वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 711–720

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 711–720

पृष्ठ 711

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बेवार्थपारिजातः ६८१ लिडादिनियामकम्, ' अभ्यास्त सर्वर्तुसुखामयोध्याम् ' इत्यत्र लङोऽसाधुत्वापत्तेः । एवं ' रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ' ( वा ० रा ० १ | १ | ९ ७ ) इत्यत्रानद्यतनत्वाविवक्षया प्रयातेति लुप्रयोगं न कृतवान् महर्षिः, किन्तु राज्यकरणो तरकालमात्र विवक्षया लूटं प्रयुक्तवान् ' । एवमेव ' वारिदस्तृप्तिमाप्नोति ' ( स ० ४१२२ ९ ) अत्र तृप्तिजलदानयोः कार्यकारण-भावमात्रविवक्षया लट्प्रयोगो न वर्तमानकालबोधार्थम् । कालसामान्यं वा लडर्थः । तथैव ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' इत्यत्रापि हिरण्यगर्भस्यास्तित्वपृथिव्यादिधारणकर्तुं त्वविवक्षयैव लप्रयोगः । न भूतकालोऽत्र लर्थः । अत एव वेदे लङादीनां कालसामान्यमेवार्थ:, न भूतकालः । ' छन्दसि लुललिट: ' ( पा ० सू ० ३।४१६ ) इति सूत्रेण येषु येष्वर्थेषु ङायो विहिताः तद्भिन्ने कालसामान्ये वेदे भवन्तीत्युक्तम् । तत्र लुङ उदाहरणानि ' देवो देवेभिरागमत् ' ( ऋ ० सं ० १।१५ ), तेभ्योऽकरं नमः ' ( ऋ ० सं ० १० ८५/१७ ) इत्यादीनि । ' अग्निमद्य होतारमवृणीतायं सुतासुती यजमानः ' ( तै ० ब्रा ० २/६/१५/१ ) इति लङ उदाहरणम् । ' अद्या ममार ' ( तै ० आ ० ४।२०1१ ) इति लिट उदाहरणम् । वेदस्यापीरुषेयत्वादेव पाणिनिर्वेदे लुङादीनां कालसामान्यमेवार्थमुक्तवान् । भूतादिबोधकत्वे कदाचिद्वेदासत्वापत्त्या-नादित्वभङ्गापत्तिः स्यात् । एवमेव निष्ठाप्रत्ययस्य अग्रे पुरा पूर्वम् आदिशब्दानामपि वेदे न वेदात् पूर्वार्थबोध -कत्वम् । किन्त्वन्योन्यापेक्षया पूर्वकालार्थमेव । तद्रीत्या ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' ( वा ० सं ० १३।४ ) इत्यस्य अग्रे प्रतिसगं सुष्टे: पूर्वकाले हिरण्यगर्भः ब्रह्मा समवर्तत भवति । एवं सिद्धान्तं ज्ञात्वैव चार्वाकादयो नास्तिका अपि वैदिकशब्दैर्वेदानामर्वाचीनत्वसाधनाय न प्रयतितवन्तः । ततोऽपि मन्दाः पाश्चात्त्यास्तदनुगामिनो दयानन्दस्तदीयाश्च लुङादिभिर्मन्त्राणां ब्राह्मणानां च सादित्वं पौरुषेयत्वं चापादितवन्तः । ननु वेदे लुङादीनां भूतार्थत्वाभावे भूतार्थवादासङ्गतिः, भूतार्थबोधकत्वेनैवार्थवादविशेषस्य भूतार्थवादत्व-प्रसिद्धेरिति चेन्न, स्वार्थेऽवान्तरतात्पर्यवत्वेन गुणवादानुवादभिन्नार्थवादे भूतार्थवादत्वप्रसिद्धेः । अत एव प्रातिशाख्ये सर्वर्तुसुखामयोध्याम् ' यहाँ पर ललकार का प्रयोग गलत हो जायगा । इसी तरह ' रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ' यहाँ पर महर्षि वाल्मीकि ने अनद्यतन की अविवक्षा के कारण ' प्रयाता ' इस लुट्लकार का प्रयोग नहीं किया, किन्तु राज्य करने के उत्तर काल मात्र की विवक्षा में लृट् का प्रयोग किया । इसी तरह ' वारिदस्तृप्तिमाप्नोति ' यहाँ पर केवल तृप्ति और जलदान की कार्यकारणता मात्र की विवक्षा से लट्लकार का प्रयोग है, वर्तमान काल के अवबोध के लिये नहीं । अथवा कालसामान्य के लिये लट् का प्रयोग हुआ है, उसी तरह ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' यहाँ पर भी हिरण्यगर्भ के अस्तित्व, पृथिव्यादिधारणकर्तृत्व आदि की विवक्षा से ही लङ्लकार का प्रयोग हुआ है । यहाँ पर लड़ का अर्थ भूतकाल नहीं है । इसीलिये वेद में लङादि का कालसामान्य हो अर्थ है, भूतकाल नहीं । ' छन्दसि लुललिट: ' इस पाणिनि सूत्र में यह बताया गया है कि जिन - जिन अर्थों में लोक में लुङ् आदि का विधान हुआ है, उससे भिन्न कालसामान्य में भी वेद में इनका प्रयोग होता है । इनमें ' देवो देवेभिरागमत् ', ' इदं तेभ्योऽकरं नमः ' इत्यादि लुङ के उदाहरण हैं । ' होतारमवृणीत ' यह लङ् का उदाहरण है । ' अद्या समार ' यह लिट् का उदाहरण है । वेद के अपौरुषेय होने से ही पाणिनि ने वेद में लुङादि का कालसामान्य अर्थ बताया है । भूतादि का बोधक मानने पर कदाचित् वेद के असत्व की आपत्ति के कारण वेद की अनादिता नष्ट हो सकती है । इसी तरह निष्ठा प्रत्यय की तथा आगे, पुरा, पूर्व आदि शब्दों को वेद में भी वेद के पूर्ववर्ती अर्थ की बोधकता नहीं मानी जाती, किन्तु अन्योन्य की अपेक्षा पूर्वकाल तामात्र की बोधकता है | इसी पद्धति से ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' यहाँ पर भी ' अ ' पद का अर्थ प्रति सर्ग में सृष्टि के पूर्व काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, यही किया जाता है । इस सिद्धान्त को जानने के हो कारण चावकि प्रभृति नास्तिकों में वैदिक शब्दों से वेदों की अर्वाचीनता सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं किया । ये पाचात्य विद्वान्, उनके अनुयायी दयानन्द और उनके शिष्य इन नास्तिकों से भी अधिक मन्द वृद्धि के हैं कि ये लोग लुङ् आदि लकारों के प्रयोग मात्र से मन्त्र और ब्राह्मण भाग की सादिता और पौरुषेयता सिद्ध करना चाहते हैं । प्रश्न उठता है कि यदि वेद में लुडादि की भूतार्थता नहीं मानी जायगी, तो भूतार्थवाद की के बोधक होने से ही अर्थवादविशेष का नाम भूतार्थवाद पड़ता है? इसका उत्तर यह है कि स्वार्थ में ८६ कैसे सङ्गति बैठेगी, भूत अर्थ अवान्तर तात्पर्य के कारण

