वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 61–70

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 61–70

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वेदार्थपारिजातः ३१ सति तदतिरिच हेत्वजन्यत्वस्य प्रामाण्यस्व तस्त्वे दोषाभावात् । कार्यकारणादेव कार्येण सहोत्पत्तिरेव प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वम्, कार्यशक्तं रसति बाधके कार्यकारणादेवोत्पत्तिः सर्वैरप्यङ्गीकार्या, अन्यथा दाहादिशक्तेः कारणान्तरादुत्पत्ता-बुत्पन्नस्याप्यग्नेरदाहकत्वापत्तिः स्यात् । वह्निरच स्वाश्रयं दहन्नेव जायते । न चैवमप्रामाण्यमपि स्वत एवास्त्विति वाच्यम्, तस्य दोषान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वेन तद्धेतुमात्रजन्यत्वाभावात् । न चाजन्यत्वादीश्वरज्ञान उक्तलक्षणाव्याप्तिरिति वाच्यम्, तस्याजन्यत्वेऽपि ज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सत्यतिरिक्तकारणाजन्यत्व-लक्षणविशिष्टधर्मवत्त्वाभावात् । तेन विज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति तदतिरिक्तसामग्री जन्यत्वात्यन्ताभाववत्त्वं प्रामाण्यस्वतस्त्व-लक्षणम् । न चात्र मानाभावः कार्यशक्तेः कारणान्तराजन्यत्वेन तदनुमातुं शक्यत्वात् । तथाहि-- ज्ञानस्य प्रामाण्यं ज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति तदतिरिक्तहेतुजन्यं न भवति शक्तित्वात् वह्निशक्तिवत् । न च शक्तिरसिद्धा, तस्याः साधयिष्यमाणत्वात् । प्रमा विज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति तदरिक्तजन्या न भवति, अप्रमातिरिक्तत्वात् पटादिवत् । न च ज्ञानत्वाधिकरणत्वमुपाधिः, ईश्वरज्ञाने साध्याव्याप्तेः । यदुक्तम् - ज्ञानसामग्र्यजन्यत्वमुपाधिः, न चायमांश्वरज्ञाने, साध्येऽव्याप्तः, तस्य नित्यत्वे सुतरां ज्ञानसामग्र्यजन्यत्वसिद्धेरिति } तन्न, व्यतिरेके सोपाधिकतया साध्याव्यापकत्वात् । तथाहि-- यज्ज्ञानसामग्रीजन्यं तज्ज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सत्यतिरिक्तजन्यमप्रमाणवदिति व्यतिरेकिव्याप्तावप्रमात्वस्यैवोपाधि-त्वात् । यदुक्तम् —— अनीश्वरप्रमा विज्ञानहेत्वतिरिक्तहेत्वधीना कार्यत्वाद् घटवत् । ननु ज्ञानत्वाश्रयभूताज्ञानव्यक्तिः प्रमात्वाश्रयभूतायाः प्रमाव्यक्तेभिन्ना अभिन्ना वा? प्रथमे प्रत्यक्षज्ञानव्यक्त्या व्यभिचार:, प्रत्यक्षज्ञानव्यक्तेर्ज्ञानहेत्वति-रिक्तहेत्वधनाभावात् । अन्त्ये च अनीश्वरज्ञानरूपापि प्रभा न ज्ञानहेत्वतिरिक्तहेतुजन्येति बाघ इति चेन्न ज्ञान-व्यक्तिप्रमाव्यक्त्योभिदाभावेऽपि विज्ञानत्वप्रमात्वयोर्भेदेन प्रमाया अपि द्रव्यत्वपृथिवीत्वघटत्वादीनां विभिन्न प्रयोजकप्रयोज्यत्व-मानने से कोई दोष नहीं आवेगा । कार्य का जो कारण है, उसीसे कार्य के साथ जिसकी उत्पत्ति होती है, वहीं प्रामाण्य का स्वतस्त्व है । किसी बाधक के उपस्थित न होने पर कार्य के कारण से ही कार्यगत शक्ति की उत्पति सभी को माननी पड़ती है, अन्यथा अग्नि की दाह प्रभृति शक्ति की उत्पत्ति यदि दूसरे कारण से मानी जाती है, तो उत्पन्न हुई अग्नि में अदाहकता की आपत्ति जावेगी । वह्नि तो अपन माश्रय को जलाती हुई ही पैदा होती है । सब फिर अप्रामाण्य का भी स्वस्व क्यों नहीं हो जायगा? इस लिए नहीं होगा कि वह दोष के अन्वय और व्यतिरेक की मी अपेक्षा रखता है, यतः यह ज्ञानजनक सामग्रीमान से पैदा नहीं होता । ईश्वर ज्ञान के जन्य न होने से यहाँ स्वतस्त्व लक्षण की अति की शंका नहीं की जा सकती, क्योंकि ज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति अतिरिक्तदोषादिकारणजन्यरूप ( अमावृति ) विशिष्ट धर्म का अत्यन्ताभाव ईश्वर ज्ञान में रहता ही है । दण्डी पुरुषो नास्ति यह व्यवहार दण्ड न होने से, पुरुष न होने से तथा दोनों के न होने से fafe होता है । यहाँ उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव समझना चाहिए । इस लिए यह मानना होगा कि जो विज्ञान सामग्री से जन्य है तथा वदतिरिक्त सामग्री दोष से जन्यता का जहाँ अत्यन्ताभाव है, वही प्रामाण्य स्वतस्त्व का लक्षण है । यह नहीं कहा जा सकता कि इसमें कोई प्रमाण नहीं हैं, क्योकि कार्य की शक्ति किसी दूसरे कारण से पैदा नहीं होती, अतः अनुमान प्रमाण से उसको जाना जा सकता है । जैसे कि ज्ञान का प्राय ज्ञान की सामग्री से भिन्न अन्य किसी कारण से पैदा नहीं होता, शक्ति होने से वह्निष्ठ शक्ति के समान शक्ति सिद्ध है. ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसकी आगे सिद्ध किया जायगा । प्रमा विज्ञान जनक सामग्रीजन्यत्व विशिष्ट होकर भिन्न किसी कारण से जन्म नहीं है, क्योंकि यह war से भिन्न है, पट आदि के समान, जैसे पट अपने कार्य अङ्ग प्रावरण, सीतापनयन याद में न्य की अपेक्षा नहीं करता, वैसे प्रमा भी अपने कार्य वस्तु प्रकाशन में अन्य की अपेक्षा नहीं करती । यहाँ पर यह नहीं कहा जा सकता कि इस अनुमान में ज्ञानवानधिकरणत्व उपाधि हो जायगी, क्योंकि ईश्वर के ज्ञान में साध्य की अध्याति है । उपाधि का साध्य में व्यापक होना afear होता है | यह कहा जाय कि इस अनुमान में ज्ञानसामग्री से अजन्यत्व उपाधि है, तो ऐसा नहीं कहा जा सकता, ईश्वर ज्ञान उसमें को साध्य मान कर उसकी अव्यापकता का कारण उपाधि नहीं, यह ठीक नहीं, क्योंकि ईश्वर के ज्ञान के सित्य होने के कारण सुतरां ज्ञानसामग्री से अजन्यता विद्यमान हैं । यह कथन महत है, क्योंकि व्यतिरेक में हेतु सोपाधिक है, अतः साध्यव्यापकता वहाँ बनी

