वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 301–310

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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datefore २७१ वैदिकाशब्दा - ' एत भवन्तो ब्राह्मणा अस्माकमयमर्थो ग्राह्यो नान्य ' इत्येव क्रोशन्ति 1 । अनभिव्यक्तार्थविशेषसर्गा एव श्रुतिपथमापतन्ति । तत्र कश्चिदेकमन्योऽपरमर्थं कल्पयति । न च कश्चित् शब्दस्वभाव प्रतिनियत, येनैकार्थानुक्रिया नाप-रस्य, किन्तु समयवशात् त तमाविशन्तो दृश्यन्ते । यत्तु कुतश्चन बुद्धीन्द्रियाभ्यासानामतिशयाद् जैमिन्यादिरेव वेत्ति नापर, तस्य कुतोऽयमतिशय? तथान्योऽपि देशकालस्वभावविप्रकृष्टानामर्थाना द्रष्टापि नासभवी, यतो नहि तत्प्रतिज्ञेयसाधनानि यानि जैमिन्यादिक न विषयीकुर्वन्ति । सभवेऽपि यथायमस्य विशेष, तथान्यस्यापि स्यादित्यनभिनिवेश एव युक्त । ' यस्य प्रमाणसवादि वचन सोऽथविद्यदि । नह्यत्यन्तपरोक्षेषु प्रमाणस्यास्ति सभव ॥ ' ( ३।३१६ ) । तथा सति प्रमाणान्तराप्रवृत्ता-थागमात् केवलादप्रतिपत्तिरेव स्यात् । यद्यागमप्रवृत्ति प्रत्यक्षादिकमपेक्षते, तदाऽतीन्द्रियेषु स्वर्गाद्यर्थेषु नागमप्रवृत्ति स्यात् । ' यस्य प्रमाणवादिवचन तत्कृत वच । स आगम इति प्राप्त निरर्थाऽपौरुषेयता || ' ( ३।३१७ ) | यद्यत्यन्तपरोक्षेऽर्थेऽनागम-ज्ञानसभव | अतीन्द्रियार्थवित् कश्चिदस्तीत्यभिमत भवेत् ॥ ' ( ३३३१ ९ ) । यदि परोक्षेऽर्थे आगमानपेक्ष ज्ञानयाथातथ्यमिष्यते, तदा पुरुषा सन्त्यतीन्द्रियदृश इतीष्ट स्यात् । प्रत्यक्षेणातीन्द्रियस्यादर्शने प्रत्यक्षाप्रवृत्ते कारणात् प्रत्यक्षपूर्वकाणामनुमानादीना-मध्यतीन्द्रियेष्वप्रवृत्तिरेव । ' स्वयं रागादिमानार्थं वेत्ति वेदस्य नान्यत । न वेदयति वेदोऽपि वेदार्थस्य कुतो गति ॥ ' ( ३।३१ ९ ) । तदयमपरिज्ञातार्थं शब्दगडुरेव शल्यभूतोऽसदृश रशनायूपनिबद्धो दुरुद्धर दुखमासादयति । ' तेनाग्निहोत्र जुहुयात् स्वर्गकाम इति श्रुतौ । खादेच्छ्वमासमित्येष नार्थं इत्यत्र का प्रमा ' || ( ३३२० ) । कचिदप्यर्थे प्रत्यासत्तिरहितस्याग्नौ घृतादि-क्षेपादन्योऽप्यर्थो न भवेदित्यत्र का प्रभा । पुरुष नहीं, ऐसी भेदबुद्धि का क्या आधार माना जा सकता है? जैमिनि के समान ही अन्य दार्शनिक आचार्यों में भी पुस्त्व के समान रूप से रहते हुए वे ज्ञानी क्यो नही माने जा सकते? वैदिक ब्राह्मणों के इस कथन को कोई नहीं सुनता कि इसको इस शब्द का यही अर्थ मानना चाहिये, दूसरा नही । किसी अर्थ विशेष की अभिव्यक्ति के बिना ही शब्द सुनाई पड़ते हैं । उस दशा मे कोई एक अथ की कल्पना करता है, दूसरा दूसरे अथ को । शब्द स्वभावत किसी अथ से सम्बद्ध नहीं रहता, जिससे कि एक अथ का बोध हो, दूसरे का नहीं । किन्तु सकेत के अनुसार उस उस अथ का बोध कराता है । आप कहते हैं बुद्धि और इन्द्रियो के अतिशय अभ्यास के कारण परिशुद्ध स्वभाव जैमिनि प्रभात ही इसको जान सकते हैं, दूसरे नही? तो इस पर हम पूछते हैं कि उसमे यह अतिशय ( विशेषता ) कहाँ से आता है? उन्ही की पद्धति से अन्य व्यक्ति भी देश, काल और स्वभाव आदि से विप्रकृष्ट अर्थ के द्रष्टा नहीं हो सकेंगे, ऐसा कैसे कहा जा सकता है? अन्य दार्शनिकों के द्वारा परिदृष्ट ऐस अनेक विषय है, जिनका कि ज्ञान जैमिनि को नहीं है । यदि थोडी देर के लिये यह मान भो लिया जाय कि जैमिनि को इनका भी ज्ञान था तो उन्ही की तरह दूसरे को भी इन सब का ज्ञान हो सकता है, यही मानना उचित | यदि आप यह कहे कि जिसका वचन अन्य प्रमाणो से पुष्ट होता हो वही तत्त्वविद् माना जा सकता है तो आप यह बताइये कि अत्यन्त परोक्ष अथ मे प्रमाण की प्रवृत्ति कैसे समय हो सकती है? ऐसे परोक्ष विधयों से जब प्रमाणान्तर की प्रवृत्ति नहीं होगी तो आगम ( शास्त्र ) से भी उनका ज्ञान नहीं ही हो सकता । यदि आगम की प्रवृत्ति प्रत्यक्षादि प्रमाणो की अपेक्षा रखती है, तो इस अवस्था मे अतीन्द्रिय स्वर्गादि अर्थों में आगम की प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । इस तरह से अन्त में यही मानना पड़ेगा कि जिस व्यक्ति का वचन मन्य प्रमाणो से सपुष्ट हो जाता है, उस व्यक्ति के उपदेश को ही भागम कहते हैं । इस दशा मे अपौरुषेयता व्यर्थ हो जाती है । यदि अत्यन्त परोक्ष artific as free में जैमिनि प्रभृति को मागम निरपेक्ष यथार्थ ज्ञान हो सकता है, तब तो अतीन्द्रिय अर्थ का द्रष्टा कोई पुरुष माना जा सकता है, किन्तु प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति अतीन्द्रिय अथ में नहीं होती । इसी कारण से प्रत्यक्ष के आधार पर प्रवृत्त होने वाले अनुमानादि की भी प्रवृत्ति अतीन्द्रिय अर्थों में नहीं होगी । इस प्रकार जब कोई मतीन्द्रिय अर्थ का द्रष्टा नहीं है तो रागादिमान् पुरुष वेद के अर्थ को स्वय कैसे जानेगा? दूसरा भी कोई जाने वाला नहीं है और न वेद ही अपने अर्थ की बता पाता है । ऐसी अवस्था में वेदाथ का ज्ञान कैसे होगा? इस तरह से यह अपरिज्ञात अर्थं वाला शब्द व्यर्थ में विघ्न रूप मे उपस्थित हो जाता है । मीमासको ने मजबूत खोरी से अपने को यज्ञ के खमे से बाध किया है, इससे छुटकारा पाना कठिन है । इस परिस्थिति में ' अग्निहोत्र जहुयात् स्वर्गकाम ', इस वैदिक art का अर्थ ' कुते का मास खाय ' यह नहीं होगा, ऐसा कैसे कहा जा सकता है? जब कोई भी अथ सामने नही है, उस अवस्था ' मै घृत का प्रक्षेप करें इससे भिन्न अय भी उसका न होगा, ऐसा कैसे प्रामाणिक रूप से जाना जा सकता है?

