वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 511–520

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 511–520

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वेदार्थ पारिजातः II ' सतः परमदर्शनं विषयानागमात् ' ( मी ० सू ० १1१1१३ ) | सतः ( स एवायं गकार इति प्रत्यभिज्ञया स्थिरस्यैव ) शब्दस्य अदर्शनं युक्तम् । परमित्यव्ययं युक्तमित्यर्थे । विषयानागमाद् विषयं शब्दं प्रति अभिव्यञ्जकानाम् अनागमाद् असम्बन्धात् । प्रयत्नोत्तरकालिकं शब्दस्य दर्शनं न शब्दस्य कार्यत्वं साधयति, प्रयत्नव्यङ्ग्यत्वेनापि तदुपपत्तेः । ननु कथमभिव्यङ्ग्यत्वमिति? श्रोत्रेन्द्रिय संस्कारेणेति गृहाण | श्रोत्रेन्द्रियं च कर्णशष्कुत्यवच्छिन्नमाकाशम् । तच्च प्रतिपुरुषं भिन्नमिति नातिप्रसङ्गः । अधिष्ठानभेदाच्च संस्कारव्यवस्था । यदुक्तमुत्पत्यर्थकेन करोतिना सम्बन्धात् शब्दस्यानित्यत्वमिति, तत्राह - ' प्रयोगस्य परम् ' ( मी ० सू ० १ | १ | १४ ) । परमन्यत् यत्कारणमुक्तं करोतिशब्दादिति तत् प्रयोगस्य उच्चारणस्य शब्दं करोतीत्यत्र शब्दोच्चारणस्यो-त्पत्तिविवक्षितेत्यर्थः । एकस्य नित्यस्य युगपन्नानादेशोपलम्भः कथमिति तत्राह -- ' आदित्यवद्योगपद्यम् ' ( मी ० सू ० १।१।१५ ) । आदित्यस्यैकस्य यथा युगपद्दर्शनं तथा शब्दस्यापीत्यर्थः । सर्वगतो हि शब्दो भिन्नदेशैर्ध्वनिभिः स्वे स्वे देशेऽभिव्यज्यमानो भिन्नदेशेऽवभासते । ध्वनयो हि श्रोत्रदेशमागत्यापि शब्द व्यञ्जयन्तः स्वोत्पत्तिदेशमिव शब्द भासयन्तीति दर्शनवलादप्यु-पगम्यते । नतु अप्राप्यकारि श्रोत्रम्, न च ध्वन्युत्पत्तिदेशाः श्रोत्रेण प्राप्यन्त इति कथं तद्विशिष्टशब्दग्रहणं श्रोत्रेणेति चेत् श्रोत्रं हि स्वदेशावस्थितमेव शब्दं बोधयदपि न तद्विशिष्टं बोधयति, किन्तु स्वरूपेणैव । शब्दोच्चारणदिश आगता sar स्तु तथा विशिष्टं शब्द बोधयन्ति । सा च दिक् श्रोत्रप्राप्ता कालवच्छन्दविशेषणतया शक्यते श्रोत्रेण ग्रहीतुम् । ' सतः परमदर्शनं ० ' । यह वही गकार है, इस प्रत्यभिज्ञा के आधार पर सत् अर्थात् स्थिर रूप से विद्यमान शब्द का भी अदर्शन हो सकता है । ' परम् ' यह अव्यय यहाँ पर ' युक्त ' ( उचित ) अर्थ में हुआ है । विषय अर्थात् शब्द के साथ अभिव्यंजकों के संबद्ध न होने से शब्द का दर्शन न हो यह उचित ही है । प्रयत्न के बाद जो शब्द का दर्शन होता है, उससे शब्द को कार्यता नहीं सिद्ध की जा सकती, क्योंकि प्रयत्न के द्वारा उसकी व्यंग्यता भी सिद्ध हो सकती है । प्रयत्न के द्वारा इसकी अभिव्यंग्यता कैसे मानी जा सकती है? तो उत्तर है कि श्रोत्रेन्द्रिय के संस्कार के द्वारा । श्रोत्रेन्द्रिय कर्णशष्कुली ( कान का छिद्र ) से अवच्छिन्न ( उपहित ) आकाश ही है । वह प्रत्येक पुरुष में भिन्न भिन्न है, अत: जिस श्रोत्रेन्द्रिय का संस्कार होगा, उसी के शब्द की अभिव्यक्ति होगी, अन्यत्र नहीं । संस्कार की व्यवस्था अधिष्ठान के भेद के अनुसार होगी, अर्थात् जिस अधिष्ठान में वर्तमान श्रद्रय का संस्कार होगा, उसी अधिष्ठान ( आधार ) केन्द्रका संस्कार होगा । उत्पत्ति अर्थ वाले कुन् धातु से संबन्ध होने से शब्द की अनित्यता पहले बतलाई गई थी । उसका उत्तर हैं- ' प्रयोगस्य परम् ' । अर्थात् शब्द की अनित्यता में यह जो दूसरा कारण बताया गया है कि शब्द का ' करोति से संबन्ध है, इसका समाधान यह है कि करोति का शब्द से संबन्ध न होकर प्रयोग के साथ संबन्ध है । प्रयोग का अर्थ उच्चारण है, अतः ' शब्द करता है ' इसका अर्थ होगा ' शब्द का उच्चारण करता है ' । इस तरह से उक्त आपत्ति का परिहार हो जाता है । एक नित्य शब्द की एक साथ नाना प्रदेशों में उपलब्धि कैसे होगी? इसका समाधान यह है- ' आदित्यवद् यौगपद्यम् । ' जैसे आदित्य एक ही है, किन्तु उसका एक साथ नाना प्रदेशों में दर्शन होता है, उसी तरह से शब्द को भी मानना चाहिये | शब्द सर्वगत है, तो भी भिन्न भिन्न देशों में वर्तमान ध्वनियों के द्वारा अपने अपने प्रदेश में अभिव्यक्त होकर भिन्न भिन्न प्रदेश में प्रतीत होने लगता है | saf नियाँ श्रोत्र देश में आती अवश्य हैं, किन्तु जब वे यहाँ आकर शब्द को अभिव्यक्त करती है, तो उस समय ऐसी प्रतीति होती है कि वह शब्द s वनि की उत्पत्ति के प्रदेश में अभिव्यक्त हुआ हो । प्रश्न होता है कि श्रोत्र तो अप्राप्यकारी हैं । वह ध्वनि की उत्पत्ति के प्रदेश में जायगा नहीं, तब उसके द्वारा ध्वनि के प्रदेश के साथ शब्द की श्रुति ( श्रवण ) कैसे संभव होगी? उत्तर है कि श्र अपने स्थान में स्थित रहता हुआ ही यद्यपि शब्द का बोध कराता है, तथापि उसका बोध वह सामान्य रूप से कराता है, किसी विशेषण से faf शष्ट का नहीं । शब्द का जहाँ उच्चारण हुआ, उस दिशा से आने वाली ध्वनियाँ ही उस प्रदेश से विशिष्ट शब्द का बोध कराती हैं । उस दिशा की प्राप्ति श्रोत्र को उसी तरह से होती है, जैसे कि उसका काल से संबन्ध होता है, अतः उस शब्दविशिष्ट ६१