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३२ वेदार्थपारिजातः साधन इव ज्ञानत्वप्रयोजकव्यतिरिक्तप्रयोज्यसाधने दोषाभावात् । यदि ज्ञानमात्रप्रयोजकप्रयोज्या प्रमापि स्यात्तदा प्रयोज्य-ज्ञानवृत्तिज्ञानत्ववत् प्रमात्वमप्रमायामपि स्यादिति बाधकतर्काच्चेति तन्न, प्रमा दोषव्यतिरिक्तहेत्वतिरिक्तजन्या न भवति ज्ञानत्वादप्रमादिति सत्प्रतिपक्षसम्भवात् । विज्ञानसामग्रीमात्रादेव प्रमोत्पत्तिसम्भवे तदतिरिक्तगुणस्य दोषाभावस्य या हेतुत्वकल्पने गौरवरूपबाधकतर्काच्च । न चैवं प्रमात्वस्य विज्ञानसामग्री मात्रप्रयोज्यत्वे ज्ञानत्ववदनमावृत्तित्वं च स्यादिति वाच्यम्, प्रयोजकाभावेन तदप्रसक्तेः । दोषासहकृतज्ञानसामग्री प्रयोज्यप्रमात्वस्य दोषसहकृततत्प्रयोज्याया -मप्रमायामसम्भवात् । न च दोषस्यानमाहेतुत्वे तदभावस्य प्रमाहेतुत्वमन्वयव्यतिरेक सिद्धमेवेति वाच्यम्, विरोध्यप्रमाप्रति-बन्धकत्वेन तयोरन्यथासिद्धत्वेन कारणत्वासाधकत्वात् । यथा च पिङ्गलताया अग्निवदेव दाहेन सहान्वयव्यतिरेकयोः तोरपि न दाहं प्रति कारणता, अनन्यथासिद्धयोरेव तयोः कारणत्वावेदकत्वात् । गुणेभ्यो दोषाणामभाव एव जायते न तु प्रामाण्योत्पत्तिः । दोषाभावाच्च न प्रामाण्योत्पत्तिः, किन्तु मिथ्यात्वसंशयत्वलक्षणस्याप्रामाण्यद्वयस्य निवृत्तिरेव जायते । अनुत्पत्तिलक्षणस्याप्रामाण्यस्यानाद्यभावतया दोषादुत्पत्त्यसम्भवेन तदभावेनाभावस्याप्यसम्भवेनोत्सर्गो ज्ञानसामग्री प्रयुक्त-त्वलक्षणोऽनपोदितस्तिष्ठति । तदुक्तं भट्टपादैः -- ' तस्माद् गुणेभ्यो दोषाणामभावस्तदभावतः । अप्रामाण्यद्वयासत्त्वं तेनोत्स-गनपोदितः ॥ ' ( चोदनसूत्रवार्तिकम् ६५ ) । रहेगी । जैसा कि जो ज्ञानसामग्री से जन्म है, वह ज्ञानसामग्री से जन्य होकर अतिरिक्त हेतु से भी जन्य है, प्रमाण के समान, इस व्यतिरेक व्याप्ति में अप्रमात्व ही उपाधि है । यही बात इस प्रकार कही गई हैं कि ईश्वर से भिन्न व्यक्ति को प्रमा विज्ञान के कारण से भिन्न कारण की अपेक्षा रखती हैं, क्योंकि यह भी घट की तरह ही कार्य है । यहाँ प्रश्न उठता है कि ज्ञानत्व का आश्रयभूत ज्ञान व्यक्ति प्रमात्य के आश्रयभूत प्रमाव्यक्ति से भिन्न है या अभिन्न? प्रथम पक्ष में प्रत्यक्ष ज्ञानव्यक्ति से व्यभिचार होगा, क्योंकि प्रत्यक्षज्ञानव्यक्तिज्ञान के हेतु से अतिरिक्त हेतु के अधीन नहीं है । दूसरे पक्ष में अनीश्वर की ज्ञानरूप प्रमा भो ज्ञान के हेतु से अतिरिक्त हेतु से अन्य नहीं है, अतः बाध होगा? आपका प्रश्न ठीक है । उसका उसर इस प्रकार दिया जा सकता है कि ज्ञानव्यक्ति और प्रमाव्यक्ति में भेद न रहते हुए भी विज्ञानत्व और प्रमात्व के रूप में भेद रहने से प्रमा के भी ज्ञानत्व प्रयोजक से भिन्न प्रयोजक के साधन में कोई दोष नहीं माना जायगा । जैसे कि द्रव्यत्व पृथिवीत्व, are fee से विभिन्न प्रयोज्य प्रयोजक सिद्ध होते हैं । यह बाधक तर्क भी यहाँ विद्यमान है कि यदि प्रभा भी ज्ञानमात्र प्रयोज्य हो तो प्रयोज्यज्ञानवृत्ति ज्ञानत्व के समान प्रमात्य भी अप्रमा में रहने लगेगा | यह कथन भो इसलिए उचित नहीं है कि प्रदोष व्यतिरिक्त हेतु से भिन्न से नहीं पैदा होती, क्योकि यह ज्ञान है, अप्रमा के समान इस प्रकार यहां सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास हो जायगा | विज्ञान की सामग्री मात्र से प्रमा की उत्पत्ति हो जाने से उससे मिश्र गुण या दोषाभाव की हेतुता को कल्पना करने में गौरव रूप बाधक तर्क भी है । इस प्रकार प्रमात्व को यदि विज्ञान - सामग्री मात्र से प्रयोज्य मानें तो ज्ञानत्व के समान इसको भी अप्रमा में वृत्ति हो जायनी? ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अप्रयोजक के अभाव में ऐसा नहीं हो सकता । प्रमात्व का प्रयोजक दोष से असहकृत ज्ञान सामग्री है, अप्रमादोषसहकृत सामग्री से पैदा होती है, अतः अप्रमा में प्रमात्व का आरोप नहीं किया जा सकता | यह कहना भी ठीक नहीं है कि दोष aft प्रमा का हेतु है, तो उसका अभाव प्रमा का हेतु है । यह बात तो अन्वयव्यतिरेक से ही सिद्ध हो जायगी, क्योंकि उस अन्वयव्यतिरेक की स्थिति विरोधी प्रमा के प्रतिमन्धक रूप में गतार्थ हो गई है, अतः अन्यथासिद्ध हो जाने के कारण उसकी कारणता यहाँ नहीं बनेगी । जैसे कि पिंगल वर्ण की अग्नि के समान ही दाह के साथ भी अन्वयव्यतिरेकता विद्यमान है, तो भी उसको दाह के प्रति कारणता नहीं है, अनन्यथा सिद्ध होने पर ही अन्वयव्यतिरेक की कारणता के प्रति प्रयोजकता मानी जाती है । गुणों से दोषों का अभाव ही जाना जाता है, उससे प्रामाण्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती । इसी तरह दोषाभाव से भी प्रामाण की उत्पत्ति नहीं होगी, किन्तु मिध्यात्व और संशय रूप दो अप्रमाणों की केवल उससे निवृत्ति होगी । अनुत्पत्ति लक्षण अप्रामाण्य तो अनादि अभाव है, अतः उसकी दोष से उत्पत्ति नहीं हो सकती और उत्पत्ति के अभाव में अभाव की भो स्थिति नहीं होगी । अतः ज्ञानसामग्री का प्रयोजक उत्सर्ग अबाधित रूप से विद्यमान रहेगा । यही बात मट्ट कुमारिल ने भी कही है --- " इस लिये गुणों से दीपों के बाव की प्रतीति होगी, दोषाभाव से मिध्यात्व और संशय रूप दो अप्रमाणों की निवृत्ति होगी । इससे स्वभावतः प्राप्त ज्ञान का प्रामाप्य नहीं होगा! " दूर

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वैवार्थपारिजातः ३३ ननु यथा संस्कारस्यानुभवनाशकत्वेऽपि स्मृतिजनकत्वं भवति तथैव दोषाभावस्य विरोध्यप्रमानाशकत्वेऽपि प्रामाण्यजनकत्वमस्तु, इति चेन्न तत्र स्मृतेः संस्कारातिरिक्तकारणान्तरानिरूपणे संस्कारस्योभयहेतुत्वेऽपि प्रकृते तद्वैषम्यात् । न च नित्यद्रव्येषु गुणनाशस्य गुणान्तरोत्पादनियतत्वेन तत्रापि संस्कारनाशात् स्मृतिरस्त्विति वाच्यम्, स्मृत्युत्पत्तिव्यति-रेकेण संस्कारनाशासम्भवात् । प्रकृते तु ज्ञानसामग्रीत एव प्रामाण्योत्पत्तिसम्भवे दोषाभावस्य तद्धेतुत्वकल्पनाया वैयर्थ्यात् । न च दोषाणामप्यप्रामाण्योत्पत्तौ गुणाभावेनान्यथासिद्धिरिति वाच्यम्, अभावस्य हेतुत्वानुपपत्त्या कारणान्तरानु-पपत्त्या च दोषाणामेव तत्कारणत्वोपपत्तेः । न च सामथ्र्यैक्ये ज्ञानप्रमालक्षणकार्यभेदानुपपत्तिरेव बाधिकेति वाच्यम्, एकस्मादग्निसंयोगात् पार्थिवपरमाणौ रूपरसगन्धस्पर्शादीनां बहूनामङ्गीकारात् । यत्तु प्रामाण्यप्रागभावस्य प्रामाण्योत्पत्तौ हेतुत्वे परतस्त्वापत्तिरिति तन्न, प्रागभावाभावे कार्याभावलक्षण-व्यतिरेकाभावात्, विशेषस्याकारणत्वात् । प्रामाण्योत्पत्तिस्वतस्त्ववत् प्रामाण्यज्ञप्तेरपि स्वतस्त्वम् विज्ञानज्ञापकसामग्रीत एव तज्ज्ञानसिद्धेः । ननु न घटसंवेदनस्य प्रामाण्यं घटसंवेदनेनैव ज्ञातुं शक्यते, घटसंवेदनस्य घटं प्रत्येव प्रत्यक्षत्वमिन्द्रियार्थ -सन्निकर्षोत्पन्नत्वात् स्वप्रामाण्यपरिच्छितो तु न तत्प्रमाणम्, तस्य बहिरिन्द्रियैरसन्निकर्षात् । मनः सन्निकर्षेण तत्परि-च्छित्तिरपि न वक्तुं शक्या, प्रामाण्यस्य मनः सन्निकर्षसमये तत्सत्त्वार्थं तदाश्रयज्ञानस्यापि सत्त्वं वक्तव्यम् । तथा च न तदेव ज्ञानं स्वाश्रितप्रामाण्येन्द्रियसन्निकर्षादुत्पत्तुमर्हति सिद्धस्वभावत्वात् ज्ञानान्तरोत्पत्ती तु परतः प्रामाण्यप्रसक्तिः । जैसे संस्कार अनुभव का नाशक होते हुए भी स्मृति का जनक हैं, उसी तरह दोषाभाव