वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 911–920
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 911–920
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८८१ व्याम: ' ( पृ ० ११६ ) इति पाठो लभ्यते । तथा चानेन वचनेन स्पष्टमेव ब्राह्मणानां प्रजापतेरार्षमुच्यते । यत्तु ' य एवाप्ता वेदार्थानां द्रष्टारः ' ( गोतमसूत्र २१११६:) इत्यत्र वात्स्यायनोक्त्या बंदार्थ ( बेदव्याख्यान ) भूतानां ब्राह्मणानां द्रष्टार एव ऋषयः । तादृशव्याख्यानेन साधीमतिहासपुराणादिकमपि प्रोक्तमुपिभिः । तथा च निरुक्तम्-' ऋषेद्दृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवत्याख्यानसंयुक्ता १०३१०, २०१४६, इत्याख्यानम् | ११ / १ ९, ११/२५, ११३४ इत्यादि ( पृ ० ११५ ), तदतितुच्छम्, तथा सति मन्त्रद्रष्टृणामित्यस्य मन्त्रार्थद्रष्टृणामित्येवार्थः स्यात् । तथा च मन्त्रद्रष्टार ऋषय इति स्वत्सिद्धान्तो व्याकुप्येत । किञ्च, मन्त्रब्राह्मणद्रष्टारो वेदार्थद्रष्टारोऽपि भवन्तु न तावता तेषां मन्त्रब्राह्मणद्रष्टृत्यमनुपपद्यते, मन्त्र-ब्राह्मणद्रष्टृणां वेदार्थद्रष्टृत्वसम्भवात् । यत्तूदाहृतनिरुक्तवचनस्य व्याख्यानं यत् — ' वेदार्थ इतिहासादिभिर्युक्तो यदोच्यते तदा स प्रियो भवति । मन्त्राणां वेदले तदर्थो ब्राह्मणेषूक्तः । ब्राह्मणानामपि वेदत्वे तदर्थः केषु ग्रन्थेषु? न केषुचित्त-दर्थो वतः ' ( पृ ० १ ( ५ ) इति, तदोष बालभाषितम् त्वदुद्धृतनिरुक्तवचनानां स्वदभिप्रायविरुद्धार्थबोधकत्वात् । तथाहि --- ' यो जायमान एव प्रथमो मनस्वी देवो देवानऋतुना कर्मणा पर्यभवत् ' ( मै ० सं ० १०/१२/१२ ) इत्यादि-मन्त्राणामेवानैतिहासिकोऽर्थं उक्तः, तस्मादेतिहासिकोऽपि मन्त्रार्थो भवतीत्युक्तम् | fre क्तकारादयः सर्वे सत्त-च्छाखागतानां मन्त्राणामेवमर्थं वर्णयन्ति । गृत्समदस्याम् । इन्द्राय मनस्वते पुरोडाशस्य याज्या ( मै ० सं ० १०/२/१२ ) गृत्समदमिन्द्रवरप्रदानादेन्द्रं रूपं विभ्रतमिन्द्रोऽयमिति मन्यमाना जिघांसवोऽसुराः किल मरुद्गणैविनाकृतोऽयमिदानी-मेकः शक्यो हन्तुमिति परिवनिरे । स किल भीतोऽनेन सूक्त नेन्द्र तुष्टाव | आत्मानं च ब्राह्मणं परेभ्य: प्रतिवेदयाञ्च-मन्त्राध्याय ' यह नाम ही प्रकट करता है कि मन्त्रों के ही ऋषि हैं, आह्मणों के नहीं ( पृ ० ११४ ), यह भी बड़ी मोटी अकल की बात है, क्योंकि वहीं पर १८ व स्थानक के बाद कहा गया है कि ' सामान्य रूप से ब्राह्मणों के प्रजापति ऋषि है । अब ब्राह्मण पठित मन्त्रों का उदाहरण देंगे ' इस वचन से स्पष्ट प्रतीत होता है कि ब्राह्मणों का ऋषि प्रजापति हैं । ' य एवाप्ता वेदार्थाना द्रष्टारः ' वात्स्यायन की इस उक्ति का तात्पर्य यह है कि वेद व्याख्यानभूत ब्राह्मणों के ऋषिगण केवल द्रष्टा है । उस व्याख्यान के साथ साथ ऋषियों में इतिहास, पुराण आदि का भी प्रवचन कर दिया है । निरुक्त में भी कहा है - ' ऋषेर्दष्टार्थस्य ', ' इत्याख्यानम् ' । इसका भी यही अभिप्राय होता है कि जब वेदार्थ इतिहास आदि से संयुक्त कहा जाता है तो वह प्रिय और रुचिकर लगता है ' ( पृ ० ११५ ) यह कथन भी कुछ नहीं है, ऐसा मानने पर भी ' मन्त्रद्रष्टृणाम् ' इस पद का ' मन्त्रार्थद्रष्टृणाम् ' यह अर्थ करना पड़ेगा और इस तरह से आपका यह सिद्धान्त दुष्ट हो जायगा कि ऋषिगण मन्त्रद्रष्टा है । अपि च, मन और ब्राह्मण के अष्टा ऋषिगण वेदार्थ के भी द्रष्टा माने जांय तो इसमें आपत्ति क्या है? वेदार्थ के द्रष्टा होने से वे मन्त्र और ब्राह्मण के द्रष्टा नहीं रह जायेंगे, ऐसी बात तो होगी नहीं, क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मण के व्रदावेदार्थ के भी हो हो सकते हैं । भगवदत्त ने ऊपर उस निरुक वचन की व्याख्या इस तरह से की है - ' वेदार्थ इतिहास आदि से संयुक्त कहा जाता है, तो वह प्रिय और रुचिकर लगता है । मन्त्रों को वेद मानने से उनका अर्थ ब्राह्मणों में किया गया है । यदि ब्राह्मणों को भी वेद मानोगे तो उनका अर्थ किन ग्रन्थों में बताओगे? उनका अर्थ तो कहीं वर्णित नहीं है ' ( पृ ० ११५ ), किन्तु यह सब बच्चों की सी बातें हैं, क्योंकि आपके द्वारा उद्धृत निरुक्त का वचन आपके अभिप्राय के विरुद्ध हो अर्थ का प्रतिपादक है । क्योंकि ' यो जायमान ' इत्यादि मन्त्रों का ही ऐतिहासिक अर्थ यहाँ बताया गया है । इसी लिये ऐतिहासिक पद्धति से भी मन्त्र का अर्थ किया जा सकता है, यह बात यहाँ कही गई है | free कार प्रभृति सभी आचार्यगण उन उन शाखाओं में विद्यमान मन्त्रों का इसी तरह से अर्थ करते हैं । ' यो जायमान ' इस मन्त्र के ऋषि गृत्समद है । गृत्समद ऋषि इन्द्र के वरदान के प्रभाव से स्वयं इन्द्रस्वरूप हो गये । इनको इन्द्र मानकर मार डालने के अभिप्राय से असुरों ने देखा कि अभी यह इन्द्र मरुद्गणों के बिना अकेला ही दिखाई पड़ रहा है । इस अकेले इन्द्र को हम आसानी से मार सकते हैं, ऐसा सोचकर इन्द्र बने गृत्समद ऋषि को उन्होंने घेर लिया । इस अवस्था में भयग्रस्त गृत्समद ऋषि इस सूक्त से इन्द्र की स्तुति करने लगे और उन इन्द्र - शत्रु असुरों से कहा कि मैं तो गृत्समद नाम का ब्राह्मण हूँ । मन्त्र का अर्थ इस **
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८८२ वार्थपारिजातः कार | मन्त्रार्थस्तु जात एव जातमात्र एव प्रथमो मुख्यः सर्वभूतानां प्रतिमुख्यतां सम्पेदे | मनस्वी मेधावी । अन्ये तु यथाकालं मुख्या भवन्तीन्द्रस्तु जातमात्र एवेत्यर्थः । देवो देवान् क्रतुना पर्यभूषत पर्यगृह्णात् परिगृहीतवान् स्वामित्वेन पर्यरक्षा | मुख्यत्वादत्यकामद्वा । यस्य शुष्माद् वलाद् रोदसी अभ्यसेताम् अविभीताम् । तृम्णस्य महाबलस्य सेना-लक्षणस्य महत्त्वेनास्यासह्यवलमित्यवश्यमावां सादयिष्यतीत्येवं यस्य बलादतिमहत्यावेते द्यावापृथिव्यावविभीताम्, हे असुरजनाः! स इन्द्रो नाहमिन्द्रो ब्राह्मणोऽहं तत्प्रमादादेवावाप्ततद्रूप इति । निरुक्तवचनार्थस्तु - ऋषे दृष्टार्थस्यानुभूतेन्द्र मंत्रस्येन्द्रवयस्यस्य गृत्समदस्येन्द्रं प्रति प्रीतिस्तुष्टिर्भवत्याख्यानसम्बद्धा, अथवा दृष्टार्थस्य देवतार्थतत्त्वतो दृष्टवतो भावितान्तःकरणस्य तत्रोपजाः प्रीतेरतिहर्षाद् आख्यानयुक्ता अन्येभ्यः कथनसंयुक्ता इत्यर्थः । १०/४६ इत्यत्रापि-' एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे । तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितस्तं मातारेल्हि स उ रेल्हि मातरम् ॥ ' ( ऋ ० सं ०१०।११४।४ ) इति मन्त्रेऽपि ऋषे दृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवत्याख्यानयुक्ता । मन्त्रार्थस्त्वयम् - एकोऽद्वितीयः सुपर्णः सुपतनो वायुः समुद्रमन्तरिक्षं नित्यमाविशति । स सर्वभूतानुप्रवेशी भुवनानि अभिपश्यति । तमेवं वर्तमानमहं पाकेन मनसा विपक्वमनसा अहमन्तिकमिवापश्यम् । दृष्टं देवतावादसतस्त्वमृषिः कस्यचिदाचक्षाणो ब्रवीति । तं माता माध्यमिका वाग् उपजीवति । स च तामुपजीवति, परस्पराश्रयत्वात्तयोर्वृत्तेः । एवमेव ' किमिच्छन्ती सरमा प्रेदमानड् दूरे ह्यध्वा जगुरिः पराचेः । कास्मेहितिः का परितक्म्यासीत् कथं रसाया अतरः पयांसि || ' ( ऋ ० सं ० १० १०८1१ ) | देवपणय: किलासुराः देवगवीरपजहुः । ततः किलेन्द्रस्तद-न्वेषणाय तदायं सरमां प्राहिणोत् । ते च तां दृष्ट्वा पप्रच्छुरनयर्चा -- इदमस्मत्स्थानं किमिच्छन्ती प्रानद् प्राप्तवती । दूरे ह्यध्वा महदन्तरमध्वानं न यदृच्छया गन्तुं शक्यम् । य एवं जगुरिः भृशं गन्ता स एवागन्तुं शक्तः । तरह से है- ' यह इन्द्र उत्पन्न होते ही सब प्राणियों के बीच अपना प्रमुख स्थान बना लेता है । यह बड़ा मनस्वी मेधावी है । इसका afe यह है कि अन्य प्राणी तो समय पाकर प्रमुख स्थान बनाते हैं, किन्तु इन्द्र तो उत्पन्न होते हो प्रमुख बन जाता है । वह अपने प्रभाव से सभी देवताओं को इकट्ठा कर लेता है । अथवा सभी देवताओं का स्वामी होने से वह इनकी रक्षा करता है । अथवा अपनी प्रमुखता के कारण वह इन सबसे आगे बढ जाता है । जिस इन्द्र के पराक्रम से द्यावापृथिवी कांपते रहते हैं कि बड़ी भारी सेना रखने के कारण महान् बलशाली यह इन्द्र कहीं हम लोगों को नष्ट कर दे । इस तरह से जिसके पराक्रम से ये अतिविशाल द्यावापृथिवी थर थर कांपते रहते हैं, हे असुरों, वह इन्द्र मैं नहीं हैं, किन्तु उसी के प्रसाद से, वरदान से तत्सदृश इन्द्र के स्वरूप को प्राप्त हुआ मैं ' ब्राह्मण हूँ ' । उक्त निरुक्त के वचन का अर्थ यह है --- दृष्टार्थ अर्थात् जिसने इन्द्र की मैत्री का अनुभव किया है, उस इन्द्र के मित्र ऋषि गृत्समद की इन्द्र के प्रति प्रीति का इस आख्यान से संबन्ध है! अथवा दृष्टार्थ अर्थात् इन्द्र को देवता के रूप में देखने वाले, उसकी प्रीति के लिये अपने अन्तःकरण को समर्पित कर देने वाले और उसमें अनुराग उत्पन्न हो जाने के कारण परम प्रसन्न मुद्रा में स्थित गृत्समद दूसरे व्यक्तियों के सामने उस इन्द्र के गुणों का वर्णन करते हैं । इसी तरह से ' एक सुपर्णः ' इत्यादि मन्त्र में भी दृष्टार्थ ऋषि की प्रीति आख्यान से संयुक्त होती है । मन्त्र का अर्थ यह हैं - एक अर्थात् अद्वितीय, सुपर्ण सुखपूर्वक बहने वाना पवन सदा अन्तरिक्ष में बहता रहता है । वह सभी प्राणियों में श्वासोच्छ्वास के रूप में प्रविष्ट होता रहता है और सारे जगत् का अवलोकन करता रहता है । उस पवन को इस रूप में मैं सदा अपने पवित्र मन से अपने पास देखता रहता हूँ ' । यहाँ पर भी daarata के त को जिसने ठीक तरह से जान लिया है, ऐसा कोई ऋषि किसी को समझाने के लिये बोल रहा है । उस ऋषि की सहायता मातृस्थानीया मध्यमा वाणी कर कही है, यह ऋषि उसकी सहायता ले रहा है और इस तरह से एक दूसरे की सहायता से व्यवहार चलता है । यही स्थिति ' किमिवी ० ' इत्यादि मन्त्र की भी है । एक बार देवताओं के शत्रु असुरों ने देवताओं की गायों का अपहरण कर लिया । तब इन्द्र ने इनको खोजने के लिये असुरों के यहाँ सरमा को भेजा । असुरों ने जब सरमा को देखा तो इस ऋचा के द्वारा सरमा से पूछते है - ' हे सरमे तुम किस अभिप्राय से हमारे घर आई हो । तुम अपने घर से बहुत दूर चली आई हो, बिना अभिप्राय के इतनी दूर आ पाना संभव नहीं है । बहुत दूर तक जिसका चलने का अभ्यास हो, वही इतनी दूर आ सकता
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वार्थपारिजाता ८८ ' पराचेः पराङ्मुखैर्गमनै रचिता आगता देवनिवासात् का तवास्मासु आतिरर्थस्याधानं कोऽस्मत्तोऽर्थस्तव प्राप्तव्यः का परितक्म्या सुखा रात्रिः अन्तरा तवासीत् कथं रसाया नद्याः पयांसि अतरः । श्रान्तायास्तवान्तरावासाः केष्वा सन्? समूद इत्याख्यानम् । ११/२५ इत्यत्रापि मन्त्र एवाख्यानमुक्तम् । एवमेव - ' अन्यभूषु त्वं यम्यन्यत्व परिष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् । तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥ ' ( ऋ ० सं ० १० १० १४ ) यमी किल यमं चकमे ग्रातरम्, तो यमोऽनयच प्रत्याचचक्षे - हे यमि, अन्यमूषु त्वं परिष्वजस्व मैथुनाभिप्रायेष लिबुजा वल्ली समोपजं वृक्षम् । अन्य एव त्वां परिष्वजतां यस्य योग्या त्वम् । तस्य वा त्वं मन इच्छा । तस्य च त्वं मनः प्रवेष्टुमिच्छ । अथैवमेकचित्यमुपगम्यमानेन समानेन सह कृणुष्व संविदं सुभद्राम् । यमी यमं चकमे तां यस प्रत्याचक्षे व्याख्यानम् | ( नि ० १११३४ ) त्रित्वपक्षे तु - माध्यमिको यमो माध्यमिकां वाचमुषसमात्मनः प्रविभक्तामिव कृत्वोभयस्थानां तां ब्रवीति - हे यमि । ' समस्मिन् जायमान आसत ग्ना उतेमवर्धनद्यः स्वगूर्ताः । महे यत्त्वा पुरूरवो रणायावर्धयन् दस्युहत्याय देवाः || ' ( ऋ ० सं ० १० / ९ ५ / ७ ) उर्वश्या आर्षम् । देवपल्यो वापि ( नि ० १०२४७ ) आख्यानपक्षोऽपि दर्शितः । ' विद्युत या पतन्ती दविद्योद्भरन्ती मे अप्या काम्यानि । जनिष्टो अपो नर्यः सुजातः प्रोवंशी तिरत दीर्घमायुः ॥ ' ( ऋ ० सं ० १० / ९ ५ / १० ) अत्राप्यैतिहासिक: पक्षो दुर्गाचार्येण दर्शितः । ऐतिहासिकपक्षे खेलः पुरूरवा अप्सरसा वियुक्तो ब्रवीति - विद्युदिव या पतन्ती । त्रिः स्म मातः श्नथयो वैतसेन ' ( ऋ ० सं ० १० / ९ ५ / ५ ) ऐतिहासिका-भिप्रायेणैव ' शेपो वैतस इति पुंस्प्रजननस्य ' ( नि ० ३।२१ ) इत्यत्रेतिहासिकोऽर्थोऽभिप्रेतः । अत्र सर्वत्र मन्त्रेष्वेवाख्यान-वर्णनं दृश्यते । यदुक्तम्- ' ब्राह्मणे वेदार्थो विद्यते । ब्राह्मणस्यापि वेदत्वे वेदार्थः कस्मिन् भविष्यतीति ' ( पृ ० ११५ १ निस्तत्त्वम्, ब्राह्मणार्थस्यापि मन्त्रेण वर्णनात् । तथाहि-- ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तै ० उ ० २ १ ) इति ब्राह्मणम् । है | आज तुम देवताओं के यहाँ न जाकर उलटे मुँह हमारे यहाँ चली आई हो तो इसका क्या प्रयोजन है? हमसे तुम क्या प्राप्त करना चाहती हो । तुम्हारी मार्ग में पड़ी रात्रि तो सुखपूर्वक बीती? मार्ग के बीच में पड़ी नदियों को तुमने किस तरह से पार किया? पक जाने पर तुम कहीं विश्राम करती थी । इसी तरह से ' समूद ' ( ११।