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४८२ ध्वनयश्च क्रमेण मन्दीभवन्तः प्रत्यासन्नाद् दूरतराच्च देशादागतास्तोत्रं मन्दं मन्दतरं च शब्दं बोधयन्ति । सर्वं चैतत् शास्त्रदीपिकार्या स्पष्टम् । यत्तु दध्यत्रेत्यादौ प्रकृतेरिकारस्य स्थाने विकृतेर्यकारस्य दर्शनात् शब्दानित्यत्वमिति, तत्राह-' शब्दान्तरमविकास ' ( मी ० सू ० १ | १ | १६ ) | ' दधि + अत्र ' इत्यस्माद् दध्यत्रेति शब्दान्तरम् । इकारस्य न विकारो यकाराः । यथा कटं चिकीर्षुनियमेन तृणान्यादत्ते न तथा यकारं प्रयुयुक्षु नियमेनेकारमुपादत्ते । तस्मान्त विक्रियते शब्दः । यदुक्तं वक्तृबहुत्वात् शब्दमहत्त्वमिति, तत्राह -- ' नादवृद्धिः परा ' ( मी ० सू ० १।१।१७ ) | परा अन्या वृद्धिय उक्ता वक्तृवहुत्वात् शब्दस्य सा न शब्दस्य वृद्धिः, किन्तु नादस्य ध्वनेरेव वृद्धिः । शब्दस्यानवयवत्वेन महत्वानु-पपत्तेः । नादवृद्धिरेव खात्या शब्दवृद्धिः प्रतीयत इति भावः । एवं परमतसमीक्षां विधाय स्वमतमाह भगवान् जैमिनि: - नित्यस्तु स्याद्दर्शनस्य परार्थत्वात् ' ( मी ० सू ० १ | १ | १८ ) । तुरवधारणे । नित्य एव शब्दः स्यात् । दृश्यतेऽनेनेति दर्शनमुच्चारणम् । तस्य परं प्रत्यर्थप्रत्यायनार्थ, त्वात् । नह्युच्चारितस्य शब्दस्य नाशेऽन्यस्मात् शब्दजशब्दाद् अर्थप्रतीतिः सम्भवति, शक्तिग्रहाभावात्, उच्चारितात् शब्दादर्थं प्रत्येमीत्यनुभवविरोधाच्च । इतो s पि नित्यः शब्द इत्याह-- ' सर्वत्र योगपद्यात् ' । सर्वव्यक्तिषु बोधस्य योगपद्याद् नित्यः शब्दः । गोशब्देऽभ्युच्चरिते युगपत्सर्वासां गोव्यक्तीनां प्रतीतेरानुभविकत्वेनाकृति वचनत्वं शब्दस्याध्यवसीयते । न च जात्या ओनत्यशब्दस्य सम्बन्धः कर्तुं शक्यः । नित्यत्वे तु पूर्वपूर्वप्रयोगात् स शक्यग्रह इत्यर्थः । दिशा का are star को हो सकता है । ध्वनियाँ क्रमशः धीमी पड़ती जाती हैं, अतः पास से आई ध्वनि की तीव्र श्रुति दूर से आई safe की मन्द श्रुति और बहुत दूर से आई ध्वनि की मन्वदर श्रुति होती हैं । ये सारी बातें शास्त्रदीपिका में स्पष्ट है । ऊपर यह भी बताया गया था कि ' दव्यन ' यहाँ पर प्रकृतिभूत इकार के साथ विकृतिभूत यकार का विधान होने से शब्द को अनित्य ही मानना चाहिये । इसका उत्तर है- ' शब्दान्तरसविकार: ' अर्थात् ' दधि अत्र ' इससे ' दव्यत्र ' यह शब्द ही भिन्न है । यहां पर यकार इकार का विकार नहीं है । जैसे चटाई तुमने वाला व्यक्ति नियमतः उसके दिये तृणों को उपादान बनाता है, उसी तरह से यकार का प्रयोग करने वाला व्यक्ति नियमतः इकार का उपादान नहीं करता । अतः शब्द में विकार नहीं होता | दूसरी आशङ्का यह भी उठाई गई थी कि एक हौ शब्द को जब अनेक व्यक्ति बोलते हैं, तो उस समय आवाज तेज हो जाती है । इसका उत्तर है- ' नादवृद्धिः परा ' । अर्थात् अनेक व्यक्तियों के एक साथ एक ही शब्द के उच्चरित होने पर शब्द की वृद्धि की जो बात कही गई है, यह शब्द की वृद्धि नहीं है, किन्तु नाद अर्थात् ध्वनि की वृद्धि है । शब्द तो निरवयव हैं, अतः उसमें वृद्धि नहीं हो सकती । नाद की वृद्धि ही चान्ति से शब्द की वृद्धि प्रतीत होती है । इस तरह से परमत की समीक्षा करके भगवान् जैमिति अपने मत को कहते हैं - ' नित्यस्तु ० ' । तु शब्द यहाँ अवधारण ( निश्चय ) के अर्थ में प्रयुक्त हैं । अर्थात् शब्द नित्य ही हैं । दर्शन का अर्थ उच्चारण है । शब्द का उच्चारण दूसरे को अर्थ का बोध कराते safe से किया जाता है । उच्चरित शब्द के नष्ट हो जाने पर अन्य शब्दजन्य शब्द से अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि उसके साथ शक्तिग्रह नहीं होगा, साथ ही उच्चरित शब्द से अर्थ को जानता हूँ, इस अनुभव के साथ विरोध भी होगा । शब्द इसलिये भी नित्य है -- ' सर्वत्र योगपद्यात् ' । शब्द से सभी व्यक्तियों का एक साथ ( बोध ) ज्ञान होता है, इसलिये भी शब्द नित्य है । गो शब्द के उच्चारण करने पर एक साथ ही सभी गो व्यक्तियों की प्रतीति हो जाती हैं, यह बात अनुभव से सिद्ध है ) अतः शब्द को कृतिवाचक ( जाति ) मानना निश्चित हो जाता है । आकृति अर्थात् जाति से अनित्य शब्द का सम्बन्ध नहीं स्थापित हो सकता | शब्द को नित्य मानने पर पूर्व - पूर्व प्रयोग के आधार पर यह सम्बन्ध जाना जा सकता है ।

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वेदार्थपारिजातः ४८३ इतोऽपि नित्यः शब्द इत्याह-- ' संख्याभावात् ' ( मी ० सू ० १ | १ | २० ) । दशगोशब्दानुच्चारयतीति संख्याप्रतीतेरभावादपि नित्यः शब्दः । दशकृत्वो गोशब्दमुच्चारयतीत्येव प्रतीतेः । इतोऽपि नित्यः शब्द / २१ ) | यथा घटादिकार्यं स्वोत्पत्ती समवाय्यसमवायि-: -- - ' ': अनपेक्षत्वात् ' ( १।१ निमित्तकारणमपेक्षते, तन्नाशे च नश्यति नैवं शब्दः, तस्य समवाय्यादिकारणाभावात् । तस्मान्नित्यः शब्दः । ननु वायुकारणकः शब्दः, वायुसंयोगविभाग जयमानत्वात् ' बायुरापद्यते शब्दताम् ' इति शिक्षाकृदुक्तेश्व | तत्राह - ' प्रेक्षाभावाच्च संयोगस्य ' ( मो ० सू ० १११।२२ ) । संयोगस्य वाय्ववयवसंयोगस्य प्रेक्षाभावाद अनुपलब्धेश्च न वायुकारणकः शब्दः । वेदसम्मतमपि शब्दस्य नित्यत्वम् इत्याह- ' लिङ्गदर्शनाच्च ' ( मी ० सू ० १११।२३ ) | ( वाचा विरूपनित्यया ' ( ऋ ० सं ० ८२७५/६ ) इति नित्यत्वानुवादाल्लिङ्गादपि नित्यः शब्दः । एवं वेदविरुद्धानि प्राचां सिद्धान्तानि समालोचितानि विस्तरेण । अथेतः परं दयानन्दीया ऋग्वेदभाष्य-भूमिका कणहत्य खण्डयते । न होने से भी देखे जाते हैं । शब्द इसलिये भी नित्य है -- ' संख्याभावात् ' । शब्द नित्य है । यहाँ पर यही प्रतीत होता क्या बार - बार इन्हीं शब्दों का उच्चारण कर शब्द इसलिये भी नित्य है -- ' अनपेक्षत्वात् ' । अर्थात् दस गो शब्दों का उच्चारण करता है, यहाँ पर संख्या की प्रतीति कि दस बार एक ही गो शब्द का उच्चारण करता है । लोग ऐसा कहते रहे हो! अर्थात् घट आदि कार्य जैसे अपनी उत्पत्ति में समवायी, असमवायी और निमित्त कारण की अपेक्षा रखते हैं और कारण के नाश होने पर नष्ट हो जाते हैं, इस तरह की स्थिति शब्द की नहीं है, क्योंकि उसका कोई समवायी आदि कारण नहीं है । इसलिये शब्द नित्य है । प्रश्न है कि शब्द का कारण वायु है, क्योंकि वायु के संयोग और विभाग से उसकी उत्पत्ति होती है । शिक्षाकार ने भी कहा है कि वायु ही शब्द के आकार को प्राप्त कर लेता है । इसका समाधान यह है-- ' प्रेक्षाभावाच्च ० ' । अर्थात् वायु के अवयवों के उपलब्ध न होने से वायु को शब्द का कारण नहीं माना जा सकता । शब्द नित्य है, इस बात में वेद की भी सम्पति है । इस बात को इस सूत्र में बताया गया है ' लिङ्गदर्शनाच्च ' । ' वाचा विरूपनित्यया ' यह श्रुति वाणी की नित्यता और अधिकारिता का प्रतिपादन करती है, इस प्रमाण से भी शब्द की नित्यता सिद्ध होती है । इस प्रकार वेद विरोधी अनेक सिद्धान्तों की यहां विस्तार से समालोचना की गई है । अब आगे स्वामी दयानन्द विरचित ऋग्वेदभाष्यभूमिका का खण्डन किया जा रहा है ।

