वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 251–260
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 251–260
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वेदाथपारिजात २२१ प्रयोजकम्, तदितरच्चाप्रयोजकम् । नहि पुरुषमन्तरेण क्वचिदक्षरविन्यासो दृष्ट | भो भगवन्त । सभ्या ', क्वेद दृष्ट क्व चश्रुत लोके यद्वाक्येषु पदाना रचना नैसर्गिकी भवति । ' यदि स्वाभाविकी वेदे पदाना रचना भवेत् । पटेऽपि हन्त तन्तूना कथ नैसर्गिकी न सा ॥, ' ' शन्नो देवीरभिष्टये ', ' नारायण नमस्कृत्य ', ' अस्त्युत्तरस्या दिशि देवतात्मा ' इति रचनात्वे क्वचित्कर्तृपूवकत्वमपरत्र तद्विपर्यय इति महान् व्यामोह । एव धूमोऽपि कश्चिदग्निमान् अनग्निकच कश्चित्, तदपि तुच्छम् रचनात्वस्यैवासिद्धे । लोके प्रमाणान्तरेणाथमुपलभ्य वाक्यादिरचना दृश्यते । न चेह तथा सम्भवति, वेदार्थस्य प्रमाणान्तरागोचरत्वात् । पूर्वपूर्वानु-पूर्वीसव्यपेक्षोच्चारणतु न रचना सम्भवति तथात्वे रघुवशस्य तथोच्चारयितृत्वेनास्मद्रचितत्वापातात् । प्रथमोच्चारणस्या-स्यैव रचनात्वे तु वेदे तदभाव एव । अपि च यथा घटादीना सशरीरकतृकत्वेऽपि न तथात्वमङ्करादौ साधयितुं शक्यते प्रत्यक्षविरोधादेव, तथैव लोकिक वाक्येषु पुरुषवकत्वे सत्यपि वेदे न तथात्व साधयितु शक्यते, निश्वसितत्वनित्यत्वादिश्रवणविरोधात् । उच्चारण पुरुष कतृकमिति तूभयत्र समानम् । नैरपेक्ष्येण पूर्वानुपूर्वीसापेक्षतया वेत्यत्रैव वैमत्यम् । पूर्वं निष्प्रमाणमुत्तर तु सप्रमाणमित्युक्तमेव । न च पौरुषेयत्वानुमान तत्र मानम्, तस्योच्चारणमात्रगताथत्वात् वाचा विरूपनित्ययेति वेद-वाक्येनैवान्यादृशरचनाया बाधाच्च । अत कुमारसभवादिवाक्यतुल्यत्व वेदवाक्यस्येति कथनमास्तिकस्य न शोभते । शब्दत्वे सत्तासामान्ये तुल्येऽपि पौरुषेयत्वेऽपि तुल्यता न वक्तु शक्या वेदविरोधादेव । तदुक्तम्- ' ननु या कालिदासादिरचना कर्तृ-पूर्विका । ताभ्यो विलक्षणैवेय रचना भाति वैदिकी ॥ इहाध्ययनवेलाया रूपादेव प्रतीयते । अकृत्रिमत्व वेदस्य भेदैस्तैस्तैरन-न्यगे || नामाख्यातोपसर्गादिप्रयोगगतयो नवा । स्तुतिनिन्दापुराकल्पपरकृत्यादिनीतय || शाखान्तरोक्तसापेक्षविक्षिप्तार्थो -ही गया है कि लोकिक वाक्यों मे पदो की रचना नैसर्गिक होती है । यदि वैदिक पद रचना को स्वाभाविक माना जाय तो पट मे भी तन्तुओ की रचना को नैसगिक क्यो न मान लिया जाय । ' शन्नो देवीरभिष्टये ', ' नारायण नमस्कृत्य, ' अस्त्युत्तरस्या दिशि देवतात्मा ' इत्यादि रचनाओं में किसी को सकर्तृक और किसी को अकक मानना महान् व्यामोह होगा, जैसे किसी धूम को अग्निमान् और किसी कोमा कह देना । किन्तु यह सब निरगल प्रलाप है, क्योकि वेदो को किसी की रचना कहना ही सिद्ध नही हो पा रहा है । लोक व्यवहार मे देखते हैं कि दूसरे प्रमाणों से विषयों का ज्ञान प्राप्त करके वाक्य आदि की रचना की जाती है, वैसा तो वेद मे होता सम्भव ही नहीं, क्योंकि वेदाथ तो अन्य प्रमाणो का विषय हो नही है । पूर्व - पूर्वतन आनुपूर्वी की अपेक्षा करके उच्चारण किये जाने को रचना नही कह सकते, अन्यथा रघुवश का उच्चारण करने मात्र से ही वह अपनी रचना कही जा सकेगो । यदि प्रथम उच्चारण को ही रचना कहे तो ससार अनादि होने से वेद का प्रथम उच्चारण है ही नहीं । दूसरी बात यह है कि जैसे घटादिको मे शरीर वाले कर्ता के रहने पर भी प्रत्यक्ष से विरुद्ध होने के कारण अकुरादिको मे जमे सिद्ध नही किया जा सकता, उसी तरह लौकिक वाक्य में पुरुष yare थ रहने पर भी वेद में वैसा नही कहा जा सकता, क्योकि वेदों को ft rare a प तथा नित्य कहा है । उच्चारण का पुरुषकर्तृक होना तो दोनो पक्षो मे तुल्य है । मतभेद तो केवल उनके चारण में पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्षता या पूर्वानुपूर्वीसापेक्षता के विषय मे है । जिसके समाधान में बता चुके हैं कि प्रथम पक्ष तो frontus है और द्वितीय पक्ष सप्रमाण है । यदि कहें कि वेद के पौषेयत्व का अनुमान ही उसकी निरपेक्षता मे प्रमाण है, तो यह कहना उचित न होगा, क्योंकि वह अनुमान तो उसके केवल उच्चारण में ही गताथ हो जाता है । ' याचा विरूपनित्यया ' इस वेदवाक्य से ही दूसरी तरह की ( पुरानी मानुपूर्वी से भिन्न आनुपूर्वी वाली रचना ) रचता का बाध हो जाता है । अतः कुमारसम्भवादि काव्य के वाक्यो के समान वेद के वाक्य हैं, यह कह देना वास्तिक को शोभा नहीं देता । शब्दत्व रूप जाति के तुल्य रहने पर भी, वैसी तुल्यता वेदविरोध होने के कारण पौरुषेयत्व में नहीं बताई जा सकती । कहा भी है कि कालिदास प्रभृति के काव्यो की रचना उनके द्वारा की गई है, किन्तु वेद की रचना उससे विलक्षण है । वेद पढ़ते समय ही उसके स्वरूप से वह किसी का बनाया हुआ नहीं है. यह मालूम हो जाता है, क्योंकि वेद वाक्यों में जो विशेषताएँ हैं, वे अन्यत्र नहीं हैं । नाम ( सज्ञा ), आख्यात ( fararte शब्द ) उपसर्ग ( तुच वा इत्यादि ) इत्यादि की वेदमे नवीन पद्धति से जैसी स्थिति है, वैसी लौकिक वाक्यों में नहीं है । स्तुति, निन्दा ( तत्परक अर्थवाद ), पुराकल्प ( घटनाएँ ), परकृति आदि का वर्णन मी वेद के जैसा लोक में नहीं है । एक ही प्रयोग मे
