वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 791–800

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 791–800

पृष्ठ 791

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वार्थपारिजातः ७६१ ( वेद ) उदाहरणे कठा:, मौदा:, पैप्पलादाः, वाजसनेयिन उक्ताः । तेन शाखान्तराणां वेदत्वं छन्दस्त्वमनिच्छद्भिरपि सामाजिकैरभ्युपेतव्यमेव । सूत्रकृत्पाणिनिमहाभाष्यकृत्यतञ्जलि निघण्टु निरुक्तकृद्भिश्च ये वेदिकाः शब्दाः प्रदर्शिता -स्तेषामुपलम्भो बेदे परमावश्यकः । न चेतेषां संहिताचतुष्टय उपलम्भस्तदा यत्रोपलम्भस्तासामवश्यमभ्यसंहितानामपि वेदत्वमङ्गीकार्यम् । महाभाष्ये पस्पशाह्निके ' ये चाप्येते भवतोऽप्रयुक्ता अभिमताः शब्दास्तेषामपि प्रयोगो दृश्यते । क्व? वेदे ' इत्युक्त्वा यद्वा ' रेवत्यामूष ' इति वेदवाक्यमुद्धृतम् । तच्च नेदानीन्तनेषूपलब्धेषु वेदेषुपलभ्यते । ' जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिॠणवान् जायते ' एवमृणसंयोगं वेदो दर्शयति । वचनं चेदं वौधायनधर्मसूत्रे ( २ / ९ / १६ / ७ ), न्यायदर्शन-भाष्ये ( ४ | ११५ ९ -६० ) वेदनाम्नोद्धृतम् । न्यायदर्शनभाष्ये -- ' जायमानो ह वै ऋणवान् ' इति पाठः, तैत्तिरीय-संहितायां च ' जायमानो वे ऋणवा ' इति पाठः । परमयं मन्त्रः कृष्णयजुः संहितायाम् ( ६३३ | १० | ५ ) उपलभ्यते । तस्मात् स्पष्टमेव तस्याः संहिताया वेदत्वं सिद्धयति । यास्को निघण्टुग्रन्थं वैदिकशब्दसंग्रहमुक्तवान् । ' छन्दोभ्यः समाहृत्य समाहृत्य समाम्नाताः ( नि ० ११११४ ) | सामाजिकाश्चैतदभ्युपगच्छन्ति । न च निघण्टुशब्दाः सामाजिकाभिमतवेदसीनावरुद्धाः, किन्तु सर्वास्वेव शाखासु ब्राह्मणेष्वारण्यकेषूपनिषत्सु तेषामुपलम्भो भवति । यथा ' काश्वनं जातरूपम् ' ( ० १/२ ) हिरण्यनामसु पठितम् । न चैष चतसृषु सामाजिकाभिमतसंहिता सूपलभ्यते । ' वियत् आकाराम् ' अन्तरिक्षनामसु पठितम् । तदपि तासु नोपलभ्यते । ' आष्ठा ' इति दिशां नामसु ' शोत्री ' ( नि ० १।७ ) रात्रिनामसु वलिशानो बलाहकः ( नि ० १1१० ) मेघनाम, ' कुरा ' ( नि ० १1११ ) वाङ्नामसु सर्णीकं स्वृतीकम् ( नि ० १।१२ ) इति जलनामसु पठितम् । नैते शब्दा अपि सामाजिकानां वेद उपलभ्यन्ते । एवमेतादृशा वहवः शब्दाः । दिङ्मात्रमिह प्रदर्शितम् । कि शाखान्तर भी वेद हैं । सूत्रकार पाणिनि, महाभाष्यकार पतंजलि और निघण्टुकार, निरुक्तकार आदि ने जिन वैदिक शब्दों का पाठ किया है, उनकी उपलब्धि वेद में हो, यह परम आवश्यक है । यदि ये शब्द केवल चार संहिताओं में नहीं मिलते, तब जहाँ ये मिलते हैं, उन सभी संहिताओं को भी वेद के अन्तर्गत मानना जरूरी है । महाभाष्य पस्पशाह्निक में ' जिन शब्दों को आप अप्रयुक्त मानते हैं, उनका भी प्रयोग मिलता है । कहाँ? वेद में यह कह कर ' रेवत्यामूष: ' यह वेदवाक्य उद्धृत किया है । यह वाक्य आज कल उपलब्ध हो रहे वैदिक ग्रन्थों में उपलब्ध नहीं है । ' ब्राह्मण उत्पन्न होते ही तीन तरह से ऋणी हो जाता है ' इस वेद में ब्राह्मण का ऋण संबन्ध बताया गया है । यह वाक्य बौधायन धर्मसूत्र और न्यायदर्शन भाष्य में वेद के नाम से प्रदर्शित है । न्यायभाष्य में ' ऋणवान् ' और बोधायन में ' ऋणवा ' पाठ हैं । बौधायन का पाठ तैत्तिरीय संहिता में मिलता है, जो कि कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध है । इससे यह स्पष्ट है कि यह संहिता भी वेदान्तर्गत है । यास्क निघण्टु में वैदिक शब्दों का संग्रह मानते हैं । उनका कहना है कि ' इनका संग्रह वेदों से चुन चुन कर किया गया. हैं । आर्यसमाजी भी इस बात को मानते हैं । निघण्टु के ये शब्द केवल समाजियों को बांधी गई वेद की सीमा तक ही सीमित नहीं हैं, किन्तु सभी शाखाओं में, ब्राह्मणों में, आरण्यक और उपनिषदों में वे मिलते हैं । जैसे कि कांचन, जातरूप सुवर्ण के नामों में पठित है । यह शब्द समाजियों की चार संहिताओं में उपलब्ध नहीं है । वियत्, आकाश अन्तरिक्ष के नामों में पठित है । यह शब्द भी उनमें नहीं है । इसी तरह दिशाओं के लिये ' आष्ठा ', रात्रि के नामों में ' शोची ', मेघ के नाम के लिये बलिशान और बलाहक, वाणी के लिये ' बेकुरा ', और जल के लिये ' सर्णीक ' तथा स्थूतीक ' शब्द पठित हैं । ये शब्द भी सामाजिकों के अभिप्रेत वेद ग्रन्थों में नहीं मिलते | इसी तरह के अन्य अनेक शब्द हैं । यहाँ कुछ उदाहरण दिये गये हैं । १६

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७६२ दार्थपारिजातः एतावता पातञ्जलमहाभाष्योद्धृतवैदिकमन्त्राणां यदि चतसृष्वेव संहिता सूपलम्भः स्यात्, तदा ता एव वेदत्वेनाङ्गीकारार्हाः । यदि त्वयास्वपि शाखासु महाभाष्योक्तानि वाक्यान्युपलभ्येरन्, तदा तु महाभाष्योक्ता बहुधा ' अग्न भेदभिन्नाः शाखा वेदा मन्तव्याः | ' वैदिकाः खल्वपि ' शं नो देवीरभिष्टये ', ' इषे त्वोर्जे त्वा ', ' अग्निमीळे पुरोहितम् ', आहि वीतये ' इति वेदचतुष्टयस्य प्रथममन्त्रप्रतीकान्युद्धृतानि । समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्त इति पस्पशाह्निकस्थमहाभाष्यवचनानुरोधात् सर्वासु शाखासु प्रवृत्तो वेदशब्दस्तदवयवेषु स्वाभिमतचतसृषु संहितास्वपि प्रयोक्तुं शक्यत एव । ' देवेभिः ', ' ब्राह्मणासः ', ' सभेयः ', ' त्मना ' इत्यादिलौकिकविलक्षणवै दिकशब्दैः पूर्ववद्वेदसंहितामन्त्रोद्धरणैर्वा वैदिकशब्दप्रदर्शनं सम्भवति । महाभाष्यकारस्तु द्वितीय: पक्षोऽवलम्बित: । ' शन्नो ' इत्यादिलोकवेदसाधारणशब्दः प्रदर्शनेन लौकिकवैदिकशब्दभेदग्रहणासम्भवात् । महाभाष्यकारेण यदि लोकविरुद्धपदघटितकतिचिन्मन्त्रोद्धरणं कृतं स्यात्तदापीष्टसिद्धिः स्यादेव । परं प्रस्तुतवेदसंहितामन्त्रेषु लोकविलक्षणमेकमपि पदं नास्ति । महाभाष्यकारीय-मन्त्रोद्धरणक्रमनिनिमित्तो न वक्तुं शक्यते । अतश्चतसृभ्यः