वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 571–580

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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वेदार्थपारिजातः साक्षाद्बोधो ब्रह्मादितृणान्तान् सर्वान् पदार्थान् विषयोकरोति, प्रत्यक्षानुमानाविषयाणामतीन्द्रियाणामपि पदार्थानां सत्त्वात् । यदपि च-- तद्वयाख्यानरूपायां हिन्यां कर्मोपासनज्ञानेभ्यो यथावदुपयोगग्रहणमेव विज्ञानम्, परमेश्वरादि-तृणपर्यन्तपदार्थानां साक्षाद्बोधः तेभ्यश्च यथावदुपयोगः । ' विज्ञान उसको कहते हैं कि जो कर्म, उपासना और ज्ञान तीनों से यथावत् उपयोग लेना और परमेश्वर से ले के तृणपर्यन्त पदार्थों का साक्षात् बोध का होना । उनसे यथावत् उपयोग का करना ' ( पृ ० ४८ ) इति, तदप्यर्थशून्यं प्रमत्तप्रलपितमेव, विज्ञानशब्दस्य तथोक्तार्थत्वे प्रमाणाभावात् । तस्येति परामृष्टस्य विज्ञानस्य परमेश्वरादितॄणान्तेषु पदार्थेषु कथं साक्षाद्द्बोधाश्वयत्वम्? पदार्थेषु साक्षाद्बोधान्वयत्वे-s पि विज्ञानस्य केन कथं सम्बन्धः? हिन्दीव्याख्यानमपि तदर्थं न स्पृशत्येव । यदपि तु ' मर्यादायां पञ्चम्याश्रयणेन परमेश्वरातिरिक्ततृणपर्यन्तपदार्थज्ञानस्यैव विज्ञानत्वमुक्तम् ' इति, तदपि न विचारसहम्, तत्रापीश्वरानुभवो मुख्योऽस्वीति विरोधात् । न च ऋग्वेदे परमेश्वरमारभ्य तृणपर्यन्तसर्वपदार्थानां वर्णनं दृश्यते, तथात्वे न्याय - वैशेषिक - सांख्य योगायुर्वेदाधुनिकपदार्थानां विज्ञानविषयाणां गतार्थता स्यात् । आधुनिकास्तु प्रत्यक्षेण पदार्थाननुभूय तर्केण व्यवस्थाप्य प्रयोगेण परीक्षणमेव विज्ञानं मन्यन्ते । प्रत्यक्षायितं वा ज्ञानं विज्ञानं केचिन्मम्वते । तदेतदपि शिल्पज्ञानेऽन्तर्भवति । न चैतादृशमेकमपि विज्ञानमृग्वेदे प्रतिपादितं दृश्यते, न वा त्वया कश्चिदपि मन्त्रस्तादृशव्याख्यानोपेतो दर्शितः । यत्तु प्रमाणवचनान्युपस्थापितानि ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि च सर्वाणि यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ ', ' तस्य वाचकः प्रणवः ' ( यो. द. १1१७ ), ' ॐ खं ब्रह्म स्वनिरूपित ( स्व की ) विषयता का स्व में होना संभव ही नहीं, क्योंकि हेतुता शब्द भेदसापेक्ष है । साक्षात् बोध, ब्रह्मादि तृणान्त समस्त पदार्थों को विषय भी नहीं करता, क्योंकि ऐसे भी पदार्थ हैं, जो प्रत्यक्ष, अनुमानादि प्रमाणों के विषय नहीं हैं, अर्थात् अतीन्द्रिय हैं । अब जो उसकी हिन्दी व्याख्या में बताया है कि ' कर्म, उपासना और ज्ञान से यथावत् उपयोग ग्रहण करना ही विज्ञान है, अर्थात् परमेश्वरादि तृणपर्यन्त पदार्थों का साक्षाद्बोध और उनसे यथावत् उपयोग लेने का नाम ही विज्ञान है । ' विज्ञान उसको कहते हैं कि जो कर्म, उपासना और ज्ञान तीनों से यथावत् उपयोग लेना और परमेश्वर से लेकर तृणपर्यन्त पदार्थों का साक्षात् बोध का होना उनसे यथावत् उपयोग का करना । ' वह भी प्रमत्त के प्रलाप की तरह अर्थशून्य ही है । विज्ञान शब्द का जैसा अर्थ दयानन्द ने किया है, उसमें किसी प्रमाण का आधार नहीं है । ' तस्य ' शब्द से परासृष्ट किये गये विज्ञान का परमेश्वरादि तृणान्त पदार्थों में साक्षात् कैसे होगा? पदार्थों में साक्षात् बोधान्वय होने पर भी विज्ञान का किससे क्या सम्बन्ध होगा? किये गये अपने हिन्दी व्याख्यान से भी उस अर्थ का स्पर्श नहीं हो पा रहा है । जो यह कहा है कि ' मर्यादा के अर्थ में पंचमी करके परमेश्वरातिरिक्त तृणपर्यन्त पदार्थ का ज्ञान ही विज्ञान है । ' वह भी विचार करने पर असंगत ही प्रतीत हो रहा है । वहाँ भी ईश्वरानुभव मुख्य है इससे विरोध होगा । न ऋग्वेद में परमेश्वर से लेकर सृणतक के समस्त पदार्थों का वर्णन उपलब्ध होता है, यदि उपलब्ध कहा जाय तो न्याय - वैशेषिक, सांख्य योग, आयुर्वेद तथा विज्ञान के विषय जो आधुनिक पदार्थ हैं, उनको सबको गतार्थ कहना होगा । प्रत्यक्ष से पदार्थो का अनुभव कर और तर्क से उन्हें व्यवस्थित कर प्रयोग के द्वारा उनका परीक्षण करना ही विज्ञान है, ऐसा आधुनिक लोग कहते हैं । कुछ लोग प्रत्यक्ष की तरह प्रतीत होने वाले ज्ञान को विज्ञान कहते हैं । किन्तु इन लोगों का यह कथन भी शिल्पज्ञान में अन्तर्भूव हो जाता है । इस प्रकार का कोई एक भी विज्ञान ऋग्वेद में प्रतिपादित हुआ नहीं दिखाई दे रहा हैं और तुमने ही उस प्रकार के व्याख्यान से युक्त किसी मन्त्र को दिखाया है । प्रमाण रूप में जो वचन उपस्थित किये हैं, उनकी संगति अद्वैतवाद की रीति से यद्यपि हो सकती है, किन्तु दयानन्द की रीति से दयानन्द के कथन के साथ दयानन्द के द्वारा उपस्थापित वचनों की संगति नहीं बैठ रही है । यथाहि - ' सर्वे वेदा यत्पद-मामनन्ति तपांसि च सर्वाणि यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ ', ' तस्य वाचकः प्रणवः '

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पारिजातः ( १४/८/१ | १ ), ' ओमिति ब्रह्म ' ( ते. आ. ७१८ ) । एषामर्थः यत्परमं पदं मोक्षाख्यं परब्रह्मप्राप्तिलक्षणं सर्वानन्दमयं सर्वदुःखेतरदस्ति तदेवोङ्कारपदवाच्यमस्ति । तस्येश्वरस्य प्रणव ओङ्कारो वाचकोऽस्ति । वाच्यश्चेश्वर: | ओमिति परमेश्वरस्य नामास्ति । रादेव परं ब्रह्म । सर्वे वेदा वदन्ति आमनन्ति आसमन्तादम्यस्यन्ति मुख्यतया प्रतिपादयन्ति । तपांसि सत्यधर्मानुष्ठानानि तदभ्यासपराण्येव सन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य ( ब्रह्मचर्यग्रहणमुपलक्षणार्थम्, ब्रह्मचर्यगृहस्थ-वानप्रस्थसंन्यासाश्रमाचरणानि सर्वाणि तदेवामनन्ति ब्रह्मप्राप्त्यभ्यासपरागि सन्ति ) यद् ब्रह्मेच्छतो विद्वांसस्तस्मिन्न-ध्यासमाना वदन्त्युपदिशन्ति च हे नचिकेतः! अहं यमो यदीदृशं पदमस्ति तत्तं तुभ्यं संग्रहेण संक्षेपेण ब्रवीमि । अत्र मोक्षाख्यं पदमेवोङ्कारपदवाच्य मस्तीत्युक्तम्, ओङ्कारश्चेश्वरवाचका, तथा च मोक्षेश्वरयोरभेदोऽप्युक्तः । तदेव च ब्रह्म-पदं सर्वे वेदा आमनन्ति आभीक्ष्ण्येन प्रतिपादयन्ति । सर्वाणि च वर्मानुष्ठानानि ब्रह्मप्राप्त्यभ्यासपराणीति तन्निर्णयः । यद्यप्यद्वैतवादरीत्या तत्सङ्गच्छते, तथापि दयानन्दीयरीत्या तदपि तद्विरुद्धमेव, मोक्षस्य ब्रह्मज्ञानफलकत्वात् । नहि ब्रह्मैव ब्रह्मज्ञानफलम् ' तमेव विदित्वातिमृत्युमेति ' ( वा. सं. ३१।