वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 261–270

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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वैदाथपारिजात २३१ सनेऽपि प्रत्यक्षस्याप्रामाण्यप्रसङ्गात् । मरीचिषु बाधकसद्भावादप्रामाण्य नैतस्येति वेदत्रापि तत्समानत्वात् । एतेन ' अन्यदेवे-न्द्रियग्राह्यम् ' इत्यादिकञ्चापास्नम् । अन्धस्य चक्षुष्मतश्चाभिन्नेऽपि विषये प्रतिभासभेदोपपत्ते । दृश्यते हि पादपादी विषया-भेऽपि दुरामन्नदेशादिसामग्रीविशेषवशात् प्रतिभासभेदविषयता । तथैव शाब्दप्रत्यक्षबोधयोरभिन्नविषयत्वेऽपि शब्द-न्द्रियादिसामग्रीभेदात् स्पष्टास्पष्टप्रतिभासभेदो न विरुद्धयते । तस्मात् ' शब्दात्प्रत्येति भिन्नाक्षो न तु प्रत्यक्षमोक्षते ' इत्यादि-कथन निरयकमेव | यदप्युक्त काय्यकारणभावान्नातिरिक्तो वाच्यवाचकभाव इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, शब्दबुद्धिप्रतिबिम्बयो कार्य्य-कारणभावप्रतिपेधात् । किञ्च यदि कार्य्यकारणभावे एव वाच्यवाचकभावस्तदा श्रोत्रज्ञाने भासमान शब्द स्वप्रतिभासस्य कारणत्वात् तस्य वाचकोऽप्यस्तु । यथा शब्दो विकल्पस्य कारण तथा परम्परया स्वलक्षणमपि कारण भवति तदपि वाचक भवेत् । तेनाबाधितप्रत्यये यद्यथा प्रतीयते तत्तथैव मन्तव्यम् | अबाधे शाब्दे प्रत्यये सामान्यविशेषात्मकतया बाह्य घटादिक प्रतिभासमानत्वात्तत्तथाभूतमेव मन्तव्यम् । अत एव मीमासकैरपि जातिव्यक्त्यात्मक एव शब्दार्थोऽभिप्रेत । ' आकृतिस्तु ' ( १३३३ ) अत्र आक्रियते व्यक्ति रनयेति व्युत्पत्त्या जातिरेवाकृतिरभिप्रेता । तदुक्त भट्टपादै. जातिमेवाकृति प्राहु व्यक्तिराक्रियते यया । सामान्य तच्च पिण्डानामेकबुद्धिनिबन्धनम् || तन्निमित्तञ्च यत्किञ्चित् सामान्य शब्दगोचरम् । सामान्यमाकृतिर्जाति शक्तिर्वा सोऽभिधीयताम् || यद्येकमेव वस्त्वनेकाकार तर्हि तादृगेव शब्दोऽभिदधत्सामान्यमात्राभिधायी न स्यात् । न च कश्चिच्छन्दस्तादृशमर्थं भाषितु शक्नोति । ' सामान्याशानपोद्धृत्य पद सर्व प्रवर्तते ' गोशब्दोच्चारणे व्यक्तयोऽभिधेया स्यु, ततश्चित्रखण्डमुण्डादि-आँख वाले व्यक्तियों के ज्ञानों के एक रहने पर मी दूर देश तथा दोनो का अभिन्न विषय है, दोनों में स्थिति समान है । अत ' अन्यदेवेन्द्रियग्राह्यम् ' इत्यादि का निराम हो गया । अन्ध और विषय में भेद न रहने पर भी उनके ज्ञान मे भेद रहता ही है । हम देखते हैं कि वृक्षादि विषय के देश आदि सामग्री विशेष के कारण ज्ञान का भेद हो जाता है, उसी तरह शाब्द ज्ञान और प्रत्यक्ष ज्ञान ( एक विषय ) रहने पर भी शब्द, इन्द्रिय आदि सामग्री के भेद से स्पष्ट ज्ञान तथा अस्पष्ट ज्ञान रूप ज्ञान के नही हे । यस यह कथन निर कि अन्धे को शब्द से तो ज्ञान हो जाता है, किन्तु वस्तु का प्रत्यक्ष नही भेद है । शब्द से जो ज्ञान होगा, वह अस्पष्ट होगा और आँख वाले को जो ज्ञान होगा, वह स्पष्ट होगा यही उन दोनो ज्ञानो मे मानने में कोई विरोध होता, क्योकि अन्ये को क्योकि शब्द यह जा कहा था कि काय कारणभाव से अतिरिक्त वाच्य वाचकभाव सम्बन्ध नहीं है, वह भी नि सार है । और बुद्धिप्रति fare में कार्य कारणभाव नही होता । दूसरी बात यह है कि यदि काय कारणभाव जहाँ हो, वही वाच्यवाचकभाव का ) वाचक भी कहना होगा । " हेगा तो श्रोत्र ज्ञान मे भासित होने वाला शब्द, अपने ज्ञान का कारण होने से, उसे उसका ( ज्ञान है । तब उसे भी ( स्वलक्षण जैन शब्द, विकल्प | ज्ञान ) का कारण होता है, वैसे ही परम्परा से स्वलक्षण भी उसका कारक होता शाब्द ज्ञान से सामान्य को भी ) वावक कहा जाय । अबाधित प्रत्यय में जो जैसा प्रतीत हो उसे वैसा ही मानना होगा । बाधरहित ने भी जाति ( व्यक्तित्व ) विशेषण से बाह्य घटादि पदार्थों का ज्ञान होने से उन्हें वैसा ही समझ लेना चाहिये । इसीलिये मोमासको भनया ' इस व्युत्पत्ति से जाति रूप हो शब्द का अर्थ माना है । " आकृतिस्तु क्रियार्थत्वात् " -- ( ११३३३३ ) यहाँ पर ' आक्रियते व्यक्ति ही जाति शब्द से उन्हें अभिप्रेत है । इसी बात को कुमारिल भट्ट इन श्लोको से कहते हैं--जातिवाकृति प्राह व्यक्तिराक्रियते यथा । सामान्य तच्च पिण्डानामैकबुद्धिनिबन्धनम् ||

निमि चित् सामान्य वन्दगोवरम् । सामान्यमाकृतिर्जातिः शक्तिर्वा सोऽभिधीयताम् ॥

( व्यक्तियो ) जाति को ही आकृति कहते हैं, जिसके द्वारा व्यक्ति ( द्रव्य ) का निरूपण किया जाता है । पृथक पृथक पिण्डो जो सामान्य है, वह चाहे मैं जो एकाकार बुद्धि का कारण हैं, वहीं सामान्य ( जाति ) हैं । एकाकार बुद्धि को उसे पैदा शब्द करने का मे वाच्य निमित्तभूत मानने से किसी का वैमत्य नहीं जाति कहीं जाये, चाहे आकृति कही जाय, चाहे शक्ति कही जाय, है सब एक हो, या शक्ति शब्द से बताया जाता है । हैं, fears at her उसके स्वरूप में है । मीमासकों के मतमें वह स्वरूप सामान्य, आकृति, जाति

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२३२ वेदाथपारिजात विशेषस्वरूपग्रहणाद्विचित्रा बुद्धि स्यात्, न तथा बुद्धिर्भवति किन्त्वेकाकारैव तु बुद्धिरुत्पद्यते । तेनाकृतिरेव शब्दार्थ । तेनेव गामानयेत्यक्ते सामान्ययुक्ता काञ्चिदेव व्यक्तिमानयति । व्यक्तिवाचकत्वे तु सर्वासा युगपदभिहितत्वादशेषानयन भवेत् । या वा अभिधेया सेवानेया स्यात् । सामान्यग्रहणे तु पश्वाद्वयक्तय प्रतीयन्ते, आकृतिप्रत्ययस्य निमित्तान्तराभावात् । व्यक्तिप्रत्यये च पूर्वप्रतीतसामान्यनिमित्तत्वाज्जातिरेव शब्दाथ | शास्त्रदीपिकाकारश्च -आनन्त्यव्यभिचाराभ्या शक्त्यत्वदोषत । सन्देहाच्चरमज्ञानाच्चित्रबुद्धेरभावत ||

