वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1021–1030
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1021–1030
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1 वेदार्थपारिजातः १९१ ९ युधिष्ठिरमीमांसकः पूर्वोक्तमेवार्थं मीमांसाशाबरभाष्ये ( १० २० पृ० १२७ ) प्रतिपादितवान् । वस्तुतस्तु पूर्व- I मीमांसानाम्नाऽयं स्वमन्तव्यमेव प्रतिपादयति; न मीमांसासिद्धान्तम् । दयानन्दस्वामिना स्त्रग्रन्थे शाबरभाष्यस्य प्रामाण्य-मङ्गीकृतम् । आद्यशङ्कराचार्यः शास्त्रतात्पर्यंविद, इति रूपेण यं स्मरति, तस्यायं स्वेच्छया व्याख्यानं खण्डयति, स्वार्थपूर्तये च तस्य वचनान्यप्युद्धरति । सर्वथाऽप्ययं पूर्वमीमासा-विरोधी शबरस्वामि-कुमारिल-शङ्कराचार्यादिविरोधी, तथापि निर्लज्ज- तया स्वपक्षसमर्थनाय तानाश्रयतेऽपि । यदपि ( १।१।२७२८ पृ० १०२ ) विगतेऽधिकरणद्वये शब्दानित्यत्व -वाक्यरचनाभ्यां वेदानित्यत्वं समाहितम्, तदशुद्धम् । अनित्यताया निराकरणं कर्तव्यं भवति, न समाधानमिति ज्ञातव्यत्वात् । यदपि च तत्र वेदसंहितानां शाकल्यादि-,, 1 नामप्रयोगैरनित्यदोषस्य समाधानं क्रियते तदप्यशुद्धमेव अस्पष्टत्वाद् भ्रामकत्वाच्च । काठकादिसमाख्याजनितदोष-निराकरणेनैव शाकलादिसमाख्योत्थितभ्रमस्यापि निराकृतत्वात् । 4 यदप्युक्त तेन - 'जैमिनिना स्वग्रन्थे वेदाम्नायश्रुतिशब्दानां प्रयोगः कृतः' इति, तदप्यशुद्धम्, जैमिनिना न स्वग्रन्थे वेदादिशब्दानां प्रयोगः कृतः, किन्तु मन्त्रब्राह्मणयोर्जेमिनिना वेदास्नायश्रुतिशब्दानां प्रयोगः कृत इत्येव स्पष्टं वक्तव्यत्वात् । तथा चाङ्गीकृतमेतद्यत् जैमिनिनापि-' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमिति' याज्ञिकानामेव सिद्धान्तः प्रतिपादितः, याज्ञिकाश्च वैदिका एव, तथा चायमेव वैदिकः सिद्धान्तः इत्यपि वक्तव्यम् । यदपि यज्ञसम्बन्धिग्रन्थेषु वेदशब्देन मन्त्रब्राह्मण- योर्ग्रहणमिति मयापि ( यु ० मीमांसकेनापि ) स्वीक्रियते, तदपि छद्ममात्रम् । सत्यञ्चेत् समाप्तः शास्त्रार्थः किमर्थं समयो-ऽपयाप्यते निरर्थकेन प्रलापेन । न केवलं जैमिनिना, किन्तु व्यासेन, पाणिनिना, पतञ्जलिना, गौतमेन, कणादेन, वात्स्यायनेन, युधिष्ठिर मीमासक अपने मन्तव्य को ही पूर्वमीमांसा के नाम पर बता देता है, पूर्वमीमासा शास्त्र के सिद्धान्त को नही बताता । इसके दादा गुरु दयानन्दस्वामी ने अपने ग्रन्थ में शाबरभाष्य को प्रमाण माना है, तथा आद्य शंकराचार्य शास्त्रतात्पर्यवित् शब्द से जिसका स्मरण करते है, उसकी की हुई व्याख्या का खण्डन अपने को मीमासक माननेवाला युधिष्टिर ( मीमासक ) अपनी } इच्छा के अनुसार कर रहा है । और कही कही अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये उनके वचनो को उद्धृत भी करता है । अतः मीमासा शाबर भाष्य पर इसने जो कुछ हिन्दी व्याख्या के रूप मे लिखा है, वह प्रामाणिक न होने से विश्वास के योग्य नही है । मीमासा शाबरभाष्य पर लिखी हुई इसकी हिन्दी व्याख्या को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि यह सर्वथा पूर्वमीमासाशास्त्र का विरोधी है । शबरस्वामी, कुमारिलभट्टपाद, आद्यशंकराचार्य आदि प्रामाणिक विद्वानो का यह पूर्णरूप से विरोधी है । यत्र तत्र अपने पक्ष के समर्थनार्थ निर्लज्ज होकर उनका आश्रय ( साहरा ) लेवे में भी वह हिचकता नही है । ( १।१।२७- ३२) पिछले दो अधिकरणो में शब्दानित्यत्व और वाक्यरचना के द्वारा वेद की अनित्यता का जो भी ( १०२ पृ०) समाधान किया हैं, वह भी अशुद्ध है ।इतना तो इन्हें समझना चाहिये था कि अनित्यता का निराकरण कर्तव्य होता है, न कि समाधान | वेदसंहिताओं के साथ शाकल्य आदि ऋषियों के नाम जुड़ने के कारण प्रतीत होनेवाले अनित्यदोष का जो समाधान किया है, वह भी अशुद्ध है, क्योकि वह अस्पष्ट और भ्रामक है । काठकादि समाख्या के कारण उत्पन्न हुए दोष का निराकरण करने से ही शाकल आदि समाख्या से उत्पन्न हुए भ्रम का भी निराकरण हो जाता है । यह जो कहा है कि जैमिनि ने अपने ग्रन्थ में वेद, आम्नाय श्रुति शब्दों का प्रयोग किया है, वह भी अशुद्ध है । जैमिनि ने अपने ग्रन्थ में वेदादि शब्दों का प्रयोग नही किया है, किन्तु मन्त्र और ब्राह्मण में वेद, आम्नाय श्रति शब्दो का प्रयोग जैमिनि ने संज्ञा,किया है - इस प्रकार स्पष्ट कहना चाहिये । तथा च यह स्वीकार कर लिया है कि जैमिनि ने भी ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' वेदहै, यह मन्त्र-ब्राह्मण दोनो की है -यह याज्ञिको का सिद्धान्त ही बताया है । याज्ञिक भी वैदिक ही है । तथाच यही वैदिक सिद्धान्त( युधिष्ठिर भी कहना चाहिये । यह जो कहा है कि यज्ञसम्बन्धिग्रन्थों में वेद शब्द से मन्त्र और ब्राह्मण का ग्रहण किया जाता है, उसे -मैंविवाद ) ही मीमासक ) भी स्वीकार करता हूँ, किन्तु उनका यह कथन केवल छद्म है । यदि वह कथन सत्य हो तो शास्त्रर्थ ( वाद समाप्त होता है । तो क्योंकर निरर्थक प्रलाप के द्वारा समय का दुरुपयोग कर रहे हो? केवल जैमिनि ने ही नही, बल्कि व्यास,
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वेदार्थपारिजात: १ ९ २० तदनुयायिभिः शबर-कुमारिल- शंकर-वाचस्पति रामानुजादिभिरपि तथैवाङ्गीक्रियते । त्वदीयाचार्येण दयानन्देनापि वेदा- म्नायश्रुतीनां पर्यायवाचकत्वमुक्तम् । "आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्" ( जै० ११२।१ ) इत्यत्र मन्त्रब्राह्मणेष्वाम्नायशब्दप्रयोगे- गापि तेषां वेदत्वमेव सिद्ध्यति । "आम्नायः पुनर्मन्त्रा ब्राह्मणानि च" इति कौशिकसूत्रमपि मन्त्रब्राह्मणानां वेदत्वं बोधयति । नेदं यजुर्वेदीयं सूत्रमेतावता येषां ग्रन्थेषु मन्त्रब्राह्मणाना मिश्रणमासीत्तैरेव तादृशं वेदसंज्ञाविधायकं सूत्रं विनिर्मितमिति युधिष्ठिर मीमांसकमतं सर्वथा खण्डितं भवति । अथर्ववेदीयमिदं सूत्रम्, न चाथर्ववेदसहितायां मन्त्रब्राह्मण- मिश्रणं विद्यते । एवमेव ' विधिविधेयस्तश्च वेद:' ( पारस्कर गृह्यसूत्रे २/६/५ ) इति पारस्करगृह्यसूत्रम् । पारस्करोऽपि न कृष्णयजुर्वेदीयः । सोऽपि विधिपदेन विधिवाक्यानि विधेयपदेन मन्त्रान् तर्कपदेनार्थवादवचनानि गृह्णाति । षडङ्गानां वेदत्ववचनमेतस्य मतमोपचारिकमेव । t यत्तु श्रुतिपदमपि याज्ञिकाना पारिभाषिकम् 1 तेन मन्त्रब्राह्मणयोर्ग्रहणमिति, तदपि निर्मूलत्वादुपेक्ष्यम् 1। यत्तु ( अ० २४ ) इति उत्तरं श्रुतिरूपा मन्त्रा आश्वमेधिकानां पशूनां द्रव्य-देवता- सम्बन्धाभिधायिनः' इति वचनेन चतुविशाध्यायस्य प्रथममन्त्रमारभ्य पञ्चविंशाध्यायस्य नवममन्त्रपर्यन्तं सर्वे मन्त्राः श्रुतिरूपा ब्राह्मणरूपा उच्यन्ते' इति, तदपि निरर्थकम्, त्वयेवोव्वटादिविरोधिना तत्प्रामाण्यानभ्युपगमात् । यत्तु - "वेदो वा प्रायदर्शनात्" ( जे० सू० ३।