वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1201–1210
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1201–1210
पृष्ठ 1201
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०९९ वेदार्थपारिजातः तस्मिन्नेव ९ ३ पृष्ठे 'विकृति याग का लक्षण' इत्यारभ्य लक्षण प्रदर्योदाहरति - 'यथा दाक्षायणेष्टि, मित्रविन्देष्टि' इति । किमह ब्रवीमि लेखकस्य बुद्धिप्रकर्षम् । द्वितीयतृतीयपादस्य चतुर्थमधिकरण 'दाक्षायणयज्ञाधिकरणम्' इति व्यव-ह्रियते । तत्र शबरस्वामी भाष्यकारो लिखति --'तस्मात् प्रकृतयोर्दर्शपूर्णमासयोर्गुणात् फलमुच्यते, न यागान्तर विधीयते ' इति न कर्तव्यस्तत्र तं(शा० भा० पृ० १२४ चौ० स० ) | लेखकमहाभागो यज्ञशब्दस्य यत्र प्रयोग कर्तव्यस्तत्र त न करोति, यत्र च प्रयुङ्क्ते । यथा - 'दाक्षायणेष्टि:' इति 'सृष्टियज्ञ ' इति । अस्य क्रतो दाक्षायणेष्टिरिति न व्यवहारो मीमासकयाज्ञिकेषु, किन्तु दाक्षायणयज्ञ इत्येव व्यवहारः । तपस्वी अय व्यवहारमिमं कथ जानातु? शाबरभाष्यस्यानुवाद पर कर्तुं प्रवृत्त, किन्तु दाक्षा- । तत्र कर्मभेद प्रतियणयज्ञ विकृति लिखति । अत्राय विषयविवेक -द्वितीयाध्यायो मीमासाया कर्मभेदाध्याय इत्युच्यते षट्प्रमाणानि स्वीकृतानि । द्वितीय-द्वितीयपादे पञ्चाना प्रमाणाना विचारो जात -शब्दान्तरम्, अभ्यास, सङ्ख्या, सज्ञा, ' साकम्प्रस्था-गुण इति । तृतीयपादे सज्ञया कर्मभेदस्यापवादो विचार्यते । तत्रेदमुदाहरणम्-' दाक्षायणयज्ञेन स्वर्गकामो यजेत यीयेन यजेत पशुकाम. ' इत्यादि । अत्र कि कर्मान्तरविधि:? अथवा गुणफलविधि? इति सन्देह । दर्शपूर्णमाससज्ञापेक्षया सर्वज्योतिरित्यत्र यथा सज्ञया कर्मभेद उपपादित, तथैवात्रदाक्षायणयज्ञ इति सज्ञान्तरमस्ति । अत ज्योति विश्वज्योति जुहुयात्'दाक्षायणयज्ञ इति सज्ञाभेदात् कर्मान्तरमिति पूर्वपक्ष । सिद्धान्तस्तु गुणफलत्रिधि । यत्रा 'दध्नेन्द्रियकामस्य नेद कर्मान्तरम् । गुणफलविधि, न कर्मान्तरम्, तथा प्रकृतदर्शपूर्णमासयोरेवैतादृशगुणयुक्तयोरनुष्ठाने फलमिद भविष्यतीति कोऽय दाक्षायणयज्ञबोधितो गुण इति चेत्, तत्रेद वाक्यमाम्नायते-'त्रिशत वर्षाणि दर्शपूर्णमासाभ्या यजेत, यदि दाक्षायण- यज्ञी स्यात् पञ्चदश वा वर्षाणि यजेत तव सम्पद्येत' इति । त्रिशत वर्षाणि दर्शपूर्णमासयाजिनो यावती दर्शपूर्णमासप्रयोग- । तत्राय वाक्यशेषः - 'द्वे पौर्णमास्यौ सख्या तावत्सख्याकदर्शपूर्णमासप्रयोगसम्पत्ति पञ्चदशवार्षिकदाक्षायणयज्ञिनो दर्शयति दिया है- ' यथा उसी ९ ३ पृष्ट पर 'विकृति याग का लक्षण' ऐसा आरंभ करके लक्षण प्रदर्शित करते हुए लेखकअधिकरणने उदाहरण'दाक्षायणयज्ञाधिकरण' , '?, ' दाक्षायणेष्टि मित्रविन्देष्टि इति । लेखक की बुद्धि को क्या हो गया है द्वितीय के तृतीय पाद का चतुर्थ न यागान्तर विधीयते इति -', है । वहाँ भाष्यकार शबरस्वामी लिखते है तस्मात् प्रकृतयोर्दर्गपूर्णमासयोर्गुणात् फलमुच्यतेतो उसका प्रयोग नही करते किन्तु (शा भा पृ. १२४ चौ स ) । लेखक महोदय यज्ञ शब्द का जहाँ प्रयोग करना चाहिये, वहाँ ' इति ' सृष्टियज्ञ ' इति । मोमासक-जहा नही करना चाहिये वहा उसका प्रयोग अवश्य करते दिखाई पडते है । जैसे -' दाक्षायणेष्टि ' शब्द से ही व्यवहार होता याज्ञिको में इस ऋतु का दाक्षायणेष्टि शब्द से व्यवहार कही भी नही किया जाता, अपितु 'दाक्षायणयज्ञ ?, मीमासासम्प्रदायप्रसिद्ध व्यवहार को क्याजाने शावरभाष्य का अनुवाद करने प्रवृत्त हुए है पाया जाता है । यह तपस्वी लेखक को कर्मभेदाध्याय कहते है । - और दाक्षायणयज्ञ को विकृति लिखरहे है । यहाँपर विषयविवेक इसप्रकार है मीमासा मे द्वितीयाध्याय उसमें कर्मभेद बताने वाले ये प्रमाण कहे हैं । द्वितीयाध्याय के द्वितीयपाद मे पाच प्रमाणो का विचार कियागया है - (( ११ )) शब्दान्तर, ( ), ( ), ( ), ( ) - मे सज्ञासे होने वाले कर्मभेद के अपवाद २ अभ्यास ३ सख्या ४ सज्ञा ५ गुण ये पाँच कर्मभेदक प्रमाण है । तृतीयपाद देकर विचार किया है कि यहाँ पर कर्मान्तर - ' ' ' ' का विचार किया गया है । वहाँ यह उदाहरण दाक्षायणयज्ञेन स्वर्गकामो यजेत पशुकाम इस संज्ञा की अपेक्षया दाक्षायणयज्ञ यह,? ' ', का विधान है या गुणफल का विधान है इस पर पूर्वपक्षी ने कहा कि दर्शपूर्णमास का उपपादन किया जाता है वैसे ही. ' ' ' सज्ञान्तर है । अत ज्योति विश्वज्योति सर्वज्योति यहाँ पर जैसे सज्ञा से भिन्न होने से कर्मभेद चाहिए । यह पूर्वपक्ष यहाँ पर भी 'दाक्षायणयज्ञ' यह संज्ञा, ' दर्शपूर्णमास' इस सज्ञा से भिन्न होने के कारण इसे कर्मान्तर ही 'कहनाहै । जैसे ' दध्नेन्द्रिय कामस्य हुआ । उस पर सिद्धान्ती ने कहा कि उक्त यज्ञ को कर्मान्तर कहना उचित नही, वह तो 'गुणफलविधिप्रकृति दर्शपूर्णमास के ही अनुष्ठान से जुहुयात्' में गुणफलविधि माना गया है, उसे कर्मान्तरविधि नही कहा, वैसे ही एतादृशगुण-, विशिष्टयह सिद्धान्त किया गया । दाक्षायणयज्ञ से, ' यह फल सम्पन्न हो जायगा अत उस दाक्षायणयज्ञ को कर्मान्तर कहना उचित नहीं है त्रिशत वर्षाणि दर्शपूर्णमासाभ्या?, बोधित किया जाने वाला गुण कौन सा है ऐसी जिज्ञासा होने पर वहाँ यह वाक्य पढा गया है— वर्ष तक जितनी दर्शपूर्णमास यजेत, यदि दाक्षायणयज्ञी स्यात् पञ्चदशवर्षाणि यजेत तर्ह्येवं सम्पद्येत' इति । दर्शपूर्णमासयाजी की तीसकरने मात्र से ही हो जाती है । प्रयोग संख्या होगी, उतनी दर्शपूर्णमास-प्रयोग संख्या सम्पत्ति दाक्षायणयज्ञी को पन्द्रह वर्ष तक अनुष्ठान
पृष्ठ 1202
