वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 801–810

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 801–810

पृष्ठ 801

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वेदार्थपारिजातः ७७१ कश्चित्सामाजिकस्तु काठकं कालापकं मौदकं पैप्पलादकमिति महाभाष्यमाश्रित्य काठकादीनामनित्यानुपूर्वी-कत्वेन पौरुषेयत्वं तद्भिन्नानां शाकली - कोथुमी - माध्यन्दिनी - शौनकी संहितानां नित्यानुपूर्वीकत्वेनापीरुषेयत्वमाह । तत्तुच्छम् तथात्वे काठकादिभिन्नानां मैत्रायणी - काण्य - तं त्तिरीय- कपिष्ठल - कठ - राणायनीयादीनां नित्यानुपूर्वीकत्येता-पौरुषेयत्वापत्तेः । न च युष्माभिस्तासां वेदत्वमपौरुषेयत्वं चोपेयते । तस्मात् काठकपैप्पलादकादिक तिचिच्छाखाना-मुल्लेखस्तु सर्वशाखानामुपलक्षणार्थमेव मन्तव्यः । तत्र पूर्वपक्ष: - छन्दोऽर्थं तेन प्रोक्तमिति सूत्रमस्तु, नहि छन्दांसि क्रियन्ते ( पूर्वमीमांसा रीत्या ) । तत्रोत्तर-पक्ष: -- छन्दोर्थं ' तेन प्रोक्तम् ' ( पा ० सू ० ४ | ३ | १०१ ) इति सूत्रं स्याच्चेत्तुल्यमेतद्भविष्यति । ग्रामे ग्राम काठकं कालापकं प्रोच्यते, तत्रादर्शनात् । न च तत्र प्रत्ययो भवति । ( सुशर्मणा प्रोक्ता सौशर्मणी शाकलसंहिता, सौशर्मणी काठकसंहितेति प्रत्ययो दृश्यते । यत्र च प्रोक्तप्रत्ययो भवति ग्रन्थः स भवति । तत्र ग्रन्थस्य कृतत्वात् ' कृते ग्रन्थे ' ( पा ० सू ० ४ | ३ | ११६ ) इत्येव सिद्धम् | ( न च तत्र तेन प्रोक्तमित्यधिकारस्य प्रयोजनीयता ) | पुनः पूर्वपक्ष: - ननु चोक्तं नहि छन्दांसि क्रियन्ते, नित्यानि छन्दांसि । उत्तरपक्ष: - यद्यपि ( छन्दसाम् ) अर्थो नित्यः, या त्वसौ ( छन्दतां सर्वेषामानुपूर्वी ) सा अनित्या ( असमाना ) तदभेदात् ( तस्या आनुपूर्व्या ) अनित्यत्वात् ( असमानत्वात् ) एतद् भवति काठकं कालापकं मोदकं पैप्पलादकमिति । अत्र महाभाष्ये छन्दःपदेन शाकलवाजसनेयादिका: ११३१ सर्वाः संहिता उच्यन्ते । शाकल्यादयोऽपि तत्रैवान्तर्भवन्ति । दयानन्दस्यापि छन्दः शब्देन वेदसंहितोच्यते । ' छन्दः शब्देन मन्त्रभागस्य मूलवेदस्य ग्रहणं भवति ' इति ( पा ० सू ० २ | ३ | ६२ ) पृष्ठे ३१० स्वीयेऽष्टाध्यायीभाष्ये दयानन्दः । तस्मादर्थस्य नित्यत्वे समानत्वेऽप्यानु-आर्यसमाजियों में से ही किसी का कहना है कि यहाँ पर महाभाष्य में काठक, कालापक, मोदक, पैप्पलादक इत्यादि का नाम देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि काठक आदि संहिताओं में अनित्य आनुपूर्वी होने से वे पौरुषेय हैं और इससे भिन्न शाकली, कौथुमी, माव्यन्दिनी और शौनकी संहिता की आनुपूर्वी नित्य है, अतः वे अपौरुषेय हैं । यह बात ठीक नहीं है । तो आपको काठक आदि से भिन्न मैत्रायणी, काण्व, तैतिरीय, कपिल, कठ, राणायनीय आपको अपौरुषेय मानना पड़ेगा, किन्तु आप इनको वेद और अपौरुषेय मानते नहीं हैं । शाखाओं का नाम लिया जाना सभी शाखाओं का बोधक माना जाना चाहिये । यदि यह मान लिया जाय आदि की आनुपूर्वी नियत होने से इनको भी इसलिये यहाँ पर काठक, पैप्पलाद आदि कुछ यहाँ पर महाभाष्य में पूर्वपक्ष इस प्रकार है- ' वैदिक प्रयोगों के लिये ' तेन प्रोक्तम् ' यह सूत्र होना चाहिये, क्योंकि वेद बनाये नहीं जाते ( पूर्व मीमांसा की रीति से ) । इसके बाद यह उत्तर पक्ष है- ' वेदों के लिये यदि ' तेन प्रोक्तम् ' यह सूत्र होगा तो वह समान हो जायगा, अर्थात् इसका उत्तर वही होगा, जो कि इस सूत्र के प्रारंभ के भाष्य में कहा है । वह यह कि गाँव गाँव में काठक और कालापक शाखा का प्रवचन होता है, किन्तु वहाँ पर यह प्रत्यय नहीं देखा जाता ( अर्थात् सुशर्मा ने जिसका प्रवचन किया हो वह सौर्मणी शाकसंहिता, सोशर्मणी काठकसंहिता इत्यादि स्थानों में यह प्रत्यय नहीं होता ) और जहाँ पर यह प्रत्यय होता है, वह ग्रन्थ हो जाता है । यह ग्रन्थ बनाया जाता है, अतः वहां पर ' कृते ग्रन्थे ' इस सूत्र से ही प्रत्यय हो जायगा । इस प्रकार वहाँ पर ' सेन प्रोक्तम् ' इस ' अधिकार सूत्र ' का कोई प्रयोजन नहीं है ' । इसके बाद पुनः पूर्वपक्ष किया गया है— ' यह बताया गया है कि छन्द ( वेद ) बनाये नहीं जाते, ' तो नित्य हैं ' । पुनः उत्तर दिया गया है- ' यद्यपि ( वेदों का ) अर्थ नित्य है, किन्तु उनकी आनुपूर्वी के अनित्य, अर्थात् असमान होने से इस सूत्र से प्रत्यय लग कर काठक, कालापक, मोदक, पैप्पलादक आदि पदों की निष्पत होती है ' । यहाँ पर महाभाष्य में छन्दस् शब्द से शाकल, बाजसनेय आदि ११३१ सभी संहिताएँ परिगृहीत है । शाकली आदि संहिताएं भी इन्ही में हैं । दयानन्द की पद्धति से भी छन्दस् पद से वेद संहिताएं उक्त हैं | अपने अष्टाध्यायी भाष्य ( २/३/६२ ) में दयानन्द में कहा है— ' छन्दः शब्द से मन्त्रभागात्मक मूल वेद का ग्रहण होता है ' ( पु ० ३१० ) । इसलिये अर्थ की freear के सर्वत्र समान होने पर

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७७२ वेदार्थपारिजातः पूर्वीणामसमानत्वम् ।यथा- - ' ' शृणोत ग्रावाण: ' ( तै ० सं ० १ | ३ | १३ | १ ), ' श्रोता ग्रावाण: ' ( वाज ० सं ० ६ २६ ) इति । मूलवेदनाम्ना संहिताभ्योऽतिरिक्तः कश्चनापि ग्रन्थो नोपलभ्यते । अर्थस्तु समान एव सर्वासाम् । तदेवोक्तं वायुपुराणे - ' सर्वास्ता हि चतुष्पादाः सर्वाश्चैकार्थवाचकाः । पाठान्तरे पृथग्भूता वेदशाखा यथा तथा || ' ( ६१।