वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 751–760
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 751–760
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वैदार्थपारिजातः ७२१ मन्त्रान्तराणामनुदाहरणेन तेषामप्यवेदत्वापत्तिः । न च सहितानामाद्यमन्त्रस्य प्रतीकत्वेनोपस्थापितत्वात् तद्द्घटितानां मन्त्राणां तासामवयवत्वेन वेदत्वसिद्धौ ब्राह्मणेषु कस्यापि वाक्यस्यानिर्देशात् कथमिव तेषां वेदत्वसिद्धिरिति वाच्यम्, उक्तोत्तरत्वात् । निखिल ब्राह्मणस्य तत्संहितोत्तरभागरूपतया संहितायाः प्रथममन्त्रप्रतीकग्रहणेनैव विशिष्टायाः ब्राह्मणारण्यकोपनिषत्कायाः संहितायाः प्रदर्शनस्य सिद्धत्वात् । किञ्च प्रतीकशब्दस्य पुल्लिङ्गत्वेन प्रतीकानीति दयानन्दीमोल्लेखोऽशुद्ध एव । यदुक्तम् --- किन्तु यानि गौरव इत्यादीनि लौकिकोदाहरणानि दत्तानि तानि ब्राह्मणग्रन्थेष्वेव घटते, तेष्वीदृशपाठव्यवहारदर्शनादिति, तदपि निःसारम्, यजुः संहितायां चतुर्विशेऽध्याये - उक्ताः ' सञ्चराः, एताः शुनस्ति + रीया: ' ( २४ | १ ९ ) इत्यादिपशूनां बहूनां सर्पव्याघ्रमृगादीनामन्येषां पक्षिणां च नामोत्कीर्तनस्यासकृद्दर्शनात् । न चैवं ब्राह्मणस्यापि संहितापदव्यपदेश्यत्वमस्त्विति वाच्यम्, वेदपदस्य मन्त्रब्राह्मणयोरुभयोरपि प्रयोगेऽपि ब्राह्मणपदस्य संहि तायां संहितायाश्च ब्राह्मणे प्रयोगायोगात् । यथाष्टाध्याय्या व्याकरणशास्त्रत्वेऽपि स्त्रीप्रत्ययस्य तद्धितत्वं तद्धितस्य च स्त्रीप्रत्ययत्वमिति व्यवहारो न भवति, तद्वत् प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । सामाजिकाश्च कथयन्ति यत् ' महाभाष्यकारेण यासां संहितानामादिममन्त्राणामुद्धरणं कृतं ताः संहिता एव वेद: ' इति, तदपि न युक्तम्, तथात्वे तत्सम्मताया: शौनकी-संहिताया अवेदत्वापत्तेः । यतो नहि शौनकसंहिताया ' शन्नो देवीरभिष्टय ' इत्यादिमो मन्त्रः । अयं मन्त्रो यस्याः संहितायाः प्रथम मन्त्रः सा तु पैप्पलादी संहिता । तां सामाजिकाः शाखां मन्यन्ते न वेदमिति । कश्चित्तु प्राथम्यं नाभिप्रैति । तेन शौनक्यां संहितायामप्युक्तमन्त्रस्य सवेन तस्मा वेदत्वसिद्धिरिति तदपि दयानन्दमतविरुद्धमेव प्रथममन्त्र-प्रतीकानि वैदिकेषूदाहृतानीति दयानन्दीयवाक्ये प्रथमपदप्रयोगविरोधात् । न च शौनक्यां संहितायां ' शन्नो देवी-रभिष्टय ' इति प्रथमो मन्त्रः । मन्त्रों के भी उदाहरण न दिये जाने के कारण उनके ऊपर भी अवेदता वाली आपत्ति आ जायगी । संहिता के प्रथम मन्त्र का प्रतीक दिये जाने से उस संहिता के अंगभूत सभी मन्त्रों की वेदता तो सिद्ध हो जायगी, किन्तु ब्राह्मणों में से किसी का भी उदाहरण न दिये जाने से उनकी वेदता कैसे सिद्ध हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर दिया जा चुका है । सारा ब्राह्मण भाग उसी संहिता का उत्तर अंग होने से संहिता के प्रथम मन्त्र के प्रतीक से ही ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषद् के साथ पूरी संहिता के परिगृहीत होने के कारण इनके पृथक उदाहरण की कोई आवश्यकता ही नहीं है । अलोक शब्द पुंलिङ्ग है, अत: दयानन्द का ' प्रतीकानि ' इस प्रकार इस शब्द का नपुंसक लिंग में प्रयोग गलत है । ' किन्तु जो गो, अव जादि लौकिक उदाहरण दिये गये हैं, वे ब्राह्मण ग्रन्थों में घटते हैं, वहीं इस प्रकार के शब्दों का व्यवहार देखा गया है, इस कथन में भी कोई सार नहीं हैं । यजुःसंहिता के २४ वें अध्याय में ' उक्ताः संचरा एताः शुनस्तिरीया: ' यहाँ पर बाघ, हिरण आदि नाना प्रकार के पशुओं का और पक्षि, सर्प आदि को नामावली का बार - बार उल्लेख मिलता है । इन लौकिक शब्दों के मिलने से उनकी अबेदता नहीं होती तो ब्राह्मण भाग की हो क्यों भवेदता होगी । यदि ब्राह्मण आदि संहिता के हो अङ्ग हैं, वो उनकी संहिता ही क्यों नहीं कहा जाता? उत्तर है कि वेद पद का व्यवहार मन्त्र और ब्राह्मण दोनों के लिये हैं, किन्तु ब्राह्मण पद का संहिता में और संहिता पद का ब्राह्मण में व्यवहार नहीं किया जा सकता । जैसे कि पूरी अष्टाध्यायी यद्यपि व्याकरण शास्त्र हैं, किन्तु स्त्री sare में afar का और तद्धित में स्त्रीप्रत्यय का आरोप नहीं किया जा सकता, उसी तरह यहाँ भी समझना चाहिये । समाजी tata कहते हैं कि ' महाभाष्यकार ने जिन संहिताओं के प्रथम मन्त्रों के प्रतीक दिये हैं, वे संहिताएं ही बेद हैं, यह ठीक नहीं हैं । यदि ऐसा माना जाय तो जिस शौनकी संहिता को वे वेद मानते हैं, यह सम्भव न हो सकेगा । क्योंकि ' शन्नो देवीरभिष्टय ' यह मन्त्र atre संहिता में प्रथम नहीं है, किन्तु पिप्पलाद की यह स्थिति है । इस पिप्पलाद संहिता को समाजी शाखा मानते हैं, संहिता नहीं । किसी का यह कहना कि यहाँ पर मन्त्रों का प्रतीक अभिप्रेत नहीं है । फलतः इस मन्त्र की उपलब्धि शौनक संहिता के सही, बाद में होने से उसी को वेद माना जायगा, तो यह मत दयानन्द की उक्ति से विपरीत जा रहा है, क्योंकि दयानन्द किया है कि यहाँ पर प्रथम मन्त्र का प्रतीक ही अभिप्रेत है । शौनक संहिता में यह प्रथम मन्त्र नहीं है । ९ १ प्रारम्भ में न ने ! यह स्वीकार
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4 ** वेदापारिजातः यदप्युक्तम्- ' द्वितीया ब्राह्मणे ' ( पा ० सू ० २ | ३ | ६० ), ' चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ' ( पा ० सू ० २/३/६२ ), ' पुराणोक्तषु ब्राह्मणकल्पेषु ' ( पा ० सू ० ४।३।