वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 901–910
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 901–910
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पदाथपारिजातः ८७१ ' श्रुतिस्तु वेद विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ( मनु ० २1१० ) इत्यादिषु वेदसामीप्याद् वेदश्रुत्यादिशब्दप्रयोगं मनुते । ( पृ ० १०१ ), तन्निर्मूलमेव । ' अष्टौ सहस्राणि शतानि चाष्टावशीतिरस्यान्यधिकश्च पादः । एतत्प्रमाणं यजुषामृचां च सशुक्रियं सखिलं याज्ञवल्क्यम् ॥ ' ( ब्रह्माण्डपुराणपूर्वभागे ३५/७७ तथा वायुपुराणे ६१/६८ ), ' सर्वमभ्वन्तरेष्वेवं शाखाभेदाः समाः स्मृताः । ' ( वायुपुराण ६१।७४ ), ' ये ये श्रूयन्ते दिवं प्राप्ता ऋषयो ह्यूर्ध्वरेतसो मन्त्रब्राह्मणकर्तारः ', ' मन्त्रब्राह्मणकर्तारो जायन्ते हि युगक्षये । ' ( वायुपु ० ६१ १०२ ), ' भविष्ये द्वापरे चैव द्रौणिद्वैपायनः । वेदव्यासो हातीते " महातपाः ॥ भविष्यन्ति भविष्येषु शाखाप्रणयनानि तु । तस्मै तद्ब्रह्मणा ब्रह्म तपसा प्राप्तमव्ययम् ॥ ' ' कश्यपश्चैव वत्सारी ध्रुवो रैभ्य एव च । असितो देवलश्चैव षडेते ब्रह्मवादिनः ॥ ' ( वायु ० पु ० ५ ९ ११०३ ), अत्रिरचिः सनश्चैव श्यावाश्वश्चाथ विष्ठुरः । इत्येते चात्रयः प्रोक्ता मन्त्रकारा महर्षयः । ( वायुपुराणे ५ ९ ।१०४ ), ' वशिष्ठश्चैव शक्तिश्च तथैव च पराशरः । चतुर्थ इन्द्रप्रसृतिः पञ्चमस्तु भरद्वसुः ॥ षष्ठस्तु मंत्रावरुणः कुण्डिनः सप्तमस्तथा ॥ ' वा ० पु ० ५ ९ ।१०५ ), सुद्युम्नश्चाष्टमश्चैव नवमश्च बृहस्पतिः । दशमस्तु भरद्वाजो मन्त्रब्राह्मणकारकाः ॥ ( वा ० पु ० ५ ९ ।१३१ ) इत्युपर्युक्तैर्वचनै: शाखाभेदा ब्राह्मणानि खिलान्युपखिलानि च प्रतिकल्पमाविर्भवन्ति । स्वरूपतस्तु प्रजापती नित्यान्येव । ' वेदे खल्पपि पयोव्रतो ब्राह्मण: ' ( महाभाष्ये १ | १ | १ ) इत्यादिष्वनेकेषु स्थलेषु पतञ्जलिना ब्राह्मणे वेदपरप्रयोगात् स्पष्टं ब्राह्मणानां वेदत्वं सिद्धयति । महासाहसिकः सामाजिकस्तु वेदव्याख्यानरूपत्वेन ब्राह्मणे वेदशब्दप्रयोगं मन्वानस्तत्र मूलं किश्चिदनाकलयन् कथं न स्वीयं महासाहसिकत्वं ख्यापयन् उपहासास्पदं भवेत्? आर्यसमाजी विद्वान् दयानन्द के ग्रन्थों के प्रामाण्य की भी उपेक्षा करते हैं । दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में वेद, आम्नाय श्रुति प्रभृति शब्दों की वेद - बोधकता को माना है | इसके विपरीत भगवद्दस ( पु ० १०१ ) ' विविधाश्चोपनिषदी: ० I ' श्रुतिस्तु वेदो ० ' इत्यादि मनुस्मृति के वचनों को उद्धृत कर कहते हैं कि- '- वेद व्याख्यान होने से ये वेद के बहुत समीप है । इसीलिये इन्हें वेद या श्रुति कहा गया है ' ( पृ ० १०१ ) यह भी निर्मूल कथन है, क्योंकि ' अष्टी सहस्राणि ० ' इत्यादि ब्रह्माण्डपुराण और वायु-पुराणके वचन में ' ऋक्, यजुः, खिल, ब्राह्मण आदि को वेद मान करके ही उनकी संख्या का निरूपण किया है । ' सर्वमन्वन्तरेषु ' इत्यादि वायुपुराणादि के ऊपर उद्धृत वचनों में सभी मन्वन्तरों में शाखाभेद की बात कही गई है, ऊर्ध्वरेता दिवंगत ऋषियों को मन्त्र और ब्राह्मणभाग के कर्ता बताया गया है, युगक्षय अवस्था में मन्त्र ब्राह्मण भाग के कर्ता ऋषियों की उत्पत्ति बताई गई है, भविष्य काल में द्वापर में द्रोणपुत्र द्वैपायन वेदव्यास की उत्पत्ति और उनके द्वारा शाखाओं के भेदोपभेद के विस्तार की बात और इस ज्ञान की ब्रह्म से प्राप्ति की बात बताई गई है, कश्यप, वत्सार, मैध्रुव, रैभ्य, असित और देवल मे छः ब्रह्मवादी ऋषि माने गये हैं । अत्रि, अत्रि, सन, श्यावाश्च विष्ठुर, आदि अनिगोत्र के मन्त्रकार महर्षि वर्णित हैं और अन्त में वसिष्ठ, शक्ति, पराशर, इन्द्रप्रमति, भरद्वाज, मैत्रावरुण, कुण्डिन, सुद्युम्न, बृहस्पति, भरद्वाज ये दस मन्त्र ब्राह्मण भाग के द्रष्टा ऋषियों का वर्णन किया गया है । इन सब वचनों के प्रमाण पर शाखाओं के भेद, ब्राह्मण, खिल उपखिल आदि का प्रादुर्भाव प्रत्येक कल्प में होता है, यह ज्ञात होता है । ये सब स्वरूपतः प्रजापति में नित्य अवस्थित रहते हैं । व्याकरण महाभाष्यकार पतंजलि ' वेदे सत्यपि पयोव्रतो ब्राह्मणः ' इत्यादि उक्तियों के माध्यम से ब्राह्मण भाग को ही वेद के नाम से उद्धृत करते हैं और इससे स्पष्ट ही ब्राह्मण भाग की भी वेदता सिद्ध हो जाती है, किन्तु महासाहसिक आर्यसमाजी भगवद्दत्त ( १० १०२-१०४ ) कहते हैं कि वेद का व्याख्यान करने के कारण यहाँ पर ब्राह्मण भाग के लिये भी वेद शब्द का प्रयोग कर दिया गया है । ऐसा कहते समय अपनी बात के समर्थन में उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया । बिना प्रमाण के जबरदस्ती अपनी बात मनवाने का दुःसाहस करने वाले ऐसे व्यक्ति क्या उपहासास्पद नहीं है?
