वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 681–690

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 681–690

पृष्ठ 681

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वेदार्थपारिजातः श्रुतंकारणत्वं हातव्यम् । यागभावनाया एव हि फलवत्या यागलक्षणस्वकरणावान्तरव्यापारत्वाद् देवताभोजन-प्रसादादीनाम्, कृषिकर्मण इव तत्तदवान्तरव्यापारस्य सस्याधिगमसाधनत्वम् । यथा वाग्नेयादीनामिवोत्पत्तिपरमा-पूर्वावान्तरव्यापाराणां पूर्वमीमांसकमते स्वर्गसाधनत्वम् । अत्रायमभिप्राय: – ' देवता वा प्रयोजयेदतिथिवद्भोजनस्य तदर्थत्वात् ' ( जै ० सू ० ६ | १ | ६ ) इत्यत्र देवता धर्मान् प्रयोजयेदतिथिवद्भोजनस्य यागस्य तदर्थत्वात् । यथातिथिप्रीत्यर्था आतिथ्यधर्मास्तथैव देवताप्रीत्यर्था यागधर्माः । तेन देवताविग्रहादीनां यथाविध्युद्देशोपयोगस्तथैव फलनिर्देशोपयोगोऽपि । न च प्रयाजवाक्यवद्देवताविग्रहादावप्यन वान्तरतात्पर्यमस्त्विति वाच्यम्, अर्थवादानां स्तुताववान्तरतात्पर्येऽवश्यवक्तव्ये प्रतीतमात्रतया स्तुत्युपकारिणि तद्द्द्वारभूतेऽप्यवान्तरतात्पर्यकल्पनस्यायुक्तत्वात् । तदभावेऽपि मानान्तरप्राप्तिबाधरूपापवादराहित्यप्रतिष्ठितीत्सर्गिक-प्रामाण्यवाद् देवता विग्रहादिसिद्धौ तत एव देवताध्यानविधेर्देवता सायुज्यादिफलनिर्देशस्य चापेक्षाशान्त्या देवता-विग्रहादितात्पर्यवद् वाक्यान्तरकल्पनस्यार्थवादपदवृन्दस्यैवावान्तरतात्पर्यकल्पनस्य चानपेक्षितत्वात् फलनिर्देशा-पेक्षित देवता विग्रहादिवाक्य प्रामाण्यस्यावश्याभ्युपगन्तव्यत्वेन तद्द्बलेनैव व्युत्पत्तिविरोधस्य परिहारात् । न चावान्तर-तात्पर्यस्याप्यभावेऽतत्परस्य वाक्यस्य कथं देवताविग्रहादिसत्त्वे प्रामाण्यम्, ' विषं भुङ्क्ष्व ' इति वाक्यस्य विषभक्षणे-प्रामाण्यवद् इति वाच्यम्, विषभक्षणवाक्यस्य लोकतो विरोधादप्रामाण्येऽपि प्रकृते विरोधाभावेन प्रामाण्यस्योक्त-त्वात् । न चातत्परत्वेन देवता विग्रहारविवक्षितत्वापत्तिरिति वाच्यम्, अवान्तरतात्पर्येऽपि दोषाभावात् । यत्तु इन्द्रादिशब्दविषयो भविष्यत्युद्देशः, ' ऐन्द्रं दधि ' इत्यादी प्रथमोपस्थितस्येन्द्रशब्दस्य देवतात्वेनान्वयसम्भवे तदधीनचरमोपस्थिति कस्यार्थस्य देवतात्वेन कल्पनाऽयोगात् । शब्दकार्यासम्भव एवार्थे कार्यविज्ञानात् प्रसिद्धज्योति-कारणता को छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि देवता भोजन, प्रसाद नादि फलवती यागभावना के ही यागलक्षण साधन के अवान्तर व्यापार हैं, जैसे कि कृषि कर्म के अवान्तर व्यापारों की अन्न की उपलब्धि में कारणता होती है । अथवा जैसे पूर्व मीमांसक के मत में परमापूर्व की उत्पत्ति में आग्नेयादि अवान्तर व्यापारों की साधनता होती है । इसका अभिप्राय यह है- ' देवता वा ' इत्यादि जैमिनि सूत्र में बताया गया है कि देवता धर्मों को फलदान के प्रति उन्मुख करेगा, क्योंकि जैसे भोजन अतिथि के लिये होता है, उसी तरह याग देवता के लिये है । आतिथ्य धर्म जैसे अतिथि को प्रसन्नता के लिये है, उसी भांति यागधर्म देवता की प्रीति के लिये है । इससे देवता के विग्रह का जैसे विधि को उद्दिष्ट कर उपयोग होता है, उसी तरह फल निर्देश में भी उपयोग होगा । प्रयाज वाक्य के समान देवता के विग्रह आदि में भी अवान्तर तात्पर्य नहीं होगा, क्योंकि अर्थवाद arrator स्तुति में वान्तर तात्पर्य बताना ही पड़ेगा, ऐसी दशा में ज्ञानमात्र से स्तुति के उपकारक ( द्वारभूत ) विग्रहादि में भवान्तर व्यापार की कल्पना अयुक्त होगी । अवान्तर तात्पर्य की कल्पना के बिना भी मानान्तर प्राप्ति के बाघक अपवाद की अनुपस्थिति में जिसका प्रामाण्य प्रतिष्ठित है, ऐसे उत्सर्ग नियम से देवता के विग्रह के सिद्ध होने से और इसी से देवता की ध्यानविधि और देवता सामान्य रूपी फलनिर्देश की अपेक्षा की शान्ति हो जाने से देवता के विग्रह में तात्पर्य प्रतिपादक वाक्यान्तर कल्पना की और अर्थवाद के पदसमूह के अवान्तर तात्पर्य की कल्पना की अपेक्षा नहीं रहती, किन्तु फलनिर्देश के लिये अपेक्षित देवता के विग्रह प्रतिपादक वाक्य की प्रामाणि कता अवश्य स्वीकार करनी पड़ेगी, इसी से व्युत्पत्ति के विरोध का परिहार भी हो जायगा । प्रश्न है कि अवान्तर तात्पर्य के अभाव में अतत्पर वाक्य का देवता विग्रह की सत्ता में प्रामाण्य कैसे होगा? जैसे कि ' विष खाओ ' इस वाक्य में विषभक्षण में तात्पर्य न रहने से प्रामाण्य बोध नहीं होता । उत्तर है कि विषभक्षण वाक्य में लोक से विरोध होने से अप्रामाण्य होगा, प्रकृत में कोई विरोध न होने से वह प्रामाणिक ही माना जायगा । अतत्पर वाक्य की देवता के विग्रह प्रतिपादन में अविवक्षा रहने पर भी अवान्तर तात्पर्य मानने में कोई दोष नहीं है । कहा गया है कि इन्द्रादि शब्द विषयक उद्देश्य मान लिया जायगा, क्योंकि ' दही इन्द्र का है ' यहाँ पर प्रथम उपस्थित इन्द्र शब्द का देवता के साथ अन्वय हो जाने पर उसके अधीन होकर बाद में उपस्थित होने वाले अर्थ को देवता मानना अनुचित है ।

