वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 81–90

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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वेदार्थपारिजातः ५१ मगच्छति ॥ ' ( चो. सू. वा. ६८ ) । तदुक्तं जैमिनिना-- ' तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् ' ( ' सी ० सू ० १1१14 ) | ' गिरां मिथ्यात्वहेतुनां गुणानां पुरुषाश्रयात् । अपौरुषेयं सत्यार्थमित्ययुक्तं तु मन्वते ॥ इति, ' नहि पुरुषगुणानो सत्यतासाधनत्वं वचसि खलु निसर्गादेव सत्यत्वसिद्धिः । गुणमपि नरवाचां विप्लवाधायि दोषप्रशमनचरितार्थं सङ्गिरन्ते गुणज्ञाः ' इति च । यदुक्तं - दृष्टार्थेषु प्रमाणेषु प्रामाण्यनिश्चयमन्तरेणैव व्यवहारः सिद्धयति । तत्र प्रामाण्यस्वत्तस्त्वपरतस्त्वविचारो व्यर्थ एवेति । बहुद्रव्यश्रमादिसाध्येषु कर्मसु वेदप्रामाण्यनिर्णयमन्तरा प्रेक्षावतां प्रवर्तनमनुचितमिति तदेव विचारणीयमिति तन्न, दृष्टार्थेषु प्रत्यक्षादिष्वप्याञ्जस्येन व्यवहारसिद्ध्यर्थं तद्विचारस्यावश्यकत्वात् । यदुक्तम् — स्वतः प्रामाण्यमित्यस्य कोऽर्थः? कि स्वत एव प्रमाणस्य प्रामाण्यं भवति, उत स्वयमेव तत्प्रमाणमात्मनः प्रामाण्यं गृह्णातीति । न तावत् स्वयमेव प्रामाण्यग्रहणमुपपद्यते, अप्रामाणिकत्वात् । तथाहि --- यदेतन्नीलप्रकाशने प्रवृत्तं प्रत्यक्षं तन्नीलं प्रति प्रत्यक्षं प्रमाणम्, इन्द्रियार्थसन्निकर्पोत्पन्नत्वात् । प्रामाण्यपरिच्छेदे तु किं तत्प्रमाणम् -- प्रत्यक्षमनुमानं वा? प्रमाणान्तराणामनाशङ्कनीयत्वात् । स्वप्रामाण्यपरिच्छेदे तत्प्रत्यक्षं प्रमाणं तद्विज्ञानस्य वा प्रामाण्यं गृह्णीयात्, तत्फलस्य वा? तत्र ज्ञातृव्यापारात्मनो ज्ञानस्य भवन्मते नित्यपरोक्षत्वात् प्रत्यक्षतः परिच्छेदानुपपत्तौ तत्प्रामाण्यस्यापि कथं प्रत्यक्षेण ग्रहणम्? फलस्याप्यर्थ प्रकाशनाख्यस्य संवेदनात्मनो नेन्द्रियसंसर्गयोग्यता विद्यते येन तद्गतमपि यथार्थत्व-लक्षणं प्रामाण्यमिन्द्रियव्यापारलब्धजन्मना प्रत्यक्षेण परिच्छिद्येत । न च मानसमपि प्रत्यक्षं फलगतयथार्थत्वनिर्णयक्षमम्, तदानीमनुभूयमानत्वात् । नहि नीलसंवित्प्रसवसमनन्तरं यथार्थेयं नीलसंवित्तिरिति संविदन्तरमुत्पद्यमानमनुभूयते । अनुभवे प्रयुक्त अप्रामाण्य का परिहार बड़ी सरलता से हो जाता है, मतः यहाँ पर अप्रामाण्य की शंका का प्रसंग ही नहीं उठता । " जैमिनि ने भी कहा है कि " वेद का निरपेक्ष प्रामाण्य बादरायण को भी अभिप्रेत है । " " पुरुषाश्रित गुण - दोष के कारण वाणी में मिथ्यात्व आदि का आरोप हो सकता है, अतः अपौरुषेय वाक्य ही सत्य है, इस कथन को गुणज्ञ लोग अयुक्त मानते हैं, क्योंकि पुरुषगत गुण वाणी की सत्यता को सिद्ध करते हों, ऐसी बात नहीं है । वाणी में स्वाभाविक रूप से सत्यता की सिद्धि होती है । बोलने वाले मनुष्य का गुण वाणी में सम्भावित दोष की शान्ति में चरितार्थ माना जाता है, जो कि उसमें व्यवधान पैदा कर सकता हो ' । यह जो कहा गया है कि --- " इष्ट प्रयोजन वाले प्रमाणों में प्रामाण्य के निश्चय के बिना ही व्यवहार चलता है । यहाँ पर प्रामाण्य के स्वतस्त्व और परतस्त्व का विचार व्यर्थ है । भारी धन और श्रम की लागत पर सिद्ध होने वाले यज्ञ - याग आदि में वेद की प्रामाणिकता के निर्णय के बिना समझदार व्यक्ति की प्रवृत्ति नहीं होगी, अतः बदृष्ट प्रयोजन के प्रामाण्य का ही विचार होना चाहिये । " यह ठीक नहीं है, क्योंकि लौकिक दृष्टि से प्रयुक्त होने वाले प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों में भी सरलता से व्यवहार की सिद्धि के लिये प्रामाण्य के विचार की आवश्यकता हो जाती है । " स्वतः प्रामाण्य, इसका क्या अर्थ है? स्वतः ही प्रमाण का प्रामाण्य होता है, या वह प्रमाण स्वयं ही अपने प्रामाण्य को ग्रहण करता है? यदि दूसरा पक्ष कहें तो वह ठीक नहीं होगा, क्योंकि प्रमाण के द्वारा प्रामाण्य का स्वतः ग्रहण सम्भव नहीं है | यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि जैसे नील के प्रकाशन में प्रवृत्त प्रत्यक्ष उस नील के प्रति प्रत्यक्ष प्रमाण है, क्योंकि वह इन्द्रिय ( नेत्र ) और अ ] ( नील ) के संनिकर्ष ( सम्बन्ध ) के कारण उत्पन्न हुआ है । किन्तु प्रामाण्य के निश्चय में प्रवृत्त वह प्रमाण प्रत्यक्ष होगा या अनुमान? तीसरा प्रमाण तो हो ही नहीं सकता । यदि प्रत्यक्ष कहें तो यह ठीक नहीं, क्योंकि अपने प्रामाण्य का निश्चय कराने में वह serer प्रमाण अपने विज्ञान के प्रामाण्य का ग्रहण करेगा? अथवा उसके फल का? इनमें ज्ञाता के व्यापार से परिचित होने वाला ate as an a free परोक्ष है, aar प्रत्यक्ष से उसके प्रामाण्य का भी ग्रहण नहीं होगा । ज्ञान का फल अर्थप्रकाशन कहलाता है, यह भी संवेदनात्मक है, इसकी इन्द्रिय के साथ संसर्ग ( सम्बन्ध ) की योग्यता नहीं बन सकती । अतः संवेदनगत यथार्थतास्वरूप प्रामाण्य का ग्रहण इन्द्रियों के व्यापार से उत्पन्न प्रत्यक्ष द्वारा कैसे गृहीत हो सकता है? मानस प्रत्यक्ष भी फलगत यथार्थता के निर्णय में समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि उस समय उसका अनुभव नहीं होता । एक नील संवित्ति ( ज्ञान ) के उत्पन्न होने के बाद यह संवित्ति ( ज्ञान ) यथार्थ है, इसका बोध कराने वाली कोई दूसरी संवित्ति उत्पत्ति होती हुई नहीं देखी जाती । यदि अनुभूत होती भी हो, तो

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*** वेदार्थपारिजातः वा ततो द्वितीयात् प्रथमोत्पन्ननीलज्ञानयाथार्थ्यग्रहणात्र स्वतः प्रामाण्यनिश्चयः । तस्मान प्रत्यक्षस्यैव विषयः । अनुमानेनापि ज्ञानस्य फलस्य वा तन्निश्श्रेयम्? फलस्य तथात्वसाधने न कस्यचिलिङ्गत्वमवगम्यते । ज्ञातृव्यापारात्मनो ज्ञानस्य तु स्वकार्यं फलं भवेदपि लिङ्गम्, फलस्य क्रियामात्रव्याप्तिग्रहणात् स्वरूपसत्तामात्रमनुमापयितुमुत्सहते न यथार्थत्वरूपं प्रामाण्यम् । तद्धि फलं निर्विशेषणं वा स्वकारणस्य ज्ञातृव्यापारस्य प्रामाण्यमनुमापयेत्, यथार्थविशिष्टं वा? नाद्यः यतः कुतश्चित्फलात् तत्प्रामाण्यानुमाने सर्वस्यैव प्रामाण्यापत्तेः । नान्त्योऽपि, फलगतयाथार्थ्य परिच्छेदोपायाभावस्योक्तत्वात् । ननु सोऽनुभव एवोपायः तद्धि नीलसंवेदनतया फलं स्वत एवं प्रकाशते, नीलसंवेदनत्वमेव चास्य यथार्थत्वं नान्यत् । यद्येवं शुक्तिकायामपि