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I वेदार्थपारिजात यत्तु - ' ओमित्युचः प्रतिगः, एवं तथेति गाथायाः, ओमिति वै देवम्, तथेति मानुषम् ' ( ऐ ० ब्रा ० ७११८ ), ' अनृतं हि गाथा अनृतं नाराशंसी: ' ( काठकसंहिता १४१५ ), ' अनृतं मनुष्याः ' ( श ० १ | १ | १ | ४ ) अमुके यज्ञे गाथाया उत्तरे तथेति वदेत्, तथा मनुष्योऽस्तीदं ब्राह्मणेन स्वीकृतम् । ऋचाया: प्रतिपक्षे गाथाया उल्लेखात् परमेश्वरोक्तं ", मनुष्योक्ता गाथा | शतपथानुसारेण मनुष्याश्चानृतरूपाः । काठकसंहितानुसारेण गाथा नाराशंस्यश्चानृताः मानवीया इत्यर्थः । इमा एव पौरुषेय्यो गाथा ब्राह्मणग्रन्थेषूद्धृता: ( शतपथ ० १३/५/४/२, ३, ६,७, ९, ११ ) । लौकिक भाषास्वेवैमाः । एता यत्रोपलभ्यन्ते; तेषां ब्राह्मणानामवेदत्वमेव । ब्राह्मणानां वेदत्वेऽनृतगाथानामीश्वरकर्तृकत्वं मन्तव्यं स्यात्, तच्च ब्राह्मणविरुद्धमेव ' इति, तन्न युक्तम्, ब्राह्मणैस्तासां मनुष्यकर्तृकत्वोक्तेः ' इत्यादि, ( पृ ० १०४-१०५ ) तदेतत् सर्वं भगवद्दत्तस्याज्ञानविजृम्भितं प्रलपितमेव, पूर्वोक्तवचनानामभ्यार्थत्वात् । तथाहि - ' ओमिति ऋचः प्रतिगर: ' ( ऐ ० ब्रा ० ७ १८ ) इत्येतरेयवचनेनाध्वर्युणा प्रयोक्तव्यं प्रतिगरविशेषं दर्शयति-- ओमिति ऋच इति । होत्रा प्रयुक्ताया एकैकस्या ऋचोऽन्ते हिरण्यकशिपो हिरण्यकूर्चे वा तिष्ठतोऽध्वर्योः ओम् इत्येतादृशः प्रतिगरो भवति । एकैकस्या गाथायाश्चान्ते तथेति प्रतिगरः । वक्त्रा प्रोक्तस्यार्थस्याङ्गीकारवचनोऽन प्रतिगरशब्दः । अद्यत्वेऽपि कथानक श्रवणे श्रोतारोऽङ्गीकारार्थे ओमिति हूं इति मध्ये मध्ये वदन्ति । ओमित्येतच्छन्दोरूपं देवैरङ्गीकारार्थे प्रयुज्यते, तत्तथैति मानुषं मनुष्याङ्गीकारे तथेतिशब्दः प्रयुज्यते । नास्मिन् वाक्य ऋचां देवत्वं न ' वा गाथानां मानुषत्वमुच्यते । ओमिति प्रतिगरस्य देवत्वं तथेति प्रतिगरस्य मानुषत्वमुच्यते । तदेतत्सूत्रकारैरप्युच्यते । तदेतत् शौनःशेपाख्यानं परःशतग्गथमपरिमितं हिरण्यकशिपावासीनः प्रतिगृणाति - ओमित्यृचः प्रतिगरः, एवं तथेति गाथायाः, ओमिति वै मानुषम् । तथेति मानुषम् ' ( शाङ्खायनश्रौतसूत्रे १५।२७; कात्यायनश्रौतसूत्रे - १५११५४ ) | भगवद्दल आगे कहते हैं—- ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है ' ओमित्युच ० ' इत्यादि, पुनः काठक संहिता में कहा है- ' अमृतं हि गाथा ', और शतपथ में कहा है-- ' अनुतं मनुष्याः ' । इससे निश्चय होता है कि जो बात पूर्वोक्त ऐतरेय ब्राह्मण से स्पष्ट होती है, वही सिद्धान्त काठक संहिता से प्रकाशित किया गया है । ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है । अमुक यज्ञ में बैठकर गाथा के उत्तर में ' तथा ' कहे । यहाँ ' तथा ' मानुष है, यह स्वयं ब्राह्मण में स्वीकार किया गया है । ऋचा के प्रतिपक्ष में गाथा का उल्लेख स्पष्ट करता है कि जहाँ देवी ईश्वरीय है, वहा गाथा मनुष्योक्त है । शतपथ ब्राह्मण कहता है कि मनुष्य अनृत रूप है और काठक संहिता ने कहा है कि गाथा और नाराशंसी भी बनूत हैं, अर्थात् मानवीय हैं । ये ही पौरुषेय गाथाएँ ब्राह्मण - ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर उद्धृत की गई हैं । ये गाथाएं पूरी तरह से लौकिक भाषा में ही हैं । जिन ग्रन्थों में लौकिक भाषा वाली पौरुषेय गाथाएँ पाई जावें और पाई न जाएँ, किन्तु उद्धृत की गई हों, वे ग्रन्थ वेद अर्थात् ईश्वरीय नहीं हो सकते । यदि ब्राह्मण ग्रन्थों को वेद मानेंगे तो ब्राह्मणोद्धृत अनृत गाथाएँ ईश्वरकृत माननी पड़ेगी । यह बात ब्राह्मण के ही विरुद्ध है । ब्राह्मण तो गाथाओं को मनुष्यकृत कह रहा है, फिर ब्राह्मण को वेद मानना अपने ही अज्ञान का प्रकाश करना है ( पृ ० १०४ - १०५ ) | यह भगवद्दत्त का पूरा प्रतिपादन अज्ञान प्रयुक्त प्रतापमात्र है, क्योंकि इन वाक्यों का अर्थ कुछ दूसरा ही है । वस्तुतः ' ओमिति ऋचः प्रतिगरः ' इस ऐतरेय वचन में अध्वर्यु के द्वारा प्रयोग किये जाने वाले प्रतिगर विशेष का विधान है । होता के द्वारा प्रयुक्त एक एक ऋचा के अन्त में हिरण्यकशिपु अथवा हिरण्यकूर्च में बैठे अध्वर्यु ' को ' ओम् ' इस तरह का उच्चारण करना चाहिये और एक एक गाथा के अन्त में ' तथा ' शब्द का उच्चारण करना चाहिये । यहाँ पर वक्ता के द्वारा कहे गये वचन की स्वीकृति के अर्थ में, अर्थात् मैंने इस बात को या मन्त्र को सुन लिया, इसकी स्वीकृति अर्थात् सूचना के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । आज भी कहानी आदि सुनते समय श्रोतागण हम इस बात को सुन रहे हैं, इसकी स्वीकृति के लिये ' हूँ ' इस शब्द का उच्चारण बीच बीच में करते हैं । ' ओम् ' यह छन्दोरूप देवताओं के द्वारा स्वीकृति की सूचना में प्रयुक्त होता है और ' तथा ' यह शब्द मनुष्यों के द्वारा इस वाक्य में इस तरह से ऋचाओं का देवस्व अथवा मानुषत्व नहीं विहित हैं । ' ओम् ' यह देवताओं की स्वीकृति और ' ar ' यह मनुष्यों की स्वीकृति का सूचक शब्द है । यही बात श्रौतसूत्रकारों ने भी कही है ।
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८७३ शौनःशेपमाख्यायते ऋची गाथाभिश्च परःशता परःसहस्रा वा ओमिति ऋचः प्रतिगरः, तथेति गाथाया: ' ( आपस्तम्ब-श्री ० सू ० १८ / १ ९ ) । तदेतत्सर्वं किमर्थम्, किमर्थं च प्रतिगरभेद इत्याशङ्कां परिहरन्ती श्रुतिरेव वक्ति- ' ओमिति ऋचः प्रतिगरः, तथेति गाथायाः । ओमिति वै देवं तथेति मानवम् देवेन चैवैनं मानुषेण च पापादेनसः प्रमुञ्चति ( ऐ ० ब्रा ० ७ | १८ ) तेन देवेन मानुषेण च प्रतिगरेणाध्वर्युरेनं राजानमहिकादेनसोऽपकीर्तिलक्षणान्नरकहेतोश्च प्रमुवतिमुक्तं करोति । तस्मान्मानुषादैहिकाद् देवाच्च पापात् प्रमोकसिद्धयर्थं देवमानुषप्रतिगर विधानमिह दृश्यते । ' आम्नायस्य क्रियार्थ -त्वादानर्थक्यमतदर्थाताम् ' ( जै ० सू ० ११२ ११ ), ' विधिना वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः ' ( जे ० सू ० ११२/७ ) इति रीत्यार्थवादानां विध्यर्थस्तावकत्वेन स्वार्थ मानाभावात् । द्विविधपापप्रमोफलदैवमानुषप्रतिग र विधिन शेपत्वेन तत्रैव लक्षणया देवत्वमानुषत्ववोधकवाक्येऽपि तात्पर्यात् । तच्च ऋचो गाथायाश्च वेदत्वेऽपि प्रतिगरयो देवत्व-मानुषत्वाभ्यामुपपद्यते, समुच्चयविधित्सया मृत्युतरणामृतत्वसाधनयोरपि विद्याविद्ययोरन्यतमः