१०५ ) इत्यादीनि पाणिनिसूत्राणि । एषु पाणिन्याचार्यैर्मन्त्रब्राह्मणयो-भेदेनैव प्रतिपादनं कृतम्, तद्यथा पुराण: प्राचीनैर्ब्रह्माद्यषिभिः प्रोक्ता ब्राह्मणकल्पग्रन्था वेदव्याख्यानाः सन्ति । अत एतेषां पुराणेतिहाससंज्ञा कृतास्ति । यद्यत्र छन्दो ब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञाऽभीष्टा भवेत् तहि ' चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ' ( पा ० सू ० २/३/६२ ) इत्यत्र छन्दोग्रहणं व्यर्थं स्यात् । कुतः, ' द्वितीया ब्राह्मणे ' ( पा ० सू ० २/३/६० ) इति ब्राह्मणशब्दस्य प्रकृतत्वात्, अतो विज्ञायते न ब्राह्मणग्रन्थानां वेदसंज्ञास्तीति ' ( पृ ० ९९ -१०० ) इति तदेतत्सर्वमनवगत व्याकरणशास्त्र-तत्त्वस्य चेष्टितम्, सामान्यविशेषभावानवगमात् । तथाहि-- श्रुतिच्छन्दोवेदाम्नायपदानि मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदसामान्य-बोकानि, मन्त्रपदं केवलं मन्त्राणामेव वोधकं न ब्राह्मणानाम्, ब्राह्मणपदं केवलं ब्राह्मणानामेव बोधकं न मन्त्राणामित्य-सकृदुक्तत्वात् । तस्माद् ' द्वितीया ब्राह्मणे ' ( पा ० सू ० २/३/६० ) इति सूत्रेण ब्राह्मणविषये प्रयोगे व्यवहृतपणिसमा नार्थकस्य दीव्यतेः कर्मणि द्वितीया विभक्तिर्भवति । ' गामस्य तदहः सभायां दीव्येयुः ' इति ब्राह्मणवाक्येऽनेनैव सूत्रेण गोरिति षष्ठीस्थाने गामिति द्वितीया भवति । ' द्वितीया ब्राह्मणे ' ( पा ० सू ० २/३/६० ) इति सूत्राभावे तु ' दिवस्तदर्थस्य ' ( पा ० सू ० २२३१५८ ) इति सूत्रेण शतस्य दीव्यतीतिवत् ' गामस्य तदहः ' इत्यत्रापि गामित्यस्य स्थाने गोरिति षष्ठी स्यात् । तां बाधित्वा ' द्वितीया ब्राह्मणे ' ( पा ० सू ० २२३६० ) इति सूत्रेण द्वितीया विधीयते । तथा चात्र ब्राह्मण-शब्देन देदैकदेशे ब्राह्मणभागे द्वितीया विधीयते । श्रुतिच्छन्दोनिगमाम्नाय वेदपदवाच्ये मन्त्रब्राह्मणात्मके वेदासामान्ये द्वितीया न भवति । ' चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ' ( पा ० सू ० २२३६२ ) इति सूत्रेण मन्त्रब्राह्मणात्मके वेदे चतुर्थ्यर्थे क्वचित् षष्ठी भवति । ' पुरुषमृगश्चन्द्रमसः ', ' पुरुषमृगश्चन्द्रमसे ' इदं मन्त्रोदाहरणम् । ' या खर्येण पिवति तस्यै खर्वो जायते ' इदं ब्राह्मणोदाहरणम् । अत्र तस्या इति षष्ठीस्थाने चतुर्थी जाता | ' यां मलवद्वाससं सम्भवन्ति यस्ततो जायते पुनः कहा जाता है कि ' द्वितीया ब्राह्मणे ', चतुथ्यैथे, ' पुराणप्रोक्तेषु ' प्रभृति अष्टाध्यायी के सूत्रों में पाणिनि ने मन्त्र और ब्राह्मण को भित्र माना है । जैसे कि ब्रह्मा प्रभूति पुरातन अतिप्राचीन ऋषियों के द्वारा उपदिष्ट ब्राह्मण, कल्प प्रभूति वेद के व्याख्यान हैं । इसीलिये इनको पुराणेतिहास नाम दिया गया है । यदि मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद संज्ञा अभीष्ट होती तो ' चतुर्थ्यर्थे ' सूत्र में छन्द पद को देने की कोई आवश्यकता नहीं थी, ' द्वितीय ब्राह्मणे ' इस सूत्र से ' ब्राह्मण ' पद की अनुवृत्ति आ ही रही थी । उस वृति को न मानकर इस सूत्र में छन्दस् पद देने से यह ज्ञात होता है कि पाणिनि को छन्दस् और ब्राह्मण में भिन्नता अभिप्रेत है, aft for ब्राह्मणों को वेद नहीं मानते । ये सब बातें भी वही कह सकता है, जो कि व्याकरण शास्त्र के सामान्य विशेष भाव के तस्व ठीक से नहीं सका है । जैसे कि श्रुति, छन्द, वेद, आम्नाय ये सब पद मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद सामान्य के, पूरे वैदिक वाङ्मय के बोधक है । मन्त्र पद केवल मन्त्रों का बोधक है, ब्राह्मण आदि का नहीं । ब्राह्मण पद केवल ब्राह्मण का बोधक है, मन्त्र आदि का नहीं । यह बात हम बार - बार दुहरा चुके हैं । इसलिये ' द्वितीया ब्राह्मणे ' इस सूत्र से ब्राह्मणान्तर्गत प्रयोग में व्यवहृत खरीद - बिक्री अर्थवादव्यति पद के रहने पर कर्म में द्वितीया विभक्ति का विधान किया गया है । ' ग्रामस्य ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य में इसी सूत्र से ' गोस् ' इस षष्ठी विभक्ति के स्थान में ' ग्रामस्य ' इस द्वितीया का विधान होता है । इस सूत्र के अभाव में ' दिवस्तदर्थस्य ' इस सूत्र ' तस्य दीव्यति ' इस प्रयोग के समान ' गामस्य ' यहाँ पर भी ' गाम् ' के स्थान में ' गो: ' यह प्रयोग बनाना पड़ेगा । इसको बाधित करने के लिये ही ' द्वितीया ब्राह्मणे ' सूत्र से द्वितीया का विधान किया गया है । इस प्रकार यहाँ पर ब्राह्मण शब्द से वेद के एक भागविशेष ब्राह्मण में द्वितीया का विधान है | श्रुति, छन्दस्, निगम, आम्नाय पद वाक्य पूरे वेद सामान्य में तो द्वितीया न होकर षष्ठी ही होती है । ' तु बहुलं छन्दसि ' इस सूत्र से मन्त्र ब्राह्मणात्मक पूरे वेद में चतुर्थी के अर्थ में कहीं षष्ठी का विधान है । ' जो सें यह ब्राह्मण का उदाहरण है । उसको सुन्दर पुत्र होता है । यहाँ पर ' तस्या: ' इस षष्ठी केस्थान पर चतुर्षी जो बन की अभिलाषा करती है, उसको चोर; जो गण खर्व से पीती है, उसके बौना बच्चा होता है ' विभक्ति हुई है । जो गर्भणी मैला कपड़ा पहनती है,
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देवार्थपारिजातः ७२५ सोऽभिशस्त यामरण्ये तस्य स्तेनो यां पराचीं तस्ये होतमुख्यप्रगल्भो या स्नाति तस्था अप्सु मारुको याम्यङ्क्त तस्यै दुश्चर्या या प्रलिखते तस्यै खलतिरपस्मारी यात तस्यै काणो या दतो धावते तस्यें श्यावदन् या नखान निकृन्तते तस्यै कुनखी या कुणत्ति तस्य क्लीवो या रज्जुं सृजति तस्या उद्बन्धुको या पर्णेन पिवति तस्या उन्मादुको अहल्याये जामनाय्यं तन्तुः ' इत्यादीन्युदाहरणानि महाभाष्यकारेण वाहुल्येन ब्राह्मणगतान्येवोपस्थापितानि । तथा मन्त्रब्राह्मणयोरुभयोरपि ग्रहणाय सूत्रे छन्दोग्रहणं युक्तमेव । तेन यदि छन्दो ब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञाऽभीष्टा स्यात्तदा सूत्रे छन्दग्रहणं व्यर्थं स्यादित्युक्तवास्ति । अन्यथा ' मन्त्रे श्वेतवोक्यशस्पुरोडाशो ण्वित् ' ( पा ० सू ० ३।२१७१ ), ' अवे. यंज: ' ( पा ० सू ० ३।२ | ७२ ), ' विजुपे छन्दसि ' ( पा ० स ० ३१२१७३ ) इत्यत्र मन्त्रस्य प्रकृतत्वात् तदनुवृत्त्या कार्यसिद्धी ' विजुपे छन्दसि ' ( पा ० सू ० ३/२/७३ ) इत्यत्र छन्दोग्रहणं व्यर्थ स्यात्, तथा च मन्त्राणामेवावेदत्वापत्तिरुदियात् | यथा ' द्वितीया ब्राह्मणे ' ( पा ० सू ० २/३१६० ) इत्यत्र ब्राह्मणोपादानन्तरं ' चतुघ्पर्थे बहुलं छन्दसि ' ( पा ० सू ० २।३।