वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 51–60
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 51–60
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मैदार्यपारिजातः २१ मन्त्रादिस्मृतभारताद्यदृष्टार्थक्रभागेष्वतिव्याप्तिवारणायाजन्य इत्यन्तम् । यद्यपि " अनन्ता वै वेदा: " इति श्रुत्यनुसारेण वेदा अनन्ता एव, तथापि एकत्रिंशदधिकशतीत्तरसहस्रशाखापबृंहितो मन्त्रब्राह्मणात्मको विच्छिन्नपारम्पर्येणाधीयमानोऽपौरुषेयः शब्दराशिरेव मानवबुद्धिगम्यो वंदः । गुरोर्मुखादनुश्रूषमाणत्वादेवान्वर्थ कानुभवत्वमपि तस्य " प्रमाणानां प्रामाण्यादेव हि प्रमेयसिद्धिः " इति नियमात् । उपमान प्रमाणम् वेदान्तपरिभाषादिरीत्या उपमितिकरणत्वमुपमानत्वम् । करणत्वञ्चासाधारणत्वमिह विवक्षितम्, न तु व्यापार वत्त्वघटितमिति, गवयनिष्ठसादृश्यज्ञानस्योपमितो जनयितव्यायां व्यापाराभावात् । उपमितिश्च सादृश्यज्ञानत्वेन सादृश्य-ज्ञानजन्या । उपमितौ कारणान्तरानुपपत्त्या गवादिप्रतियोगिकगवयादिनिष्ठसादृश्यज्ञानस्य सादृश्यज्ञानत्वे करणत्वकल्पना-न्नासम्भवः । तदनुव्यवसायादेश्च तत्त्वेन तज्जन्यत्वाभावान्नातिव्याप्तिः । न च गोविसदृश उष्ट इति वैधर्म्यज्ञानजन्यायाम् मन्त्र के एकदेश के उच्चारण में पारलौकिक सुख नहीं होता । यदि शब्दातिरिक्तं शब्दोपजीविप्रमाणातिरिक्तं च यत्प्रमाणं तज्जन्यप्रमिति-विषयानतिरिक्तार्थको यो यस्तदन्यत्वे सति आमुष्मिक सुखजनकत्वोच्चारणकत्वं यह दो अश ही वेद का लक्षण रखा जाय, प्रमाण शब्द यह विशेष्य अशन रखा जाय तो सामगान में जो स्तोभ हैं ' हा ' आदि उनमें भी लक्षण चला जायमा, कारण वे चक्षुरादिप्रमाणजन्य प्रमिति के विषय से अनतिरिक्तार्थक से अन्य हैं और पारलौकिक सुखजनक उच्चारण वाले भी हैं परन्तु वे वेद नहीं हैं कारण मन्त्र-ब्रह्मवेदनामयम् कहा गया है और स्तोम दोनों से बहिर्भूत हैं । इस अति व्याप्ति दोष के वारण के लिए यह अंश रखा गया ' प्रमाणशब्दत्व ' अर्थात् प्रमाणनिक शब्द | स्तोम का कुछ भी अर्थ नहीं होता । निरर्थक होने से वे प्रमाजनक मी नहीं हो सकते | अतः वेद का लक्षण स्तोत्र में नहीं गया । यदि कोई प्रश्न करे कि यदि स्तोम वेद नहीं हैं तो शूद्रों के लिए उनका उच्चारण निषिद्ध क्यों? इसका समाधान यह है कि वेदाध्ययन निषेव के कारण स्ताभों के अध्ययन का निषेध शूद्रों के लिए नहीं अपितु वाचनिक पृथक् निपेध है । इतना लक्षण होने पर भी मन्वादि स्मृतियों में तथा महाभारतादि के अष्टार्थक भागों में भी वेद का लक्षण चला जायमा क्योंकि वे चक्षुरादिजन्य प्रमिति विषयानतिरिक्तार्थ से भिन्न भी है, पारलौकिक सुखजनक उच्चारणवाले भी हैं, तथा प्रमाण शब्द भी हैं । अतः इस लक्षण में पुनः अतिव्याप्ति दोष होगा । अतः जन्यज्ञाना जन्यत्व यह तीसरा विशेषण दिया गया है । इससे यह लक्षण मनुस्मृति आदि ग्रन्थों और महाभारतादि के अष्टार्थक भागों में नहीं जायगा, क्योंकि वे सभी ग्रन्य पौरुषेय ( प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य विरचित ) होने के कारण जन्यज्ञानम्य ही हैं । जम्मज्ञानग्जन्य नहीं । यदि कहा जाय कि प्रमाण शब्द में ' शब्द ' यह अंश क्यों रखा गया, केवल प्रमाण इतना ही कहना चाहिए । तो इसका उत्तर यह है कि इतना लक्षण मनमें भी चला जायगा और वेद का लक्षण अतिव्याप्ति दोषग्रस्त हो जायगा, कारण चक्षुर प्रिमितिजन्य विषयानतिरिक्तार्थक से भिन्न मन है और ' स्वाध्यायाध्येतव्य: ' इस विधि के अग्रण पर्याय होने से ' प्राणबन्धनं हि सौम्य मन: ' इस वाक्य से प्रतिपाच मन से भी बायोच्चारण के समान धर्म होता है, तथा वैशेषिकों के सिद्धान्त से स नित्य होने के कारण अजन्य है | अतः जन्य ज्ञानाजन्य भी है, ऐसे में यह लक्षण न चला जाय इसीलिए प्रमाण शब्द में शब्द यह अंश अवश्य देना चाहिए । मन शब्द नहीं है, अतः यह वेद का लक्षण मन में नहीं गया और सर्वथा निर्दुष्ट वेद का यह लक्षण हुआ । उपमान प्रमाण वेदान्तपरिभाषा को पद्धति से उपमिति के करण को उपमान प्रमाण कहते हैं । साधारण कारण यहाँ करण माना गया है । यहाँ ' व्यापारयत् ' ऐसा विशेषण जोड़ने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उपमिति में गमयनिष्ठ सादृश्य ज्ञान की उत्पति में व्यापार की वश्यकता नहीं रहती । उपमिति एक प्रकार का साहस्य ज्ञान में, अतः सादृश्य बोध होने पर यह उत्पन्न होती है । इसके अतिरिक्त उपमिति में अन्य कोई कारण की आवश्यकता नहीं है, अतः गो आदि है प्रतियोगी जिसका ऐसा ययादिनिष्ठ सारयज्ञान, उपमिति में करण होने से असंभव दोष नहीं होगा । उपमिति स्थल का अनुव्यवसाय ( गामुपमनोमि इत्याकारक साहश्य ज्ञानत्वेन सादृश्य ज्ञान-जन्य न होने से अतिव्याप्ति दोष नहीं होगा | यहाँ पर यह कथन उचित नहीं है कि ऊंट गाय से विलक्षण है, इस बैधयं ज्ञान से जनित ' मेरी गाय से fre क्षण है ' इस उपमिति में उक्त लक्षण का समन्वय न होने से अव्याहि दोष आवेगा, क्योंकि ऐसे स्थलों पर उपमान
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२२ वेदार्थपारिजातः अनया विसदृशी मदीया गौरित्युपमितावव्याप्तिः, तत्रोपमानप्रामाण्यानभ्युपगमात् । करभेण ( उष्ट्रेण ) गामुपमिनोमीत्यनु-व्यवसायादर्शनात् । तथाहि ग्रामनगरादिषु दृष्टगोपिण्डस्य पुरुषस्य बनगतस्य गवयेनेन्द्रियसन्निकर्षे सति गोसदृशोऽयमिति भवति प्रतीतिः । तदनन्तरञ्चानेन सदृशी मदीया गौरिति निश्चयरूपोपमितिरुत्पद्यते । सादृश्यश्च तद्भिन्नत्वे सति तद्गतभूय: -सामान्यवत्त्वमेव । तदसाधारणधर्मशून्यत्वे सति तद्गतधर्मवत्त्वं वा । न चैवं राजमशकयोरपि सादृश्यापत्तिः स्यादिति वाच्यम्, प्राणित्वादिना तत्र तस्येष्टत्वात् । अत एव न सादृश्यं पदार्थान्तरं तस्य सामान्येऽन्तर्भावात् । तदसाधारणधर्मशून्यत्वे सति तद्गतधर्मवत्त्वस्य सादृश्यस्योपाधिरूपत्वेन प्रमेयत्वादिवत् सामान्यवृत्तित्वेऽपि