वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 21–30

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 21–30

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वेदार्थ पारिजातः २१ नम्वितिहासपुराणानि पञ्चम इत्यत्र यथाऽवेदेनापीतिहासपुराणेन पञ्चसख्यापूर्तिस्तथैवात्रापि किं न स्यादिति चेन्न, 'ऋचो वै ब्रह्मणः प्राणाः' इत्युपक्रम्य ' आथर्वणो वै ब्रह्मणः समानः, तथा येऽस्योदवो रश्मयस्ता वास्यो- दीच्यो मधुनाड्यो अथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत: ' इति छान्दोग्ये, 'तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयाद् अन्योऽन्तर आत्मा मनोमय: ' इति प्रस्तुत्य ' तस्य यजुरेव शिरः, ऋग्दक्षिणः पक्षः, सामोत्तरः पक्षः, आदेश आत्मा, अथर्वाङ्गिरसः पुच्छ प्रतिष्ठा' इति तैत्तिरीये, 'ऋचां प्राची महती दिगुच्यते दक्षिणामाहुर्यजुषां साम्नामुत्तरामथर्वणाङ्गिरसा प्रतीची महती दिगुच्यते' इत्यथर्ववेदस्य वेदादेः समकक्षतावर्णनविरोधात् । शतपथे यज्ञविधिक्रमे - ' मध्यमे पय आहुतयो वा एता देवानां यदृचः' इत्युपक्रम्य ' मेदआहुतयो वा एता देवाना यदथर्वाङ्गिरसः । स्म य एवं विद्वान् अथर्वाङ्गिरसोऽहरहः स्वाध्यायमधीते मेदआहुतिभिरेव देवान् स तर्पयति । त एनं तृप्तास्तर्पयन्ति' इति । मन्त्रा अपि तदर्थप्रकाशनपरा अनु- - श्रूयन्ते – 'त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत' इत्यादयः । न चैषामथर्वा नाम कश्चिदृषिरित्येवंपरं व्याख्यानं युक्तम्, अन्यत्राप्यसमाश्वासप्रसङ्गात् । 'श्रुतीरथर्वाङ्गिरसीः कुर्यात्' इति मनुरपि । ' पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश । ' इति याज्ञवल्क्योऽपि चतुरो वेदानावेदयते, अन्यथा चतुर्दशसंख्यापूर्त्य - सम्भवः । स्मृत्यन्तरे च-'अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः । पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या होताश्चतुर्दश ॥ ' शातातपोऽपि —' ऋक्सामयजुरङ्गानामथर्वाङ्गिरसामपि । अणोरप्यस्य विज्ञानाद्योऽनूचानः स नो महान् ॥ ', ' चत्वारः श्चतुर्णा वेदानां पारगा धर्मज्ञाः परिषदुच्यते', 'ऋग्यजुःसामाथर्वविदः षडङ्गविद्धर्मविद् वाक्यविन्नैयायिको नैष्ठिको ब्रह्मचारी पश्चाग्निरिति दशावरा परिषत्' इत्यूचतुः शङ्खलिखितौ । महाभाष्यकारः पतञ्जलिरथर्ववेदमेव प्रथम- मुदाजहार -' शन्नो देवीरभिष्टय' इति । पस्पशाया च-'चत्वारो वेदा:' इति, ' नवधाथर्वणो वेद:' इति च । मीमांसा-: भाष्यकार शबरस्वाम्यपि वेदाधिकरणे काठकं कालापकमिति यजुर्वेदादिवदथर्ववेदेऽपि पैप्पलादकमुदाजहार । ' " - यहाँ प्रश्न उठ सकता है कि इतिहासपुराणानि पञ्चम इस स्थल में इतिहास पुराण के वेद न होने पर भी जैसे चार वेदो के बाद इतिहास-पुराण को पाचवा वेद मानते है, उसी तरह से उक्त छान्दोग्य श्रुति में अथर्ववेद को वेद की मान्यता न होने पर भी उसके लिये चौथी संख्या का विधान हो सकता है, किन्तु इसका उत्तर यह है कि 'ऋचो वै ब्रह्मणः प्राणा.' यहाँ से प्रारम्भ करके छान्दोग्य श्रुति में अथर्ववेद को ब्रह्म के समान बताया गया है । इसी तरह से तैत्तिरीय श्रुति मे मनोमय आत्मा की प्रतिष्ठा के रूप में अथर्ववेद को मान्यता मिली है । इसी तरह से 'ऋचा प्राची' इत्यादि श्रुति में अथर्ववेद की ऋग्वेद आदि से समानता वर्णित है । शतपथ ब्राह्मण मे यज्ञ की विधि का उपक्रम करते हुए ' मध्यमे पय आहु० ' इत्यादि वचन भी अन्य वेदों के समान अथर्ववेद को भी वेद के रूप मे ही मान्यता देते है । 'स्वामग्ने ' इत्यादि मन्त्र भी इसी बात का प्रतिपादन करते है । इस मन्त्र में स्थित अथर्वा पद अथर्ववेद का वाचक न होकर ' अथर्वा ' नामक ऋषि का बोधक है, यह कथन ठीक नही माना जा सकता, क्योकि ऐसा मानने पर तो बंदों में सर्वत्र अविश्वास हो जायगा कि इनमे कालान्तःपाती ऋषि-मुनियों के नाम है, तब इनको नित्य कैसे माना जा सकता है? मनु ने स्पष्ट ही अथर्वागिरस को श्रुति माना है । याज्ञवल्क्य ने भी पुराण, न्याय, मीमासा और धर्मशास्त्र के साथ १४ विद्याओं में चारों वेदों की गणना की है, अन्यथा चौदह संख्या पूरी नही हो सकती । एक दूसरी स्मृति में यह स्पष्ट बताया है- 'छः अङ्ग, चार वेद, मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र ये चौदह विद्याएं है' । शातातप स्मृति में कहा गया है-'ऋक्, साम, यजु और अथर्वाङ्गिरस इन चार वेदो और इनके अङ्गो को थोड़ा- बहुत भी पढकर जिसने इनका ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उसको हम महान् अध्ययनशील ब्राह्मण मानते हैं । चार वेदो के पारङ्गत चार ब्राह्मणों को 'परिषत्' होती है, ऐसा धर्मशास्त्रकार मानते है । शंख और लिखित नाम के धर्मशास्त्र के आचार्यों ने बताया है कि 'ऋक्, यजुः साम और अथर्ववेद के जानकार एक-एक ब्राह्मण, षडङ्ग का जानकार एक ब्राह्मण, इसी तरह से धर्मशास्त्र, मीमासाशास्त्र और न्यायशास्त्र के वंत्ता एक -एक ब्राह्मण, तथा नैष्ठिक ब्रह्मचारी और पंचाग्नि तापने वाला तपस्वी ये सब मिलकर दस व्यक्तियों की परिषत् बनती है । महाभाष्यकार पतंजलि ने सबसे पहले 'शन्नो देवी' इस अथर्ववेद के मन्त्र को ही उद्धृत किया है । वही पस्पशाह्निक में चार वेदों और अथर्ववेद को नौ शाखाओं का उल्लेख मिलता है । ११६