भी विरोधी अप्रमा का नायक होते हुए भी प्रामाण्य का जनक क्यों नहीं माना जाय? इस लिये नही माना जायगा कि स्मृति का संस्कार के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है, अतः संस्कार अनुभव का नाशक तथा स्मृति का जनक, दोनों हो सकता है, किन्तु दोषाभाव में ऐसी बात नहीं है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि नित्य द्रव्यों में एक गुण का नाश होने पर दूसरे गुण की नियत उत्पत्ति होती है, अतः यहाँ पर भी संस्कार के नाश से स्मृति उत्पन्न होगी, क्योकि स्मृति की उत्पत्ति के बिना संस्कार का नाश ही नहीं होगा । प्रकृत स्थल में ज्ञान की सामग्री से ही पासाव्य की उत्पत्ति हो सकती है तो दोषाभाव की उसके हेतु के रूप में कल्पना करना व्यर्थ है । तब तो प्रामाण्य की उत्पत्ति में दाष भी गुणाभाव में आगे अन्यथासिद्ध हो जायेंगे? नहीं, अभाव किसी का हेतु नहीं होता, दूसरा कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता, अतः दोष ही प्रामाण्य की उत्पत्ति में कारण माने जाते हैं । एक ही प्रकार की सामग्री से ज्ञान और प्रभा स्वरूप दो कार्य कैसे हो सकते हैं? जैसे एक नि-संयोग से पार्थिव परमाणु में रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदि अनेक कार्य होते हैं, उसी तरह एक ही सामग्री से ज्ञान और प्रमा स्वरूप दो कार्य भी हो सकते हैं । प्रामाण्य का प्रागभाव भी प्रामाज्य की उत्पत्ति में कारण है, अतः प्रामाण्य की उत्पत्ति स्वतः न होकर परतः माननी पड़ेगी? इस शंका का समाधान यह है कि प्रागभाव के अभाव में कार्याभाव भी होगा, इस व्यतिरेक व्याति के न बन पाने से प्रामाण्य के प्रति कोई विशेष कारण न होने से उसका परतस्त्व सिद्ध नहीं हुमा । जैसे प्रामाण्य की उत्पत्ति स्वतः होती है, उसी तरह प्रामाण्य की शति मी स्वतः ही होती है, क्योंकि जिस सामग्री से प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है, उसी सामग्री से उसका ज्ञान भी होता है । यहाँ पर शंका उठती है कि पट ज्ञान का प्रामाण्य घट ज्ञान में नहीं जाता जा सकता, क्योंकि घट ज्ञान से घर का ही प्रत्यक्ष होता है, उसके साथ इन्द्रिय का सत्रिकर्ष है, अतः वह अपने प्रामाण्य को जान सकते में समर्थ नहीं होगा, क्योंकि उसका बाहर की इन्द्रियों से निकष नहीं है । मन के संनिकर्ष से भी उसका ज्ञान हो जायगा, यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ग्रामाण्य की मन: संनिकर्ष के समय में सत्ता मानने के लिये उसके माथयभूत ज्ञान की भी सत्ता माननी पड़ेगी, तब वही ज्ञान स्वाधित प्रामाण्य और इन्द्रिय के संनिकर्ष से कैसे पैदा होगा, क्योंकि वह तो पहले ही विद्यमान है । यदि इसकी ज्ञानान्तर से उत्पत्ति मानते हैं तो परतः प्रामाण्य मानना हो गया । लिङ्ग आदि से भी यह पैदा नहीं होता, अत: यहाँ पर अनुमिति आदि को भी शंका नहीं होगी । यह विकल्प श्री at परीक्षणीय है कि यहाँ पर प्रामाण्य का ग्रहण इदंरूपेण होता है या तद्रूपेण? यदि इदंरूपेण ग्रहण होता है तो ज्ञाननिया

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३ मेवार्थपारिजातः लिङ्गादिजन्यत्वाभावादनुमित्यादिशङ्कापि न भवति । तत्रापीदं प्रामाण्यमिति रूपेण तत्तेन गृह्यते तत्प्रामाण्यमिति रूपेण वा? आधे ज्ञाननिष्ठतया अग्रहणाद् गृहीतेऽपि तस्मिन् संशयप्रसङ्गः । द्वितीये स्वविशेषितप्रामाण्यग्रहणे स्वग्रहापत्तिः । किञ्च तद्विज्ञानस्यैव प्रामाण्यं गृह्णाति तत्प्राकट्यलक्षणस्य फलस्य वा? भाट्टमतरीत्या प्राकट्यलिङ्गेन विज्ञानमनु-मीयते । न चाप्रत्यक्षगतं प्रामाण्यं प्रत्यक्षं भवितुमर्हति । न च यथा वाय्वाकाशयोर प्रत्यक्षत्वेऽपि स्पर्शशब्दयोः प्रत्यक्षत्वम्, तथै-हापि भविष्यतीति वाच्यम् जातेरिव व्यक्तिप्रत्यक्षतानियतप्रत्यक्षत्वात् । फलस्य तु स्वप्रकाशतया बाह्येन्द्रियाविषयत्वेन तद्गतयथार्थत्वलक्षणप्रामाण्यस्यापि बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षविषयत्वानुपपत्तेः । यदि तु तद्वेदनग्राहक मात्रग्राह्यत्वेन स्वतो ग्राह्यत्व-मुच्यते, तदापि ज्ञानं प्रमाणमप्रमाणं वेति संशयाभावप्रसङ्गः । ननु यथा ज्ञानग्राहकमात्रग्राह्यत्वेऽप्यर्थविशेषितस्य सांशयिकत्ववत् प्रामाण्यस्यापि सांशयिकत्वमुपपद्यते । यथा कुम्भज्ञानस्य कुम्भवत्तदम्भोऽपि विषयो भवति न वेति संशयो भवति, साम्भसामनम्भसामपि कुम्भानामुपलम्भात्, तथैव प्रामाण्येऽपि संशयो भविष्यतीति चेन्न, अम्भसः कुम्भग्राहकसामग्रीमात्रग्राह्यत्वासंभवात् । तथात्वे वा सकल-कुम्भानां सलिलवत्त्वप्रसङ्गः स्यात् । नारिकेलफलान्तर्गतसबिलादिवद् भिन्न सामग्री ग्राह्यत्वादेव तत्र संशय इति, तन्न, प्रामाण्यस्य विज्ञानग्राहकसाक्षिमात्रग्राह्यत्वेऽपि स्वत: प्रमाणत्वेन भवदभिमतर्धार्मिज्ञानेऽनुव्यवसाये च भासमानेऽपि सुगत-मतानुसारिणामप्रमाणमेवेति विपर्ययवत् स्वतः प्रमाणत्वेनाभिमतेऽनुमित्यादी चार्वाकस्य विप्रतिपत्तिवच्चाहार्थसंशयाद्युप-उसका ग्रहण न होने से उसके स्वरूप के विषय में संशय बना रहेगा । द्वितीय पक्ष में स्वविशेषणयुक्त प्रामाण्य के ग्रहण में अपने ग्रहण की भी आपत्ति उठेगी । एक नया विकल और उठ खड़ा होगा कि वह विज्ञान के हो प्रामाण्य को ग्रहण करता है या उसके प्राकट्य लक्षण फल को मी? कुमारिल भट्ट के मत में प्राकट्य रूप लिंग से विज्ञान का अनुमान होता है | प्रामाण्य तो प्रत्यक्षगत है नहीं, अत: उसका प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है? जैसे वायु और आकाश प्रत्यक्ष नहीं है, तो भी वायुगत स्पर्श और बास्सशगत शब्द का प्रत्यक्ष होता है, वैसा ही यहाँ भी अप्रत्यक्षात प्रामाण्य का भी प्रत्यक्ष मान लेंगे, यह भी संभव नहीं है, क्योंकि जाति को व्यक्ति की प्रत्यक्षता के आधार पर प्रत्यक्ष माना जा सकता है, फल तो स्वप्रकाश है, अतः वह बान्द्रिय का विषय नहीं हो सकता । फलतः उसको यथार्थता का सूचक श्रामाण्य भी बाह्मेन्द्रिय के प्रत्यक्ष का विषय नहीं बन सकेगा । यदि स्वतोग्राह्य का लक्षण केवल यही किया जाता है कि वह ज्ञान के ग्राहक से ही केवल गृहीत होता है, अर्थात् जिस सामग्री ( साधन ) से ज्ञान होता है, उस ज्ञान के साधन से ही ज्ञान की प्रामाणिकता का भी ज्ञान हो जाता है, तब भी ज्ञान प्रमाण है या? इस प्रकार के संशय की तो स्थिति रह ही नहीं जायगी । ऐसे स्थलों में भी संशय इसलिये हो सकता है कि ज्ञान की सामग्री