३।२ ) इत्यधिकरण उक्तम्-"उच्चैर्ऋचा क्रियते, उच्चैः साम्ना, उपांशु यजुषा ”, इत्यत्र ऋग्यजुःसामशब्दानां को वार्थ इति विचारणीयम्, "यत्रार्थवशात् पादव्यवस्था सा ऋक्, गीतिषु सामाख्या, शेषे यजुः शब्द " इत्यादि लक्षणलक्षिता मन्त्रा चतुर्णां वेदानां सहितासु शाखासु च लभ्यन्ते, यथा यजुः संहितासु गद्यात्मकाः पद्यात्मकाश्च मन्त्राः पठिताः, अतः पूर्वपक्षरीत्या उक्तवचने ऋक्सामयजुःशब्दा जातिवाचका:, तेन यत्र कापि पाणिनि, पतञ्जलि, गौतम, कणाद, वात्स्यायन तथा उनके अनुयायी शबर, कुमारिल, शंकर, वाचस्पति और रामानुजाचार्य आदिकों ने भी उसी तरह मन्त्र और ब्राह्मण दोनो को वेद शब्द से कहा है । तुम्हारे आचार्य दयानन्द ने भी वेद, आस्नाय, श्रुति शब्दों को पर्यायवाचक कहा है । 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' -( जै० सू० १1२1१ ) इस सूत्र मे मन्त्र -ब्राह्मण दोनों के लिये 'आम्नाय' शब्द के प्रयोग करने से भी उनका ( मन्त्र ब्राह्मण दोनो का) वेदत्व स्पष्ट हो जाता है । उसी तरह 'आम्नायः पुन मन्त्रा ब्राह्मणानि च' इस कौशिक सूत्र से भी मन्त्र ब्राह्मण दोनो में वेदत्व बताया गया है । यह कृष्णयजुर्वेद का सूत्र नही है, इतने कथनमात्र से ही युधिष्ठिर मीमासक के मत - जिनके ग्रन्थों में मन्त्र ब्राह्मणो का मिश्रण था, उन्ही लोगो ने उस प्रकार का वेद संज्ञाविधायक सूत्र रच दिया'- का खण्डन अच्छी तरह हो जाता है । उपर्युक्त सूत्र अथर्ववेद का है । अथर्व वेद की संहिता मे मन्त्र और ब्राह्मण का मिश्रण नही है । उसी प्रकार " विधिविधेयस्तर्कश्चवेद:' ( पारस्कर गृचसूत्र २२६/५) यह पारस्करगृह्यसूत्र है । पारस्कर भी कृष्णयजुर्वेदीय नही है । किन्तु उसने भी 'विधि पद से विधिवाक्यों को, ' विधेय' पद से मन्त्रो को, 'तर्क' पद से अर्थवाद वाक्यों को बताया है । षडडगो का वेदत्वप्रतिपादक मत तो औपचारिक है | यह जो कहा है कि 'श्रुति' पद, तो याज्ञिको की परिभाषा मात्र है, उसमें मन्त्र-ब्राह्मण दोनों का ग्रहण किया जाता है ।" वह कथन मी निर्मूल होने से उपेक्षणीय है । उसी तरह '[अ ० २४] के आगे वाले श्रुतिरूप मन्त्र, आश्वमेधिक पशुओ के द्रव्य- देवता सम्बन्ध को बताते हैं, इस उब्वट के वाक्य से चौबीसवे अध्याय के प्रथम मन्त्र से प्रारम्भ कर पचीसवे अध्याय के नवम मन्त्र तक सभी ' मन्त्र श्रुतिरूप ब्राह्मणरूप कहे जाते हैं । यह कहना भी तुम्हारी दृष्टि से निरर्थक ही होगा क्योकि उम्वट आदि प्रामाणिक विद्वानो से विरोध रखने वाले एकमात्र तुम ही उन्हें प्रमाण नही मान रहे हो । 1 " " - ( ),, वेदो वा प्रायदर्शनात् जै० सू० ३।३।२ इस अधिकरण में जो कहा गया है कि उच्चैर्ऋचा क्रियते उच्चैः साम्ना उपांशु यजुषा इन वाक्यों में प्रयुक्त ऋक्, यजुस्, और सामन् शब्दों का क्या अर्थ है? इसका विचार करना चाहिये । "जहाँ अर्थ के कारण पाद व्यवस्था रहती है उसे 'ऋक्', तथा 'गीति को सामसंज्ञा दी गई है और 'अवशिष्ट के लिये यजुस् शब्द का प्रयोग करना चाहिये । इन लक्षणों से लक्षित मन्त्र, चारों वेदों की संहिताओं और शाखाओं में प्राप्त होते हैं । पूर्णपक्षी का कहना है कि ऋक् याम- शब्द - η
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वेदार्थपारिजात १ ९ २१ तादृशा मन्त्रा पठिताः, तत्र तत्र पूर्वोक्तवचनरीत्या उच्चैस्त्वादिधर्मेणोच्चारणीया, उत्तरपक्षरीत्या तु ऋगादिवचनैर्ऋगादि- वेदा ग्राह्याः । कुत.? आदिवचने वेदशब्ददर्शनात् "तेभ्यस्तेपानेभ्यस्त्रयो वेदा असृज्यन्त, अग्नेर्ऋग्वेदो वायोर्यजुर्वेद आदित्यात् सामवेद '.. '”, “उच्चैर्ऋचा क्रियते, उच्चैः साम्ना, उपांशु यजुषा " इति । तथा च स्वस्ववेदपठिता मन्त्रा उच्चैस्त्वादिधर्मेणोच्चारणीया । ते मन्त्राः पद्यात्मका, गद्यात्मका, गानात्मका वा भवेयुः । “लिङ्गाच्च ' (जै० सू० ३ | ३ | ३ ) इति सूत्रे शबरस्वामिवचनम्- "ऋग्भि प्रातदिवि देव ईयते यजुर्वेदेन तिष्ठति मध्येऽह्न सामवेदेनास्तमये महीयते वेदैर- शून्यस्त्रिभिरेति सूर्यः ॥ ” ( तै ० ब्रा० ३| १२| ९ ) इति । " वेदसयोगान्न प्रकरणेन बाध्येत" ( मी ० ३ ३३८ ) यदुक्त 'ऋगादिशब्देगा दिजातीयमन्त्राणा ग्रहणे प्रकरण - मनुगृहीतं स्यादिति; तदपिन, वेदसंयोगाद् वाक्येन प्रकरणस्य बाधितत्वान्न दोष:, वाक्यापेक्षया प्रकरणस्य दुर्बलत्वात्', इति तदेतत्सर्वमसत्, पूर्वोत्तरपक्षासङ्गतेः । त्वद्रीत्या ऋड्मन्त्रा एव ऋग्वेद, यजुर्मन्त्रा एव यजुर्वेद, साममन्त्रा एव सामवेदस्तदा स्वत एव ऋक्पदेन ऋग्वेद एव ग्रहीष्यते, यजु पदेन यजुर्वेद एव ग्रहीष्यते, तदा पूर्वोत्तरपक्षी निरालम्बनौ स्याताम्; सूत्राणि च तदर्थं निरर्थकान्येव स्युः ॥ कथं च त्वद्रीत्या यजुर्वेदे ऋमन्त्राणां साडूर्यम्, साडूयंचेन्न ऋगेव ऋग्वेद, यजुरेव यजुर्वेदः । अत एव न मन्त्रा एव वेदा । तथात्वे तदधिकरणनैरर्थक्यापातात् । कथञ्चिद् यजुर्वेदे ऋमिश्रणाभ्युपगमेऽपि ऋक्सहितायां तु ऋच एव सन्ति, सामसंहितासु च ऋच एव सन्ति, न च तत्र यजुषा संमिश्रणमस्ति तथात्वे "उच्चैर्ऋचा उपाशु यजुषा ' इत्येव स्यात् 'उच्चैः साम्ना' इति व्यर्थमेव स्यात्, ऋग्ग्रहणेनैव साम्नां गृहीतत्वात् । तस्माद् ऋचां बाहुल्य ऋचो वा पठनीया यत्र मन्त्रब्राह्मणा- जातिवाचक हैं | अतः जिस किसी भी वेद मे उन मन्त्रो के पठित रहने पर पूर्वोक्त विधान के अनुसार उन उन मन्त्रो को उच्चैस्त्वादि धर्म से ही बोलना चाहिये । किन्तु उत्तर पक्षी कहता है कि नही, उपर्युक्त वाक्य मे आये हुए 'ऋक् आदि शब्दो का अर्थ मन्त्र न होकर ' वेद' है । क्योकि उपक्रम वाक्य में ' वेद' शब्द पढा गया है । अत: अपने अपने वेद में पठित मन्त्रो को उच्चैस्त्वादि धर्म के साथ कहना चाहिये | चाहे वह मन्त्र पद्यात्मक हो या गद्यात्मक हो अथवा गानात्मक हो । “लिड्गाच्च" ------ (जै० ३।