वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1161–1170
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1161–1170
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वेदार्थपारिजात २०५९
य शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुख न परा गतिम् ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाण ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि । (श्री० भ० गी० १६।२३-२४) कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । (श्री ० भ ० गो ०३।१५ ) यथा न चक्षुषा विदित रूपं प्रमाणान्तरमपेक्षते । तथैव न वेदेनावगतो धर्मः प्रमाणान्तरमपेक्षते । 'प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्धयते । एनं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता । ' नहि वेदोक्तस्यार्थस्यौचित्य- सम्यक्त्वादिसिद्धये प्रमाणान्तरापेक्षा भवति प्रमाणाना प्रामाण्यस्वतत्वाभ्युपगमात् । युक्तयस्तु वेदार्थस्य बुद्धयारोहाय क्वचित् क्वचिन्निरूप्यन्ते, न वेदप्रामाण्याय तदुपकाराय वा । तत एव कैश्विदाचाय्यैः हिंसनीयाननुग्राहकत्वविशिष्टप्राणवियोगानुकूलव्यापारस्यैव हिसात्वमुक्तम् । यथा दुश्चिकित्स्यव्रणादि- निराकरणाय मर्मच्छेदकोऽपि चिकित्सक पूज्यते समाद्रियते च, तथैव पशुयागैरपि पशूनामुपकारो भवत्येव 'याज्ञिकः हिरण्यशरीर ऊर्ध्वलोकमेति', ' न उ वा एतन्त्रियसे नरिष्यसि', 'सुगोभिः पथिभि ' इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ वेदघातकाः समाजिनस्तु मोहाद् द्वेषाद् वा मन्त्रभागस्यैव भागान्तरस्य ब्राह्मणभागस्यावेदत्वसाधनाय प्रयतन्ते । मन्त्रेष्वपि शाकल्या दिसहिताचतुष्टयस्यैव वेदत्वमुद्द्द्घोष्य महाभाष्यादिप्रोक्त- अष्टाविंशत्युत्तरं का दशशतमन्त्रसंहितानां तद्ब्राह्मणानाश्च वेदत्वमपलपन्ति । तेनैव तेषा मतदौबल्य स्पष्ट विज्ञायते । तताऽप्यधिकनास्ति कैस्तदभ्युपगतवेदेष्वप्यधिकां- शस्याधुनिकत्वं प्रक्षिप्तत्वमुच्यते । अन्यैश्च वेदाना भण्डधूर्तनिशाचर कर्तृकत्वमप्युच्यते । आस्तिकदर्शनेष्वपि साख्या योगाश्च यद्यपि समस्तस्यैव वेदस्य प्रामाण्यमङ्गीकुर्वन्ति । अत एव ते मन्त्र- ब्राह्मणसाध्यैर्यज्ञैः स्वर्गादिप्राप्तिमभ्युपगच्छन्ति, तथापि क्षयातिशययुक्तत्वेन। श्रविकस्यापि यागाद्युपायस्य शुक्ल कृष्णत्व- मुपेत्यैकान्तिकात्यन्तिकनिःश्रेयससाधनत्व नाभ्युपगच्छन्ति । 'दृष्टवदानुश्रविक नैकान्तात्यन्ततोभावात्', 'कर्माशुक्ला- कृष्ण योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्' । तेषा रीत्या 'न हिस्यात्', 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' इति वचनयोरुत्सर्गापवादभावेन युक्तियो का कही कही जो निरूपण किया है, वह वेदार्थ को बुद्धिगत करने के लिये किया गया है, वेद का प्रामाण्य सिद्ध करने के लिये नही । ततश्च कुछ बाचार्यों ने हिंसनीय प्राणी के अननुग्राहकत्वविशिष्ट प्राणवियोगानुकूल व्यापार को ही 'हिंसा' कहा है । जैस दुश्चिकित्स्य ब्रणादि के निराकरण के लिये मर्मच्छेदन करने वाले भी चिकित्सक की * प्रशंसा ही की जाती है, उसी तरह पशुयाग से भी पशुओ पर उपकार हो होता है, ऐसा श्रुतियो का कथन है । वेदघातक समाजी, मोह से अथवा द्वेष से मन्त्रभाग के एव भागान्तरस्वरूप ब्राह्मणभाग के जवेदत्व साधने मे ही लगे रहते हैं । मन्त्रो मे भी शाकल्यादिसंहिता चतुष्टय को वेद कह कर ढिढोरा पीटते और महाभाष्यकार के बताये हुए ग्यारहसो अठाईस मन्त्र संहिताओ तथा उनके ब्राह्मणो के वेदत्व का अपलाप करते हैं । उसी से इन समाजियो के मत की दुर्बलता स्पष्ट हो जाती है । नास्तिको का एक कदम उनसे भी अधिक है, वे स्वसम्मत वेदो मे भी अधिकाश भाग को आधुनिक और प्रक्षिस बताते है । इनसे भी बढकर कुछ ऐसे भी हैं, जो वेदो को भाण्ड, धूर्त, निशाचरकर्तृक कहते फिरते हैं । आस्तिक दर्शनों में भी सारूप और योग यद्यपि सम्पूर्ण वेद का ही प्रामाण्य स्वीकार करते हैं । अतएव वे मन्त्र ब्राह्मण-साध्ययज्ञो से स्वर्गादि फल प्राप्ति का होना भी मानते हैं, तथापि वह फल क्षयातिशय से युक्त होने के कारण आनुभविक ( वैदिक ) होते हुए भी उस यागात्मक उपाय मे शुक्लत्व-कृष्णत्व की कल्पना कर उसे नि श्रेयस का ऐकान्तिक तथा आत्यन्तिक साधन नही मानते । 1 इनकी रोति से 'न हिस्यात्' और ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' इन दो वचनों में विरोध का अभ्युपगम न करने के कारण उत्सर्गापवाद 1 }
