वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 91–100
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 91–100
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देवार्थपारिजातः ६१ मीमांसकेरेव " प्रयत्नेनान्वेषमाणा न दोषमवगच्छेम } तत्प्रमाणाभावाददुष्टमिति मन्येमहि । तथा हि विषयस्य चलत्व-सादृश्यादिदोषविरहः, आलोकस्य मलीमसत्वादिकारणवैकल्यम्, अन्तःकरणस्य निद्रादिदोषाद्यदूषितत्वम्, आत्मनः क्षुत्को -पाद्यनाकुलत्वम्, ईक्षणयुगलस्य तिमिरपटलादिविकत्वमित्यादि । स्वयश्च कार्यद्वारेण परोपदेशेन सर्वं सुज्ञानम् । निरवद्य-कारणजन्यत्वात् प्रमाणमर्थ कियाज्ञानमिति ", तदत्रोच्यते, ज्ञानत्वसामान्याद्यथा तस्य प्रमाणान्तरानपेक्षतया प्रामाण्यस्वत-स्त्वमूरीक्रियते, तथैव ज्ञानान्तरेष्वपि तत्क नाङ्गीविते? ज्ञानत्वाविशेषेऽपि यद्यर्थक्रियाज्ञानस्य प्रामाण्यस्वतस्त्वं तदा किमपराढं ज्ञानान्तरैः? यदुक्तम्- ' प्रवर्तकत्वाद् ज्ञानान्तराणि परीक्षणीयप्रामाण्यानि सिद्धप्रयोजनत्वात्तु नार्थक्रियाज्ञानमिति ', तदपि तुच्छम्, प्रमितेरेव प्रमाणफलटन प्रसिद्धया तस्याः प्रमाणेनैव निष्पन्नत्वात् तत्रापि सिद्धप्रयोजनत्वेन तददोषात् । प्रवर्तकत्वं विच्छादीनामेव न प्रमाणानाम्, तेषामनधिगतगन्तृत्वेनाकृतकारकत्वाभावात् । न च पूर्वोक्तिविरोधः, पूर्व संशयाज्ञान-निवर्तकत्वेन फलवत्त्वं ज्ञानस्योक्तमिति वाच्यम्, प्रवर्तकत्वाभावाभिप्रायेण सिद्धप्रयोजनत्वोः सार्थस्यात् । france त्वयाज्ञानेऽपि समानमेव । यत्र संशयः समुत्पद्यते तत्रावश्यं प्रामाण्यं परीक्षणीयम् । न च प्रामाण्य-परीक्षणाय संशय उत्प्रेक्षणीयः । तदुक्तमेव - ' उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादजातमपि बाधकम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं संपन्न होती हैं, ऐसा देखा नहीं जाता । इन विशेषताओं के कारण अर्थक्रिया ज्ञान का प्रामाण्य सरलता से जाना जा सकता है । कारण की परीक्षा से भी प्रामाण्य का निश्चय कर लेंगे, जैसा कि मीमांसकों ने कहा है --- " प्रयत्नपूर्वक खोज करने पर भी हम दोषों को नहीं जान पाते, प्रमाण के अभाव में हम उसको निर्दुष्ट मान लेते हैं । जैसे कि विषय में चलत्व, सादृश्य आदि दोष नहीं हैं, प्रकाश में fate आदि कारण नहीं हैं, अन्तःकर ur fa द्रा प्रभृत्ति दोषों से दूषित नहीं है, आत्मा ( प्राण - मन ) भूख, क्रोध आदि से आकुल नहीं है, आँखें तिमिर पटल आदि से दूषित नहीं हैं । स्वयं भी कार्य के द्वारा अथवा दूसरे के उपदेश से यह सब कुछ सरलता जान सकता है | इस तरह free द्य ( निर्दोष ) कारण से पैदा होने मे अर्थक्रियाज्ञान प्रमाण है । " इस पर हमारा कहना है कि जैसे यहाँ पर ज्ञानत्व सामान्य से प्रमाणान्तर निरपेक्ष प्रामाण्य का स्वतस्त्व माना जाता है, उसी तरह ज्ञानान्तरों में भी वह क्यों नहीं स्वीकार किया जाता? ज्ञानत्व में कोई विशेषता न होने पर भी अर्थक्रिया ज्ञान में ही प्रामाण्य का स्वतस्त्व माना जाता है तो फिर दूसरे ज्ञानों ने क्या अपराध किया हैं? यह जो कहा है " प्रवर्तक होने से ज्ञानान्तरों को प्रामाण्य परीक्षा आवश्यक है, अर्थ क्रियाज्ञान का प्रयोजन तो सिद्ध है, अतः यहाँ पर प्रामाण्य परीक्षा की Hasa कता नहीं है । " यह कथन भी कमजोर है, क्योंकि प्रमिति हो तो प्रमाण के फल के रूप में प्रसिद्ध है और इनकी निष्पत्ति प्रमाण से ही होती है, इसलिये कि यहाँ पर भी प्रयोजन सिद्ध हो गया, अतः अर्थक्रियाज्ञान के समान ही यह भी निर्दुष्ट होगा । प्रवर्तकता इच्छा प्रभृति को हो मानो जाती हैं, प्रमाणों की नहीं, क्योंकि प्रमाण अनविगत वस्तु के ज्ञापक माने जाते हैं? अतः इनमें अकारकता १ नहीं होती । यह कहना कि इससे पूर्व कथन का विरोध होगा, जहाँ पर कि पहले के संशय ज्ञान के निवर्तक होने के कारण ज्ञान का फलवत्त्व माना गया है ", इसलिये गलत है कि वहाँ पर प्रमिति प्रवर्तक नहीं होती है इसी अभिप्राय से प्रयोजन. सिद्ध है, ऐसा कहा गया है । वहीं सार्थक भी है । france तो अर्थक्रिया ज्ञान में भी समान हो है । जहाँ पर संशय उठ खड़ा होता है, वहीं पर अवश्य ही प्रामाण्य की परीक्षा करनी चाहिये । प्रामाण की परीक्षा के लिये संशय की कल्पना नहीं कर लेनी चाहिये । जैसा कि कहा गया है --- " जो व्यक्ति मोहवश अप ( af वभाग ) बाधक की कल्पना कर लेता है, वह व्यक्ति सभी व्यवहारों में संशयालु होने के कारण नष्ट हो जाता है | जबरदस्ती उठाया गया संशय व्यक्ति को सभी कार्यों के लिये अस्त - व्यस्त दृष्टिकोण प्रदान कर देता है । ऐसे व्यक्ति को अपनी १. जैसे पहले से अविद्यमान घड़ा, मिट्टी आदि से बनाया जाता है, ऐसे प्रमाणों के द्वारा प्रमेम ( प्रमाणों के विषय ) बनाये ' नहीं जाते किन्तु पहले से विद्यमान ही वट - पट आदि प्रमेय ( प्रमाणों के विषय ) का ज्ञानमात्र प्रमाणों से होता है ।