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१०० वेदार्थपारिजातः ' यजेत द्वे अमावास्ये इति ॥ प्रतिपर्व द्वयोर्द्वयो प्रयोगयोरनुष्ठाने पञ्चदशवर्षेषु त्रिशत्सङ्ख्यासम्पत्तिरित्यर्थ । एवञ्च दर्शपूर्ण- मासऋतु प्रयोगावृत्तिरूपगुणयुक्तो यदि क्रियते तर्हि निर्दिष्ट फलमितिभाव । तथाच दाक्षायणयज्ञो न क्रत्वन्तरम् । ऋत्वन्त- रत्वाभावे तस्य विकृतित्व कथ स्यादिति लेखक एव जानातु । किञ्च 'प्रकृति- विकृति याग का लक्षण ' इत्यारभ्य ९४ पृष्ठे तस्योदाहरण ददाति - ' यथा अग्निष्टोम' इति । अहो मीमासापाण्डित्यं लेखकस्य । ह हो । श्रौतयज्ञवैदुष्य श्रौत-यज्ञ-मीमासाकर्तुः । लेखकस्य दयनीया शोचनीयाञ्च दशा विलोक्य म ० म० चिन्नस्वामिशास्त्रिचरणा यदि जीवदवस्थाया वर्तेरन् तर्हि नून मन्येरन् यन्मया क्षीरप्रदानेन सर्प पालित इति । ' अग्निष्टोम' शब्दोऽग्निष्टोमसस्थाकज्योतिष्टोमवाचीति लेखकोऽङ्गीकुर्यादेव । अग्निष्टोमे चेष्टयस्सन्ति पशुयागाश्व सन्त्यङ्गभूता । इष्टयश्च दर्शपूर्णमासविकृतय, पशुयागश्च दर्शविकृति पश्चन्तराणाञ्च प्रकृति । अग्निष्टोमचोक्थ्यादिमस्थाना प्रकृति । विकृति- श्वाय कस्य यागस्य? समग्राङ्गोपदेशस्यात्र सत्वात् प्रकृतित्वमभ्युपेत्यानन्तर लिखति– परन्तु उसकै एकदेश उपसदिष्टि, दीक्षणीयेष्टि, आतिथ्येष्टिरूपअवान्तरहविर्याग अपने क्रियाक्लाप को दर्शपूर्णमास से ग्रहण करते है' इति । अग्निष्टोमस्वरूप- ज्ञानरहितस्येद लेखनम् । अग्निष्टोमोक्थ्यषोडश्यतिरात्रशब्दाना तत्तत्सस्याया शक्ति, तादृशसस्थावति ज्योतिष्टोमे निरूढ-लक्षणा, तद्वति त्वन्तरे च साम्प्रतिकी, ग्रहणे स्तोत्रे च गौणीति विभाग । ततश्चाग्निष्टोमशब्दस्य तन्नामकसंस्थाया रूढि । 1 दीक्षणीयादीष्टीना तदेकदेशत्व न, किन्तु तदङ्गत्वम् । तदङ्गानामिष्टीनामग्निष्टोमपद न बोधकम् । किन्तु तत्संस्थाकयागस्यैव ज्योतिष्टोमस्य बोधकम् । अतोऽस्य प्रकृतित्वमेव, न तु प्रकृतिविकृतित्वम् । सद्गुरुचरणारविन्दाभ्यां नमः . अविच्छेदेन शिष्याचार्यपरम्परया विद्याप्राप्तिस्सम्प्रदायशब्दार्थः । अनिदंप्रथमताकात्कालात्प्रवर्तमान कश्चन इसी सम्बन्ध मे यह वाक्य शेष भी है--' द्वे पौर्णमास्यौ यजेत, द्वे अमावास्ये इति । ' प्रत्येक पर्व पर दो-दो प्रयोगो का अनुष्ठान करने पर पन्द्रह वर्षो मे तीस की सख्या सम्पन्न होती है । एवञ्च दर्शपूर्णमासऋतु को प्रयोगावृत्तिरूपगुण से युक्त यदि किया जाता है, तो निर्दिष्ट फल प्राप्त होता है, यह अभिप्राय है । तथा च 'दाक्षायणयज्ञ' कोई क्रत्वन्तर ( कर्मान्तर ) नही है । जब वह क्रत्वन्तर ही नही है, तब उसमे विकृतित्व कैसे सभव हो सकेगा? इसे लेखक ही जाने । किञ्च 'प्रकृति विकृति याग का लक्षण' यह आरम्भकर पृ० ९ ४ पर लेखक ने उसका उदाहरण दिया है-' यथा अग्निष्टोम' इति । अहो । लेखक का मीमासापाण्डित्य देखते ही बनता है । श्रौतयज्ञ की मीमासा करने वाले लेखक का श्रौतयज्ञसम्बन्धी वैदुष्य की प्रशसा तो जितनी की जाय उतनी कम (न्यून ) ही प्रतीत होगी । यदि आज म० म० चिन्नस्वामिशास्त्रिपाद जीवित होते तो बे निश्चितरूप से यह कहते कि मैने दूध पिलाकर सर्प पाला । अग्निष्टोमसस्थाकज्योतिष्टोम का वाचक 'अग्निष्टोम' शब्द है, इतना तो लेखक को कबूल करना ही होगा । अग्निष्टोम मे अगभूत अनेक इष्टियाँ और पशुयाग होते है । इष्टियाँ, दर्शपूर्णमास को विकृतिरूप है, और पशुयाग, दर्श की विकृति हे और पश्वन्तरो का प्रकृतिरूप भी हैं । अग्निष्टोम, उवथ्यादि संस्थाओ का प्रकृतिरूप है । ऐसी स्थिति में 'अग्निष्टोम' को किस याग का विकृति समझ रहे हो? वहाँ पर समग्र अंगो का उपदेश रहने से उसका प्रकृतित्व भी स्वीकार कर रहे हो, और आगे लिख रहे हो कि 'परन्तु उसके एक देश उपसदिष्टि, दीक्षणीयेष्टि आतिथ्येष्टिरूप अवान्तर हविर्याग अपने क्रियाकलाप को दर्शपूर्णमास से ग्रहण करते है ' । इस प्रकार का लेख, अग्निष्टोम, के स्वरूप का ज्ञान न रखनेवाला व्यक्ति ही लिख सकता है । अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, अतिरात्र आदि शब्दो की तत्तत्सस्था मे शक्ति है, और तादृशसस्था वाले ज्योतिष्टोम मे निरूढलक्षणा है, और तत्सस्थाविशिष्ट ऋत्वन्तर में साम्प्रतिकी लक्षणा, एव ग्रह और स्तोत्र मे गौणी है । ततश्च अग्निष्टोम शब्द, तन्नामक सस्था मे रूढ है । दीक्षणीयादि इष्टियाँ उसकी एकदेशभूत नही है, अपितु उसकी अग है । तदङ्गभूत इष्टियो का अग्निष्टोमपद बोक नही है, अपितु तत्सस्थाक याग का हो (ज्योतिष्टोम का ही ) बोधक है । अत अग्निष्टोम में प्रकृतित्व ही है । अर्थात् अग्निष्टोम प्रकृतिरूप ही है, प्रकृति -विकृति-रूप (उभयरूप ) नही है । सद्गुरुचरणारविन्दाभ्या नमः अविच्छिन्न शिष्याचार्यपरम्परा से जो विद्या प्राप्ति होती है, उसे सम्प्रदाय कहते हैं । वह दो प्रकार का होता है- 1
पृष्ठ 1203
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २१०१ ,सम्प्रदाय सन्निकृष्टकालश्वानर । तत्र मीमामासम्प्रदायश्चातिपुरातन निरुपपद मीमामापद पूर्वमीमांसाया वाचकमिनि प्रसिद्धमिदम् ॥ यथा हि 'विज्ञान' पद सयोजनेनाधुनिका स्वप्रतिपाद्यविपयस्य नूतनत्वद्योतनाय 'भाषाविज्ञानम्' 'मूर्ति-विज्ञानम्' इत्यादीनि नामानि परिकल्प्य पुस्तकानि रचयन्ति प्रकाशयन्ति च, तथैव सन्निकृष्टकालत प्राप्तसम्प्रदायानुगता केचन पूज्यविचारार्थक 'मीमाना' पद सयोज्य 'शास्त्रावतारमीमासा' श्रीतयज्ञमीमासा' इत्यादीनि नामानि कल्पयन्त ग्रन्थान्लिखन्ति लोकान् सम्मोहयितु वञ्चयितु वा । सन्निकृष्टकालेषु सम्प्रदायेषु दयानन्दप्रवर्तित कश्चन, तदनुगतश्च नाम्ना युधिष्ठिर । यथा हि स्वरचितविपय-नाम्नामन्ते 'मीमासापद' योजयति, तथैव स्वनाम्नोऽप्यन्ते 'मीमासकपद' योजयन् लोकान् प्रतारयति । तत्रापि जगति लब्धप्रतिष्ठाना मीमासकमूर्धन्याना म० म० चिन्नस्वामिचरणाना शिष्यत्वेनात्मान कथयन् मीमासाशास्त्रसिद्धपदार्थान् अन्यथा-नयन्नसौ नून महावञ्चकः । यथा लिखत्यय न तथा पूज्याः श्रीशास्त्रिण एन पाठयाम्बभूवुरिति विश्वसिमि । यज्ञेषु पशुवधाद् बिभ्यदय मीमासाया वध करोति । तेन च सत्यमेव गुरोरात्मान पीडयति । स्वय शाबरभाष्यस्य हिन्दीभाषानुवाद कर्तु प्रवृत्तः मूलभूत भाष्य विस्मरन् दयानन्दस्याशय भूमिकाया विशदयति । अश्वमारूढोऽश्व विस्मरति यथा, तथाय शबरस्वामिनं तत्सिद्धान्तञ्च विस्मृत्य भूमिकाया विचरति । सम्प्रति भूमिकाया निबद्धान् विषयान् कतिपयान् विचारयाम - ' श्रीतयज्ञमीमासा' इतिशीर्षके ' यज्ञो का क्रमिक विकास' इति लघुशीर्षकमुल्लिख्य यज्ञविकासोपपादनाय प्रथम-मेकाग्निसाध्यत्वेनाग्निहोत्र गृह्णाति लेखकः । अग्निहोत्रमेकाग्निसाध्यमेक कुर्वन्त आसन्, यतश्च तदेकवेदसाध्यम्, तदनन्तर ( १ ) अनादिकाल से चला आने वाला सम्प्रदाय, और दूसरा ( २ ) कुछ समय पूर्व से प्रारम्भ हुआ सम्प्रदाय । उनमें से मीमामा का सम्प्रदाय अनादिकालीन ह । उपपदरहित मीमासा शब्द पूर्वमीमांसा का वाचक है, यह सर्वत्र प्रसिद्ध हे । जैसे 'विज्ञान' पद जोडकर आजकल के लोग अपने प्रतिपाद्य विषय की नवीनता बताने के लिये 'भाषाविज्ञानम्' ' मूर्तिविज्ञानम्' इत्यादि नामो की कल्पनाकर पुस्तको की रचना करते है और प्रकाशित करते है वैसे ही कुछ समय