प्राप्तिहेतुत्वोक्तियत् । ' अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः || ९ || ', ' अविधया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते || ११ || ' ( ईशावास्य ० ) इति मन्त्रवर्णेभ्यः । तेन नात्र गाथानां मानवत्वमुक्तम्, न वा तत्र तात्पर्यम्, विधिस्तुतौ तात्पर्यात् । श्रुतौ तु यथा ऋचां यजुषां साम्नां चाध्ययने यज्ञत्वसम्पत्तिरुक्का, तथैव ब्राह्मणेतिहासपुराणगाथादीना-मध्ययनेऽपि यज्ञत्वसम्पत्तिरुक्ता । तथाहि - ' यद्वृचोऽध्यगोषत ताः पय आहुतयो देवानामभवन्, यद्यजूंषि वृताहुतयो यत्सामानि सोमाहुतयो यदथर्वाङ्गिरसो मध्वाहुतयो यद्ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् गाथा नाराशंसी-' यह प्रकरण शोनःशेष आख्यान से संबद्ध हैं, जिसमें कि १०० ऋचाएँ और गाथाएँ है । हिरण्यकशिपु स्थान में आसीन अध्वर्यु East सुनता है और यह मन्त्र या गाथा मैंने सुन ली, इसकी स्वीकृति देता है- ' ओमित्युचः प्रतिगर: ' इत्यादि, ' शौनःशेप आख्यायते ' इत्यादि । ये वचन शांखायन श्रोतसूत्र, कात्यायन श्रौतसूत्र और आपस्तम्ब श्रौतसूत्र के है । यह सब किस लिये किया जाता है और यह प्रतिगर का उच्चारण किस लिये किया जाता है, इन्हीं सब बाशंकाओं का परिहार करने के लिये ऐतरेय श्रुति स्वयं ही कहती है कि ' ओम् ' यह ऋचा का प्रतिगर है और ' तथा ' यह गाया का, ' ओम् ' यह शब्द देवताओं से संबद्ध हैं और ' तथा ' शब्द मनुष्यों से । ऐसा करके अध्वर्यु दैव एवं मानुष पापों से अपने यजमान को भी मुक्त कर लेता है ' । अर्थात् देव और मानुष प्रतिगर का उच्चारण करके अध्वर्यु इस यजमान राजा को ऐहिक अपकीर्ति लक्षण पाप से और नरक लक्षण पारलौकिक पाप से मुक्त कर लेता है । इसलिये मानुष अर्थात् ऐहिक और देव अर्थात् पारलौकिक पाप से अपने यजमान को मुक्त करने के लिये देव और मानुष प्रतिगर का विधान यहाँ किया गया है । ' आम्नायस्य क्रियार्थस्वा ० ', ' विधिना वेंक ' इन सीमांसा सूत्रों के प्रमाण पर अर्थवाद वाक्यों का विनियोग farar at eafar के लिये किया जाता है, अतः उनका तात्पर्य अपने अर्थ में नहीं रहता । दैव और मानुष इन विविध पापों से छुटकारा दिलाने के लिये विहित देव और मानुष प्रतिगर विधि के अंग के रूप में ही देवत्व और मानुषत्व बोधक area में भी लक्षण से तात्पर्य का बोध हो जाता है । अर्थात् ऋचा और गाथा दोनों में वेदत्व की समान स्थिति रहने पर भी प्रतिगर में देवत्व और मानुष को उपपत्ति हो सकती है, जैसा कि कर्म और ज्ञान का समुच्चय करने की दृष्टि से मृत्युतरण और अमृतत्व साधन रूप faer और after इन दोनों को घोर अन्धकार में ले जाने वाले कारण के रूप में चित्रित किया गया है । ' वे व्यक्ति घोर अन्धकार में गिरते हैं, जो कि अविद्या की उपासना करते है । और जो विद्या की उपासना में निरत है, वे उससे भी अधिक गहन अन्धकार में गिरते हैं ', ' भविधा से मृत्यु को जीतकर विद्या से अमृतत्व को प्राप्त करते हैं ये ईशावास्य उपनिषद् के वचन इसमें प्रमाण हैं । इस सरह से यहाँ पर गाथाओं की मनुष्यकृतित्व का वर्णन नहीं है और न यहाँ पर उनका तात्पर्य ही इस अर्थ में बताया जा सकता है । श्रुति में जैसे ऋक्, यजु और साम के अध्ययन में यज्ञ करने के फल की प्राप्ति बताई गई है, उसी तरह से ब्राह्मण, इतिहास, पुराण, गाथा प्रभुति के अध्ययन में भी इसी फल की प्राप्ति वर्णित है । जैसे कि ' ऋग्वेद का जो अध्ययन किया, वह देवताओं के लिये दूध की आहुतियों के समान हुआ, यजुर्वेद का अध्ययन घृताहुति, सामवेद का अध्ययन सोमाहुति, अथर्ववेद का ११०
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८७४ वार्थपारिजातः दाहृतयो देवानामभवन् । ताभिः क्षुषं पाप्मानमपाघ्नन्नपहतपाप्मानो देवाः स्वर्गं लोकमायन् ब्राह्मणः सायुज्य-मृपयोगच्छन् इति ॥ ' ( ले ० आ ० २२ ९ | १ ) इति श्रुतिः । श्रुत्यर्थस्तु पाददद्धमन्त्रा ऋचस्ता अध्यगीषत त ऋषयोऽ-बीतवन्त इति यदस्ति ता अध्ययनक्रिया देवानां क्षीरद्रव्याहुतयोऽभवन् । तदाहुत्या या तुष्टिः सा तेषामृगध्ययनेन सम्पन्ना । एतदन्यत्रापि योज्यम् । अथर्वभिरङ्गिरोभिश्च दृष्टा मन्त्रा अथर्वाङ्गिरसः । ब्राह्मणानि कर्मचोदताः ' वायव्यं श्वेतमानभेत ' ( तै ० सू ० २1१1१1१ ) इत्यादय: । ' देवासुराः संयत्ता आसन् ' इत्यादय इतिहासाः | ' आत्मा वा इदमेक एवा आसीत् नान्यत्किवन मिषत् ' इत्यादीनि सृष्टिप्रतिपादकानि पुराणानि । कल्पाः प्रयोगप्रतिपादकानि वाक्यानि । गाथा गायति चोदिता मन्त्रविशेषायो s स्य कौष्ठ्य स्यादयः, यमगाथाभिः परिगायतीति विधानात् । नराशंसपदो-पेता नाराशंस्यो ' होता यक्षन्नराशंसम् ' इत्याद्याः । मन्त्रब्राह्मणान्तः पठितानामपि पुनरुक्तिः फलातिशयद्योतनार्था । मेयो मांसाहुतयः । ताभिराहुतिभिर्देवाः क्षुद्रूपं पाप्मानं विनाशितवन्तः । स्वाध्यायजम्यतृप्त्या क्षुधं विस्मृतवन्तः । ततः क्षुद्रूपपापरहिता देवाः सुखमनुभवितुं स्वर्गं गताः । ऋषयश्च पूर्वोक्ता अध्ययनेन ब्रह्मयज्ञेन जगत्कारणस्य ब्रह्मणः सायुज्यं प्राप्ताः । ब्रह्मज्ञानोत्पादनद्वारा मुक्तिहेतुत्वं ब्रह्मयज्ञस्य युक्तम् । अत एव ज्ञानसाधनेषु प्राथम्येन वेदानु-वचनं वाजसनेयिनः समामनन्ति | ' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन ' ( बृ ० ४/४/२२ ) इति । वस्तुतो गाथानां मानुषवं तु निरुक्तविरुद्धम् । ' तत्र ब्रह्मेतिहाममिश्र मिश्रं गाथामिश्रं भवति ' ( ४ | ६ नि ० ) । तदर्थस्तु तत्र तस्मिन् ' त्रितः कूपेऽवहितो देवान् हवत ऊतये ' ( ऋ ० सं ० १११०५ १७ ) इत्येवमादिसूते ब्रह्मेतिहासमिममिश्रं च भवति । पुनरितिहासश्च ऋग्बद्धो गाथावश्च भवति । यदुक्तम्- तेषां ' गाथेति पारिभा arrer मधु की आहुति और ब्राह्मण, इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा, नाराशंसी का अध्ययन मेदाहुति के समान है । इन आहुतियों से क्षुधा और पापों का नाश हो जाता है । देवता पापों के नष्ट हो जाने से स्वर्ग लोक में आ गये और वेदों के अध्येता ऋषिगणों ने ब्रह्मा से सायुज्य को प्राप्त कर लिया । इस श्रुति का विवरण इस प्रकार है -- पादों में free es ऋक् कहलाते हैं, इन ऋचाओं का earer ऋषियों ने किया । यह अध्ययन देवताओं के लिये क्षीर द्रव्य की आहुति के समान तृप्तिकर हुआ, अर्थात् क्षीर द्रव्य की आहुति से जो उनको तृप्ति