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** वेदार्थपारिजातः कात्यायनोऽपि ' लौकिकानामर्थं पूर्वकत्वात् ' इत्युक्त्या लौकिकवाक्यानां प्रतिपिपादयिषितार्थज्ञानपूर्वकं प्रयोगं मनुते । वैदिकानां तु नित्यत्वान्न तथेति । अतो वैदिकवाक्यैर्न सर्वथापि भूतकालवोघोऽभिमतः । पूर्वोक्तसूत्रप्रातिशाख्याद्यनभिज्ञा एव वेदेषु लौकिक मितिहासं पौरुषेयत्वं च सिषाधयिषति । यानेव कुतर्कान् सामाजिका ब्राह्मणेषूत्थापयन्ति ते मन्त्रेष्वप्यापतन्त्येव । तत्र यत्तेषां समाधानं तदेव ब्राह्मणेष्वपि । मैक्समूलर प्रोक्तश्छन्दो मन्त्रविभागोऽपि निःसारः, निष्प्रमाणत्वात् । वैदिकानां व्यवहारे तु छन्दः शब्देन मन्त्रब्राह्मणात्मको वेदोऽभिधीयते । एवं छन्दोमन्त्रयोः कालविशेषकल्पनापि निराधारंव, छन्द: पदाभिधेयस्य वेदस्य मन्त्रपदाभिधेयस्य वेदेकदेशस्य चानादित्वाविशेषात् । ' अग्निः पूर्वेभि: ' ( ऋ ० सं ० १ १ २ ) इत्यादिमन्त्रगतपूर्वशब्दस्य न वेदगतपूर्वकालस्वमर्थः, किन्तु तेन ऋषीणामेव प्राचीनत्वं नवीनत्वं चोक्तम् । तदपि न वेदापेक्षया, किन्तु ऋषीणा-मेवान्योन्यापेक्षया प्राचीनत्वं नवीनत्वं च वेदानां नित्यत्वेन तत्र प्राचीनत्वनवीनत्वकल्पनानुपपत्तेः । " यत्तु स्वामिदयानन्देन ऋषिभिरित्यस्य भूतभविष्यद्वर्तमान कालस्थैर्मन्त्रद्रष्टृभिर्मनुष्यैर्मन्त्रैः प्राणैस्तर्केश्व-षिभिरित्यर्थः ( पृ ० ८५ ) कृतस्तत्रेदं विचारणीयम् - यद्यप्यृषिशब्देन मन्त्रद्रष्टारो मन्त्राः प्राणास्तर्काचोच्यन्ते, तथापि मन्त्रेषु न प्राचीनत्वं नवीनत्वं वा वक्तुं शक्यते, तेषां नित्यत्वात् । प्राणास्तश्च चेतना अचेतना वा? नाद्यः त्वया तदनभ्युपगमात् । नान्त्य:, स्तुतेर्जडकर्तृत्वासम्भवात् । ' ये वेदादिशास्त्राण्यधीत्य विद्वांसो भूत्वाध्यापयन्ति ते प्राचीनाः, ये चाधीयते ते नवीनाः, ते ऋ षिभिरग्निरीड्यः ' ( पृ ० ८५ ) इति, तदपि निर्मूलम्, अध्यापयितृषु अध्येतृषु चर्षित्वस्य निष्प्रमाणकत्वात् । मन्ये तद्वचनेनैव दयानन्दीयैर्दयानन्दस्य पित्वं महर्षित्वं च ख्यापितम् । गुणवाद और अनुवाद से भिन्न अर्थवाद को भूतार्थवाद कहा जाता है । इसीलिये प्रातिशाख्य में कात्यायन ने ' लौकिकानामर्यपूर्वकत्वात् ' इस उक्ति के द्वारा लौकिक वाक्यों के प्रयोग को उस अर्थ के परिज्ञान के साथ जोड़ दिया है, जिसका कि प्रतिपादन अभीष्ट है । वैदिक वाक्यों की नित्यता के कारण वहीं यह संभव नहीं है । इसलिये वैदिक वाक्यों से सर्वथा भूतकाल का बोध अभिमत नहीं है । पूर्वोक्त सूत्र, प्रातिशाख्य आदि से अनभिज्ञ जन ही वेदों में लौकिक इतिहास देखते हैं और उसमें पौरुषेयता सिद्ध करना चाहते हैं । जिन कुतर्कों की उत्थापना सामाजिक गण ब्राह्मणों के लिये करते हैं, वे सब मन्त्रों में भी लागू होते हैं । ऐसी अवस्था में मन्त्रों के लिये जो समाधान दिया जाता है, वह ब्राह्मणों के लिये भी लागू होता है! का बताया हुआ छन्द और मन्त्र का विभाग भी निःसार है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है । वैदिकों के व्यवहार में तो छन्दः शब्द से मन्त्रब्राह्मणात्मक वैद का ग्रहण होता है । इसी तरह छन्द और मन्त्र को काल की कल्पना भी निराधार ही है, क्योंकि छन्दः पदाभिधेय पूरे वेद और मन्त्रपद से अभिहित होने वाले वेद के एक भाग की अनादिता समान रूप से मान्य है । ' अग्निः पूर्वेभि: ' इत्यादि मन्त्रगत पूर्व शब्द से मन्त्रगत पूर्वापरभाव का बोध न होकर केवल ऋषियों की प्राचीनता और नवीनता का बोध होता है | यह भी वेद की अपेक्षा से न होकर ऋषियों की ही परस्पर प्राचीनता और नवीनता को लेकर होता है । वेद तो नित्य है, वहाँ प्राचीनता और नवीनता की कल्पना नहीं हो सकती । यह जो स्वामी दयानन्द ने ' ऋषिभि: ' इस शब्द का भूत, भविष्य और वर्तमान में स्थित मन्त्रद्रष्टा मनुष्य, मन्त्र, प्राण और तर्क अर्थ किया है, वहाँ यह बात विचारणीय है कि यद्यपि ऋषि शब्द से मन्त्रद्रष्टा, मन्त्र, प्राण और वर्क का भी ग्रहण होता है, तो भी मन्त्र में प्राचीनता और नवीनता नहीं बताई जा सकती, क्योंकि वे नित्य हैं । आप यह बताइये कि प्राण और तर्क अचेतन हैं या चेतन? आपने इनको चेतन तो माना नहीं है और अचेतन स्तुति कैसे कर सकेगा? ' जो बेदादि शास्त्र को पढ़कर विद्वान् होकर पढ़ाने लगते हैं वे प्राचीन और जो पढ़ते हैं वे नवीन इन प्राचीन और नवीन दोनों प्रकार के ऋषियों के द्वारा अग्नि स्तुत्य है ' यह कथन श्री निर्मूल है, क्योंकि अध्यापयिता और अध्येता कहीं भी ऋषि नहीं कहे गये हैं । लगता दयानन्द के इस वचन को ही प्रमाण मानकर नार्यसमाजियों ने दयानन्द को ऋषि ही नहीं, महर्षि बना दिया है ।

