वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 831–840
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 831–840
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वदार्थपारिजाता ८०१ तदा पूर्वतने उभे अपि याज्ञदैवते पुष्पम् । पुष्पत्वमेव धर्मं विभृतः । देवते याज्ञस्यान्तर्भावात् । देवतपदेन कर्मानुष्ठानसहित-देवतोपासनं गृह्यते । ब्रह्मात्मसाक्षात्कारापेक्षितस्वान्तनैर्मल्यैकाग्रचसम्पादकत्वात् पुष्पस्थानीयं तत् । तदनन्तरं मुमुक्षु-fara मधिदैवतं चच्छिद्याध्यात्ममेवाभिसंपादयति । स एवात्मयाजी भवति, अध्यात्मार्थत्वादधिदैवतस्य तत्रैव पुरुषार्थ-पर्यवसानात् । दुर्गाचार्य्यश्च स्पष्टमेव वक्ति -- स एष सर्वोऽपि मन्त्रब्राह्मणराशिरेव त्रिविधो विभक्तः, तीव्रमुमुक्षुत्व-प्रादुर्भावात्पूर्वमधियज्ञाषिदेवपरस्तदनन्तरं तु ब्रह्मात्मपर एव सर्वोऽपि वेदराशिः, बुद्धिमंल्यतदेकाग्रयसम्पादनद्वारा तयोरपि परब्रह्मपर्यवसायित्वात् । अत एव पूर्वमीमांसायां सर्वस्यैव वेदस्य कर्मपय्र्यवसायित्वमुक्तम्, ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वात् ' ( मी ० सू ० ११२1१ ) इति । उत्तरमीमांसायां तु ' सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ' ( व्र ० सू ० ३/४/२६ ) इति । ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' ( का ० ११२।१५ ) इत्यादिश्रुतिषु सर्वस्यैव वेदस्य ब्रह्मपय्र्यवसायित्वमुक्तम् । गीतायां च ' त्रैगुण्यविषया वेदा: ' ( श्री ० भ ० गी ० २/४५ ) इति कर्मकाण्डाभिप्रायेणोक्तम् । ' वेदश्च सर्वैरहमेव वेद्य: ' ( श्री ० भ ० गी ० १५।१५ ) इति ज्ञानकाण्डाभिप्रायेणोक्तम् । यज्ञदेवताप्रतिपादनस्यापि ब्रह्मात्मपद-प्राप्त्यर्थत्वात्तात्पर्यविषया सफलवेदराशेर्ब्रह्मपर्यवसायित्वम्, सर्वेषामपि शब्दानां जाती शक्तेरङ्गीकारात्, जातेश्च स्वव्यापकीभूतायां परसत्तायां सत्ताजातो, तस्याश्च ब्रह्मण्येव पर्यवसानात् । न केवलं वैदिकानामपि तु समेषामपि शब्दवाक्यतत्कदम्बानां ब्रह्मण्येव पय्र्यवसानम् । वेदराशेरीश्वरपरत्वव्याख्यानं तु नासंगतम् । ' सर्वे वेदा यत्पदमा-मनन्ति ' ( का ० ११२/१५ ) इत्यादिश्रुतिसमर्थितत्वात्, स्थूलदृष्ट्या अभिधाशक्त्या यज्ञदेवतादिप्रतिपादनपराणामपि वेदवाक्यानां लक्षणादिभिर्ब्रह्मपरत्वप्रतिपादनसंभवात् । अत एव यथा गोपाङ्गनानां ते ते गोपा लौकिकाः पतयः पत्याभासा एव श्रीकृष्णस्तु मुख्यः पतिः तथेवेन्द्रवरुणादयः श्रुतीनामवान्तरतात्पय्यंगोचराः । ब्रह्मात्मतत्त्वं तु श्रुतीनां मुख्यः परमार्थः । तथा च वेदानां धर्मब्रह्मपरत्वं वा प्रामाणिकमेव तत्रापि पूर्वेण मन्त्रेण निरुक्तवाक्येन वा कथचिदप्येतस मोक्षलक्षण धर्म अभिप्रेत होता है, तो पहले के दोनों याज्ञ और वैदत पुष्प स्थानीय कहे जाते हैं । पुष्प के समान से धर्म को धारण करते हैं । दैवत कर्म में या कर्म का अन्तर्भाव हो जाता है । दैवत पद से कर्मानुष्ठान सहित देवतोपासन गृहीत होता है । ब्रह्मात्म der के साक्षात्कार के लिये अपेक्षित अन्तःकरण की निर्मलता और एकाग्रता का संपादक होने से देवतोपासन यहाँ पुष्पस्थानीय है । उसके बाद मुमुक्षु अधियज्ञ और अधिदैवत को छोड़कर अध्यात्म के संपादन में ही लग जाता है । वह आत्मयाजी कहलाता है । अधिदेव का उपयोग अध्यात्म के लिये है, वहीं पुरुषार्थ का पर्यवसान हो जाता है । दुर्गाचार्य स्पष्ट ही कहते हैं कि मन्त्र और ब्राह्मण के रूप में विभक्त यह सारा वेदवाङ्मय तीन विभागों में विभक्त हो जाता है | तीव्र मुक्ति की इच्छा के प्रादुर्भाव होने से पहले इसका तात्पर्य अधियज्ञ और अधिदेव में होता है और बाद में सारा वेद ब्रह्मात्मपरक हो जाता है, क्योंकि अधियज्ञ और अधिदेव का भी बुद्धि की निर्मलता और चित्त की एकाग्रता के संपादन द्वारा परब्रह्म में ही पर्यवसान होता है । इसीलिये पूर्वमीमांसा में सारे वेद का तात्पर्य कर्मपरक माना है, इसमें ' आम्नायस्य ० ' इत्यादि सूत्र प्रमाण है । ' सर्वापेक्षा च ' इत्यादि वेदान्तसूत्र और ' सर्वे वेदा ० ' इत्यादि उपनिषद् वेद का ब्रह्म में पर्यवसान मानते हैं । गीता का ' गुण्यविषया ' इत्यादि वचन कर्मकाण्ड के अभिप्राय से और ' वेदेश्व ० ' इत्यादि वचन ज्ञानकाण्ड के अभिप्राय से उक्त है । यज्ञ और देवता का प्रतिपादन भी ब्रह्मात्मपद की प्राप्ति के लिये ही है । इस प्रकार सकल वेदराशि का पर्यवसान तात्पर्य-farar ब्रह्म में ही होता है । सभी शब्दों की शक्ति जाति में ही मानी जाती है, जाति की शक्ति अपनी व्यापक परसत्ता में होती है और परसत्ता का पर्यवसान भी ब्रह्म में ही होता है । केवल वैदिक ही नहीं, सभी शब्द, वाक्य और उनके समुदाय का ब्रह्म में हो पर्यवसान होता है । वेदराशि की ईश्वरपरक व्याख्या असंगत नहीं है, क्योंकि यह ' सर्वे वेदा ० ' इत्यादि श्रुतिवाक्यों से समर्थित हैं और स्थूल दृष्टि से अभिधा वृत्ति के द्वारा यश, देवता आदि के प्रतिपादक वेदवाक्यों की लक्षणावृत्ति से ब्रह्मपरकता का प्रतिपादन किया जा सकता है । इसीलिये जैसे गोपियों के लोकिक पति केवल आभासमान हैं, उनके वास्तविक पति तो श्रीकृष्ण हैं, उसी तरह इन्द्र, वरुण आदि में श्रुतियों का अवान्तर तात्पर्य है, श्रुतियों का मुख्य प्रतिपाद्य ब्रह्मात्मतत्व ही है । इस तरह से वेदों की धर्म और १०१