संहिताभ्य एकैकः प्रथममन्त्र उघृतः । अन्यर्थकस्य द्वयोर्वा मन्त्रयोरुद्धरणं स्यात्, न चतुर्णां मन्त्राणामुद्धरणं सार्थकं स्यात् । ननु ऋगादिक्रमेण कथं न मन्त्रोद्धरणमिति चेश, नियामकाभावेनैच्छिकप्रयोगे बाधाभात् । अत एव क्वचिद् वाजसनेयिसंहितायामृचा साम्नां यजुषां छन्दसां क्रमः क्वचिद् अथर्वसंहितायामृचां यजुषां साम्नामथर्वाङ्गिरसां क्रमो | तद्रीत्याऽथर्वमन्त्रस्य ' शन्नो देवीरभिष्टय ' इत्यस्य प्राथम्यमसङ्गतमेव स्यात् । इच्छाया अपीदं कारणं सम्भाव्यते यत् ११३१ संहितामन्त्राणामुद्धरणासम्भवात् स्वसम्प्रदायानुरोधेन गुरुपारम्पर्येण प्राप्तानां वा चतुर्वेदगत-चतुर्णामादिममन्त्राणामुद्धरणं सम्भवति । तत्रापि स्वकुलशाखानुरोधेनाथर्ववेदस्य प्राथम्यं सम्भवति । तेनाथर्ववेदित्वात् प्रथममथर्व संहितामन्त्रोद्धरणमपि सङ्गच्छते । इसी तरह पातंज: महाभाष्य में उद्धृत वैदिक मन्त्र यदि चार संहिताओं में ही मिल जाय, तब तो उनको ही वेद मानना ठीक है । किन्तु यदि अन्य शाखाओं में भी इनकी उपलब्धि हो, तब तो महाभाष्य में प्रदर्शित अनेक शाखाओं त्वा में, विभक्त अग्निमीळे पूरे वैदिक वाङ्मय को, उसकी सभी शाखाओं को वेद मानना पड़ेगा । महाभाष्य में कहा है-- शं नो देवीरभिष्टये, इषे स्वोर्जे पुरोहितम्, अग्न आयाहि वीतये - ये सब वैदिक शब्द हैं । यहां पर चार वेदों के प्रथम मन्त्रों का प्रतीक दिया गया है । ' समुदाय के लिये कहा गया " शब्द उसके अवयव के लिये भी प्रयुक्त होता है ' पस्पशाह्निक महाभाष्य की इस उक्ति के अनुसार वेद शब्द को प्रवृत्ति सभी शाखाओं के लिये है, किन्तु इनकी अवयवभूत स्वाभिमत चार संहिताओं के लिये भी इसका प्रयोग हो ही सकता है । देवेभिः, ब्राह्मणासः, सभेयः, रमना इत्यादि लोकविलक्षण वैदिक शब्दों से अथवा पूर्ववत् वेदसंहिताओं के मन्त्रों के उद्धरण से वैदिक शब्द दिखाये जा सकते है । इनमें महाभाष्यकार ने दूसरा पक्ष स्वीकार किया है । ' शन्नो ' यह पदों से शब्द घटित लोक किसी - वेद साधारण है, इससे लोकिक और वैदिक शब्दों का भेद नहीं जाना जा सकता । महाभाष्यकार ने यदि लोकविरुद्ध मन्त्र का उल्लेख किया होता, तब भी इष्टसिद्धि होती, लेकिन यहाँ पर उद्धृत वेदसंहिता के मन्त्रों में ऐसा एक भी पद नहीं है । महाभाष्यकार का मन्त्रों को उद्धृत करने का क्रम बिना प्रयोजन का हो नहीं सकता । अतः मानना पड़ेगा कि यहाँ पर चारों संहिताओं उद्धरण से एक एक मन्त्रउद्धृत किया गया है । अन्यथा एक अथवा दो मन्त्रों के उद्धरण से भी काम चल सकता था, चार मन्त्रों के की कोई आवश्यकता नहीं थी । यहाँ पर ऋगादि के क्रम से मन्त्रों का उद्धरण इस लिये नहीं दिया गया कि इस प्रकार के ऐच्छिक प्रयोगों के विरुद्ध कोई नियामक वाक्य उपलब्ध नहीं है । इसी लिये वाजसनेयिसंहिता में कहीं ऋक्, साम, यजु: यह क्रम है और कहीं अथर्व संहिता में पद्धति से अथर्व मन्त्र ' शतो देवी ' का प्रथम प्रयोग असंगत हो जायगा । इच्छा के हो ऋक्, यजुः साम, अथर्व यह क्रम है । इस नियामक होने से यहाँ पर ११३१ संहिताओं के आदि वाक्यों का उद्धरण असंभव है, ऐसा मानकर अपने संप्रदाय और गुरु - परम्परा

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७६३ वेदनामभिः स्वातन्त्र्येण चत्वारो वेदाः क्वापि नोपलभ्यन्ते, किन्तु सर्वा अपि शाखा मिलित्वा वेदपद-व्यपदेश्या भवन्ति । समुदायैकदेशत्वाद् एकैकशाखास्वपि वेदपदप्रयोगो भवति । तेन स्वकुलशाखात्वादेव पिप्पलाद-शाखायाः शन्नो देवोरित्युपन्यासो युक्तः । अन्तिमास्तु वयो मन्त्रा यजुर्वेद ( बाजसनेयिसंहिता - तैत्तिरीय संहिता ) -ऋग्वेद ( शाकलीसंहिता ) - सामवेद ( कौथुमी संहिता ) संहितानां सन्तीति निर्विवादमेव । ear अन्तिमा मन्त्राः संहितात्रयस्य प्रथममन्त्रास्तदा तद्वदेव ' शन्नो देवी ' रित्यथर्वमन्त्रोऽपि प्राथमिक एव भवितुमर्हः, वैयाकरणैः साहचर्यनियमस्य प्राधान्याभ्युपगमात् । शौनकी संहितायां नायं मन्त्रः प्रथमः, पिप्पलादसंहिताया-मेवास्य प्राथम्येन निर्देशात् । महाभाष्ये यत्र यत्र अथर्वसंहितानां नामनिर्देशस्तत्र तत्र पिप्पलादसंहिताया एव प्राधान्यम् । तस्मादथर्ववेदेऽपि पिप्पलादशाखीयत्वादेव महाभाष्यकारस्य तदुपपत्तिः । तृतीयं प्रतीकं शाकली संहितास्थः प्रथमो मन्त्रः, पाठस्य ऋग्वेदादन्यत्राप्रयोगात् । मन्त्रोऽयं सामवेदेऽपि पूर्वाचके आरण्यकपर्वणि ( ६ | ३ | ४ ) उप-लभ्यते । तथापि तत्र ' अग्निमीडे ' इत्येव पाठ: । ' अग्निमीळे ' इत्यंशस्यैवोद्धरणे ऋक्संहितायाम् ( ५११४१५ ) तथा ( १०/२०१२ ) इत्यत्रत्योऽपि मन्त्रो ग्रहीतुं शक्योऽतः प्राथम्यबोधनाय पुरोहितमित्यप्यंशी निवेशितः, तेन ' अग्नि-मीळेन्यं कविम् ', ' अग्निमीळे भुजां यविष्ठं ' इति पूर्वनिर्दिष्टयोर्व्यावृत्त्या प्रथमस्यैव बोधनम् । ' इषे त्वा ' इत्यपि यजुःसंहितायाः प्रथममन्त्रप्रतीकमेव । तत्रापि कस्याः संहितायाः प्राथमिकोऽयं मन्त्र इति जिज्ञायां वाधकाभावात् शुक्लकृष्णयजुषोरुभयोरेव ग्रहणं युक्तम्, ' एकशतमध्वर्यु शाखा: ' इति तद्वचनानुरोधात् । यदि कृष्णयजुस्तैत्तिरीयसंहिताया ग्रहणं नेष्टं स्यात्तदा तद्व्यावृत्त्यै ' इषे स्वोर्जे त्वा वायब: स्थ देवो वः ' इत्येवं निर्दि-के अनुरोध से चतुर्वेद गत चार मन्त्रों को उद्धृत किया गया और इनमें भी अपने कुल की शाखा होने से अथर्ववेद को प्राथमिकता दी गई । अथर्ववेद को पिप्पलाद शाखा के मन्त्र का उद्धरण पहले देने से यही प्रतीत होता है कि महाभाष्यकार इस शाखा के अनुयायी थे | वेद के नाम से स्वतन्त्र रूप से वेद की चार पुस्तकों का उल्लेख कहीं उपलब्ध नहीं होता, किन्तु सभी शाखाएँ मिलकर वेद कहलाती हैं । समुदाय का एक अंश होने से प्रत्येक शाखा के लिये वेद शब्द प्रयुक्त होता है । इस लिये अपने कुल को शाखा होने से