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वेदार्थपारिजातः १८३ तत्पोषणयोघृतं निरुक्तप्रघट्टकमपि न तत्पोषकम्, तस्य मन्त्रनिर्वचनप्रकाशबोधकत्वात् । तद्व्याख्यान. मपि तादृशमेव । ' तत्प्रकृतीत रद्वर्तनसामान्यादित्ययं मन्त्रार्थचिन्ताभ्युहोऽम्यूढोऽपि श्रुतितोऽपि तर्कती न तु पृथक्त्वेन मन्त्रा निर्वक्तव्याः । प्रकरणश एव तु निर्वक्तव्याः । नह्येषु प्रत्यक्षमस्ति अनुषेश्रतपसो वा । पारोवर्यवित्सु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवतीत्युक्त पुरस्तात् । मनुष्या वा ऋषिषूत्कामत्सु देवानब्रुवन् को न ऋषिर्भविष्यतीति । तेभ्य एवं तर्कमृर्षि प्रायच्छन् । मन्त्रार्थचिन्ताभ्युहमम्यूढं तस्माद्यदेव किवनानूचानोऽम्यूहति आर्ष तद् भवति ' ( नि ० १३ | १२ ) ( पृ ० ८६-८७ ) । ततः पूर्वं त्वक्ष र निर्वचनमुक्तम्- ' अक्षरं न क्षरति न क्षीयते वा । क्षयं भवति वाचोऽक्ष इति वाक्षो भवति । यानस्याञ्जनात् तत्प्रकृतीत रद्वर्तनसामर्थ्यादिति ' | ' अथवा वाक्क्षयो भवति । नादरूपो वर्णलक्षणायां वाचो निवासो भवति, तत्रैव तदभिव्यक्तेः । तस्माद्वाचः क्षयो निवासो भवति । अक्षरो ह्यक्ष इवानुप्रविश्य व्यञ्जनं धारयति । अथवा अक्षः कस्मादुच्यते यानाक्षस्तावत्समञ्जनात् । नित्यं ह्यसौ भ्रश्यते तैलादिना । तत्प्रकृतीतरत् स्वराख्यमक्षरं वर्तनसामान्यात् स्वरमधिरूढानि व्यञ्जनानि भवन्ति ' इति दुर्गाचार्यरीत्या तत्प्रकृतीत रद् वर्तनसामान्यादिति पूर्वेण सम्बद्ध्यते । परिसमाप्त्यर्थमितिकरणम् । स्वामिदानन्दस्तु तस्य मन्त्रसमूहस्य पदशब्दाक्षरसमुदायानाम् इतरत् परस्परं विशेष्यविशेषणतया सामान्यवृत्त वर्तमानानां मन्त्राणामर्थचिन्ता भवति ' इत्युत्तरेण संयोजितवान् । तत्तु न सङ्गतम्, तदिति पूर्वप्रकृतबोधकं पदम् । न च तस्मात् पूर्वं मन्त्रसमूहः प्रकृतः । अक्षरनिर्वचनं तु प्रकृतम् । प्रकृतिशब्देन पदशब्दाक्षरसमुदायानां ग्रहणे किं बीजम्? मन्त्रसमुदायस्य तु मन्त्रा एवं प्रकृतयः, तैरेव समुदायारम्भात् । पदशब्दयोः शब्दाक्षयोः को भेद अपनी बात की पुष्टि के लिये उद्धृत निरुक्त का प्रघट्टक भी उसका पोषक नहीं है, क्योंकि वह तो मन्त्र के निर्वचन की पद्धति बताता है । इसी तरह की दयानन्द को इस प्रकरण की व्याख्या भी है । निरुक्त का उक्त प्रघट्टक इस प्रकार है - ' स्वर व्यंजन की प्रकृति है क्योंकि व्यंजन स्वरों का ही आश्रय लेते है | मन्त्रों के अर्थ की चिन्ता ऊह द्वारा कल्पित की जा सकती है, तो भी श्रुति के प्रमाण पर आधारित तर्क के सहारे ही यह हाना चाहिये और इसमें प्रसंग का भी ध्यान रखना जरूरी है । जो ऋषि अथवा तपस्वी नहीं है, उसको मन्त्र का अर्थ प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । यह पहले कहा गया है कि शास्त्र के पारंगत विद्वानों में बहुत अधिक श्रेष्ठ होता है । एक एक कर जब इस दुनिया से ऋषिगण उठने लगे तो देवताओं से मनुष्यों ने पूछा कि हमको aatar, मन्त्रों का अर्थ समझाने वाला कौन होगा, वो देवताओं ने मनुष्यों को तर्क को ऋषि मानकर दिया कि इस ऊह के सहारे से मन्त्र के अर्थ को चिन्ता की जा सकेगी । इसलिये वेदों में पारंगत विद्वान् जो कुछ तर्क के सहारे कहता है, वह ऋषि का ही वचन माना जाता है ' । निरुक्त में इसके पहले अक्षर शब्द का निर्यचन बताया गया है । दुर्गाचार्य की पद्धति से उसका यह अर्थ होता है— इसको अक्षर इसलिये कहते हैं कि इसका कभी अन्यथाभाव नहीं होता, अथवा यह कभी भी मूल से नष्ट नहीं होता, अथवा यह वाणी का निवास है, क्योंकि नाद वर्णलक्षण वाणी का घर है । अथवा इसको अक्षर इसलिये कहते हैं कि यह अक्ष के समान व्यंजनों को धारण करता है । जैसे कि रथ की धुरी तेल आदि से चिकनी रहती है, तो उसकी सहायता से थान की गति ठीक रहती है, उसी तरह व्यंजनों की स्थिति अपनी प्रकृति, अर्थात् स्वरों के सहारे से ही ठीक रहती है । इसके अनुसार ' तत्प्रकृतीत रद्वर्तनसामान्यात् ' इसका अन्य पूर्व वाक्य से ही होता है । यह बात ' इति ' शब्द से सूचित होती हैं । इसके विपरीत स्वामी दयानन्द ने - ' इसमें विचार करना चाहिये कि वेदों के अर्थ को यथावत् बिना विचारे उनके अर्थ में किसी मनुष्य को हठ से साहस करना उचित नहीं, क्योंकि जो वेद सब विधाओं से युक्त है, अर्थात् उनमें जितने मन्त्र और पद हैं, वे सब संपूर्ण सत्य विद्याओं के प्रकाश करने वाले हैं और ईश्वर ने वेदों का व्याख्यान भी वेदों से ही कर रक्खा है ' ( पृ ० ८८ ), इस वाक्य को आगे के वाक्यों के साथ जोड़ दिया है, यह ठीक नहीं है । तत्पद पूर्व में जो प्रकृत है, उसका बोधक होता है | इसके पहले मन्त्रसमूह का प्रसंग नहीं है । प्रसंग अक्षर के निर्वचन का है । प्रकृति शब्द से पद शब्द, अक्षरसमुदाय के ग्रहण करने में क्या प्रमाण है? मन्त्रसमुदाय की प्रकृति मन्त्र ही होगा । मन्त्रों से ही उनका समुदाय बनेगा । पद और शब्द का, शब्द और अक्षर

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६८४ वेदार्थपारिजातः इति च वक्तव्यम्, आनुपूर्वी विशिष्टानामक्षराणां पदत्वे शब्दशब्दस्योभयोरन्तर्भावसम्भवात् किमर्थं पृथगुल्लेख:? पदशब्दाक्षरसमुदायानामितरत् परस्परं विशेष्य विशेषणतया सामान्यवृत्ती वर्तमानानां मन्त्राणामर्थज्ञानचिन्ता भवति । अत्र ' इतरत् ' पदस्य परस्परविशेष्यविशेषणतयेति कथमर्थः? पदशवाक्षरसमुदायानां मन्त्राणां जोभयोः षष्ठयन्तपदयोः कः सम्बन्ध:? वर्तनसामान्यादित्यस्य ' सामान्यवृत्ती ' इत्यर्थ करणे कि बीजम्? विशेष्यविशेषणतया वृत्ता इत्यनेनैवोपपत्ती सामान्यपदस्य किं प्रयोजनम्? वस्तुतस्तु सर्वत्रैव प्रकृतिप्रत्ययाकाङ्क्षायोग्यता सत्तानंरपेक्ष्येण वाक्यार्थलापनेऽयं स्वाच्छन्द्यमेवाचरति । दुर्गाचार्यरीत्या तु तत्स्वराख्यमक्षरं प्रकृतीत रद् व्यञ्जनभिन्नं वर्तनसामान्यात् । यथाक्षानुप्रविष्टधुरायां वार्यमाणस्य वर्तनं तथैव स्वरेण व्यञ्जनानां वर्तनम् । तदेवाह - ' स्वरमधिरूढानि व्यञ्जनानि वर्तन्ते ' । मन्त्रार्थ चिन्ताम्यूहे तद्रीत्यापि न पूर्वांशस्य सम्बन्धः । अयं मन्त्रार्थचिन्ताभ्युहः, मनुष्येण कर्तव्य इति विधीयते, तस्य कृतत्वात् । अनेकेषां मन्त्राणामर्थचिन्ताभ्यूहः कृत एव प्रथमाध्यायमारम्य त्रयोदशाध्यायगतैकादशखण्डं यावत् । अत एव दुर्गाचार्यः स्पष्टमाह -- ' मन्त्रार्थचिन्तानामभ्यूहो मन्त्रार्थचिन्ताम्यूहः । वितर्कितः, मन्त्रार्थनिर्णयापयोगितर्कस्तर्कितः । शक्य एतावता मन्त्रार्थोऽम्यूहितुम् । दयानम्दरीत्या चिन्ताशब्दो निरर्थक एव तेन मन्त्राभ्युहशब्दस्यैव ' कोऽयं खल्वस्य मन्त्रस्यार्थो भविष्यतीत्यभ्यूहः, बुद्धायाभिमुख्येन हो विशेषज्ञानार्थस्तर्क: ' ( पृ ० ८७ ) इत्यर्थंकरणात् । ' नैते श्रुतितः श्रवणमात्रेणैव तर्कमात्रेण च पृथक् पृथग् मन्त्रार्था निर्वक्तव्या: ' ( पृ ० ८७ ) इत्यध्यशुद्धम्, श्रवणमात्रेणैव मन्त्रार्थनिर्वचनासम्भवात् । अत एव दुर्गाचार्यानुसारेण श्रुतिसाहाय्येन तर्कसाहाय्येन च निरुक्तशास्त्रमिदं समाप्तम् । श्रुतिभ्यो ब्राह्मणेभ्यो निगमशेषेभ्यश्चोशीतार्थाभिधानसामर्थ्येभ्यः, वर्कतश्च लक्षणन्यायाच्च मन्त्रा का क्या भेद है? यह भी आपको बताना पड़ेगा । आनुपूर्वी विशिष्ट अक्षरों को यदि पक्ष कहा जाता है तो पद और अक्षर में ही ' शब्द ' शब्द का अन्तर्भाव हो जाएगा, फिर पृथक् उल्लेख किस प्रयोजन से किया गया? पद, शब्द और अक्षरसमुदाय रूप मन्त्रों की परस्पर विशेष्यविशेषण रूप से सामान्य वृत्ति में वर्तमान रहने पर अर्थ ज्ञान की चिन्ता होती है ' । यहाँ पर ' इतर ' पद का परस्पर विशेष्यविशेषणभाव से, यह अर्थ कैसे हुआ? पक्ष - शब्द - अक्षरसमुदाय और मन्त्र इन दोनों पन्त पदों का परस्पर क्या संबन्ध है? ' वर्तनसामान्यात् ' इस पद का ' सामान्य वृलि में यह अर्थ कैसे होगा? विशेष्यविशेषणभाव से वृत्ति होने पर, इसी से वाक्य की उपपत्ति बन जाती हैं तो फिर बीच में सामान्य पद को जोड़ने से क्या लाभ है? वास्तव में स्वामी दयानन्द सभी जगह प्रकृति, प्रत्यय, आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति की ओर बिना ध्यान दिये मनमाने ढंग से वाक्य का अर्थ करने लगते हैं । दुर्गाचार्य की पद्धति से तो वह स्वर रूप अक्षर व्यंजन से भिन्न है, क्योंकि जैसे चक्र में अनुप्रविष्ट धुरी में धार्यमाण रथ की वृत्ति है, उसी तरह स्वर से व्यंजनों का व्यवहार चलता है, यह उसका अर्थ हुआ | व्यंजन स्वरों में अधिरूढ रहते हैं, इस वाक्य में यही बात कही गई है । मन्त्र के अर्थ की चिन्ता के अभ्यूह में दयानन्द के मत से भी इस पूर्ववाक्य का संबन्ध नहीं बनेगा । मन्त्र के अर्थ की चिन्ता के लिये अभ्यूह मनुष्य को करना चाहिये | अनेक मन्त्रों को अर्थचिन्ता का अभ्यूह प्रथम अध्याय से आरंभ कर त्रयोदश अध्याय के एकादश खण्ड तक किया गया है । दुर्गाचार्य ने स्पष्ट कहा है कि मन्त्रों के अर्थ की चिन्ता का अम्यूह किया गया, अर्थात् मन्त्र के अर्थ के निर्णय के लिये उपयोगी वर्क का सहारा लिया गया, इस तरह से मन्त्र के अर्थ का कह संभव हो जाता है । दयानन्द की रीति से चिन्ता शब्द निरर्थक ही है, क्योंकि उन्होंने मन्त्राम्ह शब्द का ही यह अर्थ किया है कि इस मन्त्र का अर्थ क्या होगा, इस तरह का अम्यूह, अर्थात् बुद्धि में भली भांति से विशेष ज्ञान का उद्भावक तर्क होता है । ' केवल श्रुतिमात्र से ही नहीं, तर्क के सहारे भी पृथक् पृथक मन्त्रों का अर्थनिर्वचन करना चाहिये ' यह उक्ति भी गलत है, क्योंकि श्रवणमात्र से अर्थ का निर्वचन हो ही नहीं सकता । इसीलिये दुर्गाचार्य के अनुसार श्रुति और तर्क दोनों की सहायता से यह निरुक्त शास्त्र समाप्त हुआ है । श्रुति का अर्थ ब्राह्मण है, जिनकी कि अर्थ को कहने की सामर्थ्य निगमशेष वाक्यों से अधिगत है, तर्क का अर्थ है लक्षण, इनकी सहायता से मन्त्रों का निर्वचन होना चाहिये । इस तरह से यद्यपि श्रुति और तर्क से मन्त्रों का