३।४ ) इस सूत्र पर शबरस्वामी का वचन है- प्रातः आकाश में सूर्य देव ऋग्वेद के द्वारा गमन करता है, और मध्यान्ह में यजुर्वेद के द्वारा स्थिर रहता है तथा अस्तमनकाल में सामवेद के द्वारा पूजित होता है, इस प्रकार तीनो वेदो से सम्बन्धित हुआ सूर्यदेव गमन करता रहता है । (तै० ना० ४।१२।९ ) " वेदसंयोगान्न प्रकरणेन बाध्येत" ( मी ० सू० ३| ३| ८ ) यह जो कहा गया था कि 'ऋगादि' शब्दो से ऋगादिजातीयमन्त्रों का ग्रहण करने पर प्रकरण अनुगृहीत हो सकेगा । किन्तु वह भी ठीक नही है, क्योकि उपक्रमस्थ वाक्य में वेद शब्द का सम्बन्ध रहने से वाक्य प्रमाण के द्वारा प्रकरण प्रमाण का बाघ हो जाता है । अतः कोई दोष नही है । वाक्य की अपेक्षा प्रकरण दुर्बल होता है । यह सव असत् है क्योकि पूर्वोत्तरपक्ष की सगति नहीं बैठ पाती । तुम्हारी रीति से ऋडुमन्त्र ही ऋग्वेद है, और यजुर्मन्त्र ही यज गेंद हैं तथा साममन्त्र ही सामवेद है, तब स्वत एव ऋक् पद से ऋग्वेद का ही ग्रहण होगा और यजुः पद से यजुर्वेद का ही ग्रहण होगा, तब पूर्वोत्तर पक्ष दोनों ही निराधार हो जायेंगे एवं उसके लिये जो सूत्र है वे भी निरर्थक हो जायेंगे । तुम्हारी रीति से यजुर्वेद में ऋडू मंत्रों का साकर्य कैसे हो जायगा? यदि साकर्य मानोगे तो ॠ को ही ऋग्वेद और यज ष् को यज गेंद कैसे कहा जा सकेगा? अतएव मन्त्र ही वेद नही है । ऐसी स्थिति में तत्सम्बन्धित अधिकरण व्यर्थ होगे । कथञ्चित् यजुर्वेद मे ऋचाओ के मिश्रण को मान लेनेपर भी ऋक् सहिता में तो ऋचाएँ ही है और साम संहिताओ में भी ऋचाएं ही हैं, उनमे यजुर्मन्त्रो का मिश्रण नही है । तब ' उच्चैर्ऋचा, उपाशु यजुषा' इतना ही कहा होता, 'उच्चैः साम्ना' यह कहना तो व्यर्थ ही रहता । क्योकि ऋक् का ग्रहण करने से ही साम का ग्रहण हो ही जाता । इसलिये जिस मन्त्र -ब्राह्मणात्मक वेद में ऋचाओं का बाहुल्य या ऋचाएँ पठनीय हो, वह ऋग्वेद है । तथा जिस मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद में यजु या साम २४१
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वेदार्थपारिजातः १ ९ २२ त्मके वेदे सॠग्वेद, यजुषा साम्नां वा बाहुल्य तादृशा मन्त्राः पठनीया वा यत्र तो यजुर्वेद सामवेदी इति रीत्या ऋग्वेद- पदेन मन्त्र-ब्राह्मणात्मको वेद ऋग्वेद इत्याख्यायते । तथा च केवलमृग्यजु सामशब्द: केवला ऋगादयो मन्त्रा अभिप्रेयन्ते, ऋग्वेदादिशब्देन तु मन्त्रब्राह्मणात्मक | वेदा आख्यायन्ते 1। उपक्रमे वेदपदप्रयोगाल्लक्षणया ऋगादिशब्दा अपि ऋग्वेदादिपरा मन्तव्याः, तत एव सामपदसार्थक्य- मन्यथा सामपदेन मन्त्राणामेव ग्रहणे ऋग्ग्रहणेनैव तद्ग्रहणसभवेन सामपदं व्यर्थमेव स्यात् 1। सामपद सामब्राह्मणग्रहणार्थमेव । अत एव शबरस्वामिनात्राधिकरणे --"किं ऋगादिजातिमधिकृत्यैते शब्दाः प्रवृत्ता उत वेदमधिकृत्य " इति पूर्वपक्षे एषा शब्दानां श्रवणादेव जाति प्रतिपद्यामहे । तेनोपाशुत्व जात्याधिकृतया सबद्धघते । " तन्त्रवार्तिके च मन्त्रब्राह्मणतर्काणा सम्हे काठका- दिके वेदत्वं वर्तते नित्यमनेकक्रतुगामिनि । अत्र विधिविधेयस्तकंश्च वेदः " इति पारस्कररीत्या विधिशब्दोतस्य ब्राह्मणस्य विधेयशब्दोक्ताना मन्त्राणां तर्कपदोक्तस्य - "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते " इत्युपनिषद्भागस्य वेदत्वं स्मृतं, तत्समूहे काठकाद्याख्ये क्रतुविषये वेदत्व व्यासज्य वर्तत इत्युक्तम् । " वेदो वा प्रायदर्शनात्" ( जे ० सू० ३।३।२ ) इति सिद्धान्तसूत्रे तु वेदशब्देनोपक्रम्य उपसंहारे --" उच्चैर्ऋचा क्रियते " इत्यादीना श्रवणाद् वेदवचनैरेवोपसहारेण भाव्यम् । "लिङ्गाच्च" ( जै ० सू० ३।३।३ ) इति सूत्रेणापि ऋगादिशब्दै- र्लक्षणया वेदा एव बोध्यन्ते । "ऋग्भिः प्रातर्दिवि देव इयते यजुर्वेदेन तिष्ठति मध्ये अह्नः । सामवेदेनास्तमये महीयते वेदैरशून्यस्त्रिभिरेति सूर्यः । (तै० ब्रा० ३।१।२९।५ ) इत्यत्र ऋक्शब्दो वेदवचनो ज्ञायते । धर्मोपदेशाच्च नहि द्रव्येण सम्बन्धः, 'उच्चैः साम्ना' इति साम्नो धर्मोपदेशः । जाताधिकारे तु ऋच उच्चैस्त्वेन माम्न उच्चैस्त्वं सिद्धमेव, वेदग्रहणेन तु साम- ब्राह्मणग्रहणार्थमेव उच्चे' साम्न इति सङ्गतं स्यात् । का बाहुल्य अथवा तादृश मन्त्र पठनीय हो जो क्रमश. यजुर्वेद और सामवेद है । इस रीति के अनुसार 'ऋग्वेद' पद से मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद को ऋग्वेद कहा गया है । तथा च केवल ऋक्, यजुःसाम शब्दो से केवल ऋगादि मन्त्र अभिप्रेत हैं । और ऋग्वेद आदि शब्द से मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद कहे जाते हैं । उपक्रमस्थवाक्य में ' वेद' पद का प्रयोग किया होने से लक्षणा के द्वारा ऋगादि शब्दो को भी ॠग्वेदादिपरक ही स्वीकार करना चाहिये । तभी 'साम ' पद की सार्थकता हो सकेगी; अन्यथा ' साम ' पद से मन्त्रो का ही ग्रहण करने पर 'ऋ ' शब्द से भी उन मन्त्रो का ग्रहण सम्भव रहने से 'साम' पद व्यर्थ ही हो जायगा । 'साम' पद, सामब्राह्मण के ग्रहणार्थ ही है । अतएव शबरस्वामी ने इस अधिकरण में - 'क्या ऋगादि जाति को लक्ष्य कर ये शब्द प्रवृत्त हुए हैं, अथवा वेद को लक्ष्य कर" ऐसा संशय होने पर पूर्णपक्ष में कहा है कि इन शब्दों के सुनते ही जाति की प्रतीति होती है । इस कारण अधिकृत जाति के साथ इन शब्दों का सम्बन्ध प्रतीत होता है' इससे 'उपांशुत्व धर्म का सम्बन्ध अधिकृत जाति के साथ होगा, उसी तरह तन्त्रवार्तिक मे वित्य और अनेक क्रतुगामी मन्त्र, ब्राह्मण, तर्कों के समूह रूप काठकादि में वेदत्व रहता है । वही पर 'विधिविधेयस्तर्कश्च वेद ' इस पारस्कर की रीति के अनुसार ' विधि' शब्द से बताये गये - ब्राह्मण में, और विधेय' शब्द से बताये गये मन्त्रो मे तथा ' तर्क' शब्द से बताये गये 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' --जिससे ये प्राणि पैदा होते है -इस उपनिषद् भाग मे वेदत्व' बताया है, ऋतु को विषय करनेवाले तत्समूहरूप काठक आदि नाम से प्रसिद्ध ग्रन्थ में ' वेदत्व' व्यासज्य वृत्ति से रहता है, यह कहा गया है । किन्तु ' वेदो वा प्रायदर्शनात्' ( जै० सू० ३१३( २ ) इस सिद्धान्तसूत्र में ' वेद ' शब्द से उपक्रम कर उपसंहार में 'उच्चैर्ऋचा क्रियते' इत्यादि वाक्यों केसुनाई देने से उपसंहार भी ' वेद' शब्द से ही होना चाहिये । 'लिङ्गाच' ( जै ० सू० ३।३।३ ) इस सूत्र के द्वारा भी ऋगादि शब्दों से लक्षणा के द्वारा ' वेदों को ही बताया गया है । उसी तरह ऋग्भिः प्रातदिविदेव ईयते.. ।'— (तै० ब्रा० ३११२२ ९ ) यहाँ पर भी 'ऋक्' शब्द वेदवाचक ही प्रतीत हो रहा है । 'धर्मोपदेशाच्च नहि द्रव्येण सम्बन्ध. ' - ( जै० सू० ३ | ३ |४), 'उच्चैः सास्ना' यह कहकर साम के धर्म का उपदेश किया गया है । जावाधिकार में तो ऋचाओ का उच्चैस्त्वधर्म होने से साम का , उच्चैस्त्वधर्म अर्थात् सिद्ध हो ही जाता है और ऋगादि शब्दों का ' गेद' अर्थ करने पर सामब्राह्मण के ग्रहणार्थं ही 'उच्चैः साम्ना' यह कथन संगत हो सकेगा । 2