५ ९ ) इति । अत्र शाखानां भेदोऽभिदश्वोक्तः । नागेशेन वेदत्वस्य शब्दार्थोभयनिष्ठतोक्ता । तेन शाखासु पाठभेदेऽप्यर्थाभेदो दृश्यते । पुरुषसूक्तमन्त्रेषु संहिताभेदेन भेदो दृश्यते, अर्थस्तु समान एव । ' सहस्रशीर्षा " स भूमि विश्वतो वृत्वा ' ( ऋऋ ० सं ० १० / ९ ०1१ ), ' सहस्रशीर्षा स भूमि सर्वतः स्पृत्वा ' ( वा ० सं ० ३१1१ ), ' सहस्रशीर्षास भूमि सर्वतो वृत्वा ( सामवेदसंहिता, आरण्यकपर्व ६/४/३ ), ' सहस्रबाहुः पुरुषः स भूमि विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद् ( अथर्ववेदसंहिता शौनकी १ ९ | ६ | १ ), ' छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् ' ( ऋ ० सं ० १०१ ९ ०१ ९ ), ' छन्दो ह जज्ञिरे तस्मात् ' ( अथर्व संहिता १ ९ / ६ / १३ ), ' त्रिपादूर्ध्व उदैत्ततो विष्वङ् व्यक्रामत् ' ( ऋऋ ० सं ० २०१ ९ ०४ ), त्रिभिः पद्भिद्यमरोहत् तथा व्यक्रामद् विष्वङ् ' ( अथर्व ० १ ९ / ६ / २ ), ' एतावानस्य महिमातो ' ( ऋ ० सं ० १०१ ९ ०१३ ), ' तावन्तो अस्य महिमानः ' ( अथर्व ० १ ९ | ६ | ३ ), ' उतामृतत्वस्येशानो ' ( ऋ ० सं ० १० / ९ ०६२ ), ' उतामृतत्वस्येश्वरो ' ( अथर्व ० १ ९ | ६ | ४ ), ' ऊरू तदस्य यद्वैश्यः ' ( ऋ ० सं ० १० / ९ ०११२ ), ' मध्यं तदस्य यद्वैश्यः ' ( अथर्ववेदसंहिता १ ९ / ६ / ६ ), ' कौ बाहू का ऊरू पादा ' ( ऋ ० सं ० १० १० ११ ), ' कि बाहू किमूख पादा: ' ( अथर्व सं ० १ ९ / ६ / ५ ), ' विराङग्रे समभवत् ' ( अथर्ववेदसंहिता १ ९ ६ ९ ), ' तस्माद् विराडजायत ' ( ऋ ० सं ० १० / ९ ०१५ ) सर्वेऽपि पाठस्तत्तत्संहितानां स्वतन्त्राः शुद्धा एव । नन्वत्र नित्यानित्यशब्दाभ्यां समानत्वासमानत्वरूपोऽर्थः कथं गृह्यते? किं तस्य मूलमिति चेत्? तात्पर्य-नुपपत्तेरेव तत्र मूलत्वात् । यत्तु ' स्वरो नियत आम्नायेऽस्य वामशब्दस्येति ' मतो छ: सूक्तसाम्नोः ( ५२२ | ५६ ) इति पाणिनिसूत्रे महाभाष्यकारेण वर्णानुपूर्व्या नियतत्व ( नित्यत्व ) मुक्तम् ' इति, तत्रायमाशयः -- वेदानां वर्णानुपूर्व्या नित्यत्वमनित्यत्वं च न सम्भवति । नहि छन्दसामानुपूर्व्या अनित्यत्वमाम्नायस्य चानुपूर्व्या नित्यत्वं सम्भवति, उभयोः पर्यायवाचकत्वात् । अनित्यपदस्यासमानार्थकत्वेऽपि छन्दस्वाम्नाये चाविशेषमेव स्यात् । ननु काठकादिसंहितानामेव भी पूर्वी की असमानता देखी जाती है । जैसे कि --- ' शृणोत मावाणः ' और ' श्रीता सावाणः ' में है । मूल वेद के नाम से संहिताओं से free कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है । इन सबके अर्थ में समानता है । यही बात वायुपुराण में कही गई है-- ' इन सबके चार पाद हैं ( संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ), ये सभी एक ही अर्थ का प्रतिपादन करती है । पाठान्तर के कारण ये शाखाएं जिन किसी तरह भिन्न हो जाती हैं । यहाँ पर शाखाओं का भेद और अर्थ का अभेद बताया गया है । नागेश ने वेद शब्द को शब्द और अर्थ उभयनिष्ठ माना है । इसी से शाखाओं में पाठभेद के रहते भी अर्थ का भेद नहीं होता । पुरुषसूक्त के मन्त्रों में संहिता के भेद से पाठभेद तो दिखाई देता है, किन्तु सबका अर्थ समान है । ऊपर मूल में विभिन्न संहिताओं के पाठों का संकलन किया गया है । ये सब विभिन्न संहिताओं के स्वतन्त्र पाठ हैं और सभी शुद्ध हैं । यहाँ पर नित्य और अनित्य शब्द का अर्थ समानता और असमानता कैसे लिया जाता है? उसका मूल क्या है? इसके उत्तर में यहीं कहा जा सकता है कि तात्पर्य की अनुपपत्ति के कारण ही ऐसा अर्थ करना पड़ता है । ' अस्यवाम शहद में स्वर नियत है ' इसकी चर्चा करते हुए महाभाष्यकार ने ' मतो छः सूक्तसानो: ' इस सूत्र के भाव में वर्णानुपूर्वी को नियत ( नित्य ) माना है । इसका यह अभिप्राय है कि वेदों की वर्णापूर्वी की नित्यता अथवा अनित्यता नहीं होती । छन्दस् की आनुपूर्वी से अनित्यता और आम्नाय की पूर्वी से नित्यता होगी, इस उक्ति का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि छन्द और आम्नाय पदों का अर्थ एक ही है । अनित्य शब्द का अर्थ असमान किया जाय, तब भी छन्दस और आम्नाय में कोई विशेषता नहीं आवेगी | यदि आप कहें कि छन्दस् पद का प्रयोग काठक

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वेदार्थ पारिजातः ७७३ छन्दस्त्वमिति चेत्र, ' यत्र ब्रह्मा पवमानः छन्दस्यां वाचं वदन् ' ( ऋ ० सं ० ९ ।११३।६ ) ' छन्द्यं वचः ' ( सा ० सं ० पू ० ३1३1३ ) इति शाकलीको थुम्यादिसंहितास्वपि वाचां छन्दस्त्वोक्तेः । ' छन्दांसि जज्ञिरे ' इत्यादिनाऽथर्ववेदसंहिताशीनकी-संहितादिष्वविशेषेण छन्दस्त्वव्यपदेशात् । यदि काठकादिसंहितानामाम्नायत्वं न स्यात्, तदा ' गोत्रचरणाद् वुञ् ' ( पा ० सू ० ४।३।१२६ ) इति सूत्रे महाभाष्यकारैः कठपैप्पलादीनाम्नायं मत्वा दुविधानानुपपत्तिः । न च महाभाष्यकारस्य पूर्वापरविरोधः शक्यशङ्कः, तस्य श्रमप्रमादादिराहित्येन परमाप्तत्वाम्युपगमात् । तस्मान्नियत-नित्यशब्दयोरर्थभेद एव मन्तव्यः । तेन आम्नाये आनुपूर्वी नियता निश्चिता इत्येवार्थो न नित्येति, अनित्यत्वोक्ति-विरोधात् । एतस्मिनातिमहति शब्दस्य प्रयोगविषये ते ते शब्दास्तत्र तत्र नियतविषया दृश्यन्ते । नात्र नियतशब्दो नित्यार्थकः, किन्तु निश्चितार्थंक एव । शब्दानां निश्चितविषयत्वमेव भवति न नित्यविषयत्वम्, घटाद्यनित्यविषयत्वस्यापि सम्भवात् । देशः खल्वाम्नाये नियतः कालः खल्वपि नियतः ' श्मशाने नाध्येयम्, ' नामावास्यायामध्येयम् ' | पदेकदेशः खल्वप्याम्नाये नियतः | ' अस्यवामीयम् ' इत्यादिवचनानि कस्मिन्नाम्नाये विद्यन्ते? सामाजिकैर्वक्तव्यं तेषामभिमते कस्मिनाम्नाये वचनान्येतानि समुपलभ्यते । अत्रापि नियतशब्दो निश्चितार्थक एव । लौकिकेष्वप्येतत् । ' नियतवाचोयुक्तयो नियतानुपूर्व्या भवन्ति ' ( नि ० १।१६।