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६२२ बेदार्थपारिजातः सर्वशाखाधिकरणेऽपि वेदान्तरशाखान्तरवन्मौदकपंप्पलादकाख्ये अथर्ववेदशाखे उदाहृत्य विचारितवान् । तस्मादृगादिवद् अथववेदेऽपि न श्रुतिस्मृतिपुराणादिव्यवहारविदा विप्रतिपत्तिः । यच्चोक्तम्- ' अथर्ववेदस्य प्रामाण्ये विप्रतिपत्त्यभावेऽपि त्रयोबाह्यत्वमेवाथर्ववेदस्योच्यते' इति, तदपि , |तुच्छम् तथात्वे त्रय्यप्यथर्व ह्येत्यपि वक्तु शक्यत्वात् । नेतावदेव किन्तु त्रय्यामपि परस्परबाह्यत्वमस्त्येव । यषि ऋक्सामबाह्यानि । यजुःसामवाह्या ऋचः । ऋग्यजुर्बाह्यानि सामानाति । सर्वभावानामितरेतरसाङ्कर्यराहित्येन परस्परमसाङ्कर्यस्यादोषत्वात् । यदप्युक्तम्-' यत्कर्मत्रयी नोपदिशति तत्सम्बद्धमिति तस्य त्रयीबाह्यत्वम्' इति, तदपि तुच्छम्, इष्टिपश्वेकाहाहीनसत्रादिकर्मणा तत्रोपदेशदर्शनात् । सर्वशाखाप्रत्ययमेक कर्मेति न्यायात् । सोमयागादीनामपि होत्रमृग्वेदेन क्रियते, आध्वर्यव यजुर्वेदेन, औद्गात्र सामवेदेन, तथैव ब्रह्मत्वस्याथर्ववेदेन करणात् । गोपथब्राह्मणे च-'प्रजापतिः सोमेन यक्ष्यमाणो वेदानुवाच —क वो होतार वृणोयम्' इति प्रक्रम्य 'तस्मादृग्विदमेव होतार वृणीष्व, स हि होत्र वेद । यजुर्वेदमेवाध्वर्युं वृणीष्व, स हि आध्वर्यवं वेद । सामवेदमेवोद्‌गातार वृणोष्व, स हि औद्गात्र वेद । अथर्वाङ्गिरोविदमेव ब्रह्माणमिति । तथा यज्ञे य इम च विशिष्ट च यातयाम करोति तदथर्वाण तेजसाप्याययति । अथानन्ते भृग्वङ्गिरोभ्यः सोमः पातव्य:' इति । नन्वेता: श्रुतीरथर्वाण एवाधीयते । ते तु यदृचा होत्र क्रियते यजुषाध्वर्यव साम्ना औद्गात्रम् । अथ केन ब्रह्मत्वं क्रियत इति त्रय्या विद्ययेति ब्रूयादिति । तथा च यदचैव हौत्रमकुर्वत यजुषाध्वर्यवं साम्नोद्गात्रं यदेव त्रय्यै मोमासा भाष्यकार शबरस्वामी ने वेदाधिकरण मे यजुर्वेद की काठक, कालापक शाखाओ के साथ अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा का भी उदाहरण देकर उस पर विचार किया है । इस तरह से ऋग्वेद आदि की तरह अथर्ववेद के भी वेद होने मे श्रुति स्मृति, इतिहास-पुराण के जानकर विद्वानो मे कोई मतभेद नही है । न्यायमंजरी में पुनः आक्षेप उठाया जाता है कि अथर्ववेद की प्रामाणिकता मे कोई संदेह या मतभेद न रहने पर भी हमारा यह कहना है कि अथर्ववेद को वेदत्रयी मे स्थान नही दिया गया है । वही इसका समाधान भी दिया गया है कि ऐसा मानने पर तो हम उलट कर यह भी कह सकते है कि त्रयो अथर्ववेद की दृष्टि से बाह्य अर्थात् अप्रामाणिक है । इतना ही नही, तब तो श्री मे भी परस्पर एक दूसरे को अप्रामाणिकता माननी पड़ेगी कि यजुर्वेद ऋक् और साम की दृष्टि से बाह्य है, ऋग्वेद यजुः और साम से बाह्य है और सामवेद ऋक् और यजु. से बाह्य, अर्थात् त्रयी में से प्रत्येक अन्य दो की दृष्टि से अप्रामाणिक है । वास्तव में बात यह है कि सभी पदार्थों का परस्पर साकर्य न हो जाय, इसके लिये उनके विशेष लक्षण किये जाते है, इन लक्षणो की यदि एक दूसरे में प्रवृत्ति नही होती तो यह भी उनके लिये शोभा की बात है, यह कोई दूषण नही माना जा सकता । इस प्रकार त्रयी का लक्षण ?, अथर्ववेद मे नही जाता तो इसमें दोष की क्या बात है इस पर पूर्वपक्षा कहता है कि बाह्य शब्द का जो अर्थ आप करते है वह हम को अभिप्रेत नही है । हमारा तो कहना यह है कि त्रयी जिन कर्मों का विधान करती है, उनसे भिन्न कर्मो का विधान अथर्ववेद मे है, अतः हम अथर्ववेद को त्रयोबाह्य मानते है, किन्तु यह कथन भी कुछ सारवान् नही है, क्योकि इष्टि, पशुयाग, सत्र आदि कर्मों का विधान त्रयी के समान अथर्ववेद में भी है, मीमासा में सर्वशाखाप्रत्यय न्याय का प्रतिपादन किया गया है । अर्थात् अलग- अलग शाखाओ मे प्रतिपादित कर्म अलग- अलग न होकर एक ही माने जाते हैं । सोम आदि यागो में भी यही देखा गया है कि उसमे होता का कार्य ऋग्वेद से, अध्वर्यु का कार्य यजुर्वेद से, उद्गाता का कार्य सामवेद से और ब्रह्मा का कार्य अथर्ववेद की सहायता से किया जाता है । गोपथ ब्राह्मण मे बताया गया है- ' प्रजापति ने जब सोमयाग करने की इच्छा की, तो उसने वेदो से पूछा कि होता के रूप में किसका वरण करूँ' इस तरह से विषय का उपक्रम करते हुए वहाँ बताया गया है कि ऋग्वेदश को होता, यजुर्वेदज्ञ को अध्वर्यु और सामवेदज्ञ को उद्गाता तथा अथर्ववेदज्ञ को ब्रह्मा के रूप में वरण करना चाहिये । अथर्ववेदज्ञ ब्रह्मा ही यज्ञ में आये विघ्नों को दूर करता है और कर्म को तेजस्वी बनाता है । इसलिये अथर्ववेदज्ञ ब्राह्मण को सोमपान करना चाहिये । पुनः प्रश्न उठता है कि इस तरह की श्रुतिया अथर्ववेद में ही मिलती है, अन्य तीन वेदों मे नही । त्रयो में तो ' यदृचा होत्रं इत्यादि वचनों में ऋग्वेद में होत्र कर्म, यजुर्वेद से आध्वर्यव कर्म का और सामवेद से उद्गाता के कर्मों का विधान बताकर

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वेदार्थपारिजान. ६२३ विद्यायैशुक्र तेन ब्रह्मत्वमिति चेन्न प्रोक्तवाक्यानामप्यथर्वाङ्गिरोविदेव ब्रह्मेत्यत्रैव तात्पर्यात् । यतो न त्रयी नाम किञ्चिद्वस्त्वन्तरम्, किन्तु त्रयाणा वेदाना समाहार एव त्रयी । समाहारश्च समाह्रियमाणनिष्ठो भवति । समाहिय- माणाश्च ऋग्वेदादय एव । ते च होत्रादिपरत्वेन चरितार्थाः । एकैकशश्चरितार्थाना समुदायोऽपि चरितार्थ एव । किन्त्वथर्ववेद एव त्रय्यात्मकत्वात् त्रयी प्रोच्यते, तत्र ऋचा साम्नां यजुषा च सत्त्वात् । तेन ब्रह्मत्व क्रियमाण त्रय्या कृत स्यात् । ननु यस्त्रीन् वेदानधीते तेन चेद् ब्रह्मत्व क्रियते तत्कि त्रय्या न कृत स्यादिति चेन्न भावानववोधात् । --- तथाहि - यथा एकस्मै कामायान्ये ऋनवोऽनुष्ठीयन्ते सर्वेभ्यो ज्योतिष्टोमः सर्वेभ्यो दर्शपूर्णमासाविति श्रुतावपि योग- सिद्ध्यधिकरण ( मी ० सू ० ४।३।२२ - २८ ) न्यायेनान्यतममेव बुद्धावादाय विदध्यान्न समुदाय बुद्धावारोपयितु शक्नोति, तथैव प्रकृतेऽपि । तथा चेत्येकेन कृत भवति न त्रय्या कृत स्यात् । नन्वन्ये वेदास्त्र्यात्मकाः सन्ति । यद्येव तर्हि सुतरामथर्ववेदोऽपि न पृथक्करणीयः सर्वेषां रूपाविशेषात् । तथापि तेषा पृथक्प्रतिष्ठैः स्वै स्वैर्ऋगादिभिरेव व्यपदेश इति न ते समुदायपदव्यपदेश्याः । यत्तु वाक्यान्तरे त्रय्यं विद्याये शुक्रं तेन ब्रह्मत्वमिति तत्रेय चतुर्थी षष्ठीस्थाने प्रयुक्ता । शुक्रमिति सारमाचक्षते । तेन त्रयीविद्याया: सारेण ब्रह्मत्व क्रियतइत्युक्त भवति । न च त्रय्येव त्रय्याः शुक्र सम्भवति । न च ततोऽर्थान्तर सम्भवति । तेनाथर्ववेदात्मकमेव त्रय्याः शुक्रम् । शुक्रमिति गुह्यमाह । अत एव ब्रह्मवेदोऽथर्ववेद इति पूर्वोत्तरब्राह्मणे पठ्यते - 'ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो पूछा गया है कि ब्रह्मा के कर्म का विधान कैसे होता है? और उसका उत्तर दिया है कि त्रयी विद्या से ही । इस तरह से ऋग्वेद से जो होता के कर्म सम्पन्न हुए, यजुर्वेद से अध्वर्यु के और सामवेद की सहायता से जो उद्गाता के कर्म सपन्न हुए, यही त्रयी विद्या का सार है