१८ ) इति विरोधात् । किञ्च, मोक्षः पुरुषार्थी धर्मार्थकामवत् प्राप्यः, ब्रह्मज्ञानं तत्साधनम्, ब्रह्म तु ज्ञेयम् । दयानन्दरीत्या मोक्षोऽप्यनित्य एव तेन मोक्षादावृत्तिस्वीकारात् । ब्रह्मण एव मोक्ष तस्य नित्यत्वान्नैव साध्यत्वं सम्भवति । न च ब्रह्मणो नित्यत्वेऽपि तज्ज्ञानस्य साध्यत्वमिति वाच्यम्, तज्ज्ञानस्यानित्यत्वेनेश्वरत्वानुपपत्त्या मोक्षेश्वरयोरैक्यानुपपत्तेः । किञ्च स्वर्गादिवत् स्वभिन्नस्यैव सतो ब्रह्मणो भोग्यत्वेन प्राप्तिरात्मत्वेन वा? नाद्यः, तथात्वे बहुभोग्यत्वेन क्षयिष्णुत्वापत्तेः । नास्त्यः, अपसिद्धान्ता-पातात् । वेदान्तिरीत्या तु -- ' निवृत्तिरात्मा मोहस्य ज्ञातत्वेनोपलक्षितः ' इत्युक्तिदिशा ज्ञातत्वोपलक्षितः प्रत्यगभिसः परेश एव मोक्षः । द्वैतविशिष्टाद्वैतादिवादरीत्या तु ब्रह्मोपासनया ब्रह्मसान्निध्यादिप्राप्त्या लोकोत्तरं दिव्यं सुखमेव मोक्षो न ब्रह्मरूप एव मोक्षः । तद्रीत्या सर्वे वेदा यत्पदं पदनीयं प्रापणीयं ब्रह्म तात्पर्येण बोधयन्ति । सर्वाणि च तपांसि ( यो ० ६० १।१७ ) ॐ खं ब्रह्म --- ( श ० ब्रा ० १४/८/१११ ), ॐ इति ब्रह्म ' ( तै ० आ ० ७१८ ) इनका अर्थ - जो परम पद ---मोक्षसंज्ञक, पर ब्रह्मप्राप्तिरूप, सर्वानन्दमय, समस्त दुःखों से भिन्न है, वहीं ॐ कार पद से वाव्य है, उस ईश्वर का वाचक प्रणव ॐ कार है और उसका वाच्य ईश्वर हैं । यह ॐ परमेश्वर का नाम है । समस्त वेद उसी परब्रह्म का मुख्य रूप से प्रतिपादन करते हैं, सत्यादि धर्मों के अनुष्ठान उसी के अभ्यास पर हैं । यदिच्छतो ब्रह्मचर्यं ( यहाँ ब्रह्मचर्य का ग्रहण उपलक्षणार्थ है, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास इन चारों माम्रमों के समस्त आचार ब्रह्म प्राप्ति के अभ्यास में तत्पर हैं ) ब्रह्म की इच्छा करने वाले विद्वान् उसी का निदिध्यासन करते हुए उपदेश देते हैं, हे नचिकेतः! मैं यम जो ऐसा पद है, उसे तुम्हें संक्षेप से बताता हूँ । यहाँ पर मोक्षाख्य पद ही ॐकार पद से बाच्य है, यह कहा गया है । यह ॐकार ईश्वर का वाचक है । निष्कर्ष यह है कि मोक्ष और ईश्वर में अभेद है । उसी ब्रह्म पद का समस्त वेद पुनः पुनः प्रतिपादन करते हैं, समस्त धर्मानुष्ठान ब्रह्म प्राप्ति के अभ्यास परक हैं, यह वेदों का निर्णय है । उक्त व्याख्यान को अद्वैतवाद की दृष्टि से उचित कह सकते हैं, किन्तु दयानन्द की पद्धति के अनुसार तो विरुद्ध ही है, क्योंकि मोक्ष वो ब्रह्म ज्ञान का फल है । ' तमेव विदित्वातिमृत्युमेति ' ( वा ० सं ० ३१।१८ ) इस श्रुति से विरोध भी होगा । दूसरी बात यह है कि मोक्षरूप पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम की तरह प्राप्य है और ब्रह्मज्ञान उसका साधन है, ब्रह्म तो ज्ञेय है । दयानन्द की रीति के अनुसार मोक्ष भी अनित्य ही होगा | उसने मोक्ष की आवृत्ति मानी है । ब्रह्म को ही यदि मोक्ष कहें, तो ब्रह्म के नित्य होने से वह साध्य नहीं हो सकता | ब्रह्म के नित्य रहने पर भी उसके ज्ञान को साध्य कहें, तो वह भी ठोक नहीं होगा । उसका ज्ञान अनित्य होने से ईश्वरत्व की उपपत्ति नहीं हो सकेगी, उससे मोक्ष और ईश्वर दोनों में एकता अनुपपन्न होगी । स्वर्ग आदि की तरह अपने में इसी सत् ब्रह्म की प्राप्ति भोग्यत्वेन है या आत्मत्वेन है? प्रथम पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि अनेक लोगों के द्वारा भोग्य होने से उसमें क्षयिष्णुता का प्रसंग प्राप्त होगा । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि अपसिद्धान्त हो जायगा । वेदान्तियों की रीति से तो ' निवृत्तिरात्मा मोहस्य ज्ञातत्वेनोपलक्षितः । ' ' अनुसार ज्ञातत्वीपलक्षित प्रत्यगभिन्न परेश ही मोक्ष है । द्वैती, विशिष्टाद्वैती आदि वादियों की रीति से ब्रह्म-पासना के द्वारा ब्रह्मसानिध्य आदि की प्राप्ति से लोकोत्तर दिव्य सुख ही मोक्ष है, ब्रह्मरूप मोक्ष नहीं । उस रीति से समस्त वेद जिस

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बंदार्थपारिजातः सद्धर्माचरणानि यद्बोधने पर्यवस्यन्ति 2 यत्पदमिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तद् ब्रह्मरूपपदमोङ्कारवायं संग्रहेण ब्रवीमि। प्रणवस्तस्य वाचकः । खमाकाशमपरिच्छिन्नं ब्रह्म ओङ्कारवाच्यत्वादोङ्काररूपमेव । ओमिति ब्रह्मैव । उपासनार्थमभेदोपदेशः । अद्वैतिरीत्या तु सगुणं ब्रह्म ओङ्कारपदवाच्यम्, निर्गुणं तु लक्ष्यम्, वाचकवाच्ययोरुभयोरपि तस्मिन्नेव पर्यवसानात् प्रणवोऽपि तद्रूप एव । यत्त- ' तस्मिन्नध्यासमाना वदन्त्युपदिशन्ति च ' इत्युक्तम्, तत्तु निरर्थक-मेव, व्यापके ब्रह्मणि सर्वेषामेवाध्यासनादुपवेशनाच्च । कथं विद्वांसस्तस्मिन्नुपविशन्तीत्यस्यानिरू. णात् । यच्च ब्रह्मण्येव वेदानां तात्पर्यमित्यर्थे प्रमाणान्तरदर्शनायोक्तम् --- ' तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥५ ॥ '

' यत्तदद्वेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनि परिपश्यन्ति धीराः || ६ || ' ( ० १ ५ ) मुण्डके ' ( पू ० ४७ ) इति, तत्तु न प्रकृतपोषकम् विरुद्धार्थकत्वात् । सर्वेषां वेदानां ब्रह्मणि तात्पर्यमित्यस्यार्थस्य दृढीकरणायेयं श्रुतिरुदाहृता, परमनया तु ऋग्वेदा दिवेदवेदाङ्गानामपर विद्यात्वमुक्त्वाऽक्षर-ब्रह्मवधिका काचिदन्या परा विद्येव बोध्यते । तथा च कथमियं त्वदभिप्रेतार्थसाधिकेति त्वयैव विचारणीयम् । यदपि तद्व्याख्यायामुक्तम् -- ' वेदेषु द्वे विद्ये वर्तेते अपरा परा च ' ( पृ ० ४८ ) इति, तदप्यशुद्धम्, तत्र वेदेध्वितिपदाभावात् । तदध्याहारोऽपि न युक्तः, निष्प्रमाणत्वादसङ्गतेश्च । नहि ऋग्वेदादिभ्यः केचिदन्ये वेदाः प्रसिद्धा येषु ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमित्येतद्रूपा अपरा विद्या, ब्रह्मबोधिका च काचित् परा विद्या स्यात् । भवेयुश्चेत् प्रदर्शनीयाः प्रमाणयितव्याश्च । प्रापणीय पद में, अर्थात् ब्रह्म में अपना तात्पर्य बोधन करते हैं, सभी सद्धर्माचरण जिसके बोधक करने में पर्यवसित होते