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२७२ date पारिजात अत्रोच्यते -- य एव लौकिका शब्दास्त एव वैदिका इति रीत्या यथा लौकिकै शब्दैरथबोधस्तथैव वैदिकानामपि शब्दाना स्वाथबोधे बाधाभावात् । शब्दार्थसम्बन्धस्यौत्पत्तिकत्वेऽपि सर्वशब्दाना सर्वार्थवाचकत्वेऽपि योगिव्यतिरिक्तान सकेत-व्यक्तस्यैवार्थबोधकत्वेनादोषात् । यदुक्तम्- - किं ह्यस्यापीरुषेयतया, यतो हि समयादर्थप्रतिपत्ति, स पौरुषेयो वितथोऽपि स्यात्, तदप्यकिञ्चित्करम्, समयस्यापि वृद्धपरम्परया प्राप्तत्वेन पौरुषेयत्वाभावात् । अनादिवृद्धव्यवहारतदुपजीव्याषप्रमाणैरेव लौकिकाना शब्दानामिव वैदिकानामनेकार्थनियतत्वेऽपि न दोष । लोकव्यवहारसिद्धये वाक्याथप्रतिपत्तये य उपाय स एव वेदेऽपि निर्धारणीय । तदुक्तम् -- यश्चैष लोकव्यवहारसिद्ध प्रादशि वाक्यार्थमितावुपाय, स एव वेदेऽप्यवधारणीय । तत्रापि तान्येव पदाि तेऽर्था । अपि च, सर्गात्प्रभृति प्रवृत्तोऽय वेदविदा व्यवहार । ततश्च नाभिनवा वैदिका शब्दा । दीर्घप्रबन्धप्रवृत्तादद्य यावद् व्युत्पद्यामहे व्युत्पाद्यमानाश्च त तमर्थं प्रतिपद्यामहे । अपि च, यथा वेदा अनादिभूता 1 शब्दतदर्थं सम्बन्धस्तदर्थावगमोपाया-श्रादिभूत एव । अपि च, यथा महाभाष्ये सूत्रानुकारिवाक्यानि तद्वयाख्यानानि चोपलभ्यन्ते, तथैव वेदेऽपि मन्त्रब्राह्मणात्मके व्याख्येयानि व्याख्यानभूतानि च वाक्यानि सन्ति । अनाद्यविच्छिन्न सम्प्रदायपारम्पर्येण यथा वेदा अधीयन्ते तथैव वेदार्था अप्यधीयन्ते । पारम्पर्यप्राप्त एवार्थी व्याकरणमीमासादिशास्त्रैर्गम्यते । जीवत्सु चैतेषूपायेषु वेदार्थो नावगम्यत इति सुधा भाषणम् । यथा लोके वाक्याद्वाक्यार्थोऽवगम्यते, तथैव वेदवाक्येभ्योऽपि वेदार्था गम्यते । न चात्र रागादिमत्ता बाधिका, इन सब बातो का समाधान हम इस तरह से कहते हैं जो लोकिक शब्द हैं, वे ही वैदिक भी हैं । इसलिये जैसे लौकिक शब्दो से अर्थ का बोध होता है, उसी तरह से वैदिक शब्दो से भी अर्थ का ज्ञान होने में कोई बाधा नहीं है । शब्द और अर्थ का सम्बन्ध raft स्वाभाविक और नित्य है और यह भी ठीक है कि सभी शब्द सभी अर्थों के बोधक हैं, तो भी योगी से अतिरिक्त व्यक्तियों का सत के द्वारा अर्थ के अभिव्यक्त होने पर ही उसका बोध हो सकता है, ऐसा मान लेने पर उक्त दोषो मे से किसी की भी सभावना नहीं होती । यह after गया है कि इसकी अपौरुषेयता का क्या लाभ है, जब कि इसका ज्ञान समय ( सकेत ) से हो हाना है, क्योकि यह संकेत तो पोरुषेय है, मिथ्या भी हो सकता है । यह कण्त भी अकिचित्कर है, क्योकि समय ( सकेत ) भी वृद्धपरम्परा चला आ रहा है, अतः इसको भी पौरुषेय नहीं कहा जा सकता । अनादि वृद्ध - व्यवहार के सहारे चलने वाले भाष प्रमाणों के आधार पर et offer शब्दो के समान ही वैदिक शब्दो की भी मनेकार्यता में कोई दोष नहीं है । लोक व्यवहार की सिद्धि के लिये जिस उपाय से वाक्यार्थ का ज्ञान होता है, उसी का सहारा वेद में भी लिया जाना चाहिये । जैसा कि कहा गया है --- यह जो वाक्यार्थ को प्रमिति मे लोक व्यवहार की सिद्धि को उपाय के रूप में माना गया है, उसी का reater बेद में भी करना चाहिये, क्योकि वेद में भी वे ही पद और अर्थ विद्यमान हैं, जो कि लोक में हैं । वेदों का इस तरहका व्यवहार के प्रारंभ से ही प्रवृत्त है । इसलिये वैदिक शब्द कोई नये नहीं है । निरन्तर प्रवाह रूप से चले जा रहे इन शब्दों से आज तक हम उनको व्युत्पत्ति को जानकर उनके अर्थ की अथगति करते चले आ रहे हैं । जैसे वेद अनादि है, उसी तरह से शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध मी अनादि हैं, उनके अर्थ के ज्ञान के उपाय भी अनादि है । जैसे व्याकरण महाभाष्य मे सूत्रों का अनुकरणकरने वाले और उनकी व्याख्या प्रस्तुत करने वाले वाक्य भी उपलब्ध है, उसी तरह से मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद में भी व्याध्येम और व्याख्यान-भूत दोनो तरह के वाक्य विद्यमान है । अनादि, अविच्छिन्न, सम्प्रदाय परम्परा से जैसे वेदों का अध्ययन होता है, उसी तरह से वेदार्थ का भी होता है । परम्परा से प्राप्त अर्थ की ही व्याकरण, मीमाता आदि शास्त्रों से पुष्टि होती हैं । इन उपायों की विद्यमानता में कहना कि वेदार्थ की गति नहीं होती, व्यर्थ की बकवास है । जैसे लोक में एक वाक्य से दूसरे वाक्य के अर्थ का यह उसी तरह से वेदवायों से वेद वाक्यों से भी वेद के अर्थ की अवगति होती है । इसमे रागादिमत्ता बाधिका नहीं हो सकती बोध होता । रागा- है,

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वेदाथपारिजात २७३ रागादिमत प्रत्यक्षमतीन्द्रियेऽर्थे मा प्रवर्तिष्ठ, रागादिमानग्निहोत्र जुहुयात् स्वर्गकाम इति वाक्यादप्यग्निहोत्राख्य कर्म स्वर्गसाधन नावगच्छेदिति न वक्तु शक्नोति कश्चिदपि, स्वात्मानुभवविरोधात् । यदुक्तमतीन्द्रियेऽर्थे नियता कुतो व्युत्पत्तिरिति, तदपि न किश्चित्, वेदवत्तद्व्यवहारस्य तदर्थावगमोपायस्य चाना-दित्वेन सुचिरप्ररूढत्वात् । वेदश्चार्थश्च तदवगमश्च तदुपायश्च तदनुष्ठानञ्च नाद्यत्वे प्रवृत्तानि नैयायिकादिमतरीत्या जग-त्सर्गात्प्रभृति प्रवृत्तानि मीमासकाना रीत्या खनादीन्येवेति न तेषु पर्य्यनुयोगावसर | खादेच्छ्वमासमित्याद्यपभाषणेन केवलमवीचिकेसरकुटुम्बिनमात्मान कतु वेदनिन्दैव कृता मन्दमतिना, नाभिनव दूषणमुत्प्रेक्षितमिति साधूक्त न्यायमञ्जरीकारैर्जयन्तभट्टे । स्वाध्यायाध्ययनसमये यादृशमेव शब्द यथोचितमात्रानुस्वारस्वरादिरूपसमुत्थितमुच्चाग्यत्याचार्य्यं, तादृशमेव शिष्य प्रत्युच्चारयति, प्रमाद्यन्त वा गुरुरेवानुशास्ति | आयथावदुच्चारसामर्थ्योपजन तावन्न मुञ्चति, शिक्षयति । सोऽपि शिष्यो यदा गुरुर्भवति तदा स्वशिष्य तथैव शिक्षयिष्यति । आचायों यदा शैशवे शिष्य आसीत् तदान्येन गुरुणा शिक्षितोऽभूत्, सोऽपि तदन्येन, सोऽपि तदन्येनेत्यनादित्व जैमिनीये पक्ष, आसगन्नियायिकपक्षे । लोके नास्तिकस्यापि विदितपदतदर्थतत्सम्बन्धस्य ' अग्निहोत्र जुहुयात् स्वर्गकाम ' ( शा ० ब्रा ० १८/१४ ) इत्यादिवाक्येभ्योऽर्थप्रतिपत्तिभवत्येव । तदपलापस्तु स्वात्मानुभवापलाप एव । स्वर्गाग्निहोत्रयो कार्यकारणभावस्यातीन्द्रिय-स्वाद बाधोऽपि नानुभूयते । पुरुषसम्पर्शादिप्रामाण्यशङ्कापि स्यात् । तदभावात्तु प्रामाण्यस्वतस्त्वमन पोदितमेव तिष्ठति । दिमान् व्यक्ति की प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर अतीन्द्रिय अर्थों मे प्रवृत्ति भले ही न हो, किन्तु वह व्यक्ति ' अग्निहोत्र जुहुयात् ' जैसे after arrat ' af ग्रहोत्र नामक कर्म स्वर्गं का साधन है ' इतना भी नहीं जान पायगा, ऐसी बात कोई कह नहीं सकता । यह कथन aur nare के भी विपरीत ही पडेगा । यह कहना कि अतीन्द्रिय अथ को निश्चित प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) कैसे हो सकती है? यह प्रश्न भी गलत है, क्योंकि वेद के समान ही वेद पर बाधारित व्यवहार और उसके नाम की बमति का उपाय अनादि काल से चला आ रहा है, यह बात सबके मन मे पर कर चुकी है । वेद, उसका अथ उसकी अचपति, प्रगति का उपाय और उसका अनुष्ठान बाज नही प्रवृत्त हुआ है । नैयायिक दृष्टि के अनुसार इसकी प्रवृत्ति सगँ के भारम्भ से हुई है और सीमातको के मत से ये सब अनादि काल से प्रवृत्त है । इसलिये इनमें किसी प्रकार की शका पठाने का कोई असर नहीं है । ' अग्निहोत्र जुहुयात् ' इत्यादि कन्यो का ' कुत्ते का मास खावे ' ऐसा अर्थ क्यों न होगा, इस तरह का अपभाषण करके मन्दमती धमकीर्ति ने अपने को केवल ववीचि नरक का निवापी बनाने के लिये वेद की निन्दा की है, उसने कोई नया दूषण नहीं खोज निकाला है, न्यायमजरीकार जयन्त भट्ट ने यह ठीक ही कहा है । वेद का अध्यापन करते समय यथोचित मात्रा, अनुस्वार, स्वर आदि से सयुक्त जिस तरह के शब्द की आचार्य बोलता है, उसी तरह के शब्द का उच्चारण शिष्य भी करता है । यदि शिष्य उच्चारण में कोई गलती करता है, तो चाचाय उसको पुन समझाता है | जब तक शिष्य ठीक उच्चारण नहीं करता, तब तक उसको आचाय छोडता नहीं, सिखाता ही रहता है । इस तरह से अनुशिष्ट शिष्य जब आचार्य हो जाता है, तो वह भी अपने शिष्य को इसी तरह सिखाता है । बचायें बचपन मे जब शिष्य था, तब उसने दूसरे गुरु से इसी तरह शिक्षा प्राप्त की थी और वह भी जब विद्यार्थी था तो उसने भी उससे पहले के आचार्य से शिक्षा प्राप्त की की । इस तरह से जैमिनीय मोमासको के पक्ष में यह अध्ययन अनादि परम्परा से चला जा रहा है और नैयायिकों के मत से इस सृष्टि के आरम्भ से यह अध्ययन परम्परा प्रचलित है । | लोक में किसी भी व्यक्ति को, जिसको कि पद, पदार्थ और उनके सम्बन्ध का ज्ञान हैं, ' अग्निहोत्र ' इत्यादि वाक्यों से प्र का ज्ञान होता है । इस er auory अपने अनुभव को ही नकारने के समान है । स्वग और अग्निहोत्र का कार्यकारणभाव अतीन्द्रिय प्रतीत हो सकता । इसके साथ पुरुष का किसी तरह का संस्पर्श हो तो अप्रामाण्य है, अत sent are at scre त नही ३५

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२७४ वेदापारिजात ह्मचर्यव्रतगुरुशुश्रूषाशमदमादिनियमपूर्व सम्प्रदायपारम्पर्येण वेदार्थावगमस्तु वीर्य्यवत्त भवति । तदर्थमेव ' तेजस्वि नावधीतमस्तु ( तै ० उ ० शा ० पा ० ), ' सह वीय्यं करवावहै ' ( तै ० उ ० शा ० पा ० ), ' छन्दास्ययातयामानि Hafta पर च ' ( श्री ० भा ० म ० पु ० १० / ४५।४८ ) इत्यादीनि श्रवणानि स्मरणानि । तदथमेव ' तत्व बिस ' ( ऋ ० स ० १०/७१/४ ) इत्यादिवेदवाक्यैरेवेद गम्यते यटिशिष्टाना कृते सुवासा युवतीव श्रुति स्वार्थ विवृणुते । ' यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता र्धा प्रकाशन्ते महात्मन || ' ( श्वे ० उ ० ६।२३ ), ' नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुता श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्वाम् ॥ ' ( क ० १२२२ ), ' तद्यदेनास्तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयभ्वभ्याषत् ' ( तै ० आ ० २२ ९ ) इत्यादिवचनैस्तपसा चित्तैकाग्र्येण योगजवीर्येणापि वेदार्थावगम श्रूयते । तदर्थ -विरोधिना वाक्यातावपि वीर्य्यवत्तापि न तादृशी वेदविरोधित्वादेव । अपि च राहते शाब्दव्यवहारस्यानादित्वमुपेयते, जगतो निमूलनाशलक्षण प्रलय } असतश्चात्मलाभलक्षणा सृष्टिश्च नाभ्युपेयते, योग्यतालक्षणसम्बन्धवशाच्च श्रुतम्याथप्रतिपादक वमुच्यते, सम्बन्धस्य च समयवशादभिव्यक्तिरुच्यते, तेषा सम्बन्धनित्यत्वखण्डन स्वमताभिनिवेशमात्रम् । नित्यसम्बन्धम्या भिव्यक्ती हि लाघवमेव, शब्दस्य तदर्थभूतसामान्यस्य च नित्यत्वेन सम्बन्धनित्यत्वे बाधाभावात् । अत एव - नित्या शब्दार्थसम्बन्वारतत्राम्नाता महर्षिभि । सूत्राणा मानुतन्त्राणा भाष्याणा च प्रणेतृभि ॥ ' ( वा ० प ० १-२३ ) इति वचनमपि सम्यगेव । की आशा भी उठ सकती है, किन्तु पुरुष ससग का जहाँ नितान्त अभाव है, वहाँ पर उसकी स्वत प्रमाणता में कोई बाधा नही उठ सकती । ब्रह्मचर्य के व्रत का पालन करना, गुरु की सेवा करना, राम दम आदि नियमो के अनुसार अपने जीवन को ढालना और इस तरह से साम्प्रदायिक गुरु परम्परा के आधार पर वेदार्थ का ज्ञान प्राप्त करने से वह अधिक शक्तिशाली होता है । इसीलिये ' हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम ( माचार्य और शिष्य ) साथ ही उस तेज को प्राप्त करें, इस लोक और परलोक में हमारे वेद और उसका ज्ञान सदा ताजा बने रहे इस तरह के श्रुति और स्मृति के वचन उपलब्ध होते हैं । इसीलिये ' तत्व विससे ' इत्यादि वेद वाक्यो से यह स्पष्ट हो जाता कि सुन्दर वस्त्र पहनें युवती के समान श्रुति विशिष्ट व्यक्तियों के सामने अपने अभिप्राय को व्यक्त कर देती है । ' जिस व्यक्ति की परमात्मा में तथा गुरु मे परम भक्ति है, उसी महात्मा को वेद और उपनिषदो मे प्रतिपादित अर्थ स्पष्ट होते हैं, इस आत्मस्वरूप की अधिगति न तो प्रवचनो मे हो मकती है, न अपनी बुद्धि से और न बहुत सुनने से हो होती है । यह तो स्वय जिसका वरण कर लेता है, उसी के सामने अपने स्वरूप को स्पष्ट रूप से रखता है ', ' तपस्या करते हुए महर्षियो को स्वय अनादि वेद और