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१८५ निर्वाः | यद्यप्येवं श्रुतितस्तर्कतश्च मा निर्वक्तुं व्याख्यातुं शक्यन्ते, तथापि न प्रकरणः पृथक्त्वे मन्त्रा वक्तव्याः, feng प्रकरण एवं निर्वक्तव्या: । प्रकरणानि तु मन्त्राणां याज्ञं देवत मध्यात्ममितिहासानुप्रवेशः, तदनुरोधेन मन्त्र-व्याख्यानं युक्तम् । किं कारणं तत्राह तह्येषु मन्त्रेषु प्रत्यक्षम् ( आधुनिकानामर्थप्रत्यक्षज्ञानं भवति ) अनुषेश्तपसो वा ' ( नि ० १३/१२ ) । यच्च ऋषिर्जन्मान्तरोयसुकृतपरिपाकवशात् परमेश्वरानुग्रहालय विशिष्टज्ञानसामर्थ्यो यश्च तपस्वी der arateferra स्यात्, तयोरेव मन्त्रेषु प्रत्यक्षं यथावदर्थज्ञानं भवति । ' पावर्यवित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवति ' ( नि ० १११६ ) | पारोवर्येणाचार्योपदेशपरम्परया ये विजानते ते पावयविदः, न साक्षात्कृतधर्माण:, तेषु यो भूयाविद्यो बहुश्रुतः स्यात् स एव मन्त्रार्थज्ञाने प्रशस्यो भवति नेत मन्दबुद्धिरशिक्षितः । सर्वविद्यास्थानभावेन लोकव्यवहारभावेन च मन्त्रार्थ एव विप्रकीर्णो विजृम्भत इति श्रुतस्तमूहितुं शक्नोति । पारम्पर्यविशुद्धये चाख्यायिकामाह-- ' मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवाननुवन् को न ऋषिर्भविष्यति ( पुराकल्परूपोऽर्थवादोऽयम् ) । तेभ्य एवं तर्कभूषि प्रायच्छन् ' । मनुष्याः साक्षात्कृतधर्मसु ऋषिषूत्कामत्सु देवानब्रुवन् । नोऽस्मासु के ऋषिर्भविष्यति । ते देवा एवं तर्क मन्त्रार्थचिन्ताभ्यूहं प्रायच्छन् तस्मै यो निरुक्तशास्त्र-नूचानः । विद्वान् यदेव किञ्चिद् मन्त्रेष्वभ्यूहति आषं तद् भवति । दयानन्दस्तु ' पृथक् पृथग् मन्त्रार्था निर्वक्तव्या: ' ( पृ ० ८७ ) इत्याह । मन्त्रर्षिषु किं पार्थक्यमिति तु नोक्तवान् । ' प्रकरणानुकूलतया पूर्वापरसम्बन्धेनैव नितरां वक्तव्या: ' ( पृ ० ८३ ) | वस्तुतस्तु निर्वचनं व्याख्यानमेव भवति । अत एव मन्त्र निर्वक्तव्या भवन्ति न मन्त्रार्थाः । यत्तु ' न यावद्वा पारोववित्सु कृतप्रत्यक्षमन्त्रार्थेषु भूयोविद्य विद्यावतः प्रशस्योत्युत्तमो भवति, न तावदम्यूढः सुतर्केण वेदार्थमपि वक्तुमर्हतीत्युक्तं सिद्धमस्तीति ' ( पृ ० ८७ ), व्याख्यान हो सकता है, तो भी बिना प्रकरण के मन्त्रों का निर्वचन नहीं होना चाहिये, किन्तु प्रकरण के अनुसार ही वह होना चाहिये । प्रकरण से मन्त्रों का यज्ञ में विनियोग, देवता, अध्यात्म, इतिहास इत्यादि का बोध होता है । तदनुसार ही मन्त्र की व्याख्या होनी चाहिये | इसका क्या कारण है? अतः कहा गया है कि इन मन्त्रों के अर्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान आधुनिक मनुष्यों को नहीं हो सकता, जो कि ऋषि अथवा तपस्वी नहीं है । जो कि ऋषि हैं, अर्थात् जन्मान्तर के पुण्यपरिपाक के कारण परमेश्वर का अनुग्रह होने पर जिनको विशिष्ट ज्ञान की सामर्थ्य प्राप्त हैं और जो तपस्वी हैं, अर्थात् तपस्या करने से जिसके सारे पाप भस्म हो गये हैं, ऐसे मनुष्यों को मन्त्रों के अर्थ का प्रत्यक्ष, अर्थात् यथावत् ज्ञान होता है । ' पारोववित्सु ' इत्यादि निरुक्त वचन का यह अर्थ है कि पारोदर्य अर्थात् आचार्यों के उपदेश की परम्परा से जिनको ज्ञान प्राप्त होता है, वे पारोवर्यविद् कहलाते हैं, ये धर्म के साक्षात्कर्ता नहीं होते । इनमें से जो बहुश्रुत होता है, वही मन्त्रों के अर्थज्ञान में प्रशस्य होता है, इतर मन्दबुद्धि अशिक्षित व्यक्ति नहीं । लोक की सभी विद्याओं में और लोकव्यवहार में मन्त्रों का अर्थ ही नाना प्रकार से बिखरा हुआ है, अतः जो बहुश्रुत नहीं है, वह उसको समझने में असमर्थ रहता है । पारम्पर्य की विशुद्धि के लिये यहाँ आख्यायिका दी गई है --- ' मनुष्या वा ' इत्यादि । यह पुराकल्परूप अर्थवाद है । इसका अभिप्राय है कि मनुष्यों ने धर्म का साक्षात्कार करने वाले ऋषियों के संसार से उठ जाने पर देवताओं से कहा कि अब हमको धर्म का उपदेश देने वाला ऋषि कौन होगा? उन देवताओं ने निरुक्त शास्त्र के पारंगत विद्वानों को तर्क का सहारा लेने के लिये कहा, जिससे कि मन्त्र के अर्थ की चिन्ता में सहायता मिल सके । इस प्रकार के पारोपर्यविद् विद्वान् इस कह की सहायता से जो भी अर्थ चिन्तन करते हैं, वह भी आर्ष हो माना जाता है । दयानन्द ने तो इसकी व्याख्या की कि पृथक - पृथक मन्त्रों के अर्थों का निर्वचन करना चाहिये, किन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि मन्त्रों के अर्थ में पार्थक्य है क्या? ' प्रकरण के अनुकूल पूर्वापर संबन्ध का विचार करके ही निर्वाचन बताने चाहिये ' यहाँ पर भी निर्वचन का अर्थ व्याख्या ही है । इसीलिये मन्त्रों का ही निर्वचन हो सकता है, मन्त्रों के अर्थों का नहीं । ' वेदों के व्याख्यान करने के विषय में ऐसा समझना कि जब तक सत्य प्रमाण, सुतर्क, वेदों के शब्दों का पूर्वापर प्रकरणों, व्याकरण आदि वेदाङ्गों, शतपथ

