वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1131–1140
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1131–1140
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वेदार्थ पारिजातः २०२९ अस्मात् सृष्टाः पराचीरायत् ता वरुणमगच्छन् ता अन्वेत्..... ( तै ० सं० २२ २ ) इत्यादिभिः । अर्थात् प्रजापतिना सृष्टाः प्रजाः पराची: पराङ्मुख्य: अपरक्ताः सत्यः अस्मात् प्रजापतेः आयन् अपगच्छन् । गत्वा च वरुणं प्राप्ताः । स च प्रजापतिः ताः प्रजा अनुगम्य मदीयाः प्रजाः पुनरेव मह्यं देहीति वरुणमयाचत । वरुणस्तु न ददौ । ततो वरुणमिदमब्रवीत् । एतासा प्रजानां मध्ये वरं श्रेष्ठ गृहीत्वा अवशिष्टास्ताः प्रजाः मह्य देहीति । वरुणस्तासा प्रजाना मध्ये वरं श्रेष्ठं कञ्चिपशुं मदीयोऽय- मिति हस्तेनास्पृशत् । स च परीक्ष्यमाणः कृष्णः वर्णः सन्नेकेन श्वेतेन पादेन युक्तोऽभूत् । स च वरुणगृहीतः । यो जलजन्येन महोदरव्याधिना गृहीतः स्यात्तदर्थं ( तद्रोगनिवारणार्थ ) तेन वरुणदेवताकेन पशुना यजेत । इति वरुणयागविधानमुक्तम् । अनन्तरं वशा विधातु प्रस्तोति -' स्वर्भानुरासुरः सूर्य तमसा विध्यत् । तस्मै देवाः प्रायश्चित्तिमेच्छन् । तस्य यत्प्रथम तमः 600 ( तै० स० २१ २२) | स्वर्भानुरित्यसुरस्य कस्यचिन्नाम सिद्धान्ते देवा असुराश्च चेतनाः ऐश्वर्यवन्तोऽभ्युपेयन्ते । देवा सृष्ट्यनुकूलाः सात्त्विकाः, असुरा सृष्टिप्रतिकूला राजसास्तामसाश्च । तेषां सङ्घर्षस्तत्र तत्र वेदेषु दृश्यते । स्वर्लोकगतां प्रभां नुदतीति स्वर्भानुः । स च पृथिव्या रूप धृत्वा कृष्णवर्णः तमःपुञ्जो भूत्वा स्वीयेन तमसा सूर्यमाच्छाद्य . ' ' | जगदान्ध्यकृतवान् । तम पुञ्जरूपत्वं यत्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसा विध्यदासुरः इत्यस्यामृचि स्पष्टमाम्नातम् । पृथिव्याश्च कृष्णरूपत्व लोके बहुल दृश्यते । छन्दोगाश्च ' यत्कृष्णं तदन्नस्येत्यन्नकारणभूतायाः पृथिव्याः कृष्णरूपत्वमा- मनन्ति । देवास्तस्मै तस्य सूर्यप्रभाच्छादकस्य तमसः प्रायश्चित परिहार विचिन्त्य नानाविधैः प्रकाशरूपैर्मण्यादिद्रव्यैः तमोऽध्नन् । चतुभि पर्यायैः अपसारितवन्तः । वस्तुतस्तु युधिष्ठिरः सायणभाष्यमवलोक्य विकृतं कृत्वा अनर्गल प्रलपति स्वीया नूत्नामिव कल्पना दर्शयन् । तत्र प्रथमपर्याये अपसृत तमः कृष्णवर्णा काचिदवि ( मेषी ) रभूत् । द्वितीयपर्याये फल्गुनी- लोहितवर्णा काचिदविरभूत् । तृतीये पर्यायेवलक्षी वेतवर्णा काचिदविरभूत् । अस्थ्नोऽध्युपरि वर्तमानः प्रकाशोऽध्यस्थः । कश्य- चिन्मृतदेहस्य दीप्यमानमस्थि समादाय तदीयात्प्रकाशात् चतुर्थपर्याये तमोऽपाकृतवन्तः । तच्च तमोवशा वन्ध्या काचिदवि- रभूत । ततो देवा विचार्य परस्परमिदमब्रुवन् देव्यादस्थ्नो जातत्वादयमुत्तमो देवपशुः । तमेत कस्मै कामायोत्तमप्रयोजनाय आलब्धं करिष्याम इति । अथ विचारादूध्वं तर्हि तदानी पृथिव्या अल्पत्व ओषधीनामनुत्पत्ति च दोषद्वयमवेक्ष्य तत्परि- हाररूपाय कामाय समर्थेभ्य आदित्येभ्यः ता वशामालभ्य पृथिवीविस्तारमोषध्युत्पत्ति च सम्पादितवन्तः | ' देवा अब्रुवन् ' देवपशुर्वा अयं समभूत् कस्मा इममालप्स्यामहे इत्यथ वै तल्पा पृथिव्यासीदजाता भोषधयः । तामवि ' 'वशामादित्येभ्यः कामायालभन्त नवो वा अप्रथत पृथिव्यजायन्तोषधयः एवमर्थवादेन प्रशस्य य कामयेत प्रथेय पशुभिः प्रजया जायेयेति स एतामावि वशामादित्येभ्य. कामाय आलभेत । आदित्यानेव काम स्वेन भागधेयेनोपधावति त एवैनं प्रथयन्ति पशुभि प्रजया च जनयन्ति ईदृग्विधान्यन्यान्यपि तत्रोक्तान्याख्यानानि । तमोवेधरहितोऽप्यादित्यः कदाचित् प्रकाशमान्द्यात् विशेषेण न दीप्तवान् । तदर्थमेता वक्ष्यमाणा दुल्हा गल-लम्बितस्तनान्विता अजा. श्वेतास्तिस्रः बलभन्त । अश्वमेध के स्वरूप का निरूपण करते हुए स्वीकार किया है कि आरण्य पशुओ का उत्सर्ग होता है और शेष बचे ग्राम्य पशुओं का आलंभन किया जाता है । यह सब अनुष्ठान ब्राह्मण और श्रौतसूत्र के अनुसार ही किया जाता है । परन्तु तुम्हारे मत में तो उन्हे प्रमाण नही माना जाता । तथापि जो वैदिक आस्तिक हैं, उनके मत के अनुसार तो मन्त्र ब्राह्मण दोनो समान रूप से वेद है, और दोनो का प्रामाण्य तथा अपौरुषेयत्व भी तुल्य है । यह जो कहा है-'अश्वमेघ, किसी आधिदैविक यज्ञ का प्रतिरूपक ही है । वह भी तुच्छ है, क्योंकि इसके विपरीत कहना ही उचित होगा । जहाँ अश्वादिकों का आरोप नहीं किया जाता, उसी को मुख्य अश्वमेध कहते हैं । किन्तु जहाँ सभी समारोपित ही है, उसे मुख्य अश्वमेघ कैसे कहा जा सकेगा? यह जो कहा है-'लौकिक अश्वमेघ में सार्वभौम राजा पृथक् और अश्वमेध पृथक हैं,
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वेदार्थपारिजातः २०३० सर्वथा विधीनामर्थंवादानाञ्चाभिप्रायमविज्ञायैव सैद्धान्तिकेऽर्थे धूलिप्रक्षेपं कृत्वा मिथ्याकल्पितेतिहासप्रासाद- निर्माणस्य यततेऽय युधिष्ठिर । ईदृशेनेव पाण्डित्येन सायणाचार्यमितिहासानभिज्ञ वक्तु धृष्टता करोति । जैमिनिरीत्या तु आम्नायस्य क्रियार्थत्वादतदर्थानामर्थवादानामानर्थक्यप्राप्तो विधिनात्वेकवाक्यत्वाद् विध्यर्थ-स्तावकत्वेन तदुपयोगो भवति । अयं तु तद्वेपरीत्येनार्थवादानामेव इतिहासप्रतिपादकत्वमातिष्ठते । विधीना त्वालङ्कारिक-मेव कल्पयति । इत्यहो नव्यमीमांसकत्वमस्य । द्रव्यदेवते कर्मस्वरूपं भवति । वशाभूताया अवेः प्रादुर्भावार्थवादरूपतया तु स्वर्भानुकृतावरणस्य देवताकृतमपसारणमुक्तम् 1। अयन्तु अवीनामेव काल्पनिकत्वं वक्ति । तथापि अश्व जो है, वह राजा के तेज का प्रतीक होने से उन दोनो का परस्पर सम्बन्ध है । आधिदैविक अश्वमेघ मे तो सूर्य ही सार्वभौम राजा है और वही अश्व भी है । -( पृ० १५० पर ) । किन्तु वह भी ठीक नही है क्योकि सूर्य मे सार्वभौमराजत्व और अश्वत्व दोनो काल्पनिक ही है । उसमे मुख्य अश्वत्व और राजत्व का स्वीकार तुमचे भी नही किया है । तथाहि —सूर्योदय से डेढ घण्टा पूर्व रात्रि का तम होता है । पूर्वदिशा में शकटाकार खडी, और आकाश मे व्याप्त उषा की किरणें दिखाई देती है । दे ही अश्व के पूर्व-कृष्णभाग में ललाटपर श्वेतचिन्ह है । उष काल के पश्चात् सूर्योदय होने पर प्रकाश होता है । वही अश्व का पश्चात् अर्धश्वेत भाग है । आगे आगे उषःकालयुक्त रात्रि होती है । उसके पीछे-पीछे सूर्य का प्रकाश चलता है । अश्व की रशना का परिमाण १२ या १३ अरत्नि कहा है । 