वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 601–610

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 601–610

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वेवार्थपारिजातः ५७१ वायोरग्निः, अग्नेरापो जायन्ते । अद्भयः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः, ताभ्योऽनम्, अन्नाद्रेतः, तस्मात्पुरुषो जायते । न मनामप्यस्याः श्रुतेर्दयानन्दीयार्थसमर्थनं भवति । यथाकाशवाय्वग्नीनां होमनेरपेक्ष्येणैवोत्पत्तिः, तथैव जलपृथिव्यादी-नामपि तन्नैरपेक्ष्येणैवोत्पत्तिवर्णनात्, तथैव सम्भवाच्च । मन्वादिभिः पुराणैश्चाग्नेरपामद्भ्यः पृथिव्या उत्पत्तिरुक्ता । अतः शतपथप्रसङ्गे पृथिव्या उत्पत्तिमनुक्त्वेव अग्नेर्धूमो धूमादभ्रमभ्राद् वृष्टिरित्युक्त्वानेरेता जायन्त इत्युक्तम् । मनुना गीतया चापि तस्मिन् प्रसङ्गे पृथिव्या उत्पत्तिर्नोक्ता । तस्मात्तैत्तिरीयश्रुतिः परमेश्वरात् सृष्टिक्रमं वर्णयति, नाग्निहोत्रादिफलं वर्णयति । न सर्व जलं पर्जन्यादेव । पर्जन्यस्यापि सौरतेजः सम्पृक्तात् समुद्रादुत्पत्तिदर्शनात्, तथैव वैज्ञानिकेरप्यभ्युपगमाच्च । सीमित होमधू मै विश्वनभोण्या पिपर्जन्यमण्डलस्योत्पत्त्यसम्भवाच्च । सनातनरीत्या त्वाहुतः स्वल्पांशेनापि विशिष्टादृष्टवशादंशेन देवतृप्तिरंशेन च दृष्ट्यादिकमपि संप-द्यत इति देवताविकरणप्रसङ्गे वक्ष्यते । तस्मात्स्थूलजलस्य समुद्रादन्यत्रापि जनोपयोगिजलाद्युत्पत्तय एव पर्जन्योत्पत्तिः । नेतावदेव छान्दोग्यश्रुत्या त्वग्निहोत्राद्यनुष्ठायिन धूमादिमार्गेण चन्द्रलोकमुपगताना चान्द्रमसशरीराणामेव स्वर्गः, पुण्यक्षये शोकतापद्रवभावानामेव पर्जन्यभावापत्ति:, तेषामेव वृष्ट्घौषधशुत्रादिक्रमेण गर्भभावापत्तिश्च स्पष्टमुक्ता । ' पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवच पो भवन्ति ' इति श्रुतेः । सिद्धान्ते त्वग्निहोत्रादिकं प्राणिशुभाशुभकर्ममात्रस्योपलक्षणम्, कर्मसापेक्षस्यैव परमेश्वरस्य सृष्टौ प्रवृत्तेः । अन्यथा विषमसृष्टिनिर्मातुः परमेश्वरस्य वैषम्यनैण्ये प्रसज्येयाताम् । ' वैषम्यनर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति ' ( ब ० सू ० २1१1३४ ) इति बादरायणेन तथैव निर्णीतत्वात् । अपि च, न धूमोत्पत्तिरेव होमप्रयोजनम्, होममन्तराप्यार्द्रेन्धनसंयोगाद् भवत्येव धूमोत्पत्ति | । इदानीं तु पाषाणेङ्गालाग्नेय-डीजल पेट्रोलादिभिरपि यन्त्रागारेभ्योऽपरिमितो धूमो जायते । तस्माद् वेदोक्तविधानानुसारिषुतदुग्धव्रीहियव-afe से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधियां, योषधियों से अन्न, अन्न से वीर्य और वीर्य से पुरुष पैदा होता है । इस श्रुति से दयानन्द के सल का थोड़ा सा भी समर्थन नहीं होता । जैसे आकाश, वायु प्रभृति की बिना होम के ही उत्पत्ति होती है, उसी तरह जल, पृथिवी आदि की भी निरपेक्ष उत्पत्ति यहाँ कही गई है और यही सम्भव भी है । मनु आदि ने और पुराणों ने भी अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति बताई है । शतपथ ब्राह्मण में पृथिवी की उत्पत्ति को न बताकर अग्नि से धूम, धूम से बादल, बादल से वृष्टि इत्यादि कहते हुए अग्नि से ही इनकी उत्पत्ति मानी है । मनु और गीता ने भी इस प्रसङ्ग में पृथिवी की उत्पत्ति नहीं कही । इसलिये यह सिद्ध है कि तैत्तिरीय श्रुति परमेश्वर से सृष्टि के क्रम को बताती है, अग्निहोत्र के फल को नहीं बताती । सारा जल वृष्टि से ही पैदा नहीं होता । पर्जन्य की भी उत्पत्ति सूर्य के तेज से संपृक्त सागर से देखी गई है । वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं । होम के सीमित धूम से सारे संसार के आकाश में पर्जन्य मंडल की उत्पत्ति सम्भव नहीं हो सकती । सनातनियों की पद्धति से तो आहुति के थोड़े से भी अंश से विशिष्ट अदृष्ट के कारण एक अंश से देवताओं की तृप्ति तथा दूसरे अंश से वृष्टि आदि भी हो सकती है, यह बात देवताधिकरण में कही जायगी । इसलिये स्थूल जल की समुद्र से अन्यत्र भी मनुष्यों के उपयोगी जल, अन्न आदि की उत्पत्ति के लिये ही बादलों की उत्पत्ति होती है । इतना ही नहीं, छान्दोग्य श्रुति में तो स्पष्ट बताया गया है कि अग्निहोत्र आदि का अनुष्ठान करने वाले व्यक्तियों का धूमादि मार्ग से चन्द्रलोक गमन और चान्द्र शरीर प्राप्त होने पर ही स्वर्ग मिलता है । पुण्य के क्षीण हो जाने पर शोक, ताप आदि ही द्रवीभूत होकर बादल बन जाते हैं । ये ही वृष्टि, औषध, शुक्र आदि के क्रम से गर्भ के रूप में परिणत होते हैं । ' पञ्चमी आहुति में जल पुरुष के समान हो जाता है ' यह श्रुति इसमें प्रमाण है । हमारे मत में तो अग्निहोत्र प्रभृति शब्द प्राणी के शुभ अशुभ कर्ममात्र के उपलक्षक हैं, क्योंकि ईश्वर कर्म के सहारे ही सृष्टि में प्रवृत्त होता हैं । कर्म के बिना सृष्टि करने पर ईश्वर के विषम सृष्टि के निर्माता होने पर उसमें वैषम्य और निर्दयता के दोष की आपत्ति होगी । ' वैषम्यनैर्घृण्ये ० ' इत्यादि बादरायण सूत्र में यही बात कही गई है । धूम की उत्पत्ति ही होम का प्रयोजन नहीं हो सकता, क्योंकि घूम तो होम के बिना भी गोली लकड़ी को जलाने से भी हो सकता है । आजकल तो पत्थर का कोयला, डीजल, पेट्रोल आदि से भी कारखानों आदि अपार धुँआ निकलता है । इसीलिये यही मानना उचित है कि वेदोक्त विधान के अनुसार घी, दूध, व्रीहि, यव,

