वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 611–620
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 611–620
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दार्थपारिजाता ५८१ उपर्याकाशं गच्छति, तस्मिन् गते सति तत्रावकाशाच्चतसृभ्यो दिग्भ्यः शुद्धो वायुराद्रवति । तेन गृहाकाशस्य पूर्णत्वाद् आरोग्यादिकं फलमपि जायते । यो होमेन सुगन्धयुक्तद्रव्यपरमाणुयुक्त उपरिगतो वायुर्भवति, स वृष्टिजलं शुद्धं कृत्वा वृष्ट्याधिक्यमपि करोति । तद्द्द्वारोषध्यादीनामपि शुद्धेरुत्तरोत्तरं जगति महत्सुखं वर्धत इति निश्चीयते । एतत्खल्वग्निसंयोगरहितसुगन्धेन वायुना भवितुमशक्यमस्ति । तस्माद्धोमकरणमुत्तममेव भवतीति निश्चेतव्यम् ' ( पृ ० ६२-६३ ) इति । तदप्यसत् उक्तोत्तरत्वात् । सुगन्धादिद्रव्यस्य होमेन तस्य पृथक्त्वलघुत्वाभ्यामाकाशगमन-सम्भवेऽपि दोर्गन्ध्यादेरूर्ध्वगमने होमस्याकिञ्चित्करत्वात् । होममन्तरैवाग्निप्रज्वालनेनैव ativ ध्ययुक्तपदार्थानां भेदेन पृथक्त्वलघुस्व भ्यामूर्ध्वगमनसम्भवात् । लोके तु निम्बतैलादिपरिपूर्णे घटे न पाटलपटवासविन्दुनिपातेन तद्दर्गन्ध्यापनोदनं सम्भवति सौगन्ध्यस्यात्पत्वे । नहि गृह एवाशुद्धो वायुर्भवति, बहिरेवाशुद्धिबाहुल्यदर्शनात् । ततश्चतसृस्यो दिग्भ्यः शुद्धो वायुराद्रव-तीत्यपि रिक्तं वचः । अत एव शुद्धवायुना गृहाकाशस्य पूर्णत्वादारोग्यादिकमपि फलं भविष्यतीत्यपि तथाभूतमेव । त्वद्रीत्या मनुष्यादिप्राणिसमुद्भूतदुर्गन्धस्य बायु वृष्टि जलदूषकत्वं भवत्येव । ततो बहिरपि कुतस्त्यः शुद्धवायुः? कुतस्तरामारोग्यफलजनकत्वम्? किञ्च, स्वद्रीत्या कस्यापि वस्तुनोऽत्यन्तं नाशो न भवति, तथा च सर्वत्र सर्वदेव सुगन्धदुर्गन्धमिश्रणमेव तिष्ठति । आश्चर्यमेतद् यत् सांख्योयसत्कार्यवादमाश्रित्य सर्वेषां वस्तूनां सार्वदिकं सस्वमुपेयते, तत्र चासत्कार्यवादिनेयायिकाभिमतप्रमाणान्युपस्थाप्यन्ते । यच्च - ' दूरस्थले केनचित् पुरुषेणाग्नौ सुगश्धद्रव्यस्य होमः क्रियते । तद्युक्तो वायुर्दूरस्थमनुष्यस्य घ्राणेन्द्रियेण संयुक्तो भवति । सोऽत्र सुगन्धो वायुरस्तीति जानाति । अनेन विज्ञायते यद् वायुना सह सुगन्धं दुर्गन्धं से हलका करके निकाल देता है, तब वह शुद्ध वायु भी प्रवेश कर सकता है । इसी कारण यह फल यज्ञ से ही हो सकता है, अन्य प्रकार से नहीं । क्योंकि जो होम के परमाणुओं से युक्त शुद्ध वायु है, सो पूर्व स्थित दुर्गन्ध वायु को निकाल कर उस देशस्थ वायु को शुद्ध करके रोगों का नाश करने वाला होता है और मनुष्यादि सृष्टि को उत्तम सुख को प्राप्त कराता है । जो वायु सुगन्ध आदि द्रव्य के परमाणुओं से युक्त होम द्वारा आकाश में चढ़ के दृष्टि जल को शुद्ध कर देता है और इससे वृष्टि भी अधिक होती है, क्योंकि होम करके नीचे गर्मी अधिक होने से जल भी ऊपर अधिक चढ़ता है । शुद्ध जल मोर वायु के द्वारा अन्न आदि औषधि भी अत्यन्त शुद्ध होती है । ऐसे प्रतिदिन सुगन्ध के अधिक होने से जगत् में नित्य प्रति अधिक सुख बढ़ता है । यह फल व्यक्ति में होम करने के सिवाय दूसरे प्रकार से होना असंभव है । इससे होम का करना आवश्यक है ' ( पृ ० ६३ ) यह सब भी गलत है । इसका उत्तर दिया जा चुका है । सुगन्धादि द्रव्य के होम से उसके अलग - अलग परमाणुओं के रूप में हलका होकर ऊपर आकाश में चढ़ जाने पर भी दुर्गन्ध के भी ऊपर चढ़ने से सारा होम करना व्यर्थ हो जायगा । होम के बिना भी अग्नि के जलाने मात्र से ही दुर्गन्धमय पदार्थो के परमाणुओं के भेदन से अलग होने पर ऊपर आकाश में गमन संभव है । लोक में तो देखा जाता है कि नींव के तैल से भरे हुए घड़े में गुलाब के अतर की एक बूँद डालने से उसकी दुर्गन्धि दूर नहीं की जा सकती । घर में ही अशुद्ध वायु नहीं होता, घर से बाहर भी गन्दगी ज्यादा देखी जाती है । ऐसी अवस्था में चारों दिशाओं से शुद्ध वायु घर में प्रवेश करती है, यह एक व्यर्थ की बात है । इसी तरह की बात यह भी है कि शुद्ध वायु से घर के आकाश के भर जाने से हवन का फल आरोग्य लाभ भी होगा । आप भी मानते ही है कि मनुष्य आदि प्राणियों से उत्पन्न हुई दुर्गन्ध वायु, वृष्टि, जल आदि को दूषित करती है । तब बाहर भी शुद्ध वायु कहाँ से आवेगी? उससे बारोग्य लाभ भी कैसे होगा? आपके मत से किसी भी वस्तु का अत्यन्त विनाश नहीं होता । इस तरह से सर्वत्र सदा सुगन्ध और दुर्गन्ध का मिश्रण रहेगा | यह आश्चर्य को ही बात है कि सांख्य के सत्कार्यवाद का आश्रय लेकर सभी वस्तुओं की सार्वदिक सत्ता मानी जाती हैं और उसमें असत्कार्यवादी नैयायिकों के प्रमाण उपस्थापित किये जाते हैं । यह कहना भी कि ' किसी पुरुष ने दूर देश में सुगन्ध चीजों का अग्नि में होम किया हो, उस सुगन्ध से युक्त जो वायु हैं, सो होम के स्थान से दूर देश में स्थित हुए मनुष्य के नाक के साथ संयुक्त होने से उसकी यह ज्ञान होता है कि यहाँ सुगन्ध वायु है ।
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५८२ बेवार्थपारिजातः च द्रव्यं गच्छतीति । तद्यदा स दूरं गच्छति तदा तस्य घ्राणेन्द्रियसंयोगो न भवति, पुनर्बालबुद्धीनां भ्रमो भवति स सुगन्धो नास्तीति । परन्तु तस्य हृतस्य पृथग्भूतस्य वायुस्थस्य सुगन्धयुक्तस्य द्रव्यस्य देशान्तरे वर्तमानत्वात् तेनं विज्ञायते ' ( पृ ० ६४ ) इति, तदपि न, स्वद्रीत्या दुर्गन्धस्याप्यत्यन्तनाशासम्भवाद् दुर्गन्धस्यापि वर्तमानत्वाविशेषात् । यदुक्तम् -- ' सुगन्धयुक्तो वायुर्दूरस्थमनुष्यस्य घ्राणेन्द्रियेण संयुक्तो भवति । सोऽयं सुगन्धो वायुरस्तीति जानात्येव ' इति, तदपि शास्त्राज्ञानमूलकम्, घ्राणेन विज्ञानासम्भवात् । घ्राणेन्द्रियस्य द्रव्यग्रहणे सामर्थ्याभावात् । गन्धग्राहकमेव हि घ्राणेन्द्रियम् । वायोस्त्वगिन्द्रियगोचरत्वात् । यच्च यज्ञे वेदपाठसमर्थनायोक्तम् -- एतस्यान्यदेव फलम्, कि हस्तेन होमः, नेत्रेण दर्शनम्, त्वचा स्पर्शनं व क्रियते यथा, तथा वाचापि मन्त्राः पठ्यन्ते । तत्पाठेनेश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाः क्रियन्ते । होमेन किं फलं भवतीत्यस्य ज्ञानं