अन्वयव्यतिरेकाभ्यामेकरूपप्रतीतित। प्रथमज्ञानात्तस्या एवाभिधेयता ॥

व्यक्त्याकृत्योरभेदाच्च व्यवहारोपयोगिता । लिङ्गसङ्ख्यादिसम्बन्धसामानाधिकरण्यधी || सर्वं समञ्जस ह्येतद्वस्त्वनेकान्तवादिन । वाक्यपदीयकारश् — ' सम्बन्धिभेदात् सत्तवाभिद्यमाना गवादिषु । जाति सप्रोच्यते तस्या मर्वे शब्दा व्यवस्थिता ॥ ' अत एव सर्वत्र वस्तुबुद्धिरतुवृत्तिव्यावृत्त्यात्मकत्वेन द्वयात्मिकैव भवति । safa शेषात्मक ra सामान्यप्रतीतेनिरालम्बत्वमेव स्यात् । नहि मरुमरी चिनिचयनीरप्रतीतिवत् सामान्यप्रत्ययोपमदन विशेषप्रतीतिन वा विशेषप्रत्ययबाधेन सामान्यप्रतीतिभवति । किल् युगपदेवोभयप्रतीत्युदया जायते । यदुक्त सौगते - पूर्वापराननुस्यूतस्वलक्षणमात्रग्राहिप्रत्यक्षेण सामान्य न गृह्यते, समानेषु गृहीतेषु तद्वृत्तिसाधारणरूपमनधार यदि एक ही वस्तु अनेक आकार की है, तो शब्द, उसे उसी तरह बतावेगा, तब यह केवल सामान्य का अभिधायक ( वावक ) न होगा । कोई भी शब्द उस प्रकार के अथ को नही बता सकता । " सामान्याशानपोद्धृत्य पद सर्व प्रवर्तते " तब गोशब्द का उच्चारण करने पर उससे व्यक्ति अभिधेय ( वाच्य ) होगी । चित्र, खण्ड मुण्ड आदि विशेष स्वरूपो का ग्रहण होने से विचित्र बुद्धि ( ज्ञान ) होने लगेगा, किन्तु वैसा होता नहीं, बल्कि एकाकार बुद्धि ही उत्पन्न होती है । अत शब्द का अर्थ माकृति हो है । इसी कारण ' गाम् आनय ' ----गाय ले आगो - कहने पर सामान्य ( जाति ) से युक्त किसी एक व्यक्ति को ले आता है । लेकिन शब्द का अथ व्यक्ति मानने पर सभी व्यक्ति er युगपत् ( एक साथ ) अभिहित होने के कारण समस्त व्यक्तियो को लाना होगा, अथवा जो व्यक्तिविशेष ग्राभवेय ( वाच्य ) हुआ हो उसी को लाना होगा । किन्तु सामान्य ( जाति ) की प्रतीति हाने के पश्चात् व्यक्तियों की प्रतीति होती है । आकृति की प्रतीति होने में किसी अन्य निमित्त के न होने से और व्यक्ति की प्रतीति मे पुत्र प्रतीत हुआ सामान्य ही निमित्त बन जाने से शब्द का अर्थ जाति ही हैं । शास्त्री furere श्रीपाथसारथी मिश्र भी इसी बात को इन श्लोको मे कहते हैं-शक्त्यनेकत्वदोषतः । सन्देहाच्चरमज्ञानाच्चित्रबुद्धेरभात ||

अन्वयव्यतिरेकाभ्यामेकरूपप्रतीतित । आकूते! प्रथमज्ञानात्तस्या एवाभिधेयता ॥

व्यक्त्याकृत्योरभेदाच्च व्यवहारोपयोगिता । लिङ्गसख्यादिसम्बन्धसामानाधिकरण्यधी. ॥ सर्वे समास ह्येतद् वस्त्वनेकान्तादिन । arrrrrrr कहते हैं कि सम्बन्धि के भेद से भिन्न न होने वाली सत्ता को ही गो आदि में जाति शब्द से कहा जाता है, उसमे सभी शब्द व्यवस्थित है ---सम्बन्धिभेदात् सत्तेवाभिद्यमाना गवादिषु । जाति सम्प्रोच्यते तस्या सर्वे शब्दा व्यवस्थिता ॥ इस कारण सवत्र वस्तुविषयक ज्ञान अनुवृत्ति तथा व्यावृत्ति रूप से दो प्रकार का ही होता है । केवल विशेषात्मक ( विशेषरूप ) मानने पर सामान्य ज्ञान ( प्रतीति ) निराश्रय ही हो जायगा । मरुमरीचिकासमूह में जलज्ञान के समान सामान्य प्रत्यय ( ज्ञान ) का उपमर्द ( बाध ) कर विशेष ज्ञान ( प्रतीति ) नहीं होता और न विशेष प्रत्यय ( ज्ञान ) का बाघकरके सामान्य ज्ञान ( प्रतीति ) होता है, किन्तु किसी का भी विशेष बिना किये एक साथ ही उभय प्रतीतियो ( दोनी ज्ञानो ) का उदय ( उत्पत्ति ) होता है । जैसा कि बोबों ने कहा है --- पूर्वापराननुस्यूतस्वलक्षणमात्रग्राही प्रत्यक्ष से सामान्य का ग्रहण नहीं किया जाता । समान पदार्थों का ग्रहण करने पर वृत्ति साधारण रूप का अवधारण कर सामान्य का ग्रहण किया जा सकता है, व्रत सामान्य ज्ञान सापेक्ष है, किन्तु प्रथम दृष्टिपात मात्र से उत्पन प्रत्यक्ष ज्ञान तो निरपेक्ष होता है, अतः वह कैसे उसका ग्रहण करा सकेगा । उसके पश्चात् होने वाले सस्पर्शशून्य विकल्प ज्ञानों के द्वारा सामान्य का ज्ञान होने पर भी उसकी सत्ता को वास्तविक नहीं कहा जा सकता । उसी प्रकार अनुमान तथा शब्द से भी सामान्य ( जाति )