वेदार्थ स्वत प्रकट हुआ इत्यादि ( माषय वाले ) श्रुति वाक्यों से ज्ञात होता है कि तप, feer की एकाग्रता और योगज सामान्य से भी वेदार्थ का ज्ञान होता है । वेदार्थ के विरोधी वाक्यों से वाक्यार्थ की अवगति तो होगी, किन्तु वेद विरोधी होने के कारण ही उनमे वह सामथ्य नहीं जा सकती । जैन वाशनिक शब्द व्यवहार की अनादिता को तो मानते हैं, किन्तु वे जगत् के निमूल नाश स्वरूप प्रलय को और अविद्यमान वस्तु के स्वरूप लाभ रू ० सृष्टि को नहीं मानते । उनका कहना है कि योग्यता लक्षण सम्बन्ध के कारण श्रुत शब्द अर्थ का प्रतिपादक होता है और इस सम्बन्ध की अभिव्यक्ति समय ( सकेत ) के कारण होती है । इस परिस्थिति में उनका शब्दार्थ सम्बन्ध की नित्यता का खण्डन केवल अपने मत का दुराग्रह ' मात्र है, क्योकि नित्य सम्बन्ध को अभिव्यक्ति मान्ने में लाघव हो है । शब्द और शब्दार्थ स्वरूप सामान्य दोनों नित्य हैं, अत इनके सम्बन्ध को नित्यता मे कोई बाधा नहीं उपस्थित हो रही है । इसीलिये वाक्पकार का • वास्तव में जैन दार्शनिक शब्दार्थ व्यवहार के सम्बन्ध में मीमांसकों का अनुकरण करते हैं और इसीलिये वे उनको तरह जगत् की उत्पत्ति और विनाश ने मानने का ढोंग भी रचते हैं । योग्यतारूप सम्बन्ध से शब्द के अर्थ का ज्ञान मानना और उस सम्बन्ध का संकेत के द्वारा ज्ञान मान कर भी सम्बन्ध को नित्य न मानता, यह स्पष्ठ ही उनके अनुकरण तथा अपने मत के दुराग्रह को स्पष्ट करता है ।

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वेदाथपारिजात २७५ यदुक्तम् - नित्यस्य वस्तुन क्रमयौगपद्याभ्यामथक्रियाकारित्व नोपपद्यते, तदपि न, सहकारिवशान्नित्यस्थ स्थायिनोऽपि कार्यकारित्वे बाधाभावात् । कार्य्यंस्यानित्यत्वेऽपि तत्सामान्यनित्यत्वेन कार्येऽर्थे चोदनाया प्रामाण्यकथन-मपि नासङ्गतम् । अपि च, कुरानवामविलादिग्रन्थानामपि मर्माणि शब्द तदर्थानुष्ठानपरायणाना यथा सुव्यक्तानि, न तथाऽन्येषाम् । यदुक्तम्- ' तद्वयाख्याता अतीन्द्रियार्थद्रष्टा तद्विपरीतो वा? प्रथमपक्षे अतीन्द्रियार्थदर्शिन प्रतिषेधविरोध, धर्मादौ चास्य प्रामाण्योपपत्ते } धर्मे चोदनैव प्रमाणमित्यवधारणानुपपत्तिश्च । तद्विपरीतश्चेत्तर्हि कथ यथार्थप्रतिपत्ति, अयथार्थाभिधानाशङ्कया तदनुपपत्ते ' इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, वाक्याथबोधेऽतीन्द्रियार्थदशनस्यानुपयोगात् । पारम्पर्येणाधीत-वेदतदर्थानामतीन्द्रियार्थदशनरहितानामपि तपसा निष्कल्मषाणा वेदतदर्थावबोधतदर्थानुष्ठानपरायणाना वेदतात्पर्य्यविदा व्याख्यातृत्वोपपत्ते । अत एव वशिष्टमनुव्यासादीनामृषीणा वेदोक्तकर्मोपासनादिनिष्ठाना जनसामान्यापेक्षया विशिष्टज्ञानवता -मपि वेदव्याख्यातृत्वोपपत्ति । यदुक्तम्- ' मन्वादीना सातिशयप्रज्ञत्व तेषा स्वत वेदार्थाभ्यासात्, अदृष्टात् ब्रह्मणो वा स्यात्? स्वतश्चेत्, सर्वस्य स्यादविशेषात् । वेदार्थाभ्यासाच्चेत्, तत्त्वेऽपि ज्ञातस्य वा अज्ञातस्य वा अभ्यास स्यात्? नाज्ञातस्यातिप्रसङ्गात् । ज्ञातस्य चेत्कुतस्तज्ज्ञप्ति? स्वतोऽन्यतो वा? स्वतश्चेत् अन्योन्याश्रय | सति हि वेदार्थाभ्यासे स्वतस्तत्परिज्ञानम्, यह क ar fao कुल सही है कि- ' सूत्रो के और सानुबन्ध भाष्य ग्रन्थो के प्रणेता महर्षियों ने शब्द अथ और उनके सम्बन्ध को भी नित्य माना है ' | कहा जाता है कि ' वस्तु को नित्य मानने पर उसकी क्रमश और एक साथ अर्थक्रिया करने की सामर्थ्य की उपपत्ति नहीं बन पाती ' | किन्तु यह कथन गलत है, क्योकि नित्य अत एव स्थायी वस्तु म भी सहकारी कारण की सहायता से इसको उपपत्ति हो सकती है | काय के अनित्य होने पर भी उसमें रहने वाली जाति को नित्यता के आधार पर काय अथ के प्रति भी विधिवाक्य की प्रमाणता मे कोई असंगति नहीं उठ सकती । कुरान, बाइबिल मादि अन्य धर्मों के ग्रन्थो का मर्म भी उन्ही को ठीक से समझ मे आता हैं, जो कि उनके अभ्यास में निरन्तर लगे रहते है, अन्य व्यक्तियों को नही । यह भी शक उठाई गई थी कि ' वेदाथ का व्याख्याता अतीन्द्रिय अर्थ का द्रष्टा है या नहीं? प्रथम पक्ष मानने पर अतीन्द्रियाथ दर्शी के निषेधक वाक्यो से विरोध होगा और धर्म - अधम आदि के विषय में भी जव अतीन्द्रियाथ दर्शी को प्रमाण मात लिया जायगा, तो धर्म मे केवल विधिवाक्य ही प्रमाण हो सकते हैं, यह नियम नहीं बन सकेगा । यदि वेदाय का व्याख्याता अतीन्द्रिय अर्थ का द्रष्टा नही है, तो उसको प्रतोति यथाथ कैसे मानी जा सकती हैं, क्योकि इस शका के कारण कि कहीं यह अयथार्थं वस्तु का तो प्रतिपादन नही कर रहा है, उसके उपदेश के प्रति आश्वस्त नही हुआ जा सकता ' । किन्तु यह कथन मी अकिचित्कर है, क्योकि वाक्यार्थ के ज्ञान के लिये अतीन्द्रिय अथ के दर्शन का कोई उपयोग नहीं है । परम्परा से जिन्होंने वेद का और उसके अथ का अध्ययन किया है, वे अतीन्द्रिय अर्थों के द्रष्टा भले ही न हो, किन्तु तप के बल से निष्कलुष जीवन वाले और वेद वेदाय की अवगति एव उसके अनुष्ठान मे निरन्तर लगे हुए ऐसे महानुभावो को वेद का तात्पर्य समझ मे आ ही सकता है और वे उसकी व्याख्या कर ही सकते हैं । इसीलिये वसिष्ठ, मनु, व्यास सरीखे ऋषिगण जनसामान्य की अपेक्षा अधिक तत्परता से वेदोक्त कम और उपासना आदि मे लगे रहते हैं, व्रत विशेष रूप से वेदार्थ को अवगत होने से वेदार्थ के व्याख्याता के रूप में इनकी प्रसिद्धि उचित ही है । पूछा जाता है कि ' मतुप्रभृति की सातिशयप्रज्ञता उनको स्वत प्राप्त होती है या वेदाध्ययन और उसके मर्थ ज्ञान के अभ्यास से प्राप्त होती है? मद्दष्ट के कारण यह उनमें आती है, अथवा ब्रह्मा से उनको उपदेश प्राप्त होता है? यदि मन्वादि को स्वत यह प्रा होती है तो अन्य व्यक्तियों को क्यों नहीं प्राप्त होगी, मन्वादि में और उनमें कोई विशेषता तो है नहीं । वेदार्थ के अभ्यास से यदि यह प्राप्त होती है तो यह अभ्यास ज्ञात का होगा या अज्ञात का? अज्ञात का अभ्यास नहीं हो सकता । अब यदि ज्ञात का माने तो यह क्षति ( ज्ञान ) उनको कैसे हुई? स्वत हुई या दूसरे की सहायता से यदि स्वतः हुई तो यहाँ पर शप्ति ( ज्ञान ) और अभ्यास को अन्योन्या-

