वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 701–710
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 701–710
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वेदार्थपारिजातः ६७१ यतीति प्राणलिङ्गम्, ' न वाचं विजिज्ञासोत वक्तारं विद्यात् ' ( कौ ० ३१२ ) इति जोवलिङ्गम् | तथा चानेकलिङ्गदर्श-नात् संशयः । तथापि ब्रह्मपरमेव तद्वाक्यं ज्ञेयम्, कुतोऽनुगमात्, पौर्वापर्येण वाक्ये पर्यालोच्यमाने पदार्थानां समन्वयो ब्रह्मप्रतिपादनपर उपलभ्यते । तथा हि ' वरं वृणोष्व ' इतोन्द्रेणोक्तः प्रतर्दनः परमं पुरुषार्थं वरमुपचिक्षेप ' त्वमेव वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यसे ' ( को ० ३११ ), तस्मे हिततमत्वेनोपविश्यमानः प्राणः परमात्मेव स्यादिति युक्तम्, परमात्मज्ञानादन्यत्र हिततमप्राप्त्यसम्भवात् । ' तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( श्वे ० ३१८ ) इति श्रुतेः । परमात्मविज्ञान एव सर्वकर्मक्षयोपपत्तिः । स यो मां वेद न ह वै तस्य केनचन कर्मणा लोको मोयते ' ( कौ ० ३1१ ) इत्यपि ब्रह्मपरमेव वाक्यं सूचयति । ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ( मु ० राराट ) इति परमात्मविज्ञान एव सर्वकर्मक्षयबोधनम् । प्रज्ञात्मत्वं चापि ब्रह्मपक्ष एव युज्यते, अचेतनस्य वायुमात्रस्य प्राणस्य प्रज्ञात्मत्वानुपपत्तेः । उपसंहारेऽपि ' आनन्दोऽजरोऽसृतः ' ( कौ ० ३।९ ) इत्यानन्दादीन्यपि न ब्रह्मणोऽन्यत्र सम्यक् सम्भयन्ति । ' स न साधुना कर्मणा भुयान् भवति नो एवासाधुना कर्मणा कनीयानेष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनोषते ' इति शाङ्कर-भाष्ये उद्धृता श्रुतिः ' एष लोकाधिपतिरेष लोकपाल एष लोकेश: ' इति शाङ्करभाष्ये उद्धृता च श्रुतिः ( को ० ३1 ९ ) इत्यत्रोपलभ्यते । तदेतत्सर्वं परमात्मन्येव सम्भाव्यते । तस्मात् प्राणो ब्रह्मव, प्रत्यगात्मसम्बन्धबाहुल्याच्च । ' न वाचं विजिज्ञासोत वक्तारं विद्यात् ' ( को ० ३३८ ) इत्युपक्रम्य तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभाबरा अर्पिता एव-मेवैता भूतमात्रा: प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणे अर्पिता एवं प्राण एवं प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृत: ' ( को ० ३१ ९ ) विषयेन्द्रियव्यवहारानभिभूतप्रत्यगात्मानमेवोपसंहरति । ' सम आत्मेति ' ( कौ ० ३१ ९ ) इति चोपसंहारः परमात्मग्रहण आश्रय कर उसको उठाता है ' यह वचन प्राण का बोधक है । वाणी को नहीं, उसको बोलने वाले को जाने ' यह वाक्य जीव का परिचायक है | इस प्रकार प्रज्ञानात्मा में एक साथ अनेक लक्षणों का समावेश हो जाने से संशय उठना स्वाभाविक है, तो भी अनुगम के कारण इन सब वाक्यों को संगति ब्रह्म में ही मानी जानी चाहिये । जब हम पहले के और बाद के वाक्यों को आलोचना करते हैं, तो उनकी संगति ब्रह्म के प्रतिपादन में ही पूरी तरह से बैठती है । जैसे कि ' बर मांगो ' इन्द्र के ऐसा कहने पर प्रतर्दन ने परम पुरुषार्थ को ही वर के रूप में मांगा कि ' जिसको तुम मनुष्य के लिये हिततम समझते हो, वही वर मुझे दो ' । इन्द्र ने इसके बाद प्रतर्दन को मनुष्य के लिये हिततम ( सबसे अधिक कल्याणकारी ) मान कर प्राण का उपदेश दिया । यह प्राण परमात्मा ही हो सकता है । परमात्मा के ज्ञान के सिवाय अन्यत्र कहीं से भी हिततम की प्राप्ति हो नहीं सकती; क्योंकि श्रुति ने कहा है कि ' उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु से ऊपर उठकर अमृतत्व को प्राप्त करता है, इसके सिवाय उस पद की प्राप्ति का और कोई उपाय नहीं है ' । परमात्मा को ठीक से जानने पर ही सब कर्मों का क्षय हो सकता है । ' जो मुझे जान लेता है, उसका कोई कर्म जन्मान्तर का कारण नहीं बनता ' यह वाक्य भी ब्रह्म का ही बोधक है । ' उस परात्पर परमात्मा को देख लेने पर सब कर्मों का क्षय हो जाता है यह श्रुति बताती है कि परमात्मा को जानने से ही सब कर्मों का क्षय होता है । प्रज्ञानात्मा भी ब्रह्म ही हो सकता है, अचेतन वायुमात्र प्राण नहीं । उपसंहार में ' आनन्द, अजर, अमृत ' यहाँ प्रदर्शित आनन्द आदि धर्म भी ब्रह्म के सिवाय अन्यत्र कहीं सम्यक् रूप से नहीं मिल सकते । ' वह भले कामों से न तो बढ़ता है और न बुरे कामों से छोटा होता है । वह भगवान् ही उस व्यक्ति से भले काम कराता है, जिसको कि वह इस लोक से ऊपर उठाना चाहता है, ' यह लोकाधिपति, लोकपाल और लोकेश है ' इस प्रकार की श्रुतियाँ उपलब्ध होती है । यह सब परमात्मा में ही संभव हो सकता है । इसलिये यहाँ पर प्राण शब्द ब्रह्म का ही बोधक है । उपसंहार वाक्यों का संबन्ध अधिकतर प्रत्यगात्मा में मिलता है, इससे भी उक्त बात ही सिद्ध होती है । ' वाणी को नहीं, वाणी को बोलने वाले को जाने ' इस वाक्य से आरम्भ कर ' जैसे कि रथ की अरा में नेमि जुड़ी है और नाभि में अरा जुड़ी है, इसी तरह भूतमात्रा प्रज्ञामात्रा में और प्रज्ञामात्रा प्राण में अर्पित है । यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्द, अजर, अमृत है ' इस प्रकार विषय और इन्द्रिय के व्यवहार से असंपृक्त प्रत्यगात्मा का बोध उपसंहार में कराया गया है ।
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II दार्थ पारिजातः एवोपपद्यते । ' शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ' ( ब्र ० सू ० १1१1३० ), ' मामेव विजानीहि ' ( को ० ३११ ) इति प्रत्यक्-परमात्माभेदविवक्षया प्रत्यगात्मत्वेन तस्यैव व्यपदेशः । www. तथाप्यन्यत्र हिरण्यगर्भरूपमपरब्रह्मैव प्राणशब्दार्थः । तथाहि - ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' ( तै ० उ ० २ | ७ ), ' दाहुः किं तदसदासीदित्यृषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहु: के ते ऋषय इति । प्राणा वाव ऋषयः ' इत्यत्र प्रागुत्पत्तेः प्राणानां स्थितिः श्रूयते । तथा ' एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ' ( मु ० २१११३ ), ' सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् ' ( मु ० २ | १ | ८ ) इत्यत्र प्राणस्योत्पत्तिरपि श्रूयते । परमात्मनश्च- ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र: ' ( मु ० २१११२ ) इति प्राणभिन्नत्वं श्रूयते । उत्पत्तिमत्त्वेऽपि स्वविकारापेक्षया प्रागुत्पत्तेः प्राणानां सद्भावो न विरुद्धयते । ' सप्त वै शीर्षण्याः प्राणाः ' ( तै ० सं ० ५ १/७/१ ), ' सप्त वै शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाञ्ची ' ( तै ० सं ० ५/३/२/५ ) इत्यादिभिः ' तमुत्कान्तं प्राणोऽनुत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति ' ( बु ० ४/४/२ ) इत्यादी च परमात्म भिन्नप्राणस्य तमनु प्राणानां वागादीनामुत्क्रमणं श्रूयते । ' अणवश्च ' ( ब्र ० सू ० २२४/७ ) इत्यनेन सूक्ष्मत्वात् परिच्छिन्नत्वाच्चाणुत्व-सुक्तम्, न परमाणुतुल्यत्वात्, कृत्स्तदेहव्यापिकार्यानुत्पत्तिप्रसङ्गात् । तस्मात् सूक्ष्माः परिच्छिन्नाश्च प्राणाः । ' प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठवच ' ( छा ० ५ | १ | १ ) तस्य देहे प्रथमवृत्तिलाभाद् ज्येष्ठत्वं श्रेष्ठत्वं चोक्तम् । ' न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुम् ( बृ ० ६।१।१३ ) इह मुख्यप्राणस्य श्रेष्ठत्वमुक्तम् । ' न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ' ( ब्र ० सू ० २1४1 ९ ) स प्राणो न वायुः प्राणापानादयोऽपि न, नापि करण-व्यापाररूपा क्रिया । कुतः? पृथगुपदेशात् । वायोः प्राणस्य पृथगुपदेशात् । ' स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च ' ( छा ०३ / १८ / ४ ), ' एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ' ( मु ० २1१1३ ) इति प्राणस्येन्द्रियादिभ्यः पृथगुपदेशात् ' वही मेरा आत्मा है ' यह उपसंहार वाक्य भी परमात्मा में ही संगत हो सकता है | ' शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो ' इत्यादि ब्रह्मसूत्र में और ' मामेव विजानीहि ' इत्यादि श्रुतियों में प्रत्यम् परमात्मा के साथ अभेद को विवक्षा होने से प्रत्यगात्मा शब्द से परमात्मा का हो ar पदेश होता है । इस प्रकार यद्यपि यहाँ पर प्राण से हिरण्यगर्भ रूप अपर ब्रह्म बोधित होता है । शब्द से परमात्मा का ही ग्रहण होता है, तो भी ऐसे भी स्थल हैं, जहाँ पर प्राण शब्द जैसे कि ' सृष्टि के प्रारम्भ में असत् की सत्ता थी ', ' वह असत् क्या था? इसके उत्तर में बताया गया है कि ऋषि असत् रूप में थे । वे ऋषि कौन थे? बताया गया है कि प्राण ऋषि थे ' यहाँ पर सृष्टि की उत्पत्ति के पहले प्राणों की स्थिति बताई गई है । इसी तरह ' इसी से प्राण, मन और सन इन्द्रियों को उत्पत्ति होती है ', ' उससे सप्त प्राण उत्पन्न होते हैं ' यहाँ पर भी प्राण की उत्पत्ति सुनी गई है । ' वह परमात्मा प्राण और मन से भिन्न शुभ्र वर्ण है ' यहाँ पर परमात्मा को प्राण से भिन्न माना है । यद्यपि प्राण की भी उत्पत्ति होती है, तो भी अपने विकारों की अपेक्षा यह पूर्व उत्पन्न होता है । इसलिये सृष्टि के प्रारम्भ में इसकी सत्ता मानी जाती है । ' सात प्राण मनुष्य के शिरोभाग में रहते हैं ', ' सात प्राण मनुष्य के शिरोभाग में और दो अधोभाग में रहते हैं ', ' शरीर से आत्मा के निकल जाने पर प्राण उसके पीछे निकलते हैं और प्राण के निकल जाने पर उसके साथ और सब प्राण निकल पड़ते हैं ' इत्यादि स्थलों में परमात्मा से भिन्न प्राण का तथा वाणी इत्यादि अन्य सब प्राणों का शरीर से उत्क्रमण बताया गया है | ' अणवच ' इस ब्रह्मसूत्र में प्राणों की सूक्ष्मता और परिच्छिनता के कारण उसको अणु कहा गया है, परमाणु की तरह होने के कारण नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर सारे शरीर में व्यापूत कार्यों की उत्पत्ति न हो सकेगी । इसलिये प्राण सूक्ष्म और परिच्छिन्न है । ' प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ' यहाँ पर प्राण को ज्येष्ठ और श्रेष्ठ इसलिये कहा है कि शरीर में सबसे पहले प्राण का व्यापार ही प्रारंभ होता है । ' तुम्हारे बिना हम जीने में समर्थ नहीं होंगे ' यहाँ पर मुख्य प्राण की श्रेष्ठता बताई गई है । ' न वायुक्किये ' यहाँ बादरायण सूत्र में बताया गया है कि वह प्राण वायु से भिन्न है । प्राण अपान आदि से भिन्न है और यह प्राण करणव्यापार रूप क्रिया भी नहीं हैं, क्योंकि वायु से प्राण का अलग से उपदेश हैं । ' वह वायु की ज्योति से प्रकाशित होता है और तपता है । " ' इससे प्राण, मन और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती है ' यहाँ पर इन्द्रिय इत्यादि से भिन्न प्राण का उपदेश है | इससे
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वेदार्थपारित वागादिकरणवृत्तित्वमपि नोपपद्यते । ननु कथं तहि ' यः प्राणः स वायु: ' इति प्राणस्य वायुरूपत्वमेवोक्तमिति चेन्न, अध्यात्ममापन्नस्य पञ्चव्यूहात्मनाऽवतिष्ठमानस्य प्राणशब्दवाच्यत्वात् । यतो नापि तत्त्वान्तरं नापि वायुमात्रम्, तस्मात् प्राणस्य वायोश्च भेदोऽभेदश्वोपपद्यते । ' सुतेषु वागादिषु प्राण एवंको जागर्ति प्राण एवैको मृत्युनानाप्तः प्राणः संवर्गो वागादीन् संवृङ्क्ते प्राण इतरान् प्राणान् रक्षति मातेव पुत्रान् ' इत्यादिरूपो मुख्योऽपि प्राणो राजमन्त्रिवज्जीवस्य सर्वार्थकारित्वेन जोबस्योप-करणभूतश्च न स्वतन्त्रः । ' अथ ह प्राणा अहंश्रेयसि ब्यूदिरे ' ( छा ० ५।१।६ ) इत्युक्रम्य यस्मिन्व उत्क्रान्ते शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ: ' ( छा ० ५२ १३७ ) इत्युपन्यस्य प्रत्येकं वागाद्युत्क्रमणेनैकैकवृत्तिमात्रहीनं यथापूर्व जीवनदर्शनात् प्राणोच्चिक्रमिषायां वागादिशैथिल्यापति शरीरपातप्रसङ्गं च दर्शयन्ती श्रुतिः ' तान् वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमा पद्यथा अहमेवैतत् पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामि ' ( प्र ० २१३ ) इति चैतमेवार्थ द्रढयति । ' प्राणेन रक्षप्तवरं कुलायम् ' ( बु ० ४ | ३ | १२ ) इति चक्षुरादिमुप्तो प्राणनिमित्तां शरीररक्षां दर्शयति । ' कस्मिन्नमुत्कान्ते उत्कान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि ' ( प्र ० ६ १३ ), ' स ' प्राणमसृजत ' ( ० ६१४ ) इति च तन्निमित्तंव जीवोत्क्रान्तिः श्रूयते । मनोवदेव स प्राणापानादिपश्चवृत्तिः । ' अणुश्च ' ( ब्र ० सू ० २ | ४ | १३ ) इति मुख्यप्राणोऽपि सौक्ष्म्यात् परिच्छिनत्वाच्चाणुः । स एवाधिदैविकेन समष्टिव्यष्टिरूपेण हैरण्यगर्भेण प्राणात्मना विभुरूपेणाम्नायते । आध्यात्मिकेन रूपेण परिच्छिन्नः ' समः प्लुपिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोक: ' ( बृ ० १।