से सामान्य रूप से तो वस्तु का ग्रहण हो जायगा, ferg fear विष अर्थ से यदि उसका संबन्ध है तो ऐसी अवस्था में संशय उठ खड़ा होगा, जैसे कि कुम्भ ( बड़ा ) ज्ञान का विषय जलयुक्त कुम्भ भी होता है या नहीं, यह संशय होता है । पड़े जल के और far जल के भी होते हैं । इस तरह से प्रामाण्य में भी संशय उठ सकता है | आपका यह प्रतिपादन असत्य है, क्योंकि कुम्भगत जल केवल कुम्मग्राहक सामग्री से गृहीत नहीं हो सकता, यदि ऐसा माना जायगा तो सारे कुम्मों को जल से भरा मानना पड़ जायगा । नारियल के भीतर वर्तमान जल के समान यहाँ पर भिन्न सामग्री ग्राह्यता होने से ही संशय होता है, यह कथन भी सत्य है, क्योंकि प्रामाण्य यद्यपि विज्ञान के ग्राहक साक्षी मात्र से ग्राहा है, अतः स्वतः प्रमाण हैं । ऐसी अवस्था में आपके अभिप्रेत धर्मी ज्ञान में और अनुव्यवसाय में उसका भान होने पर भी बौद्धमतावलम्बी की दृष्टि से वह विपरीत ज्ञान के समान तथा चार्वाक की दृष्टि में अनुमान के समान वह प्रमाण हैं, अतः आहार्य संशय वही उठ ही सकता है । अथवा जैसे स्वरूपभेदवाद के मत में स्वरूप के गृहीत होने पर भी यह स्थाणु है या पुरुष? इस संशय की अथवा यह ही हैं, इस विषय की संभावना बनी रहती है, इसी तरह सामग्री के रहने पर भी प्रतिबन्धक दोष आदि के संसर्ग से संक्षय उठ खड़ा होता है, उसी भाँति स्वतः ग्राह्यता में भी प्रामाण्य का संचाय उठ खड़ा हो सकता है । यहाँ पर प्रामाण्य को ज्ञान की ज्ञापक सामग्री मात्र से ग्राह्य मानने पर मिथ्या रजत बुद्धि में भी प्रामाण्य का बोध मानना यह जायगा | ऐसी भावति दसलिये नहीं उठाई जा सकती कि ऐसे स्थलों में प्रामाण्य की प्रसक्ति का कारणगत दोष तथा परवर्ती बाधज्ञान से परिहार हो जाता है । यदि आप कारणदोष और बाघ के भाव ज्ञान को प्रामाण्यग्रह में कारण मानते हैं, तब तो आपको परतः प्रामाण्य मानना पड़ेगा? नहीं, क्योंकि दोष - ज्ञान

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येवार्थपारिजातः 4 पत्तेः । यथा वा स्वरूपभेदवादिनां गृह्यमाणेऽपि स्वरूप स्थाणुर्वा पुरुषो वेति सन्देहस्य पुरुष एवेति विपर्ययस्य च सम्भवस्तथैव सत्यामपि सामग्रयां प्रतिबन्धकदोषादिसमवधानाद् यथा संशयादिर्भवति, तथैव स्वतो ग्राह्येऽपि प्रामाण्यसंशयादिकमुपपद्यत एव । न च ज्ञानज्ञापक सामग्रीमात्रग्राह्यत्वे प्रामाण्यस्य मिथ्यारजतादिबुद्धिष्वपि प्रामाण्यग्रहणप्रसङ्गः स्यादिति वाच्यम्, प्रसक्तस्यापि प्रामाण्यस्य कारणदोषबाधाभ्यां तदानोदनात् । न च तर्हि तयोरभावज्ञानस्य प्रामाण्यग्रहहेतुत्वोपपत्ती परतः प्रामाण्यापत्तिरिति वाच्यम्, दोषबाधबोधानुत्पत्तिमात्रेण प्रामाण्यस्फुरणाङ्गीकारेण दोषाभावात् । तदुक्तम्- ' तस्माद् बोधात्म-कत्वेन प्राप्ता बुद्धेः प्रमाणता । अर्थान्यथात्वहेतुत्यदोषज्ञानैरपोद्यते ॥ ' ( चोदनासूत्रवात्ति ० ५३ ), ' यदा स्वतः प्रमाणत्वं तदान्यन्नैव मृग्यते । निवती हि मध्यात्वं दोषाज्ञानादयतः ॥ ' ( चो. सु. बा. ५२ ) । दोषबाधाभावावगमस्य प्रामाण्य-हेतुत्वे तस्यापि प्रामाण्यावगमावावगमान्तराणामाश्रयणीयत्वेनानवस्थापातात् । यदुक्तम्- प्रामाण्यं ' परतो जायते, अनभ्यासदशायां सांगयिकत्वात्, अप्रामाण्यवत् ' इति, तदपि न स्वतः प्रमाण-त्वेन भवदभिमतेष्वनुमानोपमाना: व्यवसायधर्म्यध्यवसायेषु व्यभिचारस्योक्तत्वात् । न च तदनभ्युपगमपराहतम्, न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीकायां वाचस्पतिमिश्रैस्तदङ्गीकृतत्वात् । तथाहि विमतं ज्ञानमर्थाव्यभित्तारि, समर्थप्रवृत्तिजनकत्वात्, यत्रैवं तत्रैवं यथा प्रमाणाभास इति व्यतिरेकि, अन्वयव्यतिरेकि वा? अनुमानस्य स्वतः प्रमाणतया अन्वयस्यापि सम्भवात् । अनुमानस्य स्वतः प्रामाण्यमपि तत्रैवोक्तम् । तथानुमानस्य परितो निरस्तविभ्रमाशङ्कस्य स्वत एव प्रामाण्यम्, अनुमेयाव्यभिचारिलिङ्ग-समुत्थत्वात् । तथैवोपमानमपि । परतः प्रामाण्यसाधकानुमानं सत्प्रतिपक्षग्रस्तञ्च । विमतं प्रमात्वं विज्ञानग्राहकसामग्री-मात्रग्राह्यम्, अप्रमावृत्तित्वानधिकरणत्वे सति ज्ञानैकवृत्तिजातित्वात् ज्ञानत्ववत् | अनुमित्यादिस्थले सिद्धसाधनता स्यादिति तद्वारणाय ज्ञानैकवृत्तीत्युक्तस् । अप्रमात्वसंशयत्वादिभिर्व्यभिचारवारणाय अप्रमावृत्तित्वानधिकरणेत्युक्तम् । साधनवैकल्य-और बाध ज्ञान की अनुत्पत्ति मात्र से प्रामाण्य का स्फुरण माना गया है, अतः परतः प्रामाण्य की कोई आशंका नहीं उठती | यही बात इन दी श्लोकों में कही गई है-- ' इसलिये ज्ञानस्वरूप होने से ज्ञान की स्वतः प्रमाणता सिद्ध होती है | ज्ञान के विषय अर्थ को अन्यथा देखकर उत्पन्न हुए दोष - ज्ञान से ज्ञान की प्रामाणिकता निवृत्त हो जाती हैं | जन प्रमाण का प्रमाणत्य स्वतः है, तो प्रामाण्य के दिये अन्य हेतु के अन्वेषण की जावश्यकता नहीं है, क्योंकि दोष का ज्ञान न होने से प्रमाण का मिथ्यात्व बिना प्रयत्न के अपने आप निवृत्त हो जायगा । दोष और बाघ के अभाव को भी यदि प्रामाण्य के ज्ञान में हेतु माना जाय तो इनकी प्रामाणिकता के लिये भी अन्य ज्ञान की आवश्यकता माननी पड़ेगी । फिर उस ज्ञान के लिये भी एक ओर ज्ञान की आवश्यकता होगी और इस प्रकार अनवस्था दोष उठ खड़ा होगा | यह जो कहा गया है कि प्रामान्य परता ज्ञात होता है, क्योंकि अनभ्यस्त विषय में संशय उसी प्रकार बना रहता है, जैसा अप्रामाण्य में, यह कथन इसलिये ठीक नहीं है कि स्वतः प्रामाण्य विधिवत् सिद्ध किया जा चुका है और आपके अभिप्रेत अनुमान, उपमान, अनुव्यवसाय, धर्मी अध्यवसाय आदि में दोष दिखाया जा चुका है । ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इस बात को किसी ने माना नहीं है, क्योंकि व्यायवार्त्तिकतात्पर्यटीका में वाचस्पति मिश्र ने इस बात को स्वीकार किया है । वह इस प्रकार है -- विवादास्पद ( विवाद का विषय ) ज्ञान अर्थ से व्यभिचरित नहीं है, क्योंकि समर्थ प्रवृत्ति का जनक हैं, जो समर्थ प्रवृत्ति का जनक नहीं होता, वह अर्थ से यभिचरित भी नहीं होता, अर्थात् जहाँ ज्ञान के विषय का व्यभिचार है, वहाँ प्रवृत्ति नहीं होती, जैसा कि प्रामाण्या भास में, यह व्यतिरेकानुमान इसमें प्रमाण हे । अथवा यहाँ पर अन्वयव्यतिरेक भी हो सकता है, क्योंकि अनुमान स्वत: प्रमाण है, अतः वहां पर aar भी हो सकता है । अनुमान की स्वतः प्रमाणता भी वहीं मानी गई है । जैसे कि अनुमान में सभी तरह से को आशंका के न रहने से स्वत्तः प्रामाण्य सिद्ध है, क्योंकि यह अनुमेय से अव्यभिचरित हेतु से उत्पन्न होता है । इसी प्रकार उपमान को भी समझना चाहिये | परतः प्रामाण्य का साधक अनुमान सत्प्रतिपक्ष नामक हेत्वाभास से दूषित है । अन्ततः स्वतः प्रामाण्य के साधक अनुमान का यह आकार बनेगा --- विवाद का विषय प्रमात्व विज्ञान की ग्राहक सामग्री मात्र से ग्राह्य है, क्योंकि यह जमा का अधिकरण न होकर केवल एक ज्ञात ( प्रभा ) में ही रहने वाली जाति है, जैसी कि ज्ञानस्य जाति । अनुमिति मादि में साध्यसाधनता दोष के परिहार के लिये इस लक्षण में ज्ञानवृत्ति पद जोड़ा गया है । अप्रमात्व, संशयत्व आदि से व्यभिचार की व्यावृत्ति के लिये क्षण में