तत्पाठानुवृत्त्या वेदमन्त्राणां रक्षणमीश्वरस्यास्तित्व सिद्धिश्च । अन्यच्च सर्वकर्मादावीश्वरस्य प्रार्थना कार्येत्युपदेशः । यज्ञे तु वेदमन्त्रोच्चारणात् सर्वत्रैव तत्प्रार्थना भवतीति वेदितव्यम् ' ( पृ ० ६४ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, अप्रयोजकत्वात् । यज्ञस्य फलं वायुशुद्धिरेवोक्तम्, तच्च वेदपाठमन्तरापि सम्भवेत्, यज्ञे तदुच्चारणस्य व्यर्थत्वात् । हस्तेन होमः, नेत्रेण दर्शनमित्यादिकमपि व्यर्थमेव, फलानुपकारकत्वात् । भोजनेऽपि हस्तेन भोजनं मेत्रेण दर्शनं त्वचा स्पर्शनादिकं भवत्येव । सर्वेन्द्रियैः किञ्चित् किचिदवश्यं कर्तव्यमिति विधानं न दृश्यते । ईश्वरस्तुतिप्रार्थनादिकं तु वायु - जल - शुद्धयनन्तर-मेव युक्तम् । यदुक्तम्- ' नान्यस्य पाठे कृते सत्येतत्प्रयोजनं सिद्धयति, कुतः? ईश्वरोक्ताभावात् निरतिशयसत्य-विरहाच्च । यद्यद्धि क्वचित् सत्यं तत्सर्वं वेदादेव प्रसृतमिति विज्ञेयम्, यद्यत्खल्वनृतं तत्तदनीश्वरोक्तं वेदाद् बहिः ' इससे जाना जाता है कि द्रव्य के अलग होने में भी द्रव्य का गुण द्रव्य के साथ ही बना रहता है और वह वायु के साथ सुगन्ध और दुर्गन्ध युक्त सूक्ष्म हो के जाता आता है । परन्तु जब वह द्रव्य दूर चला जाता है, तब उसके नाक से संयोग भी छूट जाता है, फिर बाबुद्धि मनुष्यों को ऐसा भ्रम होता है कि वह सुगन्धित द्रव्य नहीं रहा । परन्तु यह उनको अवश्य जानना चाहिये कि वह सुगन्ध द्रव्य आकाश में वायु के साथ बना ही रहता है ' ( पृ ० ६४ ), इसलिये उचित नहीं है कि आपके ही मत से दुर्गन्ध का भी तो अत्यन्त निवास नहीं होगा, ऐसी अवस्था में सुगन्ध के ही समान दुर्गन्ध की भी स्थिति समान रूप से रहेगी । यह कथन भी कि सुगन्ध से युक्त जो वायु है, सो होम के स्थान से दूर देश में स्थित हुए मनुष्य के नाक के साथ संयुक्त होने से उसको यह ज्ञान होता है कि यहाँ सुगन्ध बायु है, शास्त्र के अज्ञान का ही सूचक है | ज्ञान प्राणेन्द्रिय से नहीं हुआ करता । प्राणेन्द्रिय द्रव्य के ग्रहण में भी समर्थ नहीं है । घ्राणेन्द्रिय केवल गन्ध को ग्रहण करता है । वायु का ग्रहण त्वगिन्द्रिय से होता है । यश के समय किये गये वेदपाठ का समर्थन करने के लिये जो यह कहा गया है कि- - ' उनके पढ़ने का प्रयोजन कुछ और ही है | वह क्या है? जैसे हाथ से होम करते हैं, आँख से देखते हैं और त्वचा से स्पर्श करते हैं, वैसे ही वाणी से वेद मन्त्रों को भी पढ़ते हैं । उनके पढ़ने से वेदों की रक्षा, ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना होती है । होम से जो - जो फल होते हैं, उनका स्मरण भी होता है । वेद मन्त्रों के बारम्बार पाठ करने से वे कण्ठस्थ भी रहते हैं तथा वेदों की रक्षा भी होती है । ईश्वर का होना भी इससे विदित होता है । सब कार्यों के आरम्भ में ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिये, यह उपदेश भी उससे मिलता है । वेद मन्त्रों के उच्चारण से यज्ञ में सर्वत्र उसकी प्रार्थना होती है ( पू ० ६४-६५ ), किन्तु इससे भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । वायु की शुद्धि ही यज्ञ का फल बताया गया है । यह बिना वेद पाठ के भी हो सकता है, तब उसका यज्ञ में उच्चारण करना व्यर्थ है । हाथ से होम किया जाता है, आंख से देखा जाता है, यह सब भी व्यर्थ की बात है, क्योंकि ये कोई फल का उपकार नहीं करते । भोजन करते समय भी हाथ से भोजन का ग्रहण, नेत्र से दर्शन और त्वचा से स्पर्श आदि होता ही है । सभी इन्द्रियों को कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिये, ऐसा कोई fafe वाक्य तो है नहीं । ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना आदि भी वायु, जल आदि की शुद्धि हो जाने पर ही ठीक हो सकती है | इस कथन में भी कुछ दम नहीं है कि - ' अन्य के पाठ में यह प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता । क्यों? ईश्वर के वचन से जो सत्य प्रयोजन सिद्ध होता है, सो अन्य के वचन से कभी नहीं हो सकता । क्योंकि जैसा ईश्वर का वचन सर्वथा भ्रान्तिरहित सत्य
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वेदार्थपारिजातः ( पृ ० ६५ ) इति, तदपि न किञ्चित्, लौकिकानामपि वाचामवाधितार्थकत्वेन सत्यत्वानपायात् । अवाधितार्थत्वमेव सत्यस्य निरतिशयत्वम्, तदन्यस्य निरतिशयत्वस्यानिर्वचनात् । नहि पारमार्थिक व्यावहारिक प्रातिभासिकेतिवेदास्ति-सम्मतं सत्यविध्यं त्वयाऽङ्गीक्रियते । तद्रीत्यापि यज्ञादिकमपि व्यावहारिकमेव सत्यम्, शुद्धब्रह्मण एवं पारमार्थिक-त्वाभ्युपगमात् । ' त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयम्भुव: ' ( म ० ११३ ) इति ( पृ ० ६५ ) मनुवचनोद्धरणं तु निरर्थकमेव, वेदस्य चातुर्वर्ण्य चातुराश्रम्यभूतभव्यभविष्यदादिबोधकत्वेन सनातनत्वेन वैदिकानां विप्रतिपत्तेरभावात् । यत्तु - ' किं यज्ञानुष्ठानाथं भूमि खनित्वा वेदिः प्रणीतादिपात्राणि कुशास्तृणानि यज्ञशाला ऋत्विज-चैतत्सर्वं कर्तव्यम्? " इत्याशङ्क्य ' यद्यदावश्यकं युक्तिसिद्धं तत्तत्सर्वं कर्तव्यं नेतरत् । तद्यथा - भूमि खनित्वा वेदी रचनीया, तस्यां होने कृतेऽग्नेस्तीव्रत्वाद्धतं द्रव्यं सद्यो विभेदं प्राप्याकाशं गच्छति, तथा वैदिदृष्टान्तेन त्रिकोण - चतुष्कोण-गोल- श्येनाद्याकारवत्करणाद् रेखागणितमपि साध्यते, तत्र चेष्टकानामपि गणितत्वादनया गणितविद्यापि गृह्यते, एव-मेवोत्तरेऽपि पदार्थाः सप्रयोजनाः सन्त्येव । परन्त्वेवं प्रणीतायां रक्षितायां पुण्यं स्यात् एवं पापं स्यादिति यदुच्यते तत्र पापनिमित्ताभावात् सा कल्पना मिथ्यैवास्ति, किन्तु खलु यज्ञसिद्धयर्थं यद्यदावश्यकं युक्तिसिद्धमस्ति तदेव ग्राह्यम् । कुत:? तंविना तदसिद्धेः ' ( पृ ० ६६ ) इति, तदपि तुच्छम् दृष्टार्थतायां परिमाणाकारादिविधानस्य नरर्थक्यापत्तेः । गणितादिशिक्षार्थं विद्यालयेषु व्यवस्थोपपत्तेश्च । पुण्यं पापं च त्वद्रीत्या होमेनापि नोत्पद्यते, दृष्टार्थताया एव सर्व-कर्मणामङ्गीकारात् । प्रणीतायामपि जलानयनादिकार्योपयोगिता वर्तत