४ ) इति यास्कानुसारेण पितापुत्रौ ', ' इन्द्राग्नी ' इत्येवमादिषु लौकिकेष्वपि शब्देषु नियतानुपूर्वी भवति । अत्रापि निश्चितार्थक एव नियतशब्दः । क्वचिन्नित्यशब्दोऽप्यनित्यार्थको भवति । तदुक्तं महाभाष्यकारैः-' अथवा नेदमेव नित्यलक्षणं ध्रुवं कूटस्थमविचालि अनपायोपजनविकारि यत् तन्नित्यम्, तदपि नित्यं यस्मिन् तस्त्वं न विहन्यते ' ( पस्पशाह्निके नित्यतासाधकपक्ष निर्णयाधिकरणे ) । अन्यत्रापि ' अयं खलु नित्यशब्दो नावश्यं कूटस्थेष्वविचालिषु afe संहिताओं के लिये ही होता है तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि ' यत्र ब्रह्मा पवमानः छन्दस्यां वाचं वदन् ', ' छत्यं वचः ' शाकलो और कोथुमी संहिता के इन वचनों को छन्दस् पद से संबोधित किया गया है । ' छन्दांसि जज्ञिरे ' यहाँ पर अथर्ववेद संहिता, शौनकी संहिता प्रभृति सभी के लिये समान रूप से छन्दस् पद का प्रयोग किया गया है । यदि काठक प्रभृति संहिताएं आम्नाय के अन्तर्गत नहीं मानी जाती तो ' गोत्रचरणाहुन् ' इस सूत्र में महाभाष्यकार कठ, पैप्पलाद आदि को आम्नाय मान कर वुञ का विधान न करते | यह नहीं कहा जा सकता कि महाभाष्यकार पूर्वापर विरुद्ध बात कहते हैं, क्योंकि वे भ्रम प्रभाव से रहित परम आप्त माने गये हैं । इसलिये नियत और नित्य शब्द का भिन्न अर्थ करना पड़ेगा । इसलिये आम्नाय में आनुपूर्वी नियत अर्थात् निश्चित है, यही अर्थ करना पड़ेगा, free नहीं | क्योंकि इसका अनित्य उक्ति से मेल नहीं खायगा । शब्द के प्रयोग का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है । इनमें से प्रत्येक शब्द का विषय free है । यहाँ पर नियत शब्द नित्यार्थक न होकर निश्चितार्थक है । ra frefers ही होते हैं, freefore नहीं । क्योंकि इनके घट आदि अनित्य पदार्थ भी विषय होते हैं । आम्नाय में देश और काल नियत कर दिये गये हैं, जैसे कि ' श्मशान में नहीं पढ़ना चाहिये ', ' अमावास्या के दिन नहीं पढ़ना चाहिये ' । आम्नाय में पद के एक देश को भी नियत कर दिया गया है । समाजियों को यह बताना चाहिये कि ' अस्यवामीयम् ' इत्यादि वचन उनके अभिप्रेत fee आम्नाय में हैं । यहाँ पर भी नियत शब्द निश्चितार्थंक ही है । यह बात लौकिक शब्दों में भी लागू होती है । ' कुछ निश्चित शब्दों का प्रयोग नियत आनुपूर्वी के अनुसार होता है ' यास्क के इस वचन के अनुसार ' पितापुत्री ', ' इन्द्राग्नी ' जैसे लौकिक aadi में आनुपूर्वी नियत है । यहाँ पर भी नियत शब्द निश्चितार्थक है । कहीं पर नित्य शब्द भी ार्थक होता है । जैसे कि महाभाष्यकार ने कहा है- ' नित्य का यहो लक्षण नहीं है कि उसको ध्रुव, कूटस्थ, अविचल, किसी विकार को उत्पत्ति और विनाश से रहित होना चाहिये, किन्तु नित्य वह भी हैं जो कि जिसका तत्त्वतः विनाश नहीं होता ', दूसरी जगह भी बताया गया है कि--' यह नित्य ' शब्द अवश्य ही कूटस्थ, अविचल पदार्थों में प्रयुक्त हो, यह बात नहीं है, पौनःपुन्य के अर्थ में भी इसकी प्रवृत्ति होती हैं, जैसे कि free प्रहसित, नित्यजल्पित शब्दों की प्रवृति बहुत हँसने और बहुत बोलने वाले व्यक्ति के लिये होती है । इस प्रकार नियत sant free मानने में भी अनित्य के साथ उसका कोई विरोध नहीं है । नागेश भट्ट ने इस प्रसंग में यह अर्थ किया है कि वह

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gu वेदाचारिजातः भावेषु वर्तते, कि तहि आभीक्ष्ण्येऽपि वर्तते । तद्यथा - नित्यप्रहसितो नित्यजम्पित: ' ( पस्पशाह्निके मङ्गलार्थाधिकरणे ) | तथा च नियतशब्दस्य नित्यार्थकत्वेऽपि नानित्यत्वविरोध: । नागेशभट्टेन च - ' सानुपूर्वी तत्कल्पसमाप्तिपर्यन्तं नियता ' इत्यर्थः कृतः । न्यायभाष्यकारेण वात्स्यायनेनाप्यतीतानागतसम्प्रदायाभ्यासप्रयोगाविच्छेदतयैव वेदानां नित्यताऽभ्युपेयते । नियतत्वेनैव वेदस्यापौरुषेयत्वसाधने पितापुत्री ', ' इन्द्राग्नी ' इत्यादिनियतानुपूर्वीकाणां लौकिकशब्दानामप्यपौरुषेयत्वं स्यात्, न च तदिष्यते सामाजिकैः । प्रकृते आम्नायशब्दो वैदिकसम्प्रदायपरः । तथा च स्वस्ववैदिकसम्प्रदाये स्वरवर्णानुपूर्वी नियता प्रलयपर्यन्तमेकरूपैव भवति । एवमर्थानभ्युपगमे नित्यार्थकत्वे च नियतशब्दे स्वरवर्णानुपूर्वी नित्या भवतीत्यर्थः स्यात् । तथात्वे विरोध एव स्यात् । ' अस्य वामस्य ' ( ऋ ० सं ० १/१६४ | १ ) इत्यत्रैव स्वरभेददर्शनात् । एकत्र ' स्य'पदे स्वरितस्वरोऽन्यत्र तत्रैव स्यपदेऽनुदात्तो दृश्यते । तथा स्वरस्य नित्यत्वं स्यात्तदा नैष भेद उपपद्येत । वर्णानुपूर्वी चापि नेकरूपा ' सप्त स्वसारोऽभि सं नवन्ते ' ( ऋ ० सं ० शाकली १११६४।३ ), ' अभिसं नवन्त ' ( अ ० सं ० ९ / ९ / ३ ) इत्युभयत्र ए ० अ ० मात्राभेद: स्पष्टः । ' अचिकित्वाश्चिकितुष ' ( ० सं ० १ १६४१६ ), ' अचिकित्वांश्चि ' ( अथर्व सं ० ९९ | ७ ), ' विद्मने ' ( ऋ ० सं ० १।१६४।६ ), ' विद्यना ' ( अथर्वसं ० ७ ४ ९ / १ ), ' सनेमि तस्मिन्तापिता ' ( ऋ ० सं ०१११६४११४ ), ' सनेमि यस्मिन्नातस्थुः ' ( अथर्वसं ० ९ ३१४ / १४ ), ' अयं स शिक्ते ' अस्यवामीयसूक्तस्य प्रसिद्धे मन्त्रे ( ऋ ० सं ० १।१६४।२ ९ ) ' मर्त्यम् ' अथर्वसंहितायां मर्त्यान् ' ( ६।४१।३ ) इति भेदः । यत्तू — ' अस्यवामीयसूक्तस्यानुपूर्वी नियता नेष्टा, किन्त्वस्यवास इति पदांशस्यानुपूर्वी नियतेति तदपि न युक्तम्, तथात्वेऽन्यसंहितापेक्षया त्वदभिमतासु संहितासु वैशेष्यानुपपत्तेः । तस्मादस्याः स्वरवर्णानुपूर्व्याः सर्वासु संहिता -स्वसमानत्वादनित्यत्वमुक्तं भाष्यकारेण । कुलपारम्पर्येण स्वकीयामाथर्वणी पैप्पलादशाखां स्मरति गोनर्दीयो महाभाष्यकारः । ( पा ० सू ० ३।२।