पिप्पलाद शाखा के मन्त्र का प्रथम उपन्यास युक्त हैं । अन्तिम तीन मन्त्र यजुर्वेद की वाजसनेयी और तैत्तिरीयसंहिता, ऋग्वेद की शाकली संहिता और सामवेद की कौथुमी संहिता के प्रथम मन्त्र हैं, इसमें कोई विवाद नहीं है । जब अन्तिम तीन मन्त्र तीन संहिताओं के प्रथम मन्त्र है, तो उसी तरह प्रथम मन्त्र भी अथर्ववेद का आद्य मन्त्र होना चाहिये । वैयाकरणों ने साहचर्य नियम को ान माना है । शौनकी संहिता का यह मय भन्त्र नहीं है, पिप्पलाद शाखा के ही प्रारम्भ में यह मिलता है । महाभाष्य में जहाँ कहीं भी अथर्वसंहिता का उल्लेख है, सभी जगह पिप्पलाद शाखा की प्रधानता है । यह तभी संगत हो सकता है, जब कि महाभाष्यकार को पिप्पलाद यात्रा का अथर्ववेदी माना जाय । तृतीय प्रतीक शाकलीसंहिता का पहला मन्त्र है, क्योंकि ' ळ ' का पाठ ऋग्वेद के सिवाय अन्यत्र उपलब्ध नहीं है । यह मन्त्र सामवेद पूर्वाचिक के आरण्य पर्व में भी उपलब्ध है, किन्तु वहाँ पर ' अग्निमीडे ' यह पाठ है । ' अग्निमीळे ' इतना ही उद्धरण देने पर ऋक्संहिता के दो अन्य मन्त्रों का ग्रहण किया जा सकता था, इसलिये प्रथम मन्त्र का ही बोधन कराने के लिये ' पुरोहितम् ' यह अंश भी जोड़ा गया । इससे उक्त दो मन्त्रों की निवृत्ति होकर प्रथम मन्त्र की ही अवगति होती है । ' इषे त्वा ' यह भी यजुः संहिता का प्रथम मन्त्र है । यहाँ पर भी किस संहिता का यह प्रथम मन्त्र है? इस बात की जिज्ञासा होने पर किसी बाधक प्रमाण के न रहने से शुक्ल और कृष्ण दोनों ही संहिताओं का ग्रहण हो सकता है । महाभाष्यकार के कथनानुसार यजुर्वेद की १०१ शाखाए हैं । यदि कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा महाभाष्यकार को अभिप्रेत न होती तो उसकी व्यावृत्ति के लिये वे ' इषे त्वोर्जे स्वा वायवः स्थ देवो व: ' इस प्रकार मन्त्र का पाठ करते । यद्यपि ' इषे त्वा सुभूताय ' यह मन्त्र मैत्रायणी

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७६४ वेदार्थपारिजात: शेत् । यदि वा शुक्लयजुर्व्यावृत्तये ' उपायवः स्थ ' इति निर्दिशेत् । यद्यपि ' इषे त्वा सुभूताय ' इति मैत्रायणीसंहिताया मन्त्रोऽप्यादिस्तथापि कृष्णशुक्लयजुषोरेकं कसंहिताया ग्रहणेन सर्वासां गतार्थत्वान्न पृथगुद्धरणं कृतम् | ' अग्न आयाहि वीतये ' इति चतुर्थप्रतीकमपि सामवेदीयप्रथममन्त्रस्यैव । ' अग्न आ याहि ' इत्येतावत एवोद्धरणे ( अथर्ववेदशौनक २० | १०३।३ ) शाखाया ग्रहणं स्यात्, तन्मा भूदिति ' वीतये ' इत्यप्युपात्तम् । अयमपि मन्त्रः कौथुमीशाखाया आदिमः । ' शन्नो देवी: ' इति यद्यथर्ववेदस्य प्रथममन्त्रप्रतीकं न विवक्षितं स्यात्, तदा तु शन्नो देवीरिति मन्त्रोद्धरणेनैव चतुर्वेदमन्त्रप्रतीकान्युद्धृतानि स्युरित्यन्य मन्त्रप्रतीकोद्धरणं व्यर्थमेव स्यात् । कुतः? अस्य मन्त्रस्य चतुर्ष्वपि वेदेषु सत्त्वात् । ' तथाहि-- ऋक्संहितायाम् ( १०१ ९ / ४ ), शुक्लयजुर्वाजसनेयिसंहितायाम् ( ३६११२ ), मैत्रायणीसंहितायाम् ( ४ | १० | ४ ) काठकसंहितायाम् ( ३६।१२ ), कौथुमी संहिताया माग्नेयपर्वणि ( १३३ | १३ ), शौनकसंहितायाम् ( १।६।१ ) च विद्यमानोऽयं मन्त्रः । तस्माच्चतुर्णा वेदानां प्रथममन्त्रप्रतीकोद्धरणमेव तदभीष्टं ज्ञातव्यम् । शौनकीयाथसंहितायास्तु प्रथममन्त्रप्रतीकम् ' ये त्रिषप्ता ' इति । ' शन्नो ' मन्त्रस्तु शौनक्या अथर्व संहितायाः षष्ठसूक्तस्यादिमो मन्त्रः । महाभाष्यकारस्तु पिप्पलादसंहितायाः प्रथममन्त्रप्रतीकोद्धरणेन सर्वासामप्यथर्व संहिताना-मुद्धरणं मनुते स्म । स्वशाखात्वाल्लोके प्रतिष्ठितत्वाच्च पिप्पलादशाखायाः प्रथममन्त्रप्रतीकमुद्धृतवान् महाभाष्य-कारः । पपशाह्निके s पि ' ओ ३ म् इत्युक्त्वा वृत्तान्तशः शमादीन् शब्दान् पठन्ति ' अत्रापि शमित्येवादी येषां तान्, अर्थात् शन्नो देवीरिति मन्त्रमेव सूचयति । ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा । ' ( म ० २२७४ ), ' न मामनीरयित्वा ब्राह्मणा ब्रह्म देयुः यदि बदेयुरब्रह्म तत्स्यादिति ' ( अथर्ववेदे गोपथब्राह्मणे १।१।२३ ) | मां प्रणवं तस्माद् ॐ शन्नो देवीरिति पिप्पलादशाखीयप्रथम मन्त्रप्रतीकमेव मन्तव्यम् । किञ्च, ' इषे त्वेकमधीष्व ', ' शत्रो देवीयकमधीष्व ( पा ० सू ० १1३1२ ) अनाथर्वसंहिताया आदिममन्त्रप्रतीकमुद्दवार महाभाष्यकारः । अत एव ' चत्वारो वेदा ' ** *** " एक-संहिता के आरम्भ में है, तो भी शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद की एक एक संहिता के ग्रहण से ही सबकी गतार्थता हो जायगी, इस आशय से यहाँ पर उसका पृथक उद्धरण नहीं दिया गया । ' अग्स आयाहि वीतये ' यह चौथा प्रतीक भी सामवेद के प्रथम मन्त्र का है । ' आयाहि ' इतना मात्र कहने से अथर्ववेद शौनक शाखा के ( २०११०३१३ ) संख्या के मन्त्र का ग्रहण हो सकता था, उसकी निवृत्ति के लिये ' नीतये ' यह जोड़ा गया । यह मन्त्र कौथुमी शाखा के आरम्भ का है । ' शन्नो देवी ' यह उद्धरण अथर्ववेद के प्रथम मन्त्र के रूप में अभिप्रेत न होता, तो केवल इस मन्त्र के उद्धरण से ही चारों वेदों के मन्त्रों के प्रतीक स्वरूप के उपलब्ध हो जाने से अन्य मन्त्रों का प्रतीक उद्धरण अनावश्यक हो जाता, क्योंकि यह सन्त्र चारों वेदों में उपलब्ध है । ऋक्संहिता में ( १०१ ९ १४ ), शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयिसंहिता में ( ३६।१२ ), मैत्रायणी संहिता ( ४११०१४ ), काठकसंहिता ( ३६/१२ ), कौथुमी संहिता आग्नेय पर्व ( १३१३ ) और शौनकसंहिता ( ११६।