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२०६० दार्थपारिजातः न बाध्यबाधकभाव, तयोर्विरोधानभ्युपगमात् । न प्रबलमित्येव प्रबलेन दुर्बल बाध्यते, किन्तु सति विरोधे । नात्र विरोधः । 'न हिस्यात्' इति वचन हितायाः पुरुषानर्थंकरत्वं वक्ति न यागानुपकारकत्वमपि । तथैव 'अग्नीषोमीय पशुमालभेती' इति वाक्य पश्वालम्भस्य ( हिंसाया ) यागोपकारकत्व वक्ति न पुरुषार्थानर्थंकरत्वाभावमपि वाक्यभेदप्रसङ्गात् । तथा च हिंसायाः पुरुषानर्थंकरत्वेऽपि यागोपकारकत्वमस्त्येव । तथैव विहितहिसाया यागोपकारकत्वेऽपि निषिद्धत्वात्पुरुषा- नर्थंकरत्वमप्यस्त्येव । यथामतत्र कण्ठे कफ करोति कोष्ठे च कफ हन्ति, तथैव हिंसा यागस्योपकरिष्यति पुरुषस्या- नर्थञ्च करिष्यति । तत एव शुक्लकृष्णं वेदिकं कर्म स्वर्गमपि प्रापयति दुखञ्च जनयति । स हि स्वल्पः संकरः स- प्रत्यवमर्शः कियतापि प्रायश्चित्तेनापाकर्तुं शक्त्यः । तेनैव सुधामहाहदावगाहनकुशलाः पापमात्रोपपादिता दु:खह्न- - कणिका सहन्ते । अश्वमेधशतेन माहेन्द्र पद प्राप्यापि देवाः वृत्ररावणादिभिस्त्रस्ताः संतप्यन्ते । भगवताऽपि 'त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण ' ( श्री० भ० गो० १८ ३) इति तन्मतमनूदितम् । चरकसुश्रुतादिग्रन्थेषु साख्यमतस्यैव प्राधान्यमस्तीति तद्रीत्यैव चरकेण पूर्वकाले पशूनामालम्भो न भवति स्मेत्युच्यते । यदा वेदा नित्यः, वेदे च ' अग्नीषोमीय पशुमालभेत' इति विधानमनाद्येव तदा पूर्वं नासीदालम्भ इत्यस्य तस्मिन् युगविशेषे नरिष्यन्तादि पूर्वं नासीदित्येवार्थ: । तत्पूर्वं तस्मिन्नेव मन्वन्तरे त्रेताकालेऽपि नासीदिति नार्थः, ' वैदिकविधानानामनादित्वात् । कदाचित्तदनुष्ठानेऽपि ततोऽपि पूर्वं तदनुष्ठानस्यानिवार्यत्वात् । न चाहिंसावादिनोऽपि सांख्यादयो वेदनित्यत्वतत्प्रामाण्यवादिनस्तथा वदन्ति वदितु वा शक्नुवन्ति । अत एव - '---अजेन यष्टव्यमिति प्राहुर्देवा द्विजोत्तमान् । सच छागोऽप्यजो ज्ञेयः नान्यः पशुरिति स्थितिः ॥ ' - इति देवाना मतमुक्तम् । ऋषभ ऋचु –' बोजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वे वैदिकी श्रुतिः । अजसंज्ञानि बीजानि छागं नो हन्तुमर्हथ' ॥ नैष धर्मः सता देवा यत्र वध्येत वै पशुः । इद कृतयुगं श्रेष्ठ कथ वध्येत वे पशुः ॥ ' एव महाभारते शान्ति पर्वणि ( ३३७/ ३-५ ) देवानामृषीणाञ्च मतमुद्धृनम् । तन्मूल तु 'तस्मादेष एतेषा पशूना प्रयुक्ततमो यदजस्तेऽजमालभन्त । सोऽजादालब्धादुदक्रामत् । स इमा प्राविशस्तस्मादियं मेध्याभवत्तस्यामन्ववायत् सोऽनुगतो ब्रोहिरभवत्' इति बह्वृचब्राह्मणम् ॥ भाव ( सामान्य विशेष भाव ) से यहाँ बाध्य-बाधक भाव नही होता । प्रबल होने मात्र से ही वह, दुर्बल का बाधक अपितु परस्पर विरोध रहने पर ही वह बाधक बनता है । किन्तु य विरोध तो है नही । क्योंकि 'न हिस्यात्' यह नहीवचनहो सकता, , ' ',, पुरुषानर्थ करत्व को बताता है यागानुपकारकत्व को नही । उसी तरह अग्नीषोमीय पशुमालभेत यह वाक्य पश्वालम्भ हिंसा मे,, ( ) केवल यागोपकारकत्व ही को बताता है न की पुरुषानर्थकरत्वाभाव को भी अन्यथा वाक्यभेद होगा । तथाच हिंसा हिंसा में होने पर भी यागोपकारिका तो है ही । तथैव विहित हिंसा, यागोपकारिका रहने पर भी निषिद्ध होने से पुरुषानर्थकारिणी, पुरुषानर्थकारिणी,, जैसे खट्टा मठा कण्ठ में कफ करता है और कोष्ठ मे कफ का विनाश करता है वैसे ही हिंसा याग पर उपकार भी तो है ही ।,का अनर्थ भी करेगी । उस कारण शुक्ल कृष्ण यह वैदिक कर्म स्वर्गप्राप्ति भी करम्वेगा और दुःख करेगी और पुरुष' ' है । त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः कहकर उनके मत का अनुवाद कर दिया भी पैदा करेगा । भगवान् ने भी चरक - सुश्रुतादि ग्रन्थो में साख्यमत का ही प्राधान्य होने से उन्हीं के अनुसार चरक ने भी 'पूर्वकाल ' ' 'आलम्भ नही होता था कह दिया है । जब कि वेद नित्य है और उसी में अग्नीषोमीयं पशुमालभेत यह विधान में पशुओ का 3 ' ' ',अनादि कहना ही होगा । तब पूर्वकाल मे आलम्भ नही था अर्थात् उस युगविशेष में नरिष्यन्तादि है तो उसे भीहोगा । तत्पूर्व अर्थात् उसी मन्वन्तर में त्रेताकाल में भी नहीं था, यह अर्थ नही होगा क्योंकि वैदिकविधावपूर्वं नासोत्अनादि' यहो उसका अर्थ उस समय उसका अनुष्ठान न होने पर भी उससे पूर्व उसका अनुष्ठान अनिवार्य भी हो सकता है | अहिंसावादी होते है । कदाचित् ।,वेद को नित्यता और प्रमाण्य का उद्घोष करते है अतः वे वैसा न कहते है और न कहने में समर्थ हैं हुए भी साख्यादि
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२०६१ वेदार्थ पारिजात सर्वेषा पशून्ा स मेध्यतारूपो यज्ञ इमा पृथिवी प्रविष्ट । अन्ववायन् अन्वेषितवन्तः । इय श्रुति. पुरोडाशस्तुतिमात्रपरा, न तु पश्नाममेध्यत्व प्रतिपादनपरा । 'नहि निन्दा निन्द्य निन्दितु प्रवर्त्तते, अपि तु विधेयं स्तोतुम्' इति न्यायात् इति देवाना मतम् । ऋषीणा तु मानान्तरा विसवादादहिंसाशास्त्रानुग्रहाच्च । अवान्तरतात्पर्येण तात्पर्य्यमन्तरापि द्वारत. प्रतीयमानोऽर्थो
यथाभूत एव । न तु स स्वार्थोऽप्रमाणम् - विरोधे गुणवाद. स्यादनुवादोऽवधारिते ।
भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधा मत. ॥