३।२२ ) इति श्रुतेः । इसको वागादि करण वृत्तिरूप भी नहीं माना जा सकता । ' जो प्राण है, वही वायु है ' यहाँ पर वायु को ही प्राण इसलिये कहा गया er अध्यात्म में प्रवेश कर वायु ही पांच व्यूहों में विभक होकर निवास करती है, क्योंकि वह न तो वायु से भिन्न कोई नया तत्त्व है और न केवल वायु ही है । इसलिये प्राण और वायु का भेद भी हैं और अभेद भो । ' वाणी इत्यादि के सो जाने पर अकेला प्राण जागता है, यह प्राण ही मृत्यु की पकड़ में नहीं आता । यह संवर्ग प्राण वाणी इत्यादि इन्द्रियों का वरण करता है । माता जैसे पुत्र की रक्षा करती है, उसी तरह यह प्राण दूसरे प्राणों की रक्षा करता है यहाँ पर वर्णित मुख्य प्राण भी राजा के मन्त्री के समान जीव के सब प्रयोजनों को पूरा करने के कारण वह जीव का उपकरण है, स्वतन्त्र नहीं । ' प्राण इत्यादि में अपनी श्रेष्ठता के बारे में विवाद उठ खड़ा हुआ ' यहाँ से आरम्भ कर ' जिसके निकल जाने पर यह शरीर घोर पातकी के समान अस्पृश्य हो जाता है, वही तुममें श्रेष्ट है ' यह कह कर वाणी प्रसृति प्रत्येक इन्द्रिय के शरीर से निकल कर बाहर जाने पर शरीर केवल एक वृति से रहित भले ही हो जाता है, किन्तु उसमें जीवन पहले के समान ही विद्यमान रहता है । प्राण जब निकलने की तैयारी करता है तो वाणी प्रभृति सारी इन्द्रियों की शिथिलता और शरीर की मृत्यु के प्रसंग को दिखाती हुई श्रुति कहती है कि-' वरिष्ठ प्राण ने उन वाणी प्रभृति प्राणों से कहा कि तुम सब मोह में मत पड़ो । मैं ही अपने को पाँच रूपों में विभक्त कर इस शरीर को धारण करता हूँ ' इस प्रकार यह पूरा प्रकरण मुख्य प्राण की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करता है । ' प्राण इस घोंसले की रक्षा करता है ' हती है कि चक्षु आदि इन्द्रियों के सो जाने पर प्राण के द्वारा शरीर की रक्षा होती है । ' किसके निकलने पर मैं निकलूंगा और किसके ठहरने पर मैं टहरूँगा ', ' उसने प्राण की सृष्टि की ' यहाँ पर प्राण प्रयुक्त हो आत्मा की उत्क्रान्ति बताई गई है । मन के समान ही इसकी भी प्राण, अपान आदि पाँच वृत्तियाँ हैं । ' अणुव ' इस सूत्र में मुख्य प्राण को भी सूक्ष्म और परिच्छित होने से ' अणु ' बताया गया है | वही प्राण माधिदैविक समष्टि व्यष्टि रूप में हिरण्यगर्भ के प्राण के रूप में जब वर्णित होता है, तो विभु कहलाता है । आध्यात्मिक रूप से जब वह शरीर से परिच्छित होता है, तो चिनगारी के समान, मच्छर और नाग के समान तथा इन तीनों लोगों के समान होता है ' इस श्रुति के अनुसार न केवल सूक्ष्म एवं परिष्टि, अपि तु विभु और अपरिचित भी रहता है ।
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६७४ ' द्वयाह प्राजापत्या देवाश्वासुराश्च ततः कानीयसा एव देवा ज्यायसा असुरा: ' ( वृ ० १ | ३ | १ ) इत्युपक्रम्य ' ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविष्यन् ' ( बृ ० १।३।२ ), ' चक्षुरूचुः ' ( बृ ० १।३।४ ), ' मन ऊचु: ' ( बृ ० १ | ३ | ६ ), ' तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् । स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विष्वच विनेशु: ' ( बृ ० उ ० १।३।७ ) इत्यादिभिर्वागादीनामासुरपाप्मविद्धता, मुख्यप्राणस्यासुरपाप्मनाऽविद्धत्वात् तस्यैवोपास्यत्वमुक्तम् । पाप्मासङ्गलक्षण मृत्युदूरत्वात् तस्य दूर्नामोक्तम् । ' सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार ' ( बृ ० १ | ३ | १० ) इति प्राण एव वागादीनां पाप्मासङ्गमपहत्य दिगन्त प्रापणेन वागादीनां व्यष्ट्यभिमानमपसार्य समष्ट्यग्न्यादिभावं प्रापयामास । अत्र मुख्यस्य प्राणस्य समष्टि-हिरण्यगर्भप्राणाभेदेनोपास्यतोक्ता । ' सोऽग्निरभवत् ' ( बृ ० १ | ३ | १२ ), ' स वायुरभवत् ' ( बृ ० १ | ३ | १३ ), ' स आदित्योऽभवत् ' ( बृ ० १ । ३ । १४ ) इति श्रुतेः । तस्यैवाङ्गिरस बृहस्पतिब्रह्मणस्पतिसामादिरूपेण चोपास्यतोक्ता । समष्टिलिङ्गशरीराभिमानि चैतम्यस्यैव हिरण्यगर्भत्वं प्राणरूपत्वं चोक्तम् । तदुपासनपरिपाकेनोपासक इतरानवरोपासकानभिभूय ' पाप्मन औषत् ( बृ ० १ | ४ | १ ) पाप्मादिदाहात् पुरुषो भवति । हिरण्यगर्भो भूत्वापि ' सोऽबिभेत् ' ( बृ ० ११४१२ ), ' स वं नैव रेमे ' ( बृ ० ११४१३ ) इति तस्यापि भयारत्यादिमत्त्वेन संसारधर्मानतिक्रान्तिरुक्ता । वैराग्यपरब्रह्मवेदनाय च कारणब्रह्मरूपस्यान्तर्यामिण एव समष्टिसूक्ष्मशरीराभिमानेन हिरण्यगर्भत्वं समष्टिस्थूलशरीरवैशिष्ट्य ' न विराडू पत्वं माण्डूक्यादायुक्तम् । उपासकानां च तद्भावापन्नानां तद्रूपत्वं तदंशेनैव तत्र भयारत्यादिमत्त्वं विशेयम् । अन्तर्याम्यादीनां स्वीश्वरत्वमेव । अतस्तस्मात् ' देव और असुर प्रजापति को सन्तान है । इनमें देवता छोटे और असुर बड़े है ' यहाँ से बारम्भ कर ' उन्होंने वाणी से कहा कि हमारे लिये उद्गीथ का गान करो । वाणी ने उनकी बात स्वीकार कर ली । वाणी में जो भोग था, उसको देवताओं के लिये और जो कल्याण था, वह अपने लिये रख लिया । जब असुरों ने यह समझ लिया कि इस उनीय गान से हमारी विजय नहीं हो सकती तो उन्होंने वाणी को पाप से घेर दिया । इसी तरह चक्षु, मन आदि को भी पाप से घेर दिया । इस प्रकार पत्थर पर गिर कर मिट्टी का केला जैसे बिखर जाता है, उसी भाँति वे चारों तरफ से नष्ट हो गये ' इस श्रुति में वाणी प्रभूति इन्द्रियों की असुरों के पाप से faraar afra है | मुख्य प्राण से उसकी अविद्धता के कारण मुख्य प्राण हो उपाय है । पाप से अविद्ध, असंलग्न होने के कारण ही यह मृत्यु से दूर हैं, अतः इसको ' दुः ' नाम से कहा गया है । ' इस मुख्य प्राण देवता ने इन देवताओं के पाप को, मृत्यु को हटा कर उसको दिशाओं के अन्त तक दूर भगा दिया ' यहाँ पर प्राण ने ही वाणी प्रभृति से पाप को अलग कर उसको दिशाओं के अन्त में Bha दिया है । इसका यह अभिप्राय