से प्रारम्भ हुए सम्प्रदाय का अनुसरण करने वाले कतिपय लोग पूज्यविचारार्थक मीमासा पद को जोडकर 'शास्त्रावतारमीमासा' श्रीतयज्ञमीमासा' इत्यादि नामो की कल्पनाकर साधारण जनता को मोहित करने हेतु अथवा उनकी प्रतारणा हेतु ग्रन्थो को लिखते रहते है । कुछ समय पूर्व से प्रारम्भ हुए सम्प्रदायो मे से दयानन्द के द्वारा प्रवर्तित भी एक सम्प्रदाय है, उस सम्प्रदाय के अनुयायी ये महोदय हैं । ये स्वरचित विषयो के नाम के पीछे ( अन्त मे ) ' मीमासा' शब्द को जोडा करते है, उसी तरह अपने नाम के अन्त मे भी ' मीमासक ' शब्द को जोडकर साधारण जनता की वञ्चना करते रहते t है और अपने को भारत विश्रुत मीमासकमूर्धन्य म० म ० चिन्नस्वामी शास्त्रीजी का शिष्य बताते हुए मीमासाशास्त्रसिद्ध पदार्थो का अनादिकालीन मीमासासम्प्रदाय के विरुद्ध अर्थ का प्रचार- प्रसार कर मीमासाशास्त्र की पवित्रता को नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे है । ऐसा दुष्कार्य तो एक महान् वञ्चक ही कर सकता है । मेरा पूर्ण विश्वास है कि परमपूज्यपाद गुरुजी ( म० म० श्री चिन्नस्वामी जी ) ने कभी भी इसे ऐसा नही पढाया होगा, जैसा इसने उटपटांग लिखा है । पशुयाग की वैदिकता और उसके महत्व को न समझ पाकर मीमासाशास्त्र के वध करने पर ही उतारू हो गया है । इस कुकर्म से सममुच ही इसने पूज्यपाद मीमासकगुरुचरणो की आत्मा को महान् कष्ट पहुँचाया है । शाबरभाष्य का हिन्दी भाषा में अनुवाद करने के लिये स्वय प्रवृत्त हुए, किन्तु मूलभूत भाष्य को ही भूल गये, और उसकी जगह दयानन्द के आशय को ही भूमिका मे स्पष्ट करने लगे । जैसे घुडसवार घोडे को ही भूलजाय ठीक उसी तरह लेखक महोदय भी भगवान् शबरस्वामी और उनके सिद्धान्त को भूलकर भूमिका में विचरण कर रहे है । इन्होने मीमासाशावरभाष्य की स्वरचित भूमिका मे जिन विषयो को निबद्ध किया है, उनमें से ही कतिपय विषयो पर अब हम विचार करते है -' श्रौतपज्ञमीमासा' शीर्षक में ही 'यज्ञो का क्रमिक विकास' इस लघुशीर्षक का उल्लेख कर यज्ञविकास के उपपादनार्थ लेखक ने प्रारम्भ में एकाग्निसाध्य होने से अग्निहोत्र को लिया है, अर्थात् प्रारम्भ में एक अग्नि के होने से एकाग्निसाध्य यजुर्वेदमात्र से सम्पन्न होनेवाले अग्निहोत्र आदि होमो का ही प्रचलन हुआ । तदनन्तर दो वेदो से किये जाने के कारण दर्शपूर्णमास को अग्निद्वयसाध्य
पृष्ठ 1204
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१०२ वेदार्थपारिजातः दर्शपूर्णमासयो वेदद्वयसाध्यत्वेनाग्निद्वयसाध्यतामवगत्य दर्शपूर्णमासावनुष्ठातु लोका प्रावर्तन्त, अनन्तरञ्च त्रिभिर्वेदैस्साध्यान् ज्योतिष्टोमादीन् जानन्तो याज्ञिका अग्नित्रयेण तानन्वतिष्ठन्, तत्पश्चात् पञ्चाग्निसाध्यानि विविधानि कर्माणि कर्तुमारभन्त याज्ञिका इति यज्ञविकासक्रमोऽभिप्रेतो भद्रपुरुषस्य लेखकस्य । एव लिखतस्तस्यायमाशयो नून स्यात्——यदग्निसिद्धि दीपशलाकया भवति । एका शलाका प्रज्ज्वाल्यैकमग्निम्, शलाकाद्वय प्रज्ज्वाल्याग्निद्वयम्, शलाकात्रय प्रज्ज्वाल्याग्नित्रय सम्पाद्य कर्माण्य- क्रियन्त याज्ञिकैरिति । तदैव खलु विकासस्यावसर । विकासो नामोत्तरोत्तर वृद्धि । यथा हि कृमि-कीट -सरीसृप -द्विजादि- क्रमेण कपिपर्यन्तमागत्य कपिभ्यो मानवा जाता इति विकासस्तथैव यज्ञाना विकास इति 'श्रीतयज्ञ-मीमासा' | दयानन्द- सम्प्रदायादिय स्यान्मीमासा, न तु शबरस्वामिना, म० म० चिन्नस्वामिना वा सम्प्रदायात् । सुदृढ विश्वसिमि यत् चिन्न- स्वामिन एव विषयान् लेखक न ग्राहयामासुरिति । अत्रेय प्रक्रिया - सपत्नीकस्य साग्निकस्य विद्यावतस्समर्थस्य द्विजस्य श्रौतकर्मस्वग्निहोत्रादिष्वधिकार | विवाहावसरे प्रवेशहोमा- ख्येन कर्मणा योऽग्निस्साध्यते तस्योपासनाग्निरिति सज्ञा । अनेनाग्निना गार्हाणि कर्माणि क्रियन्ते । अयमग्नि नित्य धार्यते, प्रातस्साय तण्डुलैरौपासनहोमा भवन्ति पर्वणि समागते स्थालीपाक इति क्रमेण योनी रक्ष्यते तादृशाग्निमत श्रौतकर्मस्व- धिकार । श्रौतकर्मणामनुष्ठानार्थ प्रथममाधानाख्येन कर्मणाग्नय साधनीया । ते चाग्नयस्त्रयोभवन्ति- आहवनीय, गार्हपत्य, --, दक्षिणाग्निरिति । आधानाख्ये कर्मणि पक्षद्वय भवति असर्वाधानम् सर्वाधानमिति । क्षौमे वसानौ जायापती औपा- सनाग्नि सन्दीप्य ततोऽधं गृहीत्वा गृहीतेऽर्धाग्नावेवाधानाङ्गभूतब्रह्यौद नपाकादिक कृत्वा तमग्नि सवत्सरादिकालपर्यन्तमव- स्थाप्य तस्मिन्नुपव्युषमरणी निष्टपेत्' ( आप० श्र ० ५८५) इति विध्यनुसारेण तस्मिन्नग्नावरणी प्रतप्य तमग्निमुद्वाप्य समझकर उसका अनुष्ठान करना लोगो ने आरम्भ किया । उसके पश्चात् तीन वेदो से किये जाने वाले ज्योतिष्टोमादि को अग्नित्रयसाध्य समझकर याज्ञिक लोग उसका अनुष्ठान करने लगे । उसके पश्चात् पञ्चाग्निसाध्य विविधकर्मो का अनुष्ठान करना याज्ञिको,,, किया यह क्रमिक यज्ञ विकास लेखक ने बताया है और यही इसे अभिप्रेत है । इस प्रकार लिखने मे ने आरम्भ होगा कि यज्ञीय अग्नि की सिद्धि दीपशाला का (दियासलाई की सीक ) से हुआ करती ह । अर्थात् लेखक निश्चित रूप से यह समझा एक अग्नि, दो शलाकाओ को प्रज्वलितकर दो अग्नि, तीनशलाकाओ को प्रज्वलितकर तीन अग्नि एक शलाका को प्रज्वलितकर - - कर्मानुष्ठान किया करते थे । तभी तो विकास कहा जाय । विकास का अर्थ है उत्तरोत्तर वृद्धि का सम्पादन करके याज्ञिक लोग सरीसृप, द्विज़1 आदि के क्रम से कपि ( बन्दर ) तक पहुॅचकर उससे मनुष्य हुए - विकास माना गया। डार्विन के मत मे जैसा कृमि, कीट, विकास हुआ होगा, बस यही 'श्रीतयज्ञमीमासा' लेखक महोदय की ह । किन्तु श्रौतयज्ञो के सम्बन्ध है, ठीक उसी तरह यज्ञो का भी मे इस प्रकार मीमासा दयानन्दी- सम्प्रदाय के अनुसार ही की जा सकती है । भगवान् शबरस्वामी और तदनुगामी म० म० श्री चिन्नस्वामी अनुसार तो ऐसी हो ही नही सकती । मुझे सुदृढ विश्वास है कि पूज्यपाद श्री चिन्नास्वामी शास्त्रीजी शास्त्रीजी के सम्प्रदाय के, कहा जाता है । पढाया होगा । मीमांसासम्प्रदाय प्रसिद्ध श्रीतयज्ञो की प्रक्रिया तो इस प्रकार है जिसे वेदानुकूल ने लेखक को इस प्रकार नही अग्निहोत्रादि श्रौतकर्मो मे उसी द्विज को अधिकारी बताया है, जो सपत्नीक, साग्निक, विद्यावान् ' ', ' ' से कहा जाता है । इस अग्नि के द्वारा समय प्रवेशहोम संज्ञक कर्म से जिस अग्नि की सिद्धि की जाती है उसे औपासनाग्नि