'यजमानः प्रस्तर. ' इति प्रस्तरयजमानयोरभेदस्य प्रत्यक्षविरोधात् प्रस्तरस्तुत्यर्थं गुणवादः । 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' इति लोकावगतार्थत्वादनुवाद:' । 'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्' इत्यत्र विरोधानुवादयोरभावात् भूतार्थवादः । ,न चात्रापि क्रत्वर्थेनोलम्भविधिना पुरुषार्थनिषेधस्य विरोधोऽस्ति अतोऽर्थवादोऽप्यय स्वार्थेऽवान्तरतात्पर्यविधया देवताधिकरणन्यायेन प्रमाणमेव, अन्यथा भारतरामायणादीनामपि स्वार्थे प्रामाण्यं विहन्येत । तस्मादजस्थस्य मेवस्य बीजेषु संक्रमाद्वीजान्येवाजसंज्ञानीति ऋषीणामभिप्रायः । वस्तुतस्तु 'छागम्य मेदसो वपाया' इति श्रुत्या छागस्यापि यज्ञ उक्तः । न च छागशब्देन छिन्नगतिकोऽश्वो गृह्यते, ' योगाद्रूढिबलीयसी ' इति न्यायात् । एवं तेषा विवादे सहसायान्तमन्तरिक्षगं वसु दृष्ट्वा ऋषयस्तं निर्णयाय पप्रच्छु । स च धान्यैर्यष्टव्यमित्य-स्माकं पक्षः, पशुना यष्टव्यमिति देवानां पक्ष इति ऋषिवचः श्रुत्वा- 'देवाना तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसश्रयात् । छागेनाजेन यष्टव्यम् J इत्युत्तरमुक्तम् । तच्छ्रुत्वा ऋषयः कुपिताः । अद्यप्रभृति ते राजन्नाकाशगति प्रतिहतास्तु, भूमिं भित्त्वा विवर प्रवेक्ष्यसीति शेपुः । तच्छापाच्च स भूमिविवरगोऽभूत् । देवास्तु सहृष्टमनस उपरिचरवसुं वसोर्धारावरप्रदानेनानुगृहीतवन्तः । अतएव महाभारत के शान्तिपर्व ३३७।३-५ मे देव और ऋषियों का बह्वचब्राह्मण मूलक मत बताया गया है । यह वह्नचब्राह्मणश्रुति-पुरोडाशस्तुतिमात्रपरक है, पशुओ को अमेध्यता प्रतिपादनपरक नही है । 'नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितु प्रवर्तते अपितु विधेयका स्तोतुम्' इस नियम के अनुसार यह देवो का मत है । ऋषियो का मत, अन्य मतो मे अविसंवाद होने से और अहिंसाशास्त्र अनुग्राहक होने से उसका अवान्तर तात्पर्य है, तात्पर्य के द्वारा भी प्रतीयमान अर्थ यथाभूत ही है । और वह अर्थ अप्रमाण भी नही है |
अर्थवाद तीन प्रकार का होता है-- "विरोधे गुणवाद स्यात् अनुवादोऽवधारिते ।
भूतार्थवादस्तद्धानात् अर्थवादस्त्रिधा मत ॥
'यजमान प्रस्तर " यहाँ पर प्रस्तर और यजमान दोनो को अभिन्न समझना तो प्रत्यक्ष के विरुद्ध है,1 इस कारण उक्त वाक्य को प्रस्तर को स्तुति के लिये गुणवाद रूप अर्थवाद माना जाता है । उसी तरह 'अग्निहिमस्य भेषजम् ' यहाँ पर समस्त लोगो' यहाँके अवगत अर्थ को ही बताया गया है, अतः उक्तवाक्य को अनुवादरूप अर्थवाद माना जाता है । तथा 'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्के साथ पर विरोध या अनुवाद दोनो ही नही है, अत इस वाक्य को भूतार्थवादरूप अर्थवाद कहा जाता है । क्रत्वर्थ आलम्भविधि न्याय से पुरुषार्थ निषेष का कोई विरोध नही है । अत: यह अर्थवाद होता हुबा भी स्वार्थ में अवान्तर तात्पर्यविषया देवताधिकरण सक्रम हो प्रमाण ही है । अन्यथा भारत- रामायणादि ग्रंथो का भी स्वार्थ में प्रामाण्य नष्ट होने लगेगा । तस्मात् अजस्थ मेघ का बीजो में जाने से बीजो को ही 'अज ' यह संज्ञा दी गई । यह ऋषियों का अभिप्राय है । वस्तुतस्तु 'छागस्यमेदसो वपाया' इस' यहश्रुतिनियमने प्रत्यक्षहै ।, 'छाग का भी यज्ञ बताया है । छाग शब्द से छिन्नगतिवाले अश्व का ग्रहण नही किया जाता क्योकि योगाद् रूढिर्बलीयसी । देव और ऋषियो के विवाद चलते समय अकस्मात् उपस्थित होने वाले वसु को देखकर ऋषयो ने उसे निर्णय करने के लिये कहा ऋषियो ने अपना ' वात्यैर्यष्टव्यम्' पक्ष बताया और देवताओं ने 'पशुना यष्टव्यम्' अपना पक्ष बताया । दोनों पक्षोंदियाको । सुनकरउनके शापवसु नेसे ( ) देवताओ के पक्ष छागेन यष्टव्यम् का समर्थन किया । उसे सुनकर ऋषिगण क्रुद्ध हुए और उस वसु को शाप का वर देकरउसकी आकाशगति प्रतिहत हुई और वह भूमिविवर में प्रविष्ट हुआ । देवताओ ने प्रसन्न होकर उस वसु को वसोर्धारा
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२०६२ वेदार्थपारिजातः , तत्तपस्तुष्टस्य विष्णोरनुग्रहाच्च स पुनरुपरिचरो भूत्वा ब्रह्मलोक जगाम । नानयापि कथया समाजिमतपुष्टिः किन्तु तन्मतबाध एव । समाजिभिश्चेतनाना मनुष्यभिन्नाना देवानामनभ्युपगमात् । देवतोद्देश्येन द्रव्यत्याग एव याग । यदि देवाः पशुयागमनुमन्यन्ते तदा सुतरामनया कथयापि पशुयागः समथ्यते । अत एव देवाना मतमाज्ञाय वसुना पशुयागपक्षः समर्थितः । साख्ययोगानुसारिणामृषीणा शापेऽपि देवाना देवदेवस्य विष्णोश्व प्रसादेन वसुधाराप्राप्तिरन्ते च तस्य ब्रह्म- लोकप्राप्तिर्जाता । पूर्वोक्तमीमासाऽपि मीमास्यैव, विधिविरोधेऽथंवादस्य स्वार्थे प्रामाण्यायोगात् । यथा प्रत्यक्षविरोधेन यजमानः प्रस्तर इत्यर्थवादवाक्यस्य न प्रस्तरयजमानयोरभेदे प्रामाण्यम्, तथैव ' अग्नीषोमीय पशुमालभेत ' इतिप्रत्यक्ष-, पश्वालम्भविधायक वाक्यविरोधान्न मेघोत्क्रमणार्थवादस्य पशूनाममेध्यत्वबोधने प्रामाण्यम् किन्तु पुरोडाशस्तुनावेव तात्पर्यम्, 'नहि निन्दा निन्द्य निन्दितु प्रवर्त्तते' इति न्यायात् । साख्यरीत्या पुरुषार्थक्रत्वर्थभेदेनाविरोधेऽपि नाग्नीषोमीयं पश्वालम्भनस्य यागानुपकारकत्वं सिद्धयति, प्रत्यक्षविधिदर्शनात् । न हिस्यादित्यनेन हिंसायाः पुरुषानर्थंकरत्वबोधनेऽपि ' ' अहिसाया यागानुपकारकत्वानवबोधनात् । अस्मिन्नाख्याने कृते कथ पशुवध इत्युक्त्यापि कृते तदनभिमतत्वेऽपि प्राचीनेषु भाविषु च त्रेतादियुगेषु तदनुमतत्वात् । किञ्च, महाभारते शान्तिपर्वणि ११५ - ११६ अध्याययो. यज्ञश्राद्धादिसम्बन्धे पशुविचारो दृश्यते ।
तथाहि - युधिष्ठिरस्य प्रश्नः- अहिंसा परमो धर्म इत्युक्त बहुशस्त्वया ।
श्राद्धेषु च भवानाह पितृनामिषकाङ्क्षिणः ॥
मासैर्बहुविधैः प्रोक्तस्त्वया श्राद्धविधिस्तथा ।
अहत्वा च कुतो मांसमेवमेतद्विरुध्यते ॥