१ ) में यह मन्त्र विद्यमान है । इसलिये यह मानना पड़ेगा कि यहाँ पर महाभाष्यकार को चारों वेदों के प्रथम मन्त्रों के प्रतीक उद्धृत करना अभीष्ट था । शोक संता का प्रथम मन्त्र ' ये त्रिषता ' है । ' शत्रो ' मन्त्र इस संहिता के छठे सुक्त का पहला मन्त्र है । महाभाष्यकार पिप्पलाद शाखा के प्रथम मन्त्र के प्रतीक को उद्धृत कर यह मानते हैं कि इस प्रकार सभी अथर्वसंहिताओं का यह प्रतिनिधित्व करता है | पिप्पलाद शाखा लोक में प्रतिष्ठित थी और उनके कुल की संहिता थी, इसीलिये महाभाष्यकार ने सबसे पहले इसी के प्रथम का प्रतीक दिया । पस्पशाह्निक में भी ' ॐ ' का उच्चारण कर वृत्तान्तशः ' शम् ' इत्यादि शब्दों को पढ़ते हैं " यहाँ पर भी ' शम् ' शब्द जिसके आदि में हैं, ऐसे ' शन्नो देवी ' मन्त्र को ही सूचित किया है । ' वेद के आदि और अन्त में सदा प्रणव का उच्चारण करें, ' मुझे ( प्रणव को ) बिना बोले ब्राह्मणगण वेद का उच्चारण न करें, यदि बोलेंगे तो वह वेद न रह जायगा ' इन सब प्रमाणों से ' ॐ शनो देवी " यह मन्त्र पिप्पलाद शाखा के प्रथम मन्त्र का प्रतीक माना जाना चाहिये | इसी तरह १/२/२ सूत्र का भाष्य करते हुए पतंजलि ने यजुर्वेद के साथ अथर्ववेद के पहले मन्त्र का प्रतीक उद्धृत किया है । इसीलिये ' चार वेद हैं । ' ' ' यजुर्वेद की

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@ # शतमध्वर्युशाखा " नवघाऽथर्वणो वेद: ' इत्याद्युक्त्वा महाभाष्यकार: स्पष्टमेव ११३१ शाखात्मकानेव चतुरो वेदानाह । अत एव शाखाभ्योऽतिरिक्तान् वेदान् नाभिमनुते महाभाष्यकारः । किञ्च यदि शन्नो देवीरित्यनेन शौनकसंहितास्थमन्त्रप्रतीकं विवक्षितं स्यात्, तदा ' शन्नो देवीरभिष्टय आप ' इत्येवं लिखेत्, किन्तु ' शन्नो देवीरभिष्टये ' इति एकारान्तं लिखितम् । तत्र ' ए ' इति लुप्तमात्रां कथं लिखेत्? आप इत्यलेखेनात्र पिप्पलादशाखीय ' शत्रो देवीरभिष्टये शन्नो भवन्तु पीतये ' इति मन्त्रस्योल्लेखः । अत्राजभावादेव एकारस्य लोपो s प्राप्तः । तत एव ' अभिष्टये ' इति लिखितम्, न ' अभिष्टय ' इति । तेन पैप्पलादशाखीय प्रथममन्त्र एव महाभाष्यकारेणोद्धृतः । मात्राविपयसेऽपि शौनकीयमन्त्र एवायमित्याग्रहस्तदा तु कतिचिन्मात्रा विपर्यासेऽपि शाखान्तः राणामपि वेदत्वसिद्धया वदनिष्टापत्तिः । यद्युच्येत वेदमन्त्राणां विद्यमानत्वे परिवर्तितशाखामन्त्राणां वैयर्थ्यमेवेति चेत्, तदा यजुःसंहितास्थानां चतुःशतसंख्यानां मन्त्राणामृक्संहितायां किञ्चित्परिवर्तनेन युक्तत्वाद् वैयर्थ्यं स्यात् । तथा सति पञ्चसप्तत्युत्तरैकोनविंशतिशतसंख्याकेभ्यो मन्त्रेभ्यः सप्ताशीत्युत्तरनवशतमन्त्राणां निष्कासनेनाष्टाशीत्युत्तर-नवतमन्त्रघटिता यजुर्वेदसंहिता मन्तव्या स्यात् । तथैव सामसंहितायाश्चतुर्विंशत्यधिकाष्टादशशत संख्याकमन्त्र-घटिताया विकृताविकृतानामृग्वेदीयानां मन्त्राणां निष्कासनेन पञ्चसप्ततिरेव मन्त्रा अवशिष्टा भविष्यन्ति । सप्तसप्तत्युत्तरनवपञ्चाशच्छतमन्त्रवत्या अथर्वसंहितायाः सकाशाद् ऋग्वेदीयमन्त्राणां निष्कासनेन सप्तशतसंख्याका एव मन्त्राः स्थास्यन्ति । यदि तु ते ते मन्त्रास्तासां तासां संहितानां यादृशा उपलभ्यन्ते तादृशास्तदीया एव, न च व्यर्थास्तदा शाखान्तरस्थिताश्चतुः शाखास्थमन्त्रतुल्या अपि तदीया एव नान्यशाखागता न वा व्यर्थाः । तच्छाखीयेषु यज्ञेषु ते तथैव पठ्यन्ते । तासु कुलपरम्परानुरोधेन ता गृह्यन्ते । शाकल्यादिचतुःशाखासंहितावदेव ता अपि वेदा एवेति न शाखान्तराणामवेदत्वम् । पिप्पलादकाठकादिशाखानामद्यत्वे विरलप्रचारत्वेऽपि महाभाष्यकारसमये ग्रामे ग्रामे काठकं कालापकं प्रोच्यते स्म । १०१ शाखाएँ हैं...... अथर्ववेद की नी ' इत्यादि कहकर महाभाष्यकार ने स्पष्ट ही वेद की ११३१ शाखाएँ बताई हैं । इसलिये महाभाष्यकार वेदों को इन शाखाओं से अतिरिक्त नहीं मानते । यदि ' शन्नो देवी: ' यह प्रतीक शौनक शाखा का विवक्षित होता, तो ' शन्नो देवीरभिष्टय आप: ' इस प्रकार दिया गया होता, किन्तु ऐसा न होकर ' शत्रो देवीरभिष्टये ' यह एकारान्त पाठ मिलता | ' आप ' इसका उल्लेख न होने से यहाँ पर पिप्पलाद शाखा के मन्त्र का प्रतीक इसको मानना चाहिये । यहाँ पर ' अभिष्टये ' पद के आगे ' अच् ' म होने से एकार के लोप का कोई प्रसंग नहीं है । इसी लिये ' अभिष्टये ' ऐसा लिखा गया है, ' अभिष्टय ' ऐसा नहीं । इन सब बातों का ast free निकलता है कि महाभाष्यकार ने पिप्पलाद शाखा के प्रथम सत्र का ही प्रतीक दिया है । आप यदि यह आग्रह करते हैं कि एक मात्रा में परिवर्तन रहने पर भी यह मन्त्र शौनक शाखा का ही माना जायना, तो फिर कुछ मात्राओं में विपर्यय होने पर भी इसी युक्ति से दूसरी शाखाओं को भी वेद मानने में क्या आपत्ति होगी? यदि आप कहें कि वेद मन्त्रों के रहते हुए उनमें कुछ परिवर्तन कर दूसरी शाखाओं में उनको रखना व्यर्थ है, तो फिर यजुः संहिता के जो ४०० मन्त्र ऋग्वेद में कुछ परिवर्तन के साथ मिलते हैं, उनकी व्यर्थता हो जायगी | ऐसा होने पर १ ९ ७५ मन्त्रों में से ९ ८७ मन्त्रों के निकाल देने पर ९ ८८ मन्त्रों की यजुर्वेद संहिता रह जायगी । इसी तरह साम संहिता के १८२४ मन्त्रों में से कुछ परिवर्तित अथवा बिना किसी परिवर्तन के उपलब्ध ऋग्वेद के मन्त्रों को निकाल दिया जाय तो यहाँ केवल ७५ मन्त्र ही बच जायेंगे । इसी तरह ५ ९ ७७ मन्त्रों वाली अथर्व संहिता में से ऋग्वेद में उपलब्ध मन्त्रों को हटा दिया जाय तो यहाँ पर केवल ७०० मन्त्र बच रहेंगे । यदि यह माना जाय कि उन उन संहिताओं के जो मन्त्र जिस रूप में मिलते हैं, उसी रूप में वे उसके अंग हैं और सार्थक है, तो इसी पद्धति से अन्य शाखाओं में विद्यमान उन मन्त्रों की भी सार्थकता माननी पड़ेगी, जो कि चार शाखाओं में विद्यमान मन्त्रों के तुल्य है । क्योंकि उन शाखाओं के अनुयायी उन्हीं से यज्ञ यागादि संपन्न करेंगे । विभिन्न शाखाओं के अनुयायियों की कुल परम्परा में उन्हीं का पाठ होता है । शाकल्य आदि चार शाखा संहिताओं के समान अन्य शाखाओं की संहिताओं को भी वेद के अन्तर्गत ही माना जायगा । पिप्पलाद,