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६२ वेदार्थपारिजातः व्रजेत् ॥ हठादुत्पद्यमानस्तु हिनस्ति सकलाः क्रियाः । स्वभार्यापरिरम्भेऽपि भवेन्मात्रादिसंशयः ॥ ' इत्यादिना । अर्थक्रिया-कारित्वं तु कूटकार्षापणादीनां भृशं दृश्यते, स्वप्नाङ्गनाया ऐत विकिरणहेतुत्वमपि दृश्यत एव । स्वप्ने पानावगाहनादीना -मपि व्यभिचारदर्शनान्नार्थक्रियाज्ञानेनापि प्रामाण्यनिर्णयः । अर्थक्रियाज्ञानमपि नाप्रवृत्तस्य भवति, प्रामाण्यावधारणपूर्वि-कायां प्रवृत्तौ कारणगुणनिश्चये प्रामाण्यचचवबद्ध चक्रकादिकमापतत्येव, अनवस्थापि न शाम्यति । दोषज्ञाने तु सत्यप्रामाण्य-मेव निश्चीयते, अप्रामाण्यस्य परतस्त्वाभ्युपगमात् । फलज्ञानेन वा कारणपरीक्षया वा दोषज्ञाने स्वतः प्राप्तस्य प्रामाण्यस्या-पनोदनम्, दोषाभावज्ञाने तु तदनपोदनादनपोदितं सत् तिष्ठत्येव । फलज्ञानमपि न पूर्वज्ञानस्य प्रामाण्यनिर्धारकं भवति, व्यभिचारदर्शनादित्यप्युक्तमेव । तेन तदपि परीक्षणीयमेव, अन्यथा तद्वदेव प्रवर्तकमपि यावद्वाधादिकं नोदियात् प्रमाणमेव । है. यदयुक्तम् -- ' अथ संशयोत्पत्तिसामर्थ्यादेव यथार्थनिश्चयः फलज्ञानेन लप्स्यते । संशयो हि नाम द्वैविध्यदर्शना-द्विना न भवति नहि स्थाणुपुरुषसाहचर्यमूर्ध्वताख्यस्य धर्मस्य यो न जानाति स तं दृष्ट्वा स्थाणुर्वा पुरुषो वेति संशेते । " वमूर्ध्वत्वादिवद् बोधरूपत्यस्य व्यभिचारित्वाव्यभिचारित्वाभ्यां सहृदर्शनमवश्यमाश्रयणीयम् । अन्यथा तद्विषयसंशयानुत्पादः स्यात् । अतः पूर्वमव्यभिचारित्वदर्शने सिद्धे यस्तदा तत्परिच्छेदोपयः स पश्चादपि भविष्यतीति सर्वथा सिद्धयत्यव्यभिचारि त्वनिश्चयः । अनिश्चितप्रामाण्यादपि वा फज्ञानात् प्रवर्तकस्य प्रामाण्यनिश्चयो युक्तः । न तु स्वत उत्पत्तौ प्रमाणादा-भासयोविशेषग्रहणात् फलज्ञाने च तद्विशेषप्रतिभासात् ' इति, तदपि न किञ्चित् संशयकुक्षिनिविष्टस्याव्यभिचारित्वदर्शनस्य प्रवृ भार्या केबलिंग के समय की अपनी माता का संशय हो सकता है " इत्यादि । नकली सिक्कों से भी ज्यादातर व्यवहार सम्पन्न होते देखे गये हैं, स्वप्न में देखी गई स्त्री भी शुक्र - क्षरण में कारण होती है । इसी तरह स्वप्न में जल से पान, अवगाहन आदि क्रियाओं का काभिचार ' देखा जाता है, तो इस प्रकार अर्थक्रिया के ज्ञान से भी प्रामाण्य का निर्णय नहीं हो पाता । अर्थक्रिया ज्ञान भी अप्रयुक्त व्यक्ति को नहीं होता, ऐसी परिस्थिति में प्रामाण्य के अवधारण के बाद ही प्रवृत्ति के होने पर और तब भारत गुण का विव्य होने पर प्रामाण्य चर्चा के साथ जुड़े हुए चक्रकादि को आपति को कौन रोक सकता है, या भी किसी तरह समाहित नहीं हो सकती । दोपज्ञान के होने पर तो अपामण्य का ही निश्चय होता है, क्योंकि वणमाण का परतस्त्व माना जाना है । फल के अध से TET कारण की परीक्षा से दोष का ज्ञान होने पर स्वतःप्राप्त प्रामाण्य का अपनोदन हो जाता हे और अब दोष के बाद शाम इंटन है, तब ज्ञान प्रामाण में अपमोदित ( विरक्त अथवा बाधित ) व होकर अवाधित रूप में विद्यमान रहता है । फल कुर्व भाग के प्रामाण्य का यार नहीं होता, क्योंकि इसमें भी व्यभिचार देखा जाता है । अर्थात् फल ज्ञान है और प्रामाण्य नहीं है, यह बात पहले ही कही जा चुकी है । इसलिये इसकी भी परीक्षा करनी ही है । जयथा उसी की तरह प्रवर्तक ज्ञान भी जब तक दोप - ज्ञान या बाध उत्पन्न न हो, तब तक प्रमाण ही है । यह कहा गया है कि ' जब यदि यह कहें कि संशय की उत्पत्ति की सामय्यं से हो कदज्ञान पे aunter का fre हो जायगा, तो संशय वैविध्य के दर्शन के बिना नहीं होता । स्थाणु और पुत्रण में समान रूप से मिलने वाले कता रूपी धर्म के साहचर्य को जो नहीं जानता, वह उसको देखकर इस संशय में नहीं पड़ेगा कि यह स्थाणु है या पुरुष? इसलिये ऊर्ध्व आदि की बोधरूपता का व्यभिचारित्व और अव्यभिचारित्व के साथ सहदर्शन ( साथ ही साथ ज्ञान ) अव अपेक्षित रहेगा | अन्यथा तहिपयक संशय की उत्पत्ति नहीं होगी । अतः पहले अव्यभिचारित्व वर्शन के सिद्ध हो जाने पर उसके निश्चय के उपाय बाद में मां हो जायेंगे, फरत: अव्यभिचारित्व का fear भी रह से बन जाता है । अनिश्चित प्रायाय वाले फलज्ञान में भी प्रवर्तक ज्ञान का प्रामाण्य-निश्चय उचित है । स्वतः उत्पत्ति में प्रमाण और प्रमाणाभास के विशेष ग्रहण ( ज्ञान ) से फलज्ञान में फलविशेष के प्रति प्रतिभास मैं यह सम्भव नहीं है " यह कथन भी जैसा तैसा ही है, क्योंकि संशय के उदर में पड़ा हुमा अन्यमिचारि दर्शन प्रवृति का अंग नहीं १. यह स्पष्ट है कि स्वप्न में प्यास लगने पर दिखाई देने वाला पानी हम जी पी लेते हैं और उससे मान भी कर लेते हैं. अतः अर्थक्रियाकारित्व तो वहाँ है, किन्तु स्वप्न में होने वाला जल - ज्ञान प्रमाण ( सच्चा ) तो नहीं है । इसलिये अर्थक्रिया के आधार पर प्रामाण्य का निश्चय करना सर्वथा गलत है ।
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६३ त्यनङ्गत्वात् अनिश्चितप्रामाण्यात् फलदर्शनाच्च न प्रवर्तकज्ञानस्य प्रामाण्यनिश्चयो युक्तः, अप्रमाणस्य प्रामाण्यसाधकत्वानुप-पत्तेः । तस्यापि प्रामाण्यनिर्णयाय प्रामाण्यान्वेषणे चानवस्था नोपशाम्यत्येव, बाधादिभिः प्रमाणतदाभासयोविशेषग्रहणे तु न सिद्धान्तहानिः । बाधाद्यभावे तु स्वाभाविकं प्रामाण्यमनपोदितमेव तिष्ठति । यदुक्तम्— ' दृष्टविरुद्धत्वादनवस्थाद्यभिधानं विरुद्धाभिधानमेव ' इति, तदपि न, प्रामाण्यस्वतस्त्वादेव दृष्टव्यवहारोप-पत्तेः । एवं प्रमाणानां परीक्षणं प्रमाणैरप्रमाणैर्वा? प्रमाणैरपि परीक्षितैरपरीक्षितैर्वा? अप्रमाणैरपरीक्षितैः प्रमाणैः प्रमाणपरीक्षणापेक्षया अपरीक्षणमेव युक्तम् । परीक्षितैः परीक्षणे त्वनवस्थैव । तस्मात् प्रामाण्यस्वतस्त्वमेवाभ्युपगन्तव्यम् | सन्देहाद्युत्पत्तौ तु बाधज्ञानका रणदोषज्ञानादिकमन्वेष्टव्यम् । तदुपलम्भेऽप्रामाण्यम्, अनुपलम्भे तु स्वाभाविकं प्रामाण्यमेष्टव्यम् । दृष्टे विषयेऽर्थानर्था अपि दृष्टा एव ततस्तत्परीक्षणे महताभिनिवेशेन जनानां प्रवृत्तिः । अदृष्टे त्वर्थानर्थावपि तथाविधावेव । यदि दृष्टे विषये प्रामाण्यपरीक्षामन्तरैव प्रवृत्तिस्तदा कुतोऽदृष्टे तत्परीक्षणाभिनिवेशः । बाघ - विचार: यत्र शुक्तिरजतादों नेदं रजतमित्यर्थान्यथात्वज्ञानं जायते तत्र स्वर्थान्यथात्वरूपाप्रमाणता शीघ्रगम्येवेति नावस्थाशङ्काप, तदपवादात्मनस्तस्य तद्वाधमन्तरानुत्पत्तेः । पूर्वं तु परस्याजातत्वात्तदबाधित्वैव जायते । तदुक्तम्-हो सकता, उसका प्रामाण्य भी निश्चित नहीं है । फल के दर्शन से