११४ ) इत्यत्र ' अभिजानासि देवदत्त कश्मोरान् गमिष्यामः । महाभाष्यकारे: कुत्राप्येतन्नोक्तं यदिमे चत्वारो आनुपूर्वी उस कल्प की समाप्ति पर्यन्त अनुस्यूत रहती है । न्यायभाष्यकार वात्स्यायन भी अतीत और अनागत संप्रदाय के अभ्यास और प्रयोगों को अच्छशता के कारण ही वेदों की freeat मानते हैं । नियत प्रयोगों के कारण वेद को अपोरुषेय सिद्ध करने पर ' पितापुत्री ', ' इन्द्राग्नी ' इत्यादि नियत आनुपूर्वी के लौकिक शब्दों को भी अपौरुषेय मानना पड़ेगा, जो कि समाजियों को भी अभिप्रेत नहीं है । प्रकृत में आना शब्द वैदिक संप्रदाय का बोधक है । अपने अपने वैदिक संप्रदाय में स्वर और वर्ण की आनुपूर्वी नियत है | वह प्रलय पर्यन्त एक रूप ही रहेगी । इस प्रकार अर्थ को न मानने पर और नियत शब्द को नित्यार्थक मानने पर स्वर और वर्ण की पूर्वी नित्य होती है, यह अर्थ होगा । ऐसा होने पर विरोध उपस्थित होगा । क्योंकि ' अस्य वामस्य ' यहीं पर स्वरभेद है | एक जगह ' स्य ' पदं का स्वरित स्वर और दूसरी जगह अनुदात्त दिखाई देता है । यदि स्वर की निश्यता हो तो यह भेद नहीं होना चाहिये । वर्ण की आनुपूर्वी में भी सर्वत्र एकरूपता नहीं है । ' सप्त स्वसारोऽभि सं नवन्ते ', ' अभिसं नवन्त ' इन दोनों जगहों में मात्राभेद ( ए और अ ) स्पष्ट है । मूल में इसी प्रकार के अन्य उदाहरण दिये गये हैं, जहां कि वर्ण, मात्रा आदि का भेद स्पष्ट है । यह कहना भी ठीक नहीं है कि वस्यवामीय सूक्त की धानुपूर्वी नियत है, यह हमारा कहना नहीं हैं, किन्तु ' अस्यवास ' इस पद की आनुपूर्वी नियत है, क्योंकि ऐसा मानने पर अन्य संहिताओं की अपेक्षा से आपकी अभिप्रेत संहिताओं में कोई विशेषता नहीं रह जायगी । इसी लिये सभी संहिताओं में स्वर बोर वर्ण की जानुपूर्वी की असमानता को देखकर ही भाष्यकार ने उनको अनित्य माना है । ३२ ११४ संख्या के सूत्र पर ' हे देवदत्त, तुम जानते हो, हम कश्मीर जायेंगे ' कहते हुए महाभाष्यकार गोनर्दीय अपनी कुल परम्परा की आथर्वण पिप्पलाद शाखा का स्मरण करते हैं । महाभाष्यकार ने यह कहीं भी नहीं लिखा है कि ये चार ही मूल वेद

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1991 मूलवेदा: । अन्याः संहिताः शाखा: । किन्तु ' चत्वारो वेदा बहुधा भिन्ना: ' इत्युक्त्वा ११३१ शाखाभेदान् दर्शितवान् । अन्यथा चतुरो मूलवेदानुक्त्वा ११२७ शाखास्तद्व्याख्यानभूता इत्यवश्यं वदेत् । न केवल मन्त्रसंहिताः किन्तु ब्राह्मणग्रन्थानपि महाभाष्यकारो वेदं मन्यते । पस्पशाह्निके ' वेदे खल्वपि पयोव्रतो ब्राह्मणः ' इत्यादिब्राह्मणवाक्या-न्येवोदाहृतवान् । आचारे पुनर्ऋषि ( वेदः ) नियमं वेदयते ' तेऽसुरा हेलयो हेलयः ' इत्यादि । ' वेदेऽपि याज्ञिकाः संज्ञां कुर्वन्ति स्पयो यूपश्चषाल: ' ( पा ० सू ० १1१1१ ), ' वेदे खत्वपि वसन्ते ब्राह्मणोऽग्निष्टोमादिभिः क्रतुभिर्यजेत ' ( पा ० सू ० ६ ११८४ ) इत्यादिवाक्यानि वेदरूपेणैवान्यशाखाम्यो ब्राह्मणेभ्यश्चोद्धृतानि । यदि चतस्रः संहिता एव वेदाः स्युः, तदा श्रोता: स्मार्ताश्च हिन्दुसनातनधर्मा निरालम्बना एवं प्रसज्येरन् संहितासु ज्योतिष्टोमादिविधीनामसत्त्वात् । विविधासु संहितासु ब्राह्मणेष्वा रण्यकेषूपनिषत्स्वेव ते सर्वे उपलभ्यन्ते । एवमेव यदि लौकिकशब्दमहासमुद्रसिद्धि-रष्टाध्यायीसूत्रः पाणिनिना कृता, तदाऽपरिमितसंहितामन्त्रशब्दानां साधने किं नाम काठिन्यम्? परन्तु तेषां सिद्धङ्घर्थ ' बहुलं छन्दसि ' इति द्वादश सूत्राणि, ' छन्दस्युभयथा ' इति सूत्रद्वयम्, ' वाच्छन्दसि ' इति सूत्रद्वयम् ' दृष्टानुविधिश्छन्दसि भवति ' इति ५।१।६ इत्यत्र महाभाष्ये इष्टि: - इत्यादिसूत्राणि विरचितानि इष्टयश्च । एतेषां सूत्राणामिष्टीनां च दानीमेव सार्थक्यं यदा विविधशाखाविशिष्टानां मन्त्राणां ब्राह्मणारण्यकोपनिषदां वेदत्वं स्यात् । अन्यथा नेतानि सङ्गच्छेरन् । ततश्चत्वारि पुस्तकान्येव वेदा इति भ्रान्तिरेव । ' शतं च नव शाखाः स्युर्यजुषामेव जन्मना । साम्नः सहस्रशाखाः स्युः पञ्चशाखा ह्यथर्वणः ॥ ' ( सीतों-पनिषदि ), ' ऋग्वेदस्य तु शाखाः स्युरेकविंशतिसंख्यया । नवाधिकं शतं शाखा यजुषो मारुतात्मज || सहस्रसंख्यया जाताः शाखाः साम्नां परन्तप । अथर्वणस्तु शाखाः स्युः पञ्चाशद्भेदती हरे ॥ ' ( मुक्तिकोपनिषदि ) इत्यादिप्रमाण: शाखानां भेदोऽपि कल्पभेदेन सङ्गच्छते । ' अनन्ता वै वेदा: ' ( तै ० ब्रा ० ३।१०।११।४ ) इति तैत्तिरीयश्रुतिरीत्या है और अन्य संहिताएँ शाखाएँ हैं । किन्तु चार वेदों के अनेक भेद हैं, ऐसा कह कर उन्होंने ११३१ शाखाएँ बताई हैं । अन्यथा उनकी यह अवश्य कहना चाहिये था कि मूल वेद चार हैं और उनकी व्याख्यानभूत शाखाएँ ११२७ हैं । न केवल इन सभी मन्त्र संहिताम को, अपितु ब्राह्मण ग्रन्थों को भी महाभाष्यकार वेद सानते हैं । पस्पशाह्निक में वे कहते हैं - ' वेद में पयोव्रत ब्राह्मण का उल्लेख है ', ऐसा कह कर वे ब्राह्मण के वाक्यों को उद्धृत करते हैं । ' आचार के विषय में ' तेऽसुराः ' इत्यादि वाक्यों से वेद नियम का विधान करते हैं ', ' वेद में भी याज्ञिकगण स्पय यूप आदि संज्ञाएँ करते हैं ', ' वेद में बताया गया है कि ब्राह्मण वसन्त ऋतु में अग्निष्टोम आदि यज्ञों का अनुष्ठान करे ' ये सब वाक्य वेद के नाम से ही अन्य शाखाओं और ब्राह्मणों से लिये गये हैं । यदि चार संहिताएँ हो वेद मानी जायें तो हिन्दुओं के श्रोत और स्मार्त सनातन धर्म निराधार हो जायेंगे, क्योंकि संहिताओं में ज्योतिष्टोम आदि की far उपलब्ध नहीं है । विभिन्न संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और रूपनिषद् में ही वे सब उपलब्ध होते हैं । इसी तरह यदि लौकिक शब्दों के अथाह महासमुद्र की सिद्धि पाणिनि ने अष्टाध्यायी सूत्रों से की तो संहिता मन्त्रों के परिमित शब्दों की सिद्धि में क्या कठिनाई हो ' सकती है? किन्तु उनकी सिद्धि के लिये बारह बार ' बहुलं छन्दसि ' इस सूत्र की रचना करनी पड़ी । ' छन्दस्युभयथा ' और ' वा छन्दसि ' इस सूत्रों को दो बार आवृत्ति करनी पड़ी । छन्द के लिये दृष्टानुविधि और इष्टियाँ बनाई गई । इन सूत्रों और इष्टियों की सार्थकता तभी हो सकती है, जबकि विविध शाखाओं के मन्त्रों और ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषदों को भी वेद माना जाय । अन्यथा इनकी कोई संगति न रह जायगी । बत: चार पुस्तकें ही वेद हैं, यह एक भ्रान्ति है । सीतोपनिषद् में प्रारंभ से ही यजुर्वेद की १० ९ शाखाएँ हैं, सामवेद की एक हजार और अथर्ववेद की पाँच ' तथा मुक्ति-कोपनिषद् में ऋग्वेद की २१ शाखाएँ हैं । है मारुतात्मज, यजुर्वेद की १० ९ ओर हे परन्तप सामवेद की एक हजार शाखाएँ हुई और अथर्ववेद की शाखाओं के पचास भेद हुए इस तरह से वेद की शाखाओं की संख्या में भिन्नता दिखाई पड़ती है, यह कल्पभेद के कारण है । अर्थात् विभिन्न कल्पों में वेद की शाखाएँ विभिन्न संख्या में विभक्त थीं, यही इससे सिद्ध होता है । ' वेद अनन्त हैं ' इस तैत्तिरीय

