वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 491–500
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 491–500
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४६१ भेदेऽत्वस्य दीर्घप्लुतयोरननुवृत्तेः, आत्वस्य ह्रस्वप्लुतयोरननुवृत्तेश्च । अवर्णकुलमित्यपि न जातिव्यवहारः, किन्तु वनादिवत् समुदायव्यवहार एव । सिद्धान्ते तु ह्रस्वादिभेदोऽप्युच्चारणधर्म एव वर्ण आरोप्यते । न चैवं पूर्वोक्तरीत्याऽर्थे भ्रान्तिः स्यादिति वाच्यम्, अश्वादिजवस्य पुंसां कार्य्याङ्गत्ववत् परधर्मस्य वर्णकार्याङ्गत्वोपपत्तेः । वृद्धपारम्पय्र्येण यादृशाच्छन्दादर्थप्रतीतिरवगता, तादृशादर्थप्रतीतेरभ्रमत्वात् । यथा च भ्रान्त्यावगतेनापि स्फटिकेनान्यरूपेण जपाकुसुमसन्निध्यनुमानं न भ्रान्तिस्तथैवेहानि ज्ञेयम् । न च दीर्घाद्यनित्यत्वाद्वाचकानित्यत्वमानुपूर्वी वत्प्रवाह नित्यत्वेन दीर्घादीनामपि नित्यत्वोपपत्तेः । यद्यप्यकारो ह्रस्वादिरूपपरिहारेण न दृश्यते, तथापि ह्रस्वदीर्घप्लुतेषु व्यावर्तमानेषु योऽनुवर्तते स एवेति भूषणादिष्वनुवर्तमानं हेमेव ज्ञातुं शक्यते । नन्वेवं द्रुतादिह्रस्वाद्युदात्तादिभेदार्थमकारादिषु भिन्नजातीया ध्वनयोऽभ्युपेया इति चेन्न, एकस्य aftar ामेकजातीयत्वेऽपि तैरेव मृदुतोव्रत्वादिसमन्वितैद्भूतादिभेदसिद्धेः । वर्णानामभिव्यक्ताविव ध्वन्यन्तरानः पेक्षणात् । युगपच्छ्रोत्रं संस्कुर्वन्तो वर्णस्वरूपं बोधयन्ति क्रमेण तु संस्कुर्वन्तो बोधमनुवर्तयन्ति । एतेन द्रुतमध्यविलम्बिता वस्थायामेक एव गकारादिवर्णः । स एव गकारादिवर्णो द्रुतादिभेदभिन्नः । या या अकारप्रतीतिः सा पूर्वाकारप्रतीत्य-भिन्नविषया, यथा पूर्वा अकारप्रतीतिः, उत्तराकारप्रतीतिरप्यकारप्रतीतिरिति सापि तथा स्यात्, इत्यादिरीत्याऽपि वर्णनित्यत्वसिद्धिः । यदप्युक्तम् -- स्वलक्षणयोरभेदसाधने न समर्थोऽयं हेतुः । तथाहि किं पूर्वाकारप्रतीतिरूपत्वादिति हेतु-विशेषेण तत्साध्यते, अकारप्रतीतिमात्रत्वादिति हेतुसामान्येन वा तत्साध्यते? आद्ये पूर्वाकारप्रतीतित्वासिद्धेर्हेत्वसिद्धिः । है कि ऐसा नहीं माना जा सकता, क्योंकि भेद के रहते हुए भी अत्व की दीर्घ और प्लुत में अनुवृत्ति नहीं रहती और आत्व की ह्रस्व और प्लुत में अनुवृत्ति नहीं रहती । अवर्ण कुल के आधार पर भी जाति का व्यवहार नहीं हो सकता, क्योंकि लोक में भी एक कुल को एक जाति का आधार नहीं माना जाता । किन्तु यहाँ पर वन प्रभृति शब्दों की तरह समुदाय का ही व्यवहार होता है । सिद्धान्ततः यहाँ पर भी हस्यादि का भेद उच्चारण का ही धर्म है, इसका वर्ण में आरोप किया जाता है । ऐसा मानने पर पूर्वोक्त रीति से अर्थ में भी भ्रान्ति की आपत्ति का परिहार इस तरह से हो जायगा कि जैसे घोड़े आदि का वेग मनुष्य के कार्य का अंग हो जाता है, उसी तरह से ध्वनि उच्चारण प्रभृति का धर्म भी वर्ण के कार्य का अंग हो जायगा । वृद्ध परम्परा के आधार पर जिस तरह शब्द से अर्थ की प्रतीति होती है, उस तरह की शब्दार्थ प्रतीति भ्रमात्मक नहीं मानी जा सकती । जैसे भ्रान्ति से अवगत स्फटिक मणि से उसकी अन्यरूपता को देखकर जपाकुसुम की संनिधि का अनुमान भ्रान्त नहीं माना जाता, उसी तरह से यहाँ भी समझना चाहिये । दीर्घादि स्वरों की अनित्यता के आधार पर भी वाचक की अनित्यता नहीं होगी, क्योंकि आनुपूर्वी के अनुसार प्रवाह नित्यता के आधार पर दीर्घादि स्वरों की भी नित्यता सिद्ध हो जायगी । यद्यपि नकार कभी ह्रस्व, दीर्घ आदि रूप को छोड़कर दिखाई नहीं देता, वो भी ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत इनमें से किसी एक के न रहने पर भी जिस रूप की अनुवृत्ति होती है, उसी को अकार कहा जा सकता है, जैसे कि कटक, कुण्डलादि भूषणों की व्यावृत्ति होने पर भी सुवर्ण की सब में अनुवृत्ति रहती है । प्रश्न है कि ar ' aft, हस्वादि और उदात्तादि के भेद के लिये अकारादि में भिनजातीय ध्वनियाँ माननी पड़ेगी । ' उत्तर है कि नहीं । एक वर्ण की ध्वनियों के एकजातीय होने पर भी उन्हीं की मृदुता, तीव्रता आदि के आधार पर दूतादि भेदों की सिद्धि हो जायगी, अतः जैसे वर्णों की अभिव्यक्ति के लिये दूसरी ध्वनि की अपेक्षा नहीं रहती, उसी तरह से तादि भेद की सिद्धि के लिये भी ध्वनियों में जात्यन्तर ( भिन्न जाति ) की अपेक्षा नहीं रहेगी । जब ये श्रोत्र का एक साथ संस्कार करती है तो वर्ण के स्वरूप का बोध ( ज्ञान ) कराती है । जब क्रम से संस्कार करती हैं तो बोध ( ज्ञान ) का अनुवर्तन करती हैं । इस तरह से द्रुत, मध्य, विलम्बित ar स्थाओं में एक ही करादि वर्ण रहता है । बहो एक गकारादि वर्ण द्रुतादि के औपाधिक भेद से भिन्न सा हो जाता है । अकारादि की सभी प्रतीतियों का विषय पूर्व प्रतीत अकारादि की प्रतीतियों से अभिन्न है, जैसी कि पूर्व अकार की प्रतीति, उत्तराकार की प्रतीति भी अकार की प्रतीति हैं, अतः वह भी उसी तरह की होगी, इस तरह अनुमान से वर्ण की नित्यता की सिद्धि हो सकती है ।
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४६२ वेदार्थपारिजातः उत्तराकारप्रतीतिरप्यकारप्रतीतिरेव । तत्र च पूर्वाकारप्रतीतित्वासिद्धिः । उत्तराकारप्रतीतिरूपत्वादिति विशेष-हेतुनाऽपि न तत्सिद्धि:, अनैकान्तिकत्वेन व्याप्त्यसिद्धेः । न द्वितीयोऽपि भिन्नविषयत्वेऽप्यविरोधात् । अकारप्रतीतिश्च स्यात्, भिन्नविषयाऽपि स्यात्, को विरोधः? किञ्चाकारप्रतीतित्वं यथोभयोः सामान्यम्, तथाकारविषयत्वमप्यविरुद्ध-मिति चेन्न, प्रति संख्या निरोधादिनित्यबुद्धयोरपि भवदुक्तदिशा भिन्नविषयत्वापत्त्या नित्यत्वमात्रस्यासिद्धघापातात् । यदप्युक्तम् -- एक विषययोश्च प्रतीत्योः पूर्वव्यवस्थितैकाकारविषययोः पूर्वोत्तरकालभाविन्योः प्रतीत्योः पूर्वापरभावः प्राक् पचाद्भावेन विरुद्धयते, संनिहितासंनिहितकारणत्वेन यथाक्रमं कार्य्यस्योत्पादानुत्पादात् । संनिहित-कारणत्वे च तयोर्युगपद्भावः स्यात् । अथ संनिहितेऽपि कारणे पूर्वेवाकारप्रतीतिरुत्पद्यते, नोत्तरा, तदा पश्चादपि सा न स्थात्, पूर्वापरप्रतीतिकारणसन्निधानेऽप्यनुत्पन्नस्योत्तराकारप्रतीतिविशेषस्यातत्कारणत्वात् । पूर्वाकारप्रतीति-कारणस्य