एव । होता है, वैसा अन्य का नहीं । इससे यह निश्चय हुआ कि जहाँ जहाँ सत्य दीखता है और सुनने में आता है, वहीं - वहीं वेदों में से हो फैला है और जो - जो मिथ्या है, सो सो वेद से नहीं, किन्तु वह जीवों की ही कल्पना से प्रसिद्ध हुआ है ' ( पृ ० ६५ ), क्योंकि लौकिक वचन भी अबाधित होने पर सत्य से दूर नहीं जाते । जो विषय अबाधित है, वही निरतिशय सत्य है । इससे भिन्न निरतिशय सत्य की और कोई व्याख्या नहीं हो सकती । पारमार्थिक, व्यावहारिक, प्रातिभासिक के भेद से वेदान्ती संमत सत्य की विविधता को आप मानते नहीं । उस पद्धति से भी यज्ञ की व्यावहारिक सत्यता ही है, पारमार्थिक सत्यता केवल शुद्ध ब्रह्म की मानी गई है । ' जिनमें सब सत्य विद्याओं का विधान है, उसके अर्थ को जानने वाले केवल आप ही हैं ' ( पृ ० ६५ ) इत्यादि मनुस्मृति के aari को उद्धृत करना भी निरर्थक है, क्योंकि वेद चार वर्ण, चार आश्रम, भूत, वर्तमान, भविष्य आदि के बोधक हैं, वेदशास्त्र सनातन हैं, इसमें वैदिकों को कोई आपत्ति नहीं है । आगे क्या यज्ञ करने के लिये पृथिवी खोद के वैदि की रचना, प्रणोता, प्रोक्षणी, चमस आदि पात्रों की स्थापना, दर्भ का रखना, यज्ञशाला का बनाना और ऋत्विजों का वरण करना, यह सब करना चाहिये ' ऐसा प्रश्न करके ' जो - जो युक्तिसिद्ध हैं, आवश्यक है, सो सो ही करने के योग्य है । वेदि बनाकर उसमें होम करने से वह द्रव्य शीघ्र भिन्न - भिन्न परमाणु होकर वायु और अग्नि के साथ आकाश में फैल जाता है । ऐसे ही वेदि में अग्नि तेज होने और होम का साकल्य इधर - उधर बिखरने से रोकने के लिये बद अवश्य बनानी चाहिये । वेदि के त्रिकोण, चतुष्कोण, गोल तथा श्येन पक्षी आदि के तुल्य बनाने के दृष्टान्त से रेखागणित विद्या जानी जाती है, तथा उसमें से जो ईंटों को संख्या दी गई है, उसमें गणित विद्या समझी जाती है । इसी तरह दूसरे पदार्थों का भी कोई न कोई प्रयोजन है ही । परन्तु इस प्रकार से प्रणीता पात्र रखने से पुण्य और इस प्रकार रखने से पाप होता है, इत्यादि कल्पना मिथ्या ही है । यहाँ पाप का कोई निमित्त नहीं है । किन्तु जिस प्रकार के करने में यज्ञ का कार्य अच्छा बने, वही करना आवश्यक है, अन्य नहीं ' ( पृ ० ६६-६७ ) यह जो कहा गया है, यह भी सारहीन है, क्योंकि इन सबका यदि दृष्ट ही प्रयोजन माना जाय तो उस अवस्था में परिमाण, आकार आदि का विधान निरर्थक हो जायगा । गणित आदि की शिक्षा के लिये तो विद्यालयों में व्यवस्था हो जायगी । आपने सभी अनुष्ठानों का दृष्ट प्रयोजन हो माना है, ऐसी अवस्था में आपके मत से होम से पुण्य पाप आदि की निष्पत्ति नहीं होगी । प्रणीता की भी जल आदि को ले आने में उपयोगिता है ही ।
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I वेदार्थपारिजातः वस्तुतस्तु त्वयाप्यग्निहोत्रादिकं कर्म शुभावहमिति न वेदितुं शक्यम् प्रमाणाभावात् । ननु तत्र प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्, तथात्वे शास्त्रवैयर्थ्यापातात् । नाग्निहोत्रदर्शपूर्णमासकारीर्यादिकर्मानुष्ठानेन तत्तत्स्वरूपफलभेदादिक-मिन्द्रियैः प्रत्यक्षीकतुं शक्यते, होमादेः सर्वत्राविशेषात् । विधिवाक्येषु तु स्वर्गपशुपुत्रादिकं फलं तैरुत्पद्यत इति ज्ञायते । कर्मतत्फलानां कार्यकारणभावोऽन्वयव्यतिरेकादिभिर्जन्मशतैरपि न ज्ञातुं शक्यते । अत एव नानुमानमपि तत्र प्रमाणम्, अनुमानस्यापि प्रत्यक्षपूर्वकत्वात् । तस्मादग्निहोत्रादिकर्मसु वैदिकाः शब्दा एव शरणमिति मन्तव्यम् । तथात्वे च प्रणीतास्थापनादावपि शास्त्रमेव प्रमाणम् । पुण्यपापमोरतीन्द्रियत्वादेव तदभावेऽपि प्रत्यक्षादयो न क्रमन्ते । ' अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम: ' इत्यादिश्रुतिवचनैरेव श्रुतार्थापत्त्यादृष्टपुण्यपापादिकमपि कल्पयितुं शक्यते । कर्मणामाशुतरविनाशिनां कालान्तरभाविफलानां च कार्यकारणभावानुपपत्त्या कर्मजश्यमदृष्टं किमपि तदुपपादकं व्यापाररूपं कल्पनीयम् । तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वरूपव्यापारस्य दण्डपदयोर्मध्ये भ्रमिरूपस्येव कल्पने बाधानुपपत्तेः । प्रणीतादिस्थापन कुशा दिस्तरणादीनामपि विहितत्वाददृष्टमेव तत्र फलं कल्पनीयम्, तत्र युक्तेः प्रवेशा-सम्भवात् । प्रत्यक्षादीनां तत्राप्रवेश एव गुणो न दूषणम् । अभ्यथा प्रत्यक्षादिगम्यत्वेऽज्ञातज्ञापकत्वाभावेनाप्रामाण्य-मेव स्याद् वेदस्य ज्ञातज्ञापकत्वात् । यद्यप्यग्निहोत्रादिकरणेनाग्निप्रज्वालनेन शीतान्धकारादिनिवृत्तिरपि भवति, तथापि न तदग्निहोत्रादि-फलम्, तस्यान्यथापि सिद्धत्वात् । तथैवाग्निहोत्रहोमेन सौगन्ध्योक्त्या दौर्गन्ध्यनिवृत्तिरंशतो वायुशुद्धयादिकमपि वस्तुतस्तु आप भी प्रमाण के अभाव में यह जानने में असमर्थ हैं कि अग्निहोत्र आदि कर्म सुख को देने वाले हैं । यदि कहा जाय कि इसमें तो प्रत्यक्ष ही प्रमाण हैं, तब शास्त्र की क्या आवश्यकता रहेगी, फलतः शास्त्र व्यर्थ हो जायगा । अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, कारीरी याग आदि कर्मों के अनुष्ठान से उनके विभिन्न फलों का स्वरूप इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन सबमें होम एक सा ही किया जाता है । विधि वाक्यों से ही यह मालूम होता है कि स्वर्ग, पशु, पुत्र आदि विभिन्न फल इनसे उत्पन्न होते हैं । कर्म का और उसके फल का कार्यकारणभाव संबन्ध सौ जन्म में भी अन्वयव्यतिरेक आदि से नहीं जाना जा सकता । इसीलिये इसमें अनुमान प्रमाण भी प्रवृत्त नहीं होगा । अनुमान भी तो प्रत्यक्ष के आधार पर ही प्रवृत्त होता है । अतः अग्निहोत्र आदि कर्मों के लिये वैदिक शब्दों की ही प्रमाण के रूप में शरण लेनी पड़ेगी । ऐसी स्थिति में प्रणीता के स्थापन के लिये भी शास्त्र को ही प्रमाण मानना पड़ेगा । पुण्य और पाप अतीन्द्रिय हैं, अतः इनके वभाव के बोध में भी प्रत्यक्ष आदि की प्रवृत्ति नहीं हो सकती । ' स्वर्ग की कामना वाला अग्निहोत्र का अनुष्ठान करे ' इत्यादि श्रुति वचनों से ही श्रुतार्थापत्ति के द्वारा अदृष्ट पुण्य - पाप आदि की भी कल्पना की जा