'अरत्नि ' नाप विशेष का नाम है । सूर्य की एक परिक्रमा मे १२ मास होते है, और तृतीयवर्ष मलमास अथवा अधिकमास होने से १३ मास होते है । इसी १२ या १३ मास लम्बी रशना से बंधा हुआ सूर्य होता है । अश्वमेधीय अश्व की रशना को घृत से चिकना किया जाता है । सूर्य के अश्व की ये रशनायें ( घृ क्षरणदीप्यो ) इस रीति के अनुसार तेजस्वी प्रकाश से व्याप्त होती है । राजा की चार पत्नियाँ है - पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चार दिशाएँ ही चार पत्नियाँ हैं । पूर्वदिशा महिषी पटरानी है, इसीके साथ सूर्य का अभिषेक प्रसव होता हैं । पश्चिम दिशा बल्लभा है, सूर्य इसी दिशा में डूबता ( विश्राम करता है ) । इसी को रूपक के द्वारा कहा है- राजा, वल्लभा के ऊरुओ के मध्य शिर रखकर सोवं । उसकाल में ब्रह्मचर्य का विधान किया है । हमारी दृष्टि में सूर्य, वल्लभा पश्चिम दिशा मे अस्त हो रहा है, परन्तु उस भाग की प्रजाओ की दृष्टि से सूर्य का उदय हो रहा है । इस प्रकार हमारी पश्चिम दिशा तद्देशस्थ मनुष्यों की पूर्वदिशा हो रही हैं, अर्थात् वल्लभा पश्चिम दिशा में सूर्य के अस्त होने पर भी उसके साथ सम्बन्ध नही कर रहा है । इसी प्रकार अवल्लभा और दूतपुत्री पत्नियाँ उत्तर- दक्षिण दिशाएँ है, जिनके साथ सूर्य का उत्तरायण और दक्षिणायन में ही सयोग होता है, सर्वदा नही । - ( पृ० १५० ) । यहाँ यह स्पष्ट ही हैं कि आधिदैविक यज्ञ मे याज्ञिक पदार्थों का आरोप ही कियामें जाता है । आरोप भी एक क्लिष्ट कल्पना करना ही है । द्वादश मासो मे रशनात्व को कथञ्चिदेव सम्पादन किया जाता है । मासो अप्रकाशरूपता रहने से उनमे प्रकाशव्याप्तता का होना संभव नही । जो यह कहा है पृ ० १५१ पर कि ' अश्व का एक वर्ष परिभ्रमण सूर्य की वार्षिक गति का ही उपलक्षक है । अश्व की रक्षा के लिये, बाधा को दूर करने वाले ४०० शस्त्रास्त्र सम्पन्न कवची राजपुत्र भी सूर्य किरण ही है । वर्षाकाल में मेघों की रुकावट के कारण सूर्य की किरणों का पृथिवी पर्यन्त प्रसार नही होता । अरब के विचरण से शत्रुरूपी रुकावट को दूर करने के लिये ४०० शस्त्रधारी कचची सैनिक साथ रहते हैं ।' इत्यादि, यह भी ' अश्वमेघ के अश्व के अवयवो को रस्सी से बाँधते है और तत्तत् स्थानीय रस्सी के छोरो से अन्य पशुओं को बांधा जाता है ।' तथैव ' सुर्यमण्डल से 1 सब ओर सूर्यरश्मिय प्रसृत होती हैं उनसे सूर्य- मण्डल पूर्णरूप से बंधा है, अर्थात् आच्छादित है, इन्हीं सूर्यरश्मियो के दूसरे छोर के साथ सौरमण्डल के पृथिवी आदि ग्रहोपग्रह बघे हुए हैं । -वह भी सब सारहीन है । क्योकि रज्जु तो अश्व से भिन्न होती है, किन्तु रश्मियाँ तो सूर्य की अंशभूत ही है, अतएव उनसे सूर्य का बंधना संभव नही, और न ही उनसे ग्रह उपग्रहों का बन्धना संभव है । उनसे बद्ध होने का सिद्धान्त अभीतक सर्वसम्मत नही हुआ है । अत एव तुमने भी 'बद्धाः' का आच्छन्नाः ऐसा औपचारिक अर्थ ही किया है । रश्मियों में रज्जुत्व, सूर्य में अश्वत्व, ग्रहोपग्रहों में भी पशुत्व आरोपित ही हैं । इस प्रकार आरोप की कल्पना कर किसी पुष्ट अर्थ की कल्पना करना शक्य नही है ।
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२०३१ वेदार्थपारिजातः यत्तु - ' अविशब्देन मेषतुल्या अकठिना आर्द्रा भूमिरेवोच्यते ' इति, तदप्यशुद्धम्, ' न विधी परः शब्दार्थ: ' इति न्यायेन विधो गोणार्थग्रहणायोगात् । 'यत्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसा विध्यदासुरः । अक्षेत्रविद्यथा मुग्धो भुवनान्यदीर्घायु ॥ ' ( तै ० स० २१ २१५ ) हे सूर्यदेव, त्वा त्वां यदा आसुरः असुरस्य प्राणापहर्तु. पुत्र स्वर्भानुस्तत्संज्ञक तमसा मायानिर्मितेन आवृणोत् तदा भुवनानि सर्वाणि अदीधयुः यथा तत्रत्यो जनः अक्षेत्रवित् स्वस्वस्थानमजानन् मुग्धो भवति, तथा दृश्यन्त इत्यर्थं ' स्वर्भानोरथयदिन्द्र-माया अवो दिवो वर्तमाना अवाहन, गुलह सूर्यतमसापव्रतेन तुरीयेण ब्रह्मणा विन्ददत्रि:' ( तै ० सं ० २| १ | २| ६ ) अथ जग-न्मोद्यानन्तर स्वर्भानोरसुरस्य यत् या: मायाः दिवो द्योतमानादादित्यात् अव अवस्तात् वर्तमाना तदुपरि तिरोधाना-अन्धकार-सामर्थ्यात् नाः सर्वा हे इन्द्र, त्वम् अवहंसि '। अथात्रैरेव परोक्षवादः - 'तमसा अन्धकारेण अपव्रतेन अपगतकर्मणा म्लावरणरूपत्वादपव्रतत्वम् तादृशेन अन्धकारेण गूलहं गूढ आवृत सूर्यमत्रिर्ऋषि यत्वा सूर्य इत्यपेक्ष्य तुरीयेण ब्रह्मणा ग्राव्णो निलीनंब्रह्मा इत्यनेन मन्त्रेण अविन्दत निरावरण शुद्धं सूर्यं लब्धवान् । एकैक मायाशमेकैकेन मन्त्रेणापनोद्य चतुर्थेन मन्त्रेण तमोऽध्यपनुददित्यर्थः । राजा' 'मामिमं तव सन्तमत्र इरस्या दुग्धोमियसा निगारीत । त्व मित्रो असि सत्यराधास्तौ महावतं वरुणश्च द्रोग्धा असुरः । ( ) तै ० सं० २।१२।