वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 821–830

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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७६१ आधुनिक युक्तियुक्त सर्वोपयोगिहृदयग्राह्यार्थ प्रतिपादकत्वाद्वेदस्य प्रामाण्यं महत्त्वं चाम्युपयन्ति । वैदिकास्तु स्वतः प्रमाणवेदवचनावगतत्वादेव तत्तदर्थानां युक्तियुक्तत्वं सुन्दरत्वं हृदयग्राह्यत्वं च वदन्ति । सुन्दरत्वं युक्तियुक्तत्वं हृदयग्राह्यत्वमर्थस्य यैः प्रमाणशयित तत्स्वरूपस्यापि तैरेव प्रमाणैर्ज्ञातुं शक्यत्वेन तदर्थं वेदस्थानावश्यकत्वापाताच्च । अत एव सर्वमान्य सर्वतन्त्रस्यार्थस्य सर्वेरेव सर्वदेव ज्ञातस्यार्थस्य बोधकत्वे ज्ञातज्ञापकत्वेनाप्रामाण्यमेव वेदानामापतेत्, प्रसिद्धस्यार्थस्य प्रतिपादनानपेक्षणेनाकिश्चित्करत्वं च । यदुक्तं लोकिक कोषाद्यनुसारेण वाच्यवाचकभावं निर्धार्य वेदार्थकरणादेव वेदार्थविलोपो जात इति, तदप्यमनोज्ञम्, शक्तिग्रहस्य लोकैकसमधिगम्यत्वात् । अलौकिकैरथैरलौकिकानां शब्दानां सम्बन्धग्रहासंभवात् । अत एव ' अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः ' ( जै ० सू ० ११२/३० ), ' लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थप्रतीते: ' ( सां ० सू ० ५१४ ), ' थ एव लौकिकास्त एव वैदिकास्त एवैषामर्थाः ' इति शवरस्वामिनश्व । अत एव वेदाक्षरैरेव तत्त्वनिर्णयो युक्तः, देशजातिविशेषा-सम्बन्धग्रहाग्रहस्यापि तदर्थंग्रहप्रतिबन्धकत्वात् । क ईश्वरः? के वा तदीया गुणाः? कानि वा तदीयानि कर्माणि? के वा सृष्टिनियमाः? यदि प्रामाण्य * मन्तरापि तदधिगमः संभवति कृतं वेदप्रामाण्यग्रहे । वेदार्थज्ञानात् पूर्वं तदज्ञाने कथं तदनुसारेणार्थकरणं संभवति । ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' ( बृ ० उ ० ३१ ९ / २६ ), ' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ' ( मी ० सू ० १ | १ | २ ), ' शास्त्रयोनित्वात् ' ( ब्र ० सू ० १1१1३ ), ' नावेदविन्मनुते तं बृहत्तम् ' ( तै ० ब्रा ० ३११२२ ९ / ७ ) इत्यादिश्रुतिसत्रवचनैस्तु परमेश्वरस्य वेदैकसमधिगम्यत्वमेव ज्ञायते । परमेशस्य गुणाः कर्माणि सृष्टिनियमाश्च न लोकप्रभाणगम्याः, तदभावे कथं तदनुर अविद्यमानता में प्रमाणान्तर का विषय न होने से बाध की प्रवृत्ति नहीं होगी । जिस प्रमाण से जो वस्तु गृहीत होती हैं, उसके अभाव का ग्रहण भी उसी से होता है । श्रोत्रेन्द्रिय से परिगृहीत शब्द का अभाव नेत्र आदि के द्वारा परिज्ञात नहीं होता । वेद के प्रमाण भी उसका बोध नहीं होता, क्योंकि ऐसा वेदवचन उपलब्ध ही नहीं है । आधुनिक विद्वान् युक्तियुक्त, सर्वोपयोगी और हृदय को छू लेने वाले का प्रतिपादक होने से वेद के प्रामाण्य और महत्व को स्वीकार करते हैं । इसके विपरीत वैदिकगण वचनों की स्वतःप्रमाणता के कारण हो वेदार्थ की युक्तियुक्तता, सुन्दरता और हृदयहारिता का प्रतिपादन करते हैं । वेदार्थ की सुन्दरता, युक्तियुक्तता और हृदयग्राह्यता जिन प्रमाणों से ज्ञात होती है, उन्हीं से उसके स्वरूप को भी अवगति हो जाने पर उनके अवगम के लिये वेद की आवश्यकता ही नहीं रह जायगी । ऐसी अवस्था में सर्वमान्य सर्वशास्त्र संमत अर्थ के, जिसका कि सभी को सवा परिचान है, पोषक मानने पर ज्ञातज्ञापक होने से वेदों में अप्रामाण्य दोष उठ खड़ा होगा । प्रसिद्ध अर्थ के प्रतिपादन की अपेक्षा न रहने से वह व्यर्थ भी हो जायगा । लौकिक कोश आदि की सहायता से वाच्यवाचकभाव का निर्धारण कर उससे वेद के अर्थ का निर्धारण करने में ही वेद का सही अर्थ लुप्त हो गया है, यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि शब्दों की शक्ति का परिज्ञान केवल लोक से ही हो सकता है । अलोकिक अर्थ के साथ अलोकिक शब्दों का संयन्त्र परिज्ञात नहीं हो सकता | इसी लिये ' अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः ' इति जैमिनि सूत्र में स्वामी ने कहा है कि ' लोक में व्युत्पन्न व्यक्ति को ही वेदार्थ की प्रतीति होती है, जो लौकिक शब्द हैं, वे ही वैदिक हैं, वही उनका अर्थ है | इसलिये वेद के अक्षरों से ही तत्त्व का निर्णय होना उचित है । देशविशेष, जातिविशेष से वेद का संवन्ध न मानने का are भी वेद के अर्थ के ग्रहण में प्रतिबन्धक ही है । ईश्वर कौन है? ईश्वर के गुण कौन कौन से हैं? ईश्वर के कार्य क्या है? सृष्टि के नियम क्या हैं? यदि बिना प्रमाण के भी इन अर्थो की अवगति हो सकती है, तो वेद के प्रामाण्य की अवगति की क्या आवश्य ता है? वेद के अर्थ के परिज्ञान से पहले afe saat अवगत नहीं होती, तो उसके अनुसार अर्थ करना संभव नहीं हैं । ' उस औपनिषद पुरुष को पूछता हूँ ', ' धर्म ' की त fafa वाक्य से होती है ', ' धर्म में शास्त्र ही प्रमाण है ', ' उस महान ब्रह्म को वेद को न जानने वाला नहीं जान पाता ' इत्यादि श्रुतियों और सूत्रों के आधार पर परमेश्वर की अगति केवल वेद से ही हो सकती है । परमेश्वर के गुण, कर्म और सृष्टि के नियम लौकिक

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** संभवति? तस्माद्वैदिकशब्दैरेव तेषामपि ज्ञानं युक्तम् । न च तदर्थज्ञाने तदनुसरणं संभवति, वेदार्थज्ञानात् पूर्व तदज्ञानात् । सृष्टिनियमा अपि नाल्पज्ञगम्याः । वेदस्य सर्वविद्याग्रन्थत्वमपि वेदादेव ज्ञायते न पुरुषाभिप्रायेण ' नहि कस्तूरिकामोदः शपथेन विभाव्यते ' इति न्यायात् । अन्यथा तस्त्रीसंदेशविज्ञानसिद्धये तरुतारशब्दाश्रयणवद् वर्तमान-कम्प्यूटर केटा दिविज्ञानस्यापि वैदिकत्वसाधनाय तादृशशब्दाभासा श्रयणापातो न्यूनतापत्तिर्वा स्यात् । मानवजीवनस्य कान्यङ्गानि तज्ज्ञानसम्बन्धिन्यश्व का आवश्यकता इत्यपि दुर्ज्ञानम् । परिवर्तिनि संसारे तेषामेकरूप्याभावात् । वैदिकरीत्या तु मानवैर्वेदा अनुसरणीयाः । तदनुसारीण्यङ्गानि निर्मातव्यानि, आवश्यकताभिश्व तदनुसारिणीभिरेव भाव्यम्, स्वातन्त्र्ये तेषामव्याहतप्रसरत्वात् । न्यायादिशास्त्राणि वेदानुगामीनि न वेदास्तदनुगामिनः " वेदानां तदनुसारित्वे स्वात्मस्वरूपस्याप्य-निर्णयापातात् । न्यायवैशेषिकानुसारेण ज्ञानादिगुणक