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१७२ वेदार्थपारिजातः सोमादिहोमजनितविशिष्टहोमेरेव स्वास्थ्यकारिजलवर्षक पर्जन्योत्पत्तिः प्रकृतेऽभिमता । तथा चाग्निहोत्रादियज्ञानां स्वर्गजनकत्वेऽप्यनुषङ्गिकं फलं स्वास्थ्यकारिजलादिप्राप्तिरूपमपि । स तपोऽतप्यतेत्यादिरपि न प्रकृतोपयोगी | यदुक्तम्- ' अन्नं ब्रह्मेत्युच्यते जीवनस्य बृहद्धेतुत्वात्, शुद्धजल-वाय्वादिद्वारेव प्राणिभ्यः सुखं भवति नातोऽज्यथेति ( पृ ० ५६ ), तदपि पिष्टपेषणमेव । स तपोऽतप्यत इति श्रुतस्त्वयमर्थः भृगुर्वरुणं पितरं ब्रह्मविद्यार्थमुपससार । तेन ' तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व ' इत्युक्त्वा ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति ' इति ब्रह्मलक्षणमेतदुक्तम् । भृगुणा च विज्ञानलक्षणेन तपसा प्रथममन्तं ब्रह्मेति विज्ञातम् । अन्नाद्धये व खल्विमानि भूतानि जायन्ते इत्यादि । तपसैव च क्रमेण प्राणो ब्रह्म मनो ब्रह्म विज्ञानं ब्रह्मेति ज्ञात्वान्ते आनम्दो ब्रह्मेति विज्ञातम् । मुख्यब्रह्मज्ञान उपयोगित्वाद् अन्नादिषु गौणी ब्रह्मबुद्धिः । ब्रह्मकार्यत्वेन ब्रह्मत्वे तु घटादीनामपि ब्रह्मत्वापत्तिः । सिद्धान्ते तु सर्वस्यैव प्रपञ्चस्य ब्रह्मविवर्तत्वेन बाधसामानाचि करण्यात् सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति श्रुतिसङ्गतिः । यदप्युक्तम्- ' तत्र द्विविधः प्रयत्नोऽस्ति, ईश्वरकृतो जीवकृतश्च । ईश्वरेण खलु अग्निमयः सूर्यो निर्मितः सुगन्धपुष्पादिश्च । स निरन्तरं सर्वस्माज्जगतो रसानाकर्षति तस्य सुगन्धदुर्गन्धाणुसंयोगत्वेन तज्जलवायू अपि अनिष्टगुणयोगाद् मध्यगुणौ भवतः तयोः सुगन्धदुर्गन्धमिश्रितत्वात् तज्जलदृष्टावोषध्यन्नरेतःशरीराण्यपि मध्यमान्येव भवन्ति, तन्मध्यमत्वात् । बल - बुद्धि - वीर्य पराक्रम घर्य शौर्यादयां गुणा अपि मध्यमा भवन्ति । कुतः? यस्य यादृशं कारणमस्ति तस्य तादृशमेव कार्य भवतीति दर्शनात् । अयं खल्वीश्वरसृष्टेर्दोषो नास्ति । कुतः? दुर्गन्धादिविकारस्य मनुष्यसृष्टयन्तर्भवात् । यतो दुर्गन्धादिविकारस्योत्पत्तिर्मनुष्यादिस्य एव भवति । तस्मादस्य निवारणमपि मनुष्यैरेव सोम आदि के होम से पैदा हुए विशिष्ट घुएँ से ही स्वास्थ्यकर जल को वर्षा वाले बादलों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार afar आदि यज्ञों की स्वर्गजनकता के रहते हुए भी उनका आनुषंगिक फल स्वास्थ्यकर जल की प्राप्ति भी है । ' स तपोऽतप्यत ' इत्यादि वचन भी प्रकृत विषय में सहायक नहीं है । यह जो कहा गया है कि- ' अन्न को ब्रह्म कहते हैं, क्योंकि यह सभी जीवों के जीवन का मुख्य साधन है । जब होम से वायु, जल और औषधि आदि शुद्ध होते हैं, तभी सब जगत् को सुख होता है, अन्यथा नहीं ' ( पृ ० ५७ ), यह भी मात्र पिष्टपेषण है । ' स तपोऽतप्यत ' इत्यादि श्रुति का यह अर्थ है - भृगु ऋषि ब्रह्मविद्या की अति के लिये अपने पिता वरुण के पास गये । ' ब्रह्म को तप से जानो ' ऐसा कह कर ' यतो वा इमानि भूतानि ' इत्यादि से ब्रह्म का लक्षण बताया । भृगु ने ब्रह्म का लक्षण जानकर पहले यह समझा कि अन्न ही ब्रह्म है, क्योंकि इसी से ये सब प्राणी पैदा होते हैं -इत्यादि । तप के द्वारा ही उसने क्रमश: प्राण, मन और विज्ञान को ब्रह्म जानकर अन्त में आनन्द ब्रह्म है, यह जाना । यहाँ पर मुख्य ब्रह्म के ज्ञान के उपयोगी होने से अन्नादि में गोणी ब्रह्म बुद्धि मानी गई है । यदि ब्रह्म के कार्य होने से इनको ब्रह्म माना जाय तो घट प्रभूति में भी ब्रह्मस्व की आपत्ति आवेगी । सिद्धान्त में तो सारे प्रपंच के ही ब्रह्म का विवर्त होने से बाघ के साथ सामानाधिकरण्य होने से ' यह सब कुछ ब्रह्म है ' इस श्रुति की संगति बैठ जायगी । आगे कहा गया है -- ' सो उसकी शुद्धि करने में दो प्रकार का प्रयत्न हैं, एक तो ईश्वर का किया हुआ और दूसरा जीव का । उनमें से ईश्वर का किया यह है कि उसने अग्निरूप सूर्य और सुगन्ध पुष्पादि पदार्थों को उत्पन्न किया है । वह सूर्य निरन्तर सब जगत् के रसों को पूर्वोक्त प्रकार से ऊपर खींचता है और जो पुष्पादि का सुगन्ध है, वह भी दुर्गन्ध को निवारण करता रहता है, परन्तु वे परमाणु सुगन्ध और दुर्गन्धयुक्त होने से जल और वायु को भी मध्यम गुण वाला कर देते हैं । उस जल की वृष्टि से योषधि, अन्न, वीर्य और शरीरादि भी मध्यम गुण वाले हो जाते हैं और उनके योग से बुद्धि, बल, ादि गुण भी मध्यम ही होते हैं, क्योंकि जिसका जैसा कारण होता है, उसका वैसा हो कार्य होता है । वृष्टि जल का दोषयुक्त होना सर्वत्र देखने में आता है । सो यह दोष ईश्वर की सृष्टि से नहीं, किन्तु मनुष्यों पराक्रम, धैर्य और शूर-यह दुर्गन्ध से वायु और की सृष्टि से ही होता है ।

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वेदार्थपारिजातः I कर्तव्यम् । यथेश्वरेणाज्ञा दत्ता सत्यभाषणमेव कर्तव्यं नानुतमिति । यस्तामाज्ञामुल्लङ्घय प्रवर्तते स पापीयान् भूत्वा क्लेशं चेश्वरव्यवस्था प्राप्नोति । तथा यज्ञः कर्तव्य इतीयमध्याज्ञा तेनैव दत्तास्ति । यस्तामप्युल्लङ्घयति सोऽपि पापीयान् सन् क्लेशवांश्च भवति ' ( पृ ० ५७ ) इति, तदपि न विचारसहम्, ईश्वराज्ञाया असिद्धेः । त्वं मन्त्राणामेव वेदत्वमीश्वराज्ञारूपत्वं चाभ्युपैषि । न च मन्त्रेषु विधिरूपा काचिदाज्ञा समुपलभ्यते । सिद्धान्ते तु मन्त्रभाग-देव ब्राह्मणभागस्यापि वेदत्वाभ्युपगमात् सत्यं वद धर्म चर नानृतं वदेद् यजेत जुहुयाद् इत्यादिब्राह्मणवचनाना-मीश्वराज्ञारूपत्वमस्त्येव । किञ्च, वायुजलादिशुद्धेरेव यागादिफलत्वे शुद्धिरेव फलं मन्त्रैर्ब्राह्मणैः सूत्रर्मीमांसाभिश्चोच्येत । न चोच्यते तत्फलम् । किञ्च, ' प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्धधते । एवं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता ॥ ' इति रीत्या प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनवगतबोधकत्वेनैवाज्ञातज्ञापकत्वेनाप्रवृत्तप्रवर्तकत्वेन च वेदानां प्रामाण्यं सम्भवति । होम जलशुद्धिर्भवतीति तु त्वादृर्शः प्रत्यक्षानुमानाभ्यामेव ज्ञातुं शक्यते । ततो न भवत्येव वैदिकी तथाभूताज्ञा । ज्ञातार्थबोधकत्वेन ' अग्निहिमस्य भेषजम् ' इतिवदनुवादित्वेन ताद्गर्थबोधकवाक्यस्य प्रामाण्यानुपपत्तेः । यदपि च -- ' यन्न खलु यावान् मनुष्यादिप्राणिसमुदायो भवति तत्र तावानेव दुर्गन्धसमुदायो जायते । न चैवमीश्वरसृष्टिनिमित्तो भवितुमर्हति । कुतः? मनुष्यादिप्राणिसमुदायनिमित्तोत्पन्नत्वात् । यत्र खलु मनुष्याः स्वसुखार्थ हस्त्यादिप्राणिनामेकत्र बाहुल्यं कुर्वन्ति । अतस्तज्जम्योऽप्यधिको दुर्गन्धो मनुष्येच्छानिमित्त एव जायते । एवं वायुवृष्टिजलदूषणकः सर्वो दुर्गन्धो मनुष्यनिमित्तादेवोत्पद्यते, अतस्तस्य निवारणमपि मनुष्या एव कर्तुमर्हन्ति । मनुष्या एवोपकारानुपकारी वेदितुमहः सन्ति । मननयोगादेव मनुष्यत्वं जायते । परमेश्वरेण हि सर्वदेहधारिणां मध्ये मनस्विनो विज्ञानं कर्तुं योग्या मनुष्या एव सृष्टाः । तद्देहेषु परमाणु संयोगविशेषेण विज्ञानभवनानुकूलानामवयवा-इस कारण से उसका निवारण करना भी मनुष्यों को ही उचित है । जैसे ईश्वर ने सत्यभाषणादि धर्म व्यवहार करने की आज्ञा दी है, मिथ्याभाषणादि की नहीं, जो इस आज्ञा से उलटा काम करता है, वह अत्यन्त पापी होता है और ईश्वर की न्याय व्यवस्था से उसको क्लेश भी होता है । वैसे ही ईश्वर ने मनुष्यों को यज्ञ करने को आज्ञा दी है । इसको जो नहीं करता, वह भी पापी हो के दुःख का भागी होता है ' ( पृ ० ५७-५८ ) | यह बात भी विचार करने पर टिक नहीं सकती, क्योंकि ईश्वर की आज्ञा सिद्ध ही नहीं होगी । आप मन्त्रों को ही वेद और ईश्वर की आज्ञा मानते हैं, किन्तु मन्त्रों में विधि रूप कोई आज्ञा उपलब्ध नहीं होती । हमारे मत में तो मन्त्र-भाग के समान ब्राह्मणभाग भी वेद के अन्तर्गत हैं, अतः सच बोलो, धर्म का आचरण करो, झूठ न बोले, यज्ञ करे, हवन करे इत्यादि ब्राह्मण वचन ईश्वर की आज्ञा के रूप में स्वीकार्य होंगे । अपि च, वायु, जल आदि की शुद्धि के हो यागादि के फल होने पर मन्त्र, ब्राह्मण, सूत्र, मीमांसा आदि में शुद्धि रूप फल का हो f वधान होना चाहिये, किन्तु यह कहीं कहा नहीं गया है । किं च, ' जो आप प्रत्यक्ष अथवा अनुमान प्रमाण से प्रतीत नहीं होता, इसको छेद से जाना जाता है । इसीलिये वेद की वेदता सार्थक है ' इस प्रमाण से प्रत्यक्ष और अनुमान से अवगत का बोधक होने से, अज्ञात का ज्ञापक और अप्रवृत्त का प्रवर्तक होने से वेदों का प्रामाण्य संभव होता है । होम से वायु - जल की शुद्धि होती है, यह बात तो आपके जैसे व्यक्ति भी प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से ही जान सकते हैं । इसलिये इस प्रकार की आज्ञा वेदविहित नहीं कही जा सकती, क्योंकि यह ज्ञात अर्थ की बोधक है, ' अति ठंड की दवा है ' इस वाक्य के समान अनुवाद मात्र होने से इस प्रकार के अर्थ के बोधक वाक्यों को प्रमाण नहीं माना जा सकता । यह कहना कि ' जहाँ जितने मनुष्य आदि के समुदाय अधिक होते हैं, वहाँ उतना हो दुर्गन्ध भी अधिक होता है । वह Fear की सृष्टि से नहीं, किन्तु मनुष्यादि प्राणियों के निमित्त से ही उत्पन्न होता है । क्योंकि हस्ती आदि के समुदायों को मनुष्य अपने ही सुख के लिये इकट्ठा करते हैं, इससे उन पशुओं से भी जो अधिक दुर्गन्ध उत्पन्न होता है, सो मनुष्यों के ही सुख की इच्छा से होता है । इससे क्या आया कि जब वायु और वृष्टि जल को बिगाड़ने वाला सब दुर्गन्ध मनुष्यों के ही निमित्त से उत्पन्न होता है, तो उसका निवारण करना भी उनको ही योग्य है । क्योंकि जितने प्राणी देहधारी जगत् में हैं, उनमें से मनुष्य ही उत्तम हैं । इससे वे ही उपकार और अनुपकार को जानने योग्य हैं | मनन नाम विचार का है, जिसके होने से ही मनुष्य नाम होता है, अन्यथा नहीं । क्योंकि ईश्वर ने

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५७७ वेदार्थपारिजातः नामुत्पादितत्वात् । अतस्त एव धर्माधर्मयज्ञानुष्ठाने च कर्तुमर्हन्ति न चान्ये | अतः सर्वोपकाराय सर्वेर्मनुष्ययज्ञः कर्तव्य: । ' ( पृ ० ५८ ) इति, तदपि निरर्थकं पिष्टपेषणं च । तथाहि - मनुष्यादिप्राणिसमुदायस्यापीश्वरसृष्टत्वात् तन्निमित्तकस्य दुर्गन्धादेरपीश्वरनिमित्तत्वानपायात् । यो हि यस्य निर्माता भवति स एव तनिमित्तकानि -वार्यपरिणामस्यापि निमित्तं भवति । न केवलं सर्वे जङ्गमा एवं वृक्षादयोऽपि रात्रौ हानिकारकं वायुविशेषं मुञ्चन्ति । तथापि यथा पादलपुष्पादिगतजन्तूनां मलनिर्मोको न पुष्पदूषणायालं भवति, कुतस्तदपेक्षया पुष्पसौगन्धस्य बाहुल्यात्, तथैव वायुजलपृथिव्यादिसमुत्पन्नानां प्राणिनिमित्तदौर्गन्ध्यादिकमप्यकिञ्चित्करमेव भवति । कुतस्तत्कारण-aarti पावकत्वातिशयोपेतत्वात् । अत एव नहि नदीप्रवाहो जलतन्तुभिर्दूषितो भवति । न वा समुद्रः स्वगत-जन्तुभिः । तथैव पृथिव्यपि स्वगतजन्तुभिर्मनुष्यादिभिर्न दृष्यते, तस्या महत्त्वातिशयेन सर्वदौर्गन्ध्यहारित्वात् । काश तु ततो s पि महान्तावसङ्गी सर्वदोषहारिणौ च तेषामपि कारणत्वात् । परमात्मा तु सर्वकारणत्वात् ततोऽपि महानसङ्गी निर्लेपः सर्वदोषहरः । तल एव न कारणभूताकाशवायुतेजोजलपृथिवीतत्परमाणूनां मनुष्यादि-समुद्भूतदौगंन्ध्यादिभिर्दूषितत्वं मध्यमस्वं वा वक्तुं शक्यम्, समष्टिकारणस्य कार्यदोषादूषितत्वात् । अत एव सादृशंमंध्यमैरेवाग्निजलंस्तादृशंरेव दुग्धघृतसोमादिभिस्तादृशैरेव मनुष्येरेव देवादिपूजनं भवति । परमेश्वराय देवेभ्यश्च हविर्दीयते । परमेश्वराय विविधनैवेद्यानि च निवेद्यन्ते । विनियुक्तमन्त्रैर्भावनाभिश्च याज्ञिकैर्यज्ञसम्भार-पात्रहविरादीनां लौकिकानामपि दिव्यत्वापादनं क्रियते । ' देवो भूत्वा देवान् यजेत ' इति हि श्रुतिः । ' देव्याय कर्मणे शु raan ' ( वा ० सं ० १११३ ) इत्यादिमन्त्रेभ्यः । न च त्वद्रीत्या तदपि सम्भवति । त्वया तु स्मरणार्थमेव मन्त्रो -च्चारणमङ्गीक्रियते । किञ्च त्वद्रीत्या मनुष्यादिजनितदोर्गन्ध्यादिभिर्वायुजलादीनां यथा मध्यमत्वं तथैवाग्नेरपि मध्यमत्वमेव भविष्यति । तथा सति मध्यमे दोर्गन्ध्यादिदूषितेऽनो होमेनापि कथं मध्यमत्वनिवृत्तिः? मनुष्य के शरीर के परमाणु आदि के संयोगविशेष से विज्ञानोत्पत्ति के अनुकूल अवयव इस प्रकार रचे हैं कि जिनसे उनको ज्ञान की उत्पत्ति होती है । इसी कारण से धर्म का अनुष्ठान और अधर्म का त्याग करने को भी वे ही योग्य हैं, अन्य नहीं । इससे सबके उपकार के लिये यज्ञ का अनुष्ठान भी उन्हीं को करना उचित है ' ( पृ ० ५८ ) । यह भी निरर्थक पिष्टपेषण मात्र है । मनुष्य आदि समुदाय को भी ईश्वर ने ही बनाया है, अतः तन्निमित्तक दुर्गन्ध का निमित्त ईश्वर ही हुआ । जो जिसका निर्माता होता