और इसी से यज्ञ में ब्रह्मा के कार्य भी संपन्न हो जाते है । यहाँ अथर्ववेद की कोई चर्चा नही है, किन्तु इसका समाधान इस तरह से किया जा सकता है कि उक्त वाक्यों का तात्पर्य इसी में है कि अथर्वांगिरस वेद का जानकार ही ब्रह्मा होता है, क्योकि त्रयी कोई वेद से भिन्न वस्तु नही है, किन्तु तीन वेदो के समुदाय को त्रयी कहते है । समाहार की स्थिति उसमे रहती है, जिनको एक समुदाय मे रखना हो । एक समुदाय में हमको ऋग्वेद आदि तीन वेदो को रखना है । इनकी अलग-अलग चरितार्थता होता आदि के कर्मों का प्रतिपादन करने से हो जाती है । जब ये एक-एक कर चरितार्थ हो गये तो समुदाय रूप में भी इनकी चरितार्थता मान ली जायगी । इसके विपरीत अथर्ववेद तो अकेला ही त्रयी कहलाता है, क्योकि इसमे ऋक्, यजुः और साम तीनो की स्थिति है । इस तरह से उक्त वाक्य का यह तात्पर्य ठीक ही माना जायगा कि अथर्ववेद के रूप में विद्यमान त्रयी से ब्रह्मा के कर्म संपादित होते है । यहाँ पुनः प्रश्न उठता है कि जो तीन वेदो को पढकर ही ब्रह्मा का कार्य करता है, तो क्या यह त्रयी के द्वारा संपादित नही माना जायगा? इसका उत्तर यह है कि आपने हमारे कथन का अभिप्राय ही ठीक से नही समझा । हमारे कथन का अभिप्राय तो यह है कि 'जैसे किसी एक-एक कामना की सिद्धि के लिये एक-एक यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता है, किन्तु ज्योतिष्टोम का अनुष्ठान तो सभी कामनाओ की पूर्ति करना है और इसी तरह से दर्शपूर्णमास यागो के अनुष्ठान से भी सभी कामनाएं सिद्ध होती है । इस श्रुति मे योगसिद्धयधिकरण न्याय से किसी एक कर्म को ही करने का संकल्प मन में करता है, समुदाय को अपने बुद्धि मे एक साथ नही बैठा सकता, उसी तरह से यहाँ पर भी समझना चाहिये कि ब्रह्मा का कार्य त्रयो समुदाय से संपादित न होकर एक ही अथर्ववेद से संपादित होगा, जिसमें कि तीनो ऋत्विजो के लिये भी ऋग्वेद आदि के मन्त्र विद्यमान है । इस तरह से जब एक अथर्ववेद से ही यह कर्म संपादित हो सकता है, तो उसके लिये ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद की समुदाय स्वरूप त्रयी तक जाने की आवश्यकता नही है । यहाँ फिर प्रश्न किया जाता है कि इस तरह से अथर्ववेद को त्रयी स्वरूप मानने पर तो अन्य प्रत्येक वेद भी इसी पद्धति से त्रयी स्वरूप माने जायेंगे? इसका उत्तर यही है कि यदि इस बात को आप मानते हैं तो फिर अथर्ववेद को इससे कभी अलग नहीं मानना चाहिये, क्योकि सबका स्वरूप एक सा है । ऐसा होते हुए भी उनकी अपनी अलग-अलग प्रतिष्ठा के अनुसार ऋग्वेद आदि पदों से उनका बोध होता है, उनका सामुदायिक त्रयी पद से बोध नहीं कराया जाता । ऐसा मान लेने पर पहले उदाहृत 'श्रम्यै विद्यायै'

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२४ वेदार्थपारिजातः ब्रह्मवेद:' इति । तथा च काठकशताध्ययने ब्राह्मणे ब्रह्मौदने श्रूयते -'ब्रह्मवादिनो वदन्ति पुरा के औद्दालकिरारुणि-रुवाच - ब्रह्मणे त्वा प्राणाय जुष्ट निर्वपामि, व्यानाय जुष्ट निर्वपामि' इत्युपक्रम्य 'आथर्वणे वै ब्रह्मणः समानोऽथर्वाण-मेवैतज्जुहोति चतुः शरावो भवति । चत्वारो हीमे वेदास्तानेव भागिनः करोति । मूलं वे ब्रह्मणो वेदाः । वेदानामेव तन्मूलं यदृत्विजः प्राश्नन्ति तद्ब्रह्मोदनस्य ब्रह्मौदनत्वं भवति' इति । तथा सामवेदे पृष्ठ्यस्य चतुर्थेऽन्यार्भवे पवमाने -आथर्वणसाम्नोद्गात्रं यत्तद्विधाने श्रूयते चतुर्विधमाथर्वणं भवति । चतुरावृत्त्यं चतुष्पदामनुष्टुभानुष्टुभेवैतच्चतुर्थं भेषजं वाथर्वाणं तद्धि भैषज्य करोत्यथर्वणानि यागभेषजानि' इत्येतदालम्बनेय स्तुतिरत एव प्रागुक्तम्- 'यज्ञे यदूनं यद्विरिष्ट च यातयामं च करोति तदथर्वाणं तेजसाऽप्याययति । तस्मादाथर्वण एव ब्रह्मेति' इति । यदपि - 'उच्चैर्ऋचा क्रियते, उच्चैः साम्ना, उपांशु यजुषेतिवन्न तत्राथर्वधर्मः कश्चिदाम्नातः' इति, तदपि निःसारम् तेषां मन्त्रधर्मत्वेन वेदधर्मत्वाभावात् । मन्त्रब्राह्मणसमुदायस्वभावा हि चत्वारो वेदाः । मन्त्रास्तु गद्यपद्यभेदाद् द्विधैव सन्ति । गीतिनिबन्धनं तु सामेति । तेषामृग्यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था । गीतिषु सामाख्या । शेषे यजुः शब्द इति जैमिनिना मन्त्राणा त्रैविध्यमेवोक्तम् । तेषामुच्चैस्त्वादिधर्माः । अथर्ववेदेऽपि त्रिविधैव मन्त्रजातिरिति तत्राप्येतद्धमंजातमुपदिष्टमेव । मन्त्रविभागकृत एवायं त्रयीव्यपदेशः । सैषा त्रयी विद्या तपतीत्यत्रापि न विरोधः । एवमृग्यजुःसामसमुदायात्मकमन्त्रो निबन्धात् त्रय्यन्तर्गतश्च पृथग्व्यवस्थितग्रन्थ सन्दर्भस्वभावत्वाच्च भिन्न इत्यपि । इत्यादि वाक्य में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग षष्ठी विभक्ति के अर्थ में माना जायगा । शुक्र का अर्थ यहाँ सार है । इस तरह से उक्त वाक्य का अर्थ होगा कि त्रयी विद्या के सार से ब्रह्मा का कार्य संपन्न होता है । स्वयं त्रयी ही त्रयी विद्या का सार नही हो सकती और किसी भिन्न वस्तु को भी त्रयी का सार नही बना सकते । इसलिये अथर्ववेद को ही नमी का सार मानना पड़ेगा । शुक्र शब्द का अर्थ गुप्त रहस्य की ओर संकेत करता है । इसीलिये पूर्वोत्तर ब्राह्मण में अथर्ववेद को ही ब्रह्मदेव कहा गया है—'ऋग्वेद, यजुर्वेद वेद, सामवेद और ब्रह्मवेद । इसी तरह से काठक शाखा के शताध्ययन ब्राह्मण में ब्रह्मोदन प्रकरण में बताया जाता है -' ब्रह्मवादियो का यह कहना है कि पहले उद्दालक ऋषि के पुत्र आरुणि ने कहा कि ब्रह्मा के रूप में विद्यमान प्राण, व्यान आदि को मैं हवि प्रदान करता हूँ" इस तरह से विषय का उपक्रम कर आगे अथर्ववेद को ही ब्रह्मा के समान मानकर उसको स्पष्ट रूप से चतुर्थ वेद के रूप में मान्यता दी है और अन्त में कहा है कि अथर्ववेद अकेला ही चारों वेदों का प्रतिनिधित्व करता है । इसीलिये अथर्ववेद की स्तुति अन्यत्र भी मिलती है, जैसा कि अभी-अभी उद्धृत एक श्रुतिवचन में बताया गया है कि कर्म मे जो न्यूनता, दोष आदि तथा अन्य विघ्न उपस्थित हो जांय, तो वे अथर्ववेदवेत्ता ब्रह्मा के तेज से, अर्थात् उसके द्वारा की गई आथर्वण विधियो से समाप्त हो जाते है । इसलिये यही मानना उचित