आत्मा, सांख्ययोगरीत्या असङ्गश्चेतनस्वरूप आत्मा । एवमणुत्व महत्त्वादिविरुद्धाभिप्रायाणां तेषामनुसरणे कथं वेदार्थनिर्धारणं स्यात्? अपि च, एवं तर्कनिकर्षर्वेदार्थ: परीक्षणमपि दुर्घटम्, तर्काप्रतिष्ठानत्वस्य वेदान्तसूत्रैरेव प्रतिपादनात् ' नैषा तर्केण मतिरापनेया ' ( काठको ० १ / २ / ९ ) इति श्रुतिविरोधाच्च । मनुनापि वेदशास्त्राविरोधिना तर्केण वेदार्थानुसन्धानमुक्तम् । स्वर्गाग्निहोत्र होमयोस्तर्का-गम्यत्वमेव, वेदार्थस्य प्रमाणान्तरगम्यस्वे वेदस्यानुवादकत्वेनाप्रामाण्यापत्तेः । व्यक्तिविशेषेतिहासानुल्लेखाराहोऽपि न वेदार्थत्व निकषः, शब्दार्थशक्त्या जायमानोल्लेखस्यापलापानर्हत्वात्, चक्षुरादिवत् स्वार्थप्रकाशने वेदवाक्यस्य स्वतन्त्रत्वात् । वेदान् ईश्वरं वा न पर्यनुयोक्तुं वयं शक्नुमस्तदभिप्रायं तूपऋमो-प्रमाणों से नहीं जाने जा सकते । इसके अभाव में उनका अनुसरण कैसे हो सकता है । इनका ज्ञान भी वैदिक शब्दों से ही हो सकता है | वेद के अर्थ के परिज्ञान से पहले इन सृष्टि आदि के नियमों का परिज्ञान नहीं हो सकता । ये सृष्टि आदि के नियम अल्पज्ञ लोगों की समझ के बाहर भी हैं । वेद सभी विद्याओं का ग्रन्थ है, इसका ज्ञान भी वेद से ही हो सकता है, पुरुष के अभिप्राय से नहीं; afe कस्तूरी की गन्ध को कोई शपथ दिला कर रोक नहीं सकता । अन्यथा तार से संदेश भेजने का विज्ञान वेद में हैं, इसको सिद्ध करने के लिये ' तरु तार ' आदि शब्दों के समान वर्तमान कम्प्यूटर, राकेट आदि विज्ञानों को भी वैदिक सिद्ध करने के लिये उसी तरह के शब्दों की कल्पना करनी पड़ेगी, अथवा वेद में इस प्रकार के शब्दों को न्यूनता माननी पड़ेगी । मानव जीवन के अंग क्या है? परिवर्तनशील संसार में इन आवश्यकताओं की का अनुसरण करना है । तदनुसार हो जीवन के इनके ज्ञान से संबद्ध आवश्यकताएं कौन - कौन सी है? यह जानना भी कठिन है । एकरूपता हो भी नहीं सकती । वैदिक पद्धति के अनुसार तो मानवों को ही वेदों अंगों की निर्मिति और आवश्यकताएं निर्धारित होनी चाहिये । इसके लिये मनुष्य को स्वतन्त्र मानने पर बिना रोक - टोक के उच्छृंखलता फैल जायगी । न्यायशास्त्र आदि ही वेदानुगामी हैं, वेद इनका अनुगामी नहीं है । वेदों को यदि इनका अनुगामी माना जाय, तो आत्मा के स्वरूप का निर्धारण होना भी कठिन हो जायगा । न्याय - वैशेषिक दर्शन के अनुसार आत्मा ज्ञान आदि गुण वाला है । सांख्य और योग की दृष्टि से आत्मा असंग और चेतनस्वरूप है । एक दर्शन आत्मा को अणु मानता है, तो दूसरा महान् । इस प्रकार परस्पर fast दर्शनों का अनुसरण करने पर वेदार्थ का निर्धारण कैसे संभव है? इसी तरह तर्क की कसौटी पर वेदार्थ को परखा भी नहीं जा सकता । वेदान्तसूत्रों में तर्क को अप्रतिष्ठित माना माना है । ' तर्क से यह बुद्धि हटायी नहीं जा सकती ' इस श्रुति से तर्क का विरोध भी है | मनु ने भी कहा है कि वेद शास्त्र के अविरोधी तर्क से ही वेदार्थ का अनुसन्धान किया जा सकता है । स्वर्ग, अग्निहोत्र आदि का प्रतिपादन तर्क से नहीं किया जा सकता । वेदार्थ का raata यदि दूसरे प्रमाणों की सहायता से हो जाता है, तो वेद में अनुवादकता के कारण अप्रामाण्य की आपत्ति उठ खड़ी होगी । विशेष के इतिहास का न होना भी वेदार्थ का प्रयोजक नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द की शक्ति से यदि वहाँ पर इतिहास का उल्लेख मिलता है, तो उसका अपलाप हम नहीं कर सकेंगे । अपने अर्थ के प्रकाशन में वेद उसी प्रकार स्वतन्त्र है, जैसे

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वेदार्थपारिजातः पसंहाराभ्यासापूर्वतार्थबादोपपत्त्यादिभिरवगन्तुं शक्नुमः । वशिष्ठाद्या महर्षयः शङ्कराचार्यप्रभृतय आचार्यां वैदिकशब्देरेव वेदार्थं निर्णयन्ति न पूर्वं मनसि कश्विदर्थं निधाय वेदाक्षरेभ्यो वलात्तत्साधयन्ति । किच, व्यक्तिविशेषेतिहासो वेदेषु नेव प्रतीयते, प्रतीयमानोऽपि वा नाभ्युपेतव्यः । न प्रतीयते चेत्तदा तस्य वेदार्थत्वाशचंद नोदेति । वैदिकशव्देस्यः प्रतीयते चेत् कथं प्रतीतिशरणैस्तदपलापो युक्तः, प्रमाणभूत वैदिकशब्दजनितायाः प्रतीतेः प्रमारूपत्वात् । न च जातिविशेप देश -विशेषव्यक्तिविशेषवर्णनेन वेदस्य पक्षपातित्वापत्तिस्तदनन्तरभावित्वापत्तिश्च लौकिकेतिहासस्येव भविष्यतीति वाच्यम्, वेदशब्देभ्यः सृष्ट्यभ्युपगमेन पदार्थसृष्टद्यानन्तर्य्यानुपपत्तेः जातौ शक्त्यङ्गीकारेण जातेश्च नित्यत्वेन शब्दार्थसम्बन्धानां नित्यत्वस्याव्याहतत्वात् । अपि च, ऋक्संहितायामुर्वेशीपुरूरवआदीनामुपवर्णनमस्त्येव । यचच ' त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् ' ( वा ० सं ० ३३६८ ) इति मन्त्रे ' चक्षुर्वे जमदग्नि: ' ( ८1१/२/३ ) इति शतपथवचनाच्चक्षुष एव जमदग्नित्वम् ' इति, तदपि चिन्त्यम्, तावताषि जमदग्निकश्यपादीनामपलापायोगात् । ' योषा वाव गौतमाग्निः ' ( छा ० ५/७११ ) इति प्रमाणेन योषायामग्नित्वारोपेऽपि वस्तुभूतस्याग्नेर्नापलापः संभवति । एवमेव ' त्रयो वेदा एत एव । बागेवरर्वेदः, मनो यजुर्वेदः, प्राणः सामवेद: ' ( श ० १४ | ४ | ३ | १२ ) इति शतपथब्राह्मणेनोपासनार्थं वागादीनामृगादित्वोक्तावपि ' तस्माद्यज्ञात् सर्वेत ऋचः सामानि जज्ञिरे ' इत्यत्र वागादीनामुत्पत्तिर्दयानन्देनापि नाभिप्रेता । दयानन्देन सत्यार्थप्रकाशे लिखितम्- ' यस्येतिहासो भवति तस्य जन्मनोऽनन्तरमेव स लिख्यते ' ( सत्यार्थ-प्रकाशे १२७ पृ ० ) इति । तेनैव ' अग्ने देवेषु प्रवोचः ' ( ऋ ० ११२७/४ ) इति मन्त्रभाष्ये - हे अनन्त विद्यामय जगदीश्वर देवेषु सृष्ट्यादी जातेषु पुण्यात्मस्वग्निवाय्वादित्याङ्गिरस्तु मनुष्येषु प्रवोचः प्रोक्तवान् इति व्याख्यातम् । तद्रीत्या-चक्षुरादि इन्द्रियाँ अपने विषय के प्रकाशन में स्वतन्त्र होती हैं । वेद अथवा ईश्वर को हम किसी प्रकार की आज्ञा नहीं दे सकते, केवल उसके अभिप्राय को उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, अर्थवाद, उपपत्ति आदि से समझ सकते हैं । वसिष्ठ आदि ऋषिगण और शंकराचार्य प्रभृति आचार्यगण वैदिक शब्दों से ही वेदार्थ का निर्णय करते हैं, मन में पहले