सकती है । कर्म भाशु ( शीघ्र ) विनाशी है, फल बाद के काल में निष्पन्न होने वाला है, अतः इनका कार्यकारणभाव नहीं बन सकता, अतः इनके संबन्ध को जोड़ने वाला व्यापाररूप कर्मजन्य अदृष्ट कल्पित करना पड़ेगा | व्यापार का लक्षण यह किया जाता है कि वह जिस वस्तु से पैदा होता है, उससे पैदा होने वाली वस्तु के जन्म में भी सहायक होता है । जैसे कि दण्ड और घट के बीच में भ्रमण रूप व्यापार की कल्पना में कोई बाधा नहीं होती । अमि दण्ड से उत्पन्न होती है और दण्ड से उत्पन्न होने वाले घट की उत्पत्ति में भी सहायक होती हैं, इसी तरह अदृष्ट रूप व्यापार कर्म से उत्पन्न होता है और वह कर्म से उत्पन्न होने वाले फल की उत्पत्ति में सहायक होता है । प्रणीता का स्थापन, कुश का आस्तरण आदि भी शास्त्र विहित हैं, अतः इनका भी फल अदृष्ट ही माना जायगा । यहाँ पर युक्ति का प्रवेश नहीं हो सकता । प्रत्यक्ष आदि की जो यहाँ दाल नहीं गलती, यह उसका भूषण ही है, दूषण नहीं । यदि इसको प्रत्यक्षादिगम्य ture लिया जाय, तो इसमें अज्ञात की ज्ञापकता के अभाव में अप्रामाणिकता दोष वेद के ऊपर भी आपतित होगा । क्योंकि अदृष्ट को प्रत्यक्षादि गम्य मान लेने पर वेद की ज्ञातज्ञापकता ही होगी, अज्ञात की ज्ञापकता नहीं । aafires करने के लिये जो अग्नि जलाई जाती है, उससे शीत, अन्धकार आदि की भी निवृत्ति होती है, किन्तु इनको afanta or a नहीं माना जाता, क्योंकि शीत, अन्धकार आदि की निवृत्ति अन्य तरीकों से भी हो सकती है । इसी तरह अग्निहोत्र होम आदि से सुगन्धि के फैलने से दुर्गन्ध की निवृत्ति और कुछ अंशों में वायु की शुद्धि भी होती ही है, तो भी वह अग्निहोत्र का फल
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वेदार्थ पारिजातः ** भवत्येव तथापि न तदग्निहोत्रफलम्, तस्यान्यथापि सिद्धत्वात् । कस्तूरी- केसरादिकं तु नाग्निहोत्रादी हूयते, तस्या-विहितत्वात् । घृतादीनां विहितानामेव हवनं भवति । फलं तु विधिबोधितं स्वर्गादिकमेव, तस्यैवानन्यलम्यत्वात् । न दृष्टार्थफलत्वमग्निहोत्रादीनां कर्मणां कल्पनीयम्, वेदप्रामाण्यव्याघातात् । अत एव भट्टपादैः ' विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम् ' ( जै ० सू ० ११३१३ ) इत्यत्रोक्तम्--लोकायतिकमूर्खाणां नैवान्यत् कर्म विद्यते । यावत्किश्विददृष्टार्थं तद् दृष्टार्थं हि कुर्वते || वैदिकान्यपि कर्माणि दृष्टार्थान्येव ते विदुः । अल्पेनापि विरोधेन विरोधं योजयन्ति ते ॥ तेभ्यश्चेत् प्रसरो नाम दत्तो मीमांसकैः क्वचित् । न च कञ्चन मुञ्चेयुर्धर्ममार्ग हि ते तदा ॥ प्रसरं न लभन्ते हि यावत् क्वचन मर्कटाः । नाभिद्रवन्ति ते तावत् पिशाचा वा स्वगोचरे || क्वचित्तेऽवकाशे हि स्वोत्प्रेक्षालब्धधामभिः । जीवितुं लभते कस्तैस्तन्मार्गपतितः स्वयम् ॥ तस्माल्लोकायतस्थानां धर्मनाशनशालिनाम् । एवं मीमांसकैः कार्यं न मनोरथपुरणम् ॥ इति । मन्ये दयानन्दादीन् सामाजिकानेवाभिलक्ष्य सर्वमेतदुक्तं स्यात् । यदपि ' यज्ञे देवताशब्देन किं गृह्यते? " इत्याशङ्क्योक्तम्- ' याश्च वेदोक्ताः । अत्र प्रमाणानि - ' अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवतादित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पति-देवन्द्र देवता वरुणो देवता । ' ( वा ० सं ० १४/२० ) इति यच्चैतद् व्याख्यानम् -- ' अत्र कर्मकाण्डे देवताशब्देन वेद-मन्त्राणां ग्रहणम्, गायत्र्यादीनि छन्दांसि ह्यग्न्यादिदेवताख्यान्येव गृह्यन्ते तेषां कर्मकाण्डविधेद्यतकत्वात् । यस्मिन् मन्त्रेऽग्निपदार्थप्रतिपादनं वर्तते स एव मन्त्रोऽग्निदेवतो गृह्यते । एवमेव बात: सूर्यश्चन्द्रमा वसवो रुद्रा आदित्या नहीं हो सकता, क्योंकि ये कार्य अन्य तरीकों से भी पूरे हो सकते हैं । कस्तूरी, कैंसर आदि का हवन अग्निहोत्र में नहीं होता, क्योंकि ये पदार्थ यहाँ विहित नहीं हैं । घृत आदि विहित पदार्थों से ही हवन संपन्न होता है । उनका फल भी विधि से बोषित स्वर्गादि ही हैं, क्योंकि अनन्यभ्य है, अर्थात् उसको अवगति अन्य किली प्रमाण से नहीं होती । अग्निहोत्र आदि कर्मों का दृष्ट फल मानने पर वेद का प्रामाण्य नष्ट हो जायगा । इसीलिये ' विरोधे त्वनपेक्ष ० ' इस मीमांसा सूत्र की व्याख्या करते हुए भट्ट कुमारिल ने कहा है कि ---' मूर्ख लोकायतिकों का इसके सिवाय और कोई काम नहीं है कि वे जो कुछ अदृष्टार्थ है, उसका दृष्ट प्रयोजन बताते रहते हैं । उनके मत से वैदिक कर्मों का भी दृष्ट ही प्रयोजन है । ये लोग थोड़ी सी विरुद्ध बात को अपने पक्ष में लेकर उसका बतंगड़ बना देते हैं । यदि मीमांसक गण इनको थोड़ी सी छूट दे देंगे तो ये धर्म की किसी भी बात को अपने चंगुल से नहीं छोड़ेंगे । बन्दरों को और पिशाचों को जब तक छूट कर खेलने का अवसर नहीं मिलता, तभी तक व्यक्ति उनसे बचा रहता है | यदि इनको थोड़ा सा भी अवसर मिल गया तो ये छूट कर खेलने लगते हैं । उस समय जो इनकी दृष्टि में आता है, जो इनके रास्ते में पड़ जाता है, जो जगह इनको अपनी सुझ - बूझ भिड़ाने को मिलती है, उसके आगे किसी का जीना दूभर हो जाता है । इसलिये मीमांसकों को चाहिये कि वे देखें कि लोकायत मत में स्थित, धर्म के नाथ में लगे हुए ऐसे व्यक्तियों के मनोरथ पूरे न होने पावे । ' लगता है मानों दयानन्द जैसे व्यक्तियों को लक्ष्य करके ही ये बातें कही गई हों । ' यज्ञ में देवता शब्द से किसका ग्रहण होता है? " ऐसी आशंका करके ' जो जो वेद में कहे गये हैं, उन्हींका ग्रहण होता है । इसमें ' अग्निर्देवता ' इत्यादि यजुर्वेद का मन्त्र प्रमाण है । इसके अनुसार अग्नि, पवन, सूर्य, चन्द्रमा, वसु, रुद्र, आदित्य, मस्तु, विश्वेदेव, बृहस्पति, इन्द्र और वरुण ये देवता हैं । ' वहाँ पर इस मन्त्र की व्याख्या इस प्रकार की गई है -- ' कर्मकाण्ड अर्थात् यज्ञ क्रिया में मुख्य करके देवता शब्द से वेद मन्त्रों का ही ग्रहण करते हैं, क्योंकि जो गायत्र्यादि छन्द हैं, वे ही देवता कहलाते हैं । इन वेद मन्त्रों से ही सब विद्याओं का प्रकाश भी होता है । इसमें यह कारण है कि जिन जिन मन्त्रों में अग्नि आदि शब्द हैं, उन उन मन्त्रों का और उन उन शब्दों के अर्थो का अग्नि आदि देवता नामों से ग्रहण होता है । इसी तरह से सूर्य, चन्द्र वसु, रुद्र, आदित्य, ७४
