वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 291–300
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 291–300
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२६१ धानात्मविकारप्रपञ्च प्रणवमात्र एव ' अकारो वै सर्वा वाक् ' इति श्रुते । तथैवाभिधेयात्मक प्रपञ्चोऽव्यकेश्वर एव ' सर्व खल्विद ब्रह्म ' इति श्रुते । तदभिन्नाभिन्नस्य तदभिन्नत्वनियमेन शब्दार्थयोरभेद एव । तथापि यथा मृद्घटयो विश्वरयोश्च वस्तुतोऽभेदेऽपि व्यावहारिको भेदो व्यवहारव्यवस्थापकाऽभ्युपेयते, तथैव शब्दार्थयोरपि । लघुमञ्जूषाकारस्तु सकेत पदपदार्थयोरितराध्यासरूप इति महाभाष्यरीत्या पदपदार्थयो सम्बन्धान्तरमेव शक्ति, वाच्यवाचकभावापरपर्याय परम्परया तद्ग्राहक चेतरेतराध्यासमूलक तादात्म्यम् । अस्माच्छन्दादयमर्थो बोद्धव्य इती-वरेच्छारूपा शक्तिर्नैयायिकाभिमता । स एव मेदरूप संकेत | अभेदरूप च वैयाकरणाभिमतम्, तथापि पाणिन्यादिस्मार्त-संकेतस्यैव वाचकतानियामकत्वम्, न त्वाधुनिकस्येत्यादि । आधुनिकसकेतस्थले द्वादशेऽह्नि क्रियमाणानामस्थले लक्षणैव । तत्र गोविन्दादिगुणाद्यारोपेण च बोध । केचित्तु पदपदाथोधबोधकभावनियामिका शक्तिरेव सम्बन्धस्तत्रापि कार्यजनकत्वे सम्बन्धस्यैव नियामकत्वम् । दीपगतप्रकाशकत्वशक्तावपि सम्बन्धे सत्येव वस्तुप्रकाशकत्व नान्यथेति दृष्टत्वात् । उपकार्य्योपकारकयोरुपकारस्वभाव सम्बन्धी यन्त्रासीत्तत्रैव कार्यं दृष्ट्वा शक्तिरूपो धर्माऽनुमीयते । तेनासौ शक्तीनामपि शक्तिर्गुणानामपि गुण । तादात्म्य चात्र तद्भिन्नत्वे सति तदभेदेन प्रतीयमानत्वम्, अभेदस्याध्यस्तत्वाच्च न तयोर्विरोध | भेदस्योद्भूतत्वविवक्षया तस्य वाचक प्रणव इति षष्ठी, अभेदविवक्षया च ओमित्यक्षर ब्रह्मेति सामानाधिकरण्यम् । अयमध्यास आदिव्यवहारकृदीश्वरकृत एव । यथावस्थित एव पितापुत्रयो सम्बन्ध सकेतेनावद्योत्यते । अयमस्य पिता, अयमस्य पुत्र । तदुक्त हरिणा -- ' इन्द्रियाणा प्रत्यय से भी अभिन्न होता है । इस नियम से शब्द और अथ अभिन्न ही हैं । जैसे पृथ्वी से अभिन्न मिट्टी स अभिन्न वडा पृथ्वी से भी अभिन्न ही है । atr और ईश्वर का तथा मृत्तिका और घट का जैसे वास्तव मे अभेद होने पर भी व्यवहार की व्यवस्था चलाने के लिए व्यावहारिक भेद भी माना जाता है, इसी प्रकार शब्द और अर्थ मे भी व्यवहार की व्यवस्था के लिए भेद मानना ही पडता है । लघुमजूषा-कार नागेश भट्ट तो संकेत को पद और पदाथ का परस्पर अध्यास रूप हो मानते हैं । महाभाष्यकार की रीति से पद और पदाथ का rasaara tree स्वतन्त्र सवन्ध हो शक्ति हे और उसका ग्राहक परस्पर अध्यासमूलक तादात्म्य है । नैयायिक के मत मे इस शब्द से यह अथ समझना चाहिए, ऐसी ईश्वर की इच्छा ही शक्ति है, यही भेदरूप संकेत है | व्याकरण शास्त्रकार इसे अभेदरूप मानते हैं और महर्षि पाणिनि जादि द्वारा निविष्ट संकेत को ही वाचकता का नियामक मानते हैं । आज कल के लोगो द्वारा निर्मित सकेत को वाचकता का नियामक नहीं मानते | आज कल के लोगा द्वारा जिन शब्दों का जिन अर्थों मे सकेत किया जाता है, उन शब्दों की उन मर्यो मेलक्षणा को वे मानते हैं । नामकरण मे भी वे लक्षणा ही मानते हैं । गोविन्द आदि के गुणो का आरोप करने से वे अर्थ का ज्ञान मानते है | कुछ लोगो के मत में शब्द और अथ की बोध ( ज्ञान ) बोधक ( ज्ञान कराने वाला ) भाव की नियामिका शक्ति ही है । शब्द से अथ के ज्ञान में वे भी सबन्ध को ही नियामक मानते है, क्योकि वस्तु के साथ सबन्ध होने पर ही दीपक की प्रकाशिका शक्ति वस्तु का प्रकाश करती है । उपकाय और उपकारक का उपकार - स्वभाव जहाँ होता है, वहीं कार्य को देखकर उसकी कारणभूत शक्ति का अनुमान किया जाता है । इसलिए यह शक्तियों की भी शक्ति है और गुणों का भी गुण है । यहा भिन्न होने पर भी अभेद से ज्ञायमान रूप तादात्म्य भी है । मंद और अभेद का विरोध होने पर भी अभेद वहीं नवास्तविक है, अत विरोध नहीं है । भेद को प्रधान रूप से कहने की इच्छा से ' तस्य वाचक प्रणव ' इस योगसून में मेदबोधक पष्ठी विभक्ति का प्रयोग हैं । अव को प्रधान बताने की इच्छा से ॐ इत्यक्षर ब्रह्म ' यहाँ समान विभक्ति है । यह अभ्यास प्रत्येक सृष्टि के प्रारंभ में व्यवहार का उपदेश करने वाले ईश्वर के द्वारा ही किया गया है । पिता - पुत्र का पहले से विद्यमान सबन्ध ही जैसे यह इसका पिता है, यह इसका पुत्र है, इस सकेत से बताया जाता है, वैसे भी ना चाहिये । मर्तृहरि ने कहा है कि ' इन्द्रियो की अपने विषय का ज्ञान कराने में जैसे अनादि काल से योग्यता है, इस प्रकार शब्दों की अपने अर्थों का ज्ञान कराने में भी अनादि योग्यता है । किन्तु उस योग्यता का ज्ञान योग्यतारूप सबन्ध से ही होता है, जैसे सबन्वीवाचक माता, पिता आदि शब्द से ही सबन्ध का ज्ञान होता है और उसका ज्ञान कार्य को देखकर कारण के अनुमान से
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२६२ वेदापारिजात स्वविषयेष्वनादिर्योग्यता यथा । अनादिरर्थे शब्दाना सम्बन्धो योग्यता तथा || सम्बन्धिशब्दे सम्बन्धो योग्यता प्रति योग्यता । समयायोग्यता सविन्मातापित्र दियोगवत् || सति प्रत्ययहेतुत्वे सम्बन्धे उपपद्यते । शब्दस्यार्थे यतस्तस्मात् सम्बन्धोऽ-स्वीति गम्यते ॥ ' इति । अस्मिन्मते भेदाभेदोपपादनाद् घटादिशब्दे न बहुधारणाद्यापत्ति, न वा अग्न्यादिशब्दोच्चारणे मुखदाहापत्ति } न वा अर्थे वर्णमालाद्यनुभवापत्ति । यथा शुक्ते रजतत्वावभास, तन्मूलक इदपदाथ रजतपदाथयोस्ता दात्म्यम्, तथा पदपदार्थयोरपि अय घट इति तादात्म्यमध्यासमूलकमेव, न वास्तविकमित्युक्तत्वात् । क शब्द कोऽर्थ इति प्रश्ने घट इत्यय शब्द घट इत्ययमर्थं इत्येवाकारोत्तरदर्शनात्तयारध्याम । अत एव पद श्रुत पदार्थ शृणु अर्थं वदेत्यादिव्यवहारा । ata एवार्थ पदमपि बौद्धमिति मते तयोरभेद एव - विप्र पृथिव्यादि चित्तस्थ न बहिस्थ कदाचन । स्वप्नभ्रममदाद्येषु सर्वेरेवानुभूयते ॥ ' न चैतावता बौद्धमतप्रवेशस्तेनारोपितसत्त्वस्याप्यनङ्गीका रादात्मनोऽप्यनित्यत्वाभ्युपगमाच । अभि-धानाभिधेयरूपा बुद्धिहृदयाकाशप्रतिष्ठिता परबोधनेच्छया पुरुषेणोदीर्य्यमाणा कण्ठादिषु वर्णभावमापद्यते । न व बौद्धे दाहादिशक्तिमत्त्वम् । अस्यायमर्थोऽस्यार्थस्येद पदमित्यादौ षष्ठ्यनुपपत्त्या स्वाभाविकयोगाङ्गीकार असम्बद्धाना घटपटा-दीनामेव व्यवहाराभावात् । समय सकेत इति चाप्तोपदेशवृद्धव्यवहारपर्य्यायो । अत एव सामयिक शब्दादर्थप्रत्यय । क पुन समय? अस्येद नामधेयमित्यादिनियोगरूप | नियोगातोपदेश एव । ईश्वरसकेत एवं शक्तिरिति नैयायिका । अयमेतच्छब्दोऽत्रास्य शक्तिरित्यस्य सकेतानापत्ते, ईदृशसकेतस्य लोके दर्शनेन तादृशेश्वरसकेतस्याप्यनुभवात् । न्यायवाचस्पत्ये उक्तम्- ' सर्गादि-होता है | इसलिये शब्द और अथ का सम्बन्ध अवश्य है, यह जान लिया जाता है । मेदाभेद सबन्ध मान लेने से इस मत मे घट शवद कहने पर सुख में बहुत कुछ मर जाने की आपत्ति नहीं और न ही अग्नि मादि शब्द के उच्चारण से मुखदाह को आपत्ति होगी । घटादिरूप वस्तु मे ' घ् अ टू अ ' इस वणमाला के अनुभव की भी आपत्ति नही होगी, क्योंकि जैसे सीप का रजत के रूप मे ज्ञान और उसका कारण सामने दिखाई देने वाली वस्तु के साथ अभेदरूप तादात्म्य है, इसी तरह शब्द और उसके अथ का भी ' यह पढ़ा है ' इस रूप में जो तादात्म्य मालूम पडता है, वह मध्यासमूलक ही है, वास्तविक नहीं, यह पहले कह चुके हैं । शब्द क्या हे? ऐसा पूछने पर भी उत्तर मिलता है प er | यह वस्तु क्या है? यह पूछने पर भी उत्तर मिलता है घड़ा | इस प्रकार एक ही आकार वाले उत्तर से ध्यास में प्रमाण मिल जाता है । इसलिये ' शब्द सुना, अथ सुनो, अथ कहो ' यह व्यवहार अध्यास के बिना बन ही नहीं सकते, क्योकि बाह्य वस्तु रूप अर्थ का उच्चारण या कथन तो सर्वथा असभव हैं । ' बुद्धि में विद्यमान ही शब्द है और अर्थ मी बुद्धिस्य ही है, बाहर नहीं इस मत मे दोनो का सुतरा अभेद है । जैसा कि प्रपचसार मे कहा है-- ' पृथिवी आदि सब पदाथ अपने मन मे ही है, बाहर नहीं । स्वप्न में, भ्रम में और मद में इसका अनुभव सभी को होता है । ऐसा मानने पर भी हम बौद्ध नही बन जायेंगे, क्योंकि उनके मत मे आरोपित की सत्यता नहीं मानी जाती मोर वे मात्मा को भी अनित्य मानते हैं । उनके विरुद्ध हम आरोपित बाह्य प्रपत्र की व्यावहारिक सत्ता मानते हैं और आत्मा की नित्यता । वाचकवाच्य रूप हृदयरूपी आकाश में रहनेवाली बुद्धि दूसरो को ज्ञान कराने की इच्छा से पुरुष के हृदय में से उठकर कण्ठ, सालु आदि स्थानो में आकर वर्णमाला बन जाती है । बुद्धिस्थ पदार्थ से तो जलाने मादि की शक्ति है नहीं । ' इस शब्द का यह अर्थ है, इस अर्थ का वाचक यह शब्द है ' इत्यादि वाक्यों मे सबन्धवाचक षष्ठी विभक्ति नहीं बन सकती | इसलिए स्वाभाविक सबन्ध स्वीकार किया है, क्योकि सबन्ध रहित घट पट आदि मे ऐसा व्यवहार नहीं होता । समय और सफेत ये दोनो शब्द आत उपदेश और वृद्ध व्यवहार के पर्यायवाचक हैं । इसीलिये कहा जाता है कि शब्द से होने वाला अर्थ का ज्ञान सामयिक अर्थात् वात उपदेश अथवा वृद्ध व्यवहार के द्वारा होता है । समय क्या है? इस व्यक्ति या वस्तु संकेत के रूप में हो, वह नियोग आठ का उपदेश ही है । वही यदि ईश्वर के यह अमुक शब्द है, इसकी इस अर्थ में शक्ति है, संकेत का ईश्वर के संकेत के रूप में ही का यह नाम है, इत्यादि नियोग को ही समय कहते हैं । वो उसे शक्ति कहते हैं । यह न्यायशास्त्र का मत है । सकता, किन्तु लोक में यह संकेत देखा जाता है, इसलिये उस न्यायत्तिक की तात्पर्यटीका में आचार्य वाचस्पति ने कहा है कि प्रत्येक सृष्टि के प्रारंभ में होने वाले ऐसा सकेस बन नहीं अनुभव मानना पड़ेगा । देवता और महषियों को
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ववायपारिजात २६३ भुवा महर्षिदेवतानामीश्वरेण साक्षादेव कृत सकेत तद्वयवहाराच्चास्मदादीनामपि सुग्रहस्तत्सकेत ' | योगवाचस्पत्ये च ' सर्वे शब्दा सर्वाभिधानस नर्था । ईश्वरसकेतस्तु प्रकाशक । ' त एव च नित्य शब्दार्थसम्बन्ध | सर्वरर्थं सर्वार्थसम्बन्धश्च योगगम्य एव ' । युक्त चेतत् एकस्यैव स्फोटस्य शब्दब्रह्मरूपस्य सर्वशब्दतदर्थो भयोपादानत्वेनोभयरूपतया उभयोरपि तत्काय्ययोरुभयरूपत्वात् । क्रियाशक्तिप्रधानाया शब्दशब्दार्थकारणम् । प्रकृतेर्विन्दुरूपिण्या शब्दब्रह्माऽभवत्पुरा ॥ ' श्रुतिश्च- ' सूक्ष्मामथ-नाप्रविभकतत्त्वामेा वाचमभिष्यन्दमानाम् । तामन्ये विदुरन्यामिव च नानानामात्मनि सन्निविष्टाम् ॥ ' तत्तद्रूपेणाभिव्य काम-न्यामिव भेदवतीमिवात्मनि चित्ते तत्वमस्यादिवाक्यस्याखण्डार्थेन शुद्धेनापि ब्रह्मणाऽऽध्यासिक तादात्म्यम्, यद्वा शब्दादि-विशिष्टबाध $ अखण्डार्थस्तु मानसबोधविषय | तादात्म्यमूलकस्य सम्बन्धत्वेऽर्थ भेदात्तत्तादात्म्यापन्नशब्देषु भेदौचित्यादर्थ -भेदाच्छब्दभेद । समानाकारत्वमात्रेण तु एकोऽय शब्दो नानार्थं इति व्यवहार । अन्ये तु एकस्मिन्नेव फले रूपरसगन्धादीना भिन्नाना तादात्म्यवद् एकत्रैव शब्देऽनेकार्थनिरूपितान्यनेकानि तादात्म्यानि । परे तु निरूपकभेदेऽपि तादात्म्यमेक-मेवेत्याह । ननु सर्वेषा शब्दाना सर्वार्थवाचकत्वे लक्षणोच्छेद म्यादिति चेन्न योगिना तथात्वज्ञानेऽप्यस्मदादीना तदभावात् । परमेश्वरस्या बुद्धिपूर्विकाया सृष्टी मायापुरुषौ भवत । अबुद्धिरविद्यालीला ' यदेकलो न शक्नोति रन्तु स्वय चर प्रभो । तदिच्छा-ईश्वर न साक्षात् संकेत के द्वारा शब्दों का अर्थ बताया और उनके व्यवहार से परम्परा के द्वारा उस संकेत का हम लोगो को भी आसानी से ज्ञान हो गया | योगभाष्य की तस्ववैशारदी टीका में तो आचाय वाचस्पति ने कहा है कि सभी शब्द सभी अर्थों का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं । ईश्वर का संकेत तो केवल प्रकाशक है । इसलिये शब्दो का अर्थ के साथ सम्बन्ध नित्य है । सब अर्थी के साथ सम्बन्ध का ज्ञान योगाभ्यास से ही हो सकता है । यही बात युक्तियुक्त भी है । एक हो शब्दब्रह्मस्वरूप स्फोट सब शब्दों और उनके अर्थों का उपादान कारण है । इसीलिये वही शब्द रूप भी है और अथ रूप भी । इसलिये उस शब्दब्रह्मरूप स्फोट में व्यक्त होने वाले शब्द कौर अथ दोनो स्फोट रूप ही हैं, जैसे घट आदि कार्य अपने उपादान कारण मृत्तिका रूप ही है । कियाशक्ति प्रधान बिन्दुरूपा प्रकृति हो शब्द और उसके अथ का कारण है । उसी बिन्दु रूप प्रकृति से पहले शब्दब्रह्म प्रकट होता है | वेद मन्त्र भी कहता है कि ' अथ से अभिन्न स्वरूप बाली अत्यन्त सूक्ष्म