वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 671–680

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 671–680

पृष्ठ 671

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देवार्थपारिजातः *** बमज्जगदवभासयति, तस्मिन्नेवादित्यादयः शब्दाः प्रयुज्यन्ते, लोकप्रसिद्धेर्वाक्यशेषप्रसिद्धेश्च । न च तस्य हृदया-दिना विग्रहेण चेतनतयाथित्वादिना वा सम्बन्धः, मृदादिवदचेतनत्वात् । तथैवाग्न्यादयोऽपि ज्ञातव्याः । यत्तु मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यो देवादीनां विग्रहवत्वावगमादधिकारसाधनम्, तदपि न युक्तम्, मन्त्राणां व्रीह्यादिवद् विनियुक्तानां कर्मापेक्षितद्रव्यदेवतास्मरणादी स्तोत्रशस्त्रादीनां कर्मसमवेतदेवतादावुपक्षीणत्वेन देवताविग्रहादिप्रतिपादने तात्पर्याभावात् । अर्थवादानां च विधिभिरेकवाक्यतया विधिस्तुतिष्वेवोपयोगो नान्यत्र । इतिहासपुराणादीनां तु पौरुषेयत्वेन प्रमाणान्तरसापेक्षत्वादेव न स्वातन्त्र्येण देवताविग्रहसद्भावे प्रामाण्यम् । प्रत्यक्षादयस्तु सत्येव तत्र विषये | लोकस्तु न स्वतन्त्रं प्रमाणम्, अविचारित प्रत्यक्षादीनामेव लोकप्रमाणपदव्यपदेश्यत्वात् । एवं ब्रह्मविद्यासु देवानामधिकार उक्तः शब्दविशेधश्च परिहृतः । तत्र जैमिनिराचार्यो देवानामधिकारं मन्यते । कुतः मध्वादिष्वसम्भवात् । कथं ' असौ वा आदित्यो देवमधु ' ( छा ० उ ० ३ | १ | १ ) इत्यत्र मनुष्या मध्वध्या-सेनोपासोरन्, देवादिष्वप्युपास केष्वभ्युपगम्यमानेष्यादित्यः कमन्यमादित्यमुपासीत? एवमादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्युपक्रम्य वसवो रुद्रा आदित्या मरुतः साध्याश्च पञ्च देवगणाः क्रमेण तत्तदमृतमुपजीवन्तीत्युपदिश्य ' स य एतदेवममृतं वेद बसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेन तदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति ' इत्युक्तम्, तत्र वस्वादयः कानन्यान् बस्वादीन् अमृतोपजीविनो विजानीयुः? कथं वाऽन्यं वस्वादिमहिमानं प्रेप्सेयुः? न च मन्त्रार्थवादानां स्तुत्याद्यर्थता देवतादिविग्रहादिपरता च युज्यते, तथात्वे वाक्यभेदापत्तेः । न च सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदो युक्तः, तस्मादन्यपराच्छन्दाज्ञाप्रसिद्धविग्रहवत्त्वादिप्रतिपादनं सम्भवति । एवं प्राप्ते आकाश स्थित जो ज्योतिर्मण्डल दिन रात घूमता हुआ जगत् को प्रकाशित करता है, उसमें मादित्य आदि देवतावाचक शब्द प्रयुक्त होते हैं, क्योंकि यह लोकप्रसिद्धि और वाक्यशेष प्रसिद्धि है । इस ज्योतिर्मण्डल का हृदयादि शरीर के साथ अथवा चेतनता, area of के साथ कोई संबन्ध नहीं है, क्योंकि मिट्टी आदि के समान वह अचेतन है । इसी प्रकार अग्नि आदि के संबन्ध में भी समझना चाहिये । यह कहना कि मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण और लोक व्यवहार से भी यह प्रतीत होता है कि देवादि शरीरधारी हैं, अतः अनधिकार रूप दोष नहीं है, इसलिये उचित नहीं है कि सामान्य मन्त्रों के सामर्थ्य के विनियुक्त ब्रोहि आदि के समान कर्म के लिये अपेक्षित द्रव्य देवता आदि के स्मरण में और स्तोत्र - शस्त्र आदि का कर्म में समवेत देवता के स्मरण में उपक्षय हो जाने से वे देवता के शरीरधारी होने की बात का प्रतिपादन नहीं कर सकते । अर्थवादों की विधि वाक्यों से एकवाक्यता होती है, अतः उनका उपयोग har विधि की स्तुति में होता है, अन्यत्र नहीं । इतिहास, पुराण आदि पौरुषेय हैं, अतः इनके प्रमाणान्तर सापेक्ष होने से ये स्वतन्त्र रूप से देवताओं के शरीरवारी होने में प्रमाण नहीं माने जा सकते । देवता शरीरधारी हैं, इस विषय में प्रत्यक्षादि प्रमाणों की प्रवृत्ति नहीं हो सकती । लोक कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है, क्योंकि जिसके विषय में विशेष विचार नहीं किया गया है, ऐसा प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्रसिद्ध हुआ अर्थ ही लोकप्रसिद्धि के नाम से कहा जाता है । इस प्रकार ब्रह्मविद्या में देवताओं का अधिकार कहा गया है और वैदिक शब्द में उपस्थापित विरोध का भी परिहार किया गया है । इस विषय में जैमिनि आचार्य का मत हैं कि देवादि का ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है, क्योंकि मधुविद्या आदि में उनका अधिकार संभव नहीं है । ' असो वा ' इत्यादि श्रुति में बताया गया है कि ' अथवा यह आदित्य देवों का मधु है ' अतः मनुष्यों को मधु के अध्यास से आदित्य की उपासना करनी चाहिए । देवादि को उपासक रूप में स्वीकार किए जाने पर आदित्य किस अन्य आदित्य की उपासना करेगा? तथा आदित्य के आश्रित पाँच रोहित आदि का उपक्रम कर वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्य में पाँच देवगण क्रम ' उस अमृत का उपभोग करते हैं, ऐसा उपदेश कर कहा गया है कि ' इस प्रकार जो इस अमृत को जानता है, वह वसुओं में से ही कोई एक होकर अग्नि रूप मुख से इसे देखकर तृप्त हो जाता है । यहां पर यदि हम वसु आदि को उपासक मानें तो वसु आदि अमृतोप-that for अन्य वसु आदि को जानेंगे? अथवा किन अन्य वसु आदि की महिमा को प्राप्त करना चाहेंगे? ८१

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६४२ आह-- ' भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ( ब्र ० सू ० ११३/३३ ) इति सूत्रेण समाधानम् - बादरायणस्तु देवादीनामधि-कारस्य भावं मन्यते, अर्थित्वसामर्थ्याप्रतिषिद्धत्वसम्भवात् । ' तद्यो यो देवानां प्रत्यबुद्धयत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम् ' ( वृ ० १ | ४ | १० ) इत्यत्र देवादीनां ब्रह्मावगमेन ब्रह्मभावप्राप्तिश्रवणात् । न चात्र मनुष्यशब्देन विद्वांसो मनुष्या एवोच्यन्ते ' विद्वांसो वे देवा: ' इति श्रुतेः, तथात्वे मनुष्याणामिति पृथङ्तिर्देशानुपपत्तेः । न च मनुष्य-शब्देनाविद्वांसो मनुष्या उच्यन्ते, ब्रह्मज्ञानेन तेषां ब्रह्मभावप्राप्तिश्रवणात् । विद्वांसो वै देवा इत्यत्र तु देवानां विद्वत्त्व-मुक्तम्, सुकृतविशेषात्तेषामाजान सिद्ध्याद्यैश्वर्यवस्वात् । ' ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांच लोकानाप्नोति सर्वाश्च