तदकारणत्वात् । तस्मात् पूर्वापरभाविन्योः प्रतीत्यो भिन्नाखिलकारणत्वमेवेति । तदपि धूलिप्रक्षेपमात्रम्, उभयोः प्रतीत्योरेकाकारस्य कारणत्वेऽपि सहकारिसन्निधानक्रमादुत्पत्तिक्रमे बाधाभावात् । ननु चैकस्य विषयस्याभेदे शक्तस्याप्रतीक्षणात्तयोः प्रतीत्योर्युगपद्भाव एव स्यादिति चेन्न, सहकारि-सन्निधानविलम्बेन कार्य्यविलम्बस्यासकृदावेदितत्वात् । किञ्च पूर्वापरकाल विशिष्टविषयकत्वेन प्रतीत्योर्भेदेऽपि पूर्वापरकालोपलक्षितस्य वस्तुनोऽभेदस्य सोऽयं देवदत्त इत्यादी सर्वानुभवसिद्धत्वादनपलपनीयोऽयमर्थः । ततश्च युक्ति- " विरुद्धं पूर्वापरयोः प्रतीत्योरेकविषयत्वमिति मुषैव जल्पितम्, युक्तिसामञ्जस्यस्य दर्शितत्वात् । इस प्रसंग में कहा गया है कि ' दो स्वलक्षणों को अभिन्न सिद्ध करने में यह हेतु समर्थ नहीं है । जैसे कि ' पूर्वाकार-प्रतीतिरूपत्वात् ' इस हेतु विशेष से उसकी सिद्धि होती हैं या ' अकारप्रतीतिमानत्वात् ' इस हेतु सामान्य से? प्रथम पक्ष में पूर्वाकार प्रतीति के सिद्ध न होने से हेतु ही असिद्ध हो जायगा । उत्तराकार प्रतीति भी अकार की ही प्रतीति है । यहाँ पर पूर्वाकारप्रती तत्व की सिद्धि नहीं होगी । ' उत्तराकारप्रतीतिरूपत्वात् ' इस विशेष हेतु से भी उसकी सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि इसकी अनैकान्तिकता ( व्यभिचारी ) के कारण ही व्याप्ति की सिद्धि नहीं होगी । द्वितीय पक्ष भी इसलिये नहीं बनेगा कि इनका विषय भित्र मानने में भी कोई विरोध नहीं है । अकार की प्रतीति भी हो और इनकी भिन्नविषयता भी हो, इसमें क्या विरोध है? अपि च, जैसे दोनों ही पक्षों में अकारप्रतीतित्व समान है, उसी तरह से अकारविषयत्व में भी उभयत्र कोई विरोध नहीं है । यह पूरा कथन इसलिये अयुक्त है कि आपकी बताई इस पद्धति से तो प्रतिसंख्यानिरोध और अप्रतिसंख्यानिरोध जैसी नित्य बुद्धियाँ भी भविषयिणी हो जायगी और इस तरह से कहीं भी नित्यत्व की सिद्धि न हो सकेगी । यह भी कहा गया है कि ' एक विषय वाली दो प्रतीतियों की, जिनका कि आकार और विषय पहले से व्यवस्थित है, यदि पूर्वापर काल में होती हैं, तो इनका पूर्वापरभाव प्राक् पश्चात् भाव से विरुद्ध पड़ेगा, क्योंकि कारण की संतिधि और असंनिधि के आवार पर क्रमशः कार्य का उत्पाद ( उत्पत्ति ) और अनुत्पाद ( अनुत्पत्ति ) मानना पड़ेगा | कारण को सदा संनिधि मानने पर उनकी एक साथ उत्पत्ति माननी पड़ेगी । अब यदि यह कहा जाय कि कारण के संनिहित रहने पर भी पूर्वाकार प्रतीति ही पहले उत्पन्न होती है, उत्तराकार प्रतीति नहीं, तो इस अवस्था में उसकी प्रतीति बाद में भी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि पूर्वापर प्रतीति के कारणों की संनिधि में भी अनुत्पन्न उत्तराकार प्रतीति विशेष का वह कारण ही न हो सकेगा । पूर्वाकार प्रतीति का कारण उत्तराकार प्रतीति का कारण नहीं हो सकता | इसलिये पूर्व और अपर काल में होने वाली दो प्रतीतियों के भिन्न होते हुए भी उनको एक ही कारण से पैदा होने वाली मानना पड़ेगा ' | किन्तु यह सब धूलिप्रक्षेप मात्र है, क्योंकि उभय प्रतीतियों की एकाकारता हो उसमें यद्यपि कारण अवश्य हैं, किन्तु सहकारी के संविधान के क्रम से उनकी उत्पत्ति की क्रमिकता में कोई भाषा नहीं है । है कि एक हो विषय में यदि भेद नहीं है, तो समर्थ कारण किसी सहायक की प्रतीक्षा क्यों करेगा? और उक्त प्रतीतियाँ एक साथ क्यों नहीं उत्पन्न हो सकेंगी '? उत्तर है कि हम यह अनेक बार बता चुके हैं कि सहकारी के संविधान में विलम्ब होने पर कार्य की निष्पत्ति में भी विलम्ब हो जाता है । दूसरी बात यह भी है कि पूर्वकाल विशिष्ट और अपरकाल विशिष्ट विषयक प्रतीतियों के भेद होते हुए भी पूर्व और उत्तर काल से उपलक्षित वस्तु का अभेद ' यह वही देवदत्त है ' इत्यादि स्थलों में सर्वानुभव
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४६३ एतेन यदुक्तम् - यत्नमभावि तन्नैकविषयम्, यथा चक्षुः श्रोत्रविज्ञानम् क्रमभाविन्यो च पूर्वोत्तरे अकारप्रतीती । एक विषयत्वमक्रमभावित्वेन व्याप्तमिति तद्विरुद्ध क्रमभावित्वोपलब्ध्या चैकविषयत्वं निवर्तते तथा च प्रत्यभिज्ञानु-मानबाधिता स्यादित्यप्यपास्तम्, पूर्वापरकालोपलक्षितस्याकारस्याभेदेऽपि पूर्वापरकाल विशिष्टविषयकत्वेन भेदसिद्धे-रिष्टत्वेन सिद्धसाधनात् प्रत्यभिज्ञात्मकप्रत्यक्षेण चानुमानस्य वाधितार्थविषयत्वात् । यदप्युक्तम्-[ - स एवायमिति ज्ञानस्य पूर्वापरकालसम्बन्धिविषयत्वेन भेदविषयत्वमेव, अन्यथा पूर्वकाल-सम्बन्धित्वादपरकालसम्बन्धित्वस्याभेदे पूर्वांशप्रतिभासाभावप्रसङ्गाद् अयमेवेति ज्ञानं स्थात्, न स एवेति । तस्मात् प्रत्यभिज्ञाया भेदविषयत्वेन कथं प्रत्यभिज्ञातोऽनुमानबाध इति, तदप्यविचारितरमणीयम् सोऽयमिति वाक्येन भागत्यागलक्षणया तात्पर्य्यगोचरस्याभेदस्यैव बुबोधयिषितत्वात् सोऽयं तदन्यो वेति संदिहानस्य संदेहनिवृत्तौ वाक्य-स्योपयोगात्, पूर्वापरकालसम्बन्ध भेदस्याविवक्षितत्वाच्च । पूर्वापरकालभेदेऽप्युभयकालान्वितस्य वस्तुतोऽभिन्नत्वात् । अत एव स एवायमित्येकानुभवः, तथाप्यतीतज्ञानगोचरताऽपरोक्षते एकाधिकरणे गृह्णन् संवेद्यते । यदि च ग्रहण-स्मरणरूपं प्रत्ययद्वयम्, तथापि निरन्तरोत्पन्नाभ्यां घटस्मरणघटग्रहणाभ्यां विलक्षणमिदम्, परस्परविषयत्वेन प्रति-भासनात् । अपरोक्ष एवार्थोऽतीतज्ञानविशिष्टतया स्मृती प्रतिभासते, अतीतज्ञानविषयश्चापरोक्षतया प्रत्यक्षे, तदहं स्मराम्येतदिति प्रतिभासनात् । तस्मादनिमिषितदृष्टेर्यदुत्पत्तिविनाशरहितानुवृत्ताध्यवसायः स एव बाधकः क्षणभङ्ग-साधकानुमानस्येत्यपि सम्यगेव । सिद्ध है, इसलिये इस बात का अपलाप नहीं किया जा सकता । इस तरह से पूर्व और अपर प्रतीति की एकविषयता युक्ति विरुद्ध है, यह कथन व्यर्थ की बकवास है, क्योंकि ऊपर हमने इस बात को युक्तियों के सहारे भलीभांति प्रतिपादित कर दिया है । उक्त प्रतिपादन से इस बात का भी खण्डन हो जाता है कि- ' जो क्रम से उत्पन्न होता है, उसका विषय एक नहीं रहता, जैसे कि क्रमभावी