होती, वह तृप्ति उनको ऋचाओं के अध्ययन से प्राप्त हो गई । इसी तरह से यजु और साम के संबन्ध में भी इसी तरह का अभिप्राय समझता चाहिये । अथर्व और अंगिरा प्रभृति के द्वारा परिदृष्ट मन्त्रसमुदाय अथर्वागिरस कहलाता है । कर्म का विधान करने वाले वाक्य ब्राह्मण कहलाते हैं, जैसे कि ' वायव्यं श्वेतमालभेल ' इस तरह के वाक्य । ' देवासुरा संयत्ता आसन् ' इस तरह के वाक्य इतिहास कहलाते हैं । ' आत्मा वा ' इत्यादि सृष्टि प्रभृति के प्रतिपादक वाक्य पुराण कहलाते हैं । प्रयोगों को स्पष्ट करने वाले वाक्य करुप कहलाते हैं । ' यमगाथाभिः परिगायति ' इस तरह से गायति क्रिया से बोदित ' योऽस्य कोष्ठ्यः ' इत्यादि वाक्य या कहलाते हैं । ' नराशंस ' इस पद से युक्त ' होता यक्षत्रराशंस ' इस तरह के वाक्य ' नाराशंसी ' कहलाते हैं । इन सबका पाठ मन्त्र-भाग या ब्राह्मणभाग में ही मिलता है, तो भी इनका अलग से वर्णन इनके पाठ से अतिशय फल प्राप्त होता है, इस बात को दिखाने के लिये हैं । मेदाहुति का अर्थ मांसाहृति है । इन आहुतियों से देवताओं की क्षुधारूपी पाप - समुदाय से मुक्ति हो गई और इस वेदादि के स्वाध्याय से जो उनकी तृप्ति हुई, उसके आगे वे क्षुधा को भूल गये । तब क्षुधा रूप पाप से मुक्त होकर देवगण सुख का अनुभव करने के लिये स्वर्ग गये और ऋषिगण पूर्वोक्त अध्ययन अर्थात् ब्रह्मयज्ञ का अनुष्ठान कर जगत् के कारण ब्रह्म से सायुज्य को प्राप्त कर लिया । ब्रह्मज्ञान की उत्पत्ति के द्वारा ब्रह्मयज्ञ की मुक्ति को कारणता उचित ही है । इसी लिये वाजसनेयी शाखा के अध्येतागण ज्ञान के साधनों में प्रथम स्थान वेदानुवचन को देते हैं --- ' इस ब्रह्म को ब्राह्मण वेद का स्वाध्याय कर जानना चाहते हैं और इसके लिये यज्ञ, दान और अनश्वर तव का भी अनुष्ठान करते हैं । गाथाओं को मनुष्यों की रचना मानना निरुक्त के भी विरुद्ध है । वहीं पर कहा गया है कि- ' तत्र ब्रह्मेतिहास ' इत्यादि । इसका अर्थ यह है कि ' त्रितः कूपे ० ' इत्यादि ऋङ मन्त्रों में इतिहास और गाथाओं का मिश्रण है । यहाँ ऋचाओं में और गाथाओं में दोनों में इतिहास भी निवद्ध मिलता है । यहाँ पर भगवद्दत्त का -- ' कुछ मन्त्र ऐसे हैं, जिनकी पारिभाषिक संज्ञा
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वेदार्थपारिजातः 20 % षिक संज्ञेति, ( पृ ० १०६ ) तत्तु निर्मूलम्, दुर्गाचार्यादिभिस्तथाऽव्याख्यानात् । यदुक्तम्- ' यथा श्लोकशब्दो लोके मन्त्रे चोपलभ्यते लोके वेदे च गाथाशब्दो लभ्यते ' ( पृ ० १०६ ), तत्तु नास्मत्प्रतिकूलम्, सिद्धान्तेऽपि गाथाशब्दस्य मन्त्र ब्राह्मणे लोके पुराणेतिहासेषु च प्रयोगाभ्युपगमात् । न तावतापि मन्त्रब्राह्मणगतगाथानां मानुषत्वं पौरुषेयत्वं च सिद्धयति । तत्र नाराशंस्यः पौरुषेय्यो यज्ञगाथाः, गाथा आत्मवादश्लोकाः, पुरुषकृता एव गाथा इत्यन्ये । ' अत्र गाथा ' वायुगीताः कीर्तयन्ति पुराविद: ' ( म ० ९ १४२ ) अत्र गाथाशब्दो वृत्तविशेषवचनः । यथोक्तं पिङ्गलेन ' अत्रासिद्ध गाथेति ' | ' अविगीताः परम्परागताः श्लोका अध्युच्यन्ते ' इति मेधातिथिः । वचनानि तु पुराणादिप्रसिद्धगाथाभिप्रायेन वोक्तानि । तद्यथा- ' अपि चेयं पुरा गीता गाया सर्वत्र विश्रुता । मनुना मानवेन्द्रेण तां श्रुत्वा मे वचः कुरु ॥११ ॥
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । कामचारप्रवृत्तस्य न कार्यं ब्रुवतो बचः || १२ || ( वाल्मीकीय रामायणे पश्चिमो तरशाखीये s योध्याकाण्डे २५ ), ' अत्र गायाः कीर्तयन्ति पुराकल्पविदो जनाः । अम्बरीषेण या गीता राज्ञा राज्य प्रशासता || ४ || समुदीर्णेषु दोषेषु बाध्यमानेषु साधुषु । जग्राह तरसा राज्यमम्बरीष इति श्रुतिः || ५ || ( म ० भा ० आश्व ० ३२, पृ ० १०७ ) इत्यादिका गाथा: पौरुषेय्यो मानुष्योऽभ्युपेयन्त एव । ब्राह्मणगतगाथाभिप्रायस्तु -- ' गाथाशब्देन ब्राह्मणगता ऋच उच्यन्ते । यज्ञार्थ गाथा यज्ञगाथा: ' इत्या-श्वलायनश्रौतसूत्रे ( ५१६ ) स्थले तट्टीकाकृन्नारायणः ( पृ ० १०८ ) । ' गाथा नाम ऋग्विशेषा: ' इत्याश्वलायनगृह्यसूत्रे ( ३/३११ ) स्थले स एव । निकषग्रावणि चायमेव सिद्धान्तः शुद्धः स्थिरश्च । पूर्वोक्तनिरुक्तानुसारेण मन्त्रा अपि गाथा भवन्ति । तथा च सायणः स्वीये तैत्तिरीयारण्यकभाष्ये ( २२ ९ ) स्थले व्याचष्टे ' गाथा मन्त्रविशेषाः ' इति । गाथा है ' ( पृ ० १०६ ) यह अर्थ सर्वथा निर्मूल है, क्योंकि दुर्गाचार्य प्रभूति ने वहां पर ऐसी कोई व्याख्या नहीं की है । ' जैसे श्लोक शब्द साधारण श्लोक के लिये भी प्रयुक्त होता है और वेद मन्त्रों के लिये भी प्रयुक्त होता है, वैसे ही गाथा शब्द का भी द्वयर्थक प्रयोग है ( पू ० १०६ ) यह बात हमारे मत के प्रतिकूल नहीं है, क्योंकि गाथा शब्द का मन्त्र, ब्राह्मण, लोक, पुराण, इतिहास इन सबमें एक ही अर्थ में प्रयोग होता है, ऐसी हमारी मान्यता है ही, किन्तु इससे मन्त्र और ब्राह्मण भाग में विद्यमान गाथानों को किसी तरह से मनुष्यकृत अर्थात् पौरुषेय नहीं सिद्ध किया जा सकता । ' पौरुषेय यज्ञ की गाथाएँ नाराशंसी कहलाती है, आत्मप्रशंसा परक श्लोक गाथाएँ कहलाती हैं, कुछ लोगों के मत से गाथाएँ मनुष्यकृत होती है ' | ' अत्र गाथा ' इत्यादि मनुस्मृति के श्लोक में गाथा शब्द वृत्तविशेष का बोधक है । जैसा कि पिंगल ने कहा है -- जो यहाँ सिद्ध न हो उसको गाथा कहा जाता है । ' अविगीत परम्परागत श्लोक गाथा कहलाते हैं यह मेघातिथि का कथन है । ( पु ० १०७ ) ये सब वचनं पुराणादि में प्रसिद्ध गाथा शब्द के लिये कहे गये है । जैसा कि वाल्मीकीय रामायण में मिलता है - ' यह पुराने समय से चली आ रही गाथा सब जगह सुनने को मिलती है, जिसको कि सबसे पहले मानवेन्द्र मनु ने गाया था कि यदि गुरु भी गर्वोन्मत्त हो जाय, कार्याकार्य का विचार न करे ओर मनमाना आचरण करने लगे, तो उसकी बात नहीं मानना चाहिये ' | इसी तरह की गाथाएँ महाभारत अश्वमेधिक पर्व में भी मिलती हैं- ' पुराकल्प के बेक्षा विद्वान् राजा अम्बरीष के द्वारा राज्य का शासन सम्यगु रूप से चलाते समय गाई गई कुछ गाथाओं को सुनाते हैं । उनमें कहा गया है कि प्रजा में दुर्गुणों की अभिवृद्धि होने पर और साधु जनों के पीडित किये जाने पर अम्बरीष ने पूरी शक्ति से सारे शासन की बागडोर को कड़ाई से अपने आप संभाल लो ' | इस तरह की गाथाओं को तो हम पौरुषेय अर्थात् मनुष्यनिर्मित मानते हैं । arrearer श्रीसूत्र के टीकाकार नारायण ब्राह्मणगत गाथा का अभिप्राय बताते हुए कहते हैं कि ' गाथा शब्द से ब्राह्मणगत मन्त्रों का बोध होता है और यज्ञ - गाथा शब्द का अर्थ है यज्ञ के लिये गाई गई गाथा, अर्थात् ऋचाएँ । आश्वलायनगृहा सूत्र ' की व्याख्या करते हुए वे ही कहते हैं कि ' गाथा ऋग्विशेष को कहते हैं । ( पृ ० १०८ ) परीक्षा की कसौटी पर यही सिद्धान्त शुद्ध और स्थायी उतरता है । उक्त उद्धृत निरुक्त वचन के अनुसार मन्त्र भी गाया कहलाते है । इसी तरह की व्याख्या तैत्तिरीयारण्यक के भाष्य में सायण ने भी की है- ' गाथा मन्त्रविशेष कहे जाते हैं ' ( पृ ० १०८ ) ।