हैं, जिस १६ की इच्छा रखने वाले ब्रह्मचर्य का व्रत पालन करते हैं, वह ब्रह्मरूप पक्ष भोंकार का वाव्य अर्थ है, उसे संक्षेप में बताता हूँ । प्रणव उसका वाचक है । अपरिच्छिन्न आकाश ब्रह्म, ओंकार का वाच्य होने से ॐकार स्वरूप ही है । ओमिति ब्रह्मैव - ॐ ब्रह्म ही है, उपासना के लिये अभेदोपदेश है । अद्वैतियों की रीति से तो सगुण ब्रह्म ओंकार पद का वाच्य अर्थ है | निर्गुण तो लक्ष्य है, वाच्य वाचक दोनों का हो उसी में पर्यवसान होने से प्रणव भी तद्रूप ही है । यह जो कहा था कि ' तस्मिन्नध्यासमाना वदन्त्युपदिशन्ति च । ' वह तो निरर्थक ही है, व्यापक ब्रह्म में सभी का अध्यासन और उपवेशन होता है । विद्वान् लोग किस रीति से उसमें उपविष्ट होते हैं, यह निरूपण नहीं किया । और जो ' ब्रह्म में ही वेदों का तात्पर्य है ' - इस अर्थ में प्रामाणन्तर का प्रदर्शन करने के लिये मुण्डक में कहा बता रहे हो ' तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद: शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधि-गम्यते ॥५ ॥ ' ' यत्तदद्देश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदवयं तद्भूतयोनि परिपश्यन्ति

धीराः || ६ || ' ( मु ० १ / ५-६ ) -- वह विरुद्धार्थक होने से प्रकृत का पोषक नहीं है । सभी वेदों का ब्रह्म में तात्पर्य है, इस अर्थ का दृढीकरण करने के लिये जिस श्रुति को उदाहृत किया, उससे तो ऋग्वेदादि वेद और उनके अंगों को अपर विद्या तथा अक्षर ब्रह्मबोधका कोई अन्य ही परा विद्या है --बताया गया है । अतः ऊपर उदाहृत की गईं श्रुति आपके अभीष्ट अर्थ की साधिका कैसे हो सकती है, इसे आप ही सोचिये । उसकी व्याख्या में भी जो कहा- ' वेदेषु द्वे विद्ये वर्तेते अपरा परा चेति ' वह भी अशुद्ध है, क्योंकि वहाँ ' वेदेषु ' यह पद नहीं है । कोई प्रमाण न होने से तथा संगति न बैठ पाने से उसका अध्याहार करना भी ठोक न होगा । ऋगादि वेदों के अतिरिक्त कोई अन्य वेद कहीं प्रसिद्ध नहीं हैं, जिनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, इन्हें अपरा विद्या और ब्रह्म बोधिका किसी परा विद्या को बताया गया हो । यदि हों तो आपको उन्हें प्रदर्शित करना चाहिये तथा प्रमाणित करना चाहिये ।

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*** वैवार्थपारिजातः अत्र मुण्डकोपनिषदि तु महर्षेरङ्गिरसो ब्रह्मविद्याप्राप्तिपरम्परामुक्त्वा ततो ब्रह्मविद्यामधिजिगमिषु-महाशालः शौनकस्तं पप्रच्छ-- भगवन्! कस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति? अङ्गिरसा च शौनकं प्रति परापररूपे द्वे विद्ये वेदितव्ये इत्युक्तम् । तत्र परापरविद्ययोः पूर्वमपरा विद्योच्यते । ऋग्वेद इत्यादिना वेदवेदाङ्गरूपा अपरा विद्या प्रतिपादिता । यदि तत्रेतिपदेन सन्तुष्यतु दुर्जनम्यायेनाप्रकृतोऽपि वेदो गृह्येत, ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ', ' तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ' इत्यादिष्वप्रकृतयोरपि परमेश्वरवेदयोर्यथा ग्रहणं क्रियते, तद्वत्रापि तत्रेतिपदेन वेदग्रहणं क्रियेत, तदा कथञ्चिद् वेदेषु परापरे द्वे विद्ये वक्तुं शक्येते । परन्तु के ते ऋग्वेदादिभ्योऽपरे वेदा इति प्रश्नो s समाहित एव । तस्माद्विरुद्ध एवायमर्थः । वस्तुतस्तु ऐहिकामुष्मिकाभ्युदयं च निःश्रेयसलक्षणं परप्राप्तिरूपं मोक्षं चोद्दिश्य द्वावेव विषयो वेदप्रतिपाद्य । तत्राभ्युदयसाधनत्वेन कर्मोपासनपरा वेदवेदाङ्गरूपा अपरा विद्या, निःश्रेयससाधनत्वेन च ब्रह्मप्रतिपादनपराः केचिन्मन्त्रा उपनिषदश्च पराविद्यारूपाः । चित्तशुद्धितदेका-ग्रतासम्पादनपारम्पर्येण तु सर्वे वेदा ब्रह्मपरा एव । त्वद्रीत्या तु चत्वारो वेदविषयाः सन्तीत्यादिवाक्यैरुपपादितस्य विषयचतुष्टयस्थ प्रकृतेन स्पष्ट एव विरोधः । प्रागुक्तस्यैव प्रामाण्ये मुण्डकत्यर्थबाध एव । यदपि –— ' तत्र यया पृथिवीतॄणमारभ्य प्रकृतिपर्यन्तानां पदार्थानां ज्ञानेन यथावदुपकारग्रहणं क्रियते सा अपरोच्यते ' ( ०४८ ) इति, तदपि न विचारसहम्, मूलश्रुतिविरुद्धत्वात् । श्रुती हि - ' तत्रापरा ऋऋग्वेदो.... इत्येवोक्तम् । किञ्च वेदस्य कतमो भागोऽपरविद्यारूपोऽभिप्रेयते? येन पृथिवीतृणमारभ्य प्रकृतिपर्यन्तानां पदार्थानां ज्ञानेनोपकारग्रहणं क्रियते । न च त्वदुक्तरीतिमनुसरन् कश्चिदपि वेदभागो दृश्यते । पृथिवीतृणमित्युभयोपादानस्य किं प्रयोजनमिति वक्तव्यम् पृथिवीमारभ्य प्रकृतिपर्यन्तमित्यस्यैव सुवचत्वात् । यत्किञ्चन वस्त्ववधीकृत्य यहाँ मुण्डकोपनिषद् में तो महर्षि अङ्गिरा से ब्रह्मविद्या प्राप्ति की परम्परा को बताकर उससे ब्रह्मविद्या को प्राप्त करने की इच्छा से महाशाल शौनक ने उनसे पूछा, भगवन्! किसके जानने से यह सब विज्ञात हो जाता है? तब अंगिरा ने परा तथा अपरा इन दो विद्याओं को जानना चाहिये, ऐसा शौनक से कहा । उन परापर विद्याओं में पहली को अपरा विद्या कहते हैं और ॠग्वेद इत्यादि से वेद - वेदांगों को अपरा विद्या कहते हैं । यदि ' तत्र ' इस पद से ' सन्तुष्यतु दुर्जन न्याय से नत्रकृत वेद को भी ग्रहण करते हैं, जैसे- ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ', ' तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेम्य: ' इत्यादि सूत्रों में अप्रकृत परमेश्वर तथा वेद का भी ग्रहण किया जाता है, उसी तरह ' तत्र ' पद से यहाँ वेद का ग्रहण कर लेंगे, तब किसी तरह वेदों में परान्नपरा दो विद्याओं को बताया जा सकता है । परन्तु प्रसिद्ध ऋग्वेदादिकों के अतिरिक्त कौन से वेद हैं? यह प्रश्न तो असमाहित हो रहा । इसलिये आपका इस प्रकार से अर्थ करना विरुद्ध ही हैं । वस्तुतस्तु ऐहिक -आमुष्मिक अभ्युदय और निःश्रेयस रूप तथा परप्राप्तिरूप मोक्ष को उद्देश्य कर दो ही विषय वेदप्रतिपादित हैं । उनमें अभ्युदय के साधक के रूप में अपरा विद्या, जो कर्मोपासना तथा वेद - वेदाङ्ग रूप है, तथा निश्रेयस प्राप्ति के साधक रूप में परा विद्या, जो ब्रह्म प्रतिपादनपरक कुछ मन्त्र हैं, तथा उपनिषद है । चित्तशुद्धि और उसकी एकाग्रता सम्पादन परम्परा के द्वारा तो सभी वेद ब्रह्मपरक ही हैं । आपकी पद्धति से तो ' चत्वारो वेदविषयाः सन्ति ' इत्यादि वाक्यों से बताये गये चार fast at प्रकृत के साथ विरोध स्पष्ट ही है । पूर्व कथन को ही प्रमाण मानने पर मुण्डक श्रुति के अर्थ का ही बाघ हो जाता है । यह जो कहा है कि ' वत्र यया पृथिवीतृणमारभ्य प्रकृतिपर्यन्तानां पदार्थानां ज्ञानेन यथावदुपकारग्रहणं क्रियते सा अपरोच्यते ' इति, वह भी मूलश्रुति के विरुद्ध होने के कारण उपेक्षणीय है । श्रुति में तो ' तत्रापरा ऋग्वेदो...... ' इतना ही कहा है । दूसरा कारण यह भी है कि आप वेद के किस भाग को अपरा विद्या के रूप में मान रहे है? जिससे पृथिवी तृण से लेकर प्रकृति तक के पदार्थों के ज्ञान से उपकार का ग्रहण किया जा रहा है । आपकी पद्धति का अनुसरण करने पर तो कोई भी वेद का भाग नहीं दिखाई देता । पृथिवी, तृण इस प्रकार दोनों के उपादान करने का क्या प्रयोजन है? यह बताइये । पृथिवी से लेकर

