वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 741–750

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 741–750

पृष्ठ 741

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वेदार्थपारिजातः सवितृप्रसूता ' ( श ० १/७/१/४ ) इत्यादयो ग्राह्याः । गाथा याज्ञवल्क्यजनकसंवादः, यथा शतपथ ब्राह्मणे गार्गी मैत्रेय्यादीनां परस्परं प्रश्नोत्तरकथनयुक्ताः सन्तीति । ( वस्तुतस्तत्र गार्गीमैत्रेय्यादीनां परस्परप्रश्नोत्तरकथनयुक्ता गाथास्तु न सन्त्येव । दयानन्दस्तु तदनवलोक्यैव तथोक्तवान् ) । नाराशंस्यश्च - अत्राहुर्यास्काचार्याः -- नाराशंसो यज्ञ इति काथक्यो नरा अस्मि • नासीना शंसन्त्यग्निरिति शाकपूणिः, नरैः प्रशस्यो भवति ( नि ० ८1६ ) । नृणां यत्र प्रशंसा नृभिर्यत्र प्रशस्यते ता ब्राह्मण-निरुक्तान्तर्गता एवं कथा नाराशंस्यो ग्राह्या नातोऽन्या: ' ( पृ ० ९ ५ ) इति । तदपि तुच्छम् तथात्वे ब्राह्मणेभ्यः पृथगितिहासपुराणात्लेख वैयर्थ्यापत्तेः । ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहास-पुराणानां प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ' इति वात्स्यायनमुनिवचनविरोधाच्च । तथाहि न्यायसूत्रे ( ४/१/६२ ) इत्यत्र वात्स्या यनभाष्ये - ' चातुराश्रम्यविधानाच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्रेषु ऐका श्रस्यानुपपत्तिः ' इत्युक्तम् । तत्रेतिहासपुराणधर्म-शास्त्राणामप्रामाण्यमाशङ्कय समाहितम् ' तदप्रमाणमिति चेन्न प्रमाणेन प्रामाण्याभ्यनुज्ञानात् । व्याख्यातं च स्ववाक्यं भाष्यकारेण ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते । ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एतदितिहास-पुराणमभ्यवदन्निति पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदमिति । तस्मादयुक्तमेतदप्रामाण्यमिति । अप्रामाण्ये च धर्मशास्त्रस्य प्राणभृतां व्यवहारलोपाल्लोकोच्छेदप्रसङ्गः । प्रकारान्तरेण च तेषां प्रामाण्यमुपपादितं भाष्यकारेण -- ' द्रष्टृ - प्रवक्तु-सामान्याच्चाप्रामाण्यानुपपत्तिः, य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य च ' इति । प्रकारान्तरेण तदेवाह - ' विषयव्यवस्थापनाच्च यथाविषयं प्रामाण्यम्, अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयोऽन्यच्चेतिहास-पुराणधर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थापनं धर्म-शास्त्रस्य विषयः, तत्रेकेन न सर्व व्यवस्थाप्यत इति यथाविषयमेतानि प्रमाणानीन्द्रियवत् । एतावता महर्षिर्वात्स्यायनो है, उसके लिये इसमें प्रार्थना की गई है ', ' सविता सब देवों का जनक है, वे सब उसी से उत्पन्न है ' ये ब्राह्मण वाक्य ही ' कल्पसूत्र ' कहलाते हैं । शतपथ ब्राह्मण में प्रश्नोत्तर के रूप में दिये गये याज्ञवल्क्य - जनक संवाद, गार्गी - मैत्रयों आदि के संवाद ' गाथा ' कहलाते है । ( वास्तव में शतपथब्राह्मण में प्रश्नावर के रूप में गार्गी मैत्रेयो संवाद उपलब्ध नहीं है, दयानन्द ने बिना देखे ही यह लिख दिया है | ) यास्काचार्य ने निरुक में ' नाराशंसी ' पद की निरुक्ति यह दी है- ' काथक्य के मत से नाराशंस यश को कहा जाता है । शाकपूर्णिका मत है कि मनुष्य इसमें बैठकर अग्नि की स्तुति करते हैं । जो मनुष्यों के द्वारा प्रशंसित होता है, वह नाराशंसी कहलाता है ' । इस तरह जिनमें मनुष्यों की प्रशंसा हैं, जहाँ मनुष्यों के द्वारा प्रशंसा की जाती हैं, वह ब्राह्मण, निरुक्त आदि में वर्णित कथा ' नाराशंसी ' कही जाती है, इससे भिन्न नहीं ' दयानन्द की यह उक्ति इसलिये व्यर्थ है कि ऐसा होने पर ब्राह्मणों से पृथक् इतिहास, पुराण आदि का उल्लेख निरर्थक हो जायगा | ' ब्राह्मण वाक्य के प्रमाण से इतिहास - पुराण की प्रामाणिकता मानी जाती है ' इस वात्स्यायन मुनि के वचन का भी विरोध होगा | ४ | १८६२ संख्या के न्यायसूत्र के वात्स्यायन भाष्य में ' इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्रों में चार आश्रमों का विधान होने से आश्रम एक ही है, यह बात नहीं मानी जा सकती ' ऐसा कहा है । वहीं पर इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र प्रमाण नहीं हो सकते, ऐसी आशंका कर उसका समाधान दिया गया है कि - ' यह सब प्रमाण नहीं माने जा सकते, ऐसी बात नहीं है, प्रमाण के द्वारा उनकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है ' । अपने इस वाक्य की व्याख्या स्वयं भाष्यकार ने इस प्रकार की है- ' प्रमाणभूत ब्राह्मण वाक्यों के द्वारा इतिहास - पुराण की प्रामाणिकता मानी जाती है । अथर्ववेद के वाक्यों में ' पुराण पाचवा वेद है ' इस प्रकार इतिहास पुराण को प्रशंसा की है । इसलिये इनको अप्रामाणिक बताना गलत है । धर्मशास्त्र को यदि प्रमाण नहीं माना जायगा त प्राणियों के परस्पर व्यवहार का ज्ञान न रहने से उच्छृंखला फैल जायगी ' । भाष्यकार ने प्रकारान्तर से भी इनकी प्रामाणिकता का उपपादन किया है-- ' इन सबके द्रष्टा और प्रवक्ता समान हैं, इसलिये भी ये अप्रामाणिक नहीं हो सकते । जो मन्त्र और ब्राह्मण के द्रष्टा हैं, वे ही इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र के प्रवक्ता है । इसी बात को दूसरे रूप में इस प्रकार कहा है- ' इन सबका विषय व्यवस्थित है, अतः विषय के अनुसार ये प्रमाण हैं । मन्त्र और ब्राह्मण का विषय भि है और इतिहास, धर्मशास्त्र, पुराण का विषय free । मन्त्र और ब्राह्मण