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वेदार्थपारिजातः १ ९ २३ सूत्रे तु तत्र यदि ऋग्वेदव्यतिक्रान्तानामृचा यजुर्वेद उपाशुत्वं भवति न तदूषणाय, बेदधर्मः स न ऋग्धर्मः । यत्तु " उच्चैस्त्वादिकं तु सर्वथा मन्त्रेष्वेव विधीयते, न ब्राह्मणेष्विति" तदपि यत्किचित्-" य एव विद्वानग्निमाधत्ते ", इति याजुर्वेदिक- अग्न्याधानविधाने - " य एवं विद्वान् वारवन्तीय गायति य एव विद्वान् यज्ञायज्ञियं गायति य एवं विद्वान् वामदेव्यं गायति ” इत्यत्र उच्चैरेतानि सामानि गेयानीति प्राप्ते - "मुख्यानुरोधेन गुणो व्यतिक्रमितव्यो मुख्यश्चानुग्रही- 1 तव्य " इति सिद्धान्तितम् मुख्यार्थत्वाद् गुणस्य । उत्पत्तिविधिमालोच्य साम्ना वेदान्तरीत्या ' साङ्ग प्रधान सम्बन्धादुपाशुत्त्वं ), " तु गम्यते तन्त्रवार्तिके इत्युक्तत्वात् । अन्यत्र च आधानयजुषा तु याजुर्वेदिक प्रधानविधिविहितत्वादेवोपाशुत्वम् य एवं विद्वान् वामदेव्य गायति” — इत्यादीनि यजुर्वेदवावयान्येव । ननु याजुर्वेदिकज्योतिष्टोमाङ्गाना स्तोत्रशस्त्रादीनामप्येतेनेव न्यायेनोपाशुत्व प्राप्नोति, सत्य प्राप्नोति, वचनात्तु सर्वत्र स्वरान्तरलाभ., “ मन्द्रं याज्यभागान्तं, पर मध्यमया, उत्तमयानुया जादि" - इति वचनस्य तत्र प्रमाणत्वात् । 1 यतूक्तम्- ' ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्र त्वो गार्यात शकरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्या यज्ञस्य मात्रा विमिमीत उत्व ०" ( ऋ० स० १०/७१/११ ) "ऋत्विक्कर्मणां विनियोगमाचष्टे" ( निरुक्ते, ११८ ) इति मन्त्रे निरुक्त- } रीत्या ऋत्विक्कर्मणा विधानमस्ति चतुर्थचरणव्याख्याने एकऋत्विग्यज्ञस्य मात्रा विमिमीते सोऽध्वर्युः । एवं यज्ञस्वरूप- निष्पादक ऋत्विगध्वर्युः, यज्ञ वरूपनिष्पादकाना कर्मणा मन्त्रा यजुर्वेदे पठिताः । अतो यजुर्वेदस्याध्वर्यवो वेद इति याज्ञिकाना समाख्या । यजुर्वेदमन्त्रे क्रियमाणाना कर्मणा विधान यजुर्वेदस्य ब्राह्मणेऽस्ति । एवं रीत्या मन्त्राणा विनियो- सूत्र के अनुसार यदि ऋग्वेद की ऋचाएँ यजुर्वेद मे आ जाय तो उनके साथ 'उपाशुत्व' धर्म का ही सम्बन्ध होगा । यजुर्वेद में ऋचाओं को उपाशु कहने मे कोई दोष नही है । क्योकि ' उपाशुत्व' धर्मं वेद का है, ऋचाओ का नही । यह जो कहा गया है कि "उच्चैस्त्वादि" धर्म का सर्वथा मन्त्रो मे ही विधान किया जाता है, ब्राह्मणो मे नही । वह कथन भी निरर्थक है । क्योकि "य एवं विद्वानग्निमाधत्ते " इस याजुर्वेदिक अग्न्याधान का विधान करते समय " य एव विद्वान् वारवन्तीय गायति...." । जो विद्वान् इस प्रकार वारवन्तीयसामगान करता है, जो विद्वान् यज्ञायज्ञिय सामगान करता है, जो विद्वान् वामदेव्यसामगान करता है, इत्यादि वाक्य पढे गये हैं । इन वाक्यो के देखने से इन सामो को उच्चस्वर से गाना चाहिये ऐसा प्राप्त होता है । किन्तु ' मुख्यानुरोधेन गुणो व्यतिक्रमि- तव्यो मुख्यश्चानुग्रहीतव्यः' मुख्य के अनुरोध से अमुख्य ( गुण ) मे व्यतिक्रम किया जाता है और मुख्य को अनुगृहीत किया जाता है- यह सिद्धान्त किया गया है । क्योकि गुण, मुख्य के लिये होता है । उत्पत्तिविधि को देखते हुए वेदान्त की पद्धति के अनुसार सामो का 'साङ्गप्रधान सम्बन्धादुपाशुत्वं तु गम्यते' --साग प्रधान के साथ सम्बन्ध रहने से उनमें उपांशुत्व प्रतीत होता है, ऐसा तंत्रवार्तिक मे कहा गया है । अन्यत्र भी कहा गया है कि ' आघानयजुष्' याजुर्वेदिक प्रधानविधि से विहित होने से ही उनको ' उपाशु' स्वर से कहा जाता है । " य एवं विद्वान् वामदेव्यं गायति " इत्यादिवाक्य, यजुर्वेद के ही है । इस रीति से याजुर्वेदिक ज्योतिष्टोमाङ्गभूत स्तोत्र, f शस्त्रादिकों का भी क्या उपाशुस्वर होगा । हाँ, होना चाहिये था, किन्तु वचनविशेष के बल से सर्वत्र अन्यस्वर ( स्वरान्तर ) होता है । " मन्द्रयाज्यभागान्तं पर मध्यमया, उत्तमयानुयाजादि" यह वचन स्वरान्तर करने में प्रमाण है । 1 1 यह जो कहा है कि "ऋचा त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्या यज्ञस्थ मात्रा विमिमीत उत्वः ॥ ” ( ऋ० सं० २०७१/११ ) "ऋत्विककर्मणा विनियोगमाचष्टे" ( निरु० ११८ ) इस मंत्र मे निश्क्त की रीति से ऋत्विकका विधान है, चतुर्थचरण के व्याख्यान में एक ऋत्विक यज्ञ की मात्रा ( विस्तार ) को मापता है, वह अध्वर्युं कहलाता हैं, अर्थात् यज्ञ स्वरूप के निष्पादक ऋत्विक् को अध्वर्यु कहते है । यज्ञस्वरूप के निष्पादक क्रमों के मन्त्रो को यजुर्वेद में पढ़ा गया है । इस कारण याज्ञिको ने यजुर्वेद को ' आध्वर्यववेद' यह नाम दिया है । यजुर्वेद के मन्त्रो से किये जानेवाले कर्मों का विधान यजुर्वेद के ब्राह्मण में है । इस रीति से मन्त्रों के विनियोजकरूप के व्याख्यानरूप यजुर्वेद ब्राह्मण को भी 'आध्वर्यव ' शब्द से कहा जाता है ।