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वेदार्थपारिजातः I. प्रकृतिपर्यन्तपदार्थविवक्षायां तु तृणमारभ्येत्येव वक्तव्यम्, ग्रहणशब्दस्यापि ज्ञानपर्यायत्वे ज्ञानेन यथावदुपकारज्ञान-मित्यर्थः स्यात्, तथा च तन्निरर्थकमेव । यतो हि तज्ज्ञानं ज्ञानाकरणकत्वाभावेन न प्रत्यक्षात्मकम् । अतोऽनुमितिरूपं शाब्दबोधरूपं वाभ्युपेयम् । नाद्यं भवितुमर्हति व्याप्तिज्ञानादेरभावात् । न वान्त्यम्, तथात्वे नोपकारज्ञाने पृथिव्यादि-प्रकृतिपर्यन्तपदार्थज्ञानं तदुपयोगि, शाब्दबोधस्य शब्दहेतुकत्वात् । अत एवोपकारज्ञानेऽनुपयोगित्वादेव तद् द्वारीकृत्य यज्ज्ञानं शाब्दबोधं सम्पादयिष्यतीत्यपि नोपपद्यते । किञ्च, यस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातमिति श्रुत्या पराविद्याप्रतिपाद्य ब्रह्मज्ञान एव सर्वविज्ञान भवति, नापराविद्ययात्मातिरिक्ततृणादिप्रकृतिपदार्थानां ज्ञाने सम्भवति सर्वविज्ञानम् । तथा च विशेषणाभावप्रयुक्त-विशिष्टाभावमादाय लक्ष्यमात्रवृत्तित्वेन गोरेकशफत्वलक्षणवदसम्भवदोषदुष्टत्वात् सर्वथापि त्वदुक्तमपराविद्यालक्षणं लक्षणाभासमेव । यया च सर्वशक्तिमद् ब्रह्म विज्ञायते सा परा अर्थादपराया विद्यायाः सकाशादुत्कृष्टाऽस्तीति वेद्यम् । यद्यपि पराविद्या अपराविद्यायाः सकाशाद् उत्कृष्टवास्ति, प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ' ( मुण्डक ० १/२/७ ) इत्यादिवाक्येरपराया विद्यायास्तज्जनितस्य फलस्य चास्थिरतोक्ता । ' सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्य-द्वरिष्ठं प्रजानाम् ' इति ( मुण्डक ० २२२१ ) ब्रह्मपर्यवसायिन्याः पराया उत्कृष्टत्वमुक्तम् । तव स्वोक्तिविरोधोऽपरिहार्य एव । त्वया तु विज्ञानस्य मुख्यत्वं प्रतिपाद्य अनुपदमेवेश्व र विषयकानुभवरूपज्ञानस्य मुख्यत्वमुक्तम् । तत्रैव सर्वेषां वेदानां तात्पर्यमिति वाक्यं हेतुत्वेनोपन्यस्तम्, ईश्वरस्य सर्वेभ्यः पदार्थेभ्यः प्रधानत्वादिति हेतुरुक्तः । यदा ऋग्वेदविषयस्य पदार्थविज्ञानस्य मुख्यत्वमुक्तं तदा परमात्मज्ञानस्य विज्ञाने कथमस्तर्भावः? ज्ञानस्यापि विज्ञानत्वे कथं ज्ञानस्याथर्वविषयस्य भिन्नत्वमुक्तम्? कथं चाथर्ववेदविषये ज्ञाने सर्ववेदतात्पर्यविषयता? तथात्वे वा कथमृग्वेद-विषयस्य विज्ञानस्य सर्वेभ्यो विषयेभ्यो मुख्यत्वं युज्यते । प्रकृति तक इतना कहना ही उचित है । जिस किसी वस्तु को अवधि बना कर प्रकृति तक के पदार्थ की विवक्षा करने पर तो तृण आरम्भ कर इतना ही कहना चाहिये था । ग्रहण शब्द भी ज्ञान का पर्याय होने से ज्ञान से यथावत् उपकार का ज्ञान यह अर्थ होगा, जो निरर्थक ही है । क्योंकि वह ज्ञान, ज्ञानाकरणक व होने से प्रत्यक्षात्मक नहीं है । इसलिये उसे अनुमिति या शाब्दबोध रूप मानना होगा । किन्तु व्याप्तिज्ञानादि के न होने से उसे अनुमितिरूप नहीं कह सकते और न ही उसे शाब्दबोधात्मक कह सकते हैं । शाब्दबोध रूप से उपकार ज्ञान में पृथिव्यादि प्रकृति पर्यन्त पदार्थज्ञान उपयुक्त होता है, क्योंकि शाब्दबोध में शब्द ही हेतु होता है । इसलिये उपकार ज्ञान में अनुपयोगी होने से उसके माध्यम से वह ज्ञान शाब्दबोध का सम्पादन करेगा, यह बात नहीं बन पाती है | और भी ' यस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातमिति श्रुत्या पराविद्याप्रतिपाद्यब्रह्मविज्ञान एवं सर्वविज्ञानं भवति, इस श्रुति से पराविद्या प्रतिपाद्य ब्रह्मज्ञान में ही सर्व विज्ञान होता है, अपरा विद्या से नहीं, इस प्रकार आत्मातिरिक्त तृणादि प्रकृति पर्यन्त पदार्थों के ज्ञान में सर्व विज्ञान का होना संभव है । इसलिये विशेषणाभाव प्रयुक्त विशिष्टाभाव को लेकर लक्ष्यमात्रवृत्ति हाने से गोरेकशफत्व के समान rice दोष से दूषित होने पर तुम्हारा बताया हुआ अपरा विद्या का लक्षण सर्वथा लक्षणाभास ही है । जिससे अदृश्यादि सर्वशक्तिमद् ब्रह्म जाना जाता है, उसे परा विद्या कहते हैं, अर्थात् अपरा विद्या से वह उत्कृष्ट होती है, यह समझना चाहिये । यद्यपि परा विद्या अपरा विद्या से उत्कृष्ट हो है । ' ' लवा होते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोत्तमबरं येषु कर्म - ( मुण्डक ० ११२/७ ) इत्यादि वाक्यों से अपरा विद्या और उसके फल की अस्थिरता कहो गई है ॥ ' सदसद्वरेण्यं विज्ञानाद् यद्वरिष्ठं प्रजानामिति ( मुण्डक ० रा रा १ ) इससे ब्रह्मपर्यवसायिनी पराविद्या की उत्कृष्टता कही गई है, तथापि आपका स्वोक्तिविरोध तो अपरिहार्य हो रहा । आपने तो विज्ञान की मुख्यता बताकर उसके अनन्तर ही ईश्वरविषयक अनुभव रूप ज्ञान की मुख्यता बताई है और उसमें समस्त वेदान्त वाक्यों का तात्पर्य है, इस वाक्य को हेतु के रूप में रखा है । समस्त पदार्थों की अपेक्षा ईश्वर को प्रधानता होने से, यह हेतु बताया गया है । जब ऋग्वेद के ferra पदार्थ विज्ञान की मुख्यता कही गई, तब परमात्मा के ज्ञान का विज्ञान में कैसे अन्तर्भाव होगा? जब ज्ञान को भी विज्ञान कहा जाय तब अथर्व के विषयभूत ज्ञान की भिन्नता कैसे कही जा सकेगी? कैसे अथर्ववेद का विषयभूत ज्ञान समस्त वेदों के तात्पर्य का विषय बन सकेगा? ऐसी परिस्थिति में ऋग्वेद के विषयभूत विज्ञान को समस्त विषयों को अपेक्षा मुख्य बताना कैसे संगत होगा?