इत्यादिप्रश्नानामुत्तरप्रसङ्ग अहिंसाया माहात्म्यातिशय उक्तः । अनुगृहीत किया । उसके तप से सन्तुष्ट हुए विष्णु के अनुग्रह से वह पुन उपरिचर होकर ब्रह्मलोक लेकर भी समाजियो के मत की पुष्टि नही हो पा रही है, अपितु उनके मत का बाध ही हो रहा मे गया । किन्तु इस कथा का सहारा है । क्योकि मनुष्यो के अतिरिक्त चेतन देवताओ को तो समाजी मानते ही नही । देवता के उद्देश्य से द्रव्य के त्याग को ही याग कहते है । यदि देव, पशुयाग को मानते का ही सुतरा समर्थन हो रहा है । अतएव देवो के मत को अच्छी तरह जानकर वसु ने पशुयाग केहैपक्ष, तो उक्त कथा से भी पशुयाग - साख्य योगानुसारी ऋषियों का शाप रहने पर भी देवो तथा देवदेव विष्णु के प्रसाद से का समर्थन किया ।, अन्त में ब्रह्मलोक की भी प्राप्ति हो गई । पूर्वोक्त मीमासा भी मीमांसा करने योग्य हीहै वसु को वसुधारा की प्राप्ति और वाक्य का स्वार्थ में प्रामाण्य नही माना जाता । जैसे प्रत्यक्ष के साथ विरोध रहने के कारण विधि के साथ विरोध रहने पर अर्थवाद 'यजमान प्रस्तर ' इस अर्थवाद वाक्य को प्रस्तर और यजमान दोनों के अभेद में प्रमाण नही माना जाता, वैसे ही 'अग्नीषोमीयं वाक्य के साथ विरोध रहने से मेवात्क्रमणरूप अर्थवाद वाक्य का पशुओ के अमेष्यत्व बोधनपशुमालभेत इस प्रत्यक्ष पश्वालम्भविधायक हो उसका तात्पर्य है, क्योंकि ' नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितु प्रवर्तते निन्दा' यह न्याय है । साख्य में प्रामाण्य न होकर पुरोडाश की स्तुति मे ,न रहने पर भी अग्नीषोमीय पश्वालम्भन याग का अनुपकारक सिद्ध नही होता है । क्योंकि की दृष्टि से पुरुषार्थ क्रत्वर्थ भेद से विरोध ' 'वाक्य से हिंसा का पुरुषानर्थंकरत्व बोषित होने पर भी उसका यागानुपकारकत्व का बोधन नहीप्रत्यक्षविधिकिया जादिखाईरहा हैपड़। उक्तरहा हैआख्यान। न हिंस्यात् उसके पूर्व और आगे त्रेतादि युगों' मेंउसकाकथं प्रपधःअनुमतइसरहनाउक्तिसंभवसे भीहै ।यह व्यक्त हो रहा है कि कृतयुग में उसके अनभिमत रहने पर भी में कृते 1
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वेदार्थपारिजातः २०६३ रूपमव्यङ्गतामायुर्बुद्धि सत्त्वं बलं स्मृतिम् । प्राप्तुकामैर्नरैहिसा वर्जिता वै महात्मभिः ॥ यो यजेताश्वमेधेन मासि मासि यतव्रतः । ( } वर्जयेत् मधुमासञ्च सममेतत् युधिष्ठिर । ११५1१-३-८-१०
न भक्षयति यो मास न च हन्यान्न घातयेत् ।
तन्मित्रं सर्वभूताना मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
इत्यादि मासभक्षणे बहून् दोषानभक्षणे च बहून् गुणानुक्त्वा भीष्म विहितमासभक्षण विहितवध च समर्थितवान् | ' हविर्यत्सस्कृत मन्त्रे प्रोक्षिताभ्युक्षित शुचि । वेदोक्तेन प्रमाणेन पितॄणां प्रक्रियासु च ॥ अतोऽन्यथा वृथा मासमभक्ष्य मनुरब्रवीत् ॥ ( ५११५२ ) । ' प्रजाना हितकामेन त्वगस्त्येन महात्मना । आरण्या सर्वदैवत्याः प्रोक्षितास्तपसा मृगाः || ५९॥ क्रिया ह्येव न हीयन्ते पितृदैवतसश्रिता । प्रीयन्ते पितरश्चैव न्यायतो मासतर्पिताः ॥ ६० ॥ विधिना वेद- दृष्टेन तदद्भुक्त्वेह न दुष्यति । यज्ञार्थं पशवः सृष्टा इत्यपि श्रूयते श्रुति. ॥ १४ ॥ आरण्या सर्वदैवत्या सर्वश. प्रोक्षिता
मृगा | अगस्त्येन पुरा राजन् मृगया येन पूज्यते ( १ | १ | ६| ६ ) । समता उपसगम्य भूत हन्यति हन्ति वा । अतो राजर्षय सर्वे मृगया यान्ति भारत । नहि लिम्पन्ति पापेन न चैतत्पातक विदु. ॥ यद्यपि य इमे ब्राह्मणा प्रोक्ता मन्त्रा वै प्रोक्षणे गवाम् । एते प्रमाणं भवत उताहो नेति वासव || नहुषो नेति तानाह तमसा मूढचेतन ।' ( म० भा० उद्योगप० १७| १ ) 'देवाश्च याभिर्यजते ददाति च' ( अथर्ववे ० स ० ४।२१।३ ), 'गावः सोमस्य प्रथमस्य भक्ष:' ( अ ० वे ० सं० ४।२१।४ ) एभि प्रमाणैर्गवामपि प्रोक्षणमुक्तम्, तथाप्यनिष्टपरिणामात्तद्दानमेवानुमतम् । 'उपाकृताना ( हताना ) गवा गौरवात् असात्म्यात् उपाहताग्नानां उपाहतमनसा अतीसारः पूर्वमुत्पन्नः पृषध्नयज्ञे । ' ( चरकचिकित्सास्थान १ ९ / ३ ) 'उत्सृजेद् वा एना ब्राह्मणाय वा दद्यात् दत्ता त्वेव श्रेयसे भवति' (बोधायनीय- ),, पितृमेधसूत्र १1१०/२ । तस्माद्गवा क्षीरादिकमेव यागादौ प्रयोज्यम्प्रयोज्यम् तदेव क्वचिन्मासादिशब्देनापि बोद्धयते । ' (. ) एतद्वा उस्वादीयो यत् अधिगवं क्षीर वा मासं तदेव अतिथे पूर्वं नाश्नीयात् । आतिथ्यादावन्यमासो- पयोगेऽपि गवा मास निषिद्धमेव, अघ्न्यत्वोक्ते । य एवं विद्वान् अतिथये मासमुपसिच्य उपहरति ( अथर्ववे ० सं ० ९ ६ ४३ ) 'अपूपवान् मासवान् चरुदेह सीदति' ( अ० वे० सं ० १८/४/२० ), ' यं ते मन्ययमोदनं यत्मांस निध्वामि ते' ( अ० वे० स ० १८|४| ४२ ) । 'यत्ते मज्जा यदस्थि यन्मास यच्च लोहितं आभिक्षा दुस्कता दात्रे क्षीरसर्पिरथा ' ( / / ) ' ' ( ) | ' मधु अ ० वे० सं० १० ९ ८ । मांसमेकः पिशातिसूत्रपा । ऋ० स० १११६१।१० ये चावतो मासभिक्षा- मुपासते । ऋ० स ० १।१६१।२ ), ' यन्नोक्षण मास्यचन्या उखाया:' ( ऋ० स० १० १६२ १३, 'अतिथिग्वः' ( अ० स ० २०/२११८ ) देवाश्च याभिर्यजते' ( ऋ० स० ८२८/३ ) अत्र ' अर्शआदिभ्योऽच्' ( पा० सू० ५।२१।