नाम और समर्थ हो । विवाह के गुह्यकर्मो का सम्पादन करते है । इस अग्नि को नित्य सुरक्षित रक्खा जाता है, प्रात' और होता है । पर्व के समय स्थालीपाक किया जाता है । इस क्रम से सुरक्षित अग्नि जिसका हो उससायद्विजतण्डुलोका से औपासन होमो का अनुष्ठान ही श्रौतकर्मो मे अधिकार बताया गया है । श्रौतकर्मो के अनुष्ठानार्थ प्रथमतः आधानसज्ञक कर्म से अग्निस्थापन करना होता है । इस प्रकार - ( ), ( ), ( ),३ सख्या तीन है १ आहवनीय २ गार्हपत्य ३ दक्षिणान्नि । आधानसज्ञककर्म के दो पक्ष है स्थापन किये हुए अग्नियो की -, ( ), ( ) | वस्त्र पहने हुए पतिपत्नी औपासनाग्नि को सन्दीप्त कर और उससे आधा अग्नि लेले । १ असर्वाधान २ सर्वाधान रेशमी ब्रह्मोदनपाक आदि करके उस अग्नि को एक संवत्सर तक रक्खे । और उस अग्नीपर 'तस्मिन्नुपव्युषमरणीनिष्टपेत्आधे लिये हुए उस अग्नि में ही आधानाङ्गभूत ' ' ( ) इस विधि के अनुसार दोनों अरणियों को तपाकर पश्चात् उस अग्नि को बाहर हटाकर पुन मन्थन करें तब आप ० श्र० ५८/५ मथित किये हुए अग्नि से
पृष्ठ 1205
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २१०३ पुनर्मथित्वा मथिताग्निना गार्हपत्याद्याधान कुर्यात् । अवशिष्टमर्धोपासनाग्नि गृह्यकर्मानुष्ठानार्थं सरक्षेत् । अयमसर्वाधानपक्ष । सर्वमप्योपासनाग्नि ब्रह्मोदनपाकार्थं परिगृह्य तस्मिन् पाकादिनिष्टपनान्त कृत्वा त सर्वमुद्वाप्य ततो मथित्वा गार्हत्यादेराधानम् । सोऽय सर्वाधान पक्ष । अनयो पक्षयोरय निष्कर्ष --अरार्वाधानपक्षे गार्ह्यकर्मणा यथावदनुष्ठानम्, सर्वाधानपक्षे तु तेषा निवृत्ति । अय पक्ष को स्मृतिकारैर्निषिद्ध । एतेनेद सिध्यति--यद् गार्हाणा श्रीतानाञ्च कर्मणामनुष्ठान प्रवाहनित्यत्वन्यायेन ऋतु- लिङ्गन्यायेन च युगयुगान्तराद् याज्ञिकमीमासकैरक्रियतेति । तत्राप्याधानेन त्रयोऽग्नयस्सिध्यन्ति --'गार्हपत्यमादधाति, आहव- नीयमादधाति, दक्षिणाग्निमादधाति' इति विधानात् । एवमग्नीन् त्रीन् आधानेन संस्कृत्य तत्र तिस्र पवमानेष्टीरनुष्ठाय यजमान प्राप्ते कालेऽग्निहोत्रादीनि कर्माण्यनुतिष्ठेदिति स्थिति । अत्राग्निहोत्रस्यैकाग्निसाध्यत्व कस्मात्सम्प्रदायादिति वक्तव्य लेखकेन --किं दयानन्दप्रवर्तितसम्प्रदायात्? उत याज्ञिकमीमासकसम्प्रदायात्? इति । यदि प्रथम कल्प तर्हि तदीयग्रन्थभूमिकायामय प्रलाप काम स्थानमर्हति, न तु शाबरभाष्यभूमिकायाम् । द्वितीय कल्पस्तु सर्वथा निराधार । यद्यैतिहासिकी दृष्टिमवलम्ब्याय लेख इति लेखको ब्रूयात्, ऐतिहासिकी दृष्टिरपि शास्त्राविरोधेनैव प्रसारणीया । इदानी वयमष्टाविंशतितमे कलियुगे वर्तामहे । सप्तविंशतिकलियुगा- स्समाप्ता । तावन्त कृतत्रेताद्वापरयुगा न्यवर्तन्त । कस्माद्युगादय श्रीतयज्ञ-विकास प्रारब्ध? किमैतिहासिकदृष्ट्या निर्णेतु शक्यते? महाभारत-वाय्वादिपुराणाना कतिपयवाक्योद्धरणमात्रेण नाय विकास साधयितु शक्य' । 'विविधक्रियाकलाप की ?? प्रकल्पना हुई' (पृ० १०५ ) इति लिखति भूमिकाकार । कस्मात्कालादिय प्रकल्पना केन चेयं प्रकल्पना कृता ?? प्रकल्पयितुरत्र किमुद्देश्यम् विविधक्रियाकलापप्रकल्पकः कस्मिन्देशे तिष्ठन् प्रकल्पयामास इत्यादयश्शतशः प्रश्नाः प्रादुर्भवेयु । प्रथममग्निहोत्र कल्पयित्वा तदनुष्ठानाय कश्चन लोकान् प्रवर्तयामास । तदनन्तर दर्शपूर्णमासौ प्रकल्प्या- गार्हपत्यादि का आवान करे । अवशिष्ट औपासनाग्नि का गृह्यकर्म के अनुष्ठानार्थ मरक्षण करे, यह असर्वाधान पक्ष है । समग्र औपासनाग्नि का ब्रह्मदनपाकार्थ परिग्रह करके उस अग्नि पर पाकादिनिष्टपनान्त कर्म करे, तदनन्तर सब का उद्वाप करे (बाहर निकाल के ) तदनन्तर पुन मन्थन कर के गार्हपत्यादिका आधान करे, यही सर्वाधानपक्ष है । उक्त दोनो पक्षो का निष्कर्ष यह है - असर्वाधानपक्ष में गृह्यकर्मो का यथावत् अनुष्ठान होता है, किन्तु सर्वाधानपक्ष मे उनकी निवृत्ति होती है । कलियुग मे स्मृतिकारो ने इस पक्ष को निषिद्ध माना है । इससे यह सिद्ध होता है कि गृह्य और श्रौतकर्मो का अनुष्ठान प्रवाहनित्यत्वन्याय से एव ऋतु लिङ्गन्याय से युगयुगान्तर से याज्ञिकमीमासा करते आ रहे थे । और आधान से ही तीनो अग्नियो को सिद्धि होती थी । क्योकि 'गार्हपत्यमादधाति, आहवनीयमादधाति, दक्षिणाग्निमादधाति' यह अग्नियो के आधान का विधान है । इसी प्रकार तीन अग्नियो का आधान से सस्कार कर वहाँ तीन पवमानेष्टियो का अनुष्ठानकर यजमान समय के प्राप्त होने पर ( यथाकाल ) अग्निहोत्रादिकर्मो का अनुष्ठान करे, यह स्थिति है । ऐसी स्थिति मे अग्निहोत्र की एकाग्निसाध्यता किस सम्प्रदाय से लेखक को ज्ञात हुई? क्या दयानन्द प्रवर्तित सम्प्रदाय से? अथवा याज्ञिकमीमासक सम्प्रदाय से? यदि प्रथम कल्प हो तो उन्ही के ग्रन्थ की भूमिका में स्थान पाकर लेखक का प्रलाप शोभा देगा । शावरशाबरभाष्यभाष्य की भूमिका मे उसकी शोभा कदापि नही होगी । द्वितीय कल्प तो सर्वथा निराधार ही है । यदि लेखक महोदय ऐतिहासिक दृष्टि के आधार पर अपने लेख को बतावे तो उसे भी शास्त्र के अविरोध से ही अपनाकर उसका उपयोग करना चाहिये । इस समय हमलोग अठ्ठाइसवे कलियुग मे बरत रहे है । सत्ताईस कलियुग समाप्त हो चुके और उतने ही कृत, त्रेता, द्वापर नामके युग भी बीत चुके । किस युग से श्रोतयज्ञ के विकास का आरम्भ हुआ? क्या इसका निर्णय ऐतिहासिक दृष्टि से किया जा सकेगा? महाभारत, वायुपुराण आदि के कतिपय वाक्यो के उद्धरणमात्र से इस विकास को बताना सम्भव नही है । लेखक महोदय पृ० १०५ पर 'विविधक्रियाकलाप की प्रकल्पना हुई' लिखते है । किस काल से यह प्रकल्पना हुई? किसने यह प्रकल्पना की? कल्पना करने वाले का क्या उद्देश्य था? विविध क्रियाकलाप की [ कल्पना करके वाले ने किस देश मे स्थित होकर कल्पना की? इत्यादि सैकडो प्रश्न पैदा हो सकेंगे । प्रथमत अग्निहोत्र की कल्पना कर उसके अनुष्ठापनार्थ किस ने लोगो को प्रेरित किया । तदनन्तर दर्शपूर्णमास की कल्पना कर उसके अनुष्ठापनार्थ कोई दूसरा प्रेरक हुआ । तदनन्तर प्रथमयज्ञ की कल्पनाकर उसके अनुष्टापनार्थ तीसरा प्रेरक आया । तदनन्तर उक्थ्यादिसस्थाक क्रतुओ की कल्पनाकर
पृष्ठ 1206