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 576 का मूल पृष्ठ
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II वेदार्थपारिजातः किञ्चेश्वरविषयकस्यानुभवस्य मुख्यत्वसिद्धी वेदानां तात्पर्यविषयत्वं हेतुरस्ति न वा? नाद्यस्तथास्त्रे ' चत्वारो वेदविषयाः ' इति स्ववाक्यविरोधात् । न च सर्वे वेदा यत्पदमामनन्तीति वचनबलात्तद्युक्तम्, तस्य शङ्करा-वार्यादिभिरन्यथार्थस्य प्रतिपादितत्वात् । यदा चत्वारो वेदविषया इति सत्यं तदा सर्ववेदतात्पर्यविषयमिति हेतुरसिद्ध एव । अत एव न पञ्चमीनिर्देश एवं हेतुत्वद्योतकः, अभ्यथा पर्वतनिष्ठवह्निविषयकोऽनुभवः सर्वेभ्यो मुख्य:, अत्रैव सर्वेषां वेदानां तात्पर्यमिति ब्रुवाणः कथं त्वयापि निरोद्धव्यः? इति भूमिकाखण्डनोक्तिर्युक्तव । तस्मादन्त्य एव पक्षो युक्तः, साधकाभावे साध्यासिद्धेर्युक्तत्वात् । काठकमुण्डकोपनिषद्गतपूर्वोक्तवाक्यानां तु श्रीशङ्करा-चार्यपादादिसम्मतोऽयमर्थ: -' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधम दिन्यत्रास्मात्कृताकृतान् । अभ्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद || ' ( ० १।२।१४ ) इति परमतत्त्वं पृष्टवते नचिकेतसे यमस्तादृशमेव वस्तु विशेषणान्तरैरप्युपलक्षितमाह - सर्वे der इति । सर्वे वेदा यत्पदं पदनीयं प्रापणीयमविभागेनामनन्ति प्रतिपादयन्ति । तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति यत्प्राप्त्यर्थान्येवेत्यर्थः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं गुरुकुलवासेन्द्रियनिग्रहरूपं चरन्त्यनुतिष्ठन्ति तत्ते तुम्यं यज्ज्ञातुमिच्छसि संग्रहेण ब्रवीमि । ओम् इत्येतत् ॐशब्दवाच्यं तत्प्रतीकं च । आनन्दगिरिरीत्या ' सर्वे वेदा इति वेदेकदेशा उपनिषदः । अनेनोपनिषदो ज्ञानसाधनत्वेन साक्षाद्विनियुक्ताः तपांसि तेषां कर्माणि शुद्धिद्वारेणावगतिसाधनानि ' । ' तत्रापरेति- -तत्र काऽपरेत्युच्यते, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद इत्येते चत्वारो वेदाः, शिक्षा कल्पो व्याकरणं free छन्दो ज्योतिषमित्यङ्गानि । षडेषापरा विद्या । अथेदानीमियं परा विद्यच्यते । यथा तद् वक्ष्यमाणविशेषण-मक्षरमधिगम्यते प्राप्यते । अधिपूर्वस्य गमेः प्रायशः प्राप्त्यर्थत्वात् । न च परप्राप्तेरवगमार्थस्य भेदोऽस्ति | अविद्याया अपाय एव हि परप्राप्तिर्नार्थान्तरम् । और भी ईश्वर विषयक अनुभव की मुख्यता सिद्ध करने में वेदों की तात्पर्यविषयताको हेतु मानते हैं या नहीं? प्रथम पक्ष ठीक नहीं होगा, क्योंकि ' चत्वारो वेदविषया: ' इस अपने वाक्य से ही विरोध होगा । यदि कहो कि ' सर्वे वेदा यत् पद-मामनन्ति ' इस वचन से वह उचित है, तो वह ठीक नहीं होगा, क्योंकि श्रीशंकराचार्य आदि विद्वानों ने उसका दूसरा अर्थ बताया है । जब ' चत्वारो वेदविषयाः ' यह सत्य है, तब ' सर्ववेदतात्पर्यविषयम् ' यह हेतु असिद्ध ही है । इसीलिये हेतुता का द्योतक केवल पञ्चमी विभक्ति का निर्देश करना नहीं माना गया है । अन्यथा पर्वत पर स्थित वह्नि के अनुभव को सबसे मुख्य और उसीमें समस्त वेदों के तात्पर्य को बताने वाले व्यक्ति को आप कैसे रोक सकेंगे? यह भूमिका खण्डनोति उचित ही है । अतः अन्त्य पक्ष ही उचित कहना होगा, साधक के अभाव में साध्य की असिद्धि का होना उचित ही है । काठक, मुण्डक उपनिषद् के पूर्वोक्त वाक्यों का अर्थ तो triever at ने इस प्रकार किया है-. ' धर्म से दूर, अधर्म से दूर, कृत और अकृत से दूर, भूत और भव्य से भी दूर जिस वस्तु को तुम देखते हो, उसका मुझे उपदेश दो ' इस प्रकार परम तस्य के विषय में पूछने वाले नचिकेता को यम ने इसी प्रकार की वस्तु का अन्य विशेषणों से संयुक्त कर उपदेश दिया far as जिस प्रापणीय वस्तु का सम्पूर्णता से प्रतिपादन करते हैं, सारे तप भी जिसकी प्राप्ति के लिये ही किये जाते हैं, जिसको चाहते हुए गुरुकुलवास, इन्द्रियनिग्रह रूप ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस पद का मैं तुमको उपदेश संक्षेप में देता हूँ, जिसको कि तुम जानना चाहते हो । वह पद ओम् है । ॐ शब्द उसका वाच्य भी है और प्रतीक भी । आनन्दगिरि के मत में ' सर्वे वेदा: ' का अर्थ सब उपनिषदें है, जो कि वेद का एक भाग है । इस प्रकार यहाँ पर उपनिषदों को ज्ञान का साक्षात् साधन माना गया है । तप उनके कर्म कहलाते हैं, जो कि चित्त शुद्धि के द्वारा ब्रह्म को अवगति के साधन हैं । गोपाल यतीन्द्र के मत में तत्रापति का अर्थ अपरा विद्या कौन सी है, यही यहाँ बताया गया है कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ये चार वेद और शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष ये छ: अंग ये सब अपरा विद्या हैं । अब यह परा विद्या कही जाती है, जिससे कि उस अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है, जिसके कि लक्षण आगे बताये गये हैं । अधिपूर्वक गम् धातु प्रायः प्राप्ति

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वेदार्थपारिजातः * ननु ऋग्वेदादिवाह्या तहि सा कथं परा विद्या स्यान्मोक्षसाधनं च । ' या वेदबाह्या: स्मृतयः ( म ० स्मृ ० १२ / ९ ५ ) इति हि स्मरन्ति । कुदृष्टित्वाग्निष्फलत्वादनादेया स्यात् । उपनिषदां च ऋग्वेदादिबाह्यत्वं स्यात् । ऋग्वेदादित्वे तु पृथक्करणमनर्थकम् । अथ कथं परेति? न वेद्यविषयविज्ञानस्य विवक्षितत्वात् । उपनिषद्याक्षरविषयं हि विज्ञानमिह परा विद्येति प्राधान्येन विवक्षितं नोपनिषच्छब्दराशिः । वेदशब्देन तु सर्वत्र शब्दर राशिविवक्षितः । शब्दराश्यधिगमेऽपि यत्नान्तरमन्तरेण गुर्वभिगमनादिलक्षणं वैराग्यं च नाक्षराधिगमः सम्भवतीति पृथक्करणं ब्रह्मविद्यायाः परा विद्येति कथनं चेति शाङ्करभाष्यम् । यद्वा साङ्गवेदादिचतुर्दश विद्यास्थानोपलक्षितं शब्दब्रह्ममात्रमपरविद्यापदेन विवक्षितम् । तदुक्तम् ---' वर्णाश्रमानुसारिकर्मोपासनानुष्ठानजनितसत्त्वशुद्धिसाधनचतुष्टय सम्पति वेदान्तश्रवणमनन निदिध्यासनोत्पन्नब्रह्मसाक्षा कार एव परा विद्या । अपरा विद्या साधनरूपा । ब्रह्मविद्या फलरूपा । तदुक्तं श्रीमद्भागवते - ' शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि । ' सायणीयकाण्वशाखीयभाष्यभूमिकायाम्, ऋग्वेदभाष्यभूमिकायां च ' द्वे विद्ये वेदितव्ये ' इति मुण्डकत्यनुसारेणैव ऋगादिमन्त्राणां ब्राह्मणानां च कर्मैव विषयः, उपनिषदां ब्रह्म विषयः । यद्यप्युपनिषदामपि वेदशीर्षत्वाद् ऋग्वेदाद्यन्तः पातित्वमेव, तथापि बाहुल्येन व्यपदेशा भवन्तीति न्यायेन वेदानां कर्मपरत्वं तत्र तत्र प्रसिद्धम् । अत एव ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् ' इति जैमिनिः । ' त्रैगुण्यविषया वेदा: ', ' वेदवादरताः पार्थं नान्यदस्तीति वादिनः ', ' नाहं वेदैर्न तपसा ' ( गीता ), ' दृष्टवदानुश्रविक: ' इति सांख्यकारिका । उपनिषदां वेदशीर्ष-त्वात् सर्ववेदसारत्वात्तु तद्विषये ब्रह्मणि सर्वेषामेव वेदानां तात्पर्यमित्युक्तिः । तदभिप्रायेणैव ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ', के अर्थ में प्रयुक्त होती है । परम पद की प्राप्ति और अवगति में कोई अर्थभेद नहीं है, क्योंकि अविद्या का दूर होना हो पर प्राप्ति है, इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं है । यदि यह ऋग्वेद आदि से भिन्न है, तो यह परा विद्या और मोक्ष का साधन कैसे हो सकती हैं? मनुस्मृति में वेदवाह्य स्मृतियों को कुदृष्टि माना गया है । कुदृष्टि होने से ये निष्फल हैं, अनादेय हैं । इस प्रकार उपनिषद् ऋग्वेदादि से बाह्य माने जायेंगे । यदि ये ऋग्वेदादि से अभिन्न हैं, तो इनका उनसे अलग करना व्यर्थ है । तब इसको परा विद्या कैसे कहा गया? नहीं, आप समझे नहीं । यहाँ पर परा विद्या से वेदविषयक विज्ञान अभिप्रेत हैं । उपनिषद् रूप वेदाक्षर विषयक विज्ञान यहाँ पर परा विद्या पद Terror अभिप्रेत है, उपनिषद् रूप शब्दराशि नहीं । वेद शब्द से सर्वत्र शब्दराशि ही विवक्षित हैं । शब्दराशि की अधिगति हो जाने पर भी अन्य प्रयत्नों के बिना गुरु की अधिगति, वैराग्य आदि से अक्षर की अधिगति नहीं हो सकती, इसलिये ब्रह्मविद्या का पृथक उपदेश किया गया है और उसको परा विद्या कहा गया है । अथवा सांग वेद आदि चतुर्दश विद्या स्थान रूप शब्दब्रह्म मात्र ऊपर विद्या पद से विवक्षित है । कहा भी गया है कि वर्णाश्रम के अनुसार कर्म और उपासना के अनुष्ठान से उत्पन्न सस्वशुद्धि, साधन चतुष्टय संपत्ति, वेदान्त श्रवण, मनन, निदिध्यासन से उत्पन्न ब्रह्म साक्षात्कार ही परा विद्या है । भागवत में भी कहा गया है कि- ' शब्दब्रह्म में निष्णात विद्वान् यदि परब्रह्म में निष्णात नहीं होगा तो उसका सारा श्रम उसी प्रकार निष्फल है, जैसा कि नाम गाय की सेवा करने वाले का होता है ' । सायण के काण्वशाखा के भाष्य की भूमिका और ऋग्वेदभाष्यभूमिका में ' दो विद्या जाननी चाहिये इस मुण्डक श्रुति के अनुसार ऋगादि मन्त्रों और ब्राह्मणों का कर्म ही विषय है और उपनिषदों का विषय ब्रह्म बताया है । वेद में शीर्षस्थानीय उपनिषदों का भी यद्यपि ऋग्वेद आदि में ही अन्तर्भाव है, तो भी वेदों में बाहुल्य कर्मों का ही है, अतः तदनुसार ही वेदों को कर्म प्रतिपादक मान लिया जाता है । इसीलिये जैमिनि ने पूरे आम्नाय को क्रियार्थक मानकर, जो भाग क्रिया प्रतिपादक नहीं है, उसको अनर्थक कहा है । इसके विपरीत गीता में वेदों को ayurfare, उसके अनुयायियों को वेदवाद में निरत कहा है और बताया है कि परमेश्वर वेद और तप से नहीं मिल सकता | Reafter में भी आनुभविक, वेदविहित कर्मों को भी इस कर्मों के समान ही क्षय ओर अतिशय से युक्त माना है । उपनिषद् वेद के शीर्षस्थानीय हैं, ये सब वेदों के सार हैं, अतः उपनिषद् के विषय ब्रह्म में ही सारे वेदों का तात्पर्य बताया गया है । इसी अभिप्राय से ' सब वेद जिस पद को बताते हैं ', ' सब वेदों से मैं ही वेद्य हूँ ' इत्यादि वचन प्रवृत्त हुए हैं । अथवा ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति '

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*** देवार्थपारिजातः ' वेदेश्व सर्वेरहमेव वेद्यः ' इत्यादिवचनानि । यद्वा ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' इत्यस्यायमर्थः केचित् पारम्पर्येण केचिच्च साक्षात् सर्वे वेदा मन्त्रब्राह्मणात्मकाः, यत्पदमामनन्ति प्रतिपादयन्ति ब्रह्मण्येव पर्यवस्यन्ति । तत्र कर्मोपासनशेषा वेदाः कर्मोपासनप्रतिपादन सत्त्वशुद्धिब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारयोग्यतासम्पादनक्रमेण ब्रह्मण्येव पर्यवस्यन्ति । कर्मोपासन-पर्यवसायिनः कर्मस्वविनियुक्ता ब्रह्मपर्यवसायिनो मन्त्रा ब्रह्मपराणि ब्राह्मणानि च साक्षादेव विधिमुखेन निषेधमुखेन ब्रह्मप्रतिपादयन्ति । यद्यपि बहवो मन्त्रा ब्राह्मणानि चेश्वरं प्रतिपादयन्ति तथापि कर्मोपासनशेषत्वेन ते कर्मोपासनपरा एवोच्यन्ते । अनन्यशेषा एव वेदा: साक्षाद् ब्रह्मप्रतिपादका उच्यन्ते । अनन्यशेषाणि ब्रह्मबोधकानि वचनानि तत्प्रधानान्युच्यते । तान्यतत्प्रधानेभ्यो बलीयांसि भवन्ति I । कर्मोपासनपरेभ्यो द्वैतवचनेभ्यो द्वैतसाधकप्रत्यनुमानेभ्योऽपि बलीयस्त्वात् तानि बाधित्वापि स्वार्थमावेदयन्ति । तथाभूता ईशावास्यमित्यादयो मन्त्रा अपि उपनिषत्कोटा आयान्ति, अत उपनिषत्सु ब्रह्मपराणां मन्त्राणां ब्राह्मणानां च सन्निवेशः । तथा च साक्षाद्ब्रह्मप्रतिपादका वेदाः पराविद्या-पदेनोच्यन्ते । ब्रह्मकार्यान्तर्गतद्रव्यदेवतात्मककर्मतत्फलप्रतिपादका वेदा अपराविद्यापदेनोच्यन्ते । यथा पृथिवीकार्य -पादुका चतुष्पादिकादिषु दत्तपदा अपि भूतल एव दत्तपदा भवन्ति, तथैव ब्रह्मकार्यप्रतिपादका अपि वेदा ब्रह्मप्रतिपादका एव भवन्ति । ' नान्यथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ' ( वेदस्तुतो ) | जातो शक्त्यभ्युपगमेन जातेश्च परसत्तायां जात पर्यवसानान्न केवलं सर्वे वेदाः, किन्तु सर्वे शब्दा अपि ब्रह्मबोधका एव । अवान्तरतात्पर्याभिप्रायेणैव anureau dare गुण्यविषया