रजतसंवेदने समानो न्यायः, नहि रजतसंवेदनादन्या यथार्थत्वसम्पत्तिरिति, तन्न युक्त, दत्तोत्तरत्वात् । विज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति तदतिरिताहेत्वजन्यत्वरूपस्य प्रामाण्यस्वतस्त्वस्योकत्वेन विकल्पजालस्यानव-काशपराहृतत्वात् । तथा च कार्यकारणादेव कार्येण सहोत्पत्तिरेव प्रामाण्यस्वत्तस्त्वमित्युक्तमेव । एवं न दाहशक्तेरुत्पादाय साधनान्तरमपेक्ष्यते । तथाभूतार्थावधारकशक्तेरेव प्रामाण्यमित्यप्युक्तम् । अर्थतथात्वं वा प्रामाण्यम् । तस्य चार्थग्राहकग्राह्यत्व-सुपपद्यत एव । शुक्तिरजतादीनां तु बाधकप्रत्ययोपनिपातेन स्फुटं प्रामाण्यापनोदनम् । बाधाद्यभावे तु नाप्रामाण्यशङ्के-त्यक्तमेव | न चैवं बाधकाभावज्ञानाधीनं प्रामाण्यमूरीकृतमिति वाच्यम्, विज्ञानसामग्रीमात्रात्तदुत्पत्तिसम्भवेन दोषाभावस्य प्रथम संवित्ति की यथार्थता का ग्रहण द्वितीय संवित्ति से होने पर स्वतः प्रामाण्य का निश्चय कहाँ हुआ? अनुमान से भी ज्ञान के प्रामाण्य का farer fo या जायगा या फल का? फल के प्रामाण्य का निश्चय करने के लिए तो कोई हेतु नहीं | ज्ञाता के व्यापाररूप ज्ञान का कार्य हैफल, वह हेतु सकता है । किन्तु फल तो केवल क्रिया के साथ ही अपनी व्याप्ति रखता है, अतः वह केवल अपनी स्वरूपसत्ता को बता सकता है, यथार्थतारूप प्रामाण्य को नहीं । वह फल विशेषणरहित अपने कारण ज्ञाता के व्यापाररूप केवल ज्ञान का प्रामाण्य अनुमान से बनावेगा? अथवा यथार्थ विशेषण से युक्त ज्ञान का? यहाँ पर पहला पक्ष इसलिये नहीं बन पावेगा कि कहीं पर मी फल से उसके प्रामाण्य का निश्चय होने पर सब ज्ञानों में प्रामाण्य अवगत हो जायगा । दूसरा पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि यह कहा जा चुका हैं कि फलगत यथार्थता का परिच्छेदक उपाय कोई नहीं बन पाता । यह कहना कि अनुभव से ही प्रामाण्य का ग्रहण हो जायगा, क्योंकि नील - ज्ञान का फल स्वतः ही प्रकाशित होता है | नील संवेदना हो ज्ञान को यथार्थता है, दूसरी नहीं । ऐसा मानने पर तो शुक्तिका में रजत का ज्ञान भी यथार्थ माना जाने लगेगा, क्योंकि रजत के संवेदन के अतिरिक्त कोई यथार्थता नहीं है, किन्तु यह कहना इसलिये ठीक नहीं है कि इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है | प्रामाण्य का स्वतस्त्व विज्ञान की सामग्री से जन्य होते हुए भी उसके अतिरिक्त हेतु से जन्य नहीं होता, यह कहा जा चुका है । अत: आपके antarat क विकल्पों की प्रवृत्ति के लिये यहाँ कोई अवसर नहीं है । इसीलिये कार्यरूप ज्ञान के कारणों ( साधनों ) से ही कार्य अर्थात् ज्ञान के साथ ही ज्ञान के सामान्य की भी उत्पत्ति हो जाना ही ज्ञान के प्रामाण्य का स्वत्तरुत्व है । इसीलिये अग्नि में दाह शक्ति की उत्पत्ति के लिये अति से भिन्न किसी साधन की अपेक्षा नहीं रहती । इसलिये अर्थनिश्चायक शक्ति ही प्रामाण्य है, यह भी बताया जा चुका है । अथवा वर्धतत्व को प्रामाण्य कहा जाता है । इस अर्थतथात्व ( वस्तु की सच्चाई ) की अर्थग्राहक से ग्राह्यता है ही । अर्थात् जिस वस्तु का ज्ञान होता है, उस वस्तु की सच्चाई का ज्ञान भी उनके साधनों से ही हो जाता है । यही बात युक्तियुक्त भी है । शुक्ति में जो रजत का ज्ञान होता है, उस ज्ञान में भी ज्ञान की सामग्री के बाधक ज्ञान के साथ हो उसकी सचाई भी स्वाभाविक रूप से थाही जाती है | किन्तु बाद में उत्पन्न होने वाला बाधक ज्ञान पहले ज्ञान की सचाई को निवृत्त कर देता है | यदि बाधक ज्ञान या दोष ज्ञान आदि न हों तो पहले ज्ञान की सचाई में कमी शंका ही न होगी । इसको स्पष्ट रूप से बताया जा चुका है । इस तरह से तो बाप के अभाव ज्ञान के अधीत प्रामाण्य मान ही लिया गया, अतः वह परतः हो गया, यह कथन भी उचित नहीं है, क्योंकि केवल विज्ञान की सामग्री से ही उसकी उत्पत्ति हो सकती है, अतः दोषाभाव अथवा गुण को उसमें कारण मानना उचित नहीं है । विज्ञान की सामग्री से ही प्रमा की उत्पत्ति हो सकती हो तो उसमें गुण और दोषाभाव की कारणता की कल्पना नहीं करनी चाहिये,

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वेदार्थपारिजातः गुणस्य वा तदहेतुत्वात् । विज्ञानसामग्रीमात्रात् प्रमोत्पत्तिसम्भवे गुणस्य दोषाभावस्य वा न तत्र हेतुत्वं कल्पनीयम्, गौरवात् । न च दोषस्याप्रमाहेतुत्वे तदभावस्य प्रमाहेतुत्वमन्वयव्यतिरेकसिद्धमिति वाच्यम्, विरोध्यप्रमाप्रतिबन्धकत्वेन तयोरन्यथा-सिद्धत्वात् । तदुक्तमेव गुणेभ्यो दोषाणामभाव एव जायते, न तु प्रामाण्योत्पत्तिः । दोषाभावाच्च न प्रामाण्योत्पत्तिः, किन्तु मिथ्यात्वसंशयत्वलक्षणस्याप्रामाण्यद्वयस्य निवृत्तिरेव जायते । किञ्च बाधकाभावो न प्रामाण्यहेतुत्वं प्रतिपद्यते, तात्कालिक -कूटकार्षापणादौ व्यभिचारात् । सर्वथा तदभावस्यासर्वज्ञागोचरत्वाच्च । यदुक्तम् - यदि प्रसवसमय एव ज्ञानस्य प्रामाण्यं निश्चिनुयाम, तर्हि प्रवर्तमाना न कचिदपि विप्रलभ्येमहि । विप्रलभ्यामहे तु तेन मन्यामहे न निश्चितं तत्प्रामाण्यम् । संशयादेव व्यवहराम इति, तदपि न, स्वरूपस्थितहेतुजाया: संविदः प्रामाण्यस्वतस्त्वे दोषाभावात् । दोषाधिकैः प्रमाणे-जनिताया: संविदस्त्वप्रामाण्यादेव विप्रलम्भस्तदप्रामाण्यनिश्वयस्तु परत एव । न च संशयात् प्रवृत्तिः, ततो निवृत्तेरेव सम्भ-वात् । शुक्तिरजतप्रतीतावपि निश्चिन्वन्त एव लौकिकाः प्रवर्तन्ते । नाननुभूयमानोऽपि संशयारोप उचितः । यदुक्तम् ----एकतरग्राह्यप्रत्ययस्तन्निश्चयोपायविरहात् संशयकोटिपतित एव बलाद् भवति यथास्ति कूपे जलमिति भिक्षवो मन्यन्ते । एवं रजतमिदमित्येक पक्षग्राह्यमपि । तदानीं प्रतिभासो वस्तुवृत्तेन संशय एव । यदि प्रमाणतयाऽसौ गृह्येत कथं कचिद्विसंवदेत्? अप्रमाणतया तु गृह्यमाणः कथं प्रवर्तयेत्? तदुक्तम्- - ' उभाभ्यामपि रूपाभ्यामथ तस्यानुपग्रहः । सोऽयं संशय एव स्यादिति किं नः प्रकुप्यसि ॥ ' इति, तदपि तुच्छम् परिच्छित्तेरेव प्रमाणकार्यस्योक्तत्वेन बाधकारणदोषप्रत्ययमन्तरा सन्देहदुषित-तनोस्तस्या उपलम्भाभावेन च तत्र संशयादिकल्पनाया निर्बीजत्वात् । उभयकोटिकस्य प्रत्ययस्य संशीतिपदास्पदत्वेन तदभावे तदनुपपत्तेः । सन्देहदूषितत्वानुपलव्ध्या प्रामाण्यमेव तस्या औत्सर्गिकम् । तत एवार्थपरिच्छेदात् प्रवर्तमानः प्रमाता प्रमाणेनैव क्योंकि ऐसा करने में गौरव होगा । यह कथन भी अनुचित है कि दोष के अप्रभा में हेतु होने पर दोषाभाव की प्रमा - हेतुता अन्वयव्यतिरेक से सिद्ध है, क्योंकि गुण और दोषाभाव विरोधी अप्रमा के प्रतिबन्धक हैं | इसलिये प्रामाण्य की उत्पत्ति में अन्यथा सिद्ध हैं । इस उद्धरण में यही बातकही गई है - " ' गुणों से दोषों का अभाव हो प्रतीत होता है, प्रामाण्य की उत्पत्ति नहीं होती । इसी तरह दोषों के अभाव से भी प्रामाण्य की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु मिथ्यात्व और संशयत्व रूप से अप्रामाण्य की निवृत्ति ही होती है । अपि व, बाधक का अभाव प्रामाण्य में हेतु नहीं बन सकता, क्योंकि बाधक के रहते हुए भी खोटे रुपये में तत्काल प्रामाण्य बुद्धि होती है । सर्वथा बाधकाभाव तो सर्वज्ञ के ही ज्ञान का विषय हो सकता है । जो यह कहा गया है कि- " यदि उत्पत्ति के समय में ही ज्ञान का प्रामाण्य निश्चित हो जाय तो उसके अनुसार प्रवृत्त होने पर कहीं भी ठगाई का अवसर नहीं जाना चाहिये, किन्तु ऐसा होता है, इसलिये मानना पड़ेगा कि उत्पत्ति के समय प्रामाण्य का निश्चय नहीं हुआ । संशय में ही व्यवहार होता हो, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि स्वरूप स्थित ( दोष रहित ) कारण से उत्पन्न संविद के प्रामाण्य स्वतस्त्व में कोई दोष नहीं होता । ऐसे प्रमाण, जिनमें कि दोषों का आदि है, उनसे उत्पन्न संविद की प्रामाणिकता के कारण ही विप्रलम्भ ( धोखा ) होता है, अतः अप्रामाण्य का निश्चय परतः होता है । संशय से प्रवृत्ति हो भी नहीं सकती, वह तो निवृत्त में ही कारण हो सकता है । शुक्ति में रजत की प्रतीति के स्थल में भी प्रवृत्ति निश्चय के कारण ही होती है | यहाँ पर संशय का आरोप करना अनुदित है, क्योंकि वह अनुभूयमान नहीं है । जैसा कि कहा गया है --- " किसी एक पक्ष का ग्राहक ज्ञान उसके निश्चायक उपाय के अभाव में संशय कोटि में ही पढ़ा हुआ माना जायगा, जैसा कि इस कुएँ में पानी है, ऐसा भिक्षुगण मानते हैं । इसी तरह से यह रजत है, इस प्रकार एक पक्ष का प्रतिभास भी वस्तुतः संशय ही है । यदि इसको प्रमाण माना जाय तो फिर इसका कहीं विसंवाद के होना है? और यदि अप्रमाणतया गृहीत होता है, तो फिर प्रवृत्ति कैसे कराता है? जैसा fe इस श्लोक में कहा गया है --- " अब यदि दोनों ही रूपों में इससे कुछ नहीं बन सकता, तो उसको संशय मान लेने में हमारा क्या बिगड़ता है । " यह सब व्यर्थ की बातें हैं, क्योंकि परिच्छित्ति ( स्वेतरव्यावृत्ति अथवा स्वनिश्चय ) को ही प्रमाण का कार्य कहा गया हैं, अतः बाधक कारणदोष ज्ञान के बिना सन्देहदुषित परिच्छित्ति का उपर्लभ न होने से परिच्छित्ति स्थल में संशय आदि की कल्पना निरर्थक है । उभय कोटि बाला ज्ञान ही संशय कहलाता है, अतः जहाँ पर दो कोटियां नहीं हैं, वहीं सन्देह नही कहा जा सकता । सन्देहदुषित परिच्छित्ति की अनुपलब्धि में स्वभावत: उसके प्रामाण्य का बोध होगा । उसीसे अर्थ की परिच्छित्ति होने पर प्रवृत्त हुआ

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* वेदार्थपारिजातः प्रवर्तितो भवति न संशयात् । यत्र बाधकप्रत्ययाद्युपनिपातेन तदपवादो भवति, तत्रैव परतोऽप्रामाण्यं निश्चीयते । एतदपि --‘ अर्थान्यथात्वहेतृत्थदोषज्ञानादपोद्यते ' ( चो ० सू ० वा ० ५३ ) इत्यादिनोक्तमेव | यदुक्तस्— अननुभूयमानोऽपि न्यायादभ्यस्ते विषयेऽविनाभावस्मरणात् संशयः परिकल्प्यः, निश्चयनिमित्तस्य तदानीमविद्यमानत्वात् संशयजनकहेतोः सामग्र्याः सन्निहितत्वात् । तथाहि -- यथार्थतरार्थसाधारणो धर्मो बोधरूपत्वमूर्ध्व-त्यादिवत्ता प्रकाशत एव । न च प्रामाण्याविनाभावी विशेषः कश्चन तदानीमवभाति । तदग्रहणे च समानधर्माधिगमप्रबो-ध्यमानवासनाधीना तत्सहचरित पर्यायानुभूतविशेषस्मृतिरति सम्भवत्येवेति संशयजननी सामग्री सन्निहितैवेति कुतस्तज्जन्यः संशय न स्यात्? इति तदपि न किश्चित्, द्वैविध्यदर्शनाद्विना संशयानुपपत्तेः । न च बोधरूपत्वदर्शनेन तत्कल्पयितुं शक्यम्, सत्यारोपे निमित्तानुसरणात्, न निमित्तमस्तांत्यारोप इति न्यायविरोधात् । यद्यपि पूर्वोक्तयुक्त्या कार्याद्वा कारणाद्वा तद्वि-शेषो नावगन्तुं शक्यः, तथाप्यर्थ तथात्वरूपं प्रामाण्यं जायमान एव प्रत्यये तज्ज्ञापकात् साक्षिण एवं स्फुरतीति विशेषाग्रहण-मपि न वक्तुं शक्यम् । यदुक्तम् --- न स विशेषः । कः? यदि स्पष्टताविशेषः, शुक्तिकायामपि रजताभासः स्पष्ट एव । नहि तत्राप्यनध्यवसाय-कालुष्यं किञ्चिदस्ति । अथ निष्कम्पता विशेषः, सोऽपि रजतावभासे विद्यत एव । नासौ जायमान एवाङ्गुल्यग्रादिवाक्यकरण-दोषवत् कम्पमानो दृश्यते । अथ निर्विचिकित्सता, सोऽपि निर्विचिकित्स एव तत्र कोटिद्वयानवमर्शात् । अथ अस्मिन् सति बाधा न दृश्यते सोऽस्य विशेष इति हन्तैतदेव पृच्छामि कस्मिन् सति बाधा न दृश्यते? सर्वावस्थस्य बाधदर्शनात् । न चासी चिरमपि प्रमाता प्रमाण से ही प्रवृत्त होता है, संशय से नहीं । जहाँ पर बाघक प्रत्यक्ष के आ जाने से उसका अपवाद हो जाता है, वहीं पर परतः अप्रामाण्य का निश्चय होता है । यह बात भी " अर्थ के अन्यथात्व को देखकर उत्पन्न हुए दोषज्ञान से उस प्रामाण्य का अपनोदन ( निवारण ) हो जाता है " इत्यादि से कही गई है । यह जो कहा गया है कि ---- " न्याय से ( साहचर्य आदि से ) अविनाभाव संबन्ध के स्मरण के द्वारा अनुभूत न होने पर भी संशय परिकल्पित करना पड़ता है, क्योंकि उस समय निश्चय का निमित्त हेतु विद्यमान नहीं है और संशय को पैदा करने वाली सामग्री सामने है । जैसे कि यथार्थ और अयथार्थ उभय साधारण धर्म बोधरूप ' स्थाणुर्वा पुरुषो वा ' इस वाक्य में उमयकोटिक धर्म ऊर्ध्वत्व प्रकाशित होता है, वैसे ही यथार्थ और यथार्थ दोनों ज्ञानों में रहने वाला केवल बोधरूप ही जहाँ प्रकाशित होता है, वहीं संशय होता है, क्योंकि म के साथ सदा रहने वाला ज्ञान का कोई विशेष रूप उस समय प्रकाशित नहीं होता । उस विशेषता को प्रतीति न होने पर समान धर्म के ज्ञान से उदीयमान वासना के अधीन किसी पर्याय में वासना सहकृत अनुभव से विशेष स्मृति भी हो ही सकती है, इसलिये संशय को पैदा करने वाली सामग्री के सांनिध्य के कारण तज्जन्य संशय क्यों नहीं पैदा होगा? " किन्तु यह भी कुछ ठीक नहीं बनता, क्यों fe frer के दर्शन के बिना केवल स्मरण मात्र से संशय नहीं होता । बोधरूप साधारण धर्म को देखकर उसकी कल्पना नहीं की जा सकती । " आरोप होने पर निर्मिस का अनुसरण करना पड़ता है । निमित्त है, इसलिये आरोप नहीं करना चाहिये " इस न्याय ( सिद्धान्त ) का विरोध होगा । यद्यपि पूर्वोक्त युक्ति से कार्य या कारण से विशेष का अवगमन ( ज्ञान ) नहीं हो सकता, तो मी अर्थ यथार्थ रूप प्रामाण्य ज्ञानोत्पत्ति के साथ साथ उसके ज्ञापक साक्षी से ही पैदा होता है, इसलिये विशेष का यहाँ स्फुरण नहीं होता, यह बात भी नहीं कही जा सकती । यह जो कहा गया है कि " वह विशेष नहीं है । तब विशेष क्या है? यदि स्पष्टता को विशेष कहा जाय तो शुक्ति में भी रजत का आभास स्पष्ट ही है । यहाँ पर भी निश्चय के अभाव के कारण कोई अनियरूप कालुष्य नहीं प्रतीत होता । यदि आप frostar at fate मा तो यह भी रजत के अवभास में विद्यमान ही है । जैसा कि ' अंगुल्य करियूयशतम् ' वाक्य को सुनते ही tara रूप दोष के ज्ञान से ज्ञान कम्पमान होता है, वैसा ' यह रजत है ' यह ज्ञान उत्पन्न होते हो कम्पमान नहीं होता । अर्थात् किसी व्यक्ति के मेरी अंगुलि पर सौ हाथी हैं, ऐसा कहते हो ' अंगुली पर सौ हाथी है ' यह ज्ञान लड़खड़ा जाता है, ऐसे ही शुक्ति में चांदी का ज्ञान तो तत्काल नहीं लड़खड़ाता | अब यदि निविचिकित्सा ( संदेह राहित्य ) को विशेष माना जाय तो रजतावभास भी निविचिकित्सा

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वेदार्थपारिजातः ५५ चिन्तयित्वा विशेषयितुं शक्यः । अथ स्वविषयाव्यभिचारित्वमेव विशेषः, स तदानीं नावभासत इत्युक्तमेव । अथ यदि तथा-विधो s पि विशेषः समस्ति तर्हि यत्र ज्ञानेऽसौ न दृश्यते, ततः किमिति प्रवर्तते? तद्विशेषदर्शी वा प्रवर्तमानः कथं विप्रलभ्येत? यदयं स्थाणुर्न पुरुषः, ' तेनैव व्यवहारस्य सिद्धत्वात् सर्वदेहिनाम् । अतश्च संशयादेव व्यवहारं वितन्वताम् ॥ लौकिकानां प्रयोक्तव्या नाभिशापपरम्परा । तस्माज्ज्ञानोत्पत्तिकाले | प्रामाण्यं ग्रहीतुमशक्यम् । तेन प्रामाण्याग्रहणमेवानध्यवसाय - संशय-शब्देन व्यपदेक्ष्यामः । तस्मात् स्वयं प्रामाण्यं गृह्यत इति दुर्घटम् ' इति, तदपि यत्किञ्चित् भावानवबोधात् । दत्तोत्तरमेतदपि । तथाहि -- अर्थ तथात्वप्रकाशकं हि प्रमाणमुक्तम् । तस्य स्वप्रमेयाव्यभिचारित्वं नाम प्रामाण्यम्, तत्र परापेक्षायां परतः प्रामाण्य-मिति वक्तुं शक्यते । न चास्य परापेक्षा, कारकस्वरूपमात्रापेक्षत्वान्नास्योत्पत्तावन्यापेक्षा । नापि स्वकार्यकरणेऽन्यापेक्षा, अर्थप्रकाशनस्वभावस्य तस्य स्वहेतोरुत्पादात् । तदुक्तम्- ' नैव वा जायते ज्ञानं जायते वा प्रकाशकम् | अर्थप्रकाशने किञ्चिन्न तृत्पन्नमपेक्षते || ' अप्रामाण्यं तुत्पत्तौ दोषान् स्वनिश्चये बाधकमपेक्षते । बोधात्मकत्वेन रजतबुद्धिरपि प्रमाणतां प्राप्तैव । तत एव तस्याः प्रवर्तकत्वमपि । अर्थान्यथात्व हेतुत्यदोषज्ञानात्तु तदपोद्यते । विस्तरेण चैतत्सर्वमुक्तमेव । एवं प्रामाण्यस्वतस्त्वे -नेव बुद्धेः प्रवर्तकत्वम्, न संशयात् प्रवृत्ति: । बाधादिभिस्तु तत्प्रामाण्यमपोद्यते । विज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति तदतिरिक्तहेत्वजन्य-त्वेन प्रामाण्यस्वतस्त्वं साधितमेव । एतेन यदुक्तम्- ' न प्रामाण्योत्पत्तौ स्वतस्त्वम् कार्याणां कारणाधीनजन्मत्वात्, प्रामाण्यस्य कार्यत्वात् । अस्त्विदं ( निःसंदिग्ध ) ही है, क्योंकि उस समय वहाँ पर दो कोटियों की प्रतीति नहीं होती । अब यदि यह विशेष की परिभाषा मानी जाय कि जिसके रहने पर बाधबुद्धि न हो तो भाई मेरे, यहीं तो पूछना है कि वह क्या वस्तु है, जिसके रहने पर बाधा नहीं दिखाई देती Hit अवस्थाओं में बाध बुद्धि होती है । ऐसी बात नहीं है कि बहुत सोच - विचार के बाद भी उसमें कोई विशेषता न देखी जाय । यदि अपने विषय से अव्यभिचरित होना ही विशेषता मानी जाय तो यह विशेषता उस समय प्रतीत नहीं होती, यह कहा जा चुका है । यह कहा जाय कि इस प्रकार का यह विशेष उस समय है, तो जिस ज्ञान में यह नहीं दिखाई देता, वहीं कैसे प्रवृत्ति होती है? ra after falent fa खाई देती है तो उस विशेष को देखकर प्रवृत्त हुआ व्यक्ति ठगा क्यों जाता है? ठगा अवश्य जाता है, क्योंकि अन्त में यह पुरुष नहीं है, किन्तु स्थाणु है, यह रुपया नहीं है, किन्तु लोहे की टिकिया पर मुलम्मा चढ़ाया हुआ हैं, इस प्रकार को ठगाई प्रत्यक्ष देखी जाती है । " यदि संशय में ही सब प्राणियों के व्यवहार सिद्ध हो सकते हों तो उससे सारे व्यवहार को चलाने वाले offent को कोसने की कोई जरूरत नहीं है । " इसलिये ज्ञान की उत्पत्ति की वेला में प्रामाण्य का ग्रहण करना असम्भव है । अतः इस प्रामाण्य के अग्रण को ही हम व्यवसाय अथवा संशय शब्द से कहेंगे । इसलिये प्रामाण्य का ग्रहण स्वतः होता है, यह कात गलत है । " ये सब भी व्यर्थ की बातें हैं । अभिप्राय न समझ सकने के कारण ये कही गई हैं । इसका भी पहले ही उत्तर दिया जा चुका है । जैसे कि अर्थ की यथार्थता को बताने वाले को प्रमाण कहा जाता है । उस प्रमाण को अपने प्रमेय ( विषय ) के प्रति afraftar को प्रामाण्य कहते हैं | इसमे यदि दूसरे की अपेक्षा हो तो परतः प्रामाण्य माना जाय । ऐसा तो नहीं है । कार स्वरूप मात्र को अपेक्षा होने से यहाँ पर उत्पत्ति में दूसरे की अपेक्षा नहीं है । अपने कार्य के करने में भी दूसरे की अपेक्षा नहीं है, raft a को प्रकाशित करने का स्वभाव उसके अपने कारण से ही पैदा होता है । कहा भी है --- " एक तो ज्ञान पैदा ही नहीं होता, यदि पैदा होता भी हैं तो उसमें प्रकाशकता साथ ही पैदा होती है । उत्पन्न होने के बाद अर्थ प्रकाशन के लिये यह किसी दूसरे की अपेक्षा नहीं करता । " अप्रामाण्य तो उत्पति में दोषों की अपेक्षा रखता है और अपने निश्चय में बाधक ज्ञान की अपेक्षा रखता है । इसलिये वह परत: है | शुक्ति में रजत ज्ञान भी ज्ञान स्वरूप होने से प्रमाणभाव को प्राप्त करता है । इसीलिये उससे प्रवृत्ति होती है । अर्थ को अन्यथा देखकर पैदा हुए दोष ज्ञान से प्रामाण्य का अपनोदन होता है । विस्तार से यह सब बातें पहले ही कही जा चुकी है । इस प्रकार प्रामाण के स्वतस्त्व के कारण हो बुद्धि की प्रवर्तकता मानी जाती है । संशय से प्रवृत्ति किसी भी दशा में नहीं माती जाती । बा आदि दोषों से वह प्रामाण्य हट जाता है । इस प्रकार प्रामाण्य का स्वास्थ्य नहीं है कि वह विज्ञान की सामग्री से ही पैदा होता है, उससे free अन्य कोई हेतु उसकी उत्पत्ति में नहीं है । उक्त कथन से यह जो कहा गया है कि " प्रामाण्य की उत्पत्ति में स्वतस्त्व नहीं है, क्योंकि कार्यों का जन्म कारणाधीन होता है

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५६ वेदार्थपारिजातः प्रामाण्यं वस्तु तच्च न नित्यं तस्मात्कार्यमेव । कार्यत्वाच्च न स्वत्तो भवति ' इत्यादिकम्, तदप्यपास्तम्, प्रकारान्तरस्य प्रामाण्य-स्वतस्त्वस्य निरस्तत्वात् । यदुक्तम्- ' गुणवता कारणेन सम्यक् कार्यम्, दोषवता चासम्यक् कार्यमुत्पद्यते । तदुक्तम् ---' निर्दोषं निर्गुणं वापि न समस्त्येव कारणम् । अत एव तृतीयस्य न कार्यस्यास्ति सम्भवः ॥ ' सम्यग्ज्ञानोत्पादकं कारकधर्म-स्वरूपातिरिक्तधर्मसापेक्षं कार्यनिर्वर्तकम् । साध्यो धर्मः, कारकत्वात्, मिथ्याज्ञानोत्पादककारकवत् । सम्यज् ज्ञानं वा धर्मि-स्वरूपातिरिक्तधर्म सम्बन्धवत्कारक निष्पाद्यम्, कार्यत्वान्मिथ्याज्ञानवत् । आयुर्वेदाचेन्द्रियगुणान् प्रतिपद्यामहे यदमी वैद्या: स्वस्थवृत्तेरौषधोपयोगमुपदिशन्ति तद्गुणोपयोगायैव न दोषशान्तये । दृश्यले च तदुपदिष्टौषधोपयोगेनेन्द्रियातिशयः । तद्विषय एव च लोके नैर्मल्यव्यपदेशः । न दोषभावनिष्ठः । तस्मादुत्पत्ती गुणानपेक्षत्वात् स्वतः प्रामाण्यमिति यदुक्तं तन्न युक्तमिति ' तत्रोच्यते, स्वरूपावस्थितेभ्यो निर्दोषेभ्यः कारकेभ्यः कार्योत्पत्तौ सम्भवन्त्यां गुणानां तद्धेतुत्वकल्पनाया निष्प्रमाणत्वात् । न तत्र प्रत्यक्षं प्रमाणम्, निर्दोषकारणभिन्नस्य गुणस्य लिङ्गेन सम्बन्धादर्शनात् । तत्र स्वरूपस्थितानि कारणानि न कार्यजन्म-न्युदासते, येन यथार्थोपलब्धिजनने गुणसहकारिता कल्प्येत । अप्रमाणस्य तु दोषान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वेन भवतु दोष -जन्यत्वम्, परं न प्रमाणस्य तथात्वम् गुणान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वासिद्धेः । ज्ञानस्य प्रामाण्यं ज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति तदतिरिक्तहेतुजन्यं न भवति, कार्यशक्तित्वात् वह्निशक्तिवदिति तत्साध-नस्य सत्त्वाच्च । एवं प्रमा विज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति अतिरिक्तजन्या न भवति, अप्रमातिरिक्तत्वात् पटादिवत् । न च ज्ञान-और भी कार्य है । यह प्रामाण्य भी वस्तु है, यह नित्य नहीं है, इसलिये कार्य है । कार्य होते से यह स्वतः नहीं हो सकता, इत्यादि " उसका खण्डन हो जाता है, क्योंकि प्रामाण्य स्वतस्त्व का प्रकारान्तर निराकृत हो चुका है । यह जो कहा गया है कि गुणवान् कारण से सही कार्य होता है और दोषयुक्त कारण से गलत कार्य । जैसा कि कहा गया है— निर्दोष और निर्गुण ऐसा कोई कारण हैं ही नहीं, इसीलिये दोषयुक्त और गुणयुक्त कार्य के सिवाय कार्य की तीसरी कोई कोटि नहीं बन सकती । सम्यग् ज्ञान के उत्पादक कारक स्वरूप से अतिरिक्त धर्म की अपेक्षा रखने वाला कारण ही कार्य का निष्पादक होता है । यहाँ पर धर्म साध्य है, क्योंकि वही अथवा सम्यम् अतिरिक्त धर्म के सम्बन्ध से के कारक है, जैसा कि मिथ्याज्ञान का उत्पादक कारक होता है । ज्ञान ही धर्मी के स्वरूप के युक्त कारक का है, क्योंकि यह भी मिथ्याज्ञान के समान कार्य है । आयुर्वेद से हम इन्द्रियों के गुणों को जानते हैं कि ये वैद्य स्वस्थ मनुष्य के लिये भी औषध का उपयोग बताते हैं । ऐसे प्रसंगों में औषध के गुण का ही उपयोग होता है, किसी दोष की शान्ति नहीं । वैच के द्वारा बताई गई औषध के सेवन से इन्द्रियों में अतिशय वैशिष्ट्य देखा जाता है । इसी अर्थ में लोक में इन्द्रिय अत्यन्त निर्मल हो गई, इस प्रकार का व्यवहार देखा जाता है । यह व्यवहार केवल दोष के बसाव का बोधक नहीं है । इसलिये उत्पत्ति में गुणों की अपेक्षा न होने से ज्ञान स्वत: प्रमाण होता है, यह जो कहा गया है, वह ठीक नहीं है । इसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है कि अपने स्वरूप में स्थित निर्दोष कारणों ( साधनों ) से ही कार्य की उत्पत्ति जब सम्भव है, तब साधनगत गुणों को कार्य की उत्पत्ति में कारण मानना यह केवल कल्पना की बात है । इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि गुण चक्षु प्रभृति से परोक्ष हैं, अतः उनके गुण प्रत्यक्ष नहीं हो सकते । ऊपर के दोनों अनुमान भी इसमें प्रमाण नहीं होंगे, निर्दोष कारण से भिन्न गुण का लिंग से सम्बन्ध न होना ही इसमें कारण है । यहाँ पर स्वरूप स्थित कारण कार्य के जन्म के समय उदासीन नहीं होते, जिससे कि यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति में गुण की सहकारिता की कल्पना की जाय । यदि स्वरूप स्थित कारण कार्य को पैदा करने में उदासीन हो जाय तो कार्यगत गुणों को सहकारी कारण मान भी सकते हैं । पर कारण कभी उदासीन होते नहीं । दोष रहने पर होता है, नहीं रहने पर नहीं होता है, इसलिये भले ही अप्रमाण दोषजन्य हो, किन्तु प्रमाण के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसकी गुण के साथ अन्वयव्यतिरेकिता नहीं सिद्ध होती । REET प्रामान्य ज्ञान की सामग्री से ही उत्पन्न होता है, इसके अतिरिक्त इसमें कोई कारण नहीं है, क्योंकि " कारण में कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति विद्यमान है, अग्नि में दाह को पैदा करने की शक्ति की तरह " यह अनुमान भी प्रामाण्य स्वतस्त्व का are है । इसी तरह “ प्रमा विज्ञान सामग्री से पैदा होती है, इससे अतिरिक्त उसका और कोई कारण नहीं है, क्योंकि वह अत्रमा से अतिरिक्त है, पटादि की तरह " ( पट पट को साधक सामग्री से जन्य है तदतिरिक्त सामग्री से अजन्य है ), इस अनुमान में ज्ञानवान -

