वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1191–1200

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1191–1200

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वेदार्थपारिनात २०८९ मासशब्दात् 'अर्शआदिभ्योऽच्' (पा ० सू० प्रत्ययेन मासमस्ति अनेन इति मासमिति व्युत्यत्त्या मासोत्पादक- दुग्धदधिघृतकूर्चादिकमपि ग्रहीतु शक्यते, इत्यप्युक्तमेव । तदेव मासैर्लातीति व्युत्पत्त्या मासलं भवति । न तत्र जीवित- पशुमास विवक्षितम् । खर्जूरवदरीफलाम्रकुमारिकादिसारभूतानि च मासशब्दवाच्यानि भवन्तीत्यप्युक्तमेव । 'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' इत्यादिरांच्या गोपदेन क्वचित् क्षीरादिक क्वचित् तान्तवी ज्या रज्जु क्वचित् गो- -':' चर्मनिर्मितं पात्र गृह्यते इत्यप्युक्तमेव ॥ तद्रीत्या ब्रह्मवैवर्त्तेऽपि पञ्चकोटिगवा मासै इत्यत्र तावतीना गवां दुग्धादिकमेव मांसपदवाच्यमिष्टम् । गोपदेन क्षीर गृह्यते तस्य सारो गोमासमुच्यते ।

ब्राह्मणाना त्रिकोटि स भोजयामास नित्यश ।

. पश्ञ्चलक्ष गवा नासैः सुपक्वैः घृतसंस्कृते ॥

इत्यत्रापि घृतादिसंस्कृतदुग्धसा रकूर्चादिनिमितापूपादिक विवक्षितम् । गोधूमादिसारोऽपि मांसमुच्यते । ' गावः तण्डुलाः अन्नं गौ ' इत्यादिरीत्या अन्नतण्डुलादयोऽपि गावो भवन्ति । तत्सारोऽपि मासमुच्यते । सर्वथाऽपि पुराणेषु न गोमासादिभक्षणं न तेन सत्कारश्चोतः । यस्य गोवशस्य रक्षणार्थं दिलीप. स्वदेह- मामिषपिण्डवत्सहाय दत्तवान् "स न्यस्तशस्त्रो हरये स्वदेहमुपानयत् पिण्डमिवामिषस्य । " ( रघुवंश २।५ ९ ) - गवां पूजनार्थमेव श्रीकृष्णेन इन्द्रमानभङ्गेन गोवर्धनपूजा चालिता । स्वयञ्च वृन्दावने श्रीकृष्णेन गोचारणं कृतम् । यद्रक्षणार्थं यस्य च पालनार्थमज्ञातवासस्थितेनाऽप्यर्जुनेन कौरवैविराटनगरे युद्ध कृतम्, तस्य पुराण- प्रसिद्धस्य गोवध. कथ वेदे पुराणे वा समर्थयितुं शक्यते । तस्माद्यथा ' गोमास भक्षयेन्नित्यं पिबेदमरवारुणीम्' इत्यादियोगवचनाना न प्रातीतिकोऽर्थः" तथैव वेदेषु पुराणेषु च गोमांसादिशब्दस्य पूर्वोको गूढ एवार्थः । प्रस्थ कुमारिकामासमित्यस्य प्रातीतिकमर्थ कश्चिदनभिज्ञ एव गृह्णाति, न विचारशील | 'परोक्षप्रिया इव हि देवा:' ( गो० ब्रा० ) इति रीत्या गूढ एवार्थ । -लोके उच्छिष्टशब्देन भुक्तशिष्टान्नादिक- मिष्यते । वेदे तूच्छिष्टपदस्य परमात्मार्थो भवति ।

उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिवि श्रिताः ।

ऋचः सामानि छन्दासि पुराणं यजुषा सह ॥

व्रात्य पदेनाधमब्राह्मणादय उच्यन्ते, ( अथर्ववे ० संहितायाम् १५।३।१ ) इति वेदे तु परमात्मैव ब्रात्यः । लोके वन्ध्या 'सुराघट-सहस्रेण यहाँ भी सुरापद से सोम विवक्षित है, मद्य नही । यह बात चरक ने चिकित्सास्थान ( २४| ५ ) मे स्पष्ट है । 'सुरया सोम. ' ( वा ० सं ० १ ९।५ ) के अनुशीलन से स्पष्ट हो जाता है कि सोमात्मक-सुरावटसहस्र से गङ्गायजन भी अनुपपन्न नहीं है । मास --शब्द से अच् प्रत्यय जोडने पर 'मासमस्ति अनेन इति मासम्' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न मास शब्द से दूध, दही, घृत, कूर्च आदि का भी ग्रहण किया जा सकता है । 'मास लाति' व्युत्पत्ति से वही मासल होता है । वहाँ जीवित पशुमास विवक्षित नही है । खजूर, बदरीफल, आम्र, कुमारिकादिसारभूत पदार्थ, भी मासशब्दवाच्य होते हैं । इसी प्रकार सब व्यवस्था लगा दी गई है । निष्कर्ष यही है कि पुराणों मे कही पर भी गोमासभक्षण अथवा उससे सत्कार करना नही बताया है । जिस गो वंश को रक्षा के लिये सम्राट् दिलीप ने सिंह के सामने आमिषपिण्ड के समान अपने शरीर को अर्पण कर दिया था उस गोवंश के वध की तथा उस मासभक्षण की चर्चा करना भी अत्यन्त निन्दनीय है । लोग वन्ध्यागी को ' वशा कहते है, किन्तु वेद में ' सर्वोत्तम गी' समझी जाती है । लोकव्यवहार में अपान शब्द से पायुवायु (पादना) कहा जाता है, किन्तु वेद में 'ब्रात्यस्य- अपानम्' कहने से पौर्णमासी, अष्टका, अमावास्या, श्रद्धा, दीक्षा, दक्षिणा बताई गई है । लोक मे वृषण को अण्डकोष कहते है, किन्तु वेद में ' अश्विनौ कामाना वर्धितारी' अश्विनीकुमार समझे जाते हैं । प्रतिपक्षियों के द्वारा जिस ब्रह्मवैवर्त पुराण मे गोमासभक्षण के वचनो को प्रदर्शित किया जा रहा है, उसी पुराण में गोवध करने पर प्रायश्चित्त बताया २६२