से बैठाये गये किसी अर्थ को वेद के अक्षरों से जबर्दस्ती नहीं सिद्ध करते । दूसरे व्यक्तिविशेष का इतिहास वेद में प्रतीत भी नहीं होता, यदि प्रतीत होता हो तो उसको नहीं मानना चाहिये । यदि यह प्रतीत नहीं होता तो उसके वेदार्थ होने को शंका का उदय ही नहीं होगा । यदि वैदिक शब्दों से यह प्रतीत होता है तो फिर प्रतीति को ही प्रमाण मानने वाले इसका अपलाप किस प्रकार कर सकते हैं, क्योंकि प्रमाणभूत वैदिक शब्दों से उत्पन्न हुई यह प्रतीति प्रमारूप ही मानी जायगी । जातिविशेष, देशविशेष, व्यक्तिविशेष के वर्णन से वेद इनके साथ पक्षपात करता है और यह इनके बाद की रचना है, इस प्रकार की आपत्ति लौकिक इतिहास के तरह की होगी, यह उक्ति इसलिये उचित नहीं है कि यहाँ पर वेद के शब्दों से ही सृष्टि मानी जाती है, अतः पदार्थ की सृष्टि के बाद वेद की स्थिति का प्रश्न ही नहीं उठता । शब्द की शक्ति जाति में मानी जाती है और जाति नित्य है, अतः शब्द और अर्थ के संबन्ध की नित्यता में कोई बाधा नहीं आती । ऋग्वेद में उर्वशी -पुरूरवा आदि का वर्णन हम मानते ही हैं । ' व्यायुषं जमदग्नेः ' इत्यादि मन्त्र में ' चक्षुर्वे जमदग्नि: ' इस शतपथ श्रुति के प्रमाण पर जो चक्षु को ही जमदग्नि माना गया है, यह विचारणीय है । इस प्रकार के अर्थ कर लेने पर भी जमदग्नि, कश्यप आदि का अपलाप नहीं किया जा सकता । ' हे गौतम, यह योषा ( स्त्री ) हाँ अग्नि है यहाँ पर जैसे योषा में अग्नि का भारोप करने पर भी वस्तुभूत अग्नि का अपलाप नहीं होता । इसी तरह ' तीन वेद है -- इनमें वाणी ही ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद और प्राण सामवेद है इस शतपथ श्रुति में उपासना के लिये बाणी इत्यादि के ऋग्वेद आदि कहे जाने पर भी ' उस सर्वहुत यज्ञ से ऋक्, साम आदि की उत्पत्ति हुई इस मन्त्र का अर्थ करते समय स्वामी दयानन्द ने भी वाणी इत्यादि की उत्पत्ति नहीं मानी । दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि ' जिसका इतिहास होता है, उसके जन्म के बाद ही वह लिखा जाता है । इसीलिये ' अग्ने देवेषु प्रवोचः ' इस मन्त्र के भाष्य में-- ' हे अनन्त विद्यामय जगदीश्वर, आपने देवों में, अर्थात् सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन पुण्यात्मा अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा आदि मनुष्यों में इस ज्ञान का उपदेश दिया ' यह व्याख्या की है । उनकी व्याख्या के अनुसार १००

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७६४ daraftaar प्यनेनेतिहास एव सिद्धयति । किञ्च ऋग्वेदस्य प्रथममण्डले चतुर्विशं सूक्तमारम्य त्रिशं सूक्तं यावत् शुनःशेषस्याख्यानं प्रसिद्धम् । ऐतरेय ब्राह्मणेऽपि तथैव तद्विवरणमपि दृश्यते । दशमे मण्डलेऽष्टादशर्क्ष उर्वशी पुरूरवसोराख्यानं दृश्यते । शतपथे ' जनमेजयं पारिक्षितं याजयाञ्चकार ' ( श ० १३/५/४११ ) इति पारीक्षितजनमेजयस्य चर्चा समायाति । तथैवाथर्व संहितायां प्राह्लादविरोचनस्य, वैवस्वतस्य मतोः, आङ्गिरसस्य बृहस्पतेः, वैन्यस्य पृथोश्चर्चा स्पष्टमायाति । तु ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वदे ' ( वै ० सू ० ६ | १ | १ ) इत्यनुसारेण वेदे तर्कविरुद्धं न किञ्चिदपि संभवति । ' तर्कपिम् ' ( नि ० १३।१२ ) इति रीत्या ऋषीणां वचनानुसारेण केचिदपि मन्त्रा नास्य नियमस्यावोलनं कर्तुं प्रभवन्ति ' ( पृ ० ४४ ), तदेतद्वालभाषितम्, ' नेपा तर्केण मतिरापनेया ' ( काठको ० ११२ / ९ ) इत्युपनिषद्वचनेन दत्तोत्तरत्वात् । ऋषयस्तद्वाक्यानि च वेदानुसारीणि भवन्ति, न तु वेदास्ताननुसंरन्ति तथात्वे प्रामाण्यपरतस्त्वप्रसङ्गात् । कणादसूत्रं तु वेदवाक्य निर्मितिमीश्वरबुद्धिपूर्वा वक्ति । न वेदेन तर्कविरुद्धो नोच्यत इत्येतत्परं तत् । सूत्रार्थस्तु पूर्वमेव व्याख्यातः । निरुक्ते ( १३ १२ ) तु यदेव किञ्चानूचानोभ्यूहत्यार्षं तद्भवति । वेदार्थनिर्धारणाय वेदाविरुद्धोऽम्यूहरूपस्त को युक्तः । तदर्थमेव तर्कषि प्रायच्छन्त्रित्युक्तम् । न ' तर्क एव ऋषिः ' इति वचनं तत्रत्यम् । वेदस्य सर्वज्ञानमयत्वेनापि न तेनैव कम्प्यूटर राकेदादिनिर्माणविद्या गतार्था भवति । धर्मब्रह्मज्ञानस्य साक्षात्परम्परया च सर्वार्थ ज्ञानमूलत्वात्तत्प्रकाशनेन सूत्ररूपेण सर्वार्थिप्रकाशनं भवत्येव । श्रीशङ्कराचाय्यस्त्विनेक विद्या-स्थानोपबृंहितस्य प्रदीपवत् सर्वार्थावद्योतनः सर्वज्ञकल्पस्येत्युक्तथा साङ्गोपाङ्गवेदस्य सर्वार्थावद्योतित्वमुक्तवन्तः, तदीयदृष्ट्या सर्वज्ञस्य सर्वज्ञानानुविद्धशब्दानामानन्त्यान्निरुपचारेणैव सर्वार्थावद्योतत्व संभवति, ' अनन्ता वै वेदा: ' भी यहाँ पर इतिहास हो सिद्ध होता है । इसी तरह ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के २४ वें सूक्त में ३० वें सूक्त तक शुनःशेप का आख्यान प्रसिद्ध है । ऐतरेय ब्राह्मण में भी इसका विवरण मिलता है । दशम मण्डल में १८ ऋचाओं में उर्वशी और पुरूरवा की कथा मिलती हैं । शतपथ ब्राह्मण में भी इसका वर्णन है । ' परीक्षित के पुत्र जनमेजय को यज्ञ कराया ' इस शतपथ श्रुति में जैसे पारीक्षित जनमेजय की चर्चा है, उसी भांति अथर्वसंहिता में प्रह्लाद के पुत्र विरोचन की, वैवस्वत मनु, आंगिरस वृहस्पति और वैन्य पृथु की चर्चा स्पष्ट आती है । भन्न और ब्राह्मण के वचनों के प्रमाण से ज्ञात हो रहे अर्थ की उपेक्षा कर जबरदस्ती अप्रतीत अर्थ की कल्पना ठीक नहीं कही जा सकती । इससे तो अव्यवस्था ही फैलेगी । ' वेद के वाक्यों की रचना बहुत सोच समझ कर की गई है इस वैशेषिक सूत्र के अनुसार वेद में तर्कविरुद्ध कोई बात नहीं हो सकती । from के अनुसार तर्क ही ऋषि है । इस ऋषि के वचन के आधार पर कोई भी मन्त्र इस नियम की अवहेलना नहीं कर सकते, यह कहना भी बेसमझी की बात है । ' तर्क के द्वारा यह बुद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती ' यह उपनिषद् का वाक्य हो इसका उत्तर दे देता है । ऋषिगण और उनके वाक्य ही वेद का अनुसरण करते हैं, वेद उनका अनुसरण नहीं करते । यदि ऐसा माना जायगा, तो वेदों का स्वतः प्रामाण्य नहीं बन पावेगा । उनमें परतः प्रामाण्य होने से वे अप्रमाण हो जायेंगे । कणाद सूत्र का afare केवल इतना ही है fr dearts का निर्माण ईश्वर की बुद्धि के अनुसार होता है । वेद में तर्क के विरुद्ध कोई बात नहीं कही जाती, यह उसका अर्थ नहीं है । निरुक्त में कहा गया है कि ' अनूचान अर्थात् सम्पूर्ण वेद - वेदांग का ज्ञाता जिस बात को सोचता है, वह भी वर्ष वचन हो जाता है ' यहाँ पर वेदार्थ के निर्धारण के लिये वेद का अविरोधी विचार रूप तर्क गृहीत होता है । इस अर्थ में ' तर्क रूप ऋषि को दिया ' यह वचन प्रयुक्त हुआ है । ' वर्क ही ऋषि है ' यह उसका अभिप्राय नहीं है । वेद के सर्वज्ञानमय होने पर भी उसीसे कम्प्यूटर, राकेट आदि के निर्माण की विद्या गतार्थ नहीं हो जायगी । धर्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान ये ही साक्षात् अथवा परम्परा से सभी ज्ञानों के मूल में हैं । वेद इनके प्रकाशक हैं, अतः सूत्र रूप से वेद सभी विषयों के प्रकाश माने हो जा सकते हैं । श्रीशंकराचार्य ने ' अनेक विद्याओं के उपबृंहक होने से, प्रदीप के समान सभी वस्तुओं के प्रकाशक होने से, वह सर्वज्ञकल्प है ' इस उक्ति के अनुसार अंग और उपांग सहित वेद को सभी विषयों का प्रकाशक माना है । उनकी दृष्टि में

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वेदार्थपारिजातः ७६५ ( तै ० ब्रा ० ३ | १०1११1४ ) इति श्रुतेः । मानव बुद्धिग्राह्यस्यैक त्रिशदुत्तरेकादशशतशाखात्मकस्य मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्यापि मानवापेक्षितसर्वार्थावभासित्वं संभवत्येव । न च कण्व माध्यन्दिनसंहितयोरिव किञ्चिदेव वैलक्षण्यं नोल्लेखनीय विशिष्टविषयकत्वमिति वाच्यम्, तत्रापि मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु च बहुभिरंशेवैलक्षण्यस्य दर्शनात् । शुक्ल-कृष्णयजुःशाखासु वैलक्षण्यभूमिष्ठत्वदर्शनात् । तत्रापि - ' पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिथिताः । वेदाः स्थानाति विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश || ' ( या ० स्मृ ० ) इति याज्ञवल्क्यस्मृतिरीत्याऽष्टादशपुराणानि, न्यायवैशेषिकशास्त्रे, पूर्वोत्तरमीमांसे, मन्वाद्यष्टादशधर्मशास्त्राणि, व्याकरणादिषडङ्गानि, चत्वारो मन्त्रब्राह्मणोपनिषद्रूपाः सर्वशास्त्रात्मका वेदा इमानि चतुर्दश विद्यास्थामानि भवन्ति । धर्मनियन्त्रित मानवजीवनोपयोगिनः सर्वेऽर्था अत्रान्तर्भवन्ति । एतद्दृष्टयं व सर्वार्थावद्योतिनो वेदा: । चतसृषु शाखास्वपि केवलाश्चतस्रो मन्त्रसंहिताः कथं नाम सर्वार्थावद्योतिन्यः स्युः । यद्यपि कर्मोपासनतत्त्वज्ञानक्रमेण सर्वस्यैव वेदस्य परब्रह्मात्मप्रतिपादन एवं महातात्पर्यम्, तथाप्यवान्तर-तात्पर्य कर्मोपासनादावप्यस्त्येव । वेदेषु बाहुल्येन विविधयज्ञहोमादिकर्मणामेव प्रतिपादनम् । अत एव जैमिनिराह-' आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य मतदर्थानाम् ' ( मी ० सू ० १।२1१ ), ' विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः ' ( मी ० सू ० ११२/७ ) । नैतन्नियमनम्, किन्तु वेदस्वरूपपर्यालोचनम्, तदर्थावधारणे दिग्दर्शनं च । ' वेदोऽखिलो धर्ममूल स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनां ॥ ' ( म ० २२६ ), ' धमं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ' ( म ० २११३ ) इति मनुरप्याह । ' वेदो धर्ममूलम् ' इति गोतमः । स्यायदर्शने ( ४ | १ | ६२ ) ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, लोकव्यवहार-व्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषयः, तत्रैकेन न सर्व व्यवस्थाप्यत इति यथाविषयमेतानि प्रमाणानि, इन्द्रियादिवत् ' इति वात्स्यायते । एतदेव महाभारतेऽपि स्पष्टम्-वंश के सभी ज्ञानों से संलग्न शब्दों की अनन्तता के कारण स्वभावतः सभी अर्थी को प्रकाशकता बन सकेगी । ' वेद अनन्त हैं ' इस श्रुति से भी यही अर्थ सिद्ध होता है । मानव बुद्धिगम्य ११३१ शाखा वाले मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद में मानव के लिये अपेक्षित सभी विषयों को प्रकाशकता हो ही सकती है । काण्व और माध्यन्दिन संहिता के समान इन शाखाओं में थोड़ा बहुत ही अन्तर है, इनमें परस्पर कोई उल्लेखनीय विशेष अन्तर नहीं दिखाई पड़ता, यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि मन्त्रों और ब्राह्मणों में अनेक अंशों में विलक्षणता दिखाई देती है । शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद में तो यह विलक्षणता बहुत अधिक है । इसके उपरान्त भी ' पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और छः अंगों के साथ चारों वेद मिलकर धर्म और विद्या के चौदह प्रस्थान माने जाते हैं यह याज्ञवल्क्य स्मृति का वचन बतलाता है कि अठारह पुराण, न्याय - वैशेषिकशास्त्र, पूर्व और उत्तर मीमांसा शास्त्र, मनु आदि के १८ स्मृतिरूप -शास्त्र, व्याकरण प्रभृति ६ अंग और चार मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद् रूप वेद - ये विद्या के सभी शास्त्रों का संग्रह करने वाले चौदह प्रस्थान होते हैं । धर्म के द्वारा नियन्त्रित मानव के जीवन के लिये उपयोगी सभी विषय यहाँ आ जाते हैं । इसी दृष्टि से वेदों को सभी विषयों का प्रतिपादक कहा गया है । चार शाखाओं में भी केवल चार मन्त्रसंहिताएँ ही कैसे सभी विषयों का प्रकाशन कर सकती हैं? यद्यपि कर्म, उपासना और तत्वज्ञान के क्रम से पूरे वेद का परब्रह्म के प्रतिपादन में ही महातात्पर्य है, तो भी कर्म और उपासना के प्रतिपादन में भी उसका अवान्तर तात्पर्य है ही, क्योंकि वेदों में बहुत जगह विविध यज्ञ, होम आदि कर्मो का प्रतिपादन मिलता है । इसी अभिप्राय से जैमिनि ते ' आम्नाय अर्थात् वेद के क्रियाप्रतिपादक होने से जो अंश क्रियाप्रतिपादक नहीं है, वह व्यर्थ हो जायगा ', ' विधि वाक्यों के साथ ऐसे वाक्यों की raaraar होने से विधि के स्वावक रूप में उनकी प्रार्थकता हो जायगी ' इत्यादि सूत्रों की रचना की है । यहाँ पर जैमिनि ने कोई नियम प्रदर्शित नहीं किया है, किन्तु वेद के स्वरूप का पर्यालोचन किया है और उसके अर्थ के निर्धारण के लिए मार्ग प्रशस्त किया है । ' पूरा वेद वर्म का मूल है, इसी तरह धर्म के प्रति स्मृति और शील का भी प्रामाण्य है और सज्जनों का आनार भी इसमें प्रमाण है ', ' धर्म के स्वरूप को जानने वाले के सामने सबसे बड़ा प्रमाण श्रुति है ' वेद के प्रति यह मनु की उक्ति है । ' वेद ही धर्म का मूल है ' यह गोतम का कहना है । न्यायदर्शन के भाष्य में वात्स्यायन ने कहा है ---