भी प्रवर्तक ज्ञान का प्रामाण्य rear ठीक नहीं हैं, क्योंकि प्रमाण माणसाधक नहीं हो सकता । इसके प्रामाण्य के निर्णय के लिये यदि पुनः प्रामाण्य का अन्वेषण करना है, तो ऐसी परिस्थिति में था की शान्ति ( ममाशि ) नहीं होगी । बाघ प्रभृति से प्रमाण और प्रमाणामास की विशेषता के ग्रहण करने में कोई सिद्धान्त की हानि नहीं है । बाघ आदि यदि नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से प्रामाण्य की अव्याहत स्थिति रहेगी । यह को कहा गया है कि " दृष्ट प्रमाण से विरुद्ध होने से अनवस्था आदि की बात करना विरुद्ध कथन ही माना जायगा, यह भी गलत है, क्योंकि प्रामाण्य के स्वतस्त्व से ही सारे इष्ट व्यवहारों की उपपत्ति बन सकेगी । इसी तरह आप यह बताइये कि प्राणों की परीक्षा प्रमाणों में होगी या अप्रमाणों में? यदि प्रमाणों से होगी तो वे परीक्षित होंगे अथवा अपरीक्षित? प्रमाणों से तथा अपरीक्षित प्रमाणों से यदि प्रमाण की परीक्षा होनी है, तो इसकी अपेक्षा प्रमाण की परीक्षा हो न की जाय, यही अच्छा है । यदि परीक्षितों से परीक्षा करनी है तो उसमें अनवस्था दोष होगा । इसलिये यही अच्छा है कि प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः ही माना जाय । सन्देह आदि की उत्पत्ति होने पर बाघ ज्ञान, कारणमत दोष ज्ञान आदि की खोज करनी चाहिये | इनकी उपलब्धि हो जाने पर प्रामाण्य मानना पड़ेगा । यदि उपलब्धि नहीं होतो तो स्वाभाविक प्रामाण्य मानना पड़ेगा । दृष्ट विषय में अर्थ और बन दोनों दृष्ट की है, बत: इनकी परीक्षा में महान् प्रयत्न के साथ मनुष्यों की प्रवृत्ति होती है | are faar में अर्थ और अनर्थ भी ही है | यदि दृष्ट विषय में प्रामाण्य की परीक्षा के बिना ही प्रवृत्ति हो सकती है, तब बद्दष्ट के विषय में प्रमाणों की परीक्षा का इतना आग्रह क्यों बाघ विचार यहाँ शुक्ति में ज्ञान रजत का होता है, वहां बाद में जब यह ज्ञान होता है aar अन्यथा ज्ञान हो गया था, इस सरह की प्रतीति होती है, तब इस तरह के कि यह रजत ( चाँदी ) नहीं है, यहाँ पर मुझे ज्ञान को अप्रामाणिकता का बोध शीघ्र हो जाता १. एक प्रमाण की परीक्षा करने के लिये दूसरा प्राण फिर उस दूसरे प्रमाण की परीक्षा करने के लिये तीसरा प्रमाण और तीसरे के लिये चौथा, चौथे के लिये पांच इस तरह से प्रभागों को परीक्षा कभी ना हो नहीं होगी । यदि अन्त में किसी एक प्रमाण को बिना परीक्षा किये हो सत्य मान को तो पहले प्रमाण को हो सत्य मात लेने में क्या आपति है?
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६४ वेदार्थपारिजातः
पूर्वं परमजातत्वादबाधित्वैव जायते । परस्यानन्ययोत्पादान्न त्वबाधेन सम्भवः ॥
एतेन रजतज्ञानस्य ज्यायसः कनीयसा नेदं रजतमिति ज्ञानेन कथं बाधः, ज्यागसा कनीयस एव बाधौचित्या-दिपास्तम् । अनपेक्षितस्य ज्यायस्त्वं बाध्यत्वे हेतुर्न बाधकत्वे इत्युक्तमेव-पूर्वात्परवलीयस्त्वं तत्र नाम प्रतीयताम् । अन्योन्यनिरपेक्षाणां यत्र जन्म धियां भवेत् ॥ इति | ततश्चात्र पूर्वस्य निरपेक्षत्वेऽपि पूर्वाबाधेनोत्पत्तिमेवानासादयतीत्तरेणेत्युत्पत्त्यवस्थायामेवार्थान्यथात्वरूपाप्रामाण्य-बोधनाघवमेव । नन्वेवं समानविषयेणार्थान्यथात्वज्ञानेन पूर्वस्य बाधेऽपि दोपज्ञानेन तु भिन्नविषयेण कथं पीतशङ्खज्ञानं वाध्यते? यतोऽत्र पीतशङ्खज्ञानं शङ्ख पीतिमानमवगमयति, दोषज्ञानं तु नेत्रे पित्तदोषमिति वाच्यम्, दुटकारणवो विषयभेदेन तादृशलाघवाभावेऽपि कारणदोषावगमप्रणात्याऽऽधिकतुल्यताप्राप्त्या गोदोहनेन चमसस्येव बाधोपपत्तेः । यथा ' गोदाहनेन पशुकामस्य प्रणयेत् ' इति पुरुषार्थेनापि गोदोहनेन क्रत्वर्थस्यापि चमसस्यार्थिकतुल्यविपयतया भवति बाधः, द्वयोरपि प्रणयनद्वावात् । गोदोहनेन तत्साधने चमसस्यानिवृतिर्भवति, एवमत्राऽपि । यद्यपि पित्तज्ञानं पित्तं गृह्णाति पिस च श्वेते पीतभ्रमस्य कारणतयाज्वगते नक्षुषि दृश्यमानं स्वकार्यस्य है, अतः यहाँ पर अनवस्था दोष? की शंका नहीं रहती, क्योकि यह दूसरा ज्ञान पहल ज्ञान का अपवाद है, अतः जब तक वह पहले ज्ञान को बाध नहीं लेगा, तब तक यह दूसरा ज्ञान पैदा ही नहीं हो सकता | पूर्व ज्ञान की स्थिति के समय तो उत्तर ज्ञान पैदा हुआ नहीं है, मतः यह जिना किसी को बाधित किये पैदा होता है । जैसा कि कहा गया है- " बाद में पैदा होने वाले ज्ञान के पहले पैदा न होने से पहला ज्ञान दूसरे ज्ञान को बाधित किये ही पैदा होता है । किन्तु दुसरा ज्ञान तो पहले ज्ञान को बाधित किये बिना पैदा ही नहीं हो सकता । अतः दूसरा ज्ञान पहले ज्ञान को बाधित करके ही पैदा होता है, क्योंकि पहले ज्ञान का बात ही दूसरे ज्ञान का स्वरूप है, अतः उसको बिना बाधे वह कैसे पैदा हो सकता है । " इस तर्क के आधार पर किसी की इस उक्ति काण्ड हो जाता है कि रजत नहीं है, यह ज्ञान कनिष्ठ ( पश्चाद्भावी ) है, यतः ओष्ठ ज्ञान का कनिष्ठ ज्ञान से ज्ञान का वाव होना चाहिये । " " रजत ज्ञान तो ज्येष्ट ( पूर्वोत् ) है और यह कैसे बाघ होगा? प्रत्युत ज्येष्ठ ज्ञान से ही कनिष्ठ यह कहा जा चुका है कि अनपेक्षित ज्ञान की ज्येष्ठतः उसको बाध्यता में ही कारण होती है, वह किसी की बापित नहीं हो सकती । " जहाँ पर ज्ञान सन्तति की अन्योन्य निरपेक्ष उत्पत्ति होती है, वहाँ पर पूर्व बुद्धि की अपेक्षा पर बुद्धि की मानी जाती है । " अर्थात् एक दो तीन वादि शाम वहाँ एक दूसरे की अपेक्षा के बिना हो, वहाँ पूर्व की अपेक्षा पर ज्ञान बलवान होता है । किन्तु यहाँ पर पूर्व ज्ञान के निरपेक्ष होने पर भी वह पर ज्ञान की अपेक्षा कृष्का ही माना जायगा, क्योंकि पूर्व ज्ञान को बाधित किये बिना उत्तर ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती और जब यह