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१०४ वेदार्थ पारिजातः नुष्ठानुमपर प्रेरक कश्चनाभूत् । तदनन्तर प्रथमयज्ञ कल्पयित्वा तदनुष्ठानाय तृतीयस्समागत । तदनन्तरमुक्थ्यादि- सस्थाकान् क्रतून् कल्पयित्वा तदनुष्ठानाय चतुर्थ आगत । एव ऐष्टिकान् पशुकान् सौमिकाश्च क्रतून् प्रकल्प्य पञ्चमोऽनुष्ठापयामास । एष एव खलु क्रमो विकासस्य । एव निरूपयन् महाभागो न जिह्वेतीति महदाश्चर्यम् । नित्यस्स आत्मा गुरु सर्वमिद निशम्य नूनमवाङ्मुखो रुदेदित्येव मे प्रतिभाति । विषयमेन परिष्कर्तु मीमासका राजमार्ग प्रवर्तयाम्बभूवु । अयञ्च सिद्धान्तस्सर्वैरेवैष्टव्य -यन्महर्षयो लक्ष्यैकचक्षुष इति ॥ यथा- यथा लक्ष्याणि तथा तथा लक्षणानि महर्षिभिरक्रियन्त । श्रुतिरिति श्रुतमिति च वेदाना शास्त्राणाञ्चाभिधाय-कम् ॥ अस्मच्चिरन्तना' श्रुत्वा तदवधार्य वेदान् शास्त्राणि च सरक्षितवन्त, वेदोदितानि कर्माणि च यथायथमन्वतिष्ठन् । सन्दिग्धाश्च विषयान् गोष्ठीषु सम्भूय सुविचार्य निर्णीतवन्त । एव गच्छति काले आयतौ लोकाना विस्मरणशक्तिमवधार्य सूत्रैर्विषयान् जग्रन्थु । सूत्राध्ययनेन विषयावबोधे तद्धारणे च क्लिश्यतो लोकानवगत्य भाष्यप्रभृतयो ग्रन्था रचिता । एव विकासो ग्रन्थानामेव जात, न तु श्रौतस्मार्तयज्ञाना विकास । यज्ञाना सङ्कोचविकासावनुष्ठानरूपेण निर्णेतव्यौ भवतः । अनुष्ठानार्थमेवोच्चावचा यज्ञा वेदेषु विहिता, न तु केवल ग्रन्थेभ्योऽवगत्यर्थम् । पुस्तकविरचनानन्तर लोकैस्तदनुष्ठान कृतमिति कल्पन न साधु, किन्त्वनुष्ठानविषयीभूताना कर्मणा सङ्ग्रह पुस्तकरूपेण सञ्जात इति कल्पनमुचितम् । अयमेव न्यायस्सर्वेषु शास्त्रेष्वतिदेष्टव्य | जगतो नित्यत्व प्रसाधयता मीमासकानामयमेव पन्था । अस्मिन्नेव पथि श्रीशबरस्वामिनो विचरन्ति । , मीमासाशास्त्रेऽधीयमाने स्पष्टमवगम्यते यत्सूत्ररचनाकाले यज्ञाना विस्तार कियानासीदिति । प्रत्यधिकरण तत्सम्बन्धि विषयवाक्यं सूत्रेष्वन्तर्हित वय पश्यामः । तानि च वाक्यानि प्राय कर्मविधायकानि । कर्मणामनुष्ठानावसरे यदि कश्चन सन्देह, तन्निर्णायैव मीमासान्यायाः प्रवृत्ता । न्यायाश्वमे तासु तासु महर्षीणा गोष्ठीषु निर्णीता एव जैमिनिनोपनिबद्धा | उसके अनुष्ठापनार्थ चौथा प्रेरक आया । एव ऐष्टिक, पाशुक, सौमिकऋतुओ की कल्पनाकर उनके अनुष्ठापनार्थ कोई पाँचवा आया । यही विकास का क्रम होगा । इस प्रकार विकास क्रम को बताते हुए लेखक महोदय को लज्जा का अनुभव क्यो नही हुआ, यह भी एक महान् आश्चर्य है । मुझे लग रहा है कि लेखक महोदय के प्रलाप को सुनकर पूज्य गुरूजी की आत्मा निश्चित ही अवाङ्मुख होकर अवश्य रोती होगी । यज्ञीय विषय को परिष्कृत करने के लिये मीमासको ने राजमार्ग का निर्माण कर दिया था । हमारे महर्षिगण लक्ष्यैकचक्षुष्क थे, यह सिद्धान्त सभी को मानना ही होगा । जैसे -जैसे लक्ष्यो को देखा तदनुसार वैसे- वैसे ही लक्षणो को महर्षियो ने किया । श्रुति और श्रुत शब्द वेदो और शास्त्रो के बाचक है । हमारे पूर्वजो ने श्रवण तथा अवधारण कर वेदो और शास्त्री का सरक्षण किया था । ओर वेदोदित कर्मो का यथाविधि वे लोग अनुष्ठान किया करते थे । और जब कभी सन्देह उपस्थित होता था तब गोष्ठिया किया करते थे, उनमे सम्मिलित होकर सन्दिग्ध विषयो पर विचार करते हुए निर्णय किया करते थे । इस रीति से कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात् भविष्य मे लोगो की स्मरणशक्ति की क्षीणता का विचार कर ऋषियो ने अपने विचारित, निर्णीत विषयो को सूत्ररूप में ग्रथित कर दिया । आगे चल कर पुनः बढती हुई विचारशक्ति की क्षीणता तथा विस्मरण शक्ति के कारण सूत्रो से विषय का आकलन तथा उसे ठीक -ठीक निर्णय कर पाने मे लोगो को जब कठिनाई होने लगी, तब तत्कालीन महान् कर्मठ विद्वानो ने उन सूत्रो पर भाष्य - रचे, वृत्तिया रची, टीकाएँ, टिप्पणिया-रची, वार्तिक रचे । इस प्रकार विकाश जो हुआ, वह ग्रन्थो का ही हुआ, श्रौतस्मार्त यज्ञो का नही । यज्ञो के सकोच-विकास का निर्णय तो उनके अनुष्ठान से ही किया जा सकता है । अनुष्ठान के लिये ही छोटे-बडे यज्ञो का विधान वेद से किया गया है । ग्रन्थो से केवल उन्हे जान लेने मात्र के लिये नहीं । पुस्तक की रचना होने के बाद लोगो ने उन कर्मो का अनुष्ठान किया, ऐसी कल्पना करना उचित न होगा बल्कि अनुष्ठान किये जाने वाले कर्मों का सग्रह पुस्तकरूप से किया गया, यह कल्पना करना समुचित होगा । इसी नियम को सभी शास्त्रो के सम्बन्ध मे समझना चाहिए । जगत् की नित्यता सिद्ध करने वाले मीमासको का यही मार्ग है । इसी मार्ग पर श्री शबर-स्वामी विचरण करते हैं । मीमासा शास्त्र के अध्ययन करने पर स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाता है कि सूत्ररचना काल में यज्ञो का विस्तार कितना था । प्रत्येक अधिकरण में तत्संबंधित विषय वाक्य को सूत्र मे अन्तहित हुआ हम देखते है । वे वाक्य प्राय. कर्म विधायक है । कर्मानुष्ठान के अवसर पर यदि कोई सन्देह उत्पन्न हो जाय तो उसके निर्णय के लिये ही मीमासा-के न्याय प्रवृत्त हुए है । समय- समय
पृष्ठ 1207
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २१०५ जैमिनिसूत्राणा पूर्वं समाजे कर्मणामनुष्ठानमेव नासीत् सत्यप्यनुष्ठाने तद्विपरीतमेवासीदित्युपपादन दुष्करम् । 'यज्ञोपवीतिना कर्तव्यम्' 'दक्षिणाचारेण कर्तव्यम्' इत्यादिस्मृतीनामाविष्कारात्पूर्व याज्ञिका एव नासन्, सत्स्वपि तेषु विनैव यज्ञोपवीतेन, दक्षिण शय परित्यज्य वामहस्तेन कर्माण्यनुष्ठीयन्ते स्मेति प्रसाधन कठिनम् । अतो यज्ञाना विकास इत्यैतिहासिक दृशोपपादन युक्तिविहीनम् । अग्निहोत्र दर्शपूर्णमासौ चातुर्मास्यानीति त्रिविधानामेव यज्ञाना प्राचीनत्व महाभारतश्लोकेनोपपादयति १०५ पृष्ठे । यज्ञाना स्वरूपनिरूपणाय न खलु व्यासाचार्येण महाभारत लिखितम् । यज्ञस्वरूपाणामवगमाय ब्राह्मणानि श्रौतसूत्राणि कल्पा एवाद्रियन्ते, न तु पुराणानि । तत्राप्यय श्लोक किं प्रतिपादर्यात? 'धीमत ' तस्य राज्ञो वान्यस्य वानुष्ठानविषयत्वेनाग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ चातुर्मास्यानि चासन् । 'तेषु धर्मंस्सनातन ' इत्ययमशस्तेषा प्राचीनत्वप्रतिपादनाय न प्रवृत्त, किन्तु सोऽनु- ष्ठाता इमान्येवानुतिष्ठन्नासीदिति बोधयितुं प्रवृत्त । 