पृष्ठ 682

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६५२ वेदार्थपारिजातः रादिविषयो भविष्यत्युद्देशो न विग्रहवती देवता । नाश्वमेधे यन्महसि तस्मै स्वाहा, यच्छकृत्करोषि तस्मै स्वाहा, इत्यादिमन्त्रानुष्ठेयहोमानां प्रसिद्ध मेध्वाश्वमूत्रपुरीषात्मकमन्तरेणोद्देश्यमस्तीति, तदपि न युक्तम्, शब्दस्याचेतनस्य ज्योतिरादेर्वा देवतात्वं तत्र देवतादर्शनसम्भाषणादिफलकर्मोपासनादिविधीनामप्रामाण्यप्रसङ्गेन सङ्कर्षादिषु तथोक्तेरभ्यु-पगमवादत्वात् ( अग्वारुह्यवादत्वात् ), प्रथमोपस्थिते शब्दे कार्यान्वयस्यात्सगिकत्वे ऋचि प्रणवं दधातोत्यत्रापि प्रणव-शब्दस्यैवानुवाकान्ते निधानापत्या तदर्थस्योङ्कारस्य निधानं व्यवस्थापयता सङ्कर्षगतेनाधिकरणान्तरेण विरोधापत्तेश्च । नन्वतिथेरातिथ्यवद् देवताप्रीत्यर्थी याग इति यदुक्तम्, तत् ' अतिथी तत्प्रधानत्वं भावः कर्मणि स्यात् तस्य प्रीतिविधानत्वात् ' ( जै ० सू ० ६ | १ | १० ) इति सूत्रेण विरुद्धयते । अत्र यज्ञस्य आतिथ्यवैषम्यमुक्तम्, न तु देवताप्रीत्यर्थो यज्ञ इति तत्र दर्शितम्, तथा च देवताप्रीत्यर्थो यज्ञ इति विरुद्धयते इति चेन्न, प्रीतिविधानादिति हेतोरर्थानभिज्ञानात् । तत्र येन येन यावताऽतिथिः प्रीयते, तेन तेन द्रव्येण तावता स पूजनीय इत्यातिथ्यं कर्मातिथिप्रधानं भवति, यज्ञकर्मणि तु येन द्रव्येण यावता वा देवता प्रीयते तावता सा पूजनीयेति प्रीतिविधानं नास्ति, किन्तु देवर्तक्येऽपि तत्तत्कर्मविशेष + व्यवस्थिते राज्यचरुपुरोडाशादिभिश्चतुर्गृ हीतद्वयावदानादिपरिमितः स्वरुभिरनदनीयः प्रस्तरादिभिश्च यष्टव्यमित्येव विधानम् । अतस्तस्य प्रीतिविधानत्वादिनि हेतुना विरोधः । परं सिद्धान्ते तु स विरोधो नास्त्येव । विहितद्रव्येरेव ' एतद्वै दैव्यं मधु यद् घृतम्, तद्वै देवा हविर्जुषन्ते + अल्पामध्येका माहुतिमपि तद् गिरिमात्रं वर्धयन्ते ' इत्याद्यर्थवाददर्शनेन हविषां देवतोचितद्रव्यरूपेण देवताभोजनपर्याप्तपरिमाणेन च विपरिणतिमङ्गीकृत्य देवताप्रीत्यर्थत्वसमर्थनात् । तस्मादस्मिन् पक्षेऽप्यातिथ्यम्यायेन तत्तदेवताप्रीतिकरद्रव्यपरिणामविधान मनपेक्षितम्, विहिर्तरेव प्रीतिविधानस्यो-शब्द में कार्य न होने से ही अर्थ में कार्य होगा । इस तरह प्रसिद्ध ज्योतिरादि अर्थ में ही कार्य संपन्न होगा, देवता को विग्रहवती मानना उचित नहीं है । अश्वमेध याग के प्रकरण में जो ' तुम सूत्र करते हो उसके लिये हवि देते हैं, जो तुम लीद करते हो उसके लिये हवि देते हैं ' इत्यादि मन्त्रों से अनुष्ठीयमान होम का उद्देश्य प्रसिद्ध अश्वमेध यज्ञ के अश्व के मूत्र और पुरीष से भिन्न और कुछ नहीं हैं । यह उक्त इसलिये ठीक नहीं है कि अचेतन शब्द अथवा ज्योतिरादि को देवता मानने पर कर्मानुष्ठान का देवता को देखने - सुनने, उनसे बात करने आदि फल को बताने वाले वाक्य अप्रामाणिक हो जायेंगे, इसी अभिप्राय से संकर्ष काण्ड में इस प्रकार की उक्ति को केवल अभ्युपगम वाद कहा हैं । प्रथम उपस्थित शब्द में ही यदि कर्मानुष्ठान का उत्सर्ग मान लिया जायगा, तो ऋचा में प्रणव का विधान करता है ' इस स्थल में अनुवाक के अन्त में प्रणव शब्द का निधान करना पड़ेगा और इससे प्रणव के अर्थ ओंकार का निधान बताने वाले संकर्ष arus के एक अन्य अधिकरण से विरोध होगा । प्रश्न कि अतिथि सत्कार जैसे अतिथि की प्रसन्नता के लिये होता है, उसी तरह याग भी देवता की प्रीति के लिये है, इस उक्ति का ' अतिथी तस्प्रधानत्वं ' इत्यादि मीमांसा सूत्र से विरोध होगा । इस सूत्र में यज्ञ की आतिथ्य से भिन्न स्थिति बताई गई है कि देवता के प्रीति के लिये नहीं है । इसका उत्तर है कि ' प्रीतिविधानात् ' इस हेतु का अर्थ ठीक से न समझ कर यह आपत्ति की जाती है । उस सूत्र में जिस - जिस और जितने द्रव्य से अतिथि प्रसन्न हो, उतने से उसकी पूजा करनी चाहिये, इस प्रकार आतिथ्य कर्म प्रधानता अतिथि के लिये ही हैं । यज्ञ कर्म में तो जितने परिमाण के जिस द्रव्य से देवता प्रसन्न हो, उतने से उसकी पूजा करनी चाहिये, इस प्रकार का विधान नहीं है । वहाँ पर विधान इस बात का है कि एक देवता के लिये भी उस उस विशेष याग के लिये निर्धारित आज्य, रु और पुरोडाश से, चतुर्गृहीत द्वयावदान आदि परिमित स्वरूप से और अभक्षणीय प्रस्तर आदि से यज्ञ करना चाहिये | इसलिये इसका प्रतिविधान हेतु से विरोध होगा । हमारे मत में यह आपत्ति उपस्थित नहीं होगी, क्योंकि ' घृत देवताओं का अमृत है । देवता जिस हवि का ग्रहण करते हैं, उस थोड़ी सी एक आहुति को भी वे पर्वत के बराबर बढ़ा लेते हैं ' इस अर्थवाद वाक्य के अनुसार विहित द्रव्यों की afa का देवता के लिये उचित द्रव्य के रूप में उसको तृप्ति पर्यन्त भोजन में परिणति स्वीकार कर उसकी देवताप्रीतिजनकता का समर्थन किया जा सकता है । इसलिये इस पक्ष में भी आतिथ्यन्याय से उस उस देवता के प्रीतिकारक द्रव्यों का विधान अनपेक्षित है, क्योंकि