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२ वेदार्थपारिजातः कवाक्याति । वेदे यथा - ' आत्मेत्येवोपासीत ' इत्यादीनि | अनुव्याख्यानानि मन्त्रविवरणानि, व्याख्यानान्यर्थवादाः अथवा वस्तुसंग्राहकवा: विवरणाति अनुव्याख्यानानि यथा चतुर्थाध्याये आत्मेत्येवोपासीतेत्यस्य यथान्योसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरित्यस्यायमध्यायशेषः । मन्त्रविवरणानि व्याख्यानानि एवमष्टविधं ब्राह्मणम् । एतेन यत्र बृहदारण्य -कादी महतो भूतस्य परमेश्वरस्य निःश्वसितरूपेणेतिहासपुराणस्य चर्चास्ति, तत्र वेदरूपत्वाद् ब्राह्मणान्तर्गतमेव । यत्र निःश्वसितत्वोक्तिर्नास्ति तत्र तु श्रीमद्भागवतादिपुराणानामेव ग्रहणं न्याय्यम्, यथा छान्दोग्यवाक्ये वात्स्यायनोद्धृते ब्राह्मणे च । तत एव वात्स्यायनो महर्षिर्ब्राह्मणेन प्रमाणेनेतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमुक्तवान् । नवचनानामितिहासपुराणानां कथमनादिवेदेषु वर्णनं सम्भाव्यत इति चेन्न 2 यथाहि ब्राह्मणानामादि-मत्वमङ्गीकुर्वाणा अपि सामाजिकाः ' तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्यचलन् ' ( अथर्वसं ० १५ / ६।११ ) इत्यथर्वमन्त्रं तेषां वर्णनमभ्युपगच्छन्ति } तथैवादिमतामपि पुराणानां वेदे वर्णनं न दोपाधायकम् । वस्तु-तस्तु इतिहासपुराणमप्यनाथैव, प्रतिकल्पं ब्रह्मणस्तदाविर्भावस्मरणात् । ' युगान्तेऽन्तहितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ॥ ' ( म ० भा ० शा ० प ० २०११ ९ ) । नन्वेवं वेदपुराणयोः को भेद इति चेच्छृणु -नियतवर्णानां नियतानुपूर्वी भिद्यते । इतिहासपुराणस्य तु कल्पान्तरेष्वपि नानुपूर्वी परिवर्तनं सम्भवति । ' ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिवि श्रितः ॥ ' ( अथर्व पं ० ११।९ ।२४ ), ' एवम सर्वे वेदा निर्मिताः सकल्पाः सरहस्याः सब्राह्मणाः सोपनिषत्का: सेतिहासाः सान्वाख्यानाः सनिरुक्ताः सपुराणाः सानुशासना: ' ( गोपथपूर्वभागे २/१० ), ' पुराणम्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुदेव || ' ( या स्मृ ० ११३ ) इत्यादिषु सर्वत्र श्रीमद्भागवतादय एव पुराणपदग्राह्याः । भाग में वर्तमान मन्त्रों को कहते हैं । ' आस्मेत्येवोपासील ' इत्यादिक वस्तुसंग्राहक वाक्यों को सूत्र कहते हैं । मन्त्र का विवरण करने वाले वाक्य अनुव्याख्यान कहे जाते हैं | अर्थवाद वाक्य व्याख्यान कहलाते हैं । अथवा वस्तुसंग्राहक वाक्यों के विवरण अनुयास्यान कहे जाते हैं । जैसे कि ' आत्मेत्येवोपासीत ' इस संग्राहक वाक्य का विवरण ' यथाऽन्यो ' इत्यादि अवशिष्ट पूरे अध्याय में किया गया है । मन्त्रों के विवरण व्याख्यान कहलाते हैं । इस प्रकार ब्राह्मण भाग अष्टधा विभक्त है । इससे यह सिद्ध होता है कि जहाँ पर बृहदारण्यक आदि में महान् भूत परमेश्वर के निःश्वासभूत इतिहास - पुराण की चर्चा है, वह वेद रूप होने से ब्राह्मण के ही अन्तर्गत माना जायगा । जहाँ पर ईश्वर के निःश्वासभूत इतिहास - पुराण की चर्चा नहीं है, वहाँ पर तो श्रीमद्भागवत आदि पुराणों का ग्रहण करना ही उचित हैं, जैसे कि छान्दोग्य वाक्य में और वात्स्यायन के द्वारा उद्धृत ब्राह्मण में । इसीलिये महर्षि वात्स्यायन ने ब्राह्मण art के प्रमाण पर इतिहास - पुराण का प्रामाण्य माता है । अनादि वेद में अर्वाचीन पुराणों का वर्णन कैसे हो सकता है? इसका उत्तर यही है कि जैसे आर्यसमाजी ब्राह्मणों को बाद की रचना मानते हुए भी ' इतिहास, पुराण, गाथा, नाराशंसी उसके पीछे पीछे चलें ' इस अथर्ववेद के मन्त्र में उनका वर्णन मानते हैं, उसी तरह अर्वाचीन पुराणों का भी वेद में वर्णन मानने में कोई दोष नहीं है । वास्तव में तो इतिहास - पुराण भी अनादि है । ' प्रलयकाल में अन्तर्हित इतिहास सहित वेदों को महर्षिगण तपस्या के बल से स्वयम्भू ब्रह्मा की आज्ञा से पुनः प्राप्त करते है ' इत्यादि ों में प्रत्येक नये कल्प में ब्रह्मा के द्वारा उनका आविर्भात सुना गया है । तब वेद और पुराण में क्या भेद रह जायगा? भेद यह रहेगा कि वेदों में नियत वर्णों की मानुपूर्वी भी नियत है, इसलिये दूसरे कल्प में भी यह आनुपूर्वी भि नहीं होती । इसके विपरीत इतिहास पुराण में अर्थ की एकता रहने पर भी आनुपूर्वी में परिवर्तन संभव है । इसलिये ' ऋक्, साम, छन्द, यजुस् और पुराण इन सबका परिज्ञान देवलोक के देवताओं को बाद में हुआ ', ' इस प्रकार कल्प, रहस्य, ब्राह्मण, उपनिषद्, इतिहास, अन्वाख्यान, निरुक, पुराण और अनुशासन के साथ सब वेदों की रचना हुई ', ' अपने ६ अंगों के साथ ४ वेद पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्म-शास्त्र को मिलाकर विद्या और धर्म के १४ प्रस्थान होते हैं ' इत्यादि सभी स्थलों में पुराण शब्द से श्रीमद्भागवत आदि का हो ग्रहण होता है ।

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७१३ किञ्च, यदि पुरावृतार्थप्रतिपादकत्वेन ब्राह्मणानामेवेतिहासपुराणत्वम्, तदा तु ' सूर्याचन्द्रमसो धाता यथा-पूर्वमकल्पयत् ' ( ऋ ० सं ० १० १ ९ ०१३ ), ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' ( वा ० सं ० १३/४ ), ' अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं कक्षीवानृषिरस्मि विप्रः ' ( ऋ ० सं ० ४।२६।१ ) इत्यादिसंहितामन्त्राणामप्यतिहासिकार्थप्रतिपादकतयेतिहासपुराणत्वा-पत्तिः स्यात् । पुरावृत्तार्थप्रतिपादकत्वेऽपि यथा त्वया मन्त्राणामितिहासपुराणत्वं नाभ्युपेयते, तथैव ब्राह्मणानामपि न तत्सम्भवति । अत एव वात्स्यायनेन यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य विषय उक्तः । लोकवृत्तमितिहासपुराणानां विषय उक्तः । गाथा नाराशंस्यश्च मन्त्रेष्वप्युपलभ्यन्ते । वस्तुतस्तु पुराणेतिहासगुणयोगादेव ब्राह्मणेषु मन्त्रेषु च गौणमेवेतिहासत्वं पुराणत्वं च, मुख्यपुराणत्वं तु श्रीमद्भागवतादीनामेव । किञ्च त्वद्रीत्या ब्राह्मणं न वेदः किन्त्वर्वाचीनमृषिकृतम्, तथापि मन्त्रेषु ब्राह्मणानां ब्राह्मणविशेषाणां पुराणेतिहासादीनां नामोपलब्धावपि यथा मन्त्राणामनादित्वं न भज्यते, तथैव ब्राह्मणेषु मनुष्यादीनां महिदासादिनाम्नां सत्वेऽपि तेषामनादित्वं वेदत्वं च न भज्यत इत्यपि समानयोगक्षेमम् । यदुक्तम्- ' तेषु तेषु वचनेषु यतो यस्माद् ब्राह्मणानीति संज्ञीपदमितिहासादिस्तेषां संज्ञेति, तद्यथा ब्राह्मणाम्येवेतिहासान् जानीयात् पुराणानि कल्पान् गाथा नाराशंसीश्चेति ' ( पृ ० ९ ५ ) तदपि तुच्छम्, निर्मूलत्वात् । प्रमाणमन्तरेण कथं ब्राह्मणान्येवेतिहासान् जानीयादिति तदर्थः सम्भवति? संज्ञीपदमित्यत्र दोर्घेकारप्रयोगोऽशुद्धः, संज्ञिपदमित्यस्यैव युक्तत्वात् । यदपि --- ' वाक्यविभागस्य चार्थग्रहणात् ' ( गो ० सू ० २/१/६० ) इत्यत्र वात्स्यायनभाष्यम् ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके । विभागश्च ब्राह्मणवाक्यानां त्रिविधः ' इति । अयमभिप्रायः - ब्राह्मणशब्दा लौकिका एव न वैदिकाः तेषां त्रिविधो विभागो लक्ष्यते ' विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् ' ( गो ० सू ० २/१/६१ ) | अत्र वात्स्यायनभाष्यम् -'विधि-पुरानी घटनाओं का वर्णन देखकर यदि आप ब्राह्मणों को ही इतिहास पुराण मानने का हद करते हैं, तो फिर ' ब्रह्मा पूर्वकल्प की भांति इस नई सृष्टि में भी चन्द्र और सूर्य को बनाया ', ' सृष्टि के बारम्भ में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा वर्तमान थे ', ' पूर्व जम्म में मैं मनुथा, सूर्य था, कक्षीवान् ऋषि था और अब ब्राह्मण वामदेव हैं इन संहिता मन्त्रों में भी इतिहास का प्रतिपादन होने से seat भी इतिहास - पुराण मानना पड़ेगा | इतिहास का उल्लेख मिलने पर भी जैसे आप मन्त्र भाग को इतिहास - पुराण के अन्तर्गत नहीं मानते, वैसे ही ब्राह्मणों के लिये भी समझना चाहिये | इसलिये वात्स्यायन ने यज्ञ को मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का विषय माना है और लोकवृत्त को इतिहास पुराण का । गाया और नाराशंसी न केवल ब्राह्मण भाग में, अपितु मन्त्र भाग में भी उपलब्ध होते हैं । वास्तव में पुराण - इतिहास के गुण धर्मो की उपलब्धि मन्त्र और ब्राह्मण भाग में भी होने से इनमें इतिहास - पुराण शब्द का प्रयोग गौण रूप से होता है, मुख्य रूप से इसका प्रयोग श्रीमद्भागवत आदि के लिये ही किया जा सकता है । आपके मत से ब्राह्मण अनादि वेद न होकर अर्वाचीन ऋषियों की कृति है । हमारा कहना है कि मन्त्रों में ब्राह्मणों का, विशेष ब्राह्मणों का इतिहास - पुराण आदि का नाम मिलने पर भी जैसे मन्त्रों की अनादिता नहीं टूटती, उसी तरह ब्राह्मणों में भी महिदास आदि मनुष्यों के नामों के मिलने पर भी उनकी अनादि वेद मानने में कोई बाधा नहीं हो सकती, क्योंकि दोनों की स्थिति समान है । यह भी कहा गया है कि उन उन पूर्वोद्धृत वचनों में जिससे ' ब्राह्मण सूष्ट हुए यह संज्ञी पद है और इतिहास आदि उसकी संज्ञाएं हैं । जैसे कि ब्राह्मणों को ही इतिहास जाने, ये ही पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी हैं । प्रमाण रहित होने से यह बात निर्मूल है । बिना प्रमाण के यह कैसे माना जा सकता है कि ' ब्राह्मणों को ही इतिहास जाने ' यह उस वाक्य का अर्थ होता है? ' संज्ञीपदम् ' यहाँ पर दीर्घ इकार का प्रयोग भी अशुद्ध है, इसका शुद्ध रूप ' संज्ञिपदम् ' होता है । इस में अपने मत की पुष्टि में निम्न न्यायसूत्र और वात्स्यायन भाष्य उद्धृत किये गये हैं- ' अनुवाद वाक्यों की भी सार्थकता के कारण प्रामाण्य है ' यह न्यायसूत्र है । यहाँ न्यायभाष्य में बताया गया है कि ' लौकिक वाक्यों के समान समस्त वैदिक शब्द ९ ०

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७१४ वेदार्थपारिजातः वचनाति, अर्थवादवचनानि, अनुवादवचनानि ' इति । ' विधिविधायकः ' ( गो ० सू ० २।१।६२ ) । अत्र वात्स्यायनभाष्यम् — ' यद्वाक्यं विधायक चोदकं स विधिः । विधिस्तु नियोगोऽनुज्ञा वा । यथा ' अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः ' इत्यादि । ' स्तुतिनिन्दा परकृतिः पुराकल्प इत्यर्थवादः ' ( गो ० सू ० २ | १ | ६४ ) । अत्रत्यं भयम्- ' विधेः फलवादलक्षणा या प्रशंसा सा स्तुतिः सम्प्रत्ययार्था स्तूयमानं श्रद्दधीतेति प्रवर्तिका च । फलश्रवणात् प्रवर्तते, ' सर्वजिता वै देवाः सर्वमजयन् सर्वस्याप्त्यै सर्वस्य जित्यै सर्वमेवैतेनाप्नोति सर्व जयति ' एवमादि । अनिष्टफलवादो निन्दा वर्जनार्थी, निन्दितं न समाचरे-दिति - ' स एष प्रथमो यज्ञो यज्ञानां यज्ज्योतिष्टोमो य एतेनानिष्ट्वान्येन यजते गर्ते पतत्ययमेवैतज्जीर्यते वा प्रमीयते वा ' इत्येवमादि । अभ्यकर्तृकस्य व्याहतस्य विधेर्वादः परकृतिः ' हुत्वा वपामेवाग्रेऽभिघारयन्ति । अथ पृषदाज्यं तदुह चर-काध्वर्यवः पृषदाज्यमेवाऽग्रेऽभिघारयन्ति । अग्नेः प्राणाः पृषदाज्यं स्तोममित्येवमभिदधति ' इत्येवमादि । ऐतिह्यसमा -चरित विधिः पुराकल्पः । ' तस्माद्वा एतेन ब्राह्मणा बहिष्पवमानं सामस्तोममस्तौषन् । योनेर्यज्ञं प्रतनवामहा ' इत्येव-मादि । कथं परकृतिपुराकल्पावर्थवादी? स्तुतिनिन्दावाक्येनाऽभिसम्बन्धाद् विध्याश्रयस्य कस्यचिदर्थस्य द्योतना-दर्थवाद इति ' इति । ' विधिविहितस्यानुवचनमनुवादः ' ( गो ० सू ० २ ११६५ ) विध्यनुवचनं चानुवादः, विहितानुवचनं व । पूर्वः शब्दानुवादो s परोऽर्थानुवादः । ' ( पृ ० ९ ६ - ९ ८ ) हिन्दीभाषानुवादे च ( पृ ० ९ ७ - ९ ८ ) यथा लोके त्रिविधानि वचनानि भवन्ति तथैव ब्राह्मणग्रन्थेष्वपि । यथा देवदत्तो ग्रामं गच्छेत् सुखार्थं तथैव ' अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकासः ' इति ब्राह्मणम् । पदार्थगुणप्रकाशन स्तुतिः, यतो मनुष्याणामुत्तमकार्यकरणे गुणानां ग्रहणे व श्रद्धा स्यात् । निन्दितकर्मणां दोषप्रदर्शनं निन्दा, यथा चोरेण निन्द्यं सप्रमाण हैं । ब्राह्मण वाक्य तीन प्रकार के हैं ' इसका यह अभिप्राय है कि ब्राह्मण शब्द लौकिक है, वैदिक नहीं । इनके तीन प्रकार हैं ----' ffer, अर्थवाद और अनुवाद के रूप में ब्राह्मण वाक्यों का तीन प्रकार से विनियोग होता है ' इस सूत्र के वात्स्यायन भाष्य में बताया गया है कि ' विधिवचन, अर्थवादवचन और अनुवादवचन ब्राह्मणों में उपलब्ध होते हैं ' । ' विधायक वाक्य विधि है ' इस सूत्र के भाष्य में कहा गया है कि- ' जो वाक्य विधायक अर्थात् प्रेरक है, वह ' विधि ' कहलाता है । विधि दो प्रकार की है - नियोग और अनुज्ञा । जैसे कि ' स्वर्ग की कामना वाला अग्निहोत्र करे ' इत्यादि । ' स्तुति निन्दा, परकृति और पुराकल्प के भेद से अर्थवाद चार प्रकार का है ' इस सूत्र का भाग्य इस प्रकार है- ' स्तुतिपरक अर्थवाद वाक्यों में विधि के फल की प्रशंसा की जाती है, इसलिये कि उसमें विश्वास जमे स्तूयमान यागादि में विश्वास उत्पन्न हो । यह स्तुति प्रवर्तिका भी है, क्योंकि फल की स्तुति सुनने से उसमें मनुष्य प्रवृत्त होता है । जैसे कि ' देवताओं ने सब कुछ पाने के लिये और सभी पर विजय पाने के लिये ' सर्वजित् ' यज्ञ का अनुष्ठान किया, जो इसका अनुष्ठान करता है वह सब कुछ पा लेता है, सबको जीत लेता है । निन्दापरक अर्थवाद अनिष्ट फल की सूचना देते हैं, इसलिये कि निन्दित कर्मों में मनुष्य प्रवृत्त न हो । जैसे कि ' ज्योतिष्टोम सभी यज्ञों में प्रथम है । जो इसका बिना