वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 521–530

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 521–530

पृष्ठ 521

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वार्थपारिजातः मनुष्याणामुपदेशमन्तरा पशुवत्प्रवृत्तिर्भवति, तथैवादिसृष्टिमारस्याद्यपर्यन्तं वेदोपदेशमन्तरा सर्वमनुष्याणां प्रवृत्तिर्भवेत् पुनर्ग्रन्थरचनस्य तु का कथा ' ( पृ ० १४ ) इति, तदपि न किश्चित्, पशुपक्षिपिपोलिकादीनामपि विशिष्टज्ञानपूर्वक -प्रवृत्तिदर्शनात् । अत एव पिपीलिकाम्यो धनसङ्ग्रहः शिक्ष्यते । मधुमक्षिकाभ्यः सारग्रहणं मनुष्यैरपि शिक्ष्यते, ' अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः । सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः ॥ ' राजनीतिष्वपि वृक्षांछित्वा दग्ध्वे-ङ्गालनिर्मापेक्षया पल्लवान् पुष्पाणि किञ्चिदपि अव्यापाद्य मधुररससङ्ग्रहपरायणाया मधुमक्षिकाया नीतिराद्रियते । युगपत्प्रवर्तमानेभ्यो निवर्तमानेभ्यः कपोतेभ्यो लोकतन्त्रनीतिः, मधुकरराजानमनुवर्तमानाभ्यो मधुमक्षिकाम्यश्च राजतन्त्र-नीतिविज्ञायते । वृकादाखेट: शिक्ष्यते । अधिकादधिकमिदमेव ववतुं शक्यते यन्मानवीय भाषाविज्ञानं वृद्धव्यवहारोपदेश-पूर्वकमेव भवति । तावतापि नेश्वरीयवेदोपदेशस्तदर्थमपेक्षितः, पूर्वजव्यवहारोपदेशादिभिरन्यथासिद्धत्वात् । त्वद्रीत्यापि पठनश्रवणव्यवहारदर्शनैर्भाषाज्ञानं सम्पद्यते । न वेश्वरस्योपदेशः सम्भवति, निराकारस्व तदसम्भवात् । कण्ठतालवाद्य-भावेन वाक्योच्चारणेनेश्वरो नोपदेष्टुं शक्नोति । न च मनुष्याः कण्ठतालवाद्यनुच्चरितान् शब्दान् शृण्वन्ति न वा श्रोतुं शक्नुवन्ति । न च मनुष्याः परमेश्वरं पश्यन्ति । तद्व्यवहारदर्शनन्तु नतरां पश्यन्ति । ततः परमेश्वरीयवेदोपदेशेन भाषाज्ञानमपि न सम्भवति । सन्तुष्यतु दुर्जनन्यायेन तदभ्युपगमेऽपि ग्रन्थनिर्माण वेदाध्ययनं कारणं तदानन्तर्यं वा? आद्यं चेद्वेदाध्ययनादेव तद्भवतीत्येव वक्तव्यम् । तदपि न सम्भवति, व्यभिचारस्य दर्शितत्वात् । न द्वितीयं कालस्य स्वतन्त्रहेतुस्वासम्भवात् । ' शास्त्रं पठित्वा उपदेशं श्रुत्वा व्यवहारं दृष्ट्वैव मनुष्याणां ज्ञानं भवति । ' इति वाक्यस्य शुद्धिरपि चिन्त्या, ' समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ' इत्यनेन पाणिन्यनुशासनेन क्त्वाप्रत्ययविधानात् । प्रकृते च मनुष्येककर्तृका-णां पठत्यादिधातूनां ज्ञानकर्तृकेण भवतिना सह समानकर्तृकत्वाभावाद उपरितनप्रयोगे क्त्वाप्रत्ययस्य दुर्घटत्वात् । तब उसको किसी भी बात का यथार्थ ज्ञान नहीं होगा । जैसे बड़े बन में रहने वाले मनुष्यों को बिना उपदेश के यथार्थ ज्ञान नहीं होता, उनकी प्रवृत्ति पशुओं की नाई होती है, वैसे ही वेदों के उपदेश के बिना भी सब मनुष्यों की प्रवृत्ति आदि सृष्टि से ही उसी प्रकार की हो जायगी, ऐसी अवस्था में फिर ग्रन्थ रचने के सामर्थ्य की तो कथा ही क्या है ' ( पृ ० १४ ) यह कथन भी कुछ नहीं है, क्योंकि पशु, पक्षी और चीटियों तक में विशिष्ट ज्ञान पूर्वक प्रवृत्ति देखने को मिलती है । इसीलिये चीटियों से धन का संग्रह करने की शिक्षा ली जाती है | मधुमक्खी से सार ग्रहण की शिक्षा मनुष्य भी लेता है । ' कुशल व्यक्ति छोटे - बड़े सभी शास्त्रों से उसी प्रकार सार ग्रहण कर ले, जैसे कि भ्रमर पुष्पों से उनका सार ले लेता है ' । राजनीति में भी वृक्षों को काट कर और उनको जलाकर कोयला बनाने के बजाय पत्र, पुष्प आदि को बिना तोड़े मधुर रस को ग्रहण करने वाली मधुमक्खी की नीति का आदर किया जाता है । एक साथ उड़कर जाने वाले और लोट कर आनेवाले कबूतरों से लोकतन्त्र की पद्धति की तथा रानी मक्खी का अनुसरण करने वाली मधुमक्खियों से राजतन्त्र की पद्धति की शिक्षा मिलती है । भेड़िये से शिकार करने की शिक्षा मिलती है । ज्यादा से ज्यादा हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य को भाषा का ज्ञान वृद्धव्यवहार के माध्यम से ही होता है । इतने पर भी इसके लिये ईश्वर के वेद के उपदेश की आवश्यकता नहीं है, ffair भी यह ज्ञान अपने पूर्वजों के व्यवहार एवं उपदेश से प्राप्त हो जायगा । आपकी पद्धति से भी पठन, श्रवण और व्यवहार के दर्शन से भाषा का ज्ञान होता है । यह ज्ञान ईश्वर से नहीं मिल सकता, क्योंकि वह तो निराकार है । कष्ठ, तालु आदि स्थानों के निराकार ईश्वर में न रहने से वाक्य का उच्चारण कर उपदेश देना संभव नहीं है और न मनुष्य बिना कण्ठ तालु से उच्चारण किये शब्दों को सुनने में ही समर्थ है । मनुष्य परमेश्वर को देखते भी नहीं । फिर उसके व्यवहार को देखने की तो बात हो नहीं उठ सकती | तब परमेश्वर द्वारा दिये गये वेद के उपदेश से भी भाषा का ज्ञान नहीं हो सकता । थोड़ी देर के लिये यदि यह मान भी लिया जाय तो यह बताइये कि ग्रन्थ की रचना में वेदाध्ययन कारण है या तदानन्तर्य? यदि वेदाध्ययन को कारण साना जाय इसमें अभी व्यभिचार बताया गया है । यदि आनन्तर्य को कारण माना जाय तो यह इसलिये नहीं सम्भव है कि काल स्वतन्त्र रूप से कारण नहीं होता । ' पठित्वा ' इत्यादि पूरा वाक्य भो अशुद्ध है । ' समानकर्तृकयो ० ' इस पाणिनि सूत्र के नियम के अनुसार ही क्त्वा प्रत्यय का विधान हो सकता है । प्रस्तुत स्थल में पठति आदि धातु का मनुष्य ही एक कर्ता है, इसकी ज्ञान के कर्ता भवति के साथ समान कर्तृकता नहीं बनती, अतः यहाँ क्त्वा प्रत्यय नहीं हो सकता ।

