वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 581–590

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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वेदार्थपारिजातः ५५१ यच्च ' तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् | ' ( ऋ ० ८२१७ ) अस्यायमर्थ: -- यद्विष्णोर्व्यापकस्य परमेश्वरस्य परमं प्रकृष्टानन्दस्वरूपं पदं पदनीयं सर्वोत्तमोपायः प्रापणीयं माक्षाख्य-मस्ति, तत् सूरयो विद्वांसः सदा सर्वेषु कालेषु पश्यन्ति । कीदृशम्? आततम् आसमन्तात् ततं विस्तृतं यद्देशकालवस्तु-परिच्छेदरहितमस्ति अतः सर्वैः सर्वत्र तदुपलभ्यते । दिवि मार्तण्डप्रकाशे नेत्रदृष्टेर्व्याप्तिर्यथा भवति, तथैव तदं ब्रह्मापि वर्तते । मोक्षय सर्वस्मादधिकोत्कृष्टत्वात् तदेव द्रष्टुं प्राप्तुमिच्छन्ति ' ( पृ ० ५० ) इति, तदपि न सङ्गतम्, वेदानां ब्रह्मणि तात्पर्यमित्यर्थ पानेऽस्य वचनस्यानुपयोगित्वात् तादृशार्थबोधकपदाभावाच्च । न च तादृशोऽर्थी ध्वन्यत इति वाच्यम्, सूरयो ब्रह्मविद एव तत्पदमवगाहितुं क्षमा इत्यत्रैव श्रुतेस्तात्पर्यात् । अतो वेदा विशेषेण तस्येव प्रतिपादनं कुर्वन्तीति तनिष्कर्षोऽपि निराधार एव, अत इत्युक्तं कुत इति आकाङ्क्षा भवति । सा च हेतुस्वरूपनिरूपण एव निवर्तते । न च स्वदुक्तार्थस्य तत्र हेतुत्वं सम्भवति । नहि देशकाल वस्तुपरिच्छेदरहिते सदा सुरिवेद्य एव वेदानां तात्पर्येण भाव्यमिति राजाज्ञास्ति, तात्पर्य -स्योपक्रमोपसंहारादिषड्विधलिङ्गेरेव ज्ञातुं शक्यत्वात् । त्वद्रीत्या विष्णोः परमानन्दस्वरूपं कथं पदनीयं कथं च तस्य मोक्षाख्या भवति? सर्वव्यापकस्य नित्यप्राप्तत्वे प्राप्तव्यत्वासम्भवात् । न च स्वात्मरूपतयः तत्साक्षात्कार एव तत्प्राप्तिः, स्वद्रीत्या जीवस्य सदैव तद्भिन्नत्वात् । न चोपास्यतया तत्साक्षात्कार एव मोक्षः, तथात्वेऽपि तस्य मोक्षभिन्नत्वेन मोक्षरूपत्वानुपपत्तेः । साक्षात्कर्त्तव्यस्य परमानन्दरूपत्वेऽप्यतद्रूपस्य साक्षात्कर्तुस्ततो भिन्नत्वेन पुरुषार्थत्वासम्भवात् । किञ्च त्वद्रीत्या वस्तुपरिच्छेदरहितं ब्रह्म नैव सम्भवति, तस्यान्योन्याभावप्रतियोगित्वात् । प्रागभावप्रध्वंसाभाव प्रतियोगित्वस्य कालपरिच्छिन्नत्वेनात्यन्ताभावप्रतियोगित्वस्य देशपरिच्छिन्नत्वेनान्योन्याभावप्रतियोगित्वस्य वस्तुपरि-च्छिन्नत्वेनाभाव चतुष्टयाप्रतियोगित्वस्यैव त्रिविधपरिच्छेदशून्यत्वं सम्भवति । तदेतदर्द्धतवाद एवं सङ्गच्छते, न त्वन्मते । ' तद्विष्णोः ' आदि मन्त्र को उद्धृत कर उसका अर्थ बताया गया है कि विष्णु अर्थात् व्यापक परमेश्वर का परम अर्थात् प्रकृष्ट आनन्द स्वरूप पद, सर्वोत्तम उपायों से प्रापणीय मोक्ष रूपी स्थान है । उसको विद्वज्जन सदा देखते हैं । यह स्थान चारों तरफ से विस्तृत है, देश, काल, वस्तु आदि के परिच्छेद से रहित है । अतः सभी सब जगह उसको पा सकते हैं । दिन में सूर्य के प्रकाश में जैसे नेत्र की दृष्टि का विस्तार हो जाता है, उसी तरह यह ब्रह्म पद भी हैं । मोक्ष पद सबसे उत्कृष्ट है, अतः इसी को सब कोई देखना और प्राप्त करना चाहते हैं । किन्तु यह कथन भी संगत नहीं है, वेदों का ब्रह्म में तात्पर्य है, इसके प्रतिपादन में यह मन्त्र असमर्थ है । इस प्रकार के अर्थ को बताने वाला कोई पद यहाँ नहीं है । इस प्रकार का अर्थ ध्वनित होता है, यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि इस मन्त्र का केवल इतना हो अर्थ है कि सूरि अर्थात् ब्रह्मवेत्तागण ही उस पद को प्राप्त करने में समर्थ हैं । इसलिये वेद विशेषेण उसी का प्रतिपादन करते हैं, यह निष्कर्ष निराधार | ' अतः ' ऐसा करने पर ' कहाँ से ' ऐसी आकांक्षा होती है । वह हेतु के स्वरूप का स्पष्ट निरूपण करने पर ही निवृत्त होती है | आपका कहा गया अर्थ वहाँ पर हेतु के रूप में उपस्थित नहीं किया जा सकता । देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित सर्वदा विद्वानों के ही द्वारा वेद में ही वेदों का तात्पर्य होगा, यह कोई राजा की आज्ञा नहीं है, क्योंकि तात्पर्य की अवगति उपक्रम, उपसंहार आदि षड्विध लिंग से ही होती है । आपके मत से विष्णु का परमा-नन्द स्वरूप पद कैसे प्राप्त किया जा सकता है और उसका नाम मोक्ष कैसे होगा? सर्व व्यापक पद तो नित्य प्राप्त है, उसको क्या प्राप्त करना है? स्वात्मरूपेण उसका साक्षात्कार हो प्राप्ति है, यह भी भाप नहीं कह सकते, क्योंकि आपकी दृष्टि में ईश्वर सदा जीव से भिन्न है । उपास्यतया उसका साक्षात्कार भी मोक्ष नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ऐसी अवस्था में भी मोक्ष से भिन्न होने से उसकी मोक्षरूपता नहीं बन सकती । जो साक्षात् करणीय है, उसके परमानन्द रूप होने पर भी साक्षात्कर्ता के परमानन्द स्वरूप न होने से वह उससे भिन्न है, अतः यहाँ पुरुषार्थता संपन्न नहीं होगी । दूसरी बात आपके मत से वस्तु परिच्छेद से रहित ब्रह्म हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह अन्योन्याभाव का प्रतियोगी है । प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव का प्रतियोगी काल से परिच्छिन्न होता है, अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी देश से परिच्छिन्न और अन्योन्याभाव का प्रतियोगी वस्तु से परिचित होता है । इन चारों अभावों का अतियोगी ही त्रिविध परिच्छेद से शून्य होता है । यह बात अद्वैतवाद में ही संभव है, आपके मत में नहीं ।