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वार्थपारिजातः ६५३ तत्वात् । अत एव - अपि वा शब्दपूर्वत्वात् यज्ञकर्मप्रधानं गुणत्वे देवताश्रुतिः ' इति सूत्रविरोधोऽपि नास्ति, उद्देश्यत्वेन देवताया गुणत्वस्वीकारात् । सूत्रार्थस्तु -- यज्ञकर्म प्रधानमङ्गग्राहि न देवता, ' यजेत स्वर्गकाम: ' इति यागफलसाधनतायाः शब्दपूर्वत्वात् । देवता तद्देश्यत्वाद् भूतस्य भव्यस्य यागस्य गुण इति देवताशब्दो गुणत्वे वर्तते । बादरायणरीत्या तु ' सर्वे वेदा यत्पदमामनम्ति ' ( का ० उ ० १ २ १५ ), ' वेदेश्व सर्वैरहमेव वेद्यः ' ( भ ० गी ० १५/१५ ), ' तत्तु समन्वयात् ' ( ब्र ० सू ० ११११४ ) इत्यादिप्रमाणैर्मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य सर्वस्यैव वेदस्यै-कस्मिन् परमे देवे ब्रह्मण्येव महातात्पर्याभ्युपगमात् तदङ्गभूतेषु देवेष्वपि तात्पर्यमस्त्येव । तत एव श्रुति स्मृति- इतिहास-पुराण -दर्शन- तर्क - भक्तलोकप्रत्यक्षसिद्धमेव देवतातस्त्वमिति मन्तव्यम् । शास्त्रविहित कर्मोपासनादिमन्तरा असिद्धत्वा-देवाज्ञातज्ञापकत्वमपि वेदानामक्षुण्णमेव । विधिलात् पृथिव्यां पात्रत्वं समुद्रे सोमत्वं यथा भाव्यते, तथैव स्वरुप्रस्तरादिष्वपि विधिवलात् तृप्तिकरत्वं सम्पद्यते । तथाहि ' लिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि बलायस्तदपि ' ( ब्र ० सू ० ३१३ | ४४ ) इत्यत्र विचारितम् - ' नैव वा इदम आसीत् ' इत्येतस्मिन् ब्राह्मणे मनोऽधिकृत्याधीयते तत् षट्त्रिंशत्सहस्राण्यपश्यदात्मनोऽनीनर्कान् मनोमयान् मनश्चित: ' इत्यादि । तथैव ' वाक्चितः प्राणचितश्चक्षुश्चितः श्रोत्रचितः कर्मचितोऽग्निचित: ' इति पृथगग्नीन् साम्पा. दिकानामनन्ति । तत्र संशयः - किमेते मनचिदादयः क्रियानुप्रवेशिनस्तच्छेषभूताः उत स्वतन्त्राः केवलविद्यात्मका इति । तत्रास्मिन् ब्राह्मणे भूयांसि लिङ्गान्येषां केवलविद्यात्मकत्वमुपोवलयन्ति दृश्यन्ते - ' तद्यत्किञ्चेमानि भूतानि मनसा सङ्कल्पयन्ति तेषामेव सा कृति: ' इति । ' तान् हैतानेवंविदे सर्वदा सर्वाणि भूतानि चिश्वन्त्यपि स्वपते ' इति चैवं-जातीयकानि । लिङ्गं च प्रकरणाद् बलीय इति पूर्वपक्षे प्राप्ते सिद्धान्तः - ' पूर्वविकल्पः प्रकरणात् स्यात् क्रियामानसवत् ' विहित द्रव्यों से ही देवता प्रसन्न होंगे । इसीलिए ' अपि वा ' इत्यादि मीमांसा सूत्र से भी कोई विरोध नहीं होगा, क्योंकि यज्ञ कर्म को उद्दिष्ट कर देवता की गौणता हमने भी मान रखी है । इस सूत्र का अर्थ यह है कि यज्ञ कर्म में प्रधानता है, क्योंकि वही अंगों का आक्षेप करता है, देवता नहीं । ' स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे ' यहाँ पर याग की स्वर्गसाधनता शब्द से ज्ञात होती है । देवता यहाँ पर उद्देश्य हैं, भूत है, अतः देवता के भव्य याग का गुण होने से देवता शब्द को भी गौणी वृत्ति है । बादरायण के मत से तो ' सब वेद उसी ब्रह्म के स्थान को बताते हैं ', ' सभी वेदों से मैं ही जानने योग्य हूँ ', ' समस्त वेदान्त वाक्यों के तात्पर्य का समन्वय ब्रह्म में ही है ' इत्यादि प्रमाणों के आधार पर मन्त्रब्राह्मणात्मक संपूर्ण वेद का महावात्पर्य एक * " मात्र परम देव ब्रह्म में ही स्वीकार किया जाता है, अतः उम परम देव के अंगभूत अन्य देवताओं में भी उनका तात्पर्य है ही । इसीलिये श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण, दर्शन, तर्क एवं भक्त लोगों के प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर भी देवता का स्वरूप सिद्ध है । raffe कर्मोपासना के बिना इस स्वरूप का बोध नहीं हो सकता, अतः विधि की अज्ञात वस्तु की ज्ञापकता वेदों में बिना बाधा के विद्यमान है । fafa के प्रमाण से पृथिवी में पात्र की तथा समुद्र में सोम की भावना की जाती है, उसी तरह विधि के प्रमाण से ही स्वरूप और प्रस्तर आदि में भी देवता को तृप्त करने वाले गुण की भावना की जाती है । ' सिङ्गभूयस्त्वात् ' इत्यादि वेदान्तसूत्र में विचार किया गया है कि ' उत्पत्ति के पूर्व यह नहीं था ' इस ब्राह्मण वाक्य में मन को प्रस्तुत कर ' उस मन ने अपने अर्चनीय, मनोमय, मन में संजोयी गयी, छत्तीस सहस्र अग्नियों को देखा ' तथा ' वाणी में, प्राण में चक्षु में, श्रोत्र में और कर्म में संजोई गई अग्नियों को देखा ' इस प्रकार भिन्न - भिन्न सांपादिक अग्नियों का विधान है । यहाँ पर संशय होता है कि क्या ये मनचित् आदि क्रिया में अनुप्रवेश कर उस कर्म के अंगभूत होते हैं या स्वतन्त्र रूप से केवल विद्यात्मक है? इस ब्राह्मण में विद्यमान अनेक लिंग ये अस्तियाँ har fources हैं, ऐसा समर्थन करते हुए देखे गये हैं, जैसे कि ' ये भूत प्राणी मन से जो कुछ संकल्प करते हैं, वह उन अग्नियों का ही काम हैं ' तथा ' ऐसी उपासना करने वाला यदि सोया हुआ हो, तो भी उसके लिये सभी भूत सदा उन अग्नियों का चयन करते हैं ' इत्यादि । लिङ्ग प्रकरण से बलवान् होता है, इस पूर्वपक्ष की उपस्थिति में ' पूर्वविकल्प: ' इत्यादि सूत्र से यह सिद्धान्त स्थिर

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६५४ वार्थपारिजातः ( ब्र ० सू ० ३ | ४ | ४५ ) अर्थाद् नैतद्युक्तम्, स्वतन्त्रा अनभ्यशेषभूता अग्नयः, पूर्वस्य क्रियामयस्याग्नेः प्रकरणात् तस्मा-तद्विषय एवायं विकल्पविशेषो न स्वतन्त्रः । तस्मात् साम्पादिका अप्येतेऽग्नयः प्रकरणात् क्रियानुप्रवेशिन एव स्यु-मनिसवत् । यथा दशरात्रस्य दशमेऽहम्यविवाक्ये पृथिव्या पात्रेण समुद्रस्य सोमस्य प्रजापतये देवतायै गृह्यमाणस्य ग्रहणासादनहवनाहरणोपह्वान भक्षणानि मानसाम्येवाम्नायन्ते । स च मानसोऽपि ग्रहकल्पः क्रियाप्रकरणात् क्रियाशेष एव । भामत्युद्धृतश्रुतिस्त्वित्थम् - ' द्वादशाहे तु श्रूयते अनया त्वा पात्रेण समुद्रं रसया प्राजापत्यं मनोग्रहं गृह्णाति ' । ra पृथिव्यां ग्रहबुद्धिः समुद्रे सोमबुद्धिः क्रियते । केचित्तु ' विद्वांसो हि देवा: ' ( पृ ० ९ ३ ) इत्याश्रित्य विदुषो मनुष्यानेव देवान् वदन्ति तन्न, पूर्वोक्त-देवनिष्ठवैलक्षण्यानां मनुष्येष्वसम्भवात् । ' देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ' ( भ ० गी ० ३ | ११ ) इत्यत्र देवानां मनुष्याणां च परस्परभावनेन यज्ञैर्देवानामिज्यत्वमुक्तम् । न चात्र विद्वांसो मनुष्या एव देवा: सम्भवन्ति, यज्ञकर्तॄणां मनुष्याणामपि विद्वस्वेनोभयेषां देवत्वे भेदानुपपत्तेः । तस्मान्नात्र मूर्खा मनुष्या विद्वांसो देवा इत्युक्त्या समाधानं सम्भवति । अत एव मनुष्या यज्ञैर्देवान् मनुष्यविलक्षणान् दिव्यैश्वर्यभाजो यजन्ति । ते च देवा वृष्ट्यादि-द्वारा s भीष्टप्रदानेन मनुष्येभ्य उपकुर्वन्ति । अत एव मनुष्यादिवद् योनिविशेषा एव देवा इति मन्तव्यम् । ' विद्वांसो हि देवा: ', ' सत्यसंहिता वै देवा: ', ' अनृतं मनुष्याः ' इत्यादिवचनैनं विद्वांसः सत्यनिष्ठा वा मनुष्या एव देवाः, वचनान्तर-विरोधात् । अतोऽनयोर्वचनयोरयमर्थी ज्ञेयः -- मनुष्या विद्वांसोऽविद्वांसश्च भवन्ति, देवास्तु विद्वांस एव नाविद्वांसः । मनुष्याः सत्यसंहिता अनृताश्च भवन्ति, देवास्तु सत्यसंहिता एव भवन्ति नानृता इति । किया गया है कि यह जो कहा गया है कि ये अग्नियाँ अन्य का अंग न होकर स्वतन्त्र हैं, यह युक्त नहीं है, क्योंकि पहले क्रियामय अग्नि का प्रकरण होने से यह विकल्प विशेष का उपदेश भी तद्विषयक ही होना चाहिये, स्वतन्त्र नहीं । इसलिये सांपादिक होती हुई भी ये अग्नियाँ प्रकरण से मन के समान क्रिया में अनुप्रवेश करने वाली हो होनी चाहिये । जैसे दशरात्र क्रतु के दसवें दिन पृथिवीरूप पात्र से गृह्यमाण समुद्ररूप सोम का प्रजापति देवता के लिये ग्रहण, आसादन, हवन, आहरण, उपह्वान और भक्षण आदि केवल मानसिक ही श्रुति में कहे गये हैं । जैसे वह मानस ग्रहकल्प क्रिया प्रकरण से क्रिया का अंग होता है, इसी तरह यह अग्निकल्प भी क्रिया का ही अंग होगा । भामती में उद्धृत इस श्रुति का पूरा स्वरूप यहाँ दिया गया है । यहाँ पर पृथिवी में ग्रह अर्थात् पात्र की तथा समुद्र में सोम की भावना की गई है । कुछ लोग ' विद्वांसो हि देवा: ' इस श्रुति के आधार पर विद्वान् मनुष्यों की ही देवता कहते हैं, यह ठीक नहीं है । पहले देवताओं को अनेक विलक्षणताएं बताई गई हैं । ये विशेषताएं मनुष्यों में नहीं हैं । ' इसलिये मनुष्यों को देवताओं की उपासना करनी चाहिये और देवतागण मनुष्यों का उपकार करें इस गीता वाक्य में देवताओं और मनुष्यों की परस्पर भावना में यज्ञों के द्वारा देवता की इज्या ( उपासना ) विहित है । विद्वान् मनुष्यों को ही देवता मानने पर यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले मनुष्य भी विद्वान् हैं, इस प्रकार दोनों के ही देवता होने से परस्पर भेद नहीं रहेगा । इसलिये यहाँ पर यह समाधान भी नहीं हो सकता कि मनुष्य मूर्ख हैं और देवता विद्वान् है । मनुष्य याग आदि करके मनुष्यों से विलक्षण दिव्य ऐश्वर्य वाले देवताओं की उपासना करते हैं और वे देवगण वृष्टि आदि इच्छित वस्तु प्रदान कर मनुष्यों का उपकार करते हैं । इसलिये मनुष्य आदि के समान देवतागण भी योनि विशेष हैं । ' देवतागण विद्वान् है ', ' देवतागण सच बोलते हैं; ' मनुष्य असत्यभाषी है ' इत्यादि वचनों से यह नहीं सिद्ध होता कि विद्वान् और सत्यनिष्ठ मनुष्य ही देवता है, क्योंकि दूसरे वाक्य इस बात के विरोधी उपलब्ध हैं । इसलिये इन वाक्यों का अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये कि मनुष्य विद्वान और मूर्ख दोनों तरह के होते हैं और देवता विद्वान् ही होते हैं, अविद्वान् नहीं । मनुष्य सत्यनिष्ट और अमृतभाषी भी हैं, किन्तु देवता केवल सत्यनिष्ट ही हैं, अनुतभाषी नहीं ।