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२२२ पवर्णनम् । इत्यादयो न दृश्यन्ते लौकिके सन्निबन्धने ॥ तेनाध्येतृगणा सर्वे रूपाद्वेदादकृत्रिमम् । मन्यन्ते एव लोके तु पीत मीमासकैर्येश ॥ वेदा न पठिता यैस्तु त्वादृशे कुण्ठबुद्धिभि । काय्यत्व ब्रुवते तेऽस्य रचनासाम्यमोहिता ॥ इति । ' यदुक्तम् — मीमासका यश पिबन्तु पयो वा पिबन्तु ब्राह्मीधृत वा पिवन्तु वेदस्तु पुरुषप्रणीत एव । ' यथा घटादि-सस्थानाद्भिन्नमप्यचलादिषु । संस्थान कतृमत् सिद्ध वेदेऽपि रचना तथा ॥ ' इति, तदपि दत्तोत्तरम्, उच्चारणस्य कतृमत्वेऽपि स्वतन्त्रोच्चारणत्वासिद्धे । तत्र रचनात्वस्यातन्त्रत्वात् । यत्तु विलक्षणाया रचनाया उपपत्तये विलक्षण कर्तानुमेय इति, तथात्वे कर्तृत्वमपि सम्प्रदायप्रवर्तकत्वरूपमेवाभ्युपेयताम् । अत एव ' यो ब्रह्माण विदधाति पूर्वं यो वै वेदाश्च प्रहिणोति तस्मै ' ( श्वे ० उ ० ६।१८ ) इत्यत्र ब्रह्मणोऽपि विधात्रा ब्रह्मणो हृदि वेदा प्रहिता न विहिता । विद्यमानानामेव प्रेपणमविद्य-मानाना विधानम् । नित्यत्वबोधकश्रुतिरप्यत्रानुकूला । यदुक्तम्-- ' अमृतेनेव ससिक्ताश्वन्दनेनेव चचिता । चन्द्राशुभिरिवोद्धृष्टा कालिदासस्य सूक्तय ॥ ' इत्येवमादिरीत्या प्रतिकाव्य च तानि तानि वैचित्र्याणि दृश्यन्ते ' इति, तदपि तुच्छम् प्रमाणान्तराविषयत्वादिना पूर्वापेक्षयाऽपि वैलक्षण्णात् । ' मन्त्रो होन स्वरतो वणतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्जो यजमान हिनस्ति यथेन्द्रशत्रु मारतोऽपराधात् ॥ ' ( पा ० शि ० ५२ ) इत्यादिवैलक्षण्य नान्यत्र वर्णयितु शक्यते । EET प्रावाहणिरकामयत, कुसुरविन्द ओद्दालकिरकामयत इत्यादीना तु समाधान श्रुतिसामान्यमात्रमित्यादिना स्पष्ट मीमासायामुक्तमेव । यद्यादिमन्तो बहवोऽर्था वेदादवगम्यन्ते इत्यनादित्व नास्ति वेदस्य, तहि नैयायिकाभिमतसर्गादिकालिकत्वमपि वेदस्य न सिद्ध्यति, पारीक्षित जनमेजयादिवर्णन-लिया जाना भी वेद की ही विशेषता है । ये सब बातें लौकिक रचनाओ स्वरूप मे हो उसे अक्कुत्रिम ( किसी का बनाया हुआ नहीं ) समझ लेते केवल यश पा लिया । किन्तु तुम जैसे ( धमकीर्ति बौद्ध ) कुण्ठित लौकिक वाक्यो की रचना में समानता के आभास से मोहित हाकर वेद को किसा अनेक शाखा मे न कहे हुए अपेक्षित अर्थ का दूसरी शाखा से मे नहीं देखी जाती । इसलिये सारे पढनेवाले पढते समय वेद के हैं । इतना स्पष्ट वेद का अपौरुषेयत्व होने पर भी मौमासको ने बुद्धि वालो ने वेद कभी पढे नहीं, ये ही वेद और का बनाया हुआ बताते हैं । यह जो कहा गया है कि मीमासक लोग चाहे यश पीयें या जल पीये अथवा ब्राह्मी घुत का पान करें, वेद पुरुष - प्रणीत ही हैं । जैसे घटादि पदार्थों के अवयव संस्थान की अपेक्षा अचल ( पर्वत } ) आदि पदार्थों का संस्थान ( रचना ) विभिन्न रहने पर भी किसी कर्ता के द्वारा ही उसका होना माना जाता है, उसी प्रकार विलक्षण रचना वाले वेदो को भी किसी का बनाया हुआ ही मानना चाहिये, किन्तु इसका उत्तर दिया जा चुका है । उच्चारण किसी कर्ता के द्वारा किये जाने पर भी वेद का उच्चारण स्वतन्त्र उच्चारण नही हो सकता, अर्थात् उसके उच्चारण करने में कर्ता की स्वतन्त्रता नहीं है । यह जो कहा गया है कि वेद की विलक्षण रचना की उपपति के लिये वैसे ही विलक्षण कर्ता का अनुमान कर लिया जाय । ऐसा अनुमान कर के यदि विलक्षण रचना की उपपत्ति करने को स्त हूँ तो कतृत्व को भी सम्प्रदायप्रवतकत्व के रूप में स्वीकार कीजिये, क्या हानि है? ऐसा स्वीकार करने के कारण ही ' या मै ब्रह्माण विवाति पूर्वं यो वै वेदाश्च प्रहिणोति तस्मै ब्रह्मा के निर्माण करने वाले ईश्वर ने ब्रह्मा के हृदय में वेदो को स्थापित ( हित किया, न कि वेदो को बनाया ( विहित ) किया, क्योकि जो वस्तु विद्यमान होता है, उसी का प्रेषण ( स्थापन ) किया जाता है, अविद्यमान ) वस्तुओं का स्थापन नहीं किया जाता, उसका विधान ( निर्माण ) किया जाता है । नित्यत्ववोधक श्रुति भी इस पक्ष में अनुकूल है। यह जो कहा है कि ' कालिदास की सुन्दर उक्तियां ऐसी है मानो अमृत से सीचो गई हो, चन्दन से चचत की किरणों से लाई गई हो ' इत्यादि सूक्ति के अनुसार प्रत्येक काव्य में कुछ न कुछ वैचित्र्य ( विलक्षणता ) दिखाई हो, चन्द्रमा से इस कथन मे भी कोई सार नहीं है, क्योंकि दूसरे प्रमाण का विषय न हो सकने से वेदो की विलक्षणता सबसे अधिक है पडती है, किन्तु एक भी वर्ण से हीन होने पर वैदिक ग्रन्थों का प्रयोग मिथ्या हो जाता है और जिस अथ के लिये उसका । " स्वर अथवा प्रकट नहीं करता । वही शब्द वस्त्र बनकर यजमान का नाश करता है । जैस स्वर में त्रुटि होने के कारण प्रयोग किया जाता है, उसे का नाप कर दिया " इत्यादि विलक्षणता वेद के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं बताई जा सकती । ' ववर ' इन्द्रशत्रु ' शब्द ने वृत्रासुर किरकामयत ' इत्यादि वाक्यों से होनेवाली शकाओं का समाधान तो " परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम् " प्रावाहणिरकाममत इत्यादि, कुसुरविन्द सूत्रोक्ति से भीमांसा में
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Aare पारिजात २२३ दर्शनात् । यदि सर्वज्ञेश्वरस्ट भूतभविष्यद्वतमानवर्णन नासगत तर्हि प्रकृतेऽपि तत्सममेव । तदुक्तमेव मनुना - ' भूत भवद्भविष्यञ्च सर्व वेदात्प्रसिद्ध्यति ' ( १२ / ९ ७ ) इति । एतेन यदुक्त सिद्धमपि वेदे कतृविस्मरणमप्रयोजकमन्यथासिद्धत्वात् वेदकरणकालस्यातिदवीयस्त्वात् तत्प्रणेतुश्च पुस सकलपुरुषविलक्षणत्वात् नियतशरीरपरिग्रहाभावादिदतयास्य पाणिनिपिङ्गलादिवत् स्मरण नास्ति । न तु स नास्त्ये-वानुमानागमाभ्या तदवगमादिति, तन्न दत्तोत्तरत्वात् । बहुक्केशायासादिसाध्यवैदिककर्मोपासनादिव्यवहारस्य कतृस्मरण-मन्तराऽसिद्ध्याऽपौरुषेयत्वमन्तराऽन्यथाऽसि । परमेश्वरस्य पुरुषत्वेऽपि यथा सकलपुरुषविलक्षणत्वमभ्युपगम्यते, तथैव वेदस्य पदवाक्य कदम्बात्मकत्वे सत्यपि सकलग्रन्थविलक्षणत्व कुतो नोपेयते, अनुमानागमयोस्तत्रापि सत्त्वात् । यदि तु नियतशरीरपरिग्रहाभावेऽपि परमेश्वरस्य वेदकर्तृत्व तर्हि पुरुषमन्तरा कुतो न वेदस्याकृत्रिमत्वमभ्युपगम्यते, नित्यत्व-निश्वसितत्वादिश्रुत्यनुरोधात् । यदि त्वचिन्त्यमहिमत्वादीश्वरस्य तथात्व तर्हि वेदस्यापि तथात्वमेवावगम्यताम् । यदुक्तम्- ' कर्तुरस्मरणे सति सुतरा वेदार्थानुष्ठान प्रेक्षावता शिथिलीभवेत् ' इति, तदेतदपि नि सारम्, पौरुषेयेष्वेव वाक्येषु तथात्वेऽविश्रम्भात्, प्रामाण्यस्वतस्त्वाभ्युपगमेनापौरुषेये पुरुषाश्रितभ्रमप्रमादादिदोषासम्भवेन बाधाभावेन चा-प्रामाण्यशङ्कानुदयात् । एवमस्मय्यमाणकर्तृकत्वस्य सत्प्रतिपक्षत्वेन पौरुषेयत्वानुमान प्रतिहन्यते । स्वातन्त्र्येणापि चानेन हेतुना स्पष्ट किया गया है । यह कहना हो कि वद में अनक सादि ( उत्पत्तिमान् ) पदार्थों का वर्णन उपलब्ध होता है, अत वेदो को अनादि नही कहा जा सकता, तो दो की नैयायिकसम्मत सृष्ट्यादिकालिकता भी, अर्थात् सृष्टि के प्रारम्भ में वेदो की