पृष्ठ 716

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 716 का मूल पृष्ठ
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६८६ वेदार्थारिजातः तदपि न सङ्गतम्, साक्षात्कृतधर्मभ्य ऋषिभ्यः पारोवर्यविदां भिन्नत्वात् । नहि साक्षात्कृतधर्माण एव पारीवर्यविदः । न ar साक्षात्कृत विद्यः प्रशस्यो भवति, ' तेषूत्क्रामत्सु ' इत्यादि निरुक्तविरोधात् । यत्तु - ' अत्रेतिहासमाह - पुरस्तात्कदाचिन्मनुष्या ऋषिषु मन्त्रार्थद्वष्टृषु उत्क्रामत्सु अतीतेषु सत्सु देवान् विदुषोऽब्रुवन् कोऽस्माकं मध्ये ऋषिर्भविष्यति? तेभ्यः सत्यासत्यविवेकेन वेदार्थबोधार्थं चैतं तर्थमृषि ते प्रायच्छन् अयमेव युष्मासु ऋषिर्भविष्यतीति उत्तरं दत्तवन्तः यः कश्चिदनूचानो विद्यापारगः पुरुषोऽस्यूहति तदेवार्षमृषिप्रोक्तं व्याख्यानं भवतीति मन्तव्यम् ' ( पृ ० ८७ ), तदपि मूलविरुद्धम्, मनुष्या देवानत्र वन्नित्युक्तिविरोधात् । अत्र मनुष्य भिन्ना एव देवा माहाभाग्याद् देवताया ऐश्वर्यवत्त्वात् तान् मनुष्यविलक्षणानव वन् इत्येतस्यैवार्थस्य युक्तत्वात् । न च विद्वांसो मनुष्या एव देवाः, देवताप्रतिपादकवेदनिरुक्तादिवचनविरोधात् । न च विद्वांसो मनुष्या देवा अविद्वांसो मनुष्या इति वाच्यम्, अद्वित्सु तर्कस्यासम्भवात् । ' साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुः । तेऽवरेभ्योऽसाक्षात्कृतधर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादु-रुपदेशाथ ग्लायन्तोऽवरे बित्मग्रहणायेमं ग्रन्थं समाम्नासिषुः । वेद च वेदाङ्गानि च ' ( नि ० १।२० ) इति निरुक्त-विरोधात् । अत्र स्पष्टं साक्षात्कृतधर्मभिरसाक्षात्कृतधर्मस्य उपदेशेन मन्त्रदानमुक्तम् । त एव पारीवर्यविदः अवर-कालीनाः श्रुतर्षयः । साक्षात्कृतधर्माणस्तु श्रवणमन्तरेणैव तपोविशेषात् परमेश्वरानुग्रहाद् ऋषयो भवन्ति, ' ऋषिदर्शनात् ' ( नि ० २१११ ) इति वचनात् । स्तोमान् ददर्शेत्योपमन्यवः | ' पश्यत्यसो सूक्ष्मानप्यर्थात् तारकेण ज्ञानेन ' इति दुर्गा • चार्यः । ' तद् यदेत्तांस्तपस्यमानान् ब्रह्मस्वयम्म्वभ्यनार्षत् त ऋषयोऽभवंस्तदृषीणामृषित्वम् ' ( तै ० आ ० २ ९ ) इति आदि ब्राह्मणों, पूर्वमीमांसा आदि शास्त्रों और शास्त्रान्तरों का यथावत् बोध न हो और परमेश्वर का अनुग्रह, उत्तम विद्वानों की शिक्षा, उनके सङ्ग से पक्षपात छोड़ के आत्मा की शुद्धि न हो तथा महर्षि लोगों के किये व्याख्यानों को न देखें, तब तक वेदों के अर्थ का यथावत् प्रकाश मनुष्य के हृदय में नहीं होता ' ( पृ ० ८८ ) यह भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि धर्म का साक्षात्कार करने वाले ऋषियों से पारोवविद् विद्वान् भिन्न ही हैं, एक नहीं । धर्म का साक्षात्कार करने वालों में भूयोविध प्रशस्य भी नहीं होता, क्योंकि निरुन्त में उनके उत्क्रमण के बाद भूयोबिद्य की चर्चा हुई हैं । आगे दी गई ' यहाँ पर इतिहास बताया जाता है -- पुराने जमाने में किसी समय समाप्त हो जाने पर विद्वानों से पूछा कि अब हमारे बीच में ऋषि कौन होगा? उन विद्वानों ने fare के लिये और वेदार्थ के ज्ञान के लिये यह तर्क हो आप लोगों के बीच में ऋषि होगा । जिसको मन्त्रार्थ निश्चित करता है, वही ऋषिप्रोक्त व्याख्यान माना जाता है ' यह व्याख्या भी मूल में कहा गया है कि मनुष्यों ने देवताओं से पूछा । इसका अभिप्राय है कि ऐश्वर्य युक्त हैं, इस रूप में वे मनुष्यों से विलक्षण हैं, यही अर्थ उचित हो सकता, क्योंकि इस तरह देवताप्रतिपादक वेदवाक्य, निरुक्त आदि के साथ मनुष्य कहा जाय, तब भी बात बनेगी नहीं, क्योंकि अविद्वान् व्यक्ति में होगा कि ' पहले धर्म का साक्षात्कार करने वाले ऋषिगण हुआ करते थे । उन्होंने बाद के उपदेश दिया । इससे भी भागे जब मनुष्य उपदेश ग्रहण करने में भी असमर्थ होगये तो संक्षेप में मनुष्यों ने मन्त्रार्थद्रष्टा ऋषियों के उत्तर दिया कि सत्य और असत्य के इसलिये विद्याओं का पारंगत विद्वान् fre क्त वचन के विरुद्ध है । निरुक देवता मनुष्यों से भिन्न हैं । देवता माहाभाग्य अर्थात् महान् सकता है । विद्वान् मनुष्यों को ही देवता नहीं कहा जा विरोध होगा । विद्वान् को देवता और अविद्वान् को यदि सर्कशक्ति नहीं रहती और इस निरुक्त वचन से भी विरोध साक्षात्कृतधर्मा मनुष्यों को मन्त्रों का शास्त्रों को जानने की इच्छा से वेद और aaii की रचना की गई । यहाँ पर स्पष्ट ही साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों से साक्षात्कृतधर्मा मनुष्यों को उपदेश के द्वारा मन्त्र की प्राप्ति का उल्लेख है । पश्चात्कालीन ये श्रुतर्षिगण ही यहाँ पर पारोवर्यविद् कहे गये हैं । साक्षात्कृत ऋषिगण तो बिना श्रवण के हो अपने तपोबल के प्रभाव से और परमेश्वर के अनुग्रह से ऋषि हुए थे ' ऋषिदर्शनात् ' यह निरुक्त वचन इसमें प्रमाण है । ' आचार्य उपमन्यु के शिष्यों का कहना है कि उपमन्यु ने स्तोमों का दर्शन किया था इस free arts का दुर्गाचार्य ने यह अर्थ किया है -- ऋषि सूक्ष्म पदार्थों को भी अपने तारक ज्ञान की सहायता से देख लेता है ।