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dar पारिजातः देशकालापरिच्छिन्नत्वात्तत्पदं ब्रह्म सर्वैः सर्वत्रोपलभ्यमित्येव त्वद्विवक्षितोऽर्थः । सोऽपि नोपपद्यते, विकल्पा-नुपपत्तेः । तथा चोपलब्धिः कीदृशी? प्रत्यक्षात्मिका, प्रत्यक्षाद्यन्यतमरूपा वा? नाद्यः, ब्रह्मस्वरूपस्यातीन्द्रियत्वात् । न च मनसा तत्प्रत्यक्षम्, न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग् गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमः ', ' यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ', ' यन्मनसा न मनुते ' इत्यादिश्रुतिभिस्तस्य मनोऽगोचरत्वप्रतिपादनात् । न द्वितीयः 2 सर्वैः सर्वत्र ब्रह्मण उपलब्ध तद्विषयकविप्रतिपत्तिसंशीतिनास्तिक्यानुपपत्तेः । नाप्यतुमितिः सम्भवति, व्याप्तिज्ञानानुपपत्तेः । नाप्यस्ति दृश्यमानजगद्विलक्षणं ब्रह्म देशाद्यपरिच्छिन्नत्वादिति मूलोक्त एव हेतु:, जगद्वैलक्षण्ये सपक्षानुपपत्त्या व्याप्तिग्रहासम्भवात् । कालाद्यपरिखितत्वं तु ब्रह्मणः स्वरूपमेवेति न तदुपलब्धी तदेव हेतुः । हेतुसाध्ययोः कथं व्याप्यव्यापकभाव इत्यपि वक्तव्यम्? तदभावेऽप्यनुमितिसम्भवे कथमनुमानप्रामाण्यव्यवस्था | सर्वस्य सर्वत्र ब्रह्मणोऽनुमितिसिद्धावपि नास्तिक्यानुपपत्तिस्तदवस्थैव । नापि शाब्दबोधात्मिकोपलब्धिः सम्भवति, वेदप्रामाण्यानभ्यु-पगन्तॄणां तदनुपपत्त्या सर्वस्य सर्वत्र तदुपलब्ध्यनुपपत्तेः । सर्वत्र सर्वस्य ब्रह्मोपलब्धो मुक्तिसंसारयोर वैशेष्यापत्तेः । किञ्च तस्य ब्रह्मरूपस्य विभुत्वादिति किं साध्यसिद्धी हेत्वन्तरं न वा? न चेत्पीनरुक्त्यापत्तिः । नाद्यः, विकल्पसमुच्चयानुपपत्तेः । विकल्पे पक्षान्तरे तदहेतुत्वापत्तेः । समुच्चयेऽधिकनामकनिग्रहस्थानापत्तेः । सर्वैः सर्वत्र तदुपलभ्यते, कस्यां किमिव तस्य ब्रह्मस्वरूपस्य विभुत्वात् । अत्र सादृश्यमुपलब्धिर्व्याप्तिर्वा? आये यथा afar विस्तृतं चक्षुरुपलभ्यते तथा सर्वे विस्तृतं ब्रह्म सर्वत्रोपलभ्यत इत्यर्थः स्यात् । स व न सम्भवति, चक्षुषोरतीन्द्रियत्वेनो-पलम्भानुपपत्तेः । न च तद्ग्रहणायेन्द्रियान्तरकल्पनम्, अनवस्थापानात् । द्वितीये यथा दिवि चक्षुविस्तृतं भवति तथैव देश, काल से अपरिच्छिन्न होने से वह ब्रह्मपद सभी के द्वारा सदा उपलम्य है, यही आपका अभिमत है । आगे किये जाने वाले विकल्प का उत्तर न बन पाने के कारण वह ठीक नहीं है । आप यह बताइये कि यह उपलब्धि कैसी है? केवल प्रत्यक्षात्मक ही है अथवा प्रत्यक्षादि में से कोई एक? प्रत्यक्षात्मक नहीं होगी, क्योंकि ब्रह्म का स्वरूप अतीन्द्रिय है । मन से भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होगा, ' वहाँ पर वक्षु वाणी और मन की गति नहीं है, इसको न हम जानते हैं और न किसी को जमा सकते हैं ', ' जिसको न पाकर मन के सहित दाणी लौट पड़ती है ', ' जिसको मन से नहीं जाना जा सकता ' इत्यादि श्रुतियों से उसकी मन से अगोचरता प्रतिपादित हैं । दूसरा पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि यदि सभी सब जगह ब्रह्म की उपलब्धि कर सकते हैं, तो तद्विषयक विप्रतिपत्ति, संशय, नास्तिक्य आदि की स्थिति नहीं होनी चाहिये । अनुमिति भी नहीं होगी, क्योंकि व्याप्तिज्ञान नहीं बनेगा । दृश्यमान जगत् से ब्रह्म विलक्षण है, क्योंकि यहू देश आदि से अपरिच्छिल है, यह मूल में कहा गया ही हेतु है, यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जगद्वैलक्षण्य में सपक्ष के न होने से व्याप्तिग्रह नहीं बनेगा । कालादि से अपरिच्छित तो ब्रह्म का स्वरूप ही है, अतः उसकी उपलब्धि में वही हेतु नहीं होगा । हेतु और साध्य का व्याप्यव्यापक भाव कैसे बनेगा, यह भी बताना पड़ेगा । इसके अभाव में भी यदि अनुमिति संभव है, तो अनुमान के प्रामाण्य की व्यवस्था कैसे होगी? सब जगह सबको ब्रह्म की अनुमिति सिद्ध होने पर भी नास्तिक्य क्यों बना रहता है? यहाँ पर शाब्द store मक उपलब्धि भी नहीं बनेगी, क्योंकि जो वेद को प्रमाण नहीं मानते, उनको शाब्दबोध न होने से सबको सब जगह उसकी उपलब्धि को उपपत्ति नहीं बनेगी और यदि सबकी सब जगह ब्रह्म की उपलब्धि बनतो है, तो मुक्ति और संसार में विशेषता क्या रह जायगी? आप यह भी बताइये कि ' ब्रह्म के स्वरूप के विभु होने से यह साध्य की सिद्धि के लिये दूसरा हेतु है या नहीं? यदि नहीं है, तो पुनरुक्ति दोष होगा? पहले पक्ष में विकल्प समुच्चय नहीं बनेगा | विकल्प में पक्षान्तर में वह हेतु नहीं हो सकेगा । ever में अधिक नामक निग्रहस्थान की आपत्ति आवेगी । वह पद सब जगह सबको प्राप्त होता है, क्योंकि वह ब्रह्म सब ठिकाने परिपूर्ण है । किसमें किसके समान? यहाँ पर सादृश्य उपलब्धि है, या व्याप्ति? प्रथम पक्ष में जैसे आकाश में विस्तृत चक्षु उपलब्ध होता है, उसी तरह सबके द्वारा यह विस्तृत ब्रह्म सर्वत्र उपलब्ध होता है, यह अर्थ होगा । यह संभव नहीं है, क्योंकि इसको चक्षुओं से अतीन्द्रिय होने के कारण उपलब्धि नहीं होगी । उसके ग्रहण के लिए दूसरी इन्द्रिय की कल्पना करने पर अनवस्था दोष होगा । दूसरे

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ब्रह्मापि सर्वत्र विस्तृतं भवतीत्यर्थः स्यात् । सोऽपि न सम्भवति, चक्षुषो व्यापकत्वानुपगमात् । व्यापकत्वं हि यावम्मूर्तद्रव्यसंयोगित्वम्, न च तदिन्द्रिये सम्भवति, मनःपरमाण्वादीनामपि प्रत्यक्षत्वापातात् । fafa मार्तण्डप्रकाशे नेत्रदृष्टेर्व्याप्तिर्यथा भवति तथैव तत्पदं ब्रह्मापि वर्तते, मोक्षस्य सर्वस्मादधिको त्कृष्टत्वात्, तदेव प्राप्तुमिच्छन्तीति सर्वथा विश्वशृङ्खलम् । कस्य साध्यस्य साधनाय हेतुपन्यासः, कथं च प्रकरण-सङ्गतिरिति तु दयानन्द एव जानातु, सामाजिका वा जानन्तु । सायणानुसारी मन्त्रस्यायमर्थ: -- सुरयो विद्वांस ऋत्विगादयः, विष्णोः सम्बन्धि परमुत्कृष्टं तच्छास्त्र-प्रसिद्धं पदं स्वर्गस्थानं शास्त्रदृष्ट्या सर्वदा पश्यन्ति । किमिव दिवीव । यथा दिवि आकाशे आततं सर्वतः प्रसृतं चक्षुनिरोधाभावेन विशदं पश्यति तद्वत् । यद्वा वेदान्तानुसार्ययमर्थः - सूरयो ब्रह्मविदः, विष्णोः परमेश्वरस्य, स्वरूपभूतं परमुत्कृष्टं प्रपञ्चातीतं तद्वेदान्तप्रसिद्धं पदं ब्रह्मविद्भिः पदनीयं प्रापणीयं सदा प्रत्यगभिन्नतया पश्यन्ति । fafra? दिवि आकाशे आततं विततं विस्तृतं चक्षुर्यथा स्पष्टं पश्यति, तथैव प्रत्यगात्मरूपेण परमात्मनोऽत्यन्तापरोक्ष-त्वात् संशयविपर्ययादिराहित्येन विशदं पश्यन्ति, ' यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म ' इति श्रुतेः । करणं तु कृतोपास्तीनामेकाग्रमनसां वेदान्तमहावाक्यमेव, ' तं त्वोपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ', ' नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' इत्यादिश्रुतिभ्यः । अकृतोपास्तीनां श्रुतवेदान्तानां तु वेदान्ताभ्यासजनितसंस्कारसंस्कृतं मन एव, ' मनसैवानुद्रष्टव्यम् ', ' दृश्यते त्वग्रया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ' इत्यादिश्रुतिभ्यः । न च ' यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ' इत्यादिवचनविरोध:, तेषां पूर्वोक्त-संस्कारहीनमनः परत्वात् । न चोभयत्रापि वाक्यजन्यवृत्तिविषयत्वे तादृङ्मनोजन्यवृत्तिविषयत्वे वा स्वप्रकाशत्वभङ्गः, अज्ञानापनोदकवृत्तिविषयत्वेऽपि फलव्याप्त्यविषयत्वेन स्वप्रकाशत्वोपपत्तेः । पक्ष में जैसे आकाश में चक्षु विस्तृत होता है, उसी तरह ब्रह्म भी सर्वत्र विस्तृत होता है, यह अर्थ होगा । यह भी संभव नहीं है, क्यों चक्षु का व्यापकत्व किसी ने माना नहीं है । सभी मूर्त द्रव्यों से संयुक्त पदार्थ ही व्यापक माना जाता है । इन्द्रिय में यह संभव नहीं है, क्योंकि उसको व्यापक मानने पर मन, परमाणु आदि की भी प्रत्यक्षता माननी पड़ जायगी । जैसे सूर्य का प्रकाश आवरण रहित भाकाश में व्याप्त होता है मोर जैसे उस प्रकाश में नेत्र की दृष्टि व्याप्त होती है, उसी प्रकार परब्रह्म पद भी स्वयंप्रकाश, सर्वत्र व्याप्त हो रहा है । उस मोक्ष पद की प्राप्ति से कोई भी प्राप्ति उत्तम नहीं है | इसलिये चारों वेद उसी की प्राप्ति कराने के लिये विशेष रूप से प्रतिपादन करते हैं । यह बात भी सर्वथा अस्तव्यस्त है | यहाँ पर fee साध्य की सिद्धि के लिये हेतु का उपन्यास किया है और प्रकरण की संगति कैसे होगी? यह बात या तो दयानन्द ही समझ सकते हैं, या उनके अनुयायी हो । सायण के अनुसार मन्त्र का अर्थ यह है - सूरि अर्थात् विद्वान् ऋत्विग्गण विष्णु संबन्धी परम उत्कृष्ट उस शास्त्र प्रसिद्ध स्वर्ग पद को शास्त्र की दृष्टि से सदा देखते हैं । कैसे? जैसे कि आकाश में चारों तरफ विस्तृत पदार्थों को चक्षु से किसी रुकावट के न रहने से स्पष्ट देखते हैं, उसी तरह से । अथवा वेदान्त के अनुसार इसका अर्थ यह होगा -- सूरि अर्थात् ब्रह्मवेत्तागण विष्णु अर्थात् परमेश्वर के स्वरूपभूत, परम उत्कृष्ट प्रपञ्चातीत उस वेदान्त प्रसिद्ध पक्ष को, जो कि ब्रह्माओं के द्वारा ही प्राप्तव्य है, सदा प्रत्य तत्त्व से अभिन्न देखते हैं । कैसे? आकाश में विस्तृत चक्षु जैसे स्पष्ट देखता है, उसी तरह प्रत्यगात्म रूप से परमात्मा के अत्यन्त अपरोक्ष होने से संशय, विपर्यय आदि से रहित होकर स्पष्ट रूप से देखते हैं । ' ब्रह्म वह है, जो कि साक्षात् अपरोक्ष है ' यह श्रुति इसमें प्रमाण है । इसमें सहायक वेदान्त महावाक्य हैं, जो कि उपासना करके चित्त की एकाग्रता संपादन करते हैं । ' उस औपनिषद पुरुष पूछता हूँ ', ' उस ब्रह्मको अवेदवित् नहीं जान पाता ' इत्यादि श्रुतियाँ इसी का प्रतिपादन करती हैं । जिन्होंने उपासना नहीं की है, किन्तु वेदान्त का श्रवण किया है, ऐसे व्यक्तियों का वेदान्त के अभ्यास संस्कृत मन ही साधन है, ' भन से ही उसको देखना चाहिये ', ' सूक्ष्मदर्शी उसको सूक्ष्म अग्र बुद्धि से देखते है ' ये श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं । ' जिसको न पाकर वाणी और मन लौट पड़ते हैं ' इस वचन से उक्त वचन का विरोध इसलिये नहीं होगा कि संस्कारहीन मन के विषय में ही यह लागू होता है । ब्रह्म को वाक्यजन्य ७०

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I वार्थपारिजात: ' तत्तु समन्वयात् ' ( 91१/१४ ) इति व्याससूत्रं यद्यपि सर्ववेदान्तानां ब्रह्मणि समन्वयेन शास्त्रकारणं शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म वक्ति, तथापि तदेव ब्रह्म सर्वत्र वेदवाक्येषु समन्वितं सत्प्रतिपादितमस्ति ( पृ ० ५० ) इत्यर्थोऽशुद्ध एव । तुशब्देन कार्यपरत्वं वेदानां व्यावर्त्य फलवन्निश्चितार्थे तद्ब्रह्म कार्ये सिद्धे च वेदानां प्रामाण्यसाधनेन जगत्कारणं शास्त्रप्रमाणकमस्ति समन्वयात् समेषां वेदवेदान्तानां ब्रह्मण्येव समन्वयात् तत्रैव तात्पर्यादित्यर्थस्यैव युक्तत्वात् । यदपि च ' सकलवेदस्येश्वर एव मुख्यः प्रतिपाद्यो विषय: ' इत्यत्रार्थे यजुरपि किञ्चित्प्रमाणभूतमाह-तथा यजुर्वेदे प्रमाणम्- ' यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्रजया संरराण-स्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी || ' ( यजु ० ८१३६ ) अस्यार्थः -- यस्मान्नैव ब्रह्मणः सकाशात् पर उत्कृष्ट! पदार्थजातः प्रादुर्भूतः परः भिन्नः कश्चिदप्यस्ति । प्रजापतिरिति ब्रह्मणो नामास्ति, प्रजापालकत्वात् । यः परमेश्वरा विश्वा सर्वाणि भुवनानि सर्वलोकान् आविवेश व्याप्तवानस्ति संरराणः सर्वप्राणिभ्यः अत्यन्तं सुखं दत्तवान् सन् त्रीण्यग्निसूर्य विद्युदाख्यानि सर्वजगत्प्रकाशकानि प्रजया ज्योतिषोऽन्यया सृष्ट्या सह तानि सचते समवेतानि करोति, अत: स एवेश्वरः षोडशी येन षोडशकला जगति रचितास्ता विद्यन्ते यस्मिन् यस्य वा तस्मात् स षोडशीत्युच्यते । अतोऽयमेव परमोऽर्थो वेदितव्य: ' ( पृ ० ५०-५१ ) इति, तदपि न सङ्गतम्, अयमेव परमोऽर्थ इत्यस्य मन्त्राक्षर-बाह्यत्वात् । नहि सर्वेषां वेदानां ब्रह्मण्येव तात्पर्यमित्यस्यार्थस्य सूचकं पदं मन्त्रे विद्यते । मन्त्रार्थोऽपि न सङ्गतः, ' यस्मात्पर उत्कृष्टो न प्रकट: ' एतेन तत उत्कृष्टः कश्चिदप्रकटोऽस्तीति विरुद्धार्थध्वननात् । संरराण इत्यस्य क्रीडार्थस्य रमतेनिष्पन्नत्वाद् रममाण एवार्थः, दानार्थकत्वायोगात् । प्रजया इत्यस्य सृष्टिरपि नार्थः, प्रमाण-शून्यत्वात् । सृष्ट्या ज्योतिषां संयोजनमप्यसङ्गतम्, ज्योतिषामपि सृष्ट्यन्तर्गतत्वात् । प्रजापदेन सृष्टेरुक्त्या षोडशकलानामपि सृष्टिरुक्तैवेति तत्पुनर्वचनं निरर्थकमेव । वृत्ति का अथवा मनोजन्य वृत्ति का विषय मानने पर दोनों ही परिस्थितियों में स्वप्रकाशत्व का भंग इसलिये नहीं होगा कि अज्ञान की निवारक वृत्ति के विषय होने पर भी फलव्याप्ति के विषय न बनने के कारण यहाँ पर स्वप्रकाशत्व की उपपत्ति बनती है । ' तत्तु समन्वयात् ' यह व्याससूत्र यद्यपि सभी वेदान्तों का ब्रह्म में समन्वय होने से शास्त्र का कारण और शास्त्र प्रमाणक ब्रह्म का प्रतिपादन करता है, तो भी ' सब वेदवाक्यों में ब्रह्म का ही विशेष करके प्रतिपादन है ( पु ० ५२ ) यह अर्थ अशुद्ध ही है । तु शब्द से वेदों की कार्यपरता का व्यावर्तन करके निश्चित फल वाले कार्य और सिद्ध अर्थ में भी वेदों का प्रामाण्य सिद्ध करके वह ब्रह्म शास्त्र के प्रमाण के आधार पर जगत् का कारण