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४६२ विकासवादिनस्तु विकासक्रमेणैव ज्ञानविकासोऽपि । पशवः पक्षिणश्च विविधं व्यवहरन्ति । सर्वोऽपि व्यवहारो ज्ञानपूर्वक एव भवति । भाषा अपि वन्यानां विविधा भवन्ति । न च तेषां वेदसंस्कारोऽप्यस्ति । भाषाप्यक्षि-सङ्कोचादिवत् स्वाभिप्रायस्य परत्रावबोधहेतुरेव । न केवलं मनुष्याः पशवोऽपि भाषाभिर्व्यवहरन्ति । जाङ्गलिका अपि भाषावन्तो भवन्ति । पारम्पर्यं तेषामपि प्रचलत्येव । यथा पाटलादिकाण्डादिभ्यः पत्राणि पुष्पाणि फलानि रसाश्च fanta माप्नुवन्ति तथैव शुक्रशोणितादिभिरेव यथा देहेन्द्रियमनोमस्तिष्कादिविकाशस्तथैव ज्ञानविज्ञानविकासोऽपि जायते । देहादिभिन्नचेतनात्मवादिनोऽपि जीवचेतनेष्वपि स्वाभाविकं ज्ञानमभ्युपगच्छन्ति । केचिज्ज्ञानगुणकमात्मानं केचिज्ज्ञानरूपमेवात्मानमभ्युपगच्छन्ति । सांख्ययोगदृष्ट्या रजस्तमोऽनभिभूतं ज्ञानं सर्वार्थावभासनशालि स्वीक्रियते । ईश्वरकारणवादिरीत्यापि सर्वकारणत्वादेवेश्वरो ज्ञानविज्ञानहेतुरपि । चक्षुषो मनः सव्यपेक्षवत् स्वाभाविकज्ञानस्योप-देशादिसव्यपेक्षत्वेऽपि स्वपित्रादिव्यवहारादिसापेक्षत्वेनैव गतार्थता | एतेन ' मैवं वाच्यमीश्वरेण मनुष्येभ्यः स्वाभाविकं ज्ञानं दत्तं तच्च सर्वग्रन्थेभ्य उत्कृष्टमस्ति, तेन विना वेदानां शब्दार्थसम्बन्धानामपि ज्ञातुमशक्यत्वात् । यथास्मदादिभिर्विविधग्रन्थानां सकाशाद् ज्ञानं गृहीत्वैव ग्रन्थान्तरं रच्यते, तथैबेश्वरज्ञानस्य सर्वेषां मनुष्याणामपेक्षाऽवश्यं भवति । न च सृष्टिसमये पठनक्रमो ग्रन्थो वा कश्चनासीत्, नमित्तिकज्ञाने पुरुषस्वातन्त्र्याभावात् । स्वाभाविकज्ञाने विद्याप्राप्त्यसम्भवः, स्वाभाविकज्ञानस्य चक्षुरादिवत्साधनकोटी प्रविष्टत्वात् ' ( पृ ० १४-१५ ) इत्यादिकमपास्तं वेदितव्यम्, रूपादिज्ञानस्यापि नैमित्तिकत्वाविशेषात् । व्यवहार-दर्शनोपदेशश्रवणादेरवश्यापेक्षणीयत्वेऽपि स्वपित्रादिव्यवहारादिभिर्गतार्थत्वमेव । ननु सृष्ट्यादौ पित्राद्यभावात् परमेश्वरीयवेदोपदेशपूर्वकमेव तदानीन्तनानां जीवानां ज्ञानमिति चेन्न, पित्रादिवन्निराकारस्येश्वरस्य तद्द्व्यवहारस्योप-विकासवाद के मत में विकास के क्रम से ही ज्ञान और विज्ञान का भी विकास होता है । पशु और पक्षी भाँति - भाँति का यवहार करते हैं । सारा व्यवहार ज्ञानपूर्वक ही होता है । वन्य प्राणियों की भाषा भी नाना प्रकार की होती है । इनमें वेद का संस्कार है नहीं । भाषा भी आंख के इशारे की तरह दूसरे को अपना अभिप्राय प्रदर्शित करने के लिये ही होती है । केवल मनुष्य ही नहीं, पशु भी भाषा से व्यवहार करते हैं । जंगली लोगों की भी भाषा होती ही है । उनमें भी परस्परा चलती है । जैसे पाटल आदि वृक्षों के तने से ही पत्र, पुष्प, फल और उसके रस आदि का विकास होता है, जैसे शुक्र शोणित आदि से ही शरीर इन्द्रिय, मन, मस्तिष्क आदि का विकास होता है, उसी तरह ज्ञान और विज्ञान का भी विकास होता है । देह आदि से भिन्न चेतन को आत्मा मानने वाले दार्शनिक जीव ( चेतन ) में भी स्वाभाविक ज्ञान मानते हैं । कुछ लोग ज्ञान को आत्मा का गुण मानते हैं, तो कुछ आत्मा को ही ज्ञानरूप मानते हैं । सांख्य योग की दृष्टि से रज और तमोगुण से अनभिभूत ज्ञान सभी वस्तुओं का प्रकाशक माना गया है । ईश्वर को ही सारे जगत् का कारण मानने वालों की दृष्टि में ज्ञान और विज्ञान का कारण भी ईश्वर ही है । चक्षु को जैसे मन की अपेक्षा है, उसी तरह स्वाभाविक ज्ञान भी बिना उपदेश के नहीं हो सकता । यह बात सही है, किन्तु वह अपने पिता आदि के व्यवहार की अपेक्षा से ही गतार्थ हो जायगा । इतना कहने से आगे की यह बात भी खण्डित हो गयी कि ' ईश्वर ने मनुष्यों को स्वाभाविक ज्ञान दिया है, सो सब ग्रन्थों से उत्तम है, क्योंकि इसके बिना वेदों के शब्द, अर्थ और संबन्ध का ज्ञान कभी नहीं हो सकता " जैसे हम लोग अन्य विद्वानों से वेदादि शास्त्रों को पढ़कर पीछे अन्य ग्रन्थों को भी रच सकते हैं, वैसे ही ईश्वर के ज्ञान की भी अपेक्षा सर्गारम्भ में सबको है, क्योंकि सृष्टि के आरंभ में पढ़ने और पढ़ाने की कुछ भी व्यवस्था नहीं थी तथा विद्या का कोई ग्रन्थ भी नहीं था । मनुष्यों को निमित्त से उत्पन्न होने वाले ज्ञान में स्वतन्त्रता नहीं है और स्वाभाविक ज्ञान मात्र से विद्या की प्राप्ति किसी को नहीं हो सकती, क्योंकि यह स्वाभाविक ज्ञान साधन कोटि में प्रविष्ट है । जैसे मन के संयोग के बिना आँख से कुछ भी नहीं देख सकता ' ( पृ ० १५-१६ ) क्योंकि रूप आदि का निमित्तजन्य ज्ञान भी स्वाभाविक ज्ञान की ही तरह साघन कोटि में ही प्रविष्ट है । व्यवहार को देखना, उपदेश का सुनना आदि की अपेक्षा अवश्य रहती है, किन्तु यह तो अपने पिता आदि के व्यवहार से ही गतार्थ हो जाती है । भाई, सृष्टि के