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७६६ श्रम् ॥११० ॥

नारद उवाच --- कच्चित्ते सफला वेदाः कच्चित्ते सफलं धनम् । कच्चिते सफला दाराः कच्चित्ते सफलं युधिष्ठिर उवाच. श्रुतम् || १११ || SCARY-कथं वै सफला वेदाः कथं वै सफलं धनम् । कथं वै सफला दाराः कथं वै सफलं नारदउवाच -- - अग्निहोत्रफला वेदा दत्तभुक्तफलं धनम् । रतिपुत्रफला दाराः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ॥११२ ॥

( महा ० सभा ० ५।११०-११२ ) एतदनुसारेणैव मन्त्रा ब्राह्मणानि श्रौतसूत्राणि याज्ञिकपद्धतयः परम्पराश्च सन्ति । तदनुरोधित्येव पूर्व-मीमांसा, ब्रह्ममीमांसाऽपि नात्र प्रतिकूला । बुद्धिशुद्धयर्थं तदनुसारिणां यज्ञतपोदानादीनां त्वयाप्यङ्गीकारात् 1 । तेन सायणादीनां व्याख्यानमेकपक्षीयं दयानन्दीयव्याख्यानमेव सर्वतोभद्रमित्यप्यपास्तम् । अत एवाध्यात्मिकाधिदेवाधिभौतिकभेदेन वेदार्थवैविध्यमपि न मुख्यम्, अर्थभेदेन वाक्यभेदप्रसङ्गात् । अत एव सकृदुच्चरितः शब्दः सकृदेवार्थं गमयतीति प्रसिद्धिः । तथापि मुख्यार्थाविरोधेनैव लाक्षणिका गौणा अन्येऽर्थाः । कैश्चिदपि तथाऽव्याख्यानाच्च । केषाञ्चिन्मन्त्राणामनेकार्थत्वप्रदर्शनेऽपि समेषामाद्योपान्तमन्त्राणां संगतिभिस्तत्तिर्वाही न केनचित्कृतः । यथा कमर्थिता आर्षप्रमाणसिद्धा, न तथान्यार्थता | पूर्वोत्तरमीमांसानिष्णातैर्यथा - ' सप्रसङ्ग उपोद्घात हेतुतावस रस्तथा । निर्वाहतैककार्यत्वे षोढा संगतिरिष्यते ॥ ' इति संगत्या मन्त्रब्राह्मणादिव्याख्यानं क्रियते, न तथान्यैः । वाक्यानां परस्परविरोधे तत्परिहारोऽन्वेषणीयः । आधुनिक संविधानेष्वपि परस्परविरोधे समन्वयाय प्रयत्यते । पूर्वोत्तरमीमांसयोस्तु विरोधपरिहारपराण्यनेकानि सूत्राण्यपि सन्ति । ' यज्ञ की विधि बताना मन्त्र और ब्राह्मण का विषय है, लोकव्यवहार की व्यवस्था करना धर्मशास्त्र का, इस प्रकार एक शास्त्र सबकी व्यवस्था नहीं कर सकता, अतः अपने - अपने विषय के अनुसार इनका प्रामाण्य व्यवस्थापित होता है, जैसा कि चक्षुरादि इन्द्रियों का अपने - अपने विषय के प्रति प्रामाण्य अभिप्रेत है । यही बात महाभारत में भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है ---नारद ने कहा कि - क्या तुम्हारे वेद सफल हैं? क्या तुम्हारा धन सफल है? क्या तुम्हारी स्त्रियों सफल हैं? और क्या तुम्हारा शास्त्राध्ययन सफल है? इस पर युधिष्ठिर ने पूछा कि - ' वेद कैसे सफल होते हैं? धन कैसे सफल होता है? स्त्रियों कैसे सफल होती हैं और शास्त्राध्ययन कैसे सफल होता है ' । नारद ने उत्तर दिया कि - ' अग्निहोत्र आदि का अनुष्ठान करने से वेद सफल होते हैं, दान देने और उसका उपयोग करने में धन का साफल्य है, रति और पुत्र प्राप्ति से स्त्रियों का साफल्य है और शील और वृत्त का परिज्ञान कराकर शास्त्र सफल होते हैं । इसी के अनुसार मन्न, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र, याज्ञिक पद्धतियां और परम्पराएं हैं । इन्हीं का अनुवर्तन करती हुई पूर्व-मीमांसा और ब्रह्ममीमांसा इनके प्रतिकूल नहीं जाती । बुद्धि की शुद्धि के लिये तदनुकूल यज्ञ, तप, दान आदि का प्रतिपादन ब्रह्मा में भी किया गया है । तब सायण प्रभृति का व्याख्यान एकपक्षीय है और दयानन्द का व्याख्यान ही सब तरह से उत्तम है, यह कहना गलत है । इसी लिये मध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक भेद से बेद का मुख्यार्थ तीन प्रकार का नहीं हो सकता, क्योंकि अर्थ के भेद से वाक्य में भेद मानना पड़ेगा । इसी लिये यह नियम प्रसिद्ध है कि एक बार उच्चरित शब्द एक बार ही अर्थ का ज्ञान कराता है । इस मुख्यार्थं के अविरोधी लक्षणा से अधिगत अन्य अर्थ गौण कहलाते हैं । आपकी पद्धति से वेदमन्त्रों का व्याख्यान कहीं उपलब्ध नहीं होता । कुछ मन्त्रों के अनेक अर्थं प्रति किये गये हैं, किन्तु सभी मन्त्रों को आद्योपान्त संगति बैठाते हुए इस पद्धति का निर्वाह किसी ने नहीं किया है | वेद मन्त्रों की कर्मार्थता जैसे वर्ष प्रमाणों से सिद्ध है, उसी तरह इन मन्त्रों की अन्यार्थता के साधक प्रमाण उपलब्ध नहीं है । पूर्व और उत्तर मीमासा में निष्णात विद्वान् जैसे प्रसङ्ग, उपोद्घात, हेतु, अवसर, निर्वाहता और एक-कार्यता रूप vefos संगति के आधार पर मन्त्र और ब्राह्मण की व्याख्या करते हैं, उस तरह की व्याख्या अन्यत्र नहीं उपलब्ध होती ।

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वदार्थपारिजातः ७६७ शाखासम्बधिप्रलापस्य निराकरणेन ' शाखा एवं वेदार्थ ' इति शीर्षक लेखस्यापि ( पृ ० ४७ ) निराकरणं जातमेव । ब्राह्मणग्रन्थानां यथा वाक्यशेषेण वाक्यार्थी ज्ञायते, समानवाक्यान्तरेव वाक्यार्थी ज्ञायते, तथैव मन्त्रान्तरैरपि मार्थी ज्ञायते । अस्मिन्नेवार्थे वेङ्कटमाधवोयवचनं प्रमाणं न त्वत्कुकल्पनापोषकम् | ' अव्यवस्यन्ति मन्त्रार्थानेव मन्त्रान्तरैरपि । शाखास्वन्यासु पठितैविस्पष्टार्थेर्मनीषिणः ॥ ' इत्यत्र ' अन्यासु ' इति शब्देन व्याख्यास्यमानां शाकल-संहितामपि वेङ्कटमाघवः शाखामेव मन्यते । कश्चित्तु ब्राह्मणग्रन्थं वेदव्याख्यानमेव मनुते ( पृ ० ४७ ), तत्तु खण्डितमेव । अपि च, सामाजिका यदि ब्राह्मणग्रन्थं मन्त्रव्याख्यानमेवाङ्गीकुर्वन्ति, व्याख्यानमपि तत्तवृषिकृतं मन्यन्ते तर्हि आर्षमेव तद्व्याख्यानं कुतो नाङ्गीकुर्वन्ति । ब्राह्मणेषु स्पष्टं यज्ञानां वर्णनं दृश्यते, तथा सति यज्ञो वेदार्थ इत्येव समायाति । तथापि मन्त्रव्याख्याने किमिति तदपहाय राजादिवर्णनपरत्वेन मन्त्रान् बलादिव योजयन्ति । निरुक्तत्रारयास्क दुर्ग- सायणादयस्तु तत्र तत्र निगमत्वेन ब्राह्मणानि समुद्धरन्त्येव । सायणस्तु मन्त्राणा-मित्र ब्राह्मणानामपि विस्तृतं भाष्यं कृतवान्, तत्र तत्र यथायोग्य माध्यात्मिकादीनप्यर्थात् व्यञ्जितवान् ऐतरेय तैत्तिरीय-ब्राह्मणारण्यकशतपथादिव्याख्यानप्रसङ्गे । सामाजिकास्तु केवलं कुचोद्यमेव कुर्वन्ति । आरण्यकान्युपनिषदश्च ब्राह्मणान्तर्गतत्वाद्वेदा एव, तथापि यथा मन्त्रान्तरैरपि मन्त्राणामर्थो व्यज्यते, तथैव वदचिद् ब्राह्मणैर्मन्त्रार्थं व्यज्यन्ते, क्वचिच्च मन्त्रं ब्रह्मणार्था अपि व्यज्यन्ते । यथा तैत्तिरीयोपनिषदि ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तै ० उ ० २।