२५ ) इत्यादि निरुक्त व्याख्यात मन्त्र में भी आख्यान हो वर्णित है । यही स्थिति ' अन्यमूषुत्वं ' इत्यादि मन्त्र की भी है । किसी समय यमी अपने भाई को ही चाहने लगी । इस ऋचा के द्वारा यस उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है- ' है यमि, तुम मैथुन के अभिप्राय से लता के समीपवर्ती किसी अन्य वृक्ष का सहारा 1 जिस व्यक्ति के तुम योग्य हो, वही तुम्हारा आलिंगन करें, तुम उसी व्यक्ति के मन को जीतने का प्रयत्न करो । इसी तरह के किसी समान अभिलाषा वाले व्यक्ति को पाकर तुम उसके साथ अपनी कल्याणकारिणी बात पक्की करो ' । यहाँ पर यमी जब यम को चाहने लगीतो यम उसका जो प्रत्याख्यान किया, उसीका वर्णन है । त्रित्व पक्ष में तो माध्यमिक यम माध्यमिक वाणी उषा को अपने से अलग करके उभय स्थान में स्थित उसके साथ वार्तालाप करता है - है यमि । इसी तरह से ' समस्मिन् जायमान ० ' इस मन्त्र की वक्ता ऋषि उर्वशी है । यहाँ पर भी ' देवपत्न्यो वापि इस निरुक्त वचन में आख्यान पक्ष भी वर्णित है । इसी तरह से ' विद्युन्न या पतन्ती ' इस ऋङ् मन्त्र में भी दुर्गाचार्य ने ऐतिहासिक पक्ष बताया है । ऐतिहासिक पक्ष में इस मन्त्र में ऐल पुरूरवा अप्सरा उर्वशी से वियुक्त होने पर कहता है --विद्युदिव या पतन्ती । इसी तरह से त्रिः स्म माहृ: ० ' इत्यादि मन्त्र का जब ऐतिहासिक पक्ष में अर्थ किया जाता है, तभी निरुक्त की यह उक्ति सार्थक हो सकती है ' शेपो वेतस इति प्रजननस्य ' इससे स्पष्ट है कि निरुक्तकार को यहाँ पर ऐतिहासिक अर्थ अभिप्रेत है । यहां जितने उदाहरण दिये गये हैं, वे सभी मन्त्र-भाग से ही उद्धृत हैं । इन सभी स्थलों में आख्यानों का वर्णन मिलता है, जो कि आपके मत से केवल ब्राह्मणभाग में ही मिलने चाहिये । ' मन्त्रार्थ तो ब्राह्मणों में विद्यमान है, यदि ब्राह्मणों को वेद मानोगे तो उनका अर्थ किन ग्रन्थों में बताओगे ' ( पृ ० ११५ ) यह कथन भी निस्तत्त्व है, क्योंकि ब्राह्मणों का अर्थ भी कहीं - कहीं मन्त्रों में वर्णित है । जैसे कि ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' इस
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८८४ वार्थचारिजात अस्य व्याख्यानम् - ' तदेषाभ्युक्ता । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति । ' ( तै ० उ ० २1१ ) तत एव मीमांसायां ब्राह्मणोक्तार्थानुवादकत्वेन विधाय -कत्वमित्युक्तमेव । वेदव्याख्यानायैव पूर्वोत्तरमीमांसे, धर्मशास्त्राणि, इतिहासपुराणानि च प्रवृतानि । ' वेदो-पबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ' ( वा ० रा ० ११४१६ ), ' भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ' ( श्रीमद्भा ० १ / ४ / २ ९ ), ' इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ' ( १२०१ ) इत्यादिप्रमाणेभ्यः । वेदार्थद्रष्टृत्वेन मन्त्रब्राह्मणद्रष्टृत्वे मन्त्रद्रष्टृत्व-स्यापि वाघापत्तेः । न चेष्टापत्तिः, ' तद् यदेनांस्तपस्यमानाम् ब्रह्म स्वयम्स्वस्यनार्षत् त ऋषयोऽभवंस्तदृषीणामृषित्वम् ' ( नि ० २।११ ) इति निरुक्तोद्धतब्राह्मणविरोधात् । यदुक्तम्- ' ब्रह्मपदेन मन्त्रा एवोच्यन्ते ' ( पृ ० ११६ ) इति, तत्तुच्छम् ब्रह्मपदेन मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्यैव ग्रहणात् । तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेम्य: ' ( गी ० सू ० २/१/५७ ) इति प्रामाण्यनिरूपणावसरे वात्स्यायन भाष्ये ' पुत्रकामः पुत्रेष्टया यजेत ' इति ब्राह्मणोदाहरणमपि सुस्पष्टमेव ब्राह्मणानां वेदत्वं साधयति । यदुक्तम्– ' तत्र तच्छन्दो न वेदबोधकः, तच्छन्दस्य पूर्वपरामशित्वेन वेदस्य च पूर्वमप्रकृतत्वेन तच्छब्देन वेदग्रहणा-सम्भवात् ' ( पृ ० ११८ ) इति, तत्तुच्छम्, तच्छदेन प्रसिद्ध बुद्धिस्थप्रधानपरामशित्वेन वेदस्यैव ग्रहणसम्भवात् । ' शब्द'-शब्दोऽपि न शब्दसामान्यबोधकः, किन्त्वाप्तोक्तशब्दस्यैव । तत्र च वेदस्यैव प्राधान्याद् ब्राह्मणानामवेदत्वेन मन्त्रा एवोदाहर्तव्याः स्युः । न्यायसूत्रे ( २२११५७ ) इत्यत्र ' तस्येति शब्दविशेषमेवाधिकुरुते भगवानृषिः ' इति वात्स्यायन-वचनमप्येतदनुकूलमेव । ब्राह्मणवाक्य की व्याख्या इस तरह से की गई है ---- ' इस ब्राह्मणवाक्य के समर्थन में यह ऋचा कही गई है - ब्रह्म, सत्य, ज्ञान और अनन्त स्वरूप है । परम आकाश में छिये ब्रह्म के इस स्वरूप को जो जानता है, वह विद्वान् ब्रह्मस्वरूप सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है । ' इसीलिये मीमांसा में मन्त्रों को ब्राह्मणोक्त अर्थ की अनुवादकता के आधार पर अविधायकता मानी गई है । वेदों के व्याख्यान के लिये ही पूर्व और उत्तरमीमांसा, घर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण आदि की प्रवृत्ति हुई है । ' वेदार्थ के उपबृंहण के लिये भगवान् ने इतिहास और पुराण की सृष्टि की ', ' महाभारत की रचना के बहाने से वेदार्थ का उपबृंहण भी किया गया है ', ' इतिहास और पुराण की सहायता से वेदार्थ का उपबृंहण करे ' इत्यादि वाल्मीकि रामायण, श्रीमद्भागवत, बायुपुराण आदि के वचन इसी बात की पुष्टि करते हैं । वेदार्थ के द्रष्टा मन्त्र और ब्राह्मणभाग के भी हृष्टा यदि माने जायेंगे तो मन्त्र भाग भी उनकी कृति माना जायगा, इस बात को आप स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा मानने पर निरुक्त में उद्धृत इस ब्राह्मणभाग के वचन से विरोध होगा कि ये लोग जब तपस्या कर रहे थे तो स्वयंभू ब्रह्मा ने स्वयं प्रभूत ज्ञान का इनमें संचार किया । इस संचरित ज्ञान के कारण ये लोग ऋषि बताया गया हैं कि वेदों को ऋषियों ने स्वयं नहीं देखा, किन्तु तपस्या करके स्वयंभू ब्रह्मा से उनको कहलाये । ' यहाँ पर स्पष्ट ही प्राप्त किया । ' ब्रह्म नाम चेद अर्थात् मन्त्रों का ही है ' ( पृ ० ११६ ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि ब्रह्मपद से