विरोधाभावात् । तद्गतधर्मवत्स्वलक्षणश्चेतर-निरूप्यत्वात् सप्रतियोगिकमपि तत्, तच्च न पदार्थान्तरम्, तथात्वे सुसदृशमीषत्सदृशमित्युत्कर्षापकर्षाभावप्रसङ्गात् । सिद्धान्ते तु सामान्यात्पभूयस्त्वाभ्यां तदुपपत्तिः । तत्रान्वयव्यतिरेकाभ्यां गवयनिष्ठगोसादृश्यज्ञानं करणं गोनिष्ठगवयसादृश्यज्ञानं फलम् । न चेदं प्रत्यक्षेण सम्भवति, गोपिण्डस्य तदानीमिन्द्रियासन्निकर्षात् । नाप्यनुमानेन, गवयनिष्ठसादृश्यस्यातल्लिङ्गत्वात् । ननु प्रत्यक्षेण गवये गोसादृश्ये गृह्यमाणे गव्यपि गवयसादृश्यं गृहीतमेव, समानसं वित्संवेद्यत्वात् इति चेन्न, धर्मि -प्रतियोगिभेदेन समानसंविद्वेद्यत्वासिद्धेः । ननु मदीया गौरेतद्गवयसदृशी, एतन्निष्ठसादृश्यप्रतियोगित्वात्, यो यद्गतसादृश्यप्रतियोगी स तत्सदृशः, यथा मैत्र-निष्टसादृश्यप्रतियोगी चैत्रो मैत्रसदृश इत्यनुमानात्तत्सम्भव:, इति चेन्न, तथाविधानुमानानवतारेऽप्यनेन सदृशी मदीया गौरिति प्रमाण माना ही नहीं जाता । इसका कारण यह है कि ऐसे स्थलों पर ऊँट से गाय की उपमिति करता हूँ, ऐसा अनुव्यवसाय नहीं देखा जाता | उपमान की प्रक्रिया यह है कि गाँव, नगर आदि में जो मनुष्य गाय से परिचित है वह वन में गव को देखता है तो उसको प्रतीति होती है कि यह गाय के जैसा है । अनन्तर इस गवय के सदृश मेरी गो है, इस प्रकार की निश्चय रूप उपमिति होती है । साहृदय का लक्षण है कि उससे भिन्न हो और तद्गत अधिक धर्मवान् हो । अथवा असाधारण अर्थात् विशेष धर्म के न रहने पर जिनमें साधारण धर्म समान हो, उसको सादृश्य कहते हैं । यह आशंका ठीक नहीं है कि इस प्रकार सामान्य धर्म लेकर हाथी ओर मच्छर में भी सादृश्य मिल जायेगा, क्योंकि इनमें प्राणी के रूप में तो साहश्य अभिप्रेत ही है । इसीलिए सादृश्य अतिरिक्त पदार्थ नहीं है | उसका सामान्य में अन्तर्भाव हो जाता है । द्वितीय लक्षण से लक्षित सादृश्य प्रमेयत्व आदि के समान सामान्य वृत्ति होने पर भी कोई विरोध नहीं होगा | क्योंकि ' सद्गतधर्मवत्व ' निरूपक सापेक्ष है । जो निरूपक है वह उसका प्रतियोगी है | इस रूप से वह सप्रनियोगी बन जाता है । अतः साहश्य पदार्थान्तर नहीं है । साहदय को भिन्न पदार्थ मानने पर यह अत्यन्त सदृश है; यह कम सहश है इत्यादि साहय में उत्कर्ष और अपकर्ष नहीं बन पावेगा । सिद्धान्त में तो इसकी उपपत्ति थोड़ी और अधिक समानता के आधार पर हो सकेगी । यहीपर अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा गवय में स्थित को का साहश्य ज्ञान करण हैं और साथ में स्थित गवय साहस्य ज्ञान उपमिति का प्रयोजन है । यह प्रत्यक्ष से नहीं हो सकता, क्योंकि उस समय वन में गाय के साथ इन्द्रियों का संनिकर्ष नहीं है । अनुमान से भी यह ज्ञात नहीं सकता, क्योंकि गवयनिष्ठ सादृश्य उसमें हेतु नहीं बन सकता । यहाँ होती है कि प्रत्यक्ष से वय में गाय का साहस्य गृहीत होने पर गाय में भी गवय का साहस्य गृहीत हो जाता है क्योंकि यह समानवत्संवेद्य हैं, अर्थात् एक प्रकार के ज्ञान से दोनों गृहीत होते हैं । तब उपमिति की क्या आवश्यकता है? यह शंका इसलिये उचित नहीं है कि यह समानसंवित्संवेध नहीं है, धर्मी एवं प्रतियोगी का भेद है | प्रत्यक्ष से न सही, किन्तु मेरी गाय इस गवय के समान है, क्योंकि इसमें विद्यमान साहश्य का गवय प्रतियोगी है, जो जिस सादृश्य का प्रतियोगी है, वह उसके समान है, जैसा कि मै r में विद्यमान साहश्य का प्रतियोगी चैत्र मैत्र सरीखा होता है, इस अनुमान १. जैसा कि गवय साहस्य को गो में ले जाना हो तो उस सादृश्य का प्रतियोगी गवय है और अनुयोग गो है । प्रतियोगी Ter से भिन्न होकर गवयगत अधिक वाली गाय है । अतः गवध सादृश्य गो में विद्यमान है । अथवा असाधारण आदि हैं, गो में असाधारण गव्यत्व धर्म नहीं है, किन्तु ग t य के चतुष्पात्र लोमकर आदि सामान्य धर्म | अतः वध के सह गो है ।
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वेदार्थपारिजातः २३ प्रततिरनुभवसिद्धत्वात् । कथञ्चित्साध्यहेतुप्रसिद्धावपि गवि गवयसादृश्यानुभवकाले नियमेन व्याप्तिज्ञानाभावात् । उप-मिनोमीत्यनुव्यवसायाचोपमानमेव तत्र मन्तव्यम् । नैयायिकरीत्या तु कीदृशी गवय इति प्रश्नानन्तरं यथा गौस्तथा गवन इत्याप्तारण्यकपुरुषद्वारा लब्धोपदेशस्य बनं गतस्य तद्वाक्यं स्मरतश्चक्षुः सन्निकर्षेणायं गोसदृश इति प्रत्यक्षे जातेऽसो गवयशब्दवाच्य इति प्रतीतिरेवोपमितिः । तत्करणञ्च नाप्तवाक्यं तस्य पिण्डप्रत्यक्षात्प्रागपि सत्त्वात् । नापि प्रत्यक्षं तस्मिन् सत्यपि वाक्याश्रवणे वाच्यताप्रतीतेः । नापि मिलितयोः कारणत्वं भिन्नभिन्नकालतया तयोर्मेलनासिद्धेः । प्रत्यक्षसमये तद्वाक्यानुस्मृतिसम्भवेऽपि शाब्दत्वापरोक्ष-त्वयोः साङ्कर्यापत्त्या ताभ्यां विजातीयाभ्यां तादृशप्रमानुपपत्तेः । नाप्यनुमानं करणं तदनवतारेऽपि तादृशप्रतीतेः सिद्धत्वात् । तदुक्तमुदयनाचार्यैः-सम्बन्धस्य परिच्छेदः संज्ञायाः संज्ञिना सह । प्रत्यक्षादेरसाधात्वादुपमानफलं विदुः ॥ ( न्या ० कु ० ३।