वाणी ही नाना रूप से प्रकट होती है । उसे लौकिक लाग भिन्न भिन्न रूप से जानते हैं । वास्तव में अपने स्वरूप में प्रविष्ट उसके वास्तविक रूप को जानने वाले विरले ही है । लाग तो उस भिन्न - भिन्न रूप वाली ही समझते हैं ' | ' तत्त्वमसि ', ' वह ब्रह्मास्मि ' इत्यादि श्रुतिवाक्य भी शब्दस्वरूप है । शुद्ध ब्रह्म हा काण्ड अथ है और उन वास्यो का अपन अथ के साथ कति तादात्म्य सम्बन्ध है । अथवा उस अथ का ज्ञान शब्द विशिष्ट है, अखण्ड अथ का ज्ञान तो अन्त करण की वृत्ति का विषय है । तादात्म्यमूलक सम्बन्ध मानने से अर्थ भिन्न हो जाते हैं, इसलिये अर्थ से शब्द मे भी भेद मानना उचित है । इसीलिये अथ भिन्न होने से शब्द भिन्न होते हैं, यह सिद्धान्त माना गया है । यह एक हो शब्द अनेक अर्थ वाला है, इस व्यवहार को समान आकार होने के कारण ही मानना चाहिये | तात्पय यह है कि ' सैन्धव ' इत्यादि शब्द ' नमक ', ' ater ' of free a के होने से स्वयं भी भिन्न - भिन्न होकर के ही भिन्न - भिन्न अथ का प्रतिपादन करते हैं, किन्तु उनका ' सैन्धव ' यह आकार एक सा होने से समझते हैं कि एक ही शब्द के अनेक अर्थ हैं । दूसरे लोगो का मत है कि एक ही फल में जैसे भिन्न - भिन्न अनेक रूप, रस, गन्ध आदि का तादात्म्य है, वैसे ही एक ही शब्द में अनेक अर्थो के अनेक तादात्म्य हैं । वास्तविक सिद्धान्त यह है कि का निरूपण करने वाले अर्थों और रूप, रस, गन्ध आदि के भिन्न - भिन्न होने पर भी उनका तादात्म्य तो एक ही है । ' यदि सब शब्द सभी अर्थों के वाचक हैं तो क्षणा, व्यजना नादि वृत्तियो को मानना व्यथ हो जायेगा, ऐसी शंका at seer, क्योकि योगियो को हो सब शब्दो से सब अर्थों का ज्ञान हो सकता है, हम लोगों को नहीं । इसलिये लक्षणा, व्यंजना areer area नहीं है । परमेश्वर की अबुद्धिपूर्वक सृष्टि में जीव और माया होते हैं । मबुद्धि का तात्पर्य यहाँ अज्ञान की लीला से है । कहा भी है कि है स्वयं विचरण करने वाले प्रभु! आप अकेले रमण नहीं कर सकते, इसलिये आपकी जो इच्छा उत्पन्न हुई, वहीं
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२६४ | तत परमेश्वरात् सिसृक्षात्मिका मायावृत्तिर्जाता, तव योत्पन्ना सेवा शक्तिरभूत्तव ॥ त्वमेको द्वित्वमापन्न शिवशक्तिप्रभेदत, चिदचिन्मिश्रोश नाद, चिदशो । तस्य बिन्दोरचिदशो बीजम ततो बिन्दुरूप त्रिगुणमव्यक्त जायते । इदमेव शक्तितत्वम्, ' सच्चिदानन्दविभवात् सफलात्परमेश्वरात् । आसीच्छतिस्ततो बिन्दु । अचिच्छब्देन शब्दार्थोभयसस्काररूपा अविद्येोच्यते पुन । बिन्दुर्नादो बीजमिति तस्य भेदा समीरिता ॥ ' इति । नादो नादाद्विन्दुसमुद्भव | परशक्तिमय साक्षात्त्रिवासी भिद्यते इत्यादि, तदप्यकिञ्चित्करम्, बाधकप्रत्ययप्रवृत्तावपीन्द्रियस्य यदप्युक्तम् -- नेन्द्रियवदुदासते शब्दा, अतोऽर्थासस्पर्शिन विज्ञान नोत्पादयतीति वक्तु शक्यते, प्रतीतिविरोधात् । चन्द्रद्वयविषय मिथ्याज्ञानजनकत्वप्रतीते । न च नत्प्रवृत्तौ तत्तद्विषय तन्निराकरणात्, विकल्पनिवचनानुपपत्ते । तदप्युक्त विकल्पयोनय शब्दा! तदप्यकिञ्चित्करम्, सविकल्पकत्वासिद्धौ, अर्थसन्निधिनिरपेक्षता, अनक्षप्रभवता, तथाहि के विकल्पना - अभिलापवत्प्रतिभासनिश्चय, जात्याद्युल्लेख, स्पष्टाकारता, चेतनाचेतनयो -तत्स्वभावत्वात् तद्धेतुत्वाद्वा? न प्रथम धर्मान्तरारोपी वा? नाथ, प्रतिभासस्याभिलापवत्त्वानुपपत्ते । तद्धि तज्जन्यत्वम् तज्जनकत्वम् उभय वा? प्रथमे जलानयोरिव विरुद्धधर्माध्यसितत्वेन तादात्म्यासम्भवात् । न द्वितीय, । तद्धि द्वितीये प्रकृतिप्रत्ययादिप्रत्यक्षे सविकल्पकत्वापत्ति । श्रीश्रज्ञानस्याविकल्पकत्वानापत्ते, तस्याभिलापप्रभवतया तद्वत्त्वप्रसङ्गात् कल्पनालक्षणत्वानुपपत्त | अथ उभयपक्षेऽपि उभयपक्षदोषापत्ति, एकत्रोभयरूपताविरोधाच्च । एवमभिलापवत्प्रतिभासस्य । प्रत्यक्ष निश्चय कल्पनोच्यते । तथात्वे प्रत्यक्षस्यापि तद्रहितत्वाभावेनाप्रामाण्यापत्ले, प्रमाणस्यानिश्चयात्मकत्वानुपपते परमेश्वर से सृष्टि को उत्पन्न करने की इच्छा आपकी शक्ति । इस प्रकार आप एक ही शिव और शक्ति रूप से दो हो गये गुण । फिर वाला बिन्दु रूप अव्यक्त पैदा हुआ । यही शक्ति तत्त्व स्वरूप माया की वृत्ति उत्पन्न हुई, उस माया - वृत्ति से सत्त्व, रज और तम नाद है । केवल चेतन अश बिन्दु है । यहाँ अवेतन शब्द का है । उसी बिन्दु का अचेतन अश बीज है और चेतन - अचेतन मिश्रित अश, ऐसे कला सहित परमेश्वर से पुन पहले शक्ति तात्पर्य शब्द मर्थ सरकार रूप अविद्या ( अज्ञान ) है । सत्, चित् आनन्द है वैभव है जिसके । कहा भी है कि वह परशक्तिस्वरूप a gr का प्राकट्य होता है, शक्ति से नाद का और नाद से बिन्दु का प्राकट्य होता है । ate प्रकार के भेद को प्राप्त होता है । बिन्दु, नाद और बीज ये तीन उसके भेद 1 ' इत्यादि आपका कथन भी aff कर ' शब्द तो इन्द्रियो की तरह टिकते नहीं, इसलिए वे अर्थों से सबंध नही कर सकते ही देती हैं । बाधक ज्ञान के रहते इन्द्रियां मिथ्या-है, क्योकि बाधक ज्ञान की प्रवृत्ति होने पर भी इन्द्रियों ' दो चन्द्रमा है ' ऐसा ज्ञान करा atar का यह कहना भी व्यर्थ है कि शब्द केवल ज्ञान पैदा करा सकती ही नहीं, यह कहना तो अनुभव से सर्वथा विरुद्ध होगा | की असिद्धि के प्रकरण में किया जा चुका है । फिर विकल्पात्मक ज्ञान ( अर्थ से असबद ) के जनक है ', क्योंकि इसका खण्डन विकल्प farer कहते है? जाति आदि का free free ( क्षण ) भी आप नही कर सकते । क्या शब्द सहित ज्ञान के free at सनिहित होने को अपेक्षा के न होने का उद्देश्य जिसमें हो उसे विकल्प कहते हैं? आकार की स्पष्टता को विकल्प कहते हैं? वस्तु के आरोप को? पहला पक्ष इसलिये freer कहते हैं? इन्द्रियो से उत्पन्न न होने को विकल्प कहते हैं? अथवा स्वतन्त्र किसी दूसरे धर्म के या शयहेतुक होने के कारण ठीक नहीं है कि केवल आभास शब्दवाद नही हो सकता । उसे शब्दवान् अपने स्वभाव के कारण कहेंगे का ( प्रकाश और आभास का ) स्वभाव के कारण तो कह नहीं सकते, क्योकि जल और अग्नि की तरह विरुद्ध धमवाले वेतन और अचेतन भी है और जनक एक स्वभाव नही हो सकता, शब्दहेतुक होने से भी क्या वह शब्द मे जन्य है या शब्द का जनक है? अथवा जन्य जन्य है, इसलिए सविकल्पक जायगा । केवल जनक भी? केवल जन्य कहें तो start fr विकल्पक नहीं बनेगा, क्योंकि यह शब्द से सिर पर वह कहें तो प्रकृतिप्रत्यय यादि का प्रत्यक्ष ज्ञान भी afte ल्पक हो जायगा | जन्य - जनक दोनो कहे तो दोनो पक्षों के दोष जायेंगे । विरुद्ध होने के कारण एक ही में दोनो रूप बन भी नहीं सकते । इस प्रकार अनिलाप वाले आभास की कल्पना लक्षण से कोसों हूर है | यदि केवल निश्चय को ही विकल्प कहें तो प्रत्यक्ष ज्ञान भी निश्चय रूप विकल्प से रहित होने के कारण अप्रामाणिक हो जायगा, क्योंकि प्रमाण निश्चय रूप ही होता है, अनिष रूप नहीं । निम्नलिखित अनुमान से भी यही बात सिद्ध होती है - प्रत्यक्ष ज्ञान ( पथ ), अपने अर्थ का निवनय कराने वाला है ( साध्य ), प्रमाण होने से ( हेतु ), अनुमान ज्ञान की तरह ( हात ) । जो स्वयं अनिश्चित स्वरूप है, वह अपने अर्थ