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II वैदार्यपारिजातः सिद्धयति यत्प्रत्येकमन्त्रस्य त्रयोऽर्था अवश्यं व्याख्यातव्या इति । ' तिस्र एव देवता: ' ( नि ० ७1५ ) इत्यनेन तु स्पष्टमे देवतात्रैविध्यमुक्तमिति नानेनापि मन्त्राणामर्थत्रैविध्यनियमनम् । वस्तुतस्तु निरुक्तकारयास्कस्य तट्टीकाकाररू दुर्गाचार्य्यस्य च सिद्धान्ता विरुन्धन्त्येव सामाजिकानां मतम् । एतच्च प्रतिपादितं विस्तरेण पूर्वम् । वेदार्थज्ञानाय fr रुक्तविद्या अपेक्षितेति तु प्राचीने राचाय्यैरप्यम्युपगम्यत एव । यदुक्तं ' वेदस्य सर्व ए शब्दाः यौगिकाः प्रकृतिप्रत्यययोगादेव स्वार्थं व्यञ्जयन्तीत्येष यास्कसिद्धान्तः ' इति, तदपि शब्दार्थविषयबुद्धिवैशद्याय न बलात् स्वाभीष्टार्थे वैदिकशब्दानां योजनाय । तत एव रूढिवादिनामिव नैरुक्तानामपि नियतार्थतंव शब्दानाम् अत एव ' यः कश्च तत् कर्म कुर्यात् सर्व तत्सत्त्वं तथाचक्षीरन् ' ( नि ० १।१४ ) इत्यनेकेषामेकक्रियायोगादेकनामत प्रसज्येतेत्यस्य समाधानं कृतं दुर्गाचार्येण पश्यामः | ' समानकर्मणां नामधेयप्रतिलम्भमेकेषां नैकेषां यथा तक्षा परिव्राजकं जीवन भूमि इति । तक्षन् कश्चित्तक्षोच्यते । अन्यस्तक्षन्नपि न तक्षेत्युच्यते । कोऽत्र हेतुरिति चेच्छृणु लोकमेव पृच्छ तमेवोपालभस्व! न मयैष नियमः कृतः । यथा समानमीहमानानां कश्विदेवार्थेन युज्यते कश्चिन्न । न चेदानीमेकोऽर्थे संयुज्यत इत्यन्यैरपि संयोक्तव्यमेकेन वा लब्धमित्यभ्यैरपि लब्धव्यम् । स्वभावतो हि शब्दानां क्रियात्वेऽपि सति काि देव क्रियामङ्गीकृत्यावस्थितिर्भवतीति । अथवा क्रियातिशयकृतो वा नियमः स्यात् ' ( नि ० १११४ ) इत्यादिभिर्दुर्गाचार्ये स्पष्टीकृतम् । एतेन योगवृत्याग्नीन्द्रादिशब्दैः स्वैरं क्वचिद्राजानं क्वचिन्मन्त्रिणं क्वचित्सेनापत्याद्यर्थानुपाददाना सामाजिकाः प्रत्याख्याता एव । अनेकेषामेकक्रियायोगेऽपि व्यवस्थित एव शब्दनियमः स्वभावतो लोके! निरुक्तेतु यथाव स्थितानां शब्दानामन्वाख्यानमात्रमेव क्रियते । लक्षणशास्त्रस्यापि रूढयनुविधायित्वमेवाङ्गीकृतं नैरुक्तैरपि 1 । भवति हि ब्रह्मपरता दोनों ही प्रामाणिक है, वो भी पूर्वमन्त्र से या निरुक्त वाक्य से भी यह किसी तरह से सिद्ध नहीं होता कि प्रत्येक म का तीनों प्रकार का अर्थ बताया जाना चाहिये | ' तिस एव देवता ' इससे तो स्पष्ट हो देवता की after at प्रतिपादन किया गय है, अतः इससे मन्त्रों की विविधता नहीं सिद्ध होती । वास्तव में निरुक्तकार यास्क और उसके भाष्यकार दुर्गाचार्य के सिद्धान्त आर्य समाजियों के मत के विपरीत ही हैं । ' देवतोपपरीक्षा ' ( ७१४ ) प्रभूति निरुक्त के वाक्यों की व्याख्या करते समय इस पर पहले ही विस्तार से विचार किया जा चुका है । वेदार्थ के ज्ञान के लिये free f वद्या अपेक्षित है, इस बात को प्राचीन आचार्यगण भी मानते ही हैं । यह जो कह गया है कि ' वेद के सभी शब्द यौगिक हैं, अर्थात् प्रकृति - प्रत्यय के योग से ही अपने अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं, यह यास्क का सिद्धान्त हैं ' । इसका यह अभिप्राय है कि इससे शब्दार्थविषयक बुद्धि खुलती है । इसके द्वारा वैदिक शब्दों का जबर्दस्ती मन चाहा अर्थ नहीं किया जा सकता । एक रूढिमात्र को मानने वालों की तरह free कारों के मत में भी शब्दों के अर्थ नियत हैं । इसी लिये ' जो कोई वह कार्य करेगा, उन सबका उससे संबन्ध माना जायगा । इस प्रकार एक क्षरण क्रिया से संयुक्त अनेक पदार्थों का एक ही नाम हो जायगा ' इसका समाधान दुर्गाचार्य ने इस प्रकार किया है — ' यह देखने में आता है कि समान क्रिया करने वाले कुछ लोगों का एक नाम होता है, दूसरों का नहीं होता । जैसे कि तक्षा, परिव्राजक जीवन, भूमिज आदि शब्द है । कोई एक व्यक्ति तक्षण क्रिया करता हुना तथा कहलाता है, यह काम करने वाला दूसरा व्यक्ति इस शब्द से अभिहित नहीं होता । इसमें क्या कारण हैं? सुनो, इसका उत्तर लोगों से ही पूछो । तुम उन्हीं को उलाहना दो, यह नियम मेरा बनाया हुआ नहीं है । जैसे कि समान इच्छा के रहते हुए भी किसी की इच्छा पूरी होती हैं, दूसरे को नहीं, तो इसके लिये कोई यह नहीं कहता कि एक की कामना पूरी हुई तो दूसरे की कामना भी अवश्य पूरी क्यों नहीं हुई? एक ने कोई चीज पाई तो दूसरे ने क्यों नहीं पाई? स्वभावतः शब्दों की उत्पत्ति क्रिया के अनुसार होती है, तो भी इनकी अवस्थिति किसी एक क्रिया के अनुसार ही मानी जाती है । अथवा जिस क्रिया की अधिकता जिसमें रहती है, तदनुसार नियम बनता है । इस प्रकार दुर्गाचार्य ने इस प्रकरण को स्पष्ट किया है । दुर्गाचार्य के इस कथन से आर्य-समाजियों की अर्थ करने को इस मनमानी प्रवृत्ति का खण्डन हो जाता है कि योग वृत्ति से अग्नि, इन्द्र आदि शब्दों का कहीं राजा कहीं मन्त्री और कहीं सेनापति अर्थ स्वच्छन्दता से किया जा सकता है । अनेक व्यक्तियों का एक क्रिया से योग होने पर भी लोक में शब्द " का नियम व्यवस्थित है । निरुक्त में यथावस्थित शब्दों का उपदेश मात्र, निर्वचन मात्र किया जाता है । निरुक्तकारों ने लक्षणशास्त्र को
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८०३ निष्पन्नेऽभिव्याहारे योगपरीष्टिः । तत एव प्रथनात् पृथिवीति निर्वचने के एनामप्रथयिष्यत् किमाधारश्चेत्याद्यनुपपत्ति-माशङ्कय पृथिव्याः पृथुत्वदर्शनादपि निर्वचनमुपपादितम् । अत एव ' कदाचन स्तरी रसि ' ( वा ० सं ० ८२ ) इति मन्त्र द्र उच्यते । ' ऐन्द्रचा गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' इति विनियोगवलात्तु पारमैश्वर्य्ययोगाद् गौण्या वृत्त्या गार्हपत्योऽपीद्रपदबोध्यो भवति । धातूनामनेकार्थत्वेन प्रामाणिकान्येव निर्वचनान्युक्तानि न स्वैरतया, अव्याहतप्रसरत्वात्तस्याः । यदप्युक्तं ' वेदेष्वनित्येतिहासो व्यक्तिविशेषस्येतिहासो नास्त्येव निरुक्तसिद्धान्ते ' इति, तदपि चिन्तनीयम्, here दृष्ट्या तथात्वेऽपि नेतिहासिक पक्षोऽपलापमर्हति निरुक्त एव तत्पक्षस्यापि दर्शनात् । तद्यथा ' को वृत्रः? मेघ इति नैरुक्तास्त्वाष्ट्रोऽसुर इत्येतिहासिकाः ' ( नि ० २।१६ ) । इन्द्रोऽस्य शत्रुः शमयिता वा । अप च ज्योतिषश्च मिश्रीभावकर्मणो वर्षकर्म जायते । वैद्युतेन ज्योतिषा वाय्वावेष्टितेनोपतप्यमाना आपः स्पन्दन्ते } । उपमार्थेन तु युद्धवर्णा भवन्ति । युद्धवर्णनं तु रूपककल्पनयाऽप्युपपद्यते । अत एव मन्त्रवर्णोऽपि युद्धं मायामात्रमाह-- ' यदचरस्तम्वा वावृधानो बलानीन्द्र प्रब्रुवाणो जनेषु । मायेत्सा ते यानि युद्धान्याहुन शत्रुं ननु पुरा विवित्से || ' ( ऋ ० १०१५४१२ ) । हे इन्द्र ] त्वं नानाप्रकारं तत्वा वावृधानः शरीरेण वावृधानः विग्रहवान् भूत्वा पुनः पुनर्वर्धमानः यच्चात्मीयानि वीर्य्याणि प्रब्रुवाण इवाचर, माया सा तव । ऐश्वर्य्ययोगात्तथान्यथा वा भवति यतस्तव शत्रुः प्रत्यनीकः पुरा वा अद्य न कश्चिदासी-दस्ति वा यावद्वीर्यं किञ्चिदस्ति सवं तत्त्वमेव । ' वीर्य्यं वै प्राणो वीर्यमिन्द्र इति ह विज्ञायते ' ( मै ० सं ० १ | ६ | ९ ) । तथैव ' प्रीतिर्भवत्याख्यानसंयुक्ता ' ( नि ० १० | ४६ ) इत्यत्रापि पुरूरवा इत्यस्य प्राण एव हि पुरूरवा म बहुधा रोरूयते इति पक्षं व्याख्याय ' समस्मिञ्जायमान आसतग्ना उतेम वर्धयन्नद्यः स्वगूर्ताः । महेयत्वा पुरूरवो रणाया वर्धयन् दस्युहत्याय देवाः ॥ ' ( ऋ ० १० / ९ ५ / ७ ) इत्यस्य मन्त्रस्य तादृशपुरुषपरत्ववर्णनावसरे ' आपो भी रूढ़ि का अनुवर्त्ती ही माना है । शब्द के प्रयोग के निश्चित हो जाने पर तदनुसार यौगिक व्युत्पत्ति ढूंढ ली जाती है । इसीलिये ' प्रथन होने से पृथिवी है इस निर्वचन में इसको किसने नापा और कहाँ वह खड़ा था? इस शंका के उठने पर पृथिवी की विशालता के अनुसार भी निर्वचन किया गया है । इसीलिये ' कदाचन ० ' इत्यादि मन्त्र का देवता इन्द्र को माना जाता है । ' ऐन्द्रया गार्हपत्य ' . इस विनियोग के आधार पर पारमैश्वर्य के योग से गौणी वृत्ति के आधार पर गार्हपत्य अग्नि भी इन्द्र पद से बोधित होती है । धातुओं की अनेकार्थता के आधार पर निरुक्तकार ने प्रामाणिक निर्वचन हो दिये हैं । इसमें उन्होंने थोड़ी सी भी मनमानी नहीं की, क्योंकि ऐसा करने पर उस पर कहीं भी अंकुश लगाना असंभव हो जायगा । यह कहना कि fro क्त के सिद्धान्त के अनुसार वेदों में अनित्य इतिहास, अर्थात् विशेष व्यक्तियों का इतिहास नहीं है, इस लिये विचारणीय हो जाता हैं कि कुछ लोगों की दृष्टि से ऐसा होने पर भी इतिहास का पक्ष एकदम उपेक्षित नहीं है, क्योंकि निरुक में ही इस पक्ष का भी प्रतिपादन किया गया है । जैसे कि - ' वृत्र कौन है? निरुक्तकारों के मत से मेघ और ऐतिहासिकों की दृष्टि से स्वाष्ट्र असुर ' इन्द्र इसका शत्रु अथवा शमयिता है । जल और ज्योति के मिलने से वर्षा होती है । विद्युत की ज्योति से, जो वायु आवेष्टित हो, उपतप्त होकर जल बरसने लगता है । उपमा अलंकार के द्वारा वर्णित भाषा में यही घटना युद्ध के वर्णन जैसी हो जाती " है । रूपक की कल्पना से भी युद्ध का वर्णन बनता है । इसीलिये मन्त्र में भी युद्ध को कोरी माया बताया है । ' यदचरस्तम्वा ० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - ' हे इन्द्र, तुम भांति - भांति के शरीर धारण कर अपना बल बता रहे हो और जो अपने पराक्रम का बखान करते जा रहे हो, यह सब तुम्हारी माया है । ऐश्वर्य के कारण तुम अनेक शरीर धारण कर लेते हो । तुम्हारा कोई शत्रु न पहले था और न अब है । इस जगत् का यावन्मात्र वीर्य सब तुम्हीं हो । यह प्राण ही वीर्य हैं, यह इन्द्र ही वीर्य है, ऐसा श्रुति में कहा भी गया है । इसी प्रकार ' प्रीतिर्भवति ० ' यहाँ पर भी ' पुरूरवा ' इस पद का ' प्राण ही पुरूरवा है, क्योंकि वही नाना प्रकार से कोलाहल करता है ' इस पक्ष की व्याख्या के बाद ' समस्मिन् जायमानः ' इस मन्त्र की व्याख्या करते समय उसको पुरुषपरक बताते हुए जल को देवपत्नी बताया है । मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है-- ' इस पुरूरवा के पैदा होने पर, अर्थात् वर्षा काल में वर्षा के रूप में परिणत
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८०४ वैवार्थ पारिजातः देवपल्यो वा ' ( नि ० १०/४७ ) इत्युक्तम् । एतस्मिन् पुरूरवसि जायमाने वर्षकर्मण्यात्यानं लभमाने प्रावृट्काले समासत ना आपः समागम्य तं परिवाय्यं तद्विषेयतामुपगम्य आसते तिष्ठन्ति । उतापि वर्षासु स्वगूर्ताः स्वयं गामिन्यो भूत्वा नद्य इमं वर्धयन् एवं वर्धयन्ति । प्रत्यक्षीभूतमाह हे पुरूरवः । यत्त्वा त्वां महे महते रणाय मेघेन सह रमणीयाय संग्रामाय अवर्धयन् वर्धयन्ति माध्यमिका देवा दस्युहत्याय मेघवधाय तस्मात्त्वामवश्यं ग्नाः समागम्यासते वर्धयन्ति च नद्यः । ऐतिहासिक पक्षे s पि दुर्गाचार्येण तथैव व्याख्यातम् । समागम्येतस्मिन्नंडे पुरूरवसि आसत ग्नाः सर्वा देव-पन्यः । स हि स्त्रीणां स्वभावो यत्प्रजायमानां स्त्रियं परिवाय्यसिते । उतेममवर्धन् नदना ग्नाः स्तुतिपरास्तस्य । स्वगूर्ता स्वयंगामिन्यः अपरप्रणेयाः । सर्वमेतदुपपद्यते त्वयि हे पुरूरवः! यस्मान्महते रणाय असुरै रमणीयाय संग्रामाय दस्यु-हृत्याय शत्रुवधाय त्वामवर्धयत् स्वर्महिमभिस्त्वं नोऽरातीनसुरान् जेष्यसीति पुरश्चक्रुर्देवास्त्वाम् । ' तत्रेतिहासमाचक्षते ' ( नि ० २१०, २१२४ ९ २३, १०२६, १२।१० ) इत्यत्रापीतिवृत्तपक्षो वर्णितः । वेदानां नित्यत्वविरोवपरिहाराय दुर्गाचार्यस्तद्वद्याचक्षाण आह- ' आत्म इतिवृत्तं परकृत्वार्थवादरूपेण यः कश्चिदाध्या-fear offer fr भौतिको वार्थ आख्यायते दिष्ट्य दितार्थावभासनार्थ स इतिहास उच्यते । स पुनरय-मितिहास: सर्वप्रकारो नित्यमविवक्षित स्वार्थस्तदर्थप्रतिपत्तॄणामुपदेशपरत्वात् ' इति । तदेतन्नैतिहासिकानां न वा सनातनिनां प्रतिकूलम्, वेदस्य तैरपि ' अत एव च नित्यत्वम् ' ( ब्र ० सू ० ११३१२ ९ ) इति नित्यत्वाभ्युपगमात् । तेषां तेषामतिहासिक व्यक्तीनामनित्यत्वेऽपि विभिन्नकल्पीय तत्सद्व्यक्तिगतजातेनित्यत्वान्नित्य शब्दार्थ सम्बन्धोपपत्तेः । अर्थ-वादानां परमतात्पय्र्यस्य विधिस्तुत्यादौ सत्त्वेऽवान्तरतात्पय्र्यस्य स्वार्थेऽपि सत्वेन बाधाभावात् । अत एव - ' विरोधे गुणवाद: स्यादनुवादो s ववारिते । भूतार्थवादस्तद्वानात् ' इत्यर्थवादत्रे विध्याभ्युपगमः । उत्तरमीमांसकानां मते सर्व-थापि लौकिकेतिहाससम्बद्धघटनानुसारीणि वैदिकान्याख्यानानि न सन्ति । वैदिकाख्यानानुसारिण्यो वटनास्तु भवन्त्यो होने पर जल उसके पास आकर उसके अनुचर बन जाते हैं । वर्षा काल में नदियाँ भी इसकी अनुगामिनी होकर इसको बढाती हैं | प्रत्यक्ष देखते हुए कहते हैं कि हे पुरूरवा तुम्हारे महान् मेत्र के साथ होने वाले रमणीय संग्राम में तुम्हारा बल बढ़ाते हुए दस्यु अर्थात् मेघ को मार डालने के लिये माध्यमिक देव संलग्न हैं । इसलिये ये नदियाँ पानी से भरी हुई तुम्हारे पास आती हैं । ऐतिहासिक पक्ष में भी दुर्गाचार्य ने ऐसी ही व्याख्या की हैं । इस ऐड पुरूरवा