवहार प्रचलित होता है । इसी कारण अज्ञात सम्बन्ध के सुनाई देने पर में सन्देह पैदा हो जाता है कि किस अर्थ को बतलाने के लिये इस व्यक्ति ने शब्द प्रयोग किया होता ऐसा न्यायमञ्जरीकार ने बतलाया है । ऐसो परिस्थिति में भी समस्त अर्थों की एक साथ प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) होने का प्रसङ्ग और निश्चित अर्थ का ज्ञान न होने में भी कोई बाधा उपस्थित नहीं होगी, क्योंकि निश्चित अर्थ में संकेत होने के कारण वे शब्द निश्चित अर्थ के हो वाचक हो सकते हैं । इसीलिये किसी एक शब्द का भी भिन्न - भिन्न अर्थविषयक निश्चित संकेत देशादि भेद के कारण अनुभव में आता है । जैसे मालब आदि देश में ' कर्कटिका ' शब्द फलविशेष में प्रसिद्ध है, और गुर्जरादि देशों में वही कर्केटिका शब्द योनि अर्थ में प्रयुक्त हैं । ' चोर ' शब्द का द्रविड़ देश में area के अ में संकेत पाया जाता है, किन्तु अन्य देशों में चोर के अर्थ में उसकी प्रसिद्धि है । आर्य लोग यब ( जो ) शब्द का प्रयोग दीर्घशुक ( लम्बी नोक वाली सोक वाला अनाज ) में करते हैं, किन्तु म्लेच्छ लोग प्रियंगु ( कंगनी ) में करते हैं । रूप are करने की योग्यता चक्षु में रहने पर भी अन्धकार के कारण समीपवर्ती वस्तु को वह प्रकाशित नहीं कर पाता, उसी तरह दूर स्थित वस्तु को दूरी और तिमिर ( नेत्र का दोष और अन्धकार ) के कारण चक्षु उसे प्रकाशित नहीं कर पाता । किन्तु अन्जन आदि उपाय विशेषों से अन्धकार में स्थित वस्तु का भी ज्ञान करा देता है । काचकालादि रोगों के कारण पीतरूप के न रहने पर भी शंख में पीसिया का ज्ञान हो जाता है । जैसे नाना रूपों के प्रकाशन की योग्यता चक्षु में रहने पर भी वह प्रतिनियत ( सुनिश्चित ) दूर स्थित रूपादि का ज्ञान करा देता है, उसी तरह अनेकअर्थों का बोधन कराने का सामर्थ्य शब्द में रहने पर भी सुनिश्चित अर्थ में उसका संकेत होने के कारण उसके सुनिश्चित अर्थ के प्रतिपादक होने में कोई बाधा नहीं है । योगियों के लिये तो समस्त शब्द समस्त

पृष्ठ 243

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२१३ ननु चक्षुर्यथा योग्यतालक्षणसम्बन्धेन संकेतानपेक्षमेवार्थप्रतीति जनयति तथैव शब्दोऽपि संकेतानपेक्षः किमित्यर्था वति न जनयतीति चेत, शब्दस्य ज्ञापकतया तत्सापेक्षस्यैवार्थावगतिजनकत्वोपपत्तेः । यज्शापकं तत्प्रतिपन्नसम्बन्धमेव प्रतीति जनयति यथा धूमादि स्वयं प्रतीयमानमप्रतीतार्थप्रतीतिहेतुर्ज्ञापकमुच्यते । चक्षुरादीनां कारकत्वात् सम्बन्धग्रहा-नपेक्षमपि प्रतीत्युत्पादकत्वं संभवति । गतिस्तु यथा रूपप्रकाशने चक्षुषस्तथैव स्वार्थप्रत्यायने शब्दस्येति । तथात्वम् । स्यात् । शब्दस्यार्थसंशित्वं त्वाप्तपुरुषदोषवशात् । तथा चानाप्तप्रणीतस्य तस्याथसिंस्पर्शित्वेऽपि न शब्दमात्रस्य अन्यथा काचादिदष्टचक्षुः प्रभवप्रत्यक्षस्याच संस्पर्शित्वं गुणवचचक्षुः प्रभवस्यापि प्रत्यक्षस्य तथात्वं यदुक्तम्- आप्तप्रणीतादप्यङ्गुल्यादिवाक्यादर्थासंस्पशिज्ञानमुत्पद्यत एव तेन शब्दस्यैवैष महिमा न वक्तृदोषाणामिति, तदपि न, आप्तानामेवंविधयाम्योच्चारणचापलासंभवात् । यत्तु अशोकमपि किञ्चिदनुशास्ति मा भवान् अङ्गुलिकोटी हस्तिशतमास्ते इत्येवमभूतार्थवादीति, तन्न, तत्रेति करणावच्छिन्नस्य दृष्टान्ततया शब्दपरत्वेनोपादानात् । प्रतिषेधैकवाक्यतया यथार्थत्वमेव अर्थपरत्वे तु निषेधवाक्यतैव न स्यात् । तस्मादाप्तवाक्यानामयथार्थत्वाभावान्न स्वतोऽथसंस्पर्शित्वमर्थस्य, किन्तु पुरुषदोषानुषङ्गकृतमेव तत् । अर्थों के बाक हो सकते हैं, क्योंकि योगी दोष शुन्य होता है । कहा भी है -- " समयापेक्षणं येह तत् क्षयोप समयेऽपि हि ॥ " ( ० ० ६६२१६/४ ) " नामोऽपि यदि कहा जाय कि जैसे चक्षु संपेत की सहायता के बिना केवल योग्य arer सम्बन्ध से ही अर्थ की प्रतीति करा देता है, वैसे ही शब्द भी संकेत की अपेक्षा किये बिना हो वर्ष का बोधन करा देगा, किन्तु ऐसी भावांका करना ठीक नहीं, क्योंकि शब्द ज्ञापक हेतु होने के कारण संकेत की सहायता पाकर ही अर्थ का ज्ञान करा पाता है । जो ज्ञापक हेतु होता है, वह संकेत ज्ञान रखने वाले व्यक्ति की अर्थीति करा पाता है । जैसे- स्वयं प्रतीयमान होनेवाला घूम बादि पदार्थ, प्रतीत न हुए पदार्थ ( अग्नि ) की कराता है, इसलिये उसे कापण हेतु कहा जाता है । चक्षुरादि तो फाल्क हेतु होने से सम्बन्धग्रह ( संकेत ज्ञान ) की अपेक्षा far ये ही अज्ञानजनक हो सकते हैं । रूप के प्रकाशन में जैसे चक्षु की शक्ति है, वैसे ही स्वार्थ का बोध कराने में शब्द की शक्ति रहती है । शब्दार्थ से सम्बन्ध न हो पाना तो बना पुरुष के दोष के कारण है | अतः अनाप्त पुरुष के द्वारा उच्चरित शब्द का अर्थ के साथ सम्बन्ध नरहने में पद का कोई दोष नहीं है । यदि ऐसा न मानें तो काचादि दोषों से युक्त चक्षु के द्वारा उत्पन्न प्रत्यक्ष ज्ञान ( भ्रम रूप ) का सर्प, चाँदी, शंख का पीलापन आदि ) के साथ सम्बन्ध न होने से सब दोषों से रहित शुद्ध गुणवान् नेत्र से उत्पन्न होने वाले प्रत्यक्ष ज्ञान का भी ( सत्य ज्ञान का ) क्या अर्थ के साथ सम्बन्ध नहीं होगा | यह जो कहा है कि प्त के द्वारा उच्चारित ' अंगुली की नोक पर सौ हाथी हैं ' ऐसे वाक्य से अर्थ का सम्बन्ध न होने पर श्री ज्ञान उत्पन्न होता ही है, जत: शब्द की ही यह महिमा है, न कि वक्ता के दोषों की । किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि आत पुरुष उक्त प्रकार के वाक्यों के बोलने की चंचलता नहीं कर सकते | यह भी जो कहा गया है कि सभी किसी को उपदेश देता है कि अंगुली के अग्र भाग पर सी हाथी हैं, इस प्रकार की बात मत बोलो । किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त के रूप में ' त ' शब्द से इन्द्रियावच्छित्र का शब्द के रूप में ही उपादान किया है । निषेध वाक्य के साथ एकवाक्यता होने से यथार्थता ही है । अर्थपरक मानने पर तो निषेध वाक्य का स्वरूप ही नहीं बन पावेगा | इसलिए प्त वाक्यों में अयथार्थता ( मिथ्यात्व ) के न होने से शब्द में स्वतः अर्थसम्बन्धशून्यता नहीं है । वर्थ से सम्बन्ध-शून्यता तो पुरुष दोष के कारण आनुषंगिक ही समझनी चाहिए ।