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२० ९० वेदार्थपारिजात गोवंशा भवति, वेदे तु सर्वोत्तमा गोरुच्यते । लोके अपानशब्देन पायुवायुरुच्यते, परन्तु वेदे व्रात्यस्य अपानमिति पोर्णमासी अष्टका अमावास्या श्रद्धा दीक्षा दक्षिणा प्रोच्यते । लोके वृषणी अण्डकोषः, वेदे अश्विनी कामानां वर्धितारो उच्येते । यत्र ब्रह्मवैवर्त्ते गामांसभक्षणस्य वचनानि प्रतिपक्षिभिः प्रदर्श्यन्ते तत्रैव गोवधे प्रायश्चित्तमुक्तम्- ' कामतो गोवधे राजन् वर्षं तीर्थे भ्रमेन्नरः । यवयावकभौजी च करेण च जलं पिबेत् ॥ तदा धेनुशत दिव्यं ब्राह्मणेभ्यो सदक्षिणम् । दत्त्वा मुञ्चति पापाच्च भोजयित्वा द्विजं शतम् ॥ : ( / ) प्रायश्चित्ते च क्षीणे च सर्वपापान्न भुञ्जति । पापावशेषाद्भवति दु खी चण्डाल एव च ॥ २०५१ २५–२७ - गवां द्वादशलक्षाणा ददो नित्यं मुदान्वितः । ( २।५० १३ – १४ ) इत्यत्र तु दानमेवोक्तं गवां न वधः । तत्रैव च- पूपमन्नं च सूपानं सगव्यं मासर्वाजितम् । ( ) विप्रा भोजनकाले च मनुवंशसमुद्भवम् ॥ ब्र ० वे ० २।५१।१६ इति मासवजितपूपादिभोजनमेवोक्तम् । 'अतो माषान्नमेवैतत् मासार्थे ब्रह्मणा स्मृतम् । ' ( १५२ प्रजापतिस्मृतिः ) पञ्चकोटिगवा मासं सापूपं स्वन्नमेव च । ब्रह्मवेक्तं 'अपूपवान् मासवान् चरुदेहः सीदतु' इत्यस्य व्याख्या तत एवचैत्रस्य राज्ञः- शतनद्यो घृतानाञ्च दध्नो नद्यः शतानि च । || शतानि नद्यो दुग्धाना मधुनद्यश्च षोडश मिष्टानां स्वस्तिकानाञ्च लक्षराशिश्च नित्यशः । ( न० वै ० २।६१।९ ६ -९८ ) इति । न चैतत्सर्वं गवा हनने संभवति । पञ्चकोटिगोमासभक्षणाय भोक्तारः कियन्तो भवेयुरित्यपि विचारणीयम् । रुक्मिणीविवाहे तु तादृशप्रस्तावः रुक्मिण एव । स तु शिशुपाल भक्तोऽसुरप्रकृतिक एवासीत् । अत एव श्री- कृष्णेन निगृहीत एव । भीष्मकस्तु कृष्णभक्त आसीत् । तत्र तु - समागत्य सुरान् विद्वान् भूताश्च प्रणनाम सः । ददौ योग्याश्रम तेभ्यो भक्ष्यपूर्णं सुधोपमम् ॥ दिवानिश चाप्युवाच दीयता दीयतामिति । ( श्रीकृष्णजन्म खण्ड - १०७१३३–३४ ) । गया है । और वही पर गोओ का दान बताया गया हैं, वध नही । तथा वही पर मासवर्जित -अपूपादि भोजन बताया गया गया है । क्या ये सब बाते गोवध होने पर सभव हो सकती है? पञ्च काटिगामासभक्षणार्थ भोक्ता लोग कितने होगे यह भी बुद्धि से सोचना चाहिये | गौओं की पूजा के लिये ही श्रीकृष्ण ने इन्द्र का अभिमान भगकर गोवर्धन की पूजा प्रचलित की । और वृन्दावन में स्वयं श्रीकृष्ण ने गोचारण किया । जिम गोवंश की रक्षा के लिये और पालन के लिये अज्ञातवास में रहते हुए भी अर्जुन ने विराट नगर में कौरवों के साथ युद्ध किया । पुराणप्रसिद्ध उस गोवश के वध का वेद या पुराण मे समर्थन कैसे हो सकता है । तस्मात् 'गोमास भक्षयेन्नित्यं पिबेदमरवारुणीम्' इत्यादि योगवचनो का प्रातीतिक अर्थ जैसे नहीं लिया जाता, वैसे ही वेदो और पुराणो में गोमासादिशब्द का पूर्वोक्त गूढ अर्थ ही हैं, और उसे ही लिया जाता है । 'प्रस्थ कुमारिकामासम्' इसके प्रातोतिक अर्थ को कोई अनभिज्ञव्यक्ति हो स्वीकार कर सकता है, विचारशील व्यक्ति कभी नही उसे स्वीकार करेगा । 'परोक्षप्रिया इव हि देवा. ' इस गोपथब्राह्मण वचन के अनुसार ये सब गूढ अर्थ ही है । लोकव्यवहार में 'उच्छिष्ट' शब्द से भुक्तशिष्ट अन्न समझा जाता है, किन्तु वेद मे 'उच्छिष्ट' शब्द से 'परमात्मा' अर्थ समझा जाता है । 'व्रात्य' शब्द से अधम ब्राह्मण आदि समझे जाते हैं, किन्तु वेद में व्रात्य शब्द से परमात्मा ही समझा जाता है । रुक्मिण के विवाह में तो वैसा प्रस्ताव रुक्मी ने ही किया था । वह तो शिशुपाल का भक्त असुरप्रकृतिका ही था । अतएव श्रीकृष्ण के द्वारा वह निगृहीत किया गया था । भीष्म तो कृष्णभक्त थे ।

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वदार्थपारिजातः २०९१ आर्यसमाजिना सत्यार्थप्रकाशेऽपि मासादिभक्षण दृश्यते । आधुनिकसमाजिभिस्तादृशाशाना प्रक्षिप्तत्व-मुच्यते । तत्र प्रथम संस्करणे 'जो वन्ध्या गाय होती है, उसको भी गोमेध मे मारना लिखा है -"स्थूलपृषतीमग्निवारुणी मनड्वाहीमालभेत " यह ब्राह्मण को श्रुति है । इसके स्त्रीलिङ्ग और स्थूलपृषती विशेषण से वन्ध्या गाय ली जाती है, क्योकि वन्ध्या से दुग्ध और वत्सादिको की उत्पत्ति नही होती । जो मास खाय अथवा घृतादि से निर्वाह करे वे भी सब अग्निहोम किये बिना न खायें, क्योकि जीव को मारने के समय पीड़ा होती है । उसमे कुछ पाप भी होता है । फिर जब अग्नि मे होम करेगे तो तब परमाणु से उस प्रकार सब जीवो को सुख पहुंचेगा । एक जीव की पीड़ा से पाप भया था , ' (, )सो भी थोड़ा सा गिना जायगा अन्यथा नही । सत्यार्थप्रकाश १० समुल्लास पृ० ३०३ अत एवार्यसमाजे मासपार्टी सञ्जाता । तथैव प्र० स० प्र० ४५ पृष्ठे - मास के पिण्ड देने मे कुछ पाप नही । पृ० १४ ९ यज्ञ के वास्ते जो पशुओ की हिंसा है, सो विधिपूर्वक हनन है । पृ० १७१ बहुत पशुओ वाला होम करके हुतशेष भोक्ता प्रशंसा को प्राप्त होता है । यजु ० स्वा ७ भाष्य १ ९| २० | स० प्र० द्वितीयावृत्तावपि १० समुल्लासे मासभक्षण लिखितम् । मुशीसमर्थदानमहाशयेन तन्निष्काशितमिति सनातनधर्मालोके षष्ठपुष्पे । यत्तु प्राचीनधर्मशास्त्रेषु गृह्मसूत्रेषु च गोचर्मणि सोमलताभिषव उक्तः, विवाहसमाप्तो चानडुहे आषंभ-रोहिते चर्मणि वधूमुपवेशयति ( सरिता ) इति तदपि तुच्छम्, स्वयमृतचर्मणि सोमाभिषवस्यैव तत्रेष्टत्वात् । मृतपशु-चर्मपादत्राणमद्यापि हिन्दुभिर्धार्यंत एव । गोपदस्य तु निरुक्तरीत्या पशुसामान्यमेवार्थः । 'अंश दुहन्तो अभ्यासते गवि इति अधिषवणचर्मण:' ( निरु ० २।५।५ ) अत्र गोशब्दोऽधिषवण चर्मश्लेष्मस्नावाज्या- इषु- सूर्य सूर्यरश्मिप्रभृतीना वाचकोऽभिप्रेतः । अद्यापि तैलादिरक्षणार्थं छागोष्टादिचर्मकूपिका उपयुज्यन्त एव । स्वयं मृतार्षभचर्मणि वध्वा उपवेशनेऽपि न दोषः । वस्तुतस्तु- अनड्वान् वृषभः प्रोक्तस्त्वनड्वान् मुख्य आलये । नारीयुक्प्रज्वलद्दीपमनडुत् कोतुकं गृहम् ॥ इति रन्तिकोषानुसारेण तत्रानडुत्शब्दो मुख्यालयस्य विवाहमण्डपस्य कौतुकागारस्य वाचकः । अनो वह- तीत्यनड्वत् पतिपत्नीरूपस्य रथस्य धारकत्वाद् मुख्यनिवासगृहमनड्वद् भर्वात । वाचस्पत्यकोषे तु - अनडुत् आसन्न- आर्यसमाजियो के सत्यार्थप्रकाश मे भी मासादि का भक्षण बताया गया है । किन्तु आधुनिक समाजी उन जैसे अंशों को प्रक्षिप्त बताते हैं । उसके प्रथमसंस्करण ( सत्यार्थ प्रका० १० समु ० पृ० ३०३ ) मे दयानन्दीय मत को देखा जा सकता है । अतएव देखिये 1। सत्यार्थ-आर्यसमाज में मासपार्टी हुई थी । तथैव प्र० स ० स ० प्रका० पृ० ४५ एव पृ ० १४ ९ यजु० स्वा० ७ भाष्य १ ९ / २० भी ने निष्कासित कर प्रकाश की द्वितीय आवृत्ति में भी १० वें समुल्लास में मास भक्षण लिखा गया है, किन्तु उसे मुन्शी समर्थदान महाशय दिया, यह बात सनातन धर्मालोक के षष्ठ पुष्प में बताई गई है । 'सरिता ' पत्रिका में जो लिखा गया है कि 'प्राचीन धर्मशास्त्रो में और गृह्यसूत्रो में गोचर्म पर सोमाभिषव करना बताया स्वयं मृतहै, तथा विवाह समाप्ति पर बैल के, ऋषभ, रोहित के चर्म पर वधू को बैठाते है ।' किन्तु यह लिखना धारणनिःसारकरतेहै, हीक्योकिहैं । उक्त्तरीति हुए के चर्म पर सोमाभिषव करना इष्ट है । मृत पशु के चर्म के बने हुए पादत्राण को आज भी हिन्दु लोग अर्थ अभिप्रेत से गोपद का 'पशुसामान्य' ही अर्थ होता है । निरुक्त २१५१५ में जो गो शब्द आया है, उसके इषु, सूर्यरश्मि आदि अनेकमृत हुए ऋषभ है । आज भी तैलादि की रक्षा के लिये छाग, राष्ट्र आदि के धर्म की बनी कुप्पी का उपयोग किया ही जाता है । स्वय के चर्म पर वधू के बैठाने में भी कोई दोष नही है । वस्तुतस्तु रन्तिकोष के अनुसार ' अनडुत्' शब्द मुख्यालय, विवाहमण्डप, कौतुकागार का वाचक है । ' अनो वहतीत्य-- नड्वत्' -पति- पत्नीरूप रथ का धारक होने से मुख्यनिवास गृह को 'अनड्वत्' कहते है । वाचस्पत्यकोष के अनुसार ' अनडुत् आसन्न-