कामान् ' इति, ' इन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवत्राज विरोचनोऽसुराणाम् ' ( छा ० ८७२ ) इत्यनेनापि देवानां प्रजापती ब्रह्मचर्यवास तत्त्वज्ञानप्राप्त्यादिकं श्रूयते । यदुक्तम् -- ' ज्योतिषि भावान्न देवतानां विग्रहादिमत्त्वम् ' इति, तन्त्र, ज्योतिरादिविषयाणामप्यादित्यादिन देवताशब्दानामैश्वर्याद्युपेतचेतनावदर्थसमर्पकत्वात् । मन्त्रार्थवादादिषु तथा व्यवहारात् । ऐश्वर्ययोगाद्देवतानां ज्योतिराद्यात्मिकावस्था तु यथेष्टतत्तद्विग्रहधारणसामर्थ्य सद्भावात् । तथा च सुब्रह्मण्यार्थवादे - ' मेधातिथेर्मेषेति || १४ || मेधातिथि ह काण्वायनं मेषो भूत्वा जहार || १५ || ' ( षड्विंशब्राह्मणम् - १ ) । स्मर्यते च - ' आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम ह || ' ( इति शाङ्करभाष्य उद्धृतम् ) ' इन्द्रो वे वृत्राय वस्त्रमुदयच्छत् ' ( ऐ ० ब्रा ० ४। २ ) इति श्रुतिः । मृदादयोऽपि नाचेतना एव ' मृदब्रवीत् ' ( श ० ब्रा ० ६ | १ | ३ | ४ ), ' आपोऽब्र ुवन् ' ( श ० ब्रा ० ६ १ ३ २ ) इति श्रवणात् । तथैव ज्योतिरादीनां भूतधातुत्वेनाचेतनत्वेऽपि तदधिष्ठातृणां देवतानां चेतनत्वाविरोधात् । tea और अर्थवाद वाक्यों का स्तुति आदि में तथा देवताओं के शरीरधारी होने से तात्पर्य नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने में वाक्यभेद की आपत्ति होगी । एकवाक्यता के रहते वाक्यभेद उचित नहीं माना जाता । इसलिये अन्य अभिप्राय से पठित शब्द से, देवता शरीरधारी है, यह अप्रसिद्ध अर्थ नहीं प्रतिपादित किया जा सकता । इस आपत्ति का परिहार ' भावं तु ' इत्यादि सूत्र से किया जाता है । बादरायण तो ऐसा मानते हैं कि देवता आदि का भी ब्रह्मविद्य r में अधिकार है, क्योंकि इनमें अथित्व, सामर्थ्य, प्रतिषेध विद्यमान है, जो कि अधिकार प्राप्ति में कारण बताए गये हैं । ' तो यो ' इत्यादि श्रुति में बताया गया है कि ' उसे देवों में से जिस जिस ने आत्मरूप से जाना, वही तद्रूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्यों में से जिस जिसने उसे जाना, वह तद्रूप ( ब्रह्म ) हो गया ' । मनुष्य शब्द से यहाँ केवल विद्वान् मनुष्य ही नहीं अभिहित होते, क्योंकि श्रुति में देवताओं को भी विद्वान् Enter गया है, यदि ऐसा माना जाय तो मनुष्यों के पृथक निर्देश की आवश्यकता न रहती । मनुष्य शब्द से उनका ग्रहण करना चाहिये, जो विद्वान् नहीं है, ऐसा भी नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्मज्ञान के द्वारा उनके ब्रह्मभाव की प्राप्ति सुनी जाती है । ' विद्वांसो वे देवा: यहाँ पर देवताओं की विद्वत्ता बतायी गई है, क्योंकि उनमें सुकृत कर्मों के कारण आजानसिद्धि आदि ऐश्वर्य विद्यमान हैं । ' वे कहने लगे कि हम उस आत्मा को जानना चाहते हैं, जिसे जानकर जीव सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगों को प्राप्त कर लेता है ', ' देवताओं का राजा इन्द्र और असुरों का राजा विरोचन ये दोनों प्रजापति के पास आये ' इन श्रुति वाक्यों में भी देवता आदि का प्रजापति के पास ब्रह्मचर्यवास एवं उनसे तत्वज्ञान की प्राप्ति आदि का वर्णन है । यह जो कहा गया है कि आदित्य आदि ज्योति में देवता शब्द का प्रयोग होने से देवताओं को शरीरधारी नहीं माना जा सकता, इसका उत्तर यह है कि ज्योतिर्मण्डल आदि के बोधक होने पर भी देवता वाचक आदित्य आदि शब्द चेतना वाले, ऐश्वर्य आदि से युक्त उस उस देवता का बोध कराते हैं, क्योंकि मन्त्र, अर्थवाद आदि में ऐसा व्यवहार है । ऐश्वर्य के योग से देवताओं का ज्योतिर्मण्डल आदि रूप से अवस्थान हो सकता है और यथेष्ट विग्रह के धारण करने की सामर्थ्य भी उनमें हैं | सुब्रह्मण्य अर्थवाद में ' ' ने भेड़ बन कर ror के पुत्र मेधातिथि का अपहरण किया ', अतः इस श्रुति में इन्द्र के प्रति ' मेधातिथि का मेष ' ऐसा संबोधन है । ' आदित्य पुरुष are कुन्ती के पास गया ' ऐसी स्मृति भी हैं । ' इन्द्र ने वृत्र के विरुद्ध वस्त्र उठाया यह श्रुति भी है । ' मृत्तिका बोली, जल बोला ' इत्यादि श्रुतियाँ मृत्तिका आदि में भी चेतन अधिष्ठाता स्वीकार करती हैं । इसी तरह आदित्य आदि में ज्योतिर्मण्डल आदि भौतिक वस्तु के अचेतन होने पर भी उनके अधिष्ठाता देवतागण चेतन माने जायेंगे ।

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वेदार्थपारिजातः ६४३ यदुक्तम्- मन्त्रार्थवादादीनामभ्यपरत्वेन न तैर्देवताविग्रहवत्त्वादिकं सिद्धयति, सद्भावासद्भावयोः प्रत्यया-प्रत्यययोः कारणत्वेनान्यार्थत्वानन्यार्थत्वयोरप्रयोजकत्वात्, अन्यार्थं प्रस्थितस्यापि पथिपतिततृणपर्णादिज्ञानदर्शनात् । यदुक्तम् - तृणपर्णादिविषयं प्रत्यक्षमेव तदस्तित्वे मानम्, प्रकृते तु विध्युद्देश्यैकवाक्यतयाऽर्थवादस्य स्तुत्यर्थतानिर्णयेन पार्थगर्थ्येन वृत्तान्तविषयस्याध्यव सातुमशक्यतैव । नहि महावाक्येऽर्थप्रत्यायकेऽवान्तरवाक्यस्य पृथक् प्रत्यायकत्वं सम्भवति । यथा - ' न सुरां पिबेत् ' इति नञ्वति वाक्ये पदत्रयसम्बन्धात् सुरापानप्रतिषेधरूप एक एवार्थोऽवगम्यते, न पदद्वयसम्बन्धात् सुरापानविधेरपि सम्भव इति, तदपि न, विषमोपन्यासात् । तथाहि - सुरापान-प्रतिषेधकवाक्ये पदान्वयस्यैकत्वाद् युक्तमेवावान्तरवाक्यार्थस्याग्रहणम्, विध्युद्देशार्थवादयोस्त्वर्थवादस्थानि पदानि पृथगन्वयं वृत्तान्तविषयं प्रतिपद्यानन्तरं कैयर्थ्याकाङ्क्षायां कामं विधेः स्वावकत्वं प्रतिपद्यन्ते । यथा- ' वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः ' इत्यत्र विध्युद्देशवर्तिनां वाय्वादिपदानां विधिना सम्बन्धः, ' वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता । वायुमेव स्वेन भागधेयेनोपधावति । स एवेनं भूतिं गमयति ' इत्यर्थवादगतपदानामपि विधिनैवैकवाक्यता । नहि भवति वायुर्वा आलभेतेति, क्षेपिष्ठा वा देवता आलभेतेत्यन्वयः, किन्तु तानि पदानि वायुस्वभावसङ्कीर्तनेन त्ववान्तरमन्वयं प्रतिपद्येत्र विशिष्टदेवत्यमिदं कर्मेति विधि स्तुवन्ति । सोऽवान्तरवाक्यार्थो यत्र प्रमाणान्तरगोचरो भवति तत्र तदनुवादेनार्थवादः प्रवर्तते । यत्र प्रमाणान्तरविरुद्धस्तत्र गुणवादः । यत्र तदुभयं न स्यात् तत्र किं