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date पारिजात २३३ सामान्य ग्रहीतु शक्यत इति सापेक्ष तत्स्वरूपग्रहणम् प्रथमाक्षिसन्निपातसमुद्गत प्रत्यक्ष ज्ञान तु निरपेक्ष कथ तद्ग्रहणाय प्रभवेत् । तत्पृष्ठभाविभिर्वस्तुसस्पर्शशून्यैर्विकल्पैस्तु गृहीतस्यापि सामान्यस्य न परमार्थसत्व सम्भवति । एवमनुमान शब्दश्च न तत्साधयितुं शक्नुत, तयोर्विकल्पविषयत्वेन वस्त्वग्राहकत्वात् । तेन न व्यक्तिभिन्न सामान्य सम्भवति । करतलगतानि विल्वादीनि फलानि यथोपलभ्यन्ते, न तथा जातिव्यक्त्योर्भेदोऽवलोक्यते । यद्यतो व्यतिरिक्त तत्तस्मिन्न-गृह्यमाणेऽपि गृह्यते, घटादिव पट । न च व्यक्तावनुपलभ्यमानाया जातिरुपलभ्यते, तेन तन्न ततो भिद्यते । यत्तु तद्वृत्तित्वात् सामान्यस्य तदग्रहेऽनुपलब्धिरिति तन्न, वृत्त्यनुपपत्तेरेव । तथाहि-- सामान्य प्रतिपिण्ड कार्त्स्न्येन भवत्येकदेशेन वा? प्रथमे पिण्डान्तरेऽनुपलञ्चिप्रसङ्ग । द्वितीये क्वचिदपि सामग्र्येण तदनुपलब्धि, निरवयत्वेन तदशानुपपत्तिश्च । एव प्रत्येक समाप्तस्य पुनरुत्पत्ति विनाऽन्यत्र सामान्यस्य न सम्भव । न चैव वृत्ति क्वचिदस्ति । यदपि व्यक्तिषु सामान्यसमवायात्मिका वृत्तिरिष्यते, सापि चिन्त्या । यदुक्तम् -- अयुत सिद्धानामाधाधारभूतानामिहप्रत्ययहेतु सम्बन्ध समवाय इति, तद्विप्रति-द्विम् । अयुत सिद्धता च सम्बन्धेति विप्रतिषिद्धयते | पृथक् सिद्धानि कुण्डवदरादीन्येव सम्बध्यन्ते । अयुतसिद्धे तु वस्तुनी तदेकत्वात् न कि सम्बध्येत । द्रव्यगुणयोरपि तादृक्सम्बन्धवर्णन तादृगेव, रूपादिभ्यो मिन्नत्वेन गुणिनोऽदर्शनात् । एव-मेव नित्याना परमाणूना पृथग्गतिमत्त्वेऽयुत्त सिद्धि } अनित्याना तु युताश्रयिसमवायित्वम् । विभूनामाकाशादीना तु सम्बन्धो नास्त्येवेत्यद्यापि नि सारम्, यतो नानात्वेन सिद्धिनिष्पत्तिज्ञप्तिर्वा युतसिद्विरुच्यते । तद्विपर्ययादैक्येन सिद्धिरयुतसिद्धिरुच्यते । त्यैक्यै सम्बन्ध दुर्वच एव । तदुक्त भट्टे - ' नानिष्पन्नस्य निष्पत्तौ युतसिद्धता | परमाण्वाकाशयो परमाणुकालयो सम्बन्धो मन्यते, नाकाशकालयोरिति च स्वगोष्ठीनिष्ठप्रक्रियामात्रम् । ' की सिद्धि नहीं की जा सकती, क्योकि दोनो प्रमाण विकल्पविषयक होने से वस्तु के ग्राहक नहीं हैं । अत व्यक्ति से भिन्न सामान्य-Trent feat वस्तु का होना संभव नहीं है । हथेली पर जैसे बेलफल आदि वस्तुएँ उपलब्ध होती है, उस प्रकार से जाति - व्यक्ति का भेद देखने मे नही आता । जो जिससे भिन्न होता है, वह उसके ग्रहण न किये जाने पर भी गृहीत होता हैं, जैसे पट घट से भिन्न है, अत घट ग्रहण न किये जाने पर भी पट का ग्रहण किया जा सकता है । किन्तु व्यक्ति की उपलब्धि न होने पर जाति की उपलब्धि नही होती, जो व्यक्ति से भिन नहीं कह सकते । यह जो कहा गया था कि व्यक्ति का ग्रहण न किये जाने पर व्यक्तिवृत्ति सामान्य का ग्रहण नहीं हो सकेगा । किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्याकि सामान्य का व्यक्तिवृत्ति होना उपपन्न नहीं हो रहा है । प्रत्येक व्यक्ति मे सामान्य का जो वृत्तित्व है, वह व्यक्ति मे पूणतया है RERT व्यक्ति में एक देश से ( अद्यत ) है? यदि प्रथम पक्ष माना जाय तो अन्य व्यक्ति ( पिण्डान्तर ) में उसकी अनुपलब्धि का प्रसंग प्राप्त होगा । यदि द्वितीय पक्ष माना जाय तो कही पर भी समग्रतया उसकी उपलब्धि नहीं होगी । तथा सामान्य तो निरवयव है, अतः उसका अर्थ होता उपपन्न नहीं हो सकता । उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति में ( सम्पूणतया रहने से ) समाप्त हुए सामान्य की दूसरी व्यक्ति में वृत्ति तभी हो सकती है, जब उसकी पुन उत्पत्ति हो । किन्तु उसकी ऐसी कही भी नहीं है । यद्यपि व्यक्तियों में सामान्य की समवायात्मिका वृत्ति कही जाती है, किन्तु वह चिन्तनीय है । यह जो कहा या कि आचार्याधारभूत अयुत्तसिद्ध पदार्थो का धहप्रत्ययहेतुभूत सम्बन्ध समवाय होता है । किन्तु यह तो परस्पर विरुद्ध है, क्योंकि एक और अयुत सिद्धता कहना और दूसरी और उसका सम्बन्ध बताना यह कैसे हो सकता है? अत वह विरुद्ध है । परस्पर पृथक रहनेवाले कुण् - बदर जैसे पदार्थों का ही सम्बन्ध होता है । मयुतसिद्ध दो वस्तुएं तो एक ही समझी जाती है, तब कौन किससे सम्बद्ध होगा? -गुण का समवाय सम्बन्ध कहना भी पूर्वोक्त दोषो से दूषित है, क्योकि रूपादि गुणो से गुणी ( द्रव्य ) का अलग होना नही देखा गया है । उसी प्रकार free परमाणुओं को पृथक् पतिमान् मानने पर वे अद्भुतनिद्धि होगे और अनित्य पदार्थों का युताश्रयित्व रूप समवायित्व होगा और आकाशादि विपदायों का सम्बन्ध तो होता ही नहीं । वैशेषिकों को यह कथन अद्यापि मिसार है, क्योंकि वैशेषिक लोग नाना-स्वैम पदार्थों की सिद्धि, निष्पत्ति, अथवा इति को युतसिद्धि कहते हैं । उसके विपरीत ऐक्येन ( एकरूप मे ) सिद्धि को अयुतसिद्धि कहते हैं । बत, ऐक्य रहने पर सम्बन्ध कहना असंभव ही है । भट्टपाद ने कहा है -- ' अनिष्पन्न की निष्पत्ति मे युतसिद्धता नहीं होती । परमाणु और आकाश का तथा परमाणु और काल का सम्बन्ध माना जाता है, लेकिन माकाश और काल का सम्बन्ध नहीं माना जाता । यह संच वैशेषिकों की अपने घर की कल्पनाएँ हैं । ३०

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२३४ चित्तु रूपरूपवलक्षण जातिव्यक्त्यो सम्बन्धमाचक्षते, विकल्पानुपपत्ते । तथाहि-- रूपशब्द शुक्लादिबोधक, आकारबोधक, स्वभाववचनो वा । प्रथमे पवनमन प्रभृतिद्रव्याणा गुणकर्मणा च जातिहीनता स्यात् । द्वितीये निरवयवाना गुणादीनानि सामान्यतापत्ति । तृतीये जातिव्यक्त्योरव्यतिरेकापत्ति स्यात् । तदुक्तम्- ' अवभाति हि भेदेन स्वभावो न स्वभा-बिन ' इति । अपि च, रूप वस्त्वेव वस्तुधर्मो वा वस्त्वन्तर वा? नान्त्य, तथाऽप्रतिभानात् । वस्तुधर्मोऽपि न वस्तुव्यतिरेकेण भाति, अव्यतिरेके सम्बन्धरूपतानुपपत्ति । किञ्चय जाति सर्वं सर्वगता पिण्डस्वगता वा? प्रथमे कर्कादावपि गोबुद्धयापत्ति, गजादिषूष्ट्रबुद्धिरपि स्यात् । तथा सति पदाथसाङ्कर्यमेव स्यात् । यदि तु व्यक्तिसामध्यानयमान्न साङ्कयम्, कर्कादिपिण्डाना गोत्वादि-व्यञ्जकत्वाभावात् । तदा खण्डमुण्डादिपिण्डानामप्यनशगोत्वव्यञ्जकत्वानुपपत्ति । तस्मात् सवगतत्वे सवत्रैव प्रतीयेत सर्वगतत्व वा जह्यात्, पिण्डदेशग्रहणे नियामकाभावात् । किञ्च, पिण्डस्य दीपवद्वयञ्जकत्वे तद्दशस्थतासिद्धि । पिण्डसवगतत्वे यद्यप्येतानि दूषणानि नोन्मिषन्ति तथापि सद्यो जाताया गवि गोत्वानुभवानापत्ति | अजाते पिण्डे जातिर्न भवति, जाते च भवति, न चान्यत सा सक्रामति, निष्क्रियत्वात् । पूर्वपिण्ड च नोज्झति, न चाशैर्वर्तते, निरशत्वात् इत्यादिकमप्यपास्तम्, अनुवृत्तिबुद्धि-निरालम्बतापत्ते । न च भ्रान्तिरेव सा, बाधाभावेन दृढप्रत्ययत्वात् । नात्र मरुमरीचिनिचयनीरप्रतीतिवत् सामान्यप्रत्यय arta f वशेषप्रत्ययो जायते, न वा विशेषबाधेन सामान्यप्रत्यय } किन्त्वविरोधेन युगपदुभयाभास । तेन यदि सौगतवत् स्वलक्षणमेव वस्तु स्यात्तदा तन्नापपद्येन । यदि वेदान्तिवत् सामान्यात्मकमेव वस्तु स्यात्तदा व्यावत्तिबुद्धिर्न स्यात् । कुछ लोग विकल्प की उपपत्ति न हो पाने से जाति व्यक्ति मे रूप - विलक्षण सम्बन्ध कहते हैं । उसी का उपपादन करते -रूप शब्द, शुक्ल आदि का बोधक है या आकार का बोधक है, या स्वभाव का वाचक है? प्रथम पक्ष में पवन, मन आदि द्रव्य तथा गुण और कर्मों में जातिहीनता का प्रसग आवेगा । दूसरे पक्ष में निरवयव गुणादि मे नि सामान्यता होगी और तीसरे पक्ष में जातिव्यक्ति दोनो मे अभेदापत्ति होगी । कहा भी है- " अवभाति हि भेदेन स्वभावो न स्वभावित " | स्वभावी से स्वभाव की भेदेन अर्थात् पृथ प्रतीति नही होती । दसरी बात यह है कि रूप वस्तु ही है या वस्तु का धर्म है, या वस्त्वन्तर, यानी अलग एक पृथक वस्तु हे? अलग से एक पृथक् वस्तु के रूप में ' रूप ' की प्रतीति न होने के कारण अन्तिम पक्ष ठीक नहीं है । द्वितीय पक्ष वस्तु - धर्म कहे तो वस्तु से अलग उसको प्रतीति नहीं होती, अलग प्रतीति न होनेपर सम्बन्धरूपता नही बन पाती | प्रथम पक्ष में भी यही दोष है । ha, यह जाति, समस्त पदार्थों में व्याप्त है या किसी एक पदार्थ मे व्याप्त है? प्रथम पक्ष में फेंकडे ( कर्क ) से भी गोबुद्धि होगी, हाथी ( गज ) में उष्ट्र ( ऊँक ) बुद्धि होगी । वैसा होने पर पदार्थसा ही होगा । यदि यह कहा जाय कि व्यक्तिनामध्ये के नियम से साय नही हो सकेगा, यत क आदि पदाथ गोत्व के अभिव्यक्षक नहीं होगे । तब खण्ड मुण्ड आदि व्यक्ति विशेष भी अशगोथ के व्यंजक नहीं बन पायेंगे । एवच सर्वगतत्व पक्ष मे सर्वत्र ही या तो प्रतोति होगी या अपने सर्वगतन्य का त्याग करेगी । पिण्डदेश ( व्यक्तिविशेष ) के ग्रहण करने के पक्ष में कोई नियामक नहीं है । किञ्च, frve को दीपक की तरह व्यञ्जक यदि माने तो पियह-Green ( अर्थात पिण्डर्वगतत्व ) सिद्ध हो सकेंगी । पिण्डसर्वगतत्व पक्ष मे यद्यपि में दूषण उपस्थित नहीं हो पाते, तथापि सद्योजात भी मे tear aana नही हो सकेगा । अनुत्पन्न पिण्ड में जाति नहीं होती, उत्पन्न पिण्ड में ही जाति होती है । यह ( जाति ) निष्क्रिय होने मे एक से दूसरी जगह सक्रमण नहीं करती, पूर्वपिण्ड का त्याग नहीं करती, निरश ( निरवयव ) होने से वह अंशत भी नहीं रहती, इत्यादि दूषणों का भी निरसन हुआ । उसे न मानने पर अनुवृत्ति बुद्धि को निरालम्ब ( आधारहीन ) कहना होगा | उसे भ्रान्ति भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसका बाध न होने से उसमे दृढ प्रत्यय होता है । यहाँ पर मरुमरीचिसमूह मे नीर ( जल ) की प्रतीति की तरह सामान्य प्रत्यय ( ज्ञान ) का बाघ होकर विशेष प्रत्यय ( ज्ञान ) नहीं होता और न ही विशेष प्रत्यय ( ज्ञान ) का बाध होकर सामान्य प्रत्यय होता है, किन्तु अविरोधेन युगपत् दोनी का आभास होता है । अत यदि सौगत ( जोद्धो ) की तरह स्वलक्षण ही वस्तु हो, तब वह - उपपन्न न होगा और यदि वेदान्तियो की तरह सामान्यात्मक ही वस्तु हो, तब व्यावृतिबुद्धि न होगी ।