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वेदार्थपारिजातः १ ९ २४ जकरूपव्याख्यानत्वाद् यजुर्वेदब्राह्मणमपि आध्वर्यवमित्युच्यते ' इति । तदेतत्सवं मूढजनप्रतारणमेव । त्वदभिमते मन्त्रात्मक- वेदे कर्मणा विधानाभावात्, चरमया पक्त्या त्वयाऽपि तत्स्वीकारात् । यद्यपि यथा पाणिनीयव्याकरणस्याध्येतारोऽपि पाणिनीया उच्यन्ते, पाणिनीये महाभाष्यादयोऽपि पाणिनीय- नाम्ना व्यवह्रियन्ते" यथा वा व्याख्यारूपयोगात् पाणिनिसूत्रव्याख्याग्रन्थेष्वपि पाणिनीयशब्द प्रयुज्यते, तद्वद् ब्राह्मणस्वरूप- व्याख्यानग्रन्थेष्वपि वेदशब्दप्रयोगो भाको भवति, मुख्यस्तु वेदशब्दो मन्त्रेष्वेव । अतः - "वेदसयोगात्" ( मी० ३।४।२८ ) इत्यत्र वेदशब्दो भाक्त एवेति तदपि नि सारम् निर्मूलत्वात् भाष्यादिषु तथाऽस्वीकारात् ॥ "गुणत्वाच्च वेदेन न व्यवस्था स्यात्" ( जे० सू० ३८| १२ ) श्येनयागे श्रुतम्- "लोहितोष्णीषा लोहितवसना ऋत्विजः प्रचरन्ति" इतिश्येने श्रुतम्, हिरण्यमालिनः ऋत्विजः प्रचरन्ति" इति वाजपेये श्रुतम् । एव लोहितोष्णीषत्व -हिरण्यमालित्वादयो धर्माः क्रमेणौद्गात्रे आध्वर्यवे च वेदे निर्दिष्टास्तत्तद्वेदसबद्धानामृत्विजामेव धर्माः समेषा वा धर्मा इत्येव विचारे सिद्धान्तसूत्रमिदम्- लोहितो-ष्णीषत्वादयो गुणाः सन्ति, तेन नेषामोद्गात्र ऽऽध्वर्यवादिसंज्ञाद्वारा व्यवस्थान भवति, तेन सर्वेषामेवैते गुणा । ( ४, ५, ६, ) सख्यातेषु पठितस्य बेदशब्दस्यात्राऽऽभिप्रायोऽपि ३ सख्यासूत्रस्येव ज्ञातव्य: । 'अत्र तद्वेदसम्बद्धेषु ब्राह्मणेषु भाक्तो वेद- शब्दप्रयोगः' इति, तदपि निर्मूलम्, मुख्यबाध एव भाक्तः प्रयोगः सम्भवति न चात्रबाधो दृश्यते, मन्त्रब्राह्मणयोरुभयोरपि वेदशब्दस्य मुख्यत्वोपपत्ते । ये ये बाधकास्ते तु निरस्ता एव । व्यासजैमिन्यादिमहर्षीणा निःसङ्कोचेन मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु च वेदाम्नायश्रुत्यादिशब्दप्रयोगाच्च तत्र मुख्य एव प्रयोग इति निश्चप्रचम् । 'विधो तु वेदसंयोगात्' (जै० सू० ६/ ७/ २९ ) अत्रापि शाबरभाष्यरीत्या वेदशब्दो ब्राह्मणवचने प्रवृत्त । अत्रापि भाक्ता ( गौणा ) र्थाश्रयणमसङ्गतमेव, मुख्यगौणार्थयोर्मुख्यार्थ सम्प्रत्ययस्यैव न्याय्यत्वात् । किन्तु तुम्हारा यह सब कथन मूढजनो को भुलावा देना अर्थात् उनकी प्रतारणा करना मात्र है । क्योकि तुम्हारे मत मे जो मन्त्रात्मक वेद है उनमें कर्मों का विधान नही हैं, इस बात को तुमने स्वयं चरम पंक्ति में स्वीकार भी किया है । यह जो तुमने कहा है कि जैसे-पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन करनेवाले 'पाणिनीय' कहलाते हैं", पाणिनीय व्याकरण में महाभाष्यादिकों को भी ' पाणिनीय ' नाम से कहते हैं, अथवा व्याख्यात्मक सम्बन्ध के कारण पाणिनिसूत्र के व्याख्याग्रन्थों के लिये भी 'पाणिनीय' शब्द का प्रयोग किया जाता है । उसी तरह ब्राह्मणात्मक व्याख्या ग्रन्थो के लिये भी 'वेद' शब्द का प्रयोग भाक्त (लाक्षणिक ) है और वेद शब्द का मुख्य प्रयोग मन्त्रो के लिये ही है । अतः 'वेदसंयोगात्' - ( मी० सू० ३| ४| ३८ ) इस सूत्र मे 'वेद' शब्द का प्रयोग भाक्त ( लाक्षणिक ) ही है । वह भी निर्मूल होने से निःसार है । भाष्यादिग्रन्थों में उसे स्वीकार नही किया गया है । "गुणत्वाच्च वेदेन न व्यवस्था स्यात्' ( जै० सू० ३।८।१२ ) श्येनयाग में यह वाक्य श्रुत है- 'लोहितोष्णीषा लोहित-वसना ऋत्विज' प्रचरन्ति' तथा 'हिरण्यमालिन ऋत्विज प्रचरन्ति' यह वाक्य वाजपेय में श्रुत है । लोहितोष्णीषत्व, हिरण्यमालित्व आदि धर्म हैं, इन धर्मों को क्रमश: औद्गात्र और आध्वर्यव वेद में बताया गया है । ऐसी स्थिति में संदेह होता है कि ये धर्म, तत्तद्वेद-ऋत्विजों के ही है अथवा सभी ऋत्विजो के है? इस प्रकार विचार चलने पर उपर्युक्त सिद्धान्त सूत्र निर्णय देता है कि 'लोहितोष्णी-षत्वादि' गुण है । इस कारण इन गुणो ( धर्मो ) की औद्गात्र, आध्वर्यव आदि संज्ञा द्वारा व्यवस्था नही होगी । अतः ये सभी ऋत्विजो के धर्म हैं । ४१५१६ संख्या पर पूर्वपठित वेद शब्द का अभिप्राय भी ३ संख्या के सूत्र के समान समझना चाहिये । 'यहाँ पर तवेद- सम्बद्ध ब्राह्मणो में वेद शब्द का प्रयोग भाक्त है' यह जो कहा, वह भी निर्मूल है । मुख्यका बाघ होने पर ही भाक्त प्रयोग का संभव रहता है, किन्तु यहाँ मुख्य का बाघ नही हो रहा है । मन्त्र ब्राह्मण दोनो में भी वेद शब्द की मुख्यता उपपन्न है । ब्राह्मण में वेद शब्द के मुख्य प्रयोग करने में जी जो बाधक उपस्थित किये गये, उन सबका खण्डन हो ही गया है । मन्त्र और ब्राह्मण दोनों में व्याप्त, जैमिनि आदि महर्षियों ने निःसंकोच होकर वेद, अम्नाय श्रुति शब्दो का मुख्य अर्थ मे ही प्रयोग किया है, यह निश्चित हो जाता है । 'विधी तु वेदसंयोगात्' --( जै० सून ६।२९ ) यहाँ भी शावर भाष्य के अनुसार 'वेद' शब्द ब्राह्मणरूप मुख्यअर्थ को बताने के लिये ही प्रयुक्त हुआ है । यहाँ पर भाक्त ( गौण ) अर्थ का आश्रय करना असङ्गत ही है, क्योंकि मुख्यार्थ और गौणार्थ दोनो प्राप्त होने पर मुख्यार्थ का आश्रय करना ही उचित माना गया है ।
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वेदार्थपारिजातः १ ९ २५ यत्तु — ' स्वीकृतमेवैतत् ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' इति सूत्रेण विधीयमानपारिभाषिक संज्ञा यज्ञसम्बन्धि- ग्रन्थेषु मन्तव्या, पूर्वमीमासाऽपि यज्ञकर्मणा सहैव सबद्धा, अतः पारिभाषिक- संज्ञानुसारेणैव भगवता जैमिनिना स्वशास्त्रे सा स्वीकृता' इति, तदपि न सगतम् त्वदुक्त्यैव त्वत्पक्षस्य समूलोन्मूलनात् । सज्ञा चेय मन्त्रब्राह्मणयोरुभयोरपि समानैव, अन्यथा मन्त्रस्य वेदत्वे स्वत सिद्धे संज्ञाविधायके सूत्रे ब्राह्मणग्रहणस्य वैयर्थ्यापातात् । किञ्च पूर्वमुकमायुष्मता कृष्णयजुर्वेदीयानामियं मज्ञा तच्छास्त्र एवोपयुज्यते, पाणिन्यादिसर्वनामसज्ञावत्, तथात्वे कथ जैमिनिनापि स्वशास्त्रे सा संज्ञा: स्वीकृता, तेन त्वत्पक्ष खण्डित एव । किञ्च यज्ञ यागादिः किं कृष्णयजुर्वेदीयानामेवोत सर्ववेदीयः । यदि सर्ववेदीयस्तहि कथं तत्र कृष्णयजुर्वेदीयाना तच्छास्त्र एवोपयोक्तव्याया वेदसंज्ञाया उपयोगः, एतेनापि त्वदीय• पक्षः खण्डित, न प्रथम: पक्ष, ' अग्निहोत्रफला वेदा' इति महाभारतवचनविरोधात् किञ्च, मीमासाऽपि किं जैमिनिना ,? 1, कृष्णयजुर्वेदीययज्ञविचारार्थं निर्मिता सर्ववेदसामान्ययज्ञविचारार्थ वा नाद्यः निर्मूलत्वात् अन्त्यश्चेत् खण्डित एव त्वत्पक्षः । यज्ञाः सर्ववेदसमताः तद्विचारार्थं मीमासाशास्त्रमपि न केवल कृष्णयजुर्वेद संबद्धम्, अतएव तदङ्गीकृतवेद- सज्ञापि न ' कृष्णयजुर्वेदीया, कात्यायन- कौशिक-पारस्कर व्यास- जैमिन्यादिभिः सर्वैरपि मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु च वेदशब्दप्रयोगात् । यत्तु - 'वेदांश्चैके सन्निकर्षं पुरुषाख्या' ( मी० १११।