प्रमाणान्तराभावाद् गुणवादः स्यादाहोस्वित्प्रमाणान्तराविरोधाद् विद्यमानवादः स्यात्? तत्र प्रतीतिशरणैविद्यमानबाद एवाभ्युपेयते न गुणवाद इति शाङ्करभाष्याभिप्रायः । वाचस्पतिरीत्या तु लोके विशिष्टार्थप्रत्यायनाय प्रयुक्तानि पदानि न स्वार्थमात्रस्मारणे पर्यवस्यन्ति, किन्तु तेषां वाक्यार्थबोधे स्वार्थस्मारणमवान्तरव्यापारः । न च यद्यदर्थं तत्तेन विना पर्यवस्यतीति न स्वार्थमात्र-यह जो कहा गया है कि मन्त्र और अर्थवाद के प्रतिपादन का प्रयोजन दूसरा है, अतः वे देवता के विग्रह को नहीं सिद्ध कर पाते । इस पर हम कहते हैं कि वस्तु के सद्भाव और असद्भाव में उसका प्रत्यय एवं अप्रत्यय ही कारण है, अतः अन्यार्थकत्व अथवा अन Forest इसमें प्रयोजक नहीं हो सकते । क्योंकि किसी अन्य प्रयोजन के लिये चला मनुष्य मार्ग में पड़े हुए तृण - पत्ते आदि को देखता ही है । पुनः यह कहना कि तृणपर्णादि विषय तो प्रत्यक्ष हैं, जिससे उनके अस्तित्व की प्रतोति होती है । प्रकृत में तो विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता प्राप्त करने से स्तुतिपरक अर्थबाद में स्वतन्त्र रूप से भूतार्थविषयक प्रवृत्ति का निश्चय नहीं किया जा सकता । अर्थ-Tree महावाक्य में अवान्तर वाक्य पृथक् रूप से अर्थ बोध नहीं करा सकता । जैसे कि ' सुरा न पिये ' इस मकार वाले वाक्य में तीन पदों के सम्बन्ध से सुरापान का प्रतिषेध रूप एक ही अर्थ अवगत होता है, पुनः दो पदों के सम्बन्ध से सुरापान की विधि का नहीं । इसका यही उत्तर है कि आपका यह दृष्टान्त ठीक नहीं है, क्योंकि सुरापान के निषेध वाक्य में पदान्वय एक होने के कारण अवान्तर वाक्यार्थ का ग्रहण नहीं होगा, विधिपरक अर्थवाद में से तो अर्थवाद के पद पहले भूतार्थं विषय से पृथक् अन्वित होकर अनन्तर कैमर्थ्यं ( इस अर्थवाद का क्या प्रयोजन है? किसलिये है? ) की आकांक्षा में यथेच्छ विधिवाक्य के स्तावक होते हैं । जैसे ' ऐश्वर्य चाहने वाला वायव्य श्वेत पशु का आलभन करे ' इस श्रुति में विधिवाक्य गत वायु आदि पदों का विधि के साथ सम्बन्ध है, वैसे ही ' वायु निश्चय ही शीघ्रगामी देवता है । जो यजमान हवि को वायु के लिये देता है, वह वायु के समान अपने मनोरथ के पास पहुँचता है, वही उसको ऐश्वर्य के पास ले जाता है ' इस अर्थवादवाक्यगत पदों का भी विधि से ही सम्बन्ध है । इन पदों का ' ा आलमन करे, अथवा क्षेपिष्ठा देवता का आलभन करे इस प्रकार का पार्थक्येन अन्वय नहीं होता, किन्तु ये वायु स्वभाव के कथनोपरान्त अवान्तर अश्वय प्राप्त कर यह एक विशिष्ट देवता सम्बन्धी कर्म है, इस प्रकार विधि को स्तुति करते हैं । यह अवान्तर वाक्यार्थ जहाँ प्रमाणान्तर का विषय होता है, वहाँ उसके अनुवाद से अर्थवाद प्रवृत्त होता है । जहाँ प्रमाणान्तर से विरोध है, वहाँ गुणवाद से । जहाँ ये दोनों नहीं है, वहाँ प्रमाणान्तर के अभाव से गुणवाद हो अथवा प्रमाणान्तर के अविरोध से विद्यमान अर्थवाद हो, ऐसा सन्देह उपस्थित होने पर प्रतीतिशरण पुरुषों को चाहिये कि वे विद्यमान अर्थवाद ( भूतार्थवाद ) का आश्रयण करें, गुणवाद का नहीं । शाङ्करभाष्य की सहमति इसी पक्ष में है ।

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६४४ पर्यवासनं पदानाम् । न च नञ्वति वाक्ये विधानपर्यवसानम्, तथा नञ्पदस्यानर्थक्यापातात् । तदेवोक्तम्- ' साक्षाद्य-द्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् । वर्णास्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले || वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्ती नान्त-रीयकम् । पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ ' इति । इयं गतिस्त्वेकवाक्ये । यत्र त्वेकस्य वाक्यस्य वाक्या-न्तरेण सम्बन्धस्तत्र तु लोकानुभूतार्थव्युत्पत्ती सिद्धायामेकैकवाक्यस्य तत्तद्विशिष्टार्थप्रत्यायनेन पर्यवसितवृत्तिनोऽपि पश्चात्कुतश्चिद्धेतोः प्रयोजनान्तरापेक्षायामस्वयः । यथा ' वायुर्वे ' इत्यादिकम् । इह स्वाध्यायाध्ययनविधिना स्वाध्याय-शब्दवाच्यवेदराशेः पुरुषार्थतोता । अत एवार्थवादा अपि पुरुषार्था एव मता: । न च विघ्युद्देशवाक्यैकवाक्यता-मन्तरा भूतार्थमात्रपर्यवसितानां तेषां पुरुषार्थता सम्भवति, तस्मात् स्वाध्यायावधिवशात् कैमर्थ्याकाङ्क्षायां वृत्तान्तादि-गोचराः सन्तस्तत्प्रत्यायनद्वारा विधिप्राशस्त्यं लक्षयन्ति । अविवक्षितस्वार्थास्तु न प्राशस्त्यलक्षणे प्रभवन्ति, अन्यथा लक्षणैव न स्यात्, नामधेयसम्बन्धाभावात् । अत एव गङ्गायां घोष इत्यत्र गङ्गाशब्दः स्वसम्बद्धमेव तीरं बोधयति न तु समुद्रतीरम् । कुतः? स्वार्थप्रत्यासत्त्यभावात् । न चैतत्सर्वं स्वार्थाविवक्षायां युज्यते । ननु यदि लक्षणायामभिधेयविवक्षा तर्हि विरुद्धार्थवादे कथं लक्षणा स्यात्, तत्राभिधेयस्य विरुद्धत्वादेव :, यथा- - ' ' आदित्यो वै यूप विवक्षानुपपत्तेरिति चेन्न तत्र गुणवादाभ्युपगमात् । यत्र प्रमाणान्तरविरुद्धार्था अर्थवादा: ', ' यजमानः प्रस्तरः ' इत्यादयस्तत्र प्रमाणान्तराविरोधासिद्धये स्तुतये च गुणवादाश्रयणम् । ' यजमानः प्रस्तर: ' इति किं विधिराहोस्विदर्थवाद इति संशयेऽपूर्वार्थलाभाद्विधिरिति प्राप्ते सिद्धान्तः -- यदि प्रस्तरकार्ये यजमानो विधीयेत वाचस्पति मिश्र का कहना है कि लोक में विशिष्ट अर्थ के प्रतिपादन के लिये प्रयुक्त पद केवल अपने अर्थ को ही बतलाकर विरत नहीं होते, किन्तु वाक्यार्थ बोध के समय अपने अर्थ का स्मरण कराना उनका अवान्तर व्यापार हैं । जो जिसका अर्थ है, उस अर्थ का बोध उस पद के बिना नहीं हो सकता, अतः केवल स्वार्थ मात्र में पदों का पर्यवसान नहीं हो सकता | नव्पदघटित वाक्य में विधि का प्रतिपादन नहीं हो सकता, क्योंकि इस प्रकार नव्पद व्यर्थ हो जायगा । कहा भी है कि ' वर्ण यद्यपि साक्षात् पद के अर्थ का प्रतिपादन करते हैं, तथापि इस निष्फल कार्य में उनका पर्यवसान नहीं होता । उनका अन्तिम उपयोग वाक्यार्थ के अवबोध में होता है । वाक्यार्थ की प्रवृत्ति में पदार्थ प्रतिपादन इनका अवान्तर व्यापार है, जैसे कि रसोई बनाने में काष्ठ की ज्वाला अवान्तर व्यापार है । ' यह एक वाक्य की व्यवस्था है । जहां पर एक वाक्य का सम्बन्ध