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२३५ यदुक्तम् -- तदेव सामान्य स एव विशेष 1 तदेवेक तदेव नाना, तदेव नित्यमनित्यम्, तदेवास्ति नेति दृष्ट चादृष्टमिति, तन्नयुक्तम्, विराधात् । ननु दृष्टत्वान्न विरोध इति चन्न, अदृष्टत्वात्, नेत्रधीर्नानुवृत्त ग्राहिणीत्युक्तत्वात् । विचित्रविकल्पवास-नोपतबुद्धयस्तथा पश्यन्ति । तस्मात् स्वलक्षण वस्तुनो रूप सामान्य तु कल्पनामयम् । न नेति प्रत्ययादेव बाध्यत्वमिथ्या-स्वादिक निश्चीयते, किन्तु परीक्षया युक्तिविशरणेनापि मिथ्यात्वादिक प्रतिपत्तव्यम् । न चैक सक वस्तुनिर्विकल्पकगोचरो भवति, व्यक्त्यन्तरानुसन्धानमन्तगऽनुवृत्तिबुद्धयनुपपते । एकार्थक्रियाकारित्वेन सामान्यव्यवहारस्तुक्त एव । सत्तादिसामा-न्यानि निसामान्यानीत्यभ्युपगम्यते परैरपि । यथा तत्र औपाधिकोऽनुगतप्रत्ययस्तथा प्रकृतेऽपि बोध्यम् । यदुक्तम् -'यदेव वादाहादिकार्यमेकेन जन्यते । गोपिण्डेन तदेवान्यैरिति तेष्वनुवृत्तिधी ॥ ' ननु प्रतिव्यक्ति कार्य भिन्न-मेवेति चेत्तथापि कर्कादिकार्याद्यथा शाबलेयादिकायस्य भिन्नत्व तथा खण्डकायस्य मुण्डकार्य्याद्भन्नता नोपलभ्यते । यद्वा दर्शन-मेव तयारेक काय्यम् । ननु दशनमपि प्रतिव्यक्ति भिन्नमेवेति चेन्न स्वपृष्ठभाविप्रत्यवमर्शेक्यात्तदेकत्वो के सामञ्जस्यात् । तथा च गौरिति प्रत्यवमशस्तु खण्डमुण्डादिष्वेक एव भवति । तदुक्तम्- - ' एकप्रत्यवमर्शस्य हेतुत्वाद्वीर भेदिनी । एकधीहेतुभावेन व्यक्तीनामपि भिन्नता || ' ननु सामान्याभ्युपगममन्तरा सम्बन्धग्रह्णाधीनजन्मनो शब्दानुमानयो कथ प्रवृत्ति? न च व्यक्तिषु सम्बन्धग्रह-स्वासामानन्त्यात् । न चैकस्यामेव व्यक्तौ सम्बन्धगह, व्यक्त्यन्तरेषु शब्दाप्रवृत्त्यापातात् । न चागृहीतसम्बन्धे शब्दलिङ्गे यह जो कहा था कि वही सामान्य है और विशेष भी वही है, वही एक है और अनेक भी वही है, वही नित्य है और अनित्य भी वही है, वहीं है और नहीं भी, इसे देखा है और उसे कभी देखा नही है, इस प्रकार कहना परस्पर विरुद्ध होने से उचित नहीं है । यदि कह दें विरोध नहीं है, तो वह भी ठीक नही होगा, क्योकि ऐसा कही देखा नहीं गया । चाक्षुष ज्ञान ( प्रत्यक्ष ) अनुवृत्त का ग्राहक नहीं होता, यह कह चुके हैं । विचित्र विकाप वासनाओ मे पूर्ण बुद्धिवाले लोग वैसा देखा करते हैं । अत वस्तु का स्वरूप तो ही है और सामान्य कल्पनामय है । केवल ' न ' इस ज्ञान से aro यत्व, मिथ्यात्व आदि का निश्चय नहीं किया जाता, किन्तु परीक्षा के द्वारा या युक्ति के कुण्ठित होने से भी मिध्यात्व आदि का ज्ञान हो जाता है । व्यक्त्यन्तर का अनुसन्धान किये बिना अनुवृत्ति-बुद्धि न हो पाने से कोई एक वस्तु पूर्णतया नि feners are at far य नही होती । सामान्य व्यवहार एक अथक्रियाकारी होने से होता है, यह पहले बता चुके है । सत्तादि सामान्य का नि सामान्य ( सामान्य शून्य ) होना परपक्षियो ने भी स्वीकार किया है । सत्ता प्रकृत मे सत्ता का न रहना और जाति में जाति का न रहना आदि सिद्धान्त सवसम्मत हैं । जैसे यहां भोपाधिक अनुगत- प्रत्यय होता है, वैसा मे भी ( जातिवादी के यहाँ भी ) समझ लेना चाहिये । कहा भी है-' ate वाहवाहादिकार्य जन्यते । गोपिण्डेन तदेवान्यैरिति तेष्वनुवृत्तिधी ॥ अर्थात् एक बैल जैसे मार बहन करता है, वैसे ही दूसरा बैल भी एक अग्नि जैसे जलाने का काम करती है, वैसे ही दूसरी भी । इसीलिये चाहे जैसी अग्नि हो उसमे अग्नि अम्ति ऐसा एक रूप से अनुवृत्त ज्ञान होता है, ऐसे ही बैल आदि में समझना चाहिये । यदि कहे कि प्रत्येक व्यक्ति का कार्य तो भिन्न हो होता हैं, तथापि जैसे कर्कादि के कार्य से शाबलेयादि के कार्य को भिन्नता होती है, वैसे पट गो के कार्य से सुण्ड गो के कार्य की भिन्नता नहीं उपलब्ध होती । अथवा उन दोनो का दर्शन ही एक कार्य है । यदि कहे कि दर्शन भी प्रत्येक व्यक्ति का भिन्न - भिन्न होता है, तो वह ठीक नहीं, क्योंकि दर्शन के पश्चात् होने वाला प्रत्य एक सा होता है | इसलिये उन दोनो का दर्शनरूप कार्य एक ही बताया गया है । क्योकि खण्ड - मुण्डादि गोओ मे ' गो ' इस तरह का प्रत्ययम एकाकार ही होता है । कहा भी है-" एकत्वमस्य हेतुत्वाद्वोरभेदिनी । एकधीहेतुभावेन व्यक्तीनामपि भिन्नता ॥ " ? व्यक्तियों के सामान्य ( जाति ) को माने विना सम्बन्धज्ञान से ही होने वाले शब्द और अनुमान की प्रवृत्ति कैसे होगी जा सकता, क्योंकि अन्य व्यक्ति में न्त होने से उनमें सम्बन्धज्ञान हो नहीं सकता । किसी एक व्यक्ति से ही सम्बन्धज्ञान नहीं माना नहीं होता । यह कथन भी ठीक गो आदि शब्द की प्रवृत्ति नहीं होगी । सम्बन्धग्रह न रहने पर उसका ज्ञान शब्द तथा लिङ्ग ( हेतु ) से