है, क्योंकि सभी वेद - वेदान्त वाक्यों का ब्रह्म में ही समन्वय अर्थात् तात्पर्य विद्यमान है, यही इसका उचित अर्थ सिद्ध होता है । सकल वेद का ईश्वर ही मुख्य प्रतिपाद्य विषय है, यहाँ पर प्रमाण के रूप में यजुर्वेद का उल्लेख किया गया है--' तथा यजुर्वेद में इसका प्रमाण मिलता है -- यस्मान्न जात इत्यादि । इसका अर्थ यह है - जिस परब्रहा से बढ़कर कोई उत्तम पदार्थ नहीं हैं । प्रजापति ब्रह्मा का नाम है, क्योंकि वह प्रजा का पालक है । जो परमेश्वर सब भुवनों को व्याप्त किये हुए हैं, सब प्राणियों को सुख Start करता हुआ अग्नि, सूर्य और विद्युत् नाम से सारे जगत् को प्रकाशित करता हुआ अन्य अप्रकाशमय सृष्टि के द्वारा भी इस जगत् को संयुक्त करता है । इसीलिये यह परमेश्वर षोडशी कहलाता है, क्योंकि इसी ने जगत् में षोडश कलाओं की रचना की है, अथवा इसमें सोलह कलाएं विद्यमान हैं । अतः इसी को परम अर्थ के रूप में जानना चाहिये ' यह कथन भी संगत नहीं है, ' यही परम अर्थ है ' यह बात मन्त्राक्षरों से बाहर की है । सब वेदों का ब्रह्म में ही तात्पर्य हैं, इस अर्थ का सूचक पद मन्त्र में नहीं है । मन्त्र का अर्थ भी संगत नहीं है, जिससे उत्कृष्ट कोई प्रकट नहीं है, ऐसा कहने से यह विरुद्ध प्रतीति भी हो सकती है कि उससे उत्कृष्ट कोई अप्रकट अर्थ faanta है | क्रीडार्थक रम् धातु से निष्पन्न होने से संरराण पद का अर्थं रममाण ही होगा, दान अर्थ से इसका सम्बन्ध नहीं है । प्रजा पद का अर्थ भी बिना प्रमाण के सृष्टि नहीं होगा । सृष्टि के साथ ज्योति का संयोजन भी असंगत है, क्योंकि ज्योति भी तो सृष्टि के

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वैवार्थपारिजातः ** सूत्रकारैरयं मन्त्रः षोडशिग्रहोपस्थाने विनियुक्तः । उपस्थायैनं यस्मान्न जात इति षोडशिग्रहमुपतिष्ठेत् । यस्मात्पुरुषात्परोऽन्यो व्यतिरिक्त उत्कृष्टो देवादिर्जातः सम्भूतो नास्ति यो विश्वा सर्वाणि भुवनानि भूतजातानि आविवेश अन्तर्यामिरूपेण प्रविष्टवान् । प्रजापतिः उत्पन्नानां पालकः प्रजया प्रजारूपेण संरराणः सम्यक् रममाणः ( प्रजापतिः परमेश्वर एव प्रजारूपेणापि प्रादुर्भवति, ' सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति श्रुतेः ) त्रीणि ज्योतींषि विषयज्ञापका अग्निवाय्वादित्यरूपाणि सचते सेवते । स्वतेजसा ज्योतिषां सेवनं जडज्योतिषामुज्जीवनं करोति, ' येन सूर्यस्तपति तेजसेद्ध: ', प्राणस्य ' प्राण: ', ' सूर्यस्यापि भवेत्सूर्य: अग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः ' ( वाल्मीकीय रामायणे २ / ४४।१५ ) इत्यादि-वचनेभ्यः । य एवंरूपः स षोडशी षोडशकलात्मकलिङ्गशरीरोपहितः सर्वव्यवहाराश्रयो भवति । स एव षोडशिग्रह-रूपेण स्तूयते । एवं तत्तत्कर्माङ्गरूपेणापि परमेश्वर एवं स्तूयते । अत्र मन्त्रे ब्रह्मण एव सर्वोत्कृष्टता सर्वजगत्प्र-काशकता सर्वरूपता सर्वव्यवहाराश्रयता लोकोत्तरगुणविशिष्टता यद्यपि प्रतिपाद्यते, तथापि तस्यैव सर्ववेदतात्पर्यविषयताबोधकः कश्चिदपि शब्द इह नास्त्येव । माण्डूक्योपनिषदत्र प्रमाणत्वेनोपस्थापिता- ' ओमित्येत दक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम् ' इति । एतदर्थोऽपि तत्रैवोक्तः- ॐ इत्येतद्यस्य नामास्ति तदक्षरम्, यत्र क्षीयते कदाचित् यच्चराचरं जगदश्नुते व्याप्नोति, तद्ब्रह्मैवास्तीति विज्ञेयम् । अस्यैव सर्वेर्वेदादिभिः शास्त्रेः सकलेन जगता योपगतं व्याख्यानं मुख्यतया क्रियते ' ( पृ ० ५१ ) इति, तदपि न संगतम्, ओमित्येतद्यस्य नामास्तीत्येतस्योदक्षरत्वात् । इह चोमित्यस्याक्षरस्वं प्रतिपाद्यते । यच्चराचरं जगदश्नुते, अस्यैव सर्वेर्वेदादिभिः शास्त्रैर्व्याख्यानं क्रियत इति व्याख्यानस्य कि मूलमित्यपि वक्तव्यम्, उत्तरग्रन्थासङ्गतं चैतत् । तत्र तु इदङ्कारास्पदस्य सर्वस्य ओमित्येतदक्षररूपत्वकथनेनाभि-ही अन्तर्गत है । इसी प्रकार प्रजा पद से सृष्टि का कथन होने से षोडश कलाओं की सृष्टि भी उक्त हो जाती है, पुनः उसका कथन निरर्थक हो जायगा । सूत्रकारों ने इस मन्त्र को षोडशी ग्रह के उपस्थापन में विनियुक्त किया है । जिस पुरुष से बढ़कर अन्य उत्कृष्ट देवादि नहीं पैदा हुए, जो सब प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से प्रविष्ट है, वह प्रजापति उत्पन्न प्राणि मात्र का पालक है, वह प्रजा के साथ रममाण है, अर्थात् प्रजापति परमेश्वर ही प्रजा रूप में प्रादुर्भूत होता है, यह सब कुछ ब्रह्म ही है ' यह श्रुति इसमें प्रमाण है । यह तीन ज्योतियों को, सभी विषयों के प्रकाशक अग्नि, वायु, आदित्य को अपने तेज से उज्जीवित करता है, इसमें ये युक्तियाँ प्रमाण हैं-' जिसके तेज से दीप्त होकर सूर्य तपता है ', ' यह प्राणों का प्राण है । ' वाल्मीकि रामायण में भी कहा गया है कि ' वह सूर्य का भी सूर्य है, अग्नि का अग्नि और प्रभु का भी प्रभु है । ' जिसका इस प्रकार का रूप रहता है, वह षोडश कलात्मक लिङ्ग शरीर से उपहित होकर सभी व्यवहारों का निर्वाहक होता है । इसी की षोडशी ग्रह के रूप में स्तुति की जाती है । इस प्रकार उस उस कर्म के अङ्ग रूप में भी परमेश्वर की ही स्तुति की जाती है । यहाँ पर ब्रह्म की सर्वोत्कृष्टता, सारे जगत् की प्रकाशकता, सर्वरूपता, सब व्यवहारों की आश्रयता और लोकोत्तर गुणों से विशिष्टता बताई गई है, तो भी ब्रह्म को ही सभी वेदों की तात्पर्यविषयता का प्रतिपादक कोई शब्द यहीं नहीं है । यहाँ पर माण्डूक्य उपनिषद् को प्रमाण के रूप में उपस्थापित किया है --- इस अक्षर का ही वेद आदि सकल शास्त्रों में व्याख्यान किया जाता है । इसका अर्थ वहाँ इस प्रकार दिया गया है --यह जिसका नाम है, वह अक्षर है । उसका कभी नाश नहीं होता । वही चराचर जगत् में व्याप्त है, वहीं ब्रह्म है । इसी का वेद आदि सकल शास्त्रों में व्याख्यान मुख्यतया किया जाता है । इससे परमेश्वर ही वेदों का मुख्य अर्थ है और उससे पृथक जो यह जगत् है, सो वेदों का गौण अर्थ है ( पृ ० ५२ ) | यह भी संगत नहीं है । ॐ ग्रह जिसका नाम है, इस अर्थ को ar क्त करने वाली कोई शब्दावली यहीं नहीं है । यहाँ पर ॐ की अक्षरता का प्रतिपादन है । जो चराचर जगत् की व्याप्त करता है और इसी का वेदादि सब शास्त्रों से व्याख्यान किया जाता है, इस व्याख्या का क्या आधार है, यह भी बताना पड़ेगा | आगे के ग्रन्थ से इसकी कोई संगति भी नहीं है । वहाँ पर ' इदम् ' पद से बोषित होने वाले सभी पदार्थों की ' ॐ ' इस पद में alreat मानने से अभिधान और अभिधेय

