वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1071–1080
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1071–1080
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. वेदार्थपारिजात १ ९ ६९ द्रव्यदेवतास्मारकत्वेन चोदनासत्त्वाभावात् । अत एव महर्षिभिः - विधिविधेयस्तकंश्च वेद: ' इत्यत्र विधिपदेन ब्राह्मणमुक्तम्, विधेयपदेन मन्त्रा उक्ताः । ' कपिञ्जलानालभेत' इत्यादिक तु ब्राह्मणमेव मन्त्रधर्मेण पठ्यत इति वैदिकैरभ्युपगमात् । अत एव ' औत्पत्तिकस्तु' इति सूत्रेण सम्पूर्णस्य मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्यैव प्रामाण्यमुक्तम्, न मन्त्ररूपस्य भागविशेषस्य । अत एव शबरस्वाम्यादिभिः सर्वैर्मीमांसकैर्वेदापौरुषेयत्वाधिकरणे ब्राह्मणवचनान्येव विषयत्वेनोपस्थापितानि । तत्रैव - चानित्यत्व-वाक्यरचना पुरुषनाम- संयोगानित्यपदार्थं वर्णनेनानित्यत्वं पौरुषेयत्वञ्चाशङ्कितम् । समानन्यायेन तु मन्त्रेष्वपि तानि सूत्राणि योजयितुं शक्यन्ते । तदुच्छिष्टभोजिना त्वयापि तदनुसारेणैव सूत्राणि स्वपक्षे योजितानि । यत्तु - 'अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व' ( ऋ० १० | ३ ४| १३ ), 'मा गृध. कस्यस्विद्धनम्' ( यजु ० ४०1१ ), 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविशेच्छतं समाः' ( यजु ० ४० २ ) इति चोदना महाभूतनिःश्वसितत्वात् प्रमाणम् । ब्राह्मण- चोदनास्तु पौरुषेयत्वान्न धर्मे प्रमाणमिति, तत्सवं मीमासकबाह्यमेव, उक्तमन्त्राणां चोदनात्वाभावात् । नहि लिङ्लोट्-- तव्य-प्रत्ययदर्शनमेव चोदनाज्ञापकं भवति । ' जर्तिलयवाग्वा जुहुयात्' इति लिङ्प्रत्ययस्यापि चोदनात्वानभ्युगपमात्, ' आग्नेयो- ऽष्टाकपालो भवति' इति लिङ्ग राहित्येऽपि चोदनात्वाभ्युपगमाच्च | ' अक्षेर्मा दोव्यः कृषिमित् कृषस्व' इत्यादिकं तु लिङ्गमेव । सत्यामप्राप्तौ लिङ्गबलेन चोदना कल्पयितुं शक्यते । इह त्वन्वयव्यतिरेकाभ्यामुभयोरिष्टानिष्टकरत्वं विज्ञायत इति न विधिः । ' विधिरत्यन्तमप्राप्तौ ' इति नियमात् । अनधिगतगन्तृत्वेन खलु प्रमाणाना प्रामाण्यमधिगतगन्तृत्वे त्वनुवादकत्वेनाऽप्रामाण्यमेव । 'मा गृधः' इत्यपि न चोदना, ' ईशा वास्यम्' इत्यनेन सर्वस्य ब्रह्मरूपत्वावगती तद्भिन्नस्य धनस्याभावेन गृद्धेरभावस्य भाग हुआ करता है । जैसे मन्त्रों में जहाँ अर्थवशात् पादव्यवस्था होती है, उसे 'ऋ ' कहते हैं, गीति (गान) को ' साम' कहते हैं और इन दोनो से जो शेष बचा उसे ' यजुः' शब्द से कहते है, उसी तरह प्रस्तुत प्रसग में समझना चाहिये । अत एव यह जो कहा है कि 'चोदना' दो प्रकार की है । एक मन्त्रगत और दूसरी ब्राह्मणगत, वह भी अशुद्ध है । क्योकि मन्त्र तो देवता के स्मारक होते हैं, अतः मन्त्रों में चोदना के अस्तित्व का कोई प्रश्न ही नही है । अत एव महर्षियों ने 'विधिविधेय' वचन के विधि शब्द का अर्थ 'ब्राह्मण' बताया है और विधेय पद से 'मन्त्रों' को बताया है । 'कपिञ्जलानालभेत ' इत्यादि ब्राह्मण को ही मन्त्र धर्म से पढ़ा जाता है, ऐसा वैदिको का अभ्युपगम है । अत एव 'औत्पत्तिकस्तु ' सूत्र के द्वारा मन्त्र ब्राह्मणात्मक सम्पूर्ण वेद का ही प्रामाण्य बताया गया है । केवल मन्त्ररूप भागविशेष का नही । इसी कारण शबरस्वामी आदि सभी मीमासकों ने वेदाऽपौरुषेयत्वाधिकरण में ब्राह्मण वाक्यो को ही विचारणीय विषय बनाया है । उन्ही ब्राह्मण वाक्यों के सम्बन्ध मे अनित्यत्व, वाक्यरचना, अर्थात् पुरुषनाम संयोग के कारण अनित्य पदार्थ का वर्णन रहने से अनित्यत्व, पौरुषेयत्व आदि की आशंका को गई है । तत्समान न्याय से मन्त्रों मे भी उन सूत्रो को लगाया जा सकता है । आपने भी इन सूत्रों की योजना उन्ही के अनुसार स्वपक्ष में की है । अतः जो समाधान वहाँ है, उसी समाधान से आपके पक्ष का खण्डन हो जायगा । अपि च, ( ऋ० सं० १० ३४ १३, यजु ० ४० ११, यजु ० ४०/२ ) मन्त्रगत चोदनाओं को महाभूत निःश्वसित होने से आपने प्रमाण माना है, किन्तु ब्राह्मणगत चोदनाओ को पौरुषेय होने से उन्हें धर्म मे प्रमाण नही माना है, किन्तु यह सब मीमासक नही है । लिडु, लोट्, तव्य प्रत्यय का होना ही चोदनात्वसम्प्रदाय के विरुद्ध है,, क्योकि उक्त मन्त्रों में चोदनात्व ( विधित्व ) ( विधित्व ) का बोधक नही । 'जतिलयवाग्वा जुहुयात्' में लिड् प्रत्यय के रहने पर भी चोदनात्व ( विधित्व ) नही माना गया है । और 'आग्नेयोऽष्टाकपालो भवति' में लिड् प्रत्यय के न रहने पर भी चोदनात्व ( विधित्व ) माना जाता है | 'अक्षर्मा दीव्यः०' इत्यादि वाक्य तो लिङ्ग ही है । विधि की प्राप्ति न रहने पर लिङ्ग के बल से विधि ( चोदना ) की कल्पना की जाती है । यहाँ तो अन्वय-व्यतिरेक से दोनो में इष्टानिष्टकरत्व प्रतीत होता है । इस कारण यहाँ विधि नहीं है । विधिरत्यन्तमप्राप्ती' इस नियम के अनुसार विधि को पहचाना जाता है | अनधिगत को अधिगत कराने के कारण ही प्रमाणों का प्रामाण्य माना जाता है । अधिगत को ही यदि अधिगत कराता हो तो उसे अनुवादक कहा जाता है, किन्तु अनुवादक होने से उसे अप्रमाण ही कहा जाता है । इसी तरह 'मा गृषः" यह भी विधि ( चोदना ) नही है, क्योंकि 'ईशा वास्यम्' से सबकी ब्रह्मरूपता का बोध हो जाने पर उससे ( ब्रह्म से ) भिन्न धन का अभाव होने के कारण गर्धा ( आकांक्षा ) का अभाव तो स्वतः प्राप्त हैं, उसके लिये विधि ( विधान ) की आवश्यकता नहीं है । उसी तरह 'जिजीविषेत्' यह भी विधि ( चोदना ) नहीं है, क्योकि जिजीविषा ( जीने की इच्छा ) किसे नहीं रहती; वह तो रागप्रास २४७