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*** देवानां मनुष्ययोनिभिन्नत्वे प्रमाणानि --- विश्वेदेवा अमर्त्याः ' ( वा ० स ० २११७ ) अनेन देवाना-ममर्त्यत्वं मनुष्यभिन्नत्वं ज्ञायते । ' सुप्रावीरिख मर्त्यस्तवोतिभि: ' ( अथर्व २० | २५ | १ ) हे इन्द्र! मर्त्यस्तवोतिभि-लीलाभिः सुप्रावी: सुष्ठु रक्षितो भवति । अत्रापि मर्त्यसामान्यस्येन्द्रोपकार्यता विज्ञायते । ' इन्द्रौजिष्ठीजिष्ठस्त्वं देवेष्वस्यजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम् ' ( वा ० सं ० ८१३ ९ ) हे इन्द्र हे ओजिष्ठ, त्वं यथा देवेषु ओजिष्ठः असि तथाहं मनुष्येषु ओजिष्ठो भूयासम् । अत्रापि देवेभ्यो मनुष्याणां भिन्नत्वयुक्तम् । अत्र स्तोता देवेष्विन्द्रस्योजिष्ठत्वं वर्णयन् स्वस्य मनुष्येष्वोजिष्ठत्वं कामयते । ' अमृतानामुत मर्त्यानाम् ' ( ऋ ० सं ० १० | ३३ | ८ ), ' देवानामुत यो मर्त्यानाम् ' ( ऋ ० सं ० ६ १५/१३ ), ' देवा उत मर्त्यासः ' ( ऋ ० सं ०८१४८१ ), ' मानुषीणां विशां देवीनामुत ' ( ऋ ० सं ० ३ | ३४ | २ ), ' देवस्य मर्त्यस्य च ' ( ऋ ० सं ० २/७/२ ), ' पुनर्वै देवा अददुः पुनर्मनुष्या उत ' ( ऋ ० सं ० १० / १० ९ / ६ ), ' देवस्य वा मरुतो मर्त्यस्य बेजानस्य ' ( ऋ ० सं ० ५ | ४८/२० ) अत्र श्रुतौ वाशब्देन भिन्नता बोषिता । ' अग्निर्देवेषु राजत्यग्निर्मर्तेष्वाविशन् ' ( ऋ ० सं ० ५।२५१४ ), ' अदेव आपदिषं दीर्घायो मर्त्यः ' ( ऋ ० सं ० ८ ७०१७ ) अत्र श्रुती मर्त्यस्यादेवत्वमुक्तम्, विदुषां मनुष्याणां देवत्वे तनोपपद्येत । ' देवो न मर्त्यः ' ( ऋ ० सं ० १० १२1१ ) अत्र श्रुती देवस्य मर्त्यभिन्नत्वमुक्तम् । ' नहि देवो न मर्त्यः ' ( ऋ ० सं ० १/१६/२ ) अत्रापि परस्परमसंश्लिष्टाभ्यां द्वाभ्यां नभ्यां द्वयोरत्यन्तभेदो ज्ञायते । ' त्वावाँ अन्यो अस्तीन्द्र देवो न मर्त्यो ज्यायान् ' ( ऋ ० सं ० ६१३०१४ ), कि-देवा वारयन्ते न मर्ताः ' ( ऋऋ ० सं ० ४ १७ / १ ९ ), ' देवानामुन मानुषाणाम् ' ( अथर्ववेदसंहिता ४ | ३० | ३ ), ' यस्मिन् देवा असृजत यस्मिन् मनुष्या उत ' ( अथर्व ० सं ० १२/२/१७ ), अत्र श्रुती उत्तशब्दो देवानां मानुषाणां च भेदवोधकः । ' यत्र देवाश्च मनुष्याश्च ' ( अथर्व ० सं ० १०1८1३४ ) अत्र श्रुतौ चशब्देनापि भेदो बोध्यते । ' ये च देवा असुर ये च मर्ताः ' ( ऋ ० सं ० २/२७/१० ) अत्रापि चशब्देन भेद: । ' देवीर्मनुष्यजा उत ' ( अथर्व ० सं ० ११।६।१६ ) । ' न ते वर्तास्ति राधस इन्द्र देवो न मर्त्यः ' ( अथर्व ० सं ० २०२७१४ ) । अर्थात् हे इन्द्र, यस्मै धनं ददासि तस्य निवारको देवो वा मनुष्यो वा नास्ति । तस्माद् ब्राह्मण उभे वाची वदति, देवीं च मानुषीं च ', देवता मनुष्यों से भिन्न हैं, शास्त्रों में इसके अनेक प्रमाण हैं । जैसे कि ' विश्वेदेव अमर्त्य है ' इस श्रुति से देवताओं की अमर्त्यता अर्थात् मनुष्यभिन्नता ज्ञात होती है । ' हे इन्द्र! मनुष्य तुम्हारी लीलाओं से सुरक्षित है ' यहां पर भी बताया गया है कि मनुष्य मात्र इन्द्र से उपकृत रहता है । ' हे इन्द्र, जैसे तुम देवताओं में अतितेजस्वी हो, वैसे ही मैं भी मनुष्यों में भोजस्वी होऊ ' यहां पर भी देवता से मनुष्य का भेद बताया है । यहां पर स्तोता देवताओं में इन्द्र की ओजस्विता का वर्णन करते हुए मनुष्यों में अपने ओजस्वी होने की कामना करता है । ' अमृतों का अथवा मत्यों का ', ' जो देवताओं का अथवा मनुष्यों का ', ' देवता अथवा मनुष्य ', ' मानुषी प्रजा का ', ' देवता और मनुष्य का ', ' पुनः देवता देते हैं, अथवा पुनः मनुष्य देते हैं ' ' मस्तु देवता का अथवा याजक मनुष्य का ' इन श्रुतियों में ' वा ' शब्द से मनुष्य और देवता का भेद बोधित होता है । ' अग्नि देवताओं में शोभा पाता है, अग्नि मनुष्यों में प्रविष्ट होता है ' श्रुति में मनुष्य को देवता से भिन्न बताया गया है, विद्वान् मनुष्यों को ही देवता मानने पर यह कैसे संभव हो सकता है । ' देव मनुष्य नहीं है ' इस श्रुति में भी देवता मनुष्य से भिन्न बताया गया है । ' न देवता है और न मनुष्य ' यहाँ पर भी परस्पर असंपृक्त दो नकारों से दोनों की अत्यन्त भिन्नता ज्ञात होती है । " हे इन्द्र, तुम से बढ़ कर न कोई देवताओं में है और न मनुष्यों में ', ' उसको न देवता रोक सकते हैं और न मनुष्य ही ', ' देवताओं का अथवा मनुष्यों का ', ' जिसमें देवता अथवा मनुष्य ' ''... इन श्रुतियों में ' उत ' शब्द देवता और मनुष्य में भेद बताता है । ' जहाँ पर देवता और मनुष्य ' यहाँ पर ' च ' शब्द भी दोनों में भेद का ही बोधक हैं । ' ह असुर । जो देवतागण और मनुष्यगण ' यहाँ स्थित ' च ' शब्द भी दोनों का भेदक है । ' देवता से उत्पन्न हुई अथवा मनुष्य से ', ' हे इन्द्र! जिसको तुम वन देना चाहते हो, उससे तुमको रोकने वाला न कोई देवताओं में हैं और न मनुष्यों में ', ' इसलिये ब्राह्मण देवता और मनुष्य दोनों की वाणी बोलता है ', ' देवता, पितृगण और मनुष्यगण जिसका सदा सहारा लेते हैं ', ' देवता, पितृगण, मनुष्य, गन्धर्व और अप्सराएँ '

