वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1211–1220
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1211–1220
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वेदार्थपारिजातः २१० ९ प्रदर्शनीयम्, तदाकरनिदेश कर्तव्य, येन च लोका मन्येरन् -अय बहुश्रुत इति । अनन्तर यदेव शतपथब्राह्मणाद्वाक्यमुद्धृत तस्य द्वितीयनिष्कर्षो लिखित -'पुराकाल में यज्ञो मे बाह्याडम्बर नही था' इत्यादि । यथायथमस्योत्तर दत्तमेव । इदमत्राश्चर्यम्शतपथवाक्यस्य भस्त्राश यज्ञेषु 'सादगी' साधारणरूपता- बोधकत्वेन ग्राह्य, तत्पूर्व तदुत्तरञ्च शकटसम्बन्धी अश आडम्बरबोधकत्वेनाग्राह्य । कुक्कुटाण्डस्याधो भाग प्रसवाय, अर्धश्च भक्षणायेतिवल्लेखकस्य सरणि । यज्ञेषु हविर्ग्रहण शकटाद्वा भवतु भस्त्रातोवा । द्वयोरपि प्रमाणगम्यतावश्यकी ॥। यदग्राह्यतद्गृह्णाति यच्चग्राह्य तत्परित्यजतीति लेखकस्य गति । पौर्णमासेष्टी प्रधानयागाना त्रयाणा सम्पादनायैकैकस्य प्रधानस्य मुष्टिचतुष्टयक्रमेण द्वादशमुष्टिपरिमितानामेव द्रव्याणा निर्वाप कर्तव्य, तदर्थं शकटस्य का आवश्यकता? यस्मात्कस्माच्चित् लघुसाधनाद् घटादेर्निर्वाप कर्तुं शक्यते, शकटोपस्थापनमाडम्बरद्योतकमित्यादि लिखति । न प्रधुमिच्छामि – चतुर्मुष्टिपरिमिता व्रीहयो ग्राह्या इति भद्रपुरुषेण त्वया कथ ज्ञातमिति । यदि स्वेच्छ्येति ब्रवीषि तर्हि चतुस्सख्यातो न्यूनाधिकसख्याया आपादने तन्निवारकसामग्री का तव वर्तते? यदेव प्रमाणं चतुर्मुष्टिनिर्वापावबोधकं तदेव शकटाद हविर्ग्रहणस्यापि । तह्यडम्बरस्य का कथा । आडम्बरपरित्यागाय वस्त्रमुत्तरीयञ्च परिहाय कौपीन धृत्वा सञ्चरेत्युक्ते किमप्युत्तर तवास्ति? इदमत्र ज्ञातव्यम् —–कर्माण्यैहिकफलकानि ऐहिकसवलितामुष्मिकफलकानि, आमुष्मिकफलकानि च भवन्ति । तत्रैहिकफलकेषु ऐहिकसवलितामुष्मिकफलकेषु च कर्मसु परिवर्तनं देशकालानुरोधेन किश्चिदिव परिलक्ष्येत, आमुष्मिक फलकेषु ने तो मन में यह ठान लिया है कि कुछ भी कहना और उसके औचित्य को किसी तरह सिद्ध करने के लिये कुछ भी प्रमाण दे देना, और आकर निर्देश कर देना, जिससे लोग समझे कि यह लेखक महोदय बडे बहुश्रुत है । लेखक ने तो हिन्दी की इस उक्ति: कही की ईंट और कही का रोडा, भानुमती ने कुनबाजोडा, को सचमुच चरितार्थ करके दिखा दिया । इसके बाद पुन' लेखक ने पहले उद्धृत किये हुए शतपथब्राह्मण वाक्य का ही निष्कर्ष भी लिखा है- 'पुराकाल में यज्ञो मे वाह्याडम्बर नही था' इत्यादि । इसका यथार्थ उत्तर देही चुके है । यहाँ एक आश्चर्य की बात यह है कि शतपथवाक्यस्थ भस्त्राश, यज्ञो की सादगी ( साधारणरूपता ) का बोधक समझना और उसके पूर्व तथा उसके उत्तर जो शकटसम्बन्धी अश है, उसे आडम्बर बोधक समझना कहा है । जैसे कोई अण्डभक्षी व्यक्ति कहे कि कुक्कुण्टाण्ड का अर्धभाग प्रसव के लिये और अर्धभाग भक्षण के