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३६ निवृत्यर्थं साधनविशेषणांशमात्रग्रहणम् । तथापि प्रमामात्रवर्तिना प्रमान्यान्यत्त्वादिना व्यभिचारः स्यादिति तन्निवृत्त्यर्थं जातिग्रहणम्, तस्यान्योन्याभावत्वेन प्रतियोगिसापेक्षत्वेन विवक्षितत्वात् । ननु प्रमात्वस्य साक्षात्कारित्वेन परापरत्वासम्भवन जातित्वासम्भवाद् विशेष्यसिद्धिः । साक्षात्कारित्वं यदि परं तदा तदपरसामान्यस्य प्रमात्वस्य परसामान्याविनाभावनियमात् सर्वेव प्रमा साक्षात्कारिण्येवेति परोक्षस्यानुमानादे-प्रमात्वमेव स्यात् । यद्यपरं तत्तदा साक्षात्कारित्वस्य प्रमात्वाविनाभावादिदं रजतमित्यादिसाक्षात्कारिणो विभ्रमस्य प्रमात्व-प्रसङ्गः । प्रमात्वस्य जातित्वे एकस्यैवेदं रजतमित्यादिज्ञानस्य धर्म्यशे प्रमात्वमितरांशे चाप्रमात्वमिति जातिसाङ्कर्य -प्रसक्त्या सर्वं ज्ञानं धर्मिण्यभ्रान्तं प्रकारे तु विपर्यय इति सिद्धान्तोऽपि बाध्येतेति वेस, साक्षात्कारित्वस्य रजतादिविभ्रमेष्व-वृत्तित्वात् इन्द्रियसम्प्रयोगजन्यतोपाधिमात्रेण तु साक्षात्कारित्वाभिमानः । धर्म्यंशे तु प्रमाव्यवहारोऽबाधितानुभूतित्वो-पाधिमूलकोऽपि सम्भवत्येव । नन्वेवं सर्वत्रैवोपाधिनिबन्धनां भवतु व्यवहार इति जातिकल्पना मास्त्विति चेन्न, प्रमिणो-मीत्यबाधितानुगत व्यवहारस्य गौगौरिति व्यवहारस्येव जातिमन्तरानुपपत्तेः । वस्तुतस्त्विदं साङ्कर्यैनिराकरणं पररीत्येव । मीमांसकानां नेदं दूषणम् अत एवार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणम्, असशि-कृष्टेऽर्थे ज्ञानमिति मीमांसासूत्रभाष्यकाराभ्यां प्रमात्वज्ञानत्वा दिजातिरङ्गीकृतैव । संशयविपर्ययस्मृतिव्यतिरिक्तज्ञानानि ' प्रभावृत्तित्वानधिकरण ' यह जोड़ा गया | साधनविकलता की निवृति के लिये साधन विशेषण के अंश रूप में ' मात्र ' पद दिया गया है! इस पर भी प्रमामावर्ती ( सभी यथार्थ ज्ञानों में वर्तमान ) प्रमात्यान्यत्व ( व्रमा से सिन से भिन्न अर्थात् प्रमा ) में व्यभिचार होगा, उसकी निवृत्ति के लिये ' जाति ' पद गृहीत है, प्रसान्यान्यत्व अन्योन्याभाव है, मतः यहाँ पर प्रतियोगी सापेक्ष रूप से विवक्षित है, जाति रूप से नहीं । अर्थात् भेदज्ञान में प्रतियोगी ज्ञान की अपेक्षा जरूर होती है, क्योंकि केवल भित्र कहने से काम नहीं चलता, किससे भिन्न है, यह बताना ही होगा । यह कहना कि प्रमात्व भी जाति नहीं होगी, क्योकि साक्षात्कारित्व में परत्य और अपरत्व के न बन पाने से विशेष्य ही नहीं सिद्ध होगा । जैसे कि यदि साक्षात्कारिता को पर सामान्य मानें तो अपर सामान्य प्रमात्व का पर सामान्य के साथ अविना भाव होने से सारी प्रमा साक्षात्कारिणी होगी, ऐसी अवस्था में परोक्ष अनुमान आदि से बप्रमात्व मानना पड़ेगा | यदि साक्षात्कारित्व को पर सामान्य माने तो साक्षात्कारित्व का प्रमात्व से अविनाभाव होगा, अर्थात् जहाँ जहाँ प्रमात्व होगा, वहीं साक्षात्कारित्व भी मानना पड़ेगा, किन्तु ऐसा होता नहीं, क्योंकि अनुमान में प्रमात्व है, साक्षात्कारित्व नहीं । फलतः यह रजत है, इस तरह से साक्षात् प्रतीत हो रहे भ्रम में प्रसात्व का प्रसंग हो जायया । प्रमात्व को जाति मानने पर एक दूसरा दोष यह भी नावेगा कि यह रजत है, इस एक ज्ञान में हो धर्मी अंश में प्रमात्व और इतर अंश में अप्रमात्व होने से जाति- सांकर्य की प्रसक्ति में सारा ज्ञान धर्मों में अभ्रान्त है और उसके प्रकार में ही भ्रान्ति होती है, इस सिद्धान्त का भी बाध होने लगेगा? इस आशंका का उत्तर यही दिया जा सकता है fe erecter की स्थिति रजत बादि विकाम स्थल में नहीं रहती । ऐसे स्थलों में इन्द्रिय सम्पर्क से जन्यता नामक उपाधि के कारण साक्षात्कार का मान होता है । धर्मी अंश में प्रमा का व्यवहार अबाधित अनुभूतित्य रूप उपाधि के कारण हो जाता है । अन उठता है कि यदि ऐसा है तो फिर सभी जगह उपाधि प्रयुक्त ही सारा व्यवहार निष्पन्न हो जाय, तब जाति की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर यह है कि मैं प्रमात्य का अनुभव करता हूँ, इस प्रकार का व्यवहार बिना जाति के उसी प्रकार सम्भव नहीं है, जैसे कि ater जाति के faar ' यह गाय है ' इस प्रकार का व्यवहार सम्भव नहीं होता । वास्तव में तो हमने यह सांक निवृत्ति अन्य दार्शनिकों की रीति से कही है । मीमांसकों के मत से यह दोष हैं हो नहीं । इसीलिये वस्तु ( अर्थ ) के न मिलने पर वह प्रमाण न होगा, वस्तु का इन्द्रिय के साथ संन्निकर्ष न होने पर भी हो जायगा । तात्पर्य यह है कि रस्सी में सर्प का जहाँ ज्ञान होता है, वहाँ सर्प के साथ चक्षु का सन्निकर्ष नहीं है, किन्तु सर्प का ज्ञान तो हो ही जाता है | किन्तु वह ज्ञान अप्रमाण है, क्योंकि ज्ञान होने पर भी सर्प की उपलब्धि नहीं होती । मीमांसा सूत्र और भाष्य के प्रमाण से ज्ञानत्व आदि को जाति माना ही है । ' संशय, विपर्यय और स्मृति से भिन्न ज्ञान इनसे अतिरिक्त में रहने वाली जाति से संयुक्त है,