अनुष्ठान किये दूसरे यज्ञों का अनुष्ठान करता हैं, वह गड्ढे में गिर पड़ता है, नष्ट हो जाता है, बुरी मौत मरता है ' इत्यादि । परकृति नामक अर्थवाद में दूसरों के द्वारा किये गये fatafat कार्यों का उल्लेख रहता है । जैसे कि ' हवन के बाद पहले वपा का अभिधारण किया जाता है, बाद में पूषदाज्य का । इसके विपरीत चरक शाखा के अध्वर्युगण पहले पृषदाज्य का अभिधारण करते हैं और कहते हैं कि पृषदाज्य अग्नि का प्राण है । पुराकल्प नामक अर्थवाद इतिहास के समान दिखाई पड़ता है । जैसे कि ' इसी लिये पुराकाल के ब्राह्मण ' योनेश प्रतनदाम है ' इत्यादि वहिष्पवमान साम स्तोम से स्तुति करते थे ' इत्यादि । परकृति और पुराकल्प कैसे अर्थवाद होंगे? इसलिये कि स्तुति अथवा मिन्दापरक वाक्य से जुड़ कर ये विधि प्रतिपादित किसी अर्थ को बतलाते हैं । ' विधि से विहित पदार्थ का किसी उद्देश्य से पुन: विधान किया जाय तो यह अनुवाद कहलाता है ' इसका भाष्य यह है -- ' अनुवाद विधि के अनुवचन और विहित के अनुवचन के भेद से दो प्रकार का है । पहला का अनुवाद है और दूसरा अर्थ का ' । हिन्दी भाषा के अनुवाद में बताया गया है कि जैसे लोक में तीन तरह के वाक्य होते हैं, उसी तरह के वाक्य ब्राह्मणों में भी है । जैसे ' सुख के लिये देवदत्त गाँव में जाये ' यह लौकिक वाक्य है, उसी तरह ' स्वर्ग को वाहने वाला अग्निहोत्र करे ' यह ब्राह्मण art भी है । किसी वस्तु के गुणों को प्रकाशित करना स्तुति कहलाती है । इससे मनुष्य की अच्छे कार्य करने में प्रवृत्ति और गुणों को

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पारिजातः 19 कार्यं कृतं तेन स दण्डितः, अन्येन सुपुरुषेण साधु कर्म कृतं तेन स प्रतिष्ठां प्राप्तः । पुराकल्पो यथा जनकसभायां याज्ञवल्क्यगार्गीशाकल्यादिभिः प्रश्नोत्तररूपः संवाद कृतः । परमेतत्सर्वं सूत्रभाष्यसंस्पर्शशून्यमेव, प्रमाणं शब्दो यथा लोके इत्यनेन भाष्यवाक्येनैव दयानन्देनेदं निर्णीत यद् ब्राह्मणग्रन्थशब्दा लौकिका एव न वैदिका इति । परमेष निर्णयस्तद्भ्रान्तिमूलक एवं सूत्रभाष्यशब्देस्तादृशस्यार्थ-स्यानवगमात् । वस्तुतस्तु ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके ' इत्ययमंश: ( गो ० सू ० २ १/६१ ) इति सूत्रस्यावतरणिका रूपः, तेन ब्राह्मणभागस्य लौकिकता कथं सिद्धयति? स्वामिदयानन्देनास्याभिप्रायो नावगतः । यदि परिज्ञातस्तदा तु धूलिप्रक्षेप-मात्रमेव तेन कृतम् । लोकदृष्टान्तेन मन्त्राणां विभाग: पोष्येत तदा किं मन्त्रभागस्यापि लौकिकत्वमभ्युपगंस्यते सामाजिक:? नो चेल्लोकदृष्टान्तेन ब्राह्मणभेदकथनेऽपि कथं ब्राह्मणभागस्य लौकिकत्वसिद्धिः? यथा लोके राज्ञः संस्तवस्तथा मन्त्रेषु परमेशस्तव इत्येवं लोकदृष्टान्तेन मन्त्राणां भेदनिर्देशो भवत्येव । किञ्च, लौकिकवैदिकवाक्ययोरभेद एवोपवणतो वात्स्यायनेन । भिद्यते लौकिकाद् वाक्याद् वैदिकं वाक्यं प्रेक्षापूर्व कारिप्रणीतत्वेन । मन्वन्तरयुगान्तरेषु चातीतानागतेषु सम्प्रदायाभ्यासप्रयोगाविच्छेदाद् वेदानां नित्यत्वम्, आप्त-प्रामाण्याच्च प्रामाण्यं लौकिकेषु शब्देषु चैतत्समानमिति ( गो ० सू ० २।१।६८ ) इत्यत्र वात्स्यायनभाष्यम् । नहि लौकिकशब्दसमानत्वकथनेन वैदिकशब्दानां लौकिकत्वं भवति, तथैव ब्राह्मणविभागस्य लौकिकशब्दविभागसमानत्व-कथनेनापि न ब्राह्मणभागस्य लौकिकत्वम् । किमेवं मन्त्राणामपि लौकिकत्वं न सिद्धयति? यास्केनापि लौकिक-दृष्टान्तेनैव मन्त्राणां सार्थकता प्रदर्शिता । ' अर्थवन्तः शब्दसामान्यात् । समान एव हि शब्दो लोके मन्त्रेषु च । स एव गोशब्दो लोके, स्वरसंस्कारयुक्तः स एव मन्त्रेष्वपि । तत्रैवं सति स एवार्थवांल्लोके स एव चानर्थको मन्त्रेष्विति ग्रहण करने में श्रद्धा होती है । बुरे कामों में दोष दिखाना निन्दा कही जाती है । जैसे कि चोर ने बुरा काम किया, इसलिये वह दण्डित हुआ । दूसरे आदमी ने अच्छा काम किया, अत: वह प्रशंसित हुआ । जनक की सभा में याज्ञवल्क्य, गार्गी, शाकल्य आदि का प्रश्नोत्तररूप संवाद पुराकरूप का उदाहरण है । यह सारा कथनसूत्र और साध्य का अर्थ ठीक से न समझने के कारण है । ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके ' भाष्य के इस वाक्य के आधार पर ही दयानन्द ने यह निर्णय कर लिया कि ब्राह्मण ग्रन्थों के शब्द लौकिक हैं, वैदिक नहीं । यह उनकी भ्रान्ति है, क्योंकि सूत्र और भाष्य के शब्दों में यह बात नहीं कही गई है । वास्तव में ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके ' भाष्य का यह अंश २/११६१ संख्या के न्यायसूत्र की अवतरणिका है । इससे ब्राह्मण भाग की लौकिकता कैसे सिद्ध हो सकती है? स्वामी दयानन्द ने इसका अभिप्राय नहीं समझा । यदि समझा है, तो वे केवल धूलिप्रक्षेप करना चाहते हैं । यदि लौकिक दृष्टान्त से मन्त्रों का भी विभाग कर दिया जाय तो क्या आर्यसमाजी मन्त्र भाग को भी लौकिक मानने लगेंगे? यदि नहीं तो फिर लौकिक दृष्टान्त से ब्राह्मण वाक्यों का भेद बताने पर ब्राह्मणभाग की लौकिकता अर्थात् अवैदिकता कैसे होगी? जैसे लोक में राजा की स्तुति की जाती हैं, उसी तरह की स्तुति वेदों में देवताओं की मिलती है, इस प्रकार लौकिक दृष्टान्त से मन्त्रों का भी भेद दिखाया जा सकता है । वात्स्यायन ने लौकिक और वैदिक वाक्य में अभेद बतलाया है । २१११६८ सूत्र के भाष्य में कहा गया है कि लौकिक art से वैदिक वाक्य का इस माने में कोई अन्तर नहीं है कि दोनों की रचना करने वाले व्यक्ति विचारक है । वेद नित्य इसलिये हैं कि इनके सम्प्रदाय का विच्छेद बीते हुए अथवा आने वाले मन्वन्तर और युगान्तर में भी न हुआ है और न होगा । आप्त पुरुषों के प्रमाण पर वैदिक और लौकिक दोनों ही वाक्य सप्रमाण | लौकिक शब्दों के साथ समानता बताने से वैदिक शब्द लौकिक नहीं हो जाते, उसी तरह लौकिक वाक्य विभाग के समान ब्राह्मण वाक्यों का भी विभाग होता है, ऐसा कहने से भी ब्राह्मण भाग लौकिक नहीं हो जायगा । ऐसा मानने पर क्या मन्त्रों की भी लौकिकता सिद्ध न हो जायगी । यास्क ने भी लौकिक दृष्टान्तों से ही मन्त्रों की सार्थकता दिखाई है । ' मन्त्र सार्थक हैं, क्योंकि ये भी शब्द ही हैं । लोक में और मन्त्रों में एक से ही शब्द हैं । जिस ' गो ' शब्द का व्यवहार लोक में होता है, वही स्वर से संस्कृत होकर मन्त्र में भी प्रयुक्त होता है । ऐसी अवस्था में एक ही शब्द लोक में सार्थक और मन्त्र में