६२ ) इत्यत्र छन्दोग्रहणे ब्राह्मणस्यावेदत्वं साध्यते सामाजिकस्तत्र मन्त्रानन्तरं छन्दाग्रहणेन मन्त्राणामप्यवेदत्वमनिवार्यमेव स्यात्, न्यायस्य तुल्यत्वात् । तस्मान्मन्त्रशब्देन वेदेकदेशी मन्त्रभाग एवं गृह्यते ब्राह्मणशब्देनापि वेदेकदेशो ब्राह्मण-भाग एव गृह्यते, वेदच्छन्दो निगमश्रुत्याम्नाय शब्दैर्मन्त्रब्राह्मणात्मका सर्वोऽपि वेदो गृह्यत इत्यकामेनाप्यभ्युपेतव्यम् । मन्त्रशब्देन मन्त्रभागस्य ग्रहणेऽपि ब्राह्मणभागस्य ग्रहणं न भवति, ततो मन्त्रब्राह्मणोभयभागग्रहणार्थं छन्दोग्रहणं युक्तमेव, तथैव ब्राह्मणशब्देन ब्राह्मणभागस्य ग्रहणेऽपि मन्त्रभागस्य ग्रहणं न भवति । तस्मादुभयग्रहणार्थं ' चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ' ( पा ० सू ० २/३/६२ ) इत्यत्र छन्दोग्रहणं युक्तमेव । नैतावता कस्यापि भागस्यावेदत्वमायाति । आश्चर्यमिदं वैयाकरणेषु प्रसिद्धोऽयमर्थः कथं दयानन्देन तदनुयायिभिश्च नावगम्यते । नैतावदेव ' अनरूवरित्युभयथा छन्दसि ' ( पा ० सू ० ८ | २ | ७० ) इत्यस्मिन् सूत्र छन्दः पदमुपादायापि ' भुवश्च महाव्याहृते: ' ( पा ० सू ० ८२२१७१ ) इत्यत्र रुत्वस्थ वैकल्पिकविधानार्थं महाव्याहृतिग्रहणेन महाव्याहृतेरप्य -छिपना चाहती है, उसको लज्जालु और प्रगल्भः जो नहाना चाहती है, उसको जल में मरने वाला, जो उबटन करती है, उसको दुष्ट चरित्र वाला; जो खुजलाती है, उसको गंजा और पागल, जो आँजन लगाती है, उसको काना; जो दौड़ना चाहती है, उसको काले दाँत वाला; जो नख काटती है, उसको कुनखी; जो दाँत काटती है, उसको नपुंसक; जो रस्सी बीनती है, उसको फाँसी लगाने वाला; जो प से पानी पीती है, उसको पागल; महत्या के समान आचरण बाली को व्यभिचारी ' इस तरह के उदाहरण महाभाष्यकार ने प्रायः ज्यादातर ब्राह्मण ग्रन्थों से ही दिये हैं । इस प्रकार मन्त्र और ब्राह्मण दोनों के ग्रहण के लिये सूत्र में छन्दस् पद का ग्रहण उचित ही हैं । अभीष्ट होती तो सूत्र में छन्दस् पद का ग्रहण व्यर्थ हो जाता । प्रकृत होने से उसकी अनुवृत्ति से ही कार्य सिद्ध हो जाने से ' विजुपे प्रकार मन्त्रों की ही वेदता की मापत्ति उठ खड़ी होगी । जैसे इससे यह कहना गलत है कि यदि छन्दस और ब्राह्मण की वेद संज्ञा अन्यथा ' मन्त्रे ', ' अवेर्यज: ', ' विजुपे छन्दसि ' इन सूत्रों में मन्त्र के छन्दसि ' इस सूत्र में छन्दस् पद का रखना व्यर्थ हो जायगा और इस ' द्वितीया ब्राह्मणे ' इस सूत्र में ब्राह्मण पद की अनुवृत्ति के बाद भो ' चतुर्थ्यर्थे ' यहाँ पर छन्द पद के ग्रहण से समाजियों द्वारा ब्राह्मण को सिद्ध की जाती है, उसी तरह मन्त्र पद की अनुवृति होने पर छन्दस् पद के ग्रहण से मन्त्रों की भी अवेदत्ता माननी पड़ेगी, क्यों दोनों जगह समान न्याय, अर्थात् स्थिति है । इस आपत्ति के निवारण के लिये न चाहते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि मन्त्र शब्द से वेद के एक अंश मन्त्र भाग का, ब्राह्मण शब्द से भी वेद के एक अंश ब्राह्मण नाग का और वेद, छन्दस्, निगम, श्रुति और आम्नाय शब्दों से मन्त्र ब्राह्मणात्मक पूरे वेद का ग्रहण होता है | मन्त्र शब्द से मन्त्रभाग के गृहीत होने पर भी ब्राह्मण भाग का परिग्रहण नहीं होता, इसलिये मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का परिग्रहण करने के लिये छन्दस् पद आवश्यक है; इसी तरह ब्राह्मण शब्द से ब्राह्मण भाग के गृहीत होने पर भी मन्त्रभाग का परिग्रहण नहीं होता, इसलिये दोनों के परिग्रहण के लिये ' चतुर्थ्यर्थे ' इस सूत्र में छन्दस् पद का ग्रहण उचित । इससे कोई एक भाग वेद नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । यह आश्चर्य की ही बात है कि वैयाकरणों में अच्छी तरह से प्रसिद्ध यह बात दयानन्द और उनके अनुयायियों को क्यों मालूम नहीं है ।
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७२४ वेदार्थपारिजातः वेदत्वमापद्येत, तस्मादिदमपि मन्तव्यं यद् यथा सामान्यशब्द सम्बन्धेन विशेषशब्दग्रहणं न व्यर्थम्, तथैव विशेषशब्द-सम्बन्धेन सामान्यशब्दग्रहणमपि न व्यर्थं भवति । तेन ब्राह्मणशब्दसम्बन्धेन छन्दः शब्दो न व्यर्थो भवति । ननु यदि छन्दः शब्देन मन्त्रब्राह्मणयोरुभयोरपि ग्रहणं भवत्येव तर्हि ' छन्दो ब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ' ( पा ० सू ० ४/२/६६ ) इति सूत्रे ब्राह्मणग्रहणं व्यर्थमेव स्यादिति चेन्न ब्राह्मणशब्दस्य पुराणप्रोक्तब्राह्मणविशेषग्रहणार्थं सार्थ -क्यात् । तेन नवीनैर्ऋ षिभिः प्रोक्तषु ब्राह्मणेषु नानेन सूत्रेण कार्यं भवति । अत एव याज्ञवल्क्येन प्रोक्तानि याज्ञवल्क्यानि ब्राह्मणानीत्यादिस्थलेषु ' छन्दो ब्राह्मणानि ' ( पा ० सू ० ४/२/६६ ) इति सूत्रस्य प्रवृत्तिर्न भवति । अत एव महाभाष्य-कारः ' याज्ञवल्क्यादिभ्यः प्रतिषेधो वक्तव्यस्तुल्यकालत्वात् ' इति वातिकेन णिनिप्रतिषेधेन याज्ञवल्क्यानीतिपदं साधितवान् | प्रवाहरूपेण समेषामृषीणामनादित्वात् तुल्यकालत्वमेव । प्राचीनत्वमर्वाचीनत्वं वा न केषाञ्चन सम्भल वति । तत एव महाभाष्यकारो वार्त्तिकमुपयुक्त मेने । प्रवाहरूपेणानादित्वेऽपि प्रादुर्भावे पौर्वापर्यसम्भवात् पूर्वा विर्भूतानां प्राचीनत्वम्, पश्चादाविर्भूतानां नवीनत्वं सम्भवत्येव । तत एव ' पुराणप्रोक्तषु ब्राह्मणकल्पेषु ( पा ० सू ० ४।३।१०५ ) इति सूत्रे पाणिनिना पुराणशब्दग्रहणं कृतम् । सर्वथापि याज्ञवल्क्यानि ब्राह्मणानोत्यस्य छन्दो ब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ' ( पा ० सू ० ४/२/६६ ) इति सूत्रविषयत्ववारणाय पुराणप्रोक्तब्राह्मणविशेषग्रहणाय छन्दो ब्राह्मणानि ' ( पा ० सु ० ४१२।६६ ) इत्यत्र ब्राह्मणग्रहणं सार्थकमेव । यदि तत्र ब्राह्मणविशेषग्रहणं नाभीष्टं स्यात् तदा पुराणोक्तषु सूत्रप्रवृत्तिर्व्यथैव स्यात् । अत एव ' छन्दो ब्राह्मणानि ' ( पा ० सू ० ४।२१६६ ) इत्यत्र छन्दः पदं केवलमन्त्रभागपरम्, तथा ' विजुपे छन्दसि ' ( पा ० सू ० ३/२/७३ ) इत्यत्र छन्दः पदं केवलब्राह्मणभागपरं मन्तव्यम् । अन्यथा मन्त्रभागस्यैव वेदत्वे पूर्वसूत्रात् ' मन्त्रे श्वेतवहोक्थशस्पुराडाशो विन् ' ( पा ० सू ० ३ | २ | ७१ ) इत्यस्मादनुवृत्यैव कार्यसिद्धो ' विजुपे छन्दसि ' इतना ही नहीं, ' अन्नरूर इत्यादि सूत्र से छन्दस् पद का उपादान करके भी ' भुवा महाव्याहृतेः ' यहाँ पर सत्व के विकल्प का विधान करने के लिये महाव्याहृति का ग्रहण किया गया है । आपकी दृष्टि से तो इससे महाम्याहृति की अवेदता हो जायगी, afe after पद की अनुवृत्ति इस सूत्र में है, तो फिर महाव्याहृति के भी छन्दान्तर्गत होने से उसी से कार्य को निष्पत्ति हो सकेगी, इलना होने पर भी महाव्याहृति का उपादान यही सिद्ध करेगा कि पाणिनि को महाव्याहृति वेदान्तर्गत अभिप्रेत नहीं हैं । इस दोष से छुटकारा पाने के लिये यही मानना पड़ेगा कि जैसे सामान्य शब्द से सम्बन्ध होने पर विशेष शब्द का ग्रहण करना व्यर्थ नहीं है, उसी तरह विशेष शब्द से सम्बन्ध होने पर सामान्य शब्द का ग्रहण भी व्यर्थ नहीं है । इससे ब्राह्मण शब्द का सम्बन्ध होने पर भी छन्दस् पद की व्यर्थता नहीं होगी । यदि छन्दस् शब्द से मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का ग्रहण होता है तो ' इम्ब्राह्मणानि ' इस सूत्र में ब्राह्मण पद का ग्रहण व्यर्थ होगा? नहीं । क्योंकि यहाँ पर ब्राह्मणशब्द से पुराण प्रो ब्राह्मण विशेष के ही ग्रहण करने में उसकी सार्थकता है । इसलिये नवीन ऋषियों के द्वारा उपदिष्ट ब्राह्मणों में इस सूत्र से कार्य नहीं होते । इसी लिये याज्ञवल्क्य के द्वारा उपदिष्ट ब्राह्मणों में यह सूत्र नहीं प्रवृत्त होता । यही कारण है कि महाभाष्यकार ने ' याज्ञवल्क्यादिभ्यः ' इत्यादि वात्तिक से णिनि प्रत्यय का निषेध कर ' याज्ञवल्क्यान ' इस पद की सिद्धि की है । प्रवाह नित्यता के सिद्धान्त के अनुसार सभी ऋषियों के अनादि होने से तुल्यकालता है । इनमें परस्पर प्राचीनत्व, अर्वाचीनत्व व्यवहार नहीं बन सकता । इसी कारण से महाभाष्यकार ने वास्तिक की उपयोगिता स्वीकार की है । प्रवानित्यता के कारण अनादि होने पर भी प्रादुर्भाव के कारण इनके परस्पर पूत्रपरभाव बन सकता है, अतः पहले आवि-भूत ब्राह्मणों की प्राचीनता और बाद में आविर्भूत ब्राह्मणों की नवीनता संगत है । इसी लिये ' पुराणप्रोतेषु ' इत्यादि सूत्र में पाणिनि ने पुराण शब्द का ग्रहण किया है । सभी तरह से ' याज्ञवल्क्यानि ब्राह्मणानि यहाँ पर ' छन्दो ब्राह्मणाति ' इस सूत्र की प्रवृत्ति के निवारण के लिये और यहाँ पर पुराणप्रोक्त ब्राह्मण विशेष का ही ग्रहण होता है, यह जनाने के लिये इस सूत्र में ब्राह्मण पद की सार्थकता है । यदि यहाँ पर ब्राह्मण विशेष का ग्रहण अभीष्ट न होता तो पुराणप्रोक्त ब्राह्मणों में सूत्र की प्रवृत्ति व्यर्थ हो जाती । इसी लिये ' छन्दो ब्राह्मणानि यहाँ पर छन्दस् पद केवल मन्त्र भाग का सूचक है और ' विजुपे छन्दसि ' यहाँ पर वही पद केवल ब्राह्मण
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aar पारिजातः ७२५ ( पा ० सू ० ४ १२/६६ ) इत्यत्र छन्दोग्रहणं व्यर्थमेव स्यात् । एवमेव ' जुष्टापिते च छन्दसि ' ( पा ० सू ० ६।१।२० ९ ) इति सूत्रेऽपि छन्द: पदं ब्राह्मणभागमात्रपरम्, मन्त्रभागमात्रपरत्वे ' नित्यं मन्त्रे ' ( पा ० सू ० ६।१।२१० ) इत्यत्र पूर्वसूत्रात् ' जुष्टार्पिते च छन्दसि ' ( पा ० सू ० ६।१।२० ९ ) इत्यस्याच्छन्दः पदानुवृत्त्या कार्यसिद्धी ' नित्यं मन्त्रे ' इत्यन्न मन्त्रपद-ग्रहणं व्यर्थमेव स्यात् । यदि च ' छन्दो ब्राह्मणानि ' ( पा ० सू ० ४१२१६६ ) इति सूत्रे छमःपदपार्थ क्येन ब्राह्मणपदग्रहणाद् ब्राह्मण-भागस्यादत्वं स्यात् तदा पूर्व प्रदर्शितस्थलेषु छन्दोऽनुवृत्तिसिद्धौ मन्त्रपदग्रहणेन मन्त्रभागस्याप्यवेदत्वापत्तिर्दुर्निवारा | किञ्च, ' तनादिकञ्भ्य उ: ' ( पा ० सू ० ३३१३७६ ) इत्यत्र यथा तनादिषु कृञः पाठेऽपि पुनः कृञो ग्रहणं तद्वैशिष्ट्य-बोधनाय स्वीक्रियते, तथैव छन्दः पदेन मन्त्रभागब्राह्मणभागयोरविशेषेण ग्रहणसम्भवेऽपि पुनर्ब्राह्मणग्रहणं ब्राह्मणभागस्य वैशिष्ट aatantra मन्तव्यम् । तदुक्तं काशिकायाम्- ' ब्राह्मणग्रहणं ब्राह्मणविशेषग्रहणार्थम् तेन याज्ञवल्क्येन प्रोक्तानि ब्राह्मणानीत्यत्र न तत्कार्यप्रवृत्तिः । गोवलीवर्दन्यायेन छन्दः शब्देन मन्त्राणां ग्रहणम्, यथा ' जुष्टार्पिते च छन्दसि ' ( पा ० सू ० ६।१।२० ९ ) इति सूत्रे छन्दः शब्देन ब्राह्मणानां ग्रहणम्, ' नित्यं मन्त्रे ' ( पा ० सू ० ६।१।२१० ) इत्यत्र मन्त्रग्रहणात् । छन्दोग्रहणेनैव ब्राह्मणानां ग्रहणे सिद्धे ब्राह्मणविशेषप्रतिपत्त्यर्थं पुनर्ब्राह्मणग्रहणम् तेन याज्ञवल्क्यानि ब्राह्मणानीति तद्विषयता न भवति । तेन ब्राह्मणवशिष्ठध्यायेन वैशिष्ट्यद्योतनाय पुनर्ब्राह्मणग्रहणम् । नहि ब्राह्मणा आयाता वशिष्ठोऽध्यायात इत्युक्तौ कश्चिद्वशिष्ठस्याब्राह्मणत्वं प्रत्येति । ' स होवाच ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमथर्वाणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम् ' ( छा ० ७ ११२ ) इत्यादिस्थलेषु वेदशब्देन मन्त्रभागब्राह्मणभागयोरुभयोरपि ग्रहणम् । यथा गोपथे ' सर्वे वेदा भाग का हो बोधक है । अन्यथा मन्नभाग को ही वेद मानने से पूर्व सूत्र ' मन्त्रे ० ' इत्यादि से अनुवृत्ति के द्वारा ही कार्य सिद्ध हो जाने पर ' विजु छन् ' यहाँ पर पुनः छन्दस् पद का उपादान व्यर्थ हो जायगा । इसी तरह ' जुष्टापिते च छन्दसि ' इस सूत्र में भी उन् केवल ब्राह्मण भाग का ही बोधक है । यदि इसको मन्त्रभाग परक भी माना जाय तो ' नित्यं मन्त्रे ' यहीं पर ' जुष्टापित ० ' इत्यादि पूर्व सूत्र से छन्दस् पद को अनुवृत्ति होने से कार्य सिद्ध हो जायगा, फलतः इस सूत्र में पुनः मन्त्र पद का ग्रहण व्यर्थ होगा । यदि ' छन्दो ब्राह्मणानि ' इस सूत्र में छन्दः पद से पृथक् ब्राह्मण पद का ग्रहण करने से ब्राह्मण भाग को अवेदता आपको अभीष्ट है, तो उसी न्याय से उक्त सभी स्थलों में छन्दस् पद की अनुवृत्ति से भी कार्य की सिद्धि हो सकती थी, इस पर भी मन्त्र पद के उपादान करने से यही सिद्ध होगा कि पाणिनि को मन्त्रभाग छन्दस् पद से अभिप्रेत नहीं है । फलतः मन्त्रभाग की भी वेदता की आपति को किसी प्रकार हटाना कठिन हो जायगा । इसलिये जैसे ' तनादिकृञ्भ्य उ: ' इस सूत्र में तनादि में कृ का पाठ होने पर भी पुनः कुन पद का उपादान उसके वैशिष्ट्य के अवबोधन के लिये स्वीकार किया गया है, उसी तरह छन्दस् पद से मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का समान रूप से ग्रहण होने पर भी पुनः ब्राह्मण पद का ग्रहण ब्राह्मण भाग के वैशिष्ट्य का अवबोधक मानना चाहिये । इस सूत्र की व्याख्या में काशिका वृत्ति में इसी लिये कहा गया है कि ब्राह्मण विशेष का ग्रहण करने के लिये यहाँ पर ब्राह्मण पद उपात्त है । इससे याज्ञवल्क्य प्रोक्त ब्राह्मणों में इस सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती । गोबलीवर्दन्याय से यहाँ पर छन्दस् पद से har मन्त्रों का ग्रहण होता है, जैसे कि ' जुष्टार्पिते च च्छन्दसि ' इस सूत्र में छन्दस् शब्द से ब्राह्मणों का ग्रहण होता है, क्योंकि ' नित्यं मन्त्र ' इस सूत्र में मन्त्र परिगृहीत है । छन्दस् पद के ग्रहण से ही ब्राह्मणों का भी ग्रहण सिद्ध है, पुनः ब्राह्मण पद का ग्रहण ब्राह्मण विशेष की प्रतिपत्ति के लिये किया गया है । इसलिये ' याज्ञवल्क्यानि ब्राह्मणाति ' यहाँ पर यह सूत्र प्रवृत्त नहीं होता । श्रतः ब्राह्मण-वशिष्ठन्याय से वैशिष्ट प्रदर्शन के लिये यहां पर पुनः ब्राह्मण पद गृहीत है । सभी ब्राह्मण आ गये और वसिष्ठ भी आ गये, ऐसा कहने पर कोई वसिष्ठ को अब्राह्मण नहीं मानता । }