रचना भी सिद्ध नही atrait, क्योकि वेदो मे परीक्षित, जनमेजय आदि राजाओं का भी वर्णन उपलब्ध होता है । यदि यह कहे कि ईश्वर के सर्वज्ञ होने से उसके द्वारा भूत भविष्यत् वतमान तीनो कालो का वर्णन असंगत नही है, तो अपौरुषेय पक्ष में भी यही समाधान है । मनु ने इसी बात को कहा भी है- " भूत मवद् भविष्यच्च सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति " ( वतमान, भूत और भविष्य सब कुछ वेद से ही सिद्ध होता है ) । यह जो कहा गया था कि अन्यथासिद्ध होने से कर्ता का विस्मरण वेद की अप telar fea करने में समर्थ है, क्योकि वेदरचना का काल सुदूर पूर्ववर्ती है और वेदो का रचयिता पुरुष समस्त पुरुषो से विलक्षण है । उसका नियत - शरीर - परिग्रह न होने से पाणिनि पिङ्गलादि महर्षियों की तरह स्पष्ट रूप से यह ही वेदों का कर्ता है, ऐसा स्मरण नहीं हो पाता है, किन्तु यह नहीं कहा जा Rear feat कोई कर्ता ही नहीं है, क्योकि वेदों के कर्ता का ज्ञान अनुमान आगमादि प्रमाणो से हो जाता है । किन्तु यह कम श्री समुचित नहीं है । इस कथन का उत्तर पूर्व दे चुके हैं । अनक्लेव तथा अनेक आयासादि से होने वाला वैदिक कर्मोप reafte व्यवहार कर्ता के स्मरण हुए बिना भी चल रहा है, उसका कारण एकमात्र वेद की अपरुषेयता ही है | यदि अपौरुषेयता वेदो की न होती तो उपर्युक्त व्यवहार अबाधित रूप से न चलता । अन्य पुरुषो की तरह परमेश्वर भी पुरुष है, तथापि उसमे सकलपुरुषविलक्षणता जैसे स्वीकार की जाती है, उसी प्रकार वेद मे पद और वाक्य के समूह के रहते पर भी अन्य समस्त ग्रन्थों की अपेक्षा अनुमान, आगमादि प्रमाणो के बल पर उसमें भी विलक्षण क्यो नहीं स्वीकार की जाती? यदि नियत शरीर परिग्रह न रहने पर भी परमेश्वर मे dendar मानते हो तो पुरुष के बिना वेद को अकृत्रिम ( अपौषेय ) क्यो नही मान लेते? अकृत्रिम मानने से नित्यत्व, निःश्वसितत्व प्रतिपादक थ्रुतियाँ भी अनुकुल पड़ती है । यदि यह कहे कि ईश्वर की महिमा अचिन्त्य होने से सब कुछ संभव है, तो वेदों की महिमा को श्री अचिन्त्य मान लिया जाय । यह जो कहा था कि कर्ता का स्मरण न रहने पर वेदाय के अनुष्ठान में विचारशील लोग अत्यन्त शिथिलता करेंगे, किन्तु यह सोचना निसार है | उक्त प्रकार की विचारधारा पौरुषेय वाक्यों से ही अविश्वास के कारण हुमा करती है । वेदो का स्वत प्रामान्य होने से उसकी अपौरुषेयत्ता अक्षुण्ण है, तब पुरुषो में रहने वाले श्रम - प्रमादादि दोषो का वेदो मे हो पाना समय ही नहीं । उनके संभव न रहने पर कभी भी उनका अथ बाधित हो ही नहीं सकता, तब वेदो के अप्रामाण्य की आवश्यकता कैसे उठ सकती है? he goafafone का अनुमान कराने वाले हेतु को अपौरुषेय सिद्ध करने वाला स्मर्यमाणकर्तृत्व हेतु frent fra कर देता है और स्वतन्त्र रूप से भी यह हेतु अपौरुषेय वेद को अपौरुषेयता सिद्ध कर देता है । यह जो कहा गया था कि यह तो एक प्रकार
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III अपौरुषेयत्व सिद्धयति । यदुक्तमनेन प्रकारेणानुपलब्धिरेवोच्यते सा चानुपपन्ना मानेन कर्तुरुपलम्भादिति, तन्न, पौरुषेयत्वा-नुमानस्य सोपाधिकत्वेन तदसाधकत्वस्योक्तत्वात् । यदुक्तमनुपलब्धी सिद्धायामनुमाननिरास, अनुमाननिरासे च मत्यनुप-लब्धिसिद्धिरित्यन्योऽन्याश्रयत्वमिति, तदपि नि सारम् अस्मयमाणकर्तृकत्वहेतुबलेन कर्त्रभावसिद्धेरनुमाननिरासानधीन-त्वात् । अन्यथा तत्रापि पौरुषेयत्वानुमाने तथैव दोषो भविष्यति । यथा तव प्रतिबन्धमहिम्ना प्रामाण्यसिद्धि, नानुपलब्धि सिद्धिनिरासाधीन प्रामाण्य तथैवेहापि ज्ञेयम् । अपि च, वेदस्य पौरुषेयत्व ब्रुवाणेन तत्र प्रमाण वक्तव्यम् । पौरुषेयत्वानुमानन्तु स्मर्य्यमाणकर्तृकत्वेनोपाधिना दूषितमिति निर्दोषप्रमाणानुपलब्ध्या कर्त्रभावो व्यवतिष्ठते । एतेन ' पटादिरचना दृष्ट्वा तस्य चेत्साऽनुमीयते । वेदेऽपि रचना दृष्ट्वा कर्तृत्वं तस्य गम्यताम् ॥ ' नित्यपि निरस्तम्, उच्चारणस्यानुपूर्वी निर्माणस्य सकर्तृकत्वसाधने सिद्धसाधनम् । प्रथमोच्चारणस्य पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्षानुपूर्वी निर्माणस्य च साधने हेत्वसिद्धे । एतेन ' प्रतिमन्वन्तरश्चैषा श्रुतिरन्या विधीयते ' इति वचनमपि व्याख्यातम् । ' उच्चारण वा कर्तृत्वमानु-पूर्व्यारिच वा कृति | सिद्धसाधनता चैवमन्यत्रातिप्रसङ्गता ॥ ' अपि च, शरीरपरिग्रमन्तरेणोपदेशस्य कर्तुमशक्यत्वाद् यदीश्वर शरीर गृह्णीयात्तदा व्यासादिवदवश्य स्मर्खेत । यथा रावणक्सादिवधाथगृहीतरामकृष्णदेह परमेश्वर स्मर्य्यते, तथैव वेदोपदे शार्थमपि गृहीतशरीर परमेश्वर कथ न स्मर्य्यते । अपि च पृथिव्यादिनिर्मातृत्वेनेश्वरसामान्यमेव सिद्धयति, वेदकारस्त्वी-अनुपलन्धि ही बताई जा रही है, पर वह बन नहीं पाती, क्योकि प्रमाण के बल पर कर्ता की उपलब्धि होती है, अर्थात् वेदो का कर्ता प्रमाण से सिद्ध हो रहा है । परन्तु यह कहना ठीक नही है, क्योंकि तुम्हारा वह प्रमाण पौरुषेयत्व का अनुमान हो है और वह सोपाधिक ही है, अत उससे पौरुषेयत्व की सिद्धि नही हो सकेगी । यह जो कहा था कि अनुपलब्धि के सिद्ध होने पर अनुमान का निरास और अनुमान का निरास होने पर अनुपलब्धि की सिद्धि होने से अन्योन्याश्रय दोष होगा, किन्तु यह कथन भी निसार हैं, tute ' daerature कत्व ' हेतु के बल पर कर्ता का अभाव सिद्ध हो जाता है, यहाँ अनुमान - निरास के अधीन न होने में अन्योन्याश्रय दोष नही है । अन्यथा तुम्हारे पौरुषेयत्वानुमान में भी वैसा ही अन्योन्याश्रय दोष उपस्थित होगा | जैसे तुम्हारे यहाँ प्रतिबन्ध ( व्याप्ति ) की महिमा से प्रामाण्य की सिद्धि हो जाती है । प्रामाण्य की सिद्धि अनुपलब्धि के निरास के अधीन नहीं है । वैसे हो यहाँ पर भी प्रामाण्य की सिद्धि समझ लेना चाहिये | दूसरी बात यह है कि वेद का पौरुषेयत्व बताने वाले को उसकी पौपेयता का प्रमाण बताना होगा | पौरुषेयत्व साधक अनुमान तो ' स्मयमाणककत्व ' रूप उपाधि से दूषित हो जाता है । मत निर्दोष प्रमाण की उपलब्धि न हो पाने से कर्ता का अभाव ही सुस्थिर रहा । उपर्युक्त सन्दम से पूर्वपक्षी का जो कहना