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७६६ वेदार्थपारिजातः ' शन्नो देवी: ' इत्यथर्ववेदीयप्रथममन्त्रप्रतीकमिति स्वामिदयानन्देनाप्यम्युपगम्यते । तथाहि - ' वैदिकार खल्वपि ' शन्नो देवीरभिष्टये, इषे त्वा, अग्निमीले, अग्न आयाहि वीतये ' इति महाभाष्यकारेण मन्त्रभागस्यैव वेदसंज्ञां मा प्रथम मन्त्रप्रतीकानि वैदिकशब्देषूदाहृतानि । ' ( ऋ ० भा ० भू ० पृ ० ८६ ) । तथा च तद्रीत्यापि पिप्पलादशाखीय-प्रथममन्त्रप्रतीकोपादानमेव सिद्धयति । तथा च सिद्धमेव शाखान्तराणामपि वेदत्वम् । तेन विज्ञायते यत् स्वामिदयानन्देन सर्वासामेव शाखानां वेदत्वं मन्यते स्म । तत एव पूर्वोद्धृतनामिकाख्या तिकसामासिकादिग्रन्थेषु शाखान्तरमन्त्रा-छन्दस्त्वेनो ( वेदत्वेन ) द्धृताः । ते ग्रन्था न तदीया इत्युक्तिस्तु सामाजिकानां पलायनमेव । स्त्रैणतद्धितस्य ६५ पू ० ' छन्दोजाह्मणानि च तद्विषयाणि ' ( पा ० सू ० ४/२/६५ ) इति सूत्रे छन्दस उदाहरणे पैप्पलादा वाजसनेयिन इत्युक्तम् । छन्दोवेद निगमाम्नायश्रुतीनामैक्यमपि तेन बहुधाऽङ्गीकृतमेव । स्त्रेण तद्धितस्य ८० पृष्ठे ' चरणाद् धर्माम्नाययोः ' पैप्पलादकम् इत्युक्त्या तेन पिप्पलादसंहिताया आम्नायत्वमङ्गीकृतम् । एवमेव स्त्रैणतद्धितस्य ४३ ९ पृष्ठे वातिकेऽथर्वन् शब्दस्य चरणवाचित्वमङ्गीकृत्य आथर्वेणिकस्य धर्मं आम्नायो वा आथर्वण्य इत्युदाहरणं दत्तम् । निरुक्तस्य निपातप्रकरणेऽध्यायपदं वेदसंहितापरम् | ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' ( तै ० आ ० २ १५ ) इति स्वशाखीयं वेदं बोधयति । अत एवोक्तम्– ' यः स्वशाखोक्तमुत्सृज्य परशासोक्तमाचरेत् । अप्रमाणमृषिं कृत्वा सोऽन् तमसि मज्जति ॥ ' ( गृह्यसंग्रह २१ ९ ३ ) । यत्तु दयानन्देनोक्तम् --- ' एकशतव्याख्यानयुतो यजुर्वेदः, सहस्रव्याख्यानोपेतच सामवेदः, एकविंशति-व्याख्यानोपेत ऋग्वेदः, नवव्याख्यानोपेतोऽथर्ववेदः ' इति, तन्न, व्याख्यानातिरिक्तानां व्याख्येयग्रन्थानामनुपलम्भात् । काठक आदि शाखाओं का आज प्रचार भले ही कम हो गया हो, महाभाष्यकार पतंजलि के समय में काठक और कालापक संहिताओं का पाठ घर घर में होता था । ' शो देवी: ' यह अथर्ववेद के प्रथम मन्त्र का प्रतीक है, इसको स्वामी दयानन्द भी मानते हैं । ' शन्नो देवीरभिष्टये, इषे त्वा, अग्निमीळे, अन आयाहि वीतये ' ये वैदिक शब्द हैं इस प्रकार महाभाष्यकार ने मन्त्र भाग को ही वेद मानकर उनके प्रथम मन्त्र के प्रतीकों को वैदिक शब्दों के उदाहरण में दिया है ' ( पृ ० ८६ ) । इस प्रकार उनके कथनानुसार यह सिद्ध है कि यहाँ पर पिप्पलाद शाखा के प्रथम मन्त्र का प्रतीक गृहीत है । तब यह सिद्ध हो जाता है कि दूसरी शाखाएँ भी यैद हैं । फलतः यह मानना पड़ेगा कि स्वामी दयानन्द सभी शाखाओं को वेद मानते थे । यही कारण हैं कि नामिक, आख्यातिक, सामासिक प्रकरणों में, जिनका कि अभी पहले उल्लेख किया गया है, स्वामी दयानन्द ने दूसरी शाखाओं के मन्त्रों को भी उदाहरण के रूप में उद्धृत किया है । ये ग्रन्थ स्वामी ture के नहीं हैं, यह कहना समाजियों का पलायनवाद है । तति के स्त्रीप्रत्यय प्रकरण ( पृ ० ६५ ) में ' छन्दब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ' इस सूत्र के छान्दस उदाहरण में ' पैप्पलादाः, वाजसनेयिनः ' यहा कहा गया है । छन्द, वेद, आम्नाय और श्रुति की पर्यायता उन्होंने अनेक स्थलों पर मानी है | तद्वित के स्त्रीप्रत्यय प्रकरण ( पृ ० ८० ) ' चरणाद् धर्माम्नाययोः ' यहाँ पर ' पैप्पलादकम् ' यह उदाहरण दिया है, इससे यह सिद्ध है कि वे पिप्पलाद संहिता को आम्नाय अर्थात् वेद मानते हैं । इसी प्रकरण के पृ ० ४३ ९ में वार्तिक के उदाहरण में ' अथर्वन् ' शब्द को चरण-वाची मान कर यहा कहा है कि आयर्वणिक का धर्म अथवा आम्नाय ' आथर्वण्य ' कहलाता है | free के निपात प्रकरण में अध्याय शब्द वेद संहिता का बोधक है । ' स्वाध्यायो s ध्येतव्यः ' यहाँ पर स्वाध्याय शब्द. अपनी शाखा के वेद को बतलाता है । इसी लिये गृह्यासंग्रह की यह उक्ति है- ' जो व्यक्ति अपनी शाखा की विधि को छोड़ कर दूसरी शाखा में कही गई विधि के अनुसार आचरण करता है, वह अपने कुल पुरुष ऋषि को अप्रमाण मानने के फल स्वरूप घोर aare में डूब जाता है । ' ' यजुर्वेद के १०१ व्याख्यान हैं, सामवेद के एक हजार, ऋग्वेद के २१ और अथर्ववेद के ९ व्याख्यान ग्रन्थ है ' स्वामी दयानन्द की यह उक्ति इसलिये ठीक नहीं हैं कि व्याख्यान के अतिरिक्त व्याख्येय ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होते । शाकली, कौथुमी,

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dar पारिजातः ७६७ याश्चतस्रः शाकली. कौथुमी- माध्यन्दिनी- शौनकी संहिता वेदपदेनाभिप्रेयन्ते सामाजिकेस्ता अपि त्वदभिमतव्याख्यान-भूतासु शाखास्वान्तर्भवन्ति। यथा पाणिनिर्यदा यजुर्वेदमात्रं ( सर्वा यजुः शाखा: ) बुबोधयिषति, तदा ' यजुषि ' लिखति । यदा विशिष्टसंहिता विजिज्ञापयिषति, तदा ' देवसुम्नयोर्यजुषि काठके ' ( पा ० सू ० ७१४१३८ ) इतिवल्लिखति । प्रकृते च महाभाष्यकारो विशिष्टानां नामान्यनुल्लिख्य ' ऋग्वेद ' एवमादि लिखितवान् । तस्मात्सर्वा अपि शाखा वेदपदव्यपदेश्या भवन्ति । ' यजुषि काठके ' इति लेखेन पाणिनिरपि काठकवदेव माध्यन्दिनीभिन्ना अन्या अपि शाखा यजुर्वेदं मनुते । प्रत्याहाराह्निके ' एओङ् ' सूत्रे पूर्वपक्षिणाऽकारौकारयोः सिद्धये प्रोक्तम्- ' नतु च भोः! छान्दोगानां सात्य सुग्रिराणायनीया अर्धमेकारमर्धमोकारं चाधीयते । ' सुजाते एश्व सूनृते ' इति । तत्र महाभाष्ये समाधानमुक्तम्, परिषत्कृतिरेषा तत्रभवताम् । नैव लोके नान्यस्मिन् वेदे अर्ध एकारोऽस्ति ' । अर्थाद् राणायनीयशाखीयानां सा स्वीया शैली अर्ध एकारी लोके तथा अन्यस्मिन् राणायनीयभिन्ने वेदे न भवति । एतावता राणायनीयशाखाया वेदत्वमङ्गी-कृत्यैवान्यस्मिन् वेद इति प्रयोगः सम्भवति । अन्यथा नैव लोके नैव वेदे इत्येव ब्रयात् । ' सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे ' ( पा ० सू ० १११११६ ) अत्र ऋषिपदं वेदपरम् । ' कर्तरि चषिदेवतयोः ' ( पा ० सू ० ३।