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७२६ दार्थ पारिजातः निर्मिता: सब्राह्मणाः ' इत्यत्र वेदशब्देन केवलस्य मन्त्रभागस्य ग्रहणम्, तथैव ' तेऽवरेभ्योऽसाक्षात्कृतधर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादुः । उपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे विल्मग्रहणाय इमं ग्रन्थं समाम्नासिषुर्वेदं च वेदाङ्गानि च ' ( नि ० १।१०।२ ) अत्र वेदशब्देन ब्राह्मणानामेव ग्रहणं मन्त्रभागस्य प्रथममेवोक्तत्वात् । ' पुरुषविद्यानित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे ' ( नि ० १/२/७ ) अत्रापि मन्त्रात्पृथग् वेदशब्दो ब्राह्मणबोधक एव, ब्राह्मणभाग एवं कर्मसम्पादकमन्त्राणामाम्नातत्वात् । अत एव यदुक्तम्- ' ब्रह्म व ब्राह्मणः क्षत्रं राजन्य: ' ( श ० १३ | १ | ५ | ३ ), ' समानार्थावेतो वृषशब्दो वृषन्शब्दश्च ब्रह्मन्शब्दो ब्राह्मणशब्दश्च ' ( महाभाष्ये ५१११ ) इत्यादिप्रमाणैश्चतुर्वेदविद्भिर्ब्राह्मणर्महर्षिभिः प्रोक्तानि यानि वेदव्याख्यानानि तानि ब्राह्मणानि ' इति, तदपि तुच्छम् क्वचिद् ब्रह्मशब्दस्य पूर्वोक्तप्रमाणैः ब्राह्मणपरत्वेऽपि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० उ ० २ | १ | १ ), ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति.... तद्ब्रह्म ' ( तै ० उ ० ३ | १ ) इत्यादी ब्रह्मशब्दस्य जगत्कारणत्वप्रतिपादकत्वात् ' कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ' ( भ ० गी ० ३।१५ ) इति गीतायां ब्रह्मशब्दस्य वेदपरत्वाभ्युपगमात् । ' स उत्तमां दिशमनुब्यचलत् तमृचश्च सामानि यजूंषि च ब्रह्म चानुव्यचलन् । ऋचां च वे साम्नां च यजुषां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद ' ( अथर्ववेदसंहिता १५/१६ ) इत्यत्र ब्रह्मशब्दस्य ब्राह्मणभागात्मको वेदोऽर्थः । ब्रह्मशब्दस्यात्र मन्त्रभागोऽर्थ इति तु न वक्तु ं शक्यम्, मन्त्राणामृगादिशब्देरुक्त-वात् । तेन ब्रह्मेत्यपि ब्राह्मणभागात्मकस्य वेदस्य श्रौती संज्ञा । अत एव ' ब्रह्म छन्दस्कृतं चैव ' ( म ० ४।१०० ) इति
श्लोके कुल्लूकभट्ट: ' ब्रह्मशब्देन ब्राह्मणभागस्य ग्रहणम् | ' तस्माद् यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे '
( ऋ ० सं ० १० / ९ ०१ ) इत्यत्र छन्दः शब्देनापि ब्राह्मणभागस्यैव ग्रहणम्, मन्त्राणामृगादिशब्देरेवोक्तत्वात् । स्वामि-दयानन्दस्तु वेदानां गायत्र्यादिछन्दोऽन्वितत्वात् पुनश्छन्दांसीतिपदं चतुर्थस्याथर्ववेदस्योत्पत्तिं ज्ञापयतीत्युक्तवान् । वस्तुतस्त्वथर्ववेदस्य त्रिविधमन्त्रानतिरिक्तत्वाद् ऋगादिशब्देरेव तद्ग्रहणसम्भवाद् ब्राह्मणभागस्यैव छन्दः शब्देन ग्रहणं ' उसने कहा -- भगवन्, मैं ऋग्वेद पढ़ता हूँ, यजुर्वेद, सामवेद और चतुर्थ वेद अथर्व को भी मैं पढता हूँ । वेदों में पांचवे वेद इतिहास पुराण को भी मैं पढ़ता हूं ' इत्यादि स्थलों में वेद शब्द से मन्त्र और ब्राह्मण दोनों भागों का ग्रहण होता है । जैसे गोपथ ब्राह्मण में ' ब्राह्मण सहित सब वेद निर्मित हुए यहाँ पर वेद शब्द से केवल सम्भाग का ग्रहण होता है, उसी तरह ' उन आय ऋषियों ने बाद के उन ऋषियों को, जिनको कि धर्म का साक्षात्कार नहीं था, मन्त्रों का उपदेश किया । इस उपदेश की परम्परा में भी जब शिथिलता आने लगी तब वेद और वेदांग आदि ग्रन्थों का सम्प्रदाय प्रवृत्त हुआ ' इस निरुक्त वाक्य में वेद शब्द से ब्राह्मणों काही ग्रहण होता है, क्योंकि मन्त्रभाग का पहले ही उल्लेख हो चुका है । ' पुरुषविद्यानित्यत्वाद् मन्त्रो वेदे ' इस निरुक्त वाक्य में भी मन्त्र से पृथक् वेद शब्द ब्राह्मण भाग का हो बोधक है, कोंकि ब्राह्मण भाग में ही कर्मसम्पादक मन्त्रों का विधान है । इसीलिये ---' ब्रह्म ब्राह्मण है, क्षत्र राजन्य ', ' वृष और वृषन् शब्द के समान ब्रह्म और ब्राह्मण शब्द समानार्थक है ' इत्यादि प्रमाणों से चतुर्वेदविद् ब्राह्मण महर्षियों द्वारा उपदिष्ट वेदव्याख्यान ही ब्राह्मण है, यह उक्ति सारहीन है, क्योंकि पूर्वोक्त प्रमाणों से कहीं पर ब्रह्म शब्द ब्राह्मण at raatun भले ही हो जाय, किन्तु ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ', ' यतो वातद् ब्रह्म ' इत्यादि स्थलों में ब्रह्म शब्द को जगत् का कारण माना गया है । ' कर्म ब्रह्मोद्ध वं विद्धि ' इत्यादि गीता वाक्य में कहा शब्द वेदपरक हैं । ' स उत्तमा ' इत्यादि अथर्ववेद के पूर्वव्याख्यात ब्रात्य में ब्रह्म शब्द का अर्थ ब्राह्मणभागात्मक वेद अभिप्रेत है । ब्रह्म शब्द से यहाँ मन्त्रभाग अभिप्रेत है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, सूक्त क्योंकि ऋक् आदि शब्दों के द्वारा मन्त्रों का ग्रहण हो चुका है । इससे यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणभागात्मक वेद की ' ब्रह्म ' यह श्रौती संज्ञा है । इसीलिये ' ब्रह्म छन्दस्कृतं चैव ' इस मनुस्मृति के श्लोक की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट ने ब्रह्म शब्द से ब्राह्मण भाग का ग्रहण किया है । ' छन्दांसि जज्ञिरे ' यहाँ पर भी छन्दस् पद से ब्राह्मण भाग का ही ग्रहण होता है, क्योंकि यहाँ पर मन्त्रभागका ऋगादि शब्दों से विधान हो चुका है । यहाँ पर स्वामी दयानन्द ने सभी वेद गायत्री आदि छन्दों से अन्वित ही है, पुनः छन्द पद के परिग्रहण से यहाँ पर चतुर्थ वेद अथर्ववेद की उत्पत्ति ज्ञापित होती है, ऐसा माना है । वस्तुतः अथर्ववेद त्रिविध मन्त्रों से अतिरिक्त नहीं है, अतः