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वेदार्थपारिजातः ५७ त्वानधिकरणत्वमुपाधिः, ईश्वरज्ञाने साध्याव्याप्तेरित्यादिकमुक्तमेव । प्रमा दोषव्यतिरिक्तहेत्वतिरिक्तजन्या न भवति ज्ञानत्वाद-प्रमादिति सत्प्रतिपक्षसम्भवाच्च । नैर्मल्यव्यपदेशोऽपि काचकामलादिदोषापायनिबन्धन एवं आयुर्वेदोपदिष्टाञ्जनाद्युप-योगोऽपि दोषनिर्हरणायैव न गुणजन्मने । अत एवायुर्वेदादपि न गुणसिद्धिः । कथञ्चित्तत्सिद्धावपि दोषाभावसम्पादन एव तदुप-योगो न प्रामाण्योत्पादने, तस्य स्वरूपावस्थितेभ्यः कारकेभ्य एव सम्भवात् । यथा सर्वार्थावभासशीलं चित्तसत्त्वं रजस्तमो-भ्यामवरुद्धं सन्न सर्वार्थभासकं भवति, रजस्तमोऽपनये सति तु तत्तारतम्येन प्रकाशते तथैव तत्तद्रूपादिप्रकाशनशीलं चक्षुरादिकमपि नानाविधैर्दोषैरवरुद्धशक्तिकं भवति । अञ्जनादिभिस्तत्तदोषचैर्दोषापनयतारतम्येन प्रकाशते । योगजैस्तू-पायैर्दूरस्थ ( विप्रकृष्टदेशस्थ ) रूपादिकमपि प्रकाशते । यदुक्तम्- - ' प्रमाणस्य स्वकार्यकरणे परानपेक्षत्वमपि व्याख्येयम् । किं स्वकार्यकरणे निरपेक्षत्वम्? सामग्री, तदेक-देशो वा तज्जन्यं वा ज्ञानम्? तत्र सामायाः सत्यं स्वकार्यजन्मनि नैरपेक्ष्यम्, न तु तावता स्वतः प्रामाण्यम्, तत्परिच्छेदस्थ परायत्तत्वात् । सामग्र्यन्तर्गतकारकस्य स्वकार्ये परापेक्षत्वमपरिहार्यम्, एकस्मात् कारकात् कार्यनिर्वृत्त्यसम्भवात् । ज्ञानं फल-मेव न प्रमाणमित्युक्तमेव । न च फलात्मनस्तस्य किञ्चित् स्वकार्यनस्ति, यत्र सापेक्षत्वमनपेक्षत्वं वा स्यात् । पुरुषप्रवृत्त्यादौ तु fuerrea उपाधि नहीं होगी, क्योंकि ईश्वर के ज्ञान में ज्ञानत्वानधिकरणत्व कभी नहीं बन सकता, यह कह चुके है । प्रमा, दोष व्यतिरिक्त जो हेतु तदतिरिक्त हेतु से जन्य नहीं है क्योंकि वह ज्ञानस्वरूप है, इसलिये अप्रमा की तरह । यह सत्प्रतिपक्ष यहाँ उपस्थित हो सकता है | नर्म का व्यपदेश ( पयन ) भी काच, कामलादि नेत्र दोषों के निराकरण से मूलक हो है । आयुर्वेद में उपदिष्ट अंजन आदि का उपयोग भी दोष के परिहार के लिये ही होता है, किसी गुण को पैदा करने के लिये नहीं । इसलिये बायुर्वेद से भी गुण को सिद्धि नहीं होगी । किसी तरह गुण की सिद्धि हो भी जाय तो उसका उपयोग दोषाभाव के सम्पादन के लिये ही होगा, प्रामाण्य के उत्पादन में नहीं, क्योंकि प्रामाण्य की उत्पत्ति स्वरूपावस्थित कारकों से ही होना सम्भव है । जैसे सभी वर्षो को प्रत्यक्ष प्रकाशित करने वाले स्वभावबाला चित्तसत्त्व यदि रक और राम से अवरुद्ध है तो यह सभी अर्थों का प्रकाश नहीं कर सकता, रज और तम के हट जाने पर उसका न्यूनाधिक रूप से प्रकाशन होता है, उसी तरह उस उस रूप आदि का प्रकाशन करने वाले चक्षुरादि की शक्ति भी नाना प्रकार के दोषों से अवरुद्ध हो बाती है । यंजन प्रभृति शेषधियों के उपयोग से दोषों का परिहार होने पर वे ही चक्षुरादि न्यूनाधिक रूप से विषय को प्रकाशित कर देते हैं । योगित समाधि से उत्पन्न उपायों से तो बहुत दूर के रूपादि का भी प्रकाश हो जाता है । यह जी कहा गया है कि " प्रमाण की अपने कार्य को करने में दूसरे की अपेक्षा नहीं होती, इसको भी स्पष्ट रूप से बताना होगा | कार्य को उत्पन्न करने में फोन विरपेक्ष है? सम्पूर्ण सामग्री या उसका एक देश? अथवा उस सामग्री से उत्पन्न होने वाला ज्ञान? इन तीनों में से यदि सम्पूर्ण सामग्री को निरपेक्ष कहो तो ठीक है, क्योंकि वह सामग्री अपने कार्य का पैदा करने में किसी की अपेक्षा ही क्सो, किन्तु इसे स्वतः प्रामाण्य नहीं बनता, क्योंकि उसका निश्चय पराधीन है । सामग्री के अन्तर्गत दक को अपने कार्य को पैदा करने में परापेक्षा अपरिहार्य है, क्योंकि किसी एक कारक ( साधन ) से पूरा कार्य नहीं बनता । ज्ञान फल ही है, प्रमाण नहीं, यह पहले कहा जा चुका है । फलस्वरूप उम्र ज्ञान का अपना कोई कार्य नहीं हैं, जहाँ पर कि सापेक्षता अथवा निरपेक्षता न सकती हो । पुरुष को प्रवृत्ति में तो इच्छा की अपेक्षा विद्यमान है ही, यह सब गलत है, क्योंकि चित् के प्रतिविम्व से युक्त वृत्यात्मक ज्ञान की अज्ञान, संशय आदि की निवृत्ति रूप कार्य के प्रति निरपेक्ष कारणता होने से ८ १. जैसे तालाब का पानी स्त्रि से निकलकर नहर या नाली के द्वारा खेत्र में जाता है और खेत की क्यारी में जाकर क्यारी के त्रिकोण, चतुष्कोण, चर्तुल आदि वाकारों को स्वयं धारण कर लेता है, ऐसे ही निर्मल सत्व गुण का परिणाम अन्तःकरण चक्षु आदि प्रणाने के द्वारा घट आदि विषय पर जाकर घटादि विषयों के आकार वाला बन जाता है । अन्तःकरण के इस विद्याकार परिणाम को ही दार्शनिकगण वृत्ति कहते हैं । इतना होने पर भी घट का ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि अन्तःकरण भी जड़, उसकी विषयाकार परिणत वृत्ति भी जड़ और घट भी जह हैं । यह ठीक वैसी ही स्थिति है, जैसे कि एक अन्धे के पीछे दूसरा अन्या लग जाय | इसलिये जब अन्तःकरण की घटाकार वृत्ति में वेतन का प्रतिबिम्ब पड़ता है, तब घट का ज्ञान होता है ।

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५८ वेदार्थपारिजातः तदिच्छाद्यपेक्षत्वं विद्यत एवेति तन्न चित्प्रतिबिम्बोपेतस्य वृत्त्यात्मकस्य ज्ञानस्य अज्ञानसंशयादिनिवृत्तिलक्षणकार्य प्रति नैरपेक्ष्येण प्रामाण्यस्वतस्त्वोक्तिसम्भवात् । ज्ञानस्येन्द्रियसन्निकर्षाद्यपेक्षया फलत्वेऽपि संशयज्ञानादिनिवृत्तिरूपस्य तत्फलस्या-नुभविकत्वेन फलवत्त्वोपपत्तेः । मीमांसकरीत्या ज्ञानप्राकट्ययोर्भेदाभ्युपगमेनापि तत्समाधानमुक्तमेव । यदप्युक्तम् - " प्रामाण्यनिश्चयस्य हि द्वयी गतिः, नास्तित्वं कारणापेक्षिता वा । न पुनरस्ति च प्रामाण्यनिश्वयः कारणानपेक्षचेति वक्तुं शक्यम्, तत्र प्रथमप्रवर्तकप्रतिभासप्रसवसमये तावन्नास्त्येव प्रामाण्यनिश्वयः । नहि नीलग्राहिणा प्रमाणेन नीलस्वरूपमिव स्वप्रामाण्यमपि निश्चेतुं पार्यते । कालान्तरे प्रामाण्यनिश्चयः सत्यमस्ति, न तु तत्र नैरपेक्ष्यम्, प्रवृत्ति-सामर्थ्यात्वात् तन्निश्चयस्येति, तदपि न, नीलग्राहिणा प्रत्यक्षेण नीलस्येव तस्याग्राह्यत्वेऽपि ज्ञानग्राहकेण साक्षिणैव तद्ग्रहणेन तद्ग्रहणोपपत्तेः । अत एव ज्ञानस्यादित एव प्रमाणत्वेन स्फुरणम्, अन्यथा प्रवर्तकत्वानुपपत्तेः । ज्ञानग्राहकमात्र-ग्राह्यत्वेन च प्रामाण्यस्य स्वतो ग्राह्यत्वाभ्युपगमे दोषाभावात् । ननु च तथात्वे प्रामाण्यसंशयानुपपत्तिरिति चेन्न, स्वतः प्रमाणत्वेन भवदभिमते धर्मिज्ञानेऽनुव्यवसाये च सुगतमतानुसारिणां विपर्ययवत् तदुपपत्तेः । एवमेव विज्ञानग्राहकसाक्षिमात्रग्राह्यत्वमेव स्वतो ग्राह्यत्वमप्युक्तमेव । मिथ्यारजतादिबुद्धिष्वपि प्रसक्तस्यापि तस्य कारणदोषबाधकज्ञानाभ्यां तदपनोदनान्न तत्र तथात्वप्रसङ्गः । निःशङ्कप्रवृत्त्यापि प्रामाण्यस्वतस्त्वमुक्तमेव । प्रामाण्यस्य परतो ग्रहणासम्भवादपि स्वतस्त्वमुक्तम् । प्रामाण्य का स्वतत्व माना जा सकता है । इन्द्रिय संनिकर्ष की दृष्टि से ज्ञान फल होने पर भी संशय फल की दृष्टि से ज्ञान को भी फरवत्ता अनुभव सिद्ध है । मीमांसक की दृष्टि से ज्ञान और प्राकट्य में समाधान हो जाता है, जो कि बताया जा चुका है । अज्ञान आदि की निवृत्ति