वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1151–1160

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1151–1160

पृष्ठ 1151

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वदाथपारिजात २०४९ युक्त * किञ्च यावदनेनार्थवादेन पश्वालभ्भननिषेधः परिकल्प्यते तावत्प्रत्यक्षालम्भनविधिभिः तद्विधान सिद्धयतीति, शीघ्रोपस्थितिकैर्विधानैविलम्बोपस्थितिकस्य निषेधस्य बाध एव सिद्धयति । एतेन अजादीनान्मेध्यत्वोक्तिरपास्ता, नहि निन्दानिन्द्य निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुमितिन्यायात् । यत्तु —'यद्देवत्यः पशुस्तद्देवत्य पुरोडाश' इति नियमानुसारेण छिद्रपिधानार्थं पुरोडाशो नोपपद्यते । यदि यज्ञे मारितः पशु. स्वर्गे जीवितो भवति पशोर्यान्यङ्गानि निष्कासितानि तेषा छिद्राणि पुरोडाशेन पूर्यन्ते येन प्रमाणेन स्वर्गो लभ्यते तेनैव तदङ्गपूर्तेरपि सम्भवात् । यदि स्वर्गेऽपि स पशुरेवभवेत्तदा को विशेषः स्यात्? 'कि स्वर्गेऽपि पशवो भवन्ति' ( पृ० १५६-१५७) । इत्यादिक यदधिक्षिप्तं तत्तु नास्तिक्यमेव, ब्राह्मणप्रामाण्यानुपगमहेतुत्वात् । नहि श्रुत्युक्तेऽर्थे चांद्य भवति? तत्तु श्रुतिरेवाह - 'यद्देवत्यः पशुर्भवति तद्देवत्य पुरोडाशमनुनिर्वपति तद्यत्पुरोडाशमनुनिर्वपांत तद्यत्पुरोडाशमनुनिर्वपति । सर्वेषा वा पशूना मेधो यद्ब्रीहियवी तेनैवैनमेतन्मेधेन समर्धयति कृत्स्न करोति तस्मात् पुरोडाशमनु निर्वपति' ( श० ३| ८| ३| १ ) या देवता पशोः पुरोडाशोऽपि तद्देवताकः कर्त्तव्य. पुरोडाशानुनिर्वाप पूर्णमासस्य पशो. समृद्धिहेतुत्वेन प्रशसति- समर्धयतीति । सर्वपशूना मेधरूपत्वमैतरेयब्राह्मणे 'पुरुष वै देवाः पशुमालभन्त तस्मादालब्धान्मेध उदक्रामत्' ( ऐ ० वा० २२८ ) इत्यादि-नोक्तम् | त्वद्रीत्या तु पुरोडाशनिर्वापोऽपि निरर्थक एव । होमस्य वायुशुद्धिहेतुत्वेन देवता तृप्त्याद्यनुपगमात् । सिद्धान्ते तु पशोः समृद्धिहेतुत्वेन पुरोडाशनिर्वाप उक्तः । शास्त्रकगम्येऽर्थे कुचोद्यस्य निरवकाशत्वात् । ' अथ यद्वपया प्रचर्य पुरोडाशेन प्रचरति मध्यतो वा इमा वपामुत्विदन्ति मध्यत एवेनमेतेन मेधेन समर्धयन्ति कृत्स्नं करोति तस्माद् वपया प्रचर्यैतेन पुरोडाशेन प्रचरति' ( श० ३८ ३ २ ) । पुरोडाशस्य पशुच्छिद्रपूर्तिप्रयोजनन्तु । श्रुत्युक्तमेव । श्रुतिस्तु दर्शिता । वस्तुतस्तु पुरोडाशनिर्वापोऽय पाशुककर्मप्रकरणगतत्वेन संस्कारार्थो न स्वतन्त्रः 'अश्वालम्भ गवालम्भं सन्यास पलपैतृकम् । देवराञ्च सुतोत्पति कलो पश्ञ्च विवर्जयेत् ।' इति वचनन्तु बहुनिबन्धकृच्चचितत्वात् प्रमाणभूतमेव । यत्तु 'आदिकाले खलु यज्ञेषु पशव समालभनीया बभूवुः । नालभ्भाय प्रक्रिय- न्तेस्म । ' ( चरकसहिताचिकित्सास्थान १ ९ /४ ) इत्यतीसाररोगोत्पतिप्रसङ्गे ' अतश्च प्रत्यवरकालं पृषध्रेण दीर्घसत्रेण है । उनका कहनाहै । याज्ञिकजन इस पशुपुरोडाश को छिद्र अविधान ( काटे गये अंगो के छिद्र को ढकने पूर्ण करनेगये) केअगोलियेके मानतेछिद्र हैं, उनकी पूर्ति इस है कि जब यज्ञ में मारा गया पशु स्वर्ग मे जीवित होता है, तब उस पशु के शरीर से जो निकालेस्वर्ग की प्राप्ति होती है, तो क्या उसीके पशुपुरोडाश से होती है । वस्तुतः यह कल्पना मात्र है । क्योकि यदि यज्ञ में हुत पशु कोही प्राप्त होती हैं, तो वह उसे यहाँ भी प्राप्त ? प्रभाव से वह सर्वाङ्गपूर्ण न हो जायेगा और यज्ञन्हत पशु को स्वर्ग मे भी यदि पशुयोनि पृ० १५६-१५७ । ही है, फिर विशेषता क्या हुई? साथ हो यह भी चिन्त्य है कि क्या स्वर्ग मे पशु भी होते है? दूसरा इत्यादि जो अधिक्षेप युधिष्ठिर ने किया है, उसमे हेतु एकमात्र उसका नास्तिक्य ( नास्तिकता ) ही है । वेद का जो सैनिक शासन ( मिलिट्रि- आर्डर ) मे 'क्यों' भाग 'ब्राह्मण' है, उसे प्रमाण न मानने के कारण ही युधिष्ठिर की यह नास्तिकताके हैद्वारा। जैसेबताये गये अर्थ मे कुचोद्य करते बैठना भी निरी ( ), चोद्य इस प्रकार प्रश्न करना मूर्खता समझी जाती है वैसे ही भगवती श्रुति देवता का होता है । ऐतरेय ब्राह्मण समस्त J ',, मूर्खता ही है । शतपथब्राह्मण बता रहा है कि जो देवता पशु की हो पुरोडाश भी उसी की प्रशंसा की गई है । तुम्हारी पशुओ को मेध्य ( यज्ञ के योग्य ) बता रहा है । पशु की समृद्धि का कारण होने से पुरोडाशानुनिर्वपणमाना है, उससे देवता की तृप्ति को F ( ) दृष्टि से तो पुरोडाश निर्वाप भी निरर्थक ही है । होम हवन को तो तुमने वायुशुद्धि का कारण करने के लिये कहा गया है । तोतुम मानते नही हो । सिद्धान्त तो यही है कि पशु की समृद्धि का कारण होने से पुरोडाशनिर्वाण बताया है । वस्तुतस्तु यह शास्त्र * गम्य अर्थ में कुचो का अवसर ही कहीं होगा? । पुरोडाश से पशु छिद्रपूर्ति करना तो श्रुति ने ही पुरोडाशनिर्वाण, पाशुक-कर्मप्रकरणगत होने से संस्कारार्थ है, स्वतन्त्र नही है । इस वचन की अनेक निबन्धकारों ने चर्चा की ' ' अश्वालम्भं गवालम्भ सम्यासं पलपैतृकम् । देवराच्च सुतोत्पत्ति कलौ पञ्च विवर्जयेत् १ ९ १४ में अतीसार रोग की उत्पत्ति प्रसंग है, इसलिये उसे प्रमाण ही मानना चाहिये । और जो 'आयुर्वेदीय चरकसंहिता चिकित्सास्थान २५७