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वार्थपारिजाता ७२७ युक्तम् । ' यस्मादुचोऽपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन् । सामानि यस्य लोमानि अथर्वाङ्गिरसो मुखम् ॥ ' ( अथर्ववेदसं ० १०।७।२० ) इत्यत्र तु मन्त्रब्राह्मणात्मकस्याथर्ववेदस्य प्राधान्यविवक्षया पृथङ् निर्देशो युक्त एव । किञ्च - ' श्रुतिः स्त्री वेद आम्नाय: ' ( अमरकोषे १।६।३ ) इत्यमरकोषानुसारेण दयानन्दरीत्या च छन्दो-मन्त्रनिगमाः पर्यायवाचिनः सन्तीति ( ऋ ० भा ० भू ० ७ ९ -८० पृष्ठे ) छन्दोवेदनिगमश्रुतीनां पर्यायवाचकतोक्ता । पाणिनिसूत्रेषु महाभाष्येषु जैमिनिसूत्रशाबरभाष्येषु ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्येषु च नैकधा शाखान्तरीयमन्त्राणां ब्राह्मणानां चोद्धरणं दृश्यते, तेन तद्दृष्ट्या ब्राह्मणानां शाखान्तरीयमस्त्राणां च वेदत्वं स्पष्टमेव । न च ब्रह्मभिः कृतत्वाद् ब्राह्मणमिति संज्ञा, ब्रह्मशब्दस्य वेदपरत्वे बाधानुपपत्तेः । तेन ब्रह्मन्ब्राह्मणशब्दयोरपि वेदभागविशेष एवार्थः । एत-ब्राह्मणान्येव पहवींषि ' ( तै ० ब्रा ० १ | ६ | ४ | ३ ) चातुर्मास्यप्रकरणे । ' तमृचश्च सामानि च यजूंषि च ब्रह्म च व्यचलन् ' ( अथर्ववेदसंहिता १५ | ११६ ) इति स्पष्टं ब्राह्मणं ब्रह्म चेति ब्राह्मणभागस्येव बोधकम् । ' आवारे पुनर्ऋ षिनियमं वेदयते, तेसुरा हेलय इति ब्राह्मणवचनमेव ऋषिले ( वेदत्व ) तोक्तम् । ' शास्त्रपूर्वके प्रयोगेऽभ्युदयस्तत्तुल्यं वेदशब्देन ', ' योऽग्नि-ष्टोमेन यजते ' इति ब्राह्मणवचनं वेदोदाहरणत्वेन निर्दिष्टम् । ' ऋलृक् ' सूत्रे महाभाष्ये -- ' अनुकरणं शिष्टाशिष्टप्रतिषिद्धेषु वैदिकोदाहरणरूपेण ' विश्वसृजः सत्राण्यध्यासते ' इति ब्राह्मणवचनमुद्धृतम् । लौकिकोदाहरणरूपेण भाष्यकारैरन्यैश्चाचार्यैः क्वापि ब्राह्मणवाक्यं नोदाहृतम् । ( ' उभये देवमनुष्याः ' इति शाङ्खायनब्राह्मणवचनं महाभाष्यकारेण लौकिकोदाहरणे प्रयुक्तमिति ज्ञेयम् ) | ( पा ० सू ० १1१1१ ) महाभाग्ये ' यथा लौकिकवैदिकेषु ' इति वार्तिकस्योदाहरणरूपेण वेदे s पि याज्ञिकाः संज्ञां कुर्वन्ति ' स्फ्यो ' ' यूपश्चेति ब्राह्मणभागस्यैवोदाहरणमुपस्थापितम् । ' स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ( पा ० सू ० १ | १ | ५६ ) इत्यत्र वेदेऽपि सोमस्य स्थाने प्रतिकातृणान्यभिषुणुयादित्युच्यते । वेदोदाहरणरूपेण ब्राह्मणमुद्धृतम् । ' तदस्यास्त्यस्मि-शिति मतुप् ' ( पा ० सू ० ५ | २ | ९ ४ ) इति सूत्रे ( सन्मात्रे वषिदर्शनात् ' इति वार्त्तिकविवरणे महाभाष्यकार: - ' सभ्मात्रे ऋषिः ( वेद ) दर्शयति मतुपमित्युक्त्वा ' यवमतीभिरद्भिर्यूपं प्रोक्षति ' इति ब्राह्मणवाक्यं वेदत्वेनोदाहृतम् । गादि शब्दों से हो उसका परिग्रहण हो जाने से छन्दस् पद से यहाँ पर ब्राह्मण भाग हो अभिप्रेत है । ' यस्मादृचोऽपातक्षत् ' इत्यादि अथर्ववेद के मन्त्र में तो मन्त्रब्राह्मणात्मक अथर्ववेद की प्रधानता बतलाने के लिये उसका पृथक उल्लेख उचित ही है । ' श्रुतिः स्त्री वेद आम्नाय: ' अमरकोश के इस वाक्य के अनुसार और दयानन्द की ऋग्भाष्यभूमिका ( पृ ० ७ ९ -८० ) की उक्ति के भी अनुसार छन्दस्, वेद, मन्त्र, निगम, श्रुति आदि शब्द पर्यायवाची हैं । पाणिनि के सूत्रों में, महाभाष्य, जैमिनिसूत्र, शावर भाष्य, ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य आदि में अनेक शाखान्तरीय मन्त्रों और ब्राह्मणों के उद्धरण इन्हीं नामों से मिलते हैं, अतः इनकी दृष्टि में ब्राह्मण और शाखान्तरीय मन्त्र भी वेद है, यह बात स्पष्ट है | ' ब्राह्मण ' इस पद की प्रवृत्ति इसलिये नहीं हुई है कि यह ब्रह्म अर्थात् ब्राह्मणों की कृति है, क्योंकि यहां पर ब्रह्म शब्द का अर्थ वेद करने में कोई बाधा नहीं है । इसलिये ब्रह्म और ब्राह्मण शब्द का वेदभाग रूप एक ही अर्थ है । तैत्तिरीय ब्राह्मण के चातुर्मास प्रकरण में ' एतद्ब्राह्मणान्येव ' यहाँ पर तथा ' तचा " ब्रह्म च ' इस अथर्ववेद की उक्ति में ब्राह्मण और ब्रह्म शब्द स्पष्ट ही ब्राह्मण भाग के अवबोधक हैं । महाभाष्य में आचार के विषय में ऋषि नियम बताते हैं, ऐसा कहकर ' तेऽसुरा हेलयः ' यह ब्राह्मण वाक्य ही ऋषि ( वेद ) के नाम से उद्धृत है | ' शास्त्रपूर्वके प्रयोगे ' यहाँ पर भी ' योऽग्निष्टोमेन ' जतें ' यह ब्राह्मण वाक्य हो वेद के नाम से उद्धृत किया गया है । ' ऋलुक ' सूत्र के महाभाष्य में ' अनुकरण शिष्ट, अशिष्ट, प्रतिषिद्ध में देखा गया है, ऐसा कहकर ' विश्वसृजः ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य का ही वेद के नाम से उदाहरण दिया है । लौकिक उदाहरण के रूप में कार पतञ्जलि अथवा अन्य किसी आचार्य ने कहीं भी ब्राह्मण वाक्य को उदाहृत नहीं किया । ( ' उभये देवमनुष्याः ' यह शाङ्खायन ब्राह्मण का वचन भाष्यकार द्वारा लौकिक उदाहरण के रूप में प्रयुक्त हुआ हैं, इतना जानना चाहिये ) । अष्टाध्यायी ( १1१1१ ) सूत्र के are में ' यथा लौकिकवैदिकेषु ' इस वार्तिक के उदाहरण के रूप में ' वेद में भी याज्ञिक गण संज्ञा करते हैं, ऐसा कह कर ' स्फ्य, यूप ' इत्यादि ब्राह्मणभाग के ही उदाहरण दिये हैं । ' स्थानिवदादेशो ' इस सूत्र के महाभाष्य में भी ' वेद में भी सोम के स्थान पर पूतिका ण का अभिषव करे, ऐसा कहा गया है ' इतना कहकर वेद के रूप में ब्राह्मण वाक्य ही उदाहृत है । ' तदस्यास्त्यस्मिन् ० ' इस सूत्र में
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७१८ वेदार्थ पारिजातः ' प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् ' ( पा ० सू ० ७।२।२८ ) इत्यत्र प्रत्युदाहरणरूपेण भाषाभिन्ने मन्त्रे ' युवं सुतरा-मश्विना ' ( वा ० सं ० २०/७६ ) इति मन्त्रोदाहरणमुक्तम् । तथैव ' युवं वै ब्रह्माणो भिषजौ ' ( श ० ८ | २ | ११३ ), ' युवमिदं निष्कुरुतम् ' ( ऐ ० ब्रा ० २।२८ ) इति ब्राह्मणमुदाहृतम् । वेदत्वाविशेषेऽपि यथा यजुः सामवेदयोरनुस्वारस्य श ष स ह -वर्णेषु परेषु सत्सुकारो भवति, ऋग्वेदाथर्ववेदयोश्च न भवति, तथैव वेदत्वाविशेषेऽपि किञ्चित्कार्यं मन्त्रे न भवति, ब्राह्मणे भवति, किञ्चिच्च ब्राह्मणे न भवति मन्त्रे भवति । ' देवसुम्नयोर्यजुषि काठके ' ( पा ० सू ० ७१४१३८ ) इति सूत्रेण यजुर्वेदीयकठशाखायामाकारो विधीयते नान्यत्र । ' प्रकृत्यान्तः पादमव्यपरे ' ( पा ० सू ० ६ | १ | ११५ ), ' यजुष्युर: ' ( पा ० सू ० ६/१/११७ ) इति प्रकृतिभाव ऋग्यजुभिन्नेषु वेदेषु न भवति । यदुक्तम् -- ' कात्यायनेनापि ब्रह्मणा वेदेन सहचरितत्वात् सहचारोपाधि मत्वा ब्राह्मणानां वेदसंज्ञा सम्मतेति ज्ञायते । एवमपि न सम्यगस्ति, एवं तेनानुक्तत्वात् ' ( पृ ० १०० ) इति, तदपि तुच्छम्, अनुक्तोपालम्भात् । नहि वैदिका ब्रह्मणा वेदेन सहचरितत्वाद् ब्राह्मणभागस्य वेदत्वमभ्युपगच्छन्ति, किन्तु मन्त्रभागस्येव ब्राह्मणभागस्यापि स्वातन्त्र्येण तेषां वेदत्वाभ्युपगमः । यदुक्तम्- ' अन्यैषिभिरगृहीतत्वात् ' ( पृ ० १०० ) इति, तदपि तुच्छम्, अज्ञानविजृम्भितं च, आपस्तम्ब-वौधायनपारस्करादिभिरनेकैर्महर्षिभिर्ब्राह्मणानां वेदत्वप्रतिपादनात् । ' परात्तु तच्छ्रुते: ' ( २/३/३१ ), ' भेदश्रुतेः ' ( २ | ४ | १८ ), ' सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विद: ' ( ३१२१४ ), ' तदभावो नाडीषु तच्छू तेरात्मनि च ' ( ३२ | ७ ) इति सषु ब्रह्मसूत्रेषु श्रुत्यादिशब्देर्ब्राह्मणवचनान्येव श्रुतित्वेनोदाहृतानि । मनुना ' श्रुतिस्तु देदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृति: ' ( म ० २1१० ) इति श्रुतिवेदयोरभेदमभिधाय विविधाश्चोपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुती: ' ( म ० ६।