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वदार्थपारिजातः देशस्य च व्यवहारगोचरत्वाभावात् । नहि चक्षुराद्यगोचरस्योपदेशस्तच्छ्रवणं तद्व्यवहारदर्शनं वा सम्भवति, अत्यन्तादृष्टस्य व्याप्तिग्रहासम्भवेनानुमानागोचरत्वात् । तस्मात् सुप्तप्रतिबुद्धन्यायेन विशिष्टप्रजापत्यादीनां पूर्वकल्पीय व्यवहारोपदेशादिभिर्विशिष्टज्ञानतदुपदेशेन चान्येषामपि तत्सम्भवात् । सिद्धान्ते तु योगिनां सिद्धानामपि सङ्कल्पवशात् कार्यनिर्माणिनोपदेशाद् योगसामर्थ्यात् सत्यसङ्कल्पाद्वायेषां हृदि स्वाभीष्टज्ञानोत्पादनात् । सर्वज्ञः सत्यसङ्कल्पः सर्वशक्तिभंगवान् प्रेरणावशाद् योगिनां देवानां विशिष्टसुकृतिनां हृदि वेदानाविर्भावयितुं शक्नोत्येव । यदपि च - ' वेदोत्पादने ईश्वरस्य किं प्रयोजनमित्याक्षिप्य तत्प्रतिप्रश्नतया वेदानामनुत्पादने कि प्रयोजनमस्ति ' ( प ० १६ ) इत्युक्तम्, तत्तु बालवचनम्, अनुत्पादनस्याभावरूपतया प्रश्नानर्हत्वात् । एवमेव - ' ईश्वरेऽनन्ता विद्यास्ति नवा? सा च स्वार्था अस्ति । सा च स्वार्था परार्था च तस्यास्तद्विषयत्वात्, तद्यद्यस्मदर्थमीश्वरो वेदोपदेशं न कुर्यात् तदान्यपक्षे निष्फला स्यात् इति स्वविद्याभूतवेदोपदेशेन सप्रयोजनता सम्पादिता ' ( पृ ० १६ ) इत्यादि बहु निरर्थकं जल्पितम्, तदपि न मनोज्ञम्, परमेश्वरे तदीयानन्तविद्यायां च प्रमाणानुपस्थापनात् । न चानुमानं तत्र सम्भवति, तत्सम्बद्धलिङ्गादर्शनात् । न च भूतभौतिकानि स्वोपादानगोचरापरोक्षज्ञानेच्छाकृतिमज्जन्यानि, विलक्षणकार्यत्वात्, शय्याप्रासादादिवदिति सामान्यतोदृष्टानुमानेन तत्सिद्धिरिति वाच्यम्, विकल्पासहत्वात् । तथाहि -- प्रपञ्चस्य तत्तज्ज्ञान-पूर्वकत्वे सिद्धसाधनता, मीमांसकैरदृष्टद्वारा प्रपञ्चस्य तत्तज्जीवज्ञानवत् कर्तृकत्वाभ्युपगमात् । यदि सर्वज्ञपूर्वकत्वं प्रारंभ में तो पिता आदि हैं नहीं, उस समय तो परमेश्वर के द्वारा उपदिष्ट वेद से ही जीवों को ज्ञान हो सकता है, यह कथन इसलिये are नहीं है कि परमेश्वर निराकार है, अतः पिता आदि की तरह उससे व्यवहार और उपदेश को ग्रहण नहीं किया जा सकता । जो नेत्र आदि का अगोचर है, उसके उपदेश को सुनने की अथवा उसके व्यवहार को देखने को संभावना ही नहीं हो सकती । अत्यन्त अदृष्ट वस्तु के साथ व्याप्ति ज्ञान नहीं बन सकता, अत: अनुमान की भी प्रवृत्ति नहीं होगी । इसलिये जैसे सो करके उठा व्यक्ति पहले की सारी बातें स्मरण करता है, उसी तरह विशिष्ट प्रणापति आदि ऋषि देवगण पूर्व कल्प के व्यवहार को स्मरण कर इस कल्प में भी व्यवहार और उपदेश देकर अन्य जीवों को ज्ञानवान् बनाते हैं । सिद्धान्त में योगिगण और सिद्धगण भी अपने संकल्प के प्रभाव से शरीर धारण कर उपदेश देते हैं और योग के सामर्थ्य से अथवा संकल्प की सिद्धि के कारण दूसरे जीवों के हृदय में भी ज्ञान का संचार करते हैं । सर्वज्ञ, सत्यसंकल्प, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अपनी प्रेरणा से योगियों, विशिष्ट देवताओं और पुण्यवानों के हृदय में वेदों का आविर्भाव कर ही सकता है । इसके आगे ' वेदों के उत्पन्न करने में ईश्वर को क्या प्रयोजन था? ' ऐसी आशंका कर उसके बदले में ' मैं तुमसे पूछता हूँ कि वेदों के उत्पन्न न करने में उसको क्या प्रयोजन था ' यह पूछना बच्चों की सी बात है, क्योंकि अनुत्पत्ति तो अभाव रूप है, उसके बारे में प्रश्न नहीं किया जा सकता । इसी तरह ' ईश्वर में अनन्त विद्या है या नहीं? है । सो उसकी विद्या किस प्रयोजन के लिये है? अपने ही लिये । अच्छा तो मैं आपसे पूँछता हूँ कि ईश्वर परोपकार करता है या नहीं? ईश्वर परोपकारी है । इससे क्या आया? इससे यह बात आई कि विद्या जो हैं सो स्वार्थ और परार्थ के लिये होती है, विद्या का यही गुण है । परमेश्वर अपनी विद्या का हम लोगों के लिये उपदेश न करे तो विद्या का जो गुण परोपकार करना है, वह नहीं रहेंगा । इससे परमेश्वर ने अपनी वेद विद्या का हम लोगों को उपदेश कर उसकी सफलता सिद्ध की है ' ( पृ ० १६-१७ ) इत्यादि बहुत अनाप - शनाप कहा है, वह भी मन में बैठने वाला नहीं है । परमेश्वर और उसकी अनन्त विद्याओं की पुष्टि के लिये कोई प्रमाण नहीं दिया गया है । अनुमान की प्रवृत्ति यहाँ हो नहीं सकती, क्योंकि इससे संबद्ध कोई लिंग दिखाई नहीं देता । सब भूत - भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति इनके उपादानों का प्रत्यक्ष ज्ञान रखने वाले किसी व्यक्तिविशेष की ज्ञान, इच्छा, क्रिया की प्रणाली से ही हुई है, क्योंकि यह शय्या, प्रासाद आदि के समान ही विलक्षण कार्य है, इस सामान्यतोदृष्ट अनुमान से भी उक्त बात नहीं सिद्ध की जा सकती, क्योंकि इस स्थिति में आगे दिये तर्कों का कुछ उत्तर नहीं बनता । क्योंकि परमेश्वर को यदि प्रपंच का ज्ञान हैं, तो उसकी निर्मिति मात्र सिद्ध वस्तु की ही साधिका होने से सिद्धसाधनता दोष से ग्रस्त हो जायगी । मीमांसकगण इस प्रपंच को भी अदृष्ट के द्वारा उसी प्रकार उत्पन्न मानते हैं, जैसे कि जीवों में ज्ञान की

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*** वार्थपारिजातः सिषाधयिषितं तदा दृष्टान्तासिद्धिः शय्याप्रासादादीनां सर्वज्ञपूर्वकत्वाभावात् । नाप्यागमस्तत्र प्रमाणम्, तस्येदानीं साध्य कोटिप्रविष्टत्वात्, अन्योन्याश्रयत्वाच्च । वेदस्य प्रामाण्ये परमेशसिद्धिस्तत्सिद्धौ तदुक्तत्वेन वेदप्रामाण्यसिद्धि-रिति । ईश्वरस्य वेदनिर्माणं न स्वार्थम्, तस्य पूर्णकामत्वात् । नापि परार्थम्, परदुःखकातरस्य करुणा परवशस्यैव परार्थ-प्रवृत्तिसम्भवात् । न चेश्वरस्य कातर्यं करुणापरवशत्वं वा, तस्य सर्वथा स्वतन्त्रत्वात् । कारुण्ये वा दुःखबहुलं संसारमेव न कुर्यात् । न च कर्मभिर्दुः खबहुल संसारोत्पत्तिः, तदयोगे जडैः कर्मभिरपि दुःखबहुलं जगदुत्पादयितुमशक्यस्तात् । यदपि च -- ' परमकारुणिकः पितृवत् परमेश्वरः परमकृपया वेदोपदेशमुपचक्रे । अन्यथान्धपरम्परया धर्मार्थकाममोक्षसिद्धया विना परमानन्द एव न स्यात् । यथा कृपायमाणेनेश्वरेण प्रजासुखार्थं कन्दफलतृणादिकं रचितम् स कथं सर्वसुखप्रकाशिका सर्वविद्यामय वेदविद्यां नोपदिशेत्? ब्रह्माण्डस्थोत्कृष्ट सर्व पदार्थ प्राप्त्या यावत्सुखं विद्याप्राप्तिसुखस्य सहस्रतमांशेनापि भवति न तत्तुल्यम् ' ( पृ ० १६ ) इति, तदप्यविचारचारु, स्वतन्त्रस्य करुणापराधीनत्वानुपपत्तेः । तदनुयायी युधिष्ठिरमीमांसकोऽपि वेदोत्पत्तिप्रयोजनमप्राकरणिकमसम्बद्धं च मनुते । सत्वीश्वरस्य वेदं नित्यविद्यां मनुते । तेन तदुत्पत्तिविचारः सर्वोऽपि निरर्थक एव । स तु जीवेष्वनुकम्पया तत्प्रकाशनं मन्यते । प्रकाशनेऽपि स्वार्थपरार्थादिविकल्पप्रसादिदोषाः सन्त्येव । कन्द - मूल - फल- तृणादिवद् वेदस्यापि सद्रवितत्वे तद्वदेवानित्यत्वापत्तिरपि दुर्वारंव । उत्पत्ति होती है । सर्वज्ञ ईश्वर इस जगत् की सृष्टि करता है, यह बात यदि आप सिद्ध करना चाहते हैं यहाँ पर कोई दृष्टान्त नहीं मिलेगा । शय्या, प्रासाद आदि का निर्माण तो सर्वज्ञ व्यक्ति द्वारा होता नहीं । इस विषय में आगम को भी प्रमाण नहीं माना जा Heat after a आगम की ही सत्ता की बात चल रही है । इस परिस्थिति में आगम को प्रमाण मानने पर अन्योन्याश्रय दोष हो जायगा । वेद के प्रामाण्य पर परमेश्वर की सिद्धि और परमेश्वर के द्वारा उपदिष्ट होने से वेद की सिद्धि परस्पर आश्रित हो जायगी, अर्थात् एक दूसरे के अधीन हो जायगी । जब ईश्वर सिद्ध हो जाय तो उसके द्वारा उपदिष्ट होने के कारण वेदों की प्रमाणता सिद्ध हो और वेदों को प्रमाणता सिद्ध होने पर ईश्वर सिद्ध हो | यह एक दूसरे के अधीन बातें चल नहीं सकती । ईश्वर पूर्णकाम है, अतः उसका वेद के निर्माण में कोई स्वार्थ नहीं है । परोपकार की दृष्टि भी उसमें नहीं हो सकती, दूसरे के दुःख से जो दुःखी हो अथवा जिसमें करुणा का संचार हो, वही दूसरे के लिये प्रवृत्त होगा । ईश्वर तो सर्वथा स्वतन्त्र है, वह दुःखी अथवा करुणामय क्यों होगा | यदि वह करुणामय होता तो इस दुःखबहुल संसार की सृष्टि ही क्यों होती । दुःखबहुल संसार की सृष्टि में कर्म को कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि बिना परमेश्वर की सहायता के जड़ कर्मों की जगत् के निर्माण में प्रवृत्ति ही नहीं होगी । यह कहना भी कि परमेश्वर हम लोगों का माता - पिता के समान है, वह परम कारुणिक कृपा कर वेदों का उपदेश हम लोगों के कल्याण लिये करता है । परमेश्वर अपनी वेदविद्या का उपदेश मनुष्यों के लिखे न करता तो अन्ध परम्परा के कारण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि किसी को यथावत् प्राप्त न होती, उसके बिना परम आनन्द भी किसी को नहीं होता । जैसे परम कृपालु ईश्वर ने प्रजा के सुख के लिये कन्द, मूल, फल और घास आदि छोटे - छोटे भी पदार्थ रचे हैं, वह ईश्वर सब सुखों का प्रकाश करने वाली, सब सत्य विद्याओं से युक्त वेदविद्या का उपदेश भी प्रजा के सुख के लिये क्यों न करता? क्योंकि जिसने ब्रह्माण्ड में उत्तम पदार्थ हैं, उनकी प्राप्ति से जितना सुख होता है, वह सुख विद्या प्राप्ति से होने वाले सुख के हजारवें अंश के भी तुल्य नहीं हो सकता ' ( पृ ० १७ ) यह बात भी बिना विचारे हो अच्छी लगती है । स्वतन्त्र परमेश्वर करुणा के अधीन हो क्यों प्रवृत्त होगा? दयानन्द के अनुयायी विष्टिर मीमांसक भी वेद की उत्पत्ति के प्रयोजन को अप्राकरणिक एवं असंबद्ध मानते हैं । उनका कहना है कि arrar ft free fa द्या है । इसलिये वेद की उत्पत्ति के विषय का सारा विचार निरर्थक है । उनका कहना है कि जीवों पर दया कर ईश्वर उनके लिये वेदों को प्रकाशित करता है । इस मत में भी यह प्रकाशन स्वार्थ के लिये है या परार्थ? इत्यादि दोष आवेंगे ही । कन्द, मूल, फल, घास आदि की तरह वेद की रचना मानने पर उन्हीं की तरह वेद भी अनित्य नाशवान् हो जायगा ।