पृष्ठ 1152

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वेदार्थपारिजात '२०५० ' ( / ) |यजता पशूनामभावात् गवालम्भ प्रवनितः अतिसारः पूर्वमुत्पन्नः पृषधयज्ञे चरकसंहिताचिकित्सास्थान १ ९ ४ एतेन विज्ञायते यदादिकाले यज्ञे पशवो न हिस्यन्तेस्मेति' तदपि यत्किञ्चित्, अपौरुषेय मन्त्रब्राह्मणात्मकवेदविरुद्धस्या -वचनस्यपि तदानुगुण्येनेव व्याख्येयत्वात् । पूर्वोक्तरीत्या ब्राह्मणेषु ऋग्वेदसंहिताया प्रथममण्डले १६२तमसूक्त च स्पष्टमेवाश्वादिपशूनामश्वमेधादावालम्भ उक्तः । ते मन्त्रास्तानि ब्राह्मणानि चेदनादीनि तदाऽवश्य तदनुसारेण तत्सिद्ध्यति, सृष्ट्यारम्भे तत्प्रचारो न भवतीत्येव वक्तु शक्यते । यथा वर्णाश्रमव्यवस्थाया वेदोक्तत्वादनादित्वेऽपि सृष्ट्यादौ स्वल्पप्रचारः, तथैव कृतयुगे प्रायेण सर्वेषा ब्रह्मविद्वरिष्ठत्वात् ब्रह्मनिष्ठाया एव प्राधान्यमासीत् । गवा तु सर्वथा अघ्न्यत्वात् तद्वधाभावः पूर्वमुक्त एव । अतीसारहेतुत्वादपि तद्वधो निषिद्धो वेदितव्यः । एतेन 'पश्वालम्भनाभावे यज्ञपूर्ति.पुरोडाशेन ' ( पृ० १५७ ) इत्यादिकमपि खण्डितं वेदितव्यम् पश्वालम्भन-स्योत्सर्गस्य च शास्त्रकसमधिगम्यत्वेन तदपलापासंभवात् । यत्रोत्सर्गविधानं तत्रोत्सर्गस्य यत्रालम्भनविधानं तत्रालम्भनस्यैत्र युक्तत्वात् । यदपि च -' पिष्टपशुभिरेव पाशुककर्मसम्पत्तिबोधनं तदपि वचनानुसारेणैवेति मन्तव्यम् । यत्र प्रतिनिधिविधानं स्यात्तत्रैवतस्य युक्तत्वात् । तत्रापि यः प्रथमकल्पे प्रभुनंस्यात् तस्यैव कृतेऽनुकल्पस्यादरो नान्यस्य । तथा च मनुः---'प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते । नसाम्परायिकं तस्य दुर्मतेविद्यते फलम् ' ( म० ११।३० ) इतिमनुकेः । यत्वितिहास-,बलेन वैदिकपाशुकयज्ञविरोध उक्तः तदपि नक्षोदक्षमम् । प्राचीनवैदिकवाङ्मयेतिहासाधारेण त्वदितिहासोऽशुद्ध -इति किमु वक्तव्यम् । आधुनिकेतिहासदृष्ट्यापि त्वदितिहासस्य सर्वथाप्यशुद्धत्वात् । इदानी यावत् सर्वैरास्तिके विद्वद्भिः मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्य नित्यत्वमपौरुषेयत्वञ्चाभ्युपेयते । यदि मन्त्राणां ब्राह्मणानाञ्चानादित्वं तदापश्वादि-यागस्य को ह्यमूढः सादित्व वक्तु प्रभवेत् । अन्यत्तु सर्वं पिष्टपेषणमेव । उपरिचरवसुसम्बन्ध्याख्यानस्य गवालम्भाभास- में किये गये वर्णन से स्पष्ट है कि आदिकाल में यज्ञ मे किसी भी पशु को हिंसा नही होती थी' इत्यादि पु० १५३-५४ पर जो लिखा है, वह भी नि सार है । क्योकि अपौरुषेय मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद के विरुद्ध यदि कोई आर्षवचन आपातत: प्रतीत होता है तो उसकी व्याख्या वेद के अनुगुण हो करनी चाहिये । ब्राह्मण और चरकसहिता के प्रथम मण्डल के १६२ सूक्त मे स्पष्ट बताया गया है कि 'अश्व-मेघादि में अश्वादि पशुओ का आलम्भ होता है । ' वे मन्त्र और वे ब्राह्मण यदि अनादि, अपौरुषेय है, तो अवश्य ही तदनुसार उक्त कथन सिद्ध हो जाता है । हाँ, इतना ही कह सकते है कि सृष्टि के आरम्भ में उसका अधिक प्रचार नही रहा होगा । जैसे वर्णाश्रम- व्यवस्था वेदोक्त है, अनादि है, तथापि सृष्टि के आदिकाल में उसका प्रचार स्वल्प था,, उसी तरह कृतयुग मे प्राय सभी ब्रह्मविवरिष्ठ थे, अतः ब्रह्मनिष्ठा की ही प्रधानता थी । गो तो सर्वथा अघ्न्या ( अवध्या) है, अतः उसके वध का अभाव पूर्व कह ही चुके है और अतीसार का हेतु होने से भी उसके वा को निषिद्ध समझ लेना चाहिये । ' ' अतः पृ० १५७ पर जो कहा है कि पश्वालं मनके अभाव मे यज्ञपूर्ति पुरोडाश से होती है । उसका भी खण्डन हो 'जाता है । कहा पश्वालंभ करना चाहिये और कहा पशु का उत्सर्ग करना चाहिये, यह सब एकमात्र शास्त्रकसमधिगम्य है 1, अत उसका अपलाप करना संभव नही । जहाँ पर पिष्टपशु से ही पाशुककर्मानुष्ठान करना बताया गया है, वह वचन के अनुसार ही बताया गया है, इसे भूलना नही चाहिये । जहा प्रतिनिधि का विधान होगा, वही पर उसका औचित्य रहता है । उसमें भी जो व्यक्ति प्रथमकल्प का अनुष्ठान करने में समर्थ न हो, उसो के लिये अनुकल्प का मादर किया जाता है, अन्य के लिये नही । (मनु० ११।३० ) ने भी इसी बात को कहा है । इतिहास का आश्रय लेकर वैदिकपाशुकयज्ञ का जो विरोध बताया है, वह भी ठीक नही है, क्योकि प्राचीन वैदिक वाड्सव के इतिहास को देखते हुए तुम्हारा इतिहास अशुद्ध है, यह सुनिश्चित है । तथा आधुनिक इतिहास की दृष्टि से भी तुम्हारा इतिहास सर्वथा अशुद्ध हैं । आजतक सम्पूर्ण आस्तिक विद्वान् लोग मन्त्र ब्राह्मणात्मकवेद को नित्य और अपौरुषेय मानते चले आ रहे हैं । ऐसी स्थिति में कौन विचारशील व्यक्ति पश्वादियाग को सादि कहेगा । अन्य बात तो सब पिष्टपेषण के ही तुल्य हैं । पूर्वोक्त आख्यान का और गवालम्भाभासवचन आदि का समाधान पूर्व कर ही चुके है । युधिष्ठिर यदि