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२० ९ २ वेरार्थपारिजातः देशादी इति लिखितम्, विवाहमण्डपासन्नदेशस्तु कौतुकागार एव । तथा चानुडुहे मुख्यगृहे कौतुकागारे वा आर्षभे ऋषिभिः ऋषभतया श्रेष्ठतया स्वीकृते आर्षभे पुरुषर्षभ इत्यादिस्थलेषु ऋषभशब्दस्य श्रेष्ठार्थत्वदर्शनात् । यदि च ऋषभशब्दस्य वृषभार्थता स्यात्तदा आन्डुहे इति पुनरुक्तिरेव स्यात् । रोहिते चर्मणि मृगचर्मणि वधूमुपवेशयतीत्येवार्थः । रोहिते इत्यस्य स्थाने रोहित इति वृद्धिरहितप्रयोगः संज्ञापूर्वकविधेरनित्यत्वात् । लोहिते इति पाठे तु सूर्यस्य प्रथमकिरणेनारुणे रक्तासने वधूमुपवेशयतीत्यर्थ. । कैश्चिद्विवाहपद्धतौ चर्मशब्दः शणवाचकोऽभिप्रेतः । वाचस्पत्यरीत्या तु शणपर एव चर्मपदार्थः । गोचर्मणि इति पाठे तु पारिभाषिकमेव तद् ग्राह्यम् । तद्यथा याज्ञवल्क्यस्मृतिमिताक्षरायाम्- ' दशहस्तेन दण्डेन त्रिशद्दण्डनिवर्तनम् । दश तान्येव गोचर्म' | गृह्यासंग्रहेऽपि- 'ऋषभैक शतं यत्र गवा तिष्ठति सवृतम् । बालवत्सप्रसूताना गोचर्म इति सविदुः ॥ १३९ ॥

तथैव चन्द्रकान्तभाष्ये- गवा शतं वृषश्चेको यत्र तिष्ठेदयन्त्रितः । एतद् गोचर्ममात्रं तु प्राहुर्वेदविदो जना. ॥ तथा च गोचर्ममित्यनेन पृथिवीपरिमाणविशेष उक्तः पद्मच-द्रकोषे १३६ पृ० । वृहस्पतिस्मृती च— सवृष गोसहस्र तु यत्र तिष्ठत्यतन्द्रितम् । वालवत्स प्रसूताना तद् गोचर्म इति स्मृतम् ॥ एवं गोचर्मशब्देन स्थानविशेष एव गृह्यते । तथैव - 'इह गावो निषीदन्तु इह अश्वा इह पुरुषाः ' ( पारस्कर १1८1७ ) नहि अपरिभाषितगोचर्मणि गवाश्वादीनामुपासनं भवति । तस्मात्पारिभाषिकमेव गोचर्मात्र ग्राह्यम् । 'दोग्ध्री धेनुर्वोढाऽनड्वान्' ( वा० स० २२ २२ ) इति यस्य गोवंशस्य महत्त्वमुक्तम्, मन्वादिभिर्यस्य वधे प्रायश्चित्त विधीयते, तद्वधेन तच्चर्मण्युपवेशन सर्वथाऽसगतमेव । उत्तररामचरिते 'वत्सतरी मडमडायिता' इत्यत्रापि न वध उक्तः, किन्तु विषादमुपगतेत्येवार्थं । यदि वशिष्ठः स्वसत्काराय मांसमपेक्षेत, तदा विश्वामित्राय स तथैव समांसं मधुपर्कं दद्यात् । देशादी' और विवाह मण्डपासन्न देश को 'कौतुकागार' ही कहते हैं । 'ऋषभ' शब्द का अर्थ 'श्रेष्ठ' भी है । यदि 'ऋषभ ' का अर्थ यहाँ वृषभ किया जाय तो 'आनडुहे' कहने में पुनरुक्ति होगी । ' रोहिते -- चर्मणि का अर्थ मृगचर्मणि । मृगचर्म पर वधू को बैठाना ही अर्थ है । सज्ञापूर्वक विधि के अनित्य होने से 'रौहिते' के स्थान में ' रोहिते' यह वृद्धिरहित प्रयोग है । 'लोहिते ' पाठ में सूर्य की प्रथम किरण से अरुण प्रतीत होनेवाले आसन पर अर्थ होगा । विवाह पद्धति के अनुसार कुछ लोगो ने 'चर्म ' शब्द को ' शण' वाचक माना है । वाचस्पत्य के अनुसार तो 'शणपट ही चर्म पदार्थ है । गोचर्म शब्द से पारिभाषिक चर्म ही ग्रहण करना चाहिये, ऐसा मिताक्षरा, चन्द्रकान्तभाष्य, बृहस्पतिस्मृति, पारस्कर आदि ने कहा है । जिस गोवश का महत्व वेद बता रहे है, जिसके वध होने पर मन्वादिको ने प्रायश्चित का विधान किया है, ऐसी स्थिति में उसका वधकर उसके चर्म पर बैठाने की बात तो सर्वथा असंगत ही है । उत्तररामचरित्र में 'वत्सतरी मडमडायिता' से 'वध' नही बताया गया है, किन्तु 'विषादमुपगता' इतना ही अर्थ है । यदि वशिष्ठ अपने सत्कार के लिये मास की अपेक्षा रखते होते तो वे विश्वामित्र के लिये समांस मधुपर्क किये होते । किन्तु वैसा उन्होने नहीं किया, अपितु उन्होने फलमूल आदि हो अर्पण किये । कल्पसूत्र में जहाँ 'महोक्ष निर्वपन्ति' आया है, वहाँ 'निर्वपन्ति ' का अर्थ 'ददति' ही कर्तव्य है, 'घ्नन्ति' नही । उत्तररामचरित्र में भी वत्सतरी का विरासन इष्ट नहीं है । इसी कारण तो सत्कारार्ह व्यक्तियों का व्याघ्र वृकादि की उक्ति से उपहास प्रदर्शित किया गया है । अतिथिसत्कारार्थ गो दुग्ध का उपयोग रहने से वत्सतरी के लिये दुग्धावशेष न रहने के कारण वह वत्सतरी भूख से पीडित हुई, इस अर्थ में ही ' वत्सतरी मडमडायिता' कहकर उसका हमारना बताया गया है । ६ हुई