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७७६ वदार्थ पारिजातः परमेश्वरीयानन्तज्ञाननिष्ठा वदा अनन्ताः । मानवबुद्धिग्राह्या वेदास्तु कस्मिचित्कल्पे ११ ९ ०, कस्मिंश्चित्कल्पे किञ्चिन्ना: । पतञ्जल्यादिकालोपलब्धास्तु ११३१ शाखात्मका एव वेदाः । अपरश्व - उणादिप्रकरणे ' छन्दसीण: ' ( १।२ ) इत्यस्यार्थी लिखित: -- वेदे इण्धातोरुण्प्रत्ययो भवति । अत्र दयानन्देन छन्दसीत्यस्य वेद इत्यर्थः कृतः । ( पा ० सू ० ३।१।१२३ ) इत्यनेन छन्दसि निष्टक्यशब्दः साधितः । स्नात्वी इत्यपि छान्दसः शब्दः । वैदिकनिघण्टुग्रम्ये आष्ठा ( दिक् ), शोकी ( १७ ) रात्रिः जातरूपम्, वलिशान: ( १११० ) मेघः, बेकुरा ( १ | ११ ) वाक् सर्णीकं स्वतीकं १।१२ उदकनाम - एवमादयः शब्दाश्चतसृषु सामाजिकाभि-मतासु संहितासु नोपलभ्यन्ते तस्मादन्यासु संहितासु ब्राह्मणेषु वैदिकानामेतेषां शब्दानामुपलम्भस्तेषां वेदत्वं साधयति । अन्यथा पाणिन्यादिप्रोक्ताः प्रयोगाः स्वाभिमतासु संहितासु सामाजिकैर्देर्शनीयाः । स्वामिदयानन्देन सन्ध्यायां ॐ भूः पुनातु ', ' ॐ वाग् बाक् ' इत्यादयो मन्त्रा लिखिताः, तेऽपि वदभिमतासु संहितासु न सन्ति । शाखान्तराणां ब्राह्मणानां च वेदत्वम् यत्तु ( १०१५ ) ' स एवार्थ: ' इति दुर्गाचार्यवचनेन शाखान्तराणामवेदत्वसाधनम् ( पृ ० ३६ ), तदपि तुच्छम्, तदक्षरार्थानववोधात् । तत्र ' स एवार्थः, केवलशाखान्तरमभ्यत् ' एवं पाठो विद्यते । स्वाभीष्टसाधनायान्यथा पाठः परिकल्पितः । तत्र ' रुद्रो रौतीति सतो रोरूयमाणो द्रवतीति वा रोदयतेर्वा यदरुदत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वमिति काठकम् | यदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वमिति हारिद्रविकं तस्यैषा भवति ' इति निरुक्तवचनव्याख्यानप्रसङ्गे कठवचनं व्याख्याय वचनान्तरस्यापि स एवार्थ इत्युक्तवान् दुर्गाचार्यैः । शाखान्तरत्वमात्रं भेदः । एकशाखीय निर्वचनं प्रदर्श्य शाखान्तराणां श्रुति के प्रमाण पर परमेश्वर के अनन्त ज्ञान में अनन्त वेद विद्यमान हैं । इनमें से बुद्धिग्राह्य वेदों की संख्या किसी कल्प में १ ९९ ० तो किसी में कम है । पतञ्जलि के समय उपलब्ध वेदों की शाखाएँ ११३१ थीं । एक दूसरी बात भी है । उणादि प्रकरण में ' छन्दसीण: ' इस सूत्र का अर्थ लिखा गया है कि ' वेद में इण् धातु से उन् प्रत्यय होता है | यहाँ पर दयानन्द ने छन्दस् पद का अर्थ ' वेद ' किया है | २ | १ | १२३ संख्या के पाणिनि सूत्र से ' निष्टवर्य ' शब्द सिद्ध किया गया है । ' स्नाखी ' यह भी छान्दस शब्द है । वैदिक निघण्टु ग्रन्थ में आष्ठा ( दिक ), शोकी ( रात्रिः ), जातरूप, बलिशान ( मेघ ), कुरा ( ET ), स्वर्णी- स्वृतीक ( उदक ) इस तरह के अनेक शब्द दिये हैं । ये सब शब्द आर्यसमाजियों की अभिप्रेत चार वेद की पुस्तकों में नहीं मिलते । इसलिये अन्य संहिताओं और ब्राह्मण बादि अन्य ग्रन्थों में इनकी उपलब्धि से यह सिद्ध होता है कि ये सब वेद ही हैं । अन्यथा पाणिनि यास्क आदि के द्वारा प्रदर्शित इन वैदिक शब्दों को अपने अभिप्रेत वेद ग्रन्थों में आर्यसमाजियों को दिखाना चाहिये | स्वामी दयानन्द के सन्ध्या विधि के लिये ' ॐ भूः पुनातु ', ' ॐ वाक् वाक् ' इत्यादि मन्त्र लिखे हैं । ये मन्त्र भी आपकी अभिप्रेत संहिताओं में उपलब्ध नहीं हैं । अन्य शाखाओं और ब्राह्मणों का वेदत्व निरुक्त ( १०१५ ) की व्याख्या में स्थित दुर्गाचार्य के ' स एवार्थ: ' इस वचन से अन्य शाखाओं की वेदभिन्नता सिद्ध करना भी गलत है, जिज्ञासुनी ने वन अक्षरों का अर्थ ही ठीक से नहीं समझा है । वहाँ पर ' स एवार्थः । केवलशाखान्तरमन्यत् ' यह पाठ है | अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिये यहाँ पर अन्यथा पाठ गढ लिया गया है । निरुक्त में बताया गया है कि रुद्र शब्द की निष्पत्ति तीन प्रकार से होती है- ' क्योंकि वह वज्र के समान शब्द करता है, अथवा शब्द करता हुआ वह मेत्रों के बीच में दौड़ता है, अथवा वह शत्रुओं को रुला देना है । इस विषय में ब्राह्मण भी प्रमाण हैं । यहाँ पर ' यदरुदत् ' यह काठक का वचन हैं और ' यदरोदीत् ' यह eferfar का | इस निरुक्त वचन की व्याख्या के प्रसंग में कट के वचन को व्याख्या करके दुर्गाचार्य कहते हैं कि हारिद्रवक के aar का भी वही अर्थ है, केवल शाखा का भेद है । एक शाखा का निर्वचन बताने के बाद अन्य शाखाओं के निर्वचन उपेक्षणीय हैं,

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rate पारिजातः ७७७ निर्वचनान्युपेक्ष्याणि न पृथक् पृथक् सर्वशाखीयनिर्वचनानि प्रदर्शनीयानि, एकव्याख्यानेनैव गतार्थत्वात् इत्येव तदाशयः । शाखाग्रन्थानामेवावेदत्वं काठकशाखीयनिर्वचनस्यापि तथात्वापत्तिः, त्वद्रीत्या कठशाखाया अप्यवेदत्वात् । किञ्च, इह तु काठकशाखीयनिर्वचनं प्रदशितमेवेति कुतः काठकस्यावेदत्वमनेन सिद्धयति? तस्माद् यत्किञ्चिदेतत् । यत्तु - ' अनुवादे चरणानाम् ' ( पा ० सू ० २२४१३ ) इत्युद्धृत्य ' अनुवदते कठः कलापस्य ' अर्थात् कठः कलाप-प्रवचनस्यानुवादं करोति । एतेन कठादिशाखानामृषिप्रवक्तृकत्वं सिद्धयति ' ( पृ ० ३६ ) इति, तदपि कुशकाशाव-लम्वनम् त्वदभिमतशाकलीशौनक्यादीनामपि शाकल्यादिविशिष्टप्रवक्तृकत्वाविशेषात् । न केवलं विशिष्ट प्रवक्तृ-कत्वम्, अपरिगणिताध्यापक प्रवक्तृकत्वस्यापि सत्त्वात् । अध्यापनमेव प्रवचनं भवति । सर्वोऽपि वेदोऽध्यापक-प्रवक्तृक