पृष्ठ 717

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वेदार्थ पारिजातः ६८७ ब्राह्मणवचनाच्च । तद् यत्तपस्यमानानेनान् ब्रह्मऋग्यजुः सामाख्यं स्वयम्भु अकृत अभ्यगच्छत् प्रादुर्बभूव अनघोतमेव तपोविशेषेण ऋषयो ब्रह्मरूपं वेदं दृष्टवन्तस्तत एव तेषामृषित्वमिति तदर्थः । ते च शिष्योपाध्यायिकया वृत्त्या मन्त्रान् ग्रन्थतोऽर्थतश्च श्रुतपिभ्यः प्रत्तवन्तः । तेऽपि चोपदेशेनैव जगृहु: । तेषामेवामीषां सङ्कोचमवेक्ष्य कालानुरूपां ग्रहणशक्तिमवेक्ष्य विल्मग्रहणाय समाम्नासिषुः । एकं सन्तं वेदं सुखग्रहणाय व्यासेन समाम्नातवन्तः । तेषु तादृशेषु ऋषिषूत्क्रामत्सूपरतेषु कथमस्माकं यथावद्वेदार्थज्ञानं भविष्यतीति चिन्ताव्याकुला मनुष्या देवान् विशिष्टैश्वर्यवतोऽब्रुवन् ते च देवास्तेभ्यो निरुक्त ' मन्त्रार्थचिन्ताभ्यूहरूपं तर्क दत्तवन्तः । तर्कोऽपि नात्र लौकिको ग्राह्यः किन्तु freeread रूप एव, शुष्कतार्किकैर्वेदार्थानधिगमात् । ' हृदा तष्टेषु मनसो जवेषु यद् ब्राह्मणाः संयजन्ते सखायः | अत्राह त्वं विजहुर्वेद्याभिरोब्रह्माणो विचरन्त्यु वे ॥ ' ( ऋ ० सं ० १०।७१।८ ) इति मन्त्रवर्णात् । तेष्वर्थेषु सूक्ष्मेषु मन्त्रार्थव्याख्याने त्वमेकमविद्वासं विजहुः त्यक्तवन्तः । केन तत्यजुः? वेद्याभिर्वेदितव्याभिः प्रवृत्तिभिः । ये पुनः ओहब्रह्माण इदं निरुक्तशास्त्रम् ऊहब्रह्म येषामस्ति ते शब्दार्थन्यायसङ्कटेष्वप्रतिबद्धमाना अतिक्रम्याविद्वांस विशेषतः प्रतिपूज्यमानाश्चर-न्तीति दुर्गाचार्य: । यदुक्तम्- - ' पूर्वेभिः पूर्वकालावस्थैः कारणस्थेः प्राणैः परमेश्वर ईड्य: ' ( पृ ०८८ ) इति, तदसङ्गतम्, कारणे गुणवर्णनलक्षणस्तुत्यसम्भवात् । छन्दोमन्त्रयोरेकत्वम् यत्तु - ' मन्त्रा मननात्, छन्दांसि छादनात् स्तोमः स्तवनात्, यजुर्यजतेः, साम सम्मितमूचा ' ( वि ० ७११२ ) । गुप्तानां पदार्थानां भाषणं यस्मिन् वर्तते स मन्त्रो वेद:, तदवयवानामनेकार्थानामपि मन्त्रसंज्ञा भवति, ' मन ज्ञाने ' इत्य-' तद् यदेनान् ० ' इत्यादि तैत्तिरीय आरण्यक का वचन भी इसमें प्रमाण है । इसका यह अर्थ है कि तपस्या करते हुए इन ऋषियों को ब्रह्म अर्थात् ऋक्, यजुः, साम का स्वयं ज्ञान आविर्भूत हो गया, बिना पढ़े ही तपोबल के माहात्म्य से ऋषियों को ब्रह्मरूप वेद का दर्शन हो गया, इसीलिये वे ऋषि कहे जाते हैं । इन आद्य ऋषियों ने शिष्य और उपाध्याय की परम्परा के माध्यम से अर्थ सहित मन्त्रों को षियों को दिया । उन्होंने भी उपदेश द्वारा ही उनको ग्रहण भी कर लिया । बाद में इनमें कालगति के अनुसार ग्रहण शक्ति का संकोच देखकर सुखाववोध के लिये विभिन्न शास्त्रों का उपदेश क्रिया गया । एक ही वेद को सुखपूर्वक ग्रहण करने के लिये अलग अलग शास्त्रों की रचना की गई । ऐसे ऋषिगण भी जब दुनियाँ से उठने लगे तो हमको वेद का अर्थज्ञान कैसे होगा, ऐसी चिन्ता में पड़े मनुष्यगण विशिष्ट ऐश्वर्य वाले देवताओं के पास गये । देवताओं ने तिरुक्त, याने मन्त्रार्थ की चिन्ता के लिये अह याने नर्क का सहारा लेने को कहा | तर्क शब्द से यहाँ लोकिक तर्क का ग्रहण न होकर निरुक्त शास्त्र का ग्रहण हुआ है, क्योंकि शुष्क तार्किक वेदों के अर्थ को नहीं जान सकते | ' हृदा तष्टेषु ' इस ॠग्वेद के मन्त्र में यही बात कही गई है । इस मन्त्र का दुर्गाचार्य ने यह अर्थ किया है कि मन्त्रों के व्याख्यान के प्रसंग में सूक्ष्म अर्थों के उपस्थित होने पर तुम्हारे जैसे जिज्ञासु अविद्वान् मनुष्यों को छोड़कर उनके पास जाते हैं, जो कि जानने लायक सारी प्रवृत्तियों को जानकर तथा निरुक्त आदि शास्त्रों की सहायता से शब्द और अर्थ के इस संकट से पार पाकर सही अर्थ का अवबोध करा कर विशेष रूप से पूजा एवं संमान के भाजन बनते हैं । ' यह कहना कि ' पूर्वकाल में अवस्थित कारण रूप प्राण से कारण में गुणवर्णन रूप स्तुति का सम्भावना ही नहीं है । परमेश्वर की स्तुति करना चाहिये, इसलिये असङ्गत है कि छन्द और मन्त्र को एकता आगे ' मनन में सहायक मन्त्र, छादन करने वाले छन्द, स्तवन करने से स्तोम यजन में सहायक यजुः और ऋक् की समानता वाले साम होते हैं ' इस निरुक्त वचन को उद्धृत कर यह जो व्याख्या की गई है कि ' गुप्त पदार्थो का भाषण जिगमें हैं, वह वेद

पृष्ठ 718

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६८८ वेदार्थपारिजातः स्माद् धातोः ष्ट्रनि मन्त्रशब्दनिष्पत्तेः । मन्यन्ते ज्ञायन्ते सबैमनुष्यैः सत्याः पदार्था येन यस्मिन् वा स मन्त्रो वेद: । तदवयवाः ' अग्निमीळे ' इत्यादय: ' ( पृ ० ८ ९ ) इति, तदपि यत्किञ्चित् वेदेतरग्रन्थेषु व्यभिचारात् । धर्मार्थ-काममोक्षशास्त्रेषु पौरुषेयेष्वपि गुप्तानां पदार्थानां भाषणात् । प्रत्यक्षानुमानेष्वपि सत्यपदार्थवेदकत्वाच्च । यदपि - ' अविद्यादिदुःखानां निवारणात् सुखैराच्छादनात् छन्दो वेद: ' ( पृ ० ८ ९ ) इति, तदपि न युक्तम्, व्यभिचारात्, पौरुषेयग्रन्थेषु वेदानुवादेष्वप्या ह्लादकत्वप्रकाशकत्वादिसम्भवात् । नैरुक्तमन्त्र छन्दआदीनां तु दुर्गाचार्यादिसम्मतोऽयमर्थ: -- एम्यो ह्यध्यात्माधिदेवाधियज्ञादिमन्तारो मन्यन्ते तदेषां मन्त्रत्वम् । वैदिकमन्त्रेभ्य आध्यात्मिकादयोऽर्था मन्यन्त इति योगरूढोऽत्र मन्त्रशब्दः । ते पुनश्छन्दोमयाः । नाच्छन्दसि वागुच्चरति । छन्दांसि कस्मात्? छादनात् । यदेभिरात्मानमाच्छादयन् देवा मृत्योबिभ्यतस्तच्छन्दसां छन्द-स्त्वमिति विज्ञायते । यजतेर्वजुः, याज्यान्ते वषट्कारविधानात् । ऋऋचा सम्मितं साम । ऋचा समं मेन इति नैदानाः । यत्तु -- ' छन्दांसि वै देवा वयोनावाश्छन्दोभिर्हीीदं सर्वं वयुनं तद्धम् ' ( श ० ८१२/२८ ), ' एता वै देवताश्छन्दां-सि ' ( श ० ८ | ३ | ३ | ६ ) इत्यत्र यानि गायत्र्यादीनि छन्दांसि तदविता मन्त्राः सर्वार्थद्योतकत्वाद् देवताशब्देन गृह्यन्ते । अतश्छन्दांस्यैव देवा वयोनाथाः सर्वक्रियानिबन्धनाः । तैश्छन्दोभिरेव वेदैर्वेदमन्त्रेश्चेदं सर्वं विश्वं वयुनं कर्मादि चेश्वरेण नद्धं बद्धं कृतमिति विज्ञेयम् । येन छन्दसा छन्दोभिर्वा सर्वा विद्या आवृताः सम्यक् स्वीकृता भवन्ति, तस्माच्छन्दांसि वेदा मनाच्च मन्त्राश्चेति पर्यायो । ' श्रुतिश्च वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ' ( म ० २।१० ), ' इत्यपि निगमो भवति ' इति निरुक्ते । श्रूयते वा सकला विद्या यया सा श्रुतिर्वेदो मन्त्रश्च । निगमो वेदो मन्त्रश्चेति । तथा व्याकरणे--मन्त्र कहलाता है, उसके अनेकार्थक अवयव भी मन्त्र कहलाते हैं । ' मन ज्ञाने ' इस धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय होने पर मन्त्र पद निष्पन्न होता है । जिनसे सभी मनुष्य सत्य पदार्थों को जान पाते हैं, वे मन्त्र वेद हैं । उसके अवयव ' अग्निमीळे ' इत्यादि है, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह लक्षण तो वेद से भिन्न शास्त्रों में भी मिल जाता है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतिपादक पौरुषेय शास्त्रों में भी गुप्त पदार्थों की व्याख्या की गई है । प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण से भी सत्य पदार्थो की नवगति होती है । यह कथन भी अयुक्त है कि ' अविद्या आदि दुःखों का निवारण कर वेद व्यक्ति को सुख से आच्छादित कर देते हैं, अतः उनको छन्द कहा जाता है, क्योंकि यहाँ पर भी पूर्ववत् व्यभिचार दोष है । पौरुषेय ग्रंथ और वेदों के अनुवाद ग्रंथों में भी आह्लादकत्व, Antara आदि गुण विद्यमान हैं । निरुक्त में उल्लिखित मन्त्र, छन्द आदि शब्दों का दुर्गाचार्य प्रभृति का अर्थ इस प्रकार है- इन मन्त्रों से अध्यात्म, afeta और अधियज्ञ के स्वरूप का जिज्ञासुजन अवबोध करते हैं, अतः इनको मन्त्र कहा जाता है । वैदिक मन्त्रों से आध्यात्मिक आदि अर्थ जाने जाते हैं, अतः यहाँ पर मन्त्र शब्द योगरूढ है । ये मन्त्र छन्दोमय होते हैं । बिना छन्द के वाणी नहीं उच्चरित होती । इनको छन्द क्यों कहा जाता है? इसलिये कि ये छादक 1 देवताओं ने मृत्यु के डर से अपने को इन छन्दों से ढक लिया, इसलिये ये छन्द कहलाये । यज् धातु से यजुः शब्द बनता है, क्योंकि याज्या के अन्त में वषट्कार का विधान है । ये मन्त्र साम इसलिये कहे जाते हैं कि grat freere ऋचाओं के समान मानते हैं । आगे ' छन्दांसि वै देवा ' इत्यादि शतपथ श्रुति के दो वचनों को उद्धृत कर उनकी व्याख्या की गई है कि- ' जो गायत्री प्रभूति छन्द और वदन्ति मन्त्र हैं, वे सभी अर्थों के अवधोतक होने से देवता शब्द से गृहीत होते हैं, अतः ये छन्द रूप देव ही सारी क्रियाओं के fasures होते हैं, उन छन्दों से और वेद मन्त्रों से ही यह सारा विश्व और उसके कर्म ईश्वर से बंधे हुए हैं । इन छन्दों में निबद्ध सारी विद्याएं भली - भांति धारण कर ली जाती हैं, समझ ली जाती हैं, इसलिये ये छन्दोमय वेद और मननमय मन्त्र पर्याय कहलाते हैं । ' श्रुति वेद का नाम है, धर्म - शास्त्र को स्मृति कहा गया है यह मनुस्मृति का वचन है । ' इस प्रकार का भी निगम होता है ' यह निरुक का वचन है । जिससे सारी विद्याएं सुनी जाती है, उसको श्रुति कहते हैं । श्रुति, वेद, मन्त्र, और निगम --- से सब पर्यायवाची शब्द हैं ।