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५५६ aar र्थपारिजातः धानाभिधेययोरभेद एव विवक्षितः । अस्याक्षरस्येदं सर्वं व्याख्यानम् | ब्रह्मप्रतिपत्त्युपायतया ब्रह्मसमीपतया विस्पष्टं व्याख्यानम् । किं तत्सर्वं यस्येदमा निर्देश इत्याकाङ्क्षायां तदेवाह --भूतं भव्यं भविष्यदिति, इत्येतत्सर्वं तस्योपव्याख्यानं प्रस्तुतं बोध्यमिति शेषः । ननु तथापि ॐ पदार्थभूतः परमात्मा कथं नात्र गृह्यते? तस्यैवाक्षरत्वं चराचरव्यापकत्व-मुपासनं च कुतो नाभ्युपेयत इति चेन्न, सर्वमोङ्कार एवेति प्रतिपादनात् । यदि ह्यत्र ओमितिपदेन परमात्मरूपोऽर्थो जिवृक्षितः स्यात् तदा ओमिति पदात् कारप्रत्ययो न स्यात्, वर्णादेव कारप्रत्ययस्य व्याकरणे विधानात् । ततो निरर्थकमशुद्धमसङ्गतं प्रकृतानुपयोग्येव माण्डूक्यवचनोद्धरणम् । अतोऽयं प्रधानविषयोऽस्तीति तदुपसंहारोऽपि पूर्वोक्त-श्रुत्यननुरूप एव जरद्गवः ' कम्बलपादुकाभ्यां द्वारि स्थितो गायति भद्रकाणि ' इति वाक्यमनुहरति । यदपि ' नैव प्रधानस्याप्रधानस्य ग्रहणं भवितुमर्हति ' ( पृ ० ५१ ) इति वाक्यम्, अत्र ' अ ' इत्यस्य कथं सम्बन्धः? कि पूर्वकालावच्छेदेन नाप्रधाने कार्यसम्प्रत्यय इत्यर्थः? उत प्रधानसम्मुखीनेऽप्रधाने न कार्यसम्प्रत्यय इत्यर्थः? अथवा ' वाच्यतां समयोऽतीतः स्पष्टमये भविष्यति ' इतिवत् प्रधानस्य परकालावच्छेदेन नाप्रधाने कार्यसम्प्र त्यय इत्यर्थः? नाद्यः पूर्वकालावच्छेदेनाप्रधाने कार्य सम्प्रत्ययाभावेऽपि यौगपद्येन तत्प्रसक्त: । तत्सत्त्वे च वेदानामीश्वर एव तात्पर्यमिति त्वदभीष्टासिद्धेः । न द्वितीयोऽपि सम्मुखीनेऽप्रधाने कार्यं सम्प्रत्ययाभावेऽपि साम्यस्थितावप्रधाने तदापत्तेः 1 । नास्त्योऽपि प्रधानस्य परकालावच्छेदेनाप्रवाने कार्यसम्प्रत्ययाभावेऽपि प्रधानस्य पूर्व कालावच्छेदेनाप्रधाने कार्यसम्प्रत्ययापत्तेः । तथा च शिरस्येव कुठारापातः । तथाग्रेपदमनभिज्ञतापादकमेव वक्तुः । प्रधानाप्रधानयोः प्रधाने कार्यसम्प्रत्यय इति व्याकरणमहाभाष्यप्रामाण्यादिति ( पृ ० ५१ ) साधक हेतु + त्वेनोपन्यासोऽपि वृथैव । यतो नैतन्महाभाष्यीयं वचनम्, किन्तु परिभाषैषा । यच्च ' सर्वेषां वेदानामीश्वरे मुख्येऽर्थे में अभेदता हो विवक्षित है । इस अक्षर का यह सब व्याख्यान है, अर्थात् इससे ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय होने से, ब्रह्म के समीप होने से यह उसकी स्पष्ट व्याख्या है | यहाँ पर वह सब क्या है, जिसका कि ' इदम् ' पद से निर्देश हुआ है? इस प्रश्न के उत्तर में बताया गया है कि भूत, भव्य और भविष्यत् यह सब उसके व्याख्यान के रूप में ही प्रस्तुत जानने चाहिये । तब यहाँ पर ॐ पद का अर्थ परमात्मा क्यों नहीं गृहीत होता, उसी की अक्षरता, चराचर व्यापकता और उपासना यहाँ विदित है, ऐसा क्यों नहीं माना जाता? इसी लिये यह सब ॐकार ही है । यदि यहाँ पर ॐ पद से परमात्मा रूप अर्थ विवक्षित होता तो इस पद से कार प्रत्यय न होता । व्याकरण वर्ण से ही कार प्रत्यय का विधान है । इस प्रकार यह माण्डुक्य उपनिषद् का उद्धरण यहाँ पर निरर्थक, अशुद्ध, असंगत और प्रकृत विषय के प्रतिपादन में अनुपयोगी भी हैं । यतः यह प्रधान विषयक है, अतः उसका उपसंहार भी पूर्वोक्त श्रुति के अनुरूप ही है । यह कथन ' जरद्रव कम्बल की पादुका पहन कर मंगल गाता है ' इस वाक्य के समान प्रलाप मात्र कहलावेगा | आगे ' प्रधान के आगे प्रधान का ग्रहण नहीं होता ' यहाँ पर अग्र शब्द का संबन्ध कैसे होगा? पूर्वकालावच्छेदेन अप्रधान में कार्य नहीं होगा, यह इसका अर्थ है या प्रधान के संमुख अप्रधान में कार्य नहीं होता, यह है? बचवा ' बांची, ara समय बीत गया, आगे स्पष्ट होगा ' इत्यादि वाक्यों के समान प्रधान के परकालावच्छेदेन उपस्थित अप्रधान में कार्य नहीं होगा? यहाँ पर पहला पक्ष इसलिये नहीं बनेगा कि पूर्वकाल में अप्रधान में कार्य न होने पर भी एक साथ कार्य हो ही सकता है और ऐसा होने पर वेदों का तात्पर्य ईश्वर में ही है, यह आपका मत सिद्ध नहीं होगा । द्वितीय पक्ष भी इसलिये नहीं बनेगा कि संमुख स्थित अप्रधान में कार्य न होने पर भी साम्यस्थिति में अप्रधान में कार्य हो हो सकेगा । अन्तिम पक्ष भी नहीं बनेगा कि प्रधान के परकालावच्छेदेन प्रधान में कार्य न होने पर भी प्रधान के पूर्वकालावच्छेदेन अप्रधान में कार्य हो ही जायगा । इस प्रकार अपने हाथ से अपना ही शिर फोड़ना हुआ । तथा यहाँ पर ' अ ' पद वक्ता की अनभिज्ञता का हो सूचक हैं । ' प्रधान और अप्रधान के एक साथ उपस्थित होने पर प्रधान में ही कार्य होता है ' यह महाभाष्य का प्रमाण है । ' इस arte को अभीष्ट साधक हेतु के रूप में उपस्थित करना भी व्यर्थ है, क्योंकि यह महाभाष्य का वचन न होकर परिभाषा है । ' सभी

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दार्थ पारिजातः ५५७ मुख्यतात्पर्य मस्ति ' ( पृ ० ५१ ) इति, तदपि न सम्यक् द्वयोर्मुख्ययोः प्रयोजनानिरूपणात् । यदा गौणः कश्चनेश्वरे कार्यसम्प्रत्ययः स्यात्, तदैतद्व्यावृत्त्या तत्सार्थक्यसम्भवः । एकस्मिन्नेव मुख्यममुख्यं च तात्पर्यं भवतीत्यत्र प्रमाणादर्श -नात् । यदपि -- ' तदुपदेशपुरस्सरेण त्रयाणां कर्मोपासनाज्ञानकाण्डानां पारमार्थिकव्यावहारिक फलसिद्धये यथायोग्यो पकाराय चातुष्ठानं सर्वैर्मनुष्यैर्यथावत्कर्तव्यम् ' इत्युपसंहारवचनम्, तदप्यसङ्गतम्, वचनस्य मिथोऽनश्वितत्वात् त्वदिष्टार्थानभिधायित्वात् । तथाहि ' तदुपदेशपुरस्सरेण ' इति कस्य विशेषणम्? न कर्तुः, न कर्मणः, न प्रयोजनस्य, न वा क्रियाया विशेषणं सम्भवति, आद्यत्रयाणां भिन्नविभक्तिकत्वेन सम्बन्धाभावात् । क्रियाविशेषणत्वे तु नपुंसकैकवचनत्वापातात् । असम्बन्धे च न वाक्येऽर्थवत्ता । कर्मोपासनाज्ञानकाण्डानां सर्वैर्मनुष्यैः कर्तव्यमित्यपि न युक्तम्, प्रकरणरूपाणां काण्डानामनुष्ठानासम्भवात् । अनुष्ठानक्रियायाः काण्डाविषयत्वात् । यदपि - ' अनुष्ठानस्य पारमार्थिकव्यावहारिकफलसिद्धि:, यथायोग्योपकारश्च