है कि प्राण ने वाणी प्रभृति का व्यष्टि में विद्यमान अभिमान दूर कर उनमें समष्टिभाव, अग्नि प्रभृति देवताओं के साथ अभेदभाव की प्रतिष्ठा को है । यहाँ पर मुख्य प्राण की समष्टिभूत हिरण्यगर्भ की प्राण से अभिन्न रूप में उपास्यता बताई है । ' वह अग्नि हुआ, वह वायु हुआ, वह आदित्य हुआ ' इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं । इसी की मांगिरस बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति साम के रूप में उपासना कही गई है । समष्टि लिंगशरीर के अभिमानी इसकी उपासना का परिपाक होने पर उपासक अन्य उपासकों को परास्त कर जल जाने से ' पुरुष ' बन जाता है । हिरण्यगर्भ हो जाने पर भी ' वह डर गया ', चैतन्य को ही हिरण्यगर्भ और प्राण कहा गया है । ' पाप्मन औषत् ' इस श्रुति के अनुसार सब पापों के ' उसको शान्ति सुख न मिला ' इन श्रुतियों में उसके भय, अरति आदि सांसारिक धर्मों से ऊपर न उठ पाने का वर्णन मिलता है । इसी लिये वैराग्य के सहारे परब्रह्म का अवबोध करने के लिये कारणब्रह्म रूप अन्तर्यामी को ही माण्डूक्य आदि श्रुतियों में समष्टि सूक्ष्म-शरीर का अभिमानी होने से हिरण्यगर्भ तथा समष्टि स्थूलशरीर विशिष्ट होने से विराट् कहा गया है । इनके उपासक इनके रूप की उपासना करते करते तद्रूप हो जाते हैं, किन्तु उनमें विद्यमान भय, बरति आदि से इसलिये विमुख नहीं हो सकते कि त
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वेदार्थपारिकातः ६७५ प्राणरूपाद् हिरण्यगर्भादेव ब्रह्मक्षत्रादीनामप्युत्पत्तिरुक्ता । ' ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकं सुन्न व्यभवत् तच्छ्रे यो-रूपमत्यसृजत क्षत्रम् ' ( बृ ० १ | ४ | ११ ) | शङ्करभगवत्पादास्तृतीयब्राह्मणोपसंहारे तदुपासनस्वरूपमाहुः- " य एवमेतत्साम प्राणं यथोक्तनिर्धारित-महिमानं वेदाहमस्मि प्राण इन्द्रियविषयासङ्गरासुरैः पाप्मभिरधर्षणीयो विशुद्धो वागादिपञ्चकं च मदाश्रयत्वादख्या-द्यात्मरूपं स्वाभाविक विज्ञानोत्थेन्द्रियविषयासङ्गजनितासुरपाप्मदोषवियुक्तं सर्वभूतेषु च मदाश्रयान्नाद्योपयोगबन्धनमात्मा चाहं सर्वभूतानामाङ्गिरसत्वाद् ऋग्यजुःसामोद्गीथभूतायाश्च वाच आत्मा तद्व्याप्तेस्तन्निवर्तकत्वाच्च मम साम्नो गीतिभावमापद्यमानस्य बाह्यं धनं भूषणं सौस्वर्यं ततोऽप्यान्तरं सौवर्ण्य लाक्षणिकं सौस्वयं गीतिभावमापद्यमानस्य मम कण्ठादिस्थानानि प्रतिष्ठा । एवं गुणोऽहं पुत्तिकादिश्वरीरेष कार्त्स्न्येन परिसमाप्तोऽमृतत्वात् सर्वगतत्वाच्चात्मा एव-मभिमानाभिव्यक्तेर्वेदोपास्तेरित्यर्थः ' इति । एवं हिरण्यगर्भमेव प्रकृत्य शङ्कराचार्याः प्राहु: -- ' केचित् पर एव हिरण्यगर्भः, ' इन्द्र मिश्रं वरुणमग्निमाहुः ' ( ऋ ० सं ० १ १६४।४६ ), ' एष ब्रह्मैव इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा: ' इति मन्त्रवर्णात् । स्मृतिरपि - ' एतमेके वदन्त्यग्नि मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ' ( मनु ० १२।१२३ ), ' योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः । सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्दभी । ' ( म ० १1७ ) इति । मैक्समूलरमतनिराकरणम् यत्तु - ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ' ( ऋ ० सं ० १० | १२१1१ ) एतन्मन्त्र-व्याख्यानावसरेऽयं मन्त्रोऽर्वाचीनोऽस्तीति भट्टमोक्षमूलरेण स्वकीये संस्कृतसाहित्याख्ये ग्रन्थ उक्तम्, तन्न सङ्गच्छते । यच्च अंशभूत हो तो वे हैं । अन्तर्यामी प्रभृति तो ईश्वर ही है । इसलिये इस प्राणरूप हिरण्यगर्भ से ही ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि की उत्पत्ति बताई गई है । ' ब्रह्म वा ' इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है । भगवत्पाद शंकराचार्य ने अपने बृहदारण्यक भाष्य में तृतीय ब्राह्मण के उपसंहार में उस उपासना का स्वरूप इस तरह बतलाया है - ' जो उपासक इस सामरूपी प्राण को जिसकी कि महिमा यहाँ बताई गई है, ठीक से जानता है और समझता है कि मैं इस प्राण में इन्द्रिय, विषय आदि से प्रसक्त असुर प्रदत्त पापों से स्पृष्ट न होने से विशुद्ध हैं । वाक् प्रभृति पाँच कर्मेन्द्रियां भी मेरी आश्रित हैं, अतः अग्नि यादि तदभिमानी देवताओं की स्वरूपभूत ये इन्द्रियों भी स्वाभाविक विज्ञान से, इन्द्रिय और विषय की आसक्ति से उत्पन्न हुए असुर प्रदत्त पापों के दोषों से विमुक्त हैं । सब भूत भी मेरे ही आश्रित है, अतः उनकी बन्धनरूपता समाप्त हो गई है । मैं आंगिरस हूँ, अत: सब भूतों का आत्मा हूँ । मैं ही ऋक्, यजुः साम और उद्गीथ रूप वाणी का आत्मा हूँ । उसमें मैं व्याप्त हूँ और उ eer fasures हैं, अतः जब मैं सामगान के रूप में उपस्थित होता हूँ तो मेरा बाहरी धन और भूषण सुरीला स्वर और भीतरी धन सुन्दर वर्ण हैं | मेरा बाहरी धन ही लाक्षणिक रूप से सामगान के समय कण्ठ आदि स्थानों में प्रतिष्ठित होता है । इन गुणों से युक्त होते हुए भी मैं पुत्तिका शरीर में पूरी तरह से प्रविष्ट हो जाता हूँ और इस परिस्थिति में भी अमूर्त और सर्वगत आत्मा हूँ । इसी अभिमान की अभिव्यक्ति के लिये वेद की उपासना विहित है । इसके बाद हिरण्यगर्भ के विषय में आचार्य शंकर कहते हैं कि कुछ लोगों का कहना है कि हिरण्यगर्भ परब्रह्म ही है । ' इसी को इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते है ' यह मन्त्र इसमें प्रमाण है । ' यह ब्रह्म ही इन्द्र, प्रजापति और सब देवताओं का स्वरूप है ' यहाँ पर भी वही बात कही गई है । ' इसको कोई अग्मि कहते हैं, कोई मनु, प्रजापति, इन्द्र, प्राण अथवा शाश्वत ब्रह्म कहते हैं ', ' यह जो इन्द्रियों का अग्राह्य, सूक्ष्म, अव्यक्त, सनातन, सर्वभूतमय, अचिन्त्य ब्रह्म है, वह स्वयं ही उत्पन्न हुआ है ' इत्यादि मनुस्मृति के वाक्यों में उक्त विषय ही प्रतिपादित है । मैक्समूलर के मत का खण्डन ' arter मैक्समूलर साहब ने अपने बनाये संस्कृत साहित्य ग्रन्थ में बहुत काल के पीछे ईश्वर का ज्ञान हुआ था । वेदों के प्राचीन होने में एक भी ऐसा लिखा है कि आये लोगों को क्रम से, अर्थात् प्रमाण नहीं मिलता, किन्तु उनके नवीन होने