१ ) इति सूत्रात्मकस्य ब्राह्मणस्य व्याख्यानम् -'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायाम् | सोते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता || ' इति । कात्यायनादिसूत्राण्यपि वेदार्थव्याख्यायामत्यन्तोपकारीणि, aarti कर्मसम्बन्धः स्पष्टं व्यज्यते । arrai में परस्पर विरोध उपस्थित होने पर उसका परिहार खोजना पड़ता है । आधुनिक संविधानों में भी परस्परविरुद्ध अंशों के समन्वय पर बल दिया जाता है । पूर्व और उत्तर मीमांसा में इस प्रकार के विरोध के परिहार के लिये अनेक सूत्र हैं । पाखा संबन्धी प्रलाप के निराकरण कर देने पर ' शाखा ही वेदार्थ है ' इस शीर्षक के लेख का खण्डन भी हो ही जाता है । ब्राह्मण ग्रन्थों के वाक्यशेष से जैसे वाक्यार्थ का ज्ञान होता है, अर्थात् समान वाक्यान्तरों से वाक्यार्थ का ज्ञान हो जाता है, उसी तरह दूसरे मन्त्रों की सहायता से भी मन्त्रों का अर्थ परिज्ञात होता है । इसी अर्थ में कट area का प्रमाण हैं, आपकी की गई खोदी कल्पना में नहीं । ' इसी तरह दूसरे मन्त्रों की सहायता से भी, जिनका कि अर्थ अन्य शाखाओं में स्पष्ट है, मन्त्रों के अर्थों कोण निश्चित करते हैं ' यहाँ पर ' अभ्यासु इस शब्द से शाकल संहिता को भी, जिसकी कि वेंकट माधव व्याख्या करने जा रहे हैं, शाखा ही मानते हैं । कुछ लोग ब्राह्मण ग्रन्थों को वेद का व्याख्यान मानते हैं | इसका खण्डन किया जा चुका है । एक बात और है | यदि आर्यसमाजी ब्राह्मण ग्रन्थों को मन्त्रों का व्याख्यान मानते हैं और उसको ऋषिकृत मानते हैं, तो फिर इस वर्ष व्याख्यान को स्वीकार क्यों नहीं करते । ब्राह्मण ग्रन्थों में स्पष्ट हो यज्ञों का वर्णन किया गया है । इससे यही ज्ञात होता है कि यज्ञ ही वेद का अर्थ है | तब मन्त्र की व्याख्या करते समय वे इनको छोड़कर राजा आदि के वर्णन के अर्थ में मन्त्रों को क्यों जबर्दस्ती घसीटते हैं? निरुक्तकार यास्क, दुर्ग, सायण आदि जहाँ वहाँ निगम के नाम से ब्राह्मणों को उद्धृत करते ही हैं । सायण मन्त्र-संहिताओं के ही समान ब्राह्मणों का भी विस्तृत भाष्य करते हैं और उचित स्थान पर उनके आध्यात्मिक आदि अर्थ भी करते हैं, जैसा कि उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय ब्राह्मण, ते तरीयारण्यक, शतपथ ब्राह्मण आदि के भाष्यों में किया है । आर्यसमाजी गण केवल कुतर्क करना जानते है । आरण्यक और उपनिषद् भी ब्राह्मण के अन्तर्गत होने से वेद ही हैं, तो भी जैसे दूसरे मन्त्रों की सहायता से मन्त्रों का अर्थ स्पष्ट होता है, उसी भाँति कहीं ब्राह्मणों की सहायता से मन्त्र का अर्थ जाना जाता है और कहीं मन्त्रों की सहायता से ब्राह्मणों का अर्थ | जैसे कि तैत्तिरीय उपनिषद् के ' ब्रह्मविद् उस परम स्वरूप को पाता है ' इस सूत्रात्मक वाक्य का अर्थ- ' ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त स्वरूप है । रहस्य में आवृत इस ब्रह्म को जो जान लेता है, वह सभी कामनाओं के साथ विपश्चित् ब्रह्म को भी प्राप्त कर

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७३८ वेदार्थपारिजात याज्ञिकानां रीत्या ' त्रिधा वद्धो वृषभो रोरवीति ' ( ऋ ० सं ० ४१५८३ ) इत्यंशस्यायमेवाभिप्रायो यद् यज्ञा-त्मकधर्मरूपो वृषभो मन्त्रेण ब्राह्मणेन कल्पसूत्रेण संबद्धस्तैस्त्रिभिरेव सुज्ञेयः । सायणीष्वटमहीधरभाष्याण्येव तदनु-सारिवा मुख्य वेदार्थ इति स्पष्टमेव व्यज्यते । I. वेदाङ्गोपाङ्गानामन्येषां वाऽऽर्षग्रन्थानां वेदव्याख्याने वेदार्थानुष्ठाने चोपयोगः । यत्तु ऋषिभिः सरलो वेदार्थः कुतो न कृतः ( पृ ० ५० ) इत्याशङ्कच निरथं बहु जल्पता ब्रह्मदत्तेन तेषां सार्वश्याभावादसामर्थ्य दर्शितम्, यच्च तेनैव ' यास्कपाणिनिपतञ्जलिव्यासजैमिनिभिरेकै कविभागमेवाश्रित्य वेदार्थोपदेश: कृत: ' ( पृ ० ५० ) इति साकूतमीरि-तम्, तदतीव मन्दम् । तथात्वे त्वदीयदयानन्दीयभाष्यं सुतरामपूर्णमशुद्धं च सिद्धयति । यत्र मन्दरो मज्जति तत्र परमाणोः का कथा? यत्राषाढवाते चलति द्विपेन्द्रोऽपि कम्पते, तत्र चक्रीवतः का कथा । ऋषयोऽपि यदि वेदार्थ व्याख्यातुं न प्रभवन्ति तदा पदे पदे स्खलितस्य दयानन्दस्य व्याख्यानं सर्वतोभद्रमित्युक्तिरुपहासायैव । वस्तुतस्तु-' तस्मान्नात्पश्रुतैर्मन्देः कार्यों वेदार्थनिर्णय: ' इति वेङ्कटमाधवीयवचनेन सामाजिक शिक्षा ग्राह्या । एवंविधा अर्ध-नास्तिकाः सम्पूर्णनास्तिकेभ्योऽपि दुश्चिकित्स्या भवन्ति । ते निरङ्कुशत्वादृषीनप्यवजानन्ति । सिद्धान्ततस्तु सर्वेऽप्येते सर्वज्ञकल्पा ऋषयो वेदार्थं जानन्ति । वेदार्थज्ञानसामग्रीमुपस्थापयन्ति । तदनु-सारेणैवान्येऽपि वेदार्थ बोद्धुं प्रभवन्ति । सायणादयश्च निश्चितं वेदार्थ प्रतिपादितवन्तः । दयानन्दस्तु पलायत-परायणत्वादेवानेकाः संहिता ब्राह्मणानि सूत्राणि त्यक्त्वा परम्पराहीनत्वाद्यत्किञ्चिज्ञ्जल्पितवान् । यथा व्याकरणशास्त्र शब्दतत्प्रकृत्तिप्रत्ययतदर्थनिरूपणेन वेदार्थज्ञानायोपयुज्यते, तथैव निरुक्तं शब्दार्थनिर्वचनाभ्यामुपकरोति । यथोक्तमेव लेता है ' इस मन्त्र से स्पष्ट होता है । कात्यायन आदि के सूत्र भी वेद के अर्थ की व्याख्या के लिये अत्यन्त उपयोगी हैं । उनसे मन्त्रों का कर्म से संबन्ध स्पष्ट होता है । याज्ञिकों की पद्धति से ' faar aat ' इत्यादि मन्त्र का यह अभिप्राय है कि यज्ञात्मक धर्मरूप वृषभ मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र इन तीन से संबद्ध होने पर ही