उत्पन्न हो जाता है तो उसी अवस्था में पूर्व ज्ञान के अर्थात्ययात्व को aar कर उसके नाम का बोध कराता है । इस प्रकार लाघन ही है । यहाँ पर प्रश्न उठता है कि शुक्ति, रजत अदि स्वछ में पक प्रकार के समानविषयक ज्ञाद पूर्व ज्ञान का बाप सम्भव है, अर्थान्ययात्व ज्ञान से, अर्थात् यह रजत न होकर शुक्ति है. इस किन्तु दोष ज्ञान तो free feurs है, उसे दांत को १. शुक्तिका में रजत का साथ हुषा, तदनन्तर ' यह रजत नहीं ' यह ज्ञान होने पर पूर्व रजत ज्ञान बाधित होता है । इस स्थिति में शंका हो सकती है कि जैसे द्वितीय का प्रथम शान के प्रामाण्य का विघटक है, वैसे एक खूप काम को मानकर उसे द्वितीय ज्ञान के प्रामाण्य का विघटक क्यों न माना जाय? इस प्रकार अनवस्था क्यों न होगी? इसके यदि ऐसा हो तो सभी व्यवहार चिन्न हो उत्तर में कहा जाता है कि उक्षा मात्र से कहीं भी शंका नहीं होती । जायेंगे | भगवान् ने ठीक हो कहा कि ' संशयात्मा का यह लोक भी नहीं, बाघशान होने पर ही वह द्वितीय का बाधक बनेगा । अतः अनवस्था नहीं । न परलोक हो ' । तृतीय ज्ञान में दोष ज्ञान या
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वैदार्थपारिजातः ६५ पीतज्ञानस्य भ्रान्तत्वमवगमयति, भ्रान्तत्वेन चार्थान्यथात्वमिति बाधसिद्धि तथापि नाऽयमुत्सर्गे यदाद्यास्य द्वितीयेन बाधः । किन्तु द्वितीये बाधज्ञाने यदि तृतीयं बाधकज्ञानं दोषान्तरज्ञानं च न भवेत्, तदेवैषा गतिः । तदुद्भवे तु द्वितीयस्य मिथ्यात्वादाद्यस्यैव तद्वाधकत्वेन प्रामाण्यम् । न चैवं तृतीयज्ञानाधीनमाद्यस्य प्रामाण्यमिति परायत्तमेव प्रामाण्यमिति वाच्यम्, तस्योत्पत्तित एवार्थमव-बोधयतः स्वत एव प्रामाण्यात् । द्वितीयेन दोषज्ञानेन तदपवादः प्रसक्त: । तृतीयेन द्वितीये बाधिते सति अवगतदोषत्वात् अपवाद एवं | तनु यथाऽऽद्यस्य द्वितीयेन दोषोऽवगतस्तस्यापि तृतीयेन, तथा तृतीयस्याप्यन्येन दोषाऽवगमसंभवान्न Raftaare इति चेन्न भावानववोधात् । तथाहि -- यदा जाग्रदशायां स्वस्थेन्द्रियमनस्कस्य स्फीतप्रकाश मध्यवर्ति-सन्निहितघटज्ञाने लोकप्रसिद्धमिथ्यात्व हेतवो दोपा नानुभूयन्ते तदा दोषाशङ्काया अभावाद अप्रामाण्यशङ्काऽपि पीतता का ज्ञान कैसे बाधित होगा? क्योंकि यहां पर पीत शंख का ज्ञान शंख में पोलेपन का ज्ञान कराता है और दोष का ज्ञान क्षेत्र में पित्तजन्य दोष को बताता है, इस प्रकार इन दोनों का विषय भिन्न है । कारणगत ( नेत्रगत ) दोप ज्ञान से विषयगत ( शङ्खगत ) पीतिमा का बाथ प्राप्त ही नहीं होता । समान विषय में ही लाघवात् बाघ वाधकभाव की प्राप्ति हो सकती थी । यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि कारणात दोष के ज्ञान से उत्पन्न ज्ञान में थथार्थता बुद्धि नहीं होगी । अर्यान्यवाल का ही ज्ञान होगा । इसी से are होगा । जैसे गोदोहन से चमस का बाथ होता है, उसी प्रकार यहाँ पर भी दोष ज्ञान से पीत शंख ज्ञान का नाम हो सकेगा । जैसे कि " पशुकामना वाला गोदोहन से प्रणयन करे " " इस विधि वाक्य के द्वारा पुरुषार्थ स्वरूप गोदोहन से कत्वर्थं जमस का आर्थिक विषय समान होने के कारण बाघ होता है, क्योंकि भोदोहन और मस दोनों ही प्रणयन के साधन है । गोदोहन से प्रणयन करने पर चमम की स्वभावतः निवृत्ति हो जायगी । वपी तरह यहां पर क्षेत्र दोष के ज्ञान से शंक्ष में पीत ज्ञान की निवृति हो जायेंगी । यद्यपि पित्त ज्ञान पित्त को ग्रहण करता है । यहीं पित्त श्वेत वस्तु में पोत वर्ष के भ्रम का कारण होता है, ऐसा मग लेने पर क्षु के द्वारा पनि पीत ज्ञान की भ्रान्तता को अवगति हो जाती है । भ्रान्त होने से यह ज्ञात हो जाता है कि अर्थ मेधा भयगत हो रहा था, उससे मित्र प्रकार का है, इस प्रकार बाम की सिद्धि हो जाती है, वो भी यह नियम नहीं है कि पहले ज्ञान का बाध दूसरे ज्ञान से होना हो । किन्तु यह स्थिति तभी जाती है, जबकि द्वितीय बाघ ज्ञान के बाद उसके बापक तृतीय ज्ञान का अथवा दोषान्तर का ज्ञान न हो । यदि तृतीय बाधक ज्ञान का उद्भव हो गया तो उसमें द्वितीय बाप ज्ञान के ही मिथ्या सिद्ध हो जाने से प्रथम ज्ञान का भी प्रामाण द्वितीय ज्ञान के बाधक रूप में ही होगा । इस पर यह वापस नहीं उठाई जा सकती कि इम तरह से तो अपम ज्ञान का प्रामाण्य तृतीय ज्ञान के अधीन होने से परता ही होगा, क्योंकि प्रथम ज्ञान अपनी उत्पत्ति के समय से ही गर्व की अवगति कराता है, अत: उसके स्वतः प्रामाण्य में कोई बाधा नहीं उठती । द्वितीय बाधक ज्ञान से अथवा दोष ज्ञान से प्रथम ज्ञानगत शाम ण्य का अपवाद प्राप्त हुआ था, किन्तु जब तृतीय ज्ञान द्वितील ज्ञान का बाधक हो जाता है, तो इस परिस्थिति में दोष का शान न होने से प्रामाण्य का बाप नहीं हो पाता । यह प्रश्न उठता है कि जैसे प्रथम ज्ञान में द्वितीय ज्ञान से और तृतीय ज्ञान से द्वितीय ज्ञान में दोष का ज्ञान होता है, उसी तरह से तृतीय ज्ञान में भी अन्य ज्ञान से दोप की अवगति संभव हो सकती है, इस तरह से तो मनुष्य कहीं भी बात नहीं हो सकेगा, तो यह प्रश्न अभिप्राय बिना समझे ही उठा दिया गया है । जागद बस्या में स्वस्थ इद्रिय और मन वाला व्यक्ति जब चारों तरफ फैले प्रकाश के बीच में रक्खे हुए घट को देखता है और वहाँ पर क प्रसिद्ध संशय, बाथ नादि दोषों की संभावना नहीं रहती तो इस ९ १. वपूर्णमास में जल प्रणयन एक अंग है । यह प्रणयन ' वसस ' पात्र से किया जाता है- ' मसेनापः प्रणत ' । यह नित्य है । प्रणयन में प्रवृत्त यजमान गुण फल की कामना करता हो तो ' गोवोहमेन प्रणयेत् पशुकामः इस विधि से प्रणयन के लिए गोवोहन प्राप्त है | गाय जिस पात्र में ही जाती है, वह गोदोहन हैं, यहाँ ' काम्यं नित्यस्थ बाणकम्? इस न्याय से काम्य गोदोहन द्वारा नित्य चमस का बाघ है ।