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दयानन्द - मतखण्डनम् १. वेदोत्पत्तिविचारा दयानन्दीय ऋग्वेदभाष्यभूमिकायां वेदोत्पत्तिविषयप्रकरणे यच्च दयानन्देन ' तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥ ( यजु ० ३१।७ ) इत्यत्र तस्माद्यज्ञात् सच्चिदानन्दलक्षणात् पूर्णात् पुरुषात् सर्वहृतात् सर्वपूज्यात् सर्वोपास्यात् सर्वशक्तिमतः परमेश्वरात् परब्रह्मण ऋचः ऋग्वेद, यजुर्यजुर्वेदः सामानि सामवेदः, छन्दांसि अथर्ववेदश्च जज्ञिरे चत्वारो वेदास्तेनैव प्रकाशिता इति बेद्यम् ' ( प ० १० ) इत्युक्तम् | अत्रेदं विचारणीयम् - ऋचः सामानि यजुरिति मन्त्रवाचकान्येव पदानि न ऋग्वेदादिपराणि, तथार्थ-विधाने मानाभावात् । नहि मन्त्रा एव वेदाः, मन्त्राणां वेदत्वबोधकमन्त्रानुपलब्धेः । न च ब्राह्मणादिग्रन्थैस्तेषां वेदत्वं सिध्यति, त्वया तेषां प्रामाण्यस्वतस्त्वानभ्युपगमात् । न च ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यद् ऋग्वेदः ' ( श ० ब्रा ० १४ | ५ | ४ | १० ) इत्यादिब्राह्मणवचनस्य तत्साधकत्वम्, ऋग्वेदादिसमस्तपदस्योद्देश्य विधेयभावासंभवात् । ' छन्दांसि ' इत्यस्याथर्ववेद इत्यपि निर्मूलोऽर्थ इत्यन्यत्रोक्तमेव, तत्पदस्य ब्राह्मणग्रन्थवाचकत्वाच्च । II यदपि चोक्तम्- ' सर्वहुत इति वेदानामपि विशेषणं भवितुमर्हति यतः सर्वमनुष्यैर्होतुमादातुं ग्रहीतुं योग्याः सन्ति ' ( पृ ० १० ) इति, तदपि तुच्छम् लिङ्गविभक्तिविपरिणामापत्तेः । न च बीजमन्तरा लिङ्गविभक्ति-विपरिणामी युक्तः । सर्वहुतपदस्य स्वयमेवोपरि सर्वपूज्यत्व सर्वोपास्यत्वरूपार्थकरणेन स्वोक्तिविरोधाच्च । स्वामी दयानन्द के मत का खण्डन १. वेदों की उत्पत्ति पर विचार अपनी वेदभाष्यभूमिका के वेदोत्पत्ति विषयक प्रकरण में दयानन्द ने ' तस्मात् यज्ञात् ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ करते हुए कहा है कि ' सत् जिसका कभी नाश नहीं होता है, चित् जो सदा ज्ञान स्वरूप है, जिसको अज्ञान का लेश भी कभी नहीं होता, आनन्द जो सदा सुखस्वरूप और सबको सुख देने वाला है, इत्यादि लक्षणों से युक्त पुरुष जो सब जगह परिपूर्ण हो रहा है, जो सब मनुष्यों को उपासना के योग्य इष्टदेव और सब सामर्थ्य से युक्त है; उसी परब्रह्म से ( ऋचः ) ऋग्वेद ( यजुः ) यजुर्वेद, ( सामानि ) सामवेद और ( छन्दांसि ) इस शब्द से अथर्व भी ये चारों वेद उत्पन्न हुए हैं ' ( १० ११-१२ ) । यहाँ यह बात विचारणीय है कि ऋचः सामानि और यजुः ये पद मन्त्रवाचक ही हैं, ऋग्वेद आदि के बोधक नहीं, क्योंकि ऐसा अर्थ करने में कोई प्रमाण नहीं है । मन्त्र हो बेद नहीं है, क्योंकि मन्त्रों को वेद बतलाने वाला कोई मन्त्र नहीं हैं । ब्राह्मण आदि ग्रन्थों से भी उनका वैदत्व नहीं सिद्ध हो सकता, क्योंकि आप उनको स्वतः प्रमाण नहीं मानते । ' इस महान् परमात्मा के निःश्वास से यह ऋग्वेद निकला ' इत्यादि ब्राह्मण वचन से इसकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि ऋग्वेद आदि समस्त पद का उद्देश्यविधेयभाव संभव नहीं हो सकता । ' छन्दसि ' इस पद का अर्थ अथर्ववेद करना निराधार है, यह बात अन्यत्र बताई जा चुकी है । ' इस सत्र में पठित ' सर्वहुत: ' पद वेदों का भी विशेषण हो सकता है, अर्थात् वेद सर्वहुत हैं, क्योंकि ये सब मनुष्यों से ग्रहण करने योग्य हैं ' ( पृ ० १२ ) यह भी व्यर्थ की बात है, क्योंकि ऐसा अर्थ करने के लिये लिङ्ग और विभक्ति का विपरिणाम करना पड़ेगा और बिना किसी कारण के ऐसा करना उचित नहीं होता । सर्वहुत पद का स्वयं ' ऊपर सर्व पूज्य और सबके उपास्य ' ऐसा अर्थ किया है, अतः अब उससे भिन्न अर्थ करना अपना ही विरोध करना भी है ।

पृष्ठ 515

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वेदार्थ पारिजातः ४८५ यदुक्तम्- ' वेदानां गायत्र्यादिच्छन्दोऽन्वितत्वात् पुनः छन्दांसीति पदं चतुर्थस्याथर्ववेदस्योत्पत्तिं ज्ञापयति ' ( पृ ० १० ) इति, तदपि तुच्छम् छन्दःपदस्य वेदपरत्वेन ' छन्दांसि जज्ञिरे ' इत्यनेनैव सर्ववेदोत्पत्तिसिद्ध ऋचः सामानि यजुरित्यादिशब्दानामपि वैयर्थ्यापित्तेरपरिहार्यत्वात् । यदि विशेषरूपेण ऋगादीनामुत्पत्तिबोधनाय ऋगादि-पदानि सार्थकानि, तर्हि पृथग्गायत्र्यादिछन्दसामुत्पत्तिसिद्धये छन्दांसीति पदमपि सार्थकमेव अथर्वमन्त्राणां तु त्रिष्वेवान्तर्भावान पृथगुपदेशार्हता । अतश्छन्दः पदस्य ब्राह्मणग्रन्थवाचकत्वमेव युक्ततरम् । यदपि ' जज्ञिरे अजायत ' इति क्रियाद्वयं वेदानामनेक विद्यावस्वद्योतनार्थम् ' ( पृ ० १० ) इति, तदपि निर्मूलम्, बीजमन्तरा उत्पत्यथकाया जनेरनेक विद्यावत्त्वबोधनेऽशक्तेः । न च क्रियापदस्यावृत्तिरेव बीजम्, जायमानभेदात् क्रियाभेदस्योपपन्नत्वात् । अन्यथा तृतीयस्या अपि ' जज्ञिरे ' इति क्रियाया: प्रयोजनं वक्तव्यमापतेत् । यत्तु ' अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते ( नि ० १० | ४२ ) इत्याश्रयणम् ' ( पृ ० १० टि ० ), तदपि तुच्छम्, तत्राभ्यः स्यमानस्य क्रियार्थस्यैव भूयस्त्वसंभवात् । नह्यत्पत्तेर्भूयस्त्वं त्वयेष्यते । विद्या तु नाभ्यस्यते, ततो न तेन वेदस्यानेक-विद्यावत्त्वमभ्यासेन सिद्ध्यति । यत्तु ' तस्मादिति पदद्वयं परमेश्वरादेव वेदा जाता इत्यवधारणार्थम् ' ( पृ ० १० ), तदपि बालभाषितम्, सर्वं वाक्यं सावधारणं भवतीति रीत्येकेनापि तस्मादिति पदेन परमेश्वरादेव वेदोत्पत्तिसिद्धया तदर्थं पदद्वयानपेक्षणात् । अभ्यथा तृतीयस्यापि तस्मादित्यस्य प्रयोजनं वक्तव्यम् । वस्तुतस्त्वत्रापि जायमानभेदादेव तस्मादिति पदत्रयनिर्देशः, समानकारणत्वनिर्देशेन त्रयाणामप्यगादीनां परमेश्वरादेवोत्पत्तिरिति नोत्पाद्यभेदेन कर्तृ भेदसिद्धिरित्यर्थः । ' वेदों में सब मन्त्र गायत्री आदि छन्दों से युक्त ही हैं । फिर ' छन्दांसि ' इस पद के कहने से चौषा जो अथर्ववेद हैं, उसकी उत्पत्ति का प्रकाश होता है ' ( पृ ० १२ ) यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि छन्दस् पद का अर्थ वेद होता है, ' छन्दांसि जज्ञिरे ' इतना कहने से ही सभी वेदों की उत्पत्ति सिद्ध हो जाती है, ऐसी परिस्थिति में ' ऋचः सामानि यजुः ' इत्यादि पदों की व्यर्थता निश्चित हो जायगी । यदि विशेषण रूप से ऋगादि की उत्पत्ति बतलाने के लिये इनकी सार्थकता मानी जाय, तो अलग से गायत्री प्रभृति छन्दों की उत्पत्ति की सिद्धि के लिये ' छन्दांसि ' यह पद भी सार्थक है । अथर्व मन्त्रों का इन तीन में ही समावेश हो जाता है, फिर उसमें पृथक् उपदेश की योग्यता नहीं है । अतः छन्दः पद का अर्थ ब्राह्मण ग्रन्थ ही ठीक है । इसी प्रकार ' जज्ञिरे ' और ' बजायत ' इन दोनों क्रियाओं के अधिक होने से वेद अनेक विद्याओं से युक्त है, ऐसा माना जाता है ' ( पृ ० १२ ) यह कथन भी निर्मूल है । बिना कारण के उत्पत्यर्थक अनि धातु ' अनेक विद्यावत्त्व ' अर्थ को कहने में समर्थ नहीं हो सकती । क्रिया की आवृत्ति को इसमें कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि जायमान वेदों के भेद से क्रिया का भेद होना उचित ही हैं, अन्यथा ' जज्ञिरे ' इस तृतीय क्रिया का प्रयोजन भी आपको बताना होगा । ' शब्द का अभ्यास अर्थात् बार - बार उच्चारण करने पर उसमें से अधिक अर्थ प्रकट होता है ' ( पू ० १० टिप्पणी ) इस निरुक्त वचन का सहारा लेना भी यहाँ ठीक नहीं, क्योंकि इससे तो दुहराई गई क्रिया में ही अर्थ की अधिकता होगी, उत्पत्ति का भूयस्त्व आपको अभिप्रेत नहीं है । विद्या का यहाँ अभ्यास नहीं किया गया है, तब क्रिया के अभ्यास से वेद की अनेक विद्यावत्ता नहीं बनेगी | ' तस्मात् इत्यादि पदों के अधिक होने से यह निश्चय जानना चाहिये कि ईश्वर से ही वेद उत्पन्न हुए हैं, किसी मनुष्य से नहीं ' ( पृ ० १२ ) यह भी बच्चों की सी बात है, ' सभी वाक्य सावधारण अर्थात् निश्चयात्मक होते हैं ' इस नियम के अनुसार ' तस्मात् ' इस एक पद से ही यह निर्धारित हो सकेगा कि परमेश्वर से ही वेद की उत्पत्ति होती है, तो फिर इसके लिये दूसरा ' तस्मात् ' पद अनावश्यक हो जायगा । अन्यथा आपको तृतीय ' तस्मात् ' पद का भी प्रयोजन बताना होगा । वास्तव में तो यहाँ पर भी जायमान वेद के भेद से ' तस्मात् ' पद का तीन बार निर्देश हुआ है । समान कारण का निर्देश होने से ऋग्वेद आदि तीनों वेदों की परमेश्वर से ही उत्पत्ति होती है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि उत्पाद्य ऋक् आदि के भेद से कर्ता में भेद नहीं होता ।

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* I * वेदार्थपारिजातः यत्तु ' सर्वजगत्कर्तृ एवं विष्णी परमेश्वर एव घटते नान्यत्र ' ( पृ ० १० ) इत्युक्तम्, तत्तु सत्यम्, किन्तु वैवेष्टि व्याप्नोति चराचरं जगत् स विष्णुः परमेश्वर इति व्युत्पाद्य तदर्थं ' यज्ञो वै विष्णुः ' ( श ० १ | १ | २ | १३ ) इति वचनो-रणं तु न त्वदभिप्रायपोषकम्, तत्र तु यज्ञे विष्णुस्वारोपस्यैव तात्पर्यविषयत्वात् । नहि यज्ञशब्दस्य व्यापकत्वमर्थः । यजेर्देवपूजाद्यर्थकत्वात् यज्ञेरिज्यत्वात्, यज्ञभोक्तृत्वात्, यज्ञफलदातृत्वाच्च यज्ञे विष्णुस्वारोपः । ' इदं विष्णुविचक्रमे धा निदधे पद ' ( यजु ० ५।१५ ) इदं तु विष्णोविक्रमणबोधकं वचनम् । तत्तु निराकारस्य नोपपद्यते, व्यापकस्प धापदनिधानानुपपत्तेः । एवमेव ' यस्मादृचो अपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन् । सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखम् || स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः । अथर्व ० ( १०७।२० ) । यस्माद् ब्रह्मणः ऋचः ऋग्वेदः अपातक्षन् उत्पन्नोऽस्ति, यस्माद्यजुः अपाकषन् प्रादुर्भूतोऽस्ति सामानि सामवेदः, अथर्ववेदश्च यस्मादुत्पन्नो । एवमेव परमेश्वरस्याथर्वाङ्गिरसो मुखमिव मुख्योऽस्ति सामानि लोमानीव सन्ति यजुर्यस्य हृदयं ऋच: प्राणश्चेति रूपकालङ्कारः । यस्माच्चत्वारो वेदा उत्पन्नाः कतमः स्विद्देवोऽस्ति तं ब्रूहीति प्रश्नः । अस्योत्तरम् - स्कम्भं सर्वजगद्धारकं परमेश्वरं तं जानीहि सर्वाधारात् परमेश्वरात् पृथक् कश्चिदप्यन्यो देवो वेदकर्ता नास्ति । ' ( पृ ० १०-११ ) । अत्र यद्युत्पत्तिरेव विवक्षिता स्यात्तदा ' अपाकषन् ' इति धातुभेदप्रयोगो निरर्थक एव स्यात्, तस्माद त्रार्थान्तरमन्वेष्टव्यम् । रूपकेण त्वेवं विज्ञायते यदा काष्ठेन स्तम्भो निर्भीयते तदा तस्य पूर्व तक्षणादिभिः स्वरूपं