है, वही उसके निमित्त से होने वाले अनिवार्य परिणामों का भी निमित्त होता है । न केवल जीवजन्तु, रात्रि में वृक्ष भी हानिकारक गैस छोड़ते हैं । तो भी जैसे पाटल पुष्पादि में रहने वाले जन्तुओं का मल पुष्प को दुषित नहीं करता, क्योंकि उसकी अपेक्षा पुष्पगत सुगन्ध का आधिक्य है, उसी तरह वायु, जल, पृथिवी आदि में उत्पन्न प्राणिनिर्मित दुर्गन्ध कुछ हानि नहीं पहुँचा सकती, क्योंकि उसके कारणभूत वायु आदि में पवित्र करने की शक्ति अधिक है । इसीलिये नदी का प्रवाह जल के जन्तुओं से दूषित नहीं होता और समुद्र भी अपने जन्तुओं से दुषित नहीं होता । इसी तरह पृथिवी भी अपने ऊपर विद्यमान मनुष्य आदि से दूषित नहीं होगी, क्योंकि वह अपने महत्त्व से सारी दुर्गन्ध को दूर कर देगी । वायु और आकाश वो उससे भी महान् और असंग हैं । ये सभी दोषों को दूर कर देने वाले हैं, क्योंकि ये पृथिवी आदि के भी कारण है । परमात्मा तो इन सभी का कारण होने से सबसे महान्, असंग, निर्लेप, सब दोषों का दुर करने वाला है । इसीलिए कारणभूत आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी और इनके परमाणु मनुष्य आदि के द्वारा उत्पन्न की गई दुर्गन्ध से दूषित अत एव मध्यम नहीं कहे जा सकते, क्योंकि जो समष्टि का कारण है, वह कार्य के दोष से दूषित नहीं होता । इसलिए इस प्रकार की मध्यम अवस्था वाले अग्नि, जल आदि से और इसी तरह के घी, दूध, सोम आदि से और ऐसे ही मनुष्यों के द्वारा देवादि का पूजन होता है । परमेश्वर और देवताओं को हवि दी जाती है । परमेश्वर को विविध नैवेद्य चढ़ाए जाते हैं । विनियुक्त मन्त्रों से और भावना से याज्ञिकगण यज्ञ की सामग्री, पात्र, हवि आदि लौकिक पदार्थों में दिव्यता का आपादन करते हैं । ' स्वयं देव बनकर देवताओं का यजन करे यह farer है | ' देव सम्बन्धी कर्म के लिए आपपवित्र होइशा ' ऐसा मन्त्र भी है । आपकी रीति से तो यह हो नहीं सकता । आप तो केवल स्मरण के लिये मन्त्र का उपयोग मानते हैं । अपि च, आपके मत में मनुष्यादि से उत्पन्न दुर्गन्ध से जैसे वायु, जल आदि की

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कार्यपारिजातः पू ७५ शुद्धाग्निजलादिभिरशुद्धिनिवृत्तिः सम्भवति, मलेन मलप्रक्षालनवत् । यथा त्वया कस्तूर्यादिसुगन्धिद्रव्याणां होमेत विनाशेऽपि नात्यन्तविनाशोऽभ्युपेयते, सूक्ष्मरूपेण तेषां सत्वाद् विशेषादुपकारकत्वमम्युपेयते, तथैव वद्रीत्येव दौर्गल्या-दोनामपि नात्यन्त विनाशो भविष्यति, तथैव तेषामनुपकारकत्वमपि भविष्यत्येव तुल्यन्यायात् । धर्मशास्त्रेष्वपि यथा खनन - दहन - प्लावन - गोक्रमणादिभिः प्रसव - रक्तास्थिमलादिदूषितभूमेः शुद्धिविधीयते, तथैव कालातिक्रमेणापि भूमिशुद्धि-रभ्युपेयते । आधुनिकंस्तु होमादिमन्तरेव भूमिजलाग्निभिरुग्रक्षा रचूर्ण फिनायलादिभिश्च यादृशी शुद्धिविधीयते, न तादृशी शुद्धहमादिभिः सम्भवति । परिमितसुगन्धिद्रव्यः प्रभूतदोर्गन्ध्याभिभवासम्भवात् । सत्यपि होमे सोध्यौन्य मिश्रणमेव भविष्यति न तदत्यन्ताभावः, अग्नी प्रक्षिप्तकस्तुर्यादेरिव दोर्गन्ध्यस्यापि त्वगीत्यात्यन्तविनाशासम्भवात् । वस्तुतस्तु दयानन्दीयानि पूर्वोक्तवाक्यान्यसम्बद्धाम्यशुद्धयादिदोषदुषितान्येव । तथाहि -- ' द्विविधः प्रयत्नोऽस्ति ' इत्यसङ्गतमेव । यथा जीवेश्वरभेदेन प्रयत्नद्वैविध्यं तथैव जीवानामानन्त्येन प्रयत्नानन्त्यसम्भवेन द्वविध्यासम्भवात् । ननु जीवत्वावच्छिन्नयावज्जीवकृतत्वेन जीवेश्वरभेदेन प्रयत्नद्वैविध्यमेवेति चेन्न तथा सति प्रयत्नत्वेन रूपेण सर्वस्यापि प्रयत्नस्यैकत्वोपपत्त्या द्वेविध्यायोगात् । प्रयत्नद्वे विध्यवर्णनं व्यर्थमेव प्रकृतेऽनुपयोगात् । ईश्वरेण खल्वग्निमयः सूर्यो निर्मित इत्यत्र कर्तुरीश्वरस्येव कारणत्ववर्णनं न कृतेः ( प्रयत्नस्य ), तदप्यशुद्धम्, कर्तृत्वेन कार्यमात्र प्रति जनकत्वे मानाभावात्, गौरवपराहतत्वाच्च । कर्तुः कारणत्वे कारणतावच्छेदकं कर्तृत्वं भविष्यति । कर्तृत्वं कृतिमत्त्वमेव । कृतिमत्त्वं च कृतावेव पर्यवस्यति । तस्याश्च नानात्वेन गौरवमेव । किन्तु स्वोपादानगोचरापरोक्षज्ञानजन्यत्वं तादृशेच्छाजन्यत्वं कृतिजन्यत्वं वा साध्यम् । तथात्वे कारणतावच्छेदकं कृतित्वमेव, तच्चकमिति लाघवम् । मध्यमता होती है, उसी तरह अग्नि की मध्यमता होगी । ऐसा होने पर मध्यम अग्नि के भी दुर्गन्ध दूषित हो जाने पर उस अग्नि में होम करने से भी मध्यमत्व दोष की निवृत्ति कैसे होगी? मल से जैसे मल का प्रक्षालन नहीं होता, उसी तरह अशुद्ध जल आदि से भी अशुद्धि दूर नहीं हो सकती । जैसे आप कस्तूरी आदि सुगन्ध द्रव्यों का हवन करने पर विनाश हो जाने पर भी उनका अत्यन्त विनाश नहीं मानते, सूक्ष्म रूप से उनकी विद्यमानता के कारण उनमें विशेष उपकारकता मानते हैं, उसी तरह आपको रीति से ही दुर्गन्ध आदि का अत्यन्त विनाश नहीं होगा और उसी न्याय से इनकी विशिष्ट अनुपकारकता भी अक्षुण्ण रहेगी | धर्मशास्त्रों में भी जैसे खनन, दहन, प्लावन, गोक्रमण आदि से प्रसद, रक्त, अस्थि, भल आदि से दुषित भूमि की शुद्धि विहित हैं, उसी तरह काल के अतिक्रम से भी भूमि की शुद्धि मानी गई है । आधुनिक वैज्ञानिक तो होम आदि के बिना ही भूमि, जल, अग्नि से उम्र क्षार चूर्ण, फिनाइल आदि से जिस प्रकार की शुद्धि करते हैं, वैसी शुद्धि होमादि से नहीं हो सकती । परिमित सुगन्धि द्रव्य अपरिमित दुर्गन्ध को नष्ट नहीं कर सकते । होम के किये जाने पर भी दुर्गन्ध के साथ सुगन्धि का मिश्रण ही होगा । दुर्गन्ध का अत्यन्त नाश नहीं होगा, आपके मत से अग्नि में प्रक्षिप्त कस्तुरी आदि के समान ही दुर्गन्ध का भी अत्यन्त विनाश संभव नहीं है । वास्तव में तो दयानन्द के पूर्वोक्त वाक्य न केवल असंबद्ध, अशुद्धि दोष से भी दूषित हैं । जैसे कि प्रयत्न दो तरह का है, यह कथन असंगत है । जैसे जीव और ईश्वर के भेद से प्रयत्न दो प्रकार का है, उसी तरह जीवों के अनन्त होने से प्रयत्न भी अनन्त होंगे, फलतः उनकी द्विविधता युक्त नहीं । जीवत्व से अवच्छित यावत् जीवों के प्रयत्न को एक मानकर प्रयत्न की द्विषता सिद्ध करना भी ठीक नहीं, क्योंकि इस तरह से तो प्रयत्नत्व से अवच्छित यावत् प्रयत्नों को एक ही मानना पड़ जायगा, जब उसके दो भेद भी नहीं बन सकेंगे । बिना प्रसंग के यहां पर प्रयत्न की द्विविधता की चर्चा व्यर्थ है । ' ईश्वर ने सूर्य को अग्निमय बनाया ' यहां पर कर्ता ईश्वर को ही कारण कहा गया है, कृति ( प्रयत्न ) को नहीं, यह भी गलत है, क्योंकि कर्ता के रूप में कार्य मात्र की जनकता में कोई प्रमाण नहीं है और यहां पर गौरव दोष भी होगा । कर्ता को कारण मानने पर कारणता का अवच्छेदक कर्तृत्व होगा | कर्तृत्व और कृतिमत्व एक ही वस्तु है । कृतिमत्व का पर्यवसान कृति में ही होगा । कृतियां नाना प्रकार की हैं, अतः यहाँ गौरव