था कि- ' लोक - व्यवहार में पट रचना ( दरी, साडी आदि ) को देखकर उसके कर्ता का अनुमान जैसे किया जाता है, वैसे हो वेद की रचना को देखकर उसके कक्ष का मो अनुमान कर लेना चाहिये । वह भी निरस्त हो गया । उच्चारण की आनुपूर्वी के निर्माण का सकत्व यदि साधा जाय तो farer ही होगा । प्रमोच्चारण, जो पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष है, उसकी मानुपूर्वी निर्माण को यदि साधा जाय तो हेत्वसिद्धि होगी । इस सन्दर्भ से ' प्रत्येक मन्वन्तर में अन्य अन्य श्रुति का निर्माण होता है ' इस कथन का भी उपपादन हो गया । दूसरी बात यह भी है कि शरीर धारण किये बिना उपदेश कर पाना सम्भव न होने से यदि ईश्वर शरीर धारण करे तो व्यास आदि की तरह अवश्य उसका भी स्मरण होगा । जैसे -- रावा, कस आदि राक्षसों के वध के लिये राम, कृष्ण के रूप में शरीर धारण किये हुए परमेश्वर की याद सभी कोई करता रहता है, वैसे ही वेद का उपदेश देने के लिये भी शरीर धारण करने वाले परमेश्वर की याद क्यो नहीं की जायगी? अपि च पृथिवी आदि के निर्माता के रूप में सामान्य ईश्वर की ही सिद्धि हो पाती है । वेदकार ( वेव-निर्माता ) तो कोई विशेष ही होना चाहिये, उसकी सिद्धि कैसे हो पायगी? भिन्न भिन्न मत वालों के द्वारा बाइबिल, कुरान आदि के उपदेशको को ही ईश्वर के रूप में बताया जाता है । ऐसी स्थिति में वेदकार को हो ईश्वर कहना, बाइविलकार को नहीं, इसमें क्या हेतु है? वेद के द्वारा ईश्वर की सिद्धि और ईश्वर की सिद्धि होने पर उससे निर्मित होने के कारण वेद के प्रामान्य की
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date पारिजातः २२५ श्वरविशेष । स कथ सेत्स्यति तत्तदनुयाविभिस्तु वाइबिलकुरानोपदेशका एवेश्वरत्वेन साध्यन्ते । तत्र वेदकार ईश्वरो न वाइविलकारादय इत्यत्र को हेतु? वेदेनेश्वरसिद्धिस्तत्सिद्धौ तन्निमितत्वेन वेदप्रामाण्यसिद्धिरित्यन्योऽन्याश्रयत्वमनुमानेन तत्सिद्धिस्तु पूर्वं प्रत्याख्यातव । एव वेदाध्ययन गुवध्ययनपूर्वक वेदाध्ययनत्वादित्यपि साबु । यथेदानीतना पित्रादिपूर्वकास्तथैव पूर्वे पित्रादयोऽपि पित्रादिपूर्वका । तथव सर्व वेदाध्ययन गुवध्ययनपूर्वकमेव । अत एव वेदस्यानुश्रवेत्यन्वर्थं नाम । गुरोमुखादनुश्रूयते इत्यनुश्रव । गुरोमुखादनुश्रूयते एव पर न केनापि क्रियते । यदुक्त कतृपूर्वकेऽप्यध्ययने वेदाध्ययनत्वस्य सत्त्वाद्विपक्षेण विरुद्ध विशेषण विपक्षाद्धेतु व्यावतयति नान्यत् अतिप्रसङ्गात् । न च वेदविशेषणकतुपूर्वकत्वलक्षणविपक्षेण विरुद्धम् । भारताध्ययनवद् वेदाध्ययनस्य सकर्तृकत्वेऽप्यविरोधादिति, तन्न, वैदेति विशेषणस्यानैकान्तिकत्ववारकत्वात् कर्तृवकेऽध्य-यनेऽध्ययनत्वस्य सत्त्वेऽपि वेदाध्ययनत्वाभावात् । अपि च विषमोऽयमुपन्यास, नहि सर्वं भारताध्ययन गुर्वध्ययनपूवकम्, कर्तृकस्य प्रथमभारताध्ययनस्य गुर्वध्ययनपूर्वकत्वाभावात् । वेदस्य स्वकर्तृपूवकत्वादेव सदमध्यध्ययन गुर्वंध्ययनपूवमेवेति वेदविशेषण विपक्षविरुद्धमेव । अपोहनिराकरणम् ननु य एव शब्दा सत्यर्थे दृष्टा ते तदभावेऽपि दृश्यन्ते । अतोऽर्थाभावेऽपि शब्दानामुपलम्भाद् विधिद्वारेणार्थाभि-धायकत्वानुपपत्यान्यापोहमात्राभिधायकत्वमेव तेषा युक्तम् । तदुक्तम्- ' अपोह शब्दलिङ्गाभ्या न वस्तुविधिनोच्यते ' इति । अन्यच्च - ' अतीताज्जातयोर्वापि न च स्यादनृतार्थता | वाच कस्याश्चिदित्येषा बौद्धाथविषया इमे ॥ ' ( प्रमाणवा ० ३।२०७ ) सिद्धि --- यह अन्योन्याश्रय दोष होता है, उसको बचाने के लिये यदि अनुमान प्रमाण से ईश्वर को सिद्ध किया जाय, ( खण्डन ) यहले ही किया जा चुका है । तो उसका प्रत्याख्यान ara ' सभी वेदाध्ययन, गुवव्ययन पूर्वक है, वेदाध्ययन होने से यह अनुमान उचित ही है । जैसे आजकल के लोग पिता से पैदा होते हैं, वैसे ही पहले के लोग भी अपने अपने पिता से ही पैदा हुए, ठीक ऐसे ही समस्त वेदाध्ययन गुवध्ययनपूर्वक ही है । इसी कारण वेद का दूसरा नाम ' अनुभव ' होना सायक है । क्योकि गुरु के मुख से केवल सुना ही जाता है, बनाया नहीं जाता, इसलिये उसे ( वेद को ) अनुभव कहते हैं । यह जो कहा गया था कि ' कर्तृपूवक अध्ययन में भी वेदाध्ययनत्व के होने से विपक्ष के विरुद्ध विशेषण faver से हेतु की हो व्यावृत्ति करेगा, अन्य की नहीं । अन्य की भी व्यावृत्ति करेगा तो अतिप्रसग होगा । वेद का विशेषण --- कर्तृपूवकत्व लक्षण विपक्ष से विरुद्ध नहीं है, भारताध्ययन की तरह बेदाध्ययन को सकतृक मानने पर भी कोई विरोध नही है । किन्तु यह कथन ठीक नही है, क्योंकि ' वेद ' यह विशेषण अनैकान्तिकत्व ( व्यभिचार ) का वारण कर देता है । कतृ पूर्वक aasaar में asaare व के रहने पर भी वेदाध्ययनत्व उसमे नही है । दूसरी बात यह भी है कि दृष्टान्त ( भारताध्ययन का जो उपन्यास किया गया है, वह विषम है, क्योकि समस्त भारताध्ययन गुवध्ययनपूर्वक नही है, क्योंकि व्यासक के प्रथम भारताध्ययन hasura gaura नही है । रचयिता अपनी रचना को स्वयं ही पढ़ता है, उसे पढाने की आवश्यकता नही होती । वेद में कतृ -पूर्वकत्व न होने से ही समस्त aorat aasaaryan ही है । इसलिये ' वेद ' विशेषण विपक्ष के विरुद्ध हो है । पोह का निराकरण शका -- जो शब्द किसी वस्तु के रहने पर देखें गये हैं, वे ही शब्द वस्तु के न रहने पर भी दिखाई देते हैं । अत वस्तु ( अर्थ ) के अभाव में भी शब्दों की उपलब्धि होने से विधि के द्वारा शब्दो मे अर्थ को aresar ( अभिधायकत्व ) अनुपपन्न है, tra शब्दो मे जो अर्थाभिधायकत्व ( अर्थवाचकत्व ) है उसे ' अत्यापोह ' ही समझना चाहिये । किसी ने कहा भी है --- " विधि याचक शब्य द्वारा वस्तु नही बताई जाती, किन्तु शब्द और लिङ्ग से अपोह मात्र की प्रतीति कराई जाती है " । " किसी भी शब्द की अनुतार्थता ( मिथ्या अर्थ ) नहीं है, चाहे वह अतीत अर्थ या अनुत्पन्न अर्थ को भी बताये । " --- [ प्र ० वा ० ३।२०७ ] | E