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५८६ दार्थपारिजातः मरुतो विश्वेदेवा बृहस्पतिरिद्रो वरुणश्चेत्येतच्छब्दयुक्ता मन्त्रा देवताशब्देनोच्यन्ते । तेषां तत्तदर्थस्य द्योतकत्वात्, परमाप्तेश्वरेण कृतसङ्केतत्वाच्च ' ( पृ ० ६७ ) इति स्वयं कृतम्, तदपि मन्दम्, ' अग्निर्देवता ' इत्यादिमन्त्रपदेः प्रसिद्धाग्यादीन् शब्दशक्तिसमुपस्थितानुपेक्ष्य लक्षणया तद्बोधकमन्त्रपर्यन्तानुधावनस्य निर्मूलखात् । किश्व, यज्ञे वेदोक्तानामेव देवानां ग्रहणं नान्यासामित्यस्मिन्नर्थे एव प्रमाणमुपस्थापनीयम् । न चास्मिन् मन्त्रे तादृशार्थं उपलभ्यते । न च भूमिकाप्रदर्शितो मन्त्रार्थी युक्तः, लाक्षणिकत्वेन तस्यापास्तत्वात् । किव, स्वीत्या देवतापर्दस्तत्तन्मन्त्रबोधनं व्यर्थमेव त्वया यज्ञे वेदमन्त्रोपादानस्येश्वरस्तवनमन्त्र रक्षणपरमात्मास्तित्वबोधादिफलकत्वेनोक्तत्वात् । किश्व गायत्र्यादिच्छन्दसामपरपर्याया देवताशब्दा इति वचनमपि रिक्तमेव, निर्मूलत्वात् । न च छन्दसां कर्मकाण्डादिविधिद्योतकत्वमेव तेषामग्न्यादिदेवतापरपर्यायत्वसाधकमिति वाच्यम् त्वदुक्तहेतोरनैकान्तिकत्वेनाभाससमानयोगक्षेमत्वात् । तथाहि - गायत्र्यादीनि च्छन्दांस्यग्न्यादिदेवता-ख्यान, कर्मकाण्डादिविधिद्योतकत्वाद् इति त्वनुमानं न सम्भवति, कुतः? वेदगततत्तच्छब्देषु कर्मकाण्डविधिद्योतकत्वे सत्यप्यग्न्यादिदेवताख्यत्वाभावात् । हेतुरस्तु साध्यं मा भूत्तर्हि कि दूषणमिति पर्यनुयोगे व्यभिचारशङ्कानिवर्तक-af भावेन हेतोरप्रयोजकत्वाच्च । यत्तु ' यस्मिन् मन्त्रे चाग्निशब्दार्थप्रतिपादनं वर्तते स एव मन्त्रोऽग्निदेवतो गृह्यते ' ( पृ ० ६७ ) इति, तदपि तुच्छम् प्रसिद्धिविरोधात् । लोके तु उष्णस्पर्शाश्रयः कश्चित् तेजस्त्वावच्छिन्नो द्रव्यात्मको वस्तुविशेषोऽग्नि-रित्युच्यते । वेदेऽपि ' अग्निः कस्माद् अग्रणीर्भवति, अनं यज्ञेषु प्रणीयते, अङ्गं नयति सन्नममानः, अवनोपनो भवतीति स्थलाष्ठीविः । न वनोपयति न स्नेहयति । ' त्रिभ्य आख्यातेभ्यो जायते ' इति शाकपूणिः । इतादक्ताद् दग्धाद्वा नीतात् । मत्, विश्वेदेव, बृहस्पति, इन्द्र, वरुण इन शब्दों से युक्त मन्त्र देवता शब्द से कहे जाते हैं । मन्त्रों का देवता नाम इसलिये है कि उन्हीं से सब वर्षो का यथावत् प्रकाश होता है, जिनमें परमात्मा ने उनको संकेतित किया है ' ( पृ ० ६७ ), यह कथन भी लवर है, क्योंकि ' अग्निर्देवता ' इत्यादि मन्त्र के पदों से शब्द की शक्ति से समुपस्थित प्रसिद्ध अस्ति की उपेक्षा करके लक्षणा से आरंग आदि के के मन्त्रों तक की दौड़ लगाना बेकार है, निर्मूल है । यज्ञ में वेदोक्त देवताओं का ही ग्रहण होता है, दूसरे देवताओं का नहीं, इसमें भी प्रमाण बताना पड़ेगा । इस मन्त्र में तो ऐसी बात नहीं कहीं गई है । भूमिका में किया गया आपका अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि मुख्यार्थ के रहते लाक्षणिक अर्थ करने में कोई प्रमाण नहीं है । आपके मत से देवता पद से उस उस मन्त्र का बोधन भी व्यर्थ ही है, क्योंकि आपने यज्ञ में वेद मन्त्रों के पाठ का प्रयोजन ईश्वर की स्तुति, मन्त्रों की रक्षा, परमात्मा के अस्तित्व का बोध आदि बताया है । गायत्री प्रभृति छन्दों को ही देवता बताना भी बिना प्रमाण के व्यर्थ है । छन्द कर्मकाण्ड आदि की fafter को बताने वाले हैं, अतः स्वभावतः ये अग्नि प्रभृति देवताओं के ही नाम हैं, यह कथन भी ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि आपका कहा गया हेतु अनैकान्तिक है, इसका मिथ्या कल्पना से अधिक महत्व नहीं है । गायत्री प्रभृति छन्द अग्नि आदि देवता नाम बाले हैं, क्योंकि ये कर्मकाण्ड आदि विधि के द्योतक है, यह अनुमान नहीं हो सकता, क्योंकि वेदगत जन - जन शब्दों में कर्मकाण्ड की विधि की द्योतकता होते हुए भी अग्नि आदि देवता के नाम को द्योतकता नहीं है । हेतु के रहते हुए भी साध्य के न रहने पर क्या दोष है? इस प्रश्न के किये जाने पर उसका यही उत्तर हैं कि व्यभिचार की आशंका के निवारक तर्क के अभाव में हेतु कुछ भी सिद्ध करने में असमर्थ हैं । ' जिन - जिन मन्त्रों में aft न यादि शब्द हैं, उन - उन मन्त्रों का अग्नि आदि देवता नामों से ग्रहण होता है ' यह कथन भी प्रसिद्धि के विपरीत है । लोक में उष्ण स्पर्श वाला तेजस्त्व से अवच्छित द्रव्यात्मक वस्तु विशेष अग्नि शब्द का अर्थ माना गया है । वेद में भी --- ' अग्नि शब्द किस प्रकार निष्पन्न होता है? यह अग्रणी होता है, यज्ञ में इसका पहला स्थान होता है, यह अपने को प्रधान बनाकर बाकी सबको अपना अंग बना लेता है । स्थोलाष्ठीवि आचार्य का मत है कि यह अक्नोपन होता है, अर्थात् अग्नि किसी को स्नेहन से युक्त नहीं होने देता, सब पदार्थों को रूक्ष बना देता है । शाकपूणि आचार्य का मत है कि अग्नि शब्द की निरुक्ति तीन
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वेदार्थपारिजातः स खत्वेतेरकारमादत्ते गकारमनर्वा दहतेर्वा नीः परः ' ( नि ० ७११४ ) इत्यादिर्नरुक्तोक्तिभि:, ' प्रति त्यं चारुश्वरं गोपीथाय प्रहूयसे । मरुद्भिरग्न आगहि ' ( ऋ ० सं ० १ ९९ १ ९ ) इत्यादिमन्त्रैश्च कश्चिच्चेतनो देवोऽग्निशब्दार्थो भाति । ' अग्निमीळे ' ( ऋ ० सं ० १1१1१ ) इत्यादिषु च भौतिक एवाग्निर्गृह्यते, अत्र चेतनोऽपीति केचित्, ' अग्निरप्यदिति-रुच्यते ' इत्येकादशे यास्कः । तत्र प्रकरणादेव तत्तदर्थो ग्राह्यः । यथा-- ' अग्निहिमस्य भेषजम् ' इति वाक्यघटितस्य मन्त्रस्य सूर्य एव देवताभिमता तवापि नाग्निरिति एवमेव ' बातः ', ' सू? ', ' चन्द्रमा: ' इत्यादीनामपि ज्ञेयम् । fara, त्वयापि स्ववेदव्याख्याने प्रत्यक्षान्यादय एव देवतात्वेन वर्णिताः । तथाहि पदार्थ: - ' अग्निः ' प्रकटः पावकः ( देवता ) देवपथदिव्यगुणत्वात्, ' वातः ' पवनः ( देवता ), ' सूर्य ' सविता, ' चन्द्रमा: ' इन्दुः ( देवता ), ' बसव: ' वसुसंज्ञकाः प्रसिद्धाग्न्यादयोऽष्टौ देवताः, ' रुद्राः प्राणादयः ' एकादश देवताः, आदित्या द्वादश वसुरुद्रादिसंज्ञका विद्वांसश्च देवताः, मरुत इति ऋत्विनाम ( निघण्टु ३।