के पास सारी देवपत्नियां आ गई । स्त्रियों का यह स्वभाव है कि प्रसूति स्त्री को वे घेरकर बैठ जाती हैं । वे उसकी वृद्धि के लिये स्तुति करती हैं । बिना किसी की आज्ञा के वे स्वयं उसके पास पहुँच जाती हैं । हैं पुरूरवः, यह सब तुम्हारे साथ भी हो सकता है, क्योंकि देवताओं ने तुमको इसलिए आगे किया है कि इस महान् रमणीय युद्ध में तुम देवताओं के द्वारा बढ़ाये गये बल के सहारे इन दस्युओं, शत्रुओं को जीत लोगे ' । निरुक्त में ' तत्रेतिहासमाचक्षते ' यहां पर भी इतिहास पक्ष का वर्णन किया गया है । वेदों की नित्यता के विरोध के परिहार के लिये दुर्गाचार्य ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है-- ' इतिवृत्त का अर्थवाद के रूप में विनियोग होता है । जो कुछ आध्यात्मिक, आधिदैविक अथवा नाधिभौतिक अर्थ कहा जाता है, यह स्वर्ग में उदित अर्थ को प्रकट करने के लिये इतिहास के रूप में कहा जाता है | यह सारा इतिहास अनित्य है, इसका स्वार्थ में वात्पर्य नहीं है, इसका उपयोग इतना ही है कि वह वेदार्थ को जानते मैंप्रवृत्त ' व्यक्ति को सहायता देता है । यह व्याख्या न तो ' ऐतिहासिकों के और न सनातनियों के मत में प्रतिकूल है | वेद को उन्होंने भी नित्य ही माना है । उन उन ऐतिहासिक व्यक्तियों की अनित्यता होने पर भी विभिन्न कल्पों की उस उस व्यक्ति में वर्तमान जाति तो नित्य ही है, अतः शब्द और अर्थ के संबन्ध की नित्यता बन जाती है । अर्थवाद वाक्यों का परम तात्पर्य विधि की स्तुति-निन्दा आदि में रहने पर भी अवान्तर तात्पर्य स्वार्थ में रहता ही है, अत: इसमें कोई बाधा नहीं आती । इसीलिये ' विरोध में गुणवाद, अवधारण में अनुवाद और अतीत वस्तु के लिए मूलार्थवाद ' इस प्रकार तीन प्रकार का अर्थवाद बताया गया है । उत्तर मीमांसकों के मत से किसी भी प्रकार से लौकिक आख्यानों का अनुसरण वैदिक आख्यान नहीं करते, किन्तु वैदिक आख्यानों का अनुसरण
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वेदार्थपारिजातः o न निवार्य्यते, वेदशब्देभ्य एव भूरादिप्रपञ्चसृष्ट्यम्युपगमात् । स्कन्दस्वाम्यादीनामपि वेदेषु नित्येषु घटनानुसारीति-हासस्यासंभवादेव तदौपचारिकत्वमभिमतम्, न तु तदनुसारिवृत्तापलापोऽभिमतः, तस्य पुराणेतिहासप्रमाणसिद्धत्वात् । न च पुराणेतिहासप्रामाण्यापलापो युक्तः, ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणानां प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते । अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, अन्यश्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणाम् ' ( गो ० सू ० ४ | १/६२ ) इति गोतमसूत्रे वात्स्यायने-नाभ्युपगमात् । तदनुसारेणैव सायणोव्वटमहीधरादयो वेदभाष्यकारा ऐतिहासिकपक्षेण मन्त्रान् व्याचक्षाणा अपि कैमकाङ्क्षायां तेषां तत्तदुपदेशपरत्वमाहुः । अनेवंविदस्त्वैतिहासिक पक्षमपलपन्त्येव । लौकिकेतिहासानामपि धर्मसदाचाराद्युपदेशपरत्वेनैव सार्थक्यम्, अन्यथा निखातशवानां पुनः पुनस्तदुत्खननमिवातीतघटनानां पुनः पुनरावर्तनं व्यर्थमेवस्यात् । तत एव रामादिवद्वर्तितव्यं न रावणादिवदिति रामायणनिष्कर्षः, युधिष्ठिरादिवद्वतितव्यं न दुर्योधनादिवदिति महाभारत निष्कर्षः शिष्टैर्बोध्यते । यदप्युक्तम् --- ' यास्कोऽर्थानुसारेण विभक्तीनां स्वराणां च परिणाममुचितं मन्यते ' अर्थनित्यः परीक्षेत ' ( नि ० २ ( १ ), ' यथार्थं विभक्तीः सन्नमयेत् ' ( नि ० २1१ ), ( कथमनुदात्तप्रकृति नाम स्याद् दृष्टव्ययं तु भवति ' ( नि ० ११८ ) इति तदुक्त: । न पदपादोऽनुबध्नात्यर्थमिति यास्कः, ' अरुणो मासकृत् ' ( नि ० ५।२१ ) इति हि तत्र पदविभागः । दयानन्दीय भाष्यं च तदनुसरत्येव ' इति, तत्तुच्छम्, तन्निरुक्तवचनाद्द्यानन्वीयमतसमर्थनासंभवात् । तथाहि निरुक्तवचन-प्रसङ्ग इत्थम् --- ' अथ ' निर्वचनम् । तद्येषु पदेषु स्वरसंस्कारौ समर्थी प्रादेशिकेन गुणेनान्वितौ स्यातां तथा तानि निब्रूयात् । अथानन्वितेऽर्थेऽप्रादेशिके विकारेऽनित्यः परीक्षेत, केनचिद्वृत्तिसामान्येन अविद्यमाने सामान्येऽप्यक्षरवर्णसामान्यान्निब्रू-यात् । न त्वेव न निब्रूयास संस्कारमाद्रियेत । विशयवस्यहि वृत्तयो भवन्ति यथार्थं विभक्ती: संनमयेत् । प्रत्तमवत्तमिति करने वाली लौकिक घटनाओं का निषेध नहीं किया जा सकता । वेद के शब्दों से पृथिवी आदि प्रपंच की सृष्टि मानी गई है । स्कन्दस्वामी आदि के मत से भी वेद नित्य हैं, मतः उसमें घटनानुसारी इतिहास के असंभव होने से उसकी औपचारिकता मानी गई है । वेद वर्णित घटनाओं का भविष्य में होना असंभव नहीं है, क्योंकि पुराण- इतिहास आदि से उनकी सिद्धि होती है पुराण- इतिहास आदि की प्रामाणिकता का अपलाप नहीं किया जा सकता, क्योंकि ' प्रमाणभूत ब्राह्मण वचनों से इतिहास - पुराण का प्रामाण्य स्वीकृत है | मन्त्र ब्राह्मण का इतिहास - पुराण और धर्मशास्त्र का प्रतिपाद्य विषय free free है ' यह बात गोतमसूत्र के न्यायभाष्य वात्स्यायन ने कही है । तदनुसार ही सायण, उम्वट, महीधर आदि वेदभाष्यकारों ने ऐतिहासिक पक्ष से मन्त्रों की व्याख्या करते हुए भी प्रयोजन की आकांक्षा में वेद और ब्राह्मण को इतिहास का निरूपक बताया है । जो इस बात को नहीं जानते, वे तो ऐतिहासिक पक्ष को नहीं स्वीकार करते । लौकिक इतिहास की भी सार्थकता धर्म, सदाचार आदि की शिक्षा देने में ही है, अन्यथा गड़े मुर्दे को बार बार खोदकर निकालने के समान बोती घटनाओं की भी आवृत्ति व्यर्थ ही होगी । इसी लिये राम के समान व्यवहार करना चाहिये, रावण के समान नहीं, यह रामायण का निष्कर्ष है और युधिष्ठिर आदि के तरह व्यवहार करना चाहिये, दुर्योधन आदि की तरह नहीं, यह महाभारत का निष्कर्ष है, ऐसा शिष्टजनों का कहना है । यह जो कहा गया है कि - यास्क अर्थ के अनुसार विभक्ति और स्वरों के परिणाम को उचित मानते हैं, ' नित्य अर्थ की परीक्षा करे ', ' अर्थ के अनुसार विभक्ति का परिणाम कर ले ', ' अनुदात्त प्रकृति वाला नाम कैसे होता है, इसकी परीक्षा करनी पड़ती है ' इत्यादि में यही बात कही गई है । यास्क पदपाठ को अर्थ के साथ नहीं बाँधते, जब कि वे ' अरुणो मासकृत् ' इत्यादि पद विभाग करते हैं | दयानन्द का भाष्य इस निरुक्त की पद्धति का ही अनुसरण करता है ' किन्तु यह भी बड़ी बेतुकी बात है, इन निरुक्त वचनों से दयानन्द से मत का समर्थन नहीं हो सकता, क्योंकि निरुक्त के उक्त वचनों का प्रसंग इस प्रकार है -- ' अब निर्वचन का विचार किया जाता है । जिन पदों के स्वर और संस्कार समर्थ हैं, प्रादेशिक गुणों से युक्त है, तो तदनुसार ही उनका निर्वचन होना चाहिये । इसके विपरीत अर्थ के अनन्वित होने पर विकार के अप्रादेशिक होने पर नित्य अर्थ की परीक्षा किसी सामान्य वृत्ति के सहारे करना चाहिये, सामान्य की afanta में अक्षर, वर्ण आदि की समानता से निर्वचन करना चाहिये । निर्वचन कभी छोड़ा न जाय और न केवल संस्कार