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वार्थपारिजात २६५ स्वार्थनिश्चायकम् प्रमाणत्वादनुमानवत् । यत्स्वयम निश्चितरूपमर्थानिश्चायकश्च तन्न प्रमाणम्, यथा पुरुषान्तरज्ञान सशयादिकञ्च । सशयादे, अन्य प्रति पुरुषान्तरज्ञानस्य च न निश्चायकत्वमस्ति सशयादिव्यवच्छेदलक्षणेन प्रकर्षेण मीयतेऽर्थो येन तस्यैव प्रमाणत्वोपपत्ते । निर्विकल्पकस्य चोक्तलक्षणाभावाद्वयवहारानुपयोगित्वाच्च प्रामाण्यमेव न सम्भवति । ' प्रामाण्यव्यवहारेण ' ( प्र ० वा ० ) इति व्यवहाराङ्गत्वेनैव प्रमाणचिन्ताप्रवृत्ते । न चाविकल्पस्य प्रवृत्त्यादिव्यवहारसाधकत्वम्, स्वार्थानिश्चायकत्वात् । यदुक्तम्- - व्यतिरिक्त विकल्पोत्पादकत्वेनाविकल्पप्रत्यक्षप्रत्ययस्यापि प्रवर्तकत्वमाश्रीयते, तदप्यकिञ्चित्करम्, तस्या-विदितस्वरूपस्य सन्निकर्षादविशेषप्रसङ्गात्, तथात्वे तस्यैव प्रवर्तकत्वापत्तेश्च । न च चेतनाचेतनत्वकृतो विशेष निर्विकल्प-प्रत्यक्षस्यापि चेतनत्वाप्रसिद्धे । परनिरपेक्षतया स्वरूपोपदर्शक हि चेतनमुच्यते । न च स्वप्नेऽपि तत्तथास्वरूपमुपदर्शयति । कथ तर्हि तच्चेतनम्? कथ च तत् सन्निकर्षाद्विशेष्येत? व्यवसायात्मकत्वमनिच्छता निर्व्यापारस्याननुभूयमानस्वरूपस्य नाय सन्निकर्षाद्विशेषता । ननु पश्यामीति विकल्प एव तद्वयापार? तथात्वे व्यवसायात्मकत्वप्रसङ्गात् । न च व्यापारिणो व्यापारी भिन्नोऽभ्युपेयते बौद्ध, तस्य तत्स्वभावत्वात् । यदि तु काय्यत्वात्तद्भिन्नता, तर्हि कथ तद्व्यापार । नहि पुत्र पितुर्व्यापार उच्यते 1 । किञ्च यदि निर्विकल्पकप्रत्यक्षे व्यवसायात्मकता न स्यात्तहि तत्प्रभवे विकल्पेऽपि कुतोऽय स्यात् । स हि बोधरूपतया विलक्षणसामग्रीप्रभवतया वा व्यवसायस्वभावता स्वीकुर्य्यात् । यदि बोधरूपतया तदा प्रत्यक्ष-मपि तत्कुतो न स्वीकुर्य्यात् । यदुक्त बोधाविशेषेऽपि यस्य साक्षादर्थे ग्रहणव्यापारस्तन्न निश्चिनोति } यस्य तु तद्वयापारी-पजीवित्वमसी निश्चिनोतीति! तत्तु असे कोशस्य तीक्ष्णताव्यपदेशमनुहरति । विलक्षणसामग्रीप्रभवत्वञ्चाप्यनयोर्भेदे का भी निश्चय नहीं कराता और वह प्रमाण भी नहीं होता, जैसे दूसरे पुरुष का ज्ञान और सराय आदि । सशय आदि अन्य पुरुष के प्रति freee नहीं कराते और दूसरे पुरुष का ज्ञान भी अपने से भिन्न पुरुष को निश्चय नही कराता । सशय प्रभृति से भिन्न स्वरूप वाले free यात्मक ज्ञान ( कुष्ट ) को करानेवाले को ही प्रमाण कह सकते हैं । निर्दिकल्पक ज्ञान में तो यह लक्षण घटता नहीं । वह व्यवहार मे उपयोगी भी नही है । इसलिए वह प्रमाण भी नहीं हो सकता | आपके ही अनुयायी प्रखर बौद्ध धर्मकीर्ति ने स्वय पहा है कि व्यवहार का ear होने के कारण ही प्रमाण से व्यवहार होता है और इसीलिये प्रमाण के विचार मे प्रवृत्ति होती है । किन्तु निविकल्पक ज्ञान तो प्रवृत्ति आदि व्यवहार का साधक नहीं है, क्योकि वह स्वार्थ का निश्चय ही नहीं कराता । ' अतिरिक्त विकल्प का उत्पादक होने के कारण निर्विकल्पक प्रत्यक्ष ज्ञान भी प्रवृत्ति कराता है ' यह कथन भी गलत है, क्योंकि वैसे ज्ञान का स्वरूप चिदित न होने से वह सनिकष के समान ही है । अत सनिकर्ष के समान निर्विकल्पक ज्ञान को प्रवतक मानें तो afone को हो क्यो न मानें? यह आपत्ति बनी रहेगी । ' दोनो मे चेतनता और अचेतनता के कारण भेद है ' यह कहना भी ठीक नहीं, क्योकि freeeee प्रत्यक्ष ज्ञान की चैतन के रूप मे प्रसिद्धि नहीं है । दूसरे की अपेक्षा न रखकर अपने स्वरूप का दिग्दर्शन कराने वाला ही चेतन कहा जाता है । निर्विकल्पक ज्ञान तो स्वप्न में भी ऐसे स्वरूप को प्रकट नहीं करता, फिर उसे वेतन कैसे कह सकते हैं? और कर्ष से उसकी विशेषता ( द ) भी कैसे सिद्ध की जा सकती है? आप उसे निश्चयात्मक नहीं मानते, अस अनुभव शुन्य स्वरूप वाले सब प्रकार के व्यापार से रहित निर्विकल्पक ज्ञान का सनिकर्ष से भेद सिद्ध हो ही नही सकता । ' देख रहा हूँ ' यह विकल्प हो उसका व्यापार है, यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि फिर तो वह निश्चयात्मक हो जायगा । व्यापारी से मिल व्यापार भी आप ( बीड ) मानते मही, क्योकि आपके मत में व्यापार और व्यापारी दोनों समान स्वभाव के हैं । यदि कार्य होने से उसे सनिकर्ष से भिन्न मानें तो वह उसका व्यापार कैसे हो सकता है? पुत्र को पिता का व्यापार कोई नहीं मानता । फिर यदि निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान निश्चयात्मक नहीं है, तो उससे उत्पन्न होनेवाला सविकल्पक भी निश्चयात्मक कैसे हो जायगा? सविकल्पक ज्ञान को ज्ञानस्वरूप होने के कारण निश्चयात्मक मानोगे? अथवा fre क्षण सामग्री से उत्पन्न होने के कारण? यदि ज्ञान स्वरूप होने के कारण, तो शब्द रूप विकल्प ज्ञान भी प्रत्यक्ष ही हो जायगा । ' दोनो मै ज्ञानता समान होने पर भी जो साक्षात् अर्थ का ज्ञान कराता है, वह निश्चयात्मक नहीं है और जो उसके व्यापार के द्वारा अर्थ का ज्ञान कराता है, वह ात्मक है ' यह आपका उत्तर भी तलवार की स्थान को तीखो बनाने के समान हैं । सविकल्पक ज्ञान विलक्षण सामग्री से होता है, इसलिये निश्वयात्मक है, यह तो सब कहा जा सकता है, जब दोनों का भेद सिद्ध हो जाय, किन्तु निर्विकल्प और सविकल्प का मेव I