मन्त्रब्राह्मणात्मक संपूर्ण वेद का ग्रहण किया जाता है । ' तदप्रामाण्यमनृत ० ' इस गोतम सूत्र के वात्स्यायन भाष्य में पूर्वपक्ष के रूप में वेद का अप्रामाण्य निरूपित करते समय ' पुत्रकामः पुत्रेष्टया यजेत ' यह ब्राह्मण वाक्य उदाहरण के रूप में उपस्थित किया गया है । इसमें स्पष्ट ही ब्राह्मण भाग भी वेद माना गया है । वहीं पर ' तत् ' शब्द वेद का बोधक नहीं है । ' तत् ' शब्द सदा अपने से पहले जो विषय विद्यमान रहता है, उसका परामर्शक माना जाता है | यहाँ पर वेद का कोई प्रसंग नहीं है, अतः ' तत् ' शब्द से वेद का परामर्श नहीं हो सकता ' ( १० ११८ ), किन्तु यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि ' सत् ' शब्द बुद्धि में प्रसिद्ध वस्तुओं में जो प्रधान होता है, उसी का परामर्शक माना जाता है, अतः यहाँ पर वेद का ग्रहण होगा । ' शब्द ' पद भो केवल सामान्य शब्द का बोधक न होकर आप्त अर्थात् प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा उच्चारित शब्द ही माना जायगा । इन शब्दों में सर्वप्रधान वेद ही माने जायेंगे । ब्राह्मण जब वेद नहीं है तो यहाँ पर मन्त्रों का ही उदाहरण दिया जाना चाहिये | न्यायसूत्र ( २१११५७ ) पर ' तस्य ' इस पद को शब्द विशेष के लिये ही भगवान् ऋषि प्रयुक्त करते हैं ' यह वात्स्यायन का वचन भी हमारे अर्थ की ही पुष्टि करता है ।
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नेवार्थपारिजातः ८८ ' तद्वचनादाम्नायस्य श्रामाण्यम् ' ( १ | १ | ३ ) इति वैशेषिकसूत्रेऽपि प्रसिद्धपरामशित्वेनैवेश्वरो गृह्यते, ईश्वरस्य तत्राकुलत्वात् । स्वामिदयानन्देनापि तयोर्धर्मेश्वरयोर्वचनादिति व्याख्यातमृगादिभूमिकायाम् । तेनेश्वरेण वचनात्प्रणयनादाम्नायस्य प्रामाण्यमिति तत्रोपस्कारकृत् । ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यम् ' ( गो ० सू ० २१११६८ ) अत्रापि तत्पदेन वेदस्य ग्रहणं भवति यथा तथैव ' तदप्रामाण्यम् ' ( गो ० सू ० २/१: ५७ ) इत्यत्रापि तत्पदेन वेदस्यैव ग्रहणम् । न च तत्रापि वेदशब्दः प्रकृतः न च तत्रापि वेदो न गृह्यत इति वाच्यम्, खद्गुरुणा दयानन्देन तत्र तेषां वेदानां नित्यानामीश्वरोक्तानां प्रामाण्यमित्यर्थ स्वीकारात् ( ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकायां वेदनित्यत्वविचारे ) । तस्मात् सर्वथैव भगवद्दत्तादयः सामाजका धूलिप्रक्षेपमेव कुर्वीत । तद्रीत्या तु ' तदप्रामाण्यम् ' ५७ सूत्रमा रम्य ६८ सूत्रपर्यन्तं वेदप्रामाण्यविचारी नास्त्येव, तेषामप्रसक्तत्वादिति साधु समर्थितं दयानन्दमयं तेन देवानांप्रियेण । यदुक्तम्-- ' सप्ताक्षरं ब्रह्म । ऋगित्येकाक्षरं ब्रह्म । सामेति द्वेऽथ यदतोऽन्यद् ब्रह्मैव तद् द्वयक्षरं वै ब्रह्म तदेतत्सर्व सप्ताक्षरं ब्रह्म ' ( श ० १० २२४१६ ) अत्र ब्रह्मपदेनाथर्वदेदो गृह्यते ' ( पृ ० ११६ ) इति, तत्तुच्छम्, तथात्वे सप्ताक्षराणामुक्तानां ब्रह्मरूपत्वेऽप्युगादिमन्त्राणामब्रह्मत्वापत्तेः । तस्मात् प्रकृते ऋगादिशब्देन केवलमृगादिसन्त्रा एव गृह्यन्ते, किन्तु मन्त्रब्राह्मणात्मका वेदा एव ऋगादिशब्दैर्ग्राह्याः । ' वेदो वा प्रायदर्शनात् ( मो ० सू ० ३।३१२ ) इत्यत्र ' उच्चैर्ऋ चा क्रियते । उपांशु यजुषा । उच्चैः साम्ना ' इत्यत्र मन्त्रब्राह्मणसमुदायस्यैव ऋगादिशब्दग्रहणस्य निधारि-तत्वात् । यद्वात्र ब्रह्मपदेन ब्राह्मणस्यैव ग्रहणम्, अथर्वमन्त्राणामपि त्रिविधमन्त्रेष्वन्तर्भावात् । प्रकृते ' आदित्य एक: ' इत आरम्य ' शतघात्मानं विधायाग्नि सर्वान् कामानात्मानमचिनुत स सर्वे कामा अभवत् स एकः शतधा सप्तविधं सम्पद्यते । तस्य सप्ताक्षरे प्रतिष्ठितत्वात् । तथा चाग्निविद्याङ्गत्वेनोक्तवचनस्य वेदत्वावेदत्वाविवेचनायाः प्रवृत्तेः । तस्माद्यथा--' तद्वचनादाम्नायस्थ ० ' इस वैशेषिक सूत्र में भी ' तत् ' पद की प्रसिद्ध परामर्शिता के आधार पर ही ईश्वर का ग्रहण होता है, यद्यपि ईश्वर वहां प्रकृत नहीं है । ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में स्वामी दयानन्द ने भी ' तयोः ' पद धर्म और ईश्वर का ग्रहण किया है । उपस्कार के रचयिता ने यहाँ व्याख्या की है कि ' उस परमेश्वर के द्वारा प्रणीत होने से आस्नाय का प्रामाण्य है । ' ' मन्त्रायुर्वेद ० ' इस सूत्र में जैसे ' तत् ' पद से वेद का ग्रहण होता हैं, उसी तरह से ' तदप्रामाण्य ० ' इत्यादि सूत्र में भी ' तत् ' पद से वेद का हो ग्रहण होगा | यहाँ पर भी तो वेद शब्द प्रकृत नहीं है । यहाँ पर भी वेद का ग्रहण नहीं होगा, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि आपके गुरु arra ने वहाँ पर ईश्वरोक्त नित्य वेदों का प्रामाण्य स्वीकार किया है ( ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका में वेद की नित्यता का विचार करने वाले प्रकरण में ) । इस तरह से सभी जगह भगवदत्त प्रभृति आर्यसमाजी आँख में धूल झोंकने का प्रयत्न किया करते हैं । इनके मत से ' तदप्रामाण्य ० ५७ ' इस सूत्र से लेकर ६ ९ सूत्र पर्यन्त वेद के प्रामाण्य का विचार किया ही नहीं गया है, इस तरह से इन चेलों ने अपने गुरु दयानन्द के मत का अच्छा समर्थन किया है । ' सप्ताक्षरं ब्रह्म ० ' इत्यादि शपथश्रुति में ब्रह्म पद से अथर्थवेद गृहीत होता है ' ( पू ० ११६ टि ० ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि ऐसा मानने पर उक्त सप्ताक्षरों के केवल ब्रह्मरूप ( अथर्ववेद रूप ) होने से ऋगादि मन्त्र ब्रह्म स्वरूप हो जायेंगे | इसलिये प्रकृत उद्धरण में ऋ प्रभृति शब्दों से केवल ऋगादि मन्त्रों का ही ग्रहण नहीं होगा, किन्तु मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद भी ऋयादि शब्दों से गृहीत माने जायेंगे । ' वेदो वा प्रायदर्शनात् ' इस मीमांसा सूत्र के उदाहरणभूत ' उच्चैर्ऋचा क्रियते ' इत्यादि वाक्यों में मन्त्रब्राह्मण समुदाय का ही ग्रहण ऋगादि शब्दों से किया जाता है, ऐसा निर्णय किया गया है । अथवा यहाँ पर ब्रह्मपद केवल ब्राह्मणभाग का ही ग्रहण fear जायगा, क्योंकि त्रिवि मन्त्रों में red वेद के मन्त्रों का भी अन्तर्भाव हो जाता है । प्रकृत स्थल में ' आदित्य एक: यहाँ से आरम्भ करके वह अग्नि के रूप में अपने को amr विभक्त करके सभी कामना न कर लेता है और तब वह शतधा विभक्त अपने स्वरूप को सात भागों में विभक्त कर लेता है और सात महारों में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस तरह से उक्त वचन अग्निविद्या का अंगभूत है, अतः यहाँ पर वेदत्व और atara के Fader का कोई प्रसंग नहीं है । इसलिये जैसे ' वाणी ' ही ऋक् है, प्राण साम है '