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८६ बेवार्थपारिजातः तत्र पुराणेतिहासादिगतानां मानुषीत्वेऽपि न मन्त्रब्राह्मणगतानां गाथानां पौरुषेयत्वं सिद्धयति । यथा पुराणादिगतानां श्लोकानां पौरुषेयत्वेऽपि न मन्त्रगतानां श्लोकानां पौषयत्वमिति तद्वत् । ब्राह्मणप्रसङ्गे गाथाशब्देन ब्राह्मणरूपाणां गाथानामपि ग्रहणं युक्तमेव । यदुक्तम्- ' अनृतं मनुष्याः ' ( श ० १ | १ | १ | ४ ) इति शतपथे मनुष्याणामनृतत्वमुक्तम् ' ( पृ ० १०५ ) इति, तदपि तुच्छम् त्वन्मते देवानामपि मनुष्यत्वाविशेषान्मन्त्राणामपि मानुषत्वापत्तेः । यथा च मानुषत्वेन ' अनृतं हि गाथाऽनृतं नाराशंसीः ' ( काठकसंहिता १४ ( ५ ) इति मानुषत्वेन गाथादीनामनृतत्वम्, तथैव मन्त्राणामप्यनृतत्वापत्तिः, ' विद्वांसो वे देवा: ' इति प्रमाणेन ऋग्वेदभूमिकास्वनेकत्र दयानन्देन विदुषां मनुष्याणामेव देवत्वाम्युपगमात् । सिद्धान्ते तु ' द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति सत्यं चैवानृतं च । सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्याः ' ( श ० ब्रा ० १ | १ | १ | ४ ) । अत्र सायणः -- यद् इदं जगत् तत्सर्वमनृतं सत्यं वेति कोटिद्वयमेव न तृतीया कोटिरस्ति । सत्यमेव देवाः, चिरावस्थानात् नियमेन सत्यवादित्वाद्वा । अनृतं मनुष्याः स्वप्नदृष्ट्वदल्पकालावस्थानात् प्रायेणानृतवादित्वाद्वा । तथा च सत्यानृत-वादित्वमेतरेय केऽप्याम्नातम् --- ' सत्यसंहिता वै देवा अनृतसंहिता मनुष्याः ' ( ऐतरेय ब्राह्मण १।६ ) | सत्यानृतवदन-साहित्यं हि तत्र विवक्षितोऽर्थ: -- ' तस्माद्दीक्षितेन सत्यमेव वदितव्यम् ' ( ऐतरेय ब्राह्मण १।६ ) । तत्रास्य सायणेनेत्य-मर्थोऽनुवर्णितः- देवा एव सत्य संहिताः सत्ये तात्पर्यवन्तः । मनुष्यास्तु प्रायेण अनृते तात्पर्यवन्त इति । यदुक्तम् --- ' यद्ब्रह्मणः शमलमासीत् सा गाथा नाराशंस्यभवत् । यद्वेदस्य मलमासीत्तदेव गाथा वारा-शंस्यभवत् ' ( पृ ० १०५ ) इति, तदपि तुच्छस्, तस्य प्रतिग्रहनिषेधार्थपरत्वेन निन्दायां तात्पर्यात् । ' देवा वै ब्रह्मणश्चा-न्नस्य शमलमपाघ्नन् । यद्ब्रह्मणः शमलमासीत् सा गाथा नाराशंस्यभवत् । यदन्नस्य सा सुरा ' ( तै ० ब्रा ० १।३।२२६ ) इस परिस्थिति में पुराण- इतिहास आदि के ग्रन्थों में उपलब्ध गाथाएँ यद्यपि पौरुषेय हैं, किन्तु मन्त्र ब्राह्मणभाग गत गाथाएँ उन्हीं के उदाहरण से पौरुषेय नहीं सिद्ध की जा सकतीं । जैसे कि पुराणादिगत श्लोकों के पौरुषेय होने पर भी मन्त्रगत श्लोकों की पौरुषेयता नहीं सिद्ध हो सकती । ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रसंग में आये गाथा शब्द से ब्राह्मण रूप गाथाओं का ही ग्रहण हो, यह उचित ही है । ' शतपथ ब्राह्मण में मनुष्यों को अमृत कहा गया है ' ( पृ ० १०५ ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि आपके मत से तो देवता भी मनुष्य ही हैं, अतः मन्त्रों की भी पौरुषेयता ही माननी पड़ जायगी । जैसे मनुष्यनिर्मित होने से गाथा और नाराशंसी अनृत है, उसी तरह से मनुष्यनिर्मित होने से मन्त्रों की भी अनुसता माननी पड़ेगी, क्योंकि आप देवताओं को भी मनुष्य मानते हैं । ' विद्वांसो मैं देवा: ' इस वचन के प्रमाण के आधार पर ऋग्वेदभाष्यभूमिका में अनेक स्थलों पर स्वामी दयानन्द ने विद्वान् मनुष्यों को ही देवता माना है । सिद्धान्त में तो पूरा शतपथ ब्राह्मण का वाक्य इस प्रकार से है - ' द्वयं वा ० ' इत्यादि । इसका सायणसंमत अर्थ है ' यह सारा जगत् सत्य है या अनृत, इन दो कोटियों में हो बढा हुआ है । इसमें कोई तीसरा विकल्प नहीं हो सकता । इनमें देवगण सत्य इसलिये हैं कि उनकी स्थिति चिरकाल पर्यन्त रहती है, अथवा वे नियमपूर्वक सत्य ही बोलते हैं । मनुष्य अनूत इसलिये हैं कि वे सपने में देखी वस्तु की तरह बहुत थोड़ी देर के लिये रहते हैं, अथवा प्रायः अनृतभाषी होते हैं । मनुष्यों और देवों का इसी तरह का वर्णन ऐतरेय ब्राह्मण में भी मिलता है --- ' देवगण सत्य प्रतिज्ञा वाले और मनुष्य असत्य प्रतिज्ञा वाले होते हैं । इसका अभिप्राय यह हैं कि देवगण सत्य वचन से और मनुष्य असत्य वचन से अपना लगाव रखते हैं । ' इसलिये दीक्षित व्यक्ति को सच ही बोलना चाहिये ' इस ऐतरेय वाक्य का सायण ने यह अर्थ किया है- ' देवगण ही सत्यसंहित, अर्थात् सत्य में अपना अभिप्राय रखते हैं । इसके विपरीत मनुष्यों का अभिप्राय प्रायः असत्य में रहता है ' । ' यद् ब्रह्मण: ' इत्यादि तैत्तिरीय ब्राह्मण के वचन को उद्धृत करके जो यह कहा गया है कि जो यह भी गलत है, क्योंकि उक्त वाक्य प्रतिग्रह ( दान ) का निषेध वेद का मल था, वह गाथा, नाराशंसी बन गया ' ( पृ ० १०५ ) करता है, अत: इस aa art at a निन्दा में तात्पर्य है ।यहाँ का पूरा प्रसंग इस प्रकार है --- ' देवा वै. ' ' सा सुरा इति ' । इसका सायण से यह अर्थ