१२७ ) इति सूत्रेण किञ्च, महाभारत में यज्ञ, श्राद्ध आदि के सम्बन्ध में पशु विचार किया गया दिखाई देता है । युधिष्ठिर धर्मराज के प्रश्न करने पर उत्तर देते हुए अहिंसा के माहात्म्य का अतिशय बताया है । इस प्रकार भीष्मपितामह ने मास भक्षण में अनेक दोष तथा अभक्षण में अनेक गुणों को बताकर विहित मास भक्षण और विहित पशुवध का समर्थन किया है । अथर्ववेदसहिता आदि के प्रमाणो से ओंका भी प्रोक्षण कहा गया है, और उनका दान कर देना ही माना गया है, अन्यथा अनिष्ट परिणाम होगा । इसी कारण गौत्रो के क्षीर आदि का ही याग में प्रयोग किया गया है, उसी को कही कही मासादि शब्द से भी बोधन किया गया है । आतिथ्य आदि के लिये अन्य मास का उपयोग रहने पर भी गोमास का तो निषेध ही किया है, क्योकि गौ को 1 अन्या कहा गया है । किन्तु आर्य समाजी युधिष्ठिर न ब्राह्मणग्रंथो को प्रमाण मानते हैं और न ही अपनी चार पुस्तकों वाली सहिता Jके अतरिक्त सहिताओं को उनके मन्त्री का प्रमाण मानते हैं । इस कारण कहना पड़ रहा है कि सवमुव हो उसने जैमिनि को मोमासा को अपनी नास्तिकता से भर दिया है ।
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२०६४ वेदार्थपारिजात अच्प्रत्ययविधानात्: मांसम् अस्ति अनेन इति मासमिति व्युत्पत्त्या शरीरे येन मासमुत्पद्यते तन्मांसपदेनोच्यते ॥ नामलमिति पद तात्पर्याय भूतम् । मांसं लातीति तदर्थं । तथैतेन सारभागो मांसमुच्यते । खर्जूराम्रादिसारोऽपि मांस ।' कुमारिकामासमपि तत्सार उच्यते । 'गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ( ऋ० स० ९ ४६१४ ) इति निरुक्तोद्धृतमन्त्रे गोदुग्धमपि गोप- देनोच्यते 1। ' गोभि श्रीणन्त ' ( ऋ० सं०८/ २/ ३ ) इति मन्त्रे 'गोभि. गवि भवेः क्षीरादिभिः श्रपणद्रव्ये श्रीणन्त मिश्री- कुर्वन्तः' इति सायणोक्ते । ' अथाप्यस्यातद्धितेन कृत्स्नविन्निगमा भवन्ति' ( ति० रु० २/५/४ ) इति रीत्या मूलशब्दस्तद्धितप्रत्ययान्ता- र्थंको भवति । तद्रोत्या वृक्षशब्दो वृक्षनिर्मिते धनुषि गौशब्दो गोभवे क्षीरे प्रयुज्यते । ' गोय' ( ऋ० स० १०।१७।२२ ) इत्यत्र गोचर्मनिर्मिताया ज्यायामपि गोशब्दः प्रयुज्यते । 'अंशुं दुहन्तो अध्यास्ते गवि' (ऋ० स० १० / ९ ४ / ९) इत्यत्र गोचर्मनिर्मित पात्रं गोशब्दार्थः । 'गोभिः सन्नद्धो असि ’ (ऋ ० सं ० ६।४७।२६ ) गोश्लेष्मा गोपदार्थ: । 'गोभि सन्नद्धा' ( यजुः ) इत्यत्र गोस्नावा गोपदार्थ: । ' वृक्षे नियता गौ: (अ० वे ० सं ० १०।२७।२२ ) । अत्र गोचरज्जुः गोपदार्थः । तेन गोशब्दस्य दुग्धार्थंकत्वे गोमासपदस्य गोदुग्धसार एवार्थो भवितुमर्हति । 'मांस मासेन रोहतु' ( | | ) अथर्ववे ० स ० ४ १२ ४ इत्यत्र कस्यचिदौषधस्य सारेण मासवृद्धिरुक्ता । कदलीफले वल्कलं त्वगुच्यते । तदन्तस्थः सारभागो मासशब्देन बोध्यते । गोशब्देन गोधूमोऽपि गृह्यते । गोधूमशब्दात् धूम इत्यस्य विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदलोपो वक्तव्य ' (पा० सू० ५।३।८३ ) इति वार्त्तिकेन लोपे गोशब्द एवावशिष्यते, तथा च गोमांसपदस्य गोधूम- चूर्णोऽर्थः । 'गावः तण्डुला:' ( अथर्ववे० स० ११।३।५ ), ' अन्नं हि गो:' ( शत ० ब्रा० ४।३।१।२५ ) इत्यादी गोपदस्य तण्डुला अन्नच अर्थो भवति । गोशब्दस्यानेकार्थत्वेन गोशब्दस्य पशुसामान्यमर्थः । तत एव ऋग्वेदसंहितायाम् ( १२४| ११ ) इत्यत्र गवामश्वाना-मिति सायणभाष्यं दृश्यते । गवाम् -अघ्न्या इति नाम प्रसिद्धं तेन सर्वथा तद्वधो निषिद्ध । तथा च मन्त्रवर्णः 'मा गामना-गामदितिं वधिष्ठ' | 'अत्या इति गवां नाम के एता हन्तुमर्हति । . ( ) महच्चकाराकुशलं वृष गां वा लभेत्तु य ॥ म० शा० २६२/४७ । मी मास कम्मन्यः समाजी युधिष्ठिरस्तु न ब्राह्मणाना न वा संहिताचतुष्टयेत रसंहितामन्त्राणाञ्च प्रामाण्यं मन्यते । तेन सत्यमेव तेन मीमांसा लोकायतीकृता । यत्तु — 'शाखाब्राह्मणश्रोतसूत्रपूर्वमीमासायुक्तिविरुद्धवेदादिप्रमाणविरुद्ध मन्त्रार्थविपरीतमन्त्रार्थाननुसारि विनि-योगानां दयानन्दः स्वामी प्रामाण्यं न मन्यते' इति, तत्तु समाजिनां नग्नचित्रप्रदर्शनमेव ॥ स्वच्छन्दचारिणस्तस्य तदभिमतकतिचिन्मन्त्रसमूहातिरिक मन्त्रब्राह्मणात्मकस्य वेदस्य वदङ्गाना कल्पसूत्र मीमांसानां प्रामाण्यानभ्युपगमस्यैव वेदनिन्दकत्वेन नास्तिक्यात् । अश्वमेधीयाश्वमेधराजमहिषीसम्बन्धाश्लीलभाषणादिसम्बद्धदुस्तर्कस्य तु पूर्वमेव निरा-करणं जातमेव । यह जो कहा है कि 'शाखा ब्राह्मण, श्रौतसूत्र, पूर्वमीमांसायुक्तिविरुद्ध, तथा वेदादिप्रमाणविरुद्ध मन्त्रार्थं विपरीत, मन्त्रार्थाननुसारी, किये जाने वाले विनियोगो का प्रामाण्य स्वामी दयानन्द नही मानते है' । वह तो समाजियो का नग्नचित्र है । स्वच्छन्दचारी समाजियों के अभिमत कतिपय मन्त्रसमूह के अतिरिक्त मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद और उनके अगभूत कल्पसूत्र, मीमासा आदि 1
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वेदार्थपारिजात. २०६५ तथा च शास्त्रान्तरेऽपियोगशास्त्रे हठयोगप्रदीपिकायाम्- गोमास भक्षयेन्नित्य पिबेदमरवारुणीम् । ( हठयोगप्र० ३| ४७ )
न यथाश्रुतार्थी गृह्यते, किन्तु - गोशब्देनोदिताजिह्वा यत्प्रवेशो हि तालुनि ।
गोमासभक्षण प्रोक्त महापातकनाशनम् ॥