'इन तीन यज्ञो को ही प्राचीन यज्ञ कहा हैं' इति लेखकस्य पक्ति । लेख- केनोद्धृते पद्ये त्रयाणा यज्ञत्व न कीर्तितम् । पद्ये प्रयुक्त धर्मपद यज्ञपर मत्वा लिखति । न खलु धर्मयज्ञशब्दौ पर्यायौ भवत । मीमासासिद्धान्तरीत्या याग-दान होम द्रव्य -गुण-जातयो धर्मा भवन्ति । न हीमे यज्ञा । लेखकवाक्ये 'यज्ञो को ही' इति 'ही ' पदं व्यावर्तक प्रयुक्तम्, न तुद्धृतपद्ये विद्यमानमेवपदमिममर्थ ब्रवीति ' धीमत इमान्येव कर्माण्यासन्' इति । न तु 'तेष्वेव धर्म: ' इत्यन्वयः । यज्ञानां प्राचीनत्वमर्वाचीनत्वमिति विभागो हास्याय भवेत् । तस्मिन्नेव पृष्ठे 'प्रारम्भिक यज्ञो मे सादगी तथा सात्त्विकता' इति शीषके प्रारम्भिकयज्ञानाम् अग्निहोत्र -दर्श- पूर्णमास-चातुर्मास्याना 'सादगी' सामान्यरूपताम् सत्त्वगुणसम्पन्नताञ्चोपपादयति लेखक: | 'प्रारंभ में जिन यज्ञो की कल्पना की गई वे यज्ञ अत्यन्त सादे तथा सात्त्विक थे ' इति पङ्क्ति । अनयेदमवगम्यते -यदग्निहोत्रदर्शपूर्णमास-चातुर्मास्यानि सत्त्व- पर हुई महर्षियो की तत्तद्गोष्ठियो में निर्णीत किये गये ये न्याय है, उन्ही न्यायो को जैमिनि ने सूत्रो में निबद्ध किया है । जैमिनि की सूत्ररचना के पूर्व समाज में कर्मानुष्ठान ही नही होता था, और यदि होता भी हो तो कुछ विपरीत ही होता होगा, यह कहना कठिन है । ' यज्ञोपवीतिना-कर्तव्यम्' दक्षिणाचारेण कर्तव्यम् इत्यादि स्मृतियो के आविष्कार के पूर्व याज्ञिक ही नही थे, और यदि हो भी तो दाहिने हाथ के बजाय बाँये हाथ से ही कर्मानुष्ठान करते होगे, यह सिद्ध करपाना बडा कठिन है । अत ऐतिहासिकदृष्टि से यज्ञो के विकास का उपपादन करना युक्तिहीन है । पू. १०५ पर लेखक महोदय ने महाभारत का श्लोक देकर अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य इन तीन प्रकार के यज्ञो को ही प्राचीनता बताने का विफल प्रयास किया है । लेखक को इतना तो सोचही लेना था कि व्यासाचार्य ने यज्ञो के स्वरूपनिरूपणार्थं ,,,महाभारतनही लिखा । यज्ञका स्वरूप जानने के लिये तो याज्ञिकलोग ब्राह्मण श्रौतसूत्र कल्पादिग्रन्थो को ही देखा करते है पुराणो फिर भी जिस श्लोक को उद्धृत कियागया है, वह क्या बता रहा है? ' घीमत उस राजा या किसी अन्यव्यक्ति के अनुष्ठानको नही का विषय अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, और चातुर्मास्य था । अर्थात् बुद्धिमान् राजा या अन्य व्यक्ति अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्ययाग ' ', 'किया करता था । तेषु धर्मः सनातन यह अश उनकी प्राचीनता को नही बता रहा है । अपितु वह अनुष्ठाता इन्ही कर्मों का अनुष्ठान करता रहता था' यह बताने के लिये यहाँ दिया गया है।I 'इन तीन यज्ञो को ही प्राचीन यज्ञ कहा है' यह लेखक की पक्ति है । लेखक के द्वारा उद्धृत किये गये पद्य में तीनो को यज्ञ नही कहा है । पद्य में प्रयुक्त धर्म पद को यज्ञ परक मानकर ,,,,,लेखक ने लिखा है । धर्म और यज्ञ शब्द दोनी पर्याय नही है । मीमासा सिद्धान्त के अनुसार याग दान होम द्रव्य गुण जाति को धर्म कहते है, ये यज्ञ तो नही है । लेखक के वाक्य में ' यज्ञो को ही' लिखा है, उसमे व्यावर्तक 'हि' पद का प्रयोग किया गया है । 1 उद्धृत पद्य में विद्यमान 'एव' पद इस अर्थ को बता रहा है - 'बुद्धिमान् के ये ही कर्म थे ' इति । 'उन्ही मे ( वे ही ) धर्म' नही है-,यह अन्वय है । यज्ञो का प्राचीनत्व अर्वाचीनत्व विभाग करना उपहासास्पद है । } उसी पृष्ठ पर 'प्रारम्भिकयज्ञो मे सादगी तथा सात्त्विकता' इस शीर्षक में लेखक ने अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य इन प्रारम्भिकयज्ञो की सामान्यरूपता और सत्वगुणसम्पन्नता को बताया है । 'प्रारम्भ में जिन यज्ञो की कल्पना की गई, वे यज्ञ अत्यन्त सादे २६४
पृष्ठ 1208
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१०६ वेदार्थपारिजातः गुणसम्पन्नानि नामान्यरूगण्याडम्बर रहितानि एतदतिरिक्तानि च कर्माणि रजस्तमोगुणभूयिष्ठानि न साधारणरूपाणि आडम्बरसहितानीति । नहि भेरीपटहादिवाद्यवादनपुरस्सर क्वचिदाडम्बरेण कर्माणि क्रियन्ते, नापि विविधस्यूतवस्त्रपरि- धानेन कर्माण्यनुष्टीयन्ते, न चापि संवादपत्रेषु कर्मणा रूपाणि प्रकाश्य साडम्बर कर्माण्याचरन्ति । 'आडम्बर' इत्यस्य कोऽर्थ,? किं विहिताङ्गाना यथावदनुष्ठानम्? तत्तु कर्तव्यमेव । तत्राम्बरस्य कः प्रसरः? यथाग्निहोत्रादय पूर्वोत्तराङ्गसहिता अनुष्ठीयन्ते तथैव तदतिरिक्ता अपि क्रतव । अङ्गानामनुष्ठाने विधिरेव खल्वस्माकमवलम्बः । तेषा विकासे सङ्कोचे वा न वय स्वतन्त्राः । अनुष्ठानम् अननुष्ठानं वा विधिप्रयुक्त भवति । एष मीमांसकाना पन्था । सत्त्वादयोगुणाश्चेतनसम्बद्धा, न कर्म- सम्बद्धाः । सात्त्विकाः प्राणिनो भवन्ति, न कर्माण्यचेतनानि भवन्ति । पशूद्रव्यसम्बन्धेन कर्मणा साडम्बरत्वम् तमोगुणसम्प- न्नत्वञ्च न भवति । पशुद्रव्यसम्बन्धरहिताना कर्मणामनुष्ठानाय यः प्रयोजक, स एव तत्सम्बद्धकर्मणामनुष्ठायापि । कर्मणो द्वे रूपे - द्रव्य देवता च । उभयमपि विधिगम्यम् । विधिमतिक्रम्य विधिञ्चानादृत्य द्रव्यस्य देवताया वा ग्रहण न याज्ञिक- मीमासका कुर्वन्ति । पशुद्रव्यसम्बन्धेन कर्मणस्तमोगुणयुक्तत्वकथन लेखकस्यैवावैदिकत्वं ज्ञापयति । वैदिकत्वमवैदिकत्व वा निर्णेतु वेद एवावलम्ब । अवैदिकत्वेन परिगण्यमान पशु वैदिक एव । यस्मादेव प्रमाणादग्निहोत्रादयोऽनुष्ठेया इति निश्चीयते, तस्मादेव प्रमाणात्पशुद्रव्यसम्बद्धयागा अपि । नानाशाखासु लक्षशस्सोमयागा विहिता अनुष्ठेयत्वेन । तेष्वेकोऽपि सोमयागस्तादृशो न भवति यत्र पशुयागोऽङ्ग न भवति । मोमासाया शतशोऽधिकरणानि सन्ति, यत्र पशुयागसम्बन्धिन , पदार्था परीक्षिता । अनुष्ठानस्यैव रूपान्तरं श्रौतसूत्र नाम । आपस्तम्बकात्यायनाश्वलायनादयो महर्षय पशुयागानां स्वरूपं निरूपयन्ति स्वस्वसूत्रेषु । न हीमे जनसग्रहाय द्रव्यप्राप्तये कोर्तिप्रसाराय वा प्रभूतान् ग्रन्थान् लिखितवन्त । न ही समाजवञ्चका । तथा सात्त्विक थे, यह लेखक की पड़क्ति है । इस पक्ति से यह बोध होता है कि अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य ये तीन सत्त्वगुणसम्पन्न और सामान्यरूप के तथा आडम्बररहित थे । इनके अतिरिक्त जो कर्म है, वे रजस्तमोगुण बहुल है, साधारणरूप के नही है और आडम्बर सहित है । क्या कही भेरी, पटह आदि वाद्यो को बजाकर आडम्बर के साथ कर्म किये जाते है? क्या कही विविध प्रकार से सिले कपडो को पहनकर कर्मानुष्ठान किये जाते है? क्या संवाद पत्रो मे (वृत्तपत्रो मे) कर्मो के रूपको प्रकाशित कर बडे आडम्बर के साथ कर्म किये जाते