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* II यदपि - ईश्वरेण लेखनीमसीपात्रसाधनानि कुतो लब्धानि वेदपुस्तकोल्लेखायेत्याशङ्कय समाहितम् ---' विना हस्तपादाद्यवयवः काष्ठलेोष्टादिसामग्री साधनैश्चेश्वरेण जगद्रचितं तथैव वेदा अपि रचिता: ' ( पृ ० १७ ) इति, तदप्यसम्बद्धमसङ्गतं च । किमेतावता यथा हस्तपादाद्यवयवैर्लोष्टादिभिर्विनेव परमेश्वरेण जगन्निर्मीयते, तथैव लेखनीमसीपात्रादिभिर्विनंव परमेश्वरो वेदान् लिखितवान्? यद्येवं तहि तत्र किं प्रमाणम्? न चेत्किमर्थं साधनविना जगद्रचना दृष्टान्तरूपेणोपातेति? यदि मसीलेखनीपत्रादिभिविना स पुस्तकं लिखति तदा ज्ञानेच्छाप्रयत्नैविनाऽपि स प्रपञ्चमुत्पादयतु ] | बाढमिति चेत् ' तदेक्षत ', ' सोऽकामयत ' इति श्रुतिविरोधो दुष्परिहरः । यदपि च - ' पुस्तकस्था वेदास्तेनादौ नोत्पादिताः, किं तहिं ज्ञानमध्ये प्रेरिताः । केषाम्? अग्निवा दित्याङ्गिरसाम् ' ( पृ ० १७ ) इति, तदपि मन्दम् ज्ञानमध्ये प्रेरिता इत्यसङ्गतेः । त्वद्रीत्या अग्निवाय्वादित्याङ्गिरसो मनुष्या एव । जीवाश्चाणुपरिमाणा इत्यपि त्वदम्युपगमः । ज्ञानानि च तदीयानि व्यापकानि । तत्र ज्ञानस्य निराकारत्वादमूर्तत्वात् कथं मध्यत्वनिश्चयः? पुस्तकस्थानां ज्ञानमध्ये प्रेरितानां च वेदानां को भेदः? इत्यपि निरूपणीयम् । किञ्च त्वद्रीत्या वेदा अपि परमेश्वरीयज्ञानरूपा एवेति कथं तज्ज्ञानस्यान्यत्र संक्रमणम्? निरवयवज्ञानरूपा वेदा निरवयवेष्वग्न्यादिज्ञानेषु कथं संक्रान्ता:? नहि परमेश्वरे समवायसम्बन्धेन स्थिता वेदा अन्यत्र गन्तुं प्रभवन्ति । अपरे तु दयानन्दीयमुक्तवचनचयमभिलक्ष्य प्राहु: - वेदप्रतिपादने परमेश्वरस्य कि प्रयोजनमिति पृष्ट-तदनुत्पादने किं प्रयोजनमिति पृष्टस्य वयं न जानीम इति प्रतिवचनात्तुष्टः प्रयोजनं श्रृणुतेति प्रतिज्ञाय किमुत्तरं प्रादाद् इति विज्ञायैव विदाङ्कुर्वन्तु । ' ईश्वर ने वेद पुस्तक के लिखने के लिये लेखनी, स्याही और दवात आदि साधन कहाँ से पायें ' इस आशंका का जो यह समाधान दिया गया है कि ' हाथ पैर आदि के बिना तथा काष्ठ, लोहा आदि सामग्री के बिना ईश्वर ने जगत् को क्यों कर रचा? जैसे हाथ आदि साधनों के बिना भी उसने जगत् की रचना की, उसी तरह वेदों को भी सब साधनों के बिना रचा है ' यह भी असंबद्ध और असंगत है | क्या इससे आप यह सिद्ध करना चाहते हैं कि जैसे हाथ - पैर आदि अवयवों के और काष्ठ - लोहा आदि साधनों के बिना भी ईश्वर जगत् की रचना करता है, उसी तरह वह लेखनी, दवात आदि साधनों के बिना भी परमेश्वर वेदों को लिखता है? यदि ऐसी बात है तो इसमें क्या प्रमाण हैं? यदि नहीं तो फिर बिना साधनों के जगत् की रचना को क्यों यहाँ पर दृष्टान्त रूप में उपस्थित किया गया | यदि वह स्याही और दवात आदि के बिना भी पुस्तक लिख सकता है, तो ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न के बिना भी वह इस जागतिक प्रपंच को क्यों न बना लेगा? यदि यह बात आप मानते हैं तो ' उसने देखा, ' उसने इच्छा की ' आदि श्रुतियों से विरोध का परिहार कैसे संभव होगा? ' वेदों को पुस्तकों में लिखकर सृष्टि के आदि में ईश्वर ने नहीं प्रकाशित किया था, किन्तु अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा के मन में ज्ञान के रूप में प्रकाशित किया था ' ( पृ ० १८ ) यह कथन भी कुछ नहीं, ' ज्ञान के मध्य में प्रेरित किये ' यह वाक्य ही असंगत है | आपके सिद्धान्त के अनुसार अग्नि, वायु प्रभृति मनुष्य ही हैं । आप यह भी मानते हैं कि जीव अणु परिमाण है । उनके ज्ञान व्यापक हैं । ज्ञान तो निराकार और अमूर्त हैं । उसके मध्य भाग का निश्चय कैसे होगा? आपको यह भी बताना पड़ेगा कि पुस्तक में स्थित बंद में और ज्ञान के मध्य में प्रेरित वेद में क्या अन्तर है? दूसरी बात यह है कि आपके मत से तो वेद ईश्वर का ज्ञान है, तब Fear का यह ज्ञान दूसरे में कैसे जा सकता है । निरवयव ज्ञान रूप वेद निरवयव अग्नि आदि के ज्ञान में कैसे संक्रान्त हो सकते हैं? अवयव वाली वस्तु हो एक दूसरे में संचार कर सकती है | वेद ( ज्ञान ) के जब अवयव हो नहीं है, तो वह दूसरे, अपने ही जैसे अवयव होन ज्ञान में कैसे जा सकता है । परमेश्वर में समवाय संबन्ध से वर्तमान वेद अन्यत्र कैसे जा सकते हैं? दूसरे लोग दयानन्द के उक्त वचन के संबन्ध में यह कहते हैं कि वेद के उत्पादन में परमेश्वर का क्या प्रयोजन है? ऐसा पूछने वाले को जब पूछा गया कि वेद के अनुत्पादन में क्या प्रयोजन है? तो उसके यह कहने पर कि हम तो नहीं जानते, तो इस उत्तर से सन्तुष्ट होकर प्रश्नकर्ता को प्रयोजन सुनाने की प्रतिज्ञा करके क्या उत्तर दिया, यही यहाँ जानने की बात है ।