सुगमता से जाना जा सकता है । सायण, उब्बट, महीधर आदि के भाष्य इन्हीं का अनुसरण करते हैं, अतः स्पष्ट है कि इनके द्वारा प्रदर्शित अर्थ ही वेद का मुख्यार्थ है । वेदाङ्ग, उपांग तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों का वेद की व्याख्या में तथा वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में उपयोग होता है । ऋषियों वेद का सरल अर्थ क्यों नहीं किया, इस आशंका के उत्तर में अनाप - शनाप बहुत लिखते हुए ब्रह्मदत्त जिज्ञासु ने कहा है कि ये सर्वश नहीं थे, अतः उनमें यह सामर्थ्य ही नहीं थी कि वे मन्त्रों का सरल अर्थ करते | साथ ही उन्होंने व्यंग्यात्मक भाषा में यह भी लिखा है कि यास्क, पाणिति, पतंजलि, व्यास, जैमिनि आदि आचार्यगण केवल एक विभाग की व्याख्या के आधार पर ही वेद के अर्थ का उपदेश करने का प्रयत्न करते हैं । किन्तु उनका यह कथन बड़ा कमजोर हैं । यदि ऐसा मान लिया जाय, तब तो दयानन्द का भाष्य ही नितरां अपूर्ण और अशुद्ध मानना पड़ेगा । जहाँ मन्दर जैसा पहाड़ डूब सकता है, वहां परमाणु जैसी छोटी वस्तु के डूब जाने की बात ही क्या है? आषाढ मास की आंधी के सामने जब हाथी नहीं ठहर सकता, तो फिर गधे की क्या बिसात होगी? ऋषिगण भी यदि वेद का अर्थ नहीं कर सकते तो, स्थल स्थल पर लुढक जाने वाले दयानन्द का व्याख्यान सर्वश्रेष्ठ है, यह उक्ति मात्र उपहास के लिये हो हो सकती है | वास्तव में ---- ' इसलिये अल्पश्रुत मन्दबुद्धि वाले व्यक्तियों को वेद के अर्थ का निर्णय नहीं करना चाहिये ' इस वेंकट area की उक्ति से समाजियों को शिक्षा लेनी चाहिये । इस प्रकार के आधे नास्तिक पूरे नास्तिकों की अपेक्षा अधिक खतरनाक है । निरंकुश होने के कारण ये प्राचीन ऋषियों की भी अवमानना करने लगते हैं । वास्तव में ये सभी सर्वज्ञकल्प ऋषिगण वेद के अर्थ को जानते हैं । वेद के अर्थ को जानने के लिये सामग्री जुटाते हैं सायण प्रभृति आचार्यों ने परम्परा से निश्चित वेदार्थ का ब्राह्मणों और सूत्रों को छोड़कर, किसी परम्परा के अभाव और इन्हीं की सहायता से दूसरे भी वेदार्थ को जानने में समर्थ होते हैं । प्रतिपादन किया है | दयानन्द तो पलायन वादी थे, अतः अनेक संहिताओं,

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वेदार्थपारिजातः दुर्गाचाय्यण --- ' यस्मात् स्वतन्त्रमेवेदमर्थनिर्वचनम्, व्याकरणं तु लक्षणप्रधानम् ' ( नि ० ११५ ) इति । तत्रार्थव्याख्यानं निर्वचनम् । तत्र बुद्धिवैशद्यायैकार्थपर्य्यवसायीन्यनेकानि निर्वचनानि भवन्ति । यथा शृङ्गनिर्वचनानि- ' शृङ्गं श्रयतेव शृणोर्वा नातेव शरणायोद्गतमिति वा शिरसो निर्गतमिति वा ( नि ० २।७ ) इति । ( शिरसि ) आश्रितत्वात् शृङ्गम्, हिंसार्थकशृणातेर्वा, तेन हिनस्ति इति शृङ्गम्, शिरसो निर्गतत्वाच्च । अत्रार्थानुगमान्यनेकानि निर्वचनानि प्रदशितानि । अर्थभेदाच्च निर्वचनभेदः । पृथिव्यर्थ के निर्ऋतिशब्दे ' निरमयात् ' ( नि ० २१७ ) निविष्टानि रमन्तेऽस्यामिति निर्वचनम् । दुखःसंज्ञिकायां नि तो नितराम् ऋच्छति कृच्छ्रमायातीति निर्ऋतिः । सर्वथाऽपि निर्वचनेऽपि सापेक्षतय 1 । तथैव च दुर्गाचार्येणोक्तम्- ' यद्यपि गतिकर्मणां द्वाविंशतिसंख्यानामवि-शिष्टं गमनमेकोऽर्थः 1 तथापि प्रसिद्धयनुरोधाय कसतिलठते वच्योतन इत्येवमादयः प्रतिनियतसत्त्वगमनविषया एव द्रष्टव्याः । तद्यथा य एवोत्कटिक उरसा वा गच्छति स एव कसतीत्युच्यते, नेतरो य ऊर्ध्वं गच्छति । य एव निम्नेन कश्चिदत लोष्टादिरस्यो वा चेतनः पुरुषादिरकामकारेण गच्छति स एव लोटत इत्युच्यते । तथा यदेव द्रवद्रव्यं किञ्चित् स्रवति तदेव पच्योतत इत्युच्यते ' ( नि ० ४११ ) | यत्रानवगतसंस्कारेषु नेगमेषु पदेषु गत्यन्तरं नास्ति, यथार्थ विभक्ती: संनमयेद् इत्यादिकं न यथाश्रुतार्थोपपत्ती सत्यां तथा सत्यर्थऽराजकतापत्तेः । यदुक्तं प्रतिमन्त्रस्याध्यात्मिकाधिदैविकयज्ञभेदेन त्रिविधोऽर्थो भवति । यत्र भाष्ये त्रिविधोऽर्थो भवेत्, तदेव वेदार्थव्याख्यानम् | तत्समर्थनाय ' अर्थ वाचः पुष्पफलमाह ' ( नि ० ११२० ) इति निरुक्तवचनमुद्धृतम् ( पृ ० ५५ ), तत्तु में जो कुछ मन में आया वे लिखते चले गये । जैसे व्याकरणशास्त्र शब्द का, उसके प्रकृति प्रत्यय का और उसके अर्थ का निरूपण कर वेदार्थ के ज्ञान में सहायक होता है, उसी तरह निरुक्त भी शब्द और अर्थ के निर्वचन के द्वारा वही कार्य करता है | दुर्गाचार्य ने कहा भी है कि- ' क्योंकि यह अर्थनिर्वचन का प्रकार एक स्वतन्त्र विषय है | व्याकरण तो लक्षणप्रघान है, अर्थात् शब्द के प्रकृति-प्रत्यय आदि लक्षणों का व्याख्यान करता है ' । निर्वचन में अर्थ की व्याख्या की जाती है । वहाँ पर बुद्धि के परिष्कार के लिये एक ही अर्थ को प्रदर्शित करने वाले अनेक निर्वाचन किये जाते हैं । जैसे कि निरु में रंग शब्द के अनेक निर्वाचन किये गये हैं --- ' श्रयति, शृणोति और शम्नाति धातु से, अथवा करण के लिये निकला, शिर से निकला है, इस अर्थ में शृंग का निर्बंधन किया जा सकता है ' । इसका अर्थ है कि शिर में आश्रित होने से यह ग कहलाता है, अथवा हिंसा अर्थं वाले शृणाति धातु से जिससे मारता है, वह शृंग कहलाता है । शिर से निकलता है, इसलिये भी इसकी श्रृंग कहते हैं । इस प्रकार के अर्थ के अनुसार अनेक निर्वाचन बताये जाते हैं । अर्थ के भेद से भी निर्वचन भिन्न होते हैं । जैसा कि पृथियो के अर्थ में ' निर्ऋति ' शब्द का निर्वचन ' निरमणात् ' किया जाता है । इसका अर्थ है कि ' जिस पृथिवी में निवास कर प्राणी सुखी होते हैं । इसके विपरीत निर्ऋति शब्द का अर्थ जब दुःख किया जाता है, तो उसका निर्वचन ' जिसके कारण प्राणी नितान्त कष्टदायक अवस्था में पहुँच जाता है ' यह होता है । निर्वचन भी सदा सापेक्ष होता है । यही बात दुर्गाचार्य ने भी कही है- ' यद्यपि गतिकर्मक २२ धातुओं का अविशेषेण एक ही गमन अर्थ है, तो भी प्रसिद्धि के अनुरोत्र से कसन, लोटन, रच्योतन आदि का किसी निश्चित प्राणी के गमन में ही प्रयोग किया जाता है । जैसे कि जो प्राणी उकडू बनकर चलता है, अथवा छाती के बल चलता है, नहीं कसति का प्रयोग होता है, उसके लिये नहीं, जो कि उठकर चलता है । जो कोई अचेतन देला आदि की तरह चेतन पुरुष भी अनिच्छा से चलता है, वहीं पर ' लोटते ' इस पद का प्रयोग होता है । तथा जो कोई तरल द्रव्य कुछ बहने लगता है तो उसके लिये ' इच्योतते ' धातु का प्रयोग होता है ' । जहाँ पर किसी प्रकार के शब्द संस्कार को अवगति न हो, इस तरह के नेगम पदों में किसी दूसरी गति के अभाव में अर्थ के अनुसार विभक्त में परिवर्तन का विधान है, यथाश्रुत पदों से अर्थ की उपलब्धि हो जाने पर नहीं, क्योंकि ऐसा करने पर अर्थ प्रक्रिया में अराजकता जायगी । प्रत्येक मन्त्र का आध्यात्मिक, आधिदैविक और अधियज्ञ के भेद से तीन प्रकार का अर्थ होता है । अतः जिस भाष्य में उक्त तीनों प्रकार का अर्थ किया गया हो, वही वेद का सहो व्याख्यान है । इसके समर्थन में ' अर्थ वाचः ' यह निरुक्त वाक्य उद्धृत