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वेदार्थपारिजात' १९७० ' ', स्वतःप्राप्तत्वेन विधानानर्हत्वात् । जिजीविषेत् इत्यपि न चोदना जिजीविषाया रागप्राप्तत्वेन विधातुमशक्यत्वात् ॥ पुराणेतिहासाद्यष्टविधब्राह्मणस्यापि महाभूतनिःश्वसितत्वात् । ब्राह्मणस्य पौरुषेयत्वकथनमप्यज्ञानमूलकमेव, श्रीशङ्कराचार्येण तथोक्तत्वात् न च तदप्रमाणम् त्वया तद्वचनेन चतुर्विधमन्त्रजातस्य वेदत्वसाधनात् । अयमाक्षेपः सूत्रबहिर्भूत इत्युक्त्वा त्वया स्वपक्ष एव खण्डितः । प्रकृतसूत्रशाब रभाष्योक्त पूर्वपक्षस्य त्वया सूत्रानारूढत्वेन खण्डितत्वात् । 'यत्रोभयोः समो दोषः परिहारश्च तादृशः । नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्ताद्गर्थविचारणे ॥ ' इति विरोधाच्च । यत्तु -'वा' इति पूर्वपक्षनिवृत्त्यर्थः कृते मन्त्रेषु यज्ञानां दर्शने कर्मणः कर्मभिः सह मन्त्राणां सम्बन्धात् विनियोगः, विनियोजक ब्राह्मणं प्रमाणं स्यादिति सूत्रार्थवर्णनम् । तत्तु सर्वथाऽशुद्धमुपहासास्पदश्च, व्याकरण-काव्य- कोशा-दिभिस्तेषां शब्दानां तदर्थत्वासिद्धेः । 'कृते ' इत्यस्य ' मन्त्रेषु यज्ञानां दर्शने ' इत्यर्थः समाजिनामेव गलेऽवतरिष्यति, तथैव ' कर्मणः ' इत्यस्य 'कर्मभिः सह मन्त्राणाम्' इत्यर्थोऽपि मीमांसकम्मन्यस्य तवैव शोभते, विनियोगशब्दस्य ब्राह्मणमर्थं इत्यपि सर्वथा निर्मूलम्, पूर्वैर्विनियोजकं ब्राह्मणमुक्तं न विनियोगः, प्रमाणमित्यपि सूत्रबहिर्भूतम् । अनयैव बुद्धया शाबर- भाष्यकौमारिलवात्तिकखण्डनमभिलष्यत इति महच्चित्रम् | -- -', ' ' यत्तु तदेतत्सत्यम् मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि इति ', मन्त्रेषु ऋषिभिः कर्माणि दृष्टानि । तेनाग्निहोत्रादियज्ञानां विधानं मन्त्रेषु दृष्टमिति । तदप्यशुद्धम् मन्त्रार्थानव- --,? बोधात् । श्रीशङ्कराचार्यरीत्याऽयं मन्त्रार्थः तदेतत्सत्यमवितथम् किम् मन्त्रेषु ऋग्वेदाद्येषु कर्माण्यग्निहोत्रादीनि ,, मन्त्रैरेव प्रकाशितानि कवयो मेधाविनो वसिष्ठादयः यान्यपश्यन् दृष्टवन्तः यत्तदेतत्सत्यमेकान्तपुरुषार्थ-साधनत्वात् । तानि वेदविहितानि ऋषिदृष्टानि कर्माणि त्रेतायां त्रयीयोगलक्षणायामाध्वयंवोद्गात्रप्रकाराधिकरण- है । अत उसके लिए विधान की आवश्यकता नही है, क्योंकि विधान तो अप्राप्त का ही होता है । पुराण, इतिहासादि अष्टविध ब्राह्मण भी महान् भूत के ही निःश्वसित रूप है । तब ब्राह्मण भाग को पौरुषेय कहना अपने अज्ञान को प्रकट करना ही है । श्रीशंकराचार्य ने भी ब्राह्मण को अपौरुषेय बताया है । उनके कथन ( वचन ) को अप्रमाण नही कह सकते हो, क्योंकि आपने उनके वचनो को प्रमाण लान कर ही चतुर्विध मन्त्रसमुदाय में वेदत्व सिद्ध किया है । इस आक्षेप को सूत्रबहिर्भूत बताकर आपने अपने पक्ष को ही खण्डित कर Iडाला, क्योंकि प्रकृत सूत्र पर शाबरभाष्योक्त पूर्वपक्ष को आपने सूत्रानारूढ होने से खण्डित किया है और ' यत्रोभयोः समो दोष:' इस उक्ति से विरोध भी हो रहा है । यह जो कहा है कि 'वा' शब्द पूर्वपक्ष की निवृत्ति के लिये है, मन्त्रों में यज्ञो का दर्शन करने पर कर्म के साथ मन्त्रों का सम्बन्ध करने से विनियोजक ब्राह्मण प्रमाण है । इस प्रकार किया हुआ सूत्रार्थवर्णन सर्वथा अशुद्ध और उपहासास्पद है, क्योकि शब्दों का अर्थ व्याकरण, काव्य, कोष आदि से जाना जाता है । किन्तु मीमांसकजी का किया हुआ सूत्रार्थ व्याकरण, काव्य, कोषादि किसी से भी नही निकल रहा है । 'कृते' का अर्थ जो किया है कि 'मन्त्रेषु यज्ञानां दर्शने' वह अर्थ तो समाजियो के ही गले में उतरेगा । उसी तरह 'कर्मणः ' का अर्थ 'कर्मभिः सह मन्त्राणाम्' जो किया है, वह भी आप जैसे मीमांसकम्मन्य को ही शोभा देता है । ' विनि-योग' शब्द का अर्थ 'ब्राह्मण' किया है, वह भी सर्वथा निर्मूल है, पूर्ववर्ती पारम्परिक विद्वानो ने 'ब्राह्मण' को विनियोजक बताया है, विनियोग नहीं । आगे चलकर 'प्रमाणम्' कहा है, वह भी सूत्रबहिर्भूत है । क्या आप इसी प्रकार की विपर्यय बुद्धि से शाबरभाष्य और कौमारिल वार्तिक के खण्डन करने का दुःसाहस करने जा रहे हैं? महान् आश्चर्य है! यह जो कहा है कि ' तदेतत्सत्यं... सन्वतानि' । इससे प्रतीत होता है कि 'ऋषियों ने अग्निहोत्रादि यज्ञों का विधान मन्त्रों '' में देखा । किन्तु वह भी मन्त्रार्थं का ज्ञान न होने से अशुद्ध है । श्रीशंकराचार्य की रीति के अनुसार मन्त्रार्थ इस प्रकार है - यह जो कुछ है वह सत्य है । वह क्या है? ऋग्वेद के प्रारम्भिक मन्त्रों में अग्निहोत्रादि कर्मों से ही प्रकाशित किया गया है, जिन्हें वसिष्ठादि मेघानी कवियों ने देखा था । जो कुछ निर्दिष्ट किया गया है, वह सत्य है, क्योकि उसमें पुरुषार्थ-साधनता निश्चित रूप से है । उपर्युक्त क्रमों का अनुष्ठान, येता युग में प्रायशः होता रहता था । अत: तुम लोग 4 भी उनका अनुष्ठान करो, फल की इच्छा रखनेवाले तुम लोगों
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वेदार्थपारिजातः १ ९ ७१ } भूतायाम्, बहुधा बहुप्रकारं सन्ततानि प्रवृत्तानि क्रियमाणानि कर्मभिः क्रियमाणानि, त्रेताया युगे वा प्रायशः प्रवृत्तानि । अतो यूयं तान्याचरथ निर्वर्तयथ, नियतं सत्यकामा यथाभूतकर्मफलकामाः सन्तः । एष वो युष्माक पन्थाः सुकृतस्य लोके इत्यादिकम् । तत्र मन्त्रैः कर्माणि प्रकाश्यन्तेऽनुष्ठानसौविध्याय, न विधीयन्ते । अत एव मूले विधानमिति पदं नास्ति, त्वया व्याख्याने बलात्प्रवेशितम् । कालान्तरे विधिविधानानामवान्तरभेदानामुत्पन्नत्वात्, वेदाना बहुविधानां शाखाना ब्राह्मणाना वा प्रवचनानि जातानीत्यादिक तु निर्मूलमशुद्ध बहुधा खण्डितञ्च । यत्तु कर्मसमृद्ध्यर्थं केवला मन्त्राः समर्थाः, न केवल ब्राह्मणानि, उभयसहभावादेव यज्ञकर्मनिष्पत्तेः । अत एव श्रौतसूत्रकारैर्मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयमिति परिभाषितमित्यादि- कन्तु पिष्टपेषणमेव, परस्परविरुद्ध च । केवल मन्त्रा एव समर्था, उभयोः सहभावादेव यज्ञस्वरूपनिष्पत्तेः इति विरोधोऽपि कथन्न दृश्यते । यदपि 'मन्त्रानुसृतब्राह्मणानामेव प्रामाण्यम्- एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धम्, यत्कर्म क्रियमाणमृग्वा यजुर्वा अभिवदति' ( एतरेयब्राह्मण १।४।