वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 481–490

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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दार्थ पारिजातः ४५१ स्त्येवेत्यनुमीयते । शब्दोऽपि प्रत्यभिज्ञानात् प्रागस्तीत्यवगम्यते || कूपपूरणयत्नेन खं तिरोधीयते यदा । आस्था-मादित्य हेतुस्तदानैकान्तिको भवेत् ॥ ' यथा आकाशं नित्यमपि भूमिजलावृतं सन्नानुभूयते, खननोत्से चनादिभिस्तदपो-हनेन तु व्यज्यते प्रयत्नानन्तर्येऽपि यथाकाशस्य न प्रयत्नकार्यत्वम्, तथैव कण्ठताल्वादिप्रयत्नानन्तर्येऽपि शब्दस्य न तत्कार्यत्वम्, प्रयत्ने स्थगितेऽपि यथा ss काशमस्त्येव तथैव कण्ठादिव्यापाराभावेऽपि प्रत्यभिज्ञानाच्छन्दोऽस्त्येव । कूपपूरणादियत्नेन यथा खं तिरोधीयते तथैव प्रयत्ने स्थगिते शब्दोऽपि तिरोधीयते । अपि च, शब्दस्य कृतकत्वं किं यत्किञ्चित्कारणजन्यत्वम् उत यद्व्यापारान्तरमुपलभ्यते तत्कृतत्वम्? यत्किञ्चित्कारणजन्यत्वे प्रयत्नानन्तर्य्यस्य न कृतकत्वप्रयोजकता, शब्दत्वादिनाऽनैकान्तिकता च । तद्वयापारजन्यत्वे लु मूलोदकादिभिरनैकान्तिकत्वम्, यतस्तत्र मूलोदकाद्युपलम्भस्य खननाद्यानन्तर्येऽपि तज्जन्यत्वाभावात् । नहि खननादिना मूलोदकादिकमुत्पद्यते, किन्तु सदेव व्यज्यते, एवमेवोच्चारणादिभिः सन्नेव शब्दो व्यज्यते, नोत्पद्यते । न चान्यस्य शब्दोत्पत्तिहेतुत्वं संभवति । न च प्रतिवन्धकाभावेऽपि प्रागूर्ध्वमनुपलम्भान्न शब्दसिद्धिः, मूलोदकादीनां तु मृत्तिकादि-प्रतिबन्धोऽस्त्येवेति वाच्यम्, मृत्तिकादिभिरप्रतिबद्धानामपि मूलोदकादीनां दीपाद्यभावादनुपलम्भेन व्यभिचारात् । यदि स्वभावादेवाप्रतिबद्धस्यापि मूलोदकादेरग्रहणं तदा बधिरादिवद् व्यञ्जकाभावाच्छब्दस्याप्यग्रहण-मुपपद्यत एव | अभिव्यञ्जकाभावस्यैव प्रतिबन्धकत्वमपि सम्भवत्येवेति प्रतिवन्धकाभावे सत्यनुपलम्भादसत्त्वं न सिद्ध्यति । पूर्वापरासत्त्वं त्वसिद्धमेव } साधनाभावात् सस्वेऽप्यनुपलम्भोपपत्तेः । दिया गया प्रयत्ननान्तरीयकत्व हेतु अनैकान्तिक हो जाता है । यदि यहाँ पर आप मानते हैं कि आकाश तो है ही, किन्तु उसको मिट्टी, जल आदि से भर दिया गया है, तो उसी तरह से प्रत्यभिज्ञान के आधार पर शब्द की भी पूर्व सत्ता क्यों न मानी जायगी । कुएं को भरने के प्रयत्न से जब आकाश तिरोहित हो जाता है, ऐसी प्रतीति होती हैं, तो उसका आधार वह कूपगत स्थान होता है । इस तरह से हेतु afar नहीं आती । जैसे आकाश नित्य होते हुए भी मिट्टी, जल आदि से भर दिये जाने पर प्रतीत नहीं होता, खोदने मोर उत्सेचन ( उलीचने ) से मिट्टी और जल के हट जाने पर वह पुन: प्रतीत होने लगता है । यहीं पर प्रयत्न के बाद उपलब्ध होने पर भी आकाश जैसे प्रयत्न का कार्य नहीं है, उसी तरह से कण्ठ तालु प्रभृति के प्रयत्न से अभिव्यक्त होने पर भी शब्द उनका कार्य नहीं माना जा सकता । प्रयत्न के स्थगित रहने पर भी जैसे आकाश की स्थिति है ही, उसी तरह से कण्ठ आदि के व्यापार के अभाव में भी प्रत्यभिज्ञा के आधार पर शब्द को भी सत्ता रहती ही है । कूप को भरने के प्रयत्न से जैसे आकाश तिरोहित हो जाता है, उसी तरह से प्रयत्न के स्थगित हो जाने पर शब्द भी विरोहित हो जाता है । अपि च, यह परीक्षणीय है कि शब्द की कृतकता क्या यत्किचित्कारणजन्य ( चाहे जिस कारण से ) है, अथवा जिसके व्यापार के अनन्तर वह होता है, तत्कृत है? यत्किचित्कारणजन्यता मानने पर प्रयत्नानन्तर्य की कृतकत्व प्रयोजकता न हो सकेगी और शब्दव आदि के कारण इसमें अनैकान्तिकता ( व्यभिचार ) भी आ जावेगी । व्यापार ( कण्ठ, तालु आदि प्रयत्न ) में जन्यता मानने पर मूलोदक ( जमीन के भीतर का पानी ) आदि से अनैकान्तिकता हो जायगी, क्योंकि यहाँ पर मूलोदक आदि के उपलम्भ की खननानन्तर्यता रहने पर भी उनकी खननादिजन्यता ( खोदने से पैदा होना ) नहीं मानी जाती । खननादि व्यापार से मूलोदकादि की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु पहले से विद्यमान मूलोदकादि की अभिव्यक्ति होती है । इसी तरह से उच्चारण आदि से विद्यमान शब्द की ही अभिव्यक्ति होती है, इनकी नई उत्पत्ति नहीं होती । इनके अतिरिक्त कोई दूसरा शब्द की उत्पत्ति का कारण संभव ही नहीं । ' प्रतिबन्धक के न रहने पर भी पहले और बाद में भी शब्द की अनुपल fer को देखकर उसका अभाव ही क्यों न मान लिया जाय, मूलोक आदि स्थल में तो मृतिका प्रभूति की प्रतिबन्धकता उपलब्ध है । यह कथन भी इसलिये गलत है कि मृत्तिका प्रमृति से अतिबद्धमूलोदक आदि की भी उपलब्धि दोष आदि के अभाव में नहीं होती, अतः उक्त हेतु व्यभिचरित है । यदि लोक आदि में प्रतिबन्ध के न रहते हुए भी स्वभावतः अनुपलब्धि मानी जा सकती है, तो बधिर आदि को शब्द प्रभृति की भी अनुपलब्धि की व्याख्या व्यंजक के अभाव को लेकर की जा सकती है । यहाँ पर अभिव्यंजक के अभाव को ही प्रतिबन्धक माना जा सकता है, अत: प्रतिबन्धक के अभाव के रहने पर भी अनुपलब्धि के कारण असत्ता यहाँ सिद्ध नहीं हो सकती । पूर्व ( पहले )

पृष्ठ 482

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III वेदार्थपारिजातः ननु व्यञ्जके सति कथं चिरं नोपलभ्यते? साधनस्यास्थिरत्वे तदुपलम्भस्यापि मेघान्धकारशर्वय विद्युज्जनितदृष्टिवदस्थिरत्वात् । यथा प्रदीपादिश्चक्षुषोऽनुग्रहद्वारा घटादेव्यंजकः, एवं श्रोत्रसंस्कारद्वारा ध्वनि । शब्दव्यञ्जकः, तथा संस्कृतेरुत्पत्ताविव फलबलकल्पशक्तिसिद्धत्वात् । न च व्यङ्ग्यव्यञ्जकयोः साजात्यमपेक्षितं प्राणगन्धादाविवेति वाच्यम्, श्रोत्रन्दयोः प्रदीपघटयोर्वे जात्येऽपि परैस्तदभ्युपगमात् । सत्तादिना तुल्यत्वे त्वत्रापि शक्यसमाधानम् । ननु वायुरापद्यते शब्दतामिति शिक्षाकारवचनाद् वायवीयद्रव्यविशेषः शब्दः, अतस्तदवयवसंयोगविशेष-नाशात् संभवत्येव तद्विनाश इति चेन्न प्रख्याभावाच्चेति सूत्रेण जैमिनिना प्रत्यभिज्ञाप्रामाण्येन तन्नित्यत्वसाधनेन शिक्षाकारवचनस्य शब्दव्यञ्जकध्वनिपरत्वेन नेयत्वात् । तदुक्तं भाष्यकारेण शबरस्वामिनाऽपि - वायवीयश्चेच्छब्दो भवेद् वायोः संनिवेशविशेषः स्यात् । न च तान् अस्य वायवीयानवयवान् चब्दगतान् स्पृशामः । तस्मान्न वायुकारणकः । ननु ' वर्णाः सर्वगतत्वाद्वा न स्वतः क्रमवृत्तयः । अनित्यध्वनिकार्यत्वात् क्रमस्यातो विनाशिता ॥ पुरुषाधीनता चास्य तद्विवक्षावशाद्भवेत् । वर्णानां निष्फला लेन नित्यता परमाणुवत् || ' क्रमविशिष्टानामेव वर्णानां वाचकत्वम्, तेषां चानित्यत्वमेवेति चेन्न विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि किं क्रमविशिष्टा वर्णा वाचका:? वर्णाश्रितः क्रमो वा वाचकः? नान्यः, निराश्रयस्य तस्यादर्शनात् । क्रमवतां वर्णानामेव वाचकत्वं प्राधान्यात् । न क्रमस्य, सर्वपदार्थाङ्गत्वेन तस्यावगमात् स्वतन्त्रत्वेन तस्याव्यवह्रियमाणत्वात् । और पर ( बाद में ) असता तो किसी भी तरह से नहीं हो सिद्ध होगी, क्योंकि साधन के अभाव में वस्तु के रहते हुए भी उसकी उपलब्धि नहीं होती, ऐसा प्रति दिन का अनुभव है । ' प्रश्न है कि व्यंजक के रहते हुए भी चिरकाल तक उपलब्धि क्यों नहीं होती '? उत्तर है कि साधन के अस्थिर होने पर उसकी सहायता से होने वाले उपलम्भ में भी उसी तरह से अस्थिरता रहती है, जैसे कि मेघ के अन्धकार से भरो रात्रि में बिजली की चमक की सहायता के रहते भी दृष्टि अस्थिर होती है । जैसे प्रदीपादि चक्षु की सहायता करके घटादि का अभिव्यंजक होता है, इसी तरह से श्रोत्र के संस्कार के द्वारा ध्वनि शब्द का अभिव्यंजक माना जाता है । इस तरह का संस्कार उत्पत्ति की तरह अभिव्यक्ति में भी फल के बल से कल्पित शक्ति से सिद्ध होता है । घ्राण और गन्धादि की तरह व्यंग्य और व्यंजक में भी साजात्य की अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि कई दार्शनिकों ने ( आप लोगों ने भी ) श्रोत्र और शब्द में प्रदीप और घट के समान वैजात्य ( जाविभेद ) होते हुए भी व्यंग्यन्व्यंजक संबम्ध ही माना है । सत्तादि को तुल्यता के आधार पर तो यहीं पर भी साजात्य ( सजातीयता ) के द्वारा समाधान किया जा सकता है । प्रश्न यह है कि शिक्षाकार के इस कथन के अनुसार कि वायु हो शब्द के रूप में परिणत होता है, शब्द वायवीय द्रव्यविशेष हैं । अतः वायु के अवयवों के संयोग विशेष के नाश के साथ शब्द का भी विनाश संभावित है? उत्तर है कि नहीं, ' प्रख्याभावाच्च ' इस सूत्र के द्वारा जैमिनि ने प्रत्यभिज्ञा के प्रमाण से शब्द की नित्यता सिद्ध की है, अतः शिक्षाकार का वचन शब्द व्यंजक safe के लिये है, ऐसा मानना उचित है । जैसा कि भाष्यकार शबर स्वामी ने कहा है --- यदि शब्द को वायवीय माना जाय तो उसका वह संनिवेश विशेष होगा, किन्तु शब्द में इन वायवीय अवययों के स्पर्श का अनुभव हम नहीं कर पाते, अतः हम शब्द को ' वायु का कार्य नहीं मान सकते ' । ser है कि ' वर्ण तो सर्वगत हैं, अतः वे स्वतः क्रम वृत्ति वाले नहीं हो सकते । क्रम अनित्य ध्वनि का कार्य है, इसलिये वह विनाश होता है । यह क्रम पुरुषाधीन भी है, क्योंकि पुरुष की विवक्षा होने पर ही यह क्रम उत्पन्न होता है । इस तरह से परमाणु की नित्यता के समान वर्णों की नित्यता सिद्ध करना मात्र व्यर्थ का प्रयास है । क्रम विशिष्ट वर्ण ही वाचक होते हैं, अत: इनकी अनित्यता ही माननी पड़ेगी । ' उत्तर है कि नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर इस विकल्प का कोई उत्तर नहीं है कि क्या क्रमविशिष्ट वर्ण at area है, या वर्णाति क्रम वाचक है? यहाँ पर अन्तिम पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि क्रम कभी भी निराश्रित नहीं रहता । प्रधानता के आधार पर क्रमवान् वर्णों को ही वाचकता मानी जाती है, क्रम की नहीं । क्योंकि क्रम सभी जगह किसी न किसी पदार्थ के अंग के रूप में ही अवगत ( ज्ञात ) होता है, स्वतन्त्र रूप से उसको सत्ता कहीं भी नहीं है और न ऐसा व्यवहार ही होता है |

पृष्ठ 483

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४५३ ननु तथापि क्रमस्य पौरुषेयत्वेन वेदस्य पौरुषेयत्वमिति चेन्न, क्रमस्यापि परम्पराप्राप्तत्वेनाको स्थ्येऽपि नित्यत्वस्योक्तत्वात् । ' वक्ता नहि क्रमं कञ्चित् स्वातन्त्र्येण प्रपद्यते । यथैवास्य परैरुक्तिस्तथैवेनं विवक्षति । परोऽप्येवमत-पचास्य सम्बन्धानादिता मता । तेनैवं व्यवहारात् स्यादकौटस्थ्येऽपि नित्यता । यत्नतः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता । ' ननु बर्णानामप्येवं नित्यत्वमस्तु, तस्य पूर्वोक्तरीत्या कूटस्थनित्यत्वे बाघाभावात् वर्णेषु नित्येषु सत्सु तानेवादाय प्रयोग विशेषेण क्रमविशेषस्य परमाणुभिरिव घटस्य निष्पादयितुं शक्यत्वात् । नित्यवर्णाभावे तदनुपपत्तेः । ध्वनिवशात् क्रम-विशेषोपपत्तिस्तव । कैश्चित्तु पर्वापक्रमः " चिरक्षिप्रात्मकं च दीर्घादिरूपं पूर्वापरचिरक्षिप्रप्रत्ययश्च कालावलम्बनाः, तेन sa निभिर्वर्णेषु पूर्वापरभावेन व्यज्यमान: काल एव क्रमः, तस्य चैकत्वं विभुत्वं नित्यत्वश्च । न चैकस्य नित्यस्य कुतः पूर्वापरविभक्तत्वेनावभास इति वाच्यम्, ध्वन्युपाधिवशाद्वर्णस्येवादित्यगतिक्रियोपाधिवशात् कालस्यापि पौर्वापर्य -प्रतीतिसंभवात् । क्षिप्रत्वं चाल्पक्रियावच्छेदात् । बहुक्रियावच्छेदाच्चिरत्वम् । तदुक्तम्- ' तस्मान्न पदधर्मोऽस्ति विनाशी कश्चिदीदृशः । तेन नित्यं पदं सिद्धं वर्णनित्यत्ववादिनाम् ॥ ' ननु च ध्वनीनां क्षणिकत्वेन तत्र वर्णाभिव्यक्तेरपि क्षणिकत्वेन कथं क्षणचतुष्टय साध्यप्रत्यभिज्ञा विषयत्वमिति चेन्न, ध्वनीनामनित्यत्वाभ्युपगमेऽपि क्षणिकत्वानभ्युपगमात् । ननु कोऽयं ध्वनिरिति वेदत्र भगवत्पादैः - ' यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमव-तरति प्रत्यासीदतश्च पटुमृदुत्वादिभेदं वर्णेष्वासञ्जयति स ध्वनिः, तन्निबन्धनाश्चोदात्तादयो भेदाः, न वर्णस्वरूपभेद-क्रम की पौरुषेयता के आधार पर भी वेद की पौरुषेयता नहीं सिद्ध की जा सकती, क्योंकि क्रम भी परम्परा प्राप्त है, अतः वेद की कूटस्थता न होने पर भी क्रमिक नित्यता मानी जाती है । ' कोई भी वक्ता वेद के विषय में अपना कोई स्वतन्त्र क्रम नहीं बना सकता, जैसा इसको इसके पूर्व पुरुषों ने बताया है, उसी क्रम से वह उसको कह सकता है | बाद वाला व्यक्ति भी उसी पद्धति का अनुसरण करेगा । इस तरह से यह परम्परा संबन्ध अनादि माना जाता है । इस परम्परा व्यवहार के आधार पर इस तरह से शब्द की कूटस्थता न होने पर भी प्रवाह नित्यता मानी जाती है । इस प्रसंग में