७ इदं सूर्यवाक्यस् । हे अत्रे मामिममीदृगवस्थं तव सन्त स्वभूतं इरस्या अन्नेच्छ्या दुग्धः सत्य-मियसामयजनकेन तमसा मा निगारीत मा गिरतु । किञ्च हे मित्र त्वं मित्र: असि । प्रमीतेः सकाशात् त्राता भवसि राधाः सत्यधनश्च तो राजा वरुणश्च त्वं च युवा मा मामिहावतम् रक्षतम् । पृ० १५१ पर जो कहा है-' अश्वमेध मे विजित राजाओ से भेंट ( उपहारादि ) ग्रहण करने के समान सूर्य भी स्वसम्बद्ध प्रदेशो से अपनी रश्मियो के द्वारा जल का ग्रहण करता है ।" वह भी सारहीन है । क्योकि यह विषमउपन्यास तुमने किया है । क्योकि प्रदीयमान वस्तु के ग्रहण को उपहार स्वीकार कहते हैं । जलग्रहण इस प्रकार का नही है । किन्तु स्वेच्छया बलात् उसका, • ग्रहण किया जाता है | अत्र्वमेधमें राजा यजमान हुआ करता है और अश्व तो यज्ञ का साधन होता है । किन्तु सूर्य मेंमें यजमानत्वकही मुखमें अश्वत्व, यूपत्व सभी काल्पनिक ही है । अतः उसके अनुकरण को ' अश्वमेघ ' कहना अत्यन्त असंगत है । प्राणाग्निहोत्रादिकी कल्पना की जाती है ।,,, आहवनीयत्व की कल्पना उर में वैदित्व की कल्पना लोभ मे दर्भत्व की कल्पना जाठराग्नि में गार्हपत्यत्व जहाँ अथवा जैसे पञ्चाग्निविद्या है, वैसे हो जहाँ यज्ञचिन्तन कहा है, वहाँ तत्तद् यज्ञागो का अध्यास करके चिन्तन करना चाहिये, किन्तु विधान हो, वहाँ कल्पना करना निरर्थक ही है । 'पृ० १५१ पर 'ऋग्वेदीय अश्वसूक्त' शीर्षक मे कतिपय संकेत देकर जो स्पष्ट किया है कि अश्वमेघ के १६३ वें सूक्त में है । सर्वनाम उक्त अश्व, सूर्य ही है ।' तथा 'सूक्त १६४ का आरंभ 'नस्य वामस्य पलितस्य' से होता है । आदि में 'अस्य' सर्वनामपद पूर्वनिर्दिष्ट के स्मारक अथवा अभिघायक होते है । इस अस्यवामीय सूक्त ( १।१६४ ) में सूर्य और उसकी रश्मियों का ही वर्णन है । निरुक्तकार यास्क ने भी वैसे ही व्याख्या की है । १६२वें सूक्त मे यद्यपि अनेक ऐसे मन्त्र और पदसमूह हैं, जो आपाततः अश्वमेघयज्ञ- सम्बन्धी पदार्थों का ही वर्णन करते प्रतीत होते है । परन्तु पूर्वोक्त दोनों सूक्तो के प्रकाश में विचार करनेपर उनका भी आधिदैविक ही अर्थ करना चाहिये । और बृहदारण्यकोपनिषद् में वह १११६२ सूक्त में निर्दिष्ट अश्यांगों की आधिदैविक व्याख्या ।हीआश्वमेधिककी है ( पृ ० १५२मध्यम) किन्तु यह सब कथन, अज्ञानविजृ भित भ्रम से ही पूर्ण हैं । वस्तुतः अश्वस्तवरूप इस सूक्त को देवता ' अश्व' है 'दिन में उपाकरण संस्कार के लिये स्थित हुए अश्व की आद्य की ११ ऋचाओं से स्तुति की जा रही हैं । मन्त्रार्थ को देखते हुए अश्व- पक्ष में ही वह संगत होता है । किञ्च 'स्रादखं वसवो निरतष्ट' -( ऋ० सं० १।१६३।२ ) इस मंत्र में भी 'सूरात्' सूर से अश्व का निर्माण कहा
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वेदार्थपारिजातः २०३२ ' ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजातः सपर्यन् कीरिणादेवान्नयसोपशिक्षन् । ॥ ' ||' ब्रह्मा ब्राह्मणःअत्रिः अत्रिःसूर्यस्यग्राव्णःदिवि अभिषवसाधनानिचक्षुराधात् स्वर्भानोयुयुजानःमाया युञ्जन्अधुक्षत इन्द्रार्थं सोममभिषुण्वन् । कीरिणः कीर्यंते विक्षिप्यते इति कीरि स्तोत्रं तेन देवान् सपर्यंन् पूजयत् नमसा हविर्लक्षणेनान्नेन नमस्कारेण वा उपशिक्षन प्रसाधयत् । शिक्षतिर्दानार्थोऽप्यत्र प्रसाधनार्थं । एवमुक्ते साधनैः सूर्यस्य सर्वप्रेरकस्य चक्षु. सर्वस्य व्यापकं मण्डलं दिवि अन्तरिक्षे आधात् । निस्तमस्कं कृतवानित्यर्थः । अभिर्ब्राह्मण इन्द्रार्थं सोमाभिषवेण हविर्लक्षणेनान्नेन स्तोत्रैश्च इन्द्रादीन् देवान् पूजयन् सूर्यस्य चक्षुः मण्डलं दिवि निस्तमस्कमाधात् । स्वर्भानोरसुरस्य मायाः स्वाश्रयमव्यामोहयन्तीः मायाः अत्रिसहाय इन्द्र. अपधुक्षत अपजुगोपन्यवारयदित्यर्थः । यद्वा सूर्यस्य दिवि पूर्वमावृते प्रकाशे तदपनोद्य स्वकीय चक्षुराधात् । निरावरण तेजः सस्त्याप दृष्ट्वानिति । स्वर्भानुमायया सूर्यस्यावृति: हारिद्रविके ब्राह्मणेऽप्याम्नाता । ' स्वर्भानुश्चासुरः सूर्य तमसाविध्यत् । तस्मै देवा गया है, सूर्य का निर्माण नही । अन्तरिक्ष से या पुरोष से सूर्य का जन्म होना कही भी प्रसिद्ध नही है । तथा उसका महाशब्दकर्तृत्व भी कही प्रसिद्ध नही है । ऋ० १।१६३।२ मन्त्र भी अश्वपक्ष मे ही संगत होता है । जैसे देवशुनी सरमा के द्वारा सारमेयों की, मनु के द्वारा मानवो की स्तुति की जाती है, उसी तरह इस अश्वमेधीय विशिष्ट अश्व की इन्द्राधिष्ठित अश्वरूप से स्तुति किया जाना उचित ही है । उसो तरह ऋ ० १।१६३।३ मंत्र भी अश्व की स्तुति में ही संगत होता है, सूर्य की स्तुति में नही । मंत्रगत ' अर्वन्' सबोधन भी सूर्य मे सगत नही हो रहा है । ऋ० १।१६३।५ मत्र मे भी ' बाजिन्' सम्बोधन भी अश्व के ही अनुकूल पडता है । शफ अश्व के ही होते हैं, सूर्य के नही । ऋ० १।१६३।६ मंत्र मे अश्वमेधीय अश्व की संवत्सर प्रजापति के रूप मे उपासना बताई गई है । अतः द्युलोकगमन- श्रवण करने मात्र से उसे आदित्य समझलेना उचित नही है । सप्तम मन्त्र मे भी उसके उत्तम रूप को ध्येय बताया है । अष्टम मात्र में भी ' अर्वन्' सम्बोधन कहा गया है । नवम मंत्र में अश्व का ही स्पष्ट लिंग प्रतीत हो रहा है । पू० १५२ पर जो कहा है 'लौकिक अश्व के शृङ्ग ही नही होते, किन्तु यहाँ उसकी हिरण्यशृङ्गता कही गई है । ' किन्तु यह कथन भी सायण व्याख्या देखने से निसार प्रतीत होती है । यह जो कहा है 'ईर्मान्तास:' इस दसवें मन्त्र की व्याख्या निरुक्तकार ने सूर्यरश्मिपरक की है ।' - ( पृ० १५२ ) । वह भी ठीक नही है । क्योंकि निरुक्तकार ने भी आदित्य के रूप में अश्व की स्तुति को हो कहा है । इस मन्त्र में ' इर्मान्तास' आदि पद अश्व के विशेषण हैं । एवच निरुक्तकार की दृष्टि से भी यह मन्त्र, अश्वस्तुतिपरक ही है । १६४वें सूक्त प्रथम मन्त्रमें, ' अस्यवामस्य' इस मन्त्र में भी 'अस्य ' सर्वनाम के द्वारा सूर्य का अभिधान नही है, अपितु वहाँ १६३वें सूक्त में अश्व की स्तुति ही की गई है । १६४ वें सूक्त मे प्राय. संशयोत्थापनादि अनेक अर्थ बताये गये है, तथाच अस्यवामस्य सूक्त के सूर्यपरक लगाने पर भी सिद्धान्त मे कोई हानि