१० ) इति । वेदान्तस्तु गवयत्वविशिष्टये गवयशब्दवाच्यः, गोसदृशत्वात्, अतिदेशवाक्यावगतपिण्डवदित्यनुमानेन गवयपदं सप्रवृत्तिनिमित्तकम्, पदत्वात्, घटपदवदित्यनुमानेन च गतार्थमेव तत् । वस्तुतस्तु नहि गवयेन गामुपमिनोमीत्यनुव्यवसायो वाच्यत्वविषयः, तस्मान्न संज्ञासंज्ञिसम्बन्धबुद्धिरूपं तत्फलमिति । अर्थापत्ति प्रमाणम् उपपाद्यज्ञानेनोपपादककल्पनमर्थापत्तिः । उपपाद्यज्ञानं करणमुपपादकज्ञानं फलम् । येन विना यदनुपपन्नं तत्तत्रोप-से उसकी प्रतीति हो जायगी तो उपमिति प्रमाण की क्या आवश्यकता है? यह अनुमान भी इसलिये असफल हो जायगा कि बिना इस अनुमान के भी इस गवय के समान मेरी गाय है, ऐसी प्रतीति अनुमद से सिद्ध है । ऐसे स्थलों में किसी प्रकार साध्य और हेतु की प्रसिद्धि हो जाने पर भी निश्चित रूप से व्याप्ति ज्ञान की सिद्धि नहीं हो पाती । ऐसे स्थलों में अनुव्यवसाय अनुमान का न होकर उपमान का होता है, इससे भी यहाँ पर उपमान ही मानना पड़ेगा, अनुमान नहीं । नैयायिकों का यह कहना है कि गवय कैसा है? इस प्रश्न के उत्तर में जैसी गाय है, वैसा गवय हैं, ऐसी आत वरण्यवासी की उक्ति को सुनकर जंगल में गवय को प्रत्यक्ष करते हुये आप्त वाक्य का स्मरण करता है तो यह गाय का जैसा प्राणी है, इस प्रत्यक्ष अनुभूति के द्वारा यह गवय शब्द का वाच्य प्राणी है, ऐसी प्रतीति ही उपमिति है | यहाँ करण बाप्त वाक्य नहीं है, कपड * देखने से पहले भी वह विद्यमान था । प्रत्यक्ष भी यहीं पर करण नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष होने पर जिसने उक्त आरण्यक पुरुष की वाणी नहीं सुनी है, उसको गवयशब्द वाच्यता की प्रतीति नहीं हो सकती । दोनों मिलकर भी कारण नहीं हो सकते, क्योंकि ये दोन भिन्न - भिन्न काल के हैं । अतः ये दोनों मिल नहीं सकते | गवय का प्रत्यक्ष होते समय आप्त व्यक्ति के वाक्य का स्मरण यद्यपि संभव हैं, तो भी ऐसी अवस्था में शाब्द और प्रत्यक्षज्ञान का सांकर्य होगा, ये दोनों विजातीय प्रमाण हैं, इन परस्पर विरोधी प्रमाणों से किसी प्रमा की उत्पति नहीं हो सकती । अनुमान भी यहीं पर करण नहीं हो सकता, क्योकि बिना अनुमान के भी तादृश प्रतीति होती है । इसलिये उदयनाचार्य ने कहा है कि --- " गवयादि संज्ञा का rar frue के साथ स्वन्थ का ज्ञान कराना ही उपमान का प्रयोजन है, क्योंकि यह प्रत्यक्ष, अनुमान अथवा शब्द के द्वारा नहीं सम्भव होता " । इस पर वेदासियों का कहना है कि गवयत्य जाति से विशिष्ट प्राणी गवय शब्द वाच्य है, क्योंकि वह गोसहरा है, उदाहरण है अतिदेश वाक्य ( आत वाक्य से ) ज्ञात rar पिण्ड । इस अनुमान से, meet ra re aasm किसी का बोधक है, पद होने से, घट पद के समान, इस अनुमान से नैयायिकाभिमत गवय शब्द वाध्यता का ज्ञान हो जाता है । अतः यह उपमिति का प्रयोजन नहीं है । वस्तुतस्तु मय से गाय की उपमिति करता हूँ, यह अनुव्यवसाय वाच्यत्व nr face नहीं है, अतः संज्ञासंज्ञी रूपी सम्बन्ध ज्ञान की अवगति उपमिति का फल नहीं होगा । अर्थापत्ति प्रमाण उपपा के ज्ञान से उपपादन की कल्पना अर्थापत्ति प्रमाण कहलाता है | यहाँ उपपाद्य का ज्ञान करण और उपपादक का काल फल है । उपपाद उसे कहते हैं जिसके बिना जो उपपन्न ( सिद्ध ) न होता हो और उपपादक वह कहलाता है fr सके अभाव में
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२४ वेदार्थपारिजातः पाद्यम्, यस्याभावे यदनुपपत्तिस्तत्तत्रोपपादकम् । यथा रात्रिभोजनेन विना दिवाऽभुञ्जानस्य पीनत्वमनुपपन्नमिति तादृश-पीनत्वमुपपाद्यम्, यथा वा रात्रिभोजनस्याभावे तादृशपीनत्वानुपपत्तिरिति रात्रिभोजनं तदुपपादकम् । सा चार्थापत्तिः श्रुतार्थापत्तिदृष्टार्थापत्तिभेदेन द्विधा । इदं रजतमिति पुरोवर्तिनि प्रतिपन्नस्य रजतस्य नेदं रजत-मिति तत्रैव निषिद्धयमानत्वं सत्यत्वेऽनुपपन्नमिति रजतस्य तद्भिन्नत्वं सत्यत्वात्यन्ताभाववत्त्वं वा मिथ्यात्वं कल्पयति इति दृष्टार्थापत्ति: । ' तरति शोकमात्मविद् ' ( छा ० उ ० ७ ११३ ) इति श्रूयमाणस्य शोकपदवाच्यस्य बन्धजातस्य ज्ञाननिवर्त्य -त्वस्यान्यथानुपपत्त्या बन्धस्य मिथ्यात्वं कल्प्यते । यथा वा जीवी देवदत्तो गृहे नास्तीति श्रवणानन्तरं जीविनो गृहासत्त्वं बहि: -सत्त्वं कल्पयति । श्रुतार्थापत्तिरपि द्विविधा - अभिधानानुपपत्तिरभिहितानुपपत्तिश्च । यत्र वाक्यैकदेशश्रवणेऽन्वयाभिधानानुपपत्त्या अन्वयाभिधानोपयोगिपदान्तरं कल्प्यते तत्राभिधानानुपपत्तिः । यथा द्वारमित्यत्र पिधेहीत्यध्याहारः । अत्राभिधानपदेना-भिधीयतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या तात्पर्यस्य विवक्षितत्वेन कर्मक्रियासंसर्गावबोधनतात्पर्येण अनेन द्वारमित्युच्चारितमिति ज्ञानवतोऽ-वयाभिधानात् पूर्वावस्थायामपि तथा ज्ञानं सम्भाव्यते । अभिहितान्वयानुपपत्तिस्तु यत्र वाक्यावगतोऽर्थोऽनुपपन्नत्वेन ज्ञातः सन्नर्थान्तरं कल्पयति तत्र द्रष्टव्या । यथा ' स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत ' इत्यत्र श्रुतौ स्वर्गसाधनत्वस्य क्षणिकज्योति-ष्टोमयागगततयावगतस्यानुपपत्त्या मध्यवर्त्य पूर्वं कल्प्यते । न चेयमर्थापत्तिरनुमानेऽन्तर्भवति, अन्वयव्याप्त्यज्ञानेनान्वयिन्यनन्तर्भावात् । न च व्यतिरेकिणश्चानुमानत्वस्, अर्थापत्तिवादिभिस्तदनङ्गीकारात् । तद्रीत्या नानुमानस्य व्यतिरेकिरूपत्वम्, साध्याभावें साधनभावनिरूपितव्याप्तिज्ञानस्य किसी विशेष कार्य की सम्भावना न हो । जैसे कि देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता हुआ पीन हैं । यहाँ पीनत्व उपपाद्य है, वह बिना रात्रि भोजन से उपपन्न नहीं है । एवं रात्रि भोजन के अभाव में पीनत्व बनता नहीं तो रात्रि भोजन उसका उपपादक हूँ । यह अर्थात श्रुतार्थापत्ति और दृष्टार्थापति के भेद से दो प्रकार की है । चक्षु से संयुक्त द्रव्य में ' यह रजत है ' इस प्रकार का ज्ञान यदि सत्य है, तो उसकी ' यह रजत नहीं है ' ज्ञान से निवृत्ति कभी नहीं संभव हो सकती । अतः निषेध से रजत में या तो रजत मित्व अथवा सत्यता के अत्यन्ताभाव रूपी मिथ्यात्व की कल्पना होती है । इसको दृष्टार्थापत्ति कहते हैं । " आत्मविद शोक के पार पहुँच जाता है " इस श्रुतिवाक्य से अवगत शोकपद वाच्य संसारबन्ध ब्रह्मज्ञान के द्वारा तभी निवृत्त हो सकता है, जब कि बह बन्ध मिथ्या हो । अथवा जैसे देवदत्त जीवित तो है, किन्तु वह घर में नहीं हैं, यहाँ पर जीवित व्यक्ति का घर में न रहना, कहीं बाहर उसकी स्थिति को बताता है । इस प्रकार के सब दृष्टार्थापत्ति के उदाहरण हैं । श्रुतार्थापत्ति दो प्रकार की होती है --- अभिधानानुपपत्ति और अभिहितानुपपति | अभिधानानुपपत्ति वहाँ होती है, जहाँ कि बाय के एक अंश के सुनने पर उसका किसके साथ अन्वय है, यह प्रतीत न होने पर सदुपयोगी पदान्तर को कल्पना की जाती है, जैसे कि ' द्वार ' ( दरवाजा ) पद के सुनने पर ' पिवेहि ' ( बन्द करों } पद का अध्याहार किया जाता है । यहाँ ' अभिधीयतेऽर्थोऽनेन ' इस करण व्युत्पत्ति द्वारा अभिधान पद से तात्पर्य विवक्षित है, अतः कर्म और क्रिया के संबन्ध को बताने के तात्पर्य से इसने ' द्वार ' पद का उच्चारण किया है, ऐसा जिसको ज्ञान है, उसको अन्वय के पहले भी इस प्रकार का ज्ञान हो सकता है | अभिहितान्बय की अनुपपत्ति वहाँ पर होती है, जहाँ पर कि वाक्य से अवगत अर्थ अनुपपत्र है, ऐसा मालूम होने पर उससे भिन्न किसी उपपन्न अर्थ की hear की जाती हो । जैसे कि " स्वर्गकाम व्यक्ति ज्योतिष्टोम याग करे " श्रुति में सुनी गई क्षणिक ज्योतिष्टोम याग की स्वर्गसाधनता अनुपपन्न होकर ज्योतिष्टोम याग और स्वर्ग प्राप्ति के बीच में ज्योति से उत्पन्न अपूर्व की कल्पना में सहायक होती है । इसका अनुमान में धत्तमद नहीं हो सकता, क्योंकि अन्वय व्याप्ति का ज्ञान न होने से उसमें इसका अन्तर्भाव नहीं होगा । पति को प्रमाण मानने वाले दार्शनिक व्यतिरेकानुमान मानते ही नहीं, इसलिए व्यतिरेक व्याप्ति का यहाँ कोई प्रश्न ही नहीं है । क्यों साध्याभाव में साधनाभाव से जाना जाने वाला व्याप्ति ज्ञान साधन से साध्य के अनुमान में सहायक नहीं हो सकता | यहाँ शंका
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वेदार्थपारिजातः २५ साधनेन साध्यानुमितावनुपयोगात् । ननु कथं धूमादावन्वयव्याप्तिमविदुषोऽपि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानादनुमितिरिति चेन्न, तदर्थमेवार्थापत्तिरूपप्रमाणान्तरस्वीकारात् । अत एव केवलान्वय्यपि नानुमानम्, वेदान्तिरीत्या सर्वस्यैव धर्मस्य ब्रह्म-निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वेनात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यकत्वरूपकेवलान्वयित्वस्यासिद्धेः । नन्वर्थापत्तिस्थले इदमनेन विनाऽमुपपन्नमिति ज्ञानं करणमित्यभ्युपेयते । तत्र किमिदं तेन विनानुपपन्नत्वमिति चेन्न, तदभावव्यापकाभावप्रतियोगित्वस्यैव तत्त्वात् । अत एव ' पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा जलम् ' इत्यादौ गन्धवत्त्वमितरभेदं विनाऽनुपपन्नमित्यादिविज्ञानस्य कारणत्वादर्थापत्तिरूपतैव । अत एव - पृथिव्यामितरभेदं कल्पयामि इत्यनुव्यवसायो भवति । कथञ्चित्तदङ्गीकारेऽपि व्यतिरेकसहचारज्ञानजन्यान्वयव्याप्तिज्ञानस्यैव तत्र हेतुत्वेन तदभावव्यापका-भावप्रतियोगित्वविषयको पपाद्यज्ञानस्याहेतुत्वान्नातिव्याप्तिः । अस्तु वा व्यतिरेकसहचारज्ञानजन्यव्यतिरेकव्याप्तिज्ञाना-उठती है कि तब धूमादि मे अन्वयव्याप्ति को न जानने वाले व्यक्ति को व्यतिरेक व्याप्ति के ज्ञान से कैसे अनुमिति होती है? इसका उत्तर यही है कि यह अनुमान का विषय न होकर मर्थापत्ति रूप एक भिन्न प्रमाण का विषय है । इसीलिये केवलान्वयी भी अनुमान नहीं होता, क्यों fe अद्वैत वेदान्त के अनुसार सभी धर्म ब्रह्मनिष्ठ गत्यन्ताभाव के प्रतियोगी है, अर्थात् कोई भी धर्म ब्रह्म में कमी अलग नहीं है । इसके विपरीत अत्यन्ताभाव के अप्रतियोगी साध्य में ही केवलान्वयी की प्रवृत्ति हो सकती है, फलतः अद्वैत वेदान्त में केवला-Fat हेतु बन ही नहीं सकता । Read fea पत्ति प्रमाण में ' यह इसके बिना उपपन्न नहीं हो सकता ', इस प्रकार का ज्ञान करण माना जाता है, यहाँ पर यह उसके बिना अनुपपन्नता क्या वस्तु है? उत्तर है- ' तद्भाव ' इत्यादि । इसलिये " पृथिवी अन्य से भिन्न है, क्योंकि यह गन्धवती है, जो दूसरों से भिन्न नहीं है, वह गन्धवान् भी नहीं है, जैसे कि जल " इत्यादि स्थलों में area इतर भेद के बिना उपन्न नहीं इत्यादि विज्ञान, कारण होने से यहाँ अर्थापत्ति ही प्रमाण है । इसीलिये पृथिवी में दूसरे पदार्थों से भेद को कल्पना करता हूँ, ऐसा मनुव्यवसाय होता है | किसी प्रकार व्यतिरेकी अनुमिति को मानने पर भी अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि उयतिरेक के साहचर्य से उत्पन्न अन्य व्याप्ति ज्ञान को ही व्यतिरेकी अनुमिति में हेतु मानना पड़ेगा । अथवा व्यतिरेक के साहचर्य ज्ञान से जन्य व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से भी भले ही अनुमान प्रमाण की स्थिति माने, तो मी अर्थापत्ति के लक्षण की वहाँ पर अतिव्याप्ति इसलिये विरोधी ज्ञान के रूप में हेतु होगी, फलतः वहाँ पर अर्थात्त का उक्त नहीं होगी कि यह व्यतिरेक व्याति वहाँ पर व्यभिचार ज्ञान के १. ' पीनो देवदत्तः, दिवा न भुते ' इस स्थल में रात्रि भोजन के बिना देवदत्त में पीनस्थ अनुपपत्र है, पीनत्व का उपल पादक है रात्रि भोजन | यदि रात्रि भोजन कल्पित नहीं हुआ तो पीनत्व की उपपत्ति नहीं होगी । यह अनुपपक्ष ' तदभावव्यापकाभावप्रतियोगित्व रूप है । अर्थात् तदभाव- रात्रिभोजनाभाव, उलका व्यापक अभाव दिन में भोजन न करते हुए पोल्वाभाव, इस अभाव का प्रतियोगी पोनत्व, यही अनुपपत्न है २. नैयायिक पृथिवी में इतरभेव सिद्ध करने हेतु व्यतिरेकी अनुमान मानते हैं, उस स्थल में भी अर्थात प्रमाण से हो कार्य ! सम्पन्न होता है, यह दिखलाया जाता है -- ' अल एव ' आदि से । पृथिवो में Tarea के बिना जल आदि पदार्थो से भेद उपपत नहीं होता है । अनुपपद्यमान है पृथिवों में इतर भेद, इतर भेद का कल्पक हैन्धवस्य । गन्धवत्वा भाव का व्यापक जो अभाव इतर भेदाभाव, उसका प्रतियोगी इतर भेद, वही अनुपपद्यमान है । अत: अर्थात से ही व्यतिरेक स्थल में कार्य सम्पन्न किया जा सकता है तो व्यतिरेकी अनुमिति की आवश्यकता नहीं है । ३. विषय का स्पष्टीकरण इस प्रकार है -- हेतु के रहने से साध्य का रहना अन्वय है, साध्य के न रहने से हेतु का न रहना व्यतिरेक है । ' पतो वह्निमान् धूमात् इस अनुमान में साध्य यहि है और हेतु धूम है । साध्य वह्नि के अमावस्य ' धूम हेतु का भी भाव है । इस व्यतिरेक ज्ञान से अन्वयव्याप्ति का ज्ञान उत्पन्न होता है, अर्थात् बलि नहीं रहने पर घूम नहीं रहेगा इस ज्ञान से घूम हेतु के अधिकरण में साध्य वह्नि का अभाव नहीं मिलने पर सााधिकरण • वृत्तिता हेतु को मिल जाती है, ऐसा अन्वय ज्ञान हो जाता है । यहीं ज्ञान व्यतिरेकी अनुमिति में कारण है । अर्थापति में जो उपया ज्ञान माना जाता वह कारण नहीं है । अतः व्यतिरेकानुमिमि में अतिव्याप्ति नहीं है ।