२७ ) इति सूत्रे पारिभाषिक संज्ञा जैमिनिनाऽभिप्रेता' इति तदप्यर्धजरतीयमेव । नहि स्वशास्त्रे सर्वत्र यो मन्त्रेषु ब्राह्मणेष्वविशेषेण वेदशब्दं प्रयुङ्क्ते स एव वेदापोरुषेयत्वसाधनावसरे ', ', वेदशब्दं केवले मन्त्रे प्रयुञ्जीत इति । यदपि मीमासाशास्त्रं द्वितीयपादादारभ्यते प्रथमपादस्तु भूमिकारूप इति तदपि विरुद्धमेव । सूत्रभाष्यादिविरुद्धत्वात्, धर्मविचार प्रतिज्ञा धर्मलक्षण-तत्प्रमाणादिनिरूपणस्यावश्य मीमांस्यत्वात् । यथा यह जो तुमने कहा है- ' यह स्वीकृत हो ही चुका है कि "मन्त्र ब्राह्मणयोर्वेदनाम " सूत्र से बताई गयी पारिभाषिक सज्ञा को यज्ञसम्बन्धि ग्रंथों में मानना चाहिये, पूर्वमीमासा भी यज्ञकर्म से ही सम्बद्ध है, अत: पारिभाषिक संज्ञा के अनुसार ही भगवान् जैमिनि ने अपने शास्त्र मे उसे स्वीकृत किया है' - वह भी सङ्गत नही है । तुम्हारे कथन से ही तुम्हारे पक्ष का समूह उन्मूलन हो जाता है । मन्त्र-ब्राह्मण दोनो के लिये यह ' वेद' संज्ञा समान रूप से ही है । अन्यथा ' मन्त्र' का वेदत्व तो स्वतः सिद्ध है, तब सज्ञाविधायक सूत्र में ' ब्राह्मण' का ग्रहण करना ही व्यर्थ होगा । किञ्च - तुमने पहले कहा है कि यह संज्ञा यजुर्वेदीयों की है, इस कारण उनके शास्त्र में ही उसका उपयोग होता है, जैसे पाणिनि की दी हुई सर्वनाम संज्ञा का उपयोग पाणिनीयशास्त्र में ही किया जाता है । तब जैमिनि ने भी स्वशास्त्र में उस संज्ञा का स्वीकार क्यो किया? जैमिनि से उस संज्ञा का स्वीकार किये जाने के कारण तुम्हारा पक्ष तो खण्डित हो ही गया । किञ्च -- क्या यज्ञयागादि कृष्णयजुर्वेदियों के लिये ही है, या सभी वेदियो के लिये है? यदि सर्ववेदियो के लिये हो तो कृष्णयजु-वैदियों के शास्त्र में ही उपयुक्त होने वाली 'वेदसंज्ञा' का सर्वत्र उपयोग कैसे होगा? इस तर्क से भी तुम्हारे पक्ष का खण्डन हो जाता है । अब रहा प्रथम पक्ष, तो वह भी ठीक नही है, क्योकि 'अग्निहोत्रफला वेदा:' इस महाभारत के वचन से विरोध होता है । किञ्च - क्या कृष्णयजुर्वेदीय यज्ञविचार के लिये ही जैमिनि ने मीमासा का निर्माण किया है, या सर्ववेदसामान्य यज्ञविचार के लिए उसका निर्माण किया गया है? प्रथम पक्ष तो इसलिये ठीक नही है कि वह निर्मूल है । यदि द्वितीय ( अन्तिम ) पक्ष हो तो उसका खण्डन पहले ही हो चुका है । यज्ञो का सम्बन्ध तो सभी वेदों से है । उन यज्ञो के विचारार्थ प्रवृत्त हुए मोमासाशास्त्र को भी सभी वेदों से सम्बद्ध कहना होगा, तब उस मीमांसाशास्त्र के द्वारा स्वीकार की गयी ' वेद' संज्ञा को केवल कृष्णयजुर्वेद मात्र से हो सम्बद्ध समझना बडी भूल है । कात्यायन, कौशिक, पारस्कर, व्यास, जैमिनि आदि सभी महर्षियों ने ' वेद' शब्द का प्रयोग मन्त्र और ब्राह्मण दोनो अर्थो में किया है । यह जो कहा है कि 'वेदाश्चैके सन्निकर्षं पुरुषाख्या -( मी ० सू० १११/२७ ) 'इस सूत्र मे जैमिनि को पारिभाषिक संज्ञा अभिप्रेत है ' वह भी अर्धजरतीय है । क्योंकि जो अपने शास्त्र में सर्वत्र मन्त्रब्राह्मणों में समानरूप से 'वेद' शब्द का प्रयोग करता रहा है, वही वेदाsपौरुषेयत्व साधन के समय वेद शब्द का प्रयोग केवल ' मन्त्र' के लिये ही कैसे करेगा, और यह भी जो कहा है कि ' मीमांसाशास्त्र तो प्रथमाध्याय के द्वितीयपाद से आरंभ होता है, और प्रथम पाद तो उसका भूमिकारूप है, वह भी नितान्त विरुद्ध है । उपर्युक्त कथन
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१ ९ २६ वेदार्थपारिजात' उत्तरमीमासाशास्त्रे ब्रह्मविचार प्रतिज्ञा ब्रह्मलक्षणम्, तत्र प्रमाणोपन्यासादिकमपि मीमांसाशास्त्रमेव, न तद् भूमिकामात्रम्, तथैव प्रकृतेऽपि । यदपि " यतो यज्ञसम्बन्धिना ब्राह्मणवचनाना विचारारम्भस्तस्य द्वितीयपादस्य प्रथमसूत्रे आम्नायस्य क्रियार्थ-, त्वादित्यत्र आम्नायेतिविशेषपदप्रयोगः । आम्नायस्य क्रियार्थकता च निर्दिष्टा एतेन विज्ञायते सम्पूर्णेऽग्रिमे शास्त्रे आम्नायवचनान्येव विचारयिष्यन्ते ' ( पृ० १०८ ) इति, तदपि त्वदीयाचार्यविरुद्धमेव, त्वदीयेन स्वामिना तु वेदाम्नायश्रुतीनां ':. पर्यायवाचकत्वोक्तेः । यदपि सूत्रकारेण पारिभाषिक संज्ञाया विधानमकृत्वा याज्ञिकसम्प्रदायप्रसिद्धा आम्नाय पुन मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च' ( कौशिकसूत्र १-३ ) इति सूत्रनिर्दिष्टाम्नायसज्ञा निर्दिष्टा, समानतन्त्रे प्रसिद्धसज्ञायाः संज्ञासज्ञि- सम्बन्धनिर्देशमन्तरापि शास्त्रकृता व्यवहारदर्शनात् । पाणिनिः " वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदविशेष:' ( पा० सू० १/२/६५ ) इति सूत्रे स्वशास्त्रीयवृद्धसंज्ञाया भिन्नार्थकत्वेऽपि पूर्वाचार्याणां वृद्धसज्ञायाः पाणिनिना व्यवहृतत्वात्" इति तदप्यशुद्धमेव, तादृशविचारस्य मीमासक- सम्प्रदायबाह्यत्वात् । " वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद्वृद्धम्" इति पाणिनीयसूत्रेण विहिताया वृद्धसज्ञाया. प्राचा वृद्धसज्ञापेक्षया भिन्नार्थत्वावगमेऽपि कौशिककात्यायनापस्तम्बादिकृत - वेदाम्नायसज्ञापेक्षया जैमिनिकृतवेदसज्ञाया भिन्नार्थकत्वानवगमात् । ,. यदि जैमिनीयमीमासाशास्त्रेणापस्तम्बश्रौतसूत्रस्य समानतन्त्रताभ्युपगम्यते तदा कात्यायनगोभिलाश्वलायनादिसूत्रे समानतन्त्रतावश्यमभ्युपगन्तव्या । तथात्वे चापस्तम्बादिकृता वेदसज्ञा समानतन्त्रत्वात्तेरप्यङ्गीकृतैवेति कुतो नाङ्गीक्रियते । अङ्गीक्रियते चेद् अन्ये. सूत्रकारैर्वेदिकेश्च मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञा नाङ्गीकृतेति त्वदीयकथन त्वद्रीत्येव कथ न खण्डितं स्यात् । सूत्र, भाष्य वादि के विरुद्ध है । धर्मविचार, प्रतिज्ञा, धर्मलक्षण, उसके प्रमाण आदि का निरुपण करना अवश्य विचारणीय,,, उत्तरमीमांसाशास्त्र मे ब्रह्मविचार प्रतिज्ञा ब्रह्मलक्षण उसमे प्रमाण का उपन्यास आदि करना भी मीमासाशात्र है । जैसे,, भूमिका मात्र नही है उसी तरह प्रकृत में भी समझना चाहिये । ही है वह केवल यह जो कहा कहा है कि - "यज्ञ से सम्बन्धित ब्राह्मणवाक्यो के विचार का आरंभ, प्रथमाध्याय के ' ', ' ' सूत्र आम्नायस्य क्रियार्थत्वात् से किया गया है