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वेदार्थपारिजात स्वागतं तव चेत्युक्त्वा वशिष्ठेन महात्मना । आसनं चास्य भगवान् वशिष्ठो व्यादिदेश ह || फलमूलमुपाहरत् ॥ उपविष्टाय च तदा विश्वामित्राय धीमते । यथान्याय मुनिवर: ( रामा० ११५२१२-३ ) न च तथा कृतवान् फलमूलादिकमेव तु समर्पितवान् । यत्र तत्र ' श्रोत्रियाय अभ्यागताय वत्मतरी महोक्ष वा निर्वपन्ति गृहमेधिन.' इति कल्पसूत्रवचनमुद्धृतम्, तत्रापि निर्वपन्तीत्यस्य ददतीत्यर्थो भवति न घ्नन्तीत्यर्थः । उत्तररामचरितस्यापि न वत्सतरीविशसन मिष्टम् । तत एव सत्करणीयस्य व्याघ्रवृका युक्त्योपहासप्रदर्शनम् । तत्र गवां दुग्धस्यातिथिमत्कारार्थोपयोगेन वत्सतर्य्याः कृतेऽनवशेषात् । सा क्षुधया विषण्णा जाता तदर्थका एव वत्सतरी मडमडायिता । जनकस्तु क्षत्रियत्वाद्वानप्रस्थत्वाच्च दुग्धादिक न गृहीतवानिति तदर्थं वत्सतरी विसर्जिता । यद्यपि ' न त्वेव अमासोऽर्घं. स्यात्' ( पारस्कर गृ० सू० ११४ / २९ ) इति मधुपर्के माससाहित्य युक्तमिति तदपि न, तत्र समांसस्य मासलतार्थत्वात् । मासलत्व तु दुग्धसारादो विद्यमानत्वेनैव अदितेरखण्डनीयाया अघ्न्याया गोरातिध्याय हननस्या-....** ' ( ) नाभिः । मा गामनागामदिति वधिष्ट । ऋ० वे ० सं ० प्राप्तत्वात् । 'माता रुद्राणां दुहिता वसूना स्वसादित्यानाममृतस्य 'मम चामुष्य च पाप्मानं हनोमि' ( पारस्कर गृ० सू० १।३।२७ ) इति तत्रैव गोरुद्राणा मातृत्वाद् वसूनां दुहितृत्वाद् आदित्याना स्वसृत्वात्तन्महामहिमवर्णनाद् अनपराधित्वेन हनननिषेधदर्शनाच्च । तत्र तस्या वधस्याभीष्टत्वे यदि उत्सिसृक्षेत् इत्युत्सर्गो नोच्यते । न च गवामिवान्यपशूनामध्यत्वव्यपदेशो वेदे दृश्यते । तस्मात् शुद्धाना दधिमधुघृताना सयोजनेन मासलो मधुपर्को निर्मातव्यो न नि सारदध्यादिभिरिति समासत्वोक्तेस्तात्पर्यम् । गौर्गौर्गौरित्यनेन तु दक्षिणार्थ गोरुल्लेखः । तत्रादरातिशयायावृत्तिः । उत्सृजत तृणान्यत्तु इति तस्यै घासादि- समर्पणमेवाभिप्रेतम् । किंच- 'यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव । ( अथर्व वे० सं ० ३।११।२ ) तम् आहरामि निऋतेरुपस्थाद् अस्यार्षभेन शतशारदाय ॥ ' इत्यादिमन्त्रैर्विज्ञायते मृतकानामप्युज्जीवनसामर्थ्यमासीत् पूर्वं नाद्यत्वे तादृशी शक्तिर्दृश्यते । तत एवाश्वालम्भनादिक कलियुगे निषिद्धम् । अन्यच्च- स्वयं चैषामनडुहो युज्यन्ति च वहन्ति च । ॥ ( / ) स्वयमुत्राश्च दुह्यन्ते मनःसकल्पसिद्धिभिः म ० भा० १२ २६३।३१ अत • उनके लिये वत्सतरी का विसर्जन राजा जनक क्षत्रिय थे और वानप्रस्थ थे, इसलिये उन्होने दुग्ध नही लिया, ही मास शब्द का प्रयोग है । दुग्धमारादि के बताया है । यद्यपि पारस्कर ने समास मधुपर्क बताया है, तो वहाँ भी मासलतार्थक, अघ्न्या आदि शब्दो से संबोधित की जाने वाली गो | ' विद्यमान रहने पर ही मासलत्व हो सकता है आतिथ्य के निमित्त अदिति कहकर उत्सर्ग न कहा होता । तस्मात् शुद्ध का हनन तो प्राप्त ही नहीं है । वहाँ पर उसका वध यदि अभीष्ट रहता तो 'निःसारउत्सिसृक्षेत्दधि आदि से नहीं, यह बात कही गई है ।,,, ', दधि मधु घृत का सम्मिश्रण कर मासल मधुपर्क तैयार करना चाहिये करने के लिये आवृत्ति की गई है । उत्सृजत ' ' अथर्ववेद सं ० ३।११।२ आदि मन्त्रो से ज्ञात तीन बार गौः गोः गौः उल्लेख दक्षिणा के लिये किया गया है । आदरातिशय प्रकाशित होता तृणानि अत्तु इससे उसके लिये घास आदि का समर्पण करना ही वहाँ अभिप्रेत है । में नही दिखाई देता । यही कारण है कि कलियुग है कि उस समय मृतो को जिलाने का सामर्थ्य भी था, आज वैसा सामर्थ्य किसी समझनेवाले युधिष्ठिर जां वेदाध्ययन में चातुर्वर्ण्य मे गवालंभ अश्वालंभनादि का निषेध कर दिया गया है । किञ्च अपने को मोमासकसमझने के लिये मूल संस्कृत को पढ़ लेना चाहिये । का अधिकार मान रहे है, जो मोमासाशास्त्र के एकदम विरुद्ध है । इसे सविस्तर

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वेदार्थपारिजात २० ९४ 'यस्तथा भावित्मा स्यात् स गा ( पशु ) आलब्धुमर्हति । ( म० भा० १२ २६३/३२ ) इत्यादिनापि गवामालम्भो :, ' ' निषिद्ध तादृशसामर्थ्याभावादधुनातनानां जनानाम् । अत एव महच्चकाराकुशल वृषं गा वालभेत्तु यः इति पूर्वोदाहृतं महाभारतवचन न विस्मर्तव्यम् । किश्च कथमयं मीमासकम्मन्यो पूर्वोत्तरमीमांसाविरुद्ध वेदाध्ययने चातुर्वर्ण्यमधिकृत मन्यते? तथाहि----- ' चातुर्वर्ण्यानामविशेषात्' ( जै० सू० ६।१।२५ ) इति चातुर्वर्ण्यस्य वैदिककर्माधिकारमाशङ्कय ' निर्देशाद्वा त्रयाणा स्यादाग्नेये' ( जै० सू० ६| १| २६ ) इति सूत्रेण ' वसन्ते ब्राह्मणोऽनीनादधीत । ग्रीष्मे राजन्य । शरदि वेश्यः ' इत्यादिविधिवाक्यै- स्त्रयाणामेषामाधाने निर्देशादग्नेश्चतुर्थवर्णस्य नाधिकार इत्युक्तम् । पूर्वमीमासायाम्- ' निमित्तेनार्थेन बादरिस्तस्मात् सर्वाधिकार स्यात्' ( जे० सू० ६।१।२७ ) इत्यादिसूत्र: 'य एवं विद्वानग्नि- माधत्त' इति वाक्येन सर्वसाधारणे विहिते वसन्तादिवाक्यानि ब्राह्मणादिनिमित्तेन वसन्तादिकालविधायकानि, तेन शूद्रस्यानग्नित्वासिद्धयया कर्मानधिकारो न सिद्धयतीति पूर्वोका युक्ति दूषयत्वा 'अपि वा वेदनिर्देशादपशूद्र. प्रतीयेत' ( जै ० सू० ६| १ | ३३ ) इति सूत्रे वेदाध्ययनार्थोपनयने 'वसन्ते ब्राह्मणमुपनीयत' इत्यादिवाक्यैस्त्रयाणामेव निर्देशादुपनयन- हीनश्चतुर्थोऽध्ययनाभावान्न कर्मस्वधिकारीति सिद्धान्तयुक्तिः प्रदर्शिता । 'गुणार्थत्वान्नेति चेत्' ( जै० सू० ६| १ | ३४ ) इति सूत्रेण पुन. कर्मानुष्ठानार्थित्वादुपनयनाभावेऽपि स्वयमेव गत्वाध्येष्यत इति चोद्यमुद्भाव्य 'सस्कारस्य तदर्थत्वात्' ( जै ० सू० ६ १/३५ ) इति सूत्रेणोपनयनसंस्कारस्याध्ययनार्थत्वा- दुपनयनाभावे स्वयमेव गत्वाध्ययनं विगुण स्यादिति पूर्वोक्तचोद्यं परिहृत्य 'विद्यानिर्देशान्नेति चेत्' । जै० सू० ६ १ ३६ ) इति कर्मानुष्ठानार्थमवश्य ग्राह्यया विद्ययाऽऽक्षेपारलौकिकाध्ययन भविष्यतीत्युपनयनपूर्वकवैधाध्ययनाभावेन न किञ्चिद्वैगुण्य- मित्याशङ्कय 'अवैधत्वात्' ( जै० ६११।३७ ) इति न शूद्रेणाध्येतव्यमित्यध्ययनमात्रनिषेधाद् विद्यारहितस्य न कर्मस्वधिकार इत्युक्त्वा 'तथा चान्यार्थदर्शनम्' ( जे ० सू० ६ | १ | ३८ ) इति सूत्रेण यद्यु ह वा एत्' इति श्रुतेः शूद्रसमीपेऽध्ययनप्रतिषेधात् । शूद्रस्य कथञ्चिदप्यध्ययन न संभवतीति कैमुतिकन्यायेनावैधादिति सूत्रोक्तयुक्तिदृढीकरणम् । एवमेतेषु प्रमाणेषु सत्सु कथं- दयानन्दतदीयाना वचनं तद्विरुद्धमादरणीयं स्यात् । उत्तरमीमासायामपि अर्थित्वादिनाऽध्ययननियमस्य पुरुषार्थत्वेन लौकिकाध्ययनेन वैधत्वात् । ' अह हारे त्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्तु ' (६|४| २| ३ ) इति विद्याधिकारिणि शूद्रशब्दप्रयोगाच्च ब्रह्मविद्यास्वधि- कारमाशङ्कय - ' शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि' ( ब्र० सू० १ | ३| ३४ ) इति सूत्रेण शूद्रशब्दस्य शुचा दुद्रावेति यौगिकार्थत्वमुक्त्वा 'क्षत्रियत्वं गतेश्चेति' ( ब्र० सू० १| ३| ३५ ) सूत्रेण तस्य क्षत्रियत्वमुपपाद्य ' संस्कारपरामर्शात्तदभावा- भिलापाच्च' ( ब्र ० सू० १ ३ | ३६ ) इति सूत्रेण ' त होपनिन्ये ' ( श० ब्रा० ११/५/३/१३ ) (अधीहि भगव इति होपससाद' (छा० ७। १। १ ) इति विद्याप्रदेशेषु संस्कारपरामर्शात् । 'शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजाति:' ( १०१४ ) इत्येकजातित्वस्मरणात् ' न च संस्कारमर्हति' ( मनु ० १०११२ - ६ ) इत्यादिभिश्च संस्काराभावाभिलापाच्च शूद्रस्य न वेदाध्ययनाधिकार उक्तः । 'तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः' ( ब्र ० सू० १।३।३७ ), ' श्रवणाध्ययनार्थं प्रतिषेधात् स्मृतेश्च' ( ब्र ० सू० १| ३| ३८ ) इत्यादिभिरनधिकार उक्तः । तथात्वेऽपि समर्थनं समाजिनां साहसमेव । ↓ ऋषिप्रणीत ग्रन्थो की प्रमाणता की दुहाई देनेवाले आर्यसमाजी जैमिनि महर्षि के ही वचनो का अनादर कर ऋषियो का अपमान कर रहे है, और ऋषि वचनों के विरुद्ध प्रलाप करनेवाले दयानन्दीय वचनो को मान रहे है, कैसा आश्चर्य है? मीमासा सूत्रकार जैमिनि महषि, ब्रह्मसूत्रकार व्यास महर्षि J मनु आदि सभी ने चतुवर्ण को वेदाध्ययन के अधिकार का स्पष्ट निषेध किया तथापि ये आर्यसमाजी उनके विरुद्ध समर्थन करने का प्रयत्न करते रहते हैं, इसे दुःसाहस ही कहा जायगा । + m