२।१८६ ) दयानन्देनाप्याख्यातिके ३६१ पृष्ठे ' ऋषिर्वेद: ' इत्युक्तम् ( पा ० स ० ३।१।७ ) अत्र महाभाष्ये सर्वस्यव चेतनत्वसिद्ध्यर्थं ' ऋषिः पठति ' शृणोत ग्रावाणः । नायं पाठस्त्वदभिमते वेदे किन्त्वन्यशाखा स्वित्यनुपद-मुक्तमेव । ' तस्मादेतदुषिणा अभ्यनुक्तम् । दध्यङ् ह मधु ' ( श ० १४।१।१।२५ ) इत्यनेन ब्राह्मणेन ऋग्वेदीशाकल संहितामन्त्रः ( १।११६।१२ ) इति स्थले वर्तमान ऋषिपदेन निर्दिष्ट: । तथैव ' तदाहु: - मनो देवा मनुष्यस्य आजानन्ति, मनसा यन्दिनी और शौनकी इन चार संहिताओं को आर्यसमाजी वेद मानते हैं । ये भी आपकी उन व्याख्यानभूत शाखाओं के अन्तर्गत ही है । पाणिनि जब यजुर्वेद की सभी शाखाओं को बतलाना चाहते हैं तो ' यजुषि ' लिखते हैं और जब किसी विशिष्ट शाखा को कहना होता है, तो ' यजुषि काठके ' इस प्रकार उसका स्पष्ट उल्लेख करते हैं । उसी पद्धति से प्रकृत स्थल पर महाभाष्यकार विशिष्ट नाम का उल्लेख न कर ' ऋग्वेद ' इत्यादि सामान्य नामों को देते हैं । इससे यह स्पष्ट है कि यहीं पर उनको सभी शाखाएँ ' वेद ' पद से अभिप्रेत हैं । ' यजुषि काठके ' पाणिनि के इस उल्लेख से यह भी प्रतीत होता है कि वे काठक शाखा के ही समान माध्यन्दिन से भिन्न अन्य शाखाओं को भी यजुर्वेद मानते हैं । प्रत्याहार आह्निक में ' एओङ ' सूत्र में पूर्वपक्षी अर्थ एकार और ओकार की सिद्धि के लिये कहता है कि ' सामवेद की सात्यरािणायनीय शाखा वाले अर्ध एकार और आकार का पाठ करते हैं । जैसे कि ' सुजाते एश्व सूनूते ' इस मन्त्र में | इसका महाभाष्यकार ने यह समाधान दिया है कि ' यह केवल आपकी गोष्ठी का बात है, न तो लोक में और न ही किसी अन्य वेद में अर्थ एकार है । अर्थात् राणायनीय शाखा वालों की यह अपनी शैली हैं, अर्ध एकार लोक में तथा राणायनीय शाखा से भिन्न किसी अन्य वेद में नहीं होता । यहाँ पर राणायनीय शाखा को वेद मानने पर ही ' अन्य वेद ' शब्द का प्रयोग हो सकता है, अन्यथा ' न तो लोक में और न ही वेद में ' इतना ही कहना पर्याप्त था । १११११६ और १२ १८६ पाणिनि सूत्रों में ' ऋषि ' पद वेद का बोधक हैं | स्वामी दयानन्द ने भी आख्यातिक प्रकरण मैं ( पृ ० ३६१ ) ऋषि वेद ही है ' यह कहा है । ३१११७ संख्या के सूत्र के महाभाष्य में सभी पदार्थों की चेतनता को बताने के लिये ' वेद का कहना है कि है पत्थरों सुनो ' यह मन्त्र ' ऋषि ' नाम से उद्धृत किया गया है । यह मन्त्र at जिन चार पुस्तकों को वेद मानते है, उनमें उपलब्ध नहीं है, किन्तु उनसे free शाखा की पुस्तक में उपलब्ध है, यह बात थोड़ी ही देर पहले कहीं गई है । शतपथ ब्राह्मण में ( १४ | १ | ११२५ ) वेद की शाकलसंहिता का ( १।११६।१२ ) संख्या का मन्त्र ' ऋषि ' पद से निर्दिष्ट है । इसी तरह ऐसा कहा जाता है कि देवता मनुष्य के मन की बात जानते हैं । मनुष्य मन में संकल्प करता है, वह प्राण में पहुँच जाता है, प्राण उसको

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७६८ सङ्कल्पयति तत्प्राणमभिपद्यते प्राणो वातं वातो देवेभ्य आचष्टे तथा पुरुषस्य मनः ( श ० ३३४/२/६ ), ' तस्मादेत दृषिणाम्यनूक्तम् -- ' मनसा सङ्कल्पयति तद् वातमभिगच्छति । वातो देवेभ्य आचष्टे यथापुरुष ते मनः ( श ० ३ | ४ | २ | ७ ) ऋषिपदेनोद्धृतोऽयं मन्त्रः । न च शौनकी संहितायामेतादृशः पाठः । ' तद् देवा अपि गच्छति ' इति वैरूप्यदर्शनेन मानुषत्वापत्तेः । शतपथे ' तद् वातमभिगच्छति ', शौनकी संहितायाम् ' तद्देवा अपि गच्छति ' इति महान् भेदः । ब्राह्मणे यदुत्तरावं तत्तु शौनकी संहितायां नास्त्येव । तत्र तु ' ब्रह्माणो वशामुपयन्ति याचितुम् ' इति । अतः शतपथे कस्याश्चि-दन्यस्या: संहिताया एव मन्त्र इष्टः । तथा च शाकल्यादिसामाजिकाभिमतसंहिता चतुष्टय भिन्नसंहितायां यस्यामयं पाठो लभ्येत, तस्या वेदत्वे ११३१ संख्याकानां सर्वासामेव वेदत्वं सिद्धयति । किन, यदि शाकल्यादिचतस्रः संहिता एव वेदा: स्युस्तदा यास्कः कथङ्कारं ' ओषधे त्रायस्वनम् ' इति निरुक्ते ( १ | १५ | ६ ) उदाहरेत् । पूर्वमीमांसायां ( १ २ ३५ ) शावर भाष्येऽयमेव मन्त्र उदाहृतः । न च सामाजिका-भिमतेषु वेदेष्वेष मन्त्र उपलभ्यत इति पूर्वं दर्शितमेव । तस्मात् कृष्णयजुः संहिताया वेदत्वमभिप्रेत्येवायं मन्त्रस्तत उद्धृत इत्ययुक्तमेव । एवमेव ' वनस्य तस्यापरा भवति ' ( ८२२८1१ ) इति प्रधानस्तुतिमुदाहरता यास्केन ' वनस्पते ' नया निय पिष्टमया वयुनानि विद्वान् । देवत्रा दिधिषो हवींषि च दातारमृतेषु वोचः ॥ ' इत्युदाहृतम् । शाकल्यसंहितायां तु - ' वनस्पते रशनया नियूया देवानां पाथ उप वक्षि विद्वान् । स्वदाति देवः कृणवद्धवीष्यवतां Target हवं मे || ' ( १० / ७०।