हमको केवल बड़ी सावधानी से पुरुष की स्वतन्त्रता को ही निषिद्ध मानना पड़ता है । ' वर्णों को भी इस प्रकार प्रवाह नित्य नहीं मान सकते, क्योंकि पूर्वोक्त रीति से उनको कूटस्थ नित्य मानने में कोई बाधा नहीं है । वर्णों की नित्यता के बाधार पर ही उनको लेकर प्रयोग विशेष के अनुसार क्रम विशेष की रचना उसी तरह से हो सकती है, जैसे परमाणुओं से घटादि की रचना होती है । वर्णों की नित्यता के अभाव में यह संभव नहीं होगा । ध्वनि विशेष से क्रम विशेष की उत्पत्ति तो मानी हो गई है । कुछ लोगों का कहना है कि ' पूर्वापर का क्रम चिरक्षित भाव ( विलम्ब और शीघ्रता ) हस्व - दीर्घ आदि रूप और पूर्वापर का चिर क्षिप्रत्यय ( विलम्ब और शीघ्रता से ज्ञान ) ये सब काल पर अवलम्बित हैं । इसलिये ध्वनियों से वर्णों में पूर्वापर भाव के रूप में अभिव्यक्त होने वाला काल ही क्रम कहलाता है । यह क्रम एक हैं, विभु ( व्यापक ) है और नित्य भी है । एक और नित्य काल रूप क्रम की पूर्वापर विभाग रूप से प्रतीति ( ज्ञान ) उसी तरह से होती है, जैसी कि ध्वनि रूप उपाधि के कारण वर्ण की प्रतीति होती है । यहाँ पर भी काल की आदित्य ( सूर्य ) की गमनक्रिया रूप उपाधि के कारण काल में पौर्वापर्य क्रम की प्रतीति औपाधिक रूप से होती है । अल्प क्रिया के कारण शीघ्रता और क्रिया के आधिक्य के कारण विलम्ब होता है, यह भी ठीक है । इस विषय में कहा भी गया है- ' इस तरह से पद में ऐसा कोई धर्म नहीं है, जिसको कि के मानने वालों के यहाँ पद भी नित्य है । ' प्रश्न है कि ध्वनियाँ क्षणिक हैं, तो उनके क्षणिक ही होगी, तब वह चार क्षणों के आधार पर निष्पन्न होने वाली प्रत्यभिज्ञा का है कि ध्वनियों को हम अनित्य तो अवश्य मानते हैं, किन्तु उनको हम क्षणिक नहीं मानते | विनाशी माना जाय । इसलिये वर्ण की नित्यता आधार पर होने वाली वर्णों की अभिव्यक्ति भी विषय कैसे बन सकती है? इसका उत्तर यह यह ध्वनि क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में भगवत्पाद शंकराचार्य ने कहा है कि- ' जो दूर से सुनने वाले और वर्णों के भेद ज्ञान को न समझ पाने वाले के कान में उतरती है और जैसे - जैसे वह समीप होती जाती हैं, वैसे - वैसे हो वर्णों में पटुता और मृदुता

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४३४ वेदार्थपारिजातः निबन्धनाः, वर्णानां प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् । नवनिर्धारित विशेषवर्णत्वादिसामान्यमात्रप्रत्ययो न तु वर्णातिरिक्ततदभिव्यञ्जकध्वनिप्रत्यय इति चेन्न तस्यानुनासिकत्वादिभेदभिन्नस्य गव्यक्तिवत् प्रत्यभिज्ञानाभावात्, अप्रत्यभिज्ञायमानस्य चैकत्वाभावेन सामान्यभावानुपपत्तेः । तस्मादवर्णात्मकः शब्दः शब्दातिरिक्तो वा ध्वनिरित्येव तु युक्तम् । ननु च वर्णेषु सोऽयं गकार इत्यादिवद् ध्वनिखेनाभ्युपगते कोलाहलेऽपि स एव कोलाहलः पुनरुत्थित इति प्रत्यभिज्ञानमस्त्येव । न च ध्वनी प्रत्यभिज्ञानं तज्जातिविषयमिति तत्र वर्ण इव प्रत्यभिज्ञानं नास्तीति वाच्यम्, तुल्यरूपयोः प्रत्यभिज्ञानयोरेकं तज्जातीयविषयमन्यद् व्यक्त्यैक्यविषयमिति कल्पनायां विनिगमनाविरहात्, प्रत्यभिज्ञा-नावगतव्यक्त्यैक्येन जात्यप्रतिपत्तेर्वर्ण इव ध्वनावपि वक्तुं शक्त्यत्वादिति चेन्न, वैषम्यात् । तथाहि -- यद्यपि ध्वनी वर्णे च प्रत्यभिज्ञानस्य व्यक्त्यैक्यविषयत्वं प्रतीयते, तथापि भेर्य्यादिध्वन्युत्थितो वर्णोत्पत्त्यभावात् क्वचिद् वैदिकवाक्यानु-कारिणि वीणावेण्वादिध्वन्युत्पत्तौ कोलाहलवद् अस्फुटवर्णाकारप्रतीतिसत्त्वेऽपि वर्णोत्पत्तिस्थानकरणाभावेन तेषां दच्छायानुकारिध्वनिमात्रतया वर्णत्वाभावात् तदसार्वत्रिकत्वाच्च भेर्य्यादिध्वनिषु श्रूयमाणतारत्वमन्दत्वादिभेदक-घर्माण वर्णाश्रयत्वस्य कल्पयितुमशक्यत्वादन्यथासिद्धभेदप्रत्ययानुरोधेन ध्वनौ प्रत्यभिज्ञानं तज्जातीयं पर्यवस्यति । वर्णोच्चारणेषु हसितरुदितपशुपक्षिरुतानुकरणशङ्खध्मानादिस्थले ध्वनिकारणत्वेन क्लृप्तस्य कण्ठवाय्व-भिघातविशेषस्य सत्त्वात्, तारत्वप्राच्यत्वप्रतीच्यत्वादिश्रूयमाणधर्माणां ध्वनिधर्मत्वस्य क्लृप्तत्वात्, कोलाहलप्रत्ययस्य आदि के भेद को जोड़ देती है, वही ध्वनि है । उदात्त आदि धर्मो का भेद भी वर्णों में ध्वनि के कारण ही होता हैं । इसमें वर्णों के स्वरूप भेद की कारणता नहीं मानी जा सकती, क्योंकि वर्णों की तो प्रत्येक उच्चारण में एक सी प्रतीति ( प्रत्यभिज्ञा ) होती है । प्रश्न उठता है कि ' जिस प्रतीति में वर्ण विशेष का निर्धारण नहीं हो पाता, वह एक सामान्य प्रत्यय माना जायगा, उसको वर्ण से free तदभिव्यंजक ध्वनि प्रत्यम कैसे कहा जा सकता है? " उत्तर है कि उसकी भिनता इसलिये सिद्ध होती है कि उसकी अनुनासिकत्व मादि के भेदों से भिन्न ग व्यक्ति की तरह प्रत्यभिज्ञा नहीं होती और जिसको प्रत्यभिज्ञा नहीं होती उसकी एकता के अभाव में सामान्य भाव कैसे बन सकता है | इसलिये वर्ण भित्र शब्द को safe कहते हैं अथवा ध्वनि को शब्द से भिन्न ही माना जाय, यही उचित पक्ष है । शंका उठती है कि ' वर्णों में यह वही गकार है, इस प्रकार को प्रत्यभिज्ञा जैसे होती है, उसी तरह से ध्वनि के एक प्रकार के रूप में स्वीकृत कोलाहल में भी तो यह उसी तरह का कोलाहल फिर हुआ, इस तरह को प्रत्यभिज्ञा नामक प्रतीति होती ही है । यहाँ पर यह भी नहीं कह सकते कि ध्वनि में यह प्रत्यभिज्ञान जातिविषयक है, अतः उसकी यह प्रत्यभिज्ञा वर्णविषयिणी प्रत्यभिज्ञा से भिन्न प्रकार की है, क्योंकि तुल्यजातीय प्रत्यभिज्ञान में से एक जातिविषयक है और दूसरा व्यक्तिविषयक, इस कल्पना में कोई fafrate नहीं है । प्रत्यभिज्ञा से अवगत व्यक्ति की एकता के आधार पर वर्ण की तरह ध्वनि में भी जाति की प्रतिपत्ति नहीं होती, ऐसा बड़ी सरलता से कहा जा सकता है । ' इस शंका का यही समाधान है कि दोनों में आकाश - पाताल का अन्तर है, क्योंकि raft soft और वर्ण की प्रत्यभिज्ञा एक व्यक्ति को अपना आधार बनाती है, तो भी भेरी ( ढोल ) प्रभूति की ध्वनि होने पर वर्ण की उत्पत्ति नहीं होती । इसी तरह से कहीं पर वैदिक वाक्य का अनुकरण करने वाली वीणा, बांसुरी आदि की व्य fr में कोलाहल की तरह अस्फुट वर्णकार प्रतीति के होने