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२६६ सिद्धे सिद्धयति, न च विकल्पव्यतिरेकेणाविकल्पस्वरूप स्वप्नेऽपि सिद्धयति । एकमेव हीद स्वार्थव्यवसायात्मकमिन्द्रियसाम-श्रीत समुत्पन्नविज्ञानमनुभूयते । न तत्र स्वरूपभेद सामग्रीभेदो वा कश्चित्कदाचित् कस्यचित्प्रतिभाति सौगतादन्यत्र | किश्व, यद्येव तर्हि बुद्धिचैतन्ययोर्भेद वर्णयन् साख्य कथ प्रतिक्षिप्येत, विकल्पाविकल्पयोरप्रतिपन्नस्वरूपयोरप्यभ्युपगमात् । कथ न तयो-रपि भेदसिद्धि स्यात् तयोरेकत्वेनाध्यवसायात् । भेदाप्रतिपत्तिरुभयोरपि समानैव । उभयोर्भेदेन स्वरूपसवित्तौ सत्यामन्यस्या-न्यत्राध्यारोपात् । एकत्वाध्यवसायोऽपि युक्त, अग्निमाणकवत् । न च तथा विकल्पाविकल्पयो क्वचित्स्वरूपसवित्तिरिति । एकत्वाध्यवसायश्चानयोरन्यतरस्मात् स्वतो वा स्यात्? प्रथमे विकल्पादविकल्पाद्वा? नान्त्य, तस्य परामशशून्य-तया एकत्वाध्यवसायासमर्थत्वात् । न प्रथम, तस्य निर्विकल्पाविषयत्वात् । यद् यद्विषय न भवति न तत्तस्य केनचिदेकताम ध्यवस्यति । यथा घटविषय विज्ञान परमाण्यविषयत्वान्न तस्य घटादिना एकत्वमध्यवस्यति । विकल्पज्ञानस्य निर्विकल्प-विषयत्वे विकल्पस्यापि स्वलक्षणविषयत्व स्यात् । अन्यतश्चेत् पूर्वज्ञानादुत्तरज्ञानादन्वितरूपात् प्रतिपत्तुर्वा तदेकत्वा-ध्यवसाय? न प्रथम, तस्य तत्काले प्रध्वस्तत्वात् । न द्वितीय, तत्काले तयोरभावात् । अत एव तद्वयस्यापि निर्विकल्पस्य सविकल्पस्य वा सतो न तदेकत्वाऽध्यवसाय हेतुत्वमुभयत्रोभय दोषानुषङ्गात् । नाप्यन्वितरूपात् प्रतिपत्तुस्तद् युक्तम्, तस्य सोगते-रनभ्युपगमात् । तत प्रतीतितो वस्तुव्यवस्थामभ्युपगच्छता एकमेवानुभवप्रसिद्धस्वार्थव्यवसायात्मक प्रत्यक्ष प्रत्येतव्यम् । स्वपरपरिच्छिते सकलव्यवहारिणाञ्च तन्मुखापेक्षित्वात् । तस्यैवाविकल्पकमिति नामान्तरकरणे तु नानिष्टम्, सज्ञा-आप स्वप्न में भी सिद्ध नहीं कर सकते, क्योकि इन्द्रिय रूपी सामग्री से उत्पन्न अपने अर्थ का निश्चय कराने वाला एक हो तो ज्ञान अनुभव मे आता है | उसमे आपका अभिमत निर्विकल्प सविकल्प भेद आज तक कभी किसी के अनुभव मे नही आया । केवल बुद्ध के अनुयायियों का यह हठ मात्र है । फिर ज्ञान में ही दो प्रकार के भेद मानने वाले बौद्ध ज्ञान और चैतन्य में भेद मानन वाले साख्यों के ऊपर आक्षेप कैसे कर सकते हैं? माश्चर्य है कि जिनके स्वरूप का ही निश्चय नहीं, ऐसे निर्विकल्प सविकल्प मेद एक ही ज्ञान में बोद्ध मानते हैं और ज्ञान एव are ( front fa स्वरूप अनुभव सिद्ध भिन्न है ) में भेद मानने वाले साल्यो से बेकार असते हैं | दो वस्तुओं के भिन्न स्वरूप का ज्ञान हो पर ही एक वस्तु मे दूसरी वस्तु का आरोप करके उन दोनो वस्तुनो के अभेद का निश्चय करना ठीक हो सकता है, जैसे अग्नि और तेजस्वी बालक इन दोनो का भिन्न स्वरूप जागने वाला ही बालक को अग्नि के समान तेजस्वी देखकर उसे अग्नि ही कह देता है । लोक प्र fef द्ध मे किसी बच्चे को जब लोगियाँ मिरचा कहते हैं, तब यह बात और स्पष्ट हो जाती है । किन्तु इस प्रकार बोद्धो के अभिमत forfenry after ज्ञानो के भिन्न स्वरूप का ज्ञान तो आज तक किसी को हुआ नहीं । frferer और afore पक ज्ञान एक है, ऐसा निश्चय भी एक का दूसरे के द्वारा होगा या अपने आप ही? यदि दूसरे के द्वारा तो निर्विकल्प के द्वारा सविकल्प के अभेद का निश्चय होगा या सविकल्प के द्वारा निर्विकल्प का? यदि निर्विकल्प से सविकल्प के अभेद का निश्चय होगा, ऐसा कहो तो यह सवथा असभव है, क्योकि निर्विकल्प ज्ञान तो परामर्श से शुन्य होने के कारण दूसरे के साथ ara का ज्ञान करा देने में सर्वेधा असमर्थ हैं । यदि सविकल्प से कहो तो वह सविकल्पक है, इसलिए विकर से रहित को अपना विषय बना ही नहीं सकता | तब उसके अभेद का निश्चय कैसे करा सकता है? जिसका जो विषय ही नहीं है, वह उससे भेद का farar कैसे कर सकता है? जैसे घटविषयक विज्ञान परमाशु विषयक न होने से परमाणु के साथ एकता को निश्चय नहीं कराता । सविकल्प ज्ञान hi frfareer free मानने पर तो सविकल्प भी निर्विकल्प ज्ञानो की तरह स्वलक्षण विषयक ही हो जायेंगे । यदि अन्य के द्वारा मद निश्चय मानें तो उत्तर ज्ञान से सबद्ध पूर्व ज्ञान से उत्तर ज्ञान का अभेद मानेंगे? अथवा ज्ञान के कर्ता से उसका अभेद मानेंगे? उत्तर ज्ञान से अम्बित ( सबद्ध ) पूर्व ज्ञान से नहीं मान सकते, क्योंकि उत्तर ज्ञान के समय पूर्व ज्ञान नष्ट हो गया । यदि ज्ञाता से अद मानेंगे तो उस समय दोनो ज्ञान है नहीं, इसलिए निर्विकल्प सविकल्प दोनो के हो न रहने से उनके एकत्व का निश्चय कैसे हो सकता है? ऐसे ही दोनो का अमेद निश्चय दोनों के द्वारा भी हो नही सकता, क्योकि दोनो एक साथ नहीं रहेंगे । सबद्ध ज्ञाता के द्वारा भी अमेद का निश्चय नहीं हो सकता, क्योंकि बौद्धों के मत में वह है ही नहीं । इसलिए अनुभव बताता है कि एक ही प्रसिद्ध अपने अर्थ का निश्चय कराने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान मानना चाहिये, क्योकि अनुभव से ही वस्तु की व्यवस्था सर्वसमत है । सब कोगों के व्यवहार इसी के मुख
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वेदाथपारिजातः २६७ भेदस्यार्थाप्रसाधकत्वात् । नापि जात्याद्युल्लेख कल्पना, जात्यादीना विशेषणविशेष्यभूताना व्यावहारिकप्रमाणसता व्यामोहविच्छेदेनाध्यवसायात् कल्पनात्वानुपपत्ते । यदुक्तम् -- यद् यदर्थसाक्षात्करणाय प्रवृत्त ज्ञान तत्स्वरूपव्यतिरिक्तविशेषणविशेष्याकारतत्सयोजनास्वभाव-कल्पनाकार न भवति, यथा रूपाद्याकारप्रवृत्तचक्षुरादिज्ञानमविषयीकृतगन्धादिविशेषणयोजनाकार न भवति तथा च सर्वं स्वविषयप्रवृत्त ज्ञानमिति, तदपि तुच्छम्, विशेषणविशेष्याकारस्यानिरूपणात् । प्रतिबिम्बमुल्लेखो वा स? प्रतिबिम्ब-श्वेत्तन्निषेधस्य सिद्धसाध्यत्वात् ज्ञाने प्रतिबिम्बप्रतिषेधस्येष्टत्वात्, सकलज्ञानाना स्वतो निराकारत्वाभ्युपगमात् । अथोल्लेख, न तत्प्रतिषेधो युक्त 1 प्रमाणस्य यथावस्थितस्वरूपद्योतकत्वात् । तत्स्वरूपश्च जात्यादिविशिष्ट शुक्ल चरति इत्यादिप्रत्ययात्प्रसिद्ध-मेव । न खलु प्रतीयमानस्यापलापो युक्त, सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गात् । अथ अस्पष्टाकारता विकल्पस्वरूपम्, तच्चास्य विकल्पत्वा-देव सिद्धयति । यत्सविकल्प ज्ञान तत् स्पष्ट यथानुमान तथा चेद विवादापन्न