पृष्ठ 244

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* १ @ndaftara: यदुक्तमाप्तैरेवंविधवाक्यप्रयोगेऽपि संदिग्धो व्यतिरेकः, किं शब्दाभावादविप्लवः, वक्तृदोषाभावाद्वा? तदप्यविचारित-रमणीय, अनुच्चारितशव्दस्यापि दोषवतः पुरुषस्य हस्तसंज्ञादिना प्रतारकत्वदर्शनात् । तदुक्तम् -- ' अनुच्चारितशब्दोऽपि पुरुषो विप्रलम्भकः । हस्तसंज्ञाद्युपायेन जनयत्येव बिप्लवम् ॥ ' । न्यायमञ्जरी } । न च हस्तसंज्ञादिना शब्दानुमानं ततोऽयथार्थप्रत्यय:, तथा प्रतोत्यभावात् । नद्यास्तीरे पञ्च फलानि सन्तीति वाक्यादुत्पन्ने ज्ञाने नदीतीरमनुसरन्नप्राप्तफलस्तदुपदेष्टारमेवाक्षिपति -- दुरात्मना ते विप्रलब्याजस्म, न शब्दम् । प्राप्तफलश्च तं पुरुषमेव श्लाघते - साधुना तेनोपदिष्टम् । तस्मात् पुरुषदोषान्वयानुविधानात्ततभावकृत एवाविप्लव: । आपीषु तुष्णीमासी-तेषु तु भ्रमानुत्पाद इति न संदिग्धो व्यतिरेकः । तेन पुरुषदोषनिबन्धन एवं राब्दाद्विप्लवां न स्वरूपकृतः । ननु दोषवतो गुणवतो वा पुरुषस्य शब्दोच्चारणमात्र एवं व्यापारः, अर्थप्रतिपत्तिस्तु शब्दनिवन्धनैवेति विभ्रमोत्पादे शब्दस्यैव व्यापारो न वकृदोषाणामिति चेन्न तथात्वे गुणवद्वत्तृकान्नदीतीरे फलानि सन्तीति वाक्यात् सत्य-प्रत्ययोदयेऽपि शब्दस्यैव व्यापारी मन्तव्यः, गुणवद्वत्तुरच्या रणमात्रे चरितार्थत्वात् । दीपवर प्रकाशकत्वमेव शब्दस्य स्वरूप-मुक्तं न यथार्थत्वमयथार्थत्वं वा । विपरीतेऽप्यर्थे दीपस्थ प्रकाशदानतिवृत्तेः । प्रदीपे व्युत्पत्तिनिरपेक्षमेव प्रकाशकत्वम्, शब्दे तु तदपेक्षमेवेत्यदेव | वक्तृदोषगुणाधीने तु तस्य यथार्थायार्थये । अत एवाङ्गुल्यादिवाक्ये बाधिरोऽपि पुनः पुनरुच्चार्यमाणे भवति विभ्रमः । प्रकाशत्वरूपानपायान्मैप शब्दस्य दोषः । विपर्य्ययज्ञानोत्पत्तेर्यावद्भिः सह तद्भावमादित्यवगम्यते तावतां यह जो कहा गया है कि पुरुषों के द्वारा किये जाने वाले इस प्रकार के वाक्य प्रयोग में भी व्यक्ति का ह होगा कि या शब्द के अभाव के कारण अधिक है अथवा के दोषाभाव के कारण अजय है? किन्तु इम प्रकार के विकल्प करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि शब्दाभ्यारण न कारों पर भी दूषित पुरुष के हस्तादि संतों से भी प्रार होती दिखाई पड़ती है । कहा भी है - बिना बोले भी वचक पुरुष इत्यदि के द्वारा संकेत की विप् ( ) कर हो देता है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि हस्तादि के संकेत ( स्वायमञ्जरी ) शब्द का अनुमान किया जाता है और उससे मिथ्या ज्ञान होता है, क्योंकि वैसी प्रतीत नहीं होती । नदी के नारे पांच फल है । इस चाप से वब अर्थज्ञान उसन्न होता है, तब वह पुरुष नदी के किनारे पहुँचता है, किन्तु यहाँ फल नहीं पाता, हम उस बास्य के उम्म्मारणकर्ता को ही बुग - मला कहने लगता है कि जब टुग्द मुझे गा सके शब्दों को बुरा - भला नहीं करता । यदि यहाँ पहुंचकर फलों को पास करता है तो वा पुरुष की हो प्रदांसा करता है कि उस सज्जन ने ठीक बात बताई | अतः विम पुरुष के दोष का ही अनुस + ण करता है, पुरुष से दोष में रहने पर अविप्लव रहता है । इसलिये पुरुषदोषाभारत ह अक्दिन ( अर्थ है है । आस पुरुष के मौन रहने पर तो भ्रम उत्पन्न नहीं होता इसलिये व्यतिरेक में कोई सन्देह नहीं है, यतः दन होने बाल बिल ( अनर्थं ) शब्दकृत न होकर पुरुषदोषमूलक ही होता है । यदि यह कहें कि शेष वार्क अथवा गुण वाले पुरुष का काम तो चक शब्द का उच्चारण करता है, अर्थ ज्ञान तो शब्द पर ही निर्भर रहता है, इसलिये विश्रम ( असारका ) पैदा होने में शब्द ही कारण है, बक्ता के दोष नहीं । किन्तु यह कहना ठीक नहीं । उस परिस्थिति में भी गुणवान् का के द्वारा कहे गये ' नदी के तीर पर फल हैं ' --- इस वाक्य से यथार्थ प्रतीति ( ज्ञान ) के होने में भी शब्द का ही व्यापर मानना होगा, क्योंकि गुणवान् वक्ता का व्यापर तो केवल उच्चारण में ही चरितार्थ हो जाता है | दीपक की तरह प्रकाशमान ही शब्द का स्वरूप बतलाया गया है । यथार्थत्व अथवा अययार्थत्व उसका स्वरूप नहीं । विपरीत अर्थ की उपलब्धि होने पर भी दीपक का प्रकाशलक्षण स्वरूप नष्ट नहीं होता । दीपक की प्रकाशस्ता व्युत्पत्ति ( ज्ञान ) निरपेक्ष ही होती है, किन्तु शब्द की प्रकाशकता ज्ञानसापेक्ष होती है, यह भी कहा जा चुका है । शब्द को यथार्थता तथा अयथार्थता तो वक्ता के गुणदोष के अधीन होती है । इसीलिये यदि वाक्य के बाधित होने पर भी पुनः पुनः उच्चारण किये जाने पर भ्रम हो ही जाता है । प्रकाशत्वरूप के नष्ट न हो पाने से शब्द का दोष नहीं माना जा सकता । जिन कारणों के साथ तदभावभावित्व विपर्यय ज्ञानोत्पत्ति में पाया जाता है, उन कारणों का व्यापार उसमें मानना होगा । शब्दोच्चारण सर्वत्र समान रूप से रहने पर भी अनाप्त के सम्बन्ध के बिना अम ज्ञान की