है कि ब्रह्मा अथर्ववेद- वेत्ता को ही माना जायगा, त्रयीसमुदाय के वेत्ता को नही । यह भी कहा जाता है कि 'उच्चैर्ऋचा' इत्यादि श्रुति वाक्य में ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के उच्चारण का विधान तो मिलता है, किन्तु यहाँ अथर्ववेद के लिये कोई विधि नही बताई गई, अतः उसका त्रयी में समावेश नही माना जायगा, किन्तु यह कथन भी सारहीन है, क्योकि उच्च या उपाशु ध्वनि मन्त्र का धर्म है, वेद का नही । चारो वेद मन्त्र और ब्राह्मण भागों को मिलाकर बनते है | मन्त्र गद्य और पद्य के भेद से दो तरह के होते है । गाये जाने के कारण वे ही मन्त्र साम कहलाते हैं । इनमें अर्थ के आधार पर जहाँ पादों की व्यवस्था है वे मन्त्र ऋक्, जो गाये जाते है वे साम और बचे हुए मन्त्र यजुः कहलाते हैं । इस तरह से जैमिनि ने मन्त्रों के तीन बिभाग किये हैं । इन्ही के धर्मों को 'उच्चैर्ऋचा' आदि वचनो में बताया गया है । अथर्ववेद में भी इसी तरह के त्रिविध मन्त्र है, अतः वहाँ भी इन धर्मों का विधान स्वतः हो जाता है । मन्त्रो के उक्त विभाग के आधार पर ही त्रयी शब्द प्रचलित हो गया है | अतः ' यह त्रयी विद्या प्रकाशित हो रही है' इस वाक्य में भी कोई विरोध नही है । इस तरह से ऋक्, यजुः और साम के लक्षणों से युक्त मन्त्र का समावेश होने से अथर्ववेद त्रयी के अन्तर्गत भी है और अलग से एक व्यवस्थित ग्रन्थ के रूप में उसकी सत्ता रहने से वह उससे भिन्न भी है, यही सिद्धान्त रूप में माना जाता है ।

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वेदार्थपारिजातः ६२५ केचित्तु ऋक्प्रचुरत्वात् प्रविरलयजुर्वाक्यत्वाद् गीयमानसाममन्त्रतावशाच्च ऋग्वेदमेवाथर्ववेदमाचक्षते । चतुर्वेदाध्यायी भारद्वाज इति तैत्तिरीयसहितायाम् । यदि पुनरोत्तराधर्येण विना न सन्तोषस्तदा अथर्ववेद एव प्रथमः, ततः परममन्त्रस्य प्रणवस्याभिव्यक्तेः । 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्' इत्युपक्रम्य ' अथर्वण वेदमभ्यस्याश्नास्यदभ्यतपत् सन्तपत् तस्माच्छान्तात् सन्तप्तादोमिति मन एवोर्ध्वमक्षरमुदक्रामत्' इत्यादि, तथा महाव्याहृतीनां शाखान्तरप्रसिद्धानामसिद्धानां च बृहदित्यादीनां तत एवोत्थानम् । किश्वाथर्ववेदकृतोपनयनसस्कारमप्रापितस्याथर्ववेदाध्ययनेऽनधिकारः । भृग्वङ्गिरोविदा संस्कृतोऽन्यान् वेदानधीयीत नान्यत्र संस्कृतो भृग्वङ्गिरसोऽधीयीत । किञ्च, स्वकर्मभ्रंशेऽथर्ववेदविहितं प्रायश्चित्तमाचरद्भिरथर्ववेद एव ज्यायानिति त्रयीशरणैरप्यवश्यमाश्रयणीयः । यत्तु षट्त्रिंशदाब्दिकम् तत्त्रिवेदाध्ययनविषयकम्, यस्तु चतुरो वेदानधीते तस्याष्टचत्वारिंशद्वषं वेद- ब्रह्मचर्यमुपासीतेति स्मृत्यन्तरस्यापि सत्त्वात् । यदपि श्राद्धप्रकरणे ' यत्नेन भोजयेत्' इति त्रिवेदपारगकीर्तनम्, तद्वेद- पारगमिति समाप्तिगमिति विशेषणपर्यालोचनया ऋग्वेदाद्येकदेशवेदाध्यायिनामनधिकारमेव श्राद्धे सूचयति । अथर्वणस्तु अथर्वशिरोऽध्ययनमात्रलब्धपङ्क्तिपावनभावस्यैकदेशपाठिनोऽपि तत्राधिकार उपपद्यते । दर्शितं चाथर्वशिरो- ध्ययनमात्रेण पङ्क्तिपावनत्वम् 1। यत्तु -ज्येष्ठसामगस्त्रिमधुस्त्रिसुर्पणिक इति वेदान्तरैकदेशाध्यायिनामपि श्राद्धभोजन- स्याभ्यनुज्ञानम्, तत्त्वनुकल्परूपमेव प्रथमकल्पेन समग्रवेदाध्ययनोपदेशात् । यच्च शान्तिपुष्ट्यभिचारादिदर्शनेनाथवं- कुछ लोगो का कहना है कि अथर्ववेद मे अधिकतर ऋचाएं ही है, यजुः वाक्य बहुत कम है और इसके मन्त्रों का गान सामवेद की तरह नही होता, अतः यह ऋग्वेद ही है, उससे भिन्न नही । यह पक्ष भी स्वीकार किया जा सकता है, सामान्यतः इसमें कोई विरोध नही होना चाहिये, किन्तु 'चतुर्वेदाध्यायी भारद्वाज:' इस तरह के वाक्यो की तब कोई संगति न बैठ सकेगी, जब कि अथर्ववेद को अलग से चौथा वेद नही माना जायगा । यदि आपको इन वेदों में कौन सा वेद श्रेष्ठ है, यह जाने बिना संतोष नही होता तो हमारे कथनानुसार आप अथर्ववेद को ही सर्वश्रेष्ठ मानिये, क्योकि वेद का सर्वश्रेष्ठ मन्त्र प्रणव अथर्ववेद से ही प्रकट हुआ है । जैसा कि 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्' इस तरह से प्रारम्भ कर कही गई श्रुति मे अथर्ववेद से ॐकार के प्रकट होने की बात मानी गई है । इसी तरह से शाखान्तर मे प्रसिद्ध महाव्याहृतियो की अभिव्यक्ति भी अथर्ववेद से ही मानी गई है । दूसरी बात यह भी है कि अथर्ववेद के अध्ययन का अधिकारी वही माना जाता है, जिसका उपनयन किसी अथर्व वेदी ने ही किया हो, अन्य वेदो के अध्येता से उपनीत वटु को अथर्ववेद के अध्ययन का अधिकार नही प्राप्त होता । सबसे ऊपर बात यह है कि अपने-अपने वेदों के विधानों के अनुसार कर्म करने वाले व्यक्ति को उस समय अथर्ववेद का ही सहारा लेना पडता है, जबकि उस कर्म में कोई त्रुटि था आय, क्योकि इसके प्रायश्चित्त के रूप में उसे अथर्ववेद विहित प्रायश्चित ही करना पडेगा । इस तरह से अथर्ववेद को ही सर्वश्रेष्ठ मानना पडेगा । मनुस्मृति के आधार पर ३६ वर्ष के ब्रह्मचर्य के पालन की बात अभी बताई गई थी, मनुस्मृति का यह कथन तीन वेदों के अध्ययन से सम्बद्ध है । जिसको चारों वेदों का अध्ययन करना है, उसके लिये तो ४८ वर्ष के ब्रह्मचर्य की बात अन्य स्मृतियो मे प्रतिपादित है । इसी तरह से श्राद्ध के प्रकरण में वेदत्रयी के अध्येता को ही भोजन कराने की बात भी ऊपर कही गई है, किन्तु ' समाप्तिगम्' इस विशेषण से ऐसा प्रतीत होता है कि वहीं शास्त्रकार को वेद के पारंगत विद्वान् को ही श्राद्ध में निमन्त्रित करने की बात मान्य है । इससे जो ऋग्वेद आदि के एक अंश को ही पढा है, ऐसे ब्राह्मण का श्राद्ध में अधिकार निषिद्ध किया गया है, ऐसी सूचना मिलती है । इसके विपरीत अथर्ववेद का अध्ययनकर्ता उसके एक अंश के पढ़ने से भी पंक्तिपावन हो जाता है, अतः उसको तो श्राद्ध में सुतरां अधिकार प्राप्त हो जाता है । अथर्वशीर्ष के अध्ययन मात्र से ब्राह्मण पंक्तिपावन हो जाता है, यह बात शास्त्रों में प्रतिपादित है । 'ज्येष्ठ सामगाः' इत्यादि वचनों से वेदान्तर के एक अंश के अध्येता को भी श्राद्ध भोजन का अधिकारी बताया है, किन्तु यह केवल अनुकल्प के रूप में है । प्रथम कल्प के रूप में तो यहां समग्र वेद के अध्येता का ही विधान है । अनुकल्प का विधान तभी