चक्षुविज्ञान और श्रोत्रविज्ञान का विषय एक नहीं होता । इसी तरह से पूर्व और अपर काल की अकार प्रतीतियाँ भी क्रमभाविनी है | एकविषयता व्याप्य है और अक्रमभावित्व व्यापक है । अतः अक्रमभावित्व रूप व्यापक से frea भाव की उपलब्ध होने से एक विषयत्व भी निवृत्त हो जायगा । इस तरह से एकत्व की प्रतिपादक प्रत्यभिज्ञा अनुमान से aft हो जायगी । ' क्योंकि पूर्व और अपर काल से उपलक्षित अकार में अभेद होते हुए भी पूर्व और अपर काल से विशिष्टविषयता के आधार पर भेद को सिद्धि इसको भी इष्ट ही है | अतः यह तो सिद्ध वस्तु को पुनः सिद्ध करने के समान हुआ । प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष पर आधारित है, अतः प्रत्यभिज्ञा से अनुमान ही बाधित होगा, न कि अनुमान से प्रत्यभिज्ञा । यह जो कहा गया है कि ' यह वही है ' इस ज्ञान का विषय पूर्व और अपर काल संबन्धी है, अत: ' यह वही है ' यह ज्ञान referrer ही है । अन्यथा पूर्व काल संबन्धी से अपर काल संबन्धी का अभेद मानने पर पूर्वांश के प्रतिभास ( ज्ञान ) के अभाव का प्रसंग उठ खड़ा होगा और तब ' यही है ' इस तरह का ज्ञान होगा, न कि ' यह वही है ' इस प्रकार का । इस तरह से प्रत्यभिज्ञा की भिन्नविषयता के कारण उससे अनुमान का बाघ कैसे होगा? ' किन्तु यह कथन भी अविचारित रमणीय है, क्योंकि ' यह वही है ' इस वाक्य से भाग-- त्यागलक्षणा से तात्पर्यं गोचर ( विषयक ) अभेद को ही बताने की इच्छा है । यह वही है या उससे भिन्न? इस तरह का जिसको संदेह होता है, उसके संदेह को निवृत्ति में इस वाक्य का उपयोग होता है । यहां पर पूर्वकाल और अपरकाल का भेद विवक्षित नहीं है, इस तरह से पूर्वापर काल का भेद रहते हुए भी उभयकालान्वित ( दोनों कालों से संबद्ध ) वस्तु की एकता में कोई बाधा नहीं है । इसीलिये ' यह वही है ' इस तरह का एक ही अनुभव होता है, तो भी अतीतज्ञानगोचरता और अपरोक्षता इन दोनों का एक ही अधिकरण में ग्रहण होता है । यद्यपि ग्रहण और स्मरण रूप दो ज्ञान हैं, तो भी निरन्तर उत्पन्न हो रहे घट स्मरण और घट ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) इन दोनों से यह ज्ञान विलक्षण है, क्योंकि इसका विषय परस्पर दोनों से संबद्ध है । अपरोक्ष अर्थ ही अतीत ज्ञान से विशिष्ट होकर स्मृति में प्रतिभासित होता है और अतीत ज्ञान का विषय अपरोक्ष रूप से प्रत्यक्ष में भासित होता है, क्योंकि ' इसको मैं उसके रूप में स्मरण करता हूँ ' इन प्रकार का प्रतिभास यहाँ होता है । इस तरह से अनिमिषित दृष्टि वाले पुरुष को जो उत्पत्ति और विनाश से रहित अनुवृत्ताकार ( एकाकार ) अध्यवसाय ( निश्र्चय ) होता है, वही क्षणभंग के साधक अनुमान का बाधक होता है, यह कथन ठीक ही है ।
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**** वेदार्थपारिजातः यदत्रैवोक्तमुत्तरोत्तर प्रत्यक्षाणां यथाक्रममुत्तरोत्तरावस्थाभेदविषयत्वेन स एवायमिति तत्त्वारोपस्य भ्रान्तत्व-मेव, प्रथमदर्शनप्रत्यक्षेऽपरोक्षावस्थाया इवातीतज्ञानविषयावस्थाया अप्रतिभासनात् । भूयोदशितमपीदानीन्तनेन रूपेण वस्त्वव स्थितं न प्राक्तनेन रूपेण । प्राक्तनरूपस्थानवस्थानमेव विनाशः । यथा वृद्धावस्थायां बालरूपस्य । प्राक्तनं च रूपमतीतज्ञानकर्म । इदानीन्तनं च रूपमपरोक्षमथ च बालाद्यवस्थायां दृष्टः पुरुषो वृद्धावस्थायां प्रत्यभिज्ञायत इति कथमतीतज्ञानकर्मताऽपरोक्षते एकाधिकरणे प्रतिभासेते? कथं वा परोक्षस्वार्थोऽतीतज्ञानविशिष्टतया स्मृती प्रतिभासत इत्याद्युच्यते । यत्राप्यनिमिषितदृष्टेमिचरतरकालं पश्यतोऽनुवृत्ताध्यवसायस्तत्रापीदानीन्तनप्रत्यक्षज्ञानसम्बन्धेनार्थस्याप रोक्षतोत्पद्यते । अतीतज्ञानाभावेनातीतज्ञानकर्मतायाश्चेदानीमभाव एव विनाश इति कथमुत्पत्तिविनाशरहितानु-वृत्ताध्यवसायः क्षणिकत्वानुमानस्य बाधक इति, तदपि तुच्छम्, अवस्थानां भेदेऽप्यवस्थावतः कटकमुकुटकुण्डलादिषु न इवानुवृतस्याभेदे प्रत्यभिज्ञाया अबाधात् । विभिन्न प्रवृत्तिनिमित्तकत्वे सति समानविभक्तिकत्वे सत्येकार्थनिष्ठत्वं हि सामानाधिकरण्यं भवति । अत्यन्ताभेदाद् घटो घटः, अत्यन्तभेदाद् अश्वो महिष इति च न भवति । शाब्दबोधे वृद्धावस्थायां बालावस्थावतो यत्प्रत्यभिज्ञानं तदप्यनुवृत्तांश एव समञ्जसम् । अवस्थयोर्व्यावृत्तावप्यवस्थावतोऽनुवृत्ति-दर्शनादनिमिषितदृष्टेश्चिरतरं पश्यतोऽनुवृत्ताध्यवसायेन क्षणभङ्गभङ्गस्तु स्पष्ट एव, अतीतज्ञानकर्मतायाश्चेदानीमभा-as पि स एवायमित्यनन्यथासिद्धानुभवेनानुवृत्ति सिद्धेः । यहीं पर पुनः यह कहा गया है कि ' उत्तरोत्तर प्रत्यक्ष ज्ञान यथाक्रम उत्तरोत्तर अवस्था के भेद को अपना विषय बनाते हैं, अतः ' यह वही है ' इस तरह से प्रत्यक्ष में प्राथमिक वस्तु रूप तत्व का आरोप भ्रान्त ही माना जायगा । प्रथम दर्शन के प्रत्यक्ष में अपरोक्ष अवस्था की तरह अतीत ज्ञान विषयक अवस्था का प्रतिभास नहीं होता । बार बार दिखायी गयी वस्तु वर्तमान रूप से ही प्रतीत होती है, पूर्व रूप से नहीं । प्राक्तन रूप का न टिक पाना ही विनाश कहलाता है । जैसे कि वृद्धावस्था में बाल्यावस्था के रूप का विनाश हो जाता है । प्राक्तन रूप अतीत ज्ञान का विषय होता है और इदानीन्तन ( वर्तमान ) रूप प्रत्यक्ष ज्ञान का । बाल्य यदि अवस्था में देखे गये पुरुष की वृद्धावस्था में प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) होती है । अतः अतीत ज्ञान की विषयता और प्रत्यक्षता एक ही अधिकरण में कैसे प्रतिभासित हो सकती है? अथवा कैसे परोक्षात्मक स्वार्थ अतीत ज्ञान से विशिष्ट होकर स्मृति में प्रतिभासित होता हैं । साथ ही यह भी कहा जाता है कि ' जहाँ पर अनिमेष दृष्टि से चिरकाल पर्यन्त किसी वस्तु को देखने वाले व्यक्ति में अनुवृत्ताकार ( एकाकार ) अध्यवसाय ( अनुगत आकार का निश्चय ) होता है, तो वहाँ पर भी इदानीन्तन ( वर्तमान ) प्रत्यक्ष ज्ञान के संबन्ध से अर्थ की अपरोक्षता उत्पन्न होती है । इस समय अतीत ज्ञान का अभाव होने से अतीत ज्ञान की विषयता का भी अभी अभाव ही, अर्थात् विनाश ही हो जाता है । ऐसी स्थिति में उत्पत्ति - विनाश से रहित