ज्ञानम्, तदेतदपि न युक्तम्, निर्विकल्पकत्व -सविकल्पकत्वाभ्या ज्ञानाना स्पष्टत्वास्पष्टत्वयोरसिद्धे । स्वसामग्रीविशेषादेव तेषा तत्प्रसिद्धे । अन्यथा प्रत्ययत्वात् प्रत्यक्षमपि कथ नानुमानवदस्पष्ट न स्यात् । स्पष्टाकारत्वेन सविकल्पत्व तत्त्वेन च स्पष्टाकारत्वमित्यन्योऽन्याश्रयत्वाच्च । किञ्चा-स्पष्टता विशेषणविशिष्टार्थग्राहित्वादेव एकत्वपरामशित्वाद्वा परोक्षाकारोल्लेखित्वाद्वा? नाद्यी, वस्तुरूपस्यास्पष्टत्वा-हेतुत्वात् । वस्तुस्वरूप विशेषणविशिष्टत्वादिकमिति तन्नास्पष्टत्वहेतु । नान्त्य, परोक्षाकारोल्लेखित्वस्य तद्धेतुत्वेऽप्य-परोक्षेऽर्थे तदनुपपत्ते । नाप्यर्थसनिधिनिरपेक्षता विकल्प पुरोवर्तिन्यर्थे सत्येवेदन्तया प्रत्यक्षस्य प्रवृत्ते । यदि सनिहितार्थ -है | अपना और दसरे का निश्चय भी इसी से होता है | यदि आप इसी का पर्यायवाचक निर्विकल्पक नाम रख दें तो कोई हानि नही, afe व नाम का भेद, अर्थात् एक ही वस्तु के अनेक नाम होना वस्तु रूप अथ का साधक नहीं है । जाति नादि के उल्लेख को भी कल्पना नहीं माना जा सकता, क्योकि जाति आदि मे तो व्यावहारिक प्रमाण विद्यमान है और वे ही विशेष्यभूत है और उनके द्वारा ही व्यामोह का विच्छेद ( नाश = समाप्ति ) होता है, इसलिये वे freet त्मक है, फिर वे कल्पना कैसे हो सकते हैं? ' जो ज्ञान जिस अर्थ के साक्षात्कार के लिये प्रवृत है, वह अपने स्वरूप ज्ञान से भिन्न विशेषण- विशेष्य आकार वाला और विशेषण एवं विशेष्यों को जोडने के स्वभाववाली कल्पना रूप ब्राकार वाला नहीं होता । जैसे रूप आदि आकार मे चक्षु आदि से होने वाला ज्ञान गन्ध, स्पर्श आदि ज्ञानविषयक नहीं होता, अर्थात् गन्धादि विशेषणो के साथ सबद्ध नाकारवाला नहीं होता । इस नियम से सभी ज्ञान पहले frfan ल्प केवल ज्ञानमात्र स्वविषयक होते हैं । ' आपका यह पूरा कथन निसार है, क्योकि नि free पक ज्ञान arat विशेषण और विशेष्य के आकार का निरूपण कर ही नही सकता । क्या प्रतिबिम्ब विशेषणविशेष्य का आधार हे? या उल्लेख? यदि प्रतिबिम्ब हो तो उसका निषेध स्वत सिद्ध है । फिर उसे साध्य बनाकर सिद्ध करने की क्या आवश्यकता है? ज्ञान मे प्रतिविम्व का निषेध तो आप को भी इष्ट है, क्योंकि आपके मत में ज्ञान को निराकार माना गया है । यदि उल्लेख विशेषण और विशेष्य का नाकार, तो Sent निषेध करना अनुचित है, क्योकि प्रमाण वस्तु के वास्तविक स्वरूप का द्योतक होता है और ससार की सभी वस्तुओं का स्वरूप व्यावहारिक जाति, गुण आदि से विशिष्ट ही हैं ' शुक्ल गुण वाला व्यक्ति चल रहा है ' इत्यादि वाक्यों से मनुष्य, पशु आदि जाति विशिष्ट और शुक्ल आदि गुण विशिष्ट व्यक्ति के चलने, चरने आदि का ज्ञान होता है, यह बात जगत् में प्रसिद्ध है | जिसका अनुभव हो रहा है, उसका सर्वेचा अपलाप करना क्या ठीक है? ऐसा होने पर तो ससार में सभी जगह अविश्वास होने लगेगा | वह अनर्थ का कारण होगा | अब यदि स्पष्ट आकार होना ही विकल्प का स्वरूप कहो, सो तो इसके विकल्प रूप होने से हो स्वत सिद्ध है । ' जो विकल्प ज्ञान होता है वह स्पष्ट होता है, जैसे अनुमान, विवाद का विषय विकल्प ज्ञान भी वैसा ही है ' यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि केवल after और frfree होने मात्र से ज्ञान की स्पष्टता या अस्पष्टता नहीं सिद्ध होती, प्रत्युत स्पष्टता अस्पष्टता तो ज्ञान की सामग्री विशेष से सिद्ध होती है | ज्ञान को स्वरूप से ही स्पष्ट या अस्पष्ट माने तो प्रत्यक्ष को भी अनुमान की तरह अस्पष्ट क्यो न मान है? फिर स्पष्टाकार होने से सविकल्प और ' सविकल्प होने से स्पष्टाकार, यह अन्योन्याश्रय at ष भी इस पक्ष में है ।
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२६८ वेदाथपारिजात. तया प्रत्यक्षता, तदा कस्यापि प्रत्यक्षत्वानुपपत्ते । नाप्यनक्षप्रभवत्व विकल्पलक्षणम्, अक्षान्वयव्यतिरेकान्वयानुविधायित्वेन सविकल्पस्यैवाक्ष प्रभवत्वात् । अर्थसाक्षात्कारिणश्चाक्षप्रभवत्व भवति । न चाविकल्पस्यार्थसाक्षात्कारित्वम्, खपुष्पवत्तस्य स्वरूपेणाप्यप्रसिद्धत्वात् । नापि धर्मान्तरारोपो विकल्प इ विकल्पानुपपत्ते । विकल्पे निर्विकल्पस्य धर्म आरोप्यते, अन्यस्य वा? आधे तस्य को धर्म? वैशद्यश्चेत्, तस्य तद्धर्माधारतयाप्यसिद्धे । नहि वन्ध्यापुत्रस्य वैशद्य कचिदारोप्यते । अक्षव्यापार-प्रभव वैशद्य तु व्यवसायात्मके सविकल्पे प्रत्यक्षे युक्तमेव । नान्यस्य धर्मारोपोऽप्रसक्तत्वात् । नहि सवत्र विकल्प परोक्ष एवार्थे प्रवतते, वतमाने पुरोवर्तिन्यर्थे स्पष्टाका रोल्लेखमुखेन तत्प्रवृत्तिप्रतीते । नाप्यर्थसन्निधिनिरपेक्षता तल्लक्षणम्, पुरोवर्तिन्यर्थे सत्येवास्येदन्तया प्रवृत्ते । नहीदृशो विकल्पोऽसन्निहितेऽर्थे सभवति । यद्येव सन्निहितार्थंलक्षणत्वेऽप्यप्रत्यक्षता स्यात्ततो न किञ्चिदपि प्रत्यक्ष स्यात् । नाप्यनक्षप्रभवत्व तत्, अक्षान्वयव्यति-रेकानुविधायित्वात्, अक्षप्रभवत्वस्यैवाश्रावसायात् । नहि निर्विकल्पमक्षव्यापारानन्तरमनुभूयते । अर्थसाक्षात्कारिणश्चा-स्याक्षप्रभवत्व भवति । न चाविकल्पस्यार्थसाक्षात्कारित्व सभवति, स्वरूपेणाप्यस्याप्रसिद्धत्वात् । यत्स्वरूपेणाप्रसिद्ध न तद् अर्थसाक्षात्कारि, यथा वन्ध्यासुतज्ञानम्, तथा चेदमविकल्पकत्वाभिमत विज्ञानम् । धर्मान्तरारोपोऽपि न तल्लक्षणम्, ज्ञान की अस्पष्टता विशेषण से विशिष्ट अर्थ का ज्ञान कराने के कारण मानोगे या एकत्व के परामर्शी होने के कारण? अथवा परोक्ष आकार का उल्लेख्य करने वाला होने के कारण? पहले दो पक्ष इसलिये ठीक नहीं है कि वस्तु का रूप अस्पष्टता का कारण वहीं होता, क्योकि वस्तु का स्वरूप विशेषण से विशिष्ट ही होता है, फिर वह अस्पष्टता का कारण कैसे हो सकता है? वह तो स्पष्टता का ही कारण होता है । परोक्ष आकार का उल्लेख करने वाला होने से भी ( अन्तिम तीसरा पक्ष ) स्पष्टता का हेतु नही हो सकता । परोक्ष आकार का उल्लेख करने वाला यदि हो, तो वैसा मान भी सकते हैं, किन्तु यह तो प्रत्यक्ष ज्ञान है । इसमें परोक्ष आकार के उल्लेख का प्रश्न ही कैसा? वस्तुरूप अर्थ के सानिध्य की अपेक्षा न रखने को भी विकल्प नही कह सकते, क्योकि सामने दिखाई देने वाले वस्तुरूप अथ के होने पर