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वेदार्थपारिजातः६२६ वेदस्यापकर्ष उच्यते, तदपि तुच्छम्, श्येनयागस्य सामवेदोत्पन्नत्वात् । अद्भुतशान्त्यादीनां यजुर्वेदे दर्शनात् । यदुक्तम्-ब्रह्मत्वाश्रिता अथर्वोक्तक्रियेति, तदपि न समीचीनम्, द्वे यज्ञवृत्ती भवतो वैहारिकी पाकयज्ञवृत्तिश्चेति । तत्र वैहारिको नामानेकत्विगाश्रितानामेकक्रियाणामुपदेशः । श्रुतावेक ब्रह्मत्विगाश्रितास्तु शान्त्यादिकाः क्रियाः । तस्मात् समान-योगक्षेमत्वात सर्ववेदानामेकस्य पृथक्करणमसङ्गतमेव । अस्य समस्तस्यैव वेदराशेर्मन्त्रायुर्वेदवच्चाप्तप्रोक्तत्वात् प्रामाण्य नैयायिकैरुक्तम्, मीमांसकैरपि समस्तस्यैव वेदस्यापौरुषेयत्वादपास्तसमस्तपुंदोषशङ्काकलङ्कपङ्कस्य प्रामाण्यमुपेयते, सम्प्रदायाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वस्य तुल्यत्वात् । न केवल मन्त्रसंहितानाम्, किन्तु समस्तब्राह्मणारण्यकोपनिषदामपि तथैव तुल्य साम्प्रदायिकमिति जैमिनिनाऽपौरुषेयत्वेन प्रामाण्यमुक्तम् । नैयायिकैश्च तथैवाभ्युपगतम् । अन्ते नैयायिकेरनादित्वपक्षोऽप्यङ्गीकृतः । 'वयमपि न विशिष्मोऽनादिससारपक्षं युगपदखिलसर्गध्वसवादे तु भेदः । अकथि च रचनानां कार्यतां तेन सर्गात् प्रभृति भगवतेदं वेदशास्त्रं प्रणीतम् । अनादिरेवेश्वरकर्तृकोऽपि सदैव सर्गप्रलयप्रबन्धः । सर्गान्तरेष्वेव च कर्मबोधो वेदान्तरेभ्योऽपि जनस्य सिद्धयेत् ॥ ' ( न्या ० म०, भा० १, पृ० २३०-२३१ ) । 'मन्त्रायुर्वेदवच्च वेदानां प्रामाण्यमिति' ( पृ ० २२६ ) प्रसङ्गे न्यायमञ्जरीकारेणोक्तम्-' पिप्पलीपटोल-, मूलादेरौषधस्येत्थमुपयोगादिदमभिमतमवाप्यते अस्य क्षीरतकादिविरोध्यशनस्य परिहारादिदमनिष्टोपशमन- मित्याद्यायुर्वेदशास्त्रेषु प्रत्यक्षेण तस्यार्थस्य तथा निश्चयादविसंवादित्व नाम प्रामाण्यं प्रतिपन्नम् । तच्चेदमाप्तवाद- होता है, जबकि प्रथम कल्प उपलब्ध न हो । शान्ति, पुष्टि और अभिचार कर्मों की बहुलता के कारण अथर्थवेद को त्रयी को अपेक्षा अपकृष्ट नही माना जा सकता, क्योकि हिंसाप्रधान श्येन याग का विधान सामवेद मे मिलता है । यजुर्वेद में अद्भुत, शान्ति जैसे विधान विद्यमान है । तब इसके लिये अथर्ववेद को ही क्यो अपकृष्ट माना जायगा । अथर्ववेद की क्रियाएं केवल ब्रह्मा नाम के ऋत्विक से ही संपादित हो सकती है, यह कथन भी ठीक नही है, क्योकि यज्ञ की दो तरह की प्रवृत्ति होती है, एक तो वैहारिकी और दूसरी पाक- यज्ञ । इनमें से वैहारिक वृत्ति उसको कहते हैं, जिनमें कि अनेक ऋत्विजों से सम्पन्न होने वाली एक क्रिया का उपदेश हो । श्रुति में शान्ति, पुष्टि आदि क्रियाएं एक ऋत्विक से संपाद्य मानी गई है । इस तरह से आपका उक्त आक्षेप यजुर्वेद आदि पर भी लागू हो सकता है । तब इन सब में से अकेले अथर्ववेद को दोषी नही बनाया जा सकता । इस समस्त वेदराशि का प्रामाण्य नैयायिक लोग मन्त्र और आयुर्वेद के प्रामाण्य की तरह ही मानते है कि ये सब शास्त्र आप्त पुरुषो के द्वारा उपदिष्ट है । मीमासक समस्त वेदराशि को अपौरुषेय मानते है । उनका कहना है कि वेद पुरुष-निर्मित नही है, अतः उनमें पुरुष में रहने वाले समस्त दोषों को शङ्का का लवलेश भी नही आ सकता । अतः उनका प्रामाण्य निःसंदिग्ध है । संप्रदाय के विच्छिन्न न होने पर भी वेद का कर्ता किसी की स्मृति में नहीं है । केवल मन्त्र संहिताओ का ही नही, किन्तु समस्त ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थों का भी इसी अविच्छिन्न सम्प्रदाय परम्परा से प्रामाण्य चला आ रहा है, अतः जैमिनि आचार्य ने इन सबका अपौरुषेयता के आधार पर प्रामाण्य माना है । नैयायिक भी अन्तत वेदो की अनादिता को मानते है । जैसा कि न्यायमंजरीकार ने कहा है-' संसार की अनादिता को मानने में हमारा कोई मतभेद नही है, हमारा मतभेद एक साथ सारी सृष्टि का विनाश मानने के विषय मे ही है । इसके सिवाय इस सृष्टि की रचना को भी हम एक कार्य मानते । इसलिये हमारी यह मान्यता है कि सृष्टि के साथ ही भगवान् ने वेदशास्त्र की भी रचना की । ईश्वर के द्वारा प्रणीत होने पर भी यह सर्ग और प्रलय की परम्परा अनादि है । इस तरह से दूसरे सर्गों में भी दूसरे वेदों से मनुष्यो को अपने-अपने कर्मों का बोध हो सकता है' ( भा० १, पृ० २३०-२३१) । 'मन्त्र और आयुर्वेद के प्रामाण्य की तरह वेदों को भी प्रमाण माना जाता है' ( भा० १, पु० २२६) इस प्रसङ्ग में न्यायमंजरीकार ने कहा है- 'पीपल, परवल की जड आदि दवाओं का अमुक प्रकार से उपयोग करने पर यह फल होगा, दूध, दही आदि परस्पर विरोधी भोज्य पदार्थों के आहार को छोड़ देने से अमुक अनिष्ट शान्त हो जायगा, इस तरह के आयुर्वेद शास्त्र के वचनो का फल प्रत्यक्ष प्रतीत होता है, अतः उस शास्त्र का प्रामाण्यं बिना किसी विवाद के मान लिया जाता है । यह प्रामाण्य आप्त के वचन

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वेदार्थपारिजातः ६२७ प्रयुक्तम् । यतो यत्राप्तवाक्यत्वं तत्र प्रामाण्यमिति व्याप्तिर्गृह्यते । तथा मन्त्राणां प्रयोगे वृश्चिकभुजङ्गदष्टस्य भक्षित- विषस्य वा निर्विषत्वम्, अपस्मारपिशाचरूपिकागृहीतस्य तदुम्मोचनम्, अतिरभसोज्जिहानेषु दुष्टमेधेषु सस्यरक्षण- मित्येवमुपलब्धम् । अतस्तेषा विषभूताश निशमनकुशलानामाप्ता उपदेष्टार इति तत्रापि व्याप्तिनिश्चयः । ननु तत्र प्रत्यक्षसवादात् प्रामाण्य नाप्तप्रामाण्यादतः कथमाप्तोक्तत्वस्य तत्र व्याप्तिग्रहणमिति चेन्न, प्रत्यक्षसवादात् प्रामाण्यनिश्चयेऽपि तस्याप्तवादेनोत्थितत्वात् । प्रत्यक्षादावप्यर्थक्रियाज्ञानसवादात् प्रामाण्यस्य ज्ञप्तिः, उत्पत्तिस्तु गुणवत्कारककृतेति न्यायसिद्धान्तात् । नद्यास्तीरे फलानि सन्तीति विप्रलम्भकपुरुषभाषितानि विसवादवन्ति भवन्ति । तस्मादाप्तप्रणीतत्वमेव तद्रीत्या प्रामाण्यकारणम्, कारणशुद्धिमन्तरेण सम्यक्प्रत्ययानुत्पादात् । , नग्वन्वयव्यतिरेकमूलक मेवायुर्वेदादिप्रामाण्यम् अन्वयव्यतिरेको च यावत्येवार्थे दृश्येते तावत्येवार्थे प्रामाण्यम् । यथा हरीतक्यादिवाक्यार्थे । यत्र तु तयोरदर्शन