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qardanfcara: न भवत्येव । यादृग्विधेषु हि अप्रामाण्यसंभवः तत्रैव दोषशङ्का, न सर्वत्र । नहि ज्ञानत्वमात्रेण संशयः, तस्य साधारणधर्मादिनिश्चयाधीनत्वात् । तन्माद अवश्यं कानिचित् ज्ञानाति अप्रमाणान्येगोत्पद्यन्ते । यत्र दूरत्वादिदोपसम्भवाद-प्रामाण्यशङ्का तत्रापि प्रत्यासतिगमनादिनाऽन्यतरपदार्थनिर्णयान्नातिदूरगणनम् । तृतीयज्ञाने यदि दोपो न संभावित, ततस्तदवधिरेव निर्णयः । यदि सम्भावितस्ततस्तन्निराकरणप्रयत्नेन चतुर्थज्ञानावसानो निर्णयः, नाविकज्ञानापेक्षा । तृतीयेन चतुर्थेन वा द्वितीयस्य तृतीयस्य वा बाधे आद्यस्य द्वितीयस्य वा यस्यैव प्रामाण्यं समर्थ्यते, तस्य स्वा-भाविकं प्रमाण्यमनपोदितं भवति । इतरदपवादादप्रमाणमिति नानवस्था । तदुक्तम् ---एवं त्रिचतुरखानजन्मनो नाघिका मतिः । प्रायते तावतैवैकं स्वतः प्रामाण्यमनुते ॥ इति । तत्र शब्दे वक्त्रधीन एव दोपोद्भवः क्वचिद् गुणवद्वक्तृकस्वेन दोषाभावश्च । वेदस्य चापौरुषेयत्वात् पुरुषाभावेन निराश्रयत्वाद् दोषाभावेनाऽनपोदितं स्वतः प्रामाण्यमेव । न च ववतृगुणान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात् शब्दस्य गुणाधीनमेव प्रामाण्यमिति तदभावेन वेदस्याप्रामाण्यमेवेति वाच्यम्, प्रमाणानां परायत्तप्रामाण्यस्य निराकृतत्वेन प्रामाण्यस्वतस्त्वसाधनात्, अन्वयव्यतिरेकयोश्च दोषाभावेन गतार्थत्वाच्च । प्रमाणभूत पौरुषेयवचस्सु न केवलं गुणा दृष्टाः, किन्तु दोषभावोऽपि दृष्टः । दोषभावनिबन्धनत्वेन प्रामाण्यस्य वेदेऽपि सुलभत्वात् । न चैवमपि प्रामाण्यपरतस्त्वमेवायातम्, तस्यापवादाभाव एवोपयोगित्वात् । गुणेभ्यो दोषाभावादप्रामाण्यद्वयाभावः परिस्थिति में अप्रामाण्य की कोई शंका नहीं उठती । जिस स्थिति में अप्रामाण्य की संभावना उठ सकती है, वहीं दोष की भागका रहती है, सब जगह नहीं । केवल ज्ञान है, इसीलिये उसके साथ संशय नहीं उठ खड़ा होता, संजय की उत्पत्ति तो साधारण आदि को देखने से होती है । इसलिये यही मानना उचित है कि कुछ ज्ञान अप्रामाणिक ही उत्पन्न होते हैं । जहां पर दूरी वादि दोषों की उपस्थिति में अप्राय गी शंका होती है, वहाँ पर भी पास जाने पर भी किसी एक पदार्थ का विश्वय हो जाता है, अतः संशय को निवृत्ति के लिये अधिक नहीं जाना पड़ता । तृतीय ज्ञान में यदि दोष गंभावित नहीं है तो बही निर्णय की सीमा है । यदि दोष संभा-वित्त # तो उसके निराकरण के लिये चतुर्थ ज्ञान के अन्त में निर्णय हो हो जाता है, इससे अधिक ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती । तृतीय व चतुर्थ ज्ञान से द्वितीय अथवा तृतीय ज्ञान के बाध होने पर प्रथम व द्वितीय मे से विस किसी का प्रमाण समर्पित होता है, का स्वाभाविक प्रमाप्य बाधित या दिस्त नहीं होता । प्रामाण्य के अपवाद से दूसरा अप्रमाण होता है, फलत: यहीं पर अवस्था दोष नहीं होता । जैगा कि कहा गया है --तरह तीन या चार ज्ञान से अधिक दूरी तक बुद्धि को ले जाने की आवश्यकता है । उसने में ही किसी एक ज्ञान का प्रामाण्य अवगत हो जाता है । " to में के बीन ही दोष का उद्भव होता है । जब वक्ता गुणवान् होता है जो तत्प्रयुक्त शब्द में दोष नहीं रहता । पैद सो पेय है | यहाँ पर पुरुष के न रहने से पुरुष प्रयुक्त दोषों के अभाव के कारण वेद का स्वतः प्रामाण्य ज्यों का स्थों रहता है । यह कहना उचित नहीं है कि वक्ता के गुणवान् होने पर शब्द प्रमाण होता है और गुणवान् न होने पर प्रमाण नहीं होता, इस अन्वय और व्यतिरेक के कारण शब्द का प्रामाण्य गुणाधीन है । वेद में वक्ता के अभाव में यह गुणाधीन प्रामाण्य कैसे बनेगा? प्रमाणों की परतः प्रमाणता का निराकरण किया जा चुका है और स्वतः प्रामाण्य सिद्ध किया गया है । उक्त अन्वय और व्यतिरेक की माता दोषाभाव के ज्ञान से हो जायगी । प्रमाणभूत पुरुष के वचन में गुण न होने पर भी वप्रामाण्य नहीं होता, किन्तु दोष होने पर हो अप्रामाण्य होता है । इस तरह गुण न होने पर भी दोषाभाव से ही वचनों का प्रामाण्य देखा जाता है । वेद में दोषाभाव स्वाभाविक अतः वे परम प्रमाण हैं यह कहना उपयोग des rare के है कि इस तरह से तो दोषाभाव से प्रयुक्त होने से प्रामाण्य का पतस्त्व ही मावेगा, क्योंकि दोषाभाव का अभाव ज्ञान में होता है । गुणों के कारण अथवा दोषों की अनुपस्थिति में दोनों ही प्रकार से मान्य के
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वेदार्थपारिजात: ततश्वानपोदितं स्वतः प्रामाण्यमेव तिष्ठति । यत्र साक्षाद्विपरीतबोधकज्ञानादर्थान्यथात्वमवगम्यते यत्र च दोषज्ञानेनोभय-त्रापि ज्ञानस्यायथार्थत्वे दोष एव कारणम्, दोषभावेन तद्वयास स्वेनोत्सर्गस्यानपवाद एव सिद्धयति । अपवादाभावे प्रत्य-योत्पत्तिहेतुत्वात् प्रत्यक्षादिवत् पौरुषेयवाक्यस्यापि प्रामाण्यं प्राप्तम्, तन्नापनीयते । एवं पौरुषेयवाक्यस्थापि स्वतः प्रामाण्ये सिद्धेऽपौरुषेये वेदे तु सुतरां स्वतः प्रामाण्यम् । ननु दोषाभावस्य गुणाधनत्वे पुनरपि सैव स्थितिरिति चेन्न प्रामाण्यावधारणे गुणानां ज्ञायमानत्वेन कारण-त्वेऽनवस्थासम्भवेऽपि दोषभावस्य सत्तामात्रेणोपकारित्वेन तदसम्भवात् । गुणनिराकृतदोषा औत्सर्गिकं प्रामाण्यं नोपघ्नन्तीति कानवस्थावकाशः? वेदे तु वक्त्रभावादपवादनिर्मुक्तिस्ततोऽपि लघीयसी, तन तत्रापवादशङ्काऽपि नोदेति । एवं लोकेऽपि शब्दप्रामाण्यस्य वक्त्रपेक्षाभावेन वेदप्रामाण्यसिद्धयर्थं कर्तृकल्पनमनावश्यकम् । शाक्यादिवद् अशा-माये कल्पयितव्ये एव कर्तृकल्पना युक्ता । यच्वोकमाताप्रणीतलन बालोन्मत्तादिवाक्यवदप्रामाण्यमेवेति चेन्न! प्रामाण्य-स्वतस्त्वसिद्धेः । न च तर्हि पौरुषेयेऽपि वाक्ये