है? ' आडम्बर' शब्द से क्या तात्पर्य है? क्या विहित अङ्गो का यथावत् अनुष्ठान करना आडम्बर है? अङ्गो का यथावत् अनुष्ठान करना तो कर्तव्य ही है । उसमे आडम्बर का प्रश्न ही कहा है? जैसे अग्निहोत्रादि कर्मो का अनुष्ठान पूर्वोत्तराङ्गसहित किया जाता है, वैसे ही तदतिरिक्त क्रतुओ का भी अनुष्ठान किया जाता है । विधि के आधार पर ही अङ्गो का अनुष्ठान याज्ञिकलोग करते है । उनके विकास या सकोच करने में याज्ञिक लोग स्वतन्त्र नही होते । अनुष्ठान या अननुष्ठान विधिप्रयुक्त हुआ करता है, यही सीमासको का मार्ग है । सत्त्वादि गुण तो चेतन से सम्बद्ध रहते है, कर्म से नहीं । सात्त्विक प्राणि हुआ करते है, अचेतन कर्म नही । पशुद्रव्य से सम्बन्धितहोने मात्र से ही कर्मो को आडम्बरपूर्ण या तमोगुण सम्पन्न नही कहा जा सकता । पशुद्रव्य सम्बन्ध रहित कर्मों के अनुष्ठान में जो प्रयोजक ( अनुष्ठापक ) है, तत्सम्बद्ध कर्मों के अनुष्ठान में भी वही प्रयोजक है । द्रव्य और देवता ये दो रूप कर्म के हुआ करते है । वे दोनो ही विधिगम्य रहते है । विविका उल्लङ्घन या अनादर करते द्रव्य या देवता का ग्रहण (स्वीकार ) याज्ञिक - मीमासको के द्वारा कभी नही किया जाता । पशुद्रव्य का सम्बन्ध रहने मात्र से कर्म को तमोगुणयुक्त कहना लेखक की अवैदिकता को ही प्रकट कर रहा है । वैदिकता अथवा अवैदिकता का निर्णय वेद के आधार पर ही किया जाता है । अवैदिक समझा जाने वाला पशु वैदिक ही है । जिस प्रमाण के आधार पर - अग्निहोत्रादि कर्मो को अनुष्ठेय माना जाता है, उसी प्रमाण के आधार पर पशुद्रव्य सम्बद्ध यागो को भी अनुष्ठेय कहा जाता है । नानाशाखाओ मे लाखों सोमयाग अनुष्ठेयरूप में विहित है । उनमे एक भी सोमयाग ऐसा नही है, जिसमे पशुयाग का अगत्वेन अगरूप मे विधान न हो । मीमासा मे शतश अधिकरण ऐसे हैं, जिनमे पशुयाग सम्बन्धी पदार्थों का परीक्षण किया गया है । अनुष्ठान का ही रूपान्तर श्रौतसूत्र है । आपस्तम्ब, कात्यायन, आश्वलायनादि महर्षियो ने अपने अपने सूत्रों में पशुयागों के स्वरूप का निरूपण यथाविधि किया है । इन महर्षियों ने 'जनसङग्रहार्थ या द्रव्यलाभार्थ अथवा यशकी पिपासा से नानावन्यो की रचना नही की है । और ये समाजवञ्चक भी नही है ।
पृष्ठ 1209
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजात. २१०७ " यज्ञेषु बाह्याडम्बरविषये शतपथवाक्य यज्ञो हि वा अन इत्याद्युद्धृत्य लेखको यत्किञ्चिद्वदति तत्सर्वं प्रलापरूपम् । तन्मतेनेद वाक्य यज्ञेषूत्तरोत्तर परिवर्तनबोधकम्. बाह्याडम्बरा भावप्रदर्शकञ्च । अत्रेयं स्थिति -दर्श- पूर्णमासयागे हविर्निर्वापार्थ गार्हपत्यस्य पश्चाद्भागे व्रीहिभिर्यवैर्वा पूरितं शकटमवस्थित भवति । ' धूरसि धूर्व धूर्वन्तम्' इत्या- दिमन्त्रेण दक्षिणा युगधुरमभिमृश्य 'त्वं देवानामसि' इत्यादि मन्त्रेण उत्तरामीषा स्पृष्ट्वा 'विष्णुस्त्वाऽऽक्तूंस्त' इति सव्ये चक्रे दक्षिण पादं निक्षिप्य 'अहृतमसि' इत्यादिमन्त्रेणारुह्य 'उरू वाताय' इति धान्योपर्याच्छादित कटमपसार्य ' मित्रस्य त्वा ' ' चक्षुषा प्रेक्षे इति पुरोडाशार्थ ग्रहणयोग्यान् व्रीहीन् प्रेक्ष्य निरस्तरक्षः इत्यादिना मन्त्रेण पुरोडाशानर्हान् तृणान् तुषाश्च निरस्य 'उर्जाय व पयो मयि धेहि' इत्यभिमन्त्र्य ' चित्ति स्रुक' 'चित्तमाज्यम्' इत्यादि दशहोतृमन्त्रान् जपित्वा पवित्र शूर्पे निधाय, पवित्रवत्या वा अग्निहोत्रहवण्या चतुर्वार हविषा निर्वाण कर्तव्य । तत्र मुष्टित्रय समन्त्रक चतुर्थश्च तूष्णी गृह्यत ', इति । अस्या स्थितौ शतपथवाक्य पश्याम यज्ञो वा अन । यज्ञो हि वा अनस्तस्मादनस एव यजूषि सन्ति न कौष्ठस्य न कुम्भ्यै भस्त्रायै ह स्मर्षयो गृह्णन्ति तद्वृषीन् प्रति भस्त्रायै यजूष्यासु तान्येतहि प्राकृतानि यज्ञाद्यज्ञ निर्ममा इति तस्मादनस एव गृह्णीयात्' ( श ० ब्रा० ११२७ ), इति समग्र ब्राह्मणम् । अत्र लेखको लोकान् वञ्चयितु ब्राह्मणस्यान्तिम ' यज्ञाद्यज्ञ निर्ममा इति तस्मादनस एव गृह्णीयात्' इति भाग न प्रदर्शितवान् । स्वप्रतिपाद्यविषयस्य यावान् भागोऽनुकूलस्तावन्मात्रस्य ग्रहणम् अवशिष्टस्य च परित्याग इति वञ्चकाना सरणि । ब्राह्मणभागेऽनसो यज्ञरूपत्वमुपक्रम्योपसहारे ' तस्मादनस एव गृह्णीयात्' कीर्तितम् । प्रथमं शकटाद्धविर्ग्रहणेऽनसो यज्ञरूपत्व प्रतिपाद्य तस्माद्धविर्ग्रहण कर्तव्यम्, तत्र हेतु प्रतिपादित -' अनस एव यजूषि सन्ति' इति । अर्थात् ' धूरसि' इत्यादीना यजुर्मन्त्राणा शकटसम्बन्धित्वमस्तीति । अत एव तैत्तिरीयशाखाया ' यथायजुरेव तत्' ( ) ' ' तै ० ब्रा० ३२४ इत्युक्तम् । अनन्तर भखाप्रसङ्गमुत्थाप्य तत्रयजुस्साङ्गत्य प्रतिपाद्य तान्येतहि प्राकृतानि इत्यशेन भस्त्राया यज्ञसम्बन्धित्वाभावमुक्त्वा अनसो यज्ञरूपत्वात्तस्मा देव हविर्गृह्णीयादित्युपसंहारः कृतः । इय स्थिति शतपथ- यज्ञो में बाह्याडम्बर बताने के लिये " यज्ञो हि वा अन " इस शतपथ वाक्य को उद्धृतकर लेखक ने जो कुछ कहा है, वह सब प्रलापमात्र है । लेखक उक्त वाक्य को यज्ञगत उत्तरोत्तर परिवर्तन का बोधक और बाह्य आडम्बर के अभाव का प्रदर्शक समझ रहा हे । प्रस्तुत प्रसग इस प्रकार है - दर्शपूर्णमास याग में हविर्निवपि करने के लिये गार्हपत्य के पश्चिम भाग मे ( पीछे) व्रीहि या यव से भरा एक शकटस्थित रहता है । ' धूरसि ' मन्त्र से दक्षिण युगधुरा का स्पर्श करना होता है । तत 'त्व देवानामसि' मन्त्र से उत्तर ईषा का स्पर्श करते है । अनन्तर ' विष्णुस्त्वाऽऽक्रस्त इस मन्त्र से सव्य (वाम ) चक्र पर दक्षिण पैर रखा जाता है । तब ' अद्भुतमसि' मन्त्र से उस पर चढते है । पश्चात् 'उरुवाताय० ' मन्त्र से धान्य पर आच्छादनार्थ डाली हुई चटाई को दूर करना होता है, तब 'मित्रस्यत्वा चक्षुषा प्रेक्षे ' मन्त्र से पुरोडाशार्थ ग्रहण करने योग्य व्रीहियों को अपनी दृष्टि से देखता है तदनन्तर ' निरस्तलक्ष ' इस मन्त्र से पुरोडाश के अयोग्य तृणो और तुषो को निरस्त किया जाता है । 