पर भी वर्ण की उत्पत्ति के स्थान और करण ( प्रयत्न ) के अभाव में उनकी वर्ण की छाया ter अनुकरण वाली ध्वनि के रूप में ही मान्यता हो सकती है, वर्ण के रूप में नहीं । यह स्थिति सार्वत्रिक है भी नहीं । अतः भेरी प्रभृति की ध्वनि में श्रूयमाण तारत्व, मन्दत्व प्रभृति भेदक ( भेद कराने वाले ) धर्मों को वर्णों के आश्रित नहीं माना जा सकता | इस तरह से अन्यथासिद्ध भेदप्रत्यय के अनुरोध से safe का प्रत्यभिज्ञान तज्जातीय ही सिद्ध होता है । हसित, रुदित, पशु - पक्षियों के शब्दों का अनुकरण, शंख ध्वनि आदि स्थलों में ध्वनि के कारण के रूप में वर्णोच्चारण के स्थान- करण आदि की कारणता ही क्लुप्त है, क्योंकि वहाँ पर भी कण्ठ तालु का अभिघात विद्यमान है । तारत्व, प्राच्यत्व, प्रतीच्यत्व ( यह शब्द पूरब से आया यह पश्चिम से ) आदि श्रूयमाण धर्म ध्वनि के ही धर्म हैं । कोलाहल यदि हसित, रुदित आदि के रूप में है '

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४५५ हसितरुदितादिकोलाहलस्थले ध्वनिविषयत्वस्य क्लृप्तत्वेन जनसंघालापकोलाहलप्रत्ययस्यापि ध्वनिविषयत्वकल्पना-चित्याच्च । वर्णाभिव्यक्तिकारणं वंन्युत्पत्तेरपि कल्पनोपपत्तेर्वर्णेषु तत्प्रतीतिस्तदुपाधिकेति वाधकाभावात् । तेन वर्णेषु प्रत्यभिज्ञानस्य व्यक्त्यैक्यविषयत्वेऽपि ध्वनी तदसंभवेन तज्जातीयविषयत्वस्यैवौचित्याद् जातिविषयत्वेऽपि किमप्यनुवृत्तं ध्वनिषु प्रत्यभिज्ञानं स्वीक्रियते । अपि च, बौद्धः क्षणिके विज्ञाने सोऽहमिति प्रत्यभिज्ञानं सादृश्यमूलकमभ्युपेयते । तेनेदं सदृशमिति सादृश्यज्ञानस्य क्षणचतुष्टय साध्यस्य यथोपपत्तिस्तथैवात्रापि ज्ञेयम् । वस्तुतस्तु प्रबुद्धसंस्कारस्य प्रत्यभिज्ञाने तावत्क्षणानपेक्षत्वेन क्षणिकध्वन्यभिव्यक्तेऽपि वर्णे प्रत्यभिज्ञानसंभवात् । यथा प्रबुद्धसंस्कारस्य मेघान्धकारशवय्य घटस्य क्षणिकानभिव्यक्तावपि सोऽयं घट इति प्रत्यभिज्ञानं भवति, तथेव ध्वम्यभिव्यक्तशब्देऽपि प्रत्यभिज्ञानम् । अपि च, यस्मिन् विषये संस्कारप्रच्यो जायते, तस्य दर्शनक्षण एव स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानं भवति, तथैव प्रबुद्धसंस्काराणां क्षणिकाभिव्यक्तावपि प्रत्यभिज्ञानं संभवति । किञ्च, प्रत्यभिज्ञानानुरोधेन कारणमन्वेषणीयम्, न तु दोषसंभावनया प्रत्यभिज्ञानापलापो युक्तः । तथात्वे बह्वीनामुपलब्धीनां बाधप्रसङ्गात् । तेन यथा धारावाहिक -प्रतीतिस्थलेऽनेकक्षणावस्थायिन्येकैव वृत्तिरुपेयते, तथैव शब्दप्रत्यभिज्ञादर्शनात् शब्दव्यञ्जकध्वनीनां तावत्क्षणस्थायित्व-मध्यभ्युपेतव्यम् | प्रदीपे तु प्रभामण्डलस्यावयविविश्लेषमन्तरेणात्यन्तानुपपत्तेर्विश्लिष्टावयविनोऽवश्यं विनाशो विनष्टे च पूर्वस्मिन् प्रदीपे पश्चातनमवश्यं प्रदीपान्तरमेवेति दृढे भेदे प्रत्यभिज्ञानं सादृश्यनिमित्तमवधार्यते । शब्दे त्ववयवाभावाद-बययसामान्याभावान्न सादृश्यनिमित्तं तद्भवति । अत एव भिन्नेष्वपि लूनपुनर्जातकेशेषु तत्वग्रहणस्य दर्शनात् संशय एव, अतः कथं प्राक् सत्त्वकल्पनेत्यप्यपास्तम्, तत्र भेदस्य दर्शनात् प्रत्यभिज्ञानस्य बाधेऽपि प्रकृते तदसंभवात् । न च ध्वस्तो तो वह ध्वनिविषयक है, ऐसा निश्चित है, अत: जन संघात ( समूह ) के परस्पर बातचीत से उत्पन्न कोलाहल प्रत्यय की भी ध्वनि-विषता ही मानना ठीक है । वर्णाभिव्यक्ति के कारणों से ध्वनि की उत्पत्ति की भी कल्पना आसानी से की जा सकती हैं, किन्तु वर्णों में Test प्रतीति को तो औपाधिक ( गौण ) ही मानने से कोई बाधा नहीं रह जाती । अतः वर्णों की प्रत्यभिज्ञा भी एकला के कारण ही है, किन्तु ध्वनि में ऐसा संभव नहीं । इसलिये वहाँ वह जातिविषयक ही मानी जानी चाहिये । इसके नातिविषयक होने पर भी safe में प्रत्यभिज्ञान का एक अनुवृत्त आकार माना जा सकता है । अपि च, बौद्धों ने भी क्षणिक विज्ञान में ' यह मैं हूँ ' इस तरह की प्रत्यभिज्ञा को सादृश्यमूलक माना है । यहाँ पर जैसे क्षण चतुष्टय साध्य ' यह उसके समान है ' इस सादृश्य ज्ञान की सिद्धि की जाती है, उसी तरह से उक्त स्थल में भी समझना चाहिये । वस्तुतस्तु जिसके संस्कार प्रबुद्ध हो उठे हैं, उसके प्रत्यभिज्ञान के लिये इतने क्षणों की अपेक्षा नहीं रहती, अतः क्षणिक ध्वनि की अभिव्यक्ति के साथ ही वर्ण की प्रत्यभिज्ञा हो सकती है । जिसके संस्कार प्रबुद्ध हैं, ऐसे व्यक्ति को मेवान्धकार से आच्छा रात्रि में घट की क्षणिक अभिव्यक्ति के होने पर भी जैसे ' यह वही घट है ' इस तरह की veaf भज्ञा होती है, ध्वनि से अभिव्यक्त शब्द में भी उसी तरह की प्रत्यभिज्ञा मानी जाती है । fur faar के संस्कार गहरे जम जाते हैं, उसको देखने मात्र से ' यह वही है इस तरह का प्रत्यभिज्ञान होता है, इसी तरह से प्रबुद्ध संस्कारों की क्षणिक अभिव्यक्ति से भी प्रत्यभिज्ञान हो सकता है । अपि च, प्रत्यभिज्ञान की देखकर उसके कारण की खोज होनी चाहिये, दोष की संभावना को देखकर उसका अपलाप कर देना उचित नहीं है । ऐसा करने पर बहुत सी उपलब्धियां बाधित हो जायगी । इसलिये जैसे धारावाहिक बुद्धि के प्रसंग में अनेक क्षण तक रहने वाली एक वृत्ति मानी जाती है, उसी तरह से शब्द की प्रत्यभिज्ञा को देखकर शब्द व्यंजक ध्वनियों की उतने क्षणों तक स्थायिता माननी चाहिये । प्रदीप स्थल में अवयवों के विश्लेष के बिना प्रभामण्डल कभी भी नहीं बन सकता, अत: विशिष्ट अवयवी का विनाश अवश्य मानना पड़ेगा । इस तरह से पूर्व प्रदीप के विनाश हो जाने पर प्रदीप में बाद में प्रदीपान्तर की उत्पत्ति माननी पड़ेगी । इस तरह से इनके भेद की दृढ़ प्रमाणों के आधार पर सिद्धि हो जाने पर यहाँ हुईं प्रत्यभिज्ञा को सादृश्यमूलक माना जा सकता है । शब्द में तो अवयव नहीं है, अतः अवयव सामान्य के अभाव में वहां प्रत्यभिज्ञान में सादृश्य की निमित्तता ही नहीं बनतीं । इसी लिये ' काटने के बाद पुनः उग आये केशों में पूर्ववर्ती केशकलाप से भिन्नता होते हुए भी प्रत्यभिज्ञान के आधार पर एकता के दर्शन होने से संशय उठ खड़ा होता है, ऐसी अवस्था में शब्द की प्रति कल्पना कैसे हो सकती हैं ' इसका भी खण्डन हो जाता है, क्योंकि उक्त her स्थल में स्पष्ट भेद दिखाई देने से

पृष्ठ 486