२ ९ ) इत्युपनिषदामपि श्रुतित्वमुक्तम् । ' वेदान्तं विधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः । ( म ० ६।९ ४ ) इह वेदान्तशब्देनो-पनिषदां श्रवणमुक्तम् । भी ' सम्मा दर्शनात् ' इस वार्तिक का विवरण करते हुए महाभाष्यकार ' ऋषि, अर्थात् वेद पुनः सन्मान में मतुप् का विधान दिखाता है ' ऐसा कहकर ' ययुक्त जल से यूप का प्रोक्षण करते है ' इस ब्राह्मण वाक्य को ही वेद का उदाहरण मानते हैं । ' प्रथमायाश्च ० ' यहाँ पर प्रत्युदाहरण रूप में भाषाभित्र मन्त्र में ' युवं सुतराम् ' इस मन्त्र को उपस्थित किया है । इसी तरह ' युवं वै ', ' युवमिदं ' यह ब्राह्मण वचन भी उदाहृत है । समान रूप से वेद होते हुए भी जैसे यजु और सामवेद में श ष स ह वर्णों के आगे होने पर अनुस्वार का कार होता है और ऋत्रेद तथा अथर्ववेद में नहीं होता, उसी तरह समान रूप से वेद रहने पर भी कुछ कार्य मन्त्रों में नहीं होता, ब्राह्मणों में होता हैं और कुछ कार्य ब्राह्मणों में न होकर मन्त्रों में होते हैं । ' देवसुम्नयोर्यजुषि काटके ' इस सूत्र से यजुर्वेद की कठशाखा में आकार विहित है, अन्यत्र नहीं । ' प्रकृत्यान्त ', ' यजुष्युर: ' इन सूत्रों से प्रकृतिभाव ऋक् और यजुर्वेद से fra वेदों में नहीं होता । सहचार को उपाधि मान कर ब्राह्मणों की वेद संज्ञा मानी हैं, ऐसा नहीं ' यह आक्षेप भी व्यर्थ का है, क्योंकि इसमें जो कहा नहीं गया, सहचार से ब्राह्मण भाग की वेदता नहीं स्वीकार करते, किन्तु. ' कात्यायन ने भी ब्रह्म, अर्थात् वेद के साथ रहने से प्रतीत होता है, किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा उन्होंने कहीं कहा उसको लेकर आक्षेप किया गया है । वैदिक लोग ब्रह्म अर्थात् वेद के मन्त्र भाग के ही समान ब्राह्मण भाग को भी स्वतन्त्र रूप से ही वेद मानते हैं । ' अन्य ऋषियों ने इसको नहीं माना है ' यह कहना भी गलत ही नहीं, उनके अज्ञान का भी सूचक है, क्योंकि आपस्तम्ब, Saturat, पारस्करप्रभृति अनेक महर्षियों ने ब्राह्मणों को वेद माना है । ' परात्तु ० ', ' भेदश्रुतेः ', ' सूचकच ० ', ' तदभावो ' इत्यादि व्यासकृत सूत्रों में श्रुति आदि शब्दों से ब्राह्मण भाग के वचन ही उदाहृत है । मनु ने ' श्रुति को वेद और धर्मशास्त्र को स्मृति कहा जाता है ' यहाँ पर श्रुति और वेद की अभेदता बताकर ' आत्मा की संसिद्धि अर्थात् प्राप्ति के लिये विविध औपनिषद श्रुवियाँ हैं यहाँ पर उपनिषदों को भी कहा है । ' विधिवत् वेदान्त को सुनकर तीनों ऋणों से उऋण होकर द्विज संन्यास ग्रहण करे ' यहीं पर वैदान्त शब्द से उपनिषदों का ग्रहण होता है ।
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वेदार्थपारिजातः ७२६ शास्त्रदीपिकानुसारेण -- ' प्रजापति ' सोऽकामयत ' ( श ० १११५२८११ ) इत्युपक्रम्य ' तस्मादुच्चैऋचा क्रियते, उपांशु यजुषा, उच्चः साम्ना ' इतिवचनैर्ऋक्सामभिरुच्चस्वरेण यजुषा च मन्दस्वरेण कर्म कर्तव्यमुक्तम् । तत्र संशयः -- किमुपसंहारश्रुत्यनुरोधेनोच्चैस्त्वादयो धर्मा ऋगादिमत्राणामेव विधीयन्ते, अथवा मन्त्रब्राह्मण-संहितानामृग्वेदादीनामुच्चैस्त्वादयो धर्मा विधीयन्त इति । तत्र ' प्रजापति सोऽकामयत ' ( श ० ११/५/८/१ ), ' अग्नेर्ऋग्वेदो ' ( श ० ११।५।८।३ ) इत्युपक्रमानुरोधेन वेदधर्मः प्रतीयते, उपसंहारानुरोधेन च ऋगादिमन्त्राणामेव धर्मा इति प्रतीयते । ऋगादयः शब्दा मन्त्रेष्वेव प्रयुज्यन्ते, वेदशब्दस्तु मन्त्रब्राह्मणात्मके समस्ते वेदराशी प्रयुज्यते । पूर्वपक्षरीत्या उपसंहारश्रुतेविधिरूपत्वेन प्राधान्यमुपक्रमश्रुतेरर्थं वादत्वेनाप्राधान्यम् ॥ अत उपसंहारश्रुत्यनुरोधेनोप-क्रमश्रुतिस्थस्य वेदशब्दस्य मुख्यार्थं मन्त्रब्राह्मणसमुदायमपहाय लाक्षणिक ऋगादिमन्त्रा एवार्थः । उपक्रमश्रुतेः प्राधान्यात गौणार्थाश्रयणम्, उपक्रमश्रुतेरप्राधान्यात् तत्र गौणार्थाश्रयणं युज्यते । सिद्धान्ते त्वसञ्जातविरोधत्वान्मन्त्रा ब्राह्मणरूपो मुख्य एवार्थ ऋग्वेदादिशब्दस्य गृह्यते । एवं वेदशब्दस्य मन्त्रब्राह्मणात्मकवेदपरत्वे निश्चिते ' उच्चचा क्रियते ' इति ऋगादिशब्दानां मुख्यमर्थं मन्त्रमपहायोपक्रमानुरोधेन मन्त्रब्राह्मणसमुदायरूप एवार्थी ग्राह्यः, मुख्यार्थ -ग्रहण उपक्रमश्रुतिविरोधापत्तेः । तथा चोपसंहारस्थायाः श्रुतेरयमर्थः स्यात् - ऋग्वेदादिब्राह्मणगतै विधिभिर्येषां कर्मणां विधानं स्यात्, तान्युपसंहारश्रुत्यनुसारेणोच्चैस्त्वादिधर्मेण कर्तव्यानि । यजुर्वेदविहितानां कर्मणामुपांशु ( मन्दस्वरेण ) अनुष्ठानं युक्तम् । ' श्रुतेर्जाताधिकारः स्यात् ' ( मी ० सू ० ३1३1१ ) इति जैमिनिसूत्रेऽपि तादृशो विचारः । तत्र पूर्वपक्षे ऋगादिमन्त्राणामेवोच्चैस्त्वादिधर्मा विधीयन्ते, ऋगादिशब्दानां मन्त्रमात्रार्थत्वात् । उत्तरपक्षीयं सूत्रम् -'वेदो वा प्रायदर्शनात् ' ( मी ० सू ० ३1३1२ ) । तदर्थस्तु उच्चैस्त्वादयो धर्मा मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्यैव, न केवलं मन्त्राणा-मेव । तेन ऋग्वेदादिविहितकर्मणामेवोच्चैस्त्वादयो धर्माः उपक्रमे वेदशब्दस्य दृष्टत्वाद् इति प्रायः पदार्थः । शास्त्रदीपिका के अनुसार ' प्रजापति ने इच्छा की ' ऐसा उपक्रम कर ' इसलिये मन्त्रों का उच्च स्वर से, यजुर्मन्त्रों का मन्द स्वर से और सान मन्त्रों का उच्च स्वर से ' इत्यादि वचनों से ऋ और साम से उच्च स्वर से और यजुर्मन्त्रों से मन्द स्वर से कर्म करने का विधान है | यहाँ पर संशय उठता है कि क्या उपसंहार श्रुति के अनुसार उच्च- मन्द आदि धर्म केवल ऋगादि मन्त्रों के लिये हो विहित हैं? अथवा मन्त्र, ब्राह्मण, संहिता नादि सभी के लिये ये धर्म विहित हैं? ' प्रजापति ने चाहा ', ' अग्नि से ऋग्वेद ' इस उपक्रम ater के अनुरोध से यह वेद का धर्म प्रतीत होता है और उपसंहार वाक्य के अनुरोध से केवल ऋमादि के ही ये धर्म हैं, ऐसा प्रतीत होता है । ऋगादि शब्द मन्त्रों में ही और