जिह्वाप्रवेशसञ्जातः सुषुम्णासोमसभवः । 1 चन्द्रात् स्रवति यः सारः सैवेहामरवारुणी ॥ ( हठयोगप्रदीपका ३।४८-४९ ) प्रस्थं कुमारिकामांसमित्यस्यापि न यथाश्रुतार्थग्रहणम्, किन्तु मासशब्देनौषधविशेषस्य सार एव गृह्यते । ' कण्टकारिद्वय छित्वा मधुना भक्षयेन्निशि । ' इत्यत्र कण्टकारिपदेन औषधविशेष. कण्टकारिपदार्थो न चर्मपादत्राणम् । यत्तु - -' कर्हिस्वित् सा त इन्द्र चेत्यासद् अधस्य यद् भिनदो रक्ष एषत् । मित्रक्रुवो यच्छसने न गाव पृथिव्या आपूग् अमुया शयन्ते || ' ( ऋ० स० १० ८९ / १४ ) । 1 हे इन्द्र | यद् अस्त्र बाण वा प्रक्षिप्य त्वया पापानि रक्षासि छिन्नानि तदत्रं प्रक्षेप्तुं योग्यम् । यथा गवा वधस्थाने गावो भिद्यन्ते तथैव त्वदीयेनास्त्रेण मित्रद्विषो राक्षसादय. पतित्वा मृत्वा शेरते इतिवेदे गोवधशाला वर्णनमिति, तदपि तुच्छम्, 'इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योते अदिते सरस्वति महिविश्रुति एता ते अघ्न्ने नामानि' ( वा० स० ८ ४ ) इत्यत्र गवामघ्न्येति मुख्यनामश्रवणविरोधात् । वैदिकनिघण्टुग्रन्थेऽपि 'गोनामानि' इति प्रकृत्य 'अघ्न्या उस्रा उस्त्रिया मही अही अदिति:' (निघ० २1४ ) इति नामान्युक्तानि । ' गवां यः पतिरघ्न्य ' ( अथर्ववे० स० ९१४| १७ ) इति वृषभस्यापि अन्य इति नामोक्तमतो नासो हन्तुं योग्य: । ' अघ्न्यो भवति' ( नि० ११ । ४३ । २) इति निरुक्तेऽपि तथैवाभ्युपगमात् । सर्वत्र वेदे गवामघ्न्यापदेन व्यवहारः । तद्यथा-' अघ्न्या भरति क्षीरम्' ( ऋ० स० १० ८७ १६ ) ( वा० स० १1१ ) सामसंहिता उत्तराचि ( ३।१५ ३ ) ( अथर्व वे ० स ० १ ९ ।१६।२ ) तथा च तत्र वेदे - गवा हननस्य गोवधशालायाश्च दशयितुमशक्यत्वात् । अनेकार्थंकाना शब्दानामर्थनिर्णायकेषु -' ',संयोगादिषु औचितीपदार्थोऽपि भवति । यथा गौरेका तु मनस्विनः नात्र मनस्विपुरुषस्यैकैव गोर्भवतीत्यर्थः मनस्विन एकैव वाग्भवति, 'रामो द्विर्नाभिभाषते' इतिवत् । मृगशब्दस्य हरिणोऽर्थः प्रसिद्धस्तथापि पशवोऽपि मृगा । ( अमरको० ३।३।२० ) इति रीत्या पशुसामान्यमपि मृगपदार्थः । अत एव ' मनुष्यरूपेण मृगाश्वरन्ति' ( नीतिशतक ) इति प्रयोगः । तैल- शब्दस्य तिलस्नेहोऽर्थस्तथापि सार्षपेऽपि तैलशब्दः प्रयुज्यते । गोष्ठशब्दस्य गोस्थानवाचकत्वेऽपि 'गोष्ठजादय: स्थानादिषु पशुनामभ्य:' ( पा ० सू ० ५/ २/ २ ९ ) इति कात्यायनवार्त्तिकरीत्या सर्वपशूना स्थानस्य बोधकत्वं दृश्यते । तथैव गोशब्द: को प्रमाण न मानना ही नास्तिकता है और वेदनिन्दकता है । अश्वमेधीय अश्व राजमहिषी सम्बन्ध, अश्लीलभाषणादि से सम्बद्ध दुस्तर्क का निराकरण पहले ही किया जा चुका है । तथाच अन्यान्य शास्त्रो में भी जैसे योगशास्त्र की हठयोगप्रदीपिका में ऐसे शब्दो का प्रयोग है, जिनका यथाश्रुत अर्य नहीं लिया जाता । जैसे 'कण्टकारि' शब्द का यथाश्रुत अर्थ, आयुर्वेद मे नही लिया जाता । यह जो कहा कि 'ऋ० सं० २०८९ १४ मे गोवधशाला का वर्णन किया गया है ।' वह भी नि सार है । क्योकि वाज ० सं ० ८४ में गौ का 'अध्न्या' यह मुख्य नाम बताया गया है । वैदिक निघण्टु ग्रन्थ मे भी गौ के नाम परिगणन में अन्या आदि अनेक नामो की गणना की गई है । अथर्ववेद मे वृषभ को भी 'अन्य कहा है । निरुक्तकार ने भी वैसे ही कहा है । वेद में सर्वत्र तथाच वेद में गौ का हनन और गो वधशाला का वर्णन कही भी नही है । अनेकार्थक शब्दो के अर्थ निर्णायक संयोगादि में एक 'औचिती' पदार्थ को भी बताया गया है । जैसे 'गोरेका तु मनस्विनः' का’ अर्थ यह मनस्वी पुरुष को एक ही गाय होती है, नहीं किया जाता । किन्तु अर्थनिर्णायक औचिति पदार्थ के बल पर गोपद का अर्थ 'वक् किया जाता है, और उक्त वाक्य का अर्थ - रामौ द्विर्नाभिभाषते, के समान मनस्वी पुरुषकी एक ही वाक् होती है— किया जाता है । मृग २५९
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२०६६ वेदार्थपारिजात | प्रमिद्धगोवाचकोऽपि पशुसामान्यबोधको भवति । स्वर्गेषु पशु वाग्वज्र दिड्नेत्रघृणिभूजले लक्ष्मदृष्ट्या स्त्रिया पुमि गौ ' ( अमर० ३।३।२५ ) इति कोष'त् । 'गौर्वाहीक ' अत्रापि गोशब्द पशुबोधकः । अत एव ( ऋ० सं० १1११/५ ) इत्यत्र गोमत इत्यस्य गृहीतपगोरिति वेङ्कटमाधवभाष्यम् । 'अथापि गौरिति पशुनाम भवति एस्मादेव' ( नि० २५/३ ) इति यास्काचार्य: । ( ऋ० सं० १० १४६ । ३ ) इति मन्त्रे गाव इत्यस्य गवयाद्या मृगा इति व्याख्यान सायणभाष्ये । महाभारत वनपर्वणि रन्तिदेवकथाप्रसङ्गे– - 'अहन्यहनि वध्येते द्वे सहस्रे गत्वां तदा' २०८ /९ । इत्यत्र गोशब्दप्रयोग. । द्रोण पर्वणि तस्यामेव कथायाम्- उपस्थिताश्च पशव स्वयं य शंसितव्रतम् ||। ( ) बहव स्वर्गमिच्छन्तः विधिवत्सत्रयाजिनम् ६७।