लिये हैं, ठीक उसी तरह लेखक की यह लेखनसरणि है । यज्ञेषु हविर्ग्रहण शकट से हो चाहे भस्त्रा से, दोनो में प्रमाणगम्यता तो आवश्यक ही है । किन्तु लेखक महोदय तो स्वबुद्धिविपर्यास के वशीभूत होकर जो अग्राह्य है, उसे तो ग्रहण कर रहे है और जो ग्राह्य है उसे त्याग रहे । यही आश्चर्यं ह । लेखक महोदय का कहना है कि पौर्णमासेष्टि मे तीन प्रधान यागो के सम्पादनार्थ प्रत्येक प्रधान के लिये चार चार मुष्टिक्रम से बारह मुष्टिपरिमित द्रव्यो का ही निर्वाण कर्तव्य है । तब उसके लिये शकट की क्या आवश्यकता? जिस किसी साधनभूत छोटे घड़े से भी निर्वाण किया जा सकता है, उसके लिये शकट का उपस्थापन करना आडम्बर का हो द्योतक है । लेखक महोदय से हम पूछना चाहते है - चतुर्मुष्टिपरिमित ही व्रीहि का ग्रहण करना आपने कैसे जाना? अपनी इच्छा से, यदि कहो तो चार से न्यून अथवा अधिकमुष्टिपरिमित व्रीहि का निर्माण क्यो नही? इस प्रश्न का उत्तर लेखक के पास कुछ नही है, अंत स्वीकार करना होगा कि चतुर्मुष्टिनिर्वाप का बोधन जिस प्रमाण से हुआ, वही प्रमाणशकट से हविर्ग्रहण करने के लिये बता रहा है ऐसी स्थिति में पाठक ही स्वय विचार करले कि इसमें आडम्बर को कौन सी बात है । यदि कोई लेखक से ही कह बैठे कि धोती, दुपट्टा, कुर्ता ये सब आडम्बर है, उस आडम्बर को हटाने के लिये इन वस्त्रो का परित्याग करो और कौपोन (लगाटी ) धारण कर घूमा करो, तो लेखक के पास क्या उत्तर होगा? यहाँ पर ज्ञातव्य है — कतिपय कर्म, ऐहिक फलक होते है, और कुछ कर्म, ऐहिक-आमुष्मिकफलक तथा कुछ कर्म आमुष्मिक. -फलक ही होते हैं । उनमे से ऐहिकफलक और ऐहिक मुळे कर्मों में देश कालानुरोधेन किञ्चिन्मात्र परिवर्तन देखा जा सकता
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२११० वेदार्थपारिजातः तेषु किमपि परिवर्तनं नाभूदिति वक्तु शक्यते । तत्रापि श्रौतकर्मसु सर्वेषु परिवर्तनस्य प्रसङ्ग एव नास्ति । हविश्शकटविषये सोमयागमण्डपविषये च यदुक्त पृष्ठे १०६ तत्रदेमुच्यते - नात्र पदार्थाना परिवर्तनम्, त एव शकटमन्त्रा अधुनापि जप्यन्ते, त एव च मण्डपनिर्माणप्रकारा, किन्तु प्रयोगे कियानिव भेद. परिलक्ष्यते, सोऽपि सकारणक ' । 'यावज्जीवमग्निहोत्र जुहोति' 'यावज्जीव दर्शपूर्णमासाभ्या यजेत' इत्यादिविधिभि. यावज्जीव कर्तव्यत्वेन विहितानामग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादीना सायप्रात - कालयो पर्वणि चानुष्ठान भवति । नात्र पदार्थाना परिवर्तनं भवति । किन्तु सकारणक प्रयोग सायप्रात कालावच्छिन्न- पर्वकालावच्छिन्नश्च सङ्कोच्यते । तथैव प्रत्यक्ष धान्यपूरित शकटमवस्थाप्य हविर्ग्रहणाभावेऽपि यथाविधिपदार्था अनुष्ठीयन्त एव, तथैव मण्डपनिर्माणेऽपि । तत्काले यदि मण्डपनिर्माणाय यजमान प्रवर्तेत तर्हि प्रयोगसमवेत कालमतिक्रामत् । अतः प्रथम मण्डप निर्माय