ही ' यह घटा है ' इस रूप में प्रत्यक्ष ज्ञान की प्रवृत्ति होती है । यदि वस्तुरूप अर्थ की सनिधि को ही अप्रत्यक्ष कहे तो ससार में कोई भी ज्ञान प्रत्यक्ष न हो सकेगा । इन्द्रिय से उत्पन्न न होना विकल्प का लक्षण नहीं बन सकता, क्योकि सविकल्पक ज्ञान इन्द्रियो के सबद्ध से होता है और सबद्ध न होने से नहीं होता । इस लिये वह तो इन्द्रियजन्य ही हैं । अर्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान कराने वाला होने से यह सविकल्प ज्ञान तो इन्द्रियों से ही पैदा होता है । निर्विकल्पक, स्वलक्षण केवल ज्ञान को विषय करने वाला बोडो का अभिमत ज्ञान तो अथ ( वस्तु ) का प्रत्यक्ष कराने वाला हो ही नहीं सकता, क्योंकि आकाश के पुष्प की तरह उसका स्वरूप ही अभी तक नहीं सिद्ध हुआ । धर्मान्तर के आरोप को भी विकल्प नही कर सकते, क्योंकि विकल्प मे नि faner के धर्म का आरोप करोगे या निर्विकल्प farmer के? प्रथम पक्ष में उसके किस धर्म का आरोप करोगे? यदि स्पष्टता का, तो वह धर्म का माधार है, यह बात प्रसिद्ध नहीं है । क्या कोई वन्ध्यापुत्र की स्पष्टता का कहीं आरोप करता है? इन्द्रियो के व्यापार के होने वाली स्पष्टत r at निश्चयात्मक, सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान में युक्तिसंगत ही है । अन्य के धम का आरोप बन ही नही सकता, क्योकि उसका कोई प्रसग ही नहीं । free प की सदा परोक्ष विषय में ही प्रवृत्ति हो, ऐसी बात नहीं है, क्योकि वर्तमान काल मे सामने रखी वस्तु में उसके बाकार को स्पष्ट करते हुए विकल्प की प्रवृत्ति देखी जाती है । उसका लक्षण अवसनिधि से निरपेक्षता भी नहीं होगा, क्योंकि सामने वस्तु के विद्यमान रहने पर हो इसकी ददन्तया प्रवृत्ति देखी जाती है । इस तरह का free वस्तु के असनिहित रहने पर नहीं होता । यदि वस्तु के सनिहित रहने पर भी उसका प्रत्यक्ष न हो तो फिर कोई भी वस्तु प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय होगी ही नहीं । विकल्प की उत्पत्ति इन्द्रियों से नहीं होती, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसका इन्द्रियो के साथ ही अन्वय और व्यतिरेक हैं, अर्थात् इन्द्रियों के रहने पर ही उसकी उत्पत्ति होती है और उनके न रहने पर नहीं होती । अत अन्त में यही मानना पडता है कि विकल्प इन्द्रियो से ही उत्पन्न होता है । इन्द्रियों के व्यापार के प्रारम्भ होने के बाद निर्विकल्प की अनुभूति नहीं होती । अर्थ का साक्षात्कार करने वाला विकल्प इन्द्रियो से ही उत्पन्न होता है । निर्विकल्प प्रत्यय अर्थ का साक्षात्कार नहीं कर सकता, क्योकि वह स्वयं स्वरूप से प्रसिद्ध है । जो स्वरूप से असिद्ध होता है वह अर्थ ( विषय ) का साक्षात्कारी नहीं होता, जैसे कि वन्ध्या के पुत्र का ज्ञान ] यह निर्विकल्पक ज्ञान भी उसी तरह का है । धर्मान्तर का आरोप भी विकल्प का लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि यह
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वेदाथपारिजात २६६ तदनिरूपणात् । विकल्पे कस्य धर्मान्तरमारोप्यते? निर्विकल्पस्य चेत्, कि तत्? वैशद्यञ्चेत् वन्ध्यासुतसम्बन्धि तत् तत्रा-रोप्यते इत्यपि किं न स्यात्? तस्य तद्धर्माधारतयाऽप्रसिद्धे कथ तत् तत्रारोप्यते? न खलु बन्ध्यासुतवदेव निर्विकल्प -मप्यनन्यमनसो विस्फारिताक्षस्य तद्धर्माधारतया कदाचिदपि प्रसिद्धम् | अक्षव्यापारप्रभव वैशद्याध्यासित स्वार्थसाक्षात्कारि व्यवसायात्मक प्रत्यक्षम् । यथा च विद्यमानभ्रात्रो सम्बन्ध सकेतेन बोध्यते, तथैवौत्पत्तिक एव सम्बन्ध सकेतेन बोध्यते । किच, सर्वे शब्दा यद्यपि सर्वाथवाचका, तथापि योगिनामेव तदवगतिरन्येषा तु सकेतेनैव तद्बोध । देशभेदेन व्यवस्थापि सकेतभेदवशादेव । ईश्वरस्यान्यस्य वा सकेतकरणायापि केचित्प्रतिपन्नसम्बन्धा शब्दा अभ्युपेया । न च हस्तचेष्टादिभि-स्तद्बोधसभव, शब्दार्थानामानन्त्यात्, हस्तादिचेष्टाना चात्यन्तपरिमितत्वात् । ईश्वरेणाऽपि सम्बन्ध कुर्वताऽवश्य केनचिच्छन्देन सम्बन्ध कर्तव्य । तस्य केन कृत? शब्दान्तरेण चेत्? तस्यापि केन कृतस्तस्यापि केनेति न कश्चिदवधि । तस्मादवश्य सम्बन्ध कुर्वता व्यवहारसिद्धा केचिदकृतसम्बन्धा शब्दा अभ्युपगन्तव्या । ईश्वरे नाय दोषस्तत्कौशलस्य विकल्पानास्पदत्वादित्याद्युक्तिस्त्वन्यत्र निराकृतेव । धूमो यथा विदित एव वह्निबोधयति तथैव विदितसम्बन्ध एव शब्दोऽर्थं बोधयतीत्याद्युक्तमेव । अत एव सकेतो व्यक्त एव सबन्द्धाऽर्थप्रकाशक । यदुक्तम् — ' कथमेकस्य नित्येकरूपता, व्यक्ताव्यक्तरूपतया भेदप्रसङ्गात् । नित्यैकरूप वस्तु यदि व्यत तदा सर्वदा व्यक्तमेव स्यात् ' इति, तदपि फल्गु, धूमस्य ज्ञातत्वाज्ञातत्वाभ्या प्रकाशकत्वाप्रकाशकत्वयो धर्मान्तर आरोप क्या है, इसको समझाया नहीं जा सकता । यदि यह कहा जाय कि विकल्प मे निर्विकल्पक के भ्रम का आरोप किया जाता है, तो आप बताइये कि वह बम क्या है? यदि आप कहे कि यह धम वैशद्य है, तो वन्ध्यासुत सम्बन्धी धर्म के वैशद्य का आरोप वहीं किया जाता है, ऐसा भी क्यो न मान लिया जाय । यह विकल्प निर्विकल्पक धर्मों के आधार के रूप मे प्रसिद्ध नहीं है, तो ये धर्मं उसमे कैसे आरोपित किये जा सकते हैं । क्योकि वन्ध्यासुत के समान ही निर्विकल्पक भी एकाग्रचित्त खुली आखो वाले व्यक्ति को कभी दिखाई नहीं देता । इन्द्रियों के व्यापार से उत्पन्न होने वाला, स्पष्ट भासित होने वाला, अपने विषय का साक्षात्कार कराने वाला, ree ि यात्मक ज्ञान ही प्रत्यक्ष कहलाता है । जैसे कि सामने खड़े दो भाइयों का परस्पर सम्बन्ध सकेत से जाना जाता है, उसी तरह से शब्द और अर्थ का स्वाभादिक सम्बन्ध भी सकेत से ही ज्ञात होता है । यद्यपि सभी शब्द सभी अर्थों के वाचक हैं, तो भी योगियों को ही उनकी अवगति ( ज्ञान ) होती है । अन्य व्यक्तियों को तो संकेत से ही उसका बोध होता है । देश के भेद से शब्दो के अर्थ के भेद की व्यवस्था भी सकेत के भेद के कारण ही होती है । सकेत का निर्देश करने वाला ईश्वर हो या कोई दूसरा, इसके लिये भी ऐसे शब्दों को स्वीकार करना ही पड़ेगा, जिनका कि सम्बन्ध पहले से ज्ञात हो । हस्त चेष्टा आदि से इसका ज्ञान नहीं हो सकता, क्योकि शब्द और अर्थ तो मन्त है तथा