पृष्ठ 245

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२१५ तत्र व्यापारी मन्तव्यः । विभ्रमोत्पत्तिः सर्वत्र शब्दोच्चारणे सत्यप्यनाप्तसंमृगं विना न दृश्यते । तेन शब्दवदनाप्ताभिप्राय स्यापि तत्र व्यापारः । तन एवोक्तम्- ' पदार्थानां तु संमर्गममोक्ष्य प्रजल्पतः । वकुरेव प्रसादोऽयं न शब्दोऽथापराध्यति ॥ ' यदुक्तं नेन्द्रियदास्ते शब्दः, तदप्यकिञ्चित्रम्, बाधकप्रत्ययप्रवृत्तावपीन्द्रियस्य चन्द्रद्रयविषय मिथ्याज्ञान-जनकत्वदर्शनात् । न च बाधकप्रत्ययोत्पताविन्द्रियं द्विचन्द्रादिज्ञानं न जनयतीति वाक्यम्, प्रतीतिविरोधात् । तस्मात्प्रमाणं शब्द:, अर्थापलव्धिहेतुत्वात् प्रत्यक्षादिवत् । त्वपक्षसाधनपरपक्षवावप्रमत्वाच्च सम्यग्ज्ञानवत् । एवमेव सकलतत्व-विप्रतिपत्तिनिवृत्तिनिमित्तत्वादपि प्रमाणं शब्दः, योगिज्ञानवत् । शब्दभन्तरा देशकालस्वभावविप्रकृष्टाखिलार्थानां विप्रति-पत्तिनिवृत्तिर्न संभवत्येव तदुपायान्तरासंभवात् । न लिङ्गमुपायान्तरम् । देशकालस्वभाव विप्रकृष्टार्थप्रतिबद्धस्य लिङ्गस्या-प्रतिपत्तेः । तेन शब्दस्यैव तत्र प्रामाण्यं मन्तव्यम् । मम् वेदा अपौरुषेयाः, सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्वर्यमाणकर्तृकत्वात्, आत्मवत्, यतैवम्, तत्रैवं यथा महाभारतादि । यदुक्तं ' प्रलये सम्प्रदायविच्छेदोऽवश्यंभावी ' इति, तदपि तुच्छम् पूर्वमीमांसकरीत्या प्रलयानङ्गीकारात् । वेदान्तिरीत्या प्रलयाङ्गीकारेऽपि परमेश्वरे विशिष्टकर्मोपासनादिसंस्कारवत्सु हिरण्यगर्भादिषु सुप्तप्रतिबुद्धन्यायेन प्राक्कल्पीय वेदानुपूर्वी स्मरत्सु सम्प्रदायाविच्छेदोपपत्तेः । उत्पत्ति नहीं दिखाई पड़ती । इस सब्द की तरह अनासाभिप्राय का भी उनके पार है, यह कहना होगा | इसी अभिप्राय से यह कहा गया है --- " पदार्थानान्तु संसर्ग व शब्दोऽनापराध्यति ॥ " अर्थात् गदार्थों के पारस्परिक सम्बन्ध की ओर ध्यान दिये बिना डी चकवास करने वाले अनात बता के दोष को ही वस्तु के भ्रम में कारण साना चाहिये, उसमें शब्द का कोई दोष नहीं है । यह जो कहा गया है कि ' इन्द्रिय की तरह शब्द उदासीन नहीं हत ' --- वह भी अकिञ्चित्कर हो है, क्योंकि वाचक जान हांत हुने एन जो मन्द्रयविषयक ज्ञान चक्षुरिन्द्रिय मे होता दिखाई देता है । यह नहीं कह सकते कि बाधक ज्ञान के उत्पन्न होने पर क्षुद्र में द्विचन्द्रविषयक ज्ञान उत्पन्न नहीं हो पायेगा । क्योकि अनुभव ( प्रत्यक्ष ज्ञान | का अपलाप करना ठीक नहीं । देखने वाला जमता है कि चन्द्रमा एक ही है, दो नहीं । फिर भी उसे साफ - साफ दो चन्द्रमा दिखाई पढ़ते हैं । अतः यही कहना होगा कि प्रत्यक्ष के तुल्य वस्तु का मान कराने में कारण होने में भी प्रमाण है । जैसे सभ्यम् ज्ञान ( यथार्थ ज्ञान ) अपने पक्ष की सिद्धि और दूसरे के पक्ष का बाध करने में समर्थ होने से सत्य ज्ञान की तरह शब्द भी प्रमाण है, उसी तरह योगिज्ञान की तरह शब्द को भी विप्रतिपत्ति की निवृत्ति करने में निमित्त रहने के कारण उसे प्रमाण मानना ही होगा । शब्द के बिना तो देश, काल, स्वभाव, विप्रकृष्ट ( दुर ) आदि समस्त पदार्थों के सम्बन्ध में सन्देह की निवृत्ति हो नहीं सकती, उसे दूर करने का अन्य कोई उपाय नहीं है । यदि लिंग हेतु ) अर्थात् अनुमान को विपत्तिनिरास का उपाय कहें तो यह ठीक न होगा, क्योंकि देश - काल - स्वभाव से विप्रकृष्ट वर्थ के साथ संबद्ध ( व्यास ) कोई न ( हेतु ) नहीं है । अतः ऐसी परिस्थिति में शब्द का ही प्रामाण्य स्वीकार कर लेना चाहिये । वेदों को अपौरुषेयता aarted हैं, प्रदाय के अविच्छिन्न रहने पर भी उसके कर्ता का स्मरण नहीं होता है, जैसे मात्मा के कर्ता कारण नहीं होता । ऐसी स्थिति यहीं नहीं रहती, यही रुपेयता भी नहीं मानी जाती, जैसे महाभारत आदि की । प्रलय में सम्प्रदाय विच्छेद का होना अवश्यंभावी है — यह जो कहा गया है, यह भी निःसार है, क्योंकि पूर्वमीमांसकों के सम्प्रदाय के अनुसार प्रलय का होना मान्य नहीं है । और वेदान्त सम्प्रदाय के अनुसार प्रलय को मान लेने पर भी परमेश्वर की विशिष्ट कर्मोपासनादि जन्य संस्कार वाले हिरण्यगर्भ आदि में प्रतिबुद्ध न्याय से गत कल्प के वेदों की आनुपूर्वी का स्मरण हो आने से वेदा-Ear के अविछिन्न सम्प्रदाय की उपपत्ति बन जाती है ।