निर्मीयते, पश्चादपाकषणेन चिक्कणतासंपादकेन यन्त्रेण स्तम्भः स्निग्धः सम्पाद्यते । तथैव तत्र तक्षणेनापाकषणेन च शाः पृथग्भवन्ति तेऽपि तदंशा एव, तथैव ब्रह्मतत्त्वं तत्काष्ठस्थानीयम् । ततो विशुद्धसत्त्वोपात्रिक-' सब जगत् की उत्पत्ति करनी परमेश्वर में ही घटती है, अन्यत्र नहीं ' ( पृ ० १२ ) यह बात तो सही है, किन्तु ' चराचर जगत् को जो व्याप्त करके रहता है, वह विष्णु है ' इस प्रकार की व्युत्पत्ति कर इसके लिये ' यज्ञ ही विष्णु है ' ( पृ ० १० ) इस शतपथ श्रुति को उद्धृत करने से आपका अभिप्राय नहीं सिद्ध हो सकता, क्योंकि वहाँ पर तो यज्ञ को ही विष्णु कहा गया है । यज्ञ शब्द का अर्थं व्यापक नहीं हो सकता । यज् धातु का अर्थ देवपूजा है, परमात्मा यज्ञ से पूजनीय हैं, यज्ञ का भोक्ता है और यज्ञ के फल का भी दाता है, अतः यज्ञ में विष्णु का आरोप किया जाता है । ' इदं विष्णुविचक्रमे ' ( पृ ० १० ) इस श्रुति में विष्णु के तीन पदक्रमों का वर्णन किया गया है | आपके अभिप्रेत निराकार परमेश्वर में यह संभव नहीं है, क्योंकि जो सब जगह व्याप्त है, वह तीन बार पैर कैसे रखेगा । ' ( यस्मादृचो अपा ० ) जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, उसी से ( ऋचः ) ऋग्वेद, ( यजुः ) यजुर्वेद, ( सामानि ) सामवेद, ( rea ङ्गरसः ) अथर्ववेद, ये चारों उत्पन्न हुए हैं । इसी प्रकार रूपकालंकार से वेदों की उत्पत्ति का प्रकाश ईश्वर करता है कि अथर्ववेद मेरे मुख के समतुल्य, सामवेद लोमों के समान, यजुर्वेद हृदय के समान और ऋग्वेद प्राण की नाई है । ये चारों वेद जिससे उत्पन्न हुए हैं सो कौन सा देव है, उसको तुम मुझसे कहो, इस प्रश्न का उत्तर है कि जो सब जगत् का धारणकर्ता परमेश्वर है, उसका नाम स्कम्भ है, उसी को तुम वेदों का कर्ता जानो और यह भी जानो कि उसको छोड़ के मनुष्यों को उपासना करने के योग्य दूसरा कोई इष्टदेव नहीं है ( पृ ० १२ ) । ' पर यहाँ यदि उत्पत्ति ही कहनी हो तो ' अपाकषम् ' इस भिन्न धातु का प्रयोग निरर्थक हो जायगा, इसलिये यहाँ दूसरा अर्थ खोजना पड़ेगा । रूपक अलंकार से ऐसा मालूम होता है कि जब लकड़ी से खंभा बनाना होता है तो पहले लकड़ी की काट - छीन कर खंभे का आकार बनाया जाता है । उसके बाद उसको चिकना बनाने के लिये रंदे से छीला जाता है | यहाँ पर लकड़ी के काटने और छीलने से उसके जो अंश अलग होते हैं, वे उसी के अंग माने जाते हैं, इसी तरह ब्रह्मतत्त्व यहाँ पर काष्ठ के तुल्य है । वह विशुद्ध rea को अपनो उपाधि बना कर चैतन्य स्वरूप ईश्वर सारे जगत् के आधारभूत स्तम्भ के रूप में अभिव्यक्त होता है । ऋ और यजुः ब्रह्म के अंश है, क्योंकि तक्षण आदि के द्वारा उपादान का अंश ही ऋक्, यजुः आदि रूपों में अभिव्यक्त होता है । ' वेद साक्षात् '

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वेदार्थपारिजात: ४८७ चैतन्यरूप ईश्वरः सर्वजगदाधारस्तम्भरूपेण व्यञ्जते । ऋचो यजूंषि च ब्रह्मणोऽशभूतानि, तक्षणादिभिरुपादानां -शस्यैवर्गादिरूपेणाविर्भावात् । श्रीभागवता नारायणस्यैव वेदरूपेणाभिव्यक्तेरुक्तत्वात् । ' वेदो नारायणः साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुम ' इति वचनात् । तत्रापि ऋचां स्थौल्यं तदपेक्षया यजुषां सौक्ष्म्यावद्योतनाय ऋचां तक्षणजन्यत्वं यजुषाञ्चापाकषणजन्यत्वमुक्तम् । वस्तुतः कूटस्थे निरवयवे तक्षणाद्यसंभवादारम्भपरिणामासम्भवेन विवर्तोपादानत्वमेव ब्रह्मणो मन्तव्यम् । तथा च ब्रह्मण एव सर्वजगदाधारपरमेश्वररूपेण तत्संचालकवेदरूपेण प्रादुर्भाव इत्ये ara विवक्षितोऽर्थः । अभिधेयात्मकप्रपञ्चोत्पादनानुगुण शक्त्यवच्छिन्न सदानन्दस्येश्वरत्वम्, अभिधाना-त्मकप्रपञ्चोत्पादनानुगुणशक्त्यवच्छिन्न संविदानन्दस्य प्रणवादिवेदरूपत्वम्, परमार्थतोऽवेद्यत्वे सत्यपरोक्षस्य स्वप्रकाशस्यापि व्यवहारभूमौ स्वस्य परमेशरूपस्य स्वेन वेदरूपेण प्रकाशनादपि स्वप्रकाशत्वमुक्तम् । तस्यैव सर्वाधारस्याथर्ववेदो मुखम्, सामानि लोमानीवात्राप्यभेद एव विवक्षितः, अंशांशिनामधिष्ठानाधिष्ठेयानामभेद-पर्यवसायित्वात् । सच्चिदानन्दसमुद्रे सदानन्दसंविदानन्दो मुख्यो तरङ्गी । तद्विकाराव तज्जन्यास्तरङ्गाः, तदभिन्ना-free aafada ब्रह्मरूपतेव विवक्षिता तेषाम् । यदपि चोक्तम्- ' एवं वा अरे s स्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः ' ( श ० १४ | ५ | ४ | १० ) इत्याकाशादपि महतः परमेश्वरस्य सकाशाद् ऋग्वेदादिचतुष्टयं निःश्वसितं निःश्वासवत् सहजतया निःसृतमिति वेदितव्यम् । यथा शरीराच्छ्वासा निःसृत्य पुनस्तदेव प्रविशन्ति तथैवेश्वराद् वेदानां प्रादुर्भावतिरोभावो भवत इति निश्चयः ' ( पृ ० ११ ) इति, तदपि चिन्त्यम्, ऋग्यजुः सामवेदा इत्यनेनैवाभिप्रेतसिद्धो वेदयस्य वैयर्थ्यापत्तेः । तस्मादत्र ऋचां मन्त्राणां वाहुल्य ऋचो वा पठितव्या विनियोज्या यस्मिन् वेदे स ऋग्वेदः, स्वयम्भू नारायण है, ऐसा हम सुनते है ' इस भगवान् के वचन में नारायण की ही वेद रूप में अभिव्यक्ति बताई गई है । ऋचाओं की स्थूलता और यजुमंत्रों की सूक्ष्मता को बताने के लिये यहाँ पर ऋकू की तक्षणजन्यता और यजुः की अपाकषणजन्यता बताई गई है, अर्थात् उस ब्रह्मरूप काष्ठ के काटने से ऋग्वेद और छीलने से यजुर्वेद बना । वास्तव में कूटस्थ निरवयव ब्रह्म में तक्षण आदि क्रियायें नहीं हो सकती, अतः यहाँ उत्पत्ति का अर्थ न्याय और सांख्य संमत आरम्भ और परिणाम न मानकर वेदान्त संमत विवर्त लेना चाहिये । इस तरह ब्रह्म हो सारे जगत् के आधारभूत परमेश्वर के रूप में और वेद के रूप में दिखाई दे जाता