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बेदार्थपारिजातः II इति । अत्र सायणः - कञ्चित् प्रतिग्रहनिषेधं विधित्सुः प्रस्तौति देवा इति । ब्रह्मणो वेदस्य शमलं मलिनभागम्, अपघ्नन् अपनीतवन्तः । नराणां राजामात्यादीनामासमन्तान् प्रशंसनं नराशंसस्तद्विषया गीर्नाराशंसी । प्रतिग्रहनिषेध विधत्ते --- तस्माद् गायतश्च मत्तस्य च न प्रतिगृह्यम् । यत्प्रतिगृह्णीयात् शमलं प्रतिगृह्णीयात् । सन्तुष्यतु दुर्जनन्यायेन निन्दापरत्वेऽपि मानुषमलिनभागस्यापि यथा मानुषत्वमेवमेव वेदमलिनभागस्यापि वेदत्वमेव सिद्ध्यति नावेदत्वम् । प्रकृते च ब्रह्मणः शमलमिति स्पष्टमुक्तम् । न च ब्रह्मणि वेदे युष्माभिः शमलमभ्युपेयते, तथात्वे ब्रह्मणो वेदस्याप्रामाण्यापत्तिः । तस्मादर्थवादत्वा-चास्य वचनस्य वैदिकमन्त्रब्राह्मणगतानां गाथानां नाराशंसीनां शमलत्वप्रतिपादने तात्पर्यम्, किन्तु लौकिकानां राजा-मात्यादीनां समन्तात् प्रशंसनं नराशंसस्तद्विषया नाराशंसीस्तादृशीनामेव गाथानां निन्दने तात्पर्यम्, तस्मान्मनुष्य-विषयगान स्तुतिपरस्य सुरापानमत्तस्य प्रतिग्रहनिषेधतात्पर्यमङ्गीकार्यम् । अन्यथा-- ' ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः । सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनि: || ' ( म ० ४।१२४ ) इति वचनेन यजुर्वेदस्य मानुषत्वमेवोक्तम् । तेन यजुर्वेदस्य मानुषत्वेन पौरुषेयत्वमाधुनिकत्वं चायाति । नैतावदेव, सामवेदध्वनेरशुचित्वप्युक्तम् । तेन सामवेदस्य शमलत्वमिवाशुचित्वमुक्तम् । तेन त्वद्रीत्या सामवेदस्यापि लौकिकत्वं सिद्धयति । वस्तुतस्तु ' सामध्वनी ऋग्यजुषी नाधीयीत कदाचन । वेदस्याधीत्य वाप्यन्तमारण्यकमधीत्य च ॥ ' ( म ० ४११२३ ) इति पूर्ववचनस्यार्थवादोऽयम् । ' नात्र तदीयस्य ध्वनेरशुचित्वं परमार्थतो विज्ञेयम्, किन्तहि यथाऽशुविसन्निधाने नाध्येतव्यमेवं तत्सन्निधान इति सामान्य-मशुचित्वावलम्बनम् ' इति मेधातिथिभाष्यम् । किया है - ' प्रतिग्रह का निषेध करने के अभिप्राय से कोई कहता है --- देवताओं ने ब्रह्म अर्थात् वेद के मलिन भाग को नष्ट कर दिया । नर अर्थात् किसी राजा या उसके अमात्य प्रभृति मनुष्यों की सब तरह से प्रशंसा नराशंस कहलाती है । नराशंस करने वाली वाणी नाराशंसी कहलाती हैं । प्रतिग्रह के निषेध का विधान इस वाक्य से किया जाता है --- इसलिये गाने वाले और मत्त व्यक्ति का दान नहीं लेना चाहिये । जो दान लेता है वह उसके पाप को ले लेता है । यहाँ पर यद्यपि निन्दापरक area का कोई स्वार्थ में तात्पर्य नहीं है, तो भी ' तुष्यतु दुर्जन: ' इस न्याय के अनुसार यदि स्वार्थ का ग्रहण किया भी जाय, तो मनुष्य के मलिन भाग को भी जैसे मनुष्य ही कहा जायगा, उसी तरह से वेद के मलिन भाग को भी वेद ही माना जायगा, वह उससे भिन्न किसी दशा में नहीं माना जा सकता । प्रकृत स्थल में गाया, नाराशंसा को वेद का ही मलिन भाग कहा गया है । वेद अर्थात् ब्रह्म में मलिनता को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर ब्रह्म अर्थात् वेद का अप्रामाण्य हो जायगा | इसलिये अर्थवाद वाक्य होने से इस वचन का तात्पर्य वैदिक मन्त्र ब्राह्मण गत गाथा और नाराशंसी की सफलता के प्रतिपादन में नहीं है, किन्तु लोकिक राजा, मन्त्री आदि की सब तरह से प्रशंसा करने वाली नाराशंसी गाथाओं को निन्दा करने में है । इसलिये उसका यहाँ यह तात्पर्य लेना चाहिये कि जो व्यक्ति मनुष्यों को प्रशंसा में गाथा गाने में लगा हुआ है और सुरापान कर मदमत्त हो जाता है, उससे दान नहीं लेना चाहिये । अन्यथा-- ' ऋग्वेद के देवता देव, यजुर्वेद के मनुष्य और सामवेद के पितृगण देवता हैं । इसलिये सामवेद की sa नि अशुचि मानी जाती है ' इस मनुस्मृति के वचन के अनुसार यजुर्वेद मानुष माना गया है, अतः यजुर्वेद की मानुषता के आधार पर पौरुषेयता और आधुनिकता भी सिद्ध हो जायगी । इतना ही नहीं, यहाँ पर सामवेद की ध्वनि को अशुचि भी माना गया है । इस तरह से सामवेद केवल समल ही नहीं, अशुचि भी हो जाता है । इस तरह से आपकी व्याख्यान, पद्धति अनुसार सामवेद भी लो for fia हो जायगा । वस्तुतस्तु मनुस्मृति में इसके पहले के श्लोक में बताया गया है कि ' जब सामवेद की ध्वनि हो रही हो, उस समय ऋग्वेद और यजुर्वेद का पाठ न करे । इस वेद के अन्तिम भाग का अध्ययन करके अथवा आरण्यक का उच्चारण करने के बाद ही इनका अध्ययन करें । इस पूर्ववश्व का यह अर्थवाद वाक्य है | इसका तात्पर्य परमार्थतः सामवेद की ध्वनि की अशुचिता में नहीं है, किन्तु जैसे अशुचि पदार्थ को संनिधि में वेद का अध्ययन नहीं किया जाता, उसी तरह से यहाँ पर भी समझना चाहिये । इस तरह से यहाँ पर सामान्य अशुचिता का ही विधान मनुभाष्यकार मेधातिथि को स्वीकार्य है ।
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II बंदा पारिजातः इतिहासपुराकल्पादयो ब्राह्मणानि भवन्तीत्यत्र न विवादः शङ्करभगवत्पादैरपि ' अस्य महतो भूतस्य ' ( बृ ० २/४/१० ) इति श्रुतिव्याख्यानावसरे तथैवोक्तत्वात् । तथापि ब्राह्मणातिरिक्तान्यपीतिहासपुराणानि नापलपितु-मर्हाणि । वात्स्यायनेन - ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ' ( न्यायभाष्य ४ | १ | ६२ ) इती. तिहासपुराणादीनां प्रामाण्यव्यवस्थापनात् । नहि ब्राह्मणेनैव ब्राह्मणस्य प्रामाण्यं व्यवस्थापयितुं युक्तमित्युक्तमन्यत्र प्रकरण sea ग्रन्थे विस्तरात् । ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' ( आपस्तम्बश्रौतसूत्रे २४/१/३१; सत्याषाढश्रौतसूत्रे १1१1७, कात्यायन. परिशिष्ट प्रतिज्ञासूत्रे १; बौधायनसूत्रे २/६/३ च ), ' मन्त्रब्राह्मणं वेद इत्याचक्षते ' ( वोधायन गृह्यसूत्रे २।६।३६ ); बौधायनधर्मसूत्रे २६१७ च ) ' आस्ताय: पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च ' ( कौ ० सू ० ११३ ) इत्यादिभिरार्षेः सूत्रमनुव्यासजैमि निशबरवचनैश्च मन्त्राणां ब्राह्मणानां च वेदत्वसिद्धेः । ब्राह्मणभागस्य मानुष्यत्वोक्तिनिष्प्रमाणत्वात् प्रायश्चित्तार्हेव! यत्तु -- ' श्रीतसूत्रजन्मदातृभिर्ब्राह्मणैरेव ब्राह्मणानामवेदत्वमुक्तम्, तदा कल्पसूत्राणां कि मूल्यम् ( पृ ० १११ ) इति, दपि मिथ्याभाषणमेव, ब्राह्मणानामवेदत्वप्रतिपादक ब्राह्मणवचनानामभावात्, ' सर्वे वेदा: सब्राह्मणा ' ( गोपथ-ब्राह्मणे ११२ / ९ ) इत्यनेन तत्साधनं तु तदर्थाज्ञानमूलकमित्युक्तमेव । अन्यथा ' तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् ' ( ऋ ० सं ० १० १ ९ ०१ ९ ) इति छन्दसः पृथगृगादीनां कथनेन तेषां छन्दोभिन्नत्वसिद्धेः । ' इतिहासो वेद: ' ( श ० १३/४/३/१२ ), ' पुराणं वेद: ' ( श ० १३ | ४ | ३ | १३ ) इत्यादिवचनं नौपचारिकम्, किन्तु ब्राह्मणरूपाणां पुराणेतिहासादीनां भगवन्निःश्वसितत्वेन ऋगादिमन्त्राणामिव वेदस्वानपायात् । ' श्रुतिश्च द्विविधा - वैदिकी, तान्त्रिकी च ' इति ( म ० २११ ) इत्यत्र कुल्लूकभट्ट: । ' सौत्रेषु वैदिकेषु च मन्त्रेषु ' इति सत्याषाढ-इतिहास, पुराकल्प प्रभूति ब्राह्मणभाग के ही अन्तर्गत आते हैं, इस बात में कोई विवाद हम नहीं मानते । भगवत्पाद आचार्य शंकर ने ' अस्य महतो भूतस्य ० ' इस बृहदारण्यक श्रुति की व्याख्या करते समय ऐसा ही कहा है । तथापि ब्राह्मणभाग के अतिरिक्त श्री इतिहास - पुराण हैं, इसका अपलाप नहीं किया जा सकता । वात्स्यायन ने न्यायभाष्य में ' प्रमाणभूत ब्राह्मण वाक्य इतिहास पुरा ग की प्रामाणिकता का प्रतिपादन करते हैं । इस तरह से इतिहास - पुराण का प्रामाण्य स्वीकार किया है । ब्राह्मण वाक्य ही ब्राह्मण भाग के प्रामाण्य को सिद्ध करने में किसी तरह से समर्थ नहीं हो सकते, इस बात को हमने इसी ग्रन्थ में अन्यत्र विस्तार से समझाया है । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, सत्याषाढ श्रौतसूत्र, कात्यायनपरिशिष्ट स्थित प्रतिज्ञासूत्र और बोधायनसूत्र में मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को वेद माना है । बौधायन गृह्यसूत्र में कहा गया है कि मन्त्र और ब्राह्मण को वेद कहा जाता है । बौधायन धर्म सूत्र में ' जायमानो ब्राह्मण: ' इत्यादि ब्राह्मण वाक्य को उद्धृत कर बताया गया है कि इस प्रमाण को वेद शब्द से व्यवहृत किया गया है । कोशिक सूत्र में कहा गया है कि मन्त्र और ब्राह्मण दोनों आम्नाय अर्थात् वेद कहे जाते हैं । इस प्रकार अनेक आर्ष सूत्रों के और मनु, व्यास, जैमिनि, शबरस्वामी प्रभूति के वचनों के प्रमाणों से मन्त्र और ब्राह्मण उभय भागों को जब वेद माना गया है, तो इस परिस्थिति में ब्राह्मण भाग को मनुष्य निर्मित मानना, प्रमाण रहित होने से प्रायश्चित्त योग्य ही है । ' श्रीसूत्रों का जन्मदाता जब ब्राह्मण स्वयं कह चुका है कि वह वेद नहीं, तो कल्पसूत्रों के इन स्मार्तं प्रमाणों का क्या मूल्य हो सकता है ' ( पृ ० १११ ) यह कथन भी मिथ्या है, क्योंकि ब्राह्मण वेद नहीं है, इस बात के प्रतिपादक ब्राह्मण वाक्यों का नितान्त अभाव है । ' सर्वे वेदा: सब्राह्मणा ' इत्यादि गोपथ ब्राह्मण प्रभूति के वचनों से इस बात को सिद्ध करना, उनके अर्थ को ये लोग ठीक से नहीं समझ पाये हैं, इसी बात का सूचक हैं अन्यथा ' तस्माद्यज्ञात् ' इत्यादि श्रुति से छन्द पद का पृथक ग्रहण होने से ऋगादि की भी इनसे भिन्नता माननी पड़ जायगी । ' इतिहास वेद है, पुराण वेद है ' इस तरह के शतपथ ब्राह्मण के वचन औपचारिक नहीं है ' ( पृ ० ११२ ), किन्तु ये वचन यही सिद्ध करते हैं कि ब्राह्मणभाग के अंगभूत पुराणेतिहास आदि भी भगवान् से ही निकले हैं, अतः ऋगादि मन्त्रों की तरह ये भी वेद ही माने जायेंगे । मनुस्मृति के टीकाकार कुल्लूक भट्ट का कहना है कि श्रुति दो तरह की होती है- वैदिकी और तान्त्रिकी । सत्याषाढ
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वैदार्यपारिजातः श्रीसूत्रे ( ७/१ इत्यत्र ) गोपीनाथभट्टः । यथा श्रुतिमन्त्रयोद्वैविध्यम्, तथैव गाथानामपि लौकिकत्वं वैदिकत्वं च शेयम् । मन्त्रब्राह्मणरूपाणां वैदिकत्वं पुराणादिगतानां लौकिकत्वम् । यथा श्रुतिमन्त्रद्वैविध्येऽपि शाकल्यसंहितास्थ-मन्त्राणां न लौकिकत्वं तथैव मन्त्रब्राह्मणगतानां गाथानाराशंस्यादीनां न लौकिकत्वम्, न वा कल्पसूत्रेषु ब्राह्मणानामीप-चारिकं वेदत्वम्, तथात्वे शाकल्यादिमन्त्राणामप्यौपचारिकवेदत्वापत्तेः । ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहासपुराणानां प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ' ( ग्या ० सू ० ४ । १/६२ ) इति गौतमसूत्र-भाष्ये तु ब्राह्मणभिन्नपुराणानां प्रामाण्यं समर्थ्यते । लच्च बृहदारण्यकोक्तभगवन्निःश्वसितपुराणादिभ्यो भिन्नं छान्दो योक्तमेवेति पूर्वमुक्तमेत्र | यदुक्तम्- ' पुराणेतिहासादीनि ब्राह्मणेभ्यः पूर्वमप्यासन् । तेषां सङ्कलनेनैव ब्राह्मणग्रन्थ-निष्पत्ति: ' ( पृ ० ११३ ) इति, तत्तुच्छम्, निर्मूलत्वात् । तथात्वे तु ब्राह्मणस्य तत्कार्यत्वेन कथं तेन स्वमूलप्रामाण्याभ्यनु-ज्ञानम्? तथा वेदप्रामाण्यस्य तत्कार्यस्मृत्यादिग्रन्थायत्तत्वप्रसङ्गात् । ' अथाष्टमेऽहनि कश्चिदितिहासमाचक्षीत ' ( श ० १३ | ४ | ३ | १२ ), ' अथ नवमेऽहन् पुराणं वेदः ' ' ' सोऽयमिति किश्वित्पुराणमाचक्षीत ' ( श ० १३/४/३/१३ ), ' पुराणं कस्मात् पुरा नवं भवति ' ( नि ० ३ | १८ ) । पुरा नवं भवति न वर्तमानकाल इत्यर्थः । क्षिप्रोत्पन्नं नूत्नं भवतीति ब्राह्मणभिन्नस्यैव पुराणत्वमुक्तम् । ब्राह्मणस्य तु नित्यत्वेऽपि गुणवृत्यैव पुराणेतिहासादिसंज्ञा भवति । ब्राह्मणभिन्नानां पुराणेतिहासगाथानाराशंस्यादीनां पारिप्लवे वर्णनं भवति । यदि तु बोधायनसंशब्दनादस्य शिष्योऽस्य ग्रन्थस्य कर्तेति न्यायः काठकादिष्वाश्रयिष्यते, तदा शाकल्यादिषु संश्रयात्तेषा-मपि शाकल्यादीनां शाकल्या दिसंहिताकर्तृ त्वमेवायास्यति ( पृ ० ११३ ) | star की व्याख्या में गोपीनाथ भट्ट लिखते हैं कि सत्र और वैदिक मन्त्रों में । इन दोनों स्थलों में जैसे श्रुति और मन्त्र का द्वैविष्य प्रतिपादित है, उसी तरह से गाथाओं के भी वैदिक और लौकिक ये दो भेद जानने चाहिये । इनमें से मन्त्र ब्राह्मणगत गाथाएँ वैदिक और पुराणादिगत गाथाएँ लौकिक कहीं जायगी । जैसे श्रुति और मन्त्रों के दो भेदों के रहते हुए भी शाकल्यसंहिता में वर्तमान मन्त्र लौकिक नहीं माने जायेंगे, उसकी तरह से मन्त्र ब्राह्मणगत गाथा, नाराशंसी प्रभृति भी लौकिक नहीं माने जा सकते और न कल्पसूत्रों में ब्राह्मणों की औपचारिक बेदता ही सिद्ध की जा सकती है, क्योंकि ऐसा मानने पर शाकल्य संहिता प्रभृति के मन्त्रों को भी औपचारिक dear की आपत्ति से छुटकारा नहीं मिल सकेगा । ' प्रमाणभूत ब्राह्मण से इतिहास और पुराण की प्रामाणिकता ज्ञात होती है ' ( पू ० ११३ ) इस प्रकार न्यायसूत्र के वात्स्यायन भाष्य में ब्राह्मणभिन्न पुराणों के प्रमाण का समर्थन किया गया है । यहाँ पर बृहदारण्यक में उक्त भगवान् के निःश्वासभूत पुराणादि से भिन्न छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित पुराणादि विद्याओं का ग्रहण करना चाहिये । कहा गया है कि- ' पुराण- इतिहास की स्थिति ब्राह्मणों से भी पहले थी । उन्हीं की सामग्री का संकलन करके प्रवचन की भाषा में इन ब्राह्मणों में समावेश किया गया है ( पृ ० ११३ ), यह कथन भी तुच्छ एवं निराधार है । यदि ऐसा माना जाय तो ब्राह्मणभाग का आधार ये इतिहास - पुराण हुए, ऐसी अवस्था में