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२७६ tara पारिजात तस्मिश्च सति तदर्थाभ्यास इत्यन्योन्याश्रय | अन्यतस्तहि तस्यापि तत्परिज्ञानमन्यत । अतीन्द्रियार्थदर्शिनोऽनभ्युपगमेऽन्ध-परम्परातो यथार्थनिर्णयानुपपत्ति । अदृष्टमपि न प्रज्ञातिशयसाधकम् तस्यात्मान्तरेऽपि सद्भावात् । न च तथाविधमदृष्ट मन्वादावेव सभवति नान्यत्र । कुतस्तत्रैव सभव? वेदार्थानुष्ठानविशेषाच्चेत् तहि ज्ञातस्याज्ञातस्य वा वेदार्थस्था-नुष्ठानात्? अज्ञातस्य चेदतिप्रसङ्ग, ज्ञातस्य चेच्चक्रकापत्ति | सिद्धे हि वेदार्थज्ञानातिशये तदर्थानुष्ठानविशेषमिद्धि, सिद्धौ चादृष्टविशषसिद्धि, ततश्च ज्ञानातिशयसिद्धि ततस्तज्ज्ञानातिशयसिद्धि । ब्रह्मणोऽपि वेदार्थज्ञाने सिद्धे सति ततो मन्वादेस्तदथपरिज्ञानातिशय । तचास्य कुत सिद्धम्? धर्मविशेषाच्चेत् स एव चक्रकप्रसङ्ग । ततोऽतीन्द्रियार्थदर्शिनोऽ-नभ्युपगमे वेदार्थपतिपत्तेरनुपपत्तिरेव ' इत्यादि । तदपि तुच्छम्, अनादिसिद्धपारम्पर्येण गुरोरध्ययनेन वेदाथज्ञानम् तेन तदर्थानुष्ठानम्, ततो विशिष्टज्ञानसभवे बाधाभावात्, गुरोर्मुखादनुश्रवणेनैव तस्यानुश्रवेति नामप्रसिद्धेरुक्तत्वात् । न चान्योन्याश्रयादिक गुरुपारम्पय्र्येण वेदार्थावगमे बाधाभावात् । न चेयमन्धपरम्परा, शाब्दव्यवहारस्थानादिपरम्पराया जैनैरप्यभ्युपगमात् । सर्वैरपि गुरुपारम्पर्य्यस्य शिक्षणादी स्वीकारात् । त्वद्रीत्या करिमश्चिद्वस्तुनि सामान्यज्ञान लोकता भवति, तदाश्रित्यैवाभ्यासविशेपे सति सार्वश्यसाधनज्ञानम्, ततस्तदनुष्ठानम्, तत सार्वश्यम् । अत्र तु सार्वश्याभावेऽप्यपोरुषेयवेदेन प्रज्ञातिशयसाधनज्ञान सभवत्येव, गुरुपारम्पर्येण लोकतो वा विदितपदतदर्थस्य वाक्यश्रवणेनैव वाक्यार्थज्ञान सभवत्येव तदर्थं प्रज्ञातिशयस्यानपेक्षणात् । श्रयता माननी पडेगी । वेदाथ के अभ्यास के आधार पर स्वत इति होगी और इति के आधार पर वेदार्थ का अभ्यास होगा । यदि शति अन्यत होती है तो उसका परिज्ञान भी अन्य से होगा । इस प्रकार अतीन्द्रिय अथ के द्रष्टा को जब तक नही मानते, इस तरह की अन्ध-परम्परा के कारण कोई यथाय वस्तु का निर्णय न हो सकेगा । अदृष्ट भी प्रज्ञा ( बुद्धि ) की अतिशयिता को नहीं सिद्ध कर सकता, क्योकि are भी समान रूप से सभी आत्मानो में विद्यमान है । यदि यह कहा जाय कि इस तरह का अदृष्ट मन्वादि में ही रह सकता है, अन्यत्र नही तो आप बताइये कि ऐसा क्यों होगा? वेदाथ के अनुष्ठान विशेष से ऐसा होगा तो आप यह बताइये कि यह ज्ञात है इसलिए होगा या अज्ञात रहने पर भी । वेदार्थ के अनुष्ठान से यदि अज्ञात होने पर भी होगा तो इसमें अतिप्रसन दोष आवेगा और ज्ञात होने के कारण होगा तो उसमे चक्रक दोष की आपत्ति होगी, क्योकि वेदाथज्ञान की अतिशयिता सिद्ध होने पर वेदाथ के अनुष्ठान विशेष की सिद्धि होगी, इसके सिद्ध होने पर अदृष्टविशेष की सिद्धि होगी और अदृष्टविशेष की सिद्धि होने पर ज्ञानातिशय की सिद्धि होगी, तब मन्वादि के ज्ञानाविशय की सिद्धि हो पावेगा । अब यदि यह कहा जाय कि ब्रह्मा को वेदार्थ ज्ञान सिद्ध है, अत उससे मन्वादि को वेदार्थ ज्ञान की अतिशयिता प्राप्त होती है, तो इस पर भी हमारा प्रश्न है कि ब्रह्मा को यह वेदार्थ ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ? यदि माना जाय कि धर्म विशेष के कारण ऐसा होता है तो पूर्वोक्त चक्रक प्रसंग यहा पर भी आवेगा | अतः अतीन्द्रियार्यदर्शी के न मानने पर वेदाथ की प्रतिपत्ति किसी भी प्रकार से उपपन्न नहीं हो पाती ' । किन्तु यह सारा कथन नागाडम्बर मात्र है । अनादि सिद्ध परम्परा से चले आ रहे गुरुपूर्वक अध्ययन से वेदार्थ का ज्ञान, तब उसका अनुष्ठान करने पर विशिष्ट ज्ञान के होने में कोई बाधा नहीं है । यह पहले हो कहा जा चुका है कि वेद का एक नाम अनुश्रव इसीलिये प्रसिद्ध हैं कि इसका श्रवण गुरुमुख से उच्चरित होने के बाद होता है । अन्योन्याश्रय प्रभृति दोष भी यहाँ नहीं उठाये जा सकते, क्योकि गुरुपरम्परा से वेदार्थ की अवगति में कोई बाधा नहीं है 1 इसको अन्धपरम्परा नहीं कहा जा सकता, क्योकि स्वय जैन दार्शनिकों ने भी शब्द व्यवहार की अनादि परम्परा को माना है । शिक्षण पद्धति में गुरुपरम्परा को सब कोई स्वीकार करते हैं । आपकी पद्धति से किसी वस्तु का सामान्य ज्ञान लोक व्यवहार से प्राप्त होता है । उसी के सहारे गहरा अभ्यास करने पर सर्वज्ञता के साधक ज्ञान की अधिगति होती है और इस ज्ञान के निरन्तर अनुष्ठान से अन्त मे सर्वज्ञता की अभिव्यक्ति होती है । हमारे मत से सर्वज्ञता के अभाव मे भी अ totr वेद से प्रज्ञातिशमिता के साधक ज्ञान की अधिपति होती है । गुरुपरम्परा अथवा लोक से जिसको पद और पदार्थका ज्ञान हो चुका है, उसकी वाक्य के सुनने से हो वाक्यार्थ को अधिगति हो हो जाती है । इसके लिये प्रज्ञा की अतिशय की कोई अपेक्षा नहीं रहती ।

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date पारिजात २७७ अपि च, वैदिकैस्तु नित्यमिद्ध सर्वज्ञ सर्वशक्तिमानीश्वरोऽप्यभ्युपगम्यते । तदनुग्रहेणापि प्रज्ञातिशय सभवत्येव, ईश्वरत्वस्य स्वत सिद्धे । बौद्धर्जेनेस्तु स्वत सिद्ध सवज्ञ सर्वेश्वरो वा नाभ्युपेयते । तैस्तु साधनसिद्धमतीन्द्रियाथदर्शित्व-मभ्युपेयते । तत्रैव सावनज्ञानार्थं सावश्यमतीन्द्रियार्थदशित्वञ्चापेक्षितम् । अपौरुषेयशास्त्रे स्वत सिद्धमैश्वर्यं चाभ्युपेयते । न च स्वत सार्वश्य सवस्य स्यात्, सर्वस्य जगत्कारणत्वाभावेन तदसभवात् । नहि चेतनस्य यत्सभवस्तदचेतनस्यापि सभवति । तथैवेश्वरनिष्ठगुणानामनीश्वरेऽपि न सभव, स्वभावस्यापर्य्यनुयोज्यत्वात् । स्वभावस्य कर्मणा वा जगत्कारणत्वा-भ्युपगमापेक्षया चेतनस्येश्वरस्य जगत्कारणत्वाभ्युपगम समञ्जस एव । अनीश्वराणा तु साधनानुष्ठानादेव प्रज्ञातिशय, साधनज्ञान त्वपौरुषेयाद्वेदादेव । अपौरुषेयस्य वेदस्य तदर्थज्ञानस्य तदर्थानुष्ठानस्याविच्छिन्नपारम्पर्येणोपलब्धि | चिन्मन्त्रात्मकस्य वेदस्य ब्राह्मणात्मकेन वेदेनार्थोऽपि व्याक्रियते । ' आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवचसी जायताम् । निकामे निकामे न पजन्योऽभिवषतु ॥ ' ( वा ० स ० २२ २२ ) इत्यादीना शुक्लयजुषमन्त्राणा शतपथे स्पष्ट विवरण दृश्यते । व्याकरणनिरुक्त कल्पसूत्रमीमासोपकृताभि पारम्पर्येण प्राप्ताभि पद्धतिभिश्चानुष्ठानोपयोगी बेदाथ सम्यग्ज्ञातु शक्यत एव ।अपि वाक्यार्थावगतिर्न भवेत्, तदा जैनबौद्धाद्यागमानामपि च, यदि लोकतो विदितपदतदर्थशाब्दन्यायस्य वाक्येभ्यो नार्थावगम स्यात्, तत्सम्प्रदायविरुद्धो वार्थं परिकल्पित स्यात्, तदा श्वमास भक्षयेदिति बुद्धोक्तीनामप्यर्थं किं न स्थात् । अपि च, बुद्धवाक्यैरेव जगन्नित्यत्वमपि किं न स्यात् । यदुक्तम्- ' पौरुषेयवाक्याना पुरुषैरेवाभिप्रायप्रकाशन सभवत, नापौरुषेयेषु वाक्येष्येव सभवति, तत्राभिप्रायप्रकाश-कस्य पुरुषस्यासभवात् ' इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, यतोऽभिप्रायवाक्यस्यापि विपरीतार्थबोध कथ न स्यात् । तस्मादकामेनापि एक बात और है, वैदिक विद्वान् नित्यसिद्ध, सवश सवशक्तिमान् ईश्वर को भी मानते हैं । उसकी कृपा से प्रज्ञा का अतिशय प्राप्त हो ही सकता है । ईश्वर का ईश्वरत्व स्वतः सिद्ध है, किन्तु बौद्ध और जैन तो स्वत सिद्ध, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर को नहीं मानते | उनका है कि यह सर्वज्ञता, अतीन्द्रियाथदर्शिता साधनो से सिद्ध होती है । उन्हीं के मत में साधनो के ज्ञान के लिये सवज्ञता और अतो-न्द्रियाथ दर्शिता की अपेक्षा हो सकती है । शास्त्रो की अपौरुषेयता मानने वाले हम लोगों के मत में ऐश्वय भी स्वत सिद्ध माना जाता है । यह सज्ञता स्वत प्राप्त होता है, तो भी सवसामान्य मे इसका आविर्भाव नहीं हो सकता | सामान्य जन जगत् को उत्पन्न नहीं करते तो उनमे सता क्यो रहेगी? चेतन के लिये जो सभव हो वह अचेतन में कैसे समय हो सकता है । इसी तरह से ईश्वर में विद्यमान गुण after मे नही रह सकते । किसी वस्तु के स्वभाव को प्रश्नो के आधार पर बदला नहीं जा सकता | स्वभाव अथवा कर्म की जगत् का कारण मानने की अपेक्षा चेतन ईश्वर को जगत् का कारण मानना अधिक सही है । ईश्वर से भिन्न प्राणियों का प्रज्ञातिशय साधन का अनुष्ठान करने से अभिव्यक्त होता है और इसके साधन का ज्ञान अपौरुषेय वेद से ही होता है | अपौरुषेय वेद, वेदार्थ का ज्ञान और वेदार्थ का अनुष्ठान, इन सबकी उपलब्धि अविच्छिन्न परम्परा से होती है । कभी मन्त्रात्मक वेद को ब्राह्मणभागात्मक वेद से व्याख्या भी की जाती है । ' माह्मन् " इत्यादि शुक्लयजुर्वेद के मन्त्रो की शतपथ ब्राह्मण मे स्पष्ट व्याख्या की गई है । व्याकरण, निरुक्त, कल्पसूत्र, मीमासा प्रभृति शास्त्री की सहायता से और परम्परा प्राप्त पद्धतियों से भी अनुष्ठान के लिए उपयोगी वेदार्थ का सही ज्ञान हो सकता है । यदि लोक से पद, पदाथ और शब्द न्याय को ठीक से समझे हुए व्यक्ति के वाक्य को सुनकर वाक्याथ की अवगति नही होगी तो बौद्ध और जैन आगमो की भी अर्थावगति न हो पायेगी, अथवा उनके सम्प्रदाय से विरुद्ध अर्थ की भी कल्पना की जा सकती है । ऐसी अवस्था में बुद्ध की उक्तियों का भी यह अर्थ क्यो नही हो जायगा कि कुते का मास खाना चाहिये | बुद्ध के वाक्यों से हो जगत् की freeat भी क्यो न सिद्ध हो जायगी? कहा जाता है कि ' पौरुषेय वाक्यो का अभिप्राय पुरुष ही समझाते हैं, anteve वाक्यों में ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि वहाँ पर अभिप्राय के प्रकाशक पुरुष की स्थिति नहीं है । किन्तु यह कथन भी किचित्कर है, क्योकि उक्त अभिप्रायबोधक क्यों की भी वि रीत अर्थ की बोधकता को फोन रोक सकता है? इसलिए न चाहते हुए भी वाक्यों से ही पद, पदाथ और शाब्दन्याय के अमित व्यक्ति को

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२७८ वेदाथपारिजात वाक्यैरपि विदितपदतदर्थशाब्दन्यायस्य यथाभूतवाक्यार्थबोधोऽभ्युपेय । अपौरुषेयेऽपि वेदे - " उपक्रमोपमहारावभ्यासोऽ पूर्वता फलम् | अर्थवादोपपत्ती च लिङ्ग तात्पय्यनिणये ॥ " इत्युपक्रमोपसहारादिभि षड्विधैलिङ्गस्तात्पर्य निर्धारणसम्भ वात् । न च पुरुषाभिप्राय लक्षण तात्पर्य्यं मपौरुषेये वेदे न सम्भवत्येवेति वाच्यम्, प्रयोजनवदथस्यैव तात्पय्यशब्दार्थत्वात् तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो बलीयासीत्यादी तत्प्राधान्यस्यैव तात्पर्य्यपदाथत्वोक्ति । पौरुषेये तत्प्रतीतीच्छ्योच्चरित्ववद पौरुषेये पौरुषेये च तदितरप्रतीतीच्छ्याऽनुच्चरितत्वरूप तात्पय्यें सम्भवत्येव । वेदे तदेतदपौरुषेया पौरुषेयसाधारणेषु सर्वेष्वेव arry सम्भवत्येव । यदुक्तम्- लौकिकवैदिकपदानामेकत्वेऽप्यनेकाथत्वव्यवस्थिति, अन्यपरिहारेण व्याचिख्यासितस्यार्थम्य नियमयितु मशक्तिरिति । न च प्रकरणादिभ्यस्तन्नियमस्तेषामप्यनेकधा प्रवृत्ते इ त्रि सन्धानादिवत् । यदि च लौकिकेनाग्न्यादिशब्देना. विशिष्टत्वाद वैदिकस्यार्थस्य प्रतिपत्तिस्तर्हि पौरुषेयोऽप्यसौ कथ न स्यात् । लौकिकस्य हि अग्न्यादिशब्दस्याथवत्त्व arters का बोध होता है, यह मानना पड़ेगा । अपौरुषेय वेद मे भी ' उपक्रम, उपसहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अथवाद और उपपत्ति रूप षड्विध लिङ्ग से तात्पय का निर्णय होता है । तात्यय पुरुष के अभिप्राय को ही कहते हैं । अपौरुषेय वेद में यह कैसे रह सकता है? इसका उत्तर है कि सप्रयोजन अर्थ ही तात्पय शब्द का अर्थ है । यह वेद में भी विद्यमान है । अतस्प्रधान से तत्प्रधान बलवान् होते हैं यहाँ पर यह स्वीकार किया गया है कि सत्प्रधान ही तात्पय पद का अर्थ होता है । पौरुषेय वाक्य मे जैसे तत्प्रतीतीच्या उच्चरितत्व रूप तात्यय माना जाता है, उसी तरह से अपौरुषेय वाक्य में भी उससे भिन्न की प्रतीति के लिए अनुच्चरित रूप तात्पर्यं रह ही सकता है | इस तरह से तात्पर्य का यह लक्षण अपौरुषेय और पौरुषेय सभी वाक्यों में साधारण रूप विद्यमान रहता है | पुन आक्षेप किया जाता है कि लौकिक और वैदिक पवो को एक मानने पर भी इनका अथ एक ही नही माना जा सकता, तदन्य का परिहार कर जब हम अर्थ की व्याख्या करने लगते हैं, उस समय उसको किसी एक अथ मे नियमित कर नाना कठिन है प्रकरण प्रभृति से भी अर्थ को नियमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि तीन बार के लक्ष्यानुसन्धान की तरह प्रकरण आदि को भी अनेक रूप से प्रवृत्ति हो सकती है । यदि लोकिक अग्नि प्रभृति शब्दों से वैदिक छाथ की भी प्रतीति इसलिये होती है कि लोकिक और वैदिक शब्द समान है, तो उसी आधार पर वे पोरुषेय भी क्यो न माने जाय? क्योकि लौकिक अग्नि प्रभृति शब्दो की बथवत्ता पौरुषेयत्व से १ किसी भी ग्रन्थ या प्रकरण का तात्पर्य जानने के लिए यह आवश्यक है कि उस ग्रन्थ और प्रकरण के प्रारंभ में क्या कहा गया है और उसके अन्त मे भी वही बात कही गई है, जो उसके आरंभ में कही गई है । साथ ही यह जानना भी आव are है कि आरभ और अन्त मे कहे गये विषय को ही प्रमगवश बार बार दोहराया गया है । यह विषय ऐसा है, जिसका ज्ञान अन्य साधन से नहीं हो सकता और उस विषय के ज्ञान से फल का होना भी निश्चित है । उसी विषय का स्पष्ट ज्ञान कराने के लिए उस विषय और उसके ज्ञान से होने वाले फल की श्रेष्ठता को बताने वाला कोई प्राचीन इति-हास भी है और साथ ही बार बार अनेक सुदृढ़ तकों से उसी विषय की पुष्टि भी की गई है । इन छः प्रकार के हेतुओ से किसी भी ग्रन्थ या विषय का तात्पर्य क्या है? यह बात बुद्धिमान् लोग आसानी से समझ सकते हैं । feat f मत्र से कोई दूसरा मित्र किसी के यहाँ भोजन करने का आग्रह कर रहा है । ठीक उसी समय उसका कोई अन्त हितैषी मित्र कहता है- ' जहर क्यो नही खा लेते ' । यहाँ भोजन करने वाले मित्र area का तात्पर्य केवल भोजन कर भूख मिटाने में हैं, किन्तु ' जहर खाओ ' ऐसा कहने वाले मित्र के वाक्य का तात्पर्य जहर खाने में नहीं, किन्तु जिसके यहाँ भोजन करना चाहते हो, वह तुम्हारा शत्रु है, उसके घर भोजन करना जहर खाने के समान है, भत, उसके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिए, इस बात को दृढ़ता के साथ कहने में है, अतः यह भोजननिषेधपरक वामय भोजनपरक थाक्य को अपेक्षा बलवान् है । देवादि शास्त्रों मे भी कई ऐसे वाक्य हैं, जिनका तात्पर्य स्वाथ में है और कई ऐसे वाक्य है, जिनका तात्पर्य स्वार्थ में न होकर अन्य लाक्षणिक अर्थ के प्रतिपादन में हैं । उन स्वाभित लाक्षणिक arce वाक्यों से स्वार्थपरक वाक्य बलवान् होते हैं । जैसे ' आदित्यो ग्रुप, यजमान प्रस्तर ' इत्यादि वाक्य स्वार्थपरक न होकर केवल aerere हैं । इनकी अपेक्षा स्वार्थपरक ' अग्निहोत्र जुहुयात् ' इत्यादि वाक्य बलवान् हैं ।

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वेदाथपारिजात २७६ पोरुषेयत्वेन व्याप्तम् । तत्राय वैदिकोऽग्निशब्द कथ पौरुषेयत्व परित्यज्य तदथमेव ग्रहीतु शक्नोति उभयमपि गृह्णीयाज-ह्याति तन्त्र, समानचोद्यत्वात् । प्रकरणादिभिर्वाक्यार्थानिर्धारणे पौरुषेयेष्वपि वाक्येषु तदापत्ति समानेव | आगमनिर्मातॄणा स्वाभिप्रायप्रकाश वाक्येष्वप्यथभेदाशङ्काया अपरिहार्यत्वात् । तदानी तदभिप्रायप्रकाशनेऽपि तद्देशकाले तत्तदनुया यिभिरन्ययाथप्रकाशनसम्भवात् । यदि सादिग्रन्यानामपि पारम्पय्र्येणैव तदभिप्रायवेदन सम्भवति तदा त्वनादिग्रन्थानामपि पारम्पर्येण तात्पय्र्यावगम सुलभ एव । तस्मात्--ससर्गो विप्रयोगश्च साहचय्यं विरोधिता । अर्थ प्रकरण लिङ्ग शब्दस्य सन्निधिस्तथा ॥ I मामर्थ्यमौचिती देश कालो व्यक्ति स्वरादय । शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषम्मृतिहेतव || इति सर्गादिभिरुपक्रमादिभिश्व तात्पय्यनिणय एवोचित । यदुक्तम् - लौकिकस्याग्निशब्दस्यार्थवत्त्व पौरुषेयत्वेन व्याप्तमिति, नन, पौरुषेयापौरुषेयसाधारणस्य शब्दस्यार्थवत्त्वे बाधाभावेन पौरुषेयत्वस्याप्रयोजकत्वात् यदुक्तम् - लौकिकवैदिकशब्दयो स्वरूपाविशेषेऽपि सकेत ग्रहण सव्यपेक्षत्वेनार्थप्रतिपादकत्वेन अनुच्चायमाणयोश्च पुरुषेणाश्रणे समानेऽपि को विशेष इति, तदपि न किञ्चित्, अपौरुषेयवेदराश्यन्तर्गतत्वादेवापौरुषेयत्व तद्भिन्नत्वात्तु पौरुषेयत्व-मितरस्य सुवचत्वात् । किं च यद्यपि लौकिकाना वैदिकाना समेषामपि वर्णाना नित्यत्वमपौरुषेयत्व च समानमेव, तथापि पौर्वापय्यलक्षणाया आनुपूर्व्या निर्माणे पुरुषस्य स्वातन्त्र्यम् । यत्र पुरुषस्वातन्त्र्य तत्र पौरुषेयत्व यत्र पुरुषस्वातन्त्र्य नास्ति तत्रैवापौरुषेयत्वम् । आनुपूर्वीविशेषविशिष्टाना वर्णानामेव पदत्व वाक्यत्वश्च । पौरुषेयेषु पुरुषाश्रितदोषाशङ्का भवत्यन्यत्र नियमित है । इस परिस्थिति में वैदिक अनि लौकिक अग्नि शब्द के पौरुषेयत्व को छोडकर केवल उनके अथ से कसे सबद्ध हो सकता है । वह या तो इन दोनों को ग्रहण करेगा या दोनो को छोड़ देगा | आपका यह पूरा कथन इसलिये ठीक नही है कि यह आपत्ति समान रूप से आपके पक्ष में भी विद्यमान है । प्रकरणादि से जब वाक्याथ का निर्धारण नहीं हो पाता, उस अवस्था मे पौरुषेय arrot में भी यह आपत्ति समान रूप में उपस्थित होती हैं । शास्त्र निर्माताओं के अपने अभिप्राय के प्रकाशक वाक्यों में भी अयभेद की आशका का परिहार नहीं किया जा सकता | शास्त्रकार की विद्यमानता में उसके अभिप्राय का प्रकाशन भले ही हो, किन्तु भि देश काल में उनके अनुयायियों के द्वारा अन्यथा अथ का प्रतिपादन किया जा सकता है । यदि सादि ग्रन्थो का अभिपाय आप परम्परा से प्राप्त ही मानते हैं, तो फिर बनादि ग्रन्थो का अभिप्राय भी इसी तरह स परम्परा से बढी सरलता से समझा जा सकता है, इसमे आपको क्या आपत्ति हो सकती हैं? इसलिये ' सर्ग, विप्रयोग, साहचय, विरोधिता, अर्थ, प्रकरण, लिंग, master की सतिधि, सामथ्य, औचित्य, देश, काल, व्यक्ति, और स्वर इनकी सहायता से जहाँ पर शब्दार्थ सदिग्ध रहता है, वहीं पर विशेष अर्थ की स्मृति होती है ' इत्यादि प्रमाण वचनो के आधार पर ससर्ग प्रभृति से तथा उपक्रम प्रभृति से तात्पय का निर्णय करना ही ठीक है । ' लौकिक अग्नि शब्द की अर्थवत्ता पौरुषेयत्व से व्यास है ' यह कथन इसलिये ठीक नही