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वेदार्थपारिकाः ३७ स्वतदतिरिक्तवृत्तित्वानधिकरणजातिमन्ति, जातिमत्त्वात् सम्प्रतिपन्नवत् इत्यनुमानमपि प्रमात्वादिजातिसद्भावे मानम्, यथा रजतादिभ्रमेषु विज्ञानत्वसाक्षात्कारित्वादिकं नास्ति, तेन न साङ्कर्यमपि । तथोक्तम्- ' विज्ञानत्वमधिष्ठानधियामा रोपिते पु यत् । अविद्यापरिणामत्वाद्विज्ञानाभासता मता ॥ येन यत्तत्र विज्ञानं तत्प्रमाणमुपेयते । अप्रमाणं न विज्ञानं तत्क सङ्कर-सम्भवः ॥ ' सामग्रीभेदस्य कार्यभेदनियमात्, अप्रमायाश्च ज्ञानविशेष्यत्वासिद्धेः । न चैवं सर्वज्ञानानां यथार्थत्वेऽख्यातिवादापत्तिः स्यादिति वाच्यम्, अविद्यापरिणामरूपभ्रमारोप्ययोरङ्गीकारेण तद्भदात् । न चोपाधिमादाय जातिप्रत्याख्यानं युक्तम्, अन्यथा गोत्वादिष्वपि तदापत्तेः । ननु यद्यनुवृत्तव्यवहारसिद्धये गोत्वादिवज्जाति कल्पनमावश्यकम् तर्हि पाचकादावपि भवतु जातिकल्पनमिति चेन्न ' व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽ-थानवस्थिति: । रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥ ' इत्युक्ता कानामभावे जातिनिबन्धनोऽनुवृत्तव्यवहारोऽन्यत्र तूपाधिनिबन्धन इति व्यवस्थोपपत्तेः । तथाहि-- आकाशादौ व्यक्तेरभेदेनाकाशत्वादिकं न जातिः, अनेकसमवेतत्वाभावात् । कुम्भत्वकलशत्वयोस्तुल्यत्वेन तयोर्न भिन्नजातित्वम्, एकयैवानुगतव्यवहारसिद्धेः । अन्यथा पर्यायत्वविलोपपत्तिः । भूतत्वमृर्तत्वयोः परस्परव्यभिचारिणोरेकत्र स्थित्या न जातित्वम्, भूतत्वमपहाय मूर्तत्वस्य क्षित्यप्तेजोवायुमनःसु वर्तमानत्वेन मूर्तत्वमपहाय भूतत्वस्य क्षित्यादिवियदन्तेषु वर्तमानत्वेन पृथिव्यादिचतुष्टये तयोरुभयोरपि प्रतीतिर्वन्ध्या मे मातेतिवत् विरुद्धार्थकतया न प्रामाण्यमर्हतीति तदभावः । परस्परपरिहारेण वर्तमानयोः सामान्ययोरेकत्र समावेशे तदतज्जातीय-विरोधोच्छेदापत्तिः । सत्तायां सत्तास्वीकारे तत्रापि न जातिकल्पना, अमवस्थाप्रसङ्गात् । पाचकत्वादी तु पाचकत्वादे-क्योंकि ये भी जातिमान है, जैसी कि जाति स्वीकृत है ' यह अनुमान भी प्रमात्व आदि जाति के सद्भाव में प्रमाण है । रजतादि भ्रम स्थल में विज्ञानत्व, साक्षात्कारित्व आदि के न होने से उनका सार्य सुतरां नहीं है, यह बात इन दो श्लोकों में बताई गई है - " शुक्ति-रजत आदि आरोपित स्थलों में अधिष्ठान ज्ञान का जो विज्ञानत्व है, वह अज्ञान का परिणाम होने के कारण ज्ञान नहीं, किन्तु ज्ञानामास, है, अर्थात वहाँ वस्तुत: शुक्ति है, रजत नहीं है । किन्तु ज्ञान रजत का होता है । वह शुक्ति के अज्ञान का परिणाम है | अतः वष्ठि शुक्ति में रजतज्ञान ज्ञानाभास है, ज्ञान नहीं । जिस समय यह विज्ञान उत्पन्न होता है, तब वह प्रमाणभूत ही माना जाता है, अप्रमाण नहीं । ऐसी अवस्था में प्रमात्व और अप्रमात्व के सांकर्य की संभावना ही कहाँ है? " सामग्री के भेद से ही कार्य में भिन्नता मानी जाती है । अमा कमी भी ज्ञानविशेष नहीं मानी जाती । इस प्रकार तो सभी ज्ञान यथार्थ माने जायेंगे, फलतः बल्यातिवाद ( भ्रम की अस्वीकृति ) मानना पड़ेगा? किन्तु यह कहना ठीक नहीं, अविद्या के परिणामभूत भ्रम और आरोप को स्वीकार किया जाता है, अतः सभी ज्ञान यथार्थ ही नहीं हो सकते । ऐसे स्थलों में उपाधि को मानकर जाति का खण्डन भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसी अवस्था में गोत्व आदि में भी उपाधि हो मानना पड़ जायगा । प्रश्न उठता है कि अनुगत व्यवहार को सिद्ध के लिये गोत्व आदि जाति आवश्यक है, तो फिर पाचक आदि में भी उपाधि न मानकर जाति हो क्यों न मानी जाय? इसका उत्तर यही है कि ' व्यक्तेरभेद: ' इत्यादि श्लोक में प्रदर्शित जाति के arts हेतुओं की अनुपस्थिति में जाति निमित्तक अनुगत व्यवहार होता है और इनसे भिन्न स्थलों में उपाणिनिमित्तक । इस प्रकार की जाति और उपाषि की भिन्न - भिन्न रूप से व्यवस्था शास्त्रों में निश्चित कर दी गई है । ' व्यक्तेरभेद: ' इत्यादि श्लोक का अभिप्राय इस प्रकार है --- आकाश प्रभृति में व्यक्ति का अभेद है, अतः आकाशत्व जाति नहीं होगा, क्योंकि जाति अनेक व्यक्तियों में समवेत रहती हैं । इसी प्रकार कुम्भत्व और कलशत्व भी भिन्न जाति नहीं होगी, क्योंकि ये तुल्य हैं, इनमें से किसी एक से ही अनुगत व्यवहार सम्पन्न हो सकेगा, अन्यथा शब्दों की पर्यायता ही लुप्त हो जायगी । भूतत्व और मूर्तव्य परस्पर व्यभिचारी हैं, इनकी एकत्र स्थिति होने पर भी उनमें जातित्व नहीं माना जायगा । भूतत्व को छोड़कर मूर्तस्व मन में विद्यमान है, मूर्तत्व को छोड़कर भूतत्व आकाश में विद्यमान है । पृथिवी, जल, तेज और वायु में भूतत्व और सुर्तत्व दोनों है । इस प्रकार की प्रतीति ' मेरी माता कच्चा है ' इस वाक्य की तरह विरुद्ध वर्थ को बताती है, अतः प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । क्योंकि परस्पर एक दूसरे को छोड़कर वर्तमान सामान्य का एकत्र समावेश ( सोर्य ) मानने पर तज्जातीय और अतज्जातोय का विरोध ही उच्छिन्न हो जायगा । इसी प्रकार सत्ता में सत्ता

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३८ वेदार्थपारिजातः रागन्तुकत्वेन नित्यत्वलक्षणस्य जातिरूपस्य हान्या न जातित्वम् । विशेषेषु च स्वतो व्यावर्तकत्वहान्या न जातिः । यत्र जातिकल्पनायां व्यक्त्या सह सम्बन्धाभावस्तत्रापि न जातिः । यथा समवाये जातिकल्पनायां समवायाभावान्न तत्र जातिव्यक्त्योः सम्बन्धसम्भवः । तथा च प्रमात्वस्य जातित्वेन ज्ञानैकवृत्तिजातित्वसिद्धया न विशेष्यासिद्धिशङ्कापि । किञ्च, प्रमात्वस्य विज्ञानग्राहकसामग्रीमात्रग्राह्यत्वानुपगमे प्रमाणान्तरग्राह्यत्वे तस्याप्यन्यस्तस्याप्यन्य इति ग्राहकान्तर-कल्पनेऽनवस्था च स्यात् । न च निलीनस्यैव प्रमाणस्येन्द्रियादेरिवार्थे व्यवहारजनकत्वमस्त्विति वाच्यम्, प्रमाणप्रमाणानुदये तदस्तित्वस्यैव निश्चेतुमशक्यत्वात् । न च ज्ञानस्य स्वतः स्फुरणेऽपि तत्प्रामाण्यं तद्गतगुणत्वादिवदन्यतः स्फुरत्विति वाच्यम्, ज्ञानस्यादित एव प्रमाणत्वेनास्फुरणे तद्विषये निःशङ्कप्रवृत्त्यनुपपत्तेः । मरीच्युदकादौ ज्ञाने सत्यपि तदप्रामाण्यनिश्चये प्रवृत्त्यदर्शनात् । नन्दप्रामाण्यास्फुरणं प्रामाण्यस्फुरणमन्तरेणापि ज्ञानमात्रात् प्रवृत्तिर्भवत्येवति चेन्न, उभयारस्फुरणे संशयान्निःसंशय-प्रवृत्त्यनुपपत्तः । दृश्यते चानभ्यासदशायामपि नवदृष्टेषु फलितरसालादिषु तत्फलादित्सोः निःसंशयप्रवृत्तिः । प्रामाण्य-परतस्त्ववादिभिरपि नैयायिकादिभिः स्वर्गादिसाधनेषु प्रामाण्यनिश्चयाधीनैव निःशङ्कप्रवृत्तिरुपेयते । न च संशये सत्यपि कृष्यादौ प्रवृत्तिर्भवत्येवेति वाच्यम्, तत्र निःसंशयप्रवृत्तेरभावात् । तेन यत्र निःशङ्कप्रवृत्तिः, तंत्र प्रामाण्यनिश्चयाधीनेवेति मन्तव्यम्, अन्यथा संशयस्य कोटिद्वयसमानत्वात् प्रवृत्तियन्निवृत्तिरपि किं न स्यात्? न च स्वीकार करने पर भी जाति की कल्पना नहीं की सकती, क्योंकि ऐसा मानने पर अनवस्था हो जायगी । पाचकल्प आदि स्थल में भी जाति नहीं मानी जायगी, क्योंकि पाचकत्व एक आगन्तुक धर्म है । इसको जाति मानने पर जाति की नित्यता की हानि हो जायगी । विशेष में जाति इसलिये नहीं मानी जायगी कि जाति मानने पर इनमें स्वतः व्यावर्तकता नहीं रह जावगी । जहाँ पर जाति की कल्पना करने पर उसका व्यक्ति के साथ सम्बन्ध न बनता हो, वहां पर भी जाति नहीं मानी जाती, जैसे कि समवाय में जाति की कल्पना करने पर दूसरे समवाय के अभाव में जाति और व्यक्ति का सम्बन्ध ही नहीं बन पाता । इस नियम के अनुसार प्रमात्व एक जाति है, अतः ज्ञान में नियत रूप से विद्यमान जाति की सिद्धि हो जाने से विशेषय के भाव की कोई शंका ही नहीं उठ सकतो | दूसरी बात यह भी है कि यदि प्रमात्व को विज्ञान सामग्री मात्र से ब्राह्म नहीं माना जायगा तो उसके ग्रहण करने के लिये प्रमाणान्तर मानना पड़ेगा | इस प्रकार की परम्परा चलने पर ग्राहकान्तर की कल्पना में अनवस्था दोष की आपत्ति होगी । ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे स्वयं अप्रकाशित इन्द्रियों की ही अपने विषय के प्रति व्यवहारजनकता है, वैसे होली ( अप्रकाशित ) प्रमाण के विषय में भी माना जायगा, क्योंकि जब तक प्रमाण में प्रामाण्य का उदय नहीं होता, तब तक उसके अस्तित्व का निश्चय करना ही कठिन है । ज्ञान के स्वतः स्फुरित होने पर भी ज्ञानगत गुणत्व आदि का स्फुरण जैसे अन्यतः होता है, उसी तरह प्रामाण्य का भी स्फुरण अन्यत: क्यों न माना जाय? इसका उत्तर यही है कि ज्ञान यदि प्रारम्भ से ही प्रामाणिक रूप से स्फुरित नहीं होगा, तो उसके विषय में निःशंक प्रवृत्ति नहीं हो सकती । मृगमरीचिका में द का ज्ञान होने पर Get माणिकता के विषय हो जाने पर प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । जब अप्रामाण्य का स्फुरण नहीं होता, उस समय प्रामाण्य के fear भी ज्ञानमात्र से प्रवृत्ति देखी जाती है, यह कथन भी उचित नहीं है, क्योंकि जब तक दोनों का स्फुरण नहीं होता तो संशय बना रहेगा, फलत: ऐसी अवस्था में निःसंशय प्रवृत्ति नहीं हो सकती | अनभ्यास दशा में नये नये देखे गये फले हुए आमों को लेने के लिए निःसंशय प्रवृत्ति देखी जाती है । नैयायिक प्रभृति दार्शनिक प्रामाण्य का निश्चय परतः माननेवाले हैं, उनके मन में भी स्वाद के साधनों में प्रामाण्य के नि केही निःसंशय प्रवृत्ति मानी गई है । प्रवृत्ति देखी जाती है, इसलिये ठीक नहीं है कि ऐसे स्थलों में वहाँ पर प्रामाण्य का निश्चय अवश्य ही हुआ करता है । अन्यथा समान निवृत्ति भी क्यों न हो सकेगी? प्रवृत्ति तो मन रूप इन्द्रिय से हो सकती, यही दोनों में वैषम्य है यह कथन भी उचित नहीं है, क्योंकि यह कहना कि संशय के रहते हुए भी कृषि आदि में निःसंशय प्रवृत्ति नहीं रहती । इसलिये जहां निःसंशय प्रवृत्ति होती है, संशय की तो दोनों कोटियां समान हैं, अतः उसमें प्रवृत्ति के होती है, निवृत्ति प्रागभाव रूप है, अतः यह इन्द्रियजन्य नहीं

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वेदार्थपारिजागः प्रवृर्तर्मनोरूपाक्षजत्वं प्रागभावरूपाया निवृत्तेस्तु नाक्षजत्वमिति वैषम्यमिति वाच्यम्, वैधर्म्यमात्रत्वान् । यद्यप्रामाण्या-निश्चयाच निवृत्तिस्तर्हि प्रामाण्यानिश्चयात् प्रवृत्तिरपि न स्यात् । यदुक्तम्- इच्छा प्रवृत्तेः कारणम्, सा च समीहितोपाय-ज्ञानमपेक्षते, तचेष्टजातीयत्व लिङ्गानुभवं सोऽपीन्द्रियसन्निकर्षात् प्रामाण्यग्रहणं तु न केनाप्यंशनोपयुज्यते, उपयोगे वा स्वत इति कुत एतदिति तदपि न प्रमाणतयाऽनवगम्यमानस्य समीहितसाधनताज्ञानस्येच्छाजनकत्वाभावेन तत्रैव स्वतः प्रामाण्योपयोगसम्भवात् । यदि कचिदपि चेन्निःशङ्खसमर्थप्रवृत्तिः संशयादुत्पद्येत, तहि सर्वत्रैव तथा सम्भवेन प्रामाण्य-निश्चयो निरर्थकः स्यात् । तथा च यागादिप्रवृत्तावपि प्रामाण्यनिश्चयोऽनपेक्षित. स्यात् । यथा प्रामाण्यस्योत्पत्तौ ज्ञप्ती च स्वतस्त्वं तथैव व्यवहृतावपि स्वतस्त्वमेव । ज्ञानादेव ज्ञेयाभिव्यक्तिरूपफलस्य सिद्धेः । यत्तु हानोपादानादिकमेव सर्वत्र ज्ञानफलम् तच्चेष्टसाधनताज्ञानाधीनमिति परतस्त्वमेव तदिति तन्न हानो-पादानादिजनकत्वेन तद्विषयकज्ञानानामन्यनेरपेक्ष्येण स्वत एव फलजनकत्वोपपत्तेः । यदुक्तम् --- ' असतामसाध्यत्वात् प्रामाणमप्रामाण्यमुभयमपि स्वत एव स्यादिति शशविषाणादिकमसन्न क्रियते । तदुक्तम्- - ' अस स्वान्नास्ति सम्बन्ध: कारकैः सवसङ्गिभिः । असम्बद्धस्य चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यवस्थितिः ॥ ' इति । किञ्च कारणाभिन्नस्य तस्य कार्यप्राग-सत्त्वं नोपपद्यते, भिन्नं चेत् कार्य न तत उत्पद्येत, यथा गौरवान्नोत्पद्यते । भिन्नयोः संयोगोऽप्राप्तिर्वा भवति यथा कुण्ड-बदरयोः, मेरुविन्ध्ययोर्वा । न तदुभयमपि तन्तुपटादीनाम् । तस्मात्कारणाभिन्नत्वात् कार्याणां ततः प्रागपि त्वमेवेति यह तो वैधर्म्यमात्र है । यदि अप्रामाण्य के अनिश्चय से निवृत्ति नहीं होती तो प्रामाण्य के अनिश्चय से प्रवृत्ति भी नहीं होगा । निम्न उद्धरण में यही बात कही गई है --- " इच्छा प्रवृत्ति में कारण है और वह इच्छा अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के उपाय की अपेक्षा रखती है । इससे हमारा दृष्ट ही सिद्ध होगा, इस प्रकार के अनुभव से वह पुष्ट होगी और इसके लिये उस पदार्थ के साथ इन्द्रिय का संनिकर्ष आवश्यक है | इसमें प्रामाण्य ग्रहण की किसी भी अंश में उपयोगिता नहीं है । उपयोग होने पर भी वह स्वतः उपयुक्त हो जायगी, यह कैसे सम्भव हो सकता है? प्रमाणतया अवगम्यमान समीहित साधनता का ज्ञान इच्छाजन्य नहीं हो सकता, ऐसे स्थलों में ही स्वतः प्रामाण्य का उपयोग हो सकता है । यदि कहीं भी संशय से निःशंक समर्थ प्रवृत्ति होने लगे तो सभी जगह ऐसी ही सम्भावना रहने सेकेन की कोई आवश्यकता नहीं रह जायगी । ऐसी स्थिति में यागादि प्रवृत्ति में भी प्रामाण्य के निश्चय की अपेक्षा न रह जायगी । जैसे प्रामाण्य की उत्पत्ति और ज्ञप्ति में स्वतस्त्व है, उसी भाँति उसके व्यवहार में भी स्वतस्त्व माना जाता है. क्योंकि ज्ञान से हो ज्ञेय की अभिव्यक्ति ( प्राकट्य ) रूप फल निष्पन्न होता है । यह कहना कि सभी जगह ज्ञान का फल दृष्ट का उपादान और मनिष्ट का त्याग ही है और वह इष्ट साधनता ज्ञान ( यह मेरे अभीष्ट का साधन है, ऐसा ज्ञान ) के अधीन है, अतः व्यवहार में वो परतस्त्व ही मानना पड़ेगा, यह कहना इसलिये गलत है कि हान और उपादानविषयक ज्ञान ही अन्य की अपेक्षा रखे बिना हान ( स्याग ) और उपादान ( स्वीकार या ग्रहण ) रूप फल के जनक हो सकते हैं । जैसा कि कहा