है, जैसे सीप हो चांदी और रस्सी ही सांप दिखाई पड़ जाता है । यही अर्थ यहाँ विवक्षित है । परमेश्वर अभिधेयात्मक ( अर्थं स्वरूप ) अर्थात् सारे जगत् के वस्तु स्वरूप प्रपत्र को उत्पन्न करने में समर्थ सारी शक्तियों से युक्त तथा सदा आनन्द स्वरूप है और वेद अभिधानात्मक उन्हीं जगत् की वस्तुओं के वाचक शब्द स्वरूप सारे प्रपंच को उत्पन्न करने में समर्थ सारी शक्तियों से युक्त संवित् ( ज्ञान ) आनन्द स्वरूप प्रणवमय है । ब्रह्म परमार्थतः अवेध होते हुए भी स्वप्रकाश होने से प्रत्यक्ष हैं, अतः व्यवहार में भी वह अपने परमेश्वर रूप में अर्थात् वेद रूप में प्रत्यक्ष भासित होता है । उसी सर्वाधार परमेश्वर का मुंह अथर्ववेद और लोम साम है । यहाँ भी अभेद ही कहा गया है । जिनका अंशांशिभाव, अधिष्ठानाधिष्ठेयभाव होता है, अन्ततः उनमें अभेद ही विद्यमान रहता है । सत्, चित् और आनन्द के समुद्रभूत ब्रह्म की सदानन्द और संविदानन्द ये दो मुख्य लहरें हैं । इनसे अन्य अनेक लहरें पैदा होती हैं । मुख्य लहरें ब्रह्म से अभिन्न हैं और अन्य लहरें मुख्य लहरों से अमित्र हैं, अतः ब्रह्मस्वरूप ही मानी जाती है । पर वेदान्तसिद्धान्त शून्य स्वामी की समझ से ये बातें दूर हैं । ( एवं वा अस्य ) हे मैत्रेयि, जो आकाश आदि से भी बड़ा सर्वव्यापक परमेश्वर है, उससे ही ऋक्, यजुः साम और अथर्व ये चारों वेद उत्पन्न हुए हैं । जैसे मनुष्य के शरीर से श्वास बाहर आकर फिर भीतर को जाता है, इसी प्रकार सृष्टि के आदि में ईश्वर वेदों को उत्पन्न करके संसार में प्रकाश करता है और प्रलय में संसार में वेद नहीं रहते ' ( पृ ० १२ ) यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऋक्, यजुः सामवेद कहने से अभिप्रेत की सिद्धि हो जाती है तो फिर यहाँ पर तीन बार वेद पद की आवृत्ति करने से क्या फायदा? इसलिये यहाँ पर ऋग्वेद शब्द से हीं ऋचाओं का बाहुल्य है अथवा ऋचाओं का जहाँ विनियोग किया गया है, उसको ऋग्वेद

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४८८ वेदार्थपारिजातः यजूंषि यजुषां बाहुल्यं यजुर्मन्त्रा वा विनियोज्या यत्र स यजुर्वेदः " सामानि गेयानि साम्नां वा बाहुल्यं यस्मिन् स सामवेद इति ज्ञातव्यम् तेन ब्राह्मणभागस्यापि प्रादुर्भाव इह विवक्षितो ज्ञेयः । ऋक् यजुः सामपदैस्तु नियताक्षर -पादावसाना ऋङ्मन्त्रा गीतिविशिष्टाः साममन्त्रास्तदवशिष्टा यजुर्मंन्त्रा एव विज्ञायते, न तेषां वेदत्वं विज्ञायते । वेदपदेन तु मन्त्रब्राह्मणसमुदायस्यैव ग्रहणात् । दयानन्देन तु ब्राह्मणभागस्य वेदत्वं नोरीक्रियते । तन्निराकरणं तुपरिष्टात् करिष्यते विशेषतः । सामान्येन तु रीत्याऽनयापि निराकृतमेव । यत्तु ' निरवयवात् परमेश्वराच्छन्दमयो वेद: कथमुत्पद्येत ' इत्याशङ्क्योक्तम्- ' न सर्वशक्तिमतीश्वरे शङ्केयमुप-पद्यते, मुखप्राणादिसाधनमन्तरापि तस्य कार्यं कर्तुं सामर्थ्यस्य सदैव विद्यमानत्वात् । अन्यच्च यथा मनसि विचारणा-वसरे प्रश्नोत्तरादिशब्दोच्चारणं भवति, तथेश्वरेऽपि मन्यताम् । योऽस्ति खलु सर्वशक्तिमान् स नैव कस्यापि सहायं कार्यं कर्तुं गृह्णाति यथास्मदादीनां सहायेन विना कार्य कर्तुं सामर्थ्य नास्ति न चैवमीश्वरे । यदा निरवयवेनेश्वरेण सकलं जगद्रचितं तदा वेदरचने का शङ्कास्ति? कुतो वेदस्य सूक्ष्मरचनवज्जगत्यपि महदाश्चर्यभूतं रचनमीश्वरेण कृतमस्ति ' ( पृ ० १३ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, कण्ठतालवाद्यभिघातमन्तरा शब्दोत्पादनासंभवात् । न च सर्वशक्ति-मत्त्वादेव दृष्टकार्यकारणभावापलापः संभवति, तथात्वे सर्वशक्तिमत्त्वेनैव वेदमन्तरापि तदुपदेशसंभवात्, वेदस्याप्यानर्थक्य-प्रसङ्गात् । ज्ञानेच्छाकृत्यभावेऽपि जगदुत्पत्तिसिद्धौ जगत्कारणत्वेन सर्वज्ञत्वासिद्धेश्व । न च वेदप्रामाण्यात्तथात्व-सिद्धिरिति वाच्यम्, वेदस्य परमेश्वरकारणत्व एव विप्रतिपत्तेः । न चोक्तवचनबलात्तस्य वेदकारणत्वसिद्धिः, वेदप्रामाण्यसिद्धावेव तस्यापि प्रामाण्यसिद्धेः । कथञ्चित् प्रामाण्यसिद्धावपि तस्य ज्ञापकत्वमेव न कारकत्वम्, मानना पड़ेगा । इसी तरह जहाँ पर यजुस् का बाहुल्य हैं अथवा यजुर्मन्त्रों का जहाँ विनियोग है, वह यजुर्वेद तथा जहाँ पर साम गेय है अथवा सामगान का जहाँ बाहुल्य है, वह सामवेद यह अर्थ करना पड़ेगा, इस प्रकार ब्राह्मण भाग का भी प्रादुर्भाव यहाँ वर्णित है | केवल ऋक्, यजुः और सामपद से तो नियताक्षर और नियतपाद वाले ऋङ् मन्त्र, गीतिविशिष्ट साममन्त्र, इन दोनों से बचे यजुर्मन्त्र हो ज्ञात होते हैं । इससे ये वेद हैं, यह ज्ञात नहीं होता । वेद पद में तो मन्त्र और ब्राह्मण का समुदाय अभिप्रेत है । दयानन्द arrer at a नहीं मानते । इस मत का खण्डन आगे विशेष रूप से किया जायगा । सामान्य रूप से इस रीति से भी दयानन्द का खंडन हो ही जाता है । ' ईश्वर निराकार है, उससे शब्दरूप वेद कैसे उत्पन्न हो सकते हैं, ऐसी आशंका कर उसका जो उत्तर दिया गया है ' परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है । उसमें ऐसी शंका करना सर्वथा व्यर्थ है, क्योंकि मुख और प्राण आदि साधनों के बिना भी परमेश्वर में मुख और प्राण आदि के काम करने का अनन्त सामर्थ्य सदा विद्यमान है । इसमें दृष्टान्त भी है कि मन में मुख आदि अवयव नहीं हैं, तथापि जैसे उसके भीतर प्रश्नोत्तर आदि शब्दों का उच्चारण मानस व्यापार में होता है, वैसे ही परमेश्वर में भी जानना चाहिये | जो सम्पूर्ण सामर्थ्य वाला है, सो किसी कार्य के लिये किसी का सहाय ग्रहण नहीं करता । जैसे हम लोग बिना सहाय से कोई काम नहीं