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२३६ दायपारिजात प्रतीतिमुत्पादयत इति चेन्न, शब्दानुमानयोर्विकल्पविषयत्वेन विकल्पस्य चावस्तुविषयत्वेन तददोषात् । ननु विकल्पानामपि कश्विदनुगतो विषयोऽभ्युपेय, अन्यथा तयोरुच्छेद एव स्यादिति चेन्न, अपोहस्यानुगतस्य तद्विषयत्वोपपत्ते । वस्तुभूतस्य सामान्यस्यासत्त्वेऽप्यतद्रूपपरावृत्तिस्वभावमबहिगति बहिस्थमिव किञ्चित् कल्पनामय सामान्यमालम्ब्यैव शब्दानुमाने प्रव-तैते । तदेवापोहादिशब्दित सर्वविकल्पाना वाचा च भूमि | तदुक्तम् ---परावृत्त स्वभावमबहिगतम् । बहिस्थमिव सामान्यमालम्ब्येत विकल्पक ॥

याच भूमिर्विकल्पाना स एव विषयो गिराम् । अत एव हि शब्दार्थ मन्यापोह प्रचक्षते ॥

स्वलक्षणस्याथस्य प्रत्यक्षमात्रग्राह्यत्वेन न तद्विकल्पग्राह्यम् । तदप्युक्तम्-एकस्यार्थस्वभावस्य प्रत्यक्षस्य सत स्वयम् । कोऽन्यो न दृष्टो भाग स्याद्य प्रमाण परीक्ष्यते ॥ तेन भ्रमनिमित्तसमारोपिताकारनिषेधायैव तेषा प्रवृत्तिर्वाच्या । यथा रूपसाधर्म्यात् समारोपितरजताकार-निवृत्तये शुक्तौ नेद रजतमिति प्रमान्तर प्रवर्तते तथैव शाबलेयादिस्वलक्षणे निर्विकल्पेन सर्वात्मना परिच्छिन्ने कुतश्चिन्नि-मित्तात् कल्पितमगोरूपमेव व्यवच्छिन्दन्ति विकल्या अगौर्न भवतीति, न तु गोरिति गास्वलक्षणग्रहणे तेषा व्यापार, तस्य प्रागेव गृहीतत्वात् । यदुच्यते-- विविधविशेषणोपप्लुतस्य वस्तुन किञ्चिद्विशेषण प्रत्यक्षेण गृहीत किञ्चिद्विकल्पैगृह्यत इति चेन्न तथा-भूतस्यापि वस्तुनस्तद्विशेषणोपकारशक्तिव्यतिरिक्तात्मनोऽनुपलम्भेन तदभेदे तद्विशेषणोपकार्यस्यवस्तुस्वरूपग्रहणवेलायामेव गृहीतत्वात्तच्चित्रग्रहणासिद्धेर्विकल्पान्तराणामानर्थक्यात् । तदुक्तमेव नानोपाध्युपकाराङ्गशक्त्यभिन्नात्मनो ग्रहे । सर्वा-मनोपकार्यस्य को भेद स्यादनिश्चित || ' तेनापोहविषया एव शब्दा इति । नहीं, क्योकि शब्द और अनुमान विकल्प विषयक होते हैं और विकल्प भवस्तुविषयक होता है, इसलिये कोई दोष नहीं है । यदि कहे कि विकल्पो का भी कोई अनुगत विषय मानना चाहिये, अन्यथा शब्द और अनुमान का उच्छेद ही हो जायगा । यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योकि अनुगत मोह ही उसका विषय है । वस्तुभूत सामान्य के न होने पर भी मतद्रूप परावृत्तिस्वभाव तथा बहिर्गेति रहित बाह्य वस्तु की तरह किसी कल्पनामय सामान्य का आलम्बन करके ही शब्द और अनुमान प्रवृत्त होते हैं । उसी को अपोह शब्द से कहा जाता है, जो समस्त विकल्प और याणी ( शब्दों का विषय है । यही बात इन दो श्लोको मे कही गई है ----अपपरावृतिस्वभावमवहितम् । बहिस्यमित्र सामान्यमालम्व्येत विकल्पक ||

याच पाना स एव विषयो गिराम् । अत एव हि शब्दार्थमन्यापोहं प्रचक्षते ॥

स्वलक्षण पदार्थं तो केवल प्रत्यक्षग्राह्य होते से विकल्प का विषय नहीं है । कहा भी है--एकस्यार्थस्वभावस्य प्रत्यक्षस्य सतः स्वयम् । कोऽन्यो न दृष्टो भागा स्याद् य प्रमाणे परीक्ष्यते || इसलिये भ्रम के कारण आरोपित आकार के निषेध केलिये ही उनकी प्रवृत्ति कहनी चाहिये जैसे । रूपसाहस्य के कारण आरो पित रजताकार की निवृत्ति के लिये शक्ति में यह रजत नहीं है ( शुक्तौ नेद रजतम् ) यह प्रमान्तर ( दूसरा ज्ञान ) प्रवृत्त होता है, उसी तरह शाबलेयादि स्वलक्षण ( व्यक्ति ) जो निर्विकल्पक के द्वारा सर्वात्मना निश्चत रूप से ज्ञात है, उसमे किसी कारण से कल्पित अगोरूप ( गो से मिलरूप ) का ही निरास विकल्प किया करते हैं । अर्थात् ' गाय से भिन्न नहीं हो ' इस प्रकार से निरास करते हैं । स्वलक्षण गोव्यक्ति के ग्रहण में उनका व्यापार नहीं होता, क्योंकि उसका ग्रहण तो पहिले ही हो चुका होता है । यह जो कहा था कि अनेक प्रकार के विशेषणो से विशिष्ट वस्तु के किंचित् विशेषण प्रत्यक्ष से गृहीत होते हैं और कुछ विशेषण विकल्पो से गृहीत होते हैं । किन्तु यह कथन ठीक नहीं है । ( वस्तु के ) विशेषणोपकार शक्ति से व्यतिरिक्त उस प्रकार का वस्तु के अनु पलम्भ से उसका ( वस्तु का ) अमेव प्रतीत होता है । तब वह अपने विशेषणो से उपकृत होता है, क्योंकि वस्तु के स्वरूप का ग्रहण करते समय ही उसका ग्रहण किया जाता है । जिससे चित्र ( विलक्षणता का ) ग्रहण नहीं होता, अतः उसके लिये विकल्पान्तरो को स्वीकार करना व्यर्थ है । कहा भी है ---