१३ - १६ ) इति वचनात्' इति, तदपि यत्किञ्चित् भावार्थानवबोधात् । तेषु वचनेषु मन्त्रमूलकत्वेन ब्राह्मणाना प्रामाण्यम्, तदभावाच्चाप्रामाण्यमिति नोक्तम्, तद्वचने तद्बोधकाना पदानामभावात्, किन्तु मन्त्रैरेव कर्मणा विधाने प्रकाशने च ब्राह्मणाना वैयर्थ्यापत्तेः । त्वया च किमर्थमुभयोः सहभावेनैव यज्ञकर्मनिष्पत्तिरुच्यते, किमर्थं च कर्ममीमांसायां त्वद्रीत्या ब्राह्मणानां वेदत्वमाम्नायत्व च स्वीकृतम् त्वद्रीत्या मन्त्रैरेव तन्निर्वाहोपपत्तेः । वस्तुतस्तु कर्मप्रकाशनार्थं मन्त्राणामुपयोगो मीमांसकैर्वण्यते तच्च ब्राह्मणैरेव सम्पद्यत इति मन्त्रवैयर्थ्यापत्त्या मन्त्रैरेव द्रव्यदेवते स्मर्तव्ये इति नियमादृष्टलाभो मन्त्रप्रयोजनमभ्युपेयते मीमांसकैः । तदेवेभिर्वचनैरुच्यते I। मन्त्रोच्चारणजन्येरदृष्टेर्यज्ञकर्म- समृद्ध्यत इत्युक्तम्, तदभावे वैगुण्येन तत्समृद्धयभावापत्तेः । परन्तु दयानन्देन तदीयेश्व नादृष्टं नाम किमप्यभ्युपेयते, तद्रीत्या यज्ञसमृद्धिः कथं मन्त्रैः सम्पद्यत इति दुर्निरूपमेव । मन्त्रार्थानुसरणादेव ब्राह्मणोक्तविनियोगो भवतीति कथन तु प्रमत्तप्रलपितमेव, निर्मूलत्वात् । अन्यत्तु पिष्टपेषणमेव । यदपि ब्राह्मणप्रतिपादितमिदं मूलतत्त्वमनुसृत्यैव दयानन्देनोक्तम्— के लिये अनुष्ठान सौकर्यार्थ उन कर्मों को मन्त्रो से प्रकाशित मात्र किया गया है, उनका विधान नही है । इसी कारण मूल मे 'विधान ' पद नही है, किन्तु आपने व्याख्या करते समय उसे बलात् प्रविष्ट किया है । कुछ समय के पश्चात् विधि-विधानो के अवान्तर भेद उत्पन्न हो जाने से वेदों की बहुविध शाखाओं के तथा ब्राह्मणों के प्रवचन हुए — इत्यादि जो तुम्हारा कथन है, वह निर्मूल और अशुद्ध है, उसका बहुधा खण्डन हो चुका है । यह जो कहा है कि कर्मसमृद्धि के लिये समर्थ केवल मन्त्र हैं, केवल ब्राह्मण नहीं, दोनों के सहभाव से ही यज्ञकर्म सम्पन्न होता है । अत एव श्रौतसूत्रकारों ने 'मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' कह कर वेद की परिभाषा बताई है, किन्तु यह सब पिष्टपेषण ही है और परस्पर विरुद्ध भी है । एक ओर तो यह कहना कि केवल मन्त्र ही समर्थ है और दूसरी ओर कहना कि दोनों के सहभाव से ही यज्ञ-स्वरूप की निष्पत्ति होती है, इस परस्पर विरोध को आप क्यो नही देखते? आपने यह जो कहा है कि ऐतरेय ब्राह्मण ( १।४।१३१६ ) के अनुसार मन्त्रो का अनुसरण करने वाले ब्राह्मणों का ही प्रामाण्य होता है, किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि आप ऐतरेय ब्राह्मण का अभिप्राय समझ नही पाये हो । उन वचनो में मन्त्रमूलक होने से ब्राह्मणो का प्रामाण्य है और मन्त्रमूलक न होने से ब्राह्मणों का अप्रामाण्य है, यह किसी भी शब्द से नही कहा गया है । मन्त्रों से ही कर्मो का विधान और प्रकाशन यदि हो, तो ब्राह्मण भाग के लिये कोई कार्य ही नही बचेगा, तब उसे व्यर्थ कहना होगा । ऐसी स्थिति में क्यों आपने दोनो के सहभाव से यज्ञकर्म की निष्पत्ति कही है? कर्ममीमासा में क्योकर ब्राह्मणभाग का वेदत्व और माम्नायत्व स्वीकृत किया है? आपके मत के अनुसार तो मन्त्रों से ही उसका निर्वाह हो जायगा । वास्तव में तो मन्त्रो का उपयोग कर्मप्रकाशनार्थ मीमासको ने बताया है । ब्राह्मण वाक्यों से ही यदि वह सम्पन्न हो जाता हैं, तब मन्त्र की व्यर्थता प्रसक्त होती है, अतः 'मन्त्रों से ही द्रव्य और देवता का स्मरण करना चाहिये ' इस प्रकार नियमादृष्ट का लाभ होना ही मन्त्र का प्रयोजन है, ऐसा मीमांसको ने माना है । मन्त्रोच्चारणजन्य अदृष्ट से यज्ञकर्म की समृद्धि होती है । मदृष्ट
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वेदार्थपारिजातः १ ९७२ 'परन्त्वेतैर्वेदमन्त्रे. कर्मकाण्डविनियोजितैर्यत्र यत्राग्निहोत्राद्यश्वमेधान्ते यद्यत्कर्तव्यं तत्तदत्र वेदभाष्ये विस्तरशो न वर्ण- यिष्यते । कुतः? कर्मकाण्डानुष्ठानस्येतरे यशतपथब्राह्मणपूर्वमीमांसाश्रौतसूत्रादिषु यथार्थं विनियोजितत्वात्, पुनस्तत्कथने - नानृषिकृतग्रन्थवत् पुनरुक्त पिष्टपेषणदोषापत्तेश्चेति । तस्माद्युक्तिसिद्धो वेदादिप्रमाणानुकूलो मन्त्रार्थानुसृतस्तदुक्तो विनियोगो ग्रहीतुं योग्योऽस्ति ' ( ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, भाग० १, पृ० ३८८ ) इति । एतेन दयानन्दो वैदिकं कर्मकाण्डं न मन्यते स्मेति सनातनानुयायिकथनं मिथ्येति । तदपि मिथ्येव । पूर्वोक्ततदुक्तेरेवायुक्तत्वात् । तथाहि - यस्मिन्नग्निहोत्राद्यश्वमेधान्ते विनियोजिता मन्त्रास्तैः कर्माणि प्रतिपाद्यन्ते न वा? न चेत्, कथं ते तत्र विनियुक्ताः । प्रतिपाद्यन्ते चेत्कथ न तदनुगुणोऽर्थः क्रियते । न च पुनरुक्तिप्रसङ्गः कुतः? नहि ब्राह्मणेः सूत्रैश्च मन्त्रार्था व्याख्यायन्ते? व्याख्यायन्ते चेत्तदार्षाणि व्याख्यानान्येवानुसर्तव्यानि कि मनुष्यकृतेन व्याख्यानेन । किच, विस्तरशो वर्णनं मा भूत्, संक्षेपेण तु कर्मानुगुणेन भवितव्यमेव । दयानन्दरीत्या तु केवलं वायुशुद्धयर्थमेव ,, हवनादिकम् मन्त्रोच्चारणं तु केवलमभ्यासार्थमेवेति कुतोऽग्निहोत्रादिवर्णनप्रत्याशा । किञ्च युक्तिसिद्धो वेदार्थो यदि कृतं वेदेन तदनुवादिना । न च युक्ति: प्रमाणम्, तेषु तदगणनात् । न च प्रमाणमन्तरा प्रमेयसिद्धिः । न ज्ञातज्ञापकस्य प्रमाणस्य प्रामाण्यं सम्भवति, अनधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानस्यैव प्रमाणत्वात् । यत्तु 'याज्ञिकैर्ब्राह्मणानामत्यधिकप्रामाण्यप्रतिपादनस्यायं दुष्प्रभावो यद् यदि मन्त्रार्थप्रत्यायनाय अनर्थकं भवतीति कौत्स इति रीत्या कौत्सादिभिर्मन्त्राणामानर्थक्यं मन्यते स्म । महायाज्ञिकः कौत्सो यास्क- जैमिनि -याज्ञवल्क्य-समकालिक एव । मन्त्रानर्थक्यवादस्य मूलमुपर्युक्तमेवेति । तदपि यत्किञ्चित्, धूर्तस्वाम्यादिरीत्या यथा कैश्चिन्मन्त्राणामेव वेदत्वमभिप्रेयत इति यथा पूर्वपक्षोपस्थापनमेव, न सिद्धान्तः, तथैव कौत्सादिरीत्या मन्त्राणामानर्थक्यप्रतिपादनमपि पूर्वपक्ष एव, सिद्धान्ते तस्य खण्डितत्वादेव । के अभाव में यज्ञकर्म में विगुणता आ जाती है, उससे कर्मसमृद्धि नही हो पाती । परन्तु दयानन्द और उसके अनुयायी ' अदृष्ट' को नही मानते । अदृष्ट के अभाव में मन्त्रों के द्वारा यज्ञ की समृद्धि कैसे हो सकेगी? इस प्रश्न का उत्तर आप नही दे सकते हैं । मन्त्रार्थ का अनुसरण करने से ही ब्राह्मणोक्त विनियोग ' विनियोग' हो पाता है, यह कथन तो निर्मूल होने से प्रमत्त का प्रलाप ही कहलायेगा, अन्यान्य बातें तो पिष्टपेषण के तुल्य ही हैं । ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, भाग १, पृ० ३८८ पर कहा गया है कि दयानन्द ने ब्राह्मण प्रतिपादित जो भी यह कहा है, वह मूल तत्त्व का अनुसरण करके ही कहा है, परन्तु ' कर्मकाण्डविनियोजित इन वेदमन्त्रो के द्वारा जहाँ जहाँ अग्निहोत्रादि अश्वमेधान्त में जो जो कर्तव्य है, उसे इस वेद भाष्य में विस्तरशः न बतायेंगे । क्योंकि ऐतरेय, शतपथ ब्राह्मण, पूर्वमीमासा, श्रौतसूत्रादि में कर्मकाण्डानुष्ठान को यथार्थ रूप से बताया गया है । पुनश्च उसका कथन करने से साधारण मनुष्य के निर्मित ग्रन्थ की तरह पुनरुक्ति पिष्टपेषणादि दोष होगे । तस्मात् युक्तिसिद्ध और वेदादिप्रमाणानुकूल एवं मन्त्रार्थं का अनुसरण करने वाला तदुक्त विनियोग स्वीकार करने योग्य है । अत: दयानन्द ने वैदिक कर्मकाण्ड को नही माना है, यह कहना मिथ्या है, ऐसा समाजी लोग कहते हैं । किन्तु समाजियों का यह कहना भी नितान्त मिथ्या है । क्योकि अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेघ तक जिन कर्मों में मन्त्रों का जो विनियोग किया जाता है, उन मन्त्रों से कर्मों का प्रतिपादन किया जाता है, या नही? अगर नहीं किया जाता है तो उन मन्त्रों का उन कमों में विनियोग क्यों किया जाता है? यदि प्रतिपादन किया जाता है कहें, तो तदनुगुण अर्थ क्यों नहीं बताया जाता? पुनरुक्ति ,का भी कोई प्रसंग नहीं है क्योंकि ब्राह्मण और सूत्रों के द्वारा मन्त्रों का अर्थ नहीं बताया जाता और यदि बतायें भी तो आष व्याख्यान को हो उन्हें अनुसरण करना चाहिये । मनुष्यकृत व्याख्या की क्या आवश्यकता है? किच, विस्तरशः वर्णन भले ही न हो,
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वेदार्थपारिजातः १ ९७३ यास्केन पूर्वोद्धृतवचने गोपथवचनेन ब्राह्मणाना मन्त्रानुगामित्वमुक्तमित्यपि निर्मूलम्, न च सब्राह्मणा इति तत्प्रतिपादनम्, गुरुमनुगच्छति शिष्य इतिवद् मन्त्रमनुगच्छति ब्राह्मणमित्युक्तमिति वाच्यम्, सेन्द्राः सुरा इत्युदाहरणेन स- ब्राह्मणा मन्त्रा इति विपरीतस्यैव संभवात् । यत्तु लिङ्गोपदेशश्च तदर्थवत् त्रिभिः सूत्रहेतुत्रयेण ब्राह्मणानां मन्त्रार्थानुगा-, मित्वमुक्तम् प्रथमेन हेतुना विनियोगस्य मन्त्रानुगामित्वमेवोक्तमित्यपि सूत्रार्थानवबोधमूलकमेव । सूत्रार्थश्च शबर- स्वामिनोत एव । 'लिङ्गोपदेशश्च तदर्थंवत्', 'आग्नेय्याग्नीघ्रमुपतिष्ठते ' इति विधानाद् विवक्षितार्थानामेव मन्त्राणां भवति लिङ्गेनोपदेशः । यदि तेऽग्निप्रयोजनास्ततस्त आग्नेय्या, नाग्निशब्दसन्निधानात् । नात्र ब्राह्मणानां मन्त्रानुगामित्वेन प्रामाण्यमुक्तम् । तत्रैव भट्टपादस्तन्त्रवातिके आग्नेय्येत्यग्निना देवतया ,, लिङ्गेन तदभिधानसामर्थ्येन वा य उपदेशः स तदर्थार्हता मन्त्रस्य द्योतयति । देवतातद्धितो ह्येष स्मयंते यं चार्थं प्राधान्येन मन्त्रः प्रकाशयति, सा तस्य देवता, नाभिधानमात्रेण, एकदेवत्येऽपि मन्त्रेऽनेक देवतापदप्रयोगे सति तद्देवत्यव्यपदेशाभावात्, प्राधान्याभिधानश्च नार्थपरत्वेन विनोपपद्यते । एवमेव 'ऊहः ' ( ४४ ), 'विधिशब्दाश्च' ( ४५ ) इति संक्षेप में ही कर्मानुकूल बर्णन तो होना ही चाहिये । दयानन्द की रीति के अनुसार तो केवल वायुशुद्धि के लिये ही हवनादि है और मन्त्रों का उच्चारण केवल अभ्यास के लिये ही होता है । अत: अग्निहोत्रादि के वर्णन की आशा ही कौन कर सकेगा? किञ्च, वेदार्थ यदि युक्ति से ही सिद्ध हो तो तदनुवादी वेद की आवश्यकता ही क्यों होगी? प्रमाणो मे गणना न होने से युक्ति को 'प्रमाण' नही कह सकते । प्रमाण के विना प्रमेय की सिद्धि नही हुआ करती । ज्ञात वस्तु के ज्ञापक प्रमाण का प्रामाण्य सम्भव नही । अनषिगत और अबाधित अर्थविषयक ज्ञान को ही 'प्रमाण' शब्द से कहा जाता है । यह जो कहा है 'याज्ञिको ने ब्राह्मणभाग का अत्यधिक प्रामाण्य बताया, उसी का यह दुष्प्रभाव हुआ कि कौत्स ने कह दिया -मन्त्रार्थ का ज्ञान यदि ब्राह्मण से ही हो जाता है, तो उस अर्थज्ञान के लिये मन्त्र की कोई आवश्यकता नही, एवं च कौत्स के मत से मन्त्र अनर्थक है । महायाज्ञिक कौत्स जैमिनि, याज्ञवल्क्य के समकालिक ही है । तस्मात् मन्त्रानर्थक्यवाद का मूल ब्राह्मणभाग को प्रमाण समझना ही है, अतः ब्राह्मणभाग को प्रमाण नही मानना चाहिये' । किन्तु यह कथन उचित नही है । जैसे धूर्तस्वामी आदि के अनुसार पूर्वपक्ष के रूप में कहा गया है कि ' कतिपय मन्त्रो में ही 'वेदत्व' है । यह कोई सिद्धान्त के रूप में नही कहा गया है । उसी तरह कौत्स ने जो मन्त्रानर्थक्य बताया है, वह भी पूर्वपक्ष के रूप में ही बताया है, सिद्धान्त के रूप में नही । सिद्धान्त के रूप में तो आनर्थक्य पक्ष का खण्डन ही किया है । यह जो कहा है कि यास्क ने पूर्वोद्धत वाक्य मे गोपथवचन के द्वारा ब्राह्मणों को मन्त्रानुगामी बताया है । किन्तु इस कथन में कोई प्रमाण नही है । यदि 'सब्राह्मणाः' इस प्रतिपादन को ही मूल समझकर 'गुरुमनुगच्छति शिष्यः' के समान ' मन्त्रमनुगच्छति ब्राह्मणम्' कहा गया है, यह कहो तो वह भी ठीक नही है, क्योकि ' सेन्द्राः सुरा:' इस उदाहरण को देखो और उसी तरह 'सब्राह्मणा मन्त्राः' कहा गया है, यह समझो । जो 'लिङ्गोपदेशश्च तदर्थवत्' इत्यादि तीन सूत्रों के द्वारा तीन हेतु बताकर ब्राह्मणों को मन्त्रार्थानुमामी बताया है, उनमें प्रथम हेतु से विनियोग को मन्त्रानुगामित्व होना ही जो समझ रहे हो, उसका कारण सूत्र का अर्थ न समझ पाना ही है । सूत्र का अर्थ शबरस्वामी ने ही कह दिया है । 'लिङ्गोपदेश. ' तथा 'आग्नेय्याग्नीध्रः' ऐसा विधान होने से विवक्षितार्थक मन्त्रों का ही लिङ्ग के द्वारा उपदेश होता है । यदि वे अग्नियोजक हो तो वे आग्नेयी के हैं, केवल अग्नि शब्द के सन्निधान से नही । यहां पर ब्राह्मणों का प्रामाण्य मन्त्रानुगामी होने से नही है । तन्त्रवार्तिक में भट्टपाद ने बताया है कि अग्नि देवतारूप अर्थप्रकाशन का सामर्थ्य रखने वाली आग्नेयी ऋचा के द्वारा जो उपदेश किया गया है, उस कारण मन्त्र मे उस कार्य (प्रयोजन ) सम्पादन की योग्यता सूचित होती है । 'आग्नेय्या' पद में देवता अर्थ मे तद्धित प्रत्यय किया गया है, याचनारूप घर्थ को प्रधानतया मन्त्र से प्रकाशित किया है । एकदेवताक मन्त्र में अनेक देवताक पदो का प्रयोग रहने पर एकदेवताकत्वेन उसका व्यवहार नही होता और