दूसरे वाक्य से है, वहाँ लोकानुभूत अर्थ की व्युत्पत्ति की सिद्धि के उपरान्त विशिष्ट अर्थ का बोध कराकर एक वाक्य की वृत्ति के उपरत हो जाने पर भी किसी कारण से दूसरे प्रयोजन के उपस्थित होने पर पुनः अन्वय होता है । जैसा कि ' वायुव ' इत्यादि वाक्यों में देखा गया है । ' स्वाध्यायोऽध्येतव्य: ' इस विधि वाक्य में स्वाध्याय शब्द वाच्य defeat geetar प्रतिपादित है । इसलिये अर्थवाद वाक्य को भो पुरुषार्थता सिद्ध है । विधि वाक्य से एक वाक्यता के बिना भूतार्थं मात्र के बोधक अर्थवाद वाक्यों की पुरुषार्थता वन नहीं सकती । इसलिये स्वाध्याय विधि के प्रसङ्ग में इन अर्थवाद वाक्यों का है । इस प्रकार की आकांक्षा होने पर भूतार्थबोधक अ are area far के प्राशस्त्य को लक्षित करते हैं । स्वार्थ की क्या प्रयोजन afra प्राशस्त्य को लक्षित न कर सकेंगे | स्वार्थ की अविवक्षा में लक्षणा भी न बन सकेगी, क्योंकि तब किसी नाम से उसका सम्बन्ध नहीं बनेगा । इसलिये ' गङ्गायां घोष: ' यहाँ पर गंगा शब्द अपने से सम्बद्ध तीर को ही बताता है । समुद्र के तीर को ' नहीं, क्योंकि वह संनिहित नहीं है । स्वार्थ की विवक्षा के बिना यह सब नहीं हो सकता । लक्षणा में यदि अभिधेय की विवक्षा मानी जायगी तो विरुद्ध अर्थवाद में लक्षणा कैसे होगी, क्योंकि ऐसे स्थलों में अभिधेय के विरुद्ध अर्थ का प्रतिपादन होने से विवक्षा नहीं बन पावेगी? इस प्रश्न का उत्तर है कि ऐसे स्थलों में गुणवाद माना जायगा । जहाँ पर अर्थवाद वाक्यों का प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विशेष प्रतीत होता हो, जैसे कि ' यूप आदित्य है ', ' यजमान प्रस्तर है ' आदि वाक्यों में प्रत्यक्ष विरोध स्पष्ट है, अतः इस विरोध के परिहार के लिये और स्तुति के लिये गुणवाद का आश्रय लेना पड़ता है । ' यजमान प्रस्तर है ' यह विधि या अर्थवाद? इस संशय के उपस्थित होने पर अपूर्व अर्थ को अवगति होने से यह विधि है, इस पूर्वपक्ष के

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वेदार्थपारिजात: ६४५ तदा ' प्रस्तरं प्रहरति ' इति वचनाद् यजमानोऽग्नी हुयेत, ततः प्रयोगो न समाप्येत । अथ यजमानकार्ये प्रस्तरो विधोयते तदानीमप्यशक्यविधिः । नहि प्रथमलूनदर्भमुष्टिः प्रस्तरः शक्नोति चेतनयजमानकार्यं कर्तुम् । तस्मात् प्रस्तरं वहिष उत्तरे सादयतीत्यस्य विधेरर्थवादः । द्वितीयादिलून मुष्टिर्बहिः । कथं तर्हि सामानाधिकरण्यं तत्राह - ' गुणवादस्तु ' इति ( जै ० सू ० १ । २ । १० ) । अर्थाद् गौणीवृत्त्या प्रस्तरे यजमानशब्दप्रयोगः । को गुण इत्यपेक्षायां ' तत्सिद्धिर्गुणाश्रय: ' ( जै ० सू ० १ | ४ | १३ ) तस्य यजमानस्य कार्य ऋतुनिवृत्तिः प्रस्तरादपि सिद्धयति । स हि जुह्वाधारतया ऋतुं निर्वर्तयति । ' आदित्यो यूप: ' इत्यत्र तेजस्वित्वं गुणः, तेजसा घृतेन युपस्याक्तत्वाद् इत्यादि । तस्माद्यत्र प्रमाणान्तरविरोधः, तत्र गुणवादेन प्राशस्त्यलक्षणा लक्षितलक्षणा । यत्र तु प्रमाणान्तरसंवादस्तत्र प्रमाणान्तरादिनार्थवादादपि सोऽर्थः प्रसिद्धयति द्वयोः परस्परानपेक्षयोः प्रत्यक्षानुमानयो-रिर्वकत्रार्थे प्रवृत्तेः । प्रमानपेक्षया त्वनुवादकत्वम् । प्रमाता ह्यव्युत्पन्नः प्रथमं यथा प्रत्यक्षादिभ्योऽयं मवगच्छति, न तथाम्नायतः, तत्र व्युत्पत्त्याद्यपेक्षत्वात् । न तु प्रमाणापेक्षयानुवादकत्वम्, द्वयोः स्वार्थेऽनपेक्षत्वात् । ननु मानान्तरविरोधेऽपि कस्माद् गुणवादः? शब्दविरोधे मानान्तरमेव कस्मान्न बाध्यते? यथा वेदान्तरद्वैतविषये प्रपञ्चगोचरा: प्रत्यक्षादयः कस्माद्वा अर्थवादवद्वेदान्ता अपि गुणवादेन न नीयन्त इति चेत्तन्न, शब्दानां द्वारतस्तात्पर्यंतश्च विषयद्वैविध्येनादोषात् । यथैकस्मिन् वाक्ये पदार्था द्वारतो वाक्यार्थश्च तात्पर्यंतो विषयः, एवं वाक्यद्वयैकवाक्यतायामपि । यथेयं गौः क्रेतव्येत्येकं वाक्यम्, एषा बहुक्षीरेत्यपरम् । अत्र बहुक्षीरत्वप्रतिपादनं द्वारं उत्तर में सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि यदि प्रस्तर के कार्य में यजमान का विधान किया जायगा तो ' प्रस्तर को अग्निसात् करता है ' इति वचन से यजमान को अग्नि में समर्पित कर देना पड़ेगा और इस प्रकार प्रयोग अपूर्ण रह जायगा । यदि यजमान के कार्य के लिये प्रस्तर को अधिकृत किया जाय तो भी विधि संभव न हो सकेगी, क्योंकि प्रथम काटी गई दर्भमुष्टि को प्रस्तर कहा जाता है । यह अचेतन प्रस्तर चेतन यजमान के कार्य को नहीं कर सकता । इसलिये ' प्रस्तर को बाँह के उत्तर में रखते है ' इस विधि का यह अर्थवाद वाक्य है । दूसरी बार काटी गई दर्भमुष्टि को नहि कहा जाता है । इनका सामानाधिकरण्य ' गुणवादस्तु इस जैमिनि सूत्र में प्रदर्शित पद्धति से बनेगा । अर्थात् गोणी वृत्ति से प्रस्तर के लिये यजमान शब्द प्रयुक्त होता है । गुण क्या है? इसका उत्तर ' तत्सिद्धिर्गुणाश्रय: ' इस जैमिनि सूत्र में दिया गया है । याग को संपन करना यजमान का कार्य है, यह कार्य प्रस्तर से भी सिद्ध होता है, क्योंकि वह जुहू का आधार बन कर यज्ञ की सम्पन्न करता है । ' आदित्य यूप है ' यहाँ पर तेजस्विता गुण है, क्योंकि यूप पर तेज रूपी घृत का लेप रहता है । इसलिये जहाँ पर प्रमाणान्तर से विरोध उपस्थित हो, वहाँ गुणवाद के आधार पर प्राशस्त्य बताने वाली लक्षितलक्षणा होती है । जहाँ प्रमाणान्तर से संवाद हो, वहाँ पर प्रमाणान्तर से और अर्थवाद से भी वह अर्थ प्रतिपादित हो सकेगा । जैसे कि परस्पर अनपेक्ष प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण से एक ही अर्थ की सिद्धि होती है । प्रमाता की अपेक्षा से इसमें अनुवादकता रहेगी । अव्युत्पन्न प्रमाता जैसे पहले प्रत्यक्षादि प्रमाण से किसी वस्तु को जानता है, उस तरह शास्त्र से नहीं जान पाता, क्योंकि शास्त्र के ज्ञान के लिये व्युत्पत्ति आदि की अपेक्षा रहती है । प्रमाण की अपेक्षा से अनुवादकता नहीं बनती, क्योंकि दोनों हो स्वार्थ के अवबोध में इतर निरपेक्ष हैं । प्रश्न होता है कि प्रत्यक्ष आदि प्रमाण से विरुद्ध अर्थ का प्रतिपादक शब्द गोणी वृत्ति से अर्थलाभ करेगा, ऐसा क्यों माना जाय? शब्द प्रमाण विरोधी अन्य प्रमाण ही क्यों न बाधित माने जायें, जैसे कि अद्वैतविषयक वेदान्त वाक्यों से प्रपंचविषयक प्रत्यक्ष आदि प्रमाण बाधित होते हैं । अथवा अर्थवाद वाक्यों के समान वेदान्त वाक्यों का भी गौणी वृत्ति से क्यों न अर्थ किया जाय? इसका उत्तर है कि शब्द द्वारतः और तात्पर्यतः अपने विषय का दो प्रकार से प्रतिपादन करता है, अतः उक्त दोष नहीं होगा । जैसे कि एक वाक्य में विद्यमान पदों का अर्थ द्वारतः तथा वाक्य का अर्थ तात्पर्यंत: जाना जाता है, उसी भांति दो वाक्यों की एक वाक्यता करने पर भी होगा । जैसे कि ' यह गाय खरीदने योग्य है ' यह एक वाक्य है और ' यह बहुत दूध देती है ' यह दूसरा ।