नही है । क्योकि ' मानो मित्र' आदि २२ ऋषाओ वाले दैर्घतमस की देवता ' अश्व' है, अतः उससे अश्व की स्तुति की गई है । इस सम्पूर्ण सूक्त के प्रत्येक ऋचा का अर्थ मूल संस्कृत में दिया गया है । तात्पर्य यह है कि दैर्घतास सूक्त के द्वारा भी तुम्हारा अभिलषित सिद्ध नहीं हो रहा है । बृहदारण्यक उपनिषद् का वचन जो तुमने दिया है, उससे भी तुम्हारा पक्ष सिद्ध नही हो पा रहा है । उसमें तो अश्वमेष की उपासना बताई गई है । उसपर जो भाष्यकार ने कहा है, उसे मूल संस्कृत में दिया गया है । जैसे प्रतिमा में विष्णुबुद्धि की जाती है, वैसे ही पशु मे प्रजापतित्व बुद्धि करने के लिये कहा गया है । चक्षु की देवता सूर्य है, इसकार चक्षु में सूर्य बुद्धि करनी चाहिये । मुख की देवता अग्नि है, अतः मुख में वैश्वानराग्नि बुद्धि करनी चाहिये । संवत्सर आत्मा है, संवत्सर बारह या तेरह महीने का होता है, वह उसका आत्मा ( शरीर ) है । काल के अवयवों का संवत्सर ही शरीर है, और "इन सब अंगों का मध्यभाग आत्मा है" इस श्रुति के अनुसार शरीर हो आत्मा है । 'अश्वस्य मेध्यस्य इसकी पुनरुक्ति सबके साथ सम्बन्ध प्रदर्शित करने के लिये की गई है । h
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वेवार्थपारिजातः २०३३ प्रायश्चित्तिमैच्छन् । तस्य तत्प्रथम तमोपाघ्नन् साकृष्णाविरभवत् । यत् द्वितीय साफाल्गुनीयत्तृतीय सा वलक्षी, यदस्था- ' ' ( / )दपाकृन्तन्नित्यादि । य वे सूर्यं स्वर्भानुस्तमसा विध्यदासुर । अत्रयस्तमन्वविन्दन्नन्ये अशक्नुवन् ५ ४०१ ९ अत्रिकृतं सामर्थ्यमनुवदति -यं वा इति । य वै सूर्य स्वर्भानुरासुरस्तमसाविध्यत, अत्र यस्त सूर्यमन्वविन्दन् इन्द्रार्थं सोमयागदेवतास्तुतिनमस्कारैरनुक्रमेण इषदीषत तमोsवरुद्ध्य लब्धवन्त, अन्ये नहि अशक्नुवन्, आदित्यो व्यरोचत ।.'' इत्यादिकमप्युक्तरीत्येव समाधेयम् ।'स्वर्भानुरासुर आदित्य तसमा विध्यत तद्देवाश्चर्षयश्च भिषज्यत् तेऽत्रिमब्रुवन् ऋषे त्वमिदमपजहोति' ( जे० ब्रा० ११८० ) तादृशमेव व्याख्यानमत्राप्युक्तम् । सर्वासामाख्यायिकानामर्थंवादत्वाद्यद्यपि स्वार्थे तात्पर्यं नास्ति, विध्यर्थंस्तुतावेव तात्पर्येण स्वार्थे विगानमकिचित्करम् । महावाक्याविरुद्धद्वार भूतस्यार्थस्यापि प्रामाण्याभ्युपगमे तु आदित्यविषये बह्वः प्रायश्चित्तयः कल्पभेदेन व्यवस्थापनीया:' इति तैत्तिरीयसंहिता ( २२११८ ) सायणभाष्यानुसारेण , व्यवस्थापनं युक्तमेव । यत्तु अविमेधादिशब्दानामन्यथार्थकल्पनं तदप्यसङ्गतमेव विधौ गोणार्थस्यासम्भवात् । ' ' ( ) 'एवमेव साविवंशाभवत् तै ० सं ० २१ २ अथवा इय तक्षासोद् अलोमिका ते अब्रुवन् तस्मै कामाया-लभामहै, यथास्यामोषधयो वनस्पतयश्च जायन्त इति' ( मे ० सं ० २/५/२ ) इति मैत्रायणी संहितापि पूर्ववदेव व्याख्येया । ' ' ( ) ' ' ( ) ' अविरासीत् पिलिप्पिला वा० सं ० २०१२ ऊर्णायुः वा० सं ० १३। ५० ओषधिवनस्पतयो लोमानि ( मे० सं ० २/५/२ ) इत्यादिशब्दभेदेरन्यैश्चान्यैश्च वाग्जालैविध्यर्थस्यान्यथानयनं सर्वथाप्यवैदिकमेव, विधो गोणार्था- ' ( )श्रयणस्य मीमांसाऽसम्मतत्वात् । शिथिरा वा इयमग्र आसीत् ता प्रजापतिः शर्कराभिरहहत् मे ० स० ११६ ३ 'आर्द्रेवहीयमासीत् तां देवाः शर्कराभिरहंछन् तेजोऽग्नावदधुः' ( का० सं ० ८२ ) इत्यादिना काम पृथिव्या अनेकावस्थाः सिद्धयन्तु, नतु तावतापि तत्रालम्भनयज्ञादिकं मुख्यं सम्भवति क्वचिद्यज्ञत्वोक्तिस्तु गोण्यावृत्यैव । यदपि - ' यदि नो गा हिंसीः यद्यश्वं यदि वा पूरुषम् । तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नो ऽसो वीरहाः ॥ ( अ० वे ० सं ० १ | १६ | ४ ) ' इमं मा हिसीद्विपादं पशुसहस्राक्षो मेघाय चीयमानः' ( वा० सं० १३।४७ ) 'अश्वं जज्ञानं सरिरस्य मध्ये अग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन्' ( वा० सं० १३।४२ ) इमं मा हिसीरेकशफ पशुं कनिक्रदं वाजिनं वाजिनेषु ( वा० सं ० १३।४८ ) । 'गा मा हिसीरदिति विराजम्' ( वा ) ' ० सं ० १३।४३ इमं साहस्र शतधारमुत्सं घृतं 'दुहानामदिति जनाय माहिंसी • परमे व्योमन्' ( वा० सं ० १२२४९ ) 'अवि जज्ञानां.... अग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन् ( वा० सं ० १३।४४ ) 'इममूर्णाय वरुणस्य नाभि त्वच पशूनाम् द्विपदां चतुष्पदाम् | त्वष्टुः प्रजानां प्रथम जनित्रमग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन्' ( वा० सं० १३| १५ ) मन्त्रेरमीभिः समेषां पशूनामहिंसनमेवोक्तमिति ( पृ० १४४ ) तदपि यत्किञ्चित्, भावार्थानवबोधात् । पूर्वमुक्तमेवसमाधानम् । 'तस्माद्यज्ञे वधोऽवध:' ( म० ) ' न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसे ' पथिभिः सुगेभिर्देवानिदेषि इत्यादिभिहिरण्यशरीरप्राप्तिहेतुत्वेन वेदविहिता हिंसाप्यहिसैव । कि स्वार्थसाधनाय यथा कात्यायनमहीधरादिवचनैस्तेषा तेषा पशूनामुत्सगं साधयसि तथैव तेषामेव वचनेमध्यस्थ्यमवलम्ब्य प्रकृते किमिति दृष्टिं कथं ? ' ', ' '?न ददासि अश्वशिर ईशाने उपदधाति नैॠत्येऽजमुपदघाती त्यादिवचनानां का गतिः किञ्च त्वयापि दयानन्देनापि निरुकस्य परमं प्रामाण्यमङ्गीक्रियते । यास्काचार्यस्तु 'आम्नायवचनादहिंसेव प्रतीयेते ' ( नि० १।१६ ) J -', - त्याह । व्याख्यातं चैतत् दुर्गाचार्येण यदपि चोकं स्वधिते मैन हिसीरित्याह हिंसन् अत्र ब्रूमः आम्नाय ,,वचनादहिसा एषा प्रतीयते । कथमहिंसा प्रत्यक्षतो हि छिद्यते वृक्षः शृणु इयं हिसेयमहिंसेत्यागमादेतत् प्रतीयते अन्तरिक्ष उदर है, ऊर्ध्वत्व में समानता होनेके कारण द्युलोक उसका पृष्ठभाग है । अवकाश या छिद्ररूपता में समानता होनेके कारण सूत्र के,, ( ) ' ( ) ' ' ( ) पृथिवी पैर रखने का स्थान है पृथिवी पाजस्यम् पादस्य के वर्ण द का व्यत्ययो बहुलम् पा० सूदिशाओं० ३।१।८५का सम्बन्ध है । अनुसार जकार के रूप में व्यत्यय होने से 'पाजस्य' हो गया है । चारों दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, क्योकि पार्श्व से जटिल अशों पाठको की उत्सुकता को देखते हुए द्वितीय खंड के प्रकाशन की त्वरा हेतु बाध्य होना पड़ा, अतः पृष्ठ २०३३ से करेंगेकेवल | -- सम्पादक का ही अनवाद किया गया है । फलत: मल और अनवाद के मद्रण -क्रम विपर्यास को विज्ञ पाठक स्वयं ही अर्थानसन्धान