अनुवृत्ताध्यवसाय ( अनुगत आकार का निश्चय ) क्षणिकत्व के अनुमान का are कैसे हो सकता है? ' किन्तु यह दोनों ही कथन सारहीन हैं, क्योंकि अवस्था के भेद के रहते हुए भी अवस्थावान् की इन सब areer ओं में अनुवृति उसी तरह से मानी जा सकती है, जैसे कि कटक, मुकुट, कुण्डल आदि अवस्थाओं में सुवर्ण की अनुवृत्ति रहती है । इस अनुवृत्ताकार की अनुस्यूति रहने से अभेदविषयक प्रत्यभिज्ञा बाधित नहीं हो सकती । सामानाधिकरण्य की परिभाषा यह है कि यह विभिन्न प्रवृत्तिनिमित्तों का आधार होते हुए समान विभक्ति के सहारे एक अर्थ में रहता है । अत्यन्त अभेद के रहने पर भी एक बट दूसरे घट का स्थान नहीं ले लेता और अत्यन्त भेद के रहने से हो अश्व महिष नहीं हो जाता । बाल्यावस्था वाले व्यक्ति का वृद्धावस्था में जब कोई शब्द से ' यह वही है ' ऐसा निश्चय कराता है, तो वह निश्वय दोनों अवस्थाओं में अनुगत अंश को अपना विषय बनावे तभी ठीक बैठ सकता है, क्योंकि अवस्थाओं की व्यावृति ( भेद ) होने पर भी अवस्थावान् की अनुवृत्ति दिखाई देती है । इसलिये fift ष दृष्टि से चिरकाल तक देखने वाला अवस्थावान् ( व्यक्ति ) पहले देखे गये व्यक्ति की अनुवृत्ति का ही निश्चय करता है । इसलिये क्षणभंगवाद का खण्डन भी स्पष्ट ही हैं । अतीत ज्ञान की कर्मता ( विषयता ) का अभी अभाव होने पर भी ' यह वही है ' इस अनन्यथा-सिद्ध अर्थात् अभ्रमात्मक, यथार्थ अनुभव के आधार पर अनुवृत्ताकार को सिद्धि होती है ।
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वेदाथपारिजातः ४६५ यदुक्तम् — विनष्टानिष्टयोरनम्यत्वं न सम्भवति, विरोधात् । तन्त्र, नाशानुभवस्यावस्थागोचरत्वेनावस्था-adis वृत्तौ बाधाभावस्योक्तत्वात् । यथा सादृश्यसामान्यगोचरता प्रत्यभिज्ञानस्य न संभवति, तदप्युक्तमेव । यदुक्तम्-स इत्यंशश्च न प्रत्यक्षोऽसन्निहितविषयत्वात् । स्मरणरूपत्वे चास्य न पूर्वदृष्टार्थग्राहित्वं स्पष्टप्रतिभासाभावात् । दृष्टार्थाध्यवसायकत्वेन तु स्मृतिरूपत्वे भ्रान्तत्वम्, स्वाकाराभेदेन दृष्टार्थाध्यवसायात् । अयमिति चांश: प्रत्यक्ष इष्यते । स्मरणप्रत्यक्षयोश्चैकत्वं विरुद्धयते । तस्मात् पूर्वज्ञानविषयत्वरहिते पुरोऽवस्थितेऽर्थे सादृश्येन पूर्वज्ञानविषयत्वमारोप्य स एवायमिति मानसं गृह्णाति । आरोपबलेन चातीतज्ञानकर्मताऽपरोक्षते एकाधिकरणे प्रतिभासेते, मरीचिकायां जलप्रत्यभिज्ञानमिव । आरोपाभावे त्वेते भिन्नाधिकरणे एव प्रतिभासेते, जलस्मरणमरीचिकाग्रणयोरिव । तस्मान प्रत्यभिज्ञानं संभवति, तदव्यविचारितरमणीयम्, सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञायामतीतकाल विशिष्टस्य वर्तमानकालावच्छिन्न-स्यार्थस्यावभासात् । न च पूर्वापरकालौ परस्परविरोधिनौ कथमेकत्र समञ्जसाविति वाच्यम्, विशेषणयोर्भेदेऽपि विशेष्यमात्रस्याभेदसंभवात् । नहि केयूरकिरी दीनां भेदेऽपि देवदत्तस्याभेदो न संभवति । ननु केयूरादीनामविरोध एवेति चेन्न, परस्परव्यवहारभेदे व्यवस्थितानां सर्वेषां भावानां बौद्धविरोधाभ्युपगमात् । ननु केयूरादीनां विरोधेऽपि तदवस्थानादेक देवदत्त सम्बन्धित्वमभ्युपगन्तुं शक्यते, पूर्वापरकालयोस्तु यौगपद्यासंभवेन तदसन्निधानात् कुतस्तद्विशिष्टता विशेष्यस्येति चेन्न, सोऽयमित्येकस्मिन् तयोः प्रतीतिदर्शनात् । प्रतोत्यधीनं हि वस्तुतत्त्वनिर्णयः । अन्यथा वह्नीनां प्रतीतीनामपह्लवप्रसङ्गः । वस्तुतो नायं शब्दप्रत्यभिज्ञामात्रै विवादः, यह कहा गया है कि ' विनष्ट और अविनष्ट इन दो विरोधी पदार्थों की अनन्यता अर्थात् एकता नहीं हो सकती । किन्तु यह कथन गलत है, क्योंकि विनाश के अनुभव का विषय केवल अवस्था होने के कारण अवस्थावान् व्यक्ति की अनुवृत्ति में कोई बाधा नहीं हैं. यह कहा जा चुका है । प्रत्यभिज्ञान की सादृश्यसामान्यविषयता नहीं होती, यह बात भी कही जा चुकी है । यह भी कहा है कि प्रत्यभिज्ञा का ' वह ' इत्याकारक अंश प्रत्यक्ष नहीं है, क्योंकि उसका विषय असंनिहित है । इसको यदि स्मृतिरूप माना जाय तो इसमें पूर्व दृष्ट अर्थ की ग्राह्यता नहीं रहेगा, क्योंकि इसका स्पष्ट प्रतिभास नहीं होता । दृष्टार्थ का अध्यवसाय ( निश्चय ) है, अतः स्मृति रूप है, ऐसा मानने पर इसको भ्रान्त ज्ञान मानना पड़ेगा, क्योंकि अपने आकार से अभिन्न रूप में ही दृष्टार्थ का अध्यवसाय ( निश्चय ) रहता है । ' यह है ' इत्याकारक अंश प्रत्यक्ष माना जाता है । स्मरण और प्रत्यक्ष की एकता परस्पर विरुद्ध है । इसलिये पूर्व ज्ञान के विषय से रहित सामने स्थित पदार्थ में सादृश्य के आधार पर पूर्वज्ञानविषयता का आरोप करके ' वह यही है ' इस तरह का मानस बोध होता है । आरोप के बल से ही अतीत ज्ञान को कर्मता और अपरोक्षता ये दोनों एक ही अधिकरण में भासित होते है । जैसे fe after में जल की प्रत्यभिज्ञा ( नश्चय सा ) होतो है । जब आरोप नहीं होता तो ये दोनों free free afte रणों ( आश्रयों ) में ही रहते हैं, जैसे कि जल की स्मृति और मरुमरीचिका का ग्रहण ( प्रत्यक्ष ज्ञान ) । इस तरह से प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति नहीं बन सकती । ' किन्तु यह सब अविचारित रमणीय बातें हैं, क्योंकि ' वह यह है ' इस प्रत्यभिज्ञा में rate era faf शष्ट वस्तु की वर्तमान काल से विशिष्ट रूप में प्रतीति होती है । ' पूर्व और अपर काल परस्पर विरोधी हैं, इनकी एक जगह स्थिति कैसे हो सकती है? " इसका समाधान यह है कि विशेषण के भेद के रहते हुए भी विशेष्य मात्र में अभेद हो सकता है | केयूर, किरीट आदि विशेषता के भिन होने पर भी उनसे विशिष्ट देव er अभिन्न नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । प्रश्न है कि कटक, केयूर आदि का तो कोई विरोध ही नहीं । उत्त है कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि परस्पर व्यवहार के भेद से व्यस्थित सभी भावों ( पदार्थी ) का बौद्ध मत में परस्पर विरोध ही माना गया है । इसका अभिप्राय यह है कि बौद्ध मत के अनुसार कटक, कुण्डल आदि में भी अर्थक्रया की भिन्नता के आधार पर परस्पर भेद और विरोध मानना पड़ेगा । प्र हैं कि ' कटक, केयूर प्रभृति का परस्पर विरोध होते हुए भी एक देवदत्त में उनकी अवस्थिति मानी जा सकती है, पूर्व और अपर काल का तो यौगपद्य असंभव है, अत: उनकी परस्पर एकत्र संनिधि के अभाव में विशेष्य की तदुभयविशिष्टता कैसे हो सकती है? इसका उत्तर यह है कि ' वह यह है ' इस एक प्रत्यभिज्ञा प्रत्यय में उन दोनों अवस्थाओं की अवस्थिति देखी जाती है । ५ ९