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६५६ वेदापारिजाता ( काठकसंहिता १४ | ५ ), ' यं देवाः पितरो मनुष्या उपजीवन्ति सर्वदा ' ( अथर्ववेदसंहिता १० | ६ | ३२ ), ' देवा: पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये ' ( अथर्व ० सं ० १० ९ / ९ ) अनयोः श्रुत्योर्देवपितृमानवानां पृथक्त्वोक्त्या तेषां योनिभेदो ज्ञायते । नहि नरस्यैव विदुषो नररूपेणावस्थाने वैशिष्ट्य ' ज्ञायते । तस्माज्जीवन्त एव मनुष्याः पितरः, विद्वांस एव मनुष्या देवा इति कथनं निर्मूलमेव । अपरमपि प्रमाणजालमुपन्यस्यते - ' देवेषूत मानुषेषु ' ( अथर्व ० सं ० ४१२८/५ ), ' अव देवैर्देवकृतमेनोऽ-यक्ष्व मत्यैर्मर्त्यकृतम् ' ( वा ० सं ० २०१८ ) अत्रापि मर्त्यदेवयोभिन्नता बोधिता । ' नहि त्वा शूर देवा न मर्तासो दित्सतम् ' ( सा ० सं ० उ ० २।१।२६।३ ) अर्थात् हे इन्द्र, दित्सन्तं त्वां देवा भर्त्या वा नावरोद्धुं शक्नुवन्ति । ' तस्माद् ब्राह्मणा उभयीं वाचं वदन्ति या च देवानां या च मनुष्याणाम् ' ( नि ० १३/६ ), ' उभये ह वा इदमग्रे सहासुर्देवाश्च मनुष्याश्च ' ( श ० ब्रा ० २२३२४१४ ), ' दिवं पृथिव्या अध्यारुहामाविदाम देवान् स्वज्योति: ' ( वा ० सं ० ८१५२ ) अस्यां श्रुती पृथिव्या भिन्नं द्युलोकं प्राप्य तत्र देवदर्शनमपि जातमित्युच्यते । ' देवो वा मानुषो वा त्वम् ' ( वा ० रा ० यु ० का ० १२५/४३ ), ' रोदनादतिनिःश्वासाद् भूमिसंस्पर्शनादपि । न त्वां देवीमहं मन्ये ॥ ' ( वा ० रा ० सु ० का ० ३३ | १० ) अत्र

श्लोके देवानां लक्षणं सीतायां नास्तीति प्रतिपादितम् । एतदेव लक्षणं कालिदासेन रघुवंशे प्रतिपादितम् - ' महीतल-स्पर्शनमात्रभिन्नमृद्धं हि राज्यं पदमेन्द्रमाहुः ' ( २० म ० का ० २१५० ) । ' तस्य यज्ञस्य सम्पत्त्या तुतुषुर्देवता अपि ।

विस्मयं परमं जग्मुः किमु मानुषयोनयः ॥ ' ( म ० भा ० शा ० प ० ३८।१० ) अत्र मनुष्ययोनेर्देवानां भिन्नता बोधिता । अमरकोषेऽपि मानवयोने: पृथग् देवयोनिगणनम् । यथा - ' विद्याधराप्सरोयक्षरक्षोगन्धर्वकिन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥ ' ( १ | १ | ११ ) | ' बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ ' ( म ० ७१८ ) इति वदता मनुनापि देवनरयोर्भेदो दर्शितः । ' पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् ' इन श्रुतियों में देवता, पितृगण और मनुष्यों का पृथक् परिगणन होने से इनका योनिभेद ज्ञात होता है । विद्वान् मनुष्य यदि मनुष्यरूप में ही अवस्थित रहता है, तो उसमें किसी प्रकार की विशेषता नहीं ज्ञात होती । इसलिये जीवित मनुष्य ही पितृगण हैं और विद्वान् मनुष्य ही देवता हैं, यह कहना निर्मूल, बिना प्रमाण का है । इस विषय में पुन: अनेक प्रमाण दिये जाते हैं । ' देवताओं में अथवा मनुष्यों में ', ' देवताओं के द्वारा किये गये पाप को देवताओं से और मनुष्यों के किये पाप को मनुष्यों से छुड़ा देता है यहाँ पर भी देव और मनुष्य की भिन्नता प्रदर्शित है | ' हे इन्द्र! जब तुम देना चाहते हो तो तुमको न कोई देवता रोक सकता है और न मनुष्य ', ' इसलिये ब्राह्मण देवता और मनुष्य दोनों की वाणी बोलते हैं ', ' देवता और मनुष्य दोनों पहले साथ रहा करते थे ', ' पृथिवी से द्युलोक में जाकर ज्योतिर्मय देवताओं का दर्शन किया ' इस श्रुति में पृथिवी से भित्र द्युलोक में जाकर देवदर्शन प्रतिपादित है । ' तुम देवता हो या मनुष्य ', ' तुम रो रही हो, लम्बी उसासे भर रही हो, पृथ्वी को छूकर खड़ी हुई हो. इससे मैं जानता हूँ कि तुम देवी नहीं हो ' इस श्लोक में देवताओं के लक्षण सीता में नहीं हैं, यह बताया गया है । ' समृद्ध राज्य और ऐन्द्र पद अर्थात् स्वर्ग में केवल इतना ही अन्तर है कि वह पृथ्वीतल का स्पर्श कर रहता है ' रघुवंश के इस श्लोक में कालिदास ने भी इसी बात की ओर संकेत किया है । ' उस यज्ञ की समृद्धि को देख कर देवतागण भी संतुष्ट और परम विस्मित हुए तो फिर मनुष्यों की बात ही क्या है ' यहाँ पर भी मनुष्य योनि को देवताओं से भिन्नता प्रतिपादित हैं । ' विद्याधर, अप्सरस्, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध और भूत ये दस देवयोनियाँ हैं ' अमरकोष के इस श्लोक में भी मानवयोनि देवयोनि का पृथक परिगणन है । ' मनुष्य है, ऐसा सोचकर बालक राजा की भी अवमानना नहीं करनी चाहिये, क्योंकि मनुष्य के रूप में राजा महान् देवता है ' ऐसा कहते हुए मनु ने भी देव और मनुष्य में भेद दिखाया है । ' पितृगण, देवता और मनुष्यों का वेद सनातन चक्षु है ' यहाँ पर मनुष्य पद से साधारण मनुष्यों का वेदरूपी चक्षु से योग न होने से केवल विद्वान् ही परिगृहीत होते