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वेदार्थपारिजातः दनुमितिः तथापि तस्य व्यभिचारज्ञानविरोधिज्ञानतयाऽहेतुत्वेन तदभावव्यापकाभावप्रतियोगित्वज्ञानत्वेनाहेतुत्वान्नाति-प्रसङ्गः । अनुपलब्धि - प्रमाणम् प्रमाणम्, अनुमानादिजन्यातीन्द्रियाभावानुभवहेतो ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवासाधारणकारणमनुपलब्धिरूपं अनुमानादावतिव्याप्तिवारणायाजन्यान्तेति पदम् । अदृष्टादौ साधारणकारणेऽतिव्याप्तिवारणाय असाधारणेति पदम् । अभाव-स्मृत्य साधारणकारणहेतुसंस्कारेऽतिव्याप्तिवारणायानुभवेति विशेषणम् । नन्वतीन्द्रियाभावानुमितिस्थलेऽपि कुतो नानुपलब्ध्यैवाभावो गृह्यते विशेषाभावादिति चेत्र, धर्माधर्माद्यनुपलब्धि-सवेऽपि तदभावानिश्चयेन योग्यानुपलब्धेरेवाभावग्राहकत्वात् । ननु केयं योग्यानुपलब्धिः? कि योग्यस्य प्रतियोगिनोऽनुपलब्धिराहोस्वित् योग्येऽधिकरणे प्रतियोगिनोऽनुपलब्धिः? नाद्यः, स्तम्भे पिशाचभेदस्याप्रत्यक्षत्वापत्तेः । नान्त्यः, आत्मनि धर्माद्यभावस्य प्रत्यक्षत्वापत्तेरिति चेन्न योग्या चासावनुप-लब्धिश्चेति कर्मधारयाश्रयणे दोपविरहात् । अनुपलब्धेर्योग्यता च तर्कितप्रतियोगिसत्त्वप्रसञ्जित प्रतियोगिकत्वरूपा । यस्या-भावो गृह्यते तस्य प्रतियोगिनः सत्त्वेनाधिकरणे तर्कितेन प्रसञ्जितमापादनयोग्यं यत्प्रतियोग्युपलब्धिस्वरूपं यस्यानुप-लम्भस्य तत्त्वं तदुपलब्धियोग्यत्वम् । अत एव स्फीतालोकर्वात भूतले यदि घटः स्यात्तदा वटोपलम्भ: स्याद् इत्यापादन-लक्षण इसलिये घटित नहीं होता कि वह उस वस्तु के अभाव में तदाश्रित वस्तु को कभी भी विद्यमानता न बन सकने के रूप में हेतु नहीं है । अनुपलब्धि - प्रमाण जो किसी ज्ञान की महायता से उत्पन्न नहीं होता हुआ भी अभावात्मक अनुभव का असाधारण कारण है, उसको अनुपलब्बि प्रमाण कहते हैं । अनुमानादि ज्ञान से जन्य अतीन्द्रिय अभाव के अनुभव में कारण अनुमान आदि में अतिव्याप्ति को दूर करने के लिये ' लक्षण में ज्ञानकरणाजन्य ' यह पद जोड़ा गया है । अदृष्टादि की सर्वत्र साधारण कारणता रहती है, उनमें अतिव्याप्ति के धारण के लिये ' असाधारण ' पद दिया गया है । अभाव की स्मृति के असाधारण कारण रूप संस्कार में अतिव्याप्ति के परिहार के लिये ' अनुभव ' विशेषण समाविष्ट है । न उठता है कि अतीन्द्रिय पदार्थों के अभाव का बोध भी अनुपलब्धि प्रमाण से ही क्यों नहीं मान लिया जाता, उसके लिये अनुमान का सहारा क्यों लिया जाता है? उत्तर यह है कि धर्म और अधर्म की अनुपलब्धि रहते हुए भी इनके अभाव का निश्चय नहीं किया जा सकता, अत: अतीन्द्रिय पदार्थों के अभाव का निश्चय न हो पाने के कारण योग्यानुपलब्धि की ही अभाव में कारणता मानी जाती है, अर्थात् प्रत्यक्ष योग्य पदार्थ के अभाव का बोध अनुपलब्धि से होता है । पुनः प्रश्न उठता है कि यह योग्यानुपलब्ध क्या है? योग्य प्रतियोगी की अनुपलब्धि हैं? या योग्य अधिकरण में प्रतियोगी की अनुपलब्धि? पहला पक्ष इसलिये उचित नहीं है कि ऐसा मानने पर स्तम्भ में पिशाच के भेद की अप्रत्यक्षता की आपत्ति होगी, क्योंकि यहाँ पर पिशाच भेद का प्रतियोगी विज्ञान योग्य प्रत्यक्ष योग्य नहीं है, अतः प्रत्यक्ष का विषय न होकर अनुपलब्धि का यह विषय हो जायगा | दूसरा पक्ष भी इसलिये ठीक नहीं है कि ऐसा मानने पर आत्मा में धर्मादि के अभाव की प्रत्यक्षता की आपत्ति होगी । आपका कहना ठीक है, किन्तु यहाँ पर ' योग्या वासी अनुपलब्धिः ' यह कर्मधारय समास किया जायगा । ऐसा करने से इस लक्षण में दोष नहीं जायेंगे । अनुपलब्धि की योग्यता ' तर्कितप्रतियोगिसत्त्वप्रसञ्जितप्रतियोगिक er रूपा ' मानी जाती है । इसका यह अभिप्राय है कि अधिकरण में प्रतियोगी के तर्कित सव से प्रसज्जित होता है, प्रतियोगी जिसका तद्रूप होना ही अनुपलब्धि योग्यता है । यथा यदि भूतल में घट होता तो इस प्रकार घट रूप ( घटाभाव के ) प्रतियोगी के तर्कित सत्व से ' तहि उपलभ्येत ' इस प्रकार ( अनुप लब्धि ) प्रतियोगी रूप उपलम्भ का आपादन किया जा सकता है । इसलिये जिस भूतल पर चारों तरफ प्रकाश फैला हुआ है, वहाँ पर यदि घट होता तो वह उपलब्ध होता, इस प्रकार आपादन संभव है, इसलिये इस प्रकार के भूतल पर घटाभाव अनुपलब्धिवस्य है,
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वेदार्थपारिजातः सम्भवात्तादृशभूतले घटाभावोऽनुपलब्धिगम्यः नान्धारे । आत्मनि धर्माधर्मादिसत्वेऽप्यस्यातीन्द्रियतया निरुकोपालम्भा-पादनासम्भवान्न धर्माद्यभावस्यानुपलब्धिगम्यत्वम् । ननुक्तरीत्याऽधिकरणेन्द्रिसन्निकर्षस्थलेऽभावस्यानुपलब्धिगम्यत्वमनुमतम्, तत्र क्लृप्तेन्द्रियमेवाभावाकारवृत्तावपि करणम्, इन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधानादिति चेन्न, तत्प्रतियोग्यनुपलब्धेरपि अभावग्रहे हेतुत्वेन क्लृप्तत्वेन कारणत्वमात्रस्य कल्पनात् । इन्द्रियस्य चाभावेन सह सन्निकर्षाभावेन भावग्रहहेतुत्वासम्भवात् । इन्द्रियान्वयव्यतिरेकयोस्त्वधिकरणज्ञानादु-पक्षीणत्वेनान्यथासिद्धत्वमेव | यदुक्तम् —'भूतले घटो न ' इत्यभावानुभवस्थले भूतलांशे प्रत्यक्षत्वमुभयसिद्धमिति तदर्थं वृत्तिनिर्गमनस्यावश्यकत्वेन भूतलावच्छिन्न चैतन्यवत्तन्निष्ठघटाद्यभावावच्छिन्न चैतन्यस्यापि प्रमात्रभेदेन घटाद्यभावस्य प्रत्यक्षत्वेन तदतिरिक्तानुपलब्धि-प्रमाणस्वीकरणं व्यर्थमिति