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६४६ बेवार्थपारिजातः तात्पर्यं तु क्रेतव्येति वाक्यान्तरार्थे । तत्र यद् द्वारतस्तत्प्रमाणान्तरविरोधेऽन्यथा नीयते, यथा विषं भुङ्क्ष्वेति वाक्यं शत्रुगृहे न भोक्तव्यमिति वाक्यान्तरार्थपरं सत् । यत्र तु तात्पर्यं तत्र मानान्तरविरोधे पौरुषेयमप्रमाणमेव स्यात् । वेदान्तास्तु पौर्वापर्यपर्यालोचनया निरस्तसमस्त भेदप्रपञ्चब्रह्मप्रतिपादनपराः । अपौरुषेयतया स्वतः सिद्धतात्त्विक-प्रमाणभावाः सन्तः प्रत्यक्षादीन्येव तात्त्विक प्रमाणभावात् प्रच्याव्य सांव्यावहारिक प्रमाणभावे व्यवस्थापयन्ति । न च ' आदित्यो ग्रुप: ' इति वाक्यमादित्यस्य यूपत्वप्रतिपादनपरम् अपि तु यूपस्तुतिपरमेव । तस्मात् प्रमाणान्तर-विरोधे द्वारभूतोऽर्थी गुणवादेन नीयते । यत्र तु प्रमाणान्तरविरोधो न स्यात्, यथा देवताविग्रहादी, तत्र द्वारतोऽपि प्रतीयमानो विषयो न त्यक्तुं शक्यते, न च गुणवादेन नेतुं शक्यते, सम्भवति मुख्ये गौणाश्रयणऽतिप्रसङ्गात् । ननु तथा सति प्रमाणान्तरानधिगतं विग्रहादिकं प्रतिपादयत् तात्पर्यार्थं च बोधयद् वाक्यं भिद्येतेति चेन्न, तादृशप्रसङ्गे वाक्यभेदाङ्गीकारेऽपि दोषाभावात् । न च तहि तात्पर्यभेदोऽप्यस्त्विति वाच्यम्, द्वारतोऽपि तदवगतो तात्पर्यान्तरकल्पनाऽयोगात् । न च यत्र यस्य न तात्पर्यं तस्य तत्र न प्रामाण्यमिति वाच्यम्, तथात्वे विशिष्टपरवाक्यस्य तात्पर्याभावेन विशेषणेष्वप्रामाण्यापत्या विशेषणाविषयत्वेन विशिष्टपरत्वानुपपत्त्यापातात् । यदि तु विशिष्टविषयत्वेन विशेषणप्रमित्याक्षेपस्तदा परस्पराश्रयत्वापत्तिः ", आक्षेपाद्विशेषणप्रतिपत्तों सत्यां विशिष्टविषयत्वं विशिष्टविषयत्वाच्च तदाक्षेप इति । ननु पदैः पदार्था योग्यता दिवशेन विशेषणविशेष्यभूता लोकतो गम्यन्ते तदवगतौ च प्रतीतो विशिष्ट-विधिविशेषण विधीनामाक्षेप्ता भवेदिति चेन्न, वाक्यकणम्यस्यापि विशेषणस्य सम्भवात् । ' यथैतस्यैव रेवतीषु यहाँ पर ' बहुत दूर देने वाली है, ' इसके प्रतिपादन के द्वारा इस वाक्य का ' इसको खरीदना चाहिये ' इस दूसरे वाक्य में तात्पर्य है । यहाँ पर हारतः प्रतीत हुए अर्थ का यदि प्रमाणान्तर से विरोध प्रतीत हो तो उसका तात्पर्यतः अर्थ गृहीत होता है । जैसे कि ' विष खामो ' यह वाक्य तात्पर्यतः बतलाता है कि शत्रु के घर में भोजन नहीं करना चाहिये । शब्द जब तात्पर्यतः किसी अर्थ को बताता हैं, तब उसका अर्थ यदि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरुद्ध प्रतीत होता है, तो ऐसी अवस्था में पौरुषेय वाक्य प्रमाण नहीं माना जायगा । इसके farta darra वाक्य समस्त भेद प्रपंच का खण्डन कर ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं । वेदान्त वाक्य अपौरुषेय हैं, इनका प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है, अतः ये प्रत्यक्षादि प्रमाणों को ही यथार्थ प्रमाण की पदवी से हटाकर इनकी सांव्यावहारिक अर्थात् कल्पित प्रमाणता व्यवस्थापित करते हैं । ' आदित्य यूप है ' यह वाक्य आदित्य को यूप नहीं बताता, अपि तु यूप की स्तुति करता है । इसलिये प्रमाणान्तर से विरोध होने पर द्वारभूत अर्थ गुणवाद से अन्यत्र ले जाया जाता है । देवता शरीरधारी हैं, इत्यादि स्थलों में जहाँ पर कि प्रमाणान्तर से विरोध नहीं है, द्वारतः प्रतीयमान अर्थ भी नहीं छोड़ा जा सकता और न गुणवाद से अन्यत्र ही ले जाया जा सकता है, क्योंकि मुख्य अर्थ की विद्यमानता में गौण अर्थ का ग्रहण उचित नहीं होता । ऐसा होने पर प्रमाणान्तर से अनधिगत विग्रह आदि का प्रतिपादन करने वाला और साथ ही तात्पर्यार्थ का बोध भी कराने वाला attr fr न मानना पड़ेगा, तो ऐसे प्रसंगों में वाक्यभेद कोई दोष नहीं है । ऐसे स्थलों में तात्पर्य का भेद इसलिये उचित नहीं है कि द्वारत: भी उसी अर्थ की प्रतीति होने से उससे भिन्न तात्पर्य की कल्पना नहीं की जा सकती । जिसका जहाँ तात्पर्य नहीं हैं, उसका वहाँ प्रामाण्य नहीं हो सकता, यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर विशिष्टपरक वाक्य का विशेषणों में तात्पर्य के अभाव में अप्रामाण्य होने से विशिष्ट में भी तात्पर्य नहीं बन पावेगा । विशिष्टविषयक प्रतीति होने से विशेषण का प्रामाण्य आक्षेपलभ्य है, ऐसा मानने पर अन्योन्याश्रय दोष होगा, क्योंकि आक्षेप से विशेषण की प्रतीति होने पर विशिष्ट वस्तु का बोध होगा और विशिष्ट विषयक बोध होने पर आक्षेप से विशेषण की प्रतीति होगी । यदि यह कहा जाय कि योग्यता आदि के कारण पदों के द्वारा विशेषणविशेष्यभूत पदार्थों की प्रतीति लोक व्यवहार के अनुसार होती हैं, विशेषण और विशेष्य की अवगति के बाद हुई विशिष्ट विधि की प्रतीति विशेषण विधि का आक्षेप करेगी,