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७१६ daru रिजात: विशेषहेतुर्नास्ति ' इति दुर्गाचार्य: । यथा नियतवाचोयुक्तयो नियतानुपूर्व्या लौकिकेष्वपि एतद्यथेन्द्राग्नी पितापुत्राविति । लौकिकेष्वप्येतद्यथाऽसपत्नोऽयं ब्राह्मणोऽनमित्रो राजा ' ( नि ० १११६ ) । प्रमाण शब्दो यथा लोके । अन यथाशब्द उपमावोचकः । यथा लौकिकाः शब्दाः प्रमाणं तथैव वैदिक r अपीति तदर्थः । नैतावता मन्त्राणां ब्राह्मणानां वा लौकिकत्वं सिद्धयति । ' विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् ' ( गो ० सू ० २/१/६२ ) इति सूत्रेण ब्राह्मणभागस्य वैविध्यमुक्तम् | ( २१११६३ ), ( २/१/६४ ), ( २/१/६५ ) इति सूत्रस्तेषां लक्षणान्युक्तानि । ( २/११६५ ) सूत्रे वात्स्यायनेन पूर्वोक्तब्राह्मणवाक्यानां सार्थकत्ववोधनाय लौकिकान्युदाहरणान्यु-क्तानि । लोकेऽपि विधिरर्थवादोऽनुवाद इति त्रिविधं वायं भवति । ओदनं पचेद् इति विधिः । आयुर्वच बलं सुखं प्रतिभानं चान्ने प्रतिष्ठितमित्यर्थवादः । पचतु पचतु भवानित्यस्यास: क्षिप्रं पच्यतामिति वा । अङ्ग पच्यता-मित्यध्येषणार्थम् । पच्यतामेवेति चावधारणार्थम् । एवं लौकिकैर्वाक्यंः ' अग्निहोत्रं जुहुयात् ' इति ब्राह्मणवाक्यस्य सामञ्जस्यमुक्तम् । वात्स्यायनोक्तं षु लौकिकवाक्येष्वेकमपि ब्राह्मणवाक्यं नास्ति । वैदिकवाक्यानां यान्युदाहरणानि तेनोक्तानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणवाक्यान्येव, मन्त्रभागस्य एकमप्युदाहरणं नास्ति । यथा लौकिके वाक्ये विभागेनार्थ-ग्रहणात् प्रमाणत्वं तथा वेदवाक्यानामपि विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वं भवितुमर्हतीति । उपसंहारवाक्ये वेदवाक्यनाम्ना ब्राह्मणवाक्यस्योदाहरणाद् ब्राह्मणभागस्य वेदत्वमभिमतं वात्स्यायनस्य । ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यम् ' ( गो ० सू ० २/१/६८ ) इत्यत्रापि लौकिकस्यायुर्वेदस्योदाहरणेन वेदानां प्रामाण्यं साधितम् । किमेतावता वेदस्य लौकिकत्वमेव भवेत्? ब्राह्मणवाक्यानामवेदत्वे वेदप्रकरणे तदुपस्थापन-प्रकृतप्रक्रियैव स्यात् । ब्राह्मणानामेव प्रसङ्गे एवं वेदवाक्यानामपि प्रामाण्यं भवितुमर्हतीति कथनं ब्राह्मणानामवेदत्वे सर्वथैवासङ्गतं स्यात् । तस्मात् सूत्रभाष्यकारवचनैर्न मनागपि ब्राह्मणानामवेदत्वशङ्कापि भवति । अनर्थक हो, इसमें कोई कारण नहीं दिखाई देता ' निरुक्त की यह व्याख्या दुर्गाचार्य ने की है । ' वाक्य विन्यास की पद्धति और आनुपूर्वी वैदिक और लौकिक वाक्य में समान है । जैसे- वेद में ' इन्द्रानी ' शब्द का प्रयोग होता है, वैसे ही लोक में ' पितापुत्र ' शब्द प्रयुक्त होता हैं | इस ब्राह्मण का कोई शत्रु नहीं है, इस राजा का कोई मित्र नहीं है, इत्यादि प्रयोग लोक में भी देखे गये हैं । ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके ' यहाँ पर ' यथा ' शब्द उपमा को बताता है । जैसे लौकिक शब्द प्रमाण हैं, उसी तरह वैदिक भी, यह उसका अर्थ हुआ | इतने से मन्त्र अथवा ब्राह्मण की लौकिकता नहीं सिद्ध होती । २११/६२ संख्या के न्यायसूत्र से ब्राह्मण भाग की विविधता बताई गई और बाद के तीन सूत्रों में इनके लक्षण कहे गये हैं । लोक में भी विधि, अर्थवाद और अनुवाद इस तरह arraria होते हैं । ' चावल पका ' यह विधि वाक्य है । ' आयु, ओज, बल, सुख और प्रतिभा ये सब अन्न में प्रतिष्ठित है । यह अर्थवाद हैं । ' भोजन बनाओ बनाओ ' अथवा ' शीघ्र बनाओ ' यह अभ्यास है । ' भाई भोजन बनाओ ' यह निवेदन है और ' भोजन बनाओ ही ' यह आज्ञा देना है । इस तरह लौकिक वाक्यों के साथ ' अग्निहोत्र करें ' इत्यादिक ब्राह्मण वाक्यों की समानता बताई गई है । वात्स्यायन के द्वारा उदाहृत लौकिक वाक्यों में एक भी ब्राह्मण वाक्य नहीं है । वैदिक वाक्यों के जितने उदाहरण दिये हैं, वे सब ब्राह्मणों के वाक्य हैं । इनमें मन्त्रभाग का एक भी उदाहरण नहीं है । जैसे लौकिक वाक्यों का अपने - अपने विभाग के अनुसार अर्थ परिगृहीत होने से प्रामाण्य है, उसी तरह वेद के वाक्यों का भी अपने विभाग के अनुसार ही अर्थ परिगृहीत होने से प्रामाण्य होगा । वात्स्यायन ने उपसंहार वाक्य में वेद वाक्य के नाम से ब्राह्मण वाक्य का उदाहरण दिया है, इससे यह प्रतीत होता है कि वात्स्यायन ब्राह्मण भाग को भी वेद मानते हैं । ' मन्त्र और आयुर्वेद के समान उसका प्रामाण्य है ' इस सूत्र में भी लौकिक शास्त्र आयुर्वेद का उदाहरण देकर वेदों का प्रामाण्य सिद्ध किया है । क्या इससे वेद लोकिक हो जायेंगे? ब्राह्मण वाक्य यदि वेद नहीं है तो वेद के प्रसङ्ग में उनका उल्लेख करना एक अप्रासंगिक चर्चा होगी । ब्राह्मण वाक्य के प्रसङ्ग में ' इस प्रकार व वाक्यों का भी प्रामाण्य सिद्ध होता है ' यह कहना ब्राह्मणों को वेद न मानने पर सर्वथा असङ्गत हो जायगा । इसलिये सूत्रकार और भाष्यकार के वचनों के आधार पर ब्राह्मणों के वेद होने में लवशेष भी शङ्का नहीं उठती ।

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वैदार्थपारिजातः नैयायिकाभिमतप्रमाणचतुष्ट्ववादः ७१७ ' न ' चतुष्ट्वमेतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात् ' ( गो ० सु ० २/२1१ ) इति सूत्रं तु पूर्वपक्षपरमेव, तेनेतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावानां नैयायिकपतेन प्रामाण्योपपादनं तु दयानन्दस्य शास्त्रानभिज्ञतैव । ( पृ ० ९ ८ ) तथाहि-पूर्वमुद्दिष्टप्रमाणस्य विभागप्रसङ्गे ' प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ' ( गो ० सू ० ११११३ ) इत्यत्र प्रमाणचतुष्ट्व-मेवोक्तम् । वात्स्यायनेन च ' अक्षस्यासस्य प्रतिविषयं वृत्तिः प्रत्यक्षम् । मितेन लिङ्गेनार्थस्य पश्चाज्ज्ञानमनुमानम् सारूप्यज्ञानमुपमानम् । शब्द्यतेऽनेनेति शब्दः ' इति संक्षेपेण तल्लक्षणान्युक्तानि । सूत्रकारैश्च विशेषतस्तत्तल्लक्षणानि तत्परोक्षाश्वोक्ताः । द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयाह्निके प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाऽऽरब्धा । अयथार्थः प्रमाणोद्देश इति