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६७६ वेदानां द्वौ भागौ, एकश्छन्दो द्वितीयो मन्त्रश्च । तत्र यत्सामान्यार्थाभिधानं परतुद्धिप्रेरणाजन्यं स्वकल्पनया रचनाभावं यथा ज्ञानिनो सुखाकस्मात्रिःसरेद् ईदृशं तदचनं तच्छन्द इति विज्ञेयम् । तस्योत्पत्तिसमय एकत्रिंशच्छतानि वर्षाणि अधिकाधिका f न व्यतीतानि । तथेकोनत्रिंशच्छतानि वर्षाण मन्त्रात्पत्ती चेत्यनुमानं तेषामस्ति । तैरुक्तानि प्रमाणानि -- अग्निः ' पूर्वेभिऋषिभिरोड्यो नूतनेश्त ' ( ऋ ० सं ० ११११२ ) इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । दमयन्यथास्ति 1 कुतः, हिरण्यशब्दस्यार्थज्ञानाभावात् । अत्र प्रमाणानि - ' ज्योतिर्व हिरण्यम् ' ( श ० १० | ४ | १ | ६ ), ' ज्योतिरेषो अमृतं हिरण्यम् ' ( श ० १० | ४ | ११६ ), ' केशी - केशा रश्मयस्तैस्तद्वान् भवति । काशनाद्वा प्रकाशनाद्वा । केशोद ज्योतिरुच्यते ' ( नि ० १२/२५ ), ' यशो वे हिरण्यम् ' ( ऐ ० ब्रा ० ७१३ ), ' किज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मज्योति: ' ( श ० १४/७/११६ ), ' ज्योतिरिन्द्राग्नी ' ( श ० १० | ४ | १ | ६ ) । एषामर्थ: - ज्योतिविज्ञानं गर्भः स्वरूपं यस्य स हिरण्यगर्भः । एवं च ज्योतिर्हिरण्यं प्रकाशो ज्योतिरमृतं मोक्षो ज्योतिर्विद्युदित्यादयः । केशाः प्रकाशका लोकाश्च । यशः सत्कीर्तिर्धन्यवादश्च । ज्योतिरात्मा जीवश्च । ज्योतिरिन्द्रः सूर्योऽग्निश्च । एतत्सर्व हिरण्याख्यं गर्भ सामर्थ्ये यस्य स हिरण्यगर्भः परमेश्वरः । अती हिरण्यगर्भशब्दप्रयोगाद् वेदानामुत्तमत्वं सनातनत्वं तु न निश्चीयते, नवीनत्वं तु द्योतते । अस्य प्राचीनत्वे किमपि प्रमाणं नोपलभामहे, तद्भ्रममूलकमेव विज्ञेयम् । यच्चोक्त ' मन्त्रभागस्य नवीनत्वे ' अग्निः पूर्वेभिः ' इत्यादिकारणम्, तदपि तादृशमेव कुतः? ईश्वरस्य त्रिकालदशित्वात् । ईश्वरो हि त्रीन् कालान् जानाति । भूतभविष्यद्वर्तमानकालिकैर्मन्त्रद्रष्टुभिः प्राणैस्तर्केश्चषिभिरहमेवेडघो बभूव भवामि भविष्यामि चेति विदित्वेदमुक्त -मित्यदोष: । अन्यच्च ये वेदशास्त्राण्यधीत्य विद्वांसो भूत्वाऽध्यापयन्ति ते प्राचीना ये चाधोयते ते नवीना: । ऋषिभिरग्निः परमेश्वर एवडयो s स्त्यतश्च ( पृ ० ८४-८५ ) । में तो अनेक प्रमाण पाये जाते हैं । इनमें से एक तो ' हिरण्यगर्भ ' शब्द का प्रमाण दिया है कि छन्दोभाग से मन्त्रभाग दो सौ वर्ष पीछे बना है और दूसरा यह कि वेदों में दो भाग है -- एक छन्द और दूसरा मन्त्र । उनमें से छन्दोभाग ऐसा है जो सामान्य अर्थ के साथ संबन्ध रखता है और दूसरे की प्रेरणा से प्रकाशित हुआ मालूम नहीं पड़ता कि जिसकी उत्पत्ति बनाने वाले की प्रेरणा से नहीं हुई और उसमें कथन इस प्रकार का है कि जैसे अज्ञानी के मुख अकस्मात् वचन निकला हो । उसकी उत्पत्ति में इकतीत सो वर्ष व्यतीत हुये हैं और मन्त्रभाग की उत्पत्ति में उनतीस सौ वर्ष हुए हैं । इसमें ' अग्निः पूर्वेभि: ' इस मन्त्र का भी प्रमाण दिया है । सो उनका कहना ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि इन्होंने ' हिरण्यगर्भ ' और ' अग्निः पूर्वेसि: ' इन दोनों मन्त्रों का अर्थ यथावत् नहीं जाना है । मालूम होता है कि उनको ' हिरण्यगर्स ' शब्द नवीन जान पड़ा होगा, इस विचार से कि हिरण्य नाम है सोने का, यह सृष्टि से बहुत पीछे उत्पन्न हुआ है, अर्थात् मनुष्यों को उन्नति, राजा और प्रजा के प्रबन्ध होने के उपरान्त पृथिवी में से निकाला गया है । सो यह बात भी उनकी ठीक नहीं हो सकती, क्योंकि ' ज्योतिर्वे ० ' इत्यादि श्रुतियों के प्रमाण पर इस शब्द का अर्थ यह है कि हिरण्य नाम है ज्योति का, ज्योति कहते हैं विज्ञान को, सो जिसके गर्भ अर्थात् स्वरूप में है, ज्योति अमृत अर्थात् मोक्ष हैं सामर्थ्य में जिसके और ज्योति जो प्रकाश स्वरूप सूर्यादि लोक जिसके गर्भ में हैं, तथा ज्योति जो जीवात्मा जिसके गर्भ अर्थात् सामर्थ्य में है, तथा यशः सत्कीति जो धन्यवाद जिसके स्वरूप में है, इसी तरह ज्योति इन्द्र अर्थात् सूर्य, वायु और अग्नि ये सब जिसके सामर्थ्य में है, ऐसा जो एक परमेश्वर है, उसी को हिरण्यगर्भ कहते हैं । इस हिरण्यगर्भ शब्द के प्रयोग से वेदों का उत्तपन और सनातनपन तो यथावत् सिद्ध होता हैं, परन्तु उससे उनका नवीन कभी सिद्ध नहीं हो सकता । इससे डाक्टर मोक्षमूलर साहेब का कहना जो वेदों के नवीन होने के विषय में हैं, सो सत्य नहीं है । जो उन्होंने ' अग्निः पूर्वेभि: ' इसका प्रमाण वेदों के नवीन होने में दिया है, सो भो अन्यथा है, क्योंकि इसमें वेदों के कर्ता, त्रिकालदर्शी ईश्वर ने भूत, भविष्यत् वर्तमान तीनों कालों के व्यवहारों को यथावत् जान के कहा है कि वेदों को पढ़कर जो विद्वान् हो तथा ऋषि नाम मन्त्रद्रष्टा पुरुष, मन्त्र प्राण और तर्क का चुके हैं या जो पढ़ते हैं, वे प्राचीन और नवीन ऋषि लोग मेरी स्तुति करें । भी नाम है । इनसे ही मेरी स्तुति करनी योग्य है । इसी अपेक्षा से ईश्वर ने इस मन्त्र का प्रयोग किया है । इसे वेदों का सनातनपन
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verdufeam: इत्यादिमाक्षमूलरस्य खण्डनं कृतम्, तत्तु यत्किञ्चित् पूर्वपक्षस्वरूपतनिरसनयोरुभयोरप्यविज्ञानात् । भट्टमोक्षमूलर प्रयोऽपि तत्र नोचितः 2 तस्मिस्तदर्थासङ्गतेः । तदर्थाभिप्रायेण तत्रामकरणाभावाच्च । भट्टत्वं चट्-शास्त्राभिज्ञानामुपाधि च तत्र सोऽस्ति, तैरपि तदनङ्गीकारात् । neager कथनं तु विकल्पासह्त्वाश्विरस्थते । तथा हि - कोऽस्याभिप्रायः? किमयमभिप्राय यत् सृष्टे-बहोः कालादनन्तरं हिरण्यमुत्पन्नम्, यस्य चर्चास्मिन् मन्त्रेऽस्ति । तेन हिरण्यगर्भेति नाम्नाऽस्य मन्त्रस्य नवीनता विज्ञा-ग्ले, अथवा ' समवर्तताग्रे ' इतिशब्दाभ्यां भूतकालनिर्देशेनेदं विज्ञायते यदयं मन्त्रो हिरण्यगर्भोत्पत्तिसमये नासीदिति, यदि स्यातहि भूतकालनिर्देशो न स्यात् । नाद्यः पक्षः क्षोदक्षमः, मन्त्रे हिरण्यशब्देन ज्योतिर्मयब्रह्माण्डस्य विवक्षणेन प्रकृते सुवर्णवर्णनस्याप्रासङ्गिकत्वात् । अत एव सायण - महीघरोग्वटादिरीत्याऽस्य मन्त्रस्यायमर्थः - हिरण्मये ब्रह्माण्डे गर्भरूपेणावस्थितः प्रजापतिरेव हिरण्यगर्भः । स एवाग्रे प्राणिसृष्टेः