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८०६ aarfutures धारवादी एव शिष्येते ' ( नि ० २1१ ) इत्यादि । पूर्वं नामाख्यातोपसर्गलक्षणमुक्त्वा शास्त्रारम्भप्रयोजनानि वेदवेदाङ्ग-व्यूहं च सप्रयोजनं निघण्टुसमाम्नायविरचनां च प्रकरणत्रयविभागेनोक्त्वा दैवतमुत्कृष्य नेघण्टुकनैगमे प्रकरणे पुरस्कृते घण्टुकानि नैगमानीति । तत्र निर्वचन लक्षणमन्तरा निर्वचनेन तद्व्याख्यानमशक्यमिति निर्वचनलक्षणमुच्यते । तत्रापि हि तस्य परोक्षवृत्तावतिपरोक्षवृत्ती वा शब्दे निष्कृष्य विगृह्य वचनं निर्वचनम् । येषु पदेषु स्वरसंस्कारौ समर्थावे -परीत्येन गतार्थी प्रादेशिकेन गुणेन विकारेण च प्रादेशाभिधायिना धातुरूपेणान्वितो तेषु यथालक्षणमेव निब्रूयात्, न तत्रार्थप्राधान्येन लक्षणमनादृत्य निर्वचनं युक्तम् । दयानन्दस्तु स्वाभिमतसाधनाय समर्थस्वरसंस्कारेष्वपि शब्देषु यथेष्टं निर्वक्तुं प्रवर्तते यथेष्टं च विभक्तीः परिवर्तयितुम् । तदेतद् यजुर्वेदीयप्रथमकण्डिकायां स्पष्टम् । तद्वारणायैव दुर्गाचार्येण टीकाकृतापि - ' अर्थप्रधानत्वादनादृत्यैव लक्षणमेषु नैरुक्तो निर्ब्रूयात्, तम्मा भूदित्यत इत्युच्यते ' इत्युक्तम् । येष्वसमर्थ स्वरसंस्कारेषु प्रादेशिकधातुरूपैरनन्वितेषु यथालक्षणं निर्वचनमशक्यं स्यात्तत्रैवार्थप्रधानः सन्ननादृत्य स्वरसंस्कारौ केनचिदर्थवृत्तिसामान्येन निर्ब्रूयात् । इममेवार्थमधिकं स्पष्टतया दुर्गाचार्यो वक्ति- ' अथ पुनरनन्वितेऽये न्याय्यस्वरसंस्कारयुक्तेन शब्देन यत्र निपुणमप्यन्विष्यमाणः शब्दोऽर्थवान् कल्पयितुं न शक्येत, अन्यथैवार्थो व्यवतिष्ठतेऽन्यथैव शब्दः प्रादेशिकेन विकारेण विक्रियमाणोऽपि चासो शब्दो विपरिणम्यमानोऽप्यप्रादेशिक एव स्यादसमर्थ एव तां प्रदेशाख्यामभिधेयसत्त्वस्थां त्रियामभिधातुम्, तत्रैवार्थप्रधानः परीक्षेत । एतेन यत्रान्या गतिरेव न स्यात्तत्रैवार्थप्राधान्येन स्वरसंस्काराद्यनादरणं न सर्वत्र । अन्यथा शब्दार्थनिर्धारणेऽव्यवस्थैव स्यात् । यतो व प्रधानं तद्गुणभूत एवं शब्दः, ततोऽर्थसामान्यस्य शब्दसामान्यापेक्षया बलीयस्त्वात्तस्यैवादरो युक्तः । का ही सहारा लें, क्योंकि वृत्तियों संशय से युक्त होती हैं । अर्थ के अनुसार विभक्ति का विपरिणाम करें । प्रतम्, अवत्तम् इत्यादि स्थलों में धातु के आदि भाग ही बचे रहते हैं, इस प्रकार यहाँ पर पहले नाम, आख्यात और उपसर्ग का लक्षण बताकर शास्त्र के आरम्भक प्रयोजन, वेद और वेदांग का व्यूहन, उसका प्रयोजन- निघण्टु की रचना विधि को भी इन तीन भागों में विभक्त कर देवत प्रकरण से पहले नैघण्टुक और नैगम प्रकरण की व्याख्या की गई है । यहाँ पर निर्वचन का लक्षण किये बिना निर्वचन से इसकी व्याख्या संभव नहीं है, अतः पहले निर्वचन का लक्षण बताया गया है । परोक्षवृत्ति से शब्द को निकाल कर विग्रह बताना ही निर्वचन कहलाता । जिन पदों में स्वर और संस्कार समर्थ हैं, बिना किसी विपर्यय के गतार्थ होते है, प्रादेशिक गुण और विकार से धातुरूप आदि से युक्त होते हैं. ऐसे पदों का लक्षण के अनुसार निर्वचन करे । ऐसे स्थलों में भी अर्थ की प्रधानता को छोड़ कर निर्वचन करना उचित नहीं । see fauta aura न्द अपने अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए समर्थ स्वर और संस्कार की विद्यमानता में भी शब्दों का यथेच्छ निर्वचन करने लगते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार विभक्ति का परिणाम करने लगते हैं । यह बात यजुर्वेद की प्रथम कण्डिका में स्पष्ट है । इस दोष के faar रण के लिए ही टीकाकार दुर्गाचार्य ने कहा है कि अर्थ की प्रधानता के कारण लक्षण का अनादर कर नैरुक्त निर्वाचन न करने लग जायं, इसीलिये यह बात कही गई है । जहाँ पर पदों के स्वर और संस्कार असमर्थ हैं, जो प्रादेशिक धातु रूपों से अनन्वित हैं, जहाँ पर लक्षण के अनुसार निर्वचन न किया जा सकता हो, तो वहाँ पर अर्थ की प्रधानता का आश्रय लेकर स्वर और संस्कार की उपेक्षा कर किसी सामान्य अर्थवृत्ति के सहारे निर्वचन करना चाहिये । इसी बात को दुर्गाचार्य अधिक स्पष्ट रूप से इस प्रकार कहते हैं -- अर्थ के अन्वित न होने पर, अर्थात् जहाँ उचित स्वर संस्कार से युक्त शब्द से सावधानी से खोजने पर भी उचित अर्थ की प्रतीति न हो सकती हो, जहाँ पर अर्थ दूसरे प्रकार का और शब्द दूसरे प्रकार का प्रतीत होता हो, प्रादेशिक विकार से युक्त होने पर भी, उस रूप में विपरिणत होने पर भी जो उस अर्थ को स्पष्ट करने में असमर्थ हो, उस प्रदेशारूप अभिधेय सत्त्व स्थित अवस्था का, क्रिया न बता सकती हो, वहीं पर अर्थ-की प्रधानता स्वीकार करे निर्वचन करे । इससे यही प्रतीत होता है कि जहाँ दूसरी कोई गति न हो, वहीं पर अर्थ की प्रधानता के आधार पर स्वर और संस्कार का अनादर होना चाहिये, सर्वत्र नहीं । अन्यथा शब्द और अर्थ के निर्धारण में अव्यवस्था हो जायगी । अर्थ हो प्रधानभूत है, शब्द उसका गुणभूत है, अर्थसामान्य शब्दसामान्य की अपेक्षा से बलवान् है, अतः अर्थ का ही आदर होना चाहिये ।