४ | अत्र गोस्थाने पशव उक्तास्तेन पूर्वत्रापि गोपदेन पशव एवोक्ता न गाव । गोपशु शब्दयो पर्यायत्वश्च सिद्धयति । अत एव गोयुगच्प्रत्ययेन उष्ट्रगोयुग गोगोयुगमित्यादिप्रयोगाश्च भवन्ति । अन्यथा उष्ट्रगोयुगमित्यन्तगोपद- प्रयोगस्य को वा अर्थ. स्यात्? गोशब्देन साकं गोयुगप्रयोगवैयर्थ्यश्च । तथैव ' अश्वषड्गवम्' ( पा० सू० ५/ २/ २९ ) आदि- पाणिनिप्रयोगात् । हितोपदेशे च - ' अनेकगोमानुषाणा वधाद् मे पुत्रा मृता ' इति कथापि गोशब्दस्य पशुसामान्यवाचकत्वं सिद्धयति, 'पशूनामेव मनुष्य प्रतिद्वन्द्वित्वोपपत्तेः 1। अन्यथैकस्य विशेषवाचकत्वमपरस्य सामान्यवाचकत्व न स्यात्, 'गो- ब्राह्मणवधात् । इतिवदुभयोः विशेषवाचकत्वेन गोपदेन गवामेव बोधात् । तस्मादुक्तमन्त्रे गोशब्दस्य पशुसामान्यवाचकत्व- मेव, गवा वेदेषु अन्यापदवाच्यत्वेन हननासभवात् । अत एव सायणाचार्येण ' शसने विशसनस्थाने गावो न पशव इव' इति व्याख्यातम् । गोशब्दस्य पशुसामान्यार्थ- त्यागेन गोविशेषार्थग्रहणे उपमेये विशेषत्वानुपपत्तेः । न चोपमानेन विधिः सिद्धयति । अन्यथा न 'जार कन्या । ' ( ऋ० शब्द का प्रसिद्ध अर्थ 'हरिण' है, तथापि सर्वसाधारण पशुओ के लिये भी ' मृग' कहा जाता है । अतएव ' मनुष्यरूपेण मृगाचरन्ति' कहा गया है । 'तैल' शब्द का अर्थ, तिलस्नेह है, तथापि सार्षप में भी तेल शब्द का प्रयोग किया जाता है । 'गोष्ठ' शब्द, गो स्थान का वाचक है, तथापि कात्यायनवार्तिक के अनुसार वह सम्पूर्ण पशुओं के स्थान का बोधक है । उसी तरह 'गो' शब्द, प्रसिद्ध गो वाचक होता हुआ भी पशु सामान्य का भी बोधक होता है ।' गोर्वाहोक:' में भी गो शब्द, पशु बोधक है । अतएव ऋ० सं० १।११।५ के मन्त्रो में 'गोमतः ' का अर्थ 'गृहीतपशो: ' वेङ्कट माधव भाष्य मे किया है । इसी प्रकार निरुक्त ( २/५/३ ), ऋ० सं ० ( १० | १४६ । ३ ), का सायणभाष्य, महाभारत के वनपर्व में रन्तिदेव की कथा के प्रसंग में गो शब्दका प्रयोग, पशु सामान्य के अर्थ मे ही किया गया है । इन सबसे गो और पशु शब्दो का पर्यायत्व सिद्ध होता है । अतएव ' द्वित्वे गोयुगच्' वार्तिक के अनुसार 'गोयुगच्' प्रत्यय लगाकर छबुष्ट्रो ——उष्ट्रगोयुगम्, गोगोयुगम् इत्यादि प्रयोग हुआ करते हैं ॥ अन्यथाउष्ट्रगोयुगम् में ' गो' पदप्रयोग का क्या अर्थ होगा? गो गोयुगम् मे गो शब्द के साथ गोयुग का प्रयोग व्यर्थ ही होगा । उसी तरह ' अश्वषड्गवम्' में 'षट्त्वे षड्गवच्' वार्तिक से षड्गवच् प्रत्यय लगाने से गो शब्द का पशुसामान्य अर्थ स्पष्ट हो जाता है । हितोपदेश मे भी ' अनेक गोमानुषाणा वषान्मे युत्रा मृता:' इस कथा से गो शब्द की पशुसामान्य वाचकता स्पष्ट हो जाती है । क्योकि पशुओ मे ही मनुष्य की प्रतिद्वन्द्विना उपपन्न होती है । अन्यथा एक की विशेषवाचकता और दूसरे की सामान्यवाचकता नही बन सकेगी । क्योकि दोनो के विशेष वाचक होने से गो पद से गाय का हो बोध होगा । तस्मात् उक्तमन्त्र मे गो शब्द की पशुसामान्य वाचकता ही है, गाय को तो वेदो में अहन्या पद से बताया गया है, अतः उसका हननतो सभव ही नही है । " ' अतएव सायणाचार्य ने शखने विशखने स्थानेगावोस्थानेगावो पशव इव ऐसी व्याख्या की है । गोशब्द का पशुसामान्य अर्थ त्यागकर गोविशेष अर्थ का यदि ग्रहण किया जाय तो उपमेय में बिशेषता उपपन्न नही हो 7 | ' ' ( / / ) पायगो । उपमान से विधिसिद्ध नही होता अन्यथा जारं न कन्या ऋ० स० ९ ५६ ५ इत्यादि उपमानो के बलपर स्त्रियों के जार सम्बन्ध को भी वेद सम्मत कहनाहोगा । वस्तुतः उक्त मन्त्र मे युद्धवर्णन ही है, अतः 'शसने शत्रुपक्षीय युद्धस्थले' इसी प्रकार व्याख्या की है । तथाच जैसे मृगया स्थल में वाणों से पशु सो जाते हैं, वैसेही युद्धस्थल में
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वेदार्थपारिजात २०६७ सं० ९/ ५६।५ ) इत्यादिभिरुपमानै स्त्रीणा जारसम्बन्धस्य वेदसम्मतत्वापत्ते । वस्तुतस्तु मन्त्रे युद्धवर्णनमेव । अत. शसने शत्रुपक्षीययुद्धस्थले इत्येव व्याख्यातम् । तथा च यथा शसने मृगयास्थले बाणे पशव शेरते, तथैव शसने युद्धस्थले त्वया हता शत्रवः शेरते ।
अतो राजर्षयः सर्वे मृगया यान्ति भारत ।
नहि लिप्यन्ति पापेन न चैतत्पातक विदुः ॥
(म० भा० अनु० ११६१८१ ९) नात्र यथा गोवधस्थाने गावों हन्यन्ते इत्यर्थः, किन्तु मृगयास्थले यथा मृगाद्या पशवो हताः शेरते तथा त्वया युद्धस्थले हता शत्रवः शेरते इत्येवार्थ: । 'अनागा वै भीमा ' ( अथर्ववे ० सं ० १० | १ | २९ ) इति निरपराधहत्यायाः भयङ्करत्वोक्तः । यथा श्रोकृष्णेन वृषासुरधेनुकासुरादयः श्रोरारामेण च मारीचाद्या मृगा हतास्तद्वत्तदुपपत्तेः । मृगयास्थलेऽपि प्रायेण वृकव्याघ्रा- दय एव हन्यन्ते । ' हम क्षत्रिय मृगया वन करही । तुम जस खल मृग खोजत फिरही । ' इति रामचरितमानसे गोस्वामि- तुलसीदासोके । तस्मादत्र मन्त्रे गाव इति पदेन वृकव्याघ्रादयः पशव एव विवक्षिताः । वेदेषु गावो यथा अघ्न्या अहन्तव्या उच्यते, तथैवादिति: ( वा० स० ८।४३ ) अखण्डनीया अपि उच्यन्ते । 'गावो गोष्ठे असदन्' (ऋ ० स० १ १ ९ ११४ ) गावो गोशालाया तिष्ठन्तीत्येवं वेदे दृश्यते । यदि प्रतिपक्षसम्मतोऽप्यर्थोऽभ्युपगम्येत, तदापि तादृशी गोवधशालाऽपि राक्षसानामेव स्यात् । तथात्र यथा राक्षसाना गोवधशालासु राक्षसैर्हता गावः शेरते तथा हे इन्द्र युद्धस्थले त्वया हृता राक्षसाः शेरते इत्यर्थेऽपि न क्षतिः । तावताऽपि गोघातो राक्षसानामेव कार्यं न मनुष्याणामित्येव सिद्धयति । गोघातकाना तु वध एव युज्यत इति । 'यो नो गा हसित त्वा सीसेन विध्यामः' ( अथर्ववेदस० १।१६।४ ) इति मन्त्रोक्तः । इति सनातनधर्मालोके । तत एव 'औक्षेण वा आर्षभेण वा' ( बृ० उ० ६| ४ | १८ ) इत्यत्रापि न वृषभमासविधानमस्ति, वृषभस्याप्यघ्न्त्या- ----- विशेषात् । औक्षेण आर्षभेणेति पुनरुक्तिदोषापाताच्च ॥ यत्तु — औक्षेण लघुबृहद्भेदेन तद्भेद इति तदप्यसंगतम्, तथात्वे मांसभेदानुपपत्तेः । देहि मे वाजिनं राजन् गजेन्द्र वा मदालसमितिवद्दुष्क्रमदोषापत्तेश्च । आर्षभेण तदभावे औक्षण इति क्रमस्य वक्तव्यत्वापाताच्च । तत्रैव १४ कण्डिकाया क्षीरोदनं पाचयित्वा १५ कण्डिकाया दध्योदन पाचयित्वा इत्युक्तम् १६ afusarयामुदौदनं पाचयित्वा इत्युक्तम् । १७ कण्डिकायां दुहितुः प्राप्त्यर्थं तिलोदनं पाचयित्वोक्तमिति कथमष्टादश- कण्डिकाया सर्ववेदवक्तृपुत्रप्राप्त्यर्थं मांसोदनं पाचयित्वेति वदेत् । किञ्च, औक्षेण वा आर्षभेण वा इति तृतीययोर्न मासेन विशेषणविशेष्यभावसम्बन्धोऽपि संभवत, समानविभक्तिकत्वाभावात् । तुम्हारे द्वारा मारे गये शत्रु सोते है । अतः यहाँ पर जैसे ' गोवध स्थान में गौमें मारी जाती हैं ' यह अर्थ नही है । किन्तु मृगया स्थल मे जैसे मृगादि पशु मारे जाने पर सोते रहते हैं, वैसेही तुम्हारे द्वारा युद्धस्थल में मारे गये शत्रु सो रहे है, यही अर्थ है । क्योकि अथर्ववेदने निरपराधहत्या को भयङ्कर बताया है । जैसे श्रीकृष्ण ने वृषासुर, धेनुकासुर आदि श्रीराम ने मारीच आदि मृगो को मारा उसी तरह यहाँ पर उपपत्ति हो जाती है । मृगयास्थल में भी प्रायः वृक व्याघ्र आदि ही मारे जाते है । गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी यही कहा है- " हम क्षत्रिय मृगया वन करहीं । तुम जस खल भूख खोजत फिरही ।" तस्मात् इस मन्त्र मे गो पद से वृक, व्याघ्रादि पशुओ की ही विवक्षा की गई है । वेदो मे गाय को जैसे अवध्य कहा गया है, उसी तरह उसे अखण्डनीय भी कहा गया है । 'गावो गोष्ठे असदन्' ( ऋ० 1 सं ० १/१२११४ ) के अनुसार स्पष्ट है कि वेद मे गौएँ गोशाला में स्थित रहती है । यदि समाजीसम्मत अर्थ को भी मानलें तो भी राक्षसो की ही वह गोवधशाला होगी तथा च जैसे राक्षसों की गोवधशालाओं में राक्षसो के द्वारा मारी गई गोएँ सोती है, वैसे हो हे इन्द्र । युद्धस्थल में तुम्हारे द्वारा मारे गए राक्षस सो रहे है, इस प्रकार अर्थ करने में भी कोई हानि नहीं है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि गोवध, राक्षसो का ही कार्य है, मनुष्यों का नहीं । वेद कहता है कि गोधातकों का तो वध ही उचित है । ' ।
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२०६८ वेदार्थपारिजात किञ्च मासौदनमित्यत्र न समाहारद्वन्द्वः सभवति । तिलौदनमित्यत्र तु 'विभाषा मृगतृणधान्यव्यञ्जनपशु- शकुनि ' (पा० सू० २| ४| १२ ) इति सूत्रे ब्रीहियवम् इतिवत् धान्यत्वात् सम्भवति । मासस्य धान्यत्वाभावात् । तेनात्र मास- पदेन धान्यस्यैव ग्रहणे संगतिर्भवति नान्यथा । तस्मात्
अतो माषान्नमेवैतद् मासार्थे ब्रह्मणा स्मृतम् ।
पितरस्तेन तृप्यन्ति श्राद्ध कुर्यान्न तद्विना ॥
यथा बलिष्ठ मासत्वाद् माषान्नमपि तत्समम् ।
सौगन्धिकञ्च स्वादिष्ठं मधुर द्रव्यभेदतः ॥
( प्रजापतिस्मृति, १५२-१५३ ) पौष्टिकपदार्थस्यापि मांसलत्वात् ' अर्शआदिभ्योऽच्' ( पा ० सू०५/ २/ १२७) इत्यच्प्रत्ययान्तमासशब्देन तस्य ग्रहीतु शक्यत्वात् । तथा औक्षण आर्षभेण स्वरसेन युक्तस्य घृताक्तमाषोदनस्यैवात्र ग्रहणं युक्तम् । उपवेदभूतायुर्वेदे उक्षन् इत्यस्य सोमात्मक मौषधमर्थः । तत एव सायणेन (ऋग्वेदसहिताया १।१६४।४३ ) इति मन्त्रभाष्ये सोम उक्षाऽभवत् इत्युक्तम् । ऋषभक शब्दोऽप्यौषधवाचक एव ।
यानि भद्राणि वीजानि ऋषभा जनयन्ति च ।
तैस्त्वं पुत्र विन्दस्व सा प्रसूर्धेनुका भव ॥
(अथर्ववे ० सं ० २/२/३३ ) इति ऋषभौषधसेवनेन पुत्रप्राप्तिश्रवणात् ।
ऋषभो मधुरः शीतो गर्भसन्धानकारकः ।
शुक्रधातुकफानाञ्च कारको बलदायकः ॥
वृष्यः पुष्टिकरः प्रोक्तः पित्त रक्तातिसारजित् । इति निघण्टुरत्नाकरवचनाच्च । ' जीवकर्षभको बल्यो शीतो शुक्रकफप्रदो । ' (२1१ ) इति भावप्रकाशवचनाच्च । सोमस्य वेदसम्बन्धाद् औक्षेण रसेनाक्तस्य माषौदनभक्षणेन रुपपद्यतेतराम् । तत एव सौक्षेणेत्यस्य प्राथम्यम् । वेदवक्तृ पुत्रजनि- न बृहदारण्यकवचनेन वृषभमाससभक्षणं विधातुं शक्यते, अघ्न्यत्वबोधकमन्त्रविरोधात्,,प्रथमपरिणामो रसो भवति द्वितीयो रुधिरो धातुर्भवति तृतीयो मासघातुश्चतुर्थो । यथा भुक्तस्यान्नादेःधातुः, सप्तमो वीर्यधातुर्भवति, तथैव वृक्षफलादिष्वपि । मनुष्यस्य त्वच उत्पाटने वसाधातुः, पञ्चमोऽस्थिधातुः, षष्ठो मज्जा- रुधिरस्येव, आम्रस्य वल्कलापसारणे रसो दृश्यते । तस्य धनीभूतांशो मासस्थानीयः कठिनोऽष्टि र स्थिस्थानीयः । ' ' अत एव कादम्ब शिलाशकलप्रहारसञ्चूर्णिताष्टिसमय इत्यत्र ' (श० ३।४।१।२ ), ' अथापि ब्राह्मणाय वा राजन्याय' वाब्राह्मणाय वा महोक्षं वा महाज वा । पचेत एवमस्मे एतदातिथ्यं करोति अष्टेरस्थित्वमुक्तम् । यदपि च राज्ञे वा इसी से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वृषभमास का भी यह जो कहा है कि औक्षेण कहने से छोटे बडे का भेद होने से विधान नही है । क्योकि गौ के तुल्य वृषभ को भी अन्य बताया है । माननेपर मासभेद अनुपपन्न होगा और दुष्क्रम दोष भीउसका भेद होगा कि यह कहना भी उचित नही है । क्योकि वैसा होगा । और वही पर वृहदारण्यक के १४वी कण्डिका मे