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८८६ श्रदार्थपारिजात ' वागेव ऋक्साम प्राण: ' इत्यादिभिर्वागादिषु ऋगादिबुद्धिः क्रियते, तथव सप्ताक्षरे ब्रह्मदृष्टिविधीयते, न सप्ताक्षराणां ब्रह्मविधाने ताम् । पौर्वापर्यानुरोधेन क्वचिद् ब्रह्मशब्दस्थ देवताविशेष एवार्थी यथा स्वाध्याय ब्राह्मणे सायण: -- ' अस्य प्रपाठकस्य स्वाध्याय ब्राह्मणमिति समाख्यातः स्वाध्याय एव प्राधान्येनात्र विधेयः । तस्मिव शुद्धः पुमानधिकारी | अतः शुद्धिहेतून् यज्ञोपवीत सन्ध्यावन्दन कूष्माण्ड होमानभिधाय स्वाध्यायं विधातुमपाख्यानमाह - ' अजान् ह वे पृश्नी-स्वपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम् स्वस्यानर्षत ऋषयोऽभवन् तदूषीणामृषित्वम् । तां देवतामुपातिष्ठन्त यज्ञकामास्त एवं ब्रह्मयज्ञमपश्यन् तमाहरन् तेनायजस्त इति ' ( त ० आ ० २१ ९ ) कल्पादावेव ब्रह्मणाः सृष्टाः नह्यस्मदादिवत् कल्पमध्ये पुन: पुनर्जायन्ते तस्मादजाः । ते च पृश्नयः शुक्ला: । स्वरूपेणैव निर्मलाः सन्तोऽपि पुनस्तप आचरन् । तदीयेन तपसा तुष्टं स्वयम्भु ब्रह्म जगत्कारणत्वेन स्वतः सिद्धं परब्रह्म वस्तु काचित् मूर्ति धृत्वा तपस्यमानांस्तानृषीननुग्रही-तुमभ्यानत् आभिमुख्येन प्रत्यक्षमागच्छत् । ततस्ते मुनय ऋषिधात्वर्थविषयत्वाद् ऋषयोऽभवन् । तस्मादन्येषामपि ऋषीणामनयैव व्युत्पत्या ऋषित्वं सम्पन्नम् । ततस्ते मुनयः सर्वकामप्रदं कञ्चिद्यज्ञं कामयमानाः स्वयम्भुब्रह्मरूपां तां देवतामुपासितवन्तः । तद्देवतानुग्रहात्ते मुनय एवं वक्ष्यमाणं ब्रह्मयज्ञं समकामहेतुमपश्यन् । दृष्ट्वा च तं यज्ञमाहरत् अनुष्ठितवन्तः । तेन यज्ञेन देवानपूजयन्त ' इति । यत्तु - ' स एवं त्रिवृतं सप्ततन्तुविशतिसंस्थं यज्ञमपश्यत् ' ( गोपथ ० १ | १ | १२ ) अत्र मन्त्रेषु यज्ञक्रिया-भावदर्शनं यथा तथैव ब्राह्मणदर्शनमिति ' ( पृ ० ११७ ), तन्त्र, मन्त्रेषु यज्ञविधानाभावेन तत्र यज्ञदर्शनासम्भवात् । तस्मात्तत्र यज्ञवोधकब्राह्मणदर्शनमेव मन्तव्यम्, तत्रैव यज्ञविधानोपलम्भात् । किच, मन्त्रदर्शनेष्वपि मन्त्रार्थदर्शनमेव इत्यादि वचनों में वाणी आदि में ऋगादि बुद्धि भी भावना की जाती है, उसी तरह से सप्ताक्षर में ब्रह्मबुद्धि की भावना की जाती है । इस तरह से यहाँ पर सप्ताक्षरों को ब्रह्म सिद्ध करने का कोई प्रसंग नहीं है । raft के अनुरोध से कहीं पर ब्रह्म शब्द का अर्थ देवताविशेष ही लिया जाता है, जैसा कि स्वाध्याय ब्राह्मण की व्याख्या करते समय सायण ने किया है - इस प्रपाठक की समाख्या स्वाध्याय ब्राह्मण है, अतः यहाँ पर प्रधानरूप से स्वाध्याय का ही farara है | इसका अधिकारी शुद्ध पुरुष ही हो सकता है । इसलिये शुद्धि के कारणभूत यज्ञोपवीत, सन्ध्यावन्दन कूष्माण्ड होम प्रभृति का विधान बताने के उपरान्त स्वाध्याय का विधान करने के लिए एक उपाख्यान बताते हैं-- ' अजान् ह में पूछनी ० ' इस तैत्तिरीय आरण्यकश्रुति का तात्पर्य यह है कि इन सुनिगणों की सृष्टि कल्प के आदि में ब्रह्मा के द्वारा ही होती है, हमारी तरह ये कल्प के मध्य में बार - बार उत्पन्न नहीं होते, इसलिये ये ' अज ' कहे जाते हैं । ये अज आज पुरिन अर्थात् शुक्ल होते है । ये लोग स्वरूपतः तो निर्मल ये ही, पुनः इन्होंने तपस्या की । इनकी तपस्या से सन्तुष्ट होकर स्वयंभू ब्रह्मा ने सारे जगत् के कारणभूत स्वतः सिद्ध परब्रह्म ने कोई स्वरूप धारण कर तपस्या में लीन ऋषियों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से उनके सामने अपने को प्रकट कर दिया । तब ये मुनिगण ' ऋषि ' धातु के अर्थ से सम्बद्ध हो जाने से ऋषि कहलाने लगे । इसी तरह से अन्य ऋषियों का ऋषित्व इसी व्युत्पत्ति के सहारे सम्पन्न है | इसके बाद ये मुनिगण सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाले किसी यज्ञ का अनुष्ठान करने की इच्छा से स्वयंभू ब्रह्मस्वरूप उस देवता की उपासना करने लगे । उस देवता के अनुग्रह से उन्होंने वक्ष्यमाण ब्रह्मयज्ञ को ही अपनी सारी कामनाओं की पूर्ति के कारण के रूप में देखा और इस देखने के बाद वे इस यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे इस स्वाध्याय यज्ञ के द्वारा वे देवता की आराधना करने लगे । ' ' गोपथ ब्राह्मण के ' स एवं निवृतं. ' इस वाक्य में त्रिवृत् सप्ततन्तु और एकविंशति संस्था वाले यज्ञ को देखने की बात कही गई है । यज्ञ क्रिया है । इसी क्रिया का भाव ऋषियों ने मन्त्रों में देखा । वैसे ही ब्राह्मण वाक्यों का भाव भी उन्होंने जाना था ' ( पृ ० ११७ ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि मन्त्रों में यज्ञ का विधान नहीं है, अतः वहाँ पर यज्ञ का दर्शन नहीं हो सकता । इसलिये
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वेदार्थपारिजातः ८८७ किन स्यात्? यदि तु मन्त्राणामृषिकर्तृत्वे नित्यत्वविरोधस्तर्हि प्रकृतेऽपि तत्समानयोगक्षेमम् । नित्यत्वं तु मन्त्र-ब्राह्मणसमुदायस्यैव तत्र श्रूयते । यदुक्तम्- ' वेदव्याख्यानरूपत्वेन ब्राह्मणानां क्वचिदरूपेण ग्रहणं न दुष्यति ' इति, तदपि न सङ्गतम्, तथात्वे श्रौतसूत्राणामपि वेदपदवाच्यत्वापत्तेः । तस्माद् ब्राह्मणानां वेदत्ववोवकानां श्रौतसूत्रकार-मनु - व्यास- जैमिनिवचनानामौपचारिकार्थत्वकथनम्रपलापो वाऽनास्तिक्यमेव सामाजिकानाम् । यदपि ' छन्दोवत्सूत्राणि भवन्तीति रीत्या यथा व्याकरणादिसूत्रेषु छन्दोवत्कार्याणि भवन्ति तथैव ब्राह्मणेष्वपि भवन्ति न तावता तेपां वेदत्वम्, अन्यथा सूत्राणामपि वेदवत् पुरुषरचितत्वाभावः स्यात् ' ( पृ ० ११ ९ ) इति, तत्तु अनुक्तोपालम्भ एवं छन्दोवस्कार्यत्वाद् ब्राह्मणेषु वेदत्वानुक्तेः । उत्तरास्फूती दयानन्दस्तदीयाश्च प्रमाण-ग्रन्येषु क्षेपकत्वं शाब्दन्यायविरुद्धर्थान्तरत्वं वा वदन्ति तच्च पलायनमेव । ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके ' ( गो ० सू ० २ | १ | ६१ ) ( पृ ० १२० ) इति स्थले वात्स्यायनभाष्योत्तरं तु पूर्वमेवोक्तम् । यथा लोकशब्दस्य प्रसिद्धार्थत्यागे मानाभावस्तथेति । यथा लोके तथा वेद इति स्वाभाविक एवार्थः । यथापदबोध्यस्य सादृश्यस्य सप्रतियोगित्वात् । लोकानुयोग सादृश्यं तु वेदप्रतियोगिकमेव भवति । यथा लोके तथा वेद इति बाहल्येन प्रयोगदर्शनात् । अत एव यथा लौकिके वाक्ये विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वमेवं वेदवाक्यानामपि विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वं भवितुमर्हतीलि ( गो ० सू ० २ १/६५ ) इति स्थाने लिखितं वात्स्यायनभाष्यमपि सङ्गच्छते । यदुक्तम - ' तत्र वाक्ये ब्राह्मणवचनं नास्ति ' इति, तदपि विशृङ्खलम्, ब्राह्मणानामुदाहरणदर्शनात्, वेदवाक्यपदेन तेषामेव ग्रहणसम्भवात् । नहि तत्रोक्तो विध्यर्थवादानुवादादिविभागो मन्त्रेषूपलभ्यते । औपचारिक प्रयोगकथनं तु निर्मूलमेव । यहाँ पर यज्ञ के बोधक ब्राह्मणभाग के ही दर्शन की बात माननी पड़ेगी, क्योंकि यज्ञ की विधान - पद्धति नहीं मिलती है । अपि च, मन्त्रदर्शन का अभिप्राय भी हम सन्त्रार्थ का दर्शन क्यों न मानें? मन्त्रों को ऋषियों की रचना मानने पर उनकी नित्यता का विरोध मानें तो प्रकृत में भी समान रूप से यही आपत्ति आवेगी और उसका परिहार भी समान पद्धति से ही हो सकेगा, क्योंकि मन्त्र ब्राह्मण समुदायात्मक पूरे वेद को हो नित्य माना जाता है । ' चूंकि ब्राह्मणों में वेदों का व्याख्यान मिलता है, अतः कभी कभी ब्राह्मण वाक्यों को वेद के तुल्य मानकर उदाहरण देना बन सकता है ' ( १० ११ ९ ) यह कथन भी सही नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर श्रौतसूत्र भी वेद कहे जाने लगेंगे । इसलिये ब्राह्मणों को वेद मानने वाले श्रोतसूत्रकार, मनु, व्यास, जैमिनि प्रभृति आचार्यों के वचनों ारिक मानने वाले अथवा उनका अपलाप करने वाले आर्यसमाजी भयंकर नास्तिक ही माने जायेंगे । ' छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति ' इसके अनुसार जब व्याकरण आदि के सूत्रों में वेद के तुल्य कार्य होते हैं, तो बेद के अति निकटवर्ती ब्राह्मणों में वेदतुल्य कार्य होवें तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं है । यदि चेद्र में जैसे कार्य होते हैं वैसे ब्राह्मणों में होने से उनका मूल वेद मान लिया जावे और मनुष्यबुद्धिरचित न माना जाय तो सूत्रादि को भी ऋषि रचित न मानना चाहिये, क्योंकि वहाँ भी छन्दोचत् कार्य होते हैं, तो उनको भी वेद मान लिया जावें? ( पृ ० ११ ९ ) । यह हमारे ऊपर अनुक्त उपालम्भ है, क्योंकि यह हमने कभी नहीं कहा कि छन्दोवत् कार्य होने से ब्राह्मणभाग वेद माना जाता है । कोई उत्तर न सूझने पर दयानन्द अथवा उनके अनुयायी प्रमाण ग्रन्थों में क्षेपक मान लेते हैं, अथवा शाब्द न्याय के विरुद्ध अर्थान्तर की कल्पना करने लगते हैं, यह सब उन्नका पलायनवाद है । ' प्रमाणं शब्दो यथा लोके ' ( पू ० १२० ) यहाँ पर वात्स्यायन भाष्य का उत्तर हम पहले दे चुके हैं कि जैसे लौकिक शब्द के प्रसिद्ध अर्थ को छोड़ देने में कोई प्रमाण नहीं हैं, उसी तरह से वैदिक शब्द के विषय में भी समझना चाहिये । यही स्वाभाविक अर्थ है । यथापद से प्रतीत होने वाला सादृश्य उसके प्रतियोगी की अपेक्षा रखता हैं । लोक से अनुगत सादृश्य वेदप्रतियोगि सादृश्य की ही अपेक्षा रखेगा | जैसा लोक में देखा गया गया है, वैसा ही वेद में भी देखा जाता है, इस तरह का वाक्य प्रयोग प्रायः देखा जाता है | इसी लिये जैसे लौकिक वाक्यों में अलग - अलग अर्थों की प्रतीति के आधार पर उनका प्रामाण्य माना जाता है, उसी तरह से वेद वाक्यों का भी अलग अलग अर्थी की प्रतिपादकता के आधार पर प्रामाण्य माना जायगा, इस तरह की व्याख्या उक्त सूत्र की arrator ने उचित ही की है, अतः वह तर्कसंगत ही मानी जायगी । ' इस वाक्य में ब्राह्मण पद नहीं पढा गया है ' ( पृ ० १२० ) यह her भी fan हैं, क्योंकि यहाँ पर उदाहरण ब्राह्मणवाक्यों के ही दिये गये हैं, अतः वेद पद से उन्हीं का ग्रहण संभव हो सकता
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८८८ पेदार्थपारिजात यदपि COPORN ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहास: पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकः सूत्राण्यनु-व्याख्यानानि व्याख्यानानि बाचैव सम्राट् प्रजायन्ते ' ( श ० १४/६/१०/६ ) अत्र वेदेभ्य: पृथग् उपनिषदामुपदेशाद् ब्राह्मणग्रन्थस्य वेदभिन्नत्वं सिद्धयति ' ( पृ ० १२१ ) इति, तदतीय तुच्छम् ब्राह्मणवशिष्ठन्यायेन ब्राह्मणस्यैव सतो वशिष्ठस्य वैशिष्टचाभिप्रायेण ब्राह्मणेभ्य: पृथगुपदेशो भवति, तथैवोपनिषद ब्रह्मविद्यारूपत्वाद् वेदरूपत्वेऽपि पृथगुपदेशो युक्तः । मुण्डके s पर विद्यारूपेण ऋग्वेदादीनां ग्रहणम् । ब्रह्मप्रतिपादकत्वाद् उपनिषदां परनिद्यारूपेण वर्णनात् । ' हे विद्ये वेदितव्ये ' इत्युपक्रम्य ' तत्रापस ऋग्वेदो यजुर्वेदः... " अथ परा यथा तदक्षरमधिगम्यते ', ' यत्तददेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनि परिश्यन्ति धीरा || ' ( मुण्डक ०१ ४१६ ) | क्वचिद् ब्राह्मणानां पृथग्व्यपदेशोऽपि मन्त्राणां विनियोजकत्वेन यज्ञादिविधाय-कत्वेन वैशिष्ट्घाभिप्रायेणैव । एतेनैव तादृशान्यस्यान्यपि वचनानि व्याख्यातानि वेदितव्यानि । तस्मात् सनातन-धर्मोद्धारकृतो महामोह विद्रावणकृतश्च यद्वर्णयन्ति तदविचार्यैव भगवद्दत्तोऽनर्गलं प्रलपति, तथा तदुक्तीरुद्धृत्य समाधातुं न ] पारयत्येव । ' यतो वेदा: पुराणानि विद्योपनिषदस्तथा । श्लोकाः सत्राणि भाष्याणि यच्चान्यद् वाङ्मयं क्वचित् ॥ ' ( याज्ञवल्क्यस्मृति ३।