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२१६ } यदुक्तम्- ' किमिदमस्मर्यमाणकर्तृकत्वम्? अप्रमीयमाणकतृकत्वमाहोस्वित् स्मरणागोचरकर्तृत्वम्? नाद्य 1 ' तस्माद्यज्ञात्सवहुत ॠच सामानि जज्ञिरे ' ( वा ० स ० ३११७ ), ' त्रयो वेदा अजायन्त ' इत्यादिभिविरोधात् । नापि द्वितीय, विकल्पासहत्वात् । तथाहि --- किमेकेनास्मरण विवक्षितम् उत सर्वास्मरणम्? नाद्य, मुक्तकर ऐकादावने कान्तिकत्वात् । न द्वितीय, सर्वास्मरणस्यासर्वज्ञविज्ञानागोचरत्वात् ' इति, तदपि नि सारम्, ' वाचा विरूपनित्यया ' ( ऋ ० स ०८२७५१६ ), ' यो ब्रह्मण विदधाति पूर्वं यो वे वेदाश्च प्रहिणोति तस्मे ' ( वे ० उ ० ६ १८ ) इत्यादिवेदनित्यत्वप्रतिपादकवचनाना विरोवादुत्पत्ति बोधकवचनाना कल्पादौ सम्प्रदायप्रवतनपरत्वेनादोषात् । ' वृष्णे चोदस्व सुष्टतिम् ' ( ऋ ० स ० ८२७५/६ ) इत्यग्निस्तुतिपरत्वेऽपि न नित्यत्वापलाप सम्भवति, भूतार्थवादत्वेन स्वार्थेऽप्यवान्तरतात्पर्याविरोधात् । यदुक्तम्- ' यो ब्रह्माणम् ' ( श्वे ० उ ० ६११८ ) इत्यस्य पौरुषेयत्वापौरुषेयत्वयो साधारण्यम्, स्वयं निर्मायापि प्रदानसम्भवादिति, तदपि तुच्छम् ब्रह्मणोऽनिर्मात्रा वेदा निर्मीयन्ते इत्यनुक्त्वा तदुद्धृदि प्रहीयन्ते इत्युक्त्या तेषा नित्यत्वम्येव सिद्धे । न चानाप्ताप्रणीतत्वेनाप्तप्रणीतत्वमनुमातु शक्यम्, आत्माकाशादी व्यभिचारात् । उच्चारणरूपस्याप्तप्रणयनस्य वेदेऽङ्गीकारेऽपि प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य विरचितत्वरूपस्य तस्यानङ्गीकाराच्च । न चैव बोद्धाद्यागमेष्वपौरुषेयत्वापत्ति, मानान्तरेणार्थमुपलभ्य विरचितत्वस्य ते स्वयमेवाङ्गीकारात् । जन एवा-प्रमीयमाणस्वतन्त्रकर्तृकत्वम्, अस्मर्यमाणकर्तृकत्वम्, स्मरणागोचरकर्तृकत्वमिति सर्वमपि सम्यक् । एकेनास्मरणम्, सर्वण बा-यह जो कहा है कि ' अस्मयमाणकतृकत्व ' कहने से क्या तात्पय है? क्या अप्रमीयमाणकर्तृकत्व, अर्थात् स का ज्ञान न हो पाना अथवा कर्ता का स्मरण न हो पाना? इन दो विकल्प मे प्रथम विकल्प ठीक नही है, क्योंकि " तस्माद् यज्ञात् सवहत ऋत्र सामानि जज्ञिरे ", ' त्रयो वेदा अजायन्त ' इत्यादि वाक्यों से ईश्वर वेद का कर्ता स्पष्ट मालूम होता है | इसलिए वे वचनो का विरोध होगा दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, उसमे भी अनेक विकल्प खड़े हो जाते हैं, जैसे किसी एक को कर्ता का स्मरण न हो पाना था सभी को उसका स्मरण न हो पाना? इन दो पक्षो मे से प्रथम पक्ष तो ठीक नही है, क्योंकि मुक्तक श्लोकादि मे व्यभिचार होगा । दूसरा पक्ष भी ठीक नही है, क्योकि सभी के विस्मरण का ज्ञान असर्वज्ञ वो कैसे हो सकता है किन्तु यह कथन भी सारहीन है । यदि ' वाचा विरूपनित्यया, ' यो ब्रह्मण विदधाति पूर्व यो वै वेदाश्च प्रहिणोति तस्मै ' इत्यादि वेद की नित्यता के प्रतिपादक वाक्यों से विरोध उपस्थित होता है, तो उत्पत्ति बोध वाक्यों को कल्प के बारभ में सम्प्रदाय प्रवतनपरक स्वीकार करने पर कोई दोष नहीं होगा । ' वृष्णे चोदस्व सुष्टुतिम्'- - इस वचन के अग्निस्तुतिपरक होने पर भी वेद की नित्यता मे कोई हानि नहीं पहुँचती, क्योंकि भूतार्थवाद होनेके कारण स्वाथ मे भी अवान्तर तात्पय है । यह जो कहा गया है कि ' यो ब्रह्माण ' इत्यादि याक्यों को उभय - पक्ष मे ( पौरुषेय अपौरुषेय ) समानता है, क्योंकि स्वय निर्माण करके थी दूसरे को प्रदान किया जाना समय हो सकता है । किन्तु यह कथन भी निसार है, क्योंकि ब्रह्मा का निर्माण न करने वाले परमेश्वर के द्वारा वेदो का निर्माण किया जाता है, ऐसा न कहकर के श्रुति से ' ब्रह्मा का निर्माण करने वाला परमेश्वर ब्रह्मा के हृदय मे वेदो को प्रकट करता है ' इस उक्ति से तो वेदों की नित्यता ही सिद्ध हो जाती है । अनाप्त के द्वारा प्रणीस न होने से उनके आस - प्रणीत होने का अनुमान भी नहीं किया जा सकता, क्योकि आत्मा, आकाश आदि मे व्योमचार होगा । आप्त के द्वारा उच्चारण किया जाना हो वेदो का प्रणयन करना है, यदि वह मान लिया जाय तब भी अन्यान्य प्रमाणो से अर्थोपलब्धि पर वेदो की रचना किया जाना किसी को स्वीकार नहीं है । इससे यह नहीं समाना चाहिये कि बौद्ध, जैन आदि के शास्त्र भी अपौरुषेय हैं । उन्होने स्वयं ही यह तथ्य स्वीकार कर लिया है कि प्रमाणान्तरों से अर्थोपलब्धि कर उनके आगमो की रचना की गई है । अत अपौरुषेयत्व की परिभाषा करते हुए जो कहा गया है कि ' प्रमीयमाणस्वतन्त्रकर्तृकत्व अथवा अस्मयमाणकर्तृकत्व, या स्मरणागोचरकर्तृकत्व इत्यादि सभी ( अपौरुषेयत्व के ) लक्षण समुचित हैं । यह जो विकल्प किया गया था कि किसी एक के द्वारा अस्मरण या सभी के द्वारा अस्मरण, वह भी safefs है । अन्यथा सप्तम रस के अभाव की सिद्धि में भी यह विकल्प ( एक के द्वारा सक्षम रस की प्रमिति नहीं होती, या सभी के द्वारा नहीं होती ) किया जा सकेगा ।