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५७६ वैदार्थ पारिजातः अपि च ' स निरन्तरं सर्वस्माज्जगतो रसानाकर्षति ' इति वाक्ये तत्पदार्थः कः? इत्यपि विचारणीयम् । तत्पदस्य प्रकृतपूर्वपरामशित्वेन प्रत्यासत्तिन्यायेन च पूर्वप्रकृतः सुगन्धपुष्पादिरेव तत्पदार्थो मन्तव्यः । तस्य व सर्वजगद्रसाकर्षकत्वं न सम्भवत्येव, प्रमाणविरुद्धत्वात् । यदि चार्थसम्वन्धवशाद् दूरस्थोऽपि सूर्य एव तत्पदेन गृह्येत, तथापि सुगन्धपुष्पादिश्चेति पदमत्र निरर्थकमेव स्यात् । साधुत्वं चाप्यस्य चिन्त्यमेव । एवमेव तस्य सुगन्ध- दुर्गन्धाणु-योगत्वेन तज्जलवायू इष्टानिष्टगुणयोगान्मध्यगुणौ भवतस्तयोः सुगन्धदुर्गन्धमिश्रितत्वाद् इति वाक्येऽपि तच्छब्दस्य पूर्वपरामशत्वात् सूर्याकृष्टो रस एव तत्पदार्थो वक्तव्यः, अन्यस्यासम्भवात् । तथा च तस्य सूर्याकृष्टरस्य सुगन्ध-दुर्गन्धानुयोगत्वेनेत्यायातम्, तच्चात्यन्तमसङ्गतम्, सुगन्धदुर्गन्धाणुभी रसस्य योगानिरूपणात् । कोऽन्न योगः सम्भवति? ननु सम्बन्ध एव योगः, शोभनो गन्धः सुगन्धः, दुष्टो गन्धो दुर्गन्धः, सुगन्धश्च दुर्गन्धश्च सुगन्धदुर्गन्धो, तयोरणवः सुगन्धदुर्गन्धाणवस्तैर्योगः सुगन्धदुर्गन्धाणुयोगः, तत्त्वं तेनेति न कश्चिद्दोष: ' इति चेन्न, सुगन्धदुर्गन्धयोर्गुणत्वे-नात्वासम्भवात् । नहि गन्धपरमाणवः कैश्चिदस्युपेयन्ते । न च ते रसस्य सम्वन्धः सम्भवति, रसगन्धयोः सम्बन्धा-निरूपणात् । न च शोभनो गन्धो येषां ते सुगन्धाः, दुष्टो गन्धो येषां ते दुर्गग्धा इति बहुव्रीह्याश्रयणेनासुरभिसुरभि विशिष्टाः परमाणवः सम्भवन्त्येव । तैश्च रसस्यापि सम्बन्धः सम्भवत्येवेति वाच्यम्, तथात्वे ' गन्धस्येदुत्पति ' इत्यादि-सूत्रेण बहुव्रीहावित्वविधानविरोधात् । नहि तदानीं सुगन्धदुर्गन्धपदसाधुत्वम् । ' तज्जलवायू अपीष्टानिष्टगुणयोगान्मध्यगुणौ भवतः ' इति वाक्यस्यापि न सङ्गतिः, तज्जलेत्यत्र तच्छन्देन ' तयोर्जल वाय्वोः सुगन्धदुर्गन्धमिश्रितत्वात् ' इति त्वद्वाक्यबलेन तादृशाणुसम्बन्धग्रहणे गन्धसम्भवेन होगा । यहां पर अपने उपादान विषयक प्रत्यक्ष ज्ञान की जन्यता, तादृश इच्छाजन्यता अथवा कृतिजन्यता साध्य है । ऐसा होने पर कारणता का अवच्छेदक कृतित्व होगा । इसके एक होने से यहां लाघव है । बाप यह बताइये कि ' वह निरन्तर सारे जगत् से रसों को खींचता है ' इस वाक्य में तत्पद का अर्थ क्या है? यह भी विचारणीय है । तत्पद पूर्व प्रकृत अर्थ का परामर्शी है, इसलिये तथा प्रत्यासति न्याय से भी पूर्व प्रकृत सुगन्ध युक्त पुष्पादि ही तत्पद का अर्थ मानना पड़ेगा | पुष्पादि को पूरे जगत् के रस का खींचने वाला मानना प्रमाण विरुद्ध है । यदि अर्थ से संबद्ध होने के कारण दूरस्थ सूर्य ही तपद से परामृष्ट हो, तब भी ' सुगन्धपुष्पादि ' यह पद यहाँ पर निरर्थक हो जायगा । इसकी शुद्धता भी विचारणीय है । इस तरह ' उसके सुगन्ध और दुर्गन्ध के अणुओं के योग से जल और वायु में भी इष्ट एवं अनिष्ट गुणों के योग से मध्य गुण वाले हो जायेंगे, क्योंकि वे सुगन्ध और दुर्गन्ध से मिश्रित है ' इस वाक्य में भी ' तत् ' शब्द के पूर्व परामर्शी होने से सूर्य के द्वारा आकृष्ट रस ही स्पद का अर्थ होगा, क्योंकि दूसरे का उससे संबन्ध नहीं है । इससे उस सूर्य के द्वारा आकृष्ट रस का सुगन्ध और दुर्गन्ध से योग होने से, यह अर्थ हुआ । यह अर्थ अत्यन्त असंगत होगा, क्योंकि सूर्याकृष्ट रस का सुगन्ध और दुर्गन्ध के अणुओं से योग नहीं होता । यहाँ पर किस प्रकार का योग हो सकता है? भाई संबन्ध ही योग हो जायगा । शोभन गन्ध सुगन्ध और दुष्ट गन्ध को दुर्गन्ध कहते हैं । सुगन्ध और दुर्गन्ध के अणुओं से योग को सुगन्धदुर्गन्धाणुयोग कहेंगे । यही उसका स्वरूप होगा । आपका यह कथन भी उचित नहीं है, क्योंकि दुर्गन्ध और सुगन्ध ये गुण हैं । गुण होने से इनका अगुत्व से सम्बन्ध नहीं हो सकता । कोई भी गन्ध के परमाणुओं को ' स्वीकार नहीं करता और न गन्ध के परमाणुओं से इसका सम्बन्ध ही हो सकता है, क्योंकि रस और गन्ध का परस्पर सम्बन्ध नहीं बन सकता । जिनका शोभन गन्ध है, वे पदार्थ सुगन्ध और जिनका बुरा गन्ध है वे दुर्गन्ध, इस प्रकार बहुव्रीहि समास का सहारा लेने से सुरभि और असुरभि से विशिष्ट परमाणु हो ही सकते हैं और उनसे रस का भी सम्बन्ध हो ही सकता है, यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर गन्धस्येदुत्पूति ० ' इत्यादि पाणिनि सूत्र से बहुव्रीहि में इश्व के विधान का विरोध होगा । उस अर्थ में दुर्गन्ध और सुगन्ध पद शुद्ध नहीं माने जायेंगे । ' वे जल और वायु भी सुगन्ध और दुर्गन्ध के योग से मध्यम गुण वाले हो जाते हैं ' ' तज्जल ' यहाँ पर तत् शब्द से उस जल और वायु के सुगन्ध दुर्गन्ध से मिश्रित होने से इस प्रकार के यह वाक्य भी संगत नहीं है । वाक्य के बल से तादृश अणु के