१८ ९ ) अत्र ' उपनिषदां पृथग्वचनं वेदभागान्तरस्य तादर्थ्य प्रदर्शनार्थम् ' इति विश्वरूपाचार्याऽपि पूर्वोक्तमदुक्त्यभिप्रायेवोक्तवान् । यदुक्तम्- ' तानुपदिशति ऋचो वेद: ऋचां सूक्तं व्याचक्षाणो यजूंषि वेदः, यजुषामनुवाकं व्याचक्षाण: " तानुपदिशति आथर्वणो वेदः सामानि वेद: ' ( श ० १३ ३१३ ६, ७, १४ ), ' साम्नां दशतं ब्रूयात् ' इत्यत्र है । न्यायभाष्य प्रभूति में वर्णित विधि, अर्धवाद, अनुवाद रूप विविध विभाग मन्त्रों में नहीं उपलब्ध होता । यहाँ पर वेद शब्द के औपचारिक प्रयोग की बात निराधार है । ' ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वागिरस्, इतिहास, पुराण, दिखाएँ, उपनिषद, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान ये सब वाणी के ही साम्राज्य में से निकलते हैं ' इस शतपथ श्रुति में वेदों से पृथक उपनिषदों का उपदेश है, इससे प्रतीत होता है कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों से भिन्न है ( पृ ० १२१ ) यह कथन भी बिलकुल बेकार है, क्योंकि ब्राह्मणवशिष्टम्याय के अनुसार वशिष्ठ के ब्राह्मण रहते हुए भी उसका अलग से कथन उसकी विशेषता का द्योतक माना जाता है, उसी तरह से यहाँ पर भी उपनिषदों के वेद होते हुए भी से वर्णन उनकी ब्रह्मविद्या प्रतिपादकता रूप विशेषता का प्रतिपादक माना जायगा । सुण्डक उपनिषद् में अपर विद्या के रूप ॠग्वेद आदि ग्रहण किया गया है और ब्रह्मविद्या के प्रतिपादक उपनिषदों को पर विद्या के अन्तर्गत माना गया है । जैसे कि - ' दो विद्याएँ जाननी चाहिये ' इस तरह से प्रारंभ करके ' इनमें अपरा विद्या ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि तथा परा विद्या वह है, जिससे यह अक्षर ब्रह्म परिज्ञात होता है । यह ब्रह्म बुद्धीन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों से गृहीत नहीं हो सकता, इसका कोई गोत्र या वर्ण नहीं है, यह चक्षु श्रोत्र, पाणिपाद से रहित है । नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और अव्यय है । यही सारे स्थावर - जंगम जगत् का कारण है । धीर विद्वान् ही इसको देख पाते हैं । इसी तरह से कहीं कहीं ब्राह्मणों का पृथक उल्लेख भी उनकी मन्त्रों की विनियोजकता और यज्ञादि की विधायकता रूप विशेषता को बताने के लिये ही किया गया है । इसी तरह से उसी पद्धति के अन्य वचनों की व्याख्या भी कर लेनी चाहिये | इस प्रकार सनातन धर्मोद्धार और महामोहविद्रावण नामक ग्रन्थों के रचयिता जिस बात को कहते हैं, उस पर बिना पूरा farart for हो भगवद्दत्त अनर्गल बातें कहते हैं, किन्तु उनकी उक्तियों को पूर्वपक्ष में रखकर वे अपने मत की स्थापना में समर्थ नहीं हो पाते । ' वेद, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, भाग्य और इनके अतिरिक्त भी जो कुछ वाङ्मय विद्यमान हैं, वह सब उसी परमात्मा से प्रसूत है ' याज्ञवल्क्य स्मृति के इस वचन में उपनिषदों का अलग से उल्लेख तादयं प्रदर्शन के लिये है, विश्वरूपाचार्य की यह उक्ति भी हमारे पूर्वोक्त अभिप्राय का ही अनुसरण करती है ( पृ ० १२१ ) दि ० ) । ' शतपथब्राह्मण को अनेकों कण्डिकाओं में क्रमशः कहा गया है- ' तानुपदिशति ' ' साम्नां दशतं ब्रूयात् ' । अब विचारने की बात है कि यहाँ वेद शब्द केवल ऋगादि के लिये ही आया है, इसलिये ऋग्वेद प्रभृति शब्दों का प्रयोग भी वहीं होगा ' ( पृ ० १२२ ) ।
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दार्थ पारिजातः ८८६ ऋगादीनां मन्त्राणामेव कृते वेदशब्दप्रयोगः । तस्मादुग्वेदादिशब्दा अपि तत्रैव प्रयुज्यन्ते ' इति, तदपि पूर्वापरविचार-शून्यम्, अश्वमेवीयपारिप्लवाख्याने ऋक्पदेन लक्षणया मन्त्रब्राह्मणग्रहणात् । न च तत्र वीजाभाव:, सर्पजनविद्यादीनां drama ब्राह्मणानां पृथग्वेदत्वानुक्तेरेव वीजत्वात् । अत्रैव ' अङ्गिरसो वेद: ', ' सर्पविद्या वेद: ', ' देवजनविद्या वेद: ' ' माया वेद: ', ' इतिहासो वेद: ', ' पुराणं वेद: ' इत्यादयोऽनेके वेदा उपदिष्टाः । नेतासां सर्वासां विद्यानां वेदत्वं त्वयाऽभ्यु-पगम्यते । तस्माद्यथा तत्रोपचारिकं वेदत्वं त्वयाऽभ्युपगम्यते, तथैव ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गिरसशब्दानां मन्त्रब्राह्मण-समुदायपरत्वमभ्युपेतव्यम्, परमेश निःश्वसितत्वेन तेषां वेदत्वनिर्णयान् । for ' वेदो वा प्रायदर्शनात् ' ( मी ० सू ० ३।३।२ ) इत्यधिकरणे ' अग्ने ' ग्वेद: ' इत्याद्युपक्रमवशात् ' उच्चैर्ऋ ' चा क्रियते ' इत्यत्र ऋक्शब्देनापि मन्त्रब्राह्मणसमुदायात्मक ऋग्वेद एव गृह्यते यथा तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । अङ्गिरस इत्युक्त्यैवाथर्वणमन्त्राणां ग्रहणसम्भवे ' आथर्वणो वेद: ' ( श ० १३/३/३/७ ) इत्युक्तेः किं प्रयोजनमित्या -काङ्क्षायाम् अथर्वणा प्रोक्ता मन्त्रा ब्राह्मणानुवाकाश्च अथर्वाण इति हरिस्वामिना व्याख्यातम् । तेन ' ऋचा ' इत्यनेन ऋचो नियोज्यतया पठनीया यस्मिन् वेदे स ऋग्वेद एव ग्राह्यः । एवमेव यजुः सामशब्दानामप्यर्थो युक्तः । यथा ' यजुर्वेदे तिष्ठति मध्येऽह्नः ' इत्यनुरोधेन ' उच्चैर्ऋचा ' इत्यत्र ऋकुपदेन मन्त्रब्राह्मणसमुदायो गृह्यते, तद्वद् आथर्वण-पदप्रयोगसामर्थ्याद् ऋगादिशब्दा अपि मन्त्रब्राह्मणसमुदायपरा एव । यदुक्तम्- ' सर्पविद्या देवजनविद्या च अथर्ववेदस्यावान्तरविभागानामेव संज्ञा ' इति, तत्तु त्वदभ्युपगम-विरुद्धम् | त्वया ऋग्वेदादिभ्यः पार्थक्येन ब्राह्मणादीनामुपदेशादेव तेषामवेदत्वमभ्युपगम्यते यथा तथैव प्रकृतेऽपि ऋगादिम्यो भिन्नत्वेनोपदेशात् तेषां वेदत्वानुपपत्तेः । यदि तावत् पृथगुपदेशेऽपि तेषां वेदत्वं तहि ब्राह्मणादिषु कस्त मत्सराः? कथं न तेषां वेदत्वं स्यात्? ' ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं यह कथन भी पूर्वापर प्रकरण का बिना विचार किये ही कहा गया है, क्योंकि अश्वमेधीय पारिप्लव आस्थान में ऋक् पद से लक्षणा के द्वारा मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का ग्रहण किया गया है । इसमें क्या प्रमाण है? यही प्रमाण है कि सर्पजनविद्या प्रभूति को तो वेद शब्द से जोड़ा गया है, किन्तु वहीं पर ब्राह्मणों को अलग से वेद पद से व्यपदिष्ट नहीं किया है । यहीं पर अङ्गिरस वेद, सर्पविद्यावेद देवजनविद्यावेद, मायावेद, इतिहासवेद, पुराणवेद प्रभृति के नाम से अनेक वेदों का वर्णन मिलता है | इन सब विद्याओं को माप वेद नहीं मानते । इसलिये यहाँ पर जैसे आप इनको औपचारिक रूप से वेद मानते हैं, उसी तरह से ऋक्, यजुः साम और अथर्वागिरस शब्दों की भी आपको मन्त्र ब्राह्मणात्मकसमुदाय के बोधक मानना पड़ेगा, क्योंकि ये भी परमेश्वर के निःश्वासभूत हैं, अतः इस पूरे समुदाय को वेद मानने का निर्णय करना पड़ेगा । अपि च, ' वेदो वा प्रायदर्शनात् ' इस मीमांसा अधिकरण में ' अग्नि से ऋग्वेद प्रादुर्भूत हुआ ' इत्यादि उपक्रम वाक्यों के अनुसार ' उच्चैर्ऋचा क्रियते ' इत्यादि वाक्यों में ऋगादि शब्दों से मन्त्रब्राह्मण