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वेदार्थपारिजातः १ ९ ७४ सूत्राभ्यामपि न त्वदभिमतोऽर्थो निरूप्यते । तत्रापि शाबरभाष्यम्- 'ऊहदर्शनं च विवक्षितार्थानामेव भवति । किमूहदर्शनम्? न पिता वर्धते, न मातेति । अन्ये वर्धन्त इति गम्यते । प्रत्यक्ष कोमारयोवनस्थविरैर्वर्धन्ते मात्रादयः । शब्दो न वर्धत इति ब्रूते । का पुनः शब्दस्य वृद्धिः, यद्विवचन बहुवचनसयोगः ' अत्रापि मन्त्राणां विवक्षितार्थत्वमूहदर्शनं प्रमाणितम् । 'विधिशब्दारच ' ( ४५ ) । विधिशब्दाश्च विवक्षितार्थानेव मन्त्राननुवदन्ति । शत हिमाः शतं वर्षाणि जीव्यास- मित्येतदेवाहेति ' । विधिशब्देन मन्त्रसंस्कारपरं ब्राह्मणमुच्यते । ब्राह्मणं च तादृशं मन्त्रस्याभिप्रायं वक्ति, यदि मन्त्रस्यार्थं एव न स्यात्तदा प्रमाणभूतं सार्थकं ब्राह्मणं कथं तदर्थमभिदध्यात् । नैतेन सूत्रेण सर्वेषां ब्राह्मणानां मन्त्रानुगामित्वं तत्त्वेन च प्रामाण्यमुक्तम् । वस्तुतस्तु वेदापौरुषेयत्वाधिकरणेऽवधूतप्रामाण्यस्य वेदस्यैव विध्यर्थवादमन्त्रनामधेयात्मकस्य यथाविभागं धर्मं प्रत्युपयोगः प्रतिपाद्यते । 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' इत्यारभ्य 'विध्यर्थाश्च' इत्यन्तेन द्वितीयपादेन । तत्र पूर्वमर्थवादा- दीनामानर्थक्यविरुद्धत्वादिकमाशक्य, त्रिशत्सूत्रेः सार्थक्यं प्रामाण्यमुपपाद्य तदर्थशास्त्रादित्यारभ्य मन्त्राणामविवक्षितत्वे - नेकान् हेतुनुपन्यस्यानर्थक्यमप्रामाण्यं चाशङ्क्य सार्थकत्वमुक्तम्, तत्रावघृतप्रामाण्येन ब्राह्मणेन तदर्थनिरूपणेनावश्यमेव मन्त्राणामर्थवत्त्वमुक्तम् । अत्र ब्राह्मणकर्तृकानुवादेन मन्त्राणां सार्थक्यमुक्तं न मन्त्रार्थानुवादित्वेन ब्राह्मणस्य सार्थक्यप्रामाण्यादिक- मुक्तम् । यथा कस्यचित् संशयितस्य प्रामाणिकत्वा यावघृतप्रामाणिकत्वस्य वचनेनाऽसंदिग्धत्व व्यवस्थापनमिति तद्वद् दुःसंस्कारवशादेव स्पष्टार्थोऽप्यन्यथैव भात्यस्य हृदये । यदपि याज्ञवल्क्येन १८ अध्यायस्थमन्त्राणां प्रतिपदमर्थनिर्देशेन ब्राह्मणप्रवचन विधेर्नव्यैव दिग्दत्तेत्यादिकम्, तदप्यपरिशीलितमीमासावृत्तान्तस्यैव शोभते । विधेयानां व्रीहीणां 'व्रीहीन प्रोक्षति' इति संस्कारविधानवदेव विधेयानां प्राधान्य का अभिधान अर्थपरक हुए बिना उपपन्न नही होता । उसी प्रकार 'ऊहः', 'विधिशब्दाश्च' ( जै ० सू० ११२१५२-५३ ) इन दो सूत्रों से भी आपने अभिमत अर्थ को नही बताया जा रहा है । शाबरभाष्य भी इसी बात को बता रहा है । कौमार आदि अवस्थाओं की तो वृद्धि होती दिखाई देती है, 'शब्द' की वृद्धि नही होती । द्विवचन बहुवचन के संयोग को ही शब्द की वृद्धि कह देते हैं । इस विषय मे भी मन्त्रों का विवक्षितार्थत्व और ऊहदर्शन को प्रमाण रूप में दिया गया है । 'विधिशब्दारच' - विधि शब्द विवक्षितार्थक मन्त्रो का ही अनुवाद करते है । विधि शब्द के द्वारा मन्त्रसंस्कारपरक ब्राह्मण बताया जाता है और ब्राह्मण मन्त्र के उस अभिप्राय को कहता है । यदि मन्त्र का कोई अर्थ ही न हो तो प्रमाणभूत सार्थक ब्राह्मण उसके अर्थ को कैसे बता पावेगा । अतः पूर्वोक्त सूत्र समस्त ब्राह्मणों की मन्त्रानुगामिता और उसके कारण प्रामाण्य को नही बता रहा है । वस्तुतः वेदाऽपौरुषेयाधिकरण में विध्यर्थवादनामधेयात्मक प्रमाणभूत वेद का यथाविभाग धर्म में उपयोग बताया गया है । प्रमाणभूत ब्राह्मण के द्वारा मन्त्रार्थ का जब कि निरूपण किया गया है, तो मन्त्रो का अर्थवान् होना अपरिहार्य ही है । उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हुआ कि मन्त्रों की सार्थकता ( अर्थवत्त्व ) ब्राह्मणकर्तृक अनुवाद के कारण है । इसके विपरीत ब्राह्मण की सार्थकता और उसका प्रामाण्य मन्त्रार्थ का अनुवादक होने से नहीं है । इतना स्पष्ट अर्थ होते हुए भी दुःसंस्कार-वशात् ही इन्हें अन्यथा हो अर्थ प्रतीत होता है । यह जो कहा कि 'याज्ञवल्क्य ने १८ अध्यायस्थ मन्त्रों के प्रत्येक पद का अर्थ निर्देश कर ब्राह्मण-प्रवचन का एक नवीन प्रकार प्रदर्शित किया है । यह कथन भी उसी को शोभा देता है, जिसने मीमांसा शास्त्र का परिशीलन कभी न किया हो । विषेय व्रीहियों ' व्रीहीन प्रोति' इस वचन से संस्कार विधान के समान कर्मोपयुक्त व्याख्या के द्वारा विधेय मन्त्रों का संस्कार ही कहा गया है । जन्य