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४६६ दार्थपारिजातः किन्तु स्तम्भादिप्रत्यभिज्ञानसाधारणोऽयमाक्षेपः । प्रत्यभिज्ञायां द्वी कालो प्रतीयेते, न च तो सन्निहिताविति चित्रम् | ननु किं भूतोऽपि काल इदानीमस्ति चेन्नैवं नासावस्तीत्युच्यते किन्त्वासीदिति । एवमस्तीत्युच्यमानो वर्तमान एव न भूतः । ननु तर्हि भूतो भूतत्वादेवेदानीं नास्तीति कथं प्रतिभासत इति चेन्न, तस्य भूतत्वेन प्रतिभासे वाधा-भावात् । भूतः कालो भूततया, वर्तमानो वर्तमानतया गृह्यते । अर्थस्तूभयानुगत एक एव गृह्यते । ननु भूतकालस्ये-दानीमभावात्तद्विषयं ज्ञानमनर्थजं स्यादिति चेन्न तदवच्छिन्नस्य धर्मिणो ज्ञानजनकस्य सत्त्वात् । न च भूतस्यावच्छेद-ara मपि कथमिति वाच्यम्, तथा प्रतीतेः । स एवायमिति यः पूर्वमासीत् स इदानोमप्यस्तीत्यतीतकाल विशिष्टोऽर्थोऽ-स्यां प्रतीत भासते । नन्वेवमप्यसता कालेन विशेषितमर्थं कथमिन्द्रियजन्यं ज्ञानं गोचरयेदिति वाच्यम्, शतादिज्ञानेऽ-तीत संख्येयानामिव प्रत्यभिज्ञायामतीतकालस्य हेतुत्वे बाधानापत्तेः । तदुक्तम् --- ' अन्त्य संख्येयसंवित्तिकाले प्रागव-लोकिताः । यथा शतादिज्ञानानि जनयन्ति घटादयः । अतीतकालसंसर्गो भवन्नेव विशेषणम् । स्तम्भादिप्रत्यभिज्ञायाः ' कारणम् ॥ ' नन्वत्र घटादयः सन्त्येव नातीता इति चेन्न, कपित्थेषु भक्ष्यमाणेषु शतं कपित्थानां भक्षितवान् बाहीक इति प्रतीती कपित्थानामवर्तमानत्वाद् यथातिक्रान्तान्यपि नवनवतिः कपित्थानि शतप्रतीतिहेतुत्वं प्रतिपद्यन्ते, प्रतिभा-सोपारूढत्वात्, तथैवातीतकालयोगोऽपि प्रतिभासमानत्वादेव प्रत्यभिज्ञाहेतुतां प्रतिपत्स्यते । शतमिति प्रत्ययस्य वस्तु के स्वभाव का निर्णय प्रतीति ( अनुभव ) के अधीन होता है । अन्यथा अनेक प्रतीतियों ( अनुभवों ) को हमें अस्वीकार कर देना पड़ेगा | वस्तुत: यह विवाद केवल शब्द की प्रत्यभिज्ञा तक ही सीमित नहीं है, किन्तु यह आक्षेप स्तम्भ आदि की प्रत्यभिज्ञा पर भी लागू होता है । प्रत्यभिज्ञा में दो कालों की प्रतीति होती है, किन्तु वे संनिहित नहीं हैं, यह एक विचित्र ही बात हुई । तो क्या भूत काल भी अभी वर्तमान है? नहीं, हम कहीं कहते हैं कि वह अभी है, हमारा तो कहना है कि वह था । इस तरह से अस्ति क्रिया का यहाँ वर्तमान से संबन्ध है, भूल से नहीं । पुनः प्रश्न उठता है कि ' तब तो भूत तो व्यतीत हो चुका, वह जब अभी नहीं है, तो उसका प्रतिभास कैसे होता है '? उत्तर है कि उसका व्यतीत हो चुके काल के रूप में प्रतिभास मानने में कोई बाधा नहीं है । भूत की व्यतीत काल के रूप में और वर्तमान की विद्यमान काल के रूप में प्रतीति होती है । इन दोनों कालों में अनुगत विषय तो एक ही रहता है । भूत काल तो अभी है नहीं, अतः भूत काल विषयक ज्ञान जो अभी हो रहा है, उसकी उत्पत्ति वस्तु के अभाव से ही माननी पड़ेगी । इस शङ्का का समाधान यह है कि भूत काल से अच्छित धर्मी तो अभी अवस्थित है, अतः उसी में ज्ञानजनकता मानी जायगी । भूत काल की अवच्छेदकता कैसे हो सकती है? उत्तर है कि ऐसी ही प्रतीति होती है । ' वह यही है ' इसका अभिप्राय यह है कि जो पहले था, वही अभी भी हैं । इस तरह से इस प्रतीति में अतीत काल से विशिष्ट अर्थ का प्रतिभास होता है । इस पर भी शङ्का उठती है कि अविद्यमान काल से विशेषत वस्तु को इन्द्रिय जन्य ज्ञान कैसे अपना विषय बना सकता है? इसका समाधान यह है कि सौ संख्या की वस्तु के ज्ञान में जैसे अतीत संख्या वाले पदार्थों की प्रतीति में अतीत काल की हेतुता में कोई बाधा नहीं होती, उसी तरह से प्रत्यभिज्ञा में भी अतीत काल की हेतुता में कोई बाधा नहीं उपस्थित होगी । जैसा कि कहा गया है -- ' अन्तिम संख्या वाली वस्तु की संवित्ति ( ज्ञान ) के समय पहले देखे गये घट आदि पदार्थ जैसे उनमें शत आदि बुद्धि के जनक हैं, उसी तरह से स्तम्भ प्रभृति की प्रत्यभिज्ञा में भी अतीत काल के संसर्ग विशेषण के रूप में विद्यमान रहती हुई ही कारण बनती है ' । प्रश्न है कि ' शत आदि संख्या के ज्ञान के समय घटादि तो विद्यमान ही है, अतीत नहीं, ऐसी अवस्था में उनका उदाहरण कैसे दिया जा सकता है '? उत्तर है कि जब कपित्थ खा लिये गये हैं, तब भी बाहीक ( ग्रामीण ) को सौ कपित्थ खा लिये हैं, इस तरह की प्रतीत होती है, यहाँ पर कपित्थों के न रहने पर भी जैसे खा लिये गये निन्यानवे कपित्थ सोचें की प्रतीति में कारण माने जाते हैं, क्योंकि कमिक प्रतिभास में वे विद्यमान हैं, उसी तरह से अतीत काल का योग भी प्रतिभासित होने ' कारण हो प्रत्यभिज्ञा में हेतू होता
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III विकल्पत्वोक्तिस्तु बालिशभाषितम्, लोके सविकल्पप्रत्ययानां प्रामाण्यदर्शनात् । सामान्यसिद्धिवद् द्वित्वादिसंख्यासद्भाव-सिद्धेनिष्प्रत्यूहत्वात् । एतेन स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानं किमेकमेव ज्ञानमुत स्मृत्यनुभवरूपे द्वे ज्ञाने? नाद्यस्तस्य कारणत्वा-नुपपत्तेः । नेन्द्रियं स इत्यंशे तस्यासामर्थ्यात् । न संस्कारस्तस्यायमित्यंशेऽशक्तत्वात् । उभाभ्यां संभूयाऽपि न तन्त्रयितुं शक्यते, पृथक् पृथक् स्वकार्य्योत्पादने तत्कौशलस्य विज्ञातत्वात् । यथा मृत्पिण्डतन्तुनिर्वर्त्यकाय्यन्तिरं न दृश्यते, तथैवे-हापि ज्ञेयम् । तस्मात् स्मर्तव्यविषया स्मृतिः, ग्राह्यगोचरानुभूतिश्चेति ज्ञानद्वयमेवेह मन्तव्यम् । नात्रैक्य परामर्शि ज्ञानान्तरम् । यथा निरन्तरोत्पन्नेऽपि घटज्ञानपटस्मृती न तुल्यविषये, तथा सोऽयमित्येते अपि न तुल्यविषये । ज्ञान-कत्वेऽपि तद्व्यतीतकालयुक्तं वस्तु गोचरयेन स्मरणाद्विशेषः, अनागतविशिष्टगोचरत्वे मनोराज्यमात्रं तत्स्यात् । वर्तमा नेकनिष्ठत्वे तु