प्रयोजनं दर्शितम् ' इति, तदपि न क्षोदक्षमम्, तादशफलसिद्धि-व्यतिरिक्तस्य यथायोग्योपकारस्यानिरूपणात् । सर्वथापि निर्मूलमेवेदं वचनम् । ' वेदस्य द्वितीय विषयः कर्मकाण्डाख्यः सर्वः क्रियामयोऽस्ति । नैतेन विना विद्याभ्यासज्ञाने पूर्णे भवतः । ' ( पृ ० ५३ ) अत्र वाक्ये कर्मकाण्डस्य महत्त्वबोधने नैतेन विना विद्याभ्यासज्ञाने पूर्णे भवत इत्यंशस्य हेतुत्वमुक्तम्, तदपि न युक्तम्, यतो ययोविद्याभ्यासज्ञानयोः कर्मकाण्डमन्तरा पूर्विनं सम्भवति, तयोः स्वरूपानिरूपणमेव । तथाहि --- विद्यापदेन ज्ञानमुच्यत उपासनं वा? नाद्यः, तथात्वे ज्ञानपदस्य नैरर्थक्यापातः । नान्त्यः, अग्निहोत्रमा रम्याश्वमेधान्तकर्मकाण्डस्य स्वया वायुवृष्टिजलशुद्धा उपयोगवर्णनात् । कर्मकाण्डेन ययोः पूर्तिः, तयोः किं प्रयोजनमित्यपि नोक्तम् । किन्च, कर्मकाण्डेन विद्याभ्यासज्ञानयोः पूर्णत्वसिद्धये यदिदं बाह्यमानसव्यवहारयोर्बाह्याभ्यन्तरे युक्तत्वादिति वाक्यं हेतुत्वेनोपन्यस्तं तत्र वेदों का मुख्य अर्थ ईश्वर में मुख्य तात्पर्य है ' यह कथन भी ठीक नहीं है । यहाँ पर दो मुख्य शब्दों का क्या प्रयोजन है? यह बताया नहीं गया है । यदि ईश्वर में कोई गौण कार्य माना जाय तो उस अवस्था में उसकी व्यावृत्ति के लिये इसकी सार्थकता होती । एक ही सें मुख्य और अमुख्य दोनों तात्पर्य रहते हैं, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसके आगे ' उस परमेश्वर के उपदेश रूप वेदों के कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों काण्डों का इस लोक और पर लोक के व्यवहारों के फलों की सिद्धि और यथावत् उपकार करने के लिये सब मनुष्य इन चार विषयों के अनुष्ठानों में पुरुषार्थं करें ( पू ० ५३ ) इस प्रकार का उपसंहार वचन भी सर्वथा असंगत है, क्योंकि इनका परस्पर कोई अन्वय नहीं है और ये आपके अभीष्ट अर्थ को भी प्रकट नहीं करते | यहाँ पर ' तदुपदेशपुरस्सरेण ' यह किसका विशेषण है? यह कर्ता, कर्म, प्रयोजन अथवा क्रिया का विशेषण नहीं हो सकता, क्योंकि इनमें से तीन का विभक्ति के भेद के कारण सम्बन्ध नहीं बनेगा | क्रियाविशेषण मानने पर नपुंसक लिंग और एक वचन होना चाहिये । सम्बन्ध न होने पर वाक्य में अर्थवत्ता नहीं होगी । कर्म, उपासना और ज्ञानकाण्ड सबके कर्तव्य है, यह भी ठीक नहीं, क्योंकि प्रकरणरूप काण्डों का अनुष्ठान कैसे होगा? काण्ड अनुष्ठान का विषय नहीं हो सकता । अनुष्ठान का प्रयोजन पारमार्थिक और व्यावहारिक फल की सिद्धि तथा यथायोग्य उपकारकता बताया गया है, यह भी ठीक नहीं हैं, क्योंकि इस प्रकार की फलसिद्धि के अतिरिक्त यथायोग्य उपकारता का निरूपण न होने से यह कथन सर्वथा निर्मूल है । ' उनमें से दूसरा कर्मकाण्ड विषय है, सो सब क्रियाप्रधान ही होता है । जिसके बिना विद्याभ्यास और ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकते ' ( पृ ० ५३ ) इस वाक्य में कर्मकाण्ड का महत्त्व बताया गया है । यहाँ पर ' इसके बिना विद्याभ्यास और ज्ञान पूर्ण नहीं होते ' इस अंश की हेतुता प्रतिपादित है । यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि जिस विद्याभ्यास और ज्ञान को कर्मकाण्ड के बिना पूर्ति संभव नहीं है, उनका स्वरूप यहाँ नहीं बताया गया है । जैसे कि विद्यापद से यहाँ पर ज्ञान उक्त है, या उपासना? पहले पक्ष में ज्ञान पद निरर्थक हो जायगा । द्वितीय पक्ष में यह दोष होगा कि आपने तो अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त पूरे कर्मकाण्ड का वायु, वृष्टि, जलशुद्धि आदि ही प्रयोजन माना है । कर्मकाण्ड से जिनकी पूर्ति होगी, उनका क्या प्रयोजन है? यह भी आपने नहीं बताया । अपि च, कर्म atus से विद्याभ्यास और ज्ञान की पूर्णता की सिद्धि के लिये, चूंकि मन का योग बाहर की क्रिया और भीतर के व्यवहार में सदा रहता है,

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वेदार्थ पारिजातः ** मुख्यतात्पर्य मस्ति ' ( पृ ० ५१ ) इति, तदपि न सम्यक्, द्वयोर्मुख्ययोः प्रयोजनानिरूपणात् । यदा गौणः कश्चनेश्वरे कार्यसम्प्रत्ययः स्यात्, तदेतद्वयावृत्त्या तत्सार्थक्यसम्भवः । एकस्मिन्नेव मुख्यममुख्यं च तात्पर्यं भवतीत्यत्र प्रमाणादर्श-नात् । यदपि -- ' तदुपदेशपुरस्सरेण त्रयाणां कर्मोपासनाज्ञानकाण्डानां पारमार्थिकव्यावहारिक फलसिद्धये यथायोग्यो-पकाराय चानुष्ठानं सर्वैर्मनुष्यैर्यथावत्कर्तव्यम् ' इत्युपसंहारवचनम्, तदप्यसङ्गतम्, वचनस्य मिथोऽनन्वितत्वात् त्वदिष्टार्थानभिधायित्वात् । तथाहि ' तदुपदेशपुरस्सरेण ' इति कस्य विशेषणम्? न कर्तुः, न कर्मणः, न प्रयोजनस्य, नवा क्रियाया विशेषणं सम्भवति, आद्यत्रयाणां भिन्नविभक्तिकत्वेन सम्बन्धाभावात् । क्रियाविशेषणत्वे तु नपुंसकैकवचनत्वापातात् । असम्बन्धे च न वाक्येऽर्थवत्ता । कर्मोपासनाज्ञानकाण्डानां सर्वैर्मनुष्येः कर्तव्यमित्यपि न युक्तम्, प्रकरणरूपाणां काण्डानामनुष्ठानासम्भवात् । अनुष्ठानक्रियायाः काण्डाविषयत्वात् । यदपि ' अनुष्ठानस्य पारमार्थिकव्यावहारिकफलसिद्धिः यथायोग्योपकार प्रयोजनं दर्शितम् ' इति, तदपि न क्षोदक्षमम्, तादशफल सिद्धि-व्यतिरिक्तस्य यथायोग्योपकारस्यानिरूपणात् । सर्वथापि निर्मूलमेवेदं वचनम् । ' वेदस्य द्वितीय विषयः कर्मकाण्डाख्यः सर्वः क्रियामयोऽस्ति । नैतेन विना विद्याभ्यासज्ञाने पूर्णे भवतः । ' ( पृ ० ५३ ) अत्र वाक्ये कर्मकाण्डस्य महत्त्वबोधने नैतेन विना विद्याभ्यासज्ञाने पूर्णे भवत इत्यंशस्य हेतुत्वमुक्तम्, तदपि न युक्तम्, यतो ययोविद्याभ्यासज्ञानयोः कर्मकाण्डमन्तरा पूर्ति सम्भवति, तयोः स्वरूपानिरूपणमेव । तथाहि -- विद्यापदेन ज्ञानमुच्यत उपासनं वा? नाद्यः, तथात्वे ज्ञानपदस्य नैरर्थक्यापातः । नान्त्यः, अग्निहोत्रमा रम्याश्वमेधान्तकर्मकाण्डस्य स्वया वायुवृष्टिजलशुद्धा उपयोगवर्णनात् । कर्मकाण्डेन ययोः पूतिः, तयोः किं प्रयोजनमित्यपि नोक्तम् । किञ्च कर्मकाण्डेन विद्याभ्यासज्ञानयोः पूर्णत्वसिद्धये यदिदं बाह्यमानसव्यवहारयोर्बाह्याभ्यन्तरे युक्तत्वादिति वाक्यं हेतुत्वेनोपन्यस्तं तत्र aar का मुख्य अर्थ ईश्वर में मुख्य तात्पर्य है ' यह कथन भी ठीक नहीं है । यहाँ पर दो मुख्य शब्दों का क्या प्रयोजन है? यह