अपरविद्यारूपाः । महातात्पर्याभिप्रायेण तु कर्मोपासनपरा अपि वेदा ब्रह्मप्राप्ति-योग्यतासाधकत्वेन ब्रह्मपरा एव । तेन सर्व एव वेदा: परमात्मपदपर्यवसायित्वेन ब्रह्मप्रतिपादका एव । इस श्रुति का अर्थ यह है- ' कुछ परम्परा से और कुछ साक्षात् इस प्रकार सभी मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद जिस पद को प्रतिपादित करते हैं, वह ब्रह्म ही है । इनमें से कर्मोपासना के शेषभूत ae imran के प्रतिपादन, सत्वशुद्धि, ब्रह्म के स्वरूप के साक्षात्कार की योग्यता के सम्पादन के क्रम से ब्रह्म में पर्यवसित होते हैं और जिनका कर्मोपासना में पर्यवसान नहीं है, जो कर्म में विनियुक्त नहीं है, किन्तु ब्रह्म में जिनका पर्यवसान है, ऐसे मन्त्र और ब्रह्म के प्रतिपादक ब्राह्मण साक्षात् हो विधिमुख से अथवा निषेध मुख से ब्रह्म के प्रतिपादक हैं । यद्यपि बहुत से मन्त्र और ब्राह्मण ईश्वर का प्रतिपादन करते हैं, वो भी कर्मोपासना के शेषभूत अर्थात् अङ्ग होने से वे कर्मोपासना के भी प्रतिपादक माने जाते हैं । जो किसी के अङ्ग नहीं हैं, वे ही वेदभाग साक्षात् ब्रह्म के प्रतिपादक हैं । जो किसी के अङ्ग नहीं हैं, ऐसे ब्रह्मबोधक वचन प्रधान माने जाते हैं । ऐसे वचन उन वचनों से प्रधान माने जाते हैं, जो कि ब्रह्म के प्रतिपादक नहीं हैं । कर्मोपासना के प्रतिपादक द्वैतवादी वचनों से और उनके सहायक अनुमानों से बलवान् होने के कारण ये उनको भी Tarfer he and ear अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं । इस प्रकार के ' ईशा वास्यम् ' इत्यादि माध्यन्दिन संहिता के मन्त्र भी उपनिषदों की कोटि में ही आते हैं । इसलिये उपनिषदों में ब्रह्मपरक मन्त्रों और ब्राह्मणों का सन्निवेश है । इस तरह साक्षात् ब्रह्म के fource वेद परा विद्या के नाम से कहे जाते हैं | यज्ञ कार्य के सम्पादन के अन्तर्गत ब्रव्य, देवता और उसके फल के प्रतिपादक वेद अपरा विद्या पद से कहे जाते हैं । जैसे पृथिवी के कार्य खड़ाऊ मीटर आदि में पैर रखने पर भी वस्तुतः उनका आधार भूतल ही होता है, उसी तरह ब्रह्म कार्य के प्रतिपादक वेद भी वस्तुतः ब्रह्म के ही प्रतिपादक माने जाते हैं । अन्यथा वेदस्तुति की यह उक्ति कैसे संगत होगी कि ' मनुष्यों के पैर पृथ्वी पर ही माने जाते हैं ' । वास्तव में शब्दों की शक्ति जाति में मानी जाती है और जाति का पर सत्ता में पर्यवसान मानने से न केवल सब वेद हो, अपि तु सब शब्द भी ब्रह्म के ही ates हैं । अवान्तर तात्पर्य के अभिप्राय से ही कर्मोपासना के प्रतिपादक वेद वैगुण्य विषयक अपर विद्या के नाम से अभिहित हैं । महातात्पर्य के अभिप्राय से तो कर्मोपासना के fare वेद भी ब्रह्मप्राप्ति की योग्यता के संपादन में विनियुक्त होने से अन्त में ब्रह्मपरक ही हैं । इस तरह सभी वेद परमात्म-पद की प्राप्ति में पर्यवसित होने से ब्रह्मप्रतिपादक ही हैं ।

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वेदार्थपारिजाता *** इत्थं चावान्तरतात्पर्यवन्तः कर्मोपासनपराः साङ्गा वेदा अपरविद्या मन्तव्याः । अनन्यशेषा ब्रह्मप्रतिपादका वेदाः पराविद्यारूपा मन्तव्याः । अपरविद्यया ब्रह्मप्राप्तियोग्यतालाभः परविद्यया ब्रह्मलाभः । उपेत्य प्रत्यक चैतन्याभिन परमात्मानमधिगमय्य अविद्याग्रन्थि शातयति शिथिलयति मोक्षं गमयतीति ब्रह्मविद्यैवोपनिषदुच्यते । तज्जनकत्वात् तत्प्रतिपादकेषु मन्त्रब्राह्मणरूपेषु वेदेष्वप्युपनिषच्छन्दः प्रयुज्यते । अत एव निरुक्ते दैवतकाण्डे परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृता आध्यात्मिक्यश्च त्रिविधा ऋच उक्ताः । परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च मात्रा भूयिष्ठा अल्पशश्चाध्यात्मिका इत्यपि तत्रैवोक्तम् । ईशावास्यमित्यादयो मन्त्राः कर्मस्वविनियुक्ताः तेषामकर्मशेषस्यात्मनो याथात्म्य प्रतिपादने + नैवोपक्षीणत्वादिति शङ्कराचार्येणाप्युक्तम् । ईशावास्यमित्यादयो मन्त्राः कर्मसु विनियुक्ता मन्त्रत्वाद् इषेत्वादिवद् इत्यनुमानं तु विनियोजकप्रमाणसत्त्वोपाधिदूषितं वेदितव्यम् । यत्तु ब्रह्मचर्यपदमुपलक्षणं मत्त्वा ब्रह्मचर्य गृहस्थवानप्रस्थसंन्यासाश्रमाचरणानीत्यर्थः कृत इति, तन्न, पारम्पर्येण सर्वाश्रमाचरणानां ब्रह्मज्ञान उपयोगसत्त्वेऽपि ब्रह्मचर्यस्यैव तत्र साक्षादुपयोगः । अतो ब्रह्मविद्याप्राप्त्यर्थ प्रजापति प्रत्युपसन्नयोरिन्द्रविरोचनयोव्रं ह्मचर्यानुष्ठानं ब्रह्मविद्याङ्गतया श्रूयते । तु विषयचतुष्यसिद्ध ' यदेनमृग्भिः शंसन्ति, यजुभिर्यजन्ति, सामभिः स्तुवन्ति, अथर्वभिर्जपन्ति ' इति काठकब्राह्मणमुपन्यस्तम्, तत्तु न तत्पोषकम्, तस्यान्यार्थोपपत्तेः । तथाहि -- एवं परमात्मानमृग्भिः शंसन्ति वर्णयन्ति, यजुभिस्तमेव यजन्ति, सामभिस्तमेव स्तुवन्ति, अथर्वभिस्तमेव जपन्ति -- इत्येवार्थः । नहि शंसनं पदार्थविज्ञानं भवति । त्वद्रीत्यापि परमेश्वरमारस्य तृणपर्यन्तानां पदार्थानां ज्ञानं ततश्वोपकारग्रहणमेव विज्ञानं भवति । न चार्य पदार्थः शंसतेरर्थः सम्भवति । यजनं तु कात्यायनादिप्रोक्तप्रकारेण यथाशास्त्रं तत्तद्देवतोद्देश्यकद्रव्यत्याग एव । सामभिः अवान्तर तात्पर्य वाले कर्मोपासनापरक सांग वेद अपरा विद्या के नाम से और अनन्यशेष ब्रह्म प्रतिपादक वेद परा विद्या के नाम जाने जाते हैं । अपरा विद्या से ब्रह्म प्राप्ति की योग्यता प्राप्त होती है, परा विद्या से ब्रह्मलाभ होता है । प्रत्यक् चैतन्याभिन परमात्मा को प्राप्त कर, अविद्या ग्रन्थि को खोलकर मोक्ष को प्राप्त कराने वाली ब्रह्मविद्या ही उपनिषद् कहलाती है । इस ब्रह्मविद्या के जनक होने से मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदों के लिये उपनिषद् शब्द प्रयुक्त होता है । इसीलिये निरुत में देवत काष्ट में परोक्षकृत, प्रत्यक्षकृत और आध्यात्मिक इस प्रकार तीन प्रकार की ऋचाएं बताई गई हैं । इनमें परोक्षकृत और प्रत्यक्षकृत मन्त्रों की अधिकता है और आध्यात्मिक ऋचाएं थोड़ी सी हैं, यह भी