एव । अत एव ' आख्या प्रवचनात् ' ( जै ० सू ० १११1३० ) इति सूत्रेण जैमिनिना काठकादिसमाख्या प्रवचन-मूलिकेत्युक्तम् । काठकादीत्यत्रादिपदेन शाकल्यादिसमाख्यानामपि समर्थनम् । न च पदकारत्वेन शाकल्यनाम्ना तत्प्रसिद्धिः, शौनक्यादीनां तथात्वासंभवात् । यदि तत्रापि तन्मूलिका संभाव्या, तर्हि काठकादीनामपि तन्मूला समाख्या न दण्डवारिता । किञ्च प्रवचनमूलिका तु सा जैमिन्यादिसूत्रसिद्धा । पदकारत्वमूलिकायास्तु प्रमाणशून्याया-स्त्वत्कपोलकल्पितत्वात् कुतः प्रामाणिकता । तथात्वानङ्गीकारे वाल्मीकीयमित्यादिवत् शाकलीशौनक्यादीनां शाकल्यादिकर्तृकत्वापत्तेः । अत एव शौनक्यादयश्चतस्रः संहिता वेदाः, काठकादिसंहिताः शाखा इत्यर्धनास्तिकस्यैव मतम् | ' तेन व्याख्यातं तदध्यापितं वा प्रोक्तमिति ' ( पा ० सू ० ४१३११०१ ) इत्यत्र न्यासकारोऽपि कठादिभिरध्यापित त्वादेव काठकादिसमाख्याः समर्थयते, तेन तदुद्धरणं व्यर्थमेव । पृथक् पृथक सब शाखाओं के निर्वचनों को बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक की व्याख्या करने से अन्य निर्वचन उसी से व्याख्यात हो जाते हैं | दुर्गाचार्य का मात्र इतना ही आशय है । शाखा ग्रन्थों को यदि वेदभिन्न मान लिया जाय, तो काठक शाखा का निर्वचन भी तो वेदभिन्न हो जायगा, क्योंकि आपके मत से तो कठ शाखा की गिनती भी वेदों में नहीं होती । दूसरी बात, जब यहाँ प्रारूप में काठक शाखा का निर्वचन बताया गया है, तो फिर काठक शाखा की अवेदता कैसे सिद्ध होगी । अतः इस तरह की बातें व्यर्थ हो उठा दी जाती है । आगे ' अनुवादे वरणानाम् ' इस अष्टाध्यायी के सूत्र को उद्धृत करके ' अनुवदते कठः कलापस्य ' इस उदाहरण की व्याख्या की गई है कि कठ कलाप के प्रवचन का अनुवाद करता है और इससे सिद्ध किया गया है कि कट आदि शाखाओं के प्रवक्ता ऋषिगण है । यह भी नदी की बाढ़ में कुश - काश के तिनकों का सहारा लेने के बराबर है । आपने जिनको वेद माना है, उन शाकली, शौनकी आदि संहिताओं के साथ भी शाकल्य आदि का नाम प्रवचनकर्ता के रूप में जुड़ा है । न केवल किसी एक विशिष्ट प्रवक्ता का, किन्तु अनगिनत अध्यापक प्रवक्ताओं का उनसे संबन्ध है । अध्यापन ही तो यहाँ प्रवचन कहा जाता है । सारा वेद ही अध्यापक प्रवक्ताओं के द्वारा उपदिष्ट है । इसीलिये ' आख्या प्रवचनात् ' इस सूत्र में जैमिनि ने काठक आदि समाख्या का आधार प्रवचन को माना है । काठक आदि यहाँ पर दिये गये आदि पद से शाकल्य आदि नामों का भी समर्थन प्रवचन पद्धति के आधार पर ही होता है । इस संहिता के पदकार शाकल्य हैं, इसीलिये इनके नाम से इस संहिता का नाम पड़ गया, यदि आप ऐसा कहें तो यहीं युक्ति शौनकी के विषय में क्यों नहीं लागू होगी? यदि यहाँ पर आप कल्पना के सहारे कहते हैं कि शौनकी का पदपाठ शौनक ने किया होगा, तो फिर यही नियम काठक आदि के नाम के साथ भी तो लागू हो सकता है । एक बात और है, समाख्या प्रवचनमूलिका होती है, यह बात तो जैमिनि आदि के सूत्रों से सिद्ध है । पदकारमूलक समाख्या में तो कोई प्रमाण नहीं है, यह केवल आपकी कपोलकल्पना है । इसके कोई प्रमाण नहीं है । यदि आप ऐसा नहीं मानते तो वाल्मीकीय रामायण के समान शाकली, शौनकी आदि संहिताओं को इनकी रचना मानना पड़ जायगा । इसलिये शौनकी प्रभूति बार संहिताएँ वेद हैं और काठक प्रभूति शाखाएँ हैं, यह बात आधा नास्तिक ही कह सकता है | ४ | ३ | १०१ संख्या के पाणिनि सूत्र में न्यासकार ने कहा है कि ' उसने व्याख्या की अथवा उसने पढ़ाया ' इन दोनों ही अर्थों में ' तेन प्रोक्तम् ' यह ९ ८

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७७८ वेदार्थपारिजातः यत्तु ' ऋक्सामयोरेवाध्यभिषिच्यते ' ( का ० ३७१३ ), यजुर्भी रायस्पोषे समिषा मदेन ' ( का ० २1४ ), ' आशीर्वा अथर्वभिः ' ( का ० सं ० ५१४ ) इति चतुर्वेदस्योद्धरणात् काठकसंहिताया अवेदत्वं सिद्धयति ' ( पृ ० ३७ ) इति, तद्बुद्धिदौर्बल्यमेव तथात्वे त्वदभिमतवेदस्याप्यवेदत्वापत्तेः । ' तस्माद्यज्ञात् " ऋचः सामानि छन्दांसि तस्माद्यज: ' ( माध्यन्दिनीसं ० ), ' यस्मादृचो अपातक्षत् यजुर्यस्मादपाकषन् । सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखम् ॥ ' ( अथर्व सं ० १०/७/२० ) इति चतुर्वेदोद्धरणात्तेषामप्यवेदत्वापत्तिः स्यादेव । तत्र शाकल्यादिसंहितानां नामनिर्देशाभावेन तद्भिन्नानां वेदत्वावगमापातात् । यत्तु ' वामदेवस्यैव पञ्चदशं रक्षोघ्नं सामिधेन्यो भवन्ति । स वामदेव उख्यमग्निमविभक्तमवक्षत स एतन्मूलमपश्यत कृणुष्व पाजः प्रसिखी न पृथिवोमिति ' ( का ० १० ५ ) इत्यत्र यो वेदप्रतीकमुद्धृत्य तदृषि वर्णयति, स Fauna कथं वेदो भवितुमर्हतीति सामान्यबुद्धिरप्ययगच्छति ' ( पृ ० ३७ ) इति, तदप्यविचारितरमणीयम्, तथात्वे ऋ-संहिताया अप्यवेदत्वापत्तिः । यथा सूत्रानुकारि भाष्यं तद्व्याख्यानं च भाष्यमेव, तथैव मन्त्रास्तद्वयाख्यानांशं ब्राह्मणमपि वेद एव । ' रमध्वं मे वचसे सोम्याय ऋतावरी रुपमुहूर्तमेवः । प्र सिन्धुमच्छा बृहती मनीषा वस्युर कुशिकस्य सूनुः ॥ ' ( ऋ ० ३।३३।५ ) अत्र कुशिकसूतुर्विश्वामित्र वर्णितः । ' अकारि त इन्द्र गोतमेभिः ' ( ऋ ० ११६३।९ ) अत्र गोतमा ऋषयो वर्णिताः । ' कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना ' ( ऋ ० ९ ।