तत्स्पर्शनमनुष्ठीयते । अत्र पदार्थपरिवर्तनस्य क प्रसङ्ग । देशकालयोर्भेदेन तदवच्छिन्नपदार्थाना ' ' परिवर्तनमिव लक्ष्यते । पूर्वा वै देवानाम् अपराह्न पितॄणाम् इति विध्यनुसारेण पूर्वाह्नादिकालसग्रहाय प्रयोगस्य क्वचिद्भेद परिदृश्यते । न तावता परिवर्तनमापादयितुं शक्यम् । तदनन्तरं 'श्रीतयागो में पुत्री के प्रति हीन भावना के निदर्शक वचन पठित है, जिन्हे यजमान प्रयाजसंज्ञक याग के पश्चात् आशी के रूप मे पढता है' इति लिखति । उद्देशत्यागानन्तर तत्तद्यागमनु यजमानेन पठ्यमानोमन्त्रः अनुमन्त्रण मन्त्र इति कथ्यते न त्वाशीर्मन्त्रः । तत्र पञ्चानामपि प्रयाजाना पञ्चानुमन्त्रणमन्त्रास्सन्ति - 'एको ममैका तस्य, यश्व नो द्वेष्टि यच वयं द्विष्म, द्वौ मम द्वे तस्य, यश्च नो द्वेष्टि, त्रयो मम तिस्रस्तस्य यश्च नो द्वेष्टि, चत्वारो मम चतस्रस्तस्य, यश्च नो द्वेष्टि, पञ्च मम न तस्य किञ्चन' इति मन्त्राणामाकारा । अत्र लेखको दोषमुद्भावयति - यत् श्रौतयज्ञेषु पुत्रीणा विषये हीन- है, किन्तु आमुष्मिकफलक कर्मों मे कुछ भी परिवर्तन नही हुआ है यह दृढता के साथ कहा जा सकता है । तत्रापि किन्ही भी श्रौत- कर्मो मे परिवर्तन का तो कोई प्रसग ही नही है । पृ० १०६ पर हविश्शकट के विषय मे और सोमयाग के मण्डप के विषय मे जो लिखा है, उसका उत्तर तो यह है —यहाँ पदार्थो मे कोई परिवर्तन नही हुआ है, वे ही शकटमन्त्र, जो पहले कहे जाते थे, उन्ही को आज भी कहते है । मण्डप निर्माण का प्रकार जो पहले था, उसी को आज भी किया जाता है । यद्यपि प्रयोग मे किञ्चिन्मात्र भेद लक्षित हो सकता है तथापि वह, सकारणक है, निष्कारण नही है । 'यावज्जीवमग्निहोत्र जुहोति' ' यावज्जीव दर्शपूर्णमासाभ्या यजेत ' इत्यादि विधियो से यावत् जीवन कर्तव्यरूप से विहित अग्निहोत्र - दर्शपूर्णमासादिकर्मो का साथ प्रात काल में और पर्व में अनुष्ठान किया जाता है । यहाँ पदार्थो का कोई परिवर्तन नही किया जाता । किन्तु साय-प्रात काल मे, और पर्वकाल मे उक्त कर्मों का सकारण सकोचमात्र किया जाता है । उसी तरह हविर्ग्रहण के अभाव में भी धान्य से पूर्ण प्रत्यक्ष शकट को वहाँ स्थापित कर पदार्थों का यथाविधि अनुष्ठान तो किया ही जाता है । उसी तरह मण्डप निर्माण मे भी । यह सकोच इसलिये किया जाता है कि यदि उसी समय यजमान मण्डप निर्माण कराने मे लग जाय तो प्रयोगसमवेत (अनुष्ठान से सम्बन्धित) काल का उल्लङ्घन हो जायगा । अत प्रथमत मण्डप का निर्माण कराकर अनुष्ठान ? - उससे केवल स्पर्श किया जाता है । इसमें पदार्थ परिवर्तन का प्रसग ही क्या है देश काल के भिन्न होने से तदवच्छिन्न के समय सम्बन्धित ) पदार्थो में परिवर्तन सा लक्षित होता है । 