चेन्न अभावप्रतीतेः प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करणस्यानुपलब्धेर्मानान्तरत्वात् । अत एव दशमोह-मस्मीति ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करणस्य दशमस्त्वमसीति वाक्यस्य प्रत्यक्षप्रमाणभिन्न प्रमाणत्वोपगमः । घटाद्यभावाकार-वृत्तिनेन्द्रियजन्या, इन्द्रियस्य विषयेणासन्निकर्षात्, किन्तु घटाद्यनुपलब्धिरूपमानान्तरजन्यैव । नन्वेवमभावप्रतीतेः प्रत्यक्षत्वे घटवति घटाभावभ्रमस्यापि प्रत्यक्षत्वापत्तौ तत्राप्यनिर्वाच्यघटाभावोऽभ्युपगम्येत? न चेष्टापत्तिः, तस्य मायोपादानकत्वेनाभावत्वानुपपत्तिरिति मायोपादानकत्वाभावे सकलकार्योपादानत्यानुपपत्तिरिति चेन्न, घटयति घटाभावभ्रमस्य तत्कालोत्पन्न घटाभावविषयत्वाभावेनादोषात् । न च तहि कथं तद्वति तदभाववत्ताप्रतीति-अन्धकार में यह संभव नहीं है । आत्मा में धर्म, धर्म आदि की स्थिति रहते हुए भी उनके अतीन्द्रिय होने से उक्त प्रकार का आत्मा में उनकी सत्ता का आपादन सम्भव नहीं है, इसलिये धर्मादि का अभाव अनुपलब्धि से नहीं जाना जा सकता । इस परिस्थिति में शंका उठती है कि जहाँ पर अधिकरण के साथ इन्द्रिय का संनिकर्ष होता है, वहाँ पर अमाव अनुपलब्धि से गम्य माना जाता है, तब वहां पर तृप्त इन्द्रिय ही भावाकार वृत्ति का भी करण हो जायगा, क्योंकि इन्द्रिय के रहने से वह ज्ञान होगा और इन्द्रिय के न रहने पर वह ज्ञान नहीं होगा, तब ऐसे स्थलों पर अनुपलब्धि की क्या आवश्यकता है? इस शंका का उत्तर यह है कि प्रत्येक पदार्थ के अभाव के प्रतियोगी की अनुपलब्धि भी अभाव के ग्रहण में हेतु क्लुप्त है, तब केवल करण की कल्पना करनी है । इन्द्रिय का अभाव के साथ संनिकर्ष नहीं है, अतः वह अभाव के प्रहण में समर्थ नहीं है । इन्द्रिय के अन्वय और व्यतिरेक का अधिकरण के ज्ञान में उपयोग पूरा हो जाता है, अतः उसकी अभाव के प्रतिकरणता अन्यथा सिद्ध है | अतः अभाव स्थल में योग्यानुप-of की ही करता सम्भव है । पुनः प्रश्न उठता है कि ' भूतल पर घट नहीं है ' इत्यादि अभाव के अनुभव की जगह पर भूतल का प्रत्यक्ष दोनों पक्ष मानते हैं, अतः उसके लिये वृति का बहिर्निर्गमन जरूरी है, ऐसी अवस्था में भूतल से अवच्छिन्न चैतन्य के समान भूतलनिष्ट घटा-Haraf चैतन्य का भी प्रमाता के साथ अभेद हो जाने से घटादि के अभाव का भी प्रत्यक्ष हो जाने से अलग से अनुपलब्धि को प्रमाण मानना व्यर्थ है । उत्तर यह है कि ऐसे स्थलों में अभाव की प्रतीति के प्रत्यक्ष होने पर भी उस प्रतीति की करणभूत अनुपलब्धि एक भिन्न प्रमाण मानी जाती है । इसीलिये ' मैं दसवा हूँ इस ज्ञान के प्रत्यक्ष होने पर भी उस ज्ञान का करण ' दशमस्त्वमसि ' यह वाक्य है, अतः उक्त ज्ञान प्रत्यक्ष न होकर शाब्द बोध माना जाता है । घटादि के अमावस्वरूप वाली वृत्ति इन्द्रिय से उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि उस अभावरूप विषय से इन्द्रिय का संनिकर्ष नहीं है, किन्तु वह चटाद्यनुपलब्धि रूप एक भिन्न प्रमाण से उत्पन्न होती है । यदि आप अभाव की प्रतीति को प्रत्यक्ष मानते हैं तो घट से युक्त भूतल में घटाभाव के भ्रम की भी प्रत्यक्षता की आपत्ति होने पर अनिर्वाच्य घटाभाव मानना पड़ेगा, इस आपत्ति को यदि are स्वीकार करते हैं तो यह दोष आवेगा कि यदि उसको मायो-Train मानेंगे तो उसमें अभावत्व की अनुपपत्ति होगी और यदि माया की उपादान नहीं मानते तो सकल कायों की उपादानता नहीं बनेगी । इस आपत्ति का समाधान यह है कि घटयुक्त भूतल में sertre भ्रम mr faar ae काल उत्पन्न घटाभाव नहीं है, अतः
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२८ वेदार्थपारिजातः रिति वाच्यम्, भूतलरूपादौ विद्यमानस्य लौकिकघटाभावस्य भूतले समारोपात् । आरोप्यसन्निकर्षस्थले सर्वत्रान्यथाख्याते. रेवाभ्युपगमात् । अस्तु वा तद्वति तदभावभ्रमस्यानिर्वाच्यार्थविषयत्वम् । मायोपादानकत्वेऽपि नाभावत्वानुपपत्तिः, उपादानो-पादेययोरत्यन्तसाजात्यानुपपत्तेः । तन्तुपटयोरपि तन्तुत्वपटत्वादिना वैजात्यदर्शनात् । मिथ्यात्वानिर्वचनीयत्वादिना माया-भावयोरपि साजात्योपपत्तेश्च । अन्यथा व्यावहारिकघटाद्यभावं प्रति मायोपादानत्वस्यापि शङ्कनीयत्वापातात् । नन्वेवं विजातीययोरप्युपादानोपादेयत्वे ब्रह्मण एवोपादानत्वमस्त्विति चेन्न प्रपञ्चविभ्रमाधिष्ठानत्वेन तस्येष्ट-त्वात् । परिणामित्वरूपस्योपादानत्वस्य निरवयवे ब्रह्मण्यनुपपत्तेः । प्रपञ्चस्य परिणाम्युपादानं माया न ब्रह्मेति सिद्धान्तात् । प्रमाण - स्वरूपम् तत्र व्युत्पन्नाव्युत्पन्नसन्दिग्धविपर्यस्तानां प्रतिपादनाय प्रमाणमपेक्ष्यते । तत्र अर्थतथात्वप्रकाशकं प्रमाणम्, तस्यार्थाव्यभिचारित्वं प्रामाण्यम् । तस्य यदि प्रमाणान्तरात्प्रसिद्धिस्तदानवस्था । तदन्तरेण चेत् सर्वं सर्वस्येष्टं सिद्धयेत् । तदुक्तम्- ' प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः ' ( गो ० सू ० २।१।१७ ) | यदि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणान्तरेणोप-लभ्यन्ते तर्हि येन प्रमाणेनोपलभ्यन्ते तत्प्रमाणान्तरमस्तीति प्रमाणान्तरसद्भाव: प्रसज्येत । तस्याप्यन्येन तस्याप्यन्ये-नेत्यनवस्था | ' तद्विनिवृत्तेर्वा प्रमाणसिद्धिवत् प्रमेयसिद्धि: । ' ( गो ० सू ० २११११८ ) । यदि प्रमाणाभावेऽपि प्रत्यक्षादिकं सिद्धयेत् तदा प्रमेयोऽपि तथैव किन्न सिद्धयेत्? एवञ्च प्रमाणविलोप एव स्यात् । कोई दोष नहीं होगा । तब घटयुक्त भूतल में घटाभाव की प्रतीति कैसे होती है? इसलिये होती है कि भूतल रूप आदि में freera offee area की प्रतीति का भूतल में समारोप कर लिया जाता है | आरोग्य के सन्निक स्थल में सर्वत्र अन्यथाख्याति मानी जाती है | अपवा घटयुक्त भूतल में घटामात्र के भ्रम को अनिर्वाच्य माना जा सकता है । इसको मायोपादानक मानने पर भी अभाव की अनुपपत्ति नहीं होगी, क्योंकि उपादान और