११२ / २ ) अत्र ऋषिः स्वमेव मन्त्रसमूहरचयितारमाह । ' आभोगयं प्र यदिच्छन्त ऐतना पाकाः प्राञ्चो मम केचिदापयः । सौधन्वनासः ' ( ऋ ० ११११०१२ ) इह सौधन्वना व्यक्तिविशेषा वर्णिताः । अत्र मध्ये वक्त्रा कुत्सेन ऋभुदेवता मम पूर्वजा इत्युक्तम् । ' अग्निः पूर्वेभिः ऋषिभिरीड्य उत नूतनंस्त ' इत्यादिमन्त्रेषु प्राचीना नवीनाश्च ऋषयो वर्णिताः । कथमेतेऽपौरुषेया ईश्वरकृता:? ' अद्या मुरीय यदि यातुधानो s स्मि ' ( ऋ ० ७ १०४/१५ ), ' सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत् ' ( ऋ ० १० / ९ ५ / १४ ) इत्यादिशपथाभिशापादिबोधका सूत्र प्रवृत्त होता है । इस प्रकार न्यासकार कठ यादि के द्वारा पढ़ाई जाने के कारण काठक आदि समाख्या का समर्थन करते हैं । अतः इस प्रसंग में न्यासकार को उद्धृत करना भी व्यर्थ ही है । ' ऋक्सामयोः, यजुर्भी ०, अथर्वभिः ' इस प्रकार चारों वेदों का उद्धरण होने से काठक संहिता इन वेदों से भिन्न सिद्ध होती है ' यह उक्ति भी वक्ता की बुद्धि की दुर्बलता की सूचक है । ऐसा मानने पर आपने जिनको वेद भान रखा है, वे भी वेद नहीं रह जायेंगे । ' तस्माद्यज्ञात् ' इस यजुर्वेद के मन्त्र में तथा ' यस्मादृचो ' इत्यादि अथर्थवेद के सत्र में भी चारों वेद उद्धृत हैं, अतः उक्त कथन के अनुसार ये भी वेद नहीं रह जायेंगे । यहाँ पर यह भी आपत्ति होगी कि इनमें शाकल्य आदि संहिताओं के नाम का निर्देश न होने से इनसे भिन्न संहिताओं को ही वेद मान लिया जायगा । ' वामदेवस्यैव पञ्चदशं. ' इस प्रकार वेद के प्रतीक को उद्धृत कर जो वामदेव ऋषि का वर्णन भी करता है, वह स्वयं वेद किस प्रकार हो सकता है, यह बात सामान्य बुद्धि के व्यक्ति की भी समझ में आ सकती है ' यह कथन भी तभी तक अच्छा लगता है, जब तक कि इस पर विचार नहीं किया जाता, क्योंकि ऐसा मान लेने पर ऋग्वेद की संहिता भी वेद नहीं रह जायगी । यहाँ पर इस सिद्धान्त को समझ लेना चाहिये कि जैसे किसी भाष्य का सूत्रसदृश क्षिप्त वाक्य और फिर विस्तार के साथ की गई व्याख्या दोनों भाष्य ही माने जाते हैं, उसी तरह मन्त्र और उनकी व्याख्या करने वाले ब्राह्मणवाक्य भी वेद ही हैं । ऋग्वेद के ' रमध्वं मे वचसे ' इत्यादि मन्त्र में कुशिक के पुत्र विश्वामित्र का वर्णन है, ' अकारि व इन्द्र ' इस ऋचा में गोतम ऋषि वर्णित हैं, ' arent ' इत्यादि मन्त्र में ऋषि स्वयं अपने को मन्त्रसमूह का कर्ता बताता है, ' आभोगयं प्र यदिच्छन्त यहाँ पर सौधन्वन नाम के व्यक्तिविशेष वर्णित है, इस मन्त्र में वक्ता कुत्स ने कहा है कि ऋभु देवता मेरे पूर्वज थे, ' अग्निः पूर्वेभि: ' इत्यादि स्थलों पर प्राचीन और नवीन ऋषियों का वर्णन किया गया है । ये मन्त्र अपौरुषेय और ईश्वरकृत कैसे हो सकते हैं? इसी तरह ' अद्या मुरीय ', ' सुदेवो अद्य ' इत्यादि शपथ और शाप आदि के बोधक सन्त्र वेद कैसे हो सकते हैं? इन सबके विषय में एक समान आपत्ति उठती

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वेदार्थपारिजातः ७७६ मन्त्राः कथं वेदा भवितुमर्हन्तीति समानमेव । व्याख्यानविशेषेणापौरुषेयत्वसमर्थनं तु काठकादिवचनेष्वपि समानमेव | यदि यमयमीसंवादस्योर्वशीपुरूरवः संवादस्यापि वर्णनमपौरुषेयेऽनादौ वेदे संभवति, तहि वेदस्य वर्णनसृषेश्च वर्णनं कथं न संभवति । तेन प्रोक्तमित्यपि तु पिष्टपेषणमेव । ' होता यो विश्ववेदसं ' ( पृ ० ३ ९ ) इत्यंशस्यापि समाधानं जातमेव । यत्तु ' वेदस्यापौरुषेयत्वेन स्वतः प्रामाण्ये सिद्धे तच्छाखानामपि तद्धेतुत्वात् प्रामाण्यमिति बादरायणादिभिः प्रतिपादितमित्यनेन हरिस्वामिवचनेन वेदशास्त्रयोर्भेदसिद्धिर्वेदस्य प्रामाण्यस्वतस्त्वं शाखानी तु तद्धेतुत्वा-प्रामाण्यमिति ' ( पृ ० ३ ९ ), तदपि बुद्धिदौर्बल्यम्, भावानवबोधात् । यथा सूत्रसमूहात्मकस्य पटस्य कार्पासिकत्वे सिद्धे तद्धेतुत्वात् सूत्राणामपि कार्पासिकत्वं सिद्ध्यति, तथैव एकत्रिंशदुत्तरेकादशशतशाखात्मकस्य वेदस्य सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्य्यमाणकर्तृकत्वेन वेदे सिद्धे शाखानामपि तद्धेतुत्वात् प्रामाण्यम्, बादरायणजे मिन्यादिभिराचार्य्यस्तथैव प्रतिपादितत्वात् । किञ्च महाभाष्यकारश्चत्वारो वेदाः साङ्गाः सरहस्या बहुधा भिताः । एकशतमध्वय्यैशाखाः, सहस्रवर्मा सामवेदः, एकविंशतिधा बाह्रच्यम्, नवधाऽथर्वणो वेद इति वर्णयन् चत्वारो वेदा बहुधा भिन्ना इत्युक्त्वा वेदभेदानेव व्याचष्टे --- एकशतमध्वर्युशाखा इत्यादिना । एकत्रिंशदुत्तरेकादशशतशाखासु तेन निशितास्व भवदीयवेदत्वेनाभिमताः शाकली - कौथुमी - माध्यन्दिनी - शौनकी संहिता अपि । तासां वेदत्वे कथं नान्यासां वेदवम्? शाखात्वाविशेषेऽपि कथमासां वेदत्वम्? शाखाभ्यो वेदानामन्यत्वे तत्स्वरूपादिकमप्यवश्यं निर्दिशेत् । त्वदभिमतानां चतसृणां संहितानामेव वेदत्वं एतासां वेदत्वमुक्त्वा सप्तविंशत्युत्तरैकादशशतसंख्याका एवं शाखा निर्दिशेत् । तथा च एकोनशतमध्वर्युशाखाः सहस्रवर्त्म साम, forfaar ' बाच्यम्, अष्टघाऽथर्वण इत्येव वदेत्, तेन महाभाष्याभिमताः है । इनकी विशेष प्रकार की व्याख्या के आधार पर अपौरुषेयता का समर्थन करना है, तो वह काठक आदि के विषय में भी उसी प्रकार लागू हो सकेगी । यदि यम यमी संवाद और उर्वशी पुरूरवा का संवाद अपौरुषेय, अनादि वेद में हो सकता है, तो फिर उसमें वेद और ऋषि का वर्णन मिलता है, तो क्या आश्चर्य है? ' तेन प्रोक्तम् ' इत्यादि का प्रमाण देना पिष्टपेषण मात्र है । होता यो विश्व वेदसम् ' इसका भी उत्तर दिया जा चुका है । ' वेद के पेय होने से उनकी स्वतः प्रामाणिकता सिद्ध हो जाती है । उनकी शाखाओं का भी उन्हीं के आधार पर विस्तार होने से बादरायण प्रभृति ने प्रामाणिकता मानी हैं, हरिस्वामी के इस वचन के आधार पर वेद और शाखानों का भेद fea होता है । इससे यह भी मालूम होता है कि वेद स्वत: प्रमाण हैं और शाखाओं का प्रामाण्य वेदों के अधीन है ' यह उक्ति भी बुद्धि की दुर्बलता को ही सूचित करती है । वक्ता ने इसका भाव नहीं समझा है । जैसे धागों के ढेर से बना कपड़ा रुई से बना है, यह सिद्ध हो जाने पर ये भागे भी रुई से ही बने है, यह मालूम हो जाता है, उसी तरह ११३१ शाखा वाले वेद के सम्प्रदाय के विच्छेद के न होने पर इसका कोई कर्ता नहीं सुना गया, इस आधार पर इन सबकी वेदता सिद्ध हो जाने पर शाखाओं का भी प्रामाण्य उसी आधार पर माना जायगा । बादरायण, जैमिनि