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२०३४ दार्थपारिजातः प्रतिविशिष्टश्चायमेव वैदिकआम्नायआगमः । एतत्पूर्वकत्वादन्येषामागमानाम् । स एष कुत्स्तस्य जगतः प्रतिविशिष्टाय श्रेयसेऽभ्युद्यतः सन् हिंसाया कर्तार विनियोक्ष्यत इति कुत एतत्? नूनमियमहिसैव यतोऽस्या नियुनक्ति कर्तारम् । तदेत- दागमप्रत्यक्षमेव यथेयमहिंसेति । अपि चैतदोषधिवनस्पतिपशुमृगपक्षिसरीसृपाः सम्यगुपयुक्ताः सन्तो यज्ञे परमुत्कर्षं प्राप्नुवन्ति, सोऽयमभ्युदय एव सम्पद्यते न हिंसा •तस्माद्ययुक्तम् हिंसन्नेव मैन हितोरित्याह हिसन्निति । नासो हिनस्ति किर्ताह अनुगृह्णाति यज्ञविनियोगार्थविधानतछिन्दन तस्मादुपपन्नार्थी' इति । तथैव - प्रकृतेऽपि श्रुतिसूत्रानुसारेण हिसन्नेव मैनं हिसीरित्याद्युक्तिभिः तस्य वधस्य अवधत्वमेव वक्ति वेदः । गवा तु विशेषताऽऽन्यत्वोक्तस्तत्स्थानेऽजादय एव गृह्यन्ते । अव्यादीनामालभन तु ' वायव्यं •श्वेतमालभेत ' ' वायवे नियुत्वत आलभेत' 'प्राजापत्यं तूपरमालभेत" ( तै० सं ० २।१।१ ) इत्येवमादिभिः स्पष्टमेव पशूनामालम्भनं विहितम् । पशूना द्रव्यविधयैव याग उपयोगो भवति । यथा ब्रीह्मादीना पुरोडाश प्रकृतित्वेन यागोपयोगस्तथैव " पशूना वपादिप्रकृतित्वेनोपयोगः स्वाभाविक: । अत एव हृदयस्याग्रे अवद्यत्यथ जिह्वाया अथवक्षसो यद्वै हृदयेनाभिगच्छति' ( तै ० सं ० ६| ३| १०| ) इत्यादिभिस्तदवदानश्रवणात् कचिदुत्सर्गेऽपि आलम्भनमेव प्रायिकम् । अत एव कोषकारै: ' आलम्भन' शब्दस्य मरणपर्यायेषूल्लेखः कृतः । प्रमापणं निबर्हणं निकारण विशारणम् । आलम्भपिञ्जविशरधातोन्माथवधा अपि ॥ ' ( अमरकोष २८| ११२- ११५ ) त्रिंशन्नामानि मारणस्य । आलम्भनम् आलभ्भ. । ' भावे ' ( पा० सु ० ३।३।१८ ) इति घञ् । 'लभेश्च ' ( पा० सू० ७ ११६४ ) इति सहकारेण 'उपसर्गात् खल्घञोः' ( पा० सू० ७| १/६७ ) इति नियामक्रान्नुम् । इति रामाश्रयीयटीकायाम् । 'वियोगे विप्रलम्भः स्यात् आलम्भः प्रतिघातनम् । उपलम्भ- ' ( ) ' स्त्वनुभवो विलम्भस्त्वतिसर्जनम् शब्दरत्नाकरे सङ्कीर्णाध्याय ३४१७ । निर्वापणनिर्वासनकदनव्यापादनानि . || | ) ':. ' तुल्यानि । निग्रन्थनमालभ्भ प्रमया हिंसा च संज्ञपनम् २ ४७८ इति हलायुध । आलम्भ स्पर्शहिंसयो ( |७ १| १० ) इति यादवः । इत्यादिप्रमाणैः प्रसङ्गानुसारेण आलम्भशब्दस्य वध स्पर्शो वा अर्थों भवत्येव । अत एव चरक-वचनेऽपि वधार्थकः स्पर्शशब्दस्त्वयापीष्यत एव । तत्र यथा निषेधवशात् हिंसाया • अधर्मत्वं विज्ञायते तथैव विधिबलात् हिसाया धर्मत्वमपि सम्भवत्येव । यथा विवाहमन्तरा (योषित्स्पर्शस्य ' पापहेतुत्वेऽपि शास्त्रसम्मतविवाहपूर्वकस्पर्शो धर्म एव भवति, तथैव प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । अतः एव श्रुतिः--' अहिंसन् सर्वाणि भूतान्यन्यत्रतीर्थेभ्य:' ( छा० उ० ) सामान्यतया निषेधवचनानि सामान्यशास्त्रं यज्ञाङ्गत्वेन • विधायक वचनं विशेषशास्त्रम् । विशेषशास्त्रेण सामान्यशास्त्रस्य बाधो ' ' ( ) भवत्येवोत्सर्गापवादन्यायेन । तस्माद्यज्ञादन्यत्रैव उत्सर्गभूतानिषेधाः प्रवर्तन्ते । अशुद्धमितिचेन्न शब्दात् ब्र ० सू० | ', इत्यत्र शङ्कररामानुजादिभिराचार्यरत्नैर्वीतरागैरपि वैदिकसंज्ञपनस्य धर्मत्वमेवोक्तम् । ब्रह्मणे ब्राह्मणमालभते क्षत्राय राजन्यम्' इत्यादिषु तु 'कपिञ्जलादिवत् उत्सृजन्नि ब्राह्मणादीन् ( का० श्री० सू० २१२१/१/१२। १। १२ ) इत्युत्सर्गो विहित एव । धर्माधर्मयो शास्त्रमेव प्रमाणम् । यत्रोत्सर्गो विहितः तब स एव धर्मः । यत्र तु संज्ञपनमुक्तं तत्र तदेव धर्मः । सन्यासे तु सर्वविधयज्ञादिकर्माणि त्यक्त्वा ब्रह्मानुसन्धानपरायणनैव मुख्यो धर्मं । तदनधिकारे तु कर्माणि कर्त्तव्यान्येव । , -'सङ्ग्रामस्य हिंसापूर्णत्वात् क्रूरता सर्वविदितैव तथापि तदकरणे प्रत्यवाय उक्तो भगवता अथचेत्त्वमिमं यदि यह कहा जाय कि पार्श्व और दिशाओ की संख्यों में समानता न होने के कारण ऐसा कहना उचित नहीं है, तो वह ठीक नहीं है, क्योकि उसके पावों का सभी दिशाओ से सम्बन्ध होने के कारण कोई दोष नही है । आग्नेयी आदि अवान्तर दिशाएँ पार्श्वभाग की अस्थियाँ ( पसलियाँ ) है, ऋतुएं अङ्ग है, क्योकि सवत्सर के अवयव होने के कारण अगो से उनको समानता है । मास और अर्धमास पर्व 1( मन्त्रियाँ ) है, क्योकि सन्धि से उनकी समानता हैं । दिन और रात्रि प्रतिष्ठा ( पाद ) है । 'अहोरात्राणि इस पद में बहुवचन होने के कारण प्रजापति, देवता, पितृगण और मनुष्य सभी के दिन- रात प्रतिष्ठा ( पाद ) हैं, क्योकि इनसे वह प्रतिष्ठित होता हैं, कालात्मा + है