पृष्ठ 1153

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वेदार्थपारिजातः २०५१ वचनस्य च समाधान पूर्वमेवोक्तम् । युधिष्ठिर स्याद्वादमञ्जरीकारस्य जैनाचार्यस्य सम्मति मनुते चेत्, तदा तु तद्रीत्या तेन वेदा. परमेश्वरश्च त्याज्या भवेयुः । तद्रीत्या तदभ्युपगमस्य मौर्यप्रयोजकत्वात् । यत्तु- 'पश्चतन्त्रे एतेऽपि याज्ञिका यज्ञकर्मणि पशून् व्यापादयन्ति ते मूर्खाः परमार्थं श्रुतेनं जानन्ति । तत्र ‘ ', ' ( ), किलैतदुक्तम् । अजैर्यष्टव्यम् अजाब्रीहय सप्तवार्षिकाः कथ्यन्ते न पुनः पशुविशेषः । पृ० १६८ इत्यादिकम् तदपि निवृत्तिमार्गप्रशसापरत्वेन नेतव्यम्, अश्वमेधादिविधानविरोधात् । ' अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्' इति ब्रह्मसूत्रस्य श्रीभाष्ये श्रीरामानुजाचार्येण पशुयागस्य समर्थितत्वाच्च । इतिस्वतन्त्र धातुद्वय कल्पनया यत्किञ्चित्यत्किञ्चित् प्रलपित -, यदपिच लभलम्भ तदप्यसङ्गतम् तथात्वेऽनेकेषा पाणिनिसूत्राणा नैरर्थक्यापातात् । तथाहि आङ्पूर्वकात् लभधातोर्भावे ल्युटि सति आलम्भनम्, आलभनमिति रूपद्वयं ' ' ' ' ( | | ) भवति । उपसर्गात् खल्घञोः इति पाणिनिसूत्रे विधायकम् ॥ तत्र लभेश्च पा० सू० ७ १ ६४ इत्यनेनैव खल्घञोरपि नुमः सिद्धो ' उपसर्गात् खलघञोः' इति सूत्रं नियामकं भविष्यति 'सिद्धी सत्यामारभ्यमाणो विधिनियमाय ' ' ' कल्पते इतिसिद्धान्तात् । नियमश्चोभयथा भविष्यति । उपसर्गादेव लभेर्नुम्स्यात् खल्घञोः इतिप्रथमः । तेन ईषत्प्रलम्भ:, सुप्रलम्भ:, उपालम्भ इतिप्रयोगाः सिध्यन्ति । नियमात् नुमो व्यावृत्तिः 'ईषल्लभः लाभः इत्यनयोर्भवति । अस्मिन् पक्षे आलम्भनमित्यत्र ' लभेश्च ' ( पा० सू० ७| १ | ६४ ) इत्यनेन नुम् स्यादेव । द्वितीयो नियम: -' भावकर्मान्यतरार्थके अजादी कृत्प्रत्यये परतः उपसर्गात्परस्य लभेर्नुम् स्यात् तर्हि खल्धत्रोरेव । अतश्च भावे ल्युटि आलभनमिति सिद्धयति । ' क्षय्यजय्यो क्यार्थे' ( पा० सू० ६।१।८१ ) इतिसूत्रमुद्दिश्य महाभाष्यकृता उभयथा नियमः प्रदर्शितः । स्याद्वादमञ्जरीकार जैनाचार्य की सम्मति मानते हो तो उनके मतानुसार वेदो को और परमेश्वर को तुम्हें भी त्यागना होगा । क्योकि उनके नियम के अनुसार विरुद्ध सिद्धान्त का स्वीकार करना तो मूर्खता ही कहलायेगी । पृ०१६८ पर यह जो कहा है कि पञ्चतन्त्र मे ' ये याज्ञिक भी यज्ञ कर्म में पशुओ को मारते हैं, वे मूर्ख वेदवचन के ठीक अर्थ को नही जानते । वेद में कहा है-' अजो से यज्ञ करना चाहिये' । अज सात वर्ष पुराने व्रीहि कहे जाते हैं, न कि पशुविशेष 1 (बकरा ) । ' पञ्चतन्त्र के उस उल्लेख को निवृत्तिमार्ग की प्रशसापरक समझना चाहिये । अन्यथा अश्वमेधादि के विधान से विरोध होगा । 'अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्' -( ब्र ० सू ० ३।१।२५ ) सूत्र के श्रीभाष्य में श्रीरामानुजाचार्य ने पशुयाग का समर्थन किया है । पृ० १३१ तथा १६ ९ पर जो लभ और लम्भ दो स्वतन्त्र घातुओ की कल्पना करके जो कुछ प्रलाप किया है, वह भी असंगत ही है । क्योकि वैसा मानने पर पाणिनि के अनेक सूत्र निरर्थक हो जाएँगे । तथाहि माड,पूर्वक लभ धातु से भाव अर्थ में ' आलम्भनम्, और बलभनम्' ऐसे दो रूप निष्पन्न होते है । ' उपसर्गात् खलुघनो - ( पा ० सू०७/ १।६७) यह सूत्र नुम्-ल्युट्करने पर विधायक है । किन्तु 'लभेश्र्व ' ( पा ० सू० ७/१/६४ ) सूत्र से ही नुम् हो सकने पर भी (७/१/६७ ) सूत्र नियामक हो जायगा, क्योकि 'सिद्धौ सत्यामारभ्यमाणो विधिनियमाय कल्पते' यह सिद्धान्त है । नियम उभयथा होगा । एक प्रकार तो यह होगा कि 'उपसर्गादेव- लभेर्नुम् स्यात् खल्धनो:' । इस नियम के अनुसार 'ईषत्प्रलम्भ:', 'सुप्रलम्भ:', उपालम्भ ', ये प्रयोग सिद्ध होगे । नियम होने से तुम की जब व्यावृत्ति होगी तब ' ईषल्लभ:', 'लाभ ' इन प्रयोगों की सिद्धि होगी । इस पक्ष में 'आलम्भनम्' में 'लभेश्च ' ( पा० सू० ७ १।६४ ) से नुम् होगा ही । नियम का दूसरा प्रकार यह होगा - 'भावकर्मान्यतरार्थ के 'अजादी कृत्प्रत्यये परतः ' उपसर्गात् परस्य लभेर्नुम्स्यात् तर्हि खल्घनोरेव ' । अतः भावेल्युट् करने पर 'आलभनम्' रूप सिद्ध होगा । ' क्षय्यजय्यौ क्यार्थे' (पा० सू० ६।१।८१ ) इस सूत्र को उद्देश्यकर महाभाष्यकार ने उभयथा नियम प्रदर्शित किया है

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२०५० वेदार्थपारिजात ( १ ) 'शिज्योरेवेच ' ( २ ) 'शक्यार्थे एव ' इति । एष प्रकार: प्रकाशित 'एचोऽयवायाव ' ( पा० सू० ६ १७८ ) इति- सूत्रभाष्ये । नहि मया कश्चन नूतन पन्थाः प्रदर्शित । अस्या पद्धती नहि किमपि वैमत्यम् 'आलम्भ्या गोः, ' आलम्भ्या वडवा' इतितु 'आडोयि' ( पा० सू० ७| १ | ६५ ) इत्यनेन सिद्धयत्येव । चरकसहिताया प्रयुक्त ' समालभदीया ' इतिप्रयोग साधुरेव द्वितीयनियमपक्षतः । 'अग्निष्टोम आलभ्य इतिकाशिकाप्रयोगोऽपि साधीयानेव । लब्धु योग्य. शक्यो ' ( ):- बालभ्यः । पोरदुपधात् पा० सू० ३।१।९ ८ इतियत्प्रत्यय पूर्व कार्य पश्चात् आङुपसर्गेण सम्बन्धः । यथा प्रकृष्टोभाव प्रभाव, इत्युक्तम् सिद्धान्तकौमुद्याम् श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे, ( पा० सू० ३।३।२४ ) इतिसूत्रे । अनेन हि सूत्रेण श्रि णी भू-धातुभ्यो- ऽनुपसृष्टेभ्यो घञ् प्रत्ययो भवति । प्रभाव इति कथ सिद्धयति? तदोच्यते - भवनंभावः इतिभावशब्द प्रसाध्य प्रकृष्टो भाव इतियोजना कार्या 1। तथैवात्रापि लभ्यइति साधयित्वा आडुपसर्गो योज्य । यदि लभिधातुरन्यः कल्प्यते तदा 'लभेश्च' ( पा ० सू० ७| १ | ६४ ) 'आडोयि' ( पा० सू० ७ १/६५ ) ' उपात्प्र- ' ( | | ) ' ' ( | | ) शसायाम् पा० सू० ७ १ ६६ उपसर्गात्खल्घञोः पा ० सू० ७ १ ६७ इत्यादीनि सर्वाणि पाणिनीयसूत्राणि निष्फलानि प्रसज्येरन् । नुम्घटिताना प्रयोगाणा लभिधातुनैव सिद्धे, अत. प्रकृत्यन्तरकल्पने भगवतः पाणिनेः तात्पर्य नास्तीत्येव सिद्धान्त । यदुक्तम्- भट्टपादस्यानीश्वरवादो न्यायमञ्जरीकारेणोद्धृतम्, तदप्यशुद्धम्, तादृशानीश्वरवादस्येश्वरवादि- रपि प्रतिपादितत्वात् । न्यायमञ्जरीकारस्य वचनानित्विमानि तथाहीश्वरसद्भावो न प्रत्यक्षप्रमाणकः नह्यसावविज्ञाने सर्पादिस्त्रिभासते । नच मानसविज्ञानसवेद्योऽय सुखादिवत् । योगिनामप्यप्रसिद्धत्वान्त प्रत्यक्षगोचरः । प्रत्यक्षप्रतिषेधेन तत्पूर्वक- मनुमानमपाकृतम् । अविज्ञाते तस्मिन् व्याप्त्यनुपग्रहात् । नच सामान्यतो दृष्टम् लिङ्गमस्यास्ति किंचन । क्षित्यादीना तु कार्यत्वमसिद्ध सुधियः प्रति । शैलादिसन्निवेशोऽपि नैव कर्त्रनुमापक । कर्तृपूर्वककुम्भादिसन्निवेशविलक्षणः ॥ कर्त्रविनाभावी सन्निवेशो हि यादृशः । तादृङ्गादो नास्तीति कार्यत्ववदसिद्धता | सिद्धत्वेऽपि नसिद्धत्वमनैकान्त्यात्तृणादिभिदृष्ट. अकृष्टजातैः कर्त्तारमन्तरेणाप्तजन्मभिः ॥ तेषामुत्पत्तिसमये प्रत्यक्षत्वं न लक्ष्यते । कर्त्तर्दृश्यत्वमप्येवमभावोऽनुपलब्धितः. । नच क्षितिजलप्रायदृष्टहेत्वतिरेकिणः । कस्यापि कल्पनं तेषु युज्यतेऽतिप्रसङ्गतः । तेन कर्त्तुरभावेऽपि सन्निवेशादिदर्शनात् ॥ । ( १ ) 'क्षिज्योरेवैच. ' ( २ ) ' शक्यार्थे एव' | 'एचोऽयवायाव:' ( पा० सू० ६ ११७८ ) इस सूत्र गया है । यह कोई नवीन मार्ग नही है और इस पद्धति में किसी की कोई विप्रतिपत्ति भी नहीके भाष्य में इस प्रकार को प्रकाशित किया है । 'आलम्म्या गोः, 'आलम्भ्या वडवा ' ये रूप 'आडो थि' ( पा० सू० ७ १/६५ ) सूत्र से सिद्ध होते हो हैं । चरक सहिता में प्रयुक्त 'समालभनीया: ' ' ' पक्ष के अनुसार साधु ही है । अग्निष्टोम आलभ्य यह काशिका प्रयोग भी साधु है ही । लब्धु यह प्रयोग भी द्वितीयनियम- ' ' ( ) ' ':, पोरदुपधात् पा ० सू० ३।११ ९ ८ मूत्र से यत् प्रत्यय पहले कर लेना चाहिये । पश्चात् योग्य शक्यो वा लम्य यहाँ पर ' " ' ' ( ' ' जैसे प्रकृष्टो भावः प्रभाव यह सिद्धान्तकौमुदी मे त्रिणी भुवोऽनुपसर्गे पा० सू० आ उपसर्ग से सम्बन्ध करना चाहिये । ३| ३| २४ ) सूत्र पर बताया है । उक्त सूत्र ' ' ' '? ' भाव ' इस प्रकार 'भाव' शब्द अनुपसृष्ट धातुओ से घन् प्रत्यय होता है । तब प्रभाव कैसे सिद्ध होगा उत्तर यह है कि भवन से पहले साध लिया जाय पश्चात्'प्रकृष्टो भाव -प्रभाव-प्रभाव कियाकिया जायजाय । उसी तरह यहाँ भी 'लभ्य ' बनाकर पश्चात् ' ' जोडना चाहिये । माङ उपसर्ग यदि एक अन्य 'लभ' धातु की कल्पना की जाती है तो 'लभेश्च ( ७| १ | ६४ ), ' ( ७|| ६६ ), ' उपसर्गात्खल्बनो. ' ( ७।१।६७ ) इत्यादि सभी सूत्र निरर्थक होने लगेंगे । नुघटितप्रयोगीआडोयि ' ( ७| १ | ६५ ), ' उपात्प्रशसायाम्' ' ' हो जाती है । बतः एक और अन्य प्रकृति की कल्पना करने में भगवान् पाणिनि का तात्पर्य कदापि नही हैकी, यहीसिद्धिसिद्धान्तलभिहै ।धातु से ही पृ० ४७ पर जो कहा है कि 'जयन्त ने न्यायमञ्जरी में भट्टपाद कुमारिल के अनीश्वरवाद का ' । न्यायमञ्जरीकार के वचनो को किन्तु यह भी मशुद्ध है । वैसे अनीश्वरवाद का प्रतिपादन तो अन्य ईश्वरवादियो ने भी किया है सोद्धरण खण्डन किया है । 5 ८