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वेदार्थपारिजातः ६५७ ( म ० १२ २४ ) नात्र मनुष्यपदेन साधारणा मनुष्या उच्यन्ते तेषां सनातनवेदचक्षुष्ट्वायोगात्, विदुषामेव तत्सम्भवात् । ' ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा । नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥ ' ( म ० ४।२१ ) अत्र ऋष्यादियोनिभेदेन मनुष्यदेवादियज्ञभेद उक्तः । ' देवान् मनुष्यान् असुरानुत ऋषीन् ' ( अ ० [ सं ० ८ / ९ / २४ ), ' देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वर्यासि च । ' ( छा ० उ ० ७/२/१ ) अत्रापि पशुपक्ष्यादियोनिभेदवदेव मनुष्यदेवयोरपि योनिभेदो मन्तव्यः । ' देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरोऽसुराः ' ( तै ० आ ० १०/२१११ ), ' तानि वा एतानि चत्वार्यम्भांसि देवा मनुष्याः पितरोऽ • सुरा इति ' ( तै ० ब्रा ० २३८३ ), ' देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः । तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषा त्रिविधा गतिः ॥ ' ( म ० १२।४० ) । देवानां कार्यभेदोऽपि दृश्यते - ' इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् । नह्यस्या अपरं च न जरसा मरते पतिविश्वस्यादिन्द्र उत्तरः || ' ( ऋ ० सं ० २०१८६ । ११ ) इत्यादिभिर्देवस्येन्द्रस्याजरामरणधर्मत्वं विज्ञाप्यते, न चैतन्मनुष्येषु सम्भवति । ' देवा मृत्युमुपाध्नत ' ( अ ० सं ० ११ / ७ / १ ९ ), ' अमृता देवा: ' ( श ० ना ० २ | १ | ३ | ४ ) इत्यनयोः श्रुत्योर्देवानाममृतत्वं श्रूयते । ' मुनिपर्वते गिरी हरितसंकाशे सङ्कल्परमणेऽमरौ उभौ सममसो चराव: ' ( काठकगृह्यसूत्र १२ ) इत्यत्र देवभावं गतयोर्दम्पत्योरमरत्वं श्रूयते । केचित्तु - ' यज्ञेषु मानुषः ' ( ऋ ० सं ० १२४४ | १० ), ' मानुषवसूनि ' ( ऋ ० सं ० १ ९ ८४१२० ), ' दशारित्रो मनुष्यः ' ( ऋ ० सं ० २1१८1१ ) इत्यत्र प्रथमायां श्रुतो अग्नेद्वितीयस्यामिन्द्रस्य तृतीयस्यामिन्द्ररथस्य सामाना-धिकरण्येन प्रयुक्तं मानुषशब्दं मनुष्यशब्दं च दृष्ट्वा देवेषु मनुष्येषु च भेदं नाङ्गीकुर्वन्ति, तन्न युक्तम्, उपर्युक्तश्रुतौ मनुष्येभ्यो हितो मानुष इत्येव मानुषशब्दार्थ: । ' तस्मै हितम् ' ( पा ० सू ० ५।१५ ), ' छन्दसि च ' ( पा ० सू ० ५।१।६७ ), ' हलो यमां यमि लोप: ' ( पा ० सू ० ८ | ४ | ६४ ) इति सूत्रैस्तत्सिद्धिः । तथा ' क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिग्रह्यः क्रम: ' ( यो ० सू ० ४१३३ ) इत्यत्र व्यासभाष्ये -- ' मनुष्यजातिः श्रेयसी न वा श्रेयसीति पृष्टे विभज्य वचनीयः प्रश्नः, पशूनधिकृत्य श्रेयसी देवानृषींश्चाधिकृत्य नेति ' इत्यत्र मनुष्येषु देवेषु च जातिभेद उक्तः । ' देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः ॥ ' ( अ ० सं ० ११ / ९ / २७ ) इति श्रुतौ देवानां हैं । ' मनुष्य ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, बुयज्ञ, पितृयज्ञ आदि का अनुष्ठान यथाशक्ति सदा करता रहे, इनको छोड़े न ' यहाँ पर ऋषि आदि योति के भेद से मनुष्य, देव आदि के निमित्त किये जाने वाले यज्ञों का भेद बताया गया है । ' देवताओं को, मनुष्यों को, असुरों को तथा ऋषियों को ', ' देवों को, मनुष्यों को, पशुओं को और पक्षियों को यहाँ पर भी पशु, पक्षी आदि के योनिभेद के समान ngor और देवों का भी योनिभेद माना है । ' देव, गन्धर्व, मनुष्य, पितृगण और असुर ', ' देव, मनुष्य, पितृगण और असुर ये चार जल हैं ', ' साविक मनुष्ण देवगति को, राजस जन मनुष्य योनि को ओर वास प्रकृति के व्यक्ति तिर्यग्योनि को निश्चय ही पाते हैं, ये ही तीन गतियाँ हैं । ' देवताओं का कार्यभेद भी देखा जाता है । ' इन्द्राणी को मैं सबसे बढ़कर सौभाग्यशालिनी मानता हूँ, जिसका पति कभी मरता नहीं ' इत्यादि श्रुतियों में इन्द्र देवता को अजर, अमर बताया गया है, यह मनुष्यों में संभव नहीं है । ' देवताओं ने मृत्यु को दूर भगा दिया ', ' देवगण अमर हैं ' इन श्रुतियों में देवों को अमरता प्रतिपादित है । ' संकल्प रमणीय हरे भरे मुनिपत गिरि में हम दोनों अमर होकर साथ साथ घूमें ' ' इस काठक श्रुति में देवयोनि में पहुँचे हुए दम्पती की अमरता बताई गई है । कुछ लोग कहते हैं कि ' यज्ञों में मानुष अन्ति ', ' इन्द्र संबन्धी पन ', ' दशारित्र इन्द्र रथ ' इन श्रुतियों में से पहली में अग्नि का, दूसरी में इन्द्र का और तीसरी में इन्द्ररथ के समानार्थ में प्रयुक्त हुआ मानुष और मनुष्य शब्द देव और मनुष्य का भेद मिटा देता है, यह बात ठीक नहीं है । उक्त श्रुति में मनुष्य के लिये जो हितकारक है, उसको मानुष कहा गया है । इस शब्द की सिद्धि ' तस्मै हितम् ', ' छन्दसि च ', ' हलो यमः ' इत्यादि पाणिनि सूत्रों से होती है । ' क्षणप्रतियोगी ' इत्यादि योगसूत्र के व्यासभाष्य में बताया गया है कि ' मनुष्य जाति श्रेष्ठ है या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर एक वाक्य में नहीं हो सकता, पशुओं की अपेक्षा मनुष्य जाति श्रेष्ठ है और देवता तथा ऋषियों की अपेक्षा नहीं, इस प्रकार दो वाक्यों में विभक्त करने पर ही इसका ठीक उत्तर होता हैं । ' इस प्रकार मनुष्य और देवता की भिन्न जाति का प्रतिपादन है । ' देवता, पितृगण, मनुष्य, गन्धर्व और अप्सराएं ये सब उस परमात्मा के प्रसाद से ही पैदा