नैक्यसाधकत्वम्, कालत्रयपरीतत्वं तु विरोधादेवासंभवम् । परस्परपरित्यागव्यवस्थित निजात्मनामेकत्र न समावेशः कथञ्चिदुपपद्यते । यथा नीलबोधेन नीलाभावाविनाभूतलोहिताद्यपोहिना नीलमेव निश्चीयते, तथैव तदभावाविनाभूतस्वस्वकालाद्यपोहिना वर्तमानार्थबोधेन वर्तमानग्रहणमेव भवति । पूर्वज्ञानस्येदानीमसत्त्वेन पूर्वज्ञान-विशिष्टार्थग्राहित्वं प्रत्यभिज्ञाया न संभवति, अगृहीतविशेषणाया विशिष्टबुद्धेरभावात् । अर्थोपजननापायरहित-वस्तुस्वरूपग्राहिणी प्रत्यभिज्ञेत्यपि न संभवति, वर्तमानेकनिष्ठतायाः प्रदर्शितत्वात् । भावानां विनाशजन्मनोर्वर्तमानो वा कालः स्यादन्यो वा, तदन्यस्तु ग्रहीतुमशक्य इत्युक्तमेव । वर्तमाने तु तदुत्पादविनाशकाले कथ्यमाने तद्ग्रहणात्त-है । ' सी संख्या की प्रतीति विकल्प मात्र है ' ऐसा कहना बचकानापन ही माना जायगा, क्योंकि लोक में सविकल्पक प्रतीतियों भी प्रमाणभूत मानी जाती हैं । सामान्य की सिद्धि को तरह ही द्वित्व आदि संख्या की सत्ता की सिद्धि में भी कोई विघ्न बाधा नहीं है । उक्त प्रतिपादन से इस बात का खण्डन हो जाता है कि ' यह वही है ' इस प्रत्यभिज्ञा में एक ही ज्ञान है, अथवा इसमें स्मृति और अनुभव रूप दो ज्ञान हैं? यहाँ पर एक ही ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि उसका कोई कारण उपलब्ध नहीं है । इन्द्रिय इसलिये कारण नहीं होगा कि वह ' स ' ( वह ) इस भूत अर्थ को ग्रहण करने में असमर्थ है और संस्कार ' अयम् ' इस प्रत्यक्ष अंश को ग्रहण करने में असमर्थ है । दोनों मिलकर के भी इस ज्ञान को एक जगह नहीं ला सकते, क्योंकि इनकी कुशलता अलग - अलग कार्य निष्पादन में ही देखी गई है । जैसे ' मृत् पिण्ड और तन्तु दोनों से निष्पन्न कोई कार्यान्तर देखने को नहीं मिलता, उसी तरह से यहाँ पर भी समझना चाहिये कि उक्त दोनों ज्ञान भी किसी कार्यान्तर को पैदा नहीं कर सकते । इसलिये स्मृति की स्मर्तव्यविषयता और अनुभूति में ग्राह्यगोचरता माननी पड़ेगी । इस तरह से ये दो ज्ञान भिन्न - भिन्न ही मानने पड़ेंगे । यहाँ पर इन दोनों के ऐक्य का परामर्श करने वाला कोई एक भिन्न ज्ञान नहीं है । जैसे निरन्तर उत्पन्न होने वाले घट ज्ञान और पट स्मृति तुल्यविषयक नहीं होते, उसी तरह से वह यही है, ये दो ज्ञान मी तुल्यविषयक नहीं हो सकते । यदि यहाँ पर एक ही ज्ञान माना जाय तो भी यदि वह अतीत काल से युक्त वस्तु को अपना विषय बनावे तो उसमें और स्मृति में कोई अन्तर नहीं रहेगा । अनागत काल से विशिष्ट वस्तु को अपना विषय बनावेगा, यह तो कपोलकल्पना मात्र हो सकती है । इसको यदि केवल वर्तमानविषयक माना जाय तो फिर यहाँ पर वह और यह की एकता सिद्ध न हो सकेगी । तीनों कालों को इसका विषय मानना परस्पर विरोध के कारण सम्भव नहीं हो सकता । जिस वस्तु का जिस तरह का स्वभाव है, उसमें से परस्पर कुछ न कुछ अंश को छोड़कर वे एक जगह जुट जायें, यह कभी संभव नहीं हो सकता । जैसे नील बोध नील के अभाव से अनाभूत लोहित आदि के बोध का अपोहन कर केवल नील वस्तु का ही निश्चायक होता है, उसी तरह से वर्तमान Date भी वर्तमान के अभाव से अविनाभूत स्व - स्वकाल का अपोहन कर केवल वर्तमान काल का ही निश्चायक हो सकता है । पूर्व ज्ञान अभी विद्यमान नहीं है, अतः प्रत्यभिज्ञा पूर्वज्ञानविशिष्ट अर्थ का ग्रहण नहीं कर सकती । बिना विशेषण का ग्रहण किये विशिष्ट बुद्धि बन नहीं सकती । प्रत्यभिज्ञा केवल वस्तु के स्वरूप को ग्रहण करती है, उपजनन स्वभाव और अपाय स्वभाव धर्मो का नहीं, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह केवल वर्तमान वस्तु का ही ग्रहण करती है, ऐसा आप कह चुके हैं । उत्पत्ति - विनाश शील पदार्थों का या तो वर्तमान काल होगा या कोई एक दूसरा । वर्तमान से भिन्न का ग्रहण नहीं हो सकता, यह पहले ही कहा जा चुका है । वर्तमान
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४६८ वेदार्थपारिजातः दविनाभूतो भावानामुत्पादविनाशावपि गृहोती स्याताम् । सेयं तपस्विनी स्थैर्य प्रसाधयितुमागता प्रत्यभिज्ञा विनाशित्वं प्रतिष्ठाप्य गमिष्यति ' इत्याद्यप्यपास्तम्, प्रत्यभिज्ञाहेतुस्वरूपतत्प्रामाण्यसिद्धी बाधाभावात् । तथाहि -- मोमांसकमतरीत्या पूर्वानुभवज नितसंस्कारसध्रीचीनेन्द्रिजन्यत्वेन ग्रहणस्मरणरूपमेकमेव ज्ञानम् । तत्र पूर्वानुभूतोऽशः स्मर्थ्यते । स्मर्यमाणेन तेन सहैकत्वविशिष्टं वर्तमानं रूपं प्रत्यभिज्ञया गृह्यते । लूनपुनर्जात-केशनखादिषु प्रदीप सरित्प्रवाहादिषु च बाघकयोगात् सादृश्यादिगोचरता प्रत्यभिज्ञाया युज्यते । न पुनरिह, शब्दभेदे प्रमाणाभावात् । शब्दस्य क्षणिकत्वे प्रत्यासन्नैर्गृहीतमात्रो नष्टः कथं पश्चाद्विप्रकृष्टैर्गृह्येत । इदानीं तु रेडियोयन्त्रद्वारा योजन सहादूरस्थितैरपि शब्दः श्रूयते । न चैवमक्षणिकन प्रत्यासन्नानां चिरकालमनुवर्तनं स्यात्, त्वरत्वेन चिरमनवस्थानोपपत्तेः । अर्थप्रतिपत्त्यन्यथाऽनुपपत्त्या शब्दस्य नित्यत्वं तु सिद्धमेव । प्रत्युच्चारणमन्यान्यत्वे तु सम्बन्धग्रहणा-संभवादगृहीतसम्वन्धस्य च प्रत्यायकत्वासंभव एव स्यात् । न चान्यस्मिन् गृहीतसम्वन्धेऽन्यः प्रत्याययति, गोशब्दे गृहीतसम्वन्धेऽगृहीतसम्बन्धस्याश्वशब्दस्याप्रत्यायकत्वात् । न च सादृश्यात् कस्मिंश्चिद् गोशब्दे गृहीतसम्बम्धेऽन्यो गोशब्दः प्रत्याययिष्यति । द्विस्त्रिर्वाऽनुपलब्धस्यान्वयव्यतिरेकासंभवेन कस्यापि सम्बन्धग्रहणासंभवेन मुख्यार्थवत्वासंभवात् । प्रत्यभिज्ञया च स्थायित्वमुक्तमेव । ननु तथापि प्रत्यभिज्ञानमतिक्रान्तग्राहि चेन्द्रियार्थसन्निकर्षजश्चेति विरुद्धमिति चेन्त्र, प्रत्यभिज्ञायमानस्य सन्निकृष्टस्य वर्तमानत्वेन बाधाभावात् । में ही यदि उनका उत्पाद और विनाश काल माना जाय तो वर्तमान के ग्रहण से ही उसके अविनाभूत उत्पाद और विनाश का भी ग्रहण होने लगेगा | ' इस तरह से स्थिरता को सिद्ध करने के लिये आयी ( स्वीकृत ) यह तपस्विनी ( बेचारी ) प्रत्यभिज्ञा भावों की विनाशिता का ही सिद्ध करके चली जायगी, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा के हेतु, उसके स्वरूप और प्रामाण्य की सिद्धि में