१८ ), विश्वेदेवाः सर्वे देवा दिव्यगुणयुक्ता मनुष्याः पदार्थाश्च देवताः, बृहस्पतिः बृहतो वचनस्य ब्रह्माण्डस्य वा पालकः । अन्वयः - हे स्त्रीपुरुषाः । युष्माभिर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवता आदित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता For देवता सम्यग्विज्ञेयाः । भूमिकायां त्वग्न्यादिशब्दघटितमन्त्राणां देवतात्वमुक्तम्, तच्च भ्रान्तिमूलकमेव | महीधराचार्येण तु विनियोगमनुसृत्यायं मन्त्र एवं व्याख्यातः कर्मणि श्येनाद्याकारतया प्रकृते इष्टकाचयने तदङ्गभूतमिष्टकोपधानं कर्म त्रिभिर्मनचयैराह - मान्छन्द इत्यादिभिः । षट्त्रिंशत् छन्दस्या उपदधाति । छन्द एवोपधानो मन्त्र आसामिष्टकानामिति छन्दस्या इष्टकाः षत्रिशदुपदध्यादित्यर्थः । माच्छन्द इत्यादिमन्त्र-शब्दों से होती है | इस शब्द से, अक्त अथवा दग्ध शब्द से तथा नीत शब्द से अर्थात् इत शब्द से अकार को, अक्त अथवा दग्ध शब्द से कार को, तथा गीत शब्द से इकार लेकर अग्नि शब्द बनता है ' इस तिक्त की उक्ति के आधार पर तथा ' प्रति त्यं ' इत्यादि ऋग्वेद के मन्त्र के आधार पर कोई चेतनामय देवविशेष अग्नि शब्द का अर्थ प्रतीत होता है । ' अग्निमीळे ' इत्यादि मन्त्रों में भौतिक after का ग्रहण होता है और यहाँ पर चेतन भी गृहीत होता है, ऐसा कुछ लोगों का कथन है । ' अग्नि को भी अदिति कहा जाता है ऐसा वचन free कार यास्क ने ग्यारहवें अध्याय में कहा है । इन स्थलों में प्रकरण के अनुसार ही अर्थ गृहीत होता है । जैसे कि ' अग्नि हिम की दवा है ' इस मन्त्र में अग्नि शब्द का अर्थ सूर्य आप भी मानते हैं । इसी तरह बात, सूर्य, चन्द्रमा आदि के विषय में भी समझना चाहिये | आपने भी अपने वेदभाष्य में प्रत्यक्ष अभि आदि को ही देवता माना है । जैसे कि अग्नि पद का अर्थ इस प्रकार है --- अग्नि प्रकट पावक देवता को कहते हैं । इसमें दिव्य गुण विद्यमान हैं । वात पवन देवता है । सूर्य सविता, चन्द्रमा इन्दु देवता, वसु संज्ञक प्रसिद्ध अग्नि आदि आठ देवता, रुद्र प्राणादि ग्यारह देवता, आदित्य द्वादश और वसु, रुद्र आदि संज्ञक विद्वान् देवता निघण्टु के अनुसार मरुत् ऋत्विक् का नाम है, विश्वेदेव सभी देव अर्थात् दिव्य गुण युक्त मनुष्य और पदार्थ देवता है, बृहस्पति महान् वचन और ब्रह्माण्ड का पालक है । इस मन्त्र का अन्वय इस प्रकार है कि हे स्त्री - पुरुषों! आप लोगों को अग्नि देवता, वात देवता, सूर्य देवता, चन्द्रमा देवता, वसुदेवता, रुद्र देवता, आदित्य देवता, भस्त् देवता, विश्वेदेव देवता, बृहस्पति देवता, इन्द्र देवता, वरुण देवता का भली भांति ज्ञान करना चाहिये | भाष्य में यह अर्थ किया गया है और भूमिका में अग्नि प्रभूति शब्द घटित मन्त्रों को देवता कहा गया है । यह नान्सि मूलक ही प्रतिपादन है । आचार्य महीधर ने विनियोग का अनुसरण कर इस मन्त्र की व्याख्या इस तरह की है --- श्येन पक्षी आदि के आकार का reer ( इंट ) चयन रूप कर्म प्रकृत है । उसका अङ्गभूत इष्टका ( इंट ) उपधान रूप कर्म. ( माच्छन्द प्रभृति ) तीन मन्त्रों में प्रतिपादित है । पहले छत्तीस छन्दस्य इष्टकाओं का उपधान किया जाता है । छन्द ही जिनका उपधान मन्त्र है, ऐसी ईंटों का नाम छन्द है, इनकी संख्या ३६ हैं । ' माच्छन्द ' इत्यादि मन्त्रों का अर्थ ' अग्निदेवता ' इस मन्त्र के अर्थ के लिये उपयोगी है, अतः उसको
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५८८ दार्थ पारिजातः स्यार्थोऽग्निर्देवतेत्यादिमन्त्रोपयोगित्वादत्र समुद्धरणीयः । तथाहि ' छन्दस्याद्वादश द्वादशाप्ययेषु माच्छन्द ' ( का ० औ ० ११७ ९ १८ ) । अव्ययेषु पक्ष - पुच्छात्मस frag त्रिषु प्रत्येकं द्वादश छन्दस्यासंज्ञा इष्टका उपदधातीति सूत्रार्थः । षट्त्रिंशद्यजूंषि लिङ्गोक्तदेवत्यानि । मोयत इति मा, मितश्छादनाच्छन्दोऽयं लोकः । हे इष्टके । त्वं तद्रूपासि, ' अयं वै लोको मायं लोको मित इव ' ( श ० ८ | ३ | ३ | ५ ) इति श्रुतेः । एवं च माच्छन्द इतोदमे में यजुः । अस्य देवता लिङ्गोक्तत्वाद् मा एव, अयं लोक एवेत्वर्थः । प्रथमेष्टकोपधाने चास्य विनियोगः । द्वितीयं यजुराह - अस्माल्लोकात् प्रमीयत इति प्रमा अन्तरिक्षलोकरूपासि । ' अन्तरिक्षलोको वे प्रमा अन्तरिक्षलोको ह्यस्माल्लोकात्प्रमित इव ' ( श ० ८ | ३ | ३ | ५ ) इति श्रुतेः । एवं च प्रमाच्छन्द इति द्वितायं यजुः । अस्य द्वितीयेष्टको पचाने विनियोगः । लिङ्गोक्त-त्वाच्च प्रमा अन्तरिक्षलोक एव देवता । तथा च षट्त्रिंशत्संख्याकेन यजुषा षट्त्रिंशच्छन्दस्यानामिष्टकानामुपधान-मस्मिन् कर्मणि वक्ष्यति । तत्र सर्वत्रोक्तप्रक्रिययैव देवताविनियोगादिनिश्चयः कार्यः । " प्रतिमा द्यौः, सा ह्यन्तरिक्षे प्रतिमिता, ' असो वे लोकः प्रतिमेष ह्यन्तरिक्षलोके प्रमित इव ( श ० ८ | ३ | ३ | ५ ) इति श्रुतेः । अस्त्रीवयः अस्यते क्षिप्यत इत्यस्त्रि, अस्त्रि पतनशीलं वयोऽन्नं यस्मात्तदस्त्रियः । दीर्घश्छान्दसः । अस्त्र rar: लोकत्रयरूपं छादनाच्छन्दस्तद्रूपासि । ' यदेषु लोकेषु अन्नं तदस्त्रीवयोऽथो यदेभ्यो लोकेभ्योऽन्नं ति तदस्त्रीवयः ' ( श ० ८ | ३ | ३३५ ) इति श्रुतेः । हे इष्टके! त्वं पक्त्युष्णग्वृहत्यनुष्टृ विराङ्गायत्री त्रिष्टुब्जगती-रूपासीत्यर्थः । इत्यनेन द्वादश छन्दस्या उपदध्यादिति । द्वादश च पृथिवीछन्द इत्यादिना । अस्यार्थः -- पृथिव्यादि-देवत्यानि यानि छन्दांसि तद्रूपासि । समाः संवत्सराः । स्पष्टमन्यत् । ' यान्येतद्देवत्यानि छन्दांसि तान्येवैतदुपदधाति ' ( श ० ८ | ३ | ३ | ६ ) इति श्रुतेः । एवं द्वादश छन्दस्या इष्टका अग्निर्देवतेत्यादिनोपदध्यात् । अग्निर्देवतेत्येकेन यजुषा भी यहाँ बताना पड़ेगा । ' छन्दस्था द्वादश ० ' इस कात्यायन श्रौतसूत्र में उक्त मन्त्रों का विनियोग प्रदर्शित है कि अध्यय अर्थात् पक्ष, पुच्छ, आत्मसन्प इन तीन स्थानों में से