बताया नहीं गया है । यदि ईश्वर में कोई गौण कार्य माना जाय तो उस अवस्था में उसकी व्यावृत्ति के लिये इसकी सार्थकता होती । एक ही सें मुख्य और अमुख्य दोनों तात्पर्य रहते हैं, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसके आगे ' उस परमेश्वर के उपदेश रूप वेदों के कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों काण्डों का इस लोक और पर लोक के व्यवहारों के फलों की सिद्धि और यथावत् उपकार करने के लिये ee मनुष्य इन चार विषयों के अनुष्ठानों में पुरुषार्थ करें ' ( पृ ० ५३ ) इस प्रकार का उपसंहार वचन भी सर्वथा असंगत है, क्योंकि इनका परस्पर कोई अन्वय नहीं है और ये आपके अभीष्ट अर्थ को भी प्रकट नहीं करते । यहाँ पर ' तदुपदेशपुरस्सरेण ' यह किसका विशेषण है? यह कर्ता, कर्म, प्रयोजन अथवा क्रिया का विशेषण नहीं हो सकता, क्योंकि इनमें से तीन का विभक्ति के भेद के कारण सम्बन्ध नहीं बनेगा | क्रियाविशेषण मानने पर नपुंसक लिंग और एक वचन होना चाहिये । सम्बन्ध न होने पर वाक्य में अर्थवत्ता नहीं होगी । कर्म, उपासना और ज्ञानकाण्ड सबके कर्तव्य हैं, यह भी ठीक नहीं, क्योंकि प्रकरणरूप काण्डों का अनुष्ठान कैसे होगा? काण्ड अनुष्ठान का विषय नहीं हो सकता । अनुष्ठान का प्रयोजन पारमार्थिक और व्यावहारिक फल की सिद्धि तथा यथायोग्य उपकारकता बताया गया है, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार की फलसिद्धि के अतिरिक्त यथायोग्य उपकारता का निरूपण न होने से यह कथन सर्वथा निर्मूल है । ' उनमें से दूसरा कर्मकाण्ड विषय है, सो सब क्रियाप्रधान ही होता है । जिसके बिना विद्याभ्यास और ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकते ' ( पृ ० ५३ ) इस वाक्य में कर्मकाण्ड का महत्व बताया गया है । यहाँ पर ' इसके बिना विद्याभ्यास और ज्ञान पूर्ण नहीं होते ' इस अंश की हेतुता प्रतिपादित हैं । यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि जिस विद्याभ्यास और ज्ञान की कर्मकाण्ड के बिना पूर्ति संभव नहीं है, उनका स्वरूप यहाँ नहीं बताया गया है । जैसे कि विद्यापद से यहाँ पर ज्ञान उक्त है, या उपासना? पहले पक्ष में ज्ञान पद निरर्थक हो जायगा । द्वितीय पक्ष में यह दोष होगा कि आपने तो अग्निहोत्र से लेकर अवमेष पर्यन्त पूरे कर्मकाण्ड का वायु, वृष्टि, जलशुद्धि आदि ही प्रयोजन माना है । कर्मकाण्ड से जिनकी पूर्ति होगी, उनका क्या प्रयोजन हैं? यह भी आपने नहीं बताया । अपि च, कर्मकाण्ड से विद्याभ्यास और ज्ञान की पूर्णता की सिद्धि के लिये, चूंकि मन का योग बाहर की क्रिया और भीतर के व्यवहार में सदा रहता है;

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५५६ मोक्षसाधनत्वेऽपि स्तुतिप्रार्थनोपासनाज्ञापालन धर्मानुष्ठानज्ञानंरित्येव शुद्धम्, न स्तुतिप्रार्थनादिज्ञानेनेति । ज्ञानेनेति तृतीयाया अपि व्यापार एवार्थो वक्तव्यः । तथात्वे भेदेनेश्वरज्ञानं व्यापारीकृत्य मोक्ष: साध्यत इत्यायातम् । तेन भेदस्यैव व्यापारवदसाधारणकारणत्वात् करणत्वमप्यायातम् । तदपि विरुद्धम्, तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था: ', ' ऋते ज्ञानान्न मुक्ति: ' इत्यादिज्ञानकरणत्वबोधकश्रुतिवचनविरोधात् । यच्च - ' द्वितीयभेदं दर्शयति, अपरो लोकव्यवहारसिद्धये यो धर्मेणार्थकामौ निर्वर्तयितुं संयोज्यते ' ( पृ ० ५३ ) इति, तदप्यसङ्गतमेव, धर्मार्थकामैरेव लोकव्यवहारसिद्धिसम्भवेनार्थकामाभ्यां तदसिद्धेः । अत्रापरो धर्मभेदो यो लोकव्यवहारसिद्धये धर्मेणार्थकामी निर्वर्तयितुं संयोज्यते, तस्मात् साधनभूतो तृतीयानिर्दिष्टो धर्मो भिन्नोऽभिन्नो वा? भिन्नश्चेत् को भेदस्तयोः? स्वरूपं लक्षणं च तयोः पृथक् पृथग् वक्तव्यम्, अभिन्नश्चेत् कथमभिन्नस्यैव कर्तृत्वं साधनत्वं च? किव स ईश्वरस्तुत्यादिलक्षण एव वा ततो भिन्नोऽग्निहोत्राद्यश्वमेधान्तरूपो वा? नान्त्यः, तस्य वायु- वृष्टि जलादिशुद्धिकरणार्थत्वोक्तिविरोधात् । नाद्यः ईश्वरस्तुत्यादिभिर्लोकव्यवहारसिद्धिफलकार्थकामा-सिद्धेः । यदि स्तुत्यादिजन्येनादृष्टेनार्थकामावपि निर्वर्त्यते, तहि अग्निहोत्रादिजन्येनाप्यदृष्टेन कथं न तत्सिद्धि:? नहि स्तुत्यादिभिरेवादृष्टसिद्धिः नाग्निहोत्रादिभिरित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । न च धर्मेणैवार्थकामसिद्धिः, अभिचारादिभि-रपि तत्सम्भवात् । न च तस्यापि धर्मत्वम्, तस्यानर्थरूपेण धर्मत्वासम्भवात् । यदपि -- स यदा परमेश्वरप्राप्तिमेव फलमुद्दिश्य क्रियते तदायं श्रेष्ठफलमापन्नो निष्कामसंज्ञां लभते ' ( पृ ० ५३ ) इति, तदपि न विचारसहम्, विकल्पासहत्वात् । तथाहि-- आत्मपरमात्मप्राप्तिः संयोगः परमात्मज्ञानं वा? नाद्यः परमात्मनो विभुत्वेन नित्यत्वेन चोभयोः संयोगस्यापि सनातनत्वात् फलत्वानुपपत्तेः । फलत्वं कार्यत्वमेव । स्वीकृत सिद्धान्त से विरोध होगा | परम्परया किसी प्रकार इनकी मोक्षसाधनता मानने पर भी ' स्तुति ज्ञानेः ' यह शुद्ध पाठ होगा । ' स्तुतिप्रार्थनादिज्ञानेन ' यह पाठ ठीक नहीं है । ' ज्ञानेन ' इस तृतीया का भी व्यापार ही अर्थ करना पड़ेगा । ऐसा मानने पर भिन्न रूप से ईश्वर के ज्ञान को व्यापत कर मोक्ष सिद्ध किया जाता है, यह अर्थ होगा । इस तरह से भेद के ही व्यापार युक्त असाधारण कारण होने से करणता बनेगी । यह भी विरुद्ध हैं, क्योंकि ' उसी को जानकर मृत्यु को जीतता है ', ' बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं होती ' इत्यादि ज्ञान को मोक्ष के प्रति करण मानने वाली श्रुतियों से इसका विरोध है । कर्म के द्वितीय भेद को बतलाते हुए कहा गया है कि ' दूसरा वह है, जिससे कि लोक व्यवहार की सिद्धि के लिये धर्म के द्वारा अर्थ और काम की निष्पत्ति में संयोजन होता है ' । यह भी असंगत बात है, लोक व्यवहार की सिद्धि धर्म, अर्थ और काम से होती है, केवल अर्थ और काम से नहीं । यहाँ पर जो दूसरा धर्मभेद लोकव्यवहार की सिद्धि के लिये धर्म से अर्थ और काम की निष्पत्ति के लिये संयोजित किया जाता है, उससे साधनभूत तृतीया विभक्ति से निर्दिष्ट धर्म भिन्न है, या अभिन्न? यदि भिन्न हैं तो यह भेद क्या है? इसका स्वरूप और लक्षण पृथक् - पृथक् बताइये | यदि अभित है