रूप श्रेष्ठ है । इस मी शंका कहा जाता है कि " प्रामाण्य के निश्चय के प्रसंग में दो ही रास्ते हैं या तो वह नहीं है और यदि तो उसका कोई न कोई कारण है । प्रामाण्य का निश्चय भी है और उसका कोई कारण नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता | यह बात सही है कि प्रथम प्रवर्तक के प्रतिभास पैदा होते समय प्रामाण्य का निश्चय नहीं ही है, क्योंकि नील के ग्राहक प्रमाण से नील के स्वरूप की तरह अपने प्रामाण्य का भी निश्चय नहीं हो सकता । कालान्तर में प्रामाण्य का निश्चय है सही, किन्तु यह निरपेक्ष नहीं है, क्योंकि उसका निश्चय प्रवृत्ति सामर्थ्य के अधीन है " । किन्तु यह बात गलत है, क्योंकि नील का ज्ञान कराने वाले प्रत्यक्ष से नील वर्ण के ज्ञान की तरह नील ज्ञान की प्रामाणिकता के न बताये जाने पर भी ज्ञान के ग्राहक ( ज्ञापक ) साक्षी के द्वारा हो उसके ग्रहण ( ज्ञान ) की उपपत्ति हो जाती है । इसीलिये ज्ञान प्रारम्भ से ही प्रमाण रूप में स्फुरित होता है, अन्यथा वह प्रवर्तक नहीं हो सकता । ज्ञान का जो प्रायुक है, मात्र उसीसे इसका भी ग्रहण होता है, अतः प्रामाण्य के errera को मानने में कोई दोष नहीं है । यह कहना कि ऐसी अवस्था में तो फिर प्रामाण्य में संशय उठेगा ही नहीं, ठीक नहीं है, क्योकि १ स्वतः प्रमाण रूप से अभिमत धर्मी ज्ञान में और मनुव्यवसाय में सौगत मतानुयायी जैसे विपर्यय मानते हैं, उसी पद्धति से संशय की भी उपपत्ति हो जायगी । इसी तरह से स्वतः ग्राह्यता का अभिप्राय यह है कि वह विज्ञान के ग्राहक साक्षी मात्र से हो ग्राह्य है । यह बात पहिले कही जा चुकी है । मिध्या रजत आदि बुद्धि में भी विज्ञान ग्राहक साक्षीमात्र से ग्राह्य प्रामाण्य की प्राप्ति होने पर भी ऐसे स्थलों में कारण दोष और arts शान से उसका ( प्रामाण्य का ) अपनोदन हो जाता है, अतः वहाँ स्वतः प्रामाण्य की प्रसक्ति नहीं है । निःशंक प्रवृत्ति भी प्रामाण्य के स्वतस्त्व को सिद्ध करती ही है, यह कहा जा चुका है । प्रामाण्य का परतः ग्रहण संभव नहीं होता, इससे भी उसका स्वतस्त्व ही प्रतिपादित है । १. नै ute ज्ञान को परतः प्रमाण मानते हुए भी धर्मी ज्ञान को स्वतः प्रमाण मारते हैं । फिर भी उनके मत में संय - बन हो जाता है । इसी प्रकार बौद्ध ज्ञान को परत: प्रमाण मानते हुए भी अनुव्यवसाय ( ज्ञान विषयक ज्ञान ) को स्वतः प्रमाण मानते हैं । फिर भी मनके मत में जैसे विपर्यय बन जाता है, ठीक वैसे ही हमारे मत में भी ज्ञान को स्वतः प्रमाण मान लेने पर भी संजय और विपर्यय बन हो सकते हैं ।

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः यदुक्तम्- ' क्षणिकत्वात् कालान्तरे ज्ञानमेव न तिष्ठति, प्रामाण्याप्रामाण्यचिन्ता वृथेति ' तदपि यत्किञ्चित्, क्रान्तस्यापि स्मर्यमाणस्य तदुत्पादकस्य वा वर्तमानस्य कारकचक्रस्य प्रामाण्यनिश्चायकत्वसम्भवात् । ५६ अति-यदुक्तम्- ' अदृष्टविषये प्रामाण्यनिश्चयपूर्विकायाः प्रवृत्तेरभ्युपगमान्नेतरेतराश्रयादिकं न वा चक्रकम् दृष्टे विषये ह्यनिर्णीतप्रामाण्यस्यार्थसंशयात् प्रवृत्तिरूपमनर्थसंशयाच्च निवृत्त्यात्मकं व्यवहारमारभमाणो लोको दृश्यत इति चेत्तत्र दृष्ट-विषयेऽपि संशयान्निवृत्तेः सम्भवेऽपि प्रेक्षावतां प्रामाण्यस्वतस्त्वादेव प्रवृत्युपपत्तेः । दृष्टादृष्टविषये सर्वत्र न्यायस्य समानत्वाद् इतरेतराश्रयादिकमनिवार्यमेव । प्रामाण्यपरतस्त्वपक्षे दृष्टेऽपि विषये -- ' सर्पान् कुशाग्राणि तथोदकानि ज्ञात्वा मनुष्याः परिवर्जयन्ति । अज्ञानतस्तत्र पतन्ति चान्ये ज्ञाने फलं पश्य यथा विशिष्टम् ॥ ' भोजने शयने शस्त्रास्त्रप्रयोगे युद्धे च संशयित -प्रवृत्तिर्महतेऽनर्थाय भवति । किञ्चादृष्टविषयेऽपि: कर्मोपासनादौ नानुष्ठातारः प्रामाण्यनिर्णयाय प्रमाणान्तराण्यपेक्षन्ते । तत्कस्य हेतोः? प्रामाण्यस्वतस्त्वादेवेति मन्तव्यम् । संशयादिहेतुपस्थितौ तु स्वतः प्राप्तस्य प्रामाण्यस्यापनोदनादेवाप्रामाण्य-शङ्कया निवर्तन्ते । प्रेक्षावतां प्रवृत्त्योपथिकप्रामाण्याप्रामाण्यविचारस्तु दृष्टादृष्टादिविषयेषु सर्वत्रैव । यदुक्तम्- ' दृष्टे विषये प्रामाण्यान्वेषणं व्यर्थमिष्यत एव किन्तु तत्र प्रवृत्तिसामर्थ्येन प्रामाण्यं निश्चिन्वन् आप्तोक्त-त्वस्य हेतोः प्रामाण्येन व्याप्तिमवगच्छति, अदृष्टविषयोपयोगिवेदादिप्रामाण्याप्रामाण्यपरिच्छेदे पारम्पर्येणोपायत्वात् । तस्मात् स्वविषये व्यर्थोऽपि प्रामाण्यनिर्णयस्तत्र साधको भवतीति ', तन्न, अनाप्तानुच्चरितत्वेनैव पौरुषेयापीरुषेय सर्वविधवाक्यानां प्रामाण्योपपत्तावाप्तोक्तत्वस्य प्रामाण्यप्रयोजकत्वासिद्धौ तादृग्व्याप्तेरेवासिद्धत्वात् । यह कहना भी गलत है कि ज्ञान तो क्षणिक है, कालान्तर में वह रहेगा ही नहीं तो उसके प्रामाण्य और अप्रामाण्य की चिन्ता व्यर्थ है, क्योंकि बीते हुए ज्ञान का स्मरण होने पर अथवा ज्ञान के उत्पादक वर्तमान समय के साधन समूह मे प्रामाण्य का निश्चय हो सकता है! यदि आप यह कहें कि अट विषय में प्रवृत्ति प्रामाण्य निश्चय पूर्वक हो स्वीकार करते से इतरेतराश्रय अथवा चक्रक दोष नहीं होता, दृष्ट विषय में प्रामाण्य के अनिर्णीत होने पर अर्थ के संशय से प्रवृत्ति रूप और अनर्थ के संशय से निवृत्तिरू व्यवहार करते हुए लोग देखे जाते हैं, तो इस पर हमारा कहना है कि दृष्ट विषय में संशय से निवृत्ति भी तो हो सकती है, ऐसी परिस्थिति में समझदार व्यक्ति की प्रवृति प्रामाण्य के स्वतस्त्व से ही उपपन्न हो सकती है । दृष्ट और बदृष्ट विषय में सर्वत्र समान ही न्याय होने से इतरे-तराश्रय आदि दोष अनिवार्य है । प्रामाण्य का परतस्तत्र मानने वालों के पक्ष में दृष्ट विषय में भी " सर्प, कुशा के तीखे अग्रभाग, जल afe को देखकर जानकार मनुष्य चलते समय इनको छोड़कर चलता है, इसके विपरीत नहीं जानने वाले मनुष्य इनके चकूर में पढ़ जाते हैं । इसीसे आप समझिये कि ज्ञान की क्या विशेषता है " इस आभाणक के अनुसार भोजन, शयम, शस्त्रास्त्र के प्रयोग, युद्ध आदि में संशयग्रस्त प्रवृत्ति होगी तो उससे महान् अनर्थ होने की आशंका रहती है । इसी तरह अदृष्ट विषय में भी यज्ञ याग आदि कर्म और उपासना करने वाले व्यक्ति प्रामाण्य के निर्णय के लिए दूसरे प्रमाणों की अपेक्षा नहीं रखते । इसमें क्या कारण है? प्रामाण्य के स्वत्व को ही इसमें कारण मानना पड़ेगा । संशय प्रभृत्ति कारणों