प्रमाणान्तरापेक्षाऽनपेक्षणीयेति वाच्यम्, तथात्वेऽप्रमाणमूलतया दुष्टमूलत्वेन प्रामाण्यापवादापातात् । वेदे त्वपौरुषेयत्वेनाप्रमाणमूलत्वाशङ्काया अभावेन तदयोगात् । वेदे प्रमाणान्तरमला भावो भूषणमेव, न दूषणम्, प्रमाणान्तरविषयत्वेनानधिगतगन्तृत्वाभावेनानुवादकत्वापत्तेः । are का बोध होता है और तब बना रूप में स्वतः प्रामाण्य अवस्थित रहता है । कहीं पर साक्षात् विपर्यय बोधक ज्ञान से मुक्ति प्रभृति वस्तु का रजतादि के रूप में अन्यथा बोध होता है और जहां पर दोष ज्ञान से पीव शंख बादि का अन्यया बोब होता है दोनो ही स्थलों में ज्ञान की प्रथार्थता में दोष ही कारण है । दोषों के बाद में उक्त दोनों प्रकार के अयथार्थ बोध यहीं ताते, अतः यहाँ वर स्वाभाविक प्रागण के अपवाद की वृति नहीं होती | अपवाद अभाव में प्रत्यक्ष आदि के समव पौरुषेय वाक्य भी ज्ञान की उत्पत्ति में कारण है । यतः इसको प्रमाणता पष्ट नहीं होती । इस तरह से न पौनपेय वाक्य की स्वतः सिद्ध है, तो फिर अपौरुषेय वेद की स्वतः माता तो सुर्य गिद्ध हो जायगी । प्रश्न उठता है कि यदि वाभान का ज्ञान गुण शाह के अधीन है तो फिर यही स्थिति आ उपस्थित हुई, अर्थात् प्रगाण का परतस्तव ही सिद्ध हुना, तो यह बात ठीक नहीं है, क्योंकि प्रामाण्य असे गुणों की कारणता ज्ञाता के आधार पर होने से जनजस्ता की हानि संभावना रहती है, तो भी दोषाभाय तो मान से उपकारी होता है, अतः यहां पर ना की प्रति नहीं होगी । गुणों के द्वारा नि बाप बीमर्षिक प्रामाण का अब नहीं करते, तत्र नया क्यों होगी? वेव में तो कोई पता नहीं है, अतः यहां पर अपवाद का प्रभार बढी राखता से बात हो जाता है लिये वेद में वक्ता के अभाव के कारण अप्रामाण का अभाव अत्यन्त सरलता ने राम से आता है | इसलिये वहाँ स्वागाविक प्रामाण्य के वध की शंका ही नहीं होती । इस तरह जब कि लोक में भी शब्द के प्रामाण में गुणवान् वक्ता की अपेक्षा नहीं रहती, किन्तु उसमें स्वाभाविक प्रामाण्य है, फिर वेद में उसके प्रामाण्य का सिद्धि के लिये कर्ता को कल्पना सुतरां अनावश्यक है । नौद्ध सिद्धान्त के अनुसार स्वाभाविक म सिद्ध करने के लिये ही कर्ता की कल्पना उचित होगी है । यह कहना कि यास प्रणीत न होने के कारण चारक अपवा उन्मत्त की बातों की तरह वेद - वाक्य मी प्रमाण है, उचित नहीं है, क्योंकि वेद की स्वतः प्रमाणता सिद्ध की जा चुकी है । अत -- सब लो ger के वाक्य में भी दूसरे प्रमाण को पेक्षा नहीं होनी चाहिये? नहीं, क्योंकि नमाणमुलक पीरुषेय वाक्य में दोषप्रयुक्त प्रामाण्य के अपवाद की प्रवृत्ति हो जायगी गतः उसके प्रामाण के लिये प्रमाणान्तर की प्रवृति अपेक्षित हैं । वेद वाक्य तो अपोरुपेय है, अतः वहां मूलका के न रहने से दोषप्रयुक्त प्रामाण्य के अपवाद की प्रवृत्ति नहीं होगी । वेद में प्रमाणान्तर की अप्रवृति उसके लिये भूषण ही है, दूषण नहीं । यदि यहाँ पर प्रमाणान्तर की प्रवृत्ति मानी जाय तो वेद की अज्ञात अर्थ की ज्ञापकता के अभाव में अनुवादकता माननी पड़ेगी । अर्थात् वेद जिस विषय का प्रतिपादन करते हैं, उनका ज्ञान यदि वेद से भिन्न किसी प्रमाण से मान ले तो वेद वेद से भिन्न प्रमाण द्वारा प्रतिपादित विषय के अनुवादक मात्र हो जायेंगे, क्योंकि वे अन्य प्रमाणों से अज्ञात विषय का ज्ञापन ऐसी अवस्था में नहीं करेंगे ।
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६८ वेदार्थपारिजातः नतु प्रत्यक्षादीनां पौरुषेयवाक्यानां च प्रमाणान्तरसंवाद निबन्धनमेव प्रामाण्यम्, अतो वेदस्यापि तथात्वमेवेति, चेन्न | प्रमाणान्तरसंमतिरूप संवादस्य प्रामाण्यविरोधित्वेन तद्वैतुत्वानुपपत्तेः । यतैकस्मिन्नर्थेऽनेकप्रमाणसन्निपातस्तत्र तेषामन्योन्यनिरपेक्षार्थावबोधहेतुत्वेन तुल्यानामेव प्रामाण्यम्, न समुच्चितानाम् । अतः प्रमाणान्तरमूलत्वेनानुवादत्वापत्त्या नो सवादाधीनं प्रामाण्यम् । ननु चैकमेव वस्तु दूराद् दृष्ट्वाऽपि पुनः प्रामित्स्यैव प्रत्यासीदन्तो दृश्यन्ते । तदेतत्पूर्वस्य नैरपेक्ष्ये नोपपद्यते । अतः संवादापेक्षमेव प्रामाण्यमिति चेन्न, अप्रनितिविशेपप्रमित्येव प्रत्यासत्त्युपपत्तेः । तदुक्तम्--यत्रापि स्यात्परिच्छेदः प्रमाणैरुत्तरैः
पुनः ।
नावघृतस्तथा ॥
तत्रापि पूर्वेण सोऽर्थो यदि हि उत्तरोत्तर प्रमाणसंवादेन पूर्वपूर्वप्रमाणानां प्रामाण्यं भवेत्, तदानवस्थान्त क्वयिद् व्यवस्था स्यात् । ननु च विषयज्ञानस्यार्थक्रियाज्ञानाधीनं प्रामाण्यम्, तच्च स्वत एवेति नानवस्था । तदुक्तं धर्मकीर्तिना-" प्रमाणमविसंवादिज्ञानमर्थक्रियास्थितिः । " नैयायिकेप्युक्तम्- ' प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्ती प्रवृत्तिसामर्थ्यादर्थवत्प्रमाणम् । ' ( वा ० भा ० प्रथमसूत्रावतरणिका ) फलज्ञानं न परोक्ष्यते, पिपासोस्तोयज्ञानेन प्रवृत्तिः, ततस्तोयप्राप्तिः प्राप्तस्य पानम्, पानेन पिपासोपशान्तिः, सा च न परीक्ष्यते, अपरीक्षितस्यापि फलस्येष्टत्वादिति चेन्न विषयज्ञानार्थक्रियाज्ञानयोविशेषाभावात् । तथा च यद्येवस्य स्वतः प्रामाण्यं तर्हि विषयज्ञानस्य स्वतः प्रामाण्ये कः प्रद्वेषः? कि, यदि संवादाधीनं प्रामाण्यं भवेत् तदा श्रोत्रजन्यबुद्धे--. प्रश्न उठता है कि जन प्रत्यक्ष प्रभृति प्रमाणों की और पुरुष के वाक्यों की प्रामाणिकता प्रमाणान्तर से ही है, तब वेदों का श्रामाण्य भी प्रमाणान्तर के संवाद से ही क्यों नहीं माना जायगा? इ उत्तर यह है कि संवाद का अर्थ है प्रमाणान्तर से संत यह संमति स्वतः प्रामाण्य की विधि है, क्योंकि यहाँ जनविगतार्थ बोध ( अज्ञात विषय की ज्ञापकता ) नहीं रहेगी | अतः यह प्रामाण्य में कारण नहीं बन सकती । यहीं पर एक ही अर्थ में अनेक प्राणों की