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वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 830 का मूल पृष्ठ
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८०० वेदार्थपारिजात तदर्थापरिज्ञाननिबन्धनमेव । तत्र - ' उत त्वं सख्ये स्थिरपीतमाहर्तेनं हिन्वन्त्यपि वाजिनेषु । अषेवा चरति मामयैष वाचं शुश्रवाँ अफलामपुष्पाम् || ' ( ऋ ० १०१७ ९ १५ ) तदर्थस्तु - उत अपि त्वमेकम् । एकमपि वागर्थज्ञं बहूनाहुः । कीदृशम्? विदुषः सख्ये सखिभावे देवसख्ये यस्मिन् देवानां सखिभावस्तस्मिन् सख्ये स्थाने रमणीये देवलोकस्थाने स्थिरमविचालित विपरीतार्थं गृहोतार्थमाहुः ऋचः, नैनं हिन्वन्ति नैनं वागर्थज्ञं वहवोऽनर्थज्ञा मन्दचेतसो बहवोऽपि नानुगन्तुं प्रभवन्ति । अत एवैकमपि बहूनाहुः । क्व नानुगन्तुं प्रभवन्तीत्याह वाजिनेषु वाग्ज्ञेयेष्वर्थेषु बलवत्स्वपि दुर्ज्ञेयेषु समुद्रपिहितरत्न तुल्येषु देवताज्ञानादिषु व्याकर्तव्येषु नान्येऽवगन्तुं प्रभवन्ति । वागर्थज्ञस्तु शक्नोति तान् व्याकर्तुम् । एवमर्थज्ञं प्रशस्योत्तरार्द्धनानर्थज्ञो निन्द्यते-- एष अधेश्वा चरति । सा अधीता वेदलक्षणा वाग् इह परत्र च न धिनोति नाभीष्टं पूरयति, यस्या अर्थी न विज्ञायते । तया अर्थज्ञानरहितयाऽनभीष्टदोहया अघेखा वाचा चरति निरर्थकं पय्र्यदेति । यथा कश्चिन्मायया सुवर्ण विभृयात्तथैवायमिमामपुष्पां वाचं विभति, सा च नास्मै कामान् दुग्धे । कीदृशान् कामान्? ये तस्या वाचो मनुष्यस्थानेषु देवतास्थानेषु च दोग्धव्याः प्राप्तव्या: कामास्तानित्यर्थः । य एवमफलाम पुष्पां श्रुतवान् भवति, अन्येभ्यः श्रुत्वाऽवस्थितो भवति, तस्याध्ययनात् पाठमात्रादृते नान्यदस्ति वाचि किञ्चिन्मृग्यम् । यथा ह्यसो पश्यत्यपुष्पामफलां तथैव भवति, अथवा तदल्पत्वं नञर्थः । तथा चार्थज्ञानरहिता वागल्पफलैव भवतीत्यर्थः । अध्ययनमात्रेऽपि किञ्चिदल्पं फलं भवत्येव, न परिश्रमी व्यर्थः 1 । वास्तवं वाचा कि पुष्पं किं फलमित्याह - रूपककल्पनया पुष्पफलविभागेन याज्ञदैवते देवताध्यात्म वा पुष्पफले । यज्ञपरिज्ञानं याज्ञं पुष्पं देवतापरिज्ञानं दैवतं फलम् । दैवतं पुष्पम् अध्यात्मज्ञानं फलमिति वा । वेद-लक्षणायाः सर्वस्या एव वेदरास्त्रिधा विभागः । यदाभ्युदयलक्षणो धर्मोऽभिप्रेयते, तदा याज्ञं यज्ञपरिज्ञानं तदनुष्ठानं च पुष्पम्, पुष्पस्येव तस्य पूर्वमेव विस्तारात् । दैवतं देवताज्ञानं तत्प्रसादश्च फलम् । यदा निःश्रेयसलक्षणो धर्मोऽभिप्रेतं, किया गया है । इस प्रकरण का ठीक अर्थ न जान पाने के कारण ही यह सब कहा जाता है । निरुक्त में इस प्रसंग में ' उत तवं सख्ये ' इत्यादि मन्त्रदाहृत किया गया है । इसका यह अर्थ है- वस्तुतः विद्वानों का कहना है कि वाणी के सही अर्थ को जानने वाला एक ही विद्वान् अनेकों समान है । देवताओं की मित्रता के स्थान स्वर्ग में ऐसे अर्थविद् विद्वान् की स्थिति अविचल होती है, ऐसा वेदमन्त्रों का कहना है । इस व्यर्थज्ञ अकेले विद्वान् की मन्दबुद्धि, अर्थ से अनभिज्ञ अनेक व्यक्ति बराबरी नहीं कर सकते, जब कि समुद्र में छिपे रत्नों के समान अत्यन्त दुरूह पदों के अर्थ को समझने का प्रसंग आता है । इसीलिये इस एक ही अर्थ को अनेक कहा गया है । क्योंकि इन दुरूह पदों के अर्थ को अनेक अविद्वान् मिलकर भी नहीं समझ सकते, किन्तु अर्थज्ञ अकेला ही उनको समझ लेता है । इस प्रकार मन्त्र के पूर्वार्ध से अर्थ की प्रशंसा करके उत्तरार्ध से अनर्थज्ञ की निन्दा की गई है । यह अनर्थज्ञ व्यक्ति बिना गाय का है, अर्थात् वह जो विद्या पढ़ता है, वह उसके लिये न तो इस लोक में और न पर लोक में ही फलवती होती है, क्योंकि वह उसके अर्थ को नहीं जानता । उस अर्थज्ञानरहित वाणी के साथ वह उसी प्रकार व्यर्थ विचरण करता है, जैसा कि कोई दूध न देने वाली गाय के साथ विचरण करता हो । जैसे कोई इन्द्रजाल से उत्पादित सुवर्ण को धारण करना चाहता हो, उसी तरह बिना अर्थ की इस वाणी को धारण करने वाला भी उससे अपनी मनोकामनाओं को नहीं पा सकता, जो कि उस वाणी से मनुष्यलोक और देवलोक में उसको free ी हैं । जो व्यक्ति इस प्रकार की अफल और अपुष्प वाणी को दूसरे से सुन कर रह जाता है, उसके लिये उसको पढ़ लेने के सिवाय वाणी का और कोई प्रयोजन नहीं है । जैसी अफल और अपुष्प वाणी को वह देखता है, उसी तरह की स्थिति उसका हो जाती है | अथवा यहाँ पर नन् का अर्थ अल्पता है । अर्थात् अर्थज्ञान के बिना पढ़ी गईं वाणी थोड़ा फल देती है । केवल अध्ययन मात्र से भी थोड़ा बहुत फल मिलता ही है, वह परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता । वाणी का वास्तविक फल और पुष्प क्या है? रूपक की कल्पना कर याज्ञ और दैवत अथवा देवता और अध्यात्म को यहाँ पर पुष्प और फल कहा गया है । यज्ञ का परिज्ञान यहाँ पर याज्ञ पुष्प है और देवता का परिज्ञान दैवत फल | अथवा देवता का परिज्ञान पुष्प और अध्यात्मज्ञान फल है । सारी वेदराशि तीन प्रकार से विभक्त हो जाती है । जब अभ्युदयलक्षण धर्म अभिप्रेत होता है, तब याज्ञ अर्थात् यज्ञ का परिज्ञान और उसका अनुष्ठान पुष्प कहलाता है, क्योंकि पुष्प के समान पहले यश कर्म का विस्तार होता है । देवता का ज्ञान और उसकी प्रसन्नता फल है । जब निःश्रेयस्