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aara पारिवात २१७ स्मरणमिति विकल्पस्त्वकिञ्चित्कर, तथात्वे एकेन सप्तमरसो न प्रमीयते सर्वेर्वेति सप्तमरणाभावसिद्धावपि तथैव विकल्प-सम्भवात् । तस्मादवश्यस्मर्तव्ये सनि व्यवहतु णा वेदकर्तुरस्मरणमेव वेदानामस्मर्यमाणकर्तृकत्वमिति मन्तव्यम् । यदुक्तम्-- अस्मर्य्यमाणकर्तृत्व कर्तुं स्मरणाभाव, अकतृत्व वा? नाद्य, वैयधिकरण्यात् । स्मरणाभाव आत्मनि भवति, अपौरुषेयत्व तु वेदे इति तन्त्र, अस्मर्य्यमाणकर्तृकत्वस्य वेदे सत्वेन वैयधिकरण्याभावात् । न चाय हेतुरसिद्ध, स्मरणा-नुपलब्ध्या स्मरणाभावसिद्धौ बाधाभावात् । यदुक्त किमेकस्य स्मरणाभाव उत सर्वस्य? प्रथमे कस्यचित् स्मरणाभाव सर्वत्र सुलभ इति पौरुषेय ग्रन्थानाप्यपौरुषेयत्वापत्ति, अन्ते सर्वज्ञातिरिक्तस्य तादृग्ज्ञानासभव इति, तदप्यकिश्चत्करम्, सप्तमरसस्याप्य-भावसिद्धे । सप्तमो रस किमेकेनात्रमित उत सर्वे? प्रथमे व्यभिचार, द्वितीय ज्ञातु सावश्यापत्ति । यदुक्तमसिद्धोऽय हेतुर्यंतो वेदे परमेश्वर कर्ता श्रूयते, जैना कालासुर वेदकर्तार मन्यन्ते, बौद्धाचैवमनेकान् कर्तृ न वदन्ति } तदपि न क्षोदक्षमम्, वेद-विरोधिना तादृक्कथनस्य द्वेषमूलकत्वेनाप्रामाण्यात् । परमेश्वरकर्तृकत्वबोधकस्य वेदस्याप्रामाण्याभावेऽपि ' वाचा विरूपनित्य-येति ' वैदिकवाक्यविरोधेन सम्प्रदाय प्रवतकबोधन एव तात्पर्यात् । एतेन -थथा प्रजापतीर्वेदे तत्र तत्र प्रशस्यते । भारतेऽपि तथा व्यासस्तत्र तत्र प्रशस्यते ॥ अथ प्रणेता वेदस्य न दुष्ट केनचित्कचित् । द्वेपायनोऽपि किं दृष्टो भवत्पितृपितामहै || सर्वेषामविगीता चेत् स्मृति सत्यवतीमृते । प्रजापतिरपि स्रष्टा लोके सर्वत्र गीयते ॥ इत्यादिकमपास्तम्, ' वाचा विरूपनित्ययेति ' श्रुतिविरोधेन प्रजापतेरपि सम्प्रदायप्रवर्तकत्वप्रतिपादने स्मृतेस्तात्पय्र्यस्योक्तत्वात् । तत एव क्वचिदीश्वरस्य क्वचित्प्रजापते क्वचिदग्निवाय्वादित्यानामुत्पादकत्व श्रूयते । न ह्येकस्यानेककर्तृकत्व प्रामाणिकम् । अपि चैव विवेकविकलजनप्रवादविप्रलब्धो भ्राम्यति । इह स्वल्पमपि कर्म पित्रा मात्रा वोदिश्यमान तद्वचन-इसलिए वैदिक - लौकिक व्यवहार चतुर लोगो को अवश्य स्मरणीय व्यक्ति का ( कर्ता का ) स्मरण न हो पाना ही वेदो का अस्मर्यमाणक कत्ल है, यही स्वीकार करना होगा । यह जो कहा गया था कि अस्मयमाणककत्व से क्या कर्ता के स्मरण का अभाव अथवा कर्ता का ही अभाव समा जाता है? कर्ता के स्मरण का अभाव तो नहीं कहा जा सकता, क्योकि वैसा कहने पर वैयधिकरण्य होगा, अर्थात् स्मरण का अभाव आत्मा में रहेगा और अपरपेत्य तो वेद में रहेगा, किन्तु यह मन्तब्य ठीक नहीं है, क्योकि अस्मयमाणकतृकत्व तो द में होने से धिरण्य नही होगा । ' बस्मयमाणकर्तृकत्वात् ' इस हेतु को असिद्ध नहीं कहा जा सकता । यदि यह हेतु असिद्धि दोष से युक्त रहता तो उससे वेद T की अपौरुषेयता सिद्ध न हो पाती । यहाँ तो केवल वेदकर्ता ( वेदरचयिता ) के स्मरण की उपलब्धि न होने से कर्ता के स्मरण का aate हो निर्बाध रूप से सिद्ध हो ही जाता है । यह जो कहा गया था कि किसी एक को eat er ere ण नहीं बन पाता या सभी को? प्रथम पक्ष मे किसी एक को स्मरण न हो पाना तो सर्वत्र ही सुलभ हो सकता है, तब तो पौरुषेय ग्रन्थो को भी अपौरुषेय कहना पड़ेगा । दूसरे पक्ष मे सर्वज्ञ के अतिरिक्त उस पकार का ज्ञान होना असम्भव है । किन्तु ये दोनो विकल्प भी अकिञ्चित्कर ही है, क्योकि इन विकल्पों से सक्षम रस का भी अभाव सिद्ध नही हो सकता । वहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि क्या सप्तम रस को किसी एक ने जाना या सभी ने? प्रथम पक्ष में व्यभिचार दोष होगा । द्वितीय पक्ष में ज्ञाता को कहना पड़ेगा | यह जो कहा था कि उपर्युक्त हेतु ( अस्मयमाणकतृ कत्वात् ) असिद्ध है, क्योकि वेद में कर्ता के रूप मे परमेश्वर सुनाई पडता है और जैन लोग कालासुर को वेद का कर्ता मानते हैं, तथा बौद्ध लोग अनेक कर्ताओं को कहते हैं । किन्तु यह वक्तव्य विचार की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाता, क्योंकि वेदविरोधियों के इस प्रकार के कथन द्वेषमूलक होने से प्रमाण नहीं माने जा सकते | परमेश्वर को कर्ता के रूप मे बोधन करने वाले वेद का अप्रामाण्य न होने पर भी ' वाचा विरूपनित्यया ' इस वैदिक वाक्य के साथ f वरोध होगा, फलत. परमेश्वरकर्तृत्व बोधकवाक्य का तात्पर्य सम्प्रदाय प्रवर्तक के जोधन करने में ही समझना चाहिए । इस कम से ' जिस प्रकार वेद में जहाँ तहाँ प्रजापति की प्रशसा की जाती है, तथा महाभारत मे भी जहाँ तहाँ व्यास की प्रशसा की जाती हैं, किन्तु जैसे वेद का रचयिता कभी किसी ने मो नही देखा, तो क्या आपके पिता - पितामह आदि ने २८