'पूर्वाह्णेो वै देवानाम्' ' अपराह्न पितॄणाम्' इस विधि के अनुसार ( देश -काल से के सङ्ग्रहार्थ प्रयोग में क्वचिद् भेद दिखाई देता है । उतने मात्रा से उसे परिवर्तन कहना उचित नही है । पूर्वाह्लादिकाल तदनन्तर लेखक ने लिखा है- 'श्रतयागो मे पुत्री के प्रति हीनभावना के निदर्शक वचन पठित हैं, जिन्हे यजमान प्रयाज सज्ञक याग के पश्चात् आशी • के रूप मे पढता है' इति । उद्देशत्याग के अनन्तर तत्तद्याग के बाद यजमान के द्वारा पढे जाने वाले मन्त्र को अनुमन्त्रण मन्त्र कहते हैं, वह आशीर्मन्त्र नही हैं । वहाँ पर पाँचो प्रयाजो के पांच अनुमन्त्रण मन्त्र है--"एको मम एका यच नो द्वेष्टि यञ्च वयं द्विष्मः । द्वौ सम द्वे तस्य यश्च नो द्वेष्टि । त्रयो मम तिस्त्रस्तस्य यश्व नो द्वेष्टि । चत्वारो मम चतस्त्रस्तस्य " तस्य;; है— यच नो द्रेष्टि । पञ्च मम न तस्य किचन । ये मन्त्रों के आकार है । इन मन्त्रो को देखकर लेखक महोदय ने कल्पना की ' ) -है श्रोत यज्ञों में पुत्रियों के विषय में । कन्याओं के प्रति हीनभावना के प्रकाशक मन्त्र पढ़े जाते हैं । वस्तुत- इस प्रकार के पुत्र पुत्री के
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वेदार्थपारिजातः २१११ भावनाप्रकाशका मन्त्रा पठ्यन्ते । पुत्राणा पुत्रीणाञ्च विषये भेदभावजनका प्राचीनकाले नामन् अर्वाचीनकाल एवाभवन् । अस्य च भेदभावस्य परिणामोऽद्यतनेष्वनुभूयते यद् जातमात्राया पुत्र्या हनन क्रियत इति । वक्रतायामप्रतिहता गतिर्लेख- ।, कस्य । मन्त्रे सङ्ख्यावाचकशब्देषु एक एका द्वौ द्वे एव पुलिङ्गस्त्रीलिङ्गवाचका प्रत्ययास्सन्ति । नत्र पुल्लिङ्ग- वाचकैश्शब्दे पुत्रा उच्यन्ते स्त्रीलिङ्गवाचकैश्च तै पुत्र्य उच्यन्ते । अत्र पुलिङ्गशब्दैर्वृक्षा उच्यन्ताम्, स्त्रीलिङ्गगब्दैश्च लता-उच्यन्ताम् इति प्रश्ने कृते किमप्युत्तरमस्ति लेखकस्य । मन्त्रेषु पुत्र पुत्री वा नोक्त, पुस्त्वस्त्रीत्वपरिचायकप्रत्ययमात्रं वयं पश्याम । तत्र पुत्रपुत्र्योरेवग्रहण कर्तव्यमिति न निर्बन्ध | सख्यावाचकशब्देषु चतुरशब्दपर्यन्तमेव लिङ्गद्वये भिन्नरूपाणि भवन्ति, पञ्चप्रभृतिषु शब्देषूभयत्र समानं रूपमिति प्रदर्शयितु मन्त्रा इमे सन्तीति कथने को दोष? अत एव शतपथब्राह्मण- इयमाख्यायिका - असुरराक्षसैस्सह देवा अस्त्रैश्शस्त्रैश्च युद्ध कुर्वन्त पराजयमवाप्य सम्भूय निश्चितवन्त यद् वाग्युद्ध कुर्म इति । तादृशारशब्दा उच्चारणीया यैश्च मिथुनभाव प्रतीयेत इति समय विधाय प्रथममिन्द्रं व्याहर्तुं प्रवर्तितवन्त । स आह-एको ममेति । इतरे च एका ममेति । द्वो मम द्वेमम, त्रयो मम तिस्रो मम चत्वारो मम चतस्रो ममेति क्रमेणोक्ते इन्द्र. पञ्च- ममेत्युक्तवान् इतरेऽपि पञ्च ममेत्युक्तवन्त । अनेन वाग्युद्धेन पराजिता असुरराक्षसा इति । अस्तु । एक एका इत्यादिशब्दैः पुत्र पुत्री च गृह्यत इति । तत्र पुत्र्या हीनभाव कथमुन्नीयते? अह पुत्र कामये न कन्याम् । अपर कन्या कामयते न पुत्रम् । एतावता मन्त्रोऽय समाजे पुत्रीविषय हीनभाव जनयतीति कथ