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६५८ लोके निवास उक्त: । ' द्युस्थानो देवगण इति नैरुक्ता: ' ( नि ० १२/४१ ) नहि मनुष्याणां तत्सम्भवति । देवा दिव-कस उच्यन्ते । ' दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' ( ऋ ० सं ० १० १ ९ ०१३ ) अत्र श्रुतौ द्युलोकस्य पृथिवीलोका-ais युक्त: । ' सहस्राश्वीने वा इतः स्वर्गे लोक: ' ( ऐ ० ब्रा ० २1१७ ) अत्र श्रुतौ भूमेः स्वर्गलोकस्य मार्गावधिरुक्तः । ' न वै देवा: स्वपन्ति ' ( श ० ब्रा ० ३/२/१२२ ), ' द्राधीयो हि देवायुषं हमीयो मनुष्यायुषम् ' ( श ० ब्रा ० ७७३ | १ | १० ), ' तिर इव वै देवा मनुष्येभ्य: ' ( श ० ब्रा ० ३.१ | १ | ८ ), ' मनो ह वै देवा मनुष्यस्य आजानन्ति ' ( श ० ब्रा ० २ | १ | ४ | १ ) नहि मनुष्येष्वेतादृक् सामथ्यं दृश्यते । ' परो हि मयैरसि समो देवः ' ( ऋ ० सं ० ६ ४८ / १ ९ ) अत्र पूषा मनुष्यभिन्नो देवैः सम उक्तः । ' एको देवत्रा दयसे हि मर्तान् ' ( अ ० सं ० २० | १२ | ५ ) हे इन्द्र! देवतासु त्वमेको मर्त्यान् दयसे | अत्र श्रुतो मर्त्या दयनीया इन्द्रश्च दयावानुक्तः । ' देवा ' वै नाकसद: ' ( श ० ब्रा ० ८ | ६ | १ | १ ), ' द्यौर्वे सर्वेषां देवाना-मायतनम् ' ( श ० ब्रा ० १४/३/२८ ) अत्रापि श्रुतो देवानां विशिष्टं स्थानमुक्तम्, न तन्मनुष्याणां सम्भवति । महाभाष्ये पस्पशाह्निके - ' एवं हि श्रूयते - ' बृहस्पतिरिद्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्द-पारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम ' इति श्रुतिरुद्धता । अत्र दिव्यवर्षपदेन देवतानां वर्ष उक्तो वेदितव्यः, अन्यथा दिव्य-पदयध्यं प्रसज्येत | मनुष्येषु मानुष्यवर्षेणापि वर्षसहस्रं प्रवचनं नोपपद्यते । वर्षपदेन दिवसग्रहणे तु किमपि बोज नास्ति । तथात्वे तत्र वैशिष्ट्यमपि नास्ति । तेन तात्पर्यबाधः स्पष्ट एव । तस्य तु वचनस्य तात्पर्यमिदमेव यद् बृहस्पतिर्विशिष्ट वक्ता विशिष्टायेन्द्राय श्रोत्रे दिव्यसहस्रसंवत्सरं यावत् प्रतिपदोक्तं शब्दमुपदिदेश, परं नान्तं जगामेति । ' यावती देवतास्ता वेदविदि ब्राह्मणे वसन्ति ' ( तै ० आ ० २।१५ ) | यदि मनुष्या एव देवतास्तदा वेदविदि कथं तेषां वासः सम्भवति । देवतास्तु विशिष्टश्वर्ययोगादंशेन वेदविदि स्थातुं शक्नुवन्ति । ' यो देवो मर्त्या अति ' हुए हैं | देवगण स्वर्ग में निवास करते हैं ' इस श्रुति में देवताओं का स्वर्गलोक में निवास बताया गया है । ' देवगण स्थानीय हैं ' ऐसा निरुक्तकारों का मत हैं, अतः मनुष्य स्थानीय नहीं हो सकते । देवताओं को ' दिवौकसः ' अर्थात् ' स्वर्ग में घर वाले ' कहा गया है | ' द्युलोक, पृथ्वीलोक और अन्तरिक्ष के बाद स्वर्गलोक को बनाया ' इस श्रुति में चुलोक का पृथिवी लोक से भेद बताया गया है । ' यहाँ से स्वर्ग लोक बहुत दूर है ' इस श्रुत में पृथ्वी से स्वर्गलोक की दूरी बताई गई है । ' देवतागण सोते नहीं ', ' देवताओं को आयु लम्बी और मनुष्यों की थोड़ी होती है ', ' देवताओं की अपेक्षा मनुष्य हीन कोटि के हैं ', ' देवतागण मनुष्य के मन की बात जानते है ' इस प्रकार की सामर्थ्य मनुष्यों में नहीं है । ' हे पूषन्, तुम मनुष्यों से ऊँचे और देवताओं को बराबरी के हो ' यहाँ पर पूषा मनुष्यों से भिन्न और देवताओं के बराबर बताया गया है । हे इन्द्र, देवताओं में तुम्हीं एक हो कि मनुष्यों पर दया करते हो ' यहाँ मनुष्यों को दयनीय और इन्द्र को दयालु बताया गया है । ' देवता स्वर्ग में निवास करते हैं ', ' लोक सब देवताओं का निवास स्थान है ' यहाँ पर देवताओं का निवास स्थान बताया गया है । मनुष्यों की स्थिति वहाँ नहीं है । महाभाष्य पस्पशाह्निक में-- ' ऐसा सुना जाता है कि बृहस्पति ने इन्द्र को देवताओं के एक हजार वर्ष पर्यन्त प्रत्येक पद की व्युत्पत्ति का उपदेश दिया, किन्तु उसका अन्त नहीं हुआ ' इस श्रुति को उद्धृत किया हैं । यहाँ पर ' दिव्य वर्ष ' पद से देवताओं IT वर्ष कहा गया है, अन्यथा ' दिव्य ' पद व्यर्थ हो जायगा । मनुष्यों में तो मानुष वर्ष के हिसाब से भी एक हजार वर्ष तक उपदेश संभव नहीं है । वर्ष पद से दिन का ग्रहण करने में कोई प्रमाण नहीं है । एक हजार दिन पर्यन्त उपदेश किया, ऐसा कहने पर वह वैशिष्ट्य भी नष्ट हो जायगा, जो कि अभिप्रेत है । श्रुति का तात्पर्य पदों ( शब्दों ) की अनन्तता के प्रतिपादन में है कि बृहस्पति सदृश विशिष्ट वक्ता ने इन्द्र सदृश विशिष्ट श्रोता को एक हजार दिव्य वर्ष पर्यन्त पदों ( शब्दों ) का उपदेश दिया, तो भी वह संपूर्ण पदों ( शब्दों ) का उपदेश न कर सके । यदि यहाँ पर मनुष्यों के एक हजार दिन पर्यन्त उपदेश किया, यह अर्थ लिया जाता है, तो स्पष्ट ही यह श्रुति के तात्पर्य का बाघ है ।

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वेदार्थपारिजातः ६५ ९ अत्र मनुष्येभ्यो देवा विशिष्टशक्तय उक्ताः । ' प्राची हि देवानां दिगयो उदगुदीची हि मनुष्याणां दिक् ' ( श ० ब्रा ० १७ | १ | १२ ), ' देवो भूत्वा देवानप्येति ' ( बृ ० उ ० ४ | १ | २ ) अस्याः श्रुतेर्भूशुद्धि भूतशुद्धयादिन्यासजालैश्च देववद् भूत्वा देवानप्येतीत्येवार्थः । अन्यथा सामाजिकानां रीत्या ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येतीति नोपपद्यते, द्वैतिरीत्या जीवस्य वास्तविक-ब्रह्मभावानुपपत्तेः । ' आग्ने वह हविरद्यापदेवान् ' ( ऋ ० सं ० ७।११।५ ) अत्र श्रुतौ अग्निदवानां कृते हविर्वहति ( वस्तुतस्तु सायणानुसारं हविर्भेक्षणाय देवान् वहतीत्यर्थः ) । ' अग्निर्देवानां जठरम् ' ( तै ० ब्रा ० २२७/१२/३ ), ' ऋणं ह वै जायते asfer | जायमान एव देवेभ्य ऋषिभ्यः पितृभ्यो मनुष्येभ्यः ' ( श ० वा ० १/७/२/१ ), ( यदन्न होमान् जुहोति देवानेव तत्प्रीणाति ' ( श ० ब्रा ० १३ | २ | १ | १ ) नहि मनुष्या अग्निमुखेनाश्नन्ति । सामाजिकानां रीत्या विद्वांसो मनुष्या एव देवा:, तेषामृणं गृहीतं स्यात्तदाऽग्निहोमेन तदृणापाकरणापत्तिः । ' आग्ने वह हविरधाय देवानिन्द्रज्येष्ठास इह मादयन्ताम् । इमं यज्ञं दिवि देवेषु धेहि यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥ ' ( ऋ ० सं ० ७ १११५ ) अत्र श्रुतावग्निद्वारा देवानां तृप्तिरुक्ता । ' अग्नौ हि सर्वाभ्यो देवताभ्या जुह्वति ' ( श ० ब्रा ० ३ | १ | ३ | १ ), ' यस्यै हि कस्ये च देवतायें जुह्वत्यग्नावेव न जुह्वत्यग्निमुखा हि तद्देवा अनमकुर्वत ' ( श ० ब्रा ० | ७ ११२२४ ), ' अग्निवे सर्वा देवता अग्नी हि सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुह्वति ' ( श ० ब्रा ० ३ | ४ | १ | १ ९ ), ' अग्निर्वै सर्वा देवता: ' इति निरुक्ते ( १४१३२ ) इत्यत्रोद्धृतम् । ' अमर्त्याय अभि नः सचवमायुर्धत्त प्रतर जीवसे नः ॥ ' ( अ ० सं ० ६।४१।३ ) अत्र मन्त्रे देवताभ्य आयुः काम्यते, नहि मनुष्याणामायुर्दानसामर्थ्यमस्ति । ' इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा । बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारी प्रजया वर्धयन्तु ॥ ' ( अ ० सं ० १४ | १ | ५४ ) नहि मनुष्यरूपा देवा अन्यविवाहितायां प्रजाः कर्तुं प्रभवन्ति । न वा तेभ्यस्तादृशी ' जितनी देवताएँ हैं, ' सब वेदज्ञ ब्राह्मण में निवास करती है ' यदि मनुष्यों को ही देवता माना जाय तो फिर इस श्रुति के अनुसार वेद ब्राह्मण में उनका निवास कैसे हो सकेगा । देवतागण तो अपने विशिष्ट ऐश्वर्य के प्रभाव से अंश रूप में वेदज्ञ ब्रह्मण में निवास कर सकते हैं । ' देवतागण मनुष्यों की अपेक्षा विशिष्ट शक्ति वाले हैं ', ' पूर्व दिशा देवों की है और पश्चिम दिशा मनुष्यों की ', ' स्वयं देव होकर देवताओं के पास जाता है ' इस श्रुति का अर्थ हैं कि भूतशुद्धि, न्यास ध्यान आदि के माध्यम से पासक स्वयं देव सदृश बनकर देवता की उपासना करता है । अन्यथा आर्यसमाजिकों की दृष्टि में ' स्वयं ब्रह्म बनकर ब्रह्म को प्राप्त करता हैं इस वाक्य की उपपत्ति न बन सकेगी, क्योंकि द्वैतवादयों के मत से जीव का वास्तविक ब्रह्मभाव अनुपपन्न है | ' हे अने आज तुम देवताओं के लिये हवि का वहन करो ' इस श्रुति के अनुसार अग्नि देवताओं के लिये हवि ले जाता है । सायण ने इस श्रुति का ' उत्पन्न होते ही व्यक्ति ' यह जो अश का होम किया जाता अर्थ यह किया है कि अन हवि के भक्षण के लिये देवताओं को ले जाता है । ' अग्नि देवता का पेट है ', ऋणी हो जाता है, वह देवताओं का, ऋषयों का, पितृगणों और मनुष्यों का ऋणी होता है ', है, उससे देवता प्रसन्न होते हैं ' मनुष्य अग्नि के मुँह से भोजन नहीं करते । आर्यसमाजियों के उनसे लिये गये ऋण की अदायगी क्या अग्नि में होम करने से हो जायगी । मत से विद्वान् मनुष्य ही देवता हैं, ' हे अग्ने, आज तुम देवताओं के लिये हृवि का वहन करो । इन्द्र आप लोगों में श्रेष्ठ है, उनके साथ आप यहाँ प्रसन्न होवें । इस यज्ञ में दी गई हवि को आप स्वर्ग में देवताओं के पास ले जाय और आप हमारा सदा कल्याण करें ' इस ति में अग्नि के द्वारा देवताओं की तृप्ति बताई गई है । ' अग्नि में सब देवताओं के लिये हवन करता है ', ' जिस किसी देवता के लिये अग्नि में ही हवन करता है, देवतागण अग्नि के मुख से ही अपना अन्न ग्रहण करते हैं ', ' अग्नि सब देवताओं का प्रतिनिधि है, क्योंकि अग्नि में ही सब देवताओं के लिये बाहुति दी जाती है ' यह श्रुति निरुक्त ( १४१३२ ) में भी उद्धृत है । ' हे अमरगण, हम मनुष्यों का आप चारों तरफ से भला कीजिये, दीर्घ जीवन के लिये हमारी आयु बढ़ाइये ' इस मन्त्र में देवताओं से दीर्घायु की कामना की गई है । मनुष्यों में दोर्घायु देने की सामर्थ्य नहीं हैं । ' इन्द्र, अग्नि, द्यावापृथिवी, वायु, मित्र, वरुण, भग, दोनों अश्विनीकुमार, बृहस्पति, रुद्रण, ब्रह्मा, सोम ये देवगण इस नारी की सन्तति प्रदान द्वारा वृद्धि करें ' देवता यदि मनुष्य रूप हैं, तो वे दूसरे की विवाहित