तत्राप्रामाण्यम् । यथा सोमराज्युपयोगे समाः सहस्र जीव्यते, आप्ते तु कल्प्यमाने अर्धजरतीयं स्यादिति चेन्न, अन्वयव्यतिरेकयोर्ग्रहीतुमशक्यत्वात् । तौ हि स्वात्मनि ( ), ( ), ( ), ( ), ( ), ग्रहीतु शक्येते १ व्यक्त्यन्तरे वा २ सर्वत्र वा ३ क्वचिदेव वा ४ व्यक्तिविशेषे वा ५ सर्वथा सङ्कटपूर्णोऽय पन्थाः । व्याधीना तन्निदानानां तदुपचयाना तदुपशमनोपायानामौषधानां तत्सयोगवियोगादिशेषाणा तत्परिमाणाना तद्रसवोर्यविपाकाना देशकालपुरुषदशाभेदेन शक्तिभेदस्यैकेन जन्मना ग्रहीतुमशक्यत्वात् । जन्मान्तरा- नुभूतभावानामस्माभिर्ज्ञातुमशक्यत्वात् । तदेतत्सर्वं सगृह्योक्त न्यायमञ्जरीकारेण जयन्तभट्टेन --'जनोऽनन्तस्ता- के आधार पर स्वीकृत होता है, क्योकि जहाँ-जहाँ आप्त का वाक्य रहता है, वहाँ वहाँ वह प्रामाणिक ही होता है, इस तरह की व्याप्ति यहाँ बन जाती है । इसी तरह से मन्त्रो के प्रयोग से बिच्छू, सांप आदि के विष का अथवा किसी दूसरी तरह से पेट में पहुचे विष का उपचार हो जाता है, अपस्मार, पिशाच आदि से पकडे हुए आदमी को मन्त्रो की सहायता से लाभ पहुँचता है, बड़े वेग से मंडराते हुए और भयंकर वृष्टि करते हुए मेघो से खेती की रक्षा भी मन्त्रो की सहायता से होती देखी गई है । इस तरह से विष, भूत-प्रेत, वृष्टि-शमन आदि के लिये मन्त्रो के प्रयोग करने में कुशल आप्त ही उन मन्त्रो के उपदेष्टा है, इस तरह की व्याप्ति यहाँ भी बन जाती है । यहाँ प्रश्न उठता है कि उक्त स्थल में उक्त वाक्यो का प्रामाण्य प्रत्यक्ष के साथ संवाद हो जाने से माना जाता है, आप्त के वचन होने से उनको प्रमाण नही माना जाता, तब आपकी ऊपर बताई व्याप्ति कैसे बन सकती है? इसका उत्तर यह है कि प्रत्यक्ष के साथ संवाद होने से प्रामाण्य का निश्चय भले ही हो, किन्तु इसकी उत्पत्ति को आप्त के वचन होने से ही हुई है । प्रत्यक्ष आदि स्थल मे भी अर्थक्रिया ज्ञान के संवाद से ही प्रामाण्य का ज्ञान ही होता है, प्रामाण्य की उत्पत्ति तो गुणवान् कारण सामग्री से होती है, न्याय का यही सिद्धान्त मान्य है । ' नदी के तीर पर फल है' इस वाक्य को यदि कोई वंचक बोलता है, तो तदनुसार नदी के तीर पर जाने से फल नही मिलते | इसलिये आप्त मनुष्य द्वारा प्रणीत वाक्यों को ही न्याय की पद्धति से प्रामाण्य का कारण माना जाता है । कारण की शुद्धि के बिना सही ज्ञान उत्पन्न ही नही हो सकता । प्रश्न उठता है कि आयुर्वेद आदि का प्रामाण्य अन्वय और व्यतिरेक के आधार पर ही मानना चाहिये । अन्वय- व्यतिरेक का संबन्ध जहां तक दिखाई पडता है, वही तक वह प्रमाण हो सकता है । जैसे कि हरीतकी ( हरड) आदि के सम्बन्ध मे कहे गये आयुर्वेद शास्त्र के वाक्य | जहाँ अन्वयव्यतिरेक नहीं दिखाई देते, वहाँ ये वाक्य प्रमाण नहीं माने जा सकते । जैसे कि सोमराजी का उपयोग करने से मनुष्य हजार वर्ष तक जीता है, यहाँ अन्वयव्यतिरेक के न रहने से वह वाक्य प्रमाण नही माना जाता । यदि आप्त को ही प्रामाण्य का आधार माने तो यह प्रामाण्य और अप्रामाण्य का विभाग संभव नही हो सकता, क्योंकि आप्त के एक वचन को प्रमाण और दूसरे को अप्रमाण मानने में अर्धजरतोय न्याय की आपत्ति होगी । अर्थात् यह बात उसी तरह असंभव होगी, जिस तरह की मुर्गी का आधा भाग अंडा देने के लिये और आधा भाग खाने के लिये नहीं रक्खा जा सकता । इस प्रश्न का समाधान इस तरह से किया जाता है कि ऐसे स्थलो में अन्वय और व्यतिरेक को सब जगह पकड़ पाना बड़ा कठिन है । क्योंकि अन्वयव्यतिरेक का ग्रहण अपने में होगा या दूसरे व्यक्ति में? सब जगह इनका ग्रहण होगा या किसी एक जगह? अथवा व्यक्तिविशेष में ही इनका

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वैदार्थपारिजातः६२८ निरवधिरिह व्याधिनिवहो न संख्यातुं शक्या बहुगुणरसद्रव्यगतयः । विचित्राः संयोगाः परिणतिरपूर्वेति च कुत-श्चिकित्सायाः पारं तरति युगलक्षैरपि नरः ॥ यदेव द्रव्यमेकस्य धातोर्भवति शान्तये । योग। न्तरात्तदेवास्य पुनः कोपाय कल्पते ॥ या द्रव्यशक्तिरेकत्र पुंसि नासो नरान्तरे ॥ हरीतक्या विनोद्भूतवातकुष्ठे विरोध्यते । शरद्युद्रिक्त- पित्तस्य ज्वराय दधि कल्पते । तदेव भुक्त वर्षासु ज्वर हन्ति दशान्तरे । न चोपलक्षणं किञ्चिदस्ति तच्छतिवेदने । येनैकत्र गृहीतासी सर्वत्रावगता भवेत् । यो वा ज्ञातु प्रभवति पुरुषस्तत्सामर्थ्यं निरवधिविषयम् । स्यात् सर्वज्ञः स इति न विमतिस्तस्मिन् कार्या स्ववचनकथनैः ॥ ' (पृ० २२७ ) । अथोच्यते - अनादिरेवैषा चिकित्सकस्मृतिर्व्याकरणस्मृतिवत्, सक्षेपविस्तारविवक्षयेव चरकादयः कर्तारः, न तु ते सर्वदर्शिनः । न च स्मृतावन्धपरम्परादोषः, समूलत्वात् । यथा व्याकरणस्मृतेः शिष्टप्रयोगो मूलमेवमिहान्वय- व्यतिरेको मूलम् । शिष्टविरोधे सति यथा मूलविरोधिनी पाणिन्यादिस्मृतिरप्रमाणम् । तथा चाहुरिह न भवत्य-,, नभिधानादिति तथैव वैद्यस्मृतिरस्वयव्यतिरेकविरुद्धा न प्रमाणमिति तदपि न अन्वयव्यतिरेकयोर्यथोक्तन्यायेन परिच्छेदासम्भवेन तम्मूलत्वानुपपत्तेः । यदि ह्यन्वयव्यतिरेकाभ्यामथैषद्रव्यशक्तीनिश्चित्य चरकादिभिविरचित शास्त्र- मितीदृशमन्वयव्यतिरेकित्वमुच्यते, तत्त्वपाकृतमेव । अद्यत्वे यावन्तावन्वयव्यतिरेकी वयमुपलब्धु शक्नुमस्तावद्भ्यामेक- ग्रहण होगा? इन विकल्पों में से किसी को भी मानें, किन्तु प्रत्येक में कोई न कोई आपत्ति विद्यमान रहेगी । क्योकि व्याधियों को, उनके निदान को ये रोग कैसे बढते है और उनको किस तरह से दूर किया जा सकता है, इसके उपायो को, औषधियों में से किसको निकालना और किसको मिलाना तथा इनको मात्रा कितनी कितनी रहेगी इस बात को, उन दवाओ के रस, वीर्य और विपाक को तथा देश, काल और पुरुष की अवस्था के भेद से इन ओषधियो की अलग अलग शक्ति को एक जन्म में कोई भी व्यक्ति ठीक से नही समझ सकता । जिनका अनुभव जन्मान्तर में होता है, उनका हम इस जन्म में ज्ञान नही कर पाते । इस पूरे विषय को जयन्त भट्ट ने अपनी न्यायमंजरी में निम्न श्लोकों में संगृहीत कर दिया है -'जन संख्या का कोई पारावार नही है, व्याधियाँ भी नाना प्रकार की हैं, ओषधियो के गुण और परिपाक नाना प्रकार के होते हैं । इन ओषधियो के संयोग-वियोग ( नुस्खे ) और उनके