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वेदार्थपारिजातः १ ९७५ मन्त्राणां कर्मोपयुक्तव्याख्याने मन्त्राणां सस्कारस्यैवोक्तत्वात् ब्राह्मणान्तरेष्वपि तथा संस्कारस्य दर्शनात् । तस्मात् ' ' विधिविधेयस्तकंश्च वेद इत्यादिरीत्याऽनादिकालादारभ्याद्यपर्यन्तं वैदिकेषु याज्ञिकेषु महर्षिष्वाचार्येष्वपि मन्त्राणां ब्राह्मणानां च वेदत्वं प्रसिद्धमेव, आम्नायस्य क्रियार्थत्वेनेति रीत्या पूर्वमीमांसाया यज्ञप्राधान्येनैव प्रवृत्तेः । श्रुतिसंज्ञाविचारप्रत्याख्यानम् यदपि श्रुतिशब्दस्याऽनेकार्थत्वमाशक्य प्रलपितम्, तदपि यत्किञ्चित् । श्रूयते एव, परं न केनापि क्रियत इत्यर्थविशेषे श्रुतिशब्दप्रयोगाद्वेदशब्दवच्छुतिशब्दस्यापि मन्त्रब्राह्मणसमुदायपरत्वमेव । तदनुसारमेव - श्रुतिद्वैध तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौ स्मृती । ' उदितेऽनुदिते चैव समयाऽध्युषिते तथा । सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ॥ ' (म० २।१५ ), ' श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वे स्मृतिः ॥ ' (२( १० ), 'श्रुतीरथर्वाङ्गिरसीः कुर्यादिति विचारयन्' ( ११ | ३३ ), 'धर्म' जिज्ञासमानानां प्रमाणं परम श्रुतिः' ( २।१३ ) इति वचनानि तदनुगुणान्येव । यत्तु धर्मशास्त्रं कल्पसूत्रान्तर्गतं भवति, अतः श्रुतिशब्देन मनुस्मृती मन्त्रब्राह्मणयोर्ग्रहणं भवतीति हि पलायन- मैव । पूर्वं तु कृष्णयजुर्वेदीयैरेव कल्पसूत्रकारैर्मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञोक्ता न शुक्लयजुर्वेदीयैः, ऋक्सामवेदीयेर्वा । पश्चाज्जैमिनि-नापि समानतन्त्रत्वाद् मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदसज्ञाऽङ्गीकृता । दयानन्देन तु कात्यायनभिन्नैर्ऋषिभिर्मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद- संज्ञा नाङ्गीकृतेत्युक्तम् । इदानी कल्पसूत्रसामान्यस्य तन्मतमङ्गीकृत्य मनुस्मृतेरपि स एव सिद्धान्त इत्यङ्गीकृतम् । ' श्रुति- लिङ्ग वाक्य- प्रकरण- स्थान-समाख्याना समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्' ( जे ० ३।३।१४ ) अत्र तु श्रुतिशब्देन न मन्त्र- ब्राह्मणात्मको वेदो विवक्षितः, लिङ्गादीनामपि श्रुतित्वाविशेषात्, किन्तु निरपेक्षसम्बन्धश्रवणमेव श्रुतिः । तदुक्तं शबरस्वामिना --'का पुनरत्र श्रुतिः, कि लिङ्गम्, श्रुतिर्गार्हपत्यशब्दश्रवणम् । लिङ्गं पुनः -'कदाचन स्तरोरसि नेन्द्र सश्चासि दाशुषे ' इतीन्द्रशब्दस्य विशिष्टदेवताभिधानसामर्थ्यम् । अथ किं वाक्यं नाम? संहत्य अर्थमभिदधति -पदानि वाक्यमिति । व्याख्यातं च वार्तिककृता एकलक्ष्यमाणार्थंप्रयुक्ततया संघातत्वमापादितानि यदा स्वार्थमभि-दधति तदा तद्भूतान्येव सन्ति वाक्यत्वं प्रतिपद्यन्ते' इति । यच्छब्दस्यार्थमभिधातुं सामर्थ्यं तल्लिङ्गम्, यदर्थस्याभिधान शब्दस्य श्रवणमात्रादेवावगम्यते स श्रुत्याऽवगम्यते । एकार्थमनेकपदं वाक्यमिति । त्रिविधा श्रुतिविध्युक्तिविनियोगाख्या, वाक्यं तु प्राङ् निदर्शितम् । यद्यपि ' ऐन्द्रया गार्हपत्यम्' इत्यत्रापि शब्द- सामर्थ्यंमस्ति, कदाचन स्तरीरसीत्यत्रापि इन्द्राभिधानसामर्थ्यमस्ति तथापि ऐन्द्रयां गार्हपत्यस्याङ्गत्वं शक्त्या नावगम्यते, अस्या इन्द्राङ्गत्वं तु नाक्षरश्रुतिजन्यम् । अत एवाह भाष्यकारः -न त्वेतस्यामृचि कस्यचित्सामर्थ्याद् गार्हपत्योपस्थानं ब्राह्मणों में भी वैसा ही संस्कार दिखाई देता है । तस्मात् 'विधिविधेयस्तर्कश्च वेद:' इस रीति से अनादि काल से लेकर आज तक वैदिक, याज्ञिक, महर्षि, आचार्य सभी लोग मन्त्रो और ब्राह्मणों को ' वेद' शब्द से कहते आ रहे हैं । 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' यह सूत्र बता रहा है कि पूर्वमीमांसा की यज्ञप्रधान दृष्टि है । श्रुति शब्द पर विचार का खण्डन 'श्रुति' शब्द में अनेकार्थता की आशंका कर जो कहा है, वह भी प्रलापमात्र ही है । 'केवल सुना ही जाता है, किसी के द्वारा किया नही जाता' इस अर्थविशेष मे 'श्रुति' शब्द का प्रयोग होता है, अत. 'वेद' शब्द के समान 'श्रुति' शब्द को भी मन्त्र-ब्राह्मणपरक ही समझना चाहिये । मनु ने भी द्वितीयाध्याय के १४-१५, १० तथा १३ और ११।३३ श्लोकों के द्वारा उक्त मन्तव्य का समर्थन किया है ।} ', यह जो कहा है कि धर्मशास्त्र तो कल्पसूत्र के अन्तर्गत है अतः श्रुति शब्द से मनुस्मृति में मन्त्र ब्राह्मण का ग्रहण कियाजाता है ।' किन्तु यह कथन भी पलायनमात्र है, क्योंकि यह समझना चाहिये कि कृष्ण यजुर्वेदीय कल्पसूत्रकारों ने ही मन्त्र ब्राह्मण के " I
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वेदार्थपारिजातः १ ९७६ सर्वेष्वेतेषु संमता । धीस्तस्याः सन्नि-भवति, श्रवणादेव तु गार्हपत्यं वयमग्नि प्रतीमो न लिङ्गात् । ' विनियोक्त्री श्रुतिस्तावत्। यः पराधीनवृत्तिः स तद्वाधं कथमाचरेत् ॥ न कर्षेण विप्रकर्षेण च स्थिता ॥ नापेक्षा यस्य यत्रास्ति स तस्माद् बलवान् भवेत् सम्बन्धो येनेति व्युत्पत्त्या श्रुति-श्रुतेर्विनियोक्तृत्व लिङ्गाधीनं प्रतीयते । विज्ञाते विनियोगे तु तद्वशाच्छक्तिनिर्णयः। अत॥ एवएतेनयाज्ञिकानांश्रूयते मतेन विनियोजकवाक्यस्य, शब्देन विनियोगो विधीयत इत्यप्यसाम्प्रतम् विनियोगस्य श्रुतिकार्यत्वात् तन्निरस्तत्वात् । अत एवात्र,पारिभाषिकी श्रुतिसंज्ञेत्यपि निरस्तम् श्रुतिलिङ्गवाक्यादीनां सर्वेषामेव श्रुतित्वाविशेषेण श्रुतिलिङ्गं वाक्यं प्रकरणं श्रोतानामेव श्रुत्यादीनां बलाबलं विचार्यते । तथा च भाष्यकार: -'उक्तानि विनियोगकारणानिश्रुतिशब्दस्य प्रधानभूतोऽर्थं इति स्थानं समाख्यानमिति । तेषां समवाये कि बलीय इति चिन्त्यते' इति । मद्विचारे मन्त्रा एव निर्मूलं पिष्टपेषणं च । आम्नायसंज्ञाविचारनिरासः वेदाङ्गानां मूलभूते यदपि- आम्नाय एक: सामान्यः संज्ञाशब्दः । अस्य शब्दस्य प्रयोगो मन्त्रसंहितामारभ्य— ' अक्षरसमाम्नाय: ' इति । - - ' ' ( ) भागे दृश्यते । यथा निघण्टो समाम्नायः समाम्नातः नि० १1१ इति प्रत्याहारसूत्रेषु । मन्त्रब्राह्मणसमुदाये- - मन्त्रब्राह्मणसमुदाये आयुर्वेद धर्मशास्त्र नाट्यशास्त्रादीदां मूलभूते शास्त्रे च प्रयोगो भवति यथाम्नायविधिना प्रश्न उच्यते ' 'आम्नाय: पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च' ( कौशिकसूत्र ११३ ) इति । 'पृच्छा तन्त्राद्प्रयुक्तः । 'यत्र चाम्नायो विदध्यात्' (,, | ) चरकसंहिता सूत्रस्थान ३० ६७ अत्राम्नायशब्द आयुर्वेदविषयकमूलागमे मूलागमे आम्नायशब्दप्रयोगः । ( गो० ध ० सू० १।५१ ), 'आम्नायैरविरुद्धा' ( गो० ध ० सू० १०।