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वेदार्थपारिजातः २० ९५ यागेषु प्रकृतिविकृतिविचारः शाबरभाष्यभूमिकाया' पृष्ठे ९२ ' श्रीतयज्ञो का प्रकृति-विकृति भेद' इति शीर्षके लेखे लेखकेन यल्लिखितं तत्परि- शीलयामः । प्रथम तेन भेदत्रय प्रदर्शित, तदशुद्धम् । चत्वारोऽत्रभेदा वर्तन्ते - ( १ ) के चनयागाः प्रकृतय एव । यथा दर्शपूर्णमासी, ( ) ( ) अग्निष्टोमसस्थाकज्योतिष्टोमश्च । २ केचन विकृतय एव । यथा सौर्यादय । ३ केचन प्रकृतयो विकृतयश्च । यथा- अग्नीषोमीय पशुयाग, उक्थ्यषोडश्यतिरात्रसंस्थाका ज्योतिष्टोमयागाश्च । (४ ) केचन न प्रकृतयो भवन्ति, नापि विकृतयः । यथा दव होमाः गृहमेधीयेष्टिश्च । सर्वत्र लेखकोऽय साङ्ख्य मतपोषकोऽपि प्रकृति-विकृतिविषये साङ्ख्यमतं नानुसरतीति विचित्रमिदम् । 'प्रकृतियाग का लक्षण' इत्यारभ्य प्रकृतेः त्रीणि लक्षणान्यय लिखति । तत्र प्रथमलक्षणम्-' यत्र कृत्स्न क्रियाकलापमुच्यते सा प्रकृतिः' इति । एव लक्षणं मीमासकैःकदापि न क्रियेत, ते हि 'कलाप' शब्द पुल्लिङ्गे जानन्ति न क्लीबलिङ्गे । मीमासकास्तु — ' यत्र- समग्राङ्गोपदेशःसा प्रकृतिरिति कथयन्ति । अस्यैव लक्षणस्य परिष्कृत रूपम् यः पदार्थो यादृशोपकारद्वारा यदङ्गत्वेनावधारितः वस्य पदार्थस्य तत्सम्बन्धित्वेन रूपेण तादृशोपकारद्वारैवान्याङ्गताबोधकं प्रमाणमतिदेशः । यः पदार्थः-प्रयाजानूयाजादि, यादृशोपकारद्वारा — अदृष्टार्थानामदृष्टउपकारः, दृष्टार्थानाञ्च दृष्टउपकार इति रीत्या यदङ्गत्वेनावधारित: –आग्नेयाङ्ग- त्वेनावधारितः, तस्य पदार्थस्य प्रयाजानूयाजादेः, तत्सम्बन्धित्वेन- आग्नेयादिसम्बन्धित्वेन रूपेण, तादृशोपकारद्वारा दृष्टादृष्टो- पकारद्वारा, अन्याङ्गताबोधकम्- --सौर्याद्यङ्गताबोधकं ' प्रकृतिवद्विकृति. कर्तव्या' इत्येवमादिक वाक्यं प्रमाणम् । प्रयाजानू- याजादेराग्नेयसम्बन्धित्व न स्वरूपेण • किन्त्वाग्नेयेतिकर्तव्यतात्वेन । अतश्चाग्नेयेतिकर्तव्यतात्वमेव विकृतिसम्बन्धितावच्छेक सिध्यति । यथा प्रकृतौ प्रयाजानुयाजादय इतिकर्तव्यताकाङ्क्षापूरकत्वेन भावनायामन्वियन्ति तथा विकृतिभावनायामपि यागों में प्रकृति-विकृतिविचार शाबरभाष्यभूमिका के पृष्ठ ९ २ पर 'श्रीतयज्ञो का प्रकृति-विकृतिभेद' इस शीर्षक के लेख में लेखक ने जो लिखा है, उसी पर हम विचार करते है । पहली बात तो यह है कि उसने तीन भेद प्रदर्शित किये है, वही अशुद्ध है । श्रौत यज्ञो के चार भेद होते हैं ( १ ) कुछ भाग तो केवल 'प्रकृति' ही होते है, जैसे-दर्शपूर्णमास और अग्निष्टोमसस्थाकज्योतिष्टोम । ( २) कुछ याग विकृति ही होते है, जैसे -सौर्यादियाग ( ३ ) कुछ याग प्रकृति-विकृति उभयात्मक होते हैं, जैसे-अग्नीषोमीयपशुयाग और उक्थ्य, षोडशी, अतिरात्रसस्थाक- ज्योतिष्टोमयाग 1 ( ४) कुछ याग न प्रकृति और न विकृति ही होते हैं, जैसे -दर्वीहोम और गृहमेधीयेष्टि । लेखक महोदय सर्वत्र साख्यमत के पोषक दिखाई देते है, तथापि प्रकृति-विकृति के विषय मे साख्यमत का अनुसरण करते नही दिखाई देते, कैसे विचित्र है? 'प्रकृतियाग का लक्षण आरभकर प्रकृति के तीन लक्षण ये लिख रहे है । उनमे प्रथम लक्षण ----' जहा सम्पूर्ण क्रियाकलाप कहा गया हो उसे प्रकृति' कहा है । " यत्र कृत्स्न क्रियाकलापमुच्यते सा प्रकृति " । इस प्रकार का लक्षण मीमासको ने कहीं भी और कभी भी नही किया है । मीमासक लोग तो ' कलाप' शब्द को पुंलिङ्ग में जानते है, नपुसकलिङ्ग मे नही । किन्तु युधिष्ठिरजी ने 'कलाप' शब्द को नपुसकलिङ्ग मे समझ रक्खा है । मीमासको ने ' यत्र समाग्राङ्गोपदेश. सा प्रकृति ' यह प्रकृति का लक्षण किया है । इसी लक्षण का परिष्कृतरूप यह होगा - 'जो पदार्थ, जिस प्रकार के उपकार के द्वारा जिसका अग हुआ है, उसके सम्बन्धि के रूप मे उसी प्रकार के उपकार के द्वारा उस पदार्थ में अन्य गत्व बोधकप्रमाण को अतिदेश कहा गया है । तथाहि -जैसे प्रयाज- अनुयाजादि पर अदृष्ट उपकार और दुष्टार्थो पर दृष्ट उपकार के पदार्थ, अदृष्टार्थी द्वारा आग्नेयादि के अगरूप में अवधारित हुआ है, अत उस प्रयाजानूयाजादि पदार्थ में आग्नेयादि के सम्बन्धी के रूप से दृष्टाऽदृष्टोपकार द्वारा सौर्यादियाग-निरूपित अगत्व का बोधक 'प्रकृतिवद् विकृति. कर्तव्या' प्रकृति के समान विकृति का अनुष्ठान करना चाहिये - -यह वाक्य प्रमाण होता है । प्रयाजानूयाजादि का आग्नेयादि से सम्बन्धित होना स्वरूपतः नहीं है, किन्तु वे प्रयाजानूयाजादि पदार्थ आग्नेय की इतिकर्तव्यता के रूप में आग्नेय से सम्बन्धित होते हैं । अत. विकृतियाग के साथ होने वाली प्रयाजानूयाज की सम्बन्धिता का अवच्छेदक धर्म 'आग्नेयेतिकर्तव्यतात्व ही होगा यह स्पष्ट है । जैसे प्रकृति में भावना की इतिकर्तव्यताकाक्षा के पूरक बनकर प्रयाजानूयाजादि का भावना में अन्वय (सम्बन्ध ) होता है, जैसे ही विकृति }