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२३७ तत्रोच्यते - कोऽयमपोहो नाम? अभावश्चेत्, न स घटवत् स्वातन्त्र्येणोपलभ्यते, तस्यान्याश्रितत्वेनैवोपलम्भात् । कश्च तदाश्रय? स्वलक्षणमेव तदाश्रय इति चेन्न, तस्य विकल्पानाश्रयत्वाभ्युपगमविरोधात् । न वा शाबलेयत्वादिकमवान्तर-सामान्य तदाश्रय, यतो हि तद् अशाबलेयनिवृत्तेराश्रयता प्रतिपद्यते । नहि अशाबलेयो न भवतीति गौ, किन्तु शाबलेय इत्येव भवति । शाबलेयव्यावृत्तिर्हि गोष्वपि बाहुलेयादिष्वस्ति । अत एव अशाबलेयस्यापोहो शाबलेयो भवति, न गौ, अशाबलेयव्यावृत्तेर्बाहुलेयादिषु गोष्वपि सत्त्वात् । ननु शाबलेयादिस्वलक्षणसमुदायोऽगोव्यावृत्तेराश्रय इति चेन्न समुदायिव्यतिरेकेण समुदायानुपलम्भात्, समुदायिनाञ्च स्वलक्षणाना देशकालादिभेदेनानन्त्याद्वर्गीकरण न सभवति । तेन सोऽपि न तदाश्रय । तस्मात् सर्वसाधारण प्रतिपिण्ड पर्याप्त किमप्यन्यदेवागोव्यावृत्तेराश्रयो वक्तव्य । तच्च गोत्वमेव । प्रकारान्तरेणापोहनिरास यदुक्तम् -- स्वलक्षणमेव वस्तु न सामान्यलक्षणम्, तस्य विकल्पत्वात् । पूर्वं वस्तुनो रूपमितरत् कल्पनामयम् । येष्वनुगत तत्सामान्य तेषु बुद्धयानुसन्धीयमानेषु तद्वृत्तिसामान्यग्रहणसम्भवान्न चानुसन्धानसामर्थ्यं बुद्धेरस्ति । ' अत एव न ते सम्यगक्षज-ज्ञानवेदिन | अभेदवृत्तिप्रत्यक्षमाहुरद्वैतवाञ्छ्या ॥ ' तस्माद्भेदविषयत्वात्प्रत्यक्षस्य न तद्गत सामान्य गृह्यते । न च जातिलक्षणे सामान्येऽपहतेऽनुगतप्रत्ययस्य निरालम्बनत्वमिति वाच्यम्, तस्य विकल्पमात्रत्वात् । विकल्पाश्च तात्पर्याधीनजन्मान । यथा " नानोपाध्युपकाराङ्गशक्त्यभिन्नात्मनो ग्रहे । सर्वात्मनोपायस्य को भेदः स्यादनिश्चित || अत शब्दों का विषय अपोह हो है । किन्तु यह पूरा at का मत अत्यन्त असंगत है । इन्हे यह पूछा जा सकता है कि यह अपोह कौन वस्तु है? यदि उमे भाव कहें तो वह घट की तरह स्वतन्त्ररूप से उपलब्ध नही होता, उसकी उपलब्धि अन्याश्रित होकर ही होती है 1 । तब उसका ara कौन है? यदि स्वलक्षण को ही उसका श्राश्रय कहे तो ठीक नहीं होगा, क्योकि ' वह ( स्वलक्षण ) विकल्प का आश्रय नही होता ' आपके इस सिद्धान्त से विरोध होगा । उसी तरह शाबलेयत्व आदि अवान्तर सामान्य को भी उसका आश्रय नही कह सकते, क्योकि वैसा कहने से अशाबलेय की निवृत्ति ही उसका आश्रय हो जायगी, लेकिन बशालेय नहीं होती, ऐसी बात नहीं है, बल्कि शाबलेय गो है इस प्रकार कहा जाता है । शाबलेय से व्यावृत्ति बाहुलेय गो आदि मे भी होती है । इसीलिये अशाबलेय का अपोह शाबलेय होता है, गाय ( गो ) नहीं, क्योंकि बाहुलेय आदि गौओ मे भी अशाबलेय की व्यावृत्ति रहती है । afe he fh गोव्यावृत्ति का आश्रय शाबलेयादि स्वलक्षण समुदाय है, तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि समुदाय से पृथक् समुदाय की उपलब्धि नहीं होती और समुदायी स्वलक्षणों का देशभेद तथा कालभेद के कारण आनन्त्य होने से वर्गीकरण होना भी नहीं | इसलिये वह उसका माश्रय नहीं हो सकता । मत सर्वसाधारण तथा प्रतिव्यक्ति में पर्याप्त होनेवाले किसी अन्य को ही artoongfa का कहना होगा, वह गो ही हो सकता है । दूसरे प्रकार से अपोह का खण्डन यह जो कहा था कि स्वलक्षण ही वस्तु हैं, सामान्यलक्षण नहीं, क्योकि वह तो विकल्परूप है ( वस्तु रूप नहीं है ) | स्वलक्षण हो वस्तु का रूप है और दूसरा सामान्यलक्षण तो कल्पनामय है | वह सामान्य जिनमे अनुस्युत ( अनुगत ) होता है, बुद्धि के द्वारा उनका अनुसन्धान किये जाने पर उनमे रहने वाले सामान्य का ग्रहण करना सम्भव नहीं होता, क्योकि बुद्धि में अनुसन्धान करने का सामथ्य नही है । कहा भी है--aa एव न ते सम्यगवज्ञानवेदिन । अभेदवृत्तिप्रत्यक्षमाहुराया || प्रत् होता है । इस कारण उसमें रहने वाले सामान्य का ग्रहण नहीं होता । जातिरूप सामान्य के न माने परम, गो गो गो इस रूप से अनुगत प्रत्यय प्रत्येक गाय में होने वाला एकाकार ज्ञान किस आधार पर होगा, ऐसा नहीं कहना चाहिये, क्योंकि वह free पमात्र है, अर्थात् वस्तुरहित ज्ञानमात्र है । विकल्प की सत्ता तो तात्पर्य पर निर्भर होती है | जैसे पर सत्ता अपर

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२३८ वेदाथपारिजात सप्तादिपरापरेषु विविधसामान्येषु सामान्यान्तर नाभ्युपेयत इति नि सामान्यानि तानि । औपाधिक एवेष्वनुगतविकल्प । न च तर्हि वादिषु सुपाधिमवलम्ब्यानुगतप्रत्यय इति वाच्यम्, एकार्थक्रियाकारित्वम्योपाधेरेव व तत्र सत्त्वात् । तदुक्तम् --- ' यदेव वाह-दोहादि कार्यमेकेन जन्यते । गोपिण्डेन तदेवान्यैरिति तेष्वनुवृत्तिधी ॥ ननु प्रतिव्यक्ति कार्यं भिन्नमेवेति सत्यम्, भेदबुद्धिभयात्त-कमित्युपचर्यते । ' कर्कादिकार्याभिन्नत्व यथा ह्येतस्य दृश्यते । न तथा खण्डकार्याणा मुण्डकार्याद्विभिन्नता ॥ ननु खण्डमुण्डयो कार्यमपि नाभिन्नमिति चेन्न, दशनलक्षणस्य कार्यस्यैकत्वात् । ननु दशनमपि प्रतिव्यक्ति भिन्नम् सत्यम्, तथापि स्वपृष्ठभावि-परामर्शैक्यात् तदेकत्वव्यपदेशात् । यथा खण्डमुण्डादिपिण्डदानेऽपि गौरित्येव परामर्श इति तदेकत्वम् । तस्मान्न सामान्य किञ्चिद्वस्तुतत्त्वम् । ननु सामान्येऽनङ्गीक्रियमाणे सम्बन्धग्रहणाधीनजन्मनो शब्दानुमानयो कथ प्रवृत्ति? व्यक्तीनामान्त्येन तासु सर्वासु सम्बन्धग्रहणासम्भव, कस्याश्चित्तदुग्रहेऽप्यन्यत्र तत्प्रवृत्त्यसम्भव । न चागृहीतसम्बन्धे शब्दलिङ्गे तत्प्रतीतिमुत्पाद-यितु शक्नुत, इति चेन्न, प्रत्यक्षविषये स्वलक्षणे शब्दानुमानयारप्रवृत्ते । तदुक्तम् — ' विकल्पविषय त्तिरिष्टा शब्दानुमा-नयो । अवस्तुविषयाश्चैते विकल्प इति वर्णितम् ॥ ' ननु विकल्पविषयोऽपि कश्चिदनुगतोऽङ्गीकर्तव्य, अन्यथा शब्दानुमाने निरालम्बने स्यातामिति चेत्, शृणु, अपोहस्यैव तदालम्बनतामम्भवात् । सोऽपि न वास्तव । ' अतद्रूपपरावृत्तिस्वभाव-सत्ता आदि अनेक प्रकार की सत्ता जातियो - मे कोई दूसरी सत्ता - जाति नही मानी जाती, क्योकि जाति में जाति नहीं रहती, यह सिद्धान्त है | अतः पर, अपर आदि सत्ताओ मे जो सत्ता, सत्ता, सत्ता इस प्रकार का एक रूपज्ञान होता है, वह उपाधि के कारण ही होता है । यह वास्तव मे है विकल्प हो । तब गो आदि पदार्थों में किस उपाधि से वह अनुगत प्रत्यय होता है? यदि कोई पूछे तो उसका उत्तर सरल है कि एकार्थक्रियाकारित्व रूप उपाधि वहाँ होने से वह अनुगत प्रत्यय वहां हुआ करता है । वो बात इस लोक में भी कही गई है-ata store मेकेन जन्यते । गोपिण्डेन तदेवान्यैरिति तेष्यनुवृत्तिधी || यद्यपि यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना अपना कार्यं भिन्न - भिन्न हो होता है, किन्तु भेद बुद्धि के मय से उसे एक कह दिया जाता है । कहा भी है-दाभिन्नत्व यथा ह्येतस्य दृश्यते । न तया खण्डकार्याणा मुण्डकार्याद्विभिन्नता || इस पर भी यदि कहे कि खण्ड - मुण्ड आदि का कार्य भी अभिन्न नहीं है, तो यह कहना ठीक नही होगा, क्योकि दर्शन रूप की एकता दिखाई पडती है । इस पर भी यदि कहे कि प्रत्येक व्यक्ति का दर्शन भी भिन्न - भिन्न होता है, किन्तु उसके पश्चात् होनेवाला कार्य परामर्श free- free न होकर एक होता है, इसलिये दर्श r रूप कार्य को एक कहा गया है । जैसे खण्ड - मुण्डादि व्यक्तिया भी उनमे ' गो ' गाय इस प्रकार का ही एक सा परामर्श होता है, इसलिये दर्शन और परामश यह सब एक को देखने पर ही है, fra free नही । ra सामान्य नाम की कोई वास्तविक वस्तु नहीं है । सामान्य को स्वीकार न करने पर सम्बन्धज्ञान पर निर्भर रहने वाले शब्द और अनुमान प्रमाणों व्यक्तियो की असख्यता के कारण उन सब मे सम्बन्ध ग्रहण का होना सम्भव नहीं । यदि की प्रवृति कैसे होगी? भी जाय, तो उससे f मन दूसरी व्यक्ति मे शब्द प्रवृत्ति होना असम्भव होगा । शब्द ग्रहण किसी एक व्यक्ति में सम्बन्ध ग्रहण हो उसको / व्यक्ति की ) प्रतीति नहीं करा सकते | किन्तु यह कहना ठीक नहीं, क्योकि प्रत्यक्ष बिना के किये ही शब्द या अनुमान ( विज ) की प्रवृत्ति नहीं हुमा करती । कहा भी है-- विषय स्वलक्षण में शब्द और अनुमान विकल्पविषये वृत्तिरिधा शब्दानुमानयो । अवस्तुविषयाश्चैते विकल्पा इति यदि कहें कि सर्वत्र अनुगत रहने वाले किसी विकल्प विषय को भी मान लिया जाय, अन्यथा वर्णितम् ॥ हो जायेंगे | यह कथन ठीक नहीं होगा, क्योकि उनके आलम्बन रूप में अपोह को ही मान लिया शब्द और जा सकता है । नहीं है कहा भी है--अनुमान तो निरालम्बन किन्तु यह भी वास्तविक