प्रवृत्ति होती है, वहाँ पर ये अन्योन्यनिरपेक्ष होकर स्वतन्त्र पत्र एक ही अर्थ के अवशेष में कारण होते हैं, सब मिलकर नहीं । फिर तो अन्य प्रमाणमूलक होने से वेद इन प्रमाणो के विषयों के अनुवादक मात्र रह जायेंगे । इसलिये वेद का प्रामाण्ण संवादमूलक नहीं है । अरे भाई, व्यक्ति एक ही वस्तु को दूर से देखता है और पुनः पास में आकर उसको पहचानना चाहता है । यह बात पूर्वज्ञान-निष्ट प्रामाण्य की निरपेक्षता में नहीं हो सकती, इसलिए प्रामाण्य में संवाद की अपेक्षा माननी पतंगी, अर्थात् प्रागण में परतस्त्व हो रहेगा । नहीं, दूर से देखने पर जो ठीक से प्रतीति नहीं हुई, उसको समझने के लिए हो व्यक्ति पास में बाकर देखता है । जैसा कि कहा गया है -- ' ' जहाँ पर पूर्व परिछिन्नप्रमिति का उत्तरवर्ती प्रमाणों से पुनः परिच्छेद होता है, वहाँ पर निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि पहली प्रमिति से वस्तु का ठीक से परिशान नहीं हुआ है । " यदि उत्तर उत्तरवर्ती प्रमाण के संवाद से पूर्व, पूर्व के प्रमाणों का प्रमाण माना जाय तो अनवस्था दोष के कारण प्रामाण्य की व्यवस्था ही डाँवाडोल हो जायगी । ata fear है कि विषय के ज्ञान का प्रामाण्य वयक्रिया ज्ञान के अधीन है । वर्थक्रिया ज्ञान स्वतः प्रामाण्य है, उसके लिये किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं, यह बताया जा चुका है । इसलिए अनवस्था नहीं होगी । जैसा कि धर्मकीर्ति ने कहा है ---" अर्थक्रिया के आधार पर अवस्थित अविसंवादी ज्ञान को प्रमाण कहते हैं । " तैयायिकों का भी कहना है कि- " प्रमाण से अर्थ की अव गति होने पर ही प्रवृत्ति होती है, अतः प्रमाण की सार्थकता है । " फल ज्ञान की परीक्षा नहीं की जाती । प्यासा व्यक्ति पानी को जानकर प्रवृत्त होता है, पानी मिलने पर पी लेता है और उसकी प्यास बुझ जाती है । प्यास बुझी या नहीं, यह परीक्षा का विषय नहीं है, afe for परीक्षा किये ही उसको तृप्ति का अनुभव अपने आप हो जाता है । यह पूरी बात गलत है, क्योंकि विषय के ज्ञान और अर्थक्रिया के ज्ञान में कोई अन्तर नहीं है । ऐसी अवस्था में यदि एक का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है, तो फिर विषय ज्ञान के स्वतः प्रामाण्य
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नेवार्थपारिजातः ६६ प्रामाण्यमेव स्यात् प्रमाणान्तरासङ्गतेः । यद्यन्येन श्रोत्रजन्यज्ञानेन संवादसिद्धि:, तर्हि तादृशसंवादस्तु वेदेऽपि सम्भवत्येव, शतकृत्वः समुच्चारणजन्यनानाज्ञानानां संवादसंभवात् । साधनान्तरजन्मबुद्धिसंवादाभावरतूभयत्र समान एव । तथा च गुणसंवादार्थक्रियाज्ञानादीनामपेक्षाभावात् स्वत एव प्रामाण्यं ज्ञानस्य । वेद - प्रामाण्यम् यत्तकं क्वचिदाताप्रणीतस्य वाक्यस्य प्रामाण्यं न दृष्टमिति बदस्यापि तत्थमिति । तन्न, अनुमानसाध्ये विषय एव दृष्टान्तापेक्षत्वेऽपि प्रामाण्यस्यानुमानानपेक्षत्वं दृष्टान्तानपेक्षणात् । प्रामाण्यस्यानुमानापेक्षत्वे तस्याप्येवं तस्याऽप्येव-मित्यनवस्था प्रसज्येत | प्रामाण्यस्यानुमानसाध्यत्वे सर्वेषामपि प्रमाणानां प्रामाण्यस्य तथात्वापत्तेश्व । ननु प्रामाण्यस्यान्यानपेक्षत्वे स्वतस्त्वे च प्रत्यक्षादिप्रमाणमुत्पद्यमानमेव प्रमाणमित्येव गृह्येत । न च तत्तदाऽऽत्मानं गृह्णाति । न चागृहीतप्रामाण्येन व्यवहारसिद्धिरिति चेन्न, आत्मग्रहणमन्तरैव सत्तामात्रेण स्वकार्यक्षमत्वात् प्रमाणेनार्थ-प्रतिपत्तावन्यानपेक्षणात् । तन्मात्रनिबन्धनस्य व्यवहारस्यापि तत एव निष्पत्तेश्च । नैरपेक्ष्येण कृतकार्यस्य त्वसत्यां जिज्ञासायां पश्चात् प्रत्ययान्तरैरवबोधात् । ज्ञानस्य ज्ञायमानत्वं न तत्प्रामाण्योपयोगि । कथं तदज्ञाने तत्प्रामाण्यग्रहणमिति चेद् इत्यम् ---नहि ज्ञानसंबन्धित्वेन प्रामाण्यं गृह्यते, किन्तु विषये तथात्वमेव तद्विज्ञानस्य प्रामाण्यम् । विषयतथात्वनिबन्धनाद् ज्ञाने प्रमाणबुद्धिशब्दयोः । तच्चाज्ञानादेव ज्ञानात् स्वत एव गृहीतमित्यनर्थकं प्रामाणान्तरम् । अप्रमाणं तुन स्वयमप्रामाण्यं स्वतो गगयति, तस्यापि स्वरूपेणैव स्वानुरूपार्थग्राहकलात् । रजतज्ञानं हि शुक्तिशकलं रजतमित्येव गृह्णाति । न पुनर्वेद में आपको क्या आपत्ति हो सकती है? अपि च यदि प्रामाण्य संवाद के पड़ेगा, क्योंकि अन्य प्रमाण से उसका संवाद नहीं हो सकता । यदि दूसरे का संवाद वेज में भी तो हैं, सैकड़ों बार के उच्चारण से उत्पन्न ज्ञानों में दानों ही " क्षों में नहीं है । इस प्रकार गुण के सवाद, अर्थक्रिया के अभीष्ट है । अधीन है, तो श्रोत्र से उत्पन्न ज्ञान को अप्रमाण ही मानना घोषजन्य ज्ञान से संवाद की सिद्धि आप मानें तो इस प्रकार । संवाद सम्भव है अन्य साधन से उत्पन्न ज्ञान का संवाद तो ज्ञान आदि की अपेक्षा न रह से ज्ञान का स्वतः प्रामाण्य हो वेद को प्रामाणिकता यह कहा गया है कि लोक में आाप्त के द्वारा अप्रयुक्त वाक्य को प्रमाण नहीं माना जाता, तो वेद वाक्य को कैसे प्रमाण माना जावा? इसका यही समाधान के कि अनुमान के द्वारा सिद्ध किये जाने वाले विषय के लिए दृष्टान्त की आवश्यकता हो सकती है । प्रामाण्य के लिये तो अनुमान की अपेक्षा नहीं है, अतः यहाँ पर हृष्टान्त की भी आवश्यकता नहीं है । यदि प्रामाण्य की सिद्धि अनुमान से मानी जाय तो इसमें अनवस्था दोष होगा । दूसरी आपत्ति यह भी होगी कि यदि प्रामाण्य की सिद्धि अनुमान से मानी जाती है, तो फिर सभी प्रमाणों का प्रामाण्य अनुमान में सिद्ध हो सकेगा । प्रायाय यदि अन्य निरपेक्ष और स्वतःसिद्ध है, तो पब प्रत्यक्ष अभूति प्रमाणों की उत्पत्ति होती है, उसी समय उसका प्रमाण रूप से ग्रहण होना चाहिए, किन्तु उत्पत्ति के समय प्रत्यक्षादि प्रमाण