तो कैसे एक में ही कर्तृता और साधनता बनेगी? आप यह भी बताइये कि वह धर्म ईश्वर स्तुति आदि लक्षण वाला ही होगा अथवा अग्निहोत्रादि अश्वमेधान्त कर्मसमूह होगा? अन्तिम पक्ष इसलिये ठीक नहीं हैं कि उसको तो आपने वायु, वृष्टि, जलादि शुद्धि का साधन माना है । पहला पक्ष भी इसलिये नहीं बनेगा कि ईश्वर स्तुति आदि से लोक व्यवहार की सिद्धि करने वाले अर्थ और काम की सिद्धि नहीं होगी । यदि स्तुति आदि से जन्य अदृष्ट से अर्थ और काम की सिद्धि हो सकती है, तो अग्निहोत्रादि जन्य अदृष्ट से उसकी सिद्धि क्यों नहीं होगी? स्तुति आदि से ही अदृष्ट की सिद्धि होगी, aftaar से नहीं, इसमें कोई प्रमाण तो है नहीं । धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि नहीं होती, क्योंकि अभिचार आदि कर्मों से भी तो वह सम्भव है | अभिचार आदि कर्म कभी धर्म नहीं हो सकते हैं, क्योंकि ये तो अनर्थ रूप हैं । ' यह कर्म जब परमेश्वर की प्राप्तिरूप फल के उद्देश्य से किया जाता है, तो श्रेष्ठ फल की आकांक्षा के कारण निष्काम कर्म की संज्ञा को प्राप्त करता है ' यह बात भी ठीक नहीं है । आप यह बताइये कि आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति संयोग है या परमात्मा का ज्ञान? परमात्मा के विभु और नित्य होने से इनके संयोग के भी सनातन होने से नया संयोग नहीं बनेगा, अतः उससे कोई नया फल भी पैदा नहीं होगा, इस प्रकार संयोग रूप विकल्प यहाँ नहीं बनता । फल तो कार्य है वह नित्य कैसे हो सकता है ।

पृष्ठ 590

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 590 का मूल पृष्ठ
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५६० darduritaras नित्यत्वं फलत्वं चेति व्याहतमेव । नान्त्यः, ' तमेव विदित्वा ' इति श्रुत्या ज्ञानस्य साधनत्वप्रतिपादनविरोधात् । नहि साधनमेव फलं भवति, एकत्र साधन - फल - भावानुपपत्तेः । फलोद्देशेन क्रियमाणस्य कर्मणः कथं निष्कामत्वम्? यच्च तत्र -- ' अस्य खल्वनन्तसुखेन योगात् ' ( पृ ० ५३ ) इति हेतुरुक्तः, सोऽपि त्वद्विरुद्ध एव । अनन्त-सुखयोगत्वे मुक्त रनावृरया तवैवापसिद्धान्तापातः परमतप्रवेशश्च स्याताम् । नहि मुक्तेरावृत्तामभ्युपगम्यमानायां मुक्तिसुखस्यानन्त्यसम्भवः । यच्च -- स चाग्निहोत्रमारम्याश्वमेधपर्यन्तेषु यज्ञेषु सुगन्धिमिष्टपुष्टरोगनाशक गुणैर्युक्तस्य सम्यक् संस्कारेण शोधितस्य द्रव्यस्य होमः क्रियते । स तद्द्वारा सर्वजगत्सुखकार्येव भवति ' इति, तदप्यविचाररमणीयमेव । किमत्र स चेत्यपरः कर्मभेद: परामृष्टः? ओमिति चेत्, कथं तस्य केनान्वयः? अग्निहोत्रादियज्ञेषु भवदुक्तं गुणस्य द्रव्यस्य होमो वाय्वादिशुद्धयर्थमेव क्रियते चेत्, विधिवाक्योक्त - स्वर्ग - स्वाराज्य - पारमेष्ठ्य- पशु - ग्राम - वृष्टि- पुत्रादिफलानां का गतिः? किंव, वाय्वादिशुद्धिः शास्त्रोक्ता प्रत्यक्षसिद्धा वा? नाद्यः तादृक्शास्त्राभावात् । नान्त्यः, तथात्वे वैदिकत्वापातात् । यं च भोजनाच्छादनमानकलाकौशलयन्त्रसामाजिक नियमप्रयोजनसिद्धयर्थं विधत्ते, सोऽधिकतया स्वसुखायैव भवति ' ( पृ ० ५३ ) इत्यस्मिन् वाक्य कदम्बे यमित्यनेन सर्वनाम्ना किं परामृश्यते? न लौकिको व्यापारः, तस्याप्रकृतत्वात्, वैदिककर्मकाण्डप्रसङ्गेऽप्रसक्तत्वाच्च । नापि वैदिकव्यापारः, तद्बोधकवैदिकवाक्याभावात् । सत्त्वे वा तस्य लोकसिद्धज्ञापकत्वेनाज्ञातज्ञापकत्वाभावेनाप्रामाण्यापत्तेश्च । वस्तुतस्तु चार्वाकोच्छिष्टमेवेदं सर्वं दयानन्दीयं मतम् । दूसरा पक्ष भी नहीं बनता, ' तमेव विदित्वा ' इस श्रुति से ज्ञान की साघनता प्रतिपादित है । साधन फल कैसे हो सकता है? एक ही वस्तु साधन और फल दोनों नहीं हो सकती । किसी फल को उद्दिष्ट कर किया गया कर्म निष्काम कैसे कहा जा सकता है? वहीं पर ' उसका अनन्त सुख से योग होने से ' यह हेतु दिया गया है, वह भी आपके मत से विरुद्ध अर्थ को ही सिद्ध करता है | अनन्त सुख से योग होने पर मुक्ति की आवृत्ति न हो पाने से आपका सिद्धान्त खण्डित हो जायगा और आप दूसरे के मत को मानने लगेंगे । मुक्ति की आवृत्ति मानने पर मुक्ति सुख का आनन्त्य संभव नहीं । ' अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त जो कर्मकाण्ड है, उसमें चार प्रकार के द्रव्यों का होम करना होता है — एक सुगन्ध गुणयुक्त, जो कस्तूरी, केशर आदि है । दूसरा मिष्टगुण युक्त जो कि गुड़, शहद क्षादि कहाते हैं । तीसरा पुष्टिकारक गुणयुक्त - जो घृत, दूध, अन्न आदि है । चौथा रोगनाशक गुणयुक्त जो कि सोमलता आदि औषधि के रूप में हैं । इन चारों का परस्पर शोधन, संस्कार करके और यथायोग्य मिलाकर अग्नि में युक्तिपूर्वक जो होम किया जाता है, वह वायु और वृष्टि जल की शुद्धि करने वाला होता है । इससे सब जगत् को सुख होता है ' ( पृ ० ५४ ), यह सब भी अविचार रमणीय है । क्या यहाँ पर दूसरा कर्मभेद अभीष्ट हैं? यदि हाँ, तो उसका किसके साथ कैसे सम्बन्ध होता? अग्निहोत्र आदि यज्ञों में आपके कहे गये गुण वाले द्रव्यों के होम से वायु आदि की शुद्धि ही फल रूप में अभीष्ट है, तो फिर विधि वाक्यों में बताये गये स्वर्ग, स्वाराज्य, पारमेध्य, पशु, ग्राम, वृष्टि, पुत्र आदि फलों की क्या गति होगी? आप यह भी बताइये कि वायु आदि की शुद्धि शास्त्रोक्त है या प्रत्यक्ष से सिद्ध? यह शास्त्रोक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रकार का कोई शास्त्रवचन उपलब्ध नहीं है । प्रत्यक्ष सिद्ध भी यह नहीं हो सकती, क्योंकि तब वह वेद प्रतिपादित नहीं रहेगी । ' और जिसको भोजन, छादन, विमान आदि यान, कलाकुशलता, यन्त्र और सामाजिक नियम होने के लिये करते हैं, वह afrain से कर्ता को ही सुख देने वाला होता है ' ( पृ ० ५४ ) इस वाक्यसमूह में भी ' यम् ' इस सर्वनाम से किसका परामर्श होता है? लौकिक व्यापार का नहीं हो सकता, क्योंकि वह अप्रकृत हैं और उसका वैदिक कर्मकाण्ड में कोई प्रसङ्ग भी नहीं है । वैदिक व्यापार भी नहीं होगा, क्योंकि उसको बताने वाले कोई वैदिक वाक्य नहीं है । यदि हैं तो उनके लोकसिद्ध वस्तु के ज्ञापक होने से अज्ञात के ज्ञापक न होने के कारण उनमें अप्रामाण्य की आपत्ति होगी । वस्तुतस्तु यह सब दयानन्द का मत चावक दर्शन का उच्छिष्ट सा प्रतीत होता है ।