पृष्ठ 1155

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वेदाथपारिजातः अनैकान्तिकताहेतोर्विप्रत्वे पुरुषत्ववत् ॥ किच व्याप्त्यनुसारेण कल्प्यमान प्रसिद्धयति । कुलालतुल्य कर्तेति .. स्याद्विशेषविरुद्धता ॥ व्यापारवानसर्वज्ञः शरीरी क्लेशकुल । घटस्य यादृश कर्त्ता तादृगेव भवेद्भव ॥ विशेष- साध्यताया तु साध्यहीन निदर्शनम् । कर्तृसामान्यसिद्धी तु विशेषावगतिः कुतः ॥ शरीरस्य कर्तृत्व दृश्यते नहि कस्यचित् । देहोप्युत्पत्तिमानस्य देहत्वाच्चैत्रदेहवत् ॥ स्वयं निजशरीरस्य निर्मागमितिसाहसम् । कर्त्रन्तरकृते तस्मिन्नीश्वरानन्त्य- मापतेत् ॥ व्यापारेण जगत्सृष्टि कुतो युगशतैरपि ॥ तदिच्छा चानुवर्तन्ते न जडा परमाणव । अवाप्तसर्वानन्दस्य रागादि- रहितात्मन: । जगदारभमाणस्य न विद्म किं प्रयोजनम् ॥ सर्गात्पूर्वं हि निःशेषक्लेशसस्पर्शवर्जिता । नाम्य मुक्ता इवात्मानो भवन्ति करुणास्पदम् ॥ करुणामृतससिक्त हृदयो वा जगत्सृजन् । कथं सृजति दुर्वारदुःखप्राग्भारदारुणम् । किमीश्वरतयेश्वरो यदि न वर्त्तते स्वेच्छया । नहि प्रभवता क्रिया विधिषुहेतुरन्विष्यते ॥ नच क्रीडापि नि:शेषजनतातङ्ककारिणी । आयासबहुला चेय कत्तुं युक्ता महात्मन ॥ तस्मान्न जगता नाथः ईश्वर स्रष्टा सहर्त्ता भवति । नह्यस्य त्रियमाणेषु पूर्यन्ते जन्तुकर्मसु । सकृत्समस्तत्रैलोक्य निर्मूलनमनोरथा. ॥ कर्मोपरमपक्षे तु पुनः सृष्टिर्न युज्यते । न कर्मनिरपेक्षो हि सर्गवैचित्र्यसभव | उद्भवाभिभवो तेषा स्यातां चेदीश्वरेच्छया । तर्हि सैवास्तु जगता सर्गसंहारकारणम् ॥ इत्येवमादिरीत्या न्यायमञ्जरीकारो जयन्तभट्ट ईश्वरसिद्धी पूर्वपक्षमुपस्थापितवान् । सच न केवल भट्टपादोक्त एव । विधिविवेकन्यायकणिकादावपि तादृशस्य पक्षस्य प्रतिपादनात् । तथाच नेद भट्टपादस्यैवोद्धरणम् । नचेदृश: पक्ष ईश्वरवादिभिर्नोपस्थाप्यते शास्त्रयोनित्वाधिकरणे ईश्वरव दिभिरुत्तरमीमासकैरपि परमेश्व- रस्य शास्त्र गम्यत्वसिद्धयेऽनुमानमिद्धेश्वरनिराकरणदर्शनात् । कल्पतरुकारादिभी रामानुजाचार्यादिभिश्चैवमेवानुमान सिद्धस्ये- श्वरस्य निराकरण कृतम् । नच, तावतैव तेऽनीश्वरवादिन, वेदेकगम्येश्वरस्य तेरभ्युपगमात् । अनुमानानि च युक्तिरूपतया असभावनानिवृत्त्यर्थं तैरप्यभ्युपगतान्येव । असभावितेचार्थे प्रमाणप्रवृत्ति. 'न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पन्नेव यो हत. ।' इतिन्यायात् । अतोलक्षणैर्युक्तभिश्च सभावितेऽर्थएव प्रमाणानि प्रवर्त्तन्ते । सर्वथाऽपि मीमांसकाः वैदिकाः वेदसिद्धमीश्वर मन्यन्ते, तथापि कर्मणि शुद्धातिशयोत्पादनाय कचिद्देवता अपि शब्दरूपा एव तैरङ्गीकृताः । न च वेदान्ताश्च वेदोपनिषदाः । सृष्टिसंहारा-. भावान्नतदर्थत्वेनेश्वरोऽपेक्षणीय । फलञ्च कर्मभिरेव सपद्यते । परमेश्वरप्रतिपादकानि वचनान्यर्थवादरूपाण्येवेति वदन्तो दृश्यन्ते । कर्मनिष्ठाया बुद्धिशुद्धिवैराग्यादिक्रमेण भगवदाराधनादिक्रमेण च ब्रह्मात्मसाक्षात्कारः संभवत्येव । तत एवोक्त श्रीभागवतादी- स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः । नाचरेद्यस्तु वेदोक्तं मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ॥ विकर्मणा धर्मण निःसङ्गोपितमीश्वरे । वेदोक्तमेव कुर्वाणो नैष्कर्म्यसिद्धि लभते ( ) रोचनार्था फलश्रुतिः ॥ श्री० भा० म० पु० मूल संस्कृत में दिया गया है । न्यायमञ्जरोकार जयन्तभट्ट ने ईश्वरसिद्धि में अनेक वचनों को पूर्वपक्ष के रूप में उपस्थित किया है । उस पूर्वपक्ष में केवल भट्टपादोक्त वचनों को ही नही लिया है, अपितु विधिविवेक, न्यायकणिका आदि ग्रन्थों में भी उसी प्रकार कहा गया है । ईश्वरवादियो के द्वारा उस प्रकार का पक्ष नही उपस्थापित किया जाता, सो नही । शास्त्रयोनित्वाधिकरण में ईश्वरवादी 1 उत्तरमीमासको के द्वारा भी परमेश्वर को शास्त्र+गम्य सिद्ध करने के लिये अनुमानसिद्ध ईश्वर का निराकरण किया गया है । कल्पतरुकार आदिने, रामानुजाचार्य आदि ने भी इसी प्रकार अनुमान सिद्ध ईश्वर का निराकरण किया है । इतने करनेमात्र से उन्हें अनीश्वरवादो 1 नही कहा जाता । वेदैकगम्य ईश्वर को वे मानते है । अनुमान भी युक्तिरूप होने से उन्हें असंभावना निवृत्पर्थ सभी लोग मानते ही हैं । असभावित अर्थ में प्रमाण की प्रवृत्ति नही हुआ करती । एवं च लक्षणो से तथा युक्तियों से संभावित अर्थ मे मी प्रमाणो की प्रवृत्ति हुआ