अपने प्रामाण्य का ग्रहण करते नहीं और जब प्रामाण्य का ग्रहण नहीं करते तो उससे व्यवहार की सिद्धि कैसे होगी? इसका उत्तर यही है कि अपने प्रामाण्य को ग्रहण किये बिना ही सत्ता मात्र से वह व्यवहार निष्पादन में समर्थ हैं, क्योंकि अर्थ की अधिमति में प्रमाण किसी की अपेक्षा नहीं रखता । और प्रामाण्य प्रयुक्त • व्यवहार को निष्पत्ति भी उसकी सत्तामात्र से बन जायगी । निरपेक्ष रूप से कार्य कर चुकने के बाद यदि जिज्ञासा उठती है, तो बाद में अन्य प्रत्ययों से प्रामाण्य की अधिगति होती है । ज्ञान के भी ज्ञान का प्रामाण के लिये कोई उपयोग नहीं है । यहाँ प्रश्न उठ सकता है कि ज्ञान की ज्ञाता को बिना जाने उसमें प्रामाण्य का ग्रहण कैसे होगा? तो इसका उत्तर यह है कि प्रामाण्य का सम्बन्ध ज्ञान के साथ न रहकर विषय के साथ रहता है । विषय की यथार्थता हो ज्ञान का प्रामाण्य है । वह ज्ञान प्रमाण है, इस वाक्य में प्रमाण और ज्ञान शब्द विषय की अथार्थता के अधीन है । यह अज्ञात ज्ञान से अपने आप जान लिया जाता है । अतः इसके लिए दूसरे प्रमाण की नावश्यकता नहीं है | anre are में aurt अप्रामाण्य स्वतः गृहीत नहीं होता, क्योंकि अप्रमाण ज्ञान भी स्वभावत: अपने अनुरूप
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वेदार्थपारिजात. रजतमिति, तेनाप्रमाणज्ञानमपि स्वतः प्रामाण्यमेवात्मनोऽविद्यमानमपि गृह्णतन्निबन्धनं तद्व्यवहारमपि प्रवर्तयति । अत एव तत्राप्रामाण्यग्रहणाय व्यवहारनिवृत्तये च परापेक्षाऽस्त्येव । यतोऽर्थान्यथात्वरूपमप्रामाण्यं ज्ञानस्यार्थतथात्ववन्त्र स्वतो गृह्यते । नन्वेवं वेदस्यापि परत एव प्रामाण्यमनुमानादिभिरर्थान्यथात्वबोधसम्भवादिति चेन्न अर्थान्यथात्वकारणदोष-बुद्धेरेवाप्रामाण्य कारणलेन तदतिरिक्तानुमानादीनामनपेक्षणात् । न च तद्बुद्धेः प्रामाण्याय कारणान्तरापेक्षा, कुद्धेः प्रामाण्य-स्वतस्त्वप्रतिपादितत्वात् । यत्रापि ज्ञानमिथ्यात्वं परेभ्योऽवगम्पते तत्र पूर्वोक्तकारणद्वयमेव बक्तव्यम्, न यत्किञ्चित्साधर्म्य -मात्रम् । न चानुमानेन चोदनादिवेदार्थान्यथाभावः परिकल्पयितुं शक्यते । अनुमानस्यागमविरुद्धत्वेनाभासभानयोग-क्षेमत्वात् । न चानुमानेन वाधादागमस्यैव मिथ्यात्वमिति वाच्यम्, अन्योन्याश्रयदोपप्रसङ्गात् । तथाहि - सिद्धे मित्थात्वेऽ-तुमानम्, तस्मिन सति बाधमिथ्यात्वमित्यन्योन्याश्रयः । न च यथाऽनुमानादन्यत् बाधकं नास्ति, तथैवागमादन्यत् साधकमणि श्रागमार्थस्य नास्तीति कथं वेदार्थमद्भावोऽपीति वाच्चाए भावानवबोधात् । नानुमानसद्भावमङ्गीकृत्येव बाध-कान्तराभावादागमार्थमिथ्यात्वसिद्धिरुच्यते किन्त्वनुमानमेव नोपेतीत्युच्यते । साधकत्वागमो विद्यत एव । न चकेन मानेन गृहीतस्यान्यैरगृहीतत्वेनाभावो भवति । तथात्वे जिह्वादिगृहीवानां नेत्राद्यगृहोतत्वे रसादीनामभावापत्तेः । तदुकम् -न वाऽन्यैराहेऽर्थस्य स्वाभावो रसादिवत् । तेषां जिह्वादिभिर्यस्मानियो ग्रहणेऽस्ति ॥ ( श्री. सु. बा. ९ १? अर्थ का ही ग्रहण करता है । जैसे कि मिया रजत ज्ञान शुक्ति के टुकड़े को चाँदी का टुकड़ा ही जानता है । उस समय उसमें यह ज्ञान नहीं होता कि यह चांदी नहीं, सोप है । इसलिए प्रमाण ज्ञान भी अपने आप में विद्यमान भी कम प्रमाण को ग्रहण कर हुआ तदधीन - वादी के लेने के लिए दोढ़ाता है । एमिया ज्ञान में अयोमाष्य के के लिए और मुक्त व्यवहार की निवृति के लिए दूसरे ( बाघ ज्ञान ) की अपेक्षा है ही । दर्गीलिए अर्थ या अन्यथा बोध कराने वाले अप्रामाणिक शाप में प्रामाण्य की अति प्रवार्थ बोकामा के वमान स्वतः नहीं जानी जस्तो ' यहां पर शंका व पकती इससे तो प्रामाण्य भी परत: ही मानव कहिए, क्योंकि यहां पर अनुमान अदि प्रमाण के बाबार पर चे ज्ञान की जया सह किया जाता है । इसका सीधा सा है कि वर्थ जम्ययात्य और दोष बुद्धि भामाण्य का कारण बनती है । अतः इसमें अनुशनादि की प्रवृत्ति नहीं हो सकते । देव अन्य बुद्धि के प्रामाण्य के लिये किसी दूसरे कारण की अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि यह बताया जा चुका है कि आप स्नाः पाप है । यहां पर जरा प्रमाणों के आधार पर ज्ञान का दिव्यास्य अवगत होता के पक्ष पर भी पूर्व प्रतिवारित अर्थ की त्याची जगत शेष नाम ही में दो ही कारण बताने पड़ेंगे - पत् सायं को इस कारण नहीं थाना बक्ता अनुमान से विधिवति वाक्यों में अवगत अर्थ का अन्य परिचित नहीं किया जा सकता । अनुमान यदि वे के विरुद्र के तो वो सत्ता ही विग्न हो जायगी । यह कहना मी ठीक नहीं होगा कि अनुमान से हो आगम का मात्र ययों न मान लिया जाय, क्योंकि ऐसा मानने पर अत्यन्याय दोष होगा | जैसे कि वे के मिध्यात्व के सिद्ध होने पर अनुमान प्रवृत्त होगा और अनुमान के प्रवृत होने पर बाघ के कारण वेद का मिथ्याल द्धि होगा । यह अथन भी गलत है कि जैसे अनुमान से बिन कोई बाधक नहीं है, उसी तरह से जागन से मित्र अन्य फोर्ट अाण जागम प्रतिपादित का साधक भी तो नहीं है । ऐसी परिस्थिति में वेदार्थकी सत्ता ही संदिग्ध हो जायगी । किन्तु यहाँ वपक्षी ने हमारे कथन का भाव ही ठीक से नहीं समझा है । हमारे कचन का यह अभिप्राय नहीं है कि केवल अनुमान को मानकर उसी के आधार पर बाधकान्तर न होने पर भी हम आगम को from fr द्ध करते हो, हमारा केवल इतना ही कहना है कि ऐसे स्थलों में अनुमान की उत्पत्ति हो नहीं होती । वेद पाण्य का साधन तो मा आउन्न ही है । ऐसा तो होता नहीं कि जो वस्तु एक प्रमाण से गृहीत हो, उसका प्रमाणान्तर से ग्रहण न होते पण प्रभाव या यदि हम ऐसा मानने लगे तो, जिल्हा प्रभृति से गृहीत रसादि वस्तु का नेत्र प्रभृति से कृषक होने अपाय मानना: ड़ जायगा । जैसा कि इस लोक में कहा गया है -----