मत्वाहेति ( पूर्वपक्षी ) न चतुष्ट्वमिति सूत्रस्योत्थानिका | सूत्रव्याख्यानेऽपि तदेवोक्तम् । न चत्वार्येव प्रमाणानि, किं तर्हि ऐतिहा + मर्थापत्तिः सम्भवोऽभाव इत्येताभ्यपि प्रमाणानि तानि कस्मान्नोक्तानि । तेषां लक्षणाभ्युदाहरणानि च प्रदर्शितानि भाष्यकारेण । तथाहि --- भाष्यकारो वात्स्यायनः पूर्वपक्षं व्यावर्तयन्नाह —— सत्यमेतानि प्रमाणानि न तु प्रमाणान्तराणि, पूर्वोक्तप्रमाणचतुष्टयान्तर्गतान्येवैतानीति न प्रमाणान्तराणि न वा पृथग्गणनार्हाणीत्यर्थः । तेषां स्वरूपं तु — इति होचुरित्यनिर्दिष्टप्रवक्तृकं प्रवादपारम्पर्यमेतिह्यम् । अर्थादापत्तिरर्थापत्तिः, आपत्तिः प्राप्तिः प्रसङ्गः । यत्राभिधोयमानेऽर्थे योऽन्योऽर्थः प्रसज्यते सोऽर्थापत्तिः । यथा मेघेष्वसत्सु वृष्टिनं भवतीति, किमत्र प्रसज्यते? सत्सु भवतीति । सम्भवो नामाविनाभाविनोऽर्थस्य सत्ताग्रहणादन्यस्य सत्ताग्रहणम्, यथा द्रोणस्य सत्ताग्रहणा-दाढकस्य सत्ताग्रहणम्, आढकस्य सत्ताग्रहणात् प्रस्थस्य | अभावो विरोधो अभूतं भूतस्य विद्यमानस्याविद्यमानं वर्षकर्म विद्यमानस्य वाय्वसंयोगस्य प्रतिपादकम्, विवारके हि वाय्वप्रसंयोगे गुरुत्वादपां पतनं न भवतीति । नैयायिक सम्मत चार प्रमाण ' ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव ये भी प्रमाण हैं, अत: प्रमाण चार हैं, यह कहना ठीक नहीं है यह न्यायदर्शन का पूर्वपक्ष सूत्र है । इसके आधार पर ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव की नैयायिक मत से प्रमाणता सिद्ध करने से दयानन्द की इस शास्त्र में अनभिज्ञता सूचित होती है । प्रथम अध्याय में पदाथों के परिगणन करने के बाद जहाँ प्रमाणों का विभाग किया गया है, वहाँ पर ' प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द ये प्रमाण हैं ' इस प्रकार चार प्रमाण गिनाये है । वात्स्यायन ने - ' प्रत्येक इन्द्रिय की अपने विषय के प्रति प्रवृत्ति प्रत्यक्ष कहलाती है । परीक्षित लिंग से किसी वस्तु का परिज्ञान मनुमान है । सदृशता का परिज्ञान उपमान है । जिससे अर्थ का अभिधान होता है, वह शब्द है । इस प्रकार संक्षेप में उनके लक्षण किये हैं । आगे चलकर सूत्रकार ने स्वयं भी इनके लक्षण दिये हैं और उनकी परीक्षा की है । द्वितीय अध्याय के द्वितीय आह्निक में प्रमाण चार हैं, इस बात की परीक्षा की गई है । ' न चतुष्ट्वम् ' इत्यादि सूत्र की चर्चा करते हुए पूर्वपक्षी कहता है कि ' प्रमाण चार हैं, यह कहना गलत है । सूत्र की व्याख्या में भी वही बात कही गई है । चार ही प्रमाण नहीं है, किन्तु ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव भी प्रमाण है । इनको क्यों नहीं गिनाया गया । इनके लक्षण और उदाहरण भाष्यकार ने वहीं दिये हैं । इसके बाद भाष्यकार वात्स्यायन पूर्वपक्ष का खण्डन करते हुए कहते हैं fi ' यह सच है कि ये भी प्रमाण हैं, किन्तु ये प्रमाणान्तर नहीं हैं । अर्थात् पूर्व निर्दिष्ट चार प्रमाणों में ही इनका अन्तर्भाव है । इसलिये न तो ये अतिरिक्त प्रमाण हैं और न इनका पृथक् परिगणन ही हो सकता है ' । इनका स्वरूप इस प्रकार का है -लोक में प्रचलित किंवदन्ती, जिसके कि कहने वाले का कोई पता नहीं है, ' ऐतिह्य ' कहलाती है । अर्थ से जिसको आपत्ति अर्थात् प्राप्ति का प्रसङ्ग आता है, उसे अर्थापत्ति कहते हैं । जिसकी चर्चा से प्रसङ्गवश जो अर्थ atta होता है, वह अर्थापत्ति हैं । जैसे कि क्षेत्रों के न रहने पर पानी नहीं बरसता, यहाँ क्या मालूम होता है? यही कि मेघों के रहने पर पानी बरसता है । किसी पदार्थ की सत्ता बिना अवयव के नहीं होती, इनका अविनाभाव सम्बन्ध होता है । सम्भव वह प्रमाण है, जहाँ पर कि व्याप्य की सत्ता से व्यापक की सत्ता का बोध होता है, जैसे कि द्रोण परिमाण के ज्ञान से ढक का और आढक परिमाण

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७१८ वैवार्थपारिजातः प्रमाणान्तरं च मन्यमानेन ( पूर्वपक्षिणा ) पूर्वोक्तप्रमाणचतुष्ट्वस्य प्रतिषेध उच्यते ' शब्द ऐतिह्यानर्थान्तर-भावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः ' ( गो ० सू ० २२ २ ) अनुपपन्नः प्रतिषेधः । अर्थात् प्रमाणचतुष्ट्वप्रतिषेधो न युक्तः कुतः? शब्द इत्यादि सूत्रेण पूर्वोक्तप्रमाणचतुष्टय एवैतिह्यादीनामन्तर्भावात् । तत्र भाष्यम् ' ' आप्तोपदेशः शब्द इति न शब्दलक्षणमैतिह्याद् व्यावर्तते । सोऽयं भेदः ( शब्दविशेष्यः ) सामान्यात् ( शब्द-सामान्यात् ) संगृह्यते, विशेषस्य सामान्यान्तर्गतत्वादित्यर्थः । अर्थाद् आप्तोपदेश: शब्द इत्येव शब्दस्य लक्षणं भवति । तच्चैतिह्येऽपि सङ्गतमेव । अनिर्दिष्टप्रवक्तृकस्य शब्दविशेषस्यैवैतिह्यत्वात् तद्विशेषस्य सामान्यान्तःपातित्वात् । प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षस्य सम्बद्धस्थ प्रतिपत्तिरनुमानम् । तथाभूताश्चार्थापत्तिसम्भवाभावाः । अनुमानेऽन्तर्भवन्तीत्यर्थः । एकैकं स्पष्टयति — वाक्यार्थसम्प्रत्ययेनाभिहितस्यार्थस्य प्रत्यनीकभावाद् ग्रहणमर्थापत्तिरनुमानमेव । अविनाभाववृत्त्या च सम्बद्धयोः समुदायसमुदायिनोः समुदायेनेतरस्य ग्रहणं सम्भवः । तदप्यनुमानमेव । अस्मिन् सतीदं नोपपद्यत इति विधत्वे प्रसिद्धे कार्यानुपपत्त्या कारणस्य प्रतिबन्धकमनुमीयते । सोऽयं यथार्थं एव प्रमाणोद्देशः । अर्थात् प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दा इति प्रमाणचतुष्ट्वमेव युक्तमित्यर्थः । सूत्रार्थस्तु —-शब्दादर्थान्तरत्वाभावादैतिह्यस्य शब्देऽन्तर्भावात्, अनुमानादर्थापत्ति संभवाभावानामर्थान्तरत्वाभावाद् अनु-मानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानामन्तर्भावात् प्रमाणचतुष्ट्वस्याप्रतिषेध एव युक्तः । अर्थान्तरस्य भावोऽर्थान्तरभावो न अर्थान्तरभावोऽनर्थान्तरभावस्तस्मादिति । ' अर्थापत्तिरप्रमाणमनेकान्तिकत्वात् ' ( गो ० सू ० २२२२३ ) इत्यादिभिर्दश-के ज्ञान से प्रस्थ का ज्ञान होता है । विरोधी पदार्थ अभाव कहलाता है । वर्षा न होने से मालूम होता है कि विधारक बायु और मेघ का संयोग विद्यमान है । क्योंकि वायु और अभ्र ( मेघ ) के संयोग के अवरोधक रूप में रहने से गुरुत्व के रहते हुए भी जल की वर्षा नहीं होती । इन सबको भी स्वतन्त्र प्रमाण मानते हुए