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२०५४ वेदार्थपारिजात धर्मोऽधर्मश्च वेदैकलभ्यो वेदश्च मन्त्रब्राह्मणरूप एव | अग्निहोत्रादिरूपो यज्ञोऽपि ब्राह्मणोक्त एव । अतः पूर्वमृजवो यज्ञा आसन् पश्चाद्वाह्याडम्बरः प्रधानतो जात इत्येतत्सर्वमुन्मत्तप्रलपितमेव । अनसो यज्ञोपयोगिव्रीहियवादिग्रहण कर्त्तव्य- मिति सहेतूपपादितमेव । शतपथब्राह्मणेन तदप्रामाण्ये पौर्णमासेष्टिनिर्वाहार्थं द्वादशमुष्टि परिमितानामेव व्रीहीणां यवाना वा ग्रहणमपेक्षितमिति कथनमपि निर्मूलमेव स्यात् ॥ वितस्तिपरिमितैरप्यनोभिर्हंविग्रहणपारम्पर्यमपि याजुषामनुरोधेनेव, तत्रानसस्तदवयवानाश्चोल्लेखात् । तेनात्र मन्त्रार्थानुसरणमेव न बाह्याडम्बरोऽभिप्रेतः । यत्तु प्राचीना यज्ञाः सर्वथाऽवैदिकतत्त्वासंस्पृष्टा उत्तरकाले दर्शपूर्णमाससदृशेषु विशुद्धयज्ञेष्वप्यवैदिकतत्त्वसम्मिश्रणम् इति तदप्यशुद्धम्, मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदत्वस्यासकृदुक्तत्वेन मन्त्रब्राह्मणप्रतिपादितस्य कस्याप्यंशस्य क्वापि यज्ञे संमिश्रणाभावात् । भूमावा अन । भूमाहि वा अनस्तस्माद्यदावहुभवत्यनो वाह्यमभूदित्याहुस्तस्माद्भूमानमेवैतदुपैति तस्मादनस एव गृह्णीयात्' ( श० १।१।२६ ) यज्ञो वा अनः । यज्ञोहिवा- अनस्तस्मादनसएव यजूषि सन्ति न कोष्ठस्य न कुम्भ्यैभस्त्रायैहस्मर्षयो गृहणन्ति तदृषीन् प्रतिभस्त्राये यजूष्यासु- स्वान्येतहि प्राकृतानि यज्ञाद्यज्ञ निर्मिमा इति तस्मादनस एव गृह्णीयात्? ( श० १११।२७ ) इति श्रुतेः । यस्मादनस एव ग्रहणं तस्माद् ग्रहणमन्त्राः 'धूरसि' ( वा० सं ० ११८ ) ' अहृतमसि हविर्धानम्' ( वा० स० ११ ९ ) इत्यादयोऽनोऽवयवलिङ्गा दृश्यते । करती है । सर्वथापि मीमासक वैदिक है, अतः वे वेदसिद्ध ईश्वर को मानते हैं । तथापि कर्म मे श्रद्धातिशय के उत्पादनार्थं क्वचित् देवताओ को भी शब्दरूप हो उन्होने माना है । मोमासा सिद्धान्त के अनुसार सृष्टि और सहार का अभ्युपगम न होने से उसके कर्तृत्व का भार ईश्वर पर थोपने की मीमासको को आवश्यकता ही नही हुई, इस कारण ईश्वर को चर्चा को उन्हे अपेक्षा ही नही थी । फल- प्रदातृत्व का भी भार कर्म पर ही है, ईश्वर पर नही । अतः उसकी चर्चा का कोई अवसर ही नही था । इसी कारण ईश्वरप्रतिपादक वचनो को अर्थवादरूप ही माना गया है । जिनका तात्पर्य कर्म में ही रहने से कर्म की प्रधानता कर्म मे श्रद्धोत्पादनार्थ सिद्ध हो पाती है । इस रीति से कर्मनिष्ठा होने पर बुद्धिशुद्धि, वैराग्यादि के क्रम से और भगवदाराधनादि के क्रम से अवश्य ही ब्रह्मात्मसाक्षात्कार संभव हो जाता है । इसी बात को श्रीमद्भागवत में भी बताया गया है । धर्म और अधर्म दोनो एकमात्रवेद से ही जाने जाते हैं । और वेद तो मन्त्र ब्राह्मणरूप ही है । अग्निहोत्रादिरूप यज्ञ भी ब्राह्मणोक्त ही है । अत: 'पूर्व समय में ऋजुयज्ञ थे, पश्चात् उन यज्ञो में बाह्याडम्बर की प्रधानता हो गई । ' किन्तु यह कथन भी उन्मत्त प्ररूपित के तुल्य ही है । 'अन्न से भरे शकट से यज्ञोपयोगी ब्रीहियवादिका ग्रहण करे इस बात का सहेतुक उपपादन किया जा चुका है । शतपथ के द्वारा उसका अप्रामाण्य प्रदर्शित करने पर पौर्णमासेष्टि के लिए १२ मुष्टि परिमित व्रीहि या यवो का ही ग्रहण स्वीकार किया गया है ।' किन्तु यह कथन भी निमूल है । वितस्तिपरिमित शकट से हविर्ग्रहण की परंपरा भी यजु के अनुरोध से ही है । उसी में शकट और उसके अवयवो का उल्लेख किया गया है । अतः मन्त्रार्थ का अनुसरणमात्र ही किया गया है, उसमें बाह्याडम्बर कथमपि अभिप्रेत नहीं हैं । यह जो कहा है कि 'प्राचीन यज्ञ, अवैदिक तत्वो से सर्वथा असस्पृष्ट रहे, किन्तु आगे चलकर उत्तरकाल मे दर्शपूर्णमास सदृश विशुद्ध यज्ञो में भी अवैदिक तत्वो का सम्मिश्रण हुआ । ' किन्तु वह भी अशुद्ध है । क्योंकि मन्त्र ब्राह्मण दोनों में वेदत्व का होना बार बार बताया जा चुका है । मन्त्रब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य किसी का कोई भी अंश किसी भी यज्ञ में समिश्रित नही है । यह जो कहा है कि 'अगादङ्गात् संभवसि ' इस मन्त्र से और ' अविशेषेण पुत्राणा दाय ' इस मनुवचन से तथा यास्क ने भी पुत्रो और पुत्रियो में भेदभाव का अपनोदन किया है । किन्तु श्रीतयज्ञो में तो पुत्रियो के प्रति होनभावना का ही प्रदर्शन किया है । जैसे --1 प्रयाजसंज्ञक यागों में 'एको मम, एका तस्य, योऽस्मान् द्वेष्टि, यंच वय द्विष्म -( श० प० ११५।४।१२ ) । वह कामना (इच्छा) उत्तरोत्तर प्रयाजों में बढ़ती हुई दिखाई देती है । यहां अपने लिये पुत्रकामना और द्विष्ट या द्वेषी शत्रु के पुत्री ( कन्या) को कामना की जाती है । T 1