उपादेय का अत्यन्त साजात्य नहीं माना जायगा । तन्तु और पट में मी तन्तुत्य और Tea t area देखा जाता है । मिथ्यात्व और अनिर्वचनीयत्व आदि के कारण माया और अभाव में भी साजात्य हो सकता है । arrer व्यावहारिक घटादि अभाव के प्रति मायोपादानता मी शंका का विषय हो जायगी । यदि विजातीय पदार्थो की मी उपादान - उपादेयता मानी जायगी तो फिर सब पदार्थों के प्रति ब्रह्म की ही उपादानता क्यों न मान ली जाय? इस शंका के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि इस सारे प्रपंच विभ्रम का अधिष्ठान को ही माना जाता है । परिणामित्व रूप उपादान ब्रह्म नहीं हो सकता, क्योंकि वह निरवयव है । प्रपञ्च का परिणामी उपादान माया है, ब्रह्म नहीं, यही सिद्धान्त है । प्रमाणों का प्रयोजन व्युत्पन्न तथा अव्युत्पन्न संदिहान तथा भ्रान्त लोगों को वस्तुतस्त्र के बोध के लिये प्रमाण की आवश्यकता होती है । को वस्तु raft स्थिति को बताने वाला प्रमाण कहलाता है और इसका कहीं मी व्यभिचरित न होना प्रामाण्य कहा जाता है । इस प्रामाण्य nt व्यवस्था यदि प्रमाणान्तर से मानी जाय तो अनवस्था दोष होगा और यदि बिना प्रमाणान्तर के इसका प्रामान्य माना जायगा तो जिसको जो इष्ट है, वही प्रमाण मान लिया जायगा । यही बात ' प्रमाणतः सिद्धे ' इत्यादि न्यायसूत्र में कही गई है । इसका यह अर्थ है कि यदि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों की सिद्धि प्रमाणान्तर से होती है तो ये जिस प्रमाण से उपलब्ध होते हैं, उसके इनसे भिन्न होने से प्रमाणान्तर की सिद्धि होती है, उस प्रमाणान्तर के प्रामाण्य के लिये भी प्रमाणान्तर अपेक्षित होगा और इस प्रकार प्रमाणान्तर को स्वीकार करने पर अनवस्था दोष उपस्थित होगा । इससे आगे के ' सद्विनिवृत्व ' इस सूत्र में बताया गया है कि यदि प्रमाणान्तर के बिना भी प्रत्यक्ष आदि प्रमाण की सिद्धि हो जाती है, तो प्रमाण के समान प्रमेय की भी बिना ही प्रमाण के सिद्धि क्यों नहीं हो जायगी? इस प्रकार तो प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी ।
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वेदार्थपारिजातः २६ अन्येऽप्याहु: -- ननु प्रमाणसंसिद्धिः प्रमाणान्तरतां यदि तदानवस्थितिः, नो चेत्प्रमाणान्वेषणं वृथा, तत्रेष्टानिष्टयोः साधनदूषणान्यथोपपत्या प्रमाणसद्भाव एव । न चैत्रमनवस्था, इष्टसिद्धयनिष्टप्रतिषेधयोः प्रतिप्राणि प्रसिद्धत्वेन प्रमा-णान्तरापेक्षानुपपत्तेः । ' न प्रदीपप्रकाश सिद्धिवत् तत्सिद्धेः ' ( गो ० सू ० २ १११२ ) । नैयायिकसते प्रामाण्यपरतस्त्वेऽपि अर्थ -क्रियादिज्ञानस्याभीष्टसिद्धिरूपत्वात् तत्र प्रमाणान्तरापेक्षा न भवतीति तादृशस्य ज्ञानस्य प्रामाण्यस्वतस्त्वमेव । मीमांसकैस्तु तदेव सर्वेषामपि प्रमाणानां प्रामाण्यं स्वत एवाभ्युपेयते । प्रमाणञ्च सम्यग् ज्ञानमिति केचित् । परे तु प्रमाणमविसंवादि ज्ञानम्, अनधिगताधिगमलक्षणत्वात् । केचित्तु प्रमाणं स्वपराभासि ज्ञानं बाधविवर्जितम् अनधिगताबाधितार्थविषयज्ञानं प्रमाणमिति च । प्रामाण्यविचारः तत्र प्रामाण्यमप्रामाण्यवोभयं स्वत इति सांख्याः । उभयं परत इति तार्किकाः । अप्रामाण्यं स्वतः प्रामाण्यं परत इति बौद्धाः । प्रामाण्यं स्वतः, अप्रामाण्यं परत इति मीमांसकाः । यत्तु - ' किमिदं प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वम्? न स्वत एव जन्म, स्वस्य स्वहेतुत्वविरोधात् । न वा प्रमाणादेव प्रामाण्यस्य जन्म तत्त्वम्, ज्ञानस्य गुणत्वेन स्वप्रामाण्यं प्रति समवायिकारणत्वानुपपत्तेः । नापि ज्ञानसामग्रीतो जन्म, तस्यो-पाधित्वे जातित्वे च जन्मासम्भवात् । अनधिगतार्थविषयस्य ज्ञानस्य बाधात्यन्ताभावस्य प्रामाण्ये न तज्जन्म सम्भवति, अन्य दार्शनिकों ने भी कहा है कि प्रमाण को सिद्धि यदि प्रमाणान्तर से मानी जायेगी तो अनवस्था होगी, यदि प्रमाणान्तर को अपेक्षा नहीं है, तो प्रमाण को खोज भी व्यर्थ हो जायगी । इष्ट को सिद्धि और अनिष्ट के परिहार के कारण प्रमाण की सत्ता मान ली जायगी । इसमें अनवस्था दोष इस लिये नहीं होगा कि इष्ट सिद्धि और अनिष्ट परिहार ऐसी प्रवृत्तियों है, जो कि प्रत्येक प्राणी को बात है, अतः यहाँपर दूसरे प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी । यही बात न्यायसूत्र में इस प्रकार कही गई है कि प्रदीप के प्रकाश की तरह उसकी सिद्धि होती है, अर्थात् दीपक जैसे अपने प्रकाश से दूसरे को प्रकाशित करता है और स्वयं भी प्रकाशित होता है, उसी तरह प्रमाण भी दूसरे को प्रकाशित करता है और स्वयं भी प्रकाशित होता है । नैयायिक के मत में प्रमाण का प्रामाण्य प्रमाणान्तर से ज्ञात होता है, तो भी अर्थक्रयाज्ञान से अभीष्ट सिद्धि हो जाती है, अतः यहाँ पर दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती । फलतः ऐसे स्थलों में ज्ञान का प्रामाण्य स्वतः ही गृहीत होता है । मीमांसकों का कहना है कि इस एक उदाहरण से ही सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः ज्ञात हो जाता है । कुछ लोग सम्यक् ज्ञान को प्रमाण कहते हैं, अन्य लोगों का कहना है कि प्रमाण उस ज्ञान को कहते हैं, जो कि जागे चलकर परस्पर विरोधी न हो जाय, क्योंकि जो अब तक ज्ञात नहीं है, उसका परिशान प्रमाण से होता है | अतः जो ज्ञात हुआ, उसका जागे बाध न होना प्रमाण की आवश्यक शर्त है । कुछ लोग प्रमाण का लक्षण यह करते हैं कि वह अपने को, दूसरों को भी अवभासित होने वाला बाधराहत ज्ञान है, अथवा अनधिगत और अबाधित वस्तुविषयक ज्ञान को प्रमाण कहते हैं । प्रामाण्य विचार सांख्य दर्शन के अनुयायियों का कहना है कि प्रमाण का प्रामाण्य और अमामा दोनों स्वतः परिगृहोत होते हैं । नैयायिकों का कहना है कि ये दोनों परतः परिगृहीत होते हैं । बौद्धों का कहना है कि aurat स्वतः और प्रामाण्य परितः गृहीत होता है । इसके farta itni कहते हैं कि प्रामाण्य स्वतः और अप्रामाण्य परतः ग्राह्य है । यहाँ पर शंका उठती है कि प्रामाण्य का स्वतस्य क्या है? अपने से जन्म होता स्वतस्त्व नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कोई वस्तु स्वतः अपना कारण नहीं हो सकती । यदि स्वतस्त्व का यह अर्थ किया जाय कि उसी प्रमाण से प्रामाण्य का भी जन्म होता है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि ज्ञान तो गुण है, अतः वह अपने प्रामाण्य के प्रति समवायिकारण नहीं हो सकता । ज्ञान की सामग्री से उसका जन्म मानना भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रामाध्य के उपाधि अथवा जाति होने से उसका जन्म नहीं हो सकता । अनधिगत वस्तु