प्रत्येक में बारह बारह छन्दस्य संज्ञक इष्टकाओं का उपधान करना चाहिये । यहाँ पर ३६ यजुमंन्त्र हैं । इनके देवता लिंग से प्रतीत होते हैं । जो मापा जाता है, उसको मा कहते हैं । छादन से मापे जाने के कारण यह लोक छन्द है । हे इष्टके! तुम लोक रूप हो । ' यह लोक मा है, मापा हुआ है । यह शतपथ श्रुति है । इस प्रकार ' माच्छन्द: ' यह एक यजुर्मंन्त्र है | इस मन्त्र का लिंगो देवता मा अर्थात् यह लोक ही है । इसका विनियोग प्रथम इष्टका के उपधान में है । दूसरा यजुर्मन्त्र ' प्रमाच्छन्दः ' यह हैं । इस लोक से मापी जाने वाली प्रमा, अर्थात् अन्तरिक्ष लोक रूप तुम हो । ' अन्तरिक्ष लोक प्रमा है, अन्तरिक्ष लोक इस लोक से प्रमित होता है ' यह शतपथ का वचन हैं । इस प्रकार यह दूसरा यजुर्मन्त्र है । इसका विनियोग दूसरी इष्टका के उपधान में है । गोक्त प्रमा अर्थात् अन्तरिक्ष लोक ही इसका देवता है । इसी तरह से छत्तीस यजुर्मन्त्रों के द्वारा छत्तोस छन्दस्य इष्टकाओं का उपधान यहाँ कहा गया है | यहाँ सब जगह ऊपर बताई गई प्रक्रिया से ही देवता, विनियोग आदि का निश्चय होता है । प्रतिमा आकाश है । वह अन्तरिक्ष से प्रतिमित है । ' आकाश लोक प्रतिमा है, क्योंकि यह अन्तरिक्ष लोक में प्रमित है ' यह शतपथ श्रुति है | ' स्त्रीवय: ' यजुर्मंन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - जिसका असन अर्थात् क्षेपण होता है, उसको अस्त्रि कहते हैं, अस्त्र अर्थात् जिससे अन्न पतनशील होता है, उसको अस्त्रिय कहा जाता है । इकार का दीर्घ छन्द के कारण हो जाता है । इस प्रकार अस्त्रीय शब्द निष्पन्न होता है । अस्त्रीय छन्द लोकत्रय के रूप का छादक है, इसलिये तुम भी उसी रूप वाली हो । ' जो इन लोकों में अन है, वह अस्त्रीय है और इन लोकों से जो अन्त्र पतनशील है, वह भी अस्त्रीवय है यह श्रुति वचन है । हे इष्टके! तुम पंक्ति, उष्णिक्, बृहती, अनुष्टुप्, बिराट्, गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती छन्द रूप हो । इस प्रकार इस प्रथम मन्त्र से बारह छन्दस्य इष्टकाओं का उपधान करे । इसी तरह ' पृथिवोच्छन्द ' इत्यादि मन्त्र से बारह का उपधान करे । इसका अर्थ इस प्रकार है --- पृथिवी प्रभूति देवता वाले छन्द, तद्रूप तुम हो । सम शब्द का अर्थ संवत्सर है । बाकी का अर्थ स्पष्ट है । ' जो छन्द इन देवताओं वाले है, सप वाली ही इष्टकाओं का उपधान करते हैं । यह शतपथ का वचन इसमें प्रमाण है । इसी तरह बारह छन्दस्य इष्टकाओं का उपधान ' अग्नि-
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वेदार्थपारिजातः I एका, वातो देवतेति द्वितीयेन यजुषा द्वितीया, सूर्यो देवतेति तृतीया । एवं सर्वत्राग्रेऽपि । मन्त्रस्यार्थः - इष्टके! त्वमग्न्यादिरूपासि त्वामुपदधामीति सर्वत्र शेषः । अग्न्यादीनां देवतात्वं प्रसिद्धम् । ' अग्निर्देवता वातो देवतेत्येता वै देवताछन्दांसि । तान्येवैतदुपदचाति ' ( श ० ८ | ३ | ३३६ ) इति श्रुतेः । एवं त्रिर्द्वादशकृत्वः षट्त्रिंशत्सख्याकारछान्दस्या एभिर्यजुभिरुपदध्यादिति कर्माङ्गभूते उपधानकर्मण्येवैषामुक्तप्रक्रियया विनियोगः । तामेतां प्रक्रियामज्ञात्वंव दयानन्दः ' अग्न्यादिशब्दघटितमन्त्रा एव देवता ' इत्युक्तवान् । यद्वा मोमांसका मन्त्ररूपामेव देवतां मन्यन्ते इत्या कयैव तथोक्तवान् । यच्च देवताशब्देन वेदे मन्त्रग्रहणे निरुक्तप्रमाणमाह - ' कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रा वदे ' ( नि ० ११२ ), ' अथातो देवतम् - तद्यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तदैवतमित्याचक्षते । संषा देवतोपपराक्षा | यत्काम ऋषियंस्यां देबतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुति प्रयुङ्क्ते, तद्देवतः स मन्त्रो भवति | तास्त्रिविधा ऋचः -- परोक्षकृताः, प्रत्यक्षकृताः, आध्यात्मिक्यश्च ' ( नि ० ७ १ ) ( पृ ० ६८ ) एतानि वाक्यानि वेदे देवताशब्दस्य मन्त्रवाचकत्वे प्रमाणरूपेणोपन्य-स्वानि । तदर्थोऽपि तत्रैवोक्तः – ' कर्मणामग्निहोत्राद्यश्वमेधान्तानां शिल्पविद्यासाधनानाञ्च सम्पत्तिः सम्पन्नता संयोगो भवति येन स मन्त्रो वेदे देवताशब्देन गृह्यते । तथा च कर्मणां सम्पत्तिर्मोक्षो भवति, येन परमेश्वरप्राप्तिश्च सोऽपि मन्त्रो मन्त्रार्थश्वाङ्गीकार्यः ' ( पृ ० ६८ ) इति, तच्च ' मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ता हरोतको ' इत्युक्तिमेवानुहरति, सम्पत्तिशब्दस्य तादृशार्थत्वे प्रमाणाभावात् । देवता ' इस तृतीय मन्त्र से करें । ' अग्निर्देवता ' इस पहले यजुर्मंन्त्र से पहली का, ' वातो देवता ' इस दूसरे यजुस् से दूसरी का, ' सूर्यो ' देवता ' इस तीसरे यजुस् से तीसरी इष्टका का, इसी तरह बारहों इष्टकाओं का उपधान करे । मन्त्र का अर्थ यह हुआ है इष्टके! तुम अग्नि प्रभृति देवताओं के रूप वाली हो । ' तुम्हारा उपधान करता हूँ ' यह वाक्य सब जगह जोड़ देना चाहिये । अग्नि प्रभृति देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं । ' अग्नि देवता, वात देवता प्रभूति देवता वाली ये छन्दस्य इष्टकाएं हैं, इन्हीं का उपधान करते हैं ' यह शतपथ श्रुति इसमें प्रमाण है । इस तरह तीन बार बारह बारह करके छतीस छन्दस्य इष्टकाओं का उपधान इन छत्तीस यजुर्मन्त्रों से यहाँ विहित हैं । इसलिये कर्म के अंगभूत उपधान कर्म में ही इन सबका उक्त प्रक्रिया से विनियोग होता है । इस पूरी प्रक्रिया को बिना जाने ही दयानन्द ने कह दिया कि अग्नि प्रभृति शब्दों से घटित मन्त्र ही देवता है । लगता है कि ' मीमांसक देवता को मन्त्र रूप मानते हैं ' इस बात को बिना समझे, खाली सुन कर ही दयानन्द ने यह बात कह 1 वेद में देवता शब्द से मन्त्र का ग्रहण होता है, इस विषय में दयानन्द ने निरुक्त का प्रमाण दिया है- ' कर्म की संपलता करने वाला मन्त्र वेद में देवता कहलाता है ', ' अब दैवत प्रकरण प्रारम्भ होता है । अग्नि प्रभृति देवपत्नी पर्यन्त जिन नामों से प्रधानतया देवताओं की स्तुति की जाती है, उनका प्रतिपादक प्रकरण दैवत कहलाता है | इसमें देवतावाचक