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वेदार्थ पारिजात: २०५५ — ' ' ':' यत्तु अङ्गादङ्गात् सभवति इति मन्त्रेण अविशेषेण पुत्रीणा दाय इति मनुवचनेनच यास्केन पुत्रेषु पुत्रीषुच भेदभावोऽपनोदितः । किन्तु श्रोतयज्ञेषु तु पुत्रीषु हीनभावनैव प्रदर्शिता । तद्यथा प्रयाजसज्ञकेषु यागेषु ' एको मम-एका तस्य, योऽस्मान् द्वेष्टि य च वयं द्विष्म. ' ( शत ० १/५/४/१२) इति । साच कामतोत्तरोत्तरप्रयाजेषु वर्धमाना दृश्यते । अत्र स्वस्य पुत्रकामनाद्विष्टस्य द्वेषिणो वा कृते पुत्रीकामना दृश्यते । पञ्चमे प्रयाजे स्वस्य पञ्च पुत्राः कामिता । शत्रोः कृते न तस्य किञ्चन इत्याशी. पठितेति, तदपि नास्तिक्यमूलकमेव शतपथस्य वेदत्वेनानतिशङ्कनीयत्वात् । लोके पुत्रजन्मनि यादृशोल्लासो दृश्यते पुत्रीजन्मनि तादृशोल्लासादर्शनात् । स्त्रियोऽपि यथा पुत्रजन्मनि प्रहृष्यन्ति न तथा पुत्रीजन्मनि । अत एव 'दुहितरइत्येके ' इत्यादिना तत्रैव यास्क: पक्षान्तरं प्रदर्शयति । तस्मात् पुमान् दायादस्त्र्यदायादेतिविज्ञायते । 'यदृच्छन्ति स्थाली न दारुमयं तस्मात् पुमान् दायादोऽदायादा स्वाति विज्ञायते ' ( मंत्रा० ० ४।६।४ ) इति ब्राह्मणोक्ते । 'तस्मात् खियंजाता परास्यन्ति न पुमासमिति च ( मं० स ० ४।६।४ ) । अथ च स्थाली परास्यन्ति हवनकर्मणो न तया जुह्वति न दारुमय परास्यन्ति दहनकर्मणो दारुमयेनेव जुह्वति तस्मात् स्त्रियं जाता परा-स्यन्ति परस्मै प्रयच्छन्ति तस्मात् पुमानेव पैतृकस्येष्टे न दुहिता । नच ' अङ्गादङ्गात् सभवति हृदयादधिजायसे ' इत्यस्य -समाजिरीत्या मन्त्रत्वम्, निरुक्तेतु — 'तदेतदृक्श्लोकाभ्यामभ्युक्त' मिति ऋक्त्वाभिधानम्, 'अदायादास्त्रोति तु ब्राह्मणम् प्रतिपक्षसंमतऋग्वेदे अङ्गादङ्गात्संभवसोतिमन्त्रस्यादर्शनात् । नचान्यास्वपि तत्समतासु सहितासु तदुपलम्भ: केवल कौषी-तकि आरण्यके तदुपलम्भः । यास्केन तु तादृशारण्यकवचनस्यैव ऋक्त्वमुक्तम् । तेन मन्त्राणामेव वेदत्व न ब्राह्मणा- नामित्यप्यपास्तम् । ननु तथापि परस्परविरुद्धब्राह्मणवचनाना कथ विरोधपरिहार इति चेन्न, अभ्रातृमतीवाद ( नि० ३।४ ) मित्य- परमित्यनेन तत्रैव तत्समाधानस्योक्तत्वात्' । तस्माद्यैवाभ्रातृका सैर्वापित्र्यधनर्महतिनेतरा सभ्रातृकेति । पुरुषेषु हि पिण्डदातृषु सत्सु न कन्याधनमर्हति । अभ्रातृकायास्तु पिण्डदानाधिकारात् दायेऽप्यधिकारः । पिण्डं दत्वा धनंहरेदिति सिद्धान्तात् । 'अभ्रातरइव योषास्तिष्ठन्तु हतवर्त्मन' इति नियमात् । अभ्रातृका इव योषास्तिष्ठन्ति सन्तानकर्मणे पिण्ड-दानाय । अथर्ववेदीयाचेयमृक् । 'अमूर्यायन्तिजामयः सर्वा लोहितवाससः । अभ्रातर इव योषास्तिष्ठन्तु हतवर्त्मनः' ( अ ० सं ० १| १| ७| १ ) । तत्र दुर्गाचार्यः प्रसवभागे वहनरोगिणी या स्त्री भवति तस्मास्तत्प्रतीकारकर्मणीयं विनियुज्यते । अमूर्यायन्ति स्रवन्ति नाड्यो रक्तमजस्रमविरतास्त्रिय इवातिलोहितवस्त्रा सर्वा एतास्तिष्ठन्तु उपरमन्तु हतलोहितवहनमार्गा अस्यमन्त्रस्य पञ्चम प्रयाज मे अपने लिये पाँच पुत्र चाहे गये है, और शत्रु के लिये ' न तस्य किञ्चन' इस प्रकार आशी: ( इच्छा ) की गई है । ' किन्तु यह सब नास्तिक्यमूलक है । शतपथ भी वेद होने से उसमे शंका के लिये अवकाश ही कहां है । लोक व्यवहार मे भी पुत्रजन्म होने पर जैसा उल्लास अनुभव किया जाता है, वैसा उल्लास पुत्रो ( कन्धा ) के पैदा होने पर नही होता । स्त्रियाँ भी पुत्र के पैदा होने पर जैसी हर्षित होती हैं, वैसी पुत्रा ( कन्या ) के पैदा होने पर नहीं । अतएव 'दुहितरमित्येके ' कहकर यास्क ने दूसरा पक्ष प्रदर्शित किया है । तस्मात् मान् ( पुत्र ) दायाद है और स्त्री ( कन्या ) अदायादा ( दायाद नहीं ) है यह ज्ञात होता है । मैत्रायणा-सहिता और ब्राह्मण में भी इसी आशय को बताया गया है । 'हृदयादविजायसे ' इम समाजालोग ' मन्त्र' कहते हैं । किन्तु निरुक्तकार उसे ऋक् कहते है । समाजियो के सम्मत ऋग्वेद में 'अङ्गादङ्गात्सभवसि' यह मन्त्र कही भी उपलब्ध नही है । और न हो उनको अभिमत अन्य सहिताओं में उसको उपलब्धि है । केवल कौषीतकि आरण्यक में उसे पाया गया है । यास्कन उस आरण्यकवचन को ही ऋ 1 शब्द से बताया है | इससे समाजियों का जो मन्तव्य है कि 'मन्त्र हो वेद है, ब्राह्मण वेद नही है, उसका अच्छी तरह खण्डन हो जाता है ।