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२२६ तत्रापोह बाह्यतया आरोपित, आकारोऽपोह्यतेऽनेनेति । यद्वा अपोह्यतेऽस्मिन्नित्यपोह स्वलक्षणम् । तस्मान्न विकल्पाना स्वरूपेण बाह्यग्राह्योऽपि त्वाकारेण सहकीकृत एव बाह्यो विषय । स चापाहोऽपोह्यतेऽन्यदनेनेत्यपोह, अपोह्यतेऽस्मादन्य द्विजातीयमिति कृत्वा । तत्र प्रमाणमनुमानम् - यथा यद्यत्र प्रतिभाति तत्तस्य विषय यथैन्द्रिये प्रत्यये सुस्पष्टप्रतिभासमान-वरर्थात्मा नीलादिस्तद्विषय | शब्दलिङ्गप्रभवप्रत्यययोस्तु बहिरर्थरहित स्वरूपमात्र विषय, तत्र स्वरूपमात्रस्यैव प्रतिभा-तत्वात् । न चार्थासस्पर्शिता स्वरूपमात्रावभासित्व च शाब्दानुमानप्रत्यययोरद्याप्यसिद्धमिति वाच्यम्, विकल्पानुपपत्त्या तत्सिद्धे । तथाहि शाब्दप्रत्ययस्य को विषय? स्वलक्षणस्वभाव, सामान्यस्वरूपो वा? नाद्य, स्वलक्षणे सकेताभावेन तत्र शब्दानामप्रवृत्ति । तदुक्तम् -- ' शब्दा सकेतित प्राहुव्यवहाराय स स्मृत । तदा स्वलक्षण नास्ति संकेतस्तेन बन्धनम् ॥ ' ( प्र ० वा ० ) । स्वलक्षणस्य क्षणभङ्गुरत्वेन कालान्तरे तेनव रूपेणानुगमो नास्ति । व्यवहारार्थं समय क्रियते । तेन यस्यैव सतव्यवहार कालव्यापकत्व भवेत् तत्रैव समयो व्यवहतृणा युक्त । स्वलक्षणस्य क्षणिकत्वेनातथात्वान्न तत्र समय । ‘ देशकालक्रियाशक्तिप्रतिभासादिभेदत । तस्मात् संकेतदृष्टोऽर्थो व्यवहारे न दृश्यते ॥ न चागृहीतसकेतो बोध्येतान्य इव ध्वने । ' परमाण्वाकारतया क्षणिकतया च निरशतया च न देशकालान्तरव्याप्ति स्वलक्षणस्य । किञ्च, अस्येदमभिधानमिति यस्मिन् ज्ञाने सम्बन्ध प्रतिभाति, न तत्र प्रतिनियनन्द्रियविषययो शब्दाथस्वलक्षणयो प्रतिभास । न तत्राप्रतिभासमानयो-स्तयो सम्बन्धकारण संभवति, अतिप्रसङ्गात् । यथा गोशब्दतदर्थयो सम्बन्धज्ञानेऽप्रतिभासमानयोरश्वतदर्थयोस्तेन ज्ञानेन अपोह उसे कहते हैं, जिसका बाह्य रूप से आरोप किया जाय । इसकी ' आकार पोह्यते अनेन ' यह व्युराति है । अथवा ' नपोते अस्मिन् इति अपोह ' जिसमे आरोप किया जाता है, अर्थात् ' स्वलक्षण ' । इसलिये विकल्प ज्ञानों का विषय ( ग्राह्य ) स्वरूपत बाह्य पदाथ ( वस्तु ) नहीं है । अपि ज्ञान के आकार के साथ एकीकृत बौद्ध पदाथ ही free प ज्ञानो का विषय है । जो बाह्य विषय हैं, वह अपोह है । ' अपोते अन्यत् अनेन इति अपोह ' अर्थात् ' अपोह्यते अस्मात् अन्यत् विजातीयम् ' जिससे भिन्न विजातीय वस्तु का अपोहन ( free ) किया जाता है, उसे अपोह कहते हैं । इसे बताने वाला प्रमाण अनुमान ही है । जैसे- जिसका जहाँ प्रतिमान ( प्रतीति ) होता है, वही उसका विषय होता है । जैसे—- ऐन्द्रिय ज्ञान ( प्रत्यक्ष ज्ञान ) मे स्पष्टतया भासमान वस्तु का स्वरूप नील, पीत आदि, उस ज्ञान के विषय होते हैं । शब्द तथा लिङ्ग से उत्पन्न ज्ञान के तो अर्थ रहित केवल स्वरूपमात्र ही बाह्य विषय है, That ( बाहर ) केवल स्वरूप का ही ज्ञान होता है । शब्द तथा अनुमान प्रमाण से उत्पन्न हुए ज्ञान में ज्ञान के स्वरूप मात्र का मान होना और उसका वस्तु के साथ सम्बन्ध न होना अभी भी असिद्ध ही है, ऐसा नही कहना चाहिये, क्योंकि आगे के विकल्प की अनुपपत्ति से यह सिद्ध ही है । वह विकल्पइस प्रकार है- --शब्द से होने वाले ज्ञान का विषय क्या है? ज्ञान का अपना विशेष स्वभाव या सामान्य स्वरूप? प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं, क्योकि स्वलक्षण ( विशेष स्वभाव ) मे सकेत न होने से उसको बताने में शब्द को प्रवृत्ति ही नही होगी । कहा भी है- " शब्द संकेतित अर्थ को बताते हैं, क्योंकि व्यवहार के लिये ही सकेत की आवश्यकता पडती है । स्वक्षण में शब्द का संकेत न होने से वह उससे ( शब्द से ) बँधा हुआ नहीं है । " स्वलक्षण पदार्थ क्षणभंगुर होने से कालान्तर में उसी रूप से उसका अनुगम नहीं होता । वत व्यवहार सम्पादन के लिये संकेत किया जाता है । जिसका व्यवहार स्थिर होगा, उसी hereafter or act करना उचित होगा, किन्तु स्वलक्षण तो क्षणिक हैं, स्थिर नहीं है, अतः उसमे शब्द का संकेत ( समय ) भी नहीं है । स्वलक्षण पदार्थ, भावाकार, क्षणिक और निरवयत्र होने से देशान्तर, कालान्तर के साथ उसका सम्बन्ध नहीं है । दूसरी बात यह है कि जिस ज्ञान में ' इसका यह वाचक है ' इस प्रकार का सम्बन्ध मासित होता है, वहाँ पर तत्सत् इन्द्रिय के विषय होने वाले शब्द और स्वलक्षण रूप अथ ( वस्तु ) का आभास ( ज्ञान ) नहीं होता और न ही वहाँ sferred न होने वाले उन दोनों ज्ञान के साथ सबन्ध होना ही सभव है, अन्यथा अतिप्रसंग ( अव्यवस्था ) होगा | जैसे गोशब्द और उसके अर्थ दोनों के सम्बन्ध ज्ञान मे भासित न होने वाले ( अप्रतिभासमान ) अश्व और उसके अर्थ का उस ज्ञान के साथ सम्बन्ध नहीं किया जाता, उसी तरह अर्थ के साथ सम्बन्ध न कर पाने वाला शब्द उस वर्थ का ज्ञान नहीं करा सकता । अन्यथा अतिप्रसंग होगा । स्वलक्षण को शाब्दज्ञान का विषय मानने पर इन्द्रिय से होने वाले ज्ञान की तरह स्पष्ट प्रतिभास का प्रसग प्राप्त होगा । किन्तु प्रतीतिविरोध के कारण वैसा इष्ट नहीं है । कहा भी है-- इन्द्रिय से होने वाले ज्ञान का विषय होने वाली वस्तु भिन्न है और शब्द से होने वाले ज्ञान का विषय होने वाली वस्तु
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वदार्थपारिजात २२७ न सम्बन्धकरण भवति, तद्वत् । न चार्थेनाकृतसम्बन्ध शब्दोऽथं प्रत्याययति, अतिप्रसङ्गात् । शाब्दप्रत्ययस्य स्वलक्षणविषयत्वे इन्द्रियप्रभवप्रत्ययवत् स्पष्टप्रतिभासप्रसङ्ग स्यात् । न चैवमिष्टम्, प्रतीतिविरोधात् । तदयुक्तम्- ' अन्यदेवेन्द्रियग्राह्यमन्य-च्छन्दस्य गोचर | शब्दात्प्रत्येति भिन्नाक्षो न तु प्रत्यक्षमीक्षते ॥ ' अन्यदेव स्वलक्षणमिन्द्रियग्राह्यम्, अन्यच्च सामान्यलक्षण शब्दगोचर । प्रध्वस्तनेत्रोऽपि शब्दात्प्रत्येति, परन्तु न प्रत्यक्षमीक्षते । समानविषयत्वेऽनन्धस्येवान्धस्यापि शब्दादपरोक्षेव प्रतीति स्यात् । तथात्वे चेन्द्रियाग्निसम्बन्धादिव दाहशब्दादपि दाहानुभव स्यात् । यद्वा शब्दादन्धोऽपि घटादि प्रत्येति परन्तु चक्षुष्मानिव प्रत्यक्ष नेक्षते । ' अन्यथैवाग्निसम्बन्धाद् दाह दग्धोऽभिमन्यते । अन्यथा दाहशब्देन दाहार्थं सम्प्रतीयते ॥ ' ( वाक्यपदीये ४२५ ) | यदि शब्देन दाहाद्यर्थ प्रत्याय्येत तदा सन्निधापितोऽस्मै तामर्थक्रिया कथ न कुर्य्यात् । अग्निसम्बन्धा-Eat दामन्यथा भवति । दाहशब्देन दाहमन्यथाऽवगच्छति । ततश्च शब्दार्थयोर्नास्त्येव कश्चन सम्बन्ध । इति वाक्यपदीय -कारिकाथ । न चेकस्य रूपद्वय सभवति, येनास्पष्ट वस्तुगतरूपमेव शाब्दबोधे भासेत, एकस्य द्वित्वविरोधात् । तथा च स्वलक्षण न शब्दप्रत्ययविषय, शब्दप्रत्ययेऽप्रतिभासमानत्वात् । यो हि यत्कृते प्रत्यये न भासते न स तस्यार्थ $ यथा रूपजनिते प्रत्यये रस । न च भासते शाब्दबोधे स्वलक्षणम् । तस्यान्न तत्तस्य विषय । वस्तुविषयत्वे च शब्दाना मतभेदेनार्थभेदाभिधा-यित्वानुपपत्ति । तदुक्तम् - ' परमार्थैकतानत्वे शब्दानामनिबन्धना । न स्यात्प्रवृत्तिरर्थेषु समयान्तरभेदिषु । ' इति । तस्मान्न स्वलक्षण शाब्दबोधविषय । नापि सामान्यस्वभावोऽन्त्य पक्ष सम्भवति, वास्तवस्य सामान्यस्यैवाभावात् । तदभावश्च, शशविषाणवदनर्थक्रिया कारित्वात् । नहि जातिर्वह्निदाहादौ कचिदपि प्रत्युपस्थाप्यते । शब्द क्वचिन्नियुञ्जान प्रेक्षावान् इष्टानिष्टाप्तिप्रतिषेधलक्षण भिन्न, क्योकि अन्धे को भी शब्द से तो ज्ञान हो जाता है, किन्तु प्रत्यक्ष देख नहीं पाता । ऐन्द्रियक ज्ञान तथा शाब्द ज्ञान का विषय एक ( समान ) मान लेने पर चक्षुष्मात् की तरह अन्य व्यक्ति को भी शब्द से प्रत्यक्ष प्रतीति ही होगी, तब इन्द्रिय और अग्नि के सम्बन्ध से बाहानुभव की तरह वाह शब्द में भी दाह का अनुभव होने लगेगा | अथवा शब्द से बन्धे व्यक्ति को भी घट आदि पदाथ की प्रतीति होती है, किन्तु चक्षुष्मान की तरह प्रत्यक्ष से वह नहीं देख पाता । वाक्यपदीयकार कहते हैं -- " अन्यथैवाऽग्निसम्बन्धाद् वाह दग्धो भिमन्यते । अन्यथा दाहशब्देन दाहार्थं सम्प्रतीयते । " -- ( वा ० प ० ४२५ ) यदि शब्द से दाहादि अर्थ का बोध होगा तो उसके सन्निहित कराने पर उससे अर्थक्रिया क्यों नहीं हो पाती? अग्नि के सम्बन्ध से दग्घ हुआ व्यक्ति कुछ दूसरे ही प्रकार की जलन का ages करता है, किन्तु दाह शब्द से एक दूसरे ही प्रकार के दाह को जानता है । अर्थात् वास्तव मे जलने से कैसा दुख होता है, यह तो आग से जलने वाला ही जानता है । उसके साथ सहानुभूति रखने वाला कहता है-- आप जल गये, आपको बड़ा कष्ट हो रहा है । पर इन शब्दों से जलने वाले को जैमा दुख हो रहा है, वैसे दुख का पता थोड़े ही चलता है | तात्पय यह है कि शब्द का अर्थ के साथ कोई भी सम्बन्ध नही है । यह वाक्यपदीय की का f रका का अर्थ है । एक पदार्थ के दो रूप होना सम्भव नहीं, जिससे शाब्द बोध में वस्तु का अस्पष्ट रूप ही भासित हो । क्योकि एक का face के साथ विरोध रहता है । बत स्वलक्षण ( विशेषस्वरूप वाली ) वस्तु शब्द से होनेवाले ज्ञान ( प्रत्यय ) का विषय नही होती ज्योकि शाब्द प्रत्यय ( शब्दजनित ज्ञान ) मे उसका प्रतिभास नहीं होता । जिसके ज्ञान मे जो भासित नहीं होता, यह उसका अर्थ ( विषय ) नहीं होता । जैसे - रूप ज्ञान मे रस का मास नहीं होता, व्रत. रूप ज्ञान का विषय रस कभी नहीं होता । उसी तरह शब्दजनित ज्ञान ( शाब्द बोध ) मे स्वलक्षण मासित नहीं होता, मत वह उसका ( शब्दजन्य ज्ञान का ) विषय नहीं हो सकता । स्वलक्षण रूप वस्तु को शाब्द ज्ञान का विषय मानने पर मतभेद से शब्दों में after fearfire ( विभिन्न अर्थों का वाचकत्व ) सिद्ध न हो सकेगा | यही बात इस श्लोक में कही गई है - " परमार्थैकतानत्वे शब्दानामनिबन्धना । न स्यात् प्रवृत्तिरर्थेषु सममान्तरषु ॥ " गत स्वलक्षण वस्तु को शाब्द बोध का विषय नहीं कहना चाहिये । सामान्य स्वभाव ( सामान्य रूप ) वाला दूसरा पक्ष भी सम्भव नहीं, क्योंकि सच पूछा जाय तो ' सामान्य ' नाम की कोई वस्तु हो नहीं है । शशविषाण की तरह अर्थक्रियाकारी न होने से उसका ( सामान्य का ) अभाव ही समझना चाहिये । वह्नि दाह afe के करने में जाति ( वह्नि की जाति वह्नित्व ) को कभी भी उपस्थित नहीं किया जाता, अर्थात् जलाने की क्रिया में अति ( वह्नि )
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२२८ वेदाथपारिजातः किञ्चित्फलमवश्यमीहते । तस्मादन्यापोहगोचरा एव शब्दा | जातिव्यवत्योरिव ज्ञानतदाकारयोरपि न शाब्दबोधगोचरत्वम्, तयोरपि ज्ञानरूपेण स्वलक्षणत्वेन सकेताविषयतया शब्दगोचरतानुपपत्ते । किन्तु स एव ज्ञानाकारी दृश्यविकल्पावेकीकृत्य बहीरूपतयाध्यस्तपूर्वजातिव्यक्तिज्ञानतदाकारापेक्षयार्धपञ्चमाकारोऽन्यापोह । बाह्यत्व हि तस्यार्धाकार | अधत्व तु दृश्यस्य सत्यत्वाद्विकल्पस्यासत्यत्वात् । दृश्योऽर्थं स्वलक्षणम्, विकल्पोऽर्थं सामान्यप्रतिभास । तावेकीकृत्य स्वलक्षणमेवेद विकल्प -बुद्धा विषय क्रियते । अपोहव निषेध | म द्विविध -- पय्युदास, प्रसज्यश्च । प्रथम सदृग्ग्राही, द्वितीयस्तु निषेधकृत् । सादृश्यञ्च तद्भि-नत्वे सति तद्गतभूयधमत्वम् । प्रकारान्तरेण - ' तत्सादृश्यमभावञ्च तदन्यत्व तदल्पता । अप्राशस्त्य विरोवश्व नञर्था षट् प्रकीर्तिता ॥ ' पर्युदासोऽपि बुद्धयात्मा अर्थात्मेति द्विविध नथा बुद्धयात्मा बुद्धिप्रतिभास, अर्थेष्वनुगतेकरूपत्वेनाध्यवसित । अर्थात्मा अथस्वभावविजातीयकालाननुवृत्तमथ स्वलक्षणम् । यथा हरीतक्यादयो बहवोऽन्तरेणापि सामान्यमेक ज्वरादिशमनलक्षण काय्यं कुवन्ति तथैव शाबलेयादयोऽप्यर्था सत्यपि भेदे प्रकृत्या एाकारप्रत्यवमर्शस्य हेतवो भविष्यन्तीत्यन्तरेणापि वस्तुभूत सामान्य तानर्थानाश्रित्य तदनुभवबलेन यदुत्पन्न विकल्पज्ञान तत्र यदर्थाकारतयाऽर्थं प्रतिबिम्बकमर्थाभासो भाति तादात्म्येन तत्रान्यापोह । तच्च बुद्ध्यात्मनोऽपोहस्य विशेषलक्षणम् । अर्थात् स्वभावत परस्पर विलक्षणानर्थानेकार्थकारितया समानहेतुत्वेनाश्रित्य यदेकप्रत्यवमर्शरूपमथप्रति-की ही आवश्यकता होती है, अग्नित्व जाति की नहीं । बुद्धिमान् व्यक्ति जब कभी शब्द का प्रयोग करता है तब वह इष्ट प्राप्ति और afree परिहार ( प्रतिषेध ) रूप किसी फल को अवश्य चाहता है । अत शब्द का विषय तो अन्य का अपोह ( अन्यापोह ) करता ही है । जाति तथा व्यक्ति की तरह ज्ञान और उसके आकार में भी शाब्द बोध ( शाब्द ज्ञान की विषयता नहीं है, क्याकि वे ( ज्ञान और उसका आकार ) भी स्वलक्षण होने से ज्ञान रूप