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वेदाथपारिजात २३६ बहिर्गतम् । तहि स्थमिव सामान्यमालम्ब्येत विकल्पक ॥ या च भूमिर्विकल्पाना स एव विषयो गिराम् । अत एव हि शब्दाथ-मन्यासिद्ध प्रचक्षते || ' विकल्पाश्च न वस्तुस्पृश । कुत - एकस्यार्थस्वभावस्य प्रत्यक्षस्य सत स्वयम् । कोऽन्यो न दृष्टो भाग स्याद्य पमाणे परोक्ष्यते ॥ ' इति । तस्माद् भ्रान्तिनिमित्तसमारोपिताकारान्तरनिषेधायैव प्रमाणान्तरप्रवृत्तिरिति मन्तव्यम् । यया भास्वररूपसावर्म्यारोपितरूप्याकारनिषेधाय शुक्तौ नेद रूप्यमिति प्रमान्तरम्, तथैव शाबलेयादिस्वलक्षणे निर्विकल्पेन सर्वात्मना गृहीते कुतश्चिन्निमित्तादारोपिता गोरूपमेव व्यवच्छिन्दन्ति विकल्पा अगौन भवति । न गो स्वलक्षणग्रहणे तेषा व्यापार 1 निर्विकल्पेन प्रागेव गृहीतत्वात् । न चानेकविशेषणविशिष्टस्यार्थस्य विकल्पैस्तान्येव गृह्यन्त इति वाच्यम्, विशेषणोपका रशक्तिव्यतिरिक्ताना विशेषणानामनुपलम्भेन तदभेदे सति तद्विशेषणोपकार्यवस्तुस्वरूपग्रहदशायामेव गृहीतत्वात् चित्रग्रह्णामिद्धेर्न विकल्पसाथक्यम् । तदुक्तम् ' नानोपाध्युपकाराङ्गशक्त्यभिन्नात्मनो ग्रहे । सर्वात्मनोपकार्यस्य को भेद स्यादनिश्चित ॥ ' इति । तस्मादविषया शब्दा विकल्पाचेति तन्न, भट्टपादैबहुधाऽपोहस्य निरस्तत्वात् । तथा हि - कोऽयमपोहो नाम? व्यावृ-तिरभावो वा? नान्त्य, तस्य घटादिवत् स्वातन्त्र्येणावगमासम्भवेनाश्रयादितन्त्रत्वावगमात् । न च तस्य स्वलक्षणमाश्रय तस्य विकल्पानास्पदत्वात् । नाप्यवान्तरसामान्यमपोहाश्रय है बौद्ध सामान्यानभ्युपगमात् । अभ्युपगमेऽपि शाबलेयत्वादेस्तदा-श्रयत्व वक्तव्यम्, तच्च नोपपद्यते । शाबलेयत्वादि अशाबलेयनिवृत्तेराश्रयता प्रतिपद्यते । नह्येवमुपपद्यते -- अशाबलेयो न भवतीति

अपरावृत्तिस्वभावमवहितम् । बहि स्थमिव सामान्यमालम्ब्येत विकल्पक ॥

या च भूमिर्विकल्पाना स एव विषयों गिराम् । अत एव हि शब्दार्थमत्यासिद्ध प्रचक्षते || विकल्पो का वस्तु से कोई सम्बन्ध नही रहता | क्योकि एकस्यायस्वभावस्य प्रत्यक्षस्य सत स्वयम् । कोऽन्यो न दृष्टो भाग स्याद् य प्रमाण परीक्ष्यते ॥ " अर्थात् वस्तु का यदि एक ही कोई स्वभाव हो, तब तो उसका एक बार प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाने पर ऐसा कौन सा स्वभाव या भाग बाकी रह गया, जिसकी प्रमाणो से परीक्षा करनी पडे । इसलिये भ्रान्ति के कारण आरोपित किये गये आकारान्तर के निषेध करने के लिये ही प्रमाणान्तर की प्रवृत्ति समझनी चाहिये । जैसे भास्वर ( चमकीले ) रूप के सादृश्य से आरोपित चांदी के आकार के निषेध के लिये ही सीप में ' नेद रूप्यम् ' यह चाँदी नहीं है, ऐसा प्रमान्तर ( दूसरा ज्ञान ) हाता है । उसी प्रकार निर्विकल्प के द्वारा सर्वात्मना शालेयादि स्वलक्षण के गुहीत किये जाने पर free feet कारणवश आरोपित गोमिन रूप का ही ' गोभित नहीं है ' इस प्रकार से निश्चय कराते हैं, ' गा है ' इस तरह से नही । क्योकि उनका ( विकल्पो का ) व्यापार स्वलक्षण के ग्रहण करने मे नही है, क्योकि वह तो निर्विकल्प द्वारा हिले ही जाना जा चुका है । यदि कहे कि अनेक विशेषणो से विशिष्ट वस्तु के विकल्पों से उन्हीं का ( स्वलक्षणो का हो ) ग्रहण होता है, तो वह ठोक न होगा । विशेषणो की उपकार शक्ति से अतिरिक्त विशेषणों की उपलब्धि होने से दोनो का ( उपकारशक्ति और विशेषण ) अभेद मानना होगा, तन उपकार्यंभूत वस्तु के स्वरूप ग्रहण की दशा में हो, अर्थात् वस्तुस्वरूप के ज्ञान काल में ही विशेषणो का भी ज्ञान हो जाता है । अत चित्र ग्रहण के न हो सकने से विकल्प की कोई are कता प्रतीत नहीं होतो । यही बात इस श्लोक से भी कही गई है --सानोपा s युपकाराङ्गशक्त्यभिन्नात्मनो ग्रहे । सर्वात्मनोपकार्यस्य को भेद स्यादनिश्चित || इसलिये शब्द और विकल्प दोनो का विषय एक नहीं, किन्तु भिन्न भिन्न ही है । किन्तु बौद्धों की इस बकवास का कुमारिल ने age aust fear है । यह इस तरह है- यह ate क्या है? व्यावृतिरूप हैं या अभावरूप है? अभावरूप तो यह हो नहीं सकता, ' क्योकि घटपटादि की तरह स्वतन्त्र रूप से उसका ज्ञान नहीं हो पाता, वह तो किसी न किसी के आश्रित होकर ही ज्ञात हो पाता है । are a feet as के ही अधीन रहता है । उसका आश्रय स्वलक्षण तो हो नही सकता, क्योकि स्वलक्षण कभी विकल्प के योग्य नहीं होता । अवान्तर जाति को भी अपोह का आश्रय नहीं कह सकते, क्योकि बौद्ध जाति मानते ही नहीं हैं । मगर स्वीकार कर भी को हो उसका ( प्रभाव का ) आश्रम कहना होगा । किन्तु वह नहीं बन पाता, क्योकि शाबलेयत्वादि मे मशाबलेय