हस्त चेष्टा प्रभृति के संकेत अत्यन्त सीमित हैं । ईश्वर भी जब सकेत का निर्देश करते हैं तो उनको भी किसी न किसी शब्द का सहारा लेना ही पड़ेगा । इस शब्द का सकेत किसने किया? यदि शब्दान्तर से यह किया गया है उस शब्दान्तर का संकेत भी किसने किया और उस बाद वाले का संकेत भी किसने किया? इस तरह से इस प्रश्न परम्परा का कहीं विराम नही होगा । इसलिये जो भी सकेत का निर्देश करेगा, उसको व्यवहार सिद्ध कुछ अकृतसम्बन्ध नित्य शब्दों को अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा । ईश्वर में यह दोष नहीं हैं, क्योकि उसको कुशलता विकल्प व्यापार से निमुक्त है, इस तरह की उक्तियो का खण्डन अन्यत्र कर दिया गया है । धूम जैसे विदित होकर ही वह्नि का ज्ञान कराता है, उसी तरह से विदित सम्बन्ध शब्द ही अर्थ का प्रतिपादक होता है, यह बात भी बताई जा चुकी है । इसीलिये सकेत में अभिव्यक्त सम्बन्ध हो अर्थ का प्रकाशक होता है । यह जो कहा गया है कि - ' एक वस्तु कैसे सदा एक रूप हो सकती है? कभी व्यक्त रहती है कभी अव्यक्त, इस तरह से उसमें एकरूपता नही रह पाती । सदा एकरूप वस्तु यदि व्यक्त है तो उसको सदा व्यक्त रहना चाहिये ', यह कथन भी नि सार है, क्योंकि धूम जैसे ज्ञात अथवा अज्ञात होकर यद्यपि वह्नि
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२७० बेदाथपारिजात सतोरपि स्वरूपभेदाभाववदिहापि तत्सभवात् । यदुक्तम्- - सकेत पुरुषाश्रय, स च अतीन्द्रियज्ञानविकलतया अन्यथाऽपि वेदे सकेत कुर्यादिति, तन्न, पारम्यर्य्यादिना सम्बन्धबोधस्योक्तत्वात् । यदेकोऽन्यस्मै प्रतिपन्नसकेताय प्रतिपादयति --- गामभ्याज शुक्ला दण्डेनेति, तदा पार्श्वस्थोऽन्योऽव्युत्पन्नसकेत शब्दार्थो प्रत्यक्षेण प्रतिपद्यते श्रोतुश्च तद्विषयचेष्टोपलम्भादनुमानतो गवादिविषया प्रतिपत्ति पद्यते, तत्प्रतिपत्त्यन्यथानुपपत्त्या शब्दस्य तत्र वाचिका शक्ति परिकल्पयति । एव वृद्ध-व्यवहारैरातोपदेशैर्व्याकरणोपमानादिभिश्च तत्प्रबोध सभवति । यद्ययुक्त जैनैनित्यसम्बन्धवशात् शब्द एकार्थनियत, अनेकार्थनियतो वा? प्रथमेऽपि एकदेशेन सर्वात्मना वा? सर्वात्मनेकार्थंनियमेऽर्थान्तरे वेदात्प्रतिपत्तिर्न स्यात् ततश्चास्याज्ञानलक्षणमप्रामाण्यम् । चौरशब्दो वा नित्यसम्बन्धात् तस्करे रूढ कथ दाक्षिणात्यै ओदने प्रयुज्यते । अथैकदेशेनासौ तन्नियत, स किमेकदेश अभिमतैकार्थनियत, अनभिमतैकायनियत? अन्ते मिथ्यात्वलक्षण वेदस्याप्रामाण्य भवेत् । अथाभिमतैकार्थनियत, सोऽपि किं पुरुषात् स्वभावाद्वा? प्रथमपक्षेऽपौरुषेयत्व-समर्थने प्रयासो व्यर्थ । पुरुषो हि रागाद्यन्धत्वात् प्रतिक्षिप्यते । तस्माच्चेद् वेदैकदेशेऽर्थनियम प्रतिपद्येत, किमपौरुषेयत्वेन? स्वाभिमतेकार्थनियमे तु भावनाभेदानुपपत्ति । अनेकार्थनियतत्वे तु वेदस्य सकलार्थसाधारणार्थत्वात् कथमिष्टव्यक्तावेव समय कार समय कुर्यात् । यदपि चोक्त सोग.... ' अर्थोऽय नायमर्थो न इति शब्दा वदन्ति न । कल्प्योऽयमर्थ पुरुषस्ते च रागादिसयुता ॥ स एकतत्त्वविनान्य इति भेदश्च किं कृत । तद्वत् पुस्त्वे कथमपि ज्ञानी कश्चित् कथ न व ॥ ' ( प्र ० बा ० ३ | ३१४ १५ ) । न का प्रकाशक अथवा अप्रकाशक होता है, तो भी उसके स्वरूप में कोई भेद नहीं पड़ता, उसी तरह से यहाँ पर भी समझना चाहिये । यह जो कहा गया है कि ' aha goat त्रित है । यह पुरुषाश्रित संकेत अतीन्द्रिय ज्ञान से रहित हैं, अतः वेद मे अन्यथा भी सकेत कर सकता है ' यह भी गलत है, क्योकि यह बताया जा चुका है कि सम्बन्ध का बोध परम्परा प्रभृति से होता है । जब एक व्यक्ति प्रतिपन्न संकेत बाले दूसरे व्यक्ति को कहता है कि ' सफेद गाय को डण्डे से हाँक कर ले आओ ' उस समय पास में खड़ा व्युत्पन्न संकेत वाला दूसरा व्यक्ति शब्द और अर्थ की प्रत्यक्षत प्रतीति करता है और श्रोता को उसकी चेष्टाओ को देखकर अनुमान के द्वारा गवादि विषयिणी प्रतीति होती है । यह प्रतीति शब्द के बिना नहीं होती, अत, उसी से शब्द मे वाचिका शक्ति परिकल्पित होती हैं । इस प्रकार वृद्ध व्यवहार, मास उपदेश, व्याकरण और उपमान प्रभृति से उसका ज्ञान होता है । इस पर जैन दार्शनिक का उठाते हैं कि आपके कथनानुसार जब शब्द का अर्थ के साथ नित्य सम्बन्ध है, तो उसक कारण शब्द एक अर्थ के साथ अपना नियत सम्बन्ध रखता है या अनेक अर्थों के साथ? जब वह एक अर्थ के साथ नियत माना आता है तो उस पक्ष में भी वह एकदेशेन उससे सम्बद्ध रहता है या सर्वात्मना? यदि यह सर्वात्मना एक अर्थ के साथ नियमतः सम्बद्ध रहता तो अर्थान्तर की प्रतिपत्ति वेद से न हो सकेगी । इस तरह से यहां पर अज्ञानलक्षण अप्रामाण्य दोष उठ खडा होगा | फिर शब्द जब अपने सम्बन्ध की नित्यता के आधार पर तस्कर अर्थ मे रूढ है तो उसी शब्द को दाक्षिणात्य जन जोवन के अर्थ मे कैसे प्रयुक्त कर सकते हैं? अब यदि यह माना जाय कि वैदिक शब्द एक देश से एक अर्थ के साथ नियत सम्बन्ध रखता है, तो इस पक्ष मे भी यह विक er उठता है कि वह एक देश अभिमत एक अर्थ से नियत सम्बन्ध रखता है या अनभिमत? यदि वह अभिमत अर्थ से सम्बन्ध रखता है तो वेद मे ा के आधार पर अप्रामाण्य दोष की आपत्ति आवेगी । अव यदि यह माना जाय कि वह अभिमत एक अथ के साथ नियत सम्बन्ध रखता है, तो यहाँ पर भी बताना पड़ेगा कि ऐसा वक्ता पुरुष के कारण होता है या यह शब्द का स्वभाव ही है? पुरुष के कारण ऐसा मानने पर उसकी अपौरुषेयता को सिद्ध करने का सारा प्रयास व्यर्थ हो जायगा । पुरुष राग से अन्या हो जाता है, अतः उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता । उस पुरुष से यदि वेद के एकदेश में अथ का नियम जाना जाता है, तो फिर अपौरुषेयता कहाँ रह गई? स्वाभिमत के साथ नियत सम्बन्ध मानने पर भावना भेद की उपपत्ति न हो सकेगी । यदि इसका अनेक अर्थों से दियत सम्बन्ध माने तो वेद का सकल अर्थों के साथ साधारण सम्बन्ध होते से दृष्ट अर्थ की अभिव्यक्ति ही किस प्रकार सकेसकर्ता के सकेत के अनुसार हो सकेगी? इसी तरह बौद्ध दार्शनिक भी कहते हैं कि हमारा यह अर्थ है, यह अर्थ नहीं है, इस तरह से शब्द स्वय नहीं बोलते । पुरुष की कल्पना करता है और यह रागादि से अवलिप्त रहता है । इन पुरुषो मे जैमिनि जैसा कोई एक ही तत्वविद है और अन्य