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२१८ वेदार्थपारिजात प्रत्ययादनुष्ठीयते । तदयमियाननेकक्लेशवित्तव्ययादिनिर्वत्यों वैदिक कर्मकलाप एवमेव तदुपदेशिनमाप्तमस्मृत्वैव क्रियत इति महान् प्रमाद । उच्चावचकविरचितजरत्पुस्तकलिखित काव्यवदस्मर्य्यमाणकतृकेण वेदेन व्यवहारानुत्पत्तेरवश्य-स्मरणीयस्तत्र कर्ता स्यात् । न च कदाचन वेदेषु व्यवहारविच्छेद सम्भाव्यते, येन तत्कृत जरत्कूपारम्भादिष्विव कर्त्रस्मरण स्यात् । तस्मादवश्य कर्ता स्मय्र्य्येत । न च सस्मय्यते । स्मृतिहि तदनुभवमूलिकैव भवति न च कर्त्रनुभव कस्यचिज्जात ।

अशरीरस्य कतुर्दशनयोग्यत्वमपि न सम्भवति ।

सशरीरत्वपक्षे वा पुरुष कोऽपि तादृश । तदानी दृश्यमानोऽपि वेद कुवन्न दृश्यते ॥

अधीयमाने दृष्टेऽस्मिंस्तदा सशेरते जना । किमेष रचयेद्वेदमुत वान्यकृत पठेत् ॥

यत्कृत वा पठेदेष तस्मिन्नपि हि सशय । भङ्गया चेदमनादित्वमुन्मीलदिव दृश्यते ॥

असत्यादिप्रमाणे व कर्तृतानुभव प्रति । स्मृति प्रबन्धसिद्धापि स्पृशत्यन्धपरम्पराम् ॥ योगिभि सा गृहीतेत्यपि न व्यवहारकोटिमाटीकते, वादव्यवहारे योगजज्ञानस्यानभ्युपगमात् । वेदात् कत्रवबोधे तु स्पष्टमन्योऽन्यासश्रयम् । एतेन - यदुक्त स्मर्य्यमाणकर्तृत्वास्मर्य्यमाणकतृकत्वयो कार्य्यधर्मत्वेन कृतकत्वमेव सिद्धयति वेदस्य । तथा चानुमानम्-- वेद कृतक, अस्मय्र्य्यमाणकतृकत्वात्, जीर्णकूपारम्भादिवदित्यप्यपास्तम्, स्मर्य्यमाणकर्तृकत्वाभावेन नित्यत्वसिद्धो बाधाभावात्, आत्मवत् । नित्यत्वबोधिका श्रुतिरप्यनुकूलैव, अप्रमीयमाणकतृकत्वेनाकृत्रिमत्वस्यैव सिद्धे । उत्तरमीमासक-भी क्या द्वैपायन को देखा है? सत्यवतीपुत्र व्यास का स्मरण यदि सबको अच्छी तरह से है, तो उसी तरह सवत्र स्रष्टा प्रजापति का भी स्मरण लोगो को हे । इत्यादि मन्तव्य का खण्डन हो जाता है । ' वाचा वरूपनित्यया f ' इस श्रुति के साथ विशेष उपस्थित होने से प्रजापति को भी सम्प्रदाय का प्रवर्तक मानने मे ही स्मृति का तात्पर्यं बतलाया गया है । ईश्वर, प्रजापति आदि वेद के कर्ता न होकर केवल सम्प्रदाय के प्रवतक हैं, ऐसा मान लेने से हो श्रुति में कहीं ईश्वर कही प्रजापति staff, की वायु तो कही आदित्य को वेद का कर्ता कहना सगत हो सकता है । अन्यथा एक वस्तु का कर्ता अनेक को कहना असगत हो होगा । दूसरी बात यह है कि इस प्रकार से विचारशक्तिहीन लोगो के प्रवाद से ठगा गया आदमी भटकता रहता है | लोक-व्यवहार में देखा जाता है कि अल्प - स्वल्प काय भी पिता या माता के द्वारा बताया हुआ यदि हो तो उनके वाक्य पर श्रद्धा - विश्वास होने से उसे किया जाता है । ऐसी परिस्थिति में अनेक क्लेश तथा विपुल धन व्यय सम्पन्न होने वाले इस महान वैदिक कमकलाप को क्या उसके उपदेशक आत का स्मरण किये बिना ही किया जाता है? यदि कर्ता को बिना जाने हो इस वैदिक कर्मकलाप का किया जाता है, तो महान प्रमाद ही कहना चाहिए । छोटे - मोटे किसी कवि के द्वारा रचित जीण - शीर्ण पुस्तक में लिखित काव्य की तरह अम्माणकर्तृक ( अज्ञातकक ) वेद से व्यवहार चल नहीं सकता, इसलिये उसके कर्ता का ज्ञान ( स्मरण ) तो अवश्य रखना ही होगा । वेद की परम्परा का कभी विच्छेद हुआ हो, सो वह संभव नहीं, यदि कदाचित् परम्परा का विच्छेद होता तो जीर्णकूपारभादि की तरह उसके कर्ता का fare सभव हो भी सकता था, किन्तु ऐसी बात तो है नहीं । अतः वेद के कर्ता का स्मरण अवश्य होता ही चाहिये था, किन्तु नहीं हो रहा है । स्मरण ( स्मृति ) न होने का कारण यह है कि वह तो अनुभव मूलक हो होता है और अनुभव आजतक किसी को भी नहीं हुआ, क्योंकि अशरीर ( शरीररहित ) कर्ता का दर्शन हो सके यह संभव भी नहीं है । " यदि उसे सारीर माना जाय ता कोई भी वैसा पुरुष उस समय दिखाई देने पर भी वेद की रचना करता हुआ नहीं दिखलाई पडा । हाँ, अध्ययन करना हुआ अवश्य दिखाई दिया | तब लोगो को सन्देह होने लगता है - क्या इसके रचे हुए वेद हैं, या किसी के रचे हुए को यह पढ रहा है? यदि यह रचे हुए रहा है, तो उसमे भी सन्देह होता है । वेद वाक्यों की भगिमा से ( प्रकार से ) तो इसका अनादित्व ( अनादिता ) ही स्पष्ट प्रतीत को पढ़ हो रहा है । कर्ता के होने में यदि कोई प्रमाण देने का साहस करे तो वह असत्य ही होगा । प्रबन्ध को देखकर यदि कर्तृस्मरण कहा वह अन्धपरम्परा का अनुवर्तन करेगा । योगियों को उसके कर्ता के स्मरण होने की बात कहता तो व्यावहारिक नहीं होगी जाय तो चलते योगज भान ( योगियो का ज्ञान ) को स्वीकार नहीं किया जाता । यदि यह कहा जाय कि वेद । वादविवाद के तो अन्योन्याश्रय दोष होगा । अतः जो यह कहा गया था कि-- स्मर्यमाणकर्तृत्व और अस्मर्यमाणकर्तृकत्व से उसके कर्ता का ज्ञान होता है, वेदों की कता ही सिद्ध होती है । इसी को बताने के लिए अनुमान भी किया गया था कि ' वेद तक है दोनों , क्योंकि के कार्य के धर्म होने से वे rinse