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II वारवन्तीयमग्निष्टोमसाम कृत्वा पशुकामो ह्येतेन यजेत ' इत्यत्र विशिष्टविधो रेवन्तीनामृचां वारवन्तोयसाम्नश्च सम्बन्धी विशेषणं तच्च वाक्यैकगम्यम् । तस्माद्यथा विशिष्टप्रत्ययपरेभ्यो वाक्येभ्योऽपि विशेषणानि प्रतीयमानानि तस्यैव वाक्यस्य विषयत्वेनानिच्छताप्यम्युपेयानि, तथान्यपरेम्योऽप्यर्थवादवाक्येस्यो देवताविग्रहादयः प्रतोयमाना असति प्रमाणान्तरविरोधे न त्यक्तुं शक्याः, मुख्यार्थसम्भवे गुणवादायोगात् । एतेन --- अर्थवादा मानान्तरापेक्षाः सिद्धार्थत्वात् पुंवाक्यवद् इति न देवताविग्रहादौ प्रमाणमस्तीति तेषामप्रामाण्यमेवेत्यप्यपास्तम्, सापेक्षस्य मूलमान रहितत्वेनाप्रामाण्यऽप्यपौरुषेये तदयोगात् । वाक्यस्य सतः सापेक्षत्वे पौरुषेयत्वस्योपाधित्वात् । तस्माद् भूतार्थमप्यपौरुषेयं वाक्यं न मानान्तरापेक्षम्, अपौरुषेयत्वेनंतदन-पेक्षणात् । ननु यदि तात्पर्येक्येऽपि वाक्यभेदस्तहि कथमर्थेकत्वादेकं वाक्यम्, ' अर्थैकत्वादेकं वाक्यं साकाङ्क्ष चेद्वि-भागे स्यात् ' ( जै ० सू ० २२११४२ ) इति न्यायविरोधात् सवितुः प्रसवे ' इति मन्त्रे । एतत्सूत्रार्थस्तु -तत्र -- ' देवस्य स्वा भिन्नं वाक्यमेकं वाक्यं वेति संशये पदानामर्थं भेदात् समुदायस्यावाचकत्वाद् भिन्नं वाक्यमिति प्राप्ते सिद्धान्त: --एकप्रयोजनोपयोगिविशिष्टार्थस्यैक्यात्तद्बोधकपदान्येकं वाक्यम्, तच्च तर्ह्येव स्याद् यदि पदविभागे सति पदवृन्दं साकाङ्क्ष स्यात् । अत एव ' भगो विभजत्वर्यमा वा विभजतु ' इत्यत्र सत्यपि विभजत्यर्थैक्येऽनाकाङ्क्षत्वेन वाक्य-भेदः । ' स्योनं ते सदनं कृणोमि तस्मिन् सोद, अमृते प्रतितिष्ठ ' इत्यत्रापि सत्यपि साकाङ्क्षत्वेऽर्थभेदेन वाक्यभेदः । तथा च तात्पर्ये rs पि वाक्यभेदाभ्युपगम एतदधिकरणविरुद्ध एवेति तन्न, यथा सत्यपि वाक्यैकवाक्यत्वे प्रयाजादिवाक्या-यह इसलिये उचित नहीं है कि विशेषण सर्वत्र लोकगम्य ही नहीं होता, कहीं - कहीं केवल वेद वाक्य से भी विशेषण की प्रतीति होती है । जैसे कि ' रेवती नामक तीन ऋचाओं से संबद्ध वारवन्तीय अग्निष्टोम साम का अनुष्ठान करके पशुकाम पुरुष इससे यजन करे ' इस श्रुति में प्रतिपादित विशिष्ट विधि में रेवती नामक ऋचाओं का और वारवन्तीय साम का विशेषण विशेष्यभाव संबन्ध केवल वाक्य से ही अवगत होता है । इसलिये जैसे विशिष्ट अर्थ के बोधक वाक्यों से प्रतीयमान विशेषणों को बिना चाहे भी उसी वाक्य का विषय मानना पड़ता है, उसी तरह अन्य अर्थ के लिए प्रयुक्त अर्थवाक्य वाक्यों से देवता शरीरधारी हैं, इस प्रकार की अर्थावगति होती है, तो उसको प्रमाणान्तर से यदि विरोध नहीं है, तो छोड़ा नहीं जा सकता । मुख्य अर्थ को उपस्थिति में गुणवाद की अपेक्षा नहीं होती । उपर्युक्त विवेचन से इस उक्ति का भी खंडन हो जाता है कि अर्थवादवाक्य सिद्धार्थ के प्रतिपादक होने के कारण पुरुष वाक्य के समान अपने प्रामाण्य में प्रमाणान्तर की अपेक्षा रखते हैं, अतः उनसे देवता शरीरधारी हैं, यह बात सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि यद्यपि मूल प्रमाण के अभाव में सापेक्ष वाक्य प्रमाण नहीं माना जाता, तथापि अपौरुषेय वाक्य में यह नियम लागू नहीं होता । सापेक्ष arts at astr णता में पौरुषेयत्व उपाधि विद्यमान है । इसलिये भूतार्थं प्रतिपादक होने पर भी अपौरुषेय वाक्य के लिये प्रमाणान्तर की अपेक्षा नहीं होगी, क्योंकि अपौरुषेय होने से ही वह प्रमाणान्तर निरपेक्ष होगा । तात्पर्य की एकता में भी यदि वाक्यभेद माना जायगा तो फिर एक अर्थ के लिये एकवाक्यता के जैमिनि प्रतिपादित न्याय से विरोध होगा । ' अर्थकत्वात् ' इत्यादि सूत्र का अर्थ यह है- ' देवस्य त्वा ' इस मन्त्र में भिन्न वाक्य है या एक? संशय की इस अवस्था में पदों का अर्थ भिन्न - भिन्न है और समुदाय के वाचक न होने से भिन्नवाक्यता उचित है, इस पूर्वपक्ष की उपस्थिति में सिद्धान्त पक्ष बतलाया गया है कि एक प्रयोजन के उपयोगी विशिष्ट अर्थ की एकता के कारण विशिष्ट अर्थ के बोधक पदों की एकवाक्यता होगी । यह तभी हो सकता है, जब कि पदों के विभाग में एक समूह साकांक्ष हो । इसीलिये ' भग देवता अथवा अर्थमा देवता इसका विभाग करे ' इस श्रुति में विभाग रूप अर्थ की एकता में भी निराकांक्ष होने से वाक्यभेद होगा । ' तुम्हारे लिये सुन्दर घर बनाता हूँ, उसमें तुम बैठो, अमृत में निवास करो ' यहाँ पर साकांक्ष होने पर भी अर्थभेद के कारण वाक्यभेद होता है । इसलिये तात्पर्य की एकता में वाक्य-भेद मानना उक्त अधिकरण के विरुद्ध होगा । इसका उत्तर है कि जैसे पूरे प्रकरण की एकवाक्यता रहने पर भी प्रयाजादि वाक्यों का

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III वेदार्थपारिजातः नामवान्तरभेदः, एवमर्थवादानामप्यवान्तरवाक्यत्वे बाधाभावः । जैमिनीयैरपि स्तुति लक्षयितुं तत्तत्पदार्थ विशिष्टंक-पदार्थ प्रतीतिरभ्युपेया, अन्यथाऽभिधेयाविनाभावरूपः शक्यसम्बन्धो न स्यादित्युक्तत्वात् । तथा चार्थवादाः स्तुतों पर्यवस्यन्तु । ततश्च वाक्येकवाक्यतामुपयन्तु । नन्वेवं प्रयाजादिवाक्येभ्योऽर्थवादानां को भेद इति चेदुच्यते, स्तुतिप्रतिपत्तिद्वारं विग्रहादि, प्रयाजादि-तु नान्यप्रतीतौ द्वारं किन्तु द्वारि स्वतात्पर्यविषयत्वात् । न चौदनं भुक्त्वा ग्रामं गच्छतीत्यत्रापि वाक्यभेदः स्यात् संसर्गभेदात्, अन्य ओदनं भुक्त्वा अन्यो हि ग्रामं गच्छतीति वाच्यम्, एकत्र प्रतीतेरपर्यवसानात् । भुक्त्वेति समान-कर्तृकता पूर्वकालता च प्रतीयते । अस्याश्चापरकालं क्रियान्तरप्रतीतिमन्तराऽपर्यवसानम्, तस्माद्यावति पदसमूहे पदाहिताः पदार्थस्मृतयः पर्यवस्यन्ति तावदेकं वाक्यम् | अर्थवादवाक्ये चैताः पर्यवस्यन्ति, विधिवाक्यं विनैव विशिष्टार्थ-प्रतीतेः । नन्वेवं द्वास्यां द्वाभ्यां पदाभ्यां विशिष्टार्थप्रत्ययपर्यवसानात् पञ्चषट्पदवत्येकस्मिन् वाक्ये नानात्वप्रसङ्गः स्यादिति चेन्न, विशेषणानां नानात्वेऽपि विशिष्टस्येकत्वेन तददोषात् । सकृच्छ्रुतस्य प्रधानभूतस्य विशेष्यस्य गुणभूत-विशेषणानुरोधेनावृत्त्ययोगात् । प्रधानभेदे तु वाक्यभेद इष्ट एव । प्रकृते तु विधिवाक्यादर्थवादस्यान्यत्वादुभयोर्वाक्ययोः स्वस्ववाक्यार्थप्रत्ययावसितव्यापारयोः पश्चात् कुतश्चिदपेक्षायां परस्परान्वयः । नम्वतत्परादपि वेदादर्थः प्रतीयेत, स यदि तात्पर्यगम्यार्थोपयोगी स्यात्, विशिष्टविधाविव विशेषणम्, देवताविग्रहादिकं न तथेति चेन्न इन्द्रादिदेवत्यानि हवींषि विद्वद्भिर्देयानीति विधिरेवेन्द्रादीनां स्वरूपज्ञानमपेक्षते, अर्थवादादिभिस्तत्स्वरूपं च समर्प्यते । तथाहि -- देवतोद्देशेन हविस्त्याग एव यागशरीरम् । न च स्वरूपरहिता इन्द्रा-अवान्तर भेद होता है, उसी तरह अर्थवाद वाक्यों की भी अवान्तर वाक्यता में कोई बाधा नहीं है । मीमांसकों को भी अर्थवाद वाक्यों की स्तुतिबोधकता के लिये तत्पदार्थ विशिष्ट एक समष्टि को प्रतीति माननी पड़ेगी । अन्यथा अभिधेय के साथ अविनाभाव रूप