कर सकते, वैसा ईश्वर नहीं है । जब जगत् उत्पन्न नहीं हुआ था, उस समय निराकार ईश्वर ने सम्पूर्ण जगत् को बनाया, तब वेदों के रचने में क्या शंका है? जैसे वेदों में अत्यन्त सूक्ष्म विद्या की रचना ईश्वर ने की है, वैसे ही जगत् में भी नेत्र आदि पदार्थों की अत्यन्त आश्चर्यजनक रचना की है, तो क्या वेदों की रचना निराकार ईश्वर नहीं कर सकता? ' ( पृ ० १३ ) इस कथन में भी कुछ दम नहीं हैं । कण्ठ, वालु आदि स्थानों में अभिघात के बिना शब्द की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती । परमेश्वर के सर्वशक्तिमान् होने से यहाँ पर लोक में शतशः दृष्ट कार्यकारणभाव का भी अपलाप मान लेने से तो अच्छा यही मान लेना होगा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में बिना ही वेद के उपदेश देने का सामर्थ्य मान लिया जाय, फिर जो वेदों की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जायगी । ज्ञान, इच्छा और किया के अभाव में भी जगत् की उत्पत्ति मानने पर तो परमेश्वर में जगत् की कारणता और सर्वज्ञता भी नहीं बनेगी । वेद के प्रमाण से भी यह नहीं ही सकेगा, क्योंकि अभी तो वेद परमेश्वर द्वारा निर्मित है, यही विवाद का विषय है । उक्त श्रुति के प्रमाण से परमेश्वर में वेद की कारणता मान ली जायगी, यह भी संभव नहीं है, क्योंकि वेद का प्रामाण्य सिद्ध हो जाने पर ही उस वचन को भी प्रमाण माना जायगा । किसी प्रकार वेद प्रमाण हैं यह सिद्ध भी हो जाय, तो भी उक्त वचन ज्ञापक ही होगा, कारक नहीं । सैकड़ों बार चिल्लाने

पृष्ठ 519

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देवार्थपारिजातः ४८६ शब्दशतैरपि घटस्य पयत्वासिद्धेः । यथा घटादीनां ज्ञानेच्छाकृतिमत्कर्तृपूर्वकत्वं दृष्टं तथैव सावयवत्वेन भूधरसागरादि-प्रपञ्चस्यापि ज्ञानेच्छाकृतिमच्चेतनकर्तृत्वं साध्यते, दृष्टानुसारेणैवादृष्टस्यापि सिद्धिसम्भवात् । चित्तु तावदेव किन्तु घटादीनां शरीरिकर्तृकत्वेन प्रपञ्चस्यापि शरीरिकर्तृकत्वमेव साध्यते । तथा च कण्ठतालवाद्यभिघातमन्तरा निराकाराद् ब्रह्मणः पदवाक्य कदम्बरूपवेदस्याप्युत्पत्तिर्न सम्भाव्यते । विचारकालिक -प्रश्नोत्तरादिशब्दोच्चारणं तु कण्ठतालवाद्युच्चरितबाह्यशब्दसापेक्षं न केवलं मानसमेव, तस्य मानस भोजनस्येवा-किञ्चित्करत्वात् । न चेश्वरोऽपि निरपेक्षो जगत्सृजति, प्रकृतिपरमाण्वदृष्टादिसापेक्षत्वात् । अन्यथा वेषम्यनैर्दृण्यदोषस्य वज्रलेपायितत्वापत्तेः । यथा पर्जन्येन धरणिजलानिलवीजा दिसापेक्षेणैवाङ्कुरो जन्यते, तथैव परमेश्वरेणापि कण्ठताल्वा-दिसापेक्षेणैव वर्णा उच्चाय्र्यन्ते । न च ' अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्ण: ' इति श्रुत्या स्पष्ट-मेवापाणिपादस्यापि तस्य द्रुतगमनवस्वं ग्रहीतृत्वमचक्षुषोऽपि द्रष्टृत्यमकर्णस्यापि श्रोतृत्वमुच्यते, तथैव कण्ठताल्वादि-रहितस्थापि शब्दोच्चारयितृत्वं तस्य सम्भवत्येवेति वाच्यम्, क्रियाशक्त्याश्रयस्य प्राणस्येव चेतनाधिष्ठितस्यैवाचेतनस्य पाणिपादादेः प्रवृत्त्याश्रयत्वेन ज्ञानाश्रयस्य चेतनाधिष्ठितस्यैव चक्षुः श्रोत्रादेर्ज्ञानाश्रयत्वमिति बोधन एवोक्तस्ता-त्पर्यात् । ब्रह्मात्मचैतन्यं विना पाणिपादादीनां चक्षुः श्रोत्रादीनां चाकिञ्चित्करत्वात् परमेश्वरस्यैव स्वतः पाणिपादादि-रहितस्यैव चक्षुः श्रोत्रादिरहितस्यैव सर्वज्ञत्वं सर्वकार्यकरणत्वं चोक्तम् । यथा द्रुमादिवीजेषु विविधाङ्कुरनालस्कन्ध-शाखोपशाखादिपुष्पफल रसादिजननशक्तिमत्सु पर्जन्यधरणिजलानिलादिसंसर्गेणाङ्कुरादिजनकत्वम्, तथैतानि सर्वाण्यपि पर भी घट पट नहीं बन सकता । जैसे घट यादि की रचना ज्ञान, इच्छा, क्रियापूर्वक होती है, वैसे ही सावयव होने से भूधर, सागर आदि प्रपञ्च की रचना भी ज्ञान, इच्छा, कृति ( क्रिया ) से युक्त चेतन द्वारा ही माननी पड़ेगी, आखिर लौकिक दृष्टान्तों से हो तो अलोकिक वस्तु को भी समझा जा सकेगा । इतना ही नहीं, कुछ लोगों का कहना है कि जैसे घटादि पदार्थों की रचना शरीरवारी करते हैं, उसी तरह यह सारा जागतिक प्रपञ्च भी शरीर धारी का हो बनाया हुआ है | अतः कण्ठ तालु आदि स्थानों के अभिघात के बिना निराकार ब्रह्म से पद-वाक्यसमूह रूप वेद की उत्पत्ति नहीं हो सकती । विचार के समय मन में प्रश्न और उत्तर के रूप में जो शब्द के उच्चारण की प्रतीति होती हैं, वह कण्ठ, तालु आदि स्थानों से उच्चरित बाह्य शब्द के ज्ञान को लेकर ही बन सकती है । मानस कल्पना का भोजन जैसे किसी का पेट नहीं भर सकता, वैसे ही वह मानस शब्द भी व्यर्थ ही है । परमेश्वर भी प्रकृति, परमाणु, प्राणियों के पूर्व जन्मों में किये गये कर्मों आदि का सहारा लेकर ही जगत् की सृष्टि करता है, बिना सहारे के नहीं | क्योंकि ऐसा न मानने पर परमेश्वर में सुख - दुःखी अनेक प्रकार के विषम प्राणियों को उत्पन्न करने के कारण पक्षपात और निर्दयी होने के दोष को कोई दूर नहीं कर सकेगा | जैसे वर्षा का जल पृथ्वी, पवन, बीज आदि का सहारा लेकर ही अंकुर को पैदा करता है, उसी तरह परमेश्वर भी कण्ठ तालु आदि का सहारा लेकर ही वर्णों का उच्चारण करता है । ' क्षपाणिपादो ० ' इत्यादि श्रुति में परमेश्वर को बिना हाथ - पैर के ही शीघ्र चलने वाला और ग्रहण करने वाला, बिना चक्षु के ही देखने वाला, बिना कान के सुनने वाला कहा है, उसी तरह बिना कण्ठ तालु आदि के ही शब्दों के उच्चारण को भी सामर्थ्य उसमें क्यों न मान ली जाय, यह कहना कुछ ठीक तो लगता है, पर वास्तव में इस मन्त्र का तात्पर्य यह है कि क्रियाशक्ति का आश्रयभूत प्राण जैसे चेतन के द्वारा अधिष्ठित ( संचालित ) अचेतन हाथ - पैर आदि की प्रवृत्ति का आश्रय होता है, उसी तरह ज्ञान के आश्रयभूत चेतन के द्वारा अधिष्ठित आँख, कान आदि ही ज्ञान की उत्पत्ति में सहायक हो सकते हैं । परमात्म चैतन्य के बिना हाथ - पैर आदि अथवा आँख कान आदि कुछ नहीं कर सकते, इसीलिये परमेश्वर की बिना हाथ - पैर के और आँख कान के सर्वज्ञता और सर्वकर्तृता बताई गई है । जैसे कि वृक्ष के बीज में नाना प्रकार के अंकुर, नास, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पुष्प, फल, रस आदि को पैदा करने की सामर्थ्य है, किन्तु वह वर्षा, पृथ्वी, जल, पवन आदि के संसर्ग से ही इनको पैदा करता है, वैसे ही सभी अधिष्ठान पदार्थ वेलन offer होकर ही कार्य कर ६२