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वेदाथपारिजात २१६ मतरीत्या परमेश्वरोत्पन्नत्वेऽपि निश्वासवद् बुद्धिप्रयत्नानपेक्षत्वेन प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य विरचितत्वनिरपेक्षोच्चरितत्व-प्रथमोच्चरितत्वादिरूपस कर्तृकत्वासिद्धावपौरुषेयत्वसिद्धे । वेद कृतक इत्याद्यनुमान व्यभिचारादिदुष्टम् । अस्मर्य्यमाणकर्तृकत्वमप्रमीयमाणकर्तृकत्व वा आत्मनि विद्यते । तत्र च कृतकत्व नास्ति । अत एवास्मर्य्यमाणकतृकत्वस्याकर्तृकत्व नार्थ, अप्रसिद्धत्वात् । प्रसिद्धौ वा साध्या विशिष्टत्वमित्या द्यपास्तम्, तावताप्यपोरुषेयत्वसिद्धेर्निष्प्रत्यूहत्वात् । तथाहि - अप्रमीयमाणकर्तृकत्वेनाकतृकत्व तेन चापीरुषेयत्वसिद्धि । वेद पौरुष > रचनावत्त्वादित्यादिसत्प्रतिपक्षोऽपि निराधार, रचनावत्त्वस्याद्याप्यसिद्धे । उत्तरमीमासकरीत्याऽपि प्रथमोच्चरितत्वाभावेन रचनावत्त्वासिद्धे । नहीदानीन्तनाना कालिदासीयकाव्याच्चारणेन रचना सिद्धयति । यदुक्तम् – ‘ प्रमाणान्तरविषयभाञ्जि वैदिकानि वाक्यानि आप्तोकानि, वाक्यत्वे सति प्रमाणत्वात् पित्रादिवाक्य-वत् ' इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, स्मर्य्यमाणकर्तृकत्वस्योपाधित्वात्, प्रमाणवाक्येषु वेदेषु स्मर्थ्य माणकतृकत्वभावात् । अस्यो-पाधेर्भारतादी साध्यव्यापकत्वे सति वेदेषु साधनाव्यापकत्वात् । अपि च प्रमाणान्तरविषयभाञ्जि वेदवाक्यानीति पक्षोऽप्यसिद्ध, वेदार्थस्य तदतिरिक्तप्रमाणाविषयत्वात् । नहि यागस्वगयो कार्य्यकारणभाव केनाप्यवगन्तु शक्य. प्रत्यक्षानु-मानागोचरत्वात् । अत एवाज्ञातज्ञापकत्वेन वेदाना प्रामाण्यमुक्तम्--हैं, जीणकूपारम्भादि के समान ' - वह सब ऊपर किये गये ऊहापोह से निरस्त हो गया । कर्ता का स्मरण किसी को भी न हो पाने से वेदो की नित्यता आत्मा की तरह निर्वाध रूप से सिद्ध हो जाती है । अप्रमीयमाणकतृक ( कर्ता के अज्ञात रहने से ) होने से उसकी afrat at feat ती है, ara उसके fre यत्व का ज्ञान करानेवाली श्रुति मो उसके अनुकूल ही पडती है । उत्तर मीमासको की पद्धति के अनुसार वेदों को परमेश्वर से उत्पन्न मानने पर भी श्वास - उच्छ्वास की तरह बुद्धि - प्रयत्न का अपेक्षा बिना किये तथा अन्यान्य प्रमाणों से पदार्थों का जानकर की जानेवाली रचना और निरपेक्षोच्चारणविषय एव प्रथमोच्चारण विषयत्व रूप सकतकत्व की सिद्धि न हो पाने से वेदों का अपौरुषेयत्व हो सिद्ध हो जाता है ' । ar fear or बनाया हुआ है, इत्यादि अनुमान जो किया था, वह व्यभिचारादि दोष से दूषित है । अस्यमाणकतृत्व ( कर्ता का स्मरण जिसमे नही हो पाता ) अथवा अप्रमीयमाणकतृकत्व ( जिसमे कर्ता का अनुभव नहीं हो पाता ) आत्मा में है, किन्तु वहाँ कृ नही है । इसीलिए अप्रसिद्ध होने से अस्मर्यमाणककत्व का अर्थ ककत्व नहीं है । यदि प्रसिद्ध भी मान लें तो साध्याविशिष् ar होना आदि बातो का निरसन हो जाता है । उससे भी अपौरुषेयत्व की सिद्धि निर्वाध रूप से हो जाती है । अत अप्रमीयमाणकर्तृत्व के कहने से rence an झ मे आता है और उससे अपौरुषेयत्व की सिद्धि हो जाती है । ' वेद पौरुष रचनावत्त्वात् वेद पौरुषेय है, रचित होने के कारण, इत्यादि सत्प्रतिपक्ष भी निराधार है, क्योकि अभ t de उसका रचित होना सिद्ध नही हो पाया है । उत्तर मीमासको को प्रद्धति के अनुसार भी प्रथमोच्चरितत्व न होने से रचनावत्त्व सिद्ध नहीं है । कालिदास के काव्य का कोई आधुनिक व्यक्ति उच्चारण करे तो क्या वह उच्चारण करने वाले की रचना कही जा सकती है? ' माणान्तर के विषय होने वाले वैदिक वाक्य आसोक्त है, क्योकि पिता - माता आदि के वाक्य की तरह वे वाक्य भी प्रमाण हैं'- अर्थात् पिता आदि के वाक्य प्रमाण होने के कारण जैसे व्याप्त वाक्य है, इसी तरह वैदिक वाक्य भी प्रमाण होने के कारण किसी आप्त के कहे हुए वाक्य है, वह कथन भी ठीक नहीं है, क्योकि स्मर्यमाणकर्तृत्व वहाँ उपाधि है । प्रमाणभूत वेदवाक्यों में स्मर्यमाणक ger १. अर्थात् जो किसी व्यक्तिविशेष की रचना होती है, वह स्वाभाविक नहीं होती, अपि तु प्रयत्न को भी अपेक्षा रखता है और बुद्धि की अपेक्षा भी रखती है । साथ ही दूसरे प्रमाणों से विषय का ज्ञान प्राप्त करके ही पुरुष के द्वारा कोई ग्रन्थ रचा जाता है । पुरुष के द्वारा रखे गये वाक्यों का उच्चारण से ही पुराने वाक्यों के उच्चारण की अपेक्षा नहीं रखता और ये वाय सर्वप्रथम उच्चरित होते है । किन्तु वेद - वाक्य तो बुद्धि और प्रयत्न की अपेक्षा के बिना ही स्वाभाविक रूप से श्वास - निश्वास की तरह प्रकट होते हैं । उनके विषयों का दूसरे प्रभागों से ज्ञान भी नहीं होता और वे वाक्य अपने सदृश वैसे ही पुराने उच्चारण की अपेक्षा भी रखते हैं । तथा वे वाक्य सवप्रथम उच्चरित भी नहीं है । इसलिये चैत्र के वाक्यो का कोई कर्ता नहीं है, अत ated ही सिद्ध हो जाते हैं ।