ब्राह्मणभाग के प्रमाण पर उनके मूलभूत इतिहास - पुराण का प्रामाण्य कैसे माना जा सकता है? यदि ऐसा माना जाय तो वेद का प्रामाण्य भी वेद के आधार पर निर्मित स्मृति प्रभृति ग्रन्थों के अधीन मानना पड़ेगा । शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है- ' यथाष्टमेऽहन् ' ' ' पुराणं वेदः हैं ब्रह्मग्रथों में इतिहास और पुराण की चर्चा है सोऽयमिति किञ्चित्पुराणमाचक्षीत ' | इससे सिद्ध होता । ' पुराणं कस्मात्? पुरा नवं भवति ' इस निरुक्त वचन में पुराने अर्थात् पुराण । ' इसका अर्थ यह हुआ कि पहले नया होता है, वर्तमान काल में नहीं । तुरन्त यह निर्वचन किया है कि ' प्रथम होते समय नया हो उत्पन्न हुई वस्तु नवीन कहलाती है, इस तरह से पुराण ब्राह्मण से fra ही कहे जायेंगे । ब्राह्मण तो नित्य हैं, अतः उनमें पुराण-इतिहास प्रभृति संज्ञा का प्रयोग गुण वृत्ति से ही माना जायगा । पारिप्लव के अवसर पर ब्राह्मणभित्र पुराण, इतिहास, गाथा, नाराशंसी आदि का वर्णन पढ़ा जाता है । यदि वोधायन के कथन के प्रमाण पर काठक आदि शाखाओं के कर्त्ता इनके शिष्य पायें जाते हैं, तो उसी न्याय का सहारा शाकल्य प्रभृति संहिताओं में भी लेने पर अर्थात् शाकल्य प्रभृति को हो इन संहिताओं के कर्ता मान लेने पर इनमें भी पौरुषेयता की आपत्ति समान रूप से उठ खड़ी होगी ( पृ ० ११३ ) ।
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यदुक्तम् -'दृष्टं साम ' ( पा ० सू ० ४१२/७ ), ' तेन प्रोक्तम् ' ( पा ० सू ० ४।३।१०१ ), ' पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु ' ( पा ० सू ० ४/३/१०५ ), ' उपज्ञाते ' ( पा ० सू ० ४ | ३ | ११५ ) इत्यादीनामयमभिप्राय यन्मन्त्रा दृष्टा भवन्ति, मूलवेदभिन्नानि शाखाब्राह्मणानि च प्रोक्तानि भवन्ति, स्फूर्त्या प्रादुर्भूतानि पाणिन्यादिशास्त्राण्युपज्ञातानि, तांस्तान् ग्रन्थानाश्रित्य निर्मिता ग्रन्थाः कृता भवन्ति ' ( पृ ० ११४ ) इति, तदपि निरर्गलम् तथा सति मूलवेदस्य गगनकुसुमायितत्वापातात् । त्वदीयमूलवेदत्वेनाभिमताः शाकल्यादयः चतस्रः संहितास्तु शाकल्यादिभिः प्रोक्ताः शाखा एव । अत एव दृष्टान्येव मन्त्रब्राह्मणानि प्रोच्यन्ते । प्रवचनेन प्रचार्यन्ते । पतञ्जलिना तु ' तेन प्रोक्तम् ' ( ४ | ३ | १०१ ) इतिसूत्रं प्रत्याख्याय ' कृते ग्रन्थे ' इत्यनेनैव शाकल्य काठकादिपदसिद्धिरुक्ता । तच्चान्यत्रेहैव ग्रन्थे मीमांसितम् । यदुक्तम् —'मन्त्रा एव दृष्टा भवन्ति, न ब्राह्मणानि ' ( पृ ० ११४ ) इति, तदपि तुच्छम् त्वयंवेतेषां प्रजा-पतिदुष्टत्वाभ्युपगमात् । ' आधानं ब्राह्मणं प्रजापतेः । इष्टिब्राह्मणानि प्रजापतेः । ' ( चारायणीयमन्त्राषध्याय ९, ११ ) त्वयेतस्य प्रमाणत्वेनोद्धरणात् । ' भावं तु वादरायणोऽस्ति हि ' ( ब्र ० सू ० १ | ३ | ६३ ) इति सूत्रे शङ्करभगवत्पाक्षे रपि ऋषीणां मन्त्रब्राह्मणदर्शिनामङ्गीकारात् । यत्तु -- ' श्रीशङ्कराचार्यॊतिरैतिह्यविरुद्धेति ' ( पृ ० ११४ ), तत्तु निर्मूल-मेव सर्वसम्मत वैदिक वाङ्मयेतिहासस्याद्याप्यसिद्धेः । आधुनिका ऐतिहासिकास्तु त्वदभिमतवेदानामपि ईसवीयसन्-पूर्वाणि द्वित्राणि वर्षसहस्राण्येवायुरभ्युपगच्छन्ति । त्वदीयवाङ्मयेतिहासस्तु पक्षपातपूर्णत्वेन सर्वथाऽप्रामाणिक एव । दयानन्देन गोतमसूत्र- वात्स्यायनभाष्ययोः प्रामाण्यमभ्युपेतम् । वात्स्यायनस्तु ( ४/१/६२ ) इति गोतमसूत्रे ' य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ' इति ब्रवीति । अर्थान्मन्त्रवद् ब्राह्मणस्यापि दर्शनं प्रवचनं चोपगच्छति । तथा च त्वदितिहासस्यैवाप्रामाण्यं सिद्धयति ( पृ ० ११४ - ११५ ) । यत्तु ' मन्त्राषध्याय इत्यमिचैव द्योतयति यश्मन्त्राणामेव द्रष्टार ऋषयो न ब्राह्मणानाम् ' ( पृ ० ११४ ) इति, तदति स्थवीयः यतो हि तत्रैव अष्टादशस्थानकादनन्तरं ' ब्राह्मणानि प्रजापतेः । ब्राह्मणपठितान् मन्त्रानथोदाहरि-' भगवान् पाणिनि ने अपने अष्टक में ये सूत्र कहे हैं- दृष्टं साम तेन प्रोक्तम्, पुराणप्रीतेषु ब्राह्मणकल्पेषु, उपज्ञाते, कृते थे | इनका अभिप्राय यह है कि मन्त्र दृष्ट हैं, शाखाएं ( मूल वेदों को छोड़ कर ) ब्राह्मण और कल्प प्रोक हैं, पाणिनि आदि के ग्रन्थ स्फूर्ति से प्रकट हुए हैं, साधारण ग्रन्थ कांट - छांट कर बनाये जाते हैं ' ( पृ ० ११४ ) यह कथन भी निरर्गल है, क्योंकि ऐसा मानने पर मूल वेद की स्थिति आकाश- कुसुम के समान हो जायगी । आप जिनको मूल वेद मानते हैं, ये शाकली प्रभृति चार संहिताएं शाकल्य प्रभूति ऋषियों के द्वारा प्रोक्त शाखाएं ही हैं । इसी लिये यथादृष्ट मन्त्र और ब्राह्मण का केवल प्रवचन किया जाता है और प्रवचन के माध्यम से ही उनका प्रचार किया जाता है । पतंजलि ने ( लेन प्रोक्तम् ) इस सूत्र का ही प्रत्याख्यान कर दिया है । और ' कृते ग्रन्थे ' इसी सूत्र से शाकल्य, काठक प्रभूति पदों को सिद्धि को है । इस बात को हमने इसी ग्रन्थ में अन्यत्र विस्तार से चर्चा की है । ' मन्त्र दृष्ट हैं और ब्राह्मण प्रोक्त है ' ( पृ ० ११४ ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि आप स्वयं ही इन ब्राह्मणों को प्रजापति के द्वारा परिदृष्ट मानते हैं । ' भाधानं ब्राह्मणं प्रजापतेः ' इत्यादि चारायणीय मन्त्राषध्याय को आपने ही प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है । ' भाव ' तु बादरायणोऽस्ति हि ' इस ब्रह्मसूत्र के भाष्य में शंकर भगवत्पाद ने ऋषियों को मन्त्र और ब्राह्मण का द्रष्टा माना है । आपने कहा है कि शंकराचार्य की यह उक्ति वैदिक ऐतिह्य के विरुद्ध है ( पृ ० ११४ दि ० ), किन्तु यह सर्वथा निर्मूल है, क्योंकि सर्वसंमत वैदिक वाङ्मय का इतिहास आज भी नहीं बना है । आधुनिक ऐतिहासिक तो आपके अभिमत वेदों को भी ईसवीय शताब्दी से कोई दो तीन हजार वर्ष पहले के मानते हैं । आपका बनाया इतिहास भी पक्षपात से भरा है, अतः उसको हम सर्वथा अप्रामाणिक मानते हैं । दयानन्द ने गोतमसूत्र और उसके वात्स्यायन भाष्य को प्रमाण माना है | ४ | १/६२ संख्या के गोतम सूत्र के भाष्य में वात्स्यायन का कहना है कि मन्त्र और ब्राह्मण भाग का ऋषिगण दर्शन और प्रवचन करते हैं । अर्थात् मन्त्रभाग के समान ब्राह्मणभाग के भी दर्शन और saur को ये अंगीकार करते हैं । इस तरह से आपके इतिहास की अप्रामाणिकता सिद्ध हो जाती है ।