पूर्वं समवर्तत सृष्टेरादौ जातः । भूतस्योत्पत्स्यमा-नस्य एकः पतिः स्वामी स आसीत् । स एव पृथिवीमुतेमां द्यां दाधार धारितवान् । कस्मे प्रजापतये हविषा विधेम परिचरेम | मनुनाऽप्ययमेवार्थो निरूपितः प्रथमेध्याये - ' योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः । सर्वभूत-मयोऽचिन्त्यः स एष स्वयमुद्बभौ || ७ || सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुविविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादी तासु वीर्यमवासृजत् || ८ || तदण्डमभवर्द्धमं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः || ९ || ' इति | एवं यदि प्रजापत्युत्पत्तेरपि पूर्वमेव हिरण्मयमण्डमासीत्, तदा सृष्टेर्बहोः कालादनन्तरं सुवर्णोत्पत्तिर्जातेति रिक्त वच: । ' सन्तुष्यतु दुर्जन: ' इति न्यायेन हिरण्योत्पत्तेः पश्चाद्भावेऽपि वैदिकशब्दानां नानित्या व्यक्तयोऽर्थः जाती और उत्तपन तो सिद्ध होता है, किन्तु उन हेतुओं से वेदों का नवीन होना किसी प्रकार से सिद्ध नहीं हो सकता । इस हेतु से डाक्टर मोक्षमूलर साहब का कहना ठीक नहीं ' ( पृ ० ८५-८६ ) इस प्रकार मोक्षमूलर के मत का खण्डन भी उचित रूप से नहीं हुआ । यहाँ पर पूर्वपक्ष का स्वरूप और उसका auer दोनों ही ठीक तरह से नहीं रक्खे गये हैं । ' भट्ट मोक्षमूलर ' यहाँ पर भट्ट पद का प्रयोग भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसमें भट्ट पद के अर्थ की संगति नहीं है । इस अर्थ के अभिप्राय से वह नाम रखा भी नहीं गया है । षट्शास्त्र के अभिज्ञाता को भट्ट कहा गया है । मोक्षमूलर में यह नहीं है, इस बात को उन्होंने भी माना ही है । मैक्समूलर के कथन में आगे दिये गये विकल्प का कोई उत्तर नहीं है । तदनुसार ही उसका खण्डन किया जाता है । हमारा पूछना है कि इन श्रुतियों की व्याख्या के द्वारा आप अपना क्या अभिप्राय बताना चाहते हैं? क्या आपका यह अभिप्राय है कि सृष्टि होने के बहुत समय बाद सुवर्ण ( हिरण्य ) उत्पन्न हुआ, जिसकी कि चर्चा इस मन्त्र में हैं, जिससे कि ' हिरण्यगर्भ ' इस नाम की aavaran परिज्ञान होता है? अथवा ' समवर्तत अग्रे ' इन दो शब्दों में भूतकाल का निर्देश होने से यह मालूम होता है कि यह मन्त्र हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति के समय में नहीं था? यदि होता तो यहाँ पर भूतकाल का निर्देश उचित नहीं । इनमें पहला पक्ष किसी आक्षेष को नहीं सहन कर सकता । मन्त्र में हिरण्य शब्द से ज्योतिर्मय ब्रह्माण्ड विवक्षित है, अतः यहाँ पर सुवर्ण का वर्णन समझना गलत है | इसलिये सायण, महीधर, उम्वद आदि को पद्धति से इस मन्त्र का अर्थ यह है- हिरण्मय ब्रह्माण्ड में गर्भरूप से अवस्थित प्रजापति ही हिरण्यगर्भ है । वहीं प्राणियों की सृष्टि के पहले विद्यमान था । वह सृष्टि की आदि में हुआ । आगे उत्पन्न होने वाले सारे जगत् का वह स्वामी था । उसी ने इस पृथिवी और इस आकाश को धारण किया । उस प्रजापति को हम हविः प्रदान करके सेवा करते हैं । मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में भी यही प्रतिपादित हैं --- ' यह जो अतीन्द्रिय, सूक्ष्म, अव्यक्त, सनातन, सर्वभूतमय, अचिन्त्य परमात्मा है, वह स्वयं उत्पन्न हुआ । उसने ध्यान करके विविध प्रजा की सृष्टि करने के अभिप्राय से अपने शरीर से सबसे पहले जल की सृष्टि की और उसमें अपना वीर्य स्थापित किया । वह वीर्य सूर्य के समान तेजोमय हैम अण्ड के रूप में परिणत हो गया । उस अण्ड में से सारे जगत् का पितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुवा । इस तरह से प्रजापति की उत्पत्ति के पहले ही यदि हिरण्मय a ण्ड विद्यमान था, तब यह कहना एकदम व्यर्थ है कि सृष्टि के बहुत समय बाद सुवर्ण को उत्पत्ति हुई । आपके सन्तोष के लिये हम हिरण्य की उत्पत्ति बाद में मान लेते हैं, तब भी वैदिक
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६७८ दार्थपारिजातः शक्तेरङ्गीकारात् । तदुक्तं जैमिनिना - ' आकृतिस्तु क्रियार्थी ( मी ० सू ० ११३/३३ ) क्रियाप्रयोजनत्वादाकृतिर्जातिरेव शब्दार्थः, यदि व्यक्तयः पदार्थाः स्युस्तदा ' श्येनचितं चिन्वीत ' ( तै ० सं ० ५ | ४ | ११ | १ ) इति विधेः श्येनपक्षिसदृशाकारा-मग्निवेदि चिम्वीतेत्यर्थो न स्यात्, किन्तु सर्वाभिः श्येनव्यक्तिभिस्तुल्यां वेदि चिन्वीत, अथवा कयाचित् श्येनव्यक्त्या तुल्यास्? नाद्यः पक्षः, एकस्या वेदेः सर्वश्येनवेदितुल्यत्वासम्भवात् । नान्त्य:, तथात्वे तस्या व्यक्तेनशि श्येनयाग-नावापत्तेः । यदि च श्येनत्वजातीयासु व्यक्तिषु स्यात्तदा तासां मध्ये कयाचित्तुल्या वेदिनिर्मातव्येति तदर्थः स्यात् । तथा च श्येनत्वजातिरेव श्येनपदार्थ इति सिद्धम् । एतदनुसारेण सर्वत्र पदानां जातावेद शक्तिः । देवतानिरूपणप्रसङ्गे-व्येतत् स्पष्टीकृतम् । अत्रैव भट्टपादोऽपि — ' विशेषं नाभिधा गच्छेत् क्षीणशक्तिविशेषणे ' इत्याह । यदा विशेषणभूतां जाति safear पदानि चरितार्थानि तदा क्षीणशक्तित्वाद् विशेष्यभूतां व्यक्त न गच्छेयुः, जातिबोधादेव नान्तरीयकतया व्यक्तिबोधसम्भवात् । तथा च हिरण्यव्यक्तीनां कादाचित्कत्वेऽपि जाते नित्यत्वात्तद्बोधकत्वेऽपि न वैदिकपदानाम-नित्यत्वं न वा तेन वेदानामनित्यत्वं कादाचित्कत्वं च सम्भवति । नान्त्यस्यापि पक्षस्य सम्भवः, यतो हि विधिवाक्यबलाधिकृताः पुरुषा मन्त्रान् द्रव्यदेवतास्मरणार्थं यज्ञेषु पठन्ति । तदेव मन्त्राणां मुख्यं प्रयोजनम् । वाच्यार्थे तु तेषां मुख्यं तात्पर्यं न भवति । संस्कृतव्याकरणानुसारेण भूतभविष्यद्वर्तमानकालानां निम्नोक्ता व्यवस्था --- शब्दोच्चारणाधिकृतः कालो वर्तमानः कालः । स च लट्प्रकृतिकैः ' ति, दे ' इत्यादि शब्देर्बोध्यते । वर्तमानकालात् पूर्वः कालो भूतकालः । स च लुङ्लङ्प्रकृतिकैः ' तू, त ' नादिभिर्बोध्यते । भूतकालेऽपि तिस्रो विधाः । तत्र ' तू ' आदयस्तावन्तमेव भूतं बोधयन्ति, उच्चारणकालात् प्राग् यावान् दिनभागो व्यतीतः शब्दों का अर्थ अनित्य व्यक्तियों से संबन्ध न रख कर जाति से संबद्ध माना जाता है । ' आकृतिस्तु क्रियार्थी ' इस जैमिनि सूत्र में बताया गया है कि क्रिया का प्रयोजन आकृति में सिद्ध होता है, अतः