परिणाम भी भांति भांति के होते है । तब इस चिकित्साशास्त्र को लाखों युगों में भी कोई व्यक्ति कैसे पार कर सकता है । कोई द्रव्य अकेला रहने पर किसी रोग को शान्त कर देता है, वही किसी दूसरे द्रव्य के साथ मिल जाय तो उस रोग को बढ़ा देता है । जो दवा एक व्यक्ति में असर करती है, वही दूसरे व्यक्ति को देने पर फायदा नही पहुँचाती । हरीतकी ( हरड़ ) भी कभी कभी वात रोग और कोष्ठबद्धता को नही शमन कर पाती । शरद् ऋतु में जिसका पित्त प्रकुपित हो गया है, उसको दही खाने से बुखार आ जाता है । उसी दही को वर्षा ऋतु में जब कि पित्त प्रकुपित नही होता, खाने से ज्वर शान्त हो जाता है । औषधियों की इस परिवर्तनशील शक्ति को पहचानने लायक ऐसा कोई लक्षण नही मिलता, जिसको कि एक जगह पहचान लेने पर सब जगह वह शक्ति पहचानी जा सके । जो पुरुष ओषधियों के और व्याधियो के इन सब स्वरूपों को जान सकता हो, उसकी अनन्त सामर्थ्य को स्वीकार करना पडेगा । वह पुरुष सर्वज्ञ ही हो सकता है । इस तरह के सर्वज्ञ पुरुष के द्वारा प्रतिपादित विषयों पर अल्पज्ञ पुरुष के कथनो के आधार पर संदेह उठाना ठीक नहीं है । यदि यहा कहा जाय कि 'यह चिकित्साशास्त्र भी व्याकरणशास्त्र की तरह अनादि है । उस शास्त्र का संक्षेप अथवा विस्तार से वर्णन करने के कारण ही चरक प्रभृति इस शास्त्र के कर्ता माने जाते है, किन्तु वे सर्वज्ञ नही है । शास्त्रो पर अन्धपरम्परा का दोष नहीं लगाया जा सकता है, क्योंकि उनका आधार प्रामाणिक रहता है, जैसे व्याकरणशास्त्र के संबन्ध में उसकी प्रामाणिकता मान्य है! वहाँ शिष्ट जनों के प्रयोग व्याकरण के आधार हैं और आयुर्वेद में अन्वय- व्यतिरेक इस शास्त्र की प्रामाणिकता के आधारL है । शिष्ट प्रयोगों के विपरीत पाणिनि व्याकरण को भी प्रमाण नहीं माना जा सकता । जैसा कि कहा गया है —-व्याकरण शास्त्र में वह प्रयोग मान्य नहीं होता, जो कि शिष्टजन प्रयुक्त न हो, उसी तरह से आयुर्वेद शास्त्र भी यदि अन्वयव्यतिरेक के विपरीत है, तो उसको भी प्रमाण नही माना जायगा । किन्तु यह सारा कथन गलत है, क्योंकि अभी अभी बताई गई पद्धति से अन्वयव्यतिरेक को सब जगह पकड़ पाना बड़ा कठिन है, अतः अन्वयव्यतिरेक को वैद्यक शास्त्र का आधार नही माना जा सकता । अन्वय और व्यतिरेक से सभी द्रव्यों की शक्ति को जान कर चरक प्रभूति आचार्यों ने इस शास्त्र की रचना की है, इस तरह के अन्वयव्यतिरेक का हम

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वेदार्थपारिजातः II देशसंवादात् प्रामाण्यकल्पनात् । तत्र प्रवर्तनं न तु तो तावन्तो शास्त्रस्य मूल भवितुमर्हतः सर्वैरस्मदादिभिस्तादृश-, शास्त्रप्रणयनप्रसङ्गात् । चरकादिस्मृते कालिदासादिस्मृतिवदविगीतत्वात् । न चिकित्सास्मरणप्रबन्धोऽनादिः तथात्वेऽन्धपरम्पराकारणानवधारणात् । तस्मात् सर्वज्ञप्रणीतमेवायुर्वेदशास्त्रम् । मीमासकैस्तु मन्वादिस्मृतिवद् वेदपूर्वकत्वमायुर्वेदस्याभ्युपगम्यते, तथापि नैयायिकरीत्या कर्तृतासामान्या- भावान्न वेदमूलकत्वम् । अप्रमाणमपि न वक्तु शक्यते, बहुकृत्व संवाददर्शनात् । अतः परिशेषात् प्रत्यक्षीकृतदेशकाल - पुरुषदशाभेदानुसारिसमस्तव्यस्त पदार्थसार्थशक्तिनिश्वया रकादय इत्येव युक्त कल्पयितुम I। ननु सोमराज्यादिवाक्येषु व्यभिचार, व्यभिचारे चार्धजरतीयमिति, तदपि न, 'कर्तृ -कर्म- साधनवैगुण्यात्' ( गो० सू० २।१।५८ ) इति निर्दिष्ट- व्यभिचारात् पुत्रेष्ट्यादिवत् । तस्मान्मन्त्रायुर्वेदवच्चाप्तप्रामाण्याद् वेदाना प्रामाण्यम् । मीमांसकरीत्या त्वनभ्युपगतपरलोक प्रति तावदात्मनित्यतादिप्रतिपादनेन परलोकसमर्थन कार्यम्, परलोकवादिना तु सुखदुःखादिभेदेन जगतो वैचित्र्य दृश्यते । तच्चावश्य कर्मवैचित्र्यनिबन्धनम्, कर्माणि च नान- नुष्ठितानि सत्ता लभन्ते, अलब्धात्मना तु नभः कुसुमनिभानां कुतो विचित्रसुखदुःखादिफलसाधनत्वम्, तस्मादनुष्ठान-, मेषामेषितत्वम् । अनुष्ठानं च नाविदितस्वरूपाणा सभवति । न च तेषा ज्ञाने प्रत्यक्ष क्रमते स्वर्गाद्यदृष्ट- खण्डन कर चुके है । आज हम अपने से जितने अन्वयव्यतिरेक को जानने में समर्थ हो सकें, उससे उस शास्त्र के एक अश का ही संवाद हो सकता है और उसके आधार पर उस अंश को प्रामाणिक माना जा सकता है तथा तदनुसार कार्य भी किया जा सकता है, किन्तु इतने से तो सारे शास्त्र को प्रामाणिक नही सिद्ध किया जा सकता, क्योकि ऐसा मान लेने पर हममें से कोई भी उस शास्त्र की रचना करने लगेगा । इन शास्त्रो की वेद की तरह की अनादिता भी नही मानी जा सकती, क्योकि कालिदास की रचनाओ के समान आयुर्वेद शास्त्र के कर्ताओ की स्मृति भी निर्विवाद रूप से मान्य है कि ये चरक प्रभृति आचार्यों की रचनाएं हैं । आयुर्वेद शास्त्र की परम्परा को अनादि मानने पर उस पर अन्धपरम्परा के दोष की आपत्ति उठेगी कि अन्तत इस परम्परा का आधार क्या है? अत आयुर्वेद शास्त्र को इस अन्धपरम्परा के दोष से मुक्त रखने के लिये मानना पडेगा कि इस शास्त्र की रचना किसी सर्वज्ञ ने की है । सीमासक मनु आदि के स्मृति ग्रन्थों की तरह आयुर्वेद शास्त्र को भी वेदमूलक मानते है, किन्तु नैयायिको की दृष्टि से यह मत उचित नही है, क्योकि मनु, याज्ञवल्क्य आदि की तरह इस शास्त्र को किसी एक व्यक्ति की रचना नही माना जाता । अतः इसको वेदमूलक नही माना जा सकता, साथ ही इसको अप्रामाणिक भी नही कह सकते, क्योकि आयुर्वेद शास्त्र के विधान के अनुसार आचरण करने से उसमें बताई गई बातो की सत्यता अनेक बार परीक्षित है । अतः शेषवत् अनुमान के आधार पर यही कहा जा सकता है कि चरक प्रभृति आचार्यों ने देश, काल और पुरुष के भेद के अनुसार संमिलित रूप से अथवा अलग अलग द्रव्यों के सब तरह के परिपाकों का सही ज्ञान प्राप्त कर लिया है । इस व्याप्ति का सोमराजी आदि ओषधियो में व्यभिचार मानकर अर्धजरतीय न्याय की आपत्ति ऊपर उठाई गई है, किन्तु यह भी गलत है, क्योकि गोतम सूत्र मे बताया गया है कि कर्ता, कर्म अथवा साधन में दोष आ जाने पर वैदिक यज्ञो का भी फल नही मिलता, जैसा कि ' पुत्रेष्टि' आदि के प्रसंग में देखा जाता है । इसी तरह से आयुर्वेद शास्त्र में भी कर्ता, कर्म अथवा साधन के वैगुण्य के आधार पर किसी ओषधि से अभीष्ट सिद्धि न हो, यह संभव हो सकता है, किन्तु इतने मात्र से यहाँ व्यभिचार की सिद्धि नहीं की जा सकती । इसलिये यह कहना ठीक ही है कि मन्त्र और आयुर्वेद के प्रामाण्य की तरह वेद का प्रामाण्य भी उसको आप्त की रचना मान कर किया जा सकता है । मीमासकों की पद्धति से तो परलोक को न मानने वालो को आत्मा की नित्यता आदि का प्रतिपादन करते हुए पहले परलोक का समर्थन करना पडेगा, किन्तु जो परलोकवादी है, उनको यह समझाना पडेगा कि सुख-दुःख आदि के कारण जगत् के प्राणियों में जो बड़ी विचित्रता देखने को मिलती है, उसका कारण उनके अपने कर्म ही हो सकते है । आचरण के बिना इन कर्मों की कोई स्थिति नही बन सकती और जब तक इनको कोई स्थिति नही होगी, तब तक आकाश के पुष्प से गन्ध की तरह इनसे विचित्र सुख-दु.