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 690 का मूल पृष्ठ
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६६० पारिजातः प्रार्थना युज्यते । ' उभो लोकावभिजयेयं देवलोकं च मनुष्यलोकं च ' ( श ० ब्रा ० १३/२/४११ ), ' अयं वै लोको मनुष्य-लोकोऽयासी देवलोकः ' ( श ० ब्रा ० १३ | २ | ४ | १ ) एवं लोकभेदेनापि देवमनुष्यभेदः सिद्धयति । नहि विदुषां मनुष्याणां पृथिवीलोकाद् भिन्नो लोकः सम्भवति । ' प्रजापतिः प्रजा असृजत । स ऊर्वेभ्य एव प्राणेभ्यो देवानसृजत । येऽवाश्चः प्राणास्तेभ्यो मर्त्याः प्रजाः ' ( श ० ब्रा ० १० | १ | ३ | १ ) अत्रोत्पत्तिभेदादपि देवानां मनुष्येभ्यो भेद उक्तः । ' त्रेधा भागो निहितो यः पुरा वो देवानां पितॄणां मर्त्यानाम् । अंशान् जानीध्वं विभजामि तान् वो यो देवानां स इमां पारयाति ॥ ' ( अथवं ० ११।१५ ), ' तेज इमं यज्ञं नो वह ' अत्रापि भेदः स्पष्टः । ' एष वै देवाननु विद्वान् यदग्निः ' ( श ० ब्रा ० ११५ | १ | ६ ), ' देवेभिर्मानुषे जने ' ( सामसंहितायामाग्नेयकाण्डे ११२ ), ' स यदग्नो जुहोति तद्देवेषु जुहोति । तस्माद्देवाः सत्यथ यत्सदसि भक्षयन्ति तन्मनुष्येषु जुहोति तस्मान्मनुष्याः सन्त्यथ यद्धविर्धानयोर्नाराशंसाः सीदन्ति तत्पितृषु जुहोति तस्मात्पितरः सन्ति ' ( श ० ब्रा ० ३।६।२।२५ ) एभिर्वचनैः स्पष्टमेव देवानां मनुष्याणां च भेदः सिद्ध्यति । ' तत्र मानुषं शरीरं पार्थिवम् आप्यतैजसवायव्यानि लोकान्तरे शरीराणि । तेष्वपि भूतसंयोगाः पुरुषार्थ-तन्त्रा इति ' इति वात्स्यायनभाष्यम् ' पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः ' ( म्या ० द ० ३।१।१८ ) इति सूत्रे | ' तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिजं च ' ( १७४ ), ' धर्मविशेषाच्च ' ( १७६ ), ' समाख्याभावाच्च ' ( १७७ ), ' संज्ञाया आदित्वात् ' ( १७८ ), ' सन्त्ययोनिजा: ' ( १७ ९ ), ' वेदलिङ्गाच्च ' ( १८० ) इति वैशेषिकसूत्राणि । एषु प्रशस्तपादभाष्यम् -- ' शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिजं च । तत्रायोनिजमनपेक्ष्य शुक्रशोणितं देवर्षीणां शरीरं धर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते । क्षुद्रजन्तूनां यातनाशरीराण्यधर्म विशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायन्ते । शुक्रशोणितसन्निपातजं योनिजम् । तद्द्द्विविधम्- जरायुजमण्डजं च । मानुषपशुमृगाणां जरायुजम् । पक्षिसरीसृपाणामण्डजम् । ' तत्र शीरमयोनिजमेव वरुणलोके पार्थिवावयवोप-हम में सन्तति उत्पन्न नहीं कर सकते और न ऐसी प्रार्थना ही उचित मानी जा सकती है । ' मैं देवलोक और मनुष्यलोक दोनों को जीत लूँ ', ' यह लोक मनुष्यलोक हैं, इससे भिन्न वह देवलोक है ' इस प्रकार लोक के भेद से भी देवता और मनुष्यों की भिन्नता सिद्ध है । विद्वान् मनुष्यों का पृथिवीलोक से भिन्न दूसरा कोई लोक नहीं है । ' प्रजापति ने प्रजा की सृष्टि की । उसने अपने ऊर्ध्वं प्राण से देवताओं को और अवाक् प्राण से मनुष्यों को बनाया ' यहाँ पर उत्पत्ति के भेद से भी देवताओं की मनुष्यों से भिन्नता बताई है । ' देवताओं का, पितृगणों का और मनुष्यों का इस प्रकार पहले आप लोगों के लिये तीन हिस्से किये गये थे, आप लोग जाइये, उन अंशों को विभक्त कर मैं दे रहा है ', ' हे तेजोमय अग्ने इस यज्ञ का हमारे लिये वहन करो ' यहाँ पर भी भेद स्पष्ट है । ' अग्नि देवताओं में श्रेष्ठ है ', ' देवताओं से मनुष्यों में ', ' यह जो अग्नि में हवन करता है, वह देवताओं के लिये है, यह जो समूह में भोजन करते है, वह मनुष्यों के लिये है । यह जो हविर्धान में नाराशंसी गाथा के साथ दिया जाता है, वह पितृगणों के लिये है ' इन वचनों से स्पष्ट ही देवताओं की मनुष्यों से भिन्नता सिद्ध होती है । ' पार्थिव ' इत्यादि न्यायसूत्र के वात्स्यायन भाष्य में बताया गया है कि ' मनुष्य का शरीर पृथिवी का बना है । जल, तेज और वायु के बने शरीर लोकान्तर में हैं । इनमें भी भूतचतुष्टय का संयोग भोगाधीन है । ' ' योनिज और अयोनिज भेद से शरीर दो प्रकार का है ', ' अदृष्ट विशेष के कारण, इतिहास आदि में वर्णित समाख्या के आधार पर, सर्ग के आदि में दी गई संज्ञा के कारण और वेद मन्त्र, ब्राह्मण वाक्य आदि से भी अयोनिज शरीर सिद्ध हैं इन वैशेषिक सूत्रों का भाष्य प्रशस्तपाद ने इस प्रकार किया है ---' योनिज और अयोनिज भेद से शरीर दो प्रकार का है । शुक्र और रज की बिना अपेक्षा किये धर्मविशेष से प्रेरित परमाणुओं के संयोग से उत्पन्न हुआ देवता, ऋषि आदि का शरीर अयोनिज है । क्षुद्र जन्तुओं के यातनामय शरीर अधर्मविशेष से प्रेरित संयोग से पैदा होते हैं । शुक्र और रज के संयोग से पैदा हुए शरीर योनिज कहलाते हैं । योनिज शरीर जरायुज और परमाणुओं दो प्रकार के हैं । मनुष्य, पशु और मृगों का शरीर जरायुज और पक्षी, सर्प आदि का अण्डज होता है । ' ' वरुण लोक में शरीर अण्डज अयोनिज भेद से होता है और पार्थिव अवयवों के सहारे वह उपभोग योग्य बनता है । आदित्य लोक में भी शरीर अयोनिजहै और वह पार्थिव