वेद शब्द मन्त्रब्राह्मणात्मक समस्त वेदराशि में प्रयुक्त है । अतः उपसंहार श्रुति के अनुरोध से उपक्रम श्रुति स्थित वेद शब्द के मुरुषार्थं मन्त्रब्राह्मणात्मक समुदाय का त्याग कर ऋगादि मन्त्रपरक लाक्षणिक अर्थ परिगृहीत होता है | उपक्रम श्रुति की प्रधानता के कारण वहाँ पर गोण अर्थ नहीं होगा, उपसंहार श्रुति की अप्रधानता के कारण यहाँ पर गोण अर्थ लिया जा सकता है । सिद्धान्त में तो विशेष के न होने के कारण ऋग्वेद आदि शब्द का मन्त्रब्राह्मण रूप अर्थ ही मुख्य होगा । इसी तरह वेद शब्द के सत्र ब्राह्मणात्मक वेदपरक माने जाने पर ' उच्चैर्ऋचा ' इत्यादि स्थलों पर ऋमादि शब्द के मुख्य अर्थ मन्त्र को छोड़कर उपक्रम के अनुरोध से मन्त्र ब्राह्मणात्मक समुदाय रूप अर्थ का ग्रहण होना चाहिये, क्योंकि मुख्यार्थ का ग्रहण करने पर उपक्रम श्रुति से विरोध हो जायगा । ऐसा करने पर उपसंहार श्रुति का यह अर्थ होगा - ऋग्वेद आदि के ब्राह्मणों में प्रतिपादित विधि से जिन कर्मों का विधान हुआ है, उनको उपसंहार श्रुति के अनुसार उच्चैस्त्व आदि धर्मों से युक्त करना चाहिये । यजुर्वेद विहित कर्मों का उपांशु अर्थात् मन्त्र स्वर से अनुष्ठान उचित है । ' श्रुतेजीताधिकारा स्थात् ' इस जैमिनि सूत्र में भी इसी तरह के विचार हैं । यहाँ पर पूर्वपक्ष सूत्र में ऋगादि मन्त्रों के ही उच्चैस्तव आदि धर्म विहित हैं, क्योंकि ऋगादि शब्दों का मात्र ही अर्थ होता है । ' वेदो वा ' इत्यादि उत्तरपक्ष सूत्र है । इसका अर्थ यह है कि उच्चैस्तव आदि धर्म मन्त्रब्राह्मणात्मक पूरे वेद के हैं, केवल मन्त्रों के नहीं । इसलिये ऋग्वेद आदि से विहित कर्मों के ये उच्चैस्त्व आदि धर्म हैं, क्योंकि उपक्रम में वेद शब्द देखा गया है । यह सूत्र के प्रायः पद ९ २
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७३० वेदाथपारिजातः लिङ्गाच्च ऋक्पदैरन्यत्रापि वेदार्थत्वदर्शनात् ' ऋग्भिः पूर्वा दिवि देव ईयते यजुर्वेदे तिष्ठति मध्ये अह्नः । सामवेदेनास्तमये महीयते वेवेरशून्यैस्त्रिभिरेति सूर्यः || ' ( तै ० ब्रा ० ३ | १२ | १ | १ ) अब वेदेरिति बहुवचनेन ऋग्भि-रित्यत्रापि ऋग्वेदेरित्येवार्थी ग्राह्यः । ' धर्मोपदेशाच्च नहि द्रव्येण सम्बन्ध: ' ( मी ० सू ० ३।३।४ ) ऋचि उच्चैस्त्वविधानम्, ' ऋक्ष सामानि नीयते ' ( शां ० ब्रा ० ६ ११ ), ' ऋचि साम गीयते ' ( श ० ८ | १ | ३ | ३ ), ऋचि साम प्रतिष्ठितम् ' ( सा ० बि ० ब्रा ० १।१२ ), ' अभ्यध्यूढं साम ' ( छा ० उ ० ११५३१ ) । तेन साम नाक्षररूपं भवति, किन्तु गीतिरूपमेव । तदपि ऋमन्त्राणामेव । जैन साम्नामुच्चैस्त्वविधानं व्यर्थमेव स्यात् । यदि तु सामपदेन सामवेदग्रहणं स्यात्, तदा तु मन्त्रब्राह्मणसमुदायात्मक-सामग्रहणेन वाण्डादिब्राह्मणानामपि ग्रहणं स्यात् । तस्मात्तद्विहितानां कर्मणामुच्चैस्त्वविधानं सार्थकं स्यात् । तस्माल्लक्षणया ऋणादिशब्दानामपि मन्त्रब्राह्मणसमुदाय एवार्थो ग्राह्यः । ' उदितेऽनुदिते चैव समयाभ्युषिते तथा । सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ॥ ' ( मनु ० २।१५ ) इति मनुवाक्येन ' उदिते जुहोति, अनुदिते जुहोति ' इत्यादि-ब्राह्मणवाक्यानां स्पष्टमेव वैदिकत्वं श्रुतित्वं चोक्तम् । ' यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ ' ( म ०२ / ७ ) | मनुप्रोक्तः सर्वोऽपि वर्णाश्रमलक्षणों धर्मो वेदेऽभिहितः । न च मन्त्रसंहितासु अग्निहोत्र - दर्शपूर्णमास- ज्योतिष्टोमादि ) कर्मणां विधानमुपलभ्यते । ब्राह्मणभागे त्वेव तदुपलब्धिर्भवति । तस्मादपि ब्राह्मणभागस्य वेदत्वं सिद्धयति I । अन्येऽपि मक्ता धर्मा ब्राह्मण एवोपलभ्यन्ते, न संहिताचतुष्टये | ' राज्ञश्च दद्युरुद्वारमित्येषा वैदिकी श्रुतिः ' ( म ० ७ / ९ ७ ) अत्र योद्धा विजितधनेभ्यो राज्ञ उद्धारं दद्युरित्येषा वैदिकी श्रुतिरिति मनुना प्रोक्तम् । परं चतसृष्वपि संहितासु न तादृशाभिप्रायको मन्त्र उपलभ्यते । ' इन्द्रो वै वृत्रं हत्वा ' ( ऐ ० ब्रा ० ३।२१ ) इत्युपक्रम्य ' स महान् भूत्वा देवता अब्रवीत् उद्धारं म उद्धरत ' ( ऐ ० वा ० ३१२१ ) इति ब्राह्मण एव तदुपलम्भः । का अर्थ हुआ | ऋक पद से अन्यत्र भी वेद का परिग्रहण देखा गया है, इस लिंग रूप प्रमाण से भी यही अर्थ निकलता है । जैसे कि - ' सूर्य देव की पूर्वात् में ऋग्वेद के मन्त्रों से, मध्याह्न में यजुर्वेद से और सायाह्न में सामवेद के मन्त्रों से स्तुति की जाती है, इस प्रकार सूर्य कभी भी वेदों से शून्य नहीं होता ' यहाँ पर ' वेद: ' इस वेद पद में बहुवचन होने से ' ऋग्भिः ' यहाँ पर भी ' ऋग्वेद ' इस प्रकार बहुवचनान्त ही अर्थ होगा । ' धर्मोपदेशाच्च ० ' इस मीमांसा सूत्र तथा ' ऋक्षु सामानि गीयन्ते ' इत्यादि श्रुतियों के उद्धरणों से यह प्रतीत होता है कि साम अक्षर रूप नहीं है, किन्तु गीतिरूप है । ये भी तो मन्त्र ही हैं, अत: इनका उच्चैस्त्व विधान व्यर्थं जायगा । यदि साम पद से सामवेद का ग्रहण हो तो फिर मन्त्रब्राह्मणात्मक समुदाय के सामवेद होने से ताण्ड्य आदि ब्राह्मणों का भी ग्रहण होगा और इस कार ब्राह्मणों के द्वारा प्रतिपादित कर्मों के उच्चैस्त्व आदि के विधान की सार्थकता होगी । इसलिये लक्षणा से भी ऋगादि शब्दों का मन्त्रब्राह्मणात्मक समुदाय हो अर्थ होगा । ' सूर्योदय बेला में, सूर्योदय से पहले अथवा सूर्योदय होने के उपरान्त समय व्यतीत हो जाने पर भी सभी समयों में यज्ञ की प्रवृत्ति होती है, यह वैदिक श्रुति है ' मनुस्मृति के इस श्लोक में ' उदिते जुहोति ' इत्यादि ब्राह्मण क्यों की स्पष्ट ही वैदिकता एवं श्रुतिता प्रतिपादित है । ' ने जिस किसी के लिये जो धर्म बताया है, वह सब वेद में अभिहित है, क्योंकि मनु को सभी वेदशास्त्र आदि का ज्ञान है ' इस मनुस्मृति के श्लोक में बताया गया है कि सारा वर्णाश्रम लक्षण धर्म वेद में अभिहित है । मन्त्र संहिताओं में तो अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, ज्योतिष्टोम आदि कर्मों का विधान उपलब्ध नहीं है, ब्राह्मण भाग में ही वह उपलब्ध होता है । इससे भी ब्राह्मण भाग की वेदवा सिद्ध है । मनु उपदिष्ट अन्य अनेक धर्म भी ब्राह्मणों में ही उपलब्ध होते हैं, चारों संहिताओं में नहीं । ' राजा दधुः ' इस म वाक्य में योद्धाओं के द्वारा राजा को दिये गये उद्धार अर्थात् विजित धन के अंशदान की बात वैदिक श्रुति में प्रतिपादित मानी