है, मत उनमे सकेत ( विषयता ) न होने से शब्द - गोचरता उत्पन्न नहीं हो सकती । किन्तु दृश्य और विकल्प दोनो को एक कर बाह्य रूप के आकार मे आरोपित ( अध्यस्त ) पूर्व जाति व्यक्ति का ज्ञान और उनके आकार की अपेक्षया अधपन्नमाकार बाला जो ज्ञानाकार है, वही अन्यापोह है । उस ( ज्ञान ) का अर्ध आकार तो बाहर fear ear है | इसे आधा इसलिये कहते हैं कि उसका ( ज्ञान का ) जो दृश्य अश है, उसमे सत्यता है, और जो विकल्प ( कल्पित ) अश है, उसमे असत्यता है । दृश्य रहने वाला जो अर्थ भाग है यह तो ' स्वलक्षण ' है और विकल्प रूप ( कल्पित ) जो वध भाग है, यह सामान्य प्रतिभास ( सामान्य जाति के रूप में ज्ञात ) है । उन दोनो को मिलाकर एक कर दिया जाता है । दोनों के एक हो जाने से वह स्वलक्षण वस्तु ही पुन ज्यो को त्यो रहती है और वही विकल्प बुद्धि ( ज्ञान ) का विषय कहलाता है । अपोह का अर्थ है निषेध, उसके दो भेद हैं- एक पर्युदास और दूसरा प्रसज्य ( प्रतिषेध ) उनमें प्रथम पर्युदास तो ग्राही ( सहश को ग्रहण करने वाला ) होता है और दूसरा प्रसज्य निषेधक ( निषेध == प्रतिषे करने वाला ) होता है । साहस्य की परिभाषा इस प्रकारहै --- ' सद्भिन्नत्वे सति तद्गतभूयोधर्मवत्त्वम्'- ' परस्पर भिन्न दो पदार्थों में से एक में दूसरे के अनेक थम रहना ही साहस्य है । इसी प्रसज्य को दूसरे प्रकार से भी बताया जाता है- ' तत्सादृश्यमभावच तदन्यत्वं तदल्पता । arre त्य विरोध rs art षद् प्रकीर्तिता ॥ ' उपयुक्त छह अथ नम् के बताये जाते हैं । पयुदास भी दो प्रकार का होता है --- एक बुद्धपात्मा और दूसरा अर्थात्मा । उनमे बुद्धधारमा बुद्धि प्रतिभास हैं, जो पदार्थों मे अनुगत एक रूप से अध्यवसित है । अर्थात्मा अर्थमा है, जो विजातीय काल में अनुवृत्त न होनेवाला अर्थ स्वलक्षण है । ह tant ( E ) of बहुत सी ओषधियां बिना किसी सामान्य के जैसे ज्वर आदि रोगो को दूर कर देती है, उसी तरह शाबलेयादि अर्थों में भेद होने पर भी वे स्वभावत हो एकाकार प्रत्यवमश ( ज्ञान ) के हेतु, वस्तुभूत सामान्य के बिना भी हो सकेंगे | उन पदार्थों का भय कर उनके अनुभव के बल पर उत्पन्न होनेवाले विकल्प ज्ञान मे जिस अर्थ के आकार से अर्थ प्रतिि tror waterer प्रतीत होता है, वहीं तादात्म्य से अन्यापोह होता है । यही बुद्धधात्मा रूप अपाह का विशेष लक्षण है । सामान्य एक हैं, जो ज्वरादिशमन रूप कार्य है । अर्थात् स्वभावत परस्पर विलक्षण पदार्थों की एकार्थं क्रिया सम्पादक होने से समान हेतुत्वेन
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वेदाथपारिजात २२६ विम्बस्वभाव ज्ञानमुत्पन्न तस्य अपोह इति सज्ञा । वस्तुभागच्छायो विकल्पेनोल्लिख्यमानो बाह्यत्वेनाभिमन्यमानो विकल्पा-कार स्वाकार विपरीताका रोन्मूलकोऽपोह, अपोह्यतेऽनेनेति -- विकल्पवकाराभेदेन स्वयं प्रतिभासमानत्वात् । अपोह्यतेऽ-न्यस्मात् इति व्युपस्या अन्यापोह । अय मुख्यतया अन्यापोहशब्दवाच्य । हेतुन्त्रितयेन तु औपचारिकोऽपोहस्त्रिविध करणे काय्यधर्मारोपात् कार्ये कारणधर्माध्यासात् विजातीयव्यावृत्तस्वलक्षणेन सहैक्याध्यवसायाद्वा । यथोक्तान्यापोहेन कारणेनान्यव्यावृत्तवस्तुप्राप्तिरूप कार्य्यं जायते । तेन कारणत्वेन कार्य्यधर्मोऽन्यव्यावृत्तिरन्यापोहे समारोप्यते । क्वचित्तु का कारण म आरोप्यते । अन्याससृष्ट स्वलक्षण कारणम् । तदनुभवेन हि एकप्रत्यवमर्शकोऽन्यापोही जन्यते । अपि चात्र कारणभूते स्वलक्षणो s न्यव्यावृत्ति तस्या काय्यभूते प्रत्यवमर्शे उपचार । एवमेव विजातीयव्यावृत्तेन स्वलक्षणेन सह प्रत्यवमशभासिनी रूपस्येकत्वेनावध्यासितत्वाच्चापोहनिरूपण भवति । तदेव त्रिविध - पर्युदासप्रसज्यप्रतिषेधरूपस्त्वपोह | गोरय अगोन भवतीति व्यावृत्तिमात्रपय्र्यवसायी । एवमुक्तप्रकारोऽन्यापोहस्यैव शब्दो वाचक | वाच्यवाचकभावोऽपि कार्यकारणभावात्मक एव नान्य | बुद्धिनिष्ठप्रतिबिम्बस्य शब्दप्रभवत्वे शब्दवाच्यत्वम्, प्रतिबिम्बकारणत्वेन च शब्दस्य वाचकत्वम् । यदुक्तम्-' तत्राय प्रथम शब्देरपोह प्रतिपद्यते । बाह्यार्थाध्वयसायिन्या बुद्धे शब्दात् समुद्भवात् ॥ ' यदेव शाब्दबोधे भासेत स एव शब्दार्थो युक्त । न चात्र प्रसज्यप्रतिषेधो ज्ञायते, न चापीन्द्रियज्ञानतास्वलक्षण. प्रतिभास किन्तु बाह्यार्थीविषगिणी शाब्दी बुद्धिर्जायते । तेन तदेवार्थप्रतिबिम्बक शाब्दे ज्ञाने साक्षादात्मतया प्रतिभासनात् reate | एव प्रतीतिविलक्षणोऽपोह साक्षात् शब्दजन्य वान्मुख्य शब्दार्थ, शेषयोस्तु गौणशब्दार्थत्वम् । मानकर जो एक प्रत्यवसरा रूप अथप्रतिबिम्ब रूप ज्ञान उत्पन्न हुआ, उसे अपोह नाम दिया गया है । वस्तु के एक भाग के समन frent free प से उल्लेख किया जाता है, बाह्यरूप में जो समझा जाता है, विकल्प के आकार वाला, अपने आकार के दिपरीत आकार का उन्मूलन करने वाला जो होता है उसको अपोह कहते है । क्योकि ' अपोहाते अनेन ' इस व्युत्पत्ति से विकल्पवर्ती आकार के साथ अभिन्त होकर स्वयं भासित होता है । ' अपोह्यते अन्यस्मात् इस व्युत्पत्ति से ज्ञात होने वाला यह अन्यापोह ही मुख्यत ' मन्यापोह ' शब्द का वाच्य अर्थ है । किन्तु तीन हेतुओं से औपचारिक अपोह के तीन प्रकार होते हैं- पहिला - कारण मे कार्य धम का आप होने से, दूसरा- काय में कारण धर्मो का अभ्यास होने से, तीसरा - विजातीय व्यावृत्त स्वलक्षण के साथ ऐक्य का aaraare होने से ऊपर बताये हुए अन्यापोह रूप कारण से अन्य ( से ) व्यावृत्त हुई वस्तु की प्राप्ति रूप कार्य किया जाता है । उस कारण अन्य व्यावृति रूप कार्यं धर्म का आरोप ' कारण ' रूप से अन्यापोह पर किया जाता है । किन्तु कहीं - कहीं कार्य पर कारण धर्म का आरोप हुआ करता है । क्योंकि अन्य से अससृष्ट स्वलक्षण रूप कारण के अनुभव से एक ज्ञान कराने वाला अन्यापोह पैदा होता है । यहां पर कारणभूत स्वचक्षण में अन्यव्यावृत्ति हुआ करती है, उसका कायभूत ज्ञान मे उपचार हुआ करता है, अर्थात् गौण प्रयोग होता है । उसी प्रकार विजातीय मे व्यावृत्त स्वलक्षण के साथ ज्ञान में भासित होने वाले रूप का एकत्वेन aaraare होने में अपोह का frer ण किया जाता है । इस प्रकार से वह त्रिवि है । पय्युदास, प्रसज्य प्रतिषेध रूप पोह तो ' गौरय अगीनें भवति ' यह गो, अगी नहीं है, इस प्रकार केवल व्यावृत्ति में ही पर्यवसित होता है । इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि शब्द अन्यापोह का हो वाचक होता है । aror - ares are मी काय कारणभाव रूप ही है, अन्य नहीं । बुद्धिनिष्ठ प्रतिबिम्ब शब्द से उत्पन्न होने पर शब्द वाच्य कहा जाता है । प्रतिबिद का कारण होने से वह शब्द का वाचक नही । कहा भी है --- " ताव प्रथमः शब्दैरोह प्रतिपद्यते । बाह्या-व्यवसायिन्या बुद्धे, शब्दात् ममुन्द्रवात् ॥ " शब्द बोध मे freet भान होगा, उसी को शब्द का अर्थ कहना उचित है । यहाँ seva प्रतिषेध नहीं है और न इन्द्रिय से ज्ञात होने वाला स्वलक्षण प्रतिमास ही है, किन्तु बाह्यार्थ को विषय करने वाला शाब्द ज्ञान होता है । इसलिये वही प्रतिबिम्बित अर्थ शाब्द ज्ञान में साक्षात् मात्मतया प्रतिभासित होने से शब्द का अर्थ है । इस प्रकार से वही शब्द का मुख्य अथ है । अवशिष्ट अन्य दो को धत्र का गौण अर्थ की frore प्रतीति से वपोह साक्षात् शब्द जन्य होने समझा जाता है ।
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२३० aareeftain अत्रोच्यते -- यदुक्तम् ' अपोह शब्दलिङ्गाभ्याम् ' इत्यादिना तदसमीचीनम्, अपोहस्य निष्प्रमाणकत्वेन तदनुपपत्ते । न तावत् प्रत्यक्षेण तत्सिद्धि, प्रत्यक्षस्य स्वलक्षणविषयत्वात् । नाप्यनुमानेन, तत्सबद्धलिङ्गाभावात् । ' साक्षादाकार एतस्मितैवञ्च प्रतिपादिते । प्रसज्यप्रतिषेधोऽपि सामर्थ्येन प्रतीयते ॥ न तदात्मा परात्मेति सम्बन्धे सति वस्तुभि । व्यावृत्तवस्त्वधिगमोऽर्थादेव भवन्यत ॥ तेनायमपि शब्दस्य स्वार्थ इत्युपचर्य्यते ' । य गवादिप्रतिबिम्बस्यात्मा स परस्य अश्वादिप्रतिबिम्बस्य स्वभावा न भवतीति कृत्वा व्यावृत्तवस्त्वधिगमोऽपि भवति । तेन प्रसज्यलक्षणापोहस्य नान्तरीयकतया प्रतीतेगौण शब्दाथत्वम् । एव शब्दस्य वस्तुनि पारम्पर्येण कार्यकारणभावसम्बन्ध | प्रथम यथावस्थितस्य वस्तुनोऽनुभव, ततो विवक्षा, ततस्तात्वादि-स्पन्द, तत शब्द इत्येव परम्परया शब्दस्य बाह्येरग्न्यादिभिरर्थे सम्बन्धे सति विजातीयव्यावृत्तस्यापि वस्तुनोऽर्थापत्ति-तोऽधिगम । अतो द्विविधोऽपि प्रसज्यप्रतिषेध, अन्यव्यावृत्तवस्त्वात्मा चापोहशब्दार्थं, अपोद्येऽविनाभाविलिङ्गाभावात् । अस-निवृत्त्यागोनिवृत्त्याऽविनाभूत किञ्चिल्लिङ्ग न विद्यते । बौद्धमते तादात्म्यतदुत्पत्तिसम्बन्ध एवाविनाभाव । न चान्यव्यव-च्छेदरूपस्यापोहस्य केनचित् तादात्म्य तदुत्पत्तिर्वा घटते । यदप्युक्तम् - अतीनागतार्थाना शब्दाना नद्यास्तीरे मोदका सन्तीत्यादिशब्दाना चार्थाभावेऽपि बोधकत्वदर्शनात् कथमर्थेन सम्बन्धसिद्धिरिति तन्न, अनाप्ताप्रणीतशब्दानामेवार्थं सम्बन्धाभ्युपगमात् । कुत्रचित् शब्दाना क्वचिदर्थव्यभिचार-दर्शनेन सर्वत्र तथा कल्पयितुमशक्यत्वात् । अन्यथा मरुमरीचिषु तोयावभासिन प्रत्यक्षस्याप्रामाण्योपलम्भेन तोये तोयनिर्भा -इस पर उत्तर दिया जा रहा है -- ' भपोह शब्दलिङ्गाभ्याम् ' इत्यादि वचनो से जो कहा गया है, वह ठीक नहीं है । क्योंकि अपोह के मानने मे कोई प्रमाण नही है, अत उसकी सिद्धि किसी प्रकार भी होना सम्भव नही । प्रत्यक्ष प्रमाण से अपोह की सिद्धि हो नही सकती, क्योकि प्रत्यक्ष का विषय तो स्वलक्षण ( वस्तु का विशेष स्वरूप ) हुआ करता है । अनुमान से भी हो नहीं सकती, क्योकि उससे ( स्वलक्षण से ) सम्बद्ध कोई लिङ्ग ( हेतु ) नहीं हैं । यही बात इन पलोको मे कही गई है- " साक्षादाकार एतस्मिन्नेव प्रतिपादिते । प्रसज्यप्रतिषेधोऽपि सामथ्र्येन प्रतीयते । न तदात्मा परात्मेति सम्बन्धे सति वस्तुभि | व्यावृतवस्त्य-furnister rate त ॥ तेनायमपि शब्दस्य स्वाथ इत्युपचर्यते || " जो गवादिप्रतिबिम्ब का आत्मा ( स्वरूप = विम्ब ) अव आदि अन्य के प्रतिविम्ब का स्वरूप ( स्वभाव ) नही होता, इस कारण व्यावृत्त वस्तु का ज्ञान भी हो जाता है, वह प्रसज्य - लक्षण ( स्वरूप ) अपोह की नान्तरीयकतया ( निश्चित ) प्रतीति हो जाती है, व्रत उसे शब्द का गौण अथ कहा है गया । उससे है । इस प्रकार शब्द का वस्तु के साथ जो काय कारणभाव सम्बन्ध है, वह परम्परा से है, साक्षात् नही । पहिले यथावस्थित वस्तु का अनुभव, उसके बाद उसको कहने की इच्छा, उसके अनन्तर कण्ठ, तालु आदि में हलचल, तदनन्तर शब्द --- इस प्रकार taff at a पार्थी के साथ सम्बन्ध होने पर विजातीय से व्यावृत हुई वस्तु का ज्ञान भी अर्थापति प्रमाण से परम्परा हो में शब्द व्रत दोनो प्रकार का प्रसज्य प्रतिषेध भी अन्य व्यावृत्त वस्तु रूप ही हैं और वही मपोह शब्द का अथ है । अपोह जाता है । ( तित्य ) रूप से सम्बद्ध किसी किङ्ग ( हेतु ) के न होने से, अर्थात् असनिवृत्ति यानी अगोनिवृत्ति ( गोभिस पदार्थो मे भाव fro य ( अविनाभूत ) सम्बद्ध कोई लिङ्ग ( हेतु ) नहीं है । बौद्धों के मत से तादात्म्य तदुत्पत्ति सम्बन्ध हो अविनाभाव से निवृत्ति ) के साथ रूप पोह का किसी के साथ तादात्म्य या तदुत्पत्ति सम्बन्ध संगत नही हो सकता | है । अत अन्य यह जो कहा था कि अतीत- ममागत अथ वाचे शब्दो का ' नद्यास्तीरे मोदका. सन्ति ' नदी के तट पर मोदक ( लड्डू ) हैं -- इत्यादि शब्दो से अर्थ के न रहने पर भी ज्ञान होता है, तब अर्थ के साथ सकता हैं? किन्तु यह आशंका ठीक नहीं है । उन्ही शब्दो का अर्थ के साथ सम्बन्ध माना गया है, जो शब्द का सम्बन्ध कैसे सिद्ध हो प्रणीत शब्दों का ही अर्थ के साथ सम्बन्ध रहता है । कहीं क्वचित् किसी शब्द का अर्थ के साथ शब्द अनास - प्रणीत न हो, अर्थात् बास-सत्र ही शब्दाय का व्यभिचार समक्ष लेना उचित नही है । अन्यथा मरुमरीचिस्थलों में व्यभिचार देखकर ( सम्बन्ध न देखकर ) प्रमाण मान लेने पर वास्तविक जल मे जल का ज्ञान कराने वाले प्रत्यक्ष को भी अप्रमाण जल का आभास कराने वाले प्रत्यक्ष को होने से प्रत्यक्ष को प्रमाण माना जाता है, यदि ऐसा कहो तो जल मे जल का ज्ञान होने में मानना होगा | Ho मस्थित में बाधक भी वैसा ही बाधक उपस्थित हो सकता