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२० ९ ६ वेदार्थ पारिजातः तत्तदुपकारद्वाराऽन्वियन्तीत्यर्थः । अतश्च स्वेतिकर्तव्यताकाङ्क्षापूरकाणामङ्गानां समग्राणामाम्नान सा प्रकृतिशब्देनोच्यत इति सिध्यति । , अन्यद्यलक्षणद्वयमिति प्रदर्शित तदज्ञानमूलकम् । आपदेवेन न्यायप्रकाशे वाक्यप्रमाणनिरूपणावसरेऽनारभ्या- धीतानामङ्गाना क्व निवेश: -कि प्रकृतौ विकृतौ च? अथवा प्रकृतावेव? इति सशयमुत्थाप्य 'प्रकृतौवाऽद्विरुक्तत्वात्' इति जैमिनिसूत्रानुसारेण द्विरुक्तत्वरूपदोषनिवारणायानारभ्याधीतानां प्रकृतिगामित्वमेवेति स्वीकृत्य प्रकृतिस्वरूपनिश्चयाय ' अत्र विकृतिर्यतोऽङ्गानि गृह्णाति सा प्रकृतिरिति न प्रकृतिशब्देन विवक्षितम् इत्युक्त्वा अनारभ्याधीताना गृहमेधीयेष्टौ प्राप्तिसिध्यर्थं ' चोदकाद्यत्र नाङ्गप्राप्तिः तत्कर्म प्रकृतिशब्देन विवक्षितम्' इत्युपसहृतम् । गृहमेधीयेष्टेः प्रकृतिविकृतित्वाभावात् तत्रानारभ्याधीताङ्गाना सन्निवेशाय ग्रन्थकारेणोपायस्सूचित, न तु प्रकृतेर्लक्षणं कृतम् । अत एव प्रकरणविभागावसरे ( पृ ० ५३) तच्च ( महाप्रकरण ) प्रयाजादीना ग्राहकम्, तच्च प्रकृतावेव, यत्र समग्राङ्गोपदेशस्सा प्रकृति ' इति प्रकृतेर्लक्षणमुक्तम् । इदञ्च लक्षणं सूत्रारूढम् कृत्स्नविधानाद्वाऽपूर्वत्वम्' (जै ० सू० ८| १ | ५ ) इति सूत्रम् अग्निष्टोमस्यापूर्वत्वे -प्रकृतित्वे कृत्स्नविधानम् अभिषवादिसकलाङ्गविधान हेतुरिति सूत्रकारो वदति । अतः 'यत्र समग्राङ्गोपदेशः सा प्रकृतिः' इत्येव प्रकृतेर्लक्षणम् । ----- लक्षणद्वयप्रदर्शनस्याज्ञानमूलकत्वेऽयं हेतुः——गृहमेधीयेष्टिश्चातुर्मास्येषु वरुणप्रघासपर्वणि 'मरुद्भ्यो गृहमेधिभ्यः सर्वासा दुग्धे सायमोदनम्' इति वाक्येन विहिता । तत्र 'आज्यभागौ यजति यज्ञतायै' इत्याम्नातम् । अत्राष्टौ पक्षा. सन्ति । तेषु सप्त पूर्वपक्षा, अष्टमपक्षश्च सिद्धान्तः । ओदनद्रव्यकत्वादिदं कर्म ' इष्टि:' इत्युच्यते । इष्टीना प्रकृति: दर्शपूर्णमासी । भावना में भी तत्तदुपकार द्वारा वे ( प्रयाजानूयाजादि ) अन्वित होते है । अत अपनी इतिकर्तव्यताकाक्षा के पूरक समग्र अङ्गो का अम्नान ( पाठ ) जहा हो, उसे 'प्रकृति' शब्द से कहा गया है । और जो दो लक्षण ( प्रकृतिके ) प्रदर्शित किये है, वे अज्ञानवश ही किये गये प्रतीत हो रहे है । आपदेदने न्यायप्रकाश मे वाक्यप्रमाणनिरूपणके अवसर पर अनारम्याधीत अगो का निवेश कहा करना चाहिये? क्या प्रकृति और विकृतिदोनो मे, अथवा प्रकृति मे ही? इस प्रकार संशय जागरित कर 'प्रकृतौवाऽद्विरुक्तत्वात्' इस जैमिनि सूत्र के अनुसार द्विरुक्तत्व दोष के निवारणार्थं अनारम्याधीत अगो का प्रकृतिगामित्व बताकर प्रकृति के स्वरूप का निश्चय करने के लिये ' अत्र विकृतिर्यतोऽङ्गानि गृह्णाति सा प्रकृति. ' विकृति जहा से अगो का ग्रहण करती है, वह प्रकृति शब्द से यहाँ विवक्षित नही है, यह कहकर अनारभ्याधीतो की गृहमेधीयेष्टिमें प्राप्ति हो सके, एतदर्थ 'चोदकाद्यत्र नाङ्गप्राप्ति तत्कर्म प्रकृतिशब्देन विवक्षितम्' - अतिदेश से जहा अगो की प्राप्ति न हो उस कर्म को प्रकृति- शब्द से यहा विवक्षित किया गया है । इस प्रकार उपसहार किया है । 'गृहमेधीयेष्टि' न किसी की प्रकृति है, और न किसी की विकृति है, अत उसमें अनारम्याधीत अगो के सन्निवेशार्थं ग्रन्थकार ने उपायमात्र सूचित किया है, वह कोई प्रकृति का लक्षण नही बताया है । अत एव प्रकरण विभाग करते समय ( पृ. ५३ ) 'तत्र प्रयाजादीना ग्राहकम्, तच्च प्रकृतावेव, ' -- वह महाप्रकरण प्रयाजादिको का ग्राहक होता है, वह भी प्रकृति मे ही होता है । प्रकृति किसे कहते है? तो बताया ' यत्र समग्राङ्गोपदेश सा प्रकृति -जहा समग्र ( सम्पूर्ण ) अगो का उपदेश किया गया हो, वह प्रकृति है - इस प्रकार प्रकृति का लक्षण ग्रन्थकार ने बताया है और यह लक्षण सूत्रारूढ भी है । 'कृत्स्नविधानाद्वाऽपूर्वत्वम्' (जै० सू० ८ ११५ ) यह सूत्र अग्निष्टोम की अपूर्वता मे तथा प्रकृतित्व को प्रदर्शित करने के लिये कृत्स्नविधान कर रहा है, अर्थात् अभिषवादि सकल अगो का यहा विधान रहने के कारण अग्निष्टोम, एक अपूर्वकर्म है, वह प्रकृति | ( ),रूप कर्म है अतः अभिषवादिसकलाङ्गविधान कृत्स्नविधान ही अग्निष्टोम में अपूर्वता तथा प्रकृतित्व होने में हेतु है यह सूत्रकार ' 'ने बताया है । इस कारण यत्र समग्रागोपदेशः सा प्रकृतिः यही प्रकृति का लक्षण है । इसके अतिरिक्त दो लक्षणो को अज्ञानमूलक इसलिये कह रहे है कि 'चातुर्मास्ययाग'के वरुणप्रधास पर्व में ' गृहमेधीयेष्टि' का विधान किया गया है । वहा ' आज्यभागौ यजति यज्ञतायै' यह पढ़ा गया है । यहा पर आठ पक्ष है । उनमे सातपक्ष पूर्वपक्ष के रूप मे है, और आठवी पक्ष सिद्धान्तपक्ष है । ओदनद्रव्यक होनेसे इस कर्म को 'इष्टि' कहते हैं । इष्टियों की प्रकृति, दर्शपूर्ण- T मासेष्टि' है । दर्शपूर्णमास मे अग्नि सोमदेवताक दो आज्यभाग किये जाते है । दर्शपूर्णमास से ही इन दो यागो की प्राप्ति अतिदेश