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वेदार्थपारिजात se परमाणोः पृथिवीत्वात् पार्थिवाणुसम्बद्धी जलानिलावित्येव बोधः । तथा च तस्य सुगन्धदुर्गन्धाणुयोगत्वेनेति त्वद्ग्रन्येन पार्थिवपरमाणोः रससमवेतत्वोक्त्या जले वायौ वा का प्रभावस्तस्य । तच्छब्दार्थ परमाणुवृत्तिरस्येति वायो सर्वथापि एसाभावः । जले च पार्थिवकटुकषायतिक्तादिरसविजातीयो मधुर एव रसः । एवं च तज्जलबायु मध्यगुणी, इष्टानिष्टगुणयोगात् । न च स्वरूपासिद्धिः, पक्षे इष्टानिष्टगुणयोगत्वस्य सुगन्धदुर्गन्धमिश्रितत्वेन हेतुना सिद्धेरित्यादि-सर्वमशुद्धमेव जले वायो च मध्यमगुणसाधकहेतोरभावात् । तस्माज्जलानिलादिशोधनफलक मेवाग्निहोत्रादिकर्म सर्वैर्मनुष्यैः कर्तव्यमित्यनर्थकमेव, वचनानां परस्पराकाङ्क्षाराहित्येन दश दाडिमानि षडपूपा इत्यादिवाक्यवद् अपार्थकत्वात् । यद्ययग्निहोत्रादि कर्म सिद्धान्तेऽपोष्टमेव, तथापि वायुजलशोधनमेव न तत्फलम्, विधिप्रतिपादित-फलार्थमेव तदनुष्ठानस्येष्टत्वात् । नापि तत्सर्वेरेव कर्तव्यम्, अगृहस्थानां त्रैवर्णिकानामपत्नीकत्वेन शुद्राणां चानुपनीत-वेन तत्राधिकाराभावात् । यदुक्तम्- ' प्राणिनां मध्ये विज्ञानं कर्तुं योग्या मनुष्या एव सृष्टास्तद्देहेषु परमाणु संयोगविशेषेण विज्ञान-भवनानुकूलावयवानामुत्पादितत्वात् ' इति, तदपि सारशून्यम्, परमाणु संयोगविशेषेण विज्ञानोत्पादकावयवाभ्युपगमे चार्वाकमतप्रवेशापत्तेः । परमाणुभ्यस्तनिर्मितावयवेभ्यश्च विज्ञानोत्पत्तेरास्तिकैरनभ्युपगमात् । यदपि च --- कस्तूर्यादीनां सुरभियुक्तद्रव्याणामग्नी प्रक्षेपेण विनाशात् कथमुपकाराय यज्ञो भवितु-मर्हतीति? किन्त्वीदृशैरुत्तमैः पदार्थेर्मनुष्यादिभ्यो भोजनादिदानेनोपकारे कृते होमादप्युत्तमफलं जायते, पुनः किमर्थ यज्ञकरणम् ' इति शङ्कायाः समाधानायोक्तम् ' नात्यन्तो विनाशः कस्यापि भवति ' ( पृ ० ५ ९ ) इति, तदपि निरर्थकम्, तथात्वे दौर्गन्ध्यादीनामप्यविनाशापत्या होमस्य वायुजलशुद्धयादिप्रयोजनासिद्धेः । सम्बन्ध ग्रहण करने पर गन्ध के सम्बन्ध से पार्थिव परमाणु की प्रतीति होने पर जल और वायु पार्थिव अणु से सम्बद्ध हैं, यही बोध होगा । तब उसके ' सुगन्धदुर्गन्धाणुयोगत्वेन ' इस आपके वाक्य के आधार पर पार्थिव परमाणु के रस समवेत माने जाने पर जल अथवा बायु में उसका क्या प्रभाव होगा । वायु में तो सर्वथा रस का अभाव होता है और जल में पार्थिव कटु, कषाय आदि रसों से भिन्न मधुर रस है । इस प्रकार जल और वायु मध्यम गुण वाले हैं, इष्ट और अनिष्ट गुणों का योग होने से । यहाँ पर पक्ष में स्वरूपासिद्धि नहीं होगी, क्योंकि इष्टानिष्टगुणयोगत्व सुगन्ध - दुर्गन्ध मिश्रित हेतु से सिद्ध नहीं होंगे । इस प्रकार यह सारा कथन अशुद्ध है । क्योंकि जल और वायु मध्यम गुण साधक कोई हेतु नहीं है । इसलिये जल, वायु आदि की शुद्धि के लिये अग्निहोत्र आदि कर्म सभी मनुष्यों को करने चाहिये, यह व्यर्थ की बात है । इन वचनों में परस्पर आकांक्षा का अभाव होने से ' दस मनार, छः अपूप ' इत्यादि वाक्यों के समान निरर्थक हैं । यद्यपि सिद्धान्त में भी अग्निहोत्र आदि को कर्म ही माना गया है, किन्तु यहाँ पर वायु - जल आदि का शोधन इनका फल न होकर विधि प्रतिपादित स्वर्गादि फल के लिये ही इनका अनुष्ठान इष्ट है । ये कर्म सबके अनुष्ठेय भी नहीं है । जो गृहस्थ नहीं है, उसके पत्नी के न रहने से तथा शूद्र के अनुपनीत होने से इन कर्मों के अनुष्ठान का अधिकार प्राप्त नहीं है । यह कहना भी सार शून्य है कि-- '- ' ईश्वर ने सब प्राणियों के बीच में मनुष्य के शरीर में परमाणु आदि के संयोग - विशेष इस प्रकार के रचे हैं कि जिनसे उनको ज्ञान की उत्पत्ति होती है, क्योंकि परमाणु के संयोग - विशेष से विज्ञान के उत्पादक अवयवों की सत्ता माननेपर तो चार्वाक मत में प्रवेश हो जायगा । आस्तिक जन परमाणुओं से अथवा तन्निमित अवयवों से विज्ञान की उत्पत्ति नहीं मानते । ' सुगन्ध युक्त कस्तूरी आदि पदार्थों को अन्य द्रव्यों से मिला कर अग्नि में डालने से उनका नाश हो जाता है, फिर यज्ञ से किसी प्रकार का उपकार नहीं हो सकता, किन्तु ऐसे उत्तम उत्तम पदार्थ मनुष्यों को भोजन आदि के लिये देने से होम से भी अधिक उपकार हो सकता है, फिर यज्ञ किस लिये करना ' इस शङ्का के समाधान के लिये यह बो कहा गया है कि - ' किसी भी पदार्थ का अत्यन्त विनाश नहीं होता ' ( १० ५ ९ ), यह भी निरर्थक है, क्योंकि ऐसा मानने पर तो दुर्गन्धि का भी अत्यन्त विनाश नहीं होगा, तब होम का वायु - जल आदि की शुद्धि का प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा? ७३

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५७८ वैदार्यपारिजातः यदप्युक्तम्- ' विनाशो हि यद् दृश्यं भूत्वा पुनर्न दृश्येत, परन्तु दर्शनं त्वया कतिविधं स्वीक्रियते " अष्ट-विधं चेति । किञ्च तत् - अत्राहुर्गोतमाचार्या न्यायशास्त्र ' ( पृ ० ५ ९ ) इति, तदपि विचारणीयम् । अत्र दर्शन-शब्देन ज्ञानमेव विवक्षितम् । ' दर्शनमर्थाज्ज्ञानं मया मन्यते ' ( पृ ० ६१ ) इति स्वयैवोक्तत्वात् । ज्ञानानां च स्वाभ्युप-ताष्टविधत्व एव गोतमाचार्यस्य साक्षित्वमुपन्यस्तं यत्, तदपि न्यायशास्त्रविरुद्धम् । तस्मिन्नर्थे गोतमसूत्रोप-भ्यासस्तु घाष्ट्र्यमेव * तद्रीत्या प्रमाणचतुष्टयस्यैवाभ्युपगमात् । तद्बोधकानि सूत्राण्यपि चत्वार्येवोक्तानि । ' इन्द्रि-यार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ' ( १ | १ | ४ ), ' अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ' ( ११११५ ), ' प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम् ' ( ११११६ ), ' आप्तोपदेशः शब्दः ' ( ११११७ ) इति । ' प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्देति ह्यार्थापत्तिसम्भवाभावसाधनभेदादष्टधा प्रमाणं मन्यते ' ( पृ ० ५ ९ ) इति । अत्रानुभूत्यात्मकस्य ज्ञानस्याष्टविधतास्वीकारे तत्साधनभूतप्रमाणानामष्टविधत्वं युक्तमिति कस्यचिन्मतं न गोतमाचार्यस्य । यच्च प्रमाणानामष्टविधत्वसाधनाय ' न चतुष्ट्वम् ऐतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात् ' ( २ | २ | १ ), ' शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावाद् अनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः ' ( २/२/२ ) ( पृ ० ६० ) इत्यादिसूत्राण्युपन्यस्तानीति, तदपि सूत्रार्थाज्ञानविजृम्भणमेव । सूत्रद्वयस्यास्य