है कि पौरुषेय और अपौरुषेय साधारणतथा सभी शब्दो के अर्थवाद होने में कोई बाधा नहीं है, गत पौरुषेयत्व को इसमें प्रयोजक नही माना जा सकता । पूछा जाता है कि लौकिक और वैदिक शब्दो का जब स्वरूप समान ही है, तब सकेत ग्रहण की सहायता अथ की farasat मे और अनुच्चरित दशा में अन्य पुरुष द्वारा अश्रवण को भी समानता में इनमे सैदक विशेषता क्या मानी जायगो? इस कवन मे भी कुछ दम नहीं है, क्योकि इसका बडो सरलता से यह उत्तर दिया जा सकता है कि अपौरुषेय वेदराशि के अन्तर्गत शब्द अपौरुषेय हैं और इससे free शब्द पौरुषेय । यद्यपि लौकिक और वैदिक सभी वर्ण समान रूप से नित्य और अपौरुषेय हैं, तो मी उनमे से किन्हीं वर्णों का पहले होना और किन्हीं का बाद में होना, इस तरह की आनुपूर्वी के निर्माण में पुरुष स्वतन्त्र है । जहाँ पर पुरुष स्वतन्त्र है, वही पर पीरुषेयता मानी जायगी और जहाँ पर पुरुष स्वतन्त्र नहीं है, वहीं पर अपोरुषेयता । आनुपूर्वी विशेष से युक्त वर्ण ही पद और वाक्य कहलाते हैं । पौरुषेय पद एव वाक्यों में ही पुरुष मे विद्यमान दोषो की आशका हो सकती है, अन्यत्र ये दोष छूने को भी नहीं मिल सकते । पुराने और नये कूप, प्रासाद प्रभृति में यद्यपि कोई विशेषता नहीं है, तो भी पोप वाक्यो

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 310 का मूल पृष्ठ
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२८० वेदाथपारिजात तु तत्स्पर्शोऽपि नास्त्येव, जीर्णकूपप्रासादादीनामभिनवकूपाद्यविशिष्टत्वेऽपि पौरुषेयेषु निरपेक्षोच्चरितत्व प्रमाणान्तरे-णार्थमुपलभ्य विरचितत्वमपौरुषेयेषु तद्भिन्नत्वमिति विशेषस्य सद्भावात् । अवश्यस्मरणीयत्वे सति स्मरणागोचरकतृक-स्वेन वेदेऽपौरुषेयत्व सद्धे । जीर्णकूपादौ त्ववश्यस्मरणीयत्वाभावेन तदभावात् । लोकप्रत्यायनाभिप्रायो यथा लोक सकेत-प्रसिद्धि पालयति वेदोऽपि तथैव लोकप्रसिद्धैरेव शब्देरुपदिशतीत्युक्तमेव । उपक्रमादिभिर्वेदतात्पय्यंनिर्णय इत्यप्युक्तमेव । यदुक्तम् – न्यायमेव पालयन्त पण्डिता हेयोपादेयसाश्रयार्थे प्रवतन्ते तदपि नि सारमेव, न्यायस्याव्यवस्थितत्वात्, युक्तेरप्रतिष्ठानात् । अत एव आर्हता सौगता अन्ये च बाह्या विरुद्धान् न्यायानाश्रित्य विरुद्धान्मार्गानाश्रयन्ते । अपि च, बौद्धानामपि मन्त्रलोकादिविषयाणि वचनानि युक्तिगम्यानि यदि सभावनीयवचनत्वेन केषाञ्चित्तथाभूतान्यपि वाक्यान्यादरणी यानि तदा वैदिकानामृषीणा भावितात्मना वेदव्याख्यानानि कथन्नादरणीयानि । अपि च प्रत्यक्षादिनाऽविसवादेनागम-प्रामाण्ये तस्य प्रत्यक्षादिनैव गतार्थता । बौद्धजातकादिग्रन्थाना तथात्वेऽप्रामाण्यमेव । अपौरुषेयाणा तु वेदानामयज्ञान लोकात्सम्प्रदायात्तदविरुद्धाया युक्तैश्चोतमेव । ' प्रसिद्धो लोकवादश्चेत्तत्र कोऽतीन्द्रियार्थदृक् । अनेकार्थेषु शब्देषु येनार्थोऽय विवेचित || ' ( प्र ० वा ० ३।३२१ इति, तदप्यपास्तम्, लोकतो विदितपदतदर्थशाब्दन्यायस्या पौरुषेयाद्वेदादर्थावगमदर्शनात् । तत्रातीन्द्रियाथबोधका दूवाक्यात् परोक्षबोध, बाधसदेहाभावात्तु प्रामाण्यमेव । यथा चापीरुषेयस्य पारम्पर्येण स्वरूपलाभस्तथैवार्थलाभोऽपि । नहि वाक्या-दतीन्द्रियार्थं परोक्षज्ञानेऽतीन्द्रियार्थदर्शनमपेक्ष्यते । और अपौरुषेय वाक्यों में यह अन्तर है कि पौरुषेय वाक्यो का उच्चारण पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष होता है और उनकी रचना अन्य प्रमाण से अर्थ का निश्चय कर लेने के बाद की जाती है, किन्तु अपौरुषेय वाक्य में यह बात नही है । वेद के कर्ता का स्मरण अनश्य रहना चाहिये, तिस पर भी न तो उसके कर्ता का स्मरण ही विद्यमान है और न कोई कर्ता के रूप में प्रतीत ही हो रहा है, अत वेद की अयता सिद्ध होती है । जीर्णं कूप यादि के कर्ता का स्मरण इसलिये नहीं बच रहता कि उसको लोग स्मरण योग्य नहीं मानते । अन्य व्यक्तियो को समझाने के अभिप्राय में जैसे लोक संकेत प्रसिद्धि का पालन करते हैं, उसी तरह से वेद भी लोक प्रसिद्ध शब्दो से ही उपदेश करता है, यह बात पहले ही कही जा चुकी है । वेद के तात्पर्य का निर्णय उपक्रम प्रभृति के सहारे होता है, यह भी कहा जा चुका है । कहा जाता है कि ' समझदार व्यक्ति उन्ति नियम का पालन करते हुए ही हेय, उपादेय अथवा उपेक्षा लक्षण प्रयोजन में प्रवृत्त होते हैं । किन्तु यह बात भी निसार है, क्योंकि कोई भी न्याय व्यवस्थित नहीं होता, कोई भी युक्ति सदा प्रतिष्ठित नहीं रहती । इसीलिये जैन, बौद्ध अथवा अस्य वेदबाह्य दार्शनिक परस्पर विरोधी तर्कों के सहारे अपने -अपने मार्ग की स्थापना करते हैं । बौद्धो के भी मन्त्र और लोकादि विषयक वचन युक्तिगम्यता के आधार पर विश्वसनीय होने से जब कुछ लोगो के लिये आदरणीय हो सकते हैं, तो तप पूत वेद की व्याख्या करने वाले वैदिक ऋषियों के वचन कैसे आदरणीय नही होगे? प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से विरुद्ध आगम ही यदि प्रमाण माने जायगे तो फिर उनकी आवश्यकता ही क्या है? ऐसे आगमों की गतार्थता उन प्रमाणो से ही हो जायगी । ata जातक आदि ग्रन्यो की प्रामाणिकता इसीलिये नहीं मानी जाती । अपौरुषेय वेदों का अज्ञान लोक से सम्प्रदाय से और वेदा-विरोधिनी युक्तियों से भी हो जाता है । ' लोक व्यवहार जब प्रसिद्धि के आधार पर ही चलता है तो यहाँ पर वह अतीन्द्रिय अर्थो का द्रष्टा कौन है? जिसके कि कहने पर अनेकार्थं शब्दों मे यहाँ पर यही नथ होगा, इसका निर्णय हो सकता है ' । यह कथन भी निसार है, क्योकि लोकव्यवहार से पद, पदाथ की शब्दव्युत्पत्ति जिसको ज्ञात है, उसको अपौरुषेय वेद से भी अर्थावगति हो जाती है | यहाँ पर अतीन्द्रिय अर्थ के ates वाक्य से परोक्ष अर्थ का बोध होता है और बाध, सन्देह आदि के अभाव में इसका प्रामाण्य सुनिश्चित हो जाता है । जैसे अपौरुषेय वेद के स्वरूप का ज्ञान परम्परा से होता है, उसी तरह से उसके अर्थ का ज्ञान भी हो जाता है, क्योकि वाक्य से जब अतीन्द्रिय अथ का ज्ञान होता है, उस अवस्था में अतीन्द्रिय अर्थ का दर्शन भी हो, यह आ eere नहीं है ।