कोई बाधा नहीं है । जैसे कि मीमांसकों के मत के अनुसार पूर्व अनुभव से जनित ( उत्पन्न ) संस्कार सहित प्रत्यक्ष और स्मरण रूप एक ही ज्ञान को इन्द्रियजन्य प्रत्यभिज्ञा कहते हैं । इस ज्ञान में पूर्व अनुभूत अंश का स्मरण कराया जाता है और उस स्मर्यमाण अंश के साथ एकाकार विशिष्ट वर्तमान रूप प्रत्यभिज्ञा से गृहीत होता है | लूनपुनर्जात ( कट कर फिर पैदा हुए ) केश, नख आदि में तथा प्रदीप, सरित्प्रवाह आदि में बाधक प्रमाण की उपस्थिति के कारण प्रत्यभिज्ञा की इन स्थलों पर सादृश्यगोचरता ( विषयता ) मानना उचित है, किन्तु यहाँ पर हम ऐसा नहीं मान सकते, क्योंकि शब्द की भिन्नता में कोई प्रमाण उपस्थित नहीं है । शब्द को यदि क्षणिक माना जाय तो पास के आदमी के उसके सुनते ही तो यह नष्ट हो गया तो फिर बाद में दूर के आदमी को वह कैसे सुनाई पड़ता है । आजकल तो रेडियो द्वारा हजारों योजन दूर बैठा आदमी उन शब्दों को सुन सकता है । ' यदि शब्द क्षणिक नहीं है तो पास के आदमी को चिरकाल तक ये सुनाई क्यों नहीं पड़ते '? इसलिये नहीं सुनाई पड़ते कि ध्वनियां नश्वर हैं, अतः वे चिरकाल तक नहीं ठहर सकती । अर्थ ate की rreer उपपत्ति नहीं हो सकेगी, इस तरह से अर्थापत्ति प्रमाण से तो शब्द की नित्यता सिद्ध हो ही जाती । प्रत्येक उच्चारण में शब्द यदि भिन्न - भिन्न माने जायेंगे तो उनका अर्थ के साथ सम्बन्ध कैसे स्थिर होगा? शब्द और अर्थ का सम्बन्ध स्थिर हुए बिना शब्दों को अर्थ का ज्ञान कराने वाला कैसे माना जा सकेगा? सम्बन्ध का ग्रहण किसी दूसरे शब्द के साथ हो और अर्थ का ज्ञान कोई दूसरा शब्द करावे, ऐसा नहीं हो सकता । गो शब्द के साथ जिस अर्थ का सम्बन्ध गृहीत है, उसको अगृहीत सम्बन्ध अश्व शब्द नहीं प्रतिपादित कर सकता | किसी एक गो शब्द से सम्बन्ध के गृहीत हो जाने पर सादृश्य के आधार पर अन्य गो शब्द से भी अर्थ का ज्ञान इसलिये नहीं माना जा सकता कि जब तक दो तीन बार एक साथ उपलब्ध न हो जाय तब तक अन्वयव्यतिरेक सम्बन्ध ठीक से नहीं जाना जा सकता । इस परिस्थिति में जबतक किसी एक जगह भी यह सम्बन्ध बार - बार देख न लिया जाय तो सकी मुख्यार्थ में वृत्ति ही कहाँ बनेगी, जिसके आधार पर कि सादृश्य प्रतीति बन सके । प्रत्यभिज्ञा के द्वारा ही यह स्थायिता सिद्ध हो सकती है । प्रश्न है कि फिर भी प्रत्यभिज्ञा अतिक्रान्त का ग्रहण करती है और इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न भी होती है, ये दोनों बातें तो परस्पर विरुद्ध हैं । उत्तर है कि प्रत्यभिज्ञायमान वस्तु आंखों के सामने विद्यमान है, अतः उसका वर्तमान में यदि ग्रहण हो रहा है तो इसमें कोई बाधा नहीं आ सकती ।
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दार्थपारिजातः ४६६ ननु वर्तमानकाल एवार्थोऽस्तीति चेत्, वर्तमानस्येवातीतकालस्यापि तदवच्छेदकत्वेन तददोषात् । तदवच्छिन्नश्चार्थ इदं ज्ञानमादधातीत्यर्थजमेतदिन्द्रियजमपि भवति, तद्भावाभावानुविधानात् । नन्वतीतग्राहित्वकल्पना-पेक्षया प्रत्यभिज्ञाया अप्रामाण्यमेवास्त्विति चेन्न, बाधकाभावेन तदनुपपत्तेः । क्षणिकत्वसाधकानुमानं तु प्रतिक्षिप्तमेव । न च कारणदोषादेवाप्रामाण्यमस्तु है तस्याप्यसिद्धत्वात् । नन्वतीतविषयग्रहणे सामर्थ्याविरह एवं दोपोऽस्त्विति चेन्न, स्वतन्त्रे काले तत्मामर्थ्यविरहेऽपि तद्ग्राह्य वर्तमान वस्तुविशेषणीभूते संस्कारसचिवस्येन्द्रियस्य तत्सामर्थ्य सन्त्त्रात् । अथवा सुरभि चन्दनमिति बुद्धिवन्मानसमेव प्रत्यभिज्ञानमस्तु । यथा नेत्रगोचरे चन्दनं तदविषयगन्ध-विशेषिते वाह्येन्द्रियद्वारकग्रहणमघटमानं मानसं ज्ञानमुपेयते, तथंवेन्द्रियसन्निकृष्टेऽतीतक्षणविशिष्टे वस्तुनि मानसमेव प्रत्यभिज्ञानम् । लूनपुनर्जातकेशनखादिषु मुण्डितशिरोदर्शनादिकमेव वाधकम् । ज्वालादावपि तैलवर्तिक्षयानुमान तित्वादाता प्रत्यभिज्ञा | शब्दविषयिण्या विनाशबुद्धेस्तु ध्वनिविषयत वेत्युक्तमेव । ' बौद्धराद्धान्त विध्वान्तविध्वंसनपटीयसी । प्रत्यभिज्ञा महाशक्तिनिष्प्रत्यूहं विराजते ॥ ' इति । एतेन ' शब्द उत्पद्यते, ततः स्वविषयं ज्ञानं जनयति, अजनकस्य प्रतिभासायोगात् । ततस्तेन ज्ञानेन शब्दो गृह्यते, ततः संस्कारोद्बोधस्ततः पूर्वज्ञातशब्दस्मरणम्, ततस्तत्सचिवं श्रोत्रं मनो वा प्रत्यभिज्ञानं जनयिष्यति । इतीयत्कुतोऽस्यायुरिति न्यायमञ्जरीकारोक्तिरप्यपास्ता, प्रबुद्धसंस्कारस्य शब्दप्रत्यभिज्ञाने तावत्क्षणानपेक्षत्वात्, पुनः शंका उठती है कि ' अर्थ तो यहाँ पर वर्तमान काल में ही विद्यमान है, भूतकाल में नहीं । ' उत्तर है कि वर्तमान काल की तरह भूतकाल भी उसका अवच्छेदक ( विशेषण ) है, अतः उक्त प्रतीति में कोई बाधा नहीं है । उन दोनों कालों से अवच्छिन्न ( विशिष्ट ) अर्थ इस प्रत्यभिज्ञा को जन्म देता है, इस तरह से यह ज्ञान अर्थं से और इन्द्रिय से दोनों से उत्पन्न होता है, क्योंकि यहाँ पर उसके भाव और भाव दोनों की स्थिति रहती है । प्रश्न होता है कि प्रत्यभिज्ञा अतीत त्रस्तु का ग्रहण करती है, इस कल्पना की अपेक्षा से तो उसको अप्रमाण मान लेना ही ठीक है । उत्तर है कि बायक प्रतीति के अभाव में इसको अप्रमाण नहीं माना जा सकता । क्षणिकत्व के साधक अनुमान का तो खण्डन किया ही जा चुका है । ' कारण दोष के कारण भी इससे अप्रामाणिकता नहीं आ सकती, क्योंकि कोई कारण दोष यहाँ सिद्ध नहीं हो सकता है । यहाँ पर पूर्वपक्षी का कहना है कि अतीत विषय के ग्रहण सामर्थ्य का अभाव ही यहाँ दोष माना जायगा । तो इसका उत्तर है कि स्वतन्त्र काल में यद्यपि यह सामर्थ्य नहीं है, किन्तु प्रत्यभिज्ञा ग्राह्य वर्तमान वस्तु की विशेषणीभूत अवस्था में संस्कार के साथ विद्यमान है, अतः दोष की उपस्थिति का कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता । अथवा ' यह चन्दन सुगन्ध युक्त है ' इस बुद्धि के समान प्रत्यभिज्ञा भी एक प्रकार का मानस प्रत्यक्ष है | जैसे चक्षुरिन्द्रिय के विषय चन्दन ' जब चक्षुरिन्द्रिय के अविषय गन्ध से विशिष्ट चन्दन की प्रतीति होती है तो यह बाह्य इन्द्रिय के आधार पर नहीं हो सकती, अतः इसको मानस