समुदायात्मक पूरा ऋग्वेद गृहीत होता है, उसी तरह से प्रकृत स्थल में भी समझना चाहिये । ' अंगिरस: ' इस उक्ति से ही आथर्वण मन्त्रों का ग्रहण हो सकता है, तो अलग से ' आथर्वणो वेदः ' ऐसा कहने का क्या प्रयोजन है? इसका उत्तर देते हुए ही यहाँ पर शतपथ के व्याख्याकार हरिस्वामी ने कहा है कि अथव से उक्त मन्त्र और ब्राह्मणों के अनुवाक इस शब्द से कहे जाते हैं । इसलिये ' ऋचा ' पद से जहाँ पर ऋचाओं का नियोज्य रूप से पाठ किया जाता है, वह ऋग्वेद ही उक्त है । इसी तरह का अर्थ यजु और साम शब्द का करना चाहिये | जैसे ' यजुर्वेदे तिष्ठति ' इत्यादि वाक्य के अनुरोध से ' उच्चैर्ऋचा ' यहाँ पर ऋ पद से मन्त्रब्राह्मणात्मक समुदाय का ग्रहण किया जाता है, उसी तरह से ' आथर्वण पद ' के प्रयोग के बल से ऋगादि शब्द भी मन्त्रब्राह्मणात्मक समुदाय के ही बोधक माने जायेंगे । ' सर्पविद्या और देवजनविद्या अथर्ववेद के अवान्तर विभागों के मत के ही विरुद्ध है! आप जैसे ऋग्वेदादि से पृथक् ब्राह्मणों का उपदेश होने से ही नाम हैं ' ( पृ ० १२२ ) यह बात भी आपके अपने उनको वेद नहीं मानते, उसी तरह से प्रकृत स्थल में सद्या प्रभूति का भी ऋग्वेदादि से अलग से उपदेश होने से उनको भी वेद के अन्तर्गत नहीं माना जा सकता । यदि पृथक् उपदेश ११२
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दार्थपारिजाला वेदानां वेदं पित्र्यं राशि देवं निधि वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां देवजन-विद्यमेतद्भगवो s ध्ये ' ( छा ० उ ० ७।१।२ ) अत्रापि ऋग्वेदादिभ्यः सर्पविद्यादेवजनविद्ययो: पृथग् ग्रहणं विद्यते, तस्मात्त्व-त्या तयोर्वेदादन्यत्वमेव । सिद्धान्ते तु तयोर्वेदत्वेऽपि पृथगुपदेशो ब्राह्मणवशिष्ठन्यायेन वैशिष्टयाभिधित्सया न विरुद्धयते । किञ्च इतिहास पुराण - सर्पविद्या देवजनविद्यादिभिरपि ब्राह्मणं ग्रहीतुं शक्यते, पुराणादीनां त्वयापि ब्राह्मणविशेषत्वाङ्गीकारात् । सिद्धान्तेऽपि ' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् ' ( बु ० २ | ४ | १० ) इत्यत्र शाङ्करभाष्या-नुसारेण पुराणादयो ब्राह्मणविशेषा एवाङ्गीक्रियन्ते । यत्र तु निश्वसितत्वोक्तिर्नास्ति तत्रेतिहासपदेन रामायणमहाभारता-दिग्रन्थाः पुराणपदेन पाद्म - स्कन्द - शेव - भागवतादिग्रन्था गृह्यते । यथा - ऋग्वेदो यजुर्वेद इतिहास: पुराणं विद्या उप-निषद: ' ( श ०१४ | ६ | १०१६ ) । एतदभिप्रायेणैव प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहासपुराणानां प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ' ( ४ | १ | ६२ ) इति गोतमसूत्रे वात्स्यायनोक्तिः । तस्मान्नैतेर्वचनैर्ऋगादयो मन्त्रा एव वेदा इति सिद्धयति । यदुक्तम्- ' काञ्चिमायां कुर्यात् ' ( १० १३ | ३ | ३ | ११ ), ' कञ्चिदितिहासमाचक्षीत ' ( श ० १३/३/३/१२ ), ' किञ्चित्पुराणमाचक्षीत ' ( श ० १३ | ३ | ३ | १३ ) इत्यादावौपचारिको वेदप्रयोगः ' ( पृ ० १२३ ) इति, तदपि न युक्तम्, निर्मूलत्वात् प्रकरणातिक्रमे कारणाभावाच्च । अन्यथा ऋगादावप्यौपचारिक वेदत्वापत्तिः । यदप्युक्तम्- ' आचष्टे सर्वान् वेदान् ' ( ० १३३३/३/१५ ) इति कण्डिकायां सर्ववेदकथनेऽपि ब्राह्मणानां स्वरूपकथनाभावा तेषामौपचारि-कत्वेनापि वेदत्वं नास्तीत्युक्तं भवति ' ( पृ ० १२२ ) इति, तदपि निरर्गलम्, पुराणेतिहासरूपेणैव ब्राह्मणस्य गृहीत -होने पर भी इनको आप वेद मानते हैं, तो ब्राह्मणभाग को भी वेद मानने में आपको क्या परेशानी है? तब ब्राह्मण भाग भी उसी पद्धति से वेद क्यों नहीं माने जायेंगे । ' भगवन् मैं ऋग्वेद का अध्ययन करता हूँ, यजुर्वेद, सामवेद और चतुर्थ अथर्ववेद का मैं अध्ययन करता हूँ । इसी तरह से इतिहास - पुराण जिसका स्थान वेदों में पाचवा है, पित्र्य, राशि, देव, निधि, वाकोवाक्य, एकायन, cafer, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, देवजनविद्या इन सबका भी अध्ययन में करता हूँ ' इस छान्दोग्य उपनिषद् के वचन में भी ऋग्वेदादि से पृथक सर्पविद्या और देवजनविद्या का ग्रहण है । इसलिये आपकी पद्धति से इनकी वेदों से भिन्नता ही मानी जायगी । हमारे मत में तो इनको वेद मानते हुए भी इनके पृथक् उल्लेख का समाधान ब्राह्मणवशिष्ट न्याय के आधार पर उनकी विशिष्टता के प्रतिपादन के आधार पर किया जा सकता है, इस तरह से हमारे मत में यहाँ कोई विरोध नहीं उठ सकता । अपि च, इतिहास, पुराण, सर्पविद्या, देवजनविद्या इन शब्दों से भी ब्राह्मणग्रन्थों का ग्रहण हो सकता है । पुराणादि को आपने भी ब्राह्मणविशेष के रूप में ही स्वीकार किया है । हमारे मत में भी ' अस्य महतो ० ' इस बृहदारण्यक वाक्य के शांकर भाष्य के अनुसार पुराणादि को ब्राह्मण का ही विशेष भाग माना है । जहाँ पर निःश्वासभूत शास्त्र की चर्चा नहीं है, वहीं पर इतिहास शब्द रामायण - महाभारत प्रभृति ग्रन्थों तथा पुराण पद पास, स्कन्द, शेव, भागवत प्रभृति ग्रन्थों के अर्थ में प्रयुक्त माना जाता है । जैसे ' ऋग्वेद, यजुर्वेद, इतिहास, पुराण विद्या और उपनिषदें ' इस शतपसश्रुति में वर्णित इतिहास पुराण के लिये ' प्रमाणभूत ब्राह्मण ग्रन्थ इतिहास - पुराण की प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं ' गोतमसूत्र के व्याख्या के प्रसंग में वात्स्यायन की यह उक्ति है । इसलिये इस तरह के aar से केवल ऋगादि मन्त्र ही वेद है, यह बात किसी तरह से सिद्ध नहीं हो सकती । ' कांचिन्मायां कुर्यात्, कंचिदितिहासमाचक्षीत, किंचित् पुराणमाचक्षीत ' इन तीनों शतपथ वाक्यों के साथ, जैसा हम पूर्व में कह चुके हैं, वेदपद का औपचारिक प्रयोग है ' ( पृ ० १२२ ) यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक तो इस कथन का कोई आधार नहीं है और दूसरे प्रकरण का अतिक्रम कर औपचारिक व्याख्या करने का कोई कारण भी नहीं दिखाई पड़ता । अन्यथा ऋगादि में ativartin area की आपत्ति उठेगी । ' आचष्टे सर्वान् वेदान् ' इस af ण्डका में कहा गया है कि सब वेद कहे । यहाँ ब्राह्मणों का स्वरूप भी कथन नहीं किया गया और वास्तविक तथा औपचारिक भाव से वेद भी कह दिये । इसलिये ज्ञात होता है कि areas आदि ऋषि स्वप्न में भी ब्राह्मणों को वेद न मानते थे पृ ० १२२ ) | यह कथन भी निराधार है, क्योंकि यहाँ पर ब्राह्मण पुराण- इतिहास