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४६६ वेदार्थपारिजातः धर्मार्थकाममोक्षसिद्ध्या विना परमानन्द एव न स्यादित्यपि पुरुषार्थतत्त्वानभिज्ञानमूलकमेव, विकल्पानु-पपत्तेः । किं परमानन्दो मोक्षलक्षणात् पुरुषार्थाद् भिन्नोऽभिशो वा? नाद्यः, मोक्षभिन्नस्य परमानन्दस्याप्रसिद्धेः । न द्वितीयः, तस्यैव तद्धेतुत्वानुपपत्तेः । किं धर्मार्थकामानामपि परमानन्दजनकत्वं किं वा तद्विशिष्टस्यैव मोक्षस्य परमानन्दजनकत्वम्? आद्ये किं मोक्षेण, त्रिवर्गेणैव गतार्थत्वात् । न द्वितीयः संन्यासानुपपत्तेः । वस्तुतस्तु सातिशयं सुखं कामः, निरतिशयं सुखं मोक्षः? धर्मार्थो तु तत्साधनभूतावेव । परमेश्वरस्तु आप्तसमस्त कामोऽपि प्रजानां हितकामनयेवानादिसिद्धं वेदमधिकारिभ्यः प्रयच्छति । कल्पादों वेदस्य सम्प्रदायप्रवर्तनमेव परमेश्वराद्वेदप्रादुर्भावः । नित्यस्य तदन्यादृशाया उत्पत्तेरनुपपत्तेः । वेदाश्च न ज्ञानरूपाः, अपि तु नियतानुपूर्वीविशिष्टा अपौरुषेयशब्दराशिरूपा एव । सृष्टिप्रलयानङ्गीकर्तृपूर्वमीमांसकरीत्या स्वरूपत एव नित्याः, उत्तरमीमांसकरीत्या प्रतिकल्पं सृष्टिमारभ्य प्रलयपर्यन्तस्थायित्वेन प्रवाहनित्या एव । यत्तु प्रमाणरूपेण ' तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्ताग्नेॠग्वेदो वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात्सामवेदः ' ( श ० ११/५/२/३ ) ( पृ ० १८ ) इति, तदपि मन्दम् श्रुतेस्त्वत्समीहितासाधकत्वात् । तथाहि- समस्ता तत्रत्या श्रुतिरित्थम् - ' प्रजापतिर्वा इदमग्र आसीत् । एक एव । सोऽकामयता । स्यां प्रजायेयेति । सोऽश्राम्यत । स तपोऽतप्यत । तस्माच्छ्रान्तात्तेपानात् त्रयो लोका असृज्यन्त । पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौः । स इमांस्त्रींल्लोकानभितताप । तेभ्यस्ततेभ्य-स्त्रीणि ज्योतींष्यजायन्ताग्निर्योऽयं पवते सूर्यः । स इमानि त्रीणि ज्योतींष्यभितताप । तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रयो अजायन्ताग्ने-ऋग्वेदो वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात्सामवेद: ' ( श ० ब्रा ० ११ || ८११-३ ) | खया तु प्रजापतिरप्यग्निवायुरविभ्यो वेदानधीत-यानित्युक्तम् । अग्निवायुरवयश्च मनुष्या एबेत्युक्तम् । तच्च त्वत्समुद्धृतवचनेन विरुद्धयते । प्रजापतिरन्तःकरण-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के बिना परमानन्द की प्राप्ति ही नहीं होगी, यह कहना भी पुरुषार्थ के तत्व को न समझ पाने के कारण है, क्योंकि इस परिस्थिति में इस विकल्प का कोई उत्तर न बन सकेगा कि परमानन्द मोक्षस्वरूप पुरुषार्थं से free है अथवा अभिन्न? पहला विकल्प नहीं बन सकता, अर्थात् भिन्न सिद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि मोक्ष से भिन्न कोई परमानन्द लोक में प्रसिद्ध नहीं है । दूसरा विकल्प भी इसलिये नहीं बन सकता, अर्थात् ज्ञान को परमानन्द से अभिन्न भी नहीं कह सकते कि ' वह स्वयं पनाही कारण नहीं हो सकता । क्या धर्म, अर्थ और काम भी परमानन्द के जनक हैं, अथवा इनसे युक्त मोक्ष ही परमानन्द का जनक होगा? पहले पक्ष में त्रिवर्ग से भी परमानन्द की लधिगति हो जाने पर गोक्ष का क्या प्रयोजन रह जायगा । द्वितीय पक्ष भी इसलिये नहीं बनेगा कि ऐसा मानने पर संन्यास की उपपत्ति नहीं बन सकेगी । वास्तव में सातिशय सुख काम और निरतिशय सुब मोक्ष कहलाता है । धर्म और अर्थ इनके साधन हैं । परमेश्वर आप्तकाम होते हुए भी प्रजा के हित की इच्छा से अनादिसिद्ध वेद staff रयों को देता है । कल्प के प्रारम्भ में वेद सम्प्रदाय की प्रवृत्ति को ही परमेश्वर से वेद का प्रादुर्भाव माना जाता है । नित्य वेद की इससे भिन्न कोई उत्पत्ति नहीं बन सकती । वेद ज्ञानरूप नहीं है, किन्तु यह नियत आनुपूर्वी वाली अपौरुषेय शब्दराशि है | सृष्टि और प्रलय को न मानने वाले पूर्व मीमांसक के मत से ये वेद स्वरूपतः नित्य हैं और उत्तर मीमांसक ( वेदान्ती ) के मत से सृष्टि से लेकर प्रलय पर्यन्तस्थित रहने के कारण वेद प्रवाह रूप से नित्य हैं । यहाँ पर इस शपथ श्रुति का प्रमाण दिया है ' उनको तपाने पर तीन वेद पैदा हुए । अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद और सूर्य से सामवेद ' यह भी कमजोर बात है, क्योंकि इस श्रुति से आपकी मन चाही बात नहीं सिद्ध होती । पूरी श्रुति इस प्रकार है ---' इस सृष्टि के प्रारम्भ में प्रजापति विद्यमान थे, अकेले ही । उसने इच्छा की कि मैं अनेक रूपों में पैदा होऊँ । उसने श्रम किया, तप किया! उसके थका देने वाले तप से तीनों लोकों की सृष्टि हुई । पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश | उसने इन तीनों लोकों को तपाया । उनको तपाने से अग्नि, वायु और सूर्य ये तीन ज्योतियां पैदा हुई । उसने इन तीन ज्योतियों को तपाया, उनसे तीन वेद पैदा हुए । अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद और सूर्य से सामवेद ' | आप कहते हैं कि प्रजापति ने भी अग्नि, वायु और सूर्य से वेद पढे और इनको आप मनुष्य मानते हैं । यह बात आपके उद्धृत इस वचन से ही विरुद्ध है । प्रजापति यहाँ सबका कारण है गोर वह अग्नि आदि से