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वेदार्थपारिकाः २०३५ [ ' ( ) धर्म्यं सङ्ग्राम न करिष्यसि । ततः स्वधर्म ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि । श्री० भ ० गी ० इति : ' ' ( ) गीतोक्त । अधेन्वाचरति माययेष वाच शुश्रुव अफलामपुष्पाम् ॥ ऋ० स० १-१७६१५ इत्यत्र तु अफलायामपुष्पायां वाचि मायाधेनुत्वमेवोक्तम् । इति गोणमेवात्रवन्ध्यात्वमपिः । अत्र केवलपाठकोऽर्थज्ञानशून्यो निन्द्यते । एष अविज्ञातार्थ: पुरुष:(अधेन्वा धेनुत्ववर्जितया कामानामदोग्याः देवमनुष्यस्थानेषु वाक्प्रतिरूपया मायया चरति । अफ- लामपुष्पाम् वाचोऽर्थ. पुष्पं फलम्, अर्थवजिताम् । यद्वा वाचोऽर्थे याज्ञदेवते यज्ञे भवं ज्ञान याज्ञम्, देवतासु भवं ज्ञान देवतम्, तद्वजिनां कर्मादिविषयज्ञानवर्जिताम् वाच शुश्रुवान् केवल पाठमात्रेणैव श्रुतवान् चरति 9 तथा वन्ध्या पीना गौ कि द्रोणमात्र क्षीर दोग्धीति मायामुत्पादयन्ती चरति तथा पाठं प्रब्रुवाणश्चरति । ऊषभूमिर्वशा भवतु तत्र वशात्व ( वन्ध्यात्व गुणयोगात् गौणत्वमेव । आधिदैविकेषु भौतिकेषु यज्ञेषु यथा आज्यसमिदादयो गोणा तथैव यज्ञत्वमपि गोणमेव । अत एव नहि मुख्या यज्ञास्तत्प्रतिनिधयः सम्भवन्तीति । अध्यात्मज्ञानमये; यज्ञे ब्रह्मवाग्निर्भवति ब्रह्मेव स्रुक्सुवाद्यर्पण ब्रह्मेव हविर्ब्रह्मेव होम: ब्रह्मैव फलं च भवति । न च तावता कर्मकाण्डप्रकरणेऽपि ब्रह्मरूपाःएवाग्न्यादयो ग्राह्या भवन्ति । यदुक्तम् —'अश्वादीना बन्धनार्थं यूपा भवन्ति, तेषा पलायनसम्भवात्, न मनुष्याणा रज्जुभिर्बन्धन युक्तम्' ( पृ० १४८ ) इति, तदपि तुच्छम्, नियोजनपर्यग्निकरणादीनां सस्कारविशेषत्वेन लौकिकपलायननिवृत्तेरेवप्रयोजना- - भावात् । अधिदेवे तु सूर्ये यूपत्व रश्मिषु रज्जुत्वं चारोपितमेव । पुरुषमेधे तु मानवे श्रौतसूत्रे यूप एव नियोज ' ( ) नमुक्तम् । कपिञ्जलादीन् पृषतान्तास्त्रयोदश यूपान्तरेषु का० श्री० सू० २०१६/६ इत्युक्तेः । त्वयापि १४९ पृष्ठे अश्वमेधस्वरूपं निरूपयता स्वीकृतं यत् आरण्याना पशूनामुत्सर्गो भवति शेषाणा ग्राम्याणा पशूना- मालम्भनं भवति । तच्च सर्वं ब्राह्मणश्रोतसूत्रानुसारेणैव क्रियते । त्वया तु तेषा प्रामाण्य नाभ्युपेयते इति त्वदीयः पन्थाः । ये वैदिका आस्तिकास्तेषा रीत्या अविशेषेण मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदत्वमपौरुषेयत्व प्रामाण्यञ्च । पुरुषमेधे नियुक्तान् पुरुषान् ब्रह्मादक्षिणतः पुरुषेण नारायणेनाभिष्टोति सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रापादित्येतेन षोडशर्चेन षोडशफलं वा इद सर्व सर्वं पुरुषमेधः सर्वस्यापत्ये सर्वस्यावरुद्ध्यै तत्पर्यग्निकृताः पशवो बभूवुरसज्ञप्ताः अथ हैतं वागभ्युवादपुरुषान् मासन्तिष्ठ यो यदि संस्थाययिष्यसि पुरुष एव पुरुषमत्स्यतीति तान् पर्यग्निकृतानेवोदसृजत' ( श० १३: ६।२।११-१२-१३ ) इति पुरुषमेधश्रुत्यैवोत्सर्ग उक्तः । एतान् पुरुषपशून् मा सन्तिष्ठियः, उदनिनयनादिकानि अङ्गानि मा कृथाः । यदि संस्थापयिष्यसि ततः शेषभक्षानुसारेण लोकेऽपि पुरुषः पुरुषं भक्षयिष्यतीति । तस्मात् पर्यग्निकृता- नेवोदसृजत । यदुक्तम्—' अश्वमेधः कस्यचिदधिदेविकयज्ञस्य प्रतिरूपक एवेति, तदपि तुच्छ विपरीतस्यैव सुवचत्वात् । यत्राश्वादयोऽनारोपिताः स एव मुख्योऽश्वमेधः । यत्र तु सर्वे समारोपिता एव तस्य कथ नाम मुख्यमश्वमेधत्वं - ' सम्भवति । यद्यपि लौकिकेऽश्वमेधे सार्वभौमोराजा पृथक् अश्वश्च पृथक् । तथापि अश्वस्य राज्ञस्तेजः प्रतीकत्वात्परस्परमनयोः सम्बन्धो भवति । आधिदैविके चाश्वमेधे सूर्य एव सार्वभौमो राजा स एव चाश्वः । ' ( पृष्ठ १५० ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, सूर्ये सार्वभौमराजत्वमश्वत्वञ्च काल्पनिकमेव, तत्र मुख्याश्वत्वराजत्वयोस्त्वयाप्यनभ्युपगमात् । तथाहि दिन - रात्रि के द्वारा प्रतिष्ठित होता है और अश्व पैरों के द्वारा प्रतिष्ठित होता है । शुक्लत्व की समानता होने के कारण नक्षत्र अस्थियाँ | --- ( ),, आकाश अर्थात् आकाशस्थित मेघ क्योंकि अन्तरिक्ष आकाश को उदर कहा जा चुका है मास है क्योकि जलरूप धर बरसाने से उनकी मांस से समानता है । अवयवो के पृथक पृथक रहने की समानता होने के कारण बालू ( सिकता ) उदरस्थित अघजीर्ण अन्न ( ऊवध्य ) है | सिन्धु अर्थात् स्यन्दन ( बहने ) में समानता होने के कारण नदिया नाडियाँ ( गुदा ) हैं, क्योंकि यहाँ 'सिन्धवः'
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२०३६ वेदार्थपारिजात सूर्योदयाद सार्धघण्टाकालात्पूर्वं नैशं तमो भवति । पूर्वस्यां दिशि शकटाकारेण स्थितायाः उषस. आकाशव्यापिनः किरणा दृश्यन्ते । स एवाश्वस्य पौरस्त्ये कृष्णभागे ललाटे श्वेतचिह्नम् । उषःकालानन्तरं सति सूर्योदये प्रकाशो जायते । स एवाश्वस्य पाश्चात्त्यः अर्धश्वेतो भागः । अग्रेऽग्रे उषःकालयुक्ता रात्रिर्भवति ॥ पश्चात्सोरः प्रकाशस्तामनुसरति । अश्वरशना द्वादशारत्नि-परिमिता त्रयोदशारत्निपरिमिता वा भवति । सूर्यस्यैकपरिक्रमणे द्वादशमासा भवन्ति । तृतीये वर्षे अधिकमासमादाय त्रयोदशमासा भवन्ति । तद्रूपामीरशनाभिर्बद्धः सूर्याश्वो भवति । अश्वमेधोयाश्वस्य रशना घृताक्ता भवन्ति । (. ) सूर्याश्वस्य रशनास्तु घृ क्षरणदीप्त्यो इति रीत्या तेजस्विप्रकाशव्याप्ता भवन्ति । राज्ञश्चतस्रः पत्न्यो भवन्ति । अत्र प्राच्याद्याश्चतस्रो दिश एव सूर्यस्य पत्न्यः । पूर्वा दिक् पट्टमहिषो भवत्यनयैव तदभिषेकप्रसवात् । प्रतोची दिक् वल्लभा, तस्यामेव विश्वामदर्शनात् । तत्र वल्लभाया ऊरो शिर आषाय राज्ञः शयनं विहितम् । तदानी ब्रह्मचर्यव्रत विहितम् । अस्मदृष्ट्या सूर्यः प्रतीच्यामस्तमेति परन्तु तत्रत्यायाः प्रजाया दृष्ट्या सूर्यं उदेत्येव । सैव च तेषां दृष्ट्या प्राची भवति यास्माकं दृष्ट्या प्रतीची, अर्थात् वल्लभाया पश्चिमायां दिशि अस्तमयन्नपि न तया सम्बध्नाति अर्थात् तथा सङ्गच्छेत । तथैवोदीची दक्षिणा च दिक् अवल्लभा दूतपुत्र्यश्च भवन्ति । याम्यामुत्तरायणे दक्षिणायन एव सूर्यसंयोगो भवति न सवंदा' ( पृ० १५० ) इति, स्पष्टमेवात्र कथञ्चित् आधिदैविके यज्ञे याज्ञिकाः पदार्था आरोप्यत एव । आरोपोडिप क्लिष्टकल्पनयैव । द्वादशादिमासेषु रशनात्व कथञ्चिदेव सम्पाद्यते । मासानामप्रकाशरूपत्व- मप्यस्तीति न तेषा प्रकाशव्याप्तत्वं सम्भवति । - ' यदपि अश्वस्य वर्षभ्रमणं सूर्यस्य वार्षिकीगतिरेव । चतुःशतसंख्याकाः शस्त्रास्त्रसम्पन्नाः कवचिनो राजपुत्रा अपि सूर्यकिरणा एव, वर्षाकाले