ख आदि की परिपूर्ण स्थितियाँ भी कैसे बन सकती है? इस लिये विचित्र सुख- दुःख आदि स्थितियो को देखकर यह मानना पडेगा कि इन्होने उन उन कर्मों का अनुष्ठान किया था, जिनके आधार पर कि ये अब इस स्थिति में पडे है । यह अनुष्ठान तब तक नही बन सकता, ११७

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
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६३० वेदार्थपारिजातः साधनाना कर्मणां ज्ञातुमशक्यत्वात् । नाप्यनुमानं तृप्तिभोजनयोरिव स्वर्गयागयोः कार्यकारणभावानवधारणात् । जगद्वैचित्र्यानुपपत्त्या तु विचित्रं कारणमात्रमनुमीयते । तस्मादवश्यं शास्त्रात् कर्मबोधोऽभ्युपेयः । शास्त्र च वेदाः । ( पृ० २३० ) । नैयायिकदृष्ट्या वेदा परस्परव्यतिषक्तार्थोपदेशित्वादेककर्तृकाः । एकमेव कर्म वेदचतुष्टयोपदिष्टैः पृथग्भूतैरेकार्थसमवायिभिरङ्गैरन्वित प्रयुज्यते । तदुक्तमेव -' हौत्रमृग्वेदेन यजुर्वेदेनाध्वर्यवं सामवेदेनोद्गात्र ब्रह्मत्व- मथर्ववेदेन पैप्पलादशौनकादितत्तत् शाखोपदिष्ट तत्तदङ्गजातं तत्रापेक्ष्यते । 'एकाभिप्रायबद्धत्व तेन सर्वत्र गम्यते । भवेद्भिन्नाशयानां हि कथमेकार्थमीलनम् ॥ ' ननु यथा काव्यसमस्यापूरणे भिन्नकर्तृकता दृश्यते, तथैव वेदेऽपि भिन्न- कर्तृकता किं न स्यादिति चेन्न, 'तत्रापि प्रथमस्यैब कवेस्तद्वस्तुदर्शनात् । तदभिप्रायवेदी तु सोऽन्यस्तदनुवर्तते । अन्यथा- नन्वितं काव्यस्याद्विश्वावसुकाव्यवत् । अन्वितत्वे तु सा नूनमाद्यस्यैव कवेर्मतिः । इहाप्तेकाशयाभिज्ञ द्वतीयेश्वरकल्पने 1। एकाभिप्रायतैव स्यात् किं स्यात्तत्कल्पने फलम् ॥ ' तस्मादेक एव कर्ता सर्वशाखानाम् । काठकादिव्यपदेशस्तु प्रकृष्टा- - ध्ययननिबन्धनो भविष्यति ( पृ ० २२० ) । तदेतद् जैमिनिनोक्तमेव – ' समाख्या प्रवचनात्' ( मी ० सू० ) इति । यथैकतरोविक्षिप्ताः शाखा भवन्ति, न च कृत्स्नं पुष्पफलपत्रमेकस्या शाखाया सन्निहितम, किन्तु कस्या- ञ्चित् किञ्चित् कस्याञ्चिच्च किञ्चित् एव वेदस्यापि शाखा: पृथगङ्गकर्मोपदेशिन्यो विक्षिप्ताश्च । 'तासां च जब तक कि इन कर्मों का स्वरूप उन्हे ज्ञात न हो । किस कर्म के अनुष्ठान से क्या फल मिलेगा, इसकी जानकारी प्रत्यक्ष प्रमाण से नही हो सकती, क्योकि कर्म स्वर्गं प्रभृति अदृष्ट के साधन है, इसका ज्ञान प्रत्यक्ष से कैसे हो सकता है? यहाँ अनुमान की भी प्रवृत्ति नही हो सकती, क्योंकि जैसे हम भोजन और तृप्ति के कार्यकारणभाव का निश्चय कर लेते है, उस तरह का निश्चय स्वर्ग और याग के कार्यकारणभाव के विषय में नही कर सकते । जगत् की विचित्रता को देखकर केवल इतनी ही कल्पना की जा सकती है कि इसका कारण भी कोई विचित्र ही हो सकता है । इसलिये इस जगद्वैचित्र्य के कारण कर्मवैचित्र्य का ज्ञान शास्त्र से ही हो सकता है और यह शास्त्र वेद है । नैयायिकों की दृष्टि से सभी वेदो में परस्पर संबद्ध विषयों का प्रतिपादन मिलने से वे किसी एक की रचना माने जाते है । किसी एक ही कर्म का चारों वेदो में अलग अलग रूप से प्रतिपादित अगो से परस्पर अन्वय किया जाता है । जैसा कि कहा गया है - होता के कर्म ॠग्वेद से, अध्वर्यु के कर्म यजुर्वेद से, उद्गाता के कर्म सामवेद से और ब्रह्मा के द्वारा संपादित होने वाले कर्म के अंगो का विधान अथर्ववेद में मिलता है । इनमें भी फिर पिप्पलाद, शौनक आदि उन उन शाखाओ के अनुयायियों का कार्य उन्ही उन्ही शाखा-ग्रन्थों से संपन्न होता है । 'इससे ऐसा प्रतीत होता है कि किसी एक ही व्यक्ति के अभिप्राय के अनुसार इन सबकी रचना हुई है 1। यदि इन सबके रचयिता अलग अलग व्यक्ति हों तो इन सब में एक ही अभिप्राय के अनुसार किसी वस्तु का प्रतिपादन कैसे मिल सकता है । प्रश्न उठता है कि जैसे किसी कविता की समस्या- पूर्ति करते समय एक ही समस्या की पूर्ति अलग अलग कबि एक ही अभिप्राय से करते है, उसी तरह से वेद में भी एक ही अभिप्राय से भिन्न भिन्न कर्ताओ के द्वारा विभिन्न कर्मागो का विधान क्यों न माना जाय? किन्तु इसका समाधान यह है कि ' समस्या पूर्ति में भी समस्या- वाक्य को उपस्थित करने वाले प्रथम कवि का अभिप्राय ही मुख्य माना जाता है । उस प्रथम कवि के अभिप्राय को जानकर दूसरा कवि भी उसका अनुवर्तन करता है । ऐसा न मानने पर सारी समस्या -पूर्तियाँ गन्धर्वाविष्ट व्यक्ति की कविताओ की तरह सर्वथा परस्पर असबद्ध माननी पडेगी । यदि इनको परस्पर संबद्ध मानना है तो निश्चय ही इसको प्रथम कवि के अभिप्राय के साथ जोडना पड़ेगा । यहाँ भी वेदों के अलग अलग निर्माता के रूप में एक के अभिप्राय को जानने वाले दूसरे ईश्वर को कल्पना करने से क्या फायदा हो सकता है, जब कि दूसरे ईश्वर के अभिप्राय और पहले ईश्वर के अभिप्राय में कोई अन्तर नही है । इसलिये एक ही ईश्वर को सभी शाखाओ का कर्ता मानना उचित है । शाखाओ का काठक आदि नाम उनका विशेष अध्ययन करने वाले व्यक्ति से सम्बन्ध होने के कारण होता है । इसी बात को जैमिनि ने ' समाख्या प्रवचनात्' इस सूत्र से कहा है । इसका अर्थ है कि काठक आदि समाख्याएं उनके प्रवचन कर्ताओ के नाम से सम्बद्ध होती है । जैसे एक वृक्ष की अनेक शाखाएँ होती हैं, सारे फल फूल एक ही शाखा में नही लग जाते, किन्तु सभी में कुछ न कुछ फल- फूल लगते हैं, उसी तरह से वेद की शाखाओं में भी किसी में कुछ और किसी में कुछ इस तरह से अलग-अलग कर्म के अगो का