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वैवार्थपारिजातः ४ ९ ७ भूतोऽग्न्यादिभ्यः प्राचीनः, अग्न्यादयस्तु तत उत्पन्ना अर्वाचीना इति कथं तेभ्यस्तदध्ययनं सम्भवति । श्रुत्यर्थस्तु व्याहृतिभिः सर्वप्रायश्चित्तीयहोमविधानाय व्याहृतीनां प्रशंसार्थं तासामुत्पत्तिमाख्यायिकाह — इदं सर्व दृश्यमानं जगत् सृष्टेः प्राक् प्रजापतिरेवासीत् कारणरूपः प्रजापतिरेवासीत् । स एक एव तदानीमासीत् । सोऽकामयत । स्यां जगद्रूपेण भवेयम् । तदर्थं प्रजायेय प्रकर्षेण स्वरूपाविरोधेन देवपितृमनुष्यादिप्रजारूपेणोत्पद्येय । सोऽश्राम्यत | स्रष्टव्यपर्यालोचनात्मकं तपः कृतवान् । तस्मात्तेपानात् तप्नवतः सकाशात् पृथिवी अन्तरिक्षं चोरित्येते त्रयो लोका अजायन्त । स इमांस्त्रील्लोकानभितताप सारं जिघृक्षुः पर्यालोचितवान् । तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रीणि ज्योतींष्य जायन्त । कानि तानीति स्पष्टतयाह- अग्निः प्रसिद्धः प्रथमः पृथिवीलोकसारः, योऽयं पवते वायुः सोऽन्तरिक्षसारः, सूर्यः प्रसिद्धो द्युलोकसारः । न मनुष्या एव त्रयाणां लोकानां सारभूताः । नापि तेषु अग्निवायुसूर्यत्वादीनि सम्भवन्ति । स प्रजापतिः पूर्वोक्तानि ज्योतींष्यभितप्तवान् । तेभ्यस्तप्तेभ्योऽग्निवायुसूर्याख्येभ्यो देवेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त | अग्नेॠग्वेदो वायोर्यजुर्वेद: सूर्यात्सामवेदोऽजायत । यथा प्रजापती त्रयो लोकाः कारणरूपेणासन्, तथैव त्रिषु लोकेषु तत्सारभूता अग्न्यादयस्त्रयो देवा आसन् । तथैव त्रिषु देवेषु सारभूता त्रयो वेदा आसन् । तथैव त्रिष्वपि वेदेषु सारभूतास्त्रयो व्याहृतयो भवन्ति । तास्वपि सारभूतः प्रणवो भवति । देवास्तु विशिष्टैश्वर्यशालिनो भवन्ति । विशुद्धसत्त्वेषु तेषु नित्यानां वेदानां प्रतिभानं सम्भाव्यते । तथा च सायण: --- इत्थं सत्रप्रसङ्गाद् वेदसारभूताभिर्व्याहृतिभिः सर्वप्रायश्चित्तं होमं विधास्यन् तासामुत्पत्तिमाख्यायिका प्रतिपादयति - प्रजापतिर्वा इदमित्यादिना । इदं दृश्यमानं सर्वं जगत् अग्रे सृष्ट्यादौ प्रजापतिरेवासीत् कारणात्मना स्थित इत्यर्थः । अतः स प्रजापतिरेक एव तदानीमासीत् । नहि अनुद्भूतभौतिकात्मकं प्राचीन है । अग्नि प्रभृति उसी से पैदा हुए हैं, अतः वे अर्वाचीन है । ऐसी अवस्था में प्रजापति ने अग्नि प्रभुति से वेद पढ़ा, यह कैसे बन सकता है | श्रुति का वास्तविक अर्थ यह है कि यहाँ पर व्याहृतियों के द्वारा सर्वप्रायश्चित्तीय होम का विधान करने के लिये व्याहृतियों की प्रशंसा करते हुए उनकी उत्पत्ति को आख्यायिका के द्वारा बताया गया है कि यह सब परिदृश्यमान जगत् सृष्टि के पहले प्रजापति भगवान् ही था, अर्थात् कारणरूप प्रजापति ही था । उस समय वह अकेला था । उसने इच्छा की कि मैं जगत् के रूप में हो | इसके लिये मैं अपने स्वरूप को न छोड़ते हुए देवता, पितृगण, मनुष्य आदि प्रजा के रूप में उत्पन्न होऊँ । उसने श्रम किया, अर्थात् ष्ट पदार्थ का पर्यालोचनात्मक तप किया । उसके तप करने से पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश ये तीनों लोक पैदा हुए । उसने इन ahat लोकों का सार संग्रह करने की इच्छा से पर्यालोचन किया । उनको तपाने से तीन ज्योतियां पैदा हुई । ये तीन कौन सी हैं, इसका स्पष्टीकरण करते हुए कहा कि पहला पदार्थ अग्नि के नाम से प्रसिद्ध है, यह पृथिवी लोक का सार है, यह जो प्रवहमान ( बहने वाला ) पवन ( हवा ) है, वह अन्तरिक्ष का सार है और प्रसिद्ध सूर्य आकाश लोक का सार है । केवल मनुष्य ही तीनों लोकों के सार नहीं हैं और न इनसे अग्नि, वायु और सूर्य ही पैदा होते हैं । उस प्रजापति ने पूर्वोक्त ज्योतियों को तपाया । इन तपाये गये अग्नि, वायु और सूर्य देवता से तीन वेद पैदा हुए । अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद और सूर्य से सामवेद पैदा हुआ । जैसे प्रजापति में तीनों लोक कारण रूप में विद्यमान थे, उसी तरह तीनों लोकों में सारभूत अग्नि प्रभृति तीन देवता थे, उसी प्रकार तीनों देवताओं के सारभूत तीन वेद और तीनों वेदों की सारभूत तीन व्याहृतियाँ होती है । इन तीनों का भी सारभूत प्रणव, ओंकार है । देवगण विशिष्ट ऐश्वर्य से युक्त हैं । विशुद्धसत्व गुण वाले इन देवताओं की नित्य वेदों का सदा प्रतिभान होता रहता है । इस श्रुति का सायण कृत अर्थ इस प्रकार है - इस प्रकार सत्र ( महायज्ञ का विशेष स्वरूप ) के प्रसंग से वेदों की सारभूत व्याहृतियों के द्वारा सर्वप्रायश्चित होम का विधान करने के लिये आख्यायिका के द्वारा व्याहृतियों की उत्पत्ति बताई जाती है ---' प्रजापतिर्वा इदम् ' इत्यादि श्रुति से । यह परिदृश्यमान सारा जगत् सृष्टि के आदि में प्रजापति ही था, अर्थात् प्रजापति के रूप में कारणात्मना ( कारण रूप से ) अवस्थित था । अतः वह प्रजापति अकेला ही उस समय था । यह बात इसलिये कही गई है कि यह जगत् १३