प्रमाणानामष्टविधत्वासाधकत्वात्, किन्तु न चतुष्ट्वमिति सूत्रेणाष्टविधत्वमाशङ्कयोत्तरसूत्रेण चतुष्ट्वस्यैव व्यवस्थापनात् । दयानन्देन शब्द ऐतिह्येति-सूत्रस्य व्याख्यानमपि न कृतम् । वस्तुतस्त्वस्य सूत्रस्यायमर्थः -- शब्दे ऐतिह्यस्यानर्थान्तरभावाद् अनुमानेऽर्थापत्ति-सम्भवाभावानर्थान्तरभावादष्टविधत्वस्याप्रतिषेधो युक्तः । इह तु शब्दे ऐतिह्यस्यान्तर्भाव एव, अनुमाने चार्थापत्ति-सम्भवाभावानामन्तर्भाव एवास्ते, अतोऽष्टविधत्वस्य प्रतिषेध एव मन्तव्यः । अत एव - ' प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः यह कथन भी विचारणीय है कि जो स्थूल होकर प्रथम देखने में आकर फिर न देख पड़े, उसको हम विनाश कहते है | आप कितने प्रकार का दर्शन मानते हैं? आठ प्रकार का । कौन कौन सा? इस विषय में आचार्य गौतम ने न्याय दर्शन में कहा हैं ' ( पू ० ५ ९ -६० ), क्योंकि यहाँ पर दर्शन शब्द से ज्ञान विवक्षित है । ' इनको मैं दर्शन, अर्थात् प्रमाण मानता हूँ ( पृ ० ६२ ) यह आपका ही कथन है । अपने द्वारा स्वीकृत आठ प्रमाणों के लिये ही आपने आचार्य गोतम की साक्षी दी गई है, यह भी न्यायशास्त्र के विरुद्ध है । इस प्रसंग में न्याय सूत्रों का उपन्यास एक धृष्टता ही है । गोतम ने चार ही प्रमाण माने हैं और उनके स्वरूप का परिज्ञान करातें वाले चार सूत्र हैं, जो कि मूल में उद्धृत हैं । ' प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, संभव और अभाव के भेद से हम आठ प्रकार का दर्शन ( प्रमाण ) मानते हैं ' ( पृ ० ६० ) | यहाँ पर अनुभूति स्वरूप ज्ञान के आठ भेद मानने पर उसके साधक प्रमाण भी आठ माने जायेंगे, ऐसा मत गोतम मुनि का नहीं है । प्रमाणों के माठ भेदों की सिद्धि के लिये जो ' न चतुष्ट्रम् ' इत्यादि दो सूत्र उद्धृत किये गये हैं ( पू ० ६० ), सूत्रों का अर्थ न समझ पाने के कारण ऐसा हुआ है । ये दो सूत्र प्रमाणों के आठ भेदों के साधन नहीं है, किन्तु ' न चतुष्टुम् ' इस सूत्र से यह शंका उठाई गई है कि प्रमाण माठ प्रकार के होते हैं, ' शब्द ऐतिह्या ० ' इत्यादि सूत्र से इस शंका का समाधान कर प्रमाण चार ही हैं, यही बात सिद्ध की गई है । दयानन्द ने इस सूत्र की व्याख्या भी नहीं की है । वास्तव में इस सूत्र का अर्थ यह है- शब्द से ऐतिह्य का अन्तर नहीं है और अनुमान से अर्थापत्ति, संभव और संभाव अर्थान्तर नहीं है, अर्थात् शब्द और अनुमान में ही इन चारों का अन्तर्भाव हो जाता है, अत: प्रमाण की अष्टविधता का निषेध उचित है । इसी लिये प्रमाण का नाम निर्देश करने के बाद ' प्रत्यक्षा ० ' इत्यादि

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वेदार्थपारिजातः 198 प्रमाणानि ' ( १1१1३ ) इत्युद्दिष्टस्य प्रमाणस्य विभागवचनमपि सङ्गच्छते । ' न प्रदीपप्रकाशसिद्धिवत् तत्सिद्धेः ' ( २ | १ | १६ ) इति सूत्रे भाष्यकारोऽप्याह --- ' प्रत्यक्षादीनां चाविषयस्यानुपपत्तेः ' इति । वार्तिककृदपि —– ' यदि स्यात् किञ्चिदर्थजातं प्रत्यक्षादीनामविषयः, यत्प्रत्यक्षादिभिर्न शक्यं ग्रहीतुम्, तस्य ग्रहणाय प्रमाणान्तरमुपादीयेत, तत्तु न शक्यं केनचिदुपपादयितुमिति । प्रत्यक्षादीनां यथादर्शनमेवेदं सच्चासच्च सर्वविषय: ' इति प्रणिजगाद । सर्वमेतदुद्दिष्ट-प्रत्यक्षादिप्रमाणविषय एव । अत एव ' न चतुष्ट्वम् ' इति सूत्रावतरणिकया ' अयथार्थः प्रमाणोद्देश इति मत्वाहन चतुष्ट्वम् ' इत्याह भगवान् भाष्यकारः । तस्मान्न पूर्वोक्तसूत्रद्वयेन प्रमाणाष्टकसिद्धिः । ' मातापितृभ्यां सन्तानं जायते ' ( पृ ० ६० ) इति नपुंसकलिङ्गप्रयोगोऽप्यशुद्ध एव । यत्तु नाशस्वरूप-प्रदर्शनप्रसङ्गे- ' अतो नाशो बाह्येन्द्रियादर्शनमेव भवितुमर्हति ' ( पृ ० ६१ ) इति यदुक्तम्, तदप्यशुद्धम्, तथात्वे बाह्येन्द्रिया-विषयाणामाकाशादीनां पार्थिवपरमाणूनां च त्वद्रीत्या नाशापत्तिप्रसङ्गात् । व्यवहितानामपि पदार्थानां चैत्रादीनां बाह्येन्द्रियविषयत्वेन नाशप्रसङ्गाच्च । त्वद्रीत्या दर्शनादर्शनाभ्यामेव भावाभावावधारणात् । यच्चोक्तम् — ' यदा परमाणवः पृथक् पृथग् भवन्ति तदा ते चक्षुषा नैव दृश्यन्ते? तेषामतीन्द्रियत्वात् । यदा चैते मिलित्वा स्थूलभावमापद्यन्ते, तदैव तद् द्रव्यं दृष्टिपथमागच्छति, स्थूलस्यैन्द्रियकत्वात् । यद् द्रव्यं विभक्तं विभागान तस्य परमाणुसंज्ञा चेति व्यवहारः । ते हि विभक्ताः सन्त आकाशे वर्तन्त एव ' ( पृ ० ६१ ) इति, तदप्यसङ्गतम्, पृथग्भूताः परमाणव एवं मिलिताः सन्तः स्थूलभावमापद्यन्त इत्यङ्गीकारे नास्तिकमतप्रवेशापत्तेः । महत्वोद्भुत-रूपवत्त्वस्य द्रव्यप्रत्यक्षे कारणत्वेन परमाणुषु तदभावाद् घटादीनामप्रत्यक्षत्वापत्तेश्च । नैयायिकादिभिस्तु परमाणु-समूहातिरिक्तोऽवयवी स्वीक्रियते । अत एवाम्यत्र यद्यपि कारणगुणा एव कार्यगुणानारभन्ते, तथापि परमाण - द्रयणुक-सूत्र से उनके चार भेदों का बताया जाना संगत होता है । ' न प्रदीप ' इस सूत्र के भाग्य में वात्स्यायन कहा है कि प्रत्यक्ष आदि चार प्रमाणों के विषय की अनुपपति नहीं है । वात्तिककार ने भी कहा है कि यदि कोई ऐसा विषय हो, जो कि प्रत्यक्ष आदि में गृहीत न हो तो उसके ग्रहण के लिये प्रमाणान्तर स्वीकार किया जाय । ऐसा उपपादन किसी के द्वारा संभव नहीं, क्योंकि सत् और असत् सभी विषय प्रत्यक्ष आदि से हो परिगृहीत होते हैं । यह सारा विषय उद्दिष्ट प्रत्यक्ष आदि चार प्रमाणों का ही है । इसीलिये ' नचतुष्ट्वम् ' इत्यादि सूत्र की अवतरणिका में प्रमाणों का पहले किया गया उद्देश अप्रामाणिक है, ऐसा मानकर ' न चतुष्टम् ' इत्यादि सूत्र कहा गया है, यह भाष्यकार का कथन है । इसलिये उक्त दो सूत्रों से आठ प्रमाण नहीं सिद्ध होंगे । ' माता - पिता से सन्तानों की उत्पत्ति होती है ' यहाँ पर सन्तान शब्द का नपुंसक लिंग में प्रयोग अशुद्ध ही है । नाश शब्द का अर्थ बताते समय का यह कथन कि ' इसलिये नाथ नाह्मेन्द्रिय से अदर्शन के लिये ही प्रयुक्त होता है ' ( पृ ० ६२ ), इसलिये असंगत है कि ऐसा मानने पर बाह्येन्द्रिय के अविषय आकाश आदि का और