गया है- " असत् पदार्थ किसी भी कारण से सिद्ध नहीं किये जा सकते, अत्तः प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों स्वत: सिद्ध होंगे, इस प्रकार शशविषाण ( खरगोश के सींग ) जैसे विषय भी असत् होने के कारण ही क्रिया के विषय नहीं बनते । " इस बात को निम्न श्लोक में भी कहा गया है --- " शशविषाण आदि असत् पदार्थों का सत् साधनों के साथ सम्बन्ध नहीं है । बिना सम्बन्ध के भी ( कार्यकारण के ) किसी सावन से किसी साध्य की उत्पत्ति मानने पर अव्यवस्था हो जायगी । तात्पर्य यह है कि मृतिका रूप कारण का घट रूप कार्य से सम्बन्ध है । यह सम्बन्ध मृत्तिका में पहले घट की सत्ता मानने पर ही बन सकता है । असत् घट की मृत्तिका से उत्पत्ति मानने पर तो बिना सम्बन्ध के हो उत्पत्ति माननी पड़ेगी । ऐसी स्थिति में एक दूसरे से सम्बद्ध सभी वस्तुओं की उत्पत्ति होनी चाहिये, पर ऐसा होता नहीं | दूसरी बात यह है कि कार्य कारण से अभिन्न होता है । यतः उस कार्य की उत्पत्ति से पहले असता नहीं मानी जा सकती । यदि कार्य कारण से भिन्न है तो वह उससे पैदा नहीं हो सकता, जैसे कि गौ अन्य से उत्पन्न नहीं होती । दो भिन्न वस्तुओं का ही संयोग अथवा अप्राति होती है, जैसे कि कुण्ड और बदर का, मेरु और विन्ध्यपर्वत का । पट और तन्तु तथा घट मृत्तिका आदि में ये दोनों नहीं है । इसलिए कार्य कारण से भिन्न है, अतः उसकी उत्पत्ति के पहले भी उसकी सत्ता है हो | यह सारा जसत् की सत्ता का प्रतिपादन गलत है,

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 70 का मूल पृष्ठ
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४० वेदापारिजातः तन्न, सत्वेऽपि तदनुपपत्तेः । यदि क्रियमाणत्वमेव सत्त्वसाधनं तदा सतोऽपि तन्नोपपद्यते, सतो घटादेः क्रियमाणत्वा-दर्शनात्, कृतकरणव्यापारानुपपत्तेश्च । सत्याश्च सामथ्र्यां घटोत्पत्तिदर्शनेन प्रागसतोऽपि कार्योत्पत्तिरभ्युपेतव्या । यदुक्तम् ---कारणेनासम्बद्धस्य कार्यस्योत्पत्ती इदमेवास्य कार्यमिदमेवास्य कारणमिति व्यवस्थानुपपत्तिरित, तन्न 5 किञ्चिदेव कारणं कस्मित्किार्ये शक्तमिति शक्तितो नियमनसिद्धेः । न च शक्तिरेव नास्तीति वाच्यम्, अयमग्निः अद्विष्ठातीन्द्रियाश्रयः कारणत्वात् गुरुत्वाश्रयवदित्यनुमानेन तत्सिद्धेः । ' परास्य शक्ति विविधैव श्रूयते ' ( श्वेता ० उ ० ६६८ ) इति श्रुतेः । न च शक्तिरपि कार्यणासम्बद्धा न नियामिकेति वाच्यम्, शक्ताश्रयायास्तस्याः प्रतिनियतशक्यानुकूलस्वभावत्वात् । अन्यथा सत्कार्यवादेऽपि विवेकहेतोरभावाद् इदमेवास्य कारणमिति नियमासिद्धेः । यदि तु तत्तदभिव्यञ्जकसामर्थ्यनियमात् तत्तदभिव्यक्तिनियम आस्थीयते, तदा तु तद्वदेव तत्तदुत्पादककारणसामर्थ्यनियमात् तत्र सत्कार्योत्पत्तिनियमोऽपि सिद्धयत्येव । कार्यकारणाभेदसाधकानुमानन्तु प्रत्यक्षेण तन्तुयोर्भेदोपलम्भेन बाधदोषग्रस्तम् । किञ्च कारकव्यापारात्प्रागपि कारणे कार्यस्य सत्त्वे तदुपलम्भोऽपि स्यात्, न चोपलभ्यते, तस्मादसदेव तत् । यदि स्वभिव्यक्तेरभावादनुपलब्धिः, तदा सापि सती असती वा? सती चेत्प्रागपि कारणे कार्य कुतो नोपलभ्यते, असती चेत्कारकव्यापारादुत्पद्यते, तदा कार्यस्यैवासतः कुतो नोत्पत्तिरास्थीयते? तस्मात् प्रामाण्याप्रामाण्ययोरुभयोरपि स्वतस्त्वे किञ्चिदेव प्रमाणमप्रमाणमन्यदिति व्यवस्थानुपपत्त्या नोभयं स्वत इति मन्तव्यम् । क्योंकि इस प्रकार से तो सत् का भी उपपादन नहीं किया जा सकता | यदि क्रियमाणत्व को ही सत्त्व का साधन माना जाय तो वह तो सत् पदार्थ में भी उपपादित नहीं हो सकता, क्योंकि सत् से कुछ नहीं बनता, जो वस्तु निष्पादित हो चुकी है, उसमें घटादि बाद में करणव्यापार प्रवृत्त नहीं होता । सामग्री के रहने पर ही घट की उत्पत्ति देखी गई है, अतः पहले से अविद्यमान वस्तु की मी उत्पत्ति माननी पड़ती है । जैसा कि कहा गया है कि कारण से असम्बद्ध कार्य की उत्पत्ति मानने पर यही इसका कार्य है, यहाँ इसका कारण है, इस तरह की व्यवस्था नहीं बन पावेगी । इसका उत्तर भी यह दिया जा सकता है कि शक्ति से इसको व्यवस्थित किया जा सकता है कि एक निश्चित कारण ही एक निश्चित कार्य को पैदा कर सकता है । शक्ति है ही नहीं, यह बात नहीं कही जा सकती, क्योंकि अनुमान से उसकी सिद्धि होती है कि यह न केवल एक में रहनेवाली इन्द्रियों से न जाने जा सकनेवाली दाहकत्व रूप शक्ति का आश्रय है, दाह का कारण होने से, गुरुत्व के आश्रय पृथ्वी, जल afe की तरह | " इस ईश्वर की परा शक्ति नाना रूपों में देखी जाती है " इत्यादि श्वेताश्वतर श्रुति भी शक्ति के अस्तित्व में प्रमाण है । कार्य से संबद्ध होने पर शक्ति भी कार्य की नियामक नहीं हो सकती, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह शक्ति समर्थ में रहती है, अतः उसमें प्रतिनियत शक्य वस्तु की विपत्ति के अनुकूल सामर्थ्यं स्वभावतः विद्यमान है । अन्यथा सत्कार्यवाद में भी किसी fadee कारण के अभाव में यही इसका कारण है, यह नियम सिद्ध न हो सकेगा । यदि तत्तत् निश्चित अभिव्यञ्जक सामर्थ्य के नियम के अनुसार अभिव्यक्ति का नियम माना जाता है, तो उसी पद्धति पर उत्पादक कारण की सामर्थ्य के अनुसार वहाँ पर सत्कार्य को उत्पत्ति का नियम भी बन सकता है । कारण और कार्य का अभेद बताने वाला अनुमान बाधित है, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण से तन्तु र पद का भेद प्रतीत होता है । दूसरी बात यह है कि कारक व्यापार से पहले भी कारण में यदि कार्य की सत्ता मानी जाती है तो उसकी उपलब्धि होनी चाहिये, वह उपलब्ध नहीं होता, अतः उसको वसत् मानना पड़ेगा । यह कहा जाय कि अभिव्यक्ति के न होने से वह उपलब्ध नहीं होता तो पहले आपको यह बताना पड़ेगा कि यह अभिव्यक्ति सत् है या असत्? यदि सत् है तो अभिव्यक्ति से पहले भी कारण में कार्य क्यों उपलब्ध नहीं होता? यदि यह असत् है तो arrer user fr कारक व्यापार से उसकी उत्पत्ति होती है । ऐसी अवस्था में कार्य को ही असत् मानकर कारक व्यापार से उसकी उत्पत्ति क्यों न मानी जाय । बीच में अभिव्यक्ति का बढ़ेगा लगाना व्यर्थ ही है । इसलिये प्रामाण्य और अप्रामाप्य दोनों के स्वतस्त्व के पक्ष में कुछ ज्ञान प्रमाण हैं, अन्य अप्रमाण हैं, यह aravar संभव नहीं है, अत: यह मानना चाहिये कि प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों स्वतः अवगत न होकर परतः प्रतीत होते हैं ।