इसी कारण आम्नाय इस विशेष पद का प्रयोग किया द्वितीयपाद के प्रथम भी निर्दिष्ट की गई है । इससे यह समझ में आ जाता है कि सम्पूर्ण अग्रिम शास्त्र में आम्नाय है । आम्नाय की क्रियार्थकता जाएगा" ( पृ० १०८ ) । किन्तु वह भी तुम्हारे आचार्य के विरुद्ध ही है । तुम्हारे स्वामी ने के वाक्यो का ही विचार किया पर्यायवाचक बताया है । सूत्रकार ने जो पारिभाषिक संज्ञा का श्रुति इनसब को ' -- ( ) ' विधान न करके याज्ञिकसम्प्रदायप्रसिद्धतो वेद, आम्नाय' ब्राह्मणानि च कौशिकसूत्र १-२, इस - सूत्र से निर्दिष्ट आम्नाय सज्ञा का निर्देश कियादिखलाईहै । पड़ते माम्नयाःहैं । पुनः, मन्त्राश्च समानतन्त्र में प्रसिद्ध संज्ञा का व्यवहार संज्ञा संज्ञि सम्बन्ध निर्देश के बिना भी शास्त्रकार करते वह भी उचित ही है क्योकि यह जो कहा है कि " वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेष' ( पा० सू० ११२/ ६५ ) इस सूत्र "भिन्न अर्थ रहने पर भी पूर्वाचार्यों की वृद्धसंज्ञा का पाणिनि ने व्यवहार किया है वह भी नितान्त मे स्वशास्त्रीय वृद्धसंज्ञा का " ” मीमांसासम्प्रदाय के बहिर्भूत है । वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद्वृद्ध म् इस पाणिनीय सूत्र से विहित 'वृद्ध'अशुद्धसंज्ञाहै का। ऐसीअर्थ, विचारसरणिप्राचीनो की वृद्धतो संज्ञा की अपेक्षा भिन्न है, यह ज्ञात रहने पर भी कौशिक, कात्यायन, आपस्तम्ब आदि कृत ' ' वेद संज्ञा के भिन्न अर्थ होने का ज्ञान नही है । यदि जैमिनीय मीमासाशास्त्र के साथ आपस्तम्बवेद-आम्नायश्रौतसूत्र कोसंज्ञासमानतन्त्रताकी अपेक्षा जैमिनिकृतस्वीकार,,तो कात्यायन गोभिल आश्वलायन आदि सूत्रों के साथ भी जैमिनीय मीमांसा को समानतन्त्रता हैस्थिति में समानतन्त्रता के कारण आपस्तम्बादिकृत वेदसज्ञो का अंगीकार उन्होंने अवश्य स्वीकार करनी होगी । ऐसी' ' ',,? तुम्हें आपस्तम्बादिकृत वेद संज्ञा का स्वीकार जैमिनि ने कर लिया यह भी करलिया होगा यह क्यों नही मानते हो यदि वैदिकों ने मन्त्र ब्राह्मण दोनों को वेदसंज्ञा का होना स्वीकार नहीं किया है -मान्य हो तो तुम्हारा पूर्व वक्तव्य - अन्य सूत्रकारो ने एवं कहा है कि 'जै० सू० १११२४१ और १२२४१३० दोनो स्थलों में आम्नायवाचकका तुम्हारी ही रीति से खण्डन हो जाता है । यह जो तुमने शब्द का प्रयोग उपलब्ध होता है । और भाष्य के अनुसार
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वेदार्थपारिजातः १ ९ २७ यदपि ' आम्नायवचनशब्दप्रयोगः जैमिनिसूत्रेषु ( ११| २| ४१ | १२| ४| ३० ) उभयत्र लभ्यते । तस्य च भाष्यानुसारेण ब्राह्मण- वचनमेवार्थ:' इति, तदपि यत्किञ्चित् यथायोग्य सर्वत्र वेदाम्नायश्रत्यादिशब्दानां मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु च प्रयोगस्यास्तिक- सम्मतत्वात् । यत्तु वेदापौरुषेयत्वाधिकरणं " परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम् " ( जै ० सू० ११।३१ ) इत्यत्रैव समाप्यते, पूर्वपक्षोद्- " भात्रितयोर्वेदानित्यत्वसाधकयोः पूरुषाख्यादर्शनाऽनित्यदर्शनरूपयोर्हेत्वोस्तावतैव निराकृतत्वात् । कृते वा विनियोगः स्यात् कर्मणः सम्बन्धात्" ( १ १ ३२ ) इति संगतिदर्शनार्थं सूत्राऽ नारूढं पूर्वपक्षमुत्थाप्य 'कृते वा ' इति सूत्रेण समाधानं | कृतम् इति, तदेतच्चिन्त्यम्, पूर्वपक्षोदाहृतानां "वनस्पतयः सत्रमासत”, “सर्पाः सत्रमासत" इति वचनानामर्थंवादत्वोक्त्या क्रियाप्रशंसाद्वारा विधिवाक्यैकवाक्यतां प्रदर्श्य पूर्वपक्षसमाधान कृतम् । तदेतत् पुनरुक्तदोषदूषितम्, विधिनात्वेकवाक्यत्वा- दिति गतार्थत्वादिति, तदपि यत्किञ्चित् वेदापौरुषेयत्वाधिकरण वेदानामप्रामाण्यकारणनिराकरणद्वारा प्रामाण्यप्रति- पादनायैव प्रवृत्तम्, तत्र यथा 'बवरः प्रावाहणिरकामयत' इत्यादिवचनेन चाप्रामाण्यमाशङ्क्यते, तथैव "वनस्पतयः सत्र- मासत " इत्यादिवचनान्यपि तथैवाऽप्रामाण्यहेतुत्वेन शक्यशङ्कान्येवेति तन्निराकरणमपेक्षितमेव । अत एवैतद् युक्तमेव, अथ कथमवगम्यते नायमुन्मत्तबालवाक्यसदृश इति । तथा हि पश्यामः "वनस्पतयः सत्रमासत" ' सर्पाः सत्रमासत', 'जरद्गवो गायति मद्रकाणि', इति । कथं नाम जरद्गवो गायेत्, कथ वा वनस्पतयः सर्पा वा सत्रमासीरन्निति पूर्वपक्षोत्थापनम्, ननु नायं सूत्रारूढः पूर्वपक्ष इति, उत्तरपक्षेणापि पूर्वपक्षकल्पनासभवात् पूर्वोत्तरमीमासयो र्व्याकरणशास्त्र शब्दरत्ने भूत्यादी च उत्तरपक्षेणैव पूर्वपक्षकल्पनाया दृष्टचरत्वात् । 1 यदुक्त यदि शबरस्वामिरीत्या वेदशब्दस्य मन्त्रा ब्राह्मणानि चार्थः, तदा वेदप्रसङ्गस्याव्यवहितपूर्वत्र उसका अर्थ 'ब्राह्मण ' ही है ।" वह भी ठीक नही है । आस्तिक लोग जहाँ जैसा उचित हो उस दृष्टि से वेद, आम्नाय श्रुति आदि शब्दो का मन्त्र और ब्राह्मण के अर्थ मे प्रयोग किया करते है । , यह जो कहा है कि वेदाsपौरुषेयत्वाधिकरण "परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम्' -( जै० सू ० १1१1३१ ) इस सूत्रपर ही समाप्त होता है, क्योकि पूर्वपक्षी के द्वारा उपस्थित किये गये वेद की अनित्यता के साधक पुरुषाख्यादर्शन और अनित्यदर्शनरूप दोनो हेतुओ का उसी से निराकरण हो जाता है । "कृते वा विनियोगः स्यात् कर्मण सम्बन्धात्" -( १ । १ । ३२ ) यह सूत्र सङ्गति का प्रदर्शन करने 1 के लिये सूत्रानारूढ पूर्वपक्ष की कल्पना कर उसका समाधान कर रहा है । किन्तु यह सब, विचार अभी परिपक्व नही है, अतः चिन्तनीय 1 हैं । क्योकि पूर्वपक्षी के द्वारा उदाहृत " वनस्पतय. सत्रमासत", "सर्पा. सत्रमासत ", इत्यादि वाक्य अर्थवादरूप है, अत: क्रिया की प्रशंसा द्वारा विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता को प्राप्त करते हैं, यह प्रदर्शित कर पूर्वपक्ष का यहाँ समाधान किया गया है । " यह सब । कथन पुनरुक्तदोष से दूषित है । क्योकि 'विधिनात्वेकवाक्यत्वात्' इससे वह सब गतार्थ है । किन्तु यह कथन भी उचित नही है, क्योंकि वेदाऽपौरुषेयत्वाधिकरण वेदो के अप्रामाण्य का निराकरण करते हुए उनके प्रामाण्य का प्रतिपादन करने के हेतु प्रवृत्त हुआ है । जैसे 'ववरः प्रावाहणि रकामयत ' इस वाक्य से अप्रामाण्य की आशंका की गई है, वैसे ही " वनस्पतय. सत्रमासत ' इत्यादि वाक्यो को देखकर वेदों के अप्रामाण्य