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वेदार्थपारिजातः ५०५६ वीर्येण । कथ पुनस्ताः तिष्ठन्तु अभ्रातरइव योषा • । यथा काश्चिदभ्रातृका योषा हतभतूंवशमार्गास्तिष्ठन्ति सन्तानकर्मणे पिण्डदानाय एवमेता नाड्यास्तिष्ठन्तु एवमस्यामृचि अभ्रातृकाया अनिर्वाह ( अविवाह ) उपमायादारेति । यास्काचार्योऽपि तदेववक्ति -' अभ्रातृका इवयोषास्तिष्ठन्ति सन्तानकर्मणे पिण्डदानाय हतवर्त्मान इत्यभ्रातृकाया अनिर्वाह 'ओपमिक' इति । ( नि० ३ । ४ ) । तस्योत्तरा भूयसेनिर्वचनायेत्युक्ता 'अभ्रातेव पुस एति प्रतीचीगर्त्तारुगिवसनमेधनानाम् । जायेव पत्ये उशती- सुवासा उषा हस्रेवनिरिणते अप्सः । ( ऋ० स० १।१२४/ ७ ) अभ्रातृव पुसः पितॄनिवेत्यभिमुखी सन्तानकर्मणे पिण्डदानाय न पति गर्त्तारोहिणीव धनलाभाय दक्षिणा- जीगर्त्त (( निरु ० ३।५ ) । यथा अभ्रातृकाकन्या दत्तापि सती पित्रारूढापि भर्त्रापुनः पुस. पितृनिव पितृवशमेवाभिमुखी एति सन्तानकर्मणो पिण्डदानाय न पतिवंशमित्यर्थं । तस्मादभ्रातृकापैतृक दायाद्यमर्हति । 'नाभ्रात्रीमुपयच्छेत्, तोक ह्यस्यतद्भवती' ( नि० ३।५ ) त्यभातृकाया उपयमनप्रतिषेध प्रत्यक्षः | तोकमित्यपत्यनाम । यदपत्यमभ्रातृकायाः पितुर्भवति नेतरस्य वोदुरिति शासद्वह्निरित्ययमर्धर्योऽप्यभ्रातृमतीवादपक्षेणैव योजयितव्यः । तत्रैवोत्तरोऽप्यधेर्चः । अङ्गादङ्गादित्यत्र दुहितुः पुत्रत्वं गौणमेव । अन्यथा, दुहिता दूरेहिता दोग्धेवा ( नि० ३।४ ) इति विशेष-, निर्वचनानुपपत्तिः । मनुवचनमप्यभ्रातृमती पक्ष एवयोज्यः वेदस्मृत्योर्विरोधे वेददृष्टस्य धर्मस्यैव ज्यायस्त्वात् । " नगामग्ने तान्वोरिक्थमा रैक् चकारगर्भ सवितुर्निधानम् । यदीभ्रातरो जनयन्त वह्निमत्य कर्त्ता सुकृतोरत्य ऋन्धन् ( ऋ० स० ३।३१।२ ) । नजामये भगिन्ये " "आत्मनः पुत्रोरिक्थं प्रारिचत् चकारेनां गर्भधानीसवितुर्हस्तग्रामस्य - इति स्पष्टमेव दायनिषेधो दृश्यते । तस्माद्भेदभावः पुत्रोषु पुत्रेषु च नासीत्पूर्वमिति रिक्त वचः । प्रयाजवाक्यानान्त्वर्थवादाभिप्रायेणान्य एवाभि- प्रायः । तथाहि- 'देवाश्च वा असुराश्च उभये प्राजापत्या पस्पृधिरे दण्डैर्धनुभिर्न व्यजयन्त ते हा विजयमाना ऊचुर्हन्त वाच्येव ब्रह्मन् विजिगीषामहे योनो वाचां व्याहृतां मिथुनेन नानुनिक्रामात् ससर्वं पराजयाना अथ सर्वमितरे 'जयानितितथेति देवा अब्रुवन्स्तेदेवा इन्द्रमब्रुवन् व्याहरेति-- स इन्द्रोऽब्रवीत् - एको ममेत्यथास्माकमेतीतरेऽब्रुवन् तदुतन्मिथुनमेवाविन्दन् मिथुनं ह्येकश्चैकाच 'द्वौ ममेतीन्द्रो ब्रवीत् । अथास्माकं इतीतरेऽब्रुवस्तदु तन्मिथुनमेवाविन्दन् मिथनु हि द्वौ च द्वेच' (श० १२५ | ४| ८) वयोमम... अथास्माक तिस्र त्रयश्च विस्ररच' ( श० १/ ५/४/९ ) । तथापि परस्पर विरुद्ध ब्राह्मण वचनो का विरोध परिहार कैसे होगा? इस प्रश्न का समाधान निरुक्तकार ने वही कर दिया है । तस्मात् अभ्रातृका कन्या ही पितृधन की अधिकारिणी है, सभ्रातृका कन्या नहो । पिण्ड प्रदान करने वाले पुत्रो के रहते कन्या, पितृधन की अधिकारिणी नही हुआ करती । किन्तु अभ्रातृक कन्या को पिण्डदान का अधिकार होने से दाप मे भी उसका अधिकार माना गया है क्योंकि ' पिण्डं दत्वा धनं हरेत्' यह सिद्धान्त है । अथर्वसहिता, ऋक्सहिता, निरुक्तादि से भी उपर्युक्त सिद्धान्त की ही पुष्टि हो रही है । 'भगादङ्गात्' यहाँ पर दुहिता में गौण पुत्रत्व कहा गया है अन्यथा ' दुहिता, दूरेहिता दोग्धेवा' ( नि० ३।४ ) इस विशेष निर्वचन की उपपत्ति नही हो सकेगी । आपाततः विरुद्ध प्रतीत होने वाले स्मृति वचनो को अभ्रातृमती कन्या के पक्ष में ही लगाना चाहिये | क्योकि वेद और स्मृति दोनों में परस्पर विरोध प्रतीत होने पर वेददृष्टधर्म को ही प्रबल बताया गया है । 'न जामये तान्वों', 'ना चामये भगिन्यै', इत्यादि श्रुतियाँ कन्या के लिये स्पष्टतया दाय का निषेव कर रही हैं । अतः पूर्वकाल से पुत्र और कन्या 1

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वेदार्थपारिजात २०५७ , चत्वारो ममेतीन्द्रोऽब्रवीत् अथास्माक तस्र इतीतरे पञ्च ममेतीन्द्रोऽब्रवीत्तत इतरे मिथुन नाविन्दन् नोह्यत ऊर्ध्वं मिथुनमस्ति । पञ्च पञ्चेति ह्येवैतदुभयं भवति । ततो हामुरा सर्वं पराजयन्त सर्वस्माद्देवा असुरानजयत् सर्वस्मात् सपत्नानसुरान्निरभजन् ( श० ब्रा० ११५।४।६-११ ) । उभये प्राजापत्या देवाश्चासुराश्व स्पर्धित्वा दण्डधनुरादिभिर्हननसाघ- नैर्विजयमलभमानाः सामर्थ्यस्य समानत्वात् । विजयप्राप्त्यै वाग्रूप एव मन्त्रे विवदमाना जेतुमिच्छामहे इत्यूचुः । नोऽस्माकं निरुक्त पुल्लिङ्गवचन मिथुनेन स्त्रीलिङ्गान्तप्रतिवचनाभिधानेन मिथुन कृत्वा अनुक्रमेण म निष्क्रामेत नितरा न आक्रामति स सर्वं पराजय प्राप्नुयात् । अथ मिथुनेन वक्तारो जयान् जयेरित्येव सङ्केतमङ्गीकृत्य देवा इन्द्रमब्रुवन् व्याहरेति । ' इन्द्रो- ऽब्रवीत् एकः पुत्रो ममास्त्विति । असुरा ऊचुः -- अस्माकमेका लिङ्गसामर्थ्यात् पुत्रीति गम्यते । तत्र एक एका, द्वौ द्वे,त्रयः तिस्र, चत्वार: चतस्र इति चतुर्षु पर्यायेषु प्रतिज्ञाऽविरोधेन असुरा मिथुन लब्धवन्तः । लोके स्त्रीपुरुषयोमिथुनत्वव्यवहारात् । पञ्चमे तु पर्याय इन्द्र पञ्च ममेत्यब्रवीत् तत इतरे असुरा मिथुनं नान्वविन्दन् । पञ्च षट् सप्त इत्यादि लिङ्गद्वयेऽपि रूपाविशेषात् व्यावर्त्तकस्य रूपविशेषस्याभावात् । तेनासुराः पराजयन् । देवाः सर्वस्माद् नामविषयस्तानजयन् । यस्मादिन्द्रेण एको ममेत्युक्तम्, असुरैरेका ममेत्युक्तम्, तस्मात् प्रथमे प्रयाजे एको ममेत्यादि ब्रूयात् । एव द्वितीयादिष्वपि द्वौ मम द्वे तस्येति द्रष्टव्यम् । अह यं द्वेष्मि तस्यैका पुत्री स्यादिति । पुत्र्या रक्षणप्रदानादौ बहुतरदु. खसभवात् तच्छत्रोराशा । पञ्चमे प्रयाजे पञ्च ममेति ब्रूयात् द्वेष्टरि विपरीतफलकामनाया प्राप्ताया न तस्य किञ्चनेति असुरैः पञ्चसख्याया मिथुनरूपस्य वचनस्यादर्शनात् तस्मान्नात्र पुत्रेषु पुत्रीषु च भेदभाववत्तंनमभीष्टम् पूर्वोक्तरीत्या दायभेदभावे सत्यपि असुरैः एका द्वे इत्यादिशब्दैः पुत्रीणामेव कामितत्वात्, सर्वैरपि मातृरूपेण पत्नीरूपेण तासा समादरणदर्शनात् ॥ "पतिभि देवरैश्चैव पितृभिर्भ्रातृभिस्तथा । पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥ ” इति मनूक्तेः । यदपि च ' आदिकाले खलु यज्ञेषु पशवः समालभनीया बभूवुः नालम्भाय प्रक्रियन्ते स्म 1। ततो दक्षयज्ञ- प्रत्यवरकाले मनोः पुत्राणां नरिष्यन्नाभागेक्ष्वाकुनृगशर्यातीत्यादीनाञ्च क्रतुषु पशूनामेवाभ्यनुज्ञानात् ' पशवः प्रोक्षणमापुः ' ( चरकस० चिकित्सास्थान १ ९ १४ ) । तेन यज्ञे पशुवधप्रवृत्तिः न पूर्वमासीत् । उत्तरकाले तादृशी प्रवृत्तिः लोभमोहादिभिरेव जाता । ( शान्तिपर्वणि ३३७, अनुशासनपर्वणि ६ ३४, ११६/ ५६-५८, वायुपुराणे ५७।९१-१२५ ) इत्यादिषु तद्वर्णनम् । : ' ' उपरिचरवसुकथयापि तत्पुष्टि । लुब्धैवित्तपरैर्ब्रह्मन् नास्तिकै सम्प्रवर्तितम् । वेदवादानविज्ञाय सत्याभासमिवान्ततम् ॥ शान्तिपर्वणि ( २६३।६ ) इत्युक्तेः । बौद्ध त्रिपिटके ब्राह्मणधम्मियसुत्त १८/ १९ इत्यनेनापि विज्ञायते यल्लुब्धः ब्राह्मणेः मिय्या- भूतान् मन्त्रान्निर्माय इक्ष्वाकोः समीपं गत्वा पशुयागाय प्रोत्साहितवन्त इति, तदपि शास्त्रतात्पय्र्थ्याज्ञानमूलकम् । 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत', 'हृदयस्याग्रेऽवद्यत्यथ जिह्वाया अथ वक्षसः' इत्यादि श्रुतिशतविरोधात् । में कोई भेदभाव नही था, यह कहना व्यर्थ है । प्रयाज वाक्यो का अर्थवादाभिप्राय से अन्य ही अभिप्राय है । शतपथ ने उसे अच्छी तरह अभिव्यक्त किया है । इस रीति से पुत्र और कन्या के प्रति भेदभाव रहने पर भी असुरो ने 'एका, द्वे' आदि शब्दो से कन्याओ की ही I इच्छा की है । सभी लोग कन्याओं का बादर मातृरूप में या पत्नी रूप में किया करते है मनु ने भी इसका समर्थन किया है । और जो चरक, महाभारत, वायुपुराण, उपरिचर वसुकथा, बौद्धत्रिपिटक आदि ग्रन्थों के उल्लेखो से 'यज्ञ में पशुवध की 1 प्रवृत्ति पूर्वकाल में नही थी, किन्तु उत्तरकाल मे लोभ-मोह आदि कारणो से वह प्रवृत्ति पैदा हुई ।' बताने का जो प्रयत्न किया गया है, वह भी शास्त्र के तात्पर्य को न जानने के कारण ही हुआ है । क्योंति तुम्हारे इस कथन के साथ सैकड़ों श्रुति वचनो का विरोध प्रत्यक्ष है । २५८ }