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वेदार्थपारिजात' २० ९७ दर्शपूर्णमासयोः अग्निसोमदेवताकौ द्वौ आज्यभागयागौ स्त । दर्शमासाभ्यामेवानयोर्यागयोरतिदेशेन प्राप्तौ सत्यामस्मिन् प्रकरणे समाम्नानमाज्यभागयोः कस्मै प्रयोजनायेत्याकाङ्क्षायामिमे पक्षा तस्मिन्नधिकरणे प्रदर्शिता (पू० मी० १०७ ९) । तेषु पञ्चमाष्टमपक्षौ परिसङ्ख्याविधिपरौ - अर्थात् प्रकृतित विकृतेरितिकर्तव्यताकाङ्क्षादूरणाय प्राप्तानामङ्गाना बाधाय विकृ- तावस्मन् ‘ आज्यभागौ यजति' इति श्रुतम् । गृहमेधीये आज्यभागातिरिक्तप्रयाजानूयाजादयो नानुष्ठेयाइत्येतदर्थमिद वाक्यम् । अतिदेशेन प्राप्तेष्वङ्गेषु विधिरय तदितराङ्गपरिमख्यार्थत्वेन स्वसजातीयेतराङ्गाना यागरूपाणा प्रयाजानूयाजादीना निवर्तक इति प्राप्तबाधोऽत्र पक्षे स्वीकृत । एवं सति 'आज्यभागौ यजति' इत्यस्य प्रयाजादयो यागा न कर्तव्या इत्यर्थस्स- पद्येत । तथा च स्वार्थहानि परार्थस्वीकार प्राप्तबाधश्चेति त्रदोष्य स्यात् । अतोऽष्टम पक्ष । अस्मिन् पक्षे गृहमेधीयप्रकरण- ' 'पठितम् आज्यभागौ यजति इति वाक्य प्रकृतिवद्विकृति कर्तव्येत्यतिदेशमेव निरुणद्धि । अतिदेशत प्राप्तान् पदार्थान् न परिसञ्चष्टे, किन्त्वप्राप्तानामेव प्रयाजादीनां पदार्थाना बाधक भवतीत्यप्राप्तबाध | अर्थात् स्वप्रकरणाधीतैरेव -आज्यभाग -स्विष्ट- कृदिडोपश्वेडाभक्षणादिभिरेवेष्टेरितिकर्तव्यताकाङ्क्षोपशमात् आज्यभागादिपठिताङ्गभिन्नप्रयाजादीना परिसङ्ख्येत्यप्राप्त-बाध । अत पञ्चमपरिसङ्ख्यापक्षे विकृतित्व गृहमेधीयेष्टेस्सिध्यति, अतिदेशेन पदार्थाना प्राप्तत्वात् । अष्टमपक्षे च चोदकस्यैव-परिलोपात् विकृतित्वशङ्काया अवसर एव नास्ति । आज्यभागाद्यतिरिक्तप्रयाजानूयाजादिसमग्राङ्गोपदेशाभावान्न प्रकृतित्व-मपि । तर्ह्यनारभ्याधीताया पर्णताया निवेश कथ गृहमेधीयेष्टीभवतु? इतिशङ्कायास्समाधानाय ' चोदकाद्यत्र नाङ्गप्राप्तिः तत्कर्म प्रकृतिशब्देन विवक्षितम् इत्युक्तम् । एवञ्च गृहमेधीयेष्टि चोदकादङ्गानि न गृह्णाति, नापि च विकृत्यन्तर गृहमेधीयेष्टितोऽङ्गानि गृह्णातीति गृहमेधीयेष्टि न प्रकृति नापि विकृतिरिति सम्प्रदाय । किञ्च लेखकोऽय ९३ पृष्ठे 'प्रथम दो लक्षण प्राचीन मीमासको के हैं' इति विलिख्य तत्रो १ अङ्क टिप्पण्यर्थं प्रदाय से जब हो ही जाती है, तब इस प्रकरण में आज्यभाग का आम्नान ( पाठ ) किस प्रयोजन के लिये है? यह आकाक्षा होनेपर इन पक्षो को उस अधिकरण में प्रदर्शित किया गया है ( पू० मी ० १० / ७ / ९ ) उनमे से पाचवा और आठवाँ पक्ष परिसख्याविधिपरक है, अर्थात् विकृति की इतिकर्तव्यताकाक्षा की पूर्ति करने के लिये प्रकृति से प्राप्तहुए अगो के बाध का इस विकृतियाग मे ' आज्यभागौ यजति' यह कहा गया है । अर्थात् गृहमेधीय मे आज्यभागातिरिक्त प्रयाजानूयाजादिका अनुष्ठान न करने के लिये उक्त वाक्य को पढा गया है । अतिदेश से अगो के प्राप्त होनेपर भी ' आज्यभागो यजति' यह विधि स्वेतरागो की परिसख्या करने के लिये किया गया है, इस कारण वह स्वसजातीय ( स्वसमान) प्रयाजानूयाजादि यागरूप इतरागो का निवर्तक होता है, इसप्रकार इस पक्ष मे इसे प्राप्तबाध | ' ' ' 'कहाजाताहै तब आज्यभागौ यजति का अर्थ प्रयाजादियागो का अनुष्ठान नही करना चाहिये होगा । ऐसा अर्थ करनेपर ,,स्वार्थहानि परार्थस्वीकार और प्राप्तबाध ये तीन दोष होगे । अत अष्टमपक्ष को स्वीकार किया गया है । इस पक्ष मे गृहमेधीय ' ', ' 'प्रकरण में पठित आज्यभागौ यजति वाक्य प्रकृतिवद् विकृति कर्तव्या इस अतिदेश को ही रोक देता है । अर्थात् अतिदेशत प्राप्त हुए पदार्थों का वह परिसख्यान ( वर्जन ) नही करता बल्कि अप्राप्त प्रयाजादि पदार्थों का ही वह बाधक (निवर्तक ) होता है, ' ',,इस कारण यह आप्राप्नबाध कहा जाता है । अर्थात् स्वप्रकरणाधीत आज्यभाग स्विष्टकृत् इडाभक्षणादिसे ही इष्टि की इतिकर्तव्यता-कक्षा का उपशम होजाने से आज्यभागादिपठितअगो से भिन्न प्रयाजादि अंगो की परिसख्या होने से यह अप्राप्तबाध हैं । अत पञ्चम परि सख्यापक्ष मे गृहमेवीयेष्टि का विकृतित्व सिद्ध होता है । क्योकि अतिदेश से पदार्थ प्राप्त हो जाते है । और अष्टमपक्ष मे अतिदेशका ही लोप रहने से विकृतित्व की शंका के लिये अवसर ही नही है । आज्यभागादि के अतिरिक्त प्रयाजानूयाजादिसमग्रागोपदेश का ?अभाव रहने से उसमे प्रकृतित्व नही है । अनारभ्याधीत पर्णताका निवेश गृहमेधीय इष्टि में कैसे हो पायगा इस शका के समाधानार्थ 'चोदकाद् यत्र नाङ्गप्राप्ति तत्कर्म प्रकृतिशब्देन विवक्षितम्' -अतिदेश से जहा अगप्राप्ति नही होती, उसकर्म को 'प्रकृति' शब्द से विवक्षित किया गया है— ग्रन्थकार ने बताया है । एवञ्च गृहमेधीयेष्टि, चोदक ( अतिदेश) से अगों का ग्रहण नही करती और न अन्य कोई विकृति ही गृहमेधीयेष्टि से अगो का ग्रहण करती है, इस कारण 'गृहमेधीयेष्टि' न प्रकृति है और न विकृति ही है, यही मीमासको का सिद्धान्त है । किञ्च लेखक ने पृ ० ९ ३ पर लिखा है कि 'प्रथम दो लक्षण प्राचीन मीमासा के है' इतना लिखकर वही पर टिप्पणी लिखने के 1 २६३