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६८६ ‘ मन्त्रे घसह्नरणशबृदहावच्कुगमिभ्यो ले: ' ( पा ० सू ० २२४/८० ), ' छन्दसि लुललिटः, ( पा ० सू ० ३ | ४१६ ), ' वा पूर्वस्य निगमे ' ( पा ० सू ० ६१४ / ९ ) अत्रापि छन्दो - मन्त्र - निगमाः पर्यायवाचिनः । एवं छन्दआदीनां पर्याये सिद्धे यो भेदं ब्रूते, तद्वचनमप्रमाणमेवास्तीति विज्ञेयम् ' ( पृ ० ९ ० ) इति तत्तु सर्वमसम्बद्धम् असङ्गतं निरर्थकं च, ब्राह्मणार्थापरिज्ञानात् । छन्दः शब्दवाहुल्य वचनप्रदर्शनेन धूलिप्रक्षेपमात्रत्वाच्च । तथाहि -- ' छन्दांसि वै देवा वयोनाधाः ' इतीदं वाक्यं शतपथब्राह्मणेऽष्टमकाण्डे द्वितीयाध्याये प्रथमप्रपाठके षष्ठब्राह्मणेऽष्टमे मन्त्रे दृश्यते । तत्र चयनप्रसङ्गे वैश्वदेवेष्ट कोपधानं प्रकृतम्, अथ वैश्वदेवीरूपदधाति । तत्स्तुत्यर्थ-माख्यायिोक्ता । यामिष्टकामेभ्यो देवेभ्योऽर्थाय तदा अश्विनावुपाधत्तां सैषा द्वितीया चितिः, तासुपधायेदं सर्वमभवत तौ यदिदं किञ्चित् प्रतीयते तत्सर्वमिदं तयोः स्वाधीनमभूत्, ते देवा इदं सर्वमश्विनावभूताम्, अतो यथा येन प्रकारेण इह सर्वस्मिन् वयमप्यसाम ततस्तथा उपजातीत इति परस्परमब्रुवन् । एवमुक्त्वा ते पुनरब्रुवन् चेतयध्वमिति । एवं वदतामुक्तेरभिप्रायं श्रुतिरितरथा ब्रूते ' चितिमिच्छन्त इति वाव तदब्रुवन्निति । इतस्ततो विक्षिप्ताया बुद्धिवृत्तेरेका ग्रयेणैकत्र प्रवेशश्चितिः । ते चेतयमाना एवा वैश्वदेवीरिष्टका अपश्यन् । स्वातन्त्र्येण कार्य साधयितुमशक्तास्ते देवा एवमब्रब्रुन् । इदं सर्वं पूर्वमश्विनावभूताम् । अतो वयमप्यश्विभ्यामेव साधनाभ्यां तपश्चितिमनुसृत्यैव वैश्वदेवीरूपं दधामहे । एवमुक्त्वा ते तथैवाकुर्वन् । तस्मादश्विप्रधानत्वाद् एतां द्वितीयां चितिमाश्विनीमित्याचक्षते तज्ज्ञाः । अश्विभ्यां साधितत्वाद् यथैव पूर्वासामाश्विनीनामुदर्को मन्त्रस्यावसानमश्विनावध्वर्यू सादयतामित्येवंरूपः । एवमेतासां वैश्वदेवीनामुदकं प्रकारान्तरेण स्तुवन्नाह - ' यद्वेव वैश्वदेवीरुपदधाति ' इत्यादि । ये खलु विश्वेदेवा एतां वैश्वदेवीभिनिर्मितां द्वितीयां चितिमपश्यन् ते देवा एतेन रसेनोपायेनोपायत्, रसेन सङ्गता अभवन् । ते एते प्रसिद्धा विश्वेदेवास्तानेव रसोपेतान् देवान् एतेन वैश्वदेवीनामुपधानेनोपदधाति अध्वर्युः । कोऽसौ रस इति स उच्यते व्याकरण में भी ' मन्त्रे ० ' इत्यादि तीन सूत्रों में छन्द, मन्त्र और निगम को पर्यायवाची शब्द मारा है । इस तरह शब्दों को पर्यायवाचिता सिद्ध होने के उपरान्त भी जो लोग इनमें भेद मानते हैं, उनका वचन प्रमाण करने के योग्य नहीं ' ( १० ९ ० ) | ये सब व्याख्यान असम्बद्ध हैं, असङ्गत और निरर्थक भी, क्योंकि यहाँ पर उद्धृत शतपथब्राह्मण का अर्थ दयानन्द समझ नहीं पाये हैं । छन्दः शब्दों की जहाँ afear है, ऐसे वचनों को उद्धृत कर धूलिप्रक्षेप करने का प्रयत्न किया गया है । ' छन्दांसि वै देवा वयोनाथा: ' यह वाक्य शतपथब्राह्मण में अष्टम काण्ड के द्वितीय प्रपाठक के छठे ब्राह्मण के आठव मन्त्र में दिखाई देता है । वहाँ पर चयन के प्रसङ्ग में वैश्वदेव सम्बन्धी इष्टका का उपधान प्रकृत है । उसकी स्तुति के लिये fre दी गई हैं । इन देवताओं के निमित्त जिस इष्टका को अश्विनीकुमारों ने खरीदा, वह द्वितीया चिति है । इस चिति को रखने से सद कुछ अश्विनीकुमारों के अधीन हो गया । इस पर उन देवताओं ने परस्पर सोचा कि जैसे इस इष्टका के उपधान में सब कुछ उन अश्विनीकुमारों के अधीन हो गया, उसी भाँति हम भी हो जाय । ऐसा कहकर वे पुनः बोले कि सावधान हो जाओ । देवताओं की इस उक्ति के अभिप्राय को श्रुति में इस प्रकार कहा है कि वे बोले कि चयन करना चाहिये । इधर - उबर फैली हुई बुद्धि वृत्ति की एकाग्रता भी चिति कही जाती है । उन देवताओं ने एकाग्रचित्त होकर इन वैश्वदेव सम्बन्धी इष्टकाओं को देखा । स्वतन्त्र रूप से कार्य सिद्ध करने में असमर्थ उन देवताओं ने ऐसा कहा कि इनका उपधान पहले अश्विनीकुमारों ने किया था, अतः हम लोग भी उनकी अि विधि से ही चिति का अनुष्ठान कर विश्वेदेव स्वरूप धारण करें । ऐसा कहकर उन्होंने उसी तरह किया । इसमें अश्विनी का प्राधान्य है, तः इस द्वितीय चिति का नाम अश्विनीचिति हो उसके जानकार विद्वानों ने रखा है । अश्विनीकुमारों के द्वारा साबित इस चिति ने जैसे उनकी सौभाग्य वृद्धि की, अतः तदनुरूप ही इस मन्त्र का अवसान हुआ । इस वैश्वदेवी चिति का माहात्म्य ' यद्वेव ' इत्यादि श्रुति में प्रकाशन्तर से बताया गया है । जिन विश्वेदेवों ने इस द्वितीय चिति का दर्शन किया है, वे इसके रस से फल से लाभान्वित हुए हैं । इन शुभ फल देने वाले विश्वेदेवों की ही अध्वर्यु वैश्वदेवी चिति के उपधान द्वारा स्तुति करता है । यह शुभ फलरूप रस क्या है? यह सारी प्रजा यहाँ रस शब्द से कही गई है । यह परिदृश्यमान ८७