बादि श्राचायों का भी यही कहना है । महाभाष्यकार ने भी ' अङ्गों और रहस्यों सहित चार वेद अनेकधा विभक्त होते हैं ऐसा कह कर यजुर्वेद की १०१, सामवेद की १००० ऋग्वेद की २१ और अथर्ववेद की ९ शाखाएँ होती है इत्यादि ग्रन्थ से इन भेदों का ही वर्णन किया है । इनके द्वारा बताई गई ११३१ शाखाओं में ह्रीं शाकली, कोथुमी, माध्यन्दिनो और शौनकी संहिताएँ भी हैं, जिनको कि आप वेद मानते हैं । ये यदि वेद हैं तो दूसरी शाखाएं वेद क्यों नहीं होंगी? ये सभी शाखाएं हैं तो फिर केवल चार ही वेद कैसे कहलायेगी? शाखाओं से वेद यदि भिन्न हैं, तो उनका लक्षण बताना पड़ेगा । आप जिन चार संहिताओं को वेद मानते हैं, वे ही यदि सचमुच वेद हैं, तो फिर महाभाष्यकार पहले वेद के चार भेद करके बाद में ११२७ शाखाओं को बताते | ऐसी अवस्था में यजुर्वेद की १००, सामवेद की ९९९, ऋग्वेद की २० और अथर्ववेद की ८ शाखाएँ बताते । ऐसा न करने से प्रतीत होता है कि महाभाष्यकार शाखासमूह

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 810 का मूल पृष्ठ
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७८० वेदार्थपारिजातः शाखासमूहरूपा एव चत्वारो वेदाः । यथा पञ्चगौड - पन्चद्रविडादितत्तच्छाखासमूहा एव ब्राह्मणा न ताभ्योऽतिरि च्यन्ते, यथा वा धवखदिरादिभ्यो न वनमतिरिच्यते, तथैव शाखाभ्यो नातिरिच्यन्ते वेदा अपि । यत्तु - ' ऋग्यजुःसामाथर्वाणश्चत्वारो वेदाः साङ्गाः सशाखाश्चत्वारः पादा भवन्ति ' ( नृसिंहपूर्वतापनी ) ' एतद् बृहज्जावालमधीते स ऋचोऽधीते स यजूंष्यधीते स सामान्यधीते सोऽथर्वाणमधीते सोऽङ्गिरसमधीते स शाखा अधीते स कल्पानधीते ' ( बृहज्जाबालोपनिषद् ) इत्यत्र ऋगादिवेदेभ्यः पृथक्शाखा निर्देशात् शाखानामवेदत्वं स्वत एव सिद्धयति ' ( पृ ० ४० ) इति तत्तात्पर्याज्ञानविजृम्भितम्, यत ऋगादिपदेः स्वशाखासम्बन्धिनावदादीनां ग्रहणं शाखापदेन तदतिरिक्तशाखानां ग्रहणम् । नृसिंहतापनीयानुसारेण स्वशाखीयाः परशाखीयाश्च ऋगादयश्चत्वारः पादा भवन्ति । नन्वत्र किं मानमिति चेत्, स्वाध्यायोऽध्येतव्य इति श्रुतिगतस्वशब्दस्यैव तत्र प्रमाणत्वात् । अधीयत इत्यध्यायो वेद:, स्वस्याध्यायः स्वाध्यायः, स्वशाखीयो वेदः स्वाध्यायपदवाच्यार्थः । स्वशाखोपलक्षितः सर्वोऽपि वेदराशिस्तेनैव fafensured स्वशाखाध्ययनानन्तरम् । पूर्वं स्वशाखासम्बन्धित ऋक्सामयजुरथवंशाखा अध्यध्येतव्याः, तदनन्तरमन्या अपि शाखा अध्येतव्याः । स्वशाखाध्ययनमन्तराऽन्यशाखाध्ययनेन तु वैदिकेषु शाखारण्डसंज्ञा भवति । पारम्पय्र्येण ब्राह्मणादीनां नियताः शाखाः सन्ति । स्वशाखीयेष्वेवात्विज्यादिकं भवति । परम्पराशून्यास्तु सामाजिकास्तदभावादेव भ्राम्यन्ति । बृहज्जाबालाध्ययनेन तु स्वशाखाध्ययनफलं भवत्यन्यशाखाध्ययनफलं च भवतीत्यर्थः । ऋगादिमन्त्राणा-मन्यशाखास्वपि सत्त्वात् सर्वासामेवर्गादिवेदत्वमव्याहतमेव । यत्तु -- ' पाठभेदेनापूर्व प्रवचनाद्वेद: शाखारूपं धारयति । मूलग्रन्थेषु परिवर्तनमन्तरा पदपाठकरणाद्वा शाख व्यवहारो भवति । प्रथमनियमस्योदाहरणं तैत्तिरीयकाण्वादयः, द्वितीयस्योदाहरणं शाकली संहिता | पदपाठ-रूप ही चार वेद मानते हैं । जैसे पञ्च गौड़, पञ्च द्रविड़ आदि में अवान्तर शाखा में विभक्त होते हुए भी ब्राह्मण जाति इनसे भिन्न नहीं है, अथवा जैसे धव, खदिर आदि वृक्षों के समूह से भिन्न वन नहीं हैं, उसी तरह वेद भी शाखाओं से भिन्न नहीं है, यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिये । इसी तरह ' ऋक्, यजुः साम और अथर्व ये चारों वेद अंग और शाखाओं के साथ चार पाद होते हैं ' इस नृसिंह-पूर्वतापनी के वाक्य से तथा ' जो इस बृहज्जाबाल को पढ़ता है, वह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को पढ़ लेता है, वह शाखाओं और कल्पों को पढ़ लेता है इस बृहज्जाबाल उपनिषद् के वाक्य से स्पष्ट होता है कि ऋगादि वेदों से शाखाएं भिन्न हैं, इस प्रकार शाखाओं की वेद से भिन्नता स्वतः सिद्ध हो जाती है ' इस कथन से यह प्रतीत होता है । वक्ता को इसका तात्पर्य ठीक से नहीं अवगत हुआ है, ऋगादि पद से अपनी शाखा से संबद्ध ग्रन्थ का ही ग्रहण होता है और शाखा पद से इससे भिन्न शाखाओं का । नृसिंहतापनीय उपनिषद् के अनुसार अपनी और उससे भिन्न अन्य सभी शाखाओं के ऋगादि वेद चार पाद के होते हैं, इसमें क्या प्रमाण हैं? ' स्वाध्यायो s ध्येतव्य: ' इस वाक्य में स्थित ' स्व ' शब्द ही इसमें प्रमाण है । जो पढ़ा जाता है, वह अध्याय अर्थात् वेद है, अपने अध्याय को स्वाध्याय, अर्थात् अपनी शाखा का वेद स्वाध्याव पद का वाच्य अर्थ होता है । अपनी अपनी शाखा के रूप में पढ़ा जाने वाला सारा वेद शाखा समुदाय इस विधि से पढ़ा जाता है । इसका यह अभिप्राय है कि व्यक्ति को अपनी शाखा का अध्ययन करने के बाद अपनी शाखा से संबद्ध ऋक्, साम, यजु और अथर्व की शाखाओं का अध्ययन करना चाहिये और उसके बाद अन्य शाखाओं का भी । अपनी शाला के अध्ययन के बिना अन्य शाखाओं के अध्ययन करने पर उस व्यक्ति की ' शाखारण्ड ' संज्ञा हो जाती है । परम्परा से ब्राह्मणादि की नियत शाखाएँ हैं । अपनी शाखा में ही ऋत्विक आदि का वरण किया जाता है । आर्यसमाजियों में इस प्रकार की परम्परा के न होने से ही वे भ्रम में पड़ जाते हैं । बृहज्जाबाल श्रुति के अध्ययन से अपनी शाखा के अध्ययन का फल तो मिलता ही है, अन्य शाखाओं के अध्ययन का फल भी प्राप्त होता है, यही उसका तात्पर्य है । ऋगादि eat at ra स्थिति अन्य शाखाओं में भी है, अतः इन सभी शाखाओं को ऋगादि वेद के नाम से बिना बाधा के पुकारा जा सकता है । यह कहना कि ' पाठों के भेद से विलक्षण प्रवचन होने के कारण वेद arar रूप में परिणत हो जाते हैं, अथवा मूल ग्रन्थ में बिना परिवर्तन किये पदपाठ आदि के कारण भी शाखाएँ बन जाती है । यहाँ पर पहले नियम का उदाहरण तैतिरीय,