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 1200 का मूल पृष्ठ
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२० ९८ वेदार्थपारिजातः टिप्पण्या लिखति -' मीमासासूत्रकार के विकृती प्राकृतस्य विधेर्दर्शनातू पुन श्रुतिरनर्थिका स्यात् ( १०७२४ ) अर्थात्, इत्यादि । इद सर्व लेखनमनन्वितम् । कि लिखामि, कि लेखनीयमित्यविज्ञायैव लिखति । जैमिनि आज्यभागाधिकरणे ( १०७ ९) प्रथमपक्षनिरूपणायेद सूत्र प्रणीतवान् । अस्मिन्नधिकरणेऽष्टौ पक्षा इति पूर्वमुक्तम् । तत्राय प्रथम पक्ष –गृहमेधी- येष्टिगत ' आज्यभागो यजति' इति वाक्य चोदकत. प्राप्तेषु पदार्थेषु केवलमाज्यभागस्यानुवादमात्र करोतीति 1 सूत्रस्यायमर्थ – अष्टसु पक्षेष्वाज्यभागवाक्य गृहमेधीयेष्टिगतमनुवादमात्र करोतीति प्रथमः पक्ष । विकृतौ-विकृति- भूताया गृहमेधीयेष्टी, प्राकृतस्य विधे: - प्राकृताङ्गकलापस्य ग्रहणात्- अतिदेशत एव ग्रहणसम्भवात् पुनः श्रुतिः ---पुनस्तत्राज्य- भागश्रुति अनर्थका स्यात् - अप्राप्तप्रापणरूपप्रयोजनशून्या स्यात् । अनुवादमात्र स्यादिति I। अत्रैव लिखति -'इस न्याय से गृहमेधीयेष्टि में यावदुत्त कर्मता मानी जाती है' । दूसरे शब्दो मे यह विकृति याग है' आदि । 'यावदुक्त कर्मता मानी जाती है' इत्यस्य कोऽर्थ? यावदुक्तमङ्गजात तदनुष्ठेयमिति तस्यार्थ । तमिममर्थ सूत्रकारोऽत्र सूत्रेण कि वदति? उपरिष्टा- ल्लिखति- ' सूत्र कार के उक्त वचन से प्रथमलक्षणानुसार गृहमेधीयेष्टि प्रकृति कर्म के अन्तर्गत परिगृहीत होती है' इति । किमनेन सूत्रेण सूत्रकारो गृहमेधीयेष्टि प्रकृत्यन्तर्गता प्रतिपादयति? प्रथमलक्षणन्तु तव ' यत्र कृत्स्न क्रियाकलापमुच्यते सा प्रकृतिः' इति । ( लेखकेन यथोक्त लक्षण तथैवात्र लिखितम्) किमनेन सूत्रेण प्रकृतेरेव लक्षणं सूत्रकार सूचयति? अहह । सर्वथा जैमिनिर्हतः । ' ( ) तस्मिन्नेत्र ९ ३ पृष्ठे नवीन मीमांसको ने द्वितीय लक्षण के तृतीय लक्षण बनाया है । यह तृतीयलक्षण न केवल क्लिष्ट है अपितु लक्षणपरिगृहीत प्रकृति -विकृति के अन्योन्याश्रय होने से अन्योन्याश्रित दोष दुष्ट भी है' इति । भो. लेखक | सावधानेन मनसा स्वीयं लेख निरीक्षस्व । त्वदीय तृतीय लक्षण 'चोदकाद्यत्र नाङ्गप्राप्ति सा प्रकृति ' इति । -?, किमस्मिन् लक्षणे प्रकृति विकृतिशब्दौ परिगृहीतौ उपनेत्र धारय लक्षणञ्चावलोकय । अत्रान्योन्याश्रयदोषञ्चोद्भावयसि । न्यायप्रकाशसन्दर्भस्य स्थिति पूर्वमेवावबोधिता । लिये अक ( १ ) देकर लेखक ने टिप्पणी में लिखा है-" मीमासासूत्रकार के 'विकृतौ प्राकृतस्य विधेर्दर्शनात् पुन श्रुतिरनर्थिकास्यात्' ( १०/७/२४ ) अर्थात्" इत्यादि । किन्तु यह सब लेख असम्बद्ध है । क्या लिख रहा हूँ, आगे क्या लिखना चाहिये? इसका विना विचार किये ही लिखता जा रहा है । प्रथमत इसे देखो, सोचो -जैमिनि ने आज्यभागाधिकरण ( १०।७।९ ) मे प्रथम पक्ष के निरूपणार्थ इस सूत्र की रचना की है । इस अधिकरण में आठ पक्ष प्रदर्शित किये गये है । उनमे प्रथम पक्ष - गृहमेधीयेष्टिगत 'आज्यभागी यजति' यह वाक्य, अतिदेश के द्वारा पदार्थों के प्रान कराये जाने पर आज्यभाग का केवल अनुवादमात्र करता है । उपर्युक्त सूत्र का अर्थ यह है- विकृतौ विकृतिभूत गृहमेवीयेष्टि मे, 'प्राकृतस्यविधे दर्शनात्' --प्राकृत अगकलाप का अतिदेश से ही ग्रहण सभव होने से, पुन श्रुति वहा पर पुन आज्यभाग का श्रवण, अनर्थिका स्यात् अप्राप्तप्रापणरूपप्रयोजन से शून्य होगा अर्थात् केवल अनुवादमात्र होगा । किन्तु लेखक इस प्रकार लिखता है - 'इस न्याय से गृहमेधीयेष्टि में यावदुक्तकर्मता मानी जाती है । दुसरे शब्दो में यह विकृतियाग ह' इत्यादि । ' यावदुक्तकर्मता माना जाती है' - इस कथन का क्या अर्थ है? 'क्या यावत् अगजान उक्त है, सबका अनुष्ठान करना' यह अर्थ है, क्या इसी अर्थ को यहा पर उक्तसूत्र से सूत्रकार कह रहे है? आगे चल कर लेखक महोदय पुन लिखते है - 'सूत्रकार के उक्तवचन से ' प्रथम णानुसार गृहमेवीयेष्टि प्रकृति कर्म के अन्तर्गत परिगृहीत होती है इति । क्या इस सूत्र से सूत्रकार ने गृहमेधीयेष्टि को प्रकृति के अन्तर्गत बताया है? लेखक महोदय कालिखा हुआ प्रथम लक्षण तो यह है-' यत्र कृत्स्न क्रियाकलापमुच्यते सा प्रकृति ' इति । क्या सूत्रकार ने प्रकृति का लक्षण इस सूत्र से इस प्रकार सूचित किया है? अरे तुमने तो सूत्रकार जैमिनि की हत्या ही कर डाली । '..... उसी ९ ३ पृष्ट पर लेखक ने पुनः लिखा है- नवीन ( तृतीय लक्षण ) न केवल क्लिष्ट है, अपितु लक्षणपरिगृहोत प्रकृति मीमासको-विकृतिने के द्वितीयअन्योन्याश्रयलक्षण केहोने से अन्योन्याश्रयदोषतृतीय लक्षणदुष्टबनायाभी हैहै' ।इतियह। } लेखक महोदय अपने लेख को किञ्चित् सावधानी से देखते तो अच्छा रहता । तुम्हारा तृतीय लक्षण 'चोदकाद् यत्र नाङ्गप्राप्ति सा प्रकृति " इति । क्या इस लक्षण में प्रकृति विकृति शब्दो का परिग्रह किया गया है? जरा आँखो से लक्षण का देखो, यहा पर अन्योन्याश्रय दोष की उद्भावना कर रहे हो । न्यायप्रकाशसन्दर्भ को हम पहले ही बता चुके है ।