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 250 का मूल पृष्ठ
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२२० प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्धयते । एन विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता ॥ इति । एतेन वेदरचनाया कतुपूर्वरचनाविलक्षणत्वादिति प्रतिपादनमपि युक्तम् । यदुक्तम्- ' किमिद वैलक्षण्यम्, दुर्भणत्व दुश्रवणत्व लोकव्याकरणप्रसिद्धशब्दवैलक्षण्य वा ' इत्याद्यप्यपास्तम्, प्रमाणान्तरागोचरत्वस्यैव वैलक्षण्यात् । लौकिकानि वाक्यानि प्रत्यक्षानुमानमूलकानि, आर्षाणि प्रत्यक्षानुमानवेदमूलकानि भवन्ति । वेदवाक्यानि तु नान्यमूलकानि भवन्ति । यथा शब्दस्पशरूपादीनि श्रोत्रादिमात्रविषयकाणि, यथा चक्षुषैव रूपमुपलभ्यते नान्येन श्रोत्रादिना, अथ च निर्दोषेणावलोकादिसहकारिसहकृतेन चक्षुषा रूपमुपलभ्यत एव न नोप-लभ्यते, इत्ययोगान्ययोगव्यवच्छेदकेनैव कारकद्वयेनासाधारण सम्बन्धो निर्धाय्यते । तथैव धर्मब्रह्मणी वेदेक-समधिगम्ये वेदेनैवोपलभ्येते । अधिकारिपुरुषरुपक्रमोपसहारादिभिर्लिङ्ग विचार्य्यमाणैर्वेदैरुपलभ्येते एव । दुर्भणत्वादिकमपि सम्यगेव, गुरुमुखैकवेद्यत्वात् । गुरोमुखादनुश्रूयते, अत एवानुश्रवत्व वेदस्य । पुरुषमात्रस्य तादृशसामर्थ्याभावेनापौरुषेयत्वा-भ्युपगमात् । अत एव ' अस्य महतो भूतस्य निश्वसितम् ' इति निश्वासन्यायेन पुरुषबुद्धिप्रयत्नानपेक्षत्वेनाकृत्रिमत्वाव-गमात् । वेदा पौरुषेया, वाक्यत्वात् रचनात्वाच्च महाभारतादिवाक्यवदिति प्रत्यनुमान तु स्मर्यमाणकर्तुकत्वेन यदुक्त रचनात्वादस्मम्यमाणकतृकत्वाच्चेत्यनयो कतरदप्रयोजकमिति प्रश्ने Retreate की प्रतीति नहीं हो पाती | महाभारत आदि मे उक्त उपाधि साध्य ( आसवाक्यत्व ) की व्यापक रहने पर भी वेद मे साधन ( हेतु ) की अव्यापक हो जाती है । दूसरी बात यह है कि ' अन्य प्रमाणो के विषय वेदवाक्य ' यह पक्ष ( कथन ) भी सिद्ध नहीं किया जा सकता, क्योकि वेदाथ ( यज्ञ से स्वग होता है, इत्यादि ) वेद से हो जाना जा सकता है, अन्य किसी प्रमाण से नहीं । यज्ञ से स्वर्ग होता है, इस बात को कोई भी वेद के सिवाय प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणो से नहीं जान सकता । इसलिये वेद अन्य प्रमाणो से नहीं जाने Street वाले fart का ज्ञान कराने वाला होने के कारण ही प्रमाण माना गया है । मनु ने कहा भी है- ' प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा जो उपाय नहीं जाना जाता, उस उपाय को वेद के द्वारा ही लोग जान पाते हैं । यही वेद का वेदत्व है । ' अत वेद की रचना अन्य किसी कर्ता के रचना की अपेक्षा विलक्षण है- यह कथन उचित हो है । यह जो कहा गया है कि अन्य सकर्तृक रचनाओ की अपेक्षा क्या वेद की रसना में दुमणत्व, दुश्रवणत्व अथवा लोक प्रसिद्ध तथा व्याकरण प्रसिद्ध शब्दों की दृष्टि से वैदक्षण्य है? यह भी ठीक नहीं है । वहाँ तो केवल प्रमाणान्तर का विषय न हो पाना ही उनकी विलक्षणता है । लौकिक वाक्य प्रत्यक्षानुमानमुलक होते हैं । भाष वाक्य प्रत्यक्ष, अनुमान और मूलक होते हैं, किन्तु वेदवाक्य अन्य मूलक नही होते | जैसे शब्द, स्पर्श, रूप आदि केवल श्रोत्रादि इन्द्रियो के हो विषय होते हैं, चक्षु से ही रूप की उपलब्धि होती हैं, start a इन्द्रियो से नहीं । तथा प्रकाश आदि की सहायता पाकर दोष रहित नेत्रों से रूप की उपलब्धि होती ही है, नहीं होती है, यह कोई नही कह सकता । इसी रीति मे नन्ययोग तथा इन अयोगव्यवच्छेदक इन दो एवकारों के द्वारा उस उस इन्द्रिय और उस उस विषय के असाधारण सम्बन्ध का निर्धारण किया जाता है । उसी प्रकार एकमात्र वेद स समक्ष में आने वाले धर्म और ब्रह्म का ज्ञान वेद से ही हो सकता है | उपक्रम - उपसहारादि षविध लिङ्गो के माध्यम से अधिकारी पुरुषो के द्वारा विचार किये जाने वाले वेदों में धर्म और ब्रह्म का ज्ञान होता ही है । गुरुमुख से ही वैद्य होने के कारण उनका दुमणत्व रहना उचित ही | इसीलिये उनकी रचना में मनुष्यमात्र का सामय्यं न होने से उन्हें अपौरुषेय माना गया है, उसी कारण वेदो को अनुभव कहा जाता है । ' अस्य महतो भूतस्य निश्वसितम् ' इस निःश्वास न्याय से ( श्वास - प्रश्वास की तरह ) पुरुषबुद्धि और प्रयत्न की अपेक्षा न होने से उन्हें अकृत्रिम माना गया है । यह तो हम पहिले ही बता चुके हैं कि ' वेदा पौरुषेया वाक्यत्वात्, रचनात्वाच्च महाभारतादिवाक्यवत् - वेदों में वाक्य और रचना की उपलब्धि होने से महाभारत के वाक्यों की तरह उनके पोरुषयता का अनुमान किया जा सकता है । किन्तु उस अनुमान मे स्मर्यमाण-neer की उपाधि रहने से वह सोपाधिक अनुमान है । यह जो कहा गया है कि ' रचनात्वात् और अस्मर्यमाणकतृ कत्वात् ' इन दो treat में से कौन - सा प्रयोजक शोर कौन सा अप्रयोजक है? यह प्रश्न करने पर ' रचनात्व ' को ही प्रयोजक और उससे अन्य सभी को प्रयोजक बताया है । पुरुष के बिना अक्षरों का विन्यास कहीं भी देखा नहीं गया है । किसी सभ्य के द्वारा न सुना गया है और मवेक्षा