की शंका होने लगती है । अतः उस अप्रामाण्य की शका के निराकरणार्थ वेदाऽपौरुषेयत्वाधिकरण की यहाँ आवश्यकता है ही, इस कारण यहाँ पुनरुक्तिदोष न होकर उसका यहाँ कहा जाना उचित ही है । यह कैसे हम समझें कि "वस्नपतयः सत्रमासत, सर्पाः सत्रमासत, जरद्गवो गायति मद्रकाणि " इत्यादि वाक्यसमूह उन्मत्तवाक्य, या बालवाक्य के समान नही है? क्योंकि जरद्गव ( बूढ़ा बैल ) कैसे गा सकता है? वनस्पतियो अथवा सर्पों ने कैसे सत्र ( यज्ञ ) कर पाया होगा? इस प्रकार पूर्वपक्ष को 'उपस्थित किया गया है । यह पूर्वपक्ष सुत्रारूढ़ इस लिये नही है कि उत्तरपक्ष से भी पूर्वपक्ष की कल्पना की जाती है । पूर्वोत्तर मोमासाओ में तथा शब्दरत्न, भूति आदि व्याकरणशास्त्र में भी उत्तरपक्ष से ही पूर्वं पक्ष की कल्पना की गई है, यह प्रायः सभी के प्रत्यक्ष है । यह जो कहा है कि 'यदि शबरस्वामी के अनुसार ' वेद' शब्द का अर्थ मन्त्र और ब्राह्मण दोनों है, तब वेद का प्रसङ्ग तो
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वेदार्थपारिजात १ ९ २८,, विद्यमानत्वात् आम्नायशब्दस्य पुनः प्रयोग क्थम् अनुवर्तमान वेदशब्दस्य विभक्तिव्यत्ययेन सम्बन्धसम्भवात् पुनश्च वेदशब्दम प्रयुज्याम्नायशब्दप्रयोगः किमर्थमिति, तदपि तुच्छम्, अनुवर्तमानो वेदशब्दो द्वितीयाबहुवचनान्तः । स च न क्रियार्थत्वादित्यनेन सम्बन्धाऽर्हः," व्यत्ययेन विभक्त्यन्तरपरिणामस्तु विलष्टक्ल्पनैव । वस्तुतस्त्वनेक सूत्रव्यवधानादनु- वृत्तिरेव दुर्लभा । यत्तु वेदमप्रयुज्याम्नायशब्दस्य प्रयोगे किं कारणमिति; तदपि तुच्छम्, वेदाम्नायशब्दयोः पर्यायवाचकत्वे- ऽप्याम्नायशब्दप्रयोगे मुनेरिच्छाया एव हेतुत्वात् । दयानन्देनापि वेदाम्नायादिशब्दाना पर्यायवाचकत्वमऽभ्युपगतमित्यस कृदावेदितत्वात् । यत्तु — " वेदाश्चैके " इत्यत्र प्रयुक्तो वेदशब्दो मन्त्रमात्रवाचक: ।' इति तदपि तुच्छम्, निर्मूलत्वात् । 'शास्त्रेऽस्मिन् सर्वमन्त्रब्राह्मणसमुदाये जैमिनिना वेदशब्द प्रयुक्त इति त्वदुक्तिविरोधाच्च । बहुत्र तथा प्रयोगस्य संप्रतिपन्नत्वे क्वचिदेकत्र मन्त्र एव वेदपदस्यार्थ इत्युक्ते रुन्मत्तप्रलपितत्वात् । यत्तु 'अग्रिमे शास्त्रे मन्त्राणा ब्राह्मणानां च वाक्यानि विचारयिष्यन्ते, अतोऽत्र विशिष्य पारिभाषिक संज्ञाया. प्रयोग कृत:' इति तदपि तुच्छम् वेदशब्देनापि मन्त्राणा ब्राह्मणाना च ग्रहणसम्भवात् । "मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमिति " इति सर्वषिसम्मतत्वात् त्वयापि तथाऽभ्युपगमाच्च । यत्तु ' उपलब्धे सम्पूर्णवैदिक वाङ्मये किञ्चिदपि तादृशं वचनं नोपलभ्यते, यस्मिन् ब्राह्मणानामपि ईश्वरस्य प्रजापतेर्महाभूतस्य वा निः- श्वसितत्वमुक्तं स्यात्' इति, तत्तुच्छम् वेदानां प्रजापत्यादिभ्यः प्रादुर्भाववर्णनेनैव तदीयमन्त्रभागस्येव तदीयब्राह्मणभागस्यापि तत एवाविर्भावोपपत्तेः । " शेषे ब्राह्मणशब्दः " इति जेमिनिनैव मन्त्रभागेतरभागस्य ब्राह्मणत्वोत्तः, ऋग्वेदयजुर्वेदादिशब्दैरेव मन्त्रब्राह्मणोभयभागस्यापि ग्रहणात् । "अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत्” इति वाक्य एवेतिहास - पुराण- कल्पसूत्रादिशब्दे- रष्टविधब्राह्मणस्यैव निःश्वसितत्त्वोक्तः", श्रीशङ्कराचार्यैस्तथैव व्याख्यातत्त्वात् । अव्यवहित पूर्व से बराबर चल ही रहा है, ऐसी स्थिति में ' आम्नाय' शब्द का पुन प्रयोग कैसे किया गया? अनुवर्तमान वेद शब्द का सम्बन्ध विभक्तिव्यत्यय करके भी किया जा सकता है । और दूसरी बात यह है कि ' वेद' शब्द का प्रयोग न कर 'आम्नाय' शब्द का प्रयोग क्यों किया? किन्तु ये सब व्यर्थ के प्रश्न है । अनुवर्तमान ' वेद' शब्द, द्वितीया बहुवचन में है । उसका सम्बन्ध 'क्रियार्थत्वात्' से करना उचित न होगा । व्यत्यय करके विभक्त्यन्तर परिणाम आदि करना विलष्टकल्पना ही होगी । वास्तव में तो अनेक सूत्रो का व्यवधान होने के कारण अनुवृत्ति के द्वारा उसकी उपलब्धि होना ही दुर्लभ है । यह जो कहना है कि ' वेद' शब्द का प्रयोग न कर ' आम्नाय' शब्द के प्रयोग करने में क्या कारण है? यह तो तुच्छ प्रश्न है । ' वेद ' और 'आम्नाय' दोनो शब्द पर्याय रहने पर भी 'आम्नाय' शब्द के प्रयोग करने में मुनि की इच्छा ही कारण है । दयानन्द ने ,, " " भी वेद आम्नाय आदि शब्दों को पर्यायवाचक माना है यह कई बार हम बता चुके है । यह जो कहा है कि वेद सूत्र में प्रयुक्त वेद शब्द, केवल मन्त्र का ही वाचक है ।' किन्तु यह कथन भी निर्मूल होने से नि सार ही है । 'इस शास्त्र में सर्वत्र जैमिनि ने समस्त मन्त्र ब्राह्मण समुदाय को बताने के लिये ही ' वेद' शब्द का प्रयोग किया है' तुम्हारी इस उक्ति के साथ बिरोध भी होगा । और अनेक जगह वैसा प्रयोग किया है, क्वचित् एकाच जगह मन्त्र के अर्थ में ही ' वेद' शब्द का प्रयोग किया है, ऐसा कहोगे तो उसे उन्मत्तप्रलपित ही कहना होगा । यह जो कहा है कि 'अग्रिम शास्त्र में मन्त्र और ब्राह्मणो के वाक्यो का विचार किया जायगा । अत यहा विशेष रूप से पारिभाषिक संज्ञा का प्रयोग किया है' वह भी सारहीन है । ' वेद' शब्द से मी मन्त्र और ब्राह्मणो का ग्रहण हो सकता है, क्योकि "मन्त्र ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' इस सिद्धान्त को समस्त ऋषियो के समान तुमने भी स्वीकार किया है । यह जो कहा हैं कि - उपलब्ध सम्पूर्ण वैदिक वाड्मय में कोई भी वैसा वचन उपलब्ध नही हो रहा है, जिसमें "ब्राह्मणों" के लिये भी ईश्वर, प्रजापति या महाभूत के निःश्वसित के रूप मे कहा हो ।' वह भी निःसार है, क्योकि--प्रजापति : आदिकों से वेदों के प्रादुर्भाव वर्णन से ही, उसके मन्त्र भाग के समान उसके ब्राह्मण भाग का आविर्भाव भी उसीसे है । "शेषे ब्राह्मण- शब्दः " सूत्र के द्वारा जैमिनि ने ही मन्त्र भाग से अन्य ( इतर) भाग को 'ब्राह्मण' शब्द से बताया है । ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि शब्दो से ही मन्त्र ब्राह्मणात्मक दोनों भागों का ग्रहण किया है । "अस्य महतोभूतस्य निःश्वसितमेतत्" इस वाक्य में ही बताया गया है कि इतिहास, पुराण, कल्पसूत्र आदि शब्दी से अष्टविध ब्राह्मण भी उसके निःश्वसित हैं । श्रीशङ्कराचार्य ने उसी प्रकार उसकी व्याख्या की है ।