ज्ञान माना जाता है, उसी तरह से इन्द्रिय से संनिकृष्ट और अतीत क्षण से विशिष्ट वस्तु की ज्ञान रूप प्रत्यभिज्ञा को मानस ज्ञान ही मानना चाहिये । लूनपुनर्जात केश, नख आदि में मुण्डित शिर का देखना प्रभृति अन्य सत् प्रतीतियाँ बाधक के रूप में विद्यमान रहती हैं, इसलिये वहाँ ऐसा नहीं माना जा सकता । दीपक की ज्वाला इत्यादि में भी तेल और और बसी के जल जाने को देखकर अनुमान से यह सिद्ध हो जाता है कि ये ज्वालाएँ भिन्न - भिन्न हैं, अतः यहाँ पर हुई प्रत्यभिज्ञा को भ्रामक माना जा सकता है, किन्तु शब्दविषयक विनाश बुद्धि ध्वनि के विनाश की ग्राहिका है, शब्द के विनाश की नहीं, यह पहले ही कहा जा चुका है । अतः शब्दविषयक प्रत्यभिज्ञा को भ्रान्त नहीं माना जा सकता । इस प्रकार से बौद्ध सिद्धान्त रूपी महाशक्ति बिना विघ्न - बाधा के सभी दार्शनिकों के उक्त प्रतिपादन से जयन्त भट्ट की अन्धकार को छिन भिन्न कर देने में सर्वथा समर्थ अत्यन्त चतुर यह प्रत्यभिज्ञा नामक मत में विराजमान है । इस उक्ति का भी खण्डन हो जाता है कि पहले शब्द उत्पन्न होता है, उसके बाद वह स्वविषयक ज्ञान को जन्म देता है, क्योंकि ज्ञान की जनकता के अभाव में उसका प्रतिभास न हो सकेगा । इसके बाद उस ज्ञान से शब्द गृहीत होता है, तब संस्कार का उद्बोध होकर पूर्व ज्ञात शब्द का स्मरण होता है । तदनन्तर स्मृति की सहायता से श्रोत्र अथवा
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४७० वेदार्थपारिजातः प्रत्यभिज्ञानप्रामाण्याच्च तावत्तिरोधानमपि निषिद्धमेव । तदुक्तम्- ' कैश्चित्तिरोहिते भावादित्यप्रामाण्यमुच्यते । तदसत्तत्प्रतीत्यैव तिरोधाननिषेधनात् ॥ ' इति । अपि च, मेघश्यामायां शर्व क्षणिकप्रायैरपि विद्युत्प्रकाशैः घटादिप्रत्य-भिज्ञानम्, तथैवाचिरस्थायिभिरपि ध्वनिभिर्व्यक्तस्य शब्दस्य प्रत्यभिज्ञानमपि युक्तमेव । तदप्युक्तम्- ' यथा निशीथे रोलम्बश्यामलाम्बुदडम्बरे । प्रत्यभिज्ञायते किञ्चिदचिरद्युतिधामभिः || तथाविरत संयोगविभागक्रमजन्मभिः । प्रत्यभिज्ञायते शब्दः क्षणिकैरपि मारुतैः ॥ ' इति । यदप्युक्तम् - शब्दे तदानीमेव विनाशप्रत्ययः संभवति, गोशब्दोऽयमश्वशब्दोऽयमिति तदभिधानविशेषो-ल्लेखात् । विद्युद्दृष्टवृक्षादी नाशवित्तिर्न भवतीह तु नाशवित्तिर्भवति, तेन न तत्तुल्यतेति । तदुक्तम्- ' यदप्युदितमुद्दाम-मेघश्यामासु रात्रिषु । साम्यं सौदामिनीधामजन्यया प्रत्यभिज्ञया । तदसत् कालदेद्वण तदवस्थित्यसम्भवात् । विद्युदृष्टे च वृक्षादी नाशसंवित्यसंभवात् ॥ इति, तदप्यकिञ्चित्करम्, शब्दो ध्वस्त उत्पन्नश्चेति बुद्धेर्ध्वनिविषयत्वेन शब्दोत्पत्तिनाशासंप्रतिपत्तेः । अभिव्यञ्जकध्वनेरपि त्रिचतुरक्षणस्थायित्वेन विद्युत्प्रकाशव्यङ्गवृक्षादिप्रत्यभिज्ञावद् ध्वनिव्यङ्गयशब्दप्रत्यभिज्ञोपपत्तेः । प्रबुद्धसंस्कारस्य प्रत्यभिज्ञानं निरुपप्लवमित्यप्युक्तमेव । अपि च, नैयायिका अपि गत्वादिसामान्यविषयत्वेन प्रत्यभिज्ञानमुपपादयन्ति । तन्मतेऽपि गव्यक्तीनां क्षणिकत्वेन नित्यस्यापि सामान्यस्य व्यक्तिव्यङ्ग्यत्वेन तदभिव्यक्तेरपि क्षणिकत्वेन कथं सामान्य प्रत्यभिज्ञानमपि । मन प्रत्यभिज्ञा को पैदा करेगा । ऐसी परिस्थिति में इसकी इतनी लम्बी आयु कहाँ से आवेगी । ' क्योंकि जिसके संस्कार प्रबुद्ध हैं, उसको शब्द को पहचानने में इतने क्षणों की अपेक्षा नहीं रहती । प्रत्यभिज्ञा के प्रामाण्य के आधार पर इतने क्षण तक शब्द का तिरोधान माना भी नहीं जाता । जैसा कि कहा गया है— ' कुछ लोगों के कथनानुसार शब्द के तिरोहित हो जाने के बाद उत्पन्न हुईं प्रत्यभिज्ञा का प्रामाण्य नहीं माना जाता । यह गलत बात है, क्योंकि उस प्रत्यभिज्ञा के आधार पर ही शब्द का तिरोभाव निषिद्ध हो जाता है । ' दूसरी बात, जैसे बादलों से भरी काली रात में बिजली की क्षणिक चमक से घट आदि की प्रत्यभिज्ञा होती है, उसी तरह से थोड़ी सी देर तक ठहरने वाली ध्वनियों से अभिव्यक्त शब्द की भी प्रत्यभिज्ञा हो ही सकती है । जैसा कि कहा गया है- ' जैसे रात्रि में आकाश में घने काले बादल छा जाने पर भी एक क्षण के लिये चमकने वाली विद्युत् के क्षणिक प्रकाश से वस्तु की पहचान हो जाती है, उसी तरह से निरन्तर संयोग - विभाग के क्रम से उत्पन्न होने वाली क्षणिक वायवीय ध्वनियों से शब्द की प्रत्यभिज्ञा होती है । ' यह भी कहा गया है कि ' शब्द में तो उसी समय उसके विनष्ट हो जाने की प्रतीति हो जाती है, क्योंकि यह गो शब्द है, यह अश्व शब्द है, इस तरह से यहाँ पर अभिधान विशेष का उल्लेख होता है । विद्युत् के प्रकाश में दिखाई पड़े वृक्ष आदि पदार्थों के नाश का ज्ञान नहीं होता, किन्तु शब्दों के तो विनाश की प्रतीति होती है । इसलिये दृष्टान्त, दार्शन्तिक में तुल्यता नहीं है । जैसा कि कहा गया है ' घनघोर काले बादलों के छा जाने से अन्धकार भरी रात में सौदामिनी ( बिजली ) के प्रकाश से उत्पन्न प्रत्यभिज्ञा का शब्दजन्य प्रत्यभिज्ञा से जो साम्य बताया गया है, वह गलत है, क्योंकि बिजली से दिखाई देने वाला वृक्ष आदि के नाश का ज्ञान नहीं होता और शब्द के तो नाश का ज्ञान होता है । किन्तु यह पूरा कथन भी अकिंचित्कर है, क्योंकि शब्द नष्ट हो गया और उत्पन्न हो गया, इस तरह की प्रतीतियाँ ध्वनि को अपना विषय बनाती है, अतः शब्द के नाश और उत्पत्ति की संप्रतिपत्ति ( उभय वादी संमत ज्ञान ) इससे नहीं मानी जा सकती । शब्द की अभिव्यंजक ध्वनि भी तीन चार क्षण स्थिर रहती है, अतः विद्युत् के प्रकाश से वृक्ष आदि की पहचान की तरह ध्वनि aise शब्द की भी पहचान हो सकती है | संस्कारों के प्रबुद्ध हो जाने पर प्रत्यभिज्ञा में कोई TET नहीं उठती, यह बताया जा चुका है । अपि च, नैयायिक भी गत्व आदि सामान्य की विषयता के आधार पर प्रत्यभिज्ञा का उपपादन करते हैं । उनके मत में भी व्यक्तियाँ क्षणिक हैं, तो भी उनसे नित्य सामान्य ( गत्व आदि जाति ) की अभिव्यक्ति मानी जाती है । जब ग व्यक्ति क्षणिक है तो उससे सामान्य की अभिव्यक्ति भी क्षणिक होगी, इस स्थिति में गत्व आदि जाति की भी प्रत्यभिज्ञा कैसे होगी? यदि इसके लिये