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 520 का मूल पृष्ठ
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४६० वेदार्थपारिजातः साधिष्ठानानि चेतनाधिष्ठितान्येव कार्यकारीणीत्यधिष्ठानचेतनस्यैव सर्वकारणत्वम् । चेतनाधिष्ठितरथादीनां प्रवृत्ति-दर्शनाच्चेतनाधिष्ठितानामेव कार्यकर्तृत्वं विज्ञायते, न सर्वशक्तिमानपि परमेश्वरो बीजादिमन्तराऽङ्कुरादिनिर्माण स्वातन्त्र्येण प्रवर्तते । शुकपिक हंसमयूरादिरूपवैचित्र्यनिर्माण विविधस्तबकपल्लवपुष्पफलतद्रसादिनिर्माण वा यथा वीजादिशक्त्यैव परमेश्वरः प्रवर्तते, तर्थव मनुष्यपश्वादिशुकनिष्ठशक्त्यैव मनुष्यपश्वादिश्रोत्रनेत्रमस्तिष्क-बुद्ध्यादिनिर्माण परमेश्वरः प्रवर्तते न स्वातन्त्र्येण । तत्तत्कार्यानुकूलाः कार्यानुमेयास्तच्छक्तयोऽपि परमेश्वरीयमहा-शक्त्यंशत्वात्तदंशा एव, ' यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाऽखिलात्मिके । तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥ ' इति सप्तशतीवचनात् । यथा गोधूमबीजे गोधूमजननशक्तिर्भवति, तथैवानन्तकोटिब्रह्माण्डात्मकप्रपञ्चाधिष्ठाने ब्रह्मणि प्रपञ्चोत्पादन शक्तिरपि स्वीक्रियते । तावतेव सर्वशक्ति ब्रह्मोच्यते । न तावता सर्वशक्तिमत्त्वेनैव तद्ब्रह्म बीजादिमन्तरेव तत्तत्पत्रपुष्पफलप्राण्यादिनिर्माणे प्रवर्तते । यदपि -- परमेश्वरादन्येन वेदा: कथं न निर्मिता इत्यस्याः शङ्काया अपाकरणायोक्तम्- ' ईश्वरेण रचितस्य वेदस्याध्ययनानन्तरमेव ग्रन्थरचने कस्यापि सामथ्र्यं स्यात्, न चान्यथा ' ( पृ ० १४ ) इति, तत्तु बालभाषितम्, सहस्रशो व्यभिचारदर्शनात् । अद्यत्वे ये वेदाक्षरेरत्यन्तमपरिचिताः सन्ति तैरपि संस्कृतादिविविधभाषामया ग्रन्था निर्मीयन्त एव । यच्च - नैव कश्चिदपि पठनश्रवणमन्तरा विद्वान् भवति । यथेदानीं किञ्चिदपि शास्त्रं पठित्वोपदेशं श्रुत्वा व्यवहारं दृष्ट्वैव मनुष्याणां ज्ञानं भवति । तद्यथा कस्यचित् सन्तानमेकान्ते रक्षयित्वान्नपानादिकं युक्त्या दद्यात् तेन सह सम्भाषणादिव्यवहारं लेशमात्रमपि न कुर्यात् । तदा तस्य किञ्चिदपि यथार्थं ज्ञानं न भवति । यथा च महारण्यस्थानां सकते हैं, अतः अधिष्ठान चैतन्य को हो सबका कारण माना जाता है । चेतन सारथी के रहने पर हो रथ चान सकता है, इसी दृष्टान्त से सब जगह चेतन की उपस्थिति में हो किसी भी कार्य की प्रवृत्ति माननी पड़ेगी । सर्वं शक्तिमान् परमेश्वर बिना बीज की सहायता लिये ही स्वतन्त्र रूप से अंकुर का निर्माण नहीं करता । शुक, पिक, हंस, मयूर आदि के विचित्र स्वरूपों के निर्माण में और नाना प्रकार के स्तबक, पल्लव, पुष्प, फल तथा उनके रस के निर्माण में जैसे ईश्वर वीर्य, बीज, आदि में निहित शक्ति का सहारा लेता है, उसी तरह मनुष्य आदि के वीर्य में स्थित शक्ति की सहायता से ही मनुष्य आदि के आंख - कान, मस्तिष्क, बुद्धि आदि की रचना में वह प्रवृत्त होता है, स्वतन्त्र रूप से नहीं । तत् तत् कार्य को करने में समर्थ, कार्य के द्वारा जिनका अनुमान होता है, ऐसी परमेश्वर की शक्तियाँ परमेश्वर की महाशक्ति का एक अंश होने से उससे अनम्य ही मानी जायगी । ' हे सर्वस्वरूपे देवि, जहाँ कहीं भी सत् - असत् रूप से जो कुछ वस्तुएं हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो । ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है ' सप्तशती में ब्रह्मा द्वारा की गई इस स्तुति का यह अभिप्राय है । जैसे गेहूँ के बीज में गेहूँ को पैदा करने की शक्ति विद्यमान है, उसी तरह अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मक इस प्रपंच के अधिष्ठानभूत ब्रह्म में इस सारे प्रपञ्च को उत्पन्न करने की शक्ति मानी जाती है । इसीलिये ब्रह्म को सर्वशक्तिमान् कहा जाता है | सर्वशक्तिमान् होने मात्र से ब्रह्म बिना बीज आदि की सहायता से पत्र, पुष्प, फल तथा जीवों के निर्माण में प्रवृत्त नहीं होता । ' परमेश्वर के सिवाय किसी अन्य मनुष्य ने वेद क्यों नहीं बना लिये? ' इस शङ्का का परिहार करने के लिये कहा गया है कि - ' ईश्वर के बनाये वेदों के अध्ययन के बाद हो अन्य किसी मनुष्य को ग्रन्थ निर्माण की सामर्थ्य हो सकती हैं ' यह बच्चों की सी बात है । इसमें अनेक बार व्यभिचार देखा जाता है । rane जो वेद के अक्षरों से अत्यन्त अपरिचित है, उनको भी संस्कृत में तथा अन्य भाषाओं में ग्रन्थ बनाते देखा जाता है । ' वेद के पढ़ने और ज्ञान के बिना कोई भी मनुष्य विद्वान् नहीं हो सकता । जैसे इस विषय में किसी शास्त्र को पढ़ के, किसी का उपदेश सुन के और परस्पर मनुष्यों के व्यवहार को देखकर ही मनुष्यों को ज्ञान होता है । जैसे किसी मनुष्य के बालक को जन्म से एकान्त में रखकर उसको अन्न और जल युक्ति से देवे, उसके साथ भाषण आदि व्यवहार लेशमात्र भी कोई मनुष्य न करे,