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४६८ जगदित्यवधारणाभिप्रायात् । महत्सृष्टिमाह - सोऽकामयतेत्यादिना । स्याम् जगद्रूपेण भवेयम् । तदर्थ प्रजायेय प्रकर्षेण स्वरूपाविरोधेन देवपितृमनुष्यादिप्रजारूपेणोत्पद्येयेत्यर्थः । तत्साधनमाह - सोऽश्राम्यदिति । स्रष्टव्यपर्या-लोचनं तपः, तद्गवेषणहेतुकः शरीरखलेशः श्रमः । तेपानादिति तप्तवतः सकाशादित्यर्थः । प्रथमं पृथिव्यादीना त्रयाणां सृष्टिमाह - त्रयो लोका इति । अथैतेषां सारं जिघृक्षुः स प्रजापतिः इमानेव श्रीन् लोकानभितताप रजतसुवर्णादिलोहपिण्डवत् पुटपाकेन तप्तवानित्यर्थः । अग्न्यादयो देवास्तत उत्पन्ना इत्याह- तेभ्यस्तप्तेभ्य इति । त्रीणि ज्योतींषीत्युक्तमेवार्थं विवृणोति - अग्निरिति । योऽयमन्तरिक्षे पवते सञ्चरते स वायुद्वितीयं ज्योतिरित्यर्थः । अथैतेषामपि सारं जिघृक्षुस्तप्तवानित्याह - स इमानीति । तत्सकाशात् त्रयाणामुत्पत्तिमाह — तेभ्यस्तप्तेभ्य इति । तत्र कस्माद्देवात् कस्य वेदस्योत्पत्तिरिति विविनक्ति - अग्नेॠग्वेद इति । छान्दोग्येऽप्ययमर्थः स्पष्टमुक्तः -- ' प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् । तेषां तप्यमानानां रसान् प्रावृहदग्नि पृथिव्याः, वायुमन्तरिक्षात्, आदित्यं दिवः || १ || स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत् । तासां तप्यमानानां रसात् प्रावृहदग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् || २ || स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत् । तस्यास्तप्यमानाया रसान् प्राबृहत् । भूरित्यृग्भ्यो भुव इति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः || ३ || ' अत्रापि सारजिघृक्षया प्रजापतिलोकान् भूरादीन् पर्यालोचितवान् इत्येवार्थः । तेभ्योऽग्न्यादीन् देवान् रसरूपेण निश्चकर्ष । तेभ्योऽप्यभितप्तेभ्य ऋगादीन् वेदान् सारानाविर्भावितवान् । तेभ्योऽपि तप्तेभ्यो भूर्भुवःस्वरिति तिम्रो व्याहृती: साररूपा दुदोह । तत एव ' यद्युक्तो रिष्येद् भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयात् ऋचमिव तद्रसेनच वीर्येणर्चा यज्ञस्य विरिष्टि सन्दधाति || ४ || अथ यदि यजुष्टो महाभूतों की केवल अनुभूत अवस्था न मान ली जाय । ' सोऽकामयत ' इत्यादि से महत् की सृष्टि बताई गई है । ' स्याम् ' का अर्थ है कि मैं जगत् रूप में होऊँ । इसके लिये ' प्रजायेय ', अर्थात् स्पष्ट रूप से अपने स्वरूप का विरोध न करते हुए देव, पितृगण, मनुष्य आदि प्रजा के रूप में उत्पन्न होऊँ । ' सोऽश्राम्यत् ' इत्यादि से उसका साधन बताया गया है । सष्टव्य पदार्थ ( पैदा की जाने वाली वस्तुएँ ) का पर्यालोचन ( विचार ) तप है और उसकी खोज के लिये किया गया शारीरिक क्लेश ' श्रम ' कहलाता है । ' तेपानात् ' का अर्थ है कि तप करते हुए प्रजापति से ' त्रयो लोकाः ' यहाँ पहले पृथिवी आदि तीन लोकों की सृष्टि बताई गई है । अब इन तीन लोकों का भी सार लेने की इच्छा से प्रजापति ने इनको तपाया, जैसे कि सोना, चांदी, लोहा आदि को पुटपाक से तपाया जाता है । ' तेम्यस्तप्तेभ्यः ' से यह कहा गया है कि ऐसा करने पर अग्नि प्रभूति देवता उत्पन्न हुए । इसी अर्थ को अग्नि प्रभृति तीन ज्योतियाँ आदि कह कर स्पष्ट किया गया है । जो अन्तरिक्ष में संचरण करता है, वह वायु द्वितीय ज्योति है । ' स इमान ' इत्यादि से यह स्पष्ट किया गया है । कि उस प्रजापति ने इन तीन देवताओं का भी सार संग्रह करने के लिये उनको तपाया । ' तेभ्यस्तप्तेभ्यः ' इत्यादि से इन तीनों से जो तीन वेद पैदा हुए उनको बताया गया है । ' अग्नेर्ऋग्वेदः ' इत्यादि से यह बताया गया है कि किस देवता से कौन वेद पैदा हुआ? छान्दोग्य उपनिषद् में भी यही अर्थ स्पष्ट किया गया है - ' प्रजापति ने लोकों को तपाया । उनको तपा कर उनके रस अर्थात् सार के रूप में पृथिवी से अग्नि को अन्तरिक्ष से वायु को और आकाश से आदित्य को ग्रहण किया । इन तीनों देवताओं को भी तपाया और उनके सार के रूप में अग्नि से ऋग्वेद को वायु से यजुर्वेद को और सूर्य से सामवेद को ग्रहण किया । प्रजापति ने इस विद्या को भी तपाया और उसको तपाकर सार के रूप में ऋग्वेद से ' भू: ' को, यजुर्वेद से ' भुवः ' को तथा सामवेद से ' स्वः ' को पैदा किया | यहाँ पर भी सार संग्रह की इच्छा से प्रजापति ने भू आदि लोकों का पर्यालोचन किया, यही अर्थ है । उनसे अग्नि प्रभूति देवताओं को सार रूप से निकाला । इनको भी तपा कर ऋगादि वेदों को सार रूप में निकाला और इनको भी तथा कर भूः भुवः स्वः इन तीन व्याहृतियों को सार रूप में दुहा । इसी लिये आगे छान्दोग्य में कहा गया है कि - ' यदि यज्ञ में ऋक् के कारण कोई त्रुटि उपस्थित हो तो ' भूः स्वाहा ' इस व्याहृति से गार्हपत्य अग्नि में आहुति दे । इससे ऋचाओं के वीर्य से, उसके रस से यज्ञ की त्रुटि को दूर कर सकता है । अब यदि यजुः के कारण कोई त्रुटि आई हो, तो ' भुव: स्वाहा ' इससे दक्षिणाग्नि में आहुति दे । वह यजुः के वीर्य और रस से यज्ञ की त्रुटि को दूर कर देता है । अब यदि साम के कारण यज्ञ में त्रुटि आई हो तो वह ' स्व: स्वाहा ' इस

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वेदार्थपारिजातः ४ ९९ रिष्येद् भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयात्, यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टि सन्दधाति || ५ || अथ यदि सामतो रिध्येत् स्व: स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात्, साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टि सन्दधाति || ६ || तद्यथा लवणेन सुवर्णं सन्दध्यात्, सुवर्णेण रजतम्, रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसम्, सीसेन लोहम्, लोहेन दारु, दारु चर्मणा ॥७ ॥ एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टि सन्दधाति भेषजकृतो

ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवति || ८ || ( छा ० ४११७ ) नाग्निवायसूर्या मनुष्यरूपा एव भूरादिलोकत्रयस्य सारः सम्भवन्ति । न वा मनुष्याणां सारभूता ऋगादयो वेदाः सम्भवन्ति । तद्भूरादिलोकानामधिष्ठातृदेवा एवाग्न्यादयः । तांश्च परमेश्वरानुग्रहाद् ऐश्वर्यवशाच्च प्रलये प्रलीना नित्यसिद्धा एव वेदाः प्रतिभान्ति । मनुरप्येतमेवार्थमाह – ' अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् दोह यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुः सामलक्षणम् ॥ ' ( म ० १।२३ ) । अत्र मेधातिथि: -- तिस्र एव देवता अग्निप्रभृतय इति रुक्ताः । सत्यप्यभिधाननानात्वे । अतस्तेन दर्शनेनोच्यते । एताभ्यस्तिसृभ्यो यज्ञसिद्धयर्थं यागसम्प्रदानत्वात्तासां चतुर्थी । त्रयमृग्यजुःसामलक्षणं ब्रह्म वेदाख्यं दोह । द्विकर्मकोऽयं धातुः । प्रधानं कर्म ' त्रयम् ' । अप्रधानेन द्वितीयेन कर्मणा भवितव्यम् । न च तदस्ति । अतः पञ्चम्येवेयमिति मन्यामहे । अग्न्यादिभ्यो दुदोहाक्षारयद् अभावयत् । कथं पुनरन्यादिभ्यो वर्णात्मा शब्दो मन्त्रवाक्यानि ब्राह्मणवाक्यानि च भवेयुः? किं नोपपद्यते? कः शक्तीरदृष्टा असतीर्वक्तुमर्हति? नाख्यातार्थी विकल्पयितुं युक्तः । पञ्चमी तहिं किमर्थम्? दुहियाचीति द्वितीयया भवितव्यम् । किञ्च दृष्टप्रमाणविरोधी प्रावृत्तोऽर्थ उच्यमानो न मनःपरितोषमाधत्ते प्रामाणिकानाम् । परिहृतो विरोध: स्वरूपपरत्वाश्रयणेनैषामागमानास्ऋग्वेद एवाग्नेरजायत, यजुर्वेदो वायोः, सामवेद आदित्यादिति । व्याहृति से आहवनीय अग्नि में आहुति दे । ऐसा करने से उसके साम वीर्यवान् और रसवान् होकर यज्ञ की त्रुटि को दूर कर देते हैं । जैसे लवण ( क्षार ) सुवर्ण को जोड़ देता है, सुवर्ण से रजत को, रजत से जस्ते को, जस्ते से सीसे को, सोसे से लोहे को, लोहे से लकड़ी को और लकड़ी को चमड़े से जोड़ा जाता है, उसी तरह इन लोकों, इन देवताओं और वेद विद्या के बीर्य से यज्ञ की त्रुटि को दूर किया जाता है | इस व्याहृति होम की विधि जानने वाला ब्रह्मा जिस यज्ञ में होता है, उसमें कोई रोग, विघ्न उपस्थित नहीं होता । अग्नि, वायु और सूर्य यदि मनुष्य रूप ही हैं, तो ये भू आदि तीन लोकों के सार नहीं हो सकते और न ऋगादि वेद ही मनुष्यों के सार होंगे । अतः भू आदि लोकों के अग्नि आदि अधिष्ठातृ देवता हैं । इनको परमेश्वर के अनुग्रह से और अपने ऐश्वर्य के कारण प्रलयावस्था में विलीन, किन्तु नित्य सिद्ध वेदों का सृष्टि के आरंभ में प्रतिभान होता है । " अग्नि, वायु और सूर्य से ऋक्, यजुः साम लक्षण त्रयीमय ब्रह्म को यज्ञ की सिद्धि के लिये दुहा ' मनुस्मृति के इस