जाति ही शब्द का अर्थ माना जाता है । यदि व्यक्ति को पदार्थ माना जाय तो ' श्येनचितं चिन्वीत ' इस विधिवाक्य का पक्षी के सदृश आकार वाली वेदि का चयन करें, यह अर्थ न होकर सभी श्येन पक्षियों के सदृश वेदि का चयन करें अथवा किसी एक श्येन पक्षी सदृश? इस विकल्प को पैदा करेगा । इनमें पहला पक्ष नहीं बनेगा, क्योंकि एक ही वेदि सभी बाज पक्षियों के तुल्य नहीं बन सकती । दूसरा पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि उस श्येन पक्षी के मर जाने पर श्येन याग के भी नष्ट हो जाने की आपत्ति आवेगी । इसलिये श्येन जाति वाली व्यक्तियों की आकृति के तुल्य वेदि का निर्माण संभव हो सकेगा । इस तरह श्येनत्व जाति ही श्येन पद का अर्थ हुआ । तदनुसार सर्वत्र पदों की जाति में ही शक्ति मानी जायगी । देवता निरूपण के प्रसंग में भी हमने यह स्पष्ट किया है । इसी प्रसंग में भट्ट कुमारिल ने भो ' विशेष ' नाभिधा गच्छेत् ' इत्यादि प्रसिद्ध वचन कहा है । इसका यह अभिप्राय है कि जब विशेषणभूत जाति का बोध करा कर पद चरितार्थ हो गये, तब इस कार्य में उनकी शक्ति के क्षीण हो जाने से पुनः वे विशेष्य भूत व्यक्ति को अवगत कराने में असमर्थ हो जाते है । जाति का बोध हो जाने पर अगल्या व्यक्ति का बोध अपने बाप हो जाता है । इस तरह हिरण्य व्यक्ति के कदाचित् उत्पन्न होने पर भी हिरण्य जाति के नित्य होने से तद्बोधक वैदिक पदों में अनित्यता दोष नहीं वेगा और न वेदों की ही अनित्यता तथा कादाचित्कता संभव होगी । ' समवर्तत अग्रे ' इन दो शब्दों के माध्यम से उठाया गया दूसरा पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि विधिवाक्य के सहारे अधिकृत पुरुष यज्ञ में द्रव्य और देवता के स्मरण के लिये मन्त्रों का पाठ करते हैं । यहीं मन्त्रों का मुख्य प्रयोजन है । वाक्यों में उनका मुख्य तात्पर्य नहीं होता । संस्कृत व्याकरण के अनुसार भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल की व्यवस्था इस प्रकार है --जिस समय शब्द का उच्चारण हो रहा है, वह वर्तमान काल है । यह काल लट् लकार के ' ति ' ' ते ' इत्यादि प्रत्ययों से अवगत होता है । वर्तमान काल से पहले का समय भूतकाल है । इसका बोध लुङ्, लङ् आदि लकार के ' त् ' ' त ' आदि प्रत्ययों से होता है । भूतकाल के तीन ' भे हैं । ' तू ' आदि प्रत्ययोश उतने ही भूतकाल का बोध कराते हैं, जितना कि समय उच्चारण से पहले दिन के भाग का बीत चुका
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वेदार्थपारिजातः ६७६ स्यात् । यथा -- ' अगमत् । स एवाद्यतनभूत उच्यते । तन्मूलं लकारः । ' अगच्छत् ' यश्च क्रियाया उच्चारणदिनात् पूर्वकालः सोऽनद्यतनकालः लङ्वाच्यः । यदि चोच्चारणदिनात् पूर्वं क्रिया स्याद् उच्चारयित्रा च प्रत्यक्षेण न दृष्टा स्यात् तदा लिट्प्रकृतिकः ' तू ' प्रयोगो भवति, यथा जगाम । उच्चारणदिनात् पूर्वं गत उच्चारयित्रा च प्रत्यक्षेण गमनक्रिया न दृष्टा स चानाद्यतनपरोक्षभूतकाल उच्यते । तदबोधकत्वे लिट्प्रकृतिकाः ' त् ' ' अ ' ' ए ' इत्यादयः प्रयुज्यन्ते । उच्चारण-कालादुत्तरकालो भविष्यत्कालः । तस्यापि द्वैविध्यम् लृट्प्रकृतिकात् ' वय ' ' ति ' इत्यस्माद् उच्चारणदिवसीय उत्तरकालो बोध्यते । उच्चारणदिनादुत्तरकालोऽनद्यतनभविष्यदुच्यते । स च लुट्प्रकृतिकात् ' ता ' इत्यस्माद्बोध्यते । यथा - ' गन्ता ' । अनया रीत्या ' हिरण्यगर्भः समवर्तत ' तथा च यस्मिन् दिने s स्य मन्त्रस्योच्चारणमासीत् तस्मात्पूर्व हिरण्यगर्भः प्रादुर्बभूव । यदि मन्त्रः पौरुषेयः केनचित्पुरुषेण कृतस्तदा तु प्रथमोच्चारणकालमपेक्ष्य पूर्वकाले हिरण्यगर्भ-प्रादुर्भावः सिद्धयति, प्रथमोच्चारणस्यैव रचनापदार्थत्वात् । सिद्धान्तदृष्टया तु मन्त्रब्राह्मणात्मको वेदो s पौरुषेयः, तेनेश्वरोऽपि पूर्वपूर्वकल्पीयामेव वेदानुपूर्वीमुत्तरकल्प उपदिशति, तस्मादुच्चारणपरम्पराया अनादित्वादेवोच्चारणस्य प्राथम्यं नास्ति । तथा च कस्यचिदुच्चारणात् पूर्वकाले हिरण्यगर्भस्य प्रादुर्भावेऽपि न मन्त्रस्य नवीनत्वं सिद्ध्यति । वेद ईश्वररचित इति पक्षेऽपि मैक्समूलरस्याक्षेपोऽकिञ्चित्करः । यस्मिन् गस्मिन् दिने यो यः पुरुष इस मन्त्रमुच्चारयेत्, स ततः पूर्वकाले हिरण्यगर्भ प्रादुर्भावं स्मरेदिति तात्पर्येणैवेश्वरेणास्य मन्त्रस्य रचितत्वात् । यद्यपि ईश्वरकृतमत्र रचनाकाले हिरण्यगर्भो नासीत्, तथापि मन्त्रोच्चारयितॄणामुच्चारणकालात् पूर्वकाले हिरण्यगर्भस्या-विर्भाव आसीदेव | परमेश्वरस्य सर्वज्ञत्वेन भविष्यज्ञत्वात् तथा ज्ञानं न दुर्लभम् । स च स्वेनैव यज्ञेषु मन्त्राणा-मुच्चारणाय गुरुपरम्परया वेदाध्ययनाय न वैदान् विदधाति निष्कामत्वेनाप्तसमस्त कामत्वात्, किन्तु तेषां तेषां यज-मानानामृत्विजां चोच्चारणायाध्ययनाय च निर्माति । यथा यदा शिक्षको यजमानानामृत्विजां चोच्चारणशिक्षणाय हो, जैसे कि जगमत् । इसी को अद्यतन भूत कहते हैं । क्रिया के उच्चारण दिन से पहले का काल अनद्यतन काल है, उसमें लड् लकार होता है, जैसे कि अगच्छत् । यदि उच्चारण दिन के पूर्वकाल की क्रिया हो और उस क्रिया को उच्चारयिता ने प्रत्यक्ष न देखा हो, तब लिट् प्रकृतिक प्रत्यय होता है, जैसे कि जगाम । उच्चारण काल से आगे आने वाला समय भविष्यत्काल है | इसके दो भेद है -- लूट् प्रकृतिक ' य ' ' ति ' । इन प्रत्ययों से उच्चारण के दिवस का उत्तर काल बोधित होता है । उच्चारण दिन में आगे का काल अनद्यतन भविष्यत् कहलाता है । इसका घोष लुट् प्रकृतिक ता प्रत्यय से होता है | जैसे कि गन्ता । इस पद्धति से ' हिरण्यगर्भः समवर्तत ' यहाँ पर यह अर्थ होगा कि जिस दिन इस मन्त्र का उच्चारण किया गया था, उससे पहले हिरण्यगर्भ का प्रादुर्भाव हुआ । यदि मन्त्र पौरुषेय अर्थात् किसी व्यक्ति का बनाया गया होता, तब तो प्रथम उच्चारण की अपेक्षा से पूर्वकाल में हिरण्यगर्भ का प्रादुर्भाव सिद्ध हो सकता है, क्योंकि रचना पद का अर्थ प्रथम उच्चारण है । हमारे मल में तो मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद अपौरुषेय हैं, Free भी पूर्व पूर्व कल्प में विद्यमान वेद की आनुपूर्वी का स्मृति के आधार पर उत्तर कल्प में उपदेश देता है । इसलिये उच्चारण की परम्परा के अनादि होने से यहाँ पर उच्चारण का प्राथम्य बनता ही नहीं है । यतः किसी के उच्चारण से पूर्वकाल में हिरण्यगर्भ के प्रादुर्भाव को मानने पर भी मन्त्र की नवीनता नहीं होगी । वेद ईश्वर रचित हैं, इस पक्ष में भी मैक्समूलर का आक्षेप गलत है । जिस - जिस दिन जो - जो व्यक्ति इस मन्त्र का उच्चारण करे, वह उससे पूर्वकाल में हिरण्यगर्भ के प्रादुर्भाव का स्मरण करें, इसी तात्पर्य से ईश्वर ने इस मन्त्र की रचना की है । यद्यपि ईश्वर द्वारा की गई मन्त्र रचना के समय में हिरण्यगर्भ नहीं था, किन्तु मन्त्रों के उच्चारण करने वाले व्यक्तियों के द्वारा किये गये उच्चारण काल के पहले हिरण्यगर्भ का प्रादुर्भाव हो ही चुका था । परमेश्वर तो सर्वज्ञ होने से भविष्य की बात भी जान सकता है, अतः इस प्रकार का ज्ञान दुर्लभ नहीं है । वह स्वयं ही यज्ञों में मन्त्रों के उच्चारण के लिये तथा गुरुपरम्परा से वेदों के अध्ययन के लिये वेदों की रचना नहीं करता, क्यों fe f नष्काम होने से वह समस्त कामनाओं को प्राप्त कर चुका है, किन्तु यजमान और ऋत्विजों के उच्चारण और अध्ययन के लिये वह वेदों की रचना करता है । जैसे शिक्षक यजमान अथवा ऋत्विजों को उच्चारण की शिक्षा देने के लिये जब मन्त्र का
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६८० स्वयं मन्त्रमुच्चारयति तदा तस्येदमेव तात्पर्यं भवति यद् यजमानादयोऽप्येवमेवोच्चारयेयुः । तथैवेश्वरोऽपि कर्मठा उपासकाश्चोच्चारणकालात् पूर्वकाले प्रादुर्भूतं हिरण्यगर्भं चिन्तयेयुरित्यभिप्रायेणैव मन्त्रानुच्चारयति विरचयति वा । अतः परमेश्वरकर्तुं कोच्चारणात् पूर्वकाले हिरण्यगर्भ आविर्बभूवेति न विवक्षितम्: लौकिकलुङाद्यर्थापेक्षया वैदिक-लुङाद्यर्था विलक्षणा एव भवति । वेदानामनादित्वात् केऽपि लुङादयस्तादृशा न सन्ति ये भगवत्कर्तृ कवेदोच्चारणा-पेक्षा पूर्वकालबोधका भवेयुः । तस्माच्छिक्षणीयपुरुषापेक्षया तत्तदुच्चारणकालात् पूर्वकाल एव लुङाद्यर्थः । लोकेऽपि शिक्षा वाक्येभ्योऽन्यत्रैवोच्चारणापेक्षया पूर्वकालो लुङाद्यर्थोऽभ्युपगम्यते । हिरण्यगर्भश्च समष्टिसूक्ष्मशरीरावच्छिन्न-चेतनरूप ईश्वर एव, सूक्ष्मशरीरे बुद्धिप्राधान्याद् हिरण्यं ज्योतिर्बुद्धिरूपं गर्भे यस्य स हिरण्यगर्भः । हिरण्यशब्देन ज्योतिर्मयं नित्यज्ञानं वा गर्भे यस्य स हिरण्यगर्भ इति च । स चेश्वर ईश्वरकर्तुं कमन्त्रोच्चारणादपि पूर्वमासीदेव | गर्भ-पदस्य स्वरूपं सामथ्र्यं वार्थ इति तु प्रमाणापेक्षमेव । वस्तुतस्तु येषु कालेषु लडादयो भवन्ति, न तेषां वस्तुत्वं तत्प्रयोगे कारणम्, किन्तु वक्तृतात्पर्यानुसारेण aster: प्रयुज्यन्ते । अत एव यद्यपि परोक्षानद्यतनभूतायें लिविधानम्, तथापि वक्तृतात्पर्यानुरोधेन लुप्रयोगोऽपि दृश्यते । यथा- -- ' ' अभूम्नूपो विबुधसखः ' ( भट्टिकाव्यम् १1१ ) अत्र बभूवेति वक्तव्यत्वेऽपि मदुच्चारणात् पूर्वकाल आसी-दिति विवक्षया लुङ्लकार प्रयुक्तः । एवमेव ' अध्यास्त सर्वर्तुसुखामयोध्याम् ( भट्टि ० ११५ ) अत्रापि तथैव विवक्षा मन्तव्या । अन्यथा ' जज्वाल लोकस्थितये स राजा ' इतिवल्लिट्प्रयोग एव स्यात् । एवं ' व्यातेने किरणावलीमुदयनः ' इत्यादिस्यलेषु किरणावलीग्रन्यनिर्माणकाल एवानद्यतनभूतार्थक लकारं प्रयुक्तवानुदयनाचार्यः । अनायास निष्पन्नता-बोधनार्थं भूतत्वं शीघ्रनिष्पन्नतावोवनार्थमनद्यतनत्वं विवक्षितम् । ra rare दर्पणकार: ' न वास्तवं परीक्षादि-उच्चारण स्वयं करता है, तब उसका यह तात्पर्य रहता है कि यजमान और ऋत्विक भी इसी प्रकार उच्चारण करें, वैसे ही ईश्वर भी इसी अभिप्राय से मन्त्रों का उच्चारण और विरचन करता है कि कर्मठ उपासक उच्चारण काल से पूर्वकाल में प्रादुर्भूत हिरण्यगर्भ का ध्यान करें । अतः यहाँ पर परमेश्वर कृत उच्चारण के पूर्वकाल में हिरण्यगर्भ आविर्भूत हुआ था, यह विवक्षित नहीं है । लौकिक लुकादि की अपेक्षा से वैदिक लुङादि का अर्थ विलक्षण ही होता है । वेद अनादि हैं, अतः यहाँ पर लुङादि का ऐसा अर्थ कभी नहीं होगा कि वे भगवान् द्वारा किये गये वेद के उच्चारण के पूर्वकाल के बोधक हों । इसलिये शिक्षणीय पुरुष की अपेक्षा से उसके उच्चारण का पूर्वकाल ही लुङादि का अर्थ होगा । लोक में भी शिक्षा वाक्यों से अन्यत्र ही उच्चारण की अपेक्षा से पूर्वकाल लुङादि का अर्थ माना गया है । हिरण्यगर्भ सूक्ष्म शरीरों की समष्टि से युक्त चेतन स्वरूप ईश्वर ही है । सूक्ष्म शरीर में बुद्धि की प्रधानता है, अत: हिरण्य वह हिरण्यगर्भ है । अथवा हिरण्य शब्द से ज्योतिर्मय नित्य ज्ञान का ग्रहण होगा, यह जिसके यह ईश्वर ईश्वरकृत मन्त्रोच्चारण से पहले भी था । गर्भपद का स्वरूप ear सामर्थ्य अर्थ अर्थात् ज्योतिरूप बुद्धि जिसके गर्भ में है, गर्भ में है, वह हिरण्यगर्भ कहलायेगा । करना बिना प्रमाण के सम्भव नहीं । वास्तव में जिन कालों में लट् श्रादि लकारों का प्रयोग होता है, उनकी अवस्थिति उनके प्रयोग में कारण नहीं होती, किन्तु वक्ता के तत्पर्य के अनुसार लट् आदि का प्रयोग होता है । इसीलिये यद्यपि परोक्ष अनद्यतन भूतकाल में लिट् लकार का विधान है, तथापि वक्ता के तात्पर्य के अनुसार लुङ् का भी प्रयोग होता है । जैसे कि ' अभून्नुपो विबुधसख ' इस भट्टिकाव्य के पद में ' बभूव ' पद का प्रयोग होना चाहिये था, किन्तु उसके स्थान में विवक्षा के अनुसार बङ् लकार का प्रयोग किया गया है, इसी तरह ' अध्यास्त सर्व सुखामयोध्याम् ' यहाँ पर विवक्षा के अनुसार लङ् लकार प्रयुक्त हुआ है । अन्यथा ' जज्वाल लोकस्थितये स राजा ' इसके समान उक्त दोनों स्थलों में भी लिट् लकार का ही प्रयोग होता । इसी तरह ' व्यातेने किरणावलीमुदयनः ' यहाँ पर किरणावली अन्य के निर्माण के काल में ही उदयनाचार्य ने अनद्यतन भूतार्थक लिट् लकार का प्रयोग विवक्षाधीन ही किया है । यहां पर ग्रन्थ की रचना बिना आयास के हुई, यह बताने के लिये भूतकाल की और शीघ्र पूरी हो गई, इस भाव की अभिव्यक्ति के लिये अनद्यतन की विवक्षा है । इसीलिये दर्पणकार ने कहा है कि --- परीक्षादि काल लिट् आदि लकारों के वास्तविक नियामक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर ' अध्यास्त