वहीं बताया गया है । ' ईशा वास्यम् ' इत्यादि मन्त्र कर्म में विनियुक्त नहीं है । ये कर्म के अङ्ग नहीं हैं, क्योंकि आत्मा की तात्त्विकता के प्रतिपादन में ही इनका तात्पर्य समाप्त हो जाता है, यह बात शङ्कराचार्य ने भी कही है । ' ईशा वास्यम् ' इत्यादि मन्त्र भी कर्म में विनियुक्त है, क्योंकि ये भी ' इषे त्वा ' इत्यादि मन्त्रों के समान मन्त्र है, यह अनुमान विनियोजक प्रमाणसत्त्व रूप उपाधि से दुषित जानना चाहिये । ब्रह्मचर्य पद को उपलक्षण मान कर ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासाश्रम के आचरणों को, यह अर्थ किया गया है । वह ठीक नहीं है, क्योंकि परम्परा से सभी आश्रमों के आचरणों का ब्रह्मज्ञान में उपयोग रहने पर भी साक्षात् उपयोग वहाँ ब्रह्म का हो माना गया है । इसलिये ब्रह्मविद्या की प्राप्ति के लिये प्रजापति के पास गये इन्द्र और विरोचन को ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान ही ब्रह्मप्राप्ति के अंग के रूप में आवश्यक बताया गया है । यहाँ पर चार विषयों की सिद्धि के लिये ' ऋचाओं से स्तुति करते हैं, यजुस् से यजन करते हैं, साम से स्तवन करते हैं इस काठक ब्राह्मण के वचन को उपन्यस्त किया है, वह इसका पोषक नहीं हो सकता, क्योंकि उसका और अथर्व से जप करते हैं दूसरा भी अर्थ हो सकता है । वहाँ पर ' इस परमात्मा का ऋचाओं से वर्णन करते हैं और यजुस् से उसी का यजन करते हैं, साम से उसी की स्तुति करते हैं और अथर्व से उसी का जप करते हैं, यह अर्थ है । शंसन का अर्थ पदार्थ विज्ञान नहीं हैं । आपके मत से भी परमेश्वर से लेकर तृणपर्यन्त पदार्थों का ज्ञान और उनके उपकार का ग्रहण करना विज्ञान कहलाता है । यह अर्थ शंसति धातु का नहीं

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 580 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थ पारिजातः स्तुवन्तीति स्तुतिरपि वाचनिको क्रियैव । उपासना तु मानसी क्रिया भवति । एवमथर्वभिर्जपन्तीत्यनेनापि जपात्मकं ana सिद्धति, नहि जपतेर्ज्ञानमर्थः । वस्तुत: ' ऋग्भिः शंसन्ति ' इत्यादिभिस्तु चतुर्विधानां मन्त्राणां विनियोग उक्तः केन कि कर्तव्यमिति । ऋगादीनां मन्त्रवाचकत्वात् । ऋग्वेदादयस्तु मन्त्रब्राह्मणात्मका एव । तेषां त्वनेकशाखोपबृंहितानां समेषामेव कर्मों-पासनज्ञानान्येव विषयाः, सर्वेषु वेदेषु सर्वासु शाखासु विषयत्रैविध्योपलब्धेः । उपनिषदोऽपि सर्वास्वपि शाखा सूप-लभ्यन्ते । ऋक्सामयजुरथर्ववेदेषु कर्मणा ऋत्विजामृगादिमन्त्राणां च सर्वशाखासूपयोगः । न च शाखा वेदादन्याः, सर्वशाखासमूहस्यैव वेदत्वात् । यत्तूक्तम् -- ' विराट्पुरुष - प्रजापति- हिरण्यगर्भादिनामभिः प्राकृतिकं महदण्डं तन्निमितं च जगद्विदित्व मृत्युमतिक्रामति जनः, ' वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय || ' इति श्रुतेरिति, तदपि तुच्छम् श्रुत्यर्थानभिज्ञानात् । तथाहि - तमेवेत्यत्रैवकारेण परमात्मज्ञानस्यैव मृत्य्वतिक्रमणहेतुत्वश्रवणात् । श्रुत्यर्थस्तु मन्त्रद्गृषिर्वक्ति - अहमेनं वेदान्तवेद्यमादित्यवर्णमादित्यवत्स्वप्रकाशं महान्तं व्यापके पूर्षु शयनात्पूर्णत्वाद्वा पुरुष तमसोऽज्ञानतत्कार्यलक्षणात् प्रपश्चात् परस्ताद् विराजमानम् वेद जानामि, प्रत्यक् चैतन्याभेदेन परमात्मानं साक्षात्करोमि, तमेव यमहं वेद्मि तमेव शुद्धं प्रपञ्चातीतं परमात्मानमेव विदित्वा साधको मृत्युं तदुपलक्षितं जननमरणाविच्छेदलक्षणं संसारमतिक्रामति । नान्यस्तज्ज्ञानलक्षणाद् मार्गादन्यः कोऽपि पन्थाः संसारातितरणसाधनभूतोऽस्ति । हो सकता | वजन का अर्थ कात्यायन प्रभृति के कहे गये प्रकार से उस देवता को उद्दिष्ट कर द्रव्य का त्याग करना है । साम से स्तुति करते हैं, यहाँ पर स्तुति भी वाणी की क्रिया है । उपासना मानसी क्रिया होती है । इसी तरह अथर्व से जपता है, इससे भी जपात्मक कर्म ही सिद्ध होता है, क्योंकि जपति घातु का ज्ञान अर्थ नहीं होता । वस्तुतः ' ऋग्भिः शंसति ' इत्यादि से चार प्रकार के मन्त्रों का विनियोग बताया है कि किससे क्या करना चाहिये । ऋगादि शब्द मन्त्र के वाचक हैं | ऋग्वेदादि शब्द मन्त्र और ब्राह्मण दोनों के वाचक हैं | अनेक शाखाओं में उपबूहित इन सबका कर्म, उपासना और ज्ञान विषय है । सभी वेदों और शाखाओं में ये तीन विषय उपलब्ध होते हैं । उपनिषद् भी सभी शाखाओं में मिलती हैं । ऋक्, यजुः साम और अथर्ववेद में कर्म के साथ ऋत्विजों का और ऋगादि मन्त्रों का सभी शाखाओं में उपयोग होता है | शाखाएँ वेद से भिन्न नहीं हैं, क्योंकि सभी शाखाओं के समूह का ही नाम वेद है । यह जो कहा गया है कि ' विराट्, पुरुष, प्रजापति, हिरण्यगर्भ आदि नाम से प्राकृतिक महदण्ड और तन्निर्मित जगत् को जान कर ही मनुष्य मृत्यु को जीत लेता है, ' मैं उस महान् आदित्य वर्ण पुरुष को जानता हूँ, जो कि अन्धकार से बहुत दूर है । उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को जीत लेता है । इसके सिवाय मोक्ष प्राप्ति का कोई दूसरा उपाय नहीं है । यह श्रुति इसमें प्रमाण है, यह ata की बात है, क्योंकि बिना श्रुति का अर्थ जाने यह कहा गया है । यहाँ पर ' तमेव ' यहाँ के एवकार से परमात्मा के ज्ञान को ही मृत्यु के अतिक्रमण का एकमात्र कारण बताया गया है । श्रुति का अर्थ यह है कि मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहना है कि मैं इस वेदान्तवेद्य, afer के समान प्रशमान महात् अर्थात् व्यापक, अनेक शरीरों में विश्राम करने के कारण अथवा पूर्ण होने से जो पुरुष कहलाता है, जो तम अर्थात् मज्ञान और उसके कार्य प्रपन से परे विराजमान है, उसको जानता हूँ, प्रत्यक् चैतन्याभिन्न परमात्मा का साक्षात्कार करता हूँ | मैं जिसको जानता हूँ, उसी शुद्ध प्रपंचातीत परमात्मा को जानकर साधक मृत्यु को अर्थात् तदुपलक्षित जनन - मरण की अविच्छिन्न परम्परा रूप संसार अतिक्रान्त कर जाता है । इसके ज्ञान के सिवाय अन्य कोई मार्ग संसार - सागर को पार करने का नहीं है ।