'ऊर्जाय व पयो मयि धेहि' इस मंत्र से अभिमन्त्रण किया जाता है, 'चित्ति स्रुक' ' चित्तमाज्यम्' इत्यादि दश होतृमन्त्रो का जपकर पवित्र को शूर्प में रखकर, पवित्रवती या अग्निहोत्र-हवणी से चार बार हवि का निर्वाण किया जाता । निर्वाण करते समय तीन मुट्ठियों को समन्त्रक और चौथी को तूष्णी ग्रहण करते हैं । इतना होने पर शतपथवाक्य 'यज्ञो वा अन ' का विचार करे । " यज्ञो हि वा अनस्तस्मादनस एव यजूंषि सन्ति, न कोष्ठस्य न कुम्भ्यै भस्त्रायै ह स्मर्षयो गृह्णन्ति तद्वृषीन् प्रतिभस्त्रायै यजू ध्यासु तान्येतहि प्राकृतानि यज्ञाद्यज्ञं निर्ममा इति तस्मादनस एव गृह्णीयात्" (श० ब्रा० १ १/२/७) यह सम्पूर्ण ब्राह्मण है । लेखक महोदय ने लोगो की वञ्चना करने के लिये ब्राह्मण के अन्तिम ' यज्ञाद् यज्ञ निर्ममा इति तस्मादनस एव गृह्णीयात्' भाग की प्रदर्शित नही किया । वो की यही पद्धति होती है कि अपने प्रतिपाद्य विषय के अनुकूल जितना भाग होता है, उतने को ही वे दिखाते है और अवशिष्ट भाग को छिपालेते है । ब्राह्मणभाग में शकट ( अनस) की यज्ञरूपता बताने का उपक्रम ( आरंभ) कर उपसहार में 'तस्मादनस एव गृह्णीयात्' कहा । शकट से हविर्ग्रहण कर्तव्य होने पर प्रथमत शकट को यज्ञरूप बताया, और उस यज्ञरूप शकट से हविर्ग्रहण करने को कहा, उसमें हेतु यह है कि ' अनस एव यजूंषि सन्ति' शकट हो यजु होते हैं । अर्थात् ' धूरसि' इत्यादि यजुर्मन्त्र शकटसम्बन्धी है । अतएव तैत्तिरीयशाखा मे ' यथा यजुरेव तत्' (तै० ब्रा० ३१२१४ ) कहा है । इसके अनन्तर भस्त्राप्रसग को उठाया गया है, और उसमे यजु की संगति बताकर 'तान्येताहि प्राकृतानि' इस अंश से भस्त्रा मे यज्ञसम्बन्धित्व का अभाव बताया गया है । एवंच अनस ( शकट ) को यज्ञरूपता के कारण उसी
पृष्ठ 1210
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२१०८ वेदार्थपारिजातः ब्राह्मणस्य । गार्हपत्यस्य पश्चादनोऽवस्याप्य तस्माद्धविग्रहगे आडम्बरो दोष, भस्त्रातो हविर्ग्रहणे 'सादगी' साधारणरूपो गुण इति लेखकस्याभिप्राय. । 'तस्मादनस एव गृह्णीयात्' इत्युपसंहारभागस्य का गतिरिति न चिन्तित लेखकेन । तस्य भागस्य प्रच्छादनेन परवञ्चनाप्रावीण्य प्रदर्शितम् । 'तान्येतहि प्राकृतानि' इति भागस्यार्थस्तेन क्रियते — 'इसलिए ये याजुषमन्त्र सामान्य है (कही पर भी इनका विनियोग हो सकता है) इति । 'एतहि' एव सति 'तानि' यजूंषि ' प्राकृतानि' असम्बद्धानि भवेयुः, कुत इति चेत् ' यज्ञाद्यज्ञ निर्ममा इति' 'यज्ञो वा अन ' इत्यनसो यज्ञरूपत्वकथनाद्यज्ञाद्यज्ञस्य निर्माण यत, 'तस्मा- दनस एव गृह्णीयात्' इति सङ्गति । उपक्रमानुसारेणोपसहार. कर्तव्य इति मीमासान्यायः । उपक्रमेऽनसो यज्ञरूपत्वम् ' अनस एव यजूंषि सन्ति' यजुषामनोऽर्थप्रकाशकत्वञ्चाभिधायोपसहार क्रियते तस्मादनस एव गृहीयात्' इति । श्रुतेर्मातु. मीमासाया भगिन्याश्च केशाः लेखकहस्ते सलग्ना । स्वेच्छानुसारेण मातर भगिनीञ्च कर्षतीव लेखक | द्रौपद्याःकेशाकर्षणेन वस्त्राकर्षणेन च दुश्शासन इव मे प्रतिभाति युधिष्ठिर । कथमन्यथा न वदेत् 'कही पर भी इनका विनियोग हो सकता है' इति श्रुत्या लिङ्गेन वाक्येन समाख्यया वा मन्त्राणा विनियोग इति मीमासक्रमर्यादा । एभि प्रमाणैर्मन्त्राणा विनियोगे स्थिते 'कही पर भी इनका विनियोग हो सकता है ' इत्यनर्गल प्रलपति । अनन्तर 'याज्ञिक क्रियाओ मे उत्तरोत्तर परिवर्तन हुआ है' इत्यारभ्य वत्र निरुक्त प्रमाणयति - 'असावादित्य इति पूर्वे याज्ञिका ' ( ७२३ ) इति । वैश्वानरशब्दार्थप्रसङ्गे निरुक्तमिदम् । पूर्वे याज्ञिकास्साक्षात्कृतधर्माणः असौ पुरोदृश्यमान आदित्य एव वैश्वानर इति वदन्तीति निरुक्तस्थार्थ । चतुर्विंशखण्डे आदित्यस्य वैश्वानरत्वोपपादनाय 'यथो एतद्' 'यथो एतद्' इत्येव पूर्वेषा याज्ञिकाना ब्राह्मणवाक्यानि प्रदर्श्य तस्य तस्य समाधान कृत निरुक्तकारेण । लेखकोक्तप्रकारेण याज्ञिक-क्रियाणा परिवर्तनं भवतीतिनोक्तम् । केवलं वैश्वानरशब्दार्थविषये विवाद प्रदर्शित । स्वोक्तस्य किमपिकिमपि प्रमाण से हविर्ग्रहण करना चाहिये, यह कह कर उपसहार किया है, यह शतपथब्राह्मणोक्त प्रसग इस प्रकार बताया गया । लेखक को गार्हपत्य के पृष्ठभाग मे शकटको स्थापितकर उससे हविर्ग्रहण करने में आडम्बर दिखाई देता है और भस्त्रा से हविर्ग्रहण करने में ' सादगी' दिखाई देती है । किन्तु लेखक ने यह नहीं सोचा कि 'तस्मादनस एव गृह्णीयात्' इस उपसहारभाग की क्या गति होगी? इस उपसहार भाग को छिपाकर अपनी परवञ्चनाकुशलता को ही लेखक ने प्रदर्शित किया है । 'तान्येताहि प्राकृतानि' इस अश का अर्थ लेखक इस प्रकार करते है कि ' इसलिये ये याजुषमन्त्र सामान्य है ( कही पर भी इनका विनियोग हो सकता है ) । उपर्युक्त अश का वास्तविक अर्थ इस प्रकार होगा -'एतहि' ऐसा होने पर 'तानि' वे यजु 'प्राकृतानि' असम्बद्ध होगे, क्योकि ' यज्ञाद् यज्ञ निर्ममा' इति । 'यज्ञो वा अन ' से अनस् की यज्ञ-रूपता कथन करने के कारण जब कि यज्ञ से यज्ञ का निर्माण है, उस कारण शकट से ही हविर्ग्रहण करना चाहिये, 'तस्मादनस एव गृहीयात्' यह सङ्गति हो जाती है । 'उपक्रम के अनुसार उपसंहार करना होता है' यह मोमासा का न्याय है । उपक्रम मे अनस् की यज्ञरूपता और यजुओ की अनोऽर्थप्रकाशकता बताकर उपसहार मे 'तस्मादनस एव गृह्णीयात्' कहा गया है । द्रौपदी के केशाकर्षण और वस्त्राकर्षण करनेवाले दु शासन के समान भगवती श्रुतिमाता तथा मोमासाभगिनो की चोटी पकड़कर उन्हें मनमाने खीचा जा रहा है । माँ-बहिनो के स्वरूप को बिगाडने वाले लोग 'कही पर भी इनका विनियोग हो सकता है' इस प्रकार की कौन सी अन्यथा बात नही कह सकते? विनियोग करने की एक मर्यादा मीमासको ने बताई है— कही श्रुति से तो कहो लिङ्ग से, क्वचित् वाक्य से अन्यत्र समाख्या से मन्त्रो का विनियोग हुआ करता है मनमाने की पर भी विनियोग तो मनचले लोग किया करते है । आगे चलकर ' याज्ञिक क्रियाओ में उत्तरोत्तर परिवर्तन हुआ है, यह लिखकर उसमे निरुक्त का प्रमाण लेखक ने दिया है -'असावादित्य इति पूर्वे याज्ञिका" ( ७ २३ ) इति । उक्त निरुक्तवाक्य को वैश्वानर शब्द का अर्थ बताने के प्रसग में कहा गया है । निरुक्तकार ने बताया कि शब्द प्रमाण के द्वारा धर्म का साक्षात्कार करनेवाले याज्ञिको ने सामने दिखाई देनेवाले इस आदित्य को ही वैश्वानर' शब्द से कहा है । चौबीसवें खण्ड में आदित्य के वैश्वानरत्व का उपपादन करने के लिये पूर्ववर्ती याज्ञिको के 'यथो एतद्' यथो एतद् ब्राह्मण वाक्यों को प्रदर्शित कर ननद् वाक्यों का समाधान निरुक्तकार ने किया है । लेखक के समान 'याज्ञिक क्रियाओं मे , परिवर्तन दोनो कहा । निवकार ने केल वैश्वानर गन्द के अर्थविषयक विवाद को प्रदर्शित किया है । लेखक महोदय