शक्य सम्बन्ध नहीं बन सकेगा | अतः अर्थवादों का पहले स्तुति में पर्यवसान होगा और बाद में उनकी विधिवाक्य के साथ एक-वाक्यता होगी । ser हैं कि तब प्रयाजादि वाक्यों से अर्थवादों का क्या भेद रह जायगा? उत्तर यह है कि अर्थवाद वाक्यों से स्तुति के द्वारा देवता के विग्रहादि की प्रतीति होती है, इसी तरह प्रयाजादि के द्वारा किसी अन्य पदार्थ की प्रतीति नहीं होती, क्योंकि उनका तात्पर्य अपने ही प्रतिपादन में है । ऐसा मानने पर ' भोजन करके गाँव जाता है ' यहाँ पर भी संसर्गभेद से वाक्यभेद हो जायगा, क्योंकि भोजन करने वाला दूसरा है और गाँव जाने वाला दूसरा यह उक्ति इसलिये ठीक नहीं है कि यहाँ पर एक ही जगह में प्रतीति का पर्यवसान नहीं होता । क्त्वा प्रत्यय से यहाँ पर एककर्तृकता और भोजन की पूर्वकालता प्रतीत होती है । अपरकाल और क्रियान्तर tata के बिना इस प्रतीति का पर्यवसान नहीं होता । इसलिये जितने पदसमूह में पदों के द्वारा संनिहित पदार्थ की स्मृति का पर्यवसान होता है, उतना एक वाक्य होगा | अर्थवादवाक्य में ही इनका पर्यवसान हो जाता है, क्योंकि इनसे विधिवाक्य की सहायता के बिना ही विशिष्ट अर्थ की प्रतीति होती है । यह कहना कि दो - दो पदों से ही विशिष्टार्थ प्रतीति का पर्यवसान हो जाने से पाँच, छः पदों वाले वाक्य अनेक माने जायेंगे, इसलिये उचित नहीं है कि विशेषणों के अनेक होने पर भी विशिष्ट के एक होने से नाना arts नहीं होंगे । एक बार सुने गये प्रधान विशेष्य की गुणभूत विशेषणों के कारण आवृत्ति नहीं होती । प्रधान के भेद से तो वाक्यभेद माना ही जाता । प्रकृत में विधिवाक्य से अर्थवादवाक्य भिन्न है, इसलिये इनके अपने - अपने वाक्यार्थ का बोध कराकर उपरत हो जाने पर भी पश्चात् किसी आकांक्षा के होने पर परस्पर अन्वय होता है । aar पर वेद से भी अर्थ की प्रतीति हो सकती है, यदि वह तात्पर्यगम्य अर्थ का उपयोगी हो । जैसे कि विशिष्ट विधि में विशेषण उपयोगी होता है । देवताओं के विग्रह आदि के प्रतिपादन का तो कोई उपयोग नहीं है, यह बात भी ठीक नहीं है । विद्वान् मनुष्यों को इन्द्र आदि देवताओं को उद्दिष्ट कर हवि देना चाहिये, यह विधि ही इन्द्र आदि के स्वरूप ज्ञान की अपेक्षा रखती है और

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वैवार्थपारिजातः ET दयश्चेतस्यारोपयितुं शक्यन्ते । न च चेतस्यनारूढायें तस्यै तस्यै देवतायें हविः प्रदातुं शक्यते । ' यस्यै देवतायै हवि -गृहीतं स्यात् तां ध्यायेद्वषट्करिष्यन् ' ( ऐ ० ब्रा ० ३।८ ) । अतो देवतारूपापेक्षिणा यागविधिनैव यादृशमभ्यपरेभ्योऽपि मन्त्रार्थवादेभ्यस्तद्रूपमवगतं तदभ्युपेयते, रूपान्तरकल्पनायां मानाभावात् । यथा ' व्रात्यो व्रात्यस्तोमेन यजेत ' इत्यत्र व्रात्यस्वरूपापेक्षायां यस्य पिता पितामहो वा सोमं न पिबेत् स व्रात्यः ' इति व्रात्यस्वरूपमवगतं व्रात्यस्तोमविध्य-पेक्षितं सद्विधिप्रमाणकं भवति । यथा ' स्वर्गकामो यजेत ' इति विध्यपेक्षितमर्थवादतोऽवगम्यमानं स्वर्गस्वरूपमलौकिकं विधिप्रमाणकं भवति, तथा देवतास्वरूपमपि विव्यपेक्षितत्वाद् विधिप्रमाणकमेव । यत्तु ' उद्देशो रूपज्ञानमपेक्षते न पुना रूपम्, देवताया: समारोपेणापि रूपज्ञानसुपपद्यते । तेन समारोपितमेव देवतास्वरूपमन्त्रार्थवादेरुच्यते ' इति, तदपि मन्दम्, सत्यं रूपज्ञानमपेक्षते विधिः, तस्य चाम्यतोऽसम्भवाद् मन्त्रार्थवादेभ्य एव तदवगन्तव्यम् । तस्य रूपस्या-सति बाघकेऽनुभवारूढं तथाभावं परित्यज्याभ्यथात्वमननुभूयमानं कल्पयितुम साम्प्रतम् । तस्माद्विध्यपेक्षितं मन्त्रार्थ-वादैरण्यपरैरपि देवतारूपं बुद्धाबुपनिधीयमानं विधिप्रमाणकमेवेति युक्तम् । ननु विघ्यपेक्षायामन्यपराद्वाक्यादवगतोऽर्थः स्वीक्रियते, प्रकृते नास्त्येव देवतास्वरूपापेक्षा, शब्दरूप -स्यैव देवतात्वात् तस्य च प्रत्यक्षगम्यत्वादिति चेत्र, शब्दमात्रस्य देवतात्वासम्भवात् शब्दार्थयोर्भेदात् । तस्मा-स्मस्त्रार्थवादयोरिन्द्रादीनां यादृशं रूपमवगम्यते, तादृशं शब्दप्रमाणकेन न प्रत्याख्यातुं युक्तम् । इतिहासपुराणमपि सम्भवन्मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवत्येव देवताविग्रहादि साघयितुम् । प्रत्यक्षादिमूलमपि तत्सम्भवति, अस्माकमप्रत्यक्ष-स्यापि चिरन्तनानां प्रत्यक्षत्वात । तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्ति स्मेति स्मर्यते । afare of artis से उनका स्वरूप अवगत होता है । किसी देवता को उद्दिष्ट कर दी गई हवि को ही याग कहते हैं । स्वरूप से रहित इन्द्रादि देवतालों का चित्त में आरोप नहीं किया जा सकता और न ध्यान में अनारूढ उस देवता को हवि ही दी जा सकती है । ' जिस देवता के लिये हर्दि का ग्रहण किया गया हो, उस देवता का ' वषट् ' इस शब्द का उच्चारण कर ध्यान करें ऐसा श्रुति कहती है । इस प्रकार याविधि को देवता के स्वरूप की अपेक्षा है, अतः अन्यपरक मन्त्र, अर्थवाद आदि से जैसा भी इनका स्वरूप ज्ञात होता है, वही यहाँ पर मान्य होता है, क्योंकि किसी दूसरे स्वरूप की कल्पना में कोई प्रमाण नहीं है । जैसे कि ' व्रात्य व्रात्यस्तोम से यजन करे ' यहाँ पर व्रात्य के स्वरूप की अपेक्षा होने पर जिसके पिता और पितामह ने सोमपान नहीं किया, वह व्रात्य है ' इस श्रुति से प्रात्यस्तोम fafe के लिये अपेक्षित व्रात्यस्वरूप की अवगति विधिप्रमाणक होती है । अथवा जैसे ' स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे ' इस विधि के लिये अपेक्षित स्वर्ग का अलौकिक स्वरूप अर्थवाद वाक्य से अवगत होकर विधिप्रमाणक होता है, उसी तरह देवता का स्वरूप भी विधि के लिये अपेक्षित होने से विधिप्रमाणक होता है । यह कहना कि उद्देश्य के लिये केवल रूपज्ञान की अपेक्षा है, रूप की नहीं । देवता के समारोप से भी रूपज्ञान हो सकता है, इसलिये मन्त्र, अर्थवाद आदि देवता के समारोपित स्वरूप को ही कहते हैं, इसलिये उचित नहीं है fe aft यह बात ठीक है कि विधि रूपज्ञान की अपेक्षा करती है, तो भी उसकी अवगति किसी अन्य प्रमाण से न होने से मन्त्र, aara आदि से हो वह जाना जाता है । किसी बाधक प्रमाण के अभाव में देवता का जो स्वरूप अनुभव पर चढ़ा हुआ है, उसको छोड़कर अननुभूयमान