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वेदार्थपारिजातः यत्रार्थसामान्यमपि न स्यात्तत्राप्यक्षर ( वर्ण ) सामान्यान्निब्रूयादेवं न संस्कारमाद्रियेत । वृत्तयश्चा-निश्चिता भवन्ति । तत्रार्थ प्राधान्येनैव विभक्तयोऽपि परिवर्तयितुं शक्यन्ते । स्वरवर्ण सामान्येनापि निब्रूयादेव अमुष्मिन् घातावयं स्वरो वर्णो वा मया दृष्टः स एवायमस्मिन्नभिधाने लक्ष्यत इत्येवमुत्प्रेक्ष्य स धात्वर्थः सूत्रबद्ध इव तस्मिन्नाहृत्य विस्फार्य्यं च कृत्स्नः प्रकाशनीयः, इतरथाऽनर्थकमेव निरुक्तं स्यात् । तदर्थं लक्षणपराङ्मुखेषु शब्देषु संस्कारं नाद्रियेत । तदुदाहरणान्यपि तत्रैव निर्दिष्टानि दुर्गाचार्येण - प्रवीणोदार निस्त्रिशशब्दा इति । तद्यथा प्रकृष्टो वीणाय प्रवीण गान्धर्वे वीणावादने प्रकृष्टो मनुष्यः प्रवीण उच्यते । अत्रास्य शब्दस्य मुख्या वृत्तिः । स स्वार्थ--मुत्सृज्यैव गान्धर्वमभ्यासपादवमात्रं सामान्यमाश्रित्यान्यत्रापि प्रवर्तते । यो यस्मिन् विषये वत्नातिशयेनोत्पादित कौशलः स तत्र प्रवीण उच्यते । तद्यथा प्रवीणो व्याकरणे प्रवीणो निरुक्ते । एवमेवोदारशब्दोऽपि प्रागारसंनिपाताद् व्याहृत मात्रेणैवाभिप्रायमात्रेण वा सारथेर्योअवोऽनड्वान् वा वहति रथं स उदार:, उद्गतारत्वात् । तत्रैवास्य शब्दस्य मुख्या वृत्तिः । अयमपि शब्दः स्वार्थमृत्सृज्याभिप्रायमात्रानुसारित्वं सामान्यमाश्रित्य यो हि कस्मिंश्चिदभिप्रायानुसारेणैव प्रागेव प्रार्थनाद्ददाति तस्मिन् प्रवर्तते स उदार इत्युच्यते । तथैव निस्त्रिशशब्दोऽपि । यो हि त्रिभिः प्रदेशैर्द्वाभ्यां धाराम्यामग्रेण च निशितः श्यति स निस्त्रिशः कृपाणः । तत्रैवास्य शब्दस्य मुख्या वृत्तिः, तथापि छेदनरूपं क्रौर्य सामान्य-माश्रित्यास्य क्रूरेऽपि प्रवृत्तिः " क्रूरो निस्त्रिश उच्यते । ईदृशा एवान्येऽपि शब्दा अभ्यूहनीयाः कारकहारका दिशब्दास्तु व्याकरणादिभिः प्रसिद्धार्था एव, किन्तु दुर्बोधाः परीक्षातिपरोक्षवृत्तय एव शब्दा freed freered | यस्मात्तादृशशब्दानामर्थेषु वृत्तयो बहुसंशयवत्यो भवन्ति । | केचिदर्थं सामान्येन क्वचि जहाँ पर अर्थसामान्य को न हो, ऐसे स्थलों में अक्षर ( वर्ण ) की समानता के आधार पर निर्वचन करें, संस्कार का समादर न करे, क्योंकि वृत्तियों अनिश्चित होती हैं । ऐसे स्थलों में अर्थ की प्रधानता के आधार पर ही विभक्तियों का विपरिणाम भो किया जा सकता है । स्वर और वर्ण की सामान्यता के आधार पर भी निर्वचन किया जाय, इस धातु में यह स्वर अथवा वर्ण मैंने देखा है, वही इस अभिधान में भी दिखाई पड़ता है, इस प्रकार कल्पना करके उस धातु के अर्थ को मानो वह उसमें बंधा हुआ हो, इस प्रकार उसको पकड़ कर तथा उसका विस्तार कर अच्छी तरह से प्रकाशित करना चाहिये । अन्यथा निरुक्त की व्यर्थता सिद्ध हो जायगी । इसलिये लक्षण से रहित शब्दों में संस्कार की अपेक्षा न करें । इसके उदाहरण के रूप में दुर्गाचार्य ने वहीं पर प्रवीण, उदार और नित्रिश शब्दों को निर्दिष्ट किया है । संगीतशास्त्र में वीणा बजाने में उत्कृष्ट मनुष्य को प्रवीण कहा जाता है । इस अर्थ में इस शब्द की मुख्य वृत्ति है । वह अपने स्वार्थ गान्धर्वशास्त्र को छोड़कर केवल अभ्यास की पटुतामात्र सामान्य वृत्ति का आश्रमण कर दूसरे स्थलों में भी प्रवृत्त हो जाता है । जो व्यक्ति जिस विषय में पूरा प्रयत्न कर कुशल हो जाता है, वही उस विषय में प्रवीण माना जाता है । जैसे व्याकरण में प्रवीण, निरुक्त में प्रवीण | इसी तरह उदार शब्द भी चाबुक पड़ने से पहले ही केवल कहने मात्र से अथवा सारथि के इशारे से ही जो घोड़ा अथवा बैल रथ को चलाने लगता है, वह उदार कहलाता है । इसी अर्थ में इस शब्द की मुख्य वृत्ति है । यह शब्द भी अपने स्वार्थ को छोड़कर • अभिप्राय मात्र से समझने की सामर्थ्यरूप सामान्य धर्म को स्वीकार कर जो कोई भी प्रार्थना से पहले ही केवल अभिप्राय का अनुसरण कर अभीष्ट वस्तु को दे देता है, उसको उदार कहते हैं । इसी तरह का शब्द निस्त्रिश भी है । जो तीन प्रदेशों से, दो धाराओं से और आगे से भी तीखी धार बाला रहकर मार डालता है, उस कृपाण को निस्त्रिश कहते हैं । इसी अर्थ में इसकी मुख्य वृत्ति है । तो भी छेदन रूप सामान्य क्रौर्य धर्म को लेकर इस शब्द की क्रूर व्यक्ति में भी प्रवृत्ति होती है । इसी तरह के अन्य शब्दों को स्वयं समझ लेना चाहिये । कारक, हारक आदि शब्दों के - शब्दों का निर्वाचन निरुक्त में किया जाता है, अर्थ तो व्याकरण आदि से प्रसिद्ध ही है, किन्तु दुर्बोध, परोक्ष एवं अतिपरोक्ष वृत्ति वाले क्योंकि ऐसे शब्दों को अर्थों में वृत्तियों अनेक संशयों से युक्त होती है । कुछ शब्दों की
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८०८ द्वर्तन्ते शब्दाः । केचिच्च स्वरसामान्येन केचिच्च वर्णसामान्येन वर्तन्ते । अतो विभक्तीरपि यथार्थमेव विपरिणमयेत् पूर्वोत्तरपदप्रकरणाविरोधेन । सर्वेऽपि प्राचीना भाष्यकारा निपुणमन्वीक्ष्यैव विभक्तिविपरिणामादिकम म्युपगच्छन्ति न स्वैरम् । सुपो स्थाने सुपो भवन्तीति- ' हृत्सु शोकैः ' अत्र हृदयानि शोकैः । प्रपूर्वस्य ' डुदाञ् दाने ' इत्यस्य निष्ठायां प्रत्तमिति । अवपूर्वस्य ' दोऽवखण्डने ' इत्यस्य निष्ठायां अवत्तमिति-रूपम् । एवमस्ते निवृत्तिस्थानेषु गुणवृद्धिनिवृत्तिस्थानेषु ' पनसोरल्लोपः ' ( पा ० सू ० ६ | ४ | १११ ) इत्यादिलोपे स्तः सन्तीति रूपं भवति । एवं दृष्ट्वान्यत्रापि यथासंभवमनुविधेयम् । एवं जग्मतुः जग्मुरित्यादो गमेरुपधारूपस्यास्य लोपः । तथैवान्यत्राप्यनुविधेयम् । राजा दण्डीत्यादावुपधाविकारो दैर्घ्यम् । तत्वायामी ' ( ऋ ० सं ० १/२४ | ११ ) इत्यत्र वर्णलोप:, याचामीत्यत्र छान्दसश्चकारलोपो द्रष्टव्यः । याञ्चाकर्मा याचतिः । ' तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभिः । अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशं समान आयुः प्रमोषीः ॥ ' ( ऋ ० १ २४ | ११ ) शुनःशेपोऽनया त्रिष्टु-भावरुणं तुष्टाव । हे वरुण, तदहं त्वां वरुणं यामि याचामि ममाभिप्रेतम् । कथम्? ब्रह्मणा ऋकु - साम - यजुराख्येन वन्दमानः स्तुवन्, तदेवायं यजमानोऽपि हविभिः संस्कृतेः सान्नाय्यादिभिराशास्ते । एवं स्तुतिभिः विभिश्च भवन्त-मावामेकमेवार्थं याचा हे । याच्यमानः सर्वो हि क्रुध्यति । त्वं त्वहेडमानो अनुध्यन् हे वरुण! बोधि बुद्धयस्व । बुद्धवाचावयोरभिप्रेतार्थं कुरु । हे ऊरुशंस बहुभिः संस्तुत! नोऽस्माकं याचमानानामायुः मा प्रमोषीः । अत्र च वर्ण-लोपेनार्थसंगतिः । क्वचिद् द्विवर्णलोपोऽपि भवति यथा तृच इति । अत्र ऋवर्णेन सह रेफोऽपि लुप्यते, रेफ ऋवर्णोदरं कृमिवदनुप्रविष्टो द्रष्टव्यः । क्वचिच्चाद्यन्तयोर्विपर्य्ययो भवति । यथा ' इच्युतिर् क्षरणे ' इति धातोराद्यन्त विपर्ययेण स्तोका इति निष्पत्ति: । ' सुज विसर्गे ' इत्यस्य रज्जुः, ' कृती छेदने ' इत्यस्य तकु ', ' कस विकसने ' इत्यस्य सिकता । ' तत्कथमनुदात्त--वृत्ति अर्थ सामान्य से कहीं होती है, कुछ की स्वर सामान्य से और अन्यों की वर्णं सामान्य से होती है । अतः विभक्तियों का विपरिणाम भी अर्ध के अनुसार पूर्वोत्तर पद और प्रकरण के अनुसार करे । सभी प्राचीन भाष्यकार सावधानी से परीक्षण करने के उपरान्त ही विभक्ति के परिणाम को स्वीकार करते हैं, अपनी इच्छा में नहीं । सुपों के स्थान में सुप् ही होते हैं, जैसे ' हृत्सु शोकैः ' इसके स्थाने ' हृदयात शोकै: ' इस तरह का विभक्ति का विपरिणाम होता है । प्रपूर्वक ' डुदाञ् दाने ' इस धातु से निष्ठा में ' प्रतम् ' यह रूप बनता है । अव उपसर्ग पूर्वक ' दो अवखण्डने ' इस कातु से निष्ठा में ' अवत्तम् ' यह रूप होता है । इसी तरह मस्ति के निवृत्तिस्थान में गुण, वृद्धि अलोप आदि होने पर ' स्तः सन्ति ' आदि रूप होते । ऐसे ही प्रयोगों को देखकर दूसरी जगह भी यथासंभव विधान करना चाहिये | इसी तरह जग्मतुः जग्मुः ---- आदि स्थलों में गम् धातु के उपधा रूप का लोप हो जाता है । इसी तरह दूसरी जगह भी किया जाता है । राजा, दण्डी इत्यादि स्थलों में उपधा के विकार के रूप में दीर्घ का विधान है । ' तत्वायामि ' यहाँ पर वर्ण का लोप और ' याचामि यहाँ पर चकार का लोप देखा जाता है । यति धातु का कर्म याञ्चा है । ' तस्वायामि ' इस त्रिष्टुप् मन्त्र से शुनःशेप वरुण की स्तुति करते हैं । हैं वरुण, मैं आप से अपनी अभीष्ट वस्तु की याचना करता हूँ | कैसे? ब्रह्म अर्थात् ऋक्, यजुः साम से आप की स्तुति करना हुआ । इसी तर यह यजमान भी संस्कृत सान्नाय्य आदि की हवि से आपकी पूजा करता है । इस तरह से स्तुति और हविः से आपको प्रसन्न कर हम दोनों एक ही वस्तु चाहते हैं | मांगने पर सभी क्रुद्ध हो जाया करते हैं । आप बिना क्रुद्ध हुए हमारे अभिप्राय का समझिये और ठीक से समझ कर हमारी मंशा पूरी कीजिये | हे अनेकों मनुष्यों के स्तवनीय वरुण, आप हमारी, माँगने वालों की आयु को क्षीण मत कीजिये । यहाँ पर वर्ण के लोप के द्वारा अर्थ की संगति बैठती है । कहीं पर दो वर्णों का भी लोप देखा गया है, जैसे कि ' तुच ' यहाँ पर ॠवर्ण के साथ रेफ का भी लोप हो जाता है । रेफ ॠवर्ण के उदर में कृमि के समान बैठा रहता है । कहीं पर आदि और अन्त के वर्ण का विपर्यय हो जाता है, जैसे कि ' दच्युतिर् क्षरणे ' इस धातु के आदि और अन्त के विपर्यय से ' स्तोक ' शब्द की निष्पत्ति होती है । ' सृज विसर्गे ' इस धातु से रज्जु शब्द की, ' कृती छेदने ' से तर्कु शब्द की, ' कस विकसने से सिकता शब्द की निष्पत्ति देखी गई है । ' तो मनुदान:
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danifestat ८०६ प्रकृति नाम स्यावु दृष्टव्ययं तु भवत्युत त्वं सख्ये स्थिरपीतमाहुरिति ' ( नि ० ११८ ) । एतेनापि शब्देषु स्वैरचारिता न सिद्धयति, तदभिप्रायस्तु टीकायां तत्रैव स्पष्टमुक्तः । ' ऋवां त्यः पोषमास्ते ' ( ऋ ० सं ० १०1७१/११ ) इत्यत्र त्व इति निपातो वा नाम वेति संशये निपात इत्येका पक्षः । कुत इति चेदनुदात्तत्वात् । तदेवाह - सदेत च्छन्दरूपमनुदात्तस्वभावं सत्कथं नाम स्यात्? उत्सर्गेणैवान्तोदात्तानि प्रातिपदिकानीति स्वयं निरुक्तवृत्ती ( १७ ) इत्युक्तेरित्येकीयपक्षमुक्त्वा सिद्धान्तमाह-- अन्यत्र चापवादादिति । स्वत्वमसमसिमेत्यनुदात्तानीति । उत्सर्गादपवादो बलीयानिति न्यायात् । तस्माद्विप्रतिपन्नस्वरमपि यन्न व्येति विकार -माप्नोति तदव्ययम् । त्वशब्दस्य तु तत्तद्विभक्तिषु विकारदर्शनान्नाव्ययत्वं निपातत्त्वं वा । तदेतन्नामैव दृष्टव्ययं तु भवति । तुशब्द हेत्वर्थी हेतुसमुच्ययार्थो वा । अनुदात्तप्रकृतित्वेऽपि सति दृष्टानुविधिश्छन्दसि भवति । तस्मात्तत्र अनुदात्तस्य दृष्टत्वात्तथैव विधिर्मन्तव्य इति दृष्टव्ययत्वान्नामेति तद्भवति । अपवादश्रवणाद् व्ययदर्शनाच्चानुदात्तमपि नामैव भवति । निपातत्वेऽपि कल्प्यमानेऽस्य स्वरसामञ्जस्यं न भवत्येव । निपाता अध्याद्युदात्ता भवन्ति ( फिट्सू ० ४ | १२ ) । तस्मात्कृतापवादत्वाद् दृष्टव्ययत्वाच्च नामेवैतदिति । क्व पुनरस्य व्ययो दृष्ट इति चोद्यमुद्भाव्य उच्यते-' उत त्वस्मै तन्वं विसस्रे ' ( ऋ ० १०/७११४ ) इति चतुर्थ्यामेकवचने व्ययो दृष्टः । ' उत त्वं सख्ये स्थिरपीतमाहु ' ( ऋ ० १०/७१ १५ ) इत्यत्र द्वितीयायामेकवचन एव । न मनागप्यत्र स्वातन्त्रम् | उत्सर्गादपवादस्य प्राबल्यादेवानुदात्तं तिपदम् । ' मासकृत् मासानां चार्घमासानां च कर्ता भवति चन्द्रमा ' ( नि ० ५१२१ ) इत्यत्रापि नोच्छुङ्खलतायाः समर्थनम् । यदप्युक्तम्- ' अर्थप्राधान्यादेव आशुशुक्षणिरिति प्रथमान्तस्य पञ्चम्यर्थे प्रथमेत्याह ' ( नि ० ६।