परमाणुओं का आपकी रीति से नाश का प्रसंग आ जायगा । भिति यादि से व्यवहित पदार्थों का भी चैत्र आदि को बाह्येन्द्रियों से दर्शन नहीं होता, अतः उनका भी नाश मान लेना पड़ेगा, क्योंकि आपने तो यह मान लिया है कि दर्शन और अदर्शन से ही वस्तुओं का भाव तथा अभाव होता है । यह कथन भी असंगत है कि ' जब परमाणु अलग - अलग हो जाते हैं, तब वे देखने में नहीं आते, इसी का नाम नाश है । जब परमाणु के संयोग से द्रव्य स्थूल अर्थात् बड़ा होता है, तब वह देखने में आता है । परमाणु उसे कहते हैं, जिसका कि विभाग फिर कभी न हो सके । ये परमाणु विभक्त अवस्था में सदा आकाश में विद्यमान रहते हैं ' ( पृ ० ६२ ), क्योंकि पृथक रूप से विद्यमान परमाणु ही मिलकर स्थूल द्रव्य हो जाते हैं, ऐसा मानने पर नास्तिक के मत में प्रवेश हो जायगा । महत्त्व और उद्भूतरूपवत्त्व द्रव्य के प्रत्यक्ष में कारण माने गये हैं । परमाणुओं में ये दोनों नहीं हैं, अतः घटादि में अप्रत्यक्षता की आपत्ति या जायगी । नैयायिक प्रभृति तो परमाणु समूह के अतिरिक्त एक अवयवी मानते हैं । इसीलिये अन्य स्थानों में यद्यपि कारण के गुण ही कार्य के गुणों के आरंभक माने जाते हैं, तो भी परमाणु और द्वणुक का परिमाण कार्य में परिमाण का आरंभ नहीं माना जाता, क्योंकि ऐसा मानने पर जैसे एक बड़ी वस्तु से

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१८० वेदार्थपारिजातः परिमाणं न कार्येषु परिमाणमारभते । तथात्वे महदारब्धस्य महत्तरत्ववद् अणुपरिमाणारब्धस्य अणुतरत्वापत्तेः । अत एव च संख्याप्रचयादिपरमाणुव चणुकत्र्यणुकादिक्रमेणावयविद्रव्येषु महत्वोद्भूतरूपवत्त्वं सम्भवति । यदपि च - तथैवाग्नौ यद् द्रव्यं प्रक्षिप्यते तद्विभागं प्राप्य देशान्तरे वर्तत एव । नहि तस्याभावः कदाचिद् भवति । एवं च यद्दुर्गन्धादिदोषनिवारकं सुगन्धादिद्रव्यमस्ति तच्चाग्नी हुतं सद् वायोर्वृ ष्टिजलस्य शुद्धिकरं भवति । तस्मिन्निर्दोषे सति सृष्टये महानुपकारो भवति, अतः कारणाद् यज्ञः कर्तव्य एव ' ( पृ ० ६२ ) इति, तदपि निर्मूलम् त्वद्रीत्या सुगन्धिद्रव्यस्येव दुर्गन्धिद्रव्यस्यात्यम्सनाशासम्भवात्, तन्निवारणस्यासिद्धत्वात् । प्रयागहरिद्वारादि-कुम्भेषु लक्षशो जनसमूहेषु बहवो यज्ञा भवन्ति, तथाप्याधुनिक विधानेन चूर्णफिनायलादिप्रयोगमन्तरा यज्ञमात्रेण दोर्गन्ध्यं नापेत्येव । अत एवाधुनिक विधानादिमन्तरा पूर्वं विषूचिकादिजनसंहारकरोगा अपि आक्राम्यन्ति स्म, sarita विधाने तु यज्ञादिमन्तरापि दौर्गन्ध्यमर्पति, शुद्धिरारोग्यं च सर्वजनीनानुभवसिद्धम् । किञ्च इदानीन्तनानां तादृक्सेकचूर्णधूमादिकमाविष्कृतं येन विकृतकीटाणवो मशक मक्षिकादयोऽपि नश्यन्ति तेषां कृते वेदोपदिष्ट-होमादिकं व्यर्थमेव । यदपि च - ' वायुवृष्टिजलशुद्धिकरणमेव यज्ञस्य प्रयोजनमस्ति चेत्तहि गृहाणां मध्ये सुगन्धद्रव्यरक्षणे-तत्सेत्स्यति पुनः किमर्थमेतावानाडम्बरः ' ( पु ० ६२ ) इत्यस्याक्षेपस्य निराकरणायोक्तम्- ' नवं तेनाशुद्धो वायुः सूक्ष्मो भूत्वाकाशं गच्छति, तस्य पृथक्त्वलघुत्वाभावात् । तत्र तस्य स्थिती सत्यां नैव बाह्यो वायुरागन्तुं शक्नोत्यव-काशाभावात् । तत्र पुनः सुगन्ध दुर्गन्धयुक्तस्य वायोर्वर्तमानत्वाद् आरोग्यादिकं फलमपि भवितुमशक्यमेवास्ति । यदा तु खलु तस्मिन् गृहेऽग्निमध्ये सुगन्धादिद्रव्यस्य होम: क्रियते, तदा ग्लिना पूर्वो वायुर्भेदं प्राप्य लघुत्वमापन्नः उत्पन्न वस्तु उससे भी बड़ी होती है, उसी तरह एक छोटी वस्तु से आरंभ वस्तु के उससे भी छोटी होने की आपत्ति होगी । इसीलिये परमाणु, द्वणुक, त्र्यणुक आदि में संख्या की वृद्धि के आधार पर अवयवी द्रव्यों महत्त्व और उद्भूतरूपवत्त्व माना जाता है । इसी प्रकार यह कथन भी निर्मूल है कि- ' वैसे ही जो सुगन्ध आदि से युक्त द्रव्य अग्नि में डाला जाता है, उसके अणु अलग - अलग होकर व्याकाश में रहते ही हैं, क्योंकि किसी द्रव्य का वस्तुतः कभी अभाव नहीं होता । इससे वह द्रव्य दुर्गन्ध आदि दोषों का निवारण करने वाला अवश्य होता है । फिर उससे वायु और वृष्टि जल की शुद्धि के होने से जगत् का बड़ा उपकार और सुख rate होता है । इस कारण से यज्ञ को करना ही चाहिये ' ( पृ ० ६२-६३ ), क्योंकि आपके मत के अनुसार सुगन्धि द्रव्य के समान दुर्गंध से युक्त द्रव्य का भी अत्यन्त विनाश नहीं हो सकता, तब उसका निवारण कैसे होगा? प्रयाग, हरिद्वार आदि में कुम्भ मेले के अवसर पर लाखों आदमी जुटते हैं और वहाँ बहुत से यज्ञ भी होते हैं । तो भी आधुनिक पद्धति से चूना, फिनाइल आदि के प्रयोग के बिना यज्ञ मात्र से दुर्गन्धि दूर नहीं ही होती । इसीलिये आधुनिक उपायों के न किये जाने से पुराने जमाने में हैजा, प्लेग आदि महामारियों का उपद्रव होता था और आजकल की पद्धति में यज्ञादि के बिना भी दुर्गन्ध नष्ट हो जाती है, शुद्धि होती है और आरोग्य प्राप्त होता है, यह बात सभी के अनुभव से सिद्ध है । आजकल के विज्ञानविदों ने छिड़कने के लिये पाउडर, तेल आदि का आविष्कार किया है, जिससे कि विष के कीटाणु, मक्खी, मच्छर आदि नष्ट हो जाते हैं । उनके लिये वेद में उपदिष्ट होम आदि का अनुष्ठान व्यर्थ है । आगे ' जो यज्ञ से वायु और वृष्टि जल की शुद्धि करना मात्र हो प्रयोजन है, तो इसकी सिद्धि मतर और पुष्पादि के घरों में रखने से भी हो सकती है, फिर इतना बढ़ा परिश्रम यज्ञ में क्यों करना ' ( पृ ० १३ ) इस आक्षेप के निराकरण के लिए कहा गया है । कि-- ' यह कार्य अन्य किसी प्रकार से सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि अतर और पुष्पादि का सुगन्ध तो उसी दुर्गन्ध वायु में मिल के रहता है, उसको छेदन करके बाहर नहीं निकाल सकता और न वह ऊपर चढ़ सकता है, क्योंकि उसमें हनकापन नहीं होता । उसके उसी अवकाश में रहने से बाहर का शुद्ध वायु उस ठिकाने में जा भो नहीं सकता, क्योंकि खाली जगह के बिना दूसरे का प्रवेश नहीं हो सकता, फिर सुगन्ध और दुर्गन्धयुक्त वायु के वहीं रहने से रोग नाश आदि फल भी नहीं हो सकते । जब अग्नि उस वायु को वहाँ