पदों की अभिधान, व्युत्पत्ति, स्तुति, उदाहरण, निर्वाचन आदि के द्वारा संक्षिप्त परीक्षा की जाती है । ऋषि जिस वस्तु की कामना से जिस देवता की स्तुति से जिस अर्थ की सिद्धि होगी, इस बात का विचार कर जिस मन्त्र का विधान करता है, वही उसका देवता होता है । ये मन्त्र तीन प्रकार के हैं - परोक्षकृत, प्रत्यक्षकृत तथा आध्यात्मिक ' ( पृ ० ६८ ) । इस वैदिक वाक्यों में देवताशब्द मन्त्र का वाचक है, इस विषय में प्रमाण के रूप में उपस्थित किया गया है । इसका अर्थ भी वहाँ इस प्रकार किया गया है -- ' वेद मन्त्रों से अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त सब यज्ञों की तथा शिल्पविद्या और उनके साधनों की संपत्ति अर्थात् प्राप्ति होती है और कर्मकाण्ड को लेकर मोक्ष पर्यन्त सुख मिलता है तथा परमेश्वर की प्राप्ति होती हैं, इसी हेतु से उनका नाम देवता है ' ( पृ ० ६८ ), यह कथन भी ' मुँह है तो कहने में क्या हर्ज है कि हरें दस हाथ की होती है ' इस उक्ति को स्मरण दिलाने वाला है । संपत्ति शब्द का इस प्रकार का अर्थ करने में कोई प्रमाण नहीं है ।
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वेदार्थपारिजातः कर्मभिर्मोक्षो भवतीत्येक: पक्षोऽस्ति परं कर्मणां क्षणभङ्गुराणां मोक्ष इति वैदिकमतमित्याश्चर्यम् । ' कर्मणां सम्पत्तिर्मोक्षो भवति, येन परमेश्वरप्राप्तिश्च भवति, सोऽपि मन्त्रार्थश्चाङ्गीकार्य इति कस्य शब्दस्य कथमर्थः? देवताशब्देन मन्त्रो गृह्यत इति कथमनेन सूत्रेण सिद्धयतीति समाधानं तु दुःशकमेव । अग्निहोत्राश्वमेधान्तानां कर्मणां शिल्पसाधनत्वं कथमित्यपि प्रदर्शनीयमासीत् । कीदृशी शिल्पविद्या ततः प्रसरति, तैः शिल्पैः कानि वस्तूनि साध्यते । ' पुरुषविद्यानित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे ' इति हि निरुक्तवाक्यम् । तदर्थस्तु मनुष्यवद्देवताभिधानम् । यथैव मनुष्या प्रयोजनेषु नामाख्यातोपसर्गनिपातैर्यथार्थमभिदधत्येवमेव देवा अपि बोधयितुं शक्नुवन्त्येव । तेऽपि हि मनुष्यवद्देवा अङ्गादियुक्ताः पौरुषविधिकेरङ्गः कर्मभिश्व स्तूयन्त इति वक्ष्यमाणत्वात् । यदि नामाख्यातो-पसर्गनिपातानामपरिहीना शक्तिर्देवानप्यभिधातुम्, अथ किमर्थं वेदे मन्त्रः समाम्नातः? तेषां मनुष्यनद्देवताभियान-मिति नैरुक्तवाक्यमप्रयोज्यमिति पूर्वपक्षमाशङ्क्य समादधाति - पुरुषविद्यानित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे । अर्थात् पुरुषेषु मनुष्येषु विद्याया विज्ञानस्यानित्यत्वात् पुरुषविद्यानित्यत्वात् ततो कर्मसम्पत्तिः फलेन सम्पादनमवगुण-कर्मसम्पत्तिः । फल सम्पन्नमेव कर्म भविष्यतीत्येवमर्थं वेदेन मन्त्रः समाम्नात इति वाक्यशेषः । इतरथा हि पुरुषेषु विज्ञानस्यानित्यत्वाद् यथायं नाभिदधते देवान् नामाख्यातोपसर्गेः । अशिक्षितत्वान्मन्दशिक्षितत्वाच्च विस्मरण-शीलत्वान्नामाख्यातोपसर्गानयथार्थान् प्रयुञ्जाना देवानपराध्येयुः । सर्वार्थप्रत्यक्षदृशो देवाः स्वल्पमप्यपरावं नमन्ति । ततश्च नेयुः कर्मणि । ततश्च देवताहीनं कर्माफलं सम्पद्यते । न केवलं फलासम्पत्तिः, दुरिष्टिहेतुको दोषश्च स्यात् । तस्मादेत एव नामाख्यातोपसर्गनिपाताः प्रयोगानुपरिपाटया नियमार्थं मन्त्रत्वेन वेदे आम्नाताः । कुछ दर्शकों का मत है कि यज्ञ - यागादि कर्मों की सहायता से भी मोक्ष की अधिगति होती है, किन्तु यह कहना कि वैदिक मत में क्षणभंगुर कर्मों को मोक्ष कहा जाता है, एक आश्चर्य की ही बात है । कर्मों की सम्यक निष्पत्ति से मोक्ष होता है । इससे परमेश्वर की भी अधिगति होती है । यह भी मन्त्र का अर्थ मानना चाहिये, यह किस शब्द का कैसे अर्थ हुआ? देवता पर्यन्त शब्द से मन्त्र गृहीत होता है, इस सूत्र से यह कैसे सिद्ध होता है? इन प्रश्नों का समाधान कठिन है | अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध और उससे कर्म शिल्प के साधन कैसे हैं? इसको भी बताना चाहिये था । इनसे किस प्रकार की शिल्पविद्या का प्रसार होता है क्या चीज बनती है? पुरुष के ज्ञान के क्षमित्य होने के कारण कर्म की फलसंपन्नता के लिये वेद में मन्त्रों का विधान है । जैसे मनुष्य के प्रयोजन बोधन के उपस्थित होने पर नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात की सहायता से उसको अभिव्यक्त करते हैं, इसी तरह देवताओं में भी वे समर्थ हो सकते हैं । क्योंकि पुरुष के समान ही देवताओं के भी अंग आदि की कल्पना कर उनकी स्तुति की जाती है, यह बात आगे कही गई है । यदि नाम, बाख्यात, उपसर्ग और नपा की शक्ति देवताओं को अभिहित करने में भी परिक्षण नहीं होती तो फिर वेद में मन्त्र किस लिये पढ़े गये हैं? बतः नाम, बख्यात आदि का मनुष्य के प्रयोजन के समान देवता के अभिधान में श्री सामर्थ्य है, यह निरुक्त का वाक्य यहाँ लागू नहीं हो सकता, इस पूर्वपक्ष को उपस्थित कर समाधान किया गया है कि पुरुष के ज्ञान के अनित्य होने के कारण कर्म की सम्पन्नता के लिये वेद में मन्त्रों का विधान है । अर्थात् पुरुषों में विद्या अर्थात् विज्ञान के इसलिए वेद ने मन्त्र अनित्य होने से ही कर्मसम्पत्ति अर्थात् शास्त्रानुसारी कर्म के अनुष्ठान के द्वारा कर्म की का समाम्नाय किया है, इतना जोड़ना पड़ेगा । अन्यथा पुरुष विज्ञान के अनित्य होने से वह नाम, ठीक से प्रतिपादन नहीं कर पावेगा । मनुष्य वशिक्षित होते हैं या उनकी शिक्षा अधूरी होती है, फलसंपन्नता होगी, आख्यात आदि से देवताओं का इसके बाद भी उनका भूलने का स्वभाव होता हैं । अतः वे नाम, आख्यात आदि का प्रयोग करते समय देवताओं के प्रति कोई अपराध कर सकते हैं । सभी वस्तुओं को प्रत्यक्ष देखने वाले देवतागण थोड़े से भी अपराध को नहीं सह सकते । अतः नाम, आख्यात आदि का गलत प्रयोग हो जाने की दशा में वे यज्ञ में उपस्थित नहीं होंगे । इस प्रकार देवता से हीन कर्म निष्फल हो जायगा । फलसंपत्ति तो इससे नहीं ही होगी, sity के ठीक से froyer न होने से दोष भी होगा । इसलिये ये हो नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात प्रयोग का अनुसरण करने वाली