के उपस्थित होने पर स्वतःप्राप्त प्रामाण्य का अपनोदन हो जाते से अप्रामाण्य की आशंका से निवृत्ति होती है । समझदार व्यक्ति की प्रवृत्ति के लिये सहायक प्रामाण्य और अप्रामाण्य का विचार दृष्ट और अदृष्ट सभी विषयों में होता है । यह जो कहा गया है कि " हृष्ट विषय में प्रामाण्य की खोज व्यर्थ ही मानी जाती है, किन्तु वहाँ पर प्रवृत्ति के सामर्थ्य से प्रामाण्य का निश्चय कर आप्तोक्तत्व रूप हेतु की प्रामाथ्य के साथ व्याति जानता है । क्योंकि अदृष्ट विषय के लिये उपयोगी वैद afe के प्रामाण्य - प्रामाण्य के परिच्छेद में आसोतत्व हेतु परम्परा से सहायक है । इसलिये अपने विषय में व्यर्थ होते हुए भी प्रामाण्य का निर्णय ऐसे स्थलों में साधक होता है ", किन्तु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनास के द्वारा अनुच्चरित इतने मात्र से ही reader एवं अप सभी तरह के वाक्यों में प्र erer की उपपत्ति हो जाती हैं, इसलिये आप्तोक्तत्व को प्रामाण्य का प्रयोजक मामा weaf fear नहीं होता, क्योंकि वैसी व्याति ही नहीं बनेगी ।

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६० वेदार्थपारिजातः यदुक्तम्- ' समीहा प्रवृत्तिरुच्यते, सामर्थ्यं पुनरस्याः फलेनाभिसम्बन्ध: ' ( भाष्य उपोद्घाते ) इति न्यायभाष्यानु-सारेणार्थक्रियाफलज्ञानमेव प्रवृत्तिसामर्थ्यम् तेनेव पूर्वज्ञानस्य प्रामाण्यम् ' इति, तदपि न, अदृष्टविषये क्रियाफलज्ञाना-सम्भवात् । यत्र लौकिके जलज्ञानादावर्थक्रियाफलज्ञानं सम्भवति, तत्र प्रामाण्यविचारस्य वैयर्थ्यमुपेयते । यत्रार्थक्रियाफलज्ञान-मेव न सम्भवति, तत्र प्रामाण्यविचारस्य प्रयोजनमुपेयत इति चित्रमेव । I यदि कचिदपि निःशङ्कसमर्थप्रवृत्तिः संशयादुत्पद्येत, हि सर्वत्रैव तथा सम्भवेन प्रामाण्यनिश्चयो निरर्थकः स्यात् । तथा च यागादिप्रवृत्तावपि प्रामाण्यनिश्चयोऽनपेक्षितः स्यात् । यदप्युक्तम् --सकलप्राणभृत्प्रतीति साक्षिकव्यवहारविरोधित्वाद् अर्थक्रियाज्ञानस्य प्रमाणान्तरान्वेषणानपेक्षणाद अपरीक्षणीयप्रामाण्याद् अर्थक्रियाज्ञानस्य नानवस्था । प्रवर्तकं तु सर्वज्ञानं प्रवृत्तिसिद्धये परीक्षणीयप्रामाण्यं भवति । फलज्ञाने तु सिद्धप्रयोजनत्वात् प्रामाण्यपरीक्षापेक्षैव नास्ति, कुतोऽनवस्था? संशयाभावाद्वा तत्प्रामाण्यविचाराभावः । प्रवर्तकं तदकज्ञानमविद्यमानेऽपि नीरे मिहिरमरीचिपु दृष्टमिति संशेरते जनाः । अर्थक्रियाज्ञानं तु सलिलमध्यवर्तिनां मत्स्या-दीनामिव तदविनाभूतमेवेति न तत्र संशयः । तदभावान्न तत्र प्रामाण्यविचारः, विचारस्य संशयपूर्वकत्वात् । विशेषदर्शनाद्वा फलज्ञाने प्रामाण्यनिश्चयः । शौचाचमनमज्जनदेवपितृतर्पणपक्षालनश्रमतापापनोदनाद्यनेकप्रकारनीरपर्यालोचनप्रबन्धलक्षण-विशेषदर्शनादपि प्रामाण्यनिश्चयः । नहीयान् कार्यकलापो मिथ्याज्ञानात् प्रवृत्तस्य क्वचिदपि दृष्टः । नहि स्वप्नेऽप्यस्य प्रबन्धस्य दर्शनमस्ति, स्वप्नदशा विसदृशविस्पष्टजाग्रदवस्थाप्रत्ययस्य संदर्शनसंवेद्यत्वात् । एषोऽस्मि जागमि न स्वपिमीति स्वप्न विलक्षणमनिद्रायमाण: प्रत्यक्षमेव जाग्रत्समयं सकलो जनरचेतयते । न च तस्मिन्नवसरे सलिलमन्तरेणैताः क्रिया वर्तमाना दृश्यन्ते तद्विशेषदर्शनात् सुज्ञानमर्थक्रियाज्ञानप्रामाण्यम् । कारणपरीक्षातोऽपि प्रामाण्यं निश्चेष्यामः । यथोक्तं यह कहा जाता है कि " समीहा प्रवृत्ति को कहते हैं और इस प्रवृत्ति के फल के साथ संबद्ध होने को सामर्थ्य कहते हैं " इस न्यायमाध्य की उक्ति के अनुसार अर्थक्रिया के फल का ज्ञान ही प्रवृत्ति का सामर्थ्य हुआ । इसी से पूर्वज्ञान का प्रामाण्य बनेगा ", यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि अदृष्ट विषय में क्रिया के फल का ज्ञान नहीं हो सकता | लौकिक जलज्ञान आदि स्थलों में जहाँ पर कि अर्थ-क्रिया के फल का ज्ञान हो सकता है, प्रामाण्य विचार की व्यर्थता मानी जा सकती | जहाँ पर अर्थ क्रिया के फल का ज्ञान नहीं हो सकता, वहां पर तो प्रामाण्य के विचार का प्रयोजन माना जाता है, यह उक्ति भी विचित्र प्रतीत होती है । यदि कहीं पर भी संशय के अनन्तर शंका रहित सफल प्रवृत्ति देखी गई हो तो सभी जगह इसकी संभावना रहने से प्रामाण्य का निश्चय निरर्थक हो जायगा । इसी स्थिति में याग आदि अदृष्ट प्रयोजन वाले कर्म में प्रवृत्ति के लिये भी प्रामाण्य के निश्चय की अपेक्षा नहीं रहेगी । इसी प्रकार यह जो कहा गया है कि " अर्थक्रिया ज्ञान को सभी प्राणियों की प्रतीति के साक्षी व्यवहार की सिद्धि के लिये प्रमाणान्तर के अन्वेषण से निरपेक्ष मानना पड़ेगा, जिससे प्रामाण्य की परीक्षा की अपेक्षा न रहे, फलतः ऐसी परिस्थिति में अनवस्थादोष नहीं होगा | इसके विपरीत सभी प्रवर्तक ज्ञान प्रवृत्ति की सिद्धि के लिये प्रामाण्य के परीक्षण की अपेक्षा रखते हैं । फल ज्ञान के हो जाते पर तो प्रयोजन के सिद्ध हो जाने से प्रामाण्य के परीक्षण की अपेक्षा ही नहीं रहती, क्योंकि यहाँ पर प्रामाण्य का प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, यतः यहां पर भी अनवस्था कैसी? अथवा संशय के अभाव में उसके प्रामाण्य पर विचार हो नहीं होगा । प्रवर्तक ज्ञान में तो जल के न रहने पर भी बालू रेत पर चमकती सूरज की किरणों में जल का सन्देह होता है, अतः यहाँ पर मनुष्यों का संशय में पढ़ जाना स्वाभाविक है । अर्थक्रिया ज्ञान तो जल के मध्यवर्ती मत्स्य आदि के समान अविनाभावी हैं, अतः यहाँ पर भी संशय नहीं होगा । संशय के अभाव में वहाँ पर प्रामाण्य का विचार भी नहीं होगा, क्योंकि संशय होने पर ही विचार की प्रवृत्ति होती है । फलज्ञान मैं विशेष दर्शन के कारण से भी प्रामाण्य का निश्चय हो जाता है । शौच, आचमन, स्नान, देव तथा पितृतर्पण, कपड़ा धोना, श्रम एवं गरमी को हृ arir प्रति अनेक प्रकार के कार्य जल के देखे जाते हैं, इनसे भी प्रामाण्य का निश्चय हो जाता है । इतने सारे कार्य freer ज्ञान से प्रवृत्त होने पर कहीं देखे नहीं जाते । ये सारे कार्य जल स्वप्न में भी होते देखे गये हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि स्वप्न aar से विपरीत विस्पष्ट जाग्रत अवस्था का प्रत्यय ही संदर्शन कहलाता है । यह मैं जाग रहा है, सोया नहीं हूँ, इस तरह से स्वप्न से विलक्षण जाग्रत् काल को सभी सचेत व्यक्ति जानते हैं । इस जाग्रत अवस्था में बिना जल के ही ये सब क्रियाएँ