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३० वैवार्थपारिजातः अत्यन्ताभावत्वादेव | जातिरूपत्वेऽपि नित्यत्वादेव न तज्जन्मसम्भवः । एवं ज्ञानसामग्रीजन्यत्वमपि प्रमाया न प्रामाण्य-स्वतस्त्वम्, अप्रमाया अपि ज्ञानसामग्रीजन्यत्वेनातिप्रसङ्गात् । न च ज्ञानसामग्री मात्रजन्यत्वोक्त्यापि निस्तारः, विकणा-सहत्वात् । तथाहि -- दोषाभावसहकृतज्ञानसामग्री जन्यत्वमाः पदार्थः, दोषासह कृतज्ञानसामग्रीजन्यत्वं वा? नाद्यः परतः प्रामाण्यवादिमतप्रवेशापतेः । न द्वितीयः, विशेषदर्शनस्य भ्रमनिवृत्तिहेतुत्वे तद्विपर्ययस्य भ्रमहेतुत्ववद दोषसहकृतज्ञानसामग्री-जन्यज्ञानस्याप्रमात्वं प्रमां प्रति दोषाभावस्य हेतुत्वमपि सिद्धत्येव । ननु प्रमासामग्रयां दोषाभावस्याकाशस्येवावर्जनीयतया सान्निध्येऽपि ईश्वरज्ञान इव प्रमायां न हेतुत्वम् । न चेश्वरज्ञाने दोषाभावः प्रयोजकः, तत्प्रयुक्तत्वस्य तदन्तर्गत सामग्रीजन्यत्वानतिरेकात् । न च नित्यस्य तस्य सामग्रीजन्यत्व-मुपपद्यत इति चेन्न, नित्यद्रव्येषु तत्सामग्रीजन्यत्वाभावेऽपि गुणवत्त्वप्रयुक्तद्रव्यत्ववत्तत्प्रयुक्तत्वोपपत्तेः । न च दोषाभावस्या -भावत्वादेवाकारणत्वम्, विशेषदर्शनाभावस्य भ्रमहेतुत्ववदनुपलम्भस्याभावप्रमितिहेतुवत्तदुपपत्तेः । तदुक्तमुदयनाचार्येण-' भावो यथा तथाऽभावः कारणं कार्यवन्मतम् | ' ( न्या ० कु ० १११० ) | न च निःस्वभावत्वेनाभावस्य न कारणत्वम्, तदसिद्धः । सत्तानधिकरणस्य निःस्वभावत्वे सामान्यादीनां बुद्धिकारणत्वासिद्धेः । स्वरूपसत्त्वरहितत्वं त्वभावस्यासिद्धमेव, तदप्युक्तम्- TOTAL ' नसी विधिरूपेण तुच्छ इति स्वरूपेणापि तथा, इतरथा भावस्यापि तथात्वापातात् । किञ्चाभावस्य कार्यत्वानङ्गीकारे प्रध्वंसानुपपत्त्या घटस्य नित्यत्वापत्तिः । यदि कार्यत्वं सम्भवति तर्हि किमपराद्धं कारणत्वेनेति तन्न, विज्ञानसामग्रीजन्यत्वे विषयक ज्ञान को जो कि बाधात्यन्ताभाव का विषय है, प्रामाण्य मानने पर भी उसका जन्म नहीं होगा, क्योंकि जिसका अत्यन्ताभाव होता है, उसका जन्म नहीं होता । इसको जातिरूप मानने पर भी जाति की नित्यता के कारण उसका जन्म नहीं बनेगा । प्रमा की सामग्री से जन्म होना भी प्रामाण्य का स्वतस्त्व नहीं माना जायगा, क्योंकि अप्रमा का जन्म भी ज्ञान की सामग्री से होता है । यतः लक्षण में अतिप्रसंग दोष आवेगा । इस लक्षण में ज्ञान सामग्री मात्र से जन्म होना, यह जोड़ने पर मी दोष का परिहार नहीं होता । क्योंकि उस परिस्थिति में भी आगे दिये गये विकल्प का कोई उत्तर नहीं बनता । जैसे कि दोषाभाव सहकृत ज्ञानसामग्री से जन्यता उपर्युक्त लक्षण का अर्थ है या दोष से असहकृत ज्ञानसामग्री से अन्यता? पहला पक्ष मानने पर परतः प्रामाण्यवादी के पक्ष में प्रवेश हो जायगा | दूसरे पक्ष में विशेष दर्शन को भ्रम की निवृत्ति में कारण मानने पर अविशेष दर्शन के भ्रम का हेतु होने से उसी तरह दीप-सहकृत ज्ञानसामग्री से उत्पन्न ज्ञान के अत्रमा में कारण होने से प्रमा के प्रति दोषाभाव की हेतुता स्वतः सिद्ध हो जायगी । प्रमा की सामग्री में आकाश के समान दोषाभाव की भी स्थिति अपरिहार्य है, अतः उसकी सन्निधि में भी ईश्वर के ज्ञान के समान उसकी प्रा के प्रति कारणता नहीं बन सकेगी । ईश्वर के ज्ञान में भी दोषाभाव को प्रयोजक नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोषाभावप्रयुक्तत्व भी दोषभावयुक्त सामग्री से जन्यत्व के अतिरिक्त नहीं है । ईश्वर का ज्ञान तो नित्य है, a तः उसकी सामग्रीरन्यता नहीं बनेगी | इसका उत्तर यह है कि free द्रव्यों में उस सामग्री से जन्यता के अभाव में भी गुणवत्व से प्रयुक्त द्रव्यत्व के समान दोषा-भक्त की उपपत्ति हो जायगी । यह कहना मी ठीक नहीं है कि दोषाभाव तो अभाव है, अतः वह किसी का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि जैसे विशेष दर्शन का अभाव भ्रम का कारण होता है, अनुपलम्भ जैसे अभाव की प्रभिति का हेतु होता है, उसी तरह दोषाभाव की मी कारणता बन सकती है । उदयनाचार्य ने यही बात कही है --- " भाव के समान अभाव भी कारण और कार्य दोनों अवस्थाओं में देखा जाता है । " अभाव तो नि: स्वभाव है, अत: उसकी कारणता कैसे सिद्ध होगी? इस तरह से कि उसकी नि: स्वभावता ही सिद्ध है | सता के अनधिकरण को यदि निःस्वभाव कहा जाय तो सामान्य प्रभृति की बुद्धि के प्रति कारणता भी सिद्ध नहीं होगी । arre की career का भी निषेध तो नहीं किया जा सकता । यही बात यहाँ पर कही गई है - " अभाव का कोई free होने से उसका कोई स्वरूप हो नहीं बनेगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता, Feet are में at ाय स्वरूप की अविद्यमानता का दोष aar | अभाव को कार्य न मानने में यह एक दोष और आवेगा कि प्रभाव की उपपत्ति नहीं बनेगी और फलतः घट को fre य मानना पड़ेगा । यदि अभाव में कार्यता बन सकती है, तो फिर कारणता ने क्या अपराध किया है कि वह नहीं बनेगी? यह कथन ठीक नहीं है । विज्ञान सामग्री मात्र से उत्पन्न होता हुआ तदरिरिक्त सामग्री की अपेक्षा नहीं रखता हो, यही प्रामाण्य का स्वतस्त्व है, ऐसा