१० ) इति । उभयोः पाठयोर्महान् भेदः स्पष्टः । न च यास्कः पाठपरिवर्तने समर्थः, तस्य मानुषत्वापत्तेः । ' यदि यथैवचनूक्तमेवानुब्रूयाद् होतारं विश्ववदसमा ' ( श ० १ | ४ | १ | ३३ ) इति कण्डिकारीत्या शाकल्यसंहितापाठी मूलवेदः स्यात्तदा यास्कोक्तः पाठी मूलवेदो न स्यात् । यद्युभयोरपि मूलवेदत्वमभिप्रेतम्, तदा तु १ ९ ३१ संख्याकानां मूलवेदत्वमङ्गीकार्यम् । निरुक्तोक्तः पाठः किञ्चिद् भेदेन मैत्रायणी संहितायाम् ( ४/१३/६५ ) उपलभ्यते । निरुक्ते ' दिधिषो: ' इति पाठः । मैत्रायणी संहितायाम् ' दधिषोः पाठः । यदि तादृशभेदेन संहितापाठस्य यह कह कर शतपथ कहा गया है, उसका और शौनकसंहिता में ' तद् देवा अपि गच्छति ' । इस पवन के पास पहुँचा देता है और पनन उस बात को देवताओं को कह देता है कि मनुष्य के मन में यह बात है ' बिताती है कि ' यही बात ' ऋषि ' अर्थात् इस वेद मन्त्र में भी कही गई हैं ' । यहाँ पर जो मन्त्र ऋषि पद से पाठ शौनकसंहिता के समान नहीं है । शतपथ का पाठ ' तद्वातमभिगच्छति ' प्रकार इन दोनों पाठों में बड़ा अन्तर है । शामुपयन्ति याचितुम् ' यह है । इससे यह इस तरह आर्यसमाजियों के अभिप्रेत शाकली सिद्ध होने पर सभी ११३१ शाखाओं को यदि शाकली आदि चार ब्राह्मण भाग में प्रदर्शित उत्तरार्ध शौनकसंहिता में हैं ही नहीं । वह पाठ है- ' ब्रह्माणो प्रतीत होता है कि शतपथ ब्राह्मण में यहाँ पर किसी दूसरी संहिता का मन्त्र अभिप्रेत है । आदि चार संहिताओं से भिन्न जिस संहिता में यह मन्त्र पाठ मिलेगा, उसकी वेदता वेदता सिद्ध हो जायगी । संहिताएं ही वेद मानी जाती, तो निरुक्तकार यास्क ' ओषधे शावर भाष्य में भी यही मन्त्र उद्धृत है । आर्यसमाजियों के यह भी कहा जा चुका है कि कृष्ण यजुर्वेद की संहिता को भी श्रायस्वैनम् ' इस मन्त्र का उद्धरण अभिमत वेद भाग में यह मन्त्र वेद मान कर ही यह मन्त्रउद्धृत कैसे देते? पूर्वमीमांसा ( १/२/३५ ) के नहीं है, यह पहले कहा जा चुका है । है । इसी तरह निरुक्तकार यास्क ( ८/२८१ ) यहाँ पर प्रधान स्तुति का उदाहरण देते हुए मूल में निर्दिष्ट मन्त्र को उद्धृत करते हैं । areer संहिता का पाठ इससे भिन्न है, यह भी मूल में दिये गये पाठ से स्पष्ट है । दोनों पाठों में स्पष्ट ही बड़ा भेद है । यास्क पाठ में परिवर्तन नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने पर वेद मनुष्यनिर्मित माना जायगा । ' जैसा ऋचा का पाठ है, तदनुसार ही उच्चारण करे ' इत्यादि aave श्रुति ( १ | ४ | ११३३ ) की कण्डिका के अनुसार शाकल्य संहिता का पाठ ही मूल वेद है, तो यास्क का बताया पाठ मूल वेद नहीं माना जायगा । यदि दोनों को मूल वेद मानना है तो सभी ११३१ शाखाओं को मूल वेद मानना पड़ेगा | free का पाठ कुछ पाठभेद के साथ मैत्रायणी संहिता में ( ४/१३३६५ ) मिलता है । निरुक्त का पाठ ' दिषिषो: ' है और मैत्रायणी संहिता का

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वेदार्थपारिजातः ७६६ ऋक्त्वं न स्यात्, तदा शाकल्यसंहितायाम् ( १०/१८/८ ) ' दिधिषोः ' इति पाठः, अथर्ववेदीयशौनकी संहितायां ( १८/३/२ ) ' दधिषो: ' इति पाठः । तेनान्यतरस्यैव मूलवेदत्वं मन्तव्यम्, न च तदिष्टं सामाजिकानाम्, तैरुभयोरपि मूलवेदत्वाङ्गीकारात् । निरुक्तकारस्य वेदज्ञत्वमपि सामाजिकैरुपेयते । यास्कस्य प्रवृत्त्येदमपि प्रतीयते यत् स स्वकुल-परम्पराप्राप्तशाखापाठापेक्षयाऽन्यसंहितापाठस्य मानुषत्वं मन्यते । तत एव ' वनेन वायो न्यधायि चाकन् ' ( ऋ ० सं ० १०।२ ९ ।१ ) इत्यत्र वाय: ' वेः पुत्रः ' इत्युक्त्वा शाकलसंहिताया दोषं दर्शयति-- ' वा इति य इति च चकार शाकल्यः ' ( नि ० ६ २८ ३ ) | अर्थात् शाकल्यः ' वायः ' इत्येकस्य पदस्य ' वा, य: ' इति पदच्छेदं कृत्वा पदद्वयं चकार । तच्च न युक्तमित्यप्याह-- ' उदात्तं त्वेवमाख्यातमभविष्यदसुसमाप्तश्चार्थः ( नि ० ६ २८ ३ ) इति । एतेनेदं विज्ञायते यद् यास्को यत्रवेदेवाय इत्येकं पदमेवास्ति तमेव मूलवेदं मनुते, न ' वा, य: ' इति पदद्वयघटितं वेदम् | सामाजिकानामजमेर वैदिक-यन्त्रालय प्रकाशितायामृग्वेदसंहितायां तु प्राचीनसंस्करणे ५६० पृष्ठे १०।२ ९ ।१ वा य इत्येव पाठः प्रकाशितः । तथा ' च यास्कदृष्ट्या शाकली संहितायाः सामाजिकाभिमताया वेदत्वमपौरुषेयत्वं च न स्यात् । कश्चित्तु -- ' यदस्य पूर्वमपरं तदस्य यद्वस्यापरं तद्वस्य पूर्वम् । अहेरिव सर्पणं शाकलस्य न विजानन्ति ' ( ऐ ० ब्रा ० ३१४३ ) इत्यस्य व्याख्यां कुर्वन्नाह-- शाकलशाखाया आद्यन्तयोः प्रथमदशममण्डलयो: १ ९ १ सूक्तानां सत्त्वात् शाकलसंहिताया अहेरिव गतिः | अहिश्च सूर्योऽभिप्रेतस्तेन शाकलीसंहितेव तदभिमता । परमष्टकघटितायाम् ऋग्वेदसंहितायां तु प्रथमाष्टके २६५ सुक्तानि अन्तिमे च २४६ सूक्तानि सन्तीति न तत्र पूर्वापरयोः समानता घटते । श्रीस्वामिविश्वेश्वरानन्दट्रस्ट प्रकाशितायां शाकल संहितासूच्यां ' वायः ' इत्येकं पदं क्वापि नास्ति, किन्तु ' वा ' ३७१ पृष्ठे ' य: ' ३२१ पृष्ठे । एतेनैव वैदिकयन्त्रालयप्रकाशितायाम् अथर्वसंहितायाम् ' बा ' ' यः ' इति द्वे पदे प्रकाशिते । ' दधिषो: ' । यदि इस स्वल्प भेद के कारण इस संहिता का पाठ ' ऋचा ' नहीं कहा जायगा, तो शाकल्यसंहिता ( १०११८१८ ) में ' दिधिषी: ' पाठ है और अथर्ववेद की शौनकसंहिता में ( १८/३/२ ) पर ' दधिषो: ' पाठ होने से किसी एक को ही मूल वेद मानना पड़ेगा | आर्यसमाजियों को यह अभीष्ट नहीं होगा, क्योंकि वे इन दोनों संहिताओं को मूल वेद मानते हैं । समाजी लोग निरुक्तकार को भी वेदज्ञ मानते हैं । यास्क की प्रवृत्ति से ऐसा मालूम होता है कि वह अपनी कुलपरम्परा से प्राप्त शाखा के पाठों की दृष्टि से मनुष्यकृत मानते हैं । इसी लिये ' वमेव वायो म्यत्रायि चाकन् ' यहाँ पर ' वायः वेः पुत्रः ' ऐसा कह कर अर्थात् शाकल्य ने ' वाय: ' इस एक पद को ' वा यः ' इस गया है कि यह उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करने पर अन्य संहिता के पाठ की शाकल संहिता में दोष दिखाते हैं कि ' वा इति य इति च चकार शाकल्यः ' तरह पदच्छेद कर दो पदों में विभक्त कर दिया है । वहीं यह भी बताया आख्यात उदात्त हो जाता है और इससे अर्थ की संगति भी नहीं बैठती हैं । इससे यह मालूम होता है कि यास्क जिस ऋग्वेद में ' वाय: ' इस एक पद से घटित पाठ है, उसी को मूल वेद मानते हैं, जिसमें ' वा य: ' इन दो पदों से घटित पाठ है, उसको नहीं । समाजियों के अजमेर वैदिक यन्त्रालय से प्रकाशित ॠग्वेद संहिता के प्राचीन संस्करण में ५६० पृष्ठ पर इस मन्त्र का ' वा यः ' यही पाठ छपा है । इससे यास्क की दृष्टि में शाकली संहिता का, जिसको कि समाजीगण मूल वेद मानते हैं, वेदत्व और अपौरुषेयत्व महीं बनेगा । ' यदस्य पूर्वमपरम् ' इत्यादिक ऐतरेय ब्राह्मण के वचन की व्याख्या करते हुए किसी ने कहा है कि शाकल शाखा के आदि और अन्त अर्थात् प्रथम और दशम मण्डल में १ ९ १ सूक्त विद्यमान हैं, इसलिये इसकी गति अहि के समान है | अहि शब्द यहाँ सूर्य का वाचक है । अर्थात् उदय और अस्त ( आदि और अन्त ) काल में जैसे सूर्य की समान स्थिति होती है, वही स्थिति शाकल संहिता की है, क्योंकि इसके भी प्रथम और अन्तिम मण्डल में सूतों की संख्या समान है । किन्तु अष्टक घटित ऋग्वेद संहिता में प्रथमाष्टक में २६५ सूक्त और अन्तिम अष्टक में २४६ सूक्त है । इस प्रकार यहाँ पर आदि और अन्त में समानता नहीं है । श्रीस्वामी विश्वेश्वरानन्द ट्रस्ट प्रकाशित area संहिता की सूची में ' वाय ' यह एक पद कहीं भी नहीं है, किन्तु ३७१ पृष्ठ पर ' वा ' तथा ३२१ पृष्ठ पर ' यः पद है | इसी लिये वैदिक यन्त्रालय से प्रकाशित अथर्वसंहिता में ' वा ' और ' यः ' ये दो पद प्रकाशित हैं । इस तरह निरुक्त के अनुसार समाजियों ९ ७

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 800 का मूल पृष्ठ
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७७० वेदार्थपारिजातः तथा च निरुक्तानुसारेण सामाजिकानां शाकलीसंहिता शौनकी संहिता च न वेदपदव्यपदेश्यतामर्हतः । सायणादिभिस्तु ' वा ' ' य: ' इति पदद्वयाभ्युपगमेऽपि व्याख्यानावसरे ' वायः ' इत्येकं पदं मत्वैव व्याख्यानं कृतम् । तथापि किं पदद्वयघटि-ताया: संहिताया वेदत्वमपौरुषेयत्वं च न स्याताम्? यद्येवं सत्यपि शाकलशौनकसंहितयोर्वेदत्वं तथा यास्काभिमताया एकपदघटिताया: संहिताया अवेदत्वं भविष्यति । यदि तुभयोरपि वेदत्वं तदा तु सर्वासामपि ११३१ संहितानां वेदत्वमेव युक्तम् । तथापि स्वसम्प्रदायप्राधान्यविवक्षयैव शाखान्तरपाठस्य निन्दनं क्वचिद् दृश्यते, निन्दार्थवादेनैव क्वचित् शाखान्तरपाठस्य मानुषत्वमप्युच्यते, तथापि सर्वासामेव शाखानाम नौरुषेयत्वं वेदत्वं चाक्षुण्णमेव, निन्दार्थवादस्य स्वार्थे तात्पर्याभावात् । तथैव पुराणेष्वपि कस्याश्चिद्देवतायाः प्राधान्यवर्णनप्रसङ्गे नेतरदेवतानामपकर्षवर्णनं दृश्यते । ' शाखाभेदाश्च ये केचिद् याश्च शाखासु गीतयः । स्वरवर्णसमुच्चाराः सर्वास्तान् विद्धि मत्कृतान् ॥ ' ( म ० भा ०, शा ० प ० ३२४ ) इति भगवदुक्तिरेषा भगवत्कृतिरपौरुषेयत्वानुगुणैव । ' तस्माद् यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जिरे ' ( बा ० सं ० ३१1७ ) इत्यत्र ' जज्ञिरे ' इत्युक्त्यापि यथा न पौरुषेयत्वम् । निरुक्ते -- ' एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीय: ' ( १।१५ । ७ ), ' अग्नये समिद्धयमानाय अनुब्रूहि ' ( १।१५ / ७ ) इत्यादिमन्त्राणामुद्धरणम् । इमे मन्त्राः शाकल्यादिसंहितासु नोपलभ्यन्ते । सामाजिकास्तु यास्क पाणिनि - पतञ्जलि -शतपथादिप्रामाण्यमभ्युपगच्छन्तोऽपि नैतान् मन्त्रान् मन्यन्ते । केषाञ्चिद्रीत्या पाणिनिसूत्र ( ४ | ३ | १०१ ) महाभाष्यकार: संहितानां या वर्णानुपूर्वी तस्या अनित्यत्व-मुक्तम् । तत्रानित्यत्वस्यासमानत्वमेवार्थः । नात्र कासाञ्चिदपौरुषेयत्वं पौरुषेयत्वं च कासाञ्चित् साध्यते । तद्रीत्या वर्णानुपूर्वीणामनित्यतारूपाऽसमानतैव संहिता भवति । की शाकली और शौनकी संहिता वेद नहीं कही जा सकती है । सायण प्रभूति ने यहाँ पर दो पद मानते हुए भी व्याख्या करते समय इसको एक ही पद मान कर उसका अर्थ किया है । तो क्या दो पद बाली संहिता में वेदत्व और अपौरुषेयत्व नहीं माना जायगा? यदि यह माना जायगा कि दो पद वाली शाकल और शौनक संहिता वेद है, तो यास्क को अभिमत एक पद घटित संहिता वेद नहीं मानी जायगी । यदि दोनों को वेद मानना है, तो फिर सभी ११३१ शाखाओं की संहिताओं को वेद मानना ही ठीक होगा । ऐसा मानने पर यह संगति बैठ जाती हैं कि अपने सम्प्रदाय को प्रधान मान कर दूसरी शाखा के पाठ की निन्दा इसलिये की जाती है कि निन्दापरक अर्थवाद वाक्य के द्वारा कहीं कहीं दूसरी शाखा के पाठ को मनुष्यकृत मान लिया गया है । इससे सभी शाखाओं की अपरुषेयता और वेदता में भी किसी प्रकार की बाधा नहीं आती, क्योंकि निन्दापरक अर्थवाद का स्वार्थ में तात्पर्य नहीं होता । इसी पद्धति पर पुराणों में किसी एक प्रधान देवता के वर्णन के प्रसंग में अन्य देवताओं की हीनता बताई जाती है । उसका केवल प्रधान देवता की प्रशंसा में तात्पर्य होता है, अन्य देवताओं की निन्दा में नहीं । ' वेद के जितने शाखाभेद हैं, उन शाखाओं में विभिन्न गोतियाँ, स्वर वर्ण आदि के उच्चारण की विभिन्न विधियों ये अपौरुषेय है, ईश्वर प्रदत्त है, इस कथन के अनुकूल ही है । इसीलिये ऋक्, यजु और साम की उत्पत्ति हुई ' यहाँ पर वेद उत्पत्ति वर्णित सब मेरी ही बनाई हुई है ' महाभारत की यह भगवदुक्ति वेद ' उस यज्ञ से, जिसमें कि सभी प्रकार की आहुतियाँ दी गई थीं, है, तो भी उसकी अपरुषेयता में कोई बाधा नहीं आती । निरुक्त में ' एक एव रुद्रः ', ' अग्नये समिद्धमानाथ ' आदि मन्त्रों के उद्धरण उपलब्ध होते हैं । ये मन्त्र शाकली आदि चार संहिताओं में नहीं मिलते । आर्यसमाजी यास्क, पाणिनि, पतंजलि, शतपथ ब्राह्मण आदि को प्रमाण मानते हुए भी इनको मन्त्र मानने को तैयार नहीं हैं । कुछ लोगों के मत से ४१३३१०१ संख्या के पाणिनि सूत्र पर महाभाष्यकार पतंजलि ने संहिताओं की वर्णानुपूर्वी को अनित्य माना है । यहाँ पर अनित्य पद का अर्थ असमान किया जाना चाहिये | इससे महाभाष्यकार को कुछ शाखाओं की पौरुषेयता तथा कुछ की अपौरुषेयता अभिप्रेत नहीं है । पतंजलि के मत से वर्णापूर्वी की अनित्यता, अर्थात् असमानता ही संहिता भेद का प्रयोजक माना गया है ।