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 486 का मूल पृष्ठ
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४५६ वार्थपारिजातः कार इत्यनुभवादत्रापि प्रत्यभिज्ञानं भ्रमरूपमेवेति सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञानुरोधेन ध्वंसानुभवस्य ध्वनिविषय-त्वेनोपपत्तेः । अत एव यः पदार्थः प्रयुज्यते रा प्रयोगात् प्राग् विद्यमानो यथा वास्यादि छिदायाम्, शब्दश्च परप्रत्यायनाय प्रयुज्यते, तेन प्रयोगात् प्राक् तत् सत्त्वम् । अनित्येऽपि प्रदीपादौ प्रत्यभिज्ञानं दृश्यते, क्षणिकस्यैव तस्य प्रयोगोऽपि दृश्यत इत्यपि प्रतिक्षिप्तमेव, बाधाबाधदर्शनस्य वैशेष्यात् । यदयुक्तम् - वर्णानां सावयवत्वेनासंनिहितवर्णभागस्य कथं प्रत्यभिज्ञानमिति, तन्न, वर्णेष्ववयवानुपलम्भेन वर्णभागानुपपत्तेः । तथा हि - न वर्णेषु सावयवत्वम्, साकल्यवैकल्याभ्यां ग्रहणाभावात् । नानुमानेन तद्ग्रहः, तैः सह कस्यचिल्लिङ्गस्य सम्बन्धाग्रहणात् । न च सामान्यतोदृष्टम्, नहि यद्यद्वस्तु तस्य तस्यावश्यमवयवैर्भाव्यम्, परमाणूनां निरवयवत्वात् । तेऽपि चेत्सावयवास्तदा तदवयवा अपि सावयवाः । ततश्चैकेन तिलेनापि सर्वं जगद्वयाप्येत, अनन्तैर्मूर्त-रवयवैरम्योऽन्यस्यावकाशमप्रयच्छद्भिरनन्तदेशव्याप्तेः । तस्मान्निरवयवाः परमाणवः शब्दाश्च । तदुक्तम् --- ' पृथङ् नैवोपलभ्यन्ते वर्णस्यावयवाः क्वचित् । न च वर्णेष्वनुस्ता दृश्यन्ते तन्तुवत् पढे । तेषामनुपलब्धेश्व न ज्ञाता लिङ्ग-सन्ततिः । नागमस्तत्परचास्ति नादृष्टे चोपमा क्वचित् । न चाप्यनुपपत्तिः स्याद्वर्णस्यावययविना । यथान्त्यावयवानां हि विनाऽप्यवयवान्तरे: ॥ प्रत्यक्षेणावबुद्धश्च वर्णोऽवयववर्जितः । ' न द्रुतविलम्बितमध्येषूदात्तानुदात्तस्वरितेषु सानुनासिकनिरनुनासिकयोर्हस्यदीर्घप्लुतेषु च प्रत्यभि-ज्ञायमाना जातिः किं न स्यादिति चेन्न, द्रुतादिभेदावभासस्य द्रुताद्यवस्थाभेदालम्बनत्वात् । सोऽयं गकार इति प्रत्यभि-प्रत्यभिज्ञा का बाध माना जा सकता है, किन्तु प्रकृत स्थल में ऐसी स्थिति संभव नहीं है । यह गकार ध्वस्त ( नष्ट ) हो गया, इस तरह के अनुभव के आधार पर यहाँ पर भी प्रत्यभिज्ञान की भ्रमरूपता नहीं सिद्ध की जा सकती, क्योंकि ' यह वही गकार है ' इस प्रत्यभिज्ञा के अनुरोध से ध्वंस के अनुभव को ध्वनि का विषयक मान लेना अधिक युक्तिसंगत है । इसलिये जिसका उपयोग दूसरे के लिये होता है, वह पहले से विद्यमान होता है, जैसे कि छेदन क्रिया के लिये उपयुक्त होने वाली कुल्हाड़ी उससे पहले से विद्यमान रहती है । उसी तरह से शब्द का प्रयोग दूसरे को समझाने के लिये ही होता है, इसलिये प्रयोग से पहले इसकी भी सत्ता माननी पड़ेगी । प्रदीप आदि की अनित्यता रहने पर भी प्रत्यभिज्ञा होती है और क्षणिकता के रहते हुए भी उसका प्रयोग वस्तु के दर्शन के लिये होता है, इस तरह की शंकाओं का समाधान भी किया जा चुका है, क्योंकि उक्त स्थलों में बाघदर्शन और उसका अभाव यह परस्पर एक दूसरे का बैलक्षण्य है । ajitaraar at मानकर आक्षेप किया जाता है कि ' वर्ण के जो भाग संनिहित नहीं हैं, उनकी प्रत्यभिज्ञा कैसे हो सकती है? ' यह आक्षेप भी गलत है, क्योंकि वर्णों में अवयवों की उपलब्धि न होने से वर्णों के भाग नहीं बन सकते । जैसे कि वर्ण सावयव नहीं हैं, क्योंकि उनकी साकल्येन अथवा वैकल्येन प्रतीति नहीं होती । अनुमान से भी उनमें अवयवों की प्रतीति ( ज्ञान ) नहीं हो सकती, क्योंकि उनके साथ किसी लिंग का अविनाभाव संबन्ध प्रतीत नहीं होता । सामान्यतोदृष्ट अनुमान की भी यहाँ प्रवृत्ति नहीं होती, यह जरूरी नहीं है कि प्रत्येक वस्तु के अवयम होते ही चाहिये, क्योंकि परमाणु निरवयव ही होते हैं । इनको भी यदि सावयव माना जाय तो फिर इनके अवयवों को भी सावयव मानना पड़ेगा और इस तरह से एक ही तिल से यह सारा जगत् भर जायगा | अनन्त मूर्त अवयव एक दूसरे को अवकाश नहीं है सकते, अतः उनका अनन्त प्रदेश में फैल जाना अवश्यंभावी है । इसलिये शब्द और परमाणुओं को निरवयव हो माना जाता है । जैसा कि कहा गया है - ' वर्णों के अवयव अलग से कभी भी उपलब्ध नहीं होते । पट के साथ जैसे तन्तु अनुस्यूत रहते हैं, उसी तरह से वर्णों के अवयव उनमें अनुस्यूत नहीं दिखाई पड़ते । उनकी उपलब्धि न होने से ही उनका किसी लिंग से संबन्ध भी नहीं बन पाता । वर्णों को सावयवता का बोधक कोई आगम भी नहीं है । मदृष्ट वस्तु में उपमान को भी प्रवृत्ति नहीं होती । अर्थापत्ति से भी इनकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि वर्ण की अवयवों के बिना उपपत्ति न हो सकती हो, ऐसी कोई स्थिति नहीं है । जैसे कि अन्त्य अवयवों की उपपत्ति उनमें अवान्तर अवयवों की कल्पना के बिना भी ' होती है, उसी तरह से शब्द के विषय में भी समझना चाहिये । वर्ण अवयवों से रहित है, यह बात प्रत्यक्ष प्रमाण से भी सिद्ध है । ' प्रश्न है कि ' द्रुत, विलम्बित और मध्य गति से उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरों के उच्चारण में और सानुसासिक-निरनुनासिक ह्रस्व, दीर्घ एवं प्लुत के उच्चारण में प्रत्यभिज्ञायमान जाति को हम किस तरह से अस्वीकार कर सकते हैं? ' उत्तर

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वेदार्थपारिजातः ४५७ ज्ञानस्य गकारव्यक्त्यालम्बनत्वात् । नतु गत्वादिसामान्यविषयत्वेन प्रत्यभिज्ञोपपत्तिरिति चेन्न सामान्यासिद्धेः । यत्र धर्मिविषयो भेदो धर्मविषयश्चाभेदस्तत्रैव सामान्यस्यात्मलाभः, यथा शाबलेयबाहुलेयादिषु धर्मिदेन भासमाने अयं गौरयं गौरिति धर्माभेदेन जातिलाभः । यत्र तु धर्मे भेदावभासो धर्मिणि चाभेदावभासस्तत्र न जातिलाभः, यथैकस्मिन्नेव देवदत्ते युवायं कृशोऽयं वृद्धोऽयमिति, तथैव द्रुतादिधर्मविषयोऽभेदः, धर्मविषयस्तु भेदः । अनेनाय-मकारो द्रुतमुच्चरितोऽनेन विलम्बित इति प्रतीतिर्भवति, न त्वयमकारो द्रुतोऽयं विलम्बित इति प्रतीतिः, तस्मान्नात्र धर्मिभेदो न वा जातिः । ननु क्रमिकत्वेन कादीनामेकत्र समावेशसंभवेऽप्यनुनासिकादीनां यौगपद्यानेकवक्शुच्चारित वर्णे समवेतानां कथमेकवर्णविषयत्वम् एकस्य विरुद्धधर्माश्रयत्वासंभवादिति चेन्न, ध्वनिधर्माणामेव सतामेषां वर्ण-समारोपात् । महत्यल्पे च दर्पणे दृश्यमानेऽमिन्नेऽपि मुखे महत्त्वस्याल्पत्वस्य च विरुद्धधर्मयोः समारोपदर्शनात् । अत एव सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञायाः सादृश्यमपि न विषयः, वर्णस्य निरवयवत्वेन तत्रावयवसामान्यरूपस्य सादृश्यस्यासंभवात् । प्रत्यक्षविषयत्वाच्चापोहरूपं सामान्यमित्यपि वक्तुमशक्यम् । तदुक्तम् - ' स एवेति मर्नापि सादृश्यं न च तत् क्वचित् । विनावयव सामान्यैर्वर्णेष्ववयवा न च । प्रत्यक्षविषयत्वाच्च नान्यापोहोऽपि युज्यते । ' अन्यदपि - ' गकारादिषु सामान्यं शब्दत्वं कल्प्यते यथा । गोत्वं च शाबलेयादौ तथैतत् किं न कल्प्यते ॥ ' Tarafty भेदप्रत्ययाद्भिन्ना व्यक्तयोऽभेदप्रत्ययाच्च सामान्यं यथाऽभ्युपेयते, तथैव द्रुतादिभेदेन भेदप्रत्ययाच्च भिन्ना है कि यहां पर आदि के रूप में वर्णों में भेद की प्रतीति द्रुत आदि अवस्था के भेद पर आधारित है । ' यह वही गकार है ' इस तरह का प्रत्यभिज्ञान गकार व्यक्ति को ही अपना विषय बनाता है । इस प्रत्यभिज्ञान को गत्वादि सामान्य ( जाति ) विषयक इसलिये नहीं माना जा सकता कि यहाँ पर सामान्य ( जाति ) प्रमाण सिद्ध नहीं है । जहां पर धर्मों का भेद रहते हुए भी efforts are रहता है, वही पर सामान्य की स्थिति रहती है । जैसे शाबलेय, बाहुलेय प्रभृति में धर्मो के भेद के रहते हुए भी सब जगह यह गो है, यह गो है, इस तरह के गौ धर्म की अभेदेन सर्वत्र प्रतीति होती है, इसलिये यहाँ पर सामान्य ( गोत्व जाति ) अपने बाप सिद्ध हो जाता है, किन्तु जहाँ पर धर्म में भेद की प्रतीति और धर्मीं में अभेद की प्रतीति रहती है, वहीं पर जाति नहीं मानी जा सकती । जैसे कि एक ही देवदत्त में यह युवा है, यह कृश है, यह वृद्ध है, इस तरह से अनेक धर्मों की प्रतीति होती है, उसी तरह से वर्ण की प्रतादि ratr ओं में भी धर्मी ( वर्ण ) तो वही रहता है, किन्तु उसमें जो भेद का भान होता है, वह धर्मविषयक ही है । इसी लिये इसने इस अकार का द्रुत उच्चारण किया और दूसरे ने विलम्बित उच्चारण किया, इस तरह की प्रतीति मानी जाती है, न कि यह अकार हो द्रुत है अथवा यह अकार ही विलम्बित है, इस प्रकार की । इसलिये यहाँ पर न तो धर्मी का ही भेद हैं और इसी कारण न यहाँ पर जाति ही मानी जा सकती है । प्रश्न है कि ' कुशता ( दुर्बलता ) प्रभूति नवस्थाएं तो क्रमिक हैं, अतः उनका एक में समावेश हो सकता है, किन्तु अनुनासिक आदि का उच्चारण तो एक साथ होता है, अत: अनेक वक्ताओं के द्वारा उच्चरित वर्णों में एक साथ इनके समवेत होने से इनकी एक वर्णविषयता कैसे मानी जा सकती है, क्योंकि एक ही वस्तु में विरोधी धर्मों की स्थिति नहीं मानी जा सकती ' । इसका उत्तर है कि वस्तुतः safe के इन धर्मो का ही वर्ण में समारोप कर दिया जाता है | बड़े अथवा छोटे दर्पण में प्रतिबिम्बित एक ही मुख में महत्व और अल्पत्व ये दो विरोधी धर्म प्रतीत होते देखे जाते हैं । इसीलिये यह बही गकार है, इस प्रत्यभिज्ञा का विषय सादृष्य भी नहीं हो सकता, क्योंकि वर्ण निरवयव हैं । इसलिये समान अवयव रूप सादृश्य यहीं हो ही नहीं सकता । यह प्रत्यभिज्ञान प्रत्यक्ष पर आधारित है, अतः यहाँ पर अपोह रूप सामान्य भी नहीं माना जा सकता । जैसा कि कहा गया है- ' यह वही है ' इस प्रत्यभिज्ञा का विषय सादृश्य नहीं हो सकता, क्योंकि यह सादृश्य अवयव सामान्य पर आधारित है और वर्षों में जब अवयव ही नहीं होते तो अवयव सामान्य की स्थिति कैसे हो सकती है । यह प्रतीति प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधूत है, अतः यहाँ पर अन्यापोह रूप बौद्धाभिमत सामान्य भी नहीं रह सकता । इसके बाद भी -- ' जैसे गकारादि में शब्दत्व सामान्य की कल्पना करते हैं और शाबलेयादि में जैसे गोत्थ की कल्पना करते हैं, उसी तरह से यहाँ पर भी सामान्य की कल्पना क्यों नहीं हो सकती ' | ' Tere आदि में भेदप्रतीति के आधार पर व्यक्तिभेद ५८

पृष्ठ 488

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 488 का मूल पृष्ठ
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* कार्यपारिजातः व्यक्तयः, स एवायं गकार इति भेदप्रत्ययाच्च गत्वादिकं सामान्यं मन्तव्यमित्यर्थः इति पूर्वपक्षय्य सिद्धान्तितम्-कारादिषु भेदप्रत्ययस्य व्यक्त्यालम्यनतेति तत्र जातिरुपेयते, द्रुतादिषु तु भेदप्रत्ययस्य व्यञ्जकध्वन्यालम्बनतया व्यक्तिभेदसिद्धिरिति न तत्र जात्यङ्गीकार इत्याह- ' शाबलेयगका रादीनिष्पन्नान् व्यक्तिरूपतः । साम्यधीनहि गृह्णाती तो जातिरपोह्यते ॥ न तु द्रुतादिभेदेन निष्पन्ना सम्प्रतीयते । गव्यक्त्यन्तरविच्छिन्नगव्यक्तिरपरा स्फुटा || तेनैकत्वेन वर्णस्य बुद्धिरेकोपजायते । विशेषबुद्धिसद्भावो भवेद् व्यञ्जकभेदतः ॥ ' यथा गकारौकारयोः शाबलेयबाहुलेययो-रभिव्यञ्जकोपाधिमन्तरेव स्फुटो व्यक्तिभेद उपलभ्यते, न तथा द्रुतविलम्बितगव्यक्त्यो रभिव्यञ्जकध्वनिभेदमन्तरा स्फुटो भेद उपलभ्यते, तेनात्र वैषम्यम् । यथा सामान्यवादिनो द्रुतादिभिः सामान्यं न भिद्यते, तथैव विशेषैर्वर्णोऽपि न भिद्यते । तदप्युक्तम्- ' यथैव तत्वादि गम्यमानं द्रुतादिभिः । विशेषैरपि नानेकमेवं वर्णोऽपि नो भवेत् ॥ त्वयापि व्यञ्जकव्यक्तिभेदाद्भेदोऽभ्युपेयते । ममापि व्यञ्जकैनदिभेदबुद्धिर्भविष्यति । तेन यत् प्रार्थ्यते जातेस्तद्वर्णादेव लभ्यते । व्यक्तिलभ्यं च नादेभ्य इति गत्वादिधर्वृथा || ' तव मते व्यञ्जकव्यक्तिभेदात् सामान्ये भेदावभासः मम तु व्यञ्जकनादभेदाद्वर्णे भेदावभासः । ' कल्पयित्वापि तत्पश्चाद्विभुत्वं कत्वनित्यताः । प्रत्येकवृत्तिता चास्य भवेयुर्महतः श्रमात् । द्वयोः सिद्धस्तु वर्णात्मा नित्यत्वादि यथैव च । कल्पितस्येष्यते तद्वत् सिद्धस्यैवाभ्युपेयताम् ' || सम पक्षे धर्ममात्रकल्पना त्वत्पक्षे धर्मिकल्पना धर्मकल्पना चेति गौरवम् । ' प्रत्येकसमवाये च क्लेशो नैव भविष्यति । व्यञ्जनेषु च धीभेदो नैव कामं प्रवर्तते ॥ की और अभेदप्रतीति के आधार पर सामान्य की प्रतीति मानी जाती है, उसी तरह से द्रुत आदि के भेद से भेदप्रत्यय के आधार पर व्यक्तियों का भेद और यह वही गकार है, इस अभेद प्रतीति के आधार पर गत्व आदि सामान्य ( जाति ) की भी सत्ता माननी चाहिये ' इस तरह से पूर्वपक्ष का उत्थापन करके सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि -- कार आदि में भेद प्रतीति का आलम्बन व्यक्ति है, अतः वहाँ जाति मानी जा सकती है । द्रुत आदि में तो भेद प्रतीति का आधार व्यंजक ध्वनियों हैं, अतः यहाँ पर व्यक्तियाँ भी भिन्न - भिन्न हैं, इसलिये यहाँ पर जाति को नहीं माना जा सकता । जैसा कि कहा गया है -- शाबलेय आदि तथा गकार आदि की निष्पत्ति व्यक्ति रूप से होती है । यहाँ पर सादृश्य के अभाव में इनका ग्रहण साम्य बुद्धि से नहीं होता, इसलिये यहाँ जाति नहीं स्वीकार की जाती । इसी तरह की प्रतीति द्रुतादि भेद से निष्पन्न ध्वनियों की नहीं होती, एक ग ध्वनि के विच्छित हो जाने पर दूसरी ग ध्वनि स्पष्ट सुनाई पड़ती है | इस तरह से वर्ण व्यक्ति की एकता के कारण वर्ण में एकत्व बुद्धि होती है, इसमें विशेष बुद्धि का सद्भाव व्यंजक के भेद से होता है ' । जैसे कार और औकार का तथा शाबलेय और बाहुलेय का भेद अभिव्यंजक उपाधि के बिना भी स्पष्ट प्रतीत होता है, उसी तरह का भेद हु विलम्बित ग व्यक्ति में अभिव्यंजक ध्वनि के भेद के बिना स्पष्ट उपलब्ध नहीं होता । इसलिये इन दोनों में स्पष्ट अन्तर है | जैसे सामान्यवाद के मत में हुत आदि के कारण सामान्य भिन्न नहीं होता, उसी तरह से किसी विशेषण के रहते भी वर्ण भिन्न नहीं माना जाता । जैसा कि कहा गया है - जैसे आपके मत में गत्वादि द्रुतादि विशेषताओं से गम्यमान होता हुआ भी अनेक नहीं होता, उसी तरह से वर्ण भी अनेक नहीं होंगे! आप भी व्यंजक व्यक्ति के भेद से भेद मानते हैं, उसी तरह से हमारे मत में भी व्यंजक नाद के कारण वर्ग में भेद बुद्धि मानी जाती है । इससे जो काम जाति से लिया जाता है, वह केवल वर्ण से ही सिद्ध हो जाता है । व्यक्ति में जिन भेदों को मानें के ही भेद ध्वनि में मानने से काम चल जाता है । इस तरह से गत्वादि सामान्य को मानना व्यर्थ है ' । आपके मत में व्यंजक व्यक्ति के भेद से सामान्य में भेद की प्रतीति होती है और हमारे मत में व्यंजक नाद के भेद से वर्ण मैं भेद की प्रतीति मानी जाती हैं । आपके मत में उक्त कल्पना के बाद भी वर्णों की विभुता, एकता, नित्यता तथा प्रत्येक वृत्तिता को सिद्ध करने में बड़ा श्रम करना पड़ता है । वर्णात्मा शब्द दोनों के मत में सिद्ध है । इसमें नित्यत्वादि की जैसे आप कल्पना करते हैं, उसी तरह से उसको सिद्ध रूप में मानने में क्या बाबा है । हमारे मत में केवल धर्ममात्र की कल्पना करनी है और आपके पक्ष में और धर्म दोनों की कल्पना करनी पड़ेगी, इस तरह से गौरव है । ' हमारे मत में प्रत्येक का समवाय संबन्ध मानने का क्लेश नहीं

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वेदार्थ पारिजातः II I दृश्यतेऽजनुरागेण भेदो यो नाम तत्र नः । विवेकोऽस्त्येन नह्येष केवलानां प्रतोयते || अक्ष्वप्येवं परोपाधिद्रुतादिप्रत्ययो भवेत् । वर्णाश्रितत्वाद्वर्णत्वव्यञ्जनप्रत्ययो यथा ॥ ' व्यञ्जनेषु च धीभेदो मध्यमादिरूपो नास्ति, केवलद्भुतावभासनात् । तेन तत्र व्यक्तिभेदेऽसति निर्निबन्धनमेव सामान्यम् । तत्राऽजनुरागेण भेदे सत्यपि केवलेषु तददर्शनात्, सथैवाक्ष्वपि परोपाधिका एव द्रुतादिप्रत्यया मन्तव्याः । अविद्यमानेऽपि वस्त्वन्तराभावो दर्शयितुं न शक्यते, यथा शशविषाणे तैक्ष्याभाव: । तेन सपक्षस्य बाघसिद्धिर्न दोषः । यथा गत्वं गत्वाधारो न भवति, गान्यबुद्ध्यनिरूप्यत्वात् तथैव गकारोऽत्यन्तनिष्कृष्टगत्वाधारो न गम्यते, गान्यबुद्ध निरूप्यत्वात्, परकल्पितगत्ववत् । ' अवस्तुत्वेन साध्यत्वातिषेधाद्धेतुसाध्ययोः । सपक्षेऽन्यतरासिद्धि दोषायात्र जायते ॥ वर्णत्वाच्चापि साध्योऽयमकारादिवदेव च । व्यतिरेकस्य चादृष्टेर्नात्र दृष्टं निवर्तते ॥ गोत्वादि-वारणेऽप्येवं दृष्टवाधः स्फुटो भवेत् । नान्यथा हि मतिस्तत्र स्यात् सामान्यविशेषयोः । न चाप्येकत्र वस्तुत्वे भेदो arth भेदतः । न पिण्डव्यतिरेकेण व्यञ्जको sa ध्वनिर्यथा ॥ पिण्डव्ययव गोत्वादिनित्यं जातिः प्रतीयते । तेन भिन्नेषु पिण्डेषु जातिरेकाभ्युपेयताम् || ' ननु तद्वयं श्री भवेत्तदा बुद्धिद्वयं भवेदपि, वायुसंयोगाद्यात्मनो नादस्य त्वौत्रत्वात् कथं नादैविशेषधीः संभवतीति चेन्न, नादसंस्कृतश्रोत्राद्यदा शब्दप्रतीतिः स्यात्तदेव तदुपश्लेषतस्तत्प्रतीतिसंभवात् । सिद्धान्ते तु न वायु-तत्संयोगविभागात्मको नादः, किन्तु वायुगुणः । द्विविधः शब्दो वर्णात्मको ध्वन्यात्मकश्च । शब्दत्वं द्वयोरनुगतम् । वर्ण-विशेषाः गकारादयः । ध्वनिविशेषाः शङ्खघोषादयः । वर्णत्वं ध्वनित्वं च शब्दत्वावान्तरसामान्यम् । यथा प्रभारूपं है । व्यंजन वर्णों में भेद ज्ञान भले ही न हो, उनमें स्वर के मिलने से जो ' क का कि की इस रूप में भेद दिखाई देता है उसको हम स्पष्ट समझते हैं, क्योंकि यह भेद केवल स्वर रहित ' क ' इत्यादि वर्णों में नहीं दिखाई पड़ता । इसी तरह से द्रुतादि प्रत्यय की अ वर्णों में जो प्रतीति होती है, वह भी परोपाधिक गौण ही है, जैसे व्यंजन की प्रतीति वर्णाश्चितत्व और वर्णस्व के रूप में होती है ' । व्यंजन वर्णों में मध्यम यादि के रूप में बुद्धि - भेद नहीं रहता, क्योंकि वहाँ पर केवल द्रुत का ही आभास होता है । इस तरह से यहाँ पर व्यक्ति के भेद के न होने के कारण जाति मानने का कोई कारण नहीं हो सकता । वहाँ ' अना ' इत्यादि स्वरों के मिलने से व्यंजनों में भेद हो भी सकता है, किन्तु केवल व्यंजनों में कोई भेद नहीं रहता, उसी तरह से स्वरों में भी परोपाधि के कारण हो द्रुत, विलम्बित आदि भेदों की प्रतीति होती है, ऐसा ही मानना ठीक है । afanta at में भी दूसरी वस्तु का अभाव नहीं सिद्ध किया जा सकता, जैसे कि शशविषाण में तीक्ष्णता का अभाव | इसलिये सपक्ष में बाघ की सिद्धि दोष नहीं है । जैसे गरव गत्व का आधार नहीं होता, क्योंकि वह गकार से भिन्न बुद्धि से निरूपित नहीं होता, उसी तरह से गकार अत्यन्त निष्कृष्ट गत्व का आधार भी नहीं हो सकता, क्योंकि वह भी कार भिन्न बुद्धि से निरूप्य नहीं है, जातिवादी के मत से कल्पित गरव की तरह । ' अवस्तु की साध्यता में हेतु और साध्य का निषेध करने में सपक्ष में किसी एक की सिद्धि न होने पर भी कोई दोष नहीं माना जाता । अकार आदि की तरह ही कार की भी वर्णता सिद्ध करनी | व्यतिरेक के अभाव दृष्ट