पूर्वपक्षी ' चार ही प्रमाण है ' पहिले कही गई इस बात का निषेध करता है । यह निषेध नहीं बन सकता यह बात अगले सूत्र में कही गई है- ' ऐतिह्य शब्द है, अर्थापत्ति सम्भव और अभाव अनुमान से भिन्न नहीं है, अतः उक्त निषेध नहीं बन सकता ' । इसका यह अभिप्राय है कि प्रमाण चार ही है, इस बात का खण्डन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस सूत्र में यह दिखाया गया है कि पहिले बताये गये चार प्रमाणों में ही इनका अन्तर्भाव हो जाता है । यहाँ का भाष्य इस प्रकार है-- ' आप्त पुरुष का उपदेश शब्द कहलाता है । यह लक्षण ऐतिह्य से व्यावृत्त नहीं होता, किन्तु उसमें विद्यमान है । इसलिये ऐतिह्य के रूप में विद्यमान विशेषशब्द सामान्यशब्द से भिन्न नहीं है, किन्तु उसी में परिगृहीत होता है । क्योंकि विशेष सामान्य के अन्तर्गत होता है ' । अर्थात् आाप्त का उपदेश शब्द है, यही शब्द का सामान्य लक्षण है । वह ऐतिहा में भी लागू होता है, क्योंकि जिसका कहने वाला परिज्ञात नहीं है, ऐसे विशेष शब्द ही ऐतिह्य हैं । ये विशेष शब्द भी सामान्य शब्द के अन्तर्गत ही हैं । प्रत्यक्ष वस्तु द्वारा उससे सम्बद्ध अप्रत्यक्ष वस्तु का ज्ञान अनुमान कहलाता है । अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव में भी यही होता है, अतः इनका अनुमान में अन्तर्भाव इष्ट है । भाष्य में इनको अलग अलग समझाया गया है-- देवदत्त मोटा है, इस प्रकार के वाक्य के परिज्ञान के बाद बिना भोजन के मोटा नहीं हो सकता, अत: भोजन रूपी अनभिहित अर्थ का ज्ञान अर्थापत्ति में माना जाता है । यह अनुमान ही हैं । इसी तरह अविनाभाव संबन्ध से समुदाय और समुदाय का एक से दूसरे का ग्रहण संभव माना जाता है । यह भी अनुमान ही है | इसके रहते यह नहीं हो सकता, इस प्रकार जहाँ परस्पर विरोध प्रसिद्ध है, वहीं पर कार्य के अभाव को देखकर कारण की प्रतिबन्ध-कता का अनुमान ही होता है । " इस प्रकार यह प्रमाणों का परिगणन उचित है । अर्थात् प्रत्यक्ष अनुमान, उपसान और शब्द ये चार प्रमाण हैं, यही बात ठीक है । सूत्र का अर्थ इस प्रकार है ---- शब्द अन्तर न होने से ऐतिह्य का शब्द में अन्तर्भाव होता है, अनुमान से अर्थान्तर न होने से अर्थापत्ति, संभव और अभाव का अनुमान में अन्तर्भाव होता है । अत: चार ही प्रमाणों को स्वीकार किया जाना चाहिये । free अर्थ का होना अर्थान्तरभाव कहलाता है, इससे विपरीत अर्थ अनर्थान्तरभाव का है । इस प्रकार इस शब्द का अर्थ समानार्थकता है, अर्थात् उक्त प्रमाणों का निर्दिष्ट चार प्रमाणों में ही अन्तर्भाव हो जाता है, अतः इनको भित्र प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं

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वेदार्थपारिजातः सुत्रर्थापत्त्यभावयोः प्रमाणभावाभ्यनुज्ञाक्षेपपरिहारादिभिः प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षणमेव कृतम् । सर्वथाऽपि दयानन्दस्य न चतुष्ट्वमिति सूत्रावष्टम्भेन प्रमाणाष्टकस्य नैयायिकाभिमतत्ववर्णनं पौर्वापर्यानववारणसूत्रार्थाज्ञानमूलकमेव | यच्चात्रेय सूत्रे निर्दिष्टप्रवक्तृकं प्रवादपारम्पर्यमैतिह्यमिति भाष्यमुद्धृत्य ' अनेन प्रमाणेनापीतिहासादि-नामभिर्ब्राह्मणान्येव गृह्यन्ते, नान्ये ग्रन्था: ' ( पृ ० ९ ८ ) इति कथनम्, तत्तु सर्वथा गतत्रपस्यैव शोभते, तत्र ब्राह्मणाना-मितिहासत्वा वेदत्वप्रसङ्गाभावात् । नित्यत्वान्मन्त्राणामप्यनिर्दिष्टप्रवक्तृकत्वेन कुतो नावेदत्वम्, कुतश्च नेतिहासत्वम्? fe ब्राह्मणानां वेदव्याख्यानत्वम्? यदप्युक्तम् —'ब्राह्मणानि तु वेदव्याख्यानान्येव न वेदाख्यानि 2 इषे त्वोर्जे स्वेती ' ति ( श ० १/७/१/२ ) इत्यादि * प्रतीकानि धृत्वा ब्राह्मणेषु वेदानां व्याख्यानकरणात् ' ( पृ ० ९९ ) इति, तदपि तुच्छम्, भावानवबोधात् । तथाहि--त्वदुक्त रिदं तात्पर्यं यद् ब्राह्मणानि न वेदाः, वेदवाक्योद्धरणपूर्वकवेदव्याख्यानरूपत्वात् । एतच्चानुमानं व्याप्यत्वा-सिद्धिदोषदूषितं सत्प्रतिपक्षितं च स्मर्यमाणकर्तृकत्वस्य रागवत्पुरुषकर्तृकत्वस्य च तत्रोपाधित्वात् । ब्राह्मणानि वेदाः अपौरुषेयवाक्यत्वात्, सहस्रशीर्षेति वाक्यवत् - इति प्रत्यनुमानाच्च । न चैवं परस्परविरोधेन ब्राह्मणभागस्य वेदस्व-भपि न सिद्ध्यतीति वाच्यम्, प्रकृते ब्राह्मणग्रन्यानामवेदत्वसाधकानुमानस्य प्रत्यनुमानेन दूषयितुमिष्टत्वात् । सम्प्रदाया-विच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वादपौरुषेय स्ववेदत्वयोः प्रागेव सिद्धत्वात्, अप्रयोजकत्वाच्च । व्याख्यानरूपत्वं व्याख्येयत्वं है । इसके आगे न्यायसूत्र में ' अर्थापत्ति ' इत्यादि १० सूत्रों से अर्थापत्ति और अभाव को प्रमाण मानकर उसके विरुद्ध किये गये आक्षेपों का परिहार करते हुए प्रमाण चार ही हैं, इस बात की परीक्षा की गई है । इस तरह दयानन्द का ' न चतुष्टम् ' इत्यादि सूत्र के प्रमाण पर यह सिद्ध करना कि नैयायिकों को आठ प्रमाण अभिप्रेत हैं, सर्वथा पौर्वापर्य का ठीक तरह से निरीक्षण न करने के कारण है । वास्तव में उन्होंने सूत्र के अर्थ को ही ठीक से नहीं समझा । इसीसूत्र के ' जिसका प्रवता निर्दिष्ट नहीं है, ऐसी प्रवाद परम्परा को ऐतिह्य कहते हैं इस भाष्यांश को लेकर यह कहना कि ' इस प्रमाण से भी इतिहास आदि नामों से ब्राह्मणों का ही ग्रहण होता है, दूसरे प्रन्थों का नहीं, उसी व्यक्ति का काम हो सकता है, जिसने कि लज्जा को तिलांजलि दे दी है, क्योंकि यहां पर ब्राह्मणों के इतिहास होने, वेदभाग न होने आदि का कोई प्रसंग नहीं हैं । मन्त्र free है, इनका प्रवक्ता भी कोई निर्दिष्ट नहीं है, तो क्यों मन्त्रभाग को भी वेद माना जाय, इनको भी ऐतिहा इतिहास क्यों न माना जाय । क्या ब्राह्मण ग्रन्थ वेद के व्याख्यान हैं? ' ब्राह्मण ग्रन्थ वेद के व्याख्यान हैं, वे स्वयं वेद नहीं हैं, क्योंकि इनमें ' इषे त्वोर्जे स्वा ' इत्यादि मन्त्रों के प्रतीकों का उद्धरण कर उन वेद मन्त्रों की व्याख्या की गई है ' यह उक्ति उचित नहीं है, क्योंकि बिना इस प्रसंग को समझे यह कह दिया गया है । आपकी उक्ति का न्यायदर्शन की भाषा में यह स्वरूप हो सकता है कि ब्राह्मण वेद नहीं है, क्योंकि यहाँ पर वेद वाक्यों को उद्धृत कर उनका व्याख्यान किया