नये रूप की कल्पना उचित नहीं | इसलिये fafe के लिये अपेक्षित देवतास्वरूप अन्यपरक मन्त्र, अर्थवाद आदि से बुद्धि में आरूढ होकर भी विधिप्रमाणक ही माना जायगा, यह ठीक ही t fafe की अपेक्षा में aar यपरक वाक्य से अवगत अर्थ स्वीकृत हो सकता है, प्रकृत में तो देवता के स्वरूप की अपेक्षा ही नहीं है, क्योंकि देवता शब्दरूप है, और वह प्रत्यक्षगम्य हैं, यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि शब्द और अर्थ में भेद होने से शब्दमात्र को देवता नहीं कहा जा सकता । इसलिये मन्त्र और अर्थवाद से इन्द्रादि का जैसा स्वरूप अवगत होता है, उसको शब्द को प्रमाण मानने वाले अस्वीकार नहीं कर सकते । इतिहास और पुराण भी मन्त्र और अर्थवादमूलक होने से देवादि के विग्रह आदि सिद्ध करने में समर्थ होते हैं । प्रत्यक्षादि भी उसमें प्रमाण हो सकते हैं । हम लोगों के लिये जो प्रत्यक्ष नहीं है, उसका भी प्रत्यक्ष चिरन्तन लोगों को हो सकता है | स्मृतियों में बताया गया • कि व्यास आदि ऋषिगण देवताओं के साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे । ८२

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** पदार्थ पारिजाता यत्तु दानानामिव पूर्वेषामपि नासीद्देवादिभिव्यवहर्तुं सामर्थ्यमिति तत्तुच्छम्, तथात्वे जगद्वे चित्र्या-पलापपत्तेः । इदानीमिव कदापि सार्वभौमः क्षत्रियो नासीदिति न कश्चिद्वक्तुं शक्नोतीति, तथात्वे राजसूयादिविधि-विरोधात् । इदानीमव्यवस्थितप्रायान् वर्णाश्रमधर्मात् दृष्ट्वा कश्चिन्तेवं वक्तुं शक्नुयाद्यत् कालान्तरेऽप्येवमेवा-व्यवस्थिता वर्णाश्रमधर्मा इति व्यवस्थाविधायिशास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गात् । तस्माद् धर्मोत्कर्षवशात् प्राचीना देवादिभि-र्व्यवजह रिति युक्तमेव । ' स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोग: ' ( यो ० सू ० २१४४ ) इत्यादिस्मृतिरपि स्वाध्यायाद्देवता-साक्षात्कारं वक्ति | योगोऽप्यणिमाद्यैश्वर्य प्राप्तिफलः | योगशास्त्रे यन्निरूप्यते तस्यापि प्रत्याख्यानं तु साहसमात्रमेव । ' पृथ्व्यप्तेजोनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्थ रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् || ' ( श्वे ० उ ० २।१२ ) इति श्रुतिरपि योगस्य माहात्म्यं स्पष्टमाह । एतदर्थस्तु - पादतलमारभ्याजानोः, जानोरारभ्यानाभि, नाभेरारस्याग्रीवम्, ग्रोवाया आकेशम रोहदेशम्, ततम्बाब्रह्मरन्ध्रं क्रमेण पृथ्व्यादिभूतानां धारणया पृथिव्यादिपञ्चभूतात्मके भूतगणे समुत्थिते । जिते योगगुणे अणिमादी प्रवृत्ते योगाभिव्यक्ताग्निमयं तेजोमयं ब्रह्मशरीरं प्राप्तस्य योगिनो रोगजरामृत्य्वादिभयं न भवति । सर्वथापि मन्त्रब्राह्मणदर्शिनामृषीणां सामथ्यं नास्मदीयेन सामर्थ्य-नोपमातुं युक्तम् । तस्मादितिहासपुराणमपि समूलम् असति बाधके लोकप्रसिद्धिरपि नापलापा । ' इति शुश्रुम धीराणां तद्विचक्षिरे ( ई ० उ ० १० ) इति श्रुत्या पूर्वेषामादरप्रदर्शनात् । तत्र भामतोकाराः एवं मन्त्रार्थवादादिभिः सिद्धे देवताविग्रहादी गुर्वादिपूजावद्देवतापूजात्मको यागो देवताप्रसादादिद्वारेण सफलोऽवकल्पते, अचेतनस्य पूजास्तुत्यादिकमप्रतिपद्यमानस्य तदनुपपत्तेः । न चैवं यज्ञकर्मणो देवतां प्रति गुणभावाद् देवतात: फलोत्पादे यागभावनायाः श्रुतं फलवत्त्वं यागस्य च तां प्रति तत्फलांशं वा प्रति ऐसा कोई कहे कि आजकल के समान प्राचीन लोगों को भी देवादि के साथ व्यवहार करने की सामर्थ्य नहीं थी तो यह गलत है । ऐसा कहने वाला जगत् की विचित्रता का प्रतिषेध करता है और आजकल के समान अन्य समय में भी सार्वभौम क्षत्रिय नहीं थे ऐसा कहे, तो राजसूय आदि विधि बाधित हो जायगी । आजकल के समान अन्य समय में भी वर्णाश्रम धर्म अव्यवस्थित प्रायः थे, ऐसी प्रतिज्ञा करें तो ऐसी स्थिति व्यवस्था के विधायक शास्त्र अनर्थक हो जायेंगे | इससे सिद्ध होता है कि धर्म के उत्कर्ष के कारण प्राचीन लोग देवादि के साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे, यह युक्त ही है । ' स्वाध्याय से इष्ट देवता का सांनिध्य मिलता है ' इत्यादि स्मृति भी स्वाध्याय से देवता के साक्षात्कार को बतलाती है । योग से भी अणिमादि ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । योगशास्त्र में यह जो प्रतिपादित किया जाता है, उसका प्रत्याख्यान साहसमात्र है । ' पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पञ्च महाभूतों से बने शरीर में जब afra गुणों की प्रवृत्ति होती है, तब योगाग्नि से परिपूत उस देह में न कोई रोग होता है, न बुढ़ापा आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है ' यह श्रुति भी योग के माहात्म्य को स्पष्ट बताती हैं । इस श्रुति का अभिप्राय यह है कि पादतल से आरम्भ कर घुटने तक, घुटने से नाभि तक, नाभि से ग्रीवा तक, ग्रीवा से ललाट तक और इसके बाद ब्रह्मरन्ध पर्यन्त पृथ्वी आदि भूतों की धारणा से पृथिव्यादि पञ्च महाभूतों को जीत लेने पर अणिमादि योग गुण की प्रवृत्ति होती है । इससे यौगिक अग्नि से अभिव्यक्त तेजोमय ब्रह्मशरीर प्राप्त योगो को रोग, जरा, मृत्यु आदि का भय नहीं रहता । किसी भी तरह मन्त्र तथा ब्राह्मण रूप वेद के द्रष्टा ऋषियों की सामर्थ्य की अपनी सामर्थ्य से तुलना करना युक्त नहीं है । इसमें इतिहास, पुराण भी प्रमाण हैं । लोकप्रसिद्धि भी बाधक के अभाव में अपलाप योग्य नहीं है । ' इस प्रकार हमने उन वीर मनुष्यों से सुना है, जो कि हमको ज्ञान और कर्म का उपदेश देते रहे हैं ' इस श्रुति में हमने पूर्व पुरुषों के प्रति आदर देखा है । हाँ पर भामतीकर कहते हैं कि इस प्रकार मन्त्र, अर्थवाद आदि से देवताओं के शरीरी सिद्ध होने पर गुरु आदि की पूजा के समान देवपूजात्मक याग देवता के प्रसस्त होने पर सफल होता है । अचेतन में पूजा, स्तुति आदि को ग्रहण करने की सामर्थ्य न रहने से यह नहीं बन पावेगा । ऐसी बात नहीं है कि ऐसा मानने पर यज्ञकर्म का देवता के प्रति गुणभाव होने से देवता के प्रसाद से ही फलोत्पत्ति होगी, ऐसी दशा में याग भावना में सुनी गई स्वर्गादिफलवत्ता और याग की भावना अथवा फलांश के प्रति सुनी गई