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२४० वेदायपारिजात गौ, किन्तु शाबलेय इति । शाबलेयव्यावृत्तिर्बाहुलेयादिषु गोष्वपि दृश्यते । शाबलेयादिस्वलक्षणसमुदायां गोव्यावृत्तेराश्रय इत्यपि नोपपद्यते, समुदायिव्यतिरेकेण तस्यानुपलम्भात् । समुदायिना स्वलक्षणाना देशकालभेदेन आनन्त्यान्न तेषा वर्गी-करणसम्भव, ततो न समुदायस्तदाश्रय । तस्मात् सवसाधारण प्रतिपिण्ड परिसमाप्त किमप्यगोव्यावृत्तेरधिकरणमभ्यु-पेयम् । तदेव च गोत्वम् । तदभ्युपगमे किमपोकल्पनायासेन? अपि च, गोत्वस्य प्रतियोगितावच्छेदकत्वेऽभ्युपगमेऽगौन भवतीति गौरवमन्तु शक्यते । तदनभ्युपगमे तु गोव्यक्तिविशेषस्य गोव्यक्त्यन्तरेष्वपि व्यावृत्ति रस्त्येवेति न व्यवहारसम्भव | अपि च, अश्वादयो बौद्धमते विधिरूपतया नोपलभ्यन्ते, किन्तु अन्यव्यवच्छेदेनैवेति तेषामपि व्यवच्छेदग्रहण सेव वार्तेति नेदानी विकल्पे क्वचिदपोहो विषयीकर्तुं शक्यते, निर्विकल्पेन च न कश्चिद् व्यवहार इति व्यवहारलोपप्रसङ्ग एव स्यात् । किञ्चैव सर्वेऽपि शाबलेयादिशब्दा अपोहवाचिन एव चेत्तदा पर्यायवाचका एव भवेयु । अपोहभेदाददोष इति चेत्र, जपोहाना भेदाभावात् । भिद्यमानत्वे वा स्वलक्षणवदेषा वस्तुत्वप्रसक्ति । न चैव मीमासकपक्षेऽपि सामान्यमात्रवाचित्वाविशेषात् पर्याया-तादोष समान इति वाच्यम्, सामान्याना विधिरूपत्वात् परस्पर सहितस्वभावतया नानात्वावगमात् । अपोहस्तु भाव-मात्ररूपाविशेषान्न परस्पर भिद्यते । ननु कर्कादिशाबलेयाद्याधारभेदाद् अपोहभेद इति चेन्न, तषामाधारत्वानुपपत्तेरुक्तत्वात् । आधारभेदेन तद्भेदाभ्युपगमे प्रतिस्वलक्षणमपोहतद्भेदप्रसङ्ग । ततश्च कुतोऽस्य सामान्यात्मता? यदपि चापोह्यभेदेनापोह -भेदमा पर्यायता पराक्रियते, तदपि नि सारम्, अपोह्यभेदाद्भेदो न पर्यायत्वविरोधी तस्य भाक्तत्वात् । न चापोह्यभेदा-दोहस्य मुख्य भेद | सम्भावित ससर्गेराधारेरपि यो न भेत्तु शक्य स विप्रकृष्टतरेरससृष्टेरतिबाह्य कथ भिद्येत । तदभ्युपगमेऽपि की निवृत्ति की आश्रयता हुआ करती है । अशाबलेय नहीं है, इस कारण वह गी है, ऐसा नहीं माना जाता, किन्तु वह शावलेय है, इसलिये गाय है । शाबलेय की व्यावृत्ति बाहुलेयादि गो मे भी दिखाई देती है । गोव्यावृत्ति का आश्रय हम शाबलेयादि स्वलक्षण समुदाय को भी नहीं कह सकते, क्योकि समुदायों से पृथक् उसकी उपलब्धि नहीं होती । देश तथा कालभेद से स्वलक्षण व्यक्ति अनन्त इसलिये उनका वर्गीकरण होना सम्भव नहीं । इसलिये समुदाय को उसका आश्रय नही कह सकते । अतः अगोव्यावृत्ति का कोई ऐसा अधिकरण स्वीकार करना होगा जो प्रत्येक व्यक्ति में परिसमाप्त और सवसाधारण हो । उसी को तो गोत्व जाति कहते हैं । उसके स्वीकार कर लेने पर मपोह की कल्पना करने का प्रयास व्यर्थ है । दूसरी बात यह है कि गोत्व को प्रतियोगितावच्छेदक मान लेने पर ' अगन भवति ' कहने से ' गो ' का बोध हो सकता है और न मानने पर यो व्यक्ति विशेष की अन्यान्य गोव्यक्तियो मे मी व्यावृत्ति हो ही जाती है, जिससे व्यवहार नही चल सकता । दूसरी बात यह है कि बौद्धो के मत मे ( घोडा ) आदि पदार्थ घोडा आदि पदार्थ के रूप में नहीं जाने जाते, किन्तु घोटा से भिन्न नहीं है, इस रूप में जाने जाते हैं । मत उसके भी मे ऊपर वाले सभी दोष आ जायेंगे | इसलिये विकल्प का विषय अपोह को मानना कभी संगत नहीं हो सकता । निर्विकल्प भेद के ज्ञान व्यवहार होगा नहीं, अतः बौद्धसमत अन्यापोह को शब्दार्थ मानने पर व्यवहार का लोप हो हो जायगा । दूसरी बात से कोई सभी शाबलेयादि शब्द अपोहवाची ही हो तो वे पर्यायवाचक ही होगे । यदि कहा जाय कि अपोहभेद से पर्यायवाचक यह है कि यदि यह भी ठीक नहीं होगा, क्योकि अपोहो का भेद नहीं हुआ करता । अगर उनमे भेद माना नहीं कहलायेंगे तो होगा | भीमासको के पक्ष मे भी सभी शब्दों के जातिवाचक होने से वहाँ भी पर्यायवाचकता का जाय दोष तो स्वलक्षण की तरह उन्हें वस्तु कहना क्योंकि जातियाँ वस्तुरूप हैं, अत में परस्पर एक दूसरे से भिन्न स्वतन्त्र स्वभाव वाली होने के कारण आ जायगा उनमे, ऐसा नहीं कहना चाहिये, है । किन्तु अपोह केवल सभावरूप होने से उनमें परस्पर भेद नहीं रहता । इसलिये वे परस्पर समान भेद का ज्ञान होना सहन शाबलेयादि आधारों के भेद से अपोहो का भेद हो जायगा, यह कहना भी ठीक न होगा, क्योकि यह कहा हैं, उनमें भेद कैसा? कफदि यादि भेद के आधार बन नहीं सकते । आधारभेद से अपोहभेद मानने पर प्रत्येक स्वलक्षण में अपोह जा चुका है कि कर्मादि शाब-ऐसी स्थिति मे उसकी सामान्यरूपता कैसे हो सकती है? यह जो कहना है कि जिसके भेद का विषेष और उसका भेद मानना पड़ेगा | आधार मान कर अपोह का भेद मानने से पर्यायवाचकता न होगी, सो भी नि सार है, क्योंकि करना है, उसमें रहने वाले भेव को होने से वह पर्यायवाचकता का विरोधी नहीं है और अपोहा ( जिसके भेद का निषेध करना है ) अपोह्यभेद से अपोह का भेद सो लाक्षणिक भेद से अपोह का मुख्य भेद नहीं हो सकता ।