१ ) ( पृ ० ५७ ) प्रकृति का नाम कैसे होगा, यह परीक्षणीय है, ' उत स्यं सख्ये ' इत्यादि में यह देखा गया है ' इस निरुक्तवचन से भी शब्दों में मनमानी नहीं चलती । इसका अभिप्राय वहीं टीका में स्पष्ट किया गया है । ' वः पोषमास्ते ' यहाँ पर ' स्व ' यह निपात है या नाम? इस संशय की अवस्था में एक पक्ष का कहना है कि यह निपात है, कैसे? क्योंकि यह अनुदात्त है । यहीं बात यहाँ कही गई है कि --- यह शब्द रूप अनुदात्त स्वभाव का होकर नाम कैसे हो सकता है? उत्सर्ग से ही प्रातिपदिक अन्तोदात्त होते हैं, यह बात स्वयं निरुक्त की वृत्ति में कही गई है । इस प्रकार एक पक्ष का प्रतिपादन कर बाद में सिद्धान्त पक्ष बताया गया है कि यह बात अपवाद से भिन्न स्थान में लागू होती हैं । स्व, त्त्व, तम, सम, ये अनुदात्त हैं, क्योंकि उत्सर्ग से अपवाद बलवान् होता है । इसलिये इसके स्वर में विप्रतिपत्ति तो है ही । जिसमें कोई विकार नहीं होता, वह अव्यय कहलाता है । त्व शब्द का तो तत्तद् विभक्तियों में विकार दिखाई देता है, अतः यह न तो अव्यय है और न निपात ही है, किन्तु यह नाम है । क्योंकि इसमें विकार देखा जाता है । तु शब्द यहाँ पर हेतु के समुच्चय के अर्थ में प्रयुक्त है । अनुदारा प्रकृति के रहने पर भी वेद में यथादृष्ट विधि मानी जाती है । इसलिये यहाँ पर अनुदात्त स्वर के दिखाई देने से वदनुसार ही विधि माननी चाहिये । विकार के दिखाई देने से बहु नाम ही होता है । अपवाद के सुनाई देने से और व्यय के दर्शन से अनुदात्त होते हुए भी वह नाम ही रहता है । निपात की कल्पना में भी स्वर का सामंजस्य नहीं बैठता । निपात भी मधुदात्त होते हैं । इसलिये अपवाद के होने से और विकार के दिखाई पड़ने से यह नाम ही माना जायगा । इसका विकार कहाँ देखा गया है? इस शंका को उठा कर बताया गया है कि ' उत त्वस्मै तन्वं विससे ' यहाँ पर चतुर्थी के एकवचन में उसका विकार देखा गया है, और ' उत त्वं सख्ये ' यहाँ पर द्वितीया के एक वचन में । इसमें थोड़ी भी स्वतन्त्रता नहीं है । उत्सर्ग की अपेक्षा अपवाद के प्रबल होने से हो त्य पद अनुदात्त है । ' मासकृत् अर्थात् मासों एवं अर्धमासों ( पक्षों का करने वाला चन्द्रमा है ' यहाँ पर किसी भी तरह से उच्छृंखलता का समर्थन नहीं किया गया है । यह कहना भी कि अर्थ की प्रधानता के कारण ही ' आशुशुक्षणि: ' इस प्रथमान्त पद में पञ्चमी के १०२
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८१० वेदार्थपारिजातः इति, तदपि न किञ्चित्, तत्रापि हेतोः सस्वात् । तथाहि स्वयमेव टीकाकार आह - ' किं पुनः कारणं प्रथमेषा सती पञ्चमी विपरिणम्यत इति । उच्यते- ' तथाहि वाक्यसंयोगः ' ( नि ० ६ १ ) । तेन प्रकारेण पञ्चमीत्वेन परिणतस्य शब्दस्यानेन वाक्येन संयोगोऽर्थसंगतिर्भवति न यथावस्थितस्य । ' त्वमद्भस्त्वमश्मनस्परि त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यः ' ( ऋ ० सं ० २1१1१ ) इत्येतान्युत्तराणि बहूनि पदानि पञ्चम्यन्तानि सन्ति । तस्मादनेनापि तथैव भाव्यम् ' इति । एवं प्रामाणिको विपरिणामस्तु भाष्यकारैरभ्युपेयत एव । न तावताऽपि प्रकरणाविरुद्धमर्थमपहाय स्वाभिमतार्थयोजनाय बहुल छन्दसीत्याद्याश्रयेण यथेष्टं योगविभक्तिविपरिणामादिकमाश्रयणीयम् । यत्तु ब्रह्मदत्तेनोक्तम् — गुरुपरम्परामन्तराऽऽज्ञानमन्तरा च वेदार्थो नाधिगन्तुं शक्य ( पृ ० ५७ ) इति, तत् सिद्धान्तरूपेण संगतमपि तन्मुखादुपहासास्पदम् । यत आर्यब्रुवाणां सम्प्रदायेऽद्य यावद् गुरुपरम्पराया अभावादेवार्थज्ञानं तु दूरे तिष्ठतु मूलमन्त्रोच्चारणमपि कर्त्तु कश्चिदपि न प्रभवति । अवश्यमार्षज्ञानं गुरुगम्यं परं कि दयानन्दोप कश्चिद् ऋषिः? तथात्वे कञ्चनाप्यनर्थं ब्रुवाण ऋषित्वात् सर्वनियमनिर्मुक्तः स्यात् । स च दूषणमपि भूषणं ब्रूयात् । ' वनस्पते बीड्वङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः । गोभिः सन्नद्ध: ' ( ऋ ० सं ० ६१४७/२६ ) ( नि ० | १२ ) इत्यत्र वनस्पतिशब्दस्य वनस्पतिविकारो रथोऽथं इति तु सम्यगेव यथाश्रुतार्थग्रहणे विशेषणान्तराणाम-सङ्गतेः । तदर्थस्तु हे वानस्पत्य रथ! त्वं दृढाङ्गो भव, ततश्चास्मत्सखा सन् प्रतरणं संग्रामाणां पारं नेता सुवीरः अवस्थाता भव । गोभिः सन्नद्धः गव्येन चर्मणा श्लेष्मणा च नद्वः आत्मानं कीलयस्व स्वात्मानमवस्तम्भय | संस्तब्धे त्वयि अधिष्ठाता तव योद्धा यानि तेन जेतव्यानि सर्वाणि जयतु । सनातनिदृष्ट्या तु रथान्तर्यामी भवत्यत्र मन्त्रे देवता । तव सामाजिकस्य मते कथं जडो रथः संबोध्यः स्यात्? अर्थ में प्रथमा विभक्ति का विधान है, एकदम गलत है, यहाँ पर भी हेतु fearn है । क्योंकि टीकाकार में स्वयं ही कहा है कि For कारण है कि प्रथमा के स्थान पर यहाँ पञ्चमी में विपरिणाम किया जाता है? इसलिये यह किया जाता है कि ऐसा करने पर वाक्य से संयोग होता है, अर्थात् इस प्रकार पंचमी में विपरिणत कर देने पर शब्द के साथ वाक्य की अर्थसंगति ठीक से बैठ जाती है । यथास्थित रहने पर यह सम्भव नहीं हो पाता । ' त्वमयः ' इत्यादि अनेक उत्तर पद पञ्चम्यन्त हैं । इसलिये इस पद का भी feat free में fauf रणाम उचित है । इस प्रकार का प्रामाणिक विभक्ति - विपरिणाम भाष्यकार को भी अभिमत है । ऐसा होने पर भी प्रकरण से अविरुद्ध अर्थ को छोड़कर स्वाभिमत अर्थ को जोड़ने के लिये ' बहुलं वसि ' इत्यादि का सहारा लेकर अपनी इच्छा के अनुसार योग, विभक्ति विपरिणाम आदि को अंगीकार नहीं किया जा सकता । ब्रह्म जिज्ञासु ने यह जो कहा है कि बिना गुरुपरम्परा के और आर्ष ज्ञान के बिना वेदार्थ नहीं जाना जा सकता, यह बात सिद्धान्त रूप से सही होते हुए भी उनके मुँह से हँसी की बात लगती है, क्योंकि आर्यसमाजियों के सम्प्रदाय में गुरुपरम्परा के अभाव में हो अर्थ के ज्ञान की बात को दूर रही, कोई भी मूल मन्त्र का उच्चारण भी ठीक से नहीं कर सकता । यह बात अवश्य ठीक है कि आष ज्ञान गुरुगम्य है, किन्तु क्या दयानन्द भी कोई ऋषि है? यदि उनको ऋषि माना जाय तो ऋषि होने के कारण जो उनके मन में आवेगा, बिना नियम के उसका प्रतिपादन करने लगेंगे और यह दूषण भी उनमें भूषण हो जायगा । ' वनस्पते ० ' इत्यादि मन्त्र में वनस्पति शब्द से वृक्ष के विकार, लकड़ी से बने रथ का ग्रहण किया जाता है, क्योंकि वनस्पति का ग्रहण करने पर वहाँ पर अन्य विशेषण व्यर्थ हो जायेंगे । इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - है वनस्पति से बने रथ, तुम दृढ अंग वाले हो जाओ, तब हमारे सहायक होकर हमको सुखपूर्वक युद्ध के पार पहुँचा दो, अर्थात् हमें वीरतापूर्वक विजय दिला दो | गाय के चमड़े से मढे जाकर तुम अपने को पूरी तरह मजबूत बना लो, तुम्हारे मजबूत हो जाने पर तुम पर बैठा योद्धा सभी शत्रुओं को जीत लेगा ' । यहाँ पर सनातनियों की दृष्टि से रथ में निवास करने वाला देवता संबोध्य होता है, समाजियों के मत से यहाँ पर जड़ रथ कैसे संबोध्य होगा?