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 1160 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः२०५८ आस्तिकास्तु मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदत्वाभ्युपगमाद् धर्माधर्मव्यवस्थाया वेदमेव प्रमाण मन्यन्ते । यथा 'न हिंस्या-दिति' निषेधबलेन हिमायाः पापजनकत्वमभ्युपगच्छन्ति, तथैव ' अग्नीषोमीय पशुमालभेत' इतिविधिबलात् क्रत्वर्थाया हिंसायाः पुण्यजनकत्वेनाहिंसात्वमेव मन्यन्ते । 'तस्माद्यज्ञे वधोऽवध ' इति मनुवचनात् । 'अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्' ( ब्र० सू ० ३।१।२५ ) इति वेदान्तदर्शनसूत्रात् । पशुयागनिन्दावचनानि तु वौद्धसाख्यादिमतरीत्या पूर्वपक्षतयैव नेतव्यानि । यथास्मिन्नेव ब्रह्मसूत्रे वैदिकं कर्म हिंसादिदोषोपेतत्वादशुद्धमिति साख्यादिरीत्या पूर्वरक्षमुत्थाप्य शब्दाद् वैदिक शब्दप्रामाण्यात्तन्निराकरणं कृतम् । शब्दप्रमाणका आस्तिकास्तस्मात् यदाह शब्दस्तदेव कर्मादरणीय धर्मश्च मन्यन्ते । शास्त्रबलादेव दुहितृ- भगिन्यादीनामन्यगोत्रे विवाहः । असगोत्राया असपिण्डायाश्च कन्यकायाः पत्नीत्वेन वरण क्रियते । अविवाहिताया ,गमने पातकं विवाहितायाश्चार्त्तवेऽमनमेव पातकम् शास्त्रबलादेव । गङ्गाजलस्य पापनाशकत्व कर्मनाशाजलस्य च ,पुण्यनाशकत्वमुपेयते । मासभक्षिणामपि व्याघ्रसिंहादीना चर्माणि ध्यानधारणादावासानायाद्रियन्ते दूर्वाभक्षकस्यापि गर्दभस्य चर्मं न स्पृश्यते ॥ शङ्ख पूजायामुपयुज्यते ॥ मनुष्यास्थिस्पर्शनाच्च सचैलस्नान क्रियते । मनुष्यमूत्रस्पर्शनेन मृज्जलाभ्या शौचं विधीयते, गोमूत्रादिपञ्चगव्यप्राशन तु पापशोधकत्वेनाद्रियते । यथा रूपवीक्षणे चक्षुषैव नैरपेक्ष्येण प्रामाण्यम् । तन एव चक्षुषेव रूपमुपलभ्यते न श्रोत्रादिना । आलोकादिसहकृतेन दोषरहितेन मनःसयुक्तेन चक्षुषा रूपमुपलभ्यत एव न नोलपभ्यते । तेनैव चाक्षुषं रूपमुच्यते । तथैव धर्मो वेदेनैव विज्ञायते नान्यैः प्रत्यक्षानुमानादिभिः । अधिकारिभिरुपक्रमादिलिङ्गेर्मीमांसापद्धत्या विचार्यमाणैर्वेदेस्तु धर्मो विज्ञायत एव, न न विज्ञायते । अत एव तयोरसाधारणः सम्बन्धो भगवताप्युक्त:- आस्तिक लोग तो मन्त्र और ब्राह्मण दोनो को वेद मानते है, अत उनके मत मे धर्माधर्म की व्यवस्था, वेदप्रमाण से ही की जाती है । जैसे 'न हिस्यात्' इस निषेधवचन के बल पर हिंसा को पापजनक माना जाता है, वैसे ही 'अग्नीषोमीय पशुमालभेत' इस विधिवचन के बल पर क्रत्वर्थ हिंसा के पुण्यजनक होने से उसे अहिंसा ही माना जाता है । 'तस्माद् यज्ञे वघोऽवध.' मनु ने भी कहा है । ' अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्' इस ब्रह्मसूत्र मे वेदान्तदर्शन भी यही बना रहा है । बौद्ध एवं संख्यिमत के अनुसार पशुयाग के सम्बन्ध मे जो निन्दावचन है उन्हे पूर्वपक्ष के रूप मे समझना चाहिये । जैन उपर्युक्त ब्रह्मसूत्र में साख्यमत के अनुसार हिंसादि दोषदूषित होने से वैदिक कर्म की अशुद्धि का पूर्वपक्ष कर वैदिक शब्द के प्रामाण्य के बल पर पूर्वपक्ष के द्वारा बताई गई अशुद्धि का निराकरण किया गया है । शब्दप्रामाण्य को मानने वाले आस्तिक विद्वान् शब्द प्रमाण प्रतिपादित कर्म का आदर करते है और धर्म के रूप में स्वीकार करते है । शास्त्र वचन के बल पर ही दुहिता, भगिनी आदि का अन्य गोत्र में विवाह किया जाता है, असगोत्र और असपिण्ड कन्या को ही पत्नी के रूप में स्वीकार किया जाता है । शास्त्र के बल पर हो अविवाहिता के पास गमन को पातक और विवाहिता के समीप ऋतुकाल में अगमन को पातक माना जाता है । गंगाजल को पापनाशक और कर्मनाशा जल को पुण्यनाशक माना जाता है । व्याघ्र, सिंह आदि के मासभक्षी रहने पर भी उनके चर्म को ध्यान धारणा के लिये आसन के रूप में स्वीकार किया जाता है । और गर्दभ के दूर्वाभक्षी होने पर भी उसके धर्म का स्पर्श भी नही किया जाता । शख का पयोग पूजा में किया जाता है, किन्तु मनुष्य की अस्थि का स्पर्श होने पर सचैल स्नान करना होता है । मनुष्य सूत्र के स्पर्श होने पर मिट्टी और जल से पवित्र होना पडता है, किन्तु गोमूत्रादि पञ्चगव्य के प्राशन को पापशोधक कहा जाता है । जैसे रूपदर्शन में चक्षु को ही प्रमाण माना जाता है, श्रोत्रादि अन्य इन्द्रियो को नही । इसी कारण रूप को चाक्षुक रूप कहते है । उसी तरह धर्म को उपक्रमादि लिङ्गो को ध्यान में रखकर मोमासा पद्धति से विचार किये जाने वाले वेदो से ही जाना जाता है, प्रत्यक्ष, अनुमानादि प्रमाणो से नहीं । अतएव भगवान् ने वेद और धर्म के असाधारण सम्बन्ध को 'य. शास्त्रविधिमुत्सृज्य के द्वारारा बताया है । जैसे चक्षु के द्वारा रूप का ज्ञान होने पर, अन्य प्रमाण की अपेक्षा नही रहती, उसी तरह वेद से धर्म का ज्ञान होने पर, पुन: उसमें प्रमाणान्तर की अपेक्षा नहीं रहती ।