पृष्ठ 720

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 720 का मूल पृष्ठ
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६६० देवार्थपारिजात ता एताः सर्वाः प्रजाः, ता रसत्वेन निर्दिष्टा इष्टका एताः परिदृश्यमानाः सर्वाः प्रजाः । एतासां स्थानमाह - ' ता रेतः-सिचोर्वेलयेति । तस्माद्रेतः सिचर्मातापित्रोर्द्यावापृथिव्यात्मकत्वात् तयोर्द्यावापृथिव्योर्मध्ये प्रजा वर्तन्त इति शेषः । विस्र-स्वात् प्रजापतेर्मध्यतः सर्वाः प्रजा उद्गताः । एतस्याः प्रजोत्पत्यादिकाया योनेः सकाशाद् उद्गताः प्रजाः प्रजापति-शरीरस्य सम्बन्धिन्यः एतस्मिन् प्रतिहिते प्रजापति पुरस्तात् प्रापद्यन्त । कोऽसौ विस्रस्त प्रजापतिरित्याह - अयमेव स योऽयमग्निश्चीयते । कास्ताः प्रजा एतास्ता वैश्वदेव्यः । एवं बहुवा प्रशस्य अथासां पञ्चानां वैश्वदेवीनामुपधाने मन्त्रं विधातुमाह --- यद्वेव वैश्वदेवीरुपदधात्येतद्वै प्रजापतिरित्यादिना आत्मनः शरीरस्य मध्यमे प्रतिहिते अकामयत प्रजाः सृजेयमिति । एवं कामयमानः स ऋतुप्राणसंवत्सराश्विभिः सयुक् तत्सहायो भूत्वा एता वक्ष्यमाणवैश्वदेव्याख्याः प्रजाः प्राजनयत् । तस्मात्सयुग्भावाद्धेतोर्वेश्वदेवी नामुपधानमन्त्रेषु सजू: ( सजूरित्यनुवर्तते ) ऋतून् प्राजयत् । ऋतुभिः सयुग्भूत्वा-इन्यात् विश्वेदेववस्वादीन् देवान् प्राजनयत् सजूदेवेर्वयोनाधैरिति तत्रैवोक्तं मूले ' सजूविधाभिः सयुग्भूत्वा प्राजनयत् । तत्र विधाशब्दार्थमाह - आपो वै विधाः । कुत इति चेत् तत्र विधाशब्दप्रवृत्ति दशयति --- अद्भिदं विधीयते क्रियते, तेनापो विधा इत्युच्यन्ते । तत्र यद्देवा इत्याचक्षते । देवशब्देन येऽभिधीयन्ते ते सर्वे विवक्षिताः सजूर्देवैर्वयोनाधैरिदं सर्वं प्राजनयत् । तत्र वयोनाधशब्दार्थमाह -- प्राणा वै देवा वयोनाधाः । वयोनाधशब्दः कथं प्राणानभिधत्त इति तदुप-पादयति -- प्राणहीदं सर्वं वयुनं नद्धम्, वयो वयुनं नह्यन्ति बध्नन्तीति वयोनाधाः प्राणाः । वयः शब्दस्य ' अथोच्छन्दांसि वे देवा वयोनाधा: ' इत्यत्र विवक्षितार्थान्तरमाह -- अत्र वयःशब्देन छन्दांस्युच्यन्ते ततो वयोनाधा देवाः, अर्थात् छन्दोरूपा देवा इत्यर्थः । ततश्च तृतीयेऽध्याये ' छन्दस्या उपदधाति ' इत्यादिना छन्दस्यानां छन्दोलिङ्गमन्त्रोपधेयानामिष्टकानामुपधान-मुक्तम्, पशवो छन्दास्यन्तरिक्षं मध्यमा चितिरन्तरिक्षे तत्पशन् दधाति तस्मादन्तरिक्षायनाः पशव इत्यादिभि -सारी इष्टकाएं प्रजामय है । ' ता रेतः सिवो ' इत्यादि से इनका स्थान बताया गया है कि चूंकि वीर्य के सेवक माता - पिता आकाश-पृथ्वीमय है, अतः आकाश और पृथिवी इन दोनों के बीच ही यह सारी प्रजा निवास करती है । वित्रस्त प्रजापति के मध्य से यह सारी प्रजा निकली | इस प्रजा की उत्पत्ति की कारणभूत योनि से निकली प्रजा प्रजापति के शरीर से सम्बद्ध है । अतः प्रजा इस प्रजापति को ही पहले पहचान पाती है । यह विस्रस्त प्रजापति कौन है? जिस अग्नि का चयन होता वही विस्रव प्रजापति हैं । यह प्रजा कौन है? ये विश्वेदेव की इष्टकाएं | इस प्रकार इन वैश्वदेवी इष्टकाओं को अनेक प्रकार से स्तुति करके इन पाँच वैश्वदेव इष्टकाओं के agart के लिये मन्त्र का विधान करते हुए ' यद्वेव वैश्वदेवी ' इत्यादि वचन कहा गया है । अपने शरीर के मध्यम अङ्ग में प्रतिहित होने पर उसने प्रजा की सृष्टि की कामना की । इस प्रकार की इच्छा होने पर उसने ऋतु, प्राण, संवत्सर, अश्विनी आदि की सहायता से आगे बताई वैश्वदेवमयी सृष्टि की । इस सम्भाव के कारण वैश्वदेवी के उपधान मन्त्रों में ऋतुओं को पैदा किया, ऋतुओं की सहायता से array of ear ओं को पैदा किया । यहीं पर ' सजूर्देवैर्वयोनार्थः ' यह वाक्य प्रयुक्त हुआ है । इसका अर्थ भी वहीं बताया गया है कि ' सजू: ' शब्द से युक्त होकर उसने सृष्टि की । आगे वहीं पर विधा शब्द का अर्थ दिया गया है कि जल ही यहाँ पर विधा है । कैसे? इसको समझाने के लिये विधा शब्द की प्रवृत्ति बताई गई है कि यह सब कुछ जल से ही बनाया जाता है, इसलिये जल को ' विद्या ' कहा जाता है | यहाँ पर जो देव शब्द से अभिहित होते हैं, वे सब इस शब्द से परिगृहीत होते हैं । ' सजूर्देवः ' इत्यादि का यह अभिप्राय है कि यहाँ पर वयोनाव शब्द से प्राण अभिप्रेत है, क्योंकि यहाँ सब कुछ प्राण से जुड़ा हुआ है । वय अर्थात् वयुन को बाँधने वाले प्राण हैं । वय शब्द से छन्द का ग्रहण होता है, यतः देवगण छन्दों से बंधे हुए हैं, अर्थात् देवगण छन्दोमय हैं । इससे आगे तीसरे अध्याय में ' छन्दस्या उपदधाति ' इत्यादि से छन्दस्या अर्थात् छन्द लिंग वाली ऋचाओं से उपधेय teera का उपधान कहा गया है । ' पशु छन्द है, अन्तरिक्ष मध्यमा चिति, अन्तरिक्ष में पशुओं का उपधान करते हैं, इसलिये पशुगण अन्तरिक्षायन कहलाते हैं, इत्यादि वाक्यों से छन्दस्य इष्टकाओं को पशुरूप बताया गया है । ' बारह इष्टकाओं का उपधान करते हैं,