२२ ) इति धर्मशास्त्रस्य ने नही । पश्चात् जैमिनि ने भी समानतन्त्र होने के लिये ' वेद' संज्ञा बताई है, शुल्क यजुर्वेदियो ने अथवा ऋग्वेदियो ने या सामवेदियोहै कि कात्यायन भिन्न ऋषियो ने मन्त्र ब्राह्मण की - ' ' कारण मन्त्र ब्राह्मण की वेद संज्ञा को स्वीकार किया है । किन्तु दयानन्द कहते के मत को स्वीकार कर मनुस्मृति का भी बही ' वेद ' संज्ञा को स्वीकार नहीं किया है और अब आप यह कह रहे है कि यावत् कल्पसूत्रोशब्द से मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद की विवक्षा नही की सिद्धान्त है । जैमिनिसूत्र ( ३।३।१४ ) का उल्लेख कर कहते हैं कि इस सूत्र में श्रुति निरपेक्ष सम्बन्ध श्रवण ही है । भाष्यकार और गई है, क्योंकि 'लिङ्ग' आदि भी श्रुति के ही तुल्य है । अतः 'श्रुति' का अर्थ तो ' श्रूयते सम्बन्धो येन ' इस व्युत्पत्ति से 'श्रुति' शब्द को वार्तिककार के अभिप्राय को न समझकर उन्हे अपना ही समर्थक समझ रहे हैं । विनियोगपरक बताना भी उचित नही है, क्योकि विनियोग तो श्रुति का 'कार्य' है । अत एव याज्ञिकों के नाम पर 'श्रुति' को विनियोजक वाक्य की पारिभाषिक संज्ञा कहना भी सर्वथा असंगत है । आप का यह जो कहना है कि 'मेरे विचार में 'श्रुति' शब्द का प्रधान अर्थ मन्त्र हो है', वह भी निर्मूल है, एवं पिष्टपेषण ही है । आम्नाय शब्द पर विचार का खण्डन , मन्त्र ब्राह्मण यह जो कहा है कि 'आम्नाय ' शब्द तो एक सामान्य संज्ञा शब्द है । इस शब्द का प्रयोग मन्त्रसंहिता शब्द का प्रयोग किया जाता है । मीमांसा- समुदाय में और आयुर्वेद, धर्मशास्त्र, नाट्यशास्त्र आदि के मूलभूत शास्त्र मे भी 'आम्नायमात्र' है, इससे उन्होने स्वयं का अज्ञान ही प्रकट ' ' ' ' ' वेदाश्चैके सन्निकर्ष शास्त्र में भी बहुधा आम्नाय शब्द का प्रयोग किया गया है । किन्तु यह सब प्रलाप अन्यार्थक आप कहते है तथा ' ' किया है । आपकी रीति के अनुसार भी देखा जाय तो भी जैसे वेद शब्द को अन्यत्र पर भी वैदिक वाङ्मय में उसका मन्त्र- यहाँ पर वेद शब्द को मन्त्रार्थक ही मानते है, उसी तरह आम्नाय शब्द अन्यत्र अनेकार्थक रहने है और तन्मूलक होने से ही ब्राह्मण समुदाय हो अर्थ माना गया है । वस्तुतः आम्नाय शब्द का मुख्य अर्थ मन्त्र ब्राह्मणसमुदायहै, वैसे ही आम्नायही और समाम्नाय शब्दों में भी,, अन्यत्र उसका प्रयोग किया जाता है । किञ्च जैसे लक्ष्मी और गृहलक्ष्मी शब्दों में भेद के अनुसार नाट्यशास्त्र धर्मशास्त्र भेद है ही । आयुर्वेद का भी मूल आम्नाय ही है । अन्त में ' भूतं भवद् भविष्यच्च' इस मनु वचन और मीमांसाशास्त्र भी आम्नायमूलक होने से उनमें भी 'आम्नाय' शब्द का प्रयोग किया जाता है ।
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वेदार्थपारिजातः १ ९७७ ‘ छन्दोगौक्थिकयाज्ञिकबह्वचजटाञ्ञ्य:' ( पा० सू० ४।३।१२९ ) इति सूत्रेण नटस्य धर्म आम्नायो वा नाट्यम्, नटशब्दादपि ' धर्माम्नाययोरेव' ( काशिका ४| ३| १२९) । मीमासाशास्त्रेऽपि बहुधाम्नायशब्दः प्रयुक्त:' इति, तदपि सर्वमज्ञान- विजृम्भितम् त्वद्रीत्येव यथा वेदशब्दस्यान्यत्रान्यार्थत्वेऽपि वेदाश्चैके सन्निकर्षमित्यत्र मन्त्रा एवार्थ इति, तथैव आम्नाय- शब्दस्यान्यत्रानेकार्थत्वेऽपि वैदिकवाड्मये मन्त्रब्राह्मणसमुदाय एवार्थ इत्युत्तरस्य जागरूकत्वात् । वस्तुतस्तु मन्त्रब्राह्मण- समुदाय एव आम्नायशब्दो मुख्योऽन्यत्र तन्मूलत्वात्तच्छब्दप्रयोगः । तद्यथा निरुक्ते 'समाम्नाय: समाम्नातः' इत्युक्त्वा समाम्नायनिघण्टव इत्याचक्षत, इत्युक्त्वा कस्मान्निगमा इमे भवन्ति छन्दोभ्यः समाहृत्य समाहृत्य समाम्नातास्ते । किश्च, यथा लक्ष्मीगृहलक्ष्मीशब्दयोर्भेदो भवति, तथैव आम्नायसमाम्नायशब्दयोरपि भेद एव । आयुर्वेदस्यापि मूलमाम्नाय एव । अन्ते "भूतं भवद्भविष्यच्च सर्वं वेदात्प्रसिद्धयतीति मनुरीत्या नाट्यशास्त्रे धर्मशास्त्रे मीमासाशास्त्रे चाम्नायमूलत्वा- देवाम्नायशब्दप्रयोगः । यथा विवाहसंस्कारपूर्वकं मैथुनं न व्यभिचारकोटी निविशते । ऋतुकालाभिगामी गृहस्थोऽपि पारि- भाषिको ब्रह्मचारी भवति, तथैव यज्ञशिष्टमासाशी न मासाशी भवति । तदभिप्रायेणैव - ' अत्रापि विधिरुक्तश्च मुनिभिर्मास- भक्षणे । देवतानां पितॄणाञ्च भुङ्क्ते दत्त्वापि यः सदा ॥ यथाविधि यथाश्रद्ध न प्रदुष्यति भक्षणात् । अमांसाशी भवत्येव- मित्यपि श्रूयते श्रुति ॥ भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति ब्राह्मणः । ' (म० भा० वनपर्व २०८ | १४-१५) इति भारतोः । 'यज्ञियमांसभुजोऽपि ऋतुगामिनो ब्रह्मचर्यमिव औपचारिकमासाशित्वमिति भावः' इति नीलकण्ठोक्तेश्च । अद्यत्वेऽपि मनुष्यघाती मृत्युदण्डभाग्भवति । युद्धे तु बहूना हनने पुरस्कारो लभ्यते । यथा च दुश्चिकित्स्यं व्रणं भिन्दन् चिकित्सकः पूज्य एव भवति न द्वेष्यः, तथैव याज्ञिकपशुवधोऽपि पशूना स्वर्गप्रापकत्वात् पशुयोनिनिवारणपूर्वक-हिरण्यशरीरप्राप्तिहेतुत्वात् पशूपकारक एव भवति । तत एव बाह्यदृष्ट्या हिंसापि यथार्थतोऽहिसैव सम्पद्यते, ' तस्माद्यज्ञे वधोऽवध:' ( म० ५।३९ ) इति मनूक्तेः । 'यज्ञे यो वधः सोऽवधो विज्ञेयः, हिंसाजन्यपापनिवृत्तेः ' इति मेधातिथिवचनात् । ' यज्ञे वधोऽवध एव वधजन्यदोषाभावात्' इति कुल्लूकभट्टवचनाच्च । 'आम्नायवचनादहिंसा प्रतीयेत' ( नि० १।१६ ) इति श्रीयास्कोक्तेः । तत्रैव श्रीदुर्गाचार्य: -' आह कथमहिंसा, प्रत्यक्षतो हि छिद्यते वृक्षः, हिंस्यते च पशुः शृणु, इयमहिंसा इयं हिंसा इति आगमत एतत्प्रतीयते । प्रतिविशिष्टश्च, अयमेव वैदिक आम्नाय आगमः, एतत्पूर्वकत्वादन्येषामागमानाम् । स एष कृत्स्नस्य जगतः प्रतिविशिष्टाय श्रेयसे अभ्युद्यतः सन् हिंसायां कर्तारं विनियोक्ष्यत इति कुत एतत् सम्भवति? नूनमियमहिसैव, यतोऽस्यां युनक्ति कर्तारम् । तस्माद् धर्माधर्मव्यवस्थायां वेद एव प्रमाणम् ।' इति । तदेव मनुनाप्युक्तम्-'या वेदविहिता हिंसा नियतास्मिन् चराचरे । अहिंसामेव तां विद्याद् वेदाद् धर्मो हि निबंभो ॥ ' ( म० ५१४४ ), 'अशुद्धमिति 'चेन्न शब्दात्' ( ब्र ० सू ० ३।१।२५ ) इति वादरायणोक्तेश्च । अत्राद्यः शङ्कराचार्यः - ' यत्पुनरुक्तं पशुहिंसादियोगाद् अशुद्ध-माध्वरिकं कर्म, तस्यानिष्टमपि फलं कल्पते, तत्परिह्रियते, न, शास्त्रहेतुत्वात् धर्माधर्मविज्ञानस्य ॥ अयं धर्मः, अयमधर्म जैसे विवाह संस्कारपूर्वक मैथुन को व्यभिचार में नहीं गिना जाता, ऋतुकालाभिगामी गृहस्थ को भी पारिभाषिक ब्रह्मचारी कहा जाता है, वैसे ही यज्ञशिष्ट मांसाशी को भी मासाशी नही समझा जाता, ऐसा श्रुति ने कहा है, तथा महाभारत और उसके टीकाकार नोलकण्ठ ने भी कहा है । आज भी मनुष्यघाती मृत्युदण्ड का पात्र माना जाता है । और मनुष्यघाती डाकुओ को मारने पर मारने वाले को पुरस्कार मिलता है । जैसे दुश्चिकित्स्य व्रण को चीरने वाला चिकित्सक प्रशंसा का ही पात्र बनता है, उसे कोई बुरा नही कहता । उसी तरह यज्ञ में किया जाने वाला पशुवध भी पशुमो का स्वर्गप्रापक होने से तथा पशुयोनिनिवारण पूर्वक दिव्य शरीर प्राप्ति कराने में कारण होने से पशु का उपकारक ही होता है । अत एव बाह्यदृष्ट्या हिंसा की प्रतीति होनेपर भी वस्तुतः उसे अहिंसा ही माना गया है । मनुने भी ' तस्माद् यज्ञे वधोऽवधा' ( मनु० ५०३ ९ ) मापाततः प्रतीयमान वघ को अवध ही कहा है । इसी अभिप्राय का समर्थन मेवातिथि २४८ 1
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वेदार्थपारिजातः १ ९७८ इति शास्त्रमेव विज्ञाने कारणम्, अतीन्द्रियत्वात्तयोः, अनियतदेशकालनिमित्तत्वाच्च । यस्मिन् देशे काले निमित्ते च यो धर्मोऽनुष्ठीयते स एव देशकालनिमित्तान्तरेषु अधर्मो भवति । तेन शास्त्राद्धघेव धर्माधर्मविषयं ज्ञानं कस्यचित्' इति । श्रीरामा- तुजाचार्यस्तु हिंसनीयाननुग्राहकं प्राणवियोगानुकूलव्यापारमेव हिंसामुक्तवान् । यज्ञे पशूपयोगस्तु पशुकल्याणाय भवति । ' ', ' ' - ', न उवा एतम्रियसे हिरण्यशरीर ऊर्ध्वं लोकमेति इत्यादिश्रुतिभ्यः । अध्वरशब्दव्युत्पत्ती ध्वरतिहिंसाकर्मा तत्प्रतिषेधः' ( नि० १।८ ) इति निरुक्तवाक्यव्याख्याने दुर्गाचार्य: -' नन्वत्र हन्यन्ते पशवः, छिद्यन्ते तृणवनस्पतयः । तत्कथ- महिस्रोऽध्वर उच्यते? अभ्युदय एव हि सः । 'न उ वा एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवान् इद् एषि' ( बा ० सं ० २३ | १६) तस्मा- दभ्युदययोगाद् अहिंस्रः । युक्तं चैतत् । यस्मात्पशुरपकृष्टयोनेविमुक्तः देवयोनौ जायते । यत्तु कैश्चित् कुचोद्यमुद्भावितम् 'पिता कस्मान्न हन्यते इति, अधुना तु समाजिनोऽपि चार्वाकप्रायास्तदेव , वदन्ति तदपि प्रमादविलसितम् तथा विधानादर्शनात् । देशरक्षार्थमद्यापि पितृपितामहादयः पुत्रपौत्रादयश्च प्राणार्पणं कुर्वन्त्येव । प्राचीनकालेऽपि क्षत्रिया गुरुगोविन्द्रसिहपुत्रादयश्वानेके महापुरुषा देशधर्मादिरक्षणार्थं शिरः कर्तयन्ति स्म, प्राणा- श्वापयन्ति स्म । यथा मातुः पितुञ्च बलिदानं न भवति, तथैव गोर्वृषभस्य चालम्भनं न भवति । 'गौर्मे माता वृषभः पिता मे' ( म० भा ० अनुशासनपर्व ७६/७ ) इति भारतवचनात् । 'यज्ञार्थं पशवः सृष्टा:' ( मनु ० ५1३ ९ ) इति रीत्या पशूनामेव यज्ञ उपयोगः, यागादिलक्षणस्य धर्मस्य चोदनालक्षणत्वात् । मुक्त्यर्थं भगवत्पदप्राप्त्यर्थं नैष्ठिक ब्रह्मचर्यमतिसुन्दरम् ॥ तदसम्भवे सन्तानार्थं विवाहितासम्बन्धोऽपि नानु-चितः । असंस्कृतया सम्बन्धस्तु व्यभिचार एव । तथैव अहिंसायज्ञः सर्वोत्तमः । मन्त्रसंस्कृतयाज्ञिकपश्वालभ्भो मध्यमः । उदरपोषणार्थं पशुवधस्तु तामसोऽधमः । पशूनां प्रतिनिधित्वेनान्यवस्तूनामपि प्रयोगो भवति, 'दधि, मधु, घृतम्, आपो, धाना एतद्वे पशूनां रूपम्' ( तै० सं ० २२३२२८ ), 'पशवो वै धानाः' ( गोपथब्रा० २/४ ), 'पुरुषं ह वे देवा अग्रे पशुमाले- भिरे तस्थालब्धस्य मेधः अपचक्राम । स गा प्रविवेश ते गामालभन्त तत आलब्धस्य मेधोऽपचक्राम सोऽवि प्रविवेश......सोऽजं प्रविवेश ते अजमालभन्त तस्य मेधोऽपचक्राम ' ( श० ११२३३६ ) ( सह इमां पृथिवीमाविवेश तं खनन्त इव अन्वीयुः | तो इमो कुल्लूकभट्ट, यास्क, दुर्गाचार्य, बादरायण, आद्यशंकराचार्य रामानुजाचार्य आदि विश्वप्रसिद्ध जगन्मान्य विद्वानों ने भी किया है, क्योंकि वह यज्ञीय पशु अपकृष्ट योनि से विमुक्त होकर देवयोनि में उत्पन्न होता है । इस रीति से उस पशु का अभ्युदय होता है, अतः कोई विचारशील व्यक्ति दूसरे के अभ्युदय को देखकर या सोच कर बुरा नही मानता । कतिपय स्वैराचारी ऊटपटांग प्रश्न करते है कि 'पिता को क्यो नही मारा जाता? आज समाजी भी चार्वाक जैसे ही हैं, इस कारण वे भी इसी तरह प्रलाप करते हैं, किन्तु यह सब उनके प्रमाद का विलास मात्र ही समझना चाहिये, क्योंकि जैसा वे अपने मन मे सोचते हैं, वैसा किसी वेद में विधान नही है । देश को, राष्ट्र की रक्षा हेतु आज भी पिता, पितामह, पुत्र, पौत्र आदि अपने प्राणों को निछावर करते ही हैं, कौन नही जानता । प्राचीनकाल मे भी गुरु गोविन्दसिंह आदि अनेक क्षत्रिय महापुरुषों ने देश को, धर्म की रक्षा हेतु अपने शिर तक कटवाये तथा अपने प्राणो को भी अर्पण किया है । प्रश्नकर्ताओ को समझना चाहिये कि माता-पिता का बलिदान नही किया जाता, गाय और वृषभ का आलंभन नही किया जाता । 'पशु को उत्पत्ति यज्ञ के लिये ही हुई है ' इस मनुवचन के अनुसार पशुओं का ही यज्ञ में उपयोग बताया गया है, क्योकि यागादिलक्षण धर्मशब्द प्रमाणक हैं । मुक्ति के लिये अथवा भगवन्पदप्राप्ति के लिये नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यन्त सुन्दर है, किन्तु वह यदि सम्भव न हो सके तो सन्तानार्थ विवाहिता स्त्री से सम्बन्ध करना भी अनुचित नही है । असंस्कृता ( अविवाहिता ) स्त्री से सम्बन्ध करना तो व्यभिचार हो है । वैसे ही अहिंसा यज्ञ तो सर्वोत्तम ही है । मन्त्रसंस्कृत याज्ञिक पश्वार्लभ मध्यम है और उदरपोषणार्थ पशुबध तो तामस अधम है । पशुओं के प्रतिनिधित्वेन अन्य वस्तुओं का भी प्रयोग किया जा सकता है । तैत्तिरीय संहिता, गोपथ ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण ने अनेक वस्तुओं को पशु के प्रतिनिधि के रूप में बताया है । ब्रोहि और यव को तो सम्पूर्ण पशुओं के प्रतिनिधि के रूप में माना गया