की निवृत्ति नहीं मानी जा सकती । इसी तरह से गोत्व प्रभृति के वारण में भी स्पष्ट ही दृष्टबाध हो जायगा । यहाँ पर सामान्य और विशेष की दूसरे किसी प्रकार से व्यवस्था बन ही नहीं सकती । एक ही वस्तु में व्यंजक के भेद से भेद नहीं माना जा सकता, जब तक कि पिण्ड का भेद न हो । जैसे यहां पर व्यंजक ध्वनि के भेद से वर्ण में भेद नहीं माना जा सकता । गोत्वादि जाति की प्रतीति सदा पिण्ड से ही व्यंग्य होने पर ही होती है । इसलिये भि पिण्डों में भी एक ही जाति माननी चाहिये | प्रश्न उठता है कि ' ध्वनि और वर्ण दोनों की यदि श्रोत्रेन्द्रिय से प्रतीति होती हो तो दो तरह की बुद्धि हो भी, वायु संयोग आदि से उत्पन्न नाद तो श्रोत्रेन्द्रिय ग्राह्य नहीं है, तब इस नाद के कारण वर्णों में विशेष बुद्धि ( भेद ज्ञान ) की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? उत्तर है कि नादों से संस्कृत श्रोत्र से जब शब्द की प्रतीति होगी, तभी उनके उपरलेष ( संबन्ध ) के आधार पर वर्ण की प्रतीति हो सकती है । यह उत्तर आपके मत को मानने पर हुआ । सिद्धान्त पक्ष में नाद को वायु संयोग और विभाग से उत्पन्न नहीं माना जाता, किन्तु इसको वायु का गुण माना जाता है । शब्द दो प्रकार का होता है - वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक | इस तरह से

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 490 का मूल पृष्ठ
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४६० वेदार्थ पारिजातः भावान्तराणां व्यञ्जकस्, तथैव ध्वनिः शब्दव्यञ्जकः शब्दोपश्लिष्टः प्रतीयते, शङ्खघोषादिषु केवलोऽनुभूयते । अथवा वायवीयानां नादानामश्रौत्रत्वेऽपि नादसंस्कारानुसारेण वर्णे द्रुतादिकं ग्रहीष्यते । यथा गकारादिषु जातिव्यक्ति भेदा-म्युपगन्तुवैशेषिकस्य शब्दस्य निर्गुणत्वेन महत्वात्पत्वादिगुणाभावेऽपि ध्वन्यनुसारिण्या बुद्धया महत्त्वादिकं प्रतीयते, तथैवेहापि भविष्यति । ननु व्यञ्जकेषु नादेष्वनवगतेषु कथं तद्धर्मप्रतीतिर्व्यङ्गयष्विति चेन्न यथा पित्तदोषेणानवगतेनैव मधुरं तिक्तरूपेण श्वेतं पीततया गृह्यते, तथैव नादेषु श्रोत्रं प्राप्य क्षिप्रमन्यतः प्रयातेष्वपि तत्संयोगसंस्कारस्यात्पकालमव-स्थानाच्छन्दोऽपि क्षण एवाविर्भूय तिरोभवद् द्रुत इति गृह्यते, मध्यमो विलम्बित इति च तेन युक्तो व्यञ्जकधर्माणां भ्रास्त्या शब्दे समारोपः । ' अथवा ग्रहणं तेषां शब्दे बुद्धिस्तु तद्वशात् । संस्कारानुकृतेः सोऽपि महत्त्वाद्यवबुद्ध्यति ॥ मधुरं तिक्तरूपेण श्वेतं पीततया तथा । गृह्णन्ति पित्तदोषेण विषयं भ्रान्तचेतसः । मण्डूकवशयाऽक्ताक्षा वंशानुरगबुद्धिभिः । व्यक्त्यल्पत्वमहत्वाभ्यां सामान्यं च तदाश्रयम् ॥ गृह्णन्ति यद्वदेतानि निमित्तग्रहणाद्विना । व्यञ्जकस्थमबुद्वैवं व्यङ्गयं भ्रान्तिर्भविष्यति ॥ ' ननु तथापि ह्रस्वदीर्घादिभेदस्यार्थविशेषौपयिकतया कथं भ्रान्तित्वम्, तद्भ्रान्तित्वे वाष्पजनितबुद्धिवत् तन्निबन्धनार्थबुद्धिरपि भ्रान्तिः स्यात् न च नग इति नागा इति च पदात् तरुं वा कुञ्जरं वा प्रतिपद्यमाना भ्रान्ता भवन्ति । ततः पारमार्थिक एवं भेदोऽभ्युपेयः । तथा च सति तदनुवृत्तम् अत्वादिसामान्यमप्युपेयमिति चेन्न, सत्यपि शब्द दोनों में अनुस्यूत है । गकारादि वर्णविशेष कहलाते हैं और शंखघोष प्रभृति ध्वनिविशेष | इस तरह से वर्णत्व और after शब्दत्व का अवान्तर सामान्य ( जाति ) हुआ । जैसे प्रभा का रूप भावान्तर ( दूसरी वस्तुओं ) का अभिव्यंजक है, उसी तरह से शब्द ae after के साथ प्रतीत होती है, शंखघोष प्रभूति स्थल में केवल ध्वनि का ही अनुभव होता है । अथवा वायवीय नाद श्रोत्र ( कान ) का विषय न भी हो, तो भी नाद के संस्कार के अनुसार वर्ण में द्रुत आदि का ग्रहण हो सकेगा । जैसे गकारादि में जाति और व्यक्ति के भेद को स्वीकार करने वाले वैशेषिक के मत में शब्द की निर्गुणता के कारण महत्व, अल्पत्व आदि गुणों का अभाव होते हुए भी safe का अनुसरण करने वाली बुद्धि से महत्त्व आदि की प्रतीति होती है, उसी तरह से यहाँ पर भी समझना चाहिये | प्रश्न उठता है कि ' जब तक व्यंजक नाव ( वन ) की अवगति नहीं होती, तब तक व्यंग्य में उनके धर्मों की प्रतीति कैसे हो सकती है? उत्तर है कि जैसे पित्त दोष ज्ञात न होने पर भी मधुर रस की तिक्त रस के रूप में ओर श्वेत शंख की पीत शंख के रूप में प्रतीति होती हैं, उसी तरह से नादों के भी श्रोत्र तक पहुँच कर शीघ्र ही अन्यत्र चले जाने पर भी उनके संयोग संस्कार की स्वल्प काल तक अवस्थिति रहने पर शब्द भी कुछ क्षण के लिये आविर्भूत होकर जब तिरोहित हो जाता है तो उसका ग्रहण द्रुत रूप में होता है, इसी तरह से मध्यम और विलम्बित का भी ग्रहण तदनुसार क्षण स्थिति के आधार पर होता है । इस तरह से व्यंजक धर्मों का शब्द में समारोप भ्रान्ति पर आधारित है । ' अथवा यहाँ पर नादों के ग्रहण के आधार पर ही शब्द में तादि वृत्तियाँ गृहीत होती हैं | संस्कारों के अनुकरण के आधार पर पुरुष महत्त्वादि धर्मो को जानता है । यह उसी तरह से होता हैं, जैसे कि पित्त के दोष से दुषित इन्द्रिय - चित्त वाला व्यक्ति भ्रान्ति से मधुर में तिक्तता का और श्वेत वस्तु में पीतल का अनुभव करने लगता है । इसी तरह से मण्डूक ( मेढक ) की दशा ( चर्बी ) का अंजन लगा लेने पर व्यक्ति को बाँस में सर्प की भ्रान्ति होने लगती है । जिस तरह से भ्रान्तचित्त वाले व्यक्ति अभिव्यक्ति की अल्पता और महत्ता के आधार पर सामान्य ( जाति ) की कल्पना करके बिना निमित्त के ही पदार्थों का ग्रहण करने लगते हैं, उसी तरह से aire में स्थित धर्मों का ग्रहण किये बिना ही व्यंग्य में भ्रान्ति हो जायगी । पुनः प्रश्न उठता है कि तो भी हस्व - दीर्घ आदि का भेद अर्थविशेष की बोधकता में उपयोगी है, उसको भ्रान्त कैसे कह सकते हैं? इसको यदि अन्त माना जाय तो बाप से उत्पन्न अति बुद्धि की तरह उससे होने वाली बुद्धि को भी भ्रान्त मानना पड़ेगा, किन्तु नग तथा नाग शब्द से वृक्ष और हाथी की प्रतीति जिनको होती है, उनको कोई भी भ्रान्त नहीं कह सकता । अतः इनका भेद पारमार्थिक ( वास्तविक ) ही मानना पड़ेगा । ऐसा होने पर इनमें अनुवृत्त अत्वादि सामान्य को भी मानना पड़ेगा । ' उत्तर