गया है । इस अनुमान में व्याप्यत्वासिद्धि मोर सत्प्रतिपक्ष ये दोष हैं । यहाँ पर स्मर्यमाणकर्तृक और Treeyaure ये दो उपाधियाँ हैं, अर्थात् वेद के समान ब्राह्मणों का भी कोई कर्ता नहीं सुना गया और न ऐसा ही सुना गया है कि किसी राग - द्वेष बुद्धि वाले पुरुष ने इनकी रचना की है, अतः इनके कर्ता की अवति न होने से ये अपीरुषेय वेद ही माने जायेंगे । फलतः आपके अनुमान के विपरीत इस अनुमान वाक्य की प्रवृत्ति होगी कि ब्राह्मण वेद हैं, क्योंकि ये अपौरुषेय वाक्य हैं, ' सहस्रशीर्षा ' आदि वाक्यों की तरह आप कहें कि दो परस्पर विरोधी अनुमानों की उपस्थिति में ब्राह्मण भाग की वेदता कैसे सिद्ध होगी, तो यह गलत है, क्योंकि ब्राह्मण ग्रन्थों की अवेदता को सिद्ध करने वाले अनुमान के परिहार के लिये ही दूसरा अनुमान उपस्थित किया गया है । बिना संप्रदाय की विच्छिनता के किसी कर्ता की स्मृति के न रहने से ब्राह्मणों को अपौरुषेयता और वेदता तो पहले से ही सिद्ध हैं | व्याख्यानरूपता और व्याख्येयरूपता पौरुषेयता तथा अपौरुषेयता के प्रयोजक नहीं है, अर्थात् जो व्याख्येय हैं, वे *

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 750 का मूल पृष्ठ
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७२० मेवार्थपारिजातः वा न पौरुषेयत्वापौरुषेयत्वप्रयोजकम्, गोतमदर्शनस्य व्याख्येयत्वेऽप्यवेदस्वदर्शनात् । मन्त्रेषु शब्दान्तरेणार्थकथना-त्मक व्याख्यानपरत्वेऽपि वेदत्वदर्शनाच्च । किन्त्वपौरुषेयवाक्यत्वमेव वेदत्वप्रयोजकम्, तच्च मन्त्रब्राह्मणयोरुयत्र सममेव । न च इषे वेति प्रतीकमादाय ब्राह्मणेषु व्याख्यानदर्शनात् स्फुटमेव ब्राह्मणानां मन्त्रानन्तरकालिकत्वमिति कुतो वेदत्वमनादित्वं च ब्राह्मणानां सम्भवतीति वाच्यम्, क्रमिकेषु संहितामन्त्रेष्वपि पूर्वोत्तर भावस्यावर्जनीयतया वेदत्व-व्यवस्थायां पूर्वोत्तरभावस्याकिञ्चित्करत्वात् । यच्चोक्तम् ' महाभाष्येऽपि केषां शब्दानां लौकिकानां वैदिकानां च । तत्र लौकिकास्तावद् गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इति । वैदिकाः खल्वपि ' शन्नो देवीरभिष्टये ', ' इषे त्वोर्जे त्वा ', ' अग्निमोले पुरोहितम् ' ' अग्न आयाहि वीतये ' इति, ब्राह्मणग्रस्थानामपि वेदसंज्ञाभीष्टा स्यात्तर्हि तेषामप्युदाहरणमदात् । अत एव महाभाष्य-कारेण मन्त्रभागस्यैव वेदसंज्ञां मत्वा प्रथममन्त्रप्रतीकानि वैदिकेषु शब्देषूदाहृतानि, किन्तु यानि गौरश्व इत्यादीनि लौकिकान्युदाहरणानि दत्तानि तानि ब्राह्मणग्रन्थेषु घटस्ते । कुतः, तेष्वीदृशशब्दव्यवहारदर्शनात् ' इति, तदप्यज्ञानविजृम्भि-तम् । महाभाष्ये स्थानान्तरेषु वेदशब्दैर्ब्राह्मणवाक्यानामुदाहरणदर्शनात् । ' स्थानिवदादेशो ऽनल्विधो ' ( पा ० सू ० १।१।५६ ) इत्यत्र महाभाष्ये ' वेदेऽपि सोमस्य स्थाने पूतिकातॄणाम्यभिषुणुयादित्युच्यते ' इति ब्राह्मणवचनमेव वेदशब्देन निर्दिष्टम् | ' एक: पूर्वपरयोः ( पा ० सू ० १।३।८४ ) इत्यत्र महाभाष्ये ' वेदे खल्वपि वसन्ते ब्राह्मणोऽग्निष्टोमादिभिः ऋतुभिर्यजेत ' इति ब्राह्मणवचनं वेदत्वेन निर्दिष्टम् । पस्पशाह्निकभाष्येऽपि वेदे खल्वपि पयोव्रतो ब्राह्मणो यवागूव्रतो राजभ्यः ' इत्यादिकं ब्राह्मणवचनमेवोद्धृतम् । प्रकृते तु मन्त्रब्राह्मणारण्यकोपनिषदन्तमेवैकं वेदं मत्वा प्रारम्भिकमन्त्र-प्रतीकोदाहरणेन ब्राह्मणादिशब्दा अपि उदाहृता एवेति न पृथग्ब्राह्मणानुदाहरणेन न ब्राह्मणानामवेदत्वसिद्धिः । अन्यथा अपौरुषेय हैं और जो व्याख्यात है वह पौरुषेय हैं, यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि गौतम के न्यायदर्शन के सूत्र भी व्याख्येय हैं, किन्तु उनको कोई वेद नहीं कहता । दूसरी ओर मन्त्रों में ही अनेक स्थलों में पर्यायवाची दूसरे शब्दों के द्वारा व्याख्यानात्मक पद्धति से अर्थ स्पष्ट किया गया है, किन्तु उनकी कोई पौरुषेयता इससे नहीं बन जाती । अपौरुषेय वाक्य eat derer का प्रयोजक है और यह मन्त्र और ब्राह्मण दोनों में समान है | ' इपे त्वा ' इत्यादि प्रतीक देकर मन्त्रों की व्याख्या देखने से ब्राह्मणों की मन्त्रभाग की अपेक्षा कालिक स्थिति परवर्ती माननी पड़ेगी, फलतः ब्राह्मणों की वेदता और नादिता कैसे संभव होगी? इसका उत्तर यह है कि क्रमिक संहिता मन्त्रों में भी पूर्वोत्तर भाव अवश्यंभावी है, अवर्जनीय है । वस्तुतः वेदत्व को व्यवस्थापित करने में यह पूर्वोत्तर भाव कुछ भी नहीं कर सकता । यह कहा जाता है कि - ' महाभाष्य में भी किन शब्दों का? लौकिक और वैदिक शब्दों का । गो, अश्व, पुरुष, हस्ती, शकुनि, मृग, ब्राह्मण ये सब लौकिक शब्द हैं । श at aarcf भष्टये, इषे त्वोर्जे त्वा, अग्निमीले पुरोहितम्, अग्न आयाहि वीतये ये सब वैदिक शब्द है । यदि ब्राह्मण ग्रन्थों की भी वेदता इष्ट होती तो उनका भी उदाहरण दिया जाता । इससे स्पष्ट है कि महाभाष्यकार भाग को ही वेद मान कर वैदिक शब्दों के उदाहरण में उनके प्रथम मन्त्रों के प्रतीक दिये हैं । इसके विपरीत लौकिक उदाहरण में दिये गये गो, अव आदि शब्द ब्राह्मण वाक्यों के साथ मेल खाते हैं, क्योंकि ब्राह्मणों में भी ऐसे ही शब्द प्रयुक्त है ', यह उक्ति वक्ता के अज्ञान को ही प्रदर्शित करती हैं, क्योंकि महाभाष्य में ही दूसरे स्थलों में उद्धृत वेद वाक्यों की उपलब्धि ब्राह्मण ग्रन्थों में होती है । ' स्थानिवत् ' सूत्र के भाष्य में ' वेद में भी सोम के स्थान में पूतिका तृण का रस निकाले ' यहाँ पर वेद के नाम से ब्राह्मण वाक्य दिया गया है । ' एकः पूर्वपरयोः ' सूत्र के भाष्य में ' वेद में भी कहा गया है कि वसन्त ऋतु में ब्राह्मण अग्निष्टोम आदि यज्ञ करे ' इस प्रकार ब्राह्मण वाक्य ही वेद के रूप में निर्दिष्ट है । पशाह्निक भाष्य में ' ब्राह्मण पयोव्रती और क्षत्रिय यवागूव्रती हो ' इस ब्राह्मण वाक्य को ही वेद के नाम से स्मरण किया है । प्रकृत स्थल में मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् इन सबको farer एक वेद माना हैं । फलतः प्रारम्भ के मन्त्र का प्रतीक देने से ब्राह्मणों का भी उसी में समावेश हो जाने से अलग से ब्राह्मणों के उदाहरण नहीं दिये गये | इससे ब्राह्मण भाग की अवेदता नहीं सिद्ध होगी । यदि हम ऐसा मानने लगे तब वो दूसरे