श्लोक में यही बात कही गई है ।

मेधातिथि ने इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया है- ' अग्नि प्रभृति तीन ही देवता है, यह निरुक्तकारों का कथन है । यद्यपि इनके नाम अनेक हैं । इसी अभिप्राय से कहा गया है कि इन तीन देवताओं से यज्ञ की सिद्धि के लिये ऋक्, यजुः साम लक्षण तीन वेद रूपी ब्रह्म को दुहा । देवता पद से चतुर्थी विभक्ति इस लिये हुई कि वे याग के सम्प्रदान हैं, अर्थात् उन्होंने ही लोक को यज्ञ का विधान दिया है । यहाँ पर दुह धातु द्विकर्मक है । ' वयम् ' प्रधान कर्म है । कोई दूसरा अधान कर्म होना चाहिये । वह यहाँ पर हैं नहीं । अतः यहाँ चतुर्थी न मानकर पञ्चमी ही हम मानते हैं । अग्नि प्रभृति से पैदा किया । अब प्रश्न यह है कि अग्नि प्रभूति से वर्णात्मक शब्द, मन्त्रवाक्य और ब्राह्मणवाक्य कैसे होंगे? क्या नहीं हो सकता? अदृष्ट, अविद्यमान शक्तियों के विषय में कोई क्या कह सकता है? आख्यात का भी विकल्प हम नहीं कह सकते । तब पञ्चमी किस लिये हैं? ' दुहि याचि ' व्याकरण के इस नियम से यहाँ द्वितीया होनी चाहिये । दृष्ट प्रमाण के विरुद्ध छिपा हुआ अर्थ प्रामाणिक मनुष्यों के मन को सन्तुष्ट नहीं कर सकता । ऋग्वेद अग्नि से, यजुर्वेद वायु से और सामवेद सूर्य से पैदा हुआ, ऐसा कहकर आगमों की स्वरूपपरता बताकर विरोध का परिहार कर दिया गया है ।

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 530 का मूल पृष्ठ
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५०० देवार्थपारिजातः अग्न्यादयो s पि देवता ऐश्वर्यभाजो निरतिशयशक्तिश्च प्रजापतिः । तत्र का नामानुपपत्तिः । अस्मिन् दर्शने पञ्चमी अपि विवक्षया । अतः कारकाणि कथितानि । अत्रापादानसंज्ञेत्यपादानविवक्षायां भाष्ये समर्थितानि । अन्यदर्शने कथम्? चतुर्थी तावद्युक्तैव । अर्थवादाश्चैते । तत्र द्वितीयं कर्मात्मैव । प्रजापतिरात्मानं दुदोह | दोहनं चाध्यापनं परसंक्रान्तिसामान्येन । अथापि पञ्चमी । तत्राप्याग्नेया मन्त्रा आदावृग्वेदे P - अतीऽग्नेरजायतेत्युच्यते । यजुर्वेदेऽपि ' इषे त्वोर्जे त्वा ' इति, इट् अन्नम्, तन्मध्यस्थानत्वाद् वायुना बर्षदानेन क्रियते । ऊ प्राणः स वायुरेव । अत आदितो वायुकार्यसम्बन्धाद् वायोरित्युपमा । अथवाध्वर्यवमात्विज्यम्, बहुप्रकाशश्चेष्टाश्च सर्वा वायोरित्यनेन सामान्येन वायोर्जन्म यजुर्वेदस्य | अनधिकारस्य सामग्रीत्ययोग्यत्वाद् उत्तमाध्ययनानि सामानि उत्तमस्थानश्चादित्य इति । कुल्लूकभट्टः – ' ब्रह्म ' ऋग्यजुःसामसंज्ञं वेदत्रयमग्निवायुरविभ्य आकृष्टवान् । सनातनं नित्यम् । वेदापीरुषेयत्पक्ष एव मनोरभिमतः । पूर्वकल्पे ये वेदास्त एव परमात्ममूर्तब्रह्मणः सर्वज्ञस्य स्मृत्यारूढाः । तानेव कल्पादी अग्निवायुरविभ्य आचकर्ष | श्रीतश्चायमर्थो न शङ्कनीयः । तथा च श्रुतिः --- अग्नेॠग्वेदो वायोर्यजुर्वेद आदित्यात् सामवेदः ' इति । आकर्षणार्थत्वाद् दुहिधातोर्नाग्निवायुरुवीणाम् अकथितकर्मता, किन्त्वपादानतैव । यज्ञसिद्धयर्थं त्रयीसम्पाद्यत्वाद् यज्ञानामापीनस्थ क्षीरवद् विद्यमानानामेव वेदानामभिव्यक्तिप्रदर्शनार्थमाकर्षणवाचको दुहिगण: प्रयुक्तः । ' परमेश्वरो यथा प्रजाहितार्थं जगद्रचितवान्, तथैव तद्रक्षणार्थं यज्ञादिलक्षणधर्मप्रवर्तनाय तन्मूलभूतान् वेदान् अग्न्यादिभ्यो दुदोह प्रपूरितवानित्यर्थः । एतेनापि परमेश्वराराधनरूपत्वात् परमात्मप्राप्तिसाधनत्वात् अग्निप्रभृति देवता भी ऐश्वर्यशाली है और प्रजापति भी अतिशय शक्तिमान् हैं । इसमें क्या अनुपपत्ति होगी? इस पक्ष में पञ्चमी भीक्षित है । विवक्षा से ही कारक होते हैं । अपादान की विवक्षा में अपादान संज्ञा होती है, यह भाष्य में समर्थित है । दूसरे पक्ष में क्या होगा? चतुर्थी ठीक ही है । ये सब अर्थवाद वाक्य हैं । यहाँ पर आत्मा ही द्वितीय कर्म है । प्रजापति ने अपने को दुहा । दोहन का अभिप्राय यहां अध्यापन से है, क्योंकि इन दोनों ही क्रियाओं में एक स्थान में स्थित वस्तु की दूसरी जगह संक्रान्ति होती है | यहाँ पर विवक्षा के आधार पर पञ्चमी विभक्ति है । ऋग्वेद के आरम्भ में व्यक्ति देवता के मन्त्र हैं, अतः कहा जाता है कि ॠग्वेद अग्नि से पैदा हुआ । यजुर्वेद में भी ' इषे स्वोर्जे त्वा ' यहां पर इद् बन्न को कहते हैं, इसकी उत्पत्ति मध्यस्थानीय वायु की सहायता से वर्षा होने पर होती हैं । ऊ प्राण है । प्राण वायु ही है । अतः यजुर्वेद में प्रारंभ में वायु के कार्य का सम्बन्ध होने से उपमा बनती है । अथवा अध्वर्यु का पद और अनेक प्रकार की चेष्टाएं सब वायु से ही होती है, इसलिये यजुर्वेद का जन्म वायु से माना गया । अनधिकारी पूरी सामग्री से सम्पन्न नहीं होता, अतः साम का अध्ययन उत्तम अधिकारी के लिये है । इसीलिये उत्तम स्थानवर्ती सूर्य से साम की उत्पत्ति है । कुल्लूक भट्ट का अर्थ इस प्रकार है - ' ब्रह्म अर्थात् ऋक्, यजुः साम लक्षण तीनों वेदों को अग्नि, वायु और सूर्य से निकाला गया | सनातन का अर्थ नित्य है | मनु वेद को अपौरुषेय मानते हैं । पूर्व कल्प में जो वेद थे, वे ही परमेश्वर स्वरूप सर्वज्ञ ब्रह्मा की स्मृति में आ गये । उन्हीं को सृष्टि के आरम्भ में अग्नि, वायु और सूर्य से खींच लिया । यह अर्थ श्रुतिसम्मत है । इसमें किसी प्रकार की शङ्का नहीं होनी चाहिये । ' अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद और सूर्य से सामवेद पैदा हुआ ' यह श्रुति इसमें प्रमाण है । दुह, धातु का अर्थ यहाँ आकर्षण है, अतः यहाँ पर अग्नि, वायु, रवि को अकथित कर्मता नहीं है, किन्तु उनमें अपादान की विवक्षा है । यज्ञ की सिद्धि त्रयी द्वारा ही हो सकती है । स्तन में विद्यमान दूध की तरह विद्यमान वेदों की हो अभिव्यक्ति होती है, यह बताने के उद्देश्य से दु धातु का यहाँ पर आकर्षण के अर्थ में गोण प्रयोग किया है ' । > परमेश्वर ने प्रजा के कल्याण के लिये जैसे जगत् । रचना की, उसी तरह प्रजा की रक्षा के लिये और यज्ञ आदि धर्म कार्य की प्रवृत्ति के लिये उसने धर्म के मूलभूत वेदों को अग्नि आदि से दुह लिया । इस प्रकार वेद से परमेश्वर की आराधना की जाती है, ये परमात्मा की प्राप्ति के साधन हैं, परमेश्वरनिष्ठ भक्त के सत्यशुद्धि के क्रम से प्रत्यक् चैतन्य से अभिन्न परमात्मा के साक्षात्कार