मेधानामवरोधकत्वात् सूर्यकिरणानां पृथिवीपर्यन्तप्रसारे शत्रुकृता अवशेषाः ' ( पृ० १५१ ) इत्यादिकम् तथा, यदपि ' अश्वमेधीयाश्वस्यावयवा रशनाभिर्बंध्यन्ते तत्तत्स्थानीयरज्जुप्रान्तेषु अन्ये पशवो बध्यन्ते, तथैव सूर्यमण्डलात् रश्मयः प्रसरन्ति ते सूर्यमण्डलं पूर्णरूपेण बद्धमर्थात् आच्छन्नं भवति, तैरेव पृथिव्यादयो ग्रहोपग्रहा अपि निबद्धाः सन्ति' ( पृ० १५१ ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, रज्जवोऽश्वाद्भिन्ना भवन्ति । रश्मयस्तदंशभूता एव, अत एव ते न सूर्यस्य बन्धनं सम्भवति न वा तेर्ग्रहोपग्रहा बद्धाः, तादृशसिद्धान्तस्य अद्यापि विप्रतिपन्नत्वात् । अत एव त्वयापि बद्धा इत्यस्य ' आच्छता' इत्योपचारिक एवार्थः कृतः । रश्मिषु रज्जुत्वम् । सूर्येऽश्वत्वम् । ग्रहोपग्रहेषु अपि पशुत्व-मारोपितमेव I। नैवमारोपकल्पनया कश्चन पुष्टोऽर्थः प्रतिपादयितु शक्यः । यद्यपि- ' अश्वमेधे विजितनृपेभ्य उपहारादिग्रहणं यथा भवति तथैव सूर्यः स्वसम्बद्धप्रदेशेभ्यो रश्मिभिर्जलं गृह्वाती' ( पृ० १५१ ) ति, तदपि यत्किञ्चित् विषमोपन्यासात् । प्रदीयमानस्य ग्रहणमुपहारस्वीकारः, नैवंविधं जलग्रहणं किन्तु स्वेच्छया बलाद् ग्रहणं तत् । मश्वमेधे राजा यजमानो भवति, अश्वस्तु यज्ञसाधनम् । सूर्ये तु यजमानत्वमश्वत्व यूपत्वं सर्वमपि काल्पनिकमेव, अतस्तस्यानुकरणम् अश्वमेध इति कथनम् नितान्तमसङ्गतम् । प्राणाग्निहोत्रादिषु क्वचिन्मुखस्य हवनीयत्वमुरसो वेदित्व लोमसु दर्भत्व जाठराग्नेर्गाहपत्यत्वं कल्प्यते यथा वा पञ्चाग्निविद्यास्ति तथैव यत्र यज्ञत्वचिन्तन मुक्तम् तत्रतत्र यज्ञाङ्गानामध्यासं कृत्वा चिन्तनीयं यत्र विधानं तत्र तु यज्ञत्वकल्पन निरर्थकमेव । और ' गुदा:' दोनो ही पद बहुवचनान्त है । कठिन और ऊँचे उठे हुए होने के कारण पर्वत, यकृत और क्लोमा ( हृदय के अभाग मैं सीधे और ये दो मासखण्ड ) है । 'क्लोमान:' यह एकही अर्थ में नित्य बहुवचनान्त होता है । ओषधि ( क्षुद्र स्थावर ) और वनस्पति ( महान् स्थावर ) ये यथासंभव लाम मोर केश है । सूर्य जो मध्यान्हकालपयम्त उदित होता ऊपर की ओर जाता है, वह अश्व का पूर्वार्षि ( नाभि से ऊपर का भाग ) है, और निम्लोचन् ( मध्याह्न +मल स अस्तकी मोर जाता ) हुआ वह सूर्य, जघनार्थ अर्थात् अपराध ( नीचे का भाग ) है, क्योंकि पूर्वत्व और अपरत्न मे उन ( उदित और मस्त होते हुए सूर्य ) की समानता है । तथा
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विदार्थपारिजातः २०३७ यद्यपि ' ऋग्वदेसहिताया प्रथममण्डले १६२- १६३-१६४ इति सुकानि अश्वमेधे नियुक्तानि । ९ ६२तमे सूक्ते प्रथमे मन्त्रेऽश्वस्य समुद्रात्पुरीषाच्चोत्पत्तिरुक्ता । द्वितीये च मन्त्रे यमेन दत्त त्रितेन युक्त तमश्वं प्रथममिन्द्र आरुरोह, गन्धर्वोऽभीषु गृहीतवान्, वसुभि सुरादयमश्वस्तक्षित्वा निर्मितः इत्युक्तम् '। चतुर्थेच मन्त्रे द्युलोके अप्सु समुद्रेषु च त्रीणि श्रोणि बन्धनान्युक्तानि । षष्ठे च मन्त्रे पतङ्गस्य ( गतिशीलस्याश्वस्य ) द्युलोके गतिरुका । दशम मन्त्र निरुक्तकारः ( ) नि० ४।१३ सूर्यरश्मिपरत्वेन व्याख्यातवान् । एकादशे मन्त्रे अश्वस्य देदीप्यमानशृङ्गाणामरण्ये विचरणमुक्तम् । लौकिकेऽश्वे शृङ्गाभावात् कथमेतदुपपद्यते । अत एभिः स तैर्निगीयते यत् १६३ तमे सूके वर्गितोऽश्वः सूर्य एव । 'अस्य- वायस्य पलितस्यै ( १६४ ) तिमन्त्रेण सूक्तमिदं प्रारभ्यते । तत्र अस्येति सर्वनामपदम् पूर्वनिर्दिष्टस्यैव स्मारकमभिधायकं वा १६४ सूक्ते स्पष्टमेव सूर्यरश्मीनामेववर्णनम्, निरुककारेणापि तथैवव्याख्यातम् । १६२ तमे सूके यद्यपि तादृशानि पदसमूहानि सन्ति यैरापातत: अश्वमेधयज्ञसम्बन्धिपदार्थवर्णनमेव प्रतीयते परन्तु पूर्वोक्तयोः सूक्तयोः प्रकाशे विचारे क्रियमाणे तस्या- प्याधिदैविक एवार्थ. । बृहदारण्यकोपनिषदिच एतत्सूक्तनिर्दिष्टानामश्वाङ्गानामाधिदैविकी व्याख्येव कृता' ( पृ० १५२ ) इति, तदपि शास्त्रार्थाज्ञानविजृम्भितो भ्रम एव, वस्तुतस्तु दैवंतमसस्य श्रेष्टुभस्यास्य सूकस्य अश्वस्तवरूपस्य अश्वदेवत्यत्वम् आश्वमेधिके मध्यमेऽहनि उपाकरणायावस्थित्तमश्व बाद्यामिरेकादशभि. स्तोति । 'तमवस्थितमुपाकरणाथ यदकन्द इत्ये- कादशभि: स्तोत्यप्रणुवन्' ( आश्व ० श्री० सू० १०१८ ) इत्युक्ते: । 'यदकन्दः प्रथमं जायमानः उद्यत् समुद्रादुत वा पुरीषात् । श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहू उपस्तुत्य महिणातं ते अवत्' ( ऋ० स० १।१६२| १ ) अस्य मन्त्रस्य सायणाचार्यरीत्या अर्थस्तु- हे अवन्! अरणकुशलाश्व, ते तव जातं जन्य जननं उपस्तुत्यं उपेत्य सर्वैः स्तोतुं योग्यम् । कथमिति तदाह - यत् यस्मात् समुद्रात् अन्तरिक्षात् यक्षगन्धर्वादिसम्मोदनाधिकरणात् प्रथमं पूर्वं जायमानः । यद्वा समुद्रआदित्यः समुन्दनाद् वृष्ट्या तस्माद्वा जायमानः ' सूरादश्वं वसवो निरतष्ट' ( ऋ० सं १ ९ ६३ २ ) इति वक्ष्यमाणत्वात् उत्त वा पुरीषात् सर्वकामाना पूरकात् उदकात् प्रथमम् उद्यत् जायमानः स एतादृशस्त्वं यत् यस्मै यं यजमानमनुग्रहीतुं अक्रन्दः महाशब्दमकरोः । किश्च ते तव पक्षापक्षो पतनसाधनो श्येनस्य पक्षाविव तो यथाशीघ्रपतनसाधनो तादृशावित्यर्थः । तव बाहू हरिणस्य बाहू इव तो यथा वेगवन्तौ तादृशावित्यर्थः । यस्मादेवं तस्मात्ते जन्म स्तुत्य अत्र स्पष्टमश्वपक्षे मन्त्रोऽयं सङ्गच्छते । स्तुतिस्त्वारोपेणापि- भवत्येव । रविवि राजते राजा, इति भवत्येवस्तुतिः । सूर्यपक्षे तु न सा सङ्गच्छते । अनुक्रमणिकया आश्वलायनसूत्रेण चाश्वस्तुतिरेवानेन मन्त्रेणोच्यते । 'सूरादश्वं वसवो निरतष्ट' ( ० सं० १११६३८ ) इति मन्त्रेणापि सूरादश्वस्य निर्माणम् उक्तम्, न सूर्यस्य निर्माणम् । नचान्तरिक्षात्पुरीषाद्वा सूर्यस्य जन्मप्रसिद्धम् । न च तस्य महापशब्दकर्तृत्वमपि प्रसिद्धम् । ' ययेन दत्तंत्रित एनमायुनगिन्द्र एनं प्रथमो अध्यतिष्ठत् । गन्धर्वोअस्य रशनामगृभ्णात् सूरादश्व वसवो निरतष्ट ॥ ' ( ऋ० सं ० १ १६३।२ ) वह जो जमुहाई लेता अर्थात् अंगो को फैलाता ( उन्हें विशेष रूप से झाडता ) हैं, वह विजली का चमकना है । क्योकि विद्योतन और शरीर को कम्पित करता है वह मेघन का गर्जन है, क्योकि मुख एव मेघ के विदारण में समानता है । तथा वह जो हिलाता (,, ), इन दोनो ही मे गर्जन रहने में समानता है । और वह अश्व जा मूत्रत्याग करता है बहो वर्षा होना है क्योंकि भिगोने में इन दोनो की समानता हूं । वाक् ( शब्द ) ही इस अश्व की वाणी ह, तात्पर्य यह4 है कि यहाँ कोई कल्पना नहीं है । 1 ' हव' इत्यादि । अश्व के भागे और पीछे महिमा नामक सोन और बान्दी के दो ग्रह ( यज्ञायपात्र विशेष ) रक्खे जाते हैं, उन्हो से सम्बन्ध रखने वाली यह दृष्टि है । दीति में समानता होने के कारण दिन ही सुवर्णमय ग्रह है । दिन हो इस अश्व के है
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येवार्थपारिजातः २०३८ . अयमपि मन्त्रः अश्व एव सङ्गच्छते । यमेन नियामकेन अग्निना दत्तं एनम् अश्वम् त्रित पृथिव्यादिषु त्रिषु स्थानेषु वर्तमानस्तीर्णतमो वा वायुः अयुनकरथे योजितवान् । किञ्च एनमश्वम् इन्द्र प्रथमम् प्रतमः प्रकृष्टतमः । प्रथम इति मुस्यनाम अध्यतिष्ठत् अधिष्ठितवान् । अस्य अश्वस्य गन्धर्वः सोमः रशना नियमन रज्जुं अगृभ्णात् अग्रहोत् । ईदृशोऽश्वः कुत उत्पन्न इतिचेत्तत्रोच्यते -हे वसवः रश्मयः यूयं ] सूरादादित्यात् अश्वं एव महानुभावम् निरतष्ट निःशेषेण साधु सम्पादितवन्तः । यद्वा वसुशब्देनोक्ता यमादयः परामृश्यन्ते - हे वसवः स्वस्वव्यापारेण सर्वस्याच्छादयितार: यूयं सूरादादित्यात् अश्वं निरतष्ट अतक्षत् । निरितिसमित्येतस्य स्थाने तक्षतिः करोतिकर्मा । सच क्रियासामान्ये वर्तते । अत्रोचित्यात् धारणे । सम्यक् धारितवन्तः । तक्षेर्यंङि छान्दसो लोपः । अयमपि मन्त्र' अश्वस्तुतिपक्षे सङ्गच्छन । यथा सरमयादेवशुन्यासारमेयाः स्तूयन्ते मनुना मानवाः तथैवाश्वमेधीयो विशिष्टोऽश्वः इन्द्राधिष्ठिताश्वरूपेण स्तूयते इतियुक्तमेव । न च सूर्यस्य मुख्यमश्वत्वम्, न च तस्य त्रितेन वायुना रथे नियोजनम्, न वा इन्द्राधिष्ठितत्वम् प्रसिद्धम्, नवा गन्धर्वेणा- श्वस्य नियमनरज्जुग्रहणम्, नवा सूर्यस्य सूर्यादुत्पादनमपि सम्भवति । 'असि यमो अस्यादित्यो अर्वन्नसि त्रितो गुह्येन व्रतेन अस सोमेन समयाविपृक्त आहुस्ते त्रीणि दिवि बन्धनानि ॥ ' ( ऋ० सं ० १।१६६ | ३ ) हे अर्वन् अश्व त्व यमोऽसि नियमिता अग्निरसि तेन दत्तत्वान् तच्छब्दव्यपदेशः । तथा आदित्योऽसि 'सूरान्निरतष्टे'त्युक्तत्वात् । तथा!गुह्येन व्रतेन गोपनीयेन दुर्निरूपेण वा कर्मणा, सर्वत्रव्याप्तिरूपेणेत्यर्थः । तेन त्रितः त्रिषुस्थानेषु तायमानो वायुरसि 'त्रितएनमयुनक्' इत्युक्तत्वात् तद्रूपत्वम् । अथवा गुह्येन गोपनीयेन व्रतेन कर्मणा योगादिसाधनरूपेण त्रितनामकऋषिरसि । किञ्च हे अश्व, त्वं सोमेन सह वियुक्तः सम्पृक्तोऽसि । वीति समित्येतस्यार्थे तेन गृहीतत्वात् । हे अश्व, एवं रूप त्वम् द्युलोके आदित्ये वा वर्त्तमानस्य ते तव श्रीणि बन्धनानि उत्पत्तिकारणानि आहुः पुराविदः । वसवः, आदित्य, द्युस्थानं चेति त्रीणि स्थानानि ॥ इत्थम् अश्वस्तुतो सङ्गतोऽय मन्त्रो न सूर्यस्तुतो । अर्वन् इति सम्बोधनमपि न सूर्ये सङ्गच्छते । अश्वस्य स्तुतये तु तस्य प्रजापतिरूपेण आदित्ये द्यलोके वर्तमान त्व भवत्येव । बृहदारण्यके संस्कारार्थे संवत्सरप्रजापतिरूपेण तस्य वर्णनात् । स्तुत्यै यूपोऽप्यादित्य उच्यत एव 'आदित्यो यूप' इत्यादी । नाःदित्य आदित्योऽसीति स्तुत्ये निगद्यते । एवमेव चतुर्थेऽपि मन्त्रे- हे अन् ते तव दिवि त्रीणि वन्धनानि यथोक्तानि तथैव अप्सु पृथिव्याम् । अबुपजीवितत्वात् भूलोकोऽपि अपशब्देनाभिधीयते । त्रीणि बन्धनान्याहुः | अन्नं स्थानं बीजमिति । तथा समुद्रे अन्तःसमुद्रमध्ये समुद्रवणादपादानात् समुद्रमन्तरिक्षम् तस्मिन् त्रीणि वृष्टयुत्पत्तिनिमित्तानि मेघो विद्युत् स्तनित-मिति श्रीणिबन्धनान्याहुः । उतेव इवशब्दश्चार्थे, अपि च हे अर्वन् वरुण. पापस्य वारकः फलस्यापवर्जयिता त्वं मे मह्यम् - धन्त्सि कथयसि । किं कथयामीति चेत्तत्राह ते तव परमं जनित्रं निरतिशयं जन्येति । इहापि अर्वन्नित्यश्वस्य सम्बोधनम् । 'इमा ते वाजिन्नव मानानीमाशफानां सनितुर्निधाना । अत्रा ते भद्रा रशना अपश्य मृतस्य चा अभिरक्षन्ति गोपाः ।' ( ऋ ० सं० १११६३।५ ) हे वाजिन् अश्व ते तव सम्बन्धीनि अवमार्जनानि अङ्गसंशोधकानि स्थानानि इमा इमानि उक्तानि द्युलोकादीनि सनितुर्यागसम्भक्त. तव इमानि शफाना निधानानि स्थानानि सञ्चारप्रदेशाः । किञ्च अत्रैव ते तव भद्राः कल्याणाः रशनाः ग्रीवादिप्रसक्तारज्जू एषु उक्तेषु स्थानेषु अपश्यम् । कीदृश्यो रशनाः ऋतस्य सत्यभूतस्य यज्ञ-,साजनस्य वा अश्वस्य । कर्मणि षष्ठी । ऋतमभिक्षरन्ति पालयन्ति ता अपश्यम् दृष्टवानस्मि इहापि वाजिन्निति सामने महिमारूप से प्रकट हुआ, क्योंकि यह अश्व प्रजापतिरूप हैं, आदित्यादिरूप प्रजापति हो दिन से लक्षित होता है । जिस प्रकार को लक्ष्य बनाकर बिजली चमकती है, उसी प्रकार इस अश्व को लक्षित कराकर दिनरूप सुवर्णमय महिमासंज्ञक ग्रह प्रकट हुमावृक्ष है ।उस ग्रह का 'पूर्वे समुद्र' अर्थात् पूर्वसमुद्र योनि ( प्राप्तिस्थान ) है यहाँ वैदिक प्रक्रिया के अनुसार प्रथमा विभक्ति का सप्तमी विभक्ति के मैं-व्यत्यय हुआ है | अतः 'पूर्व समुद्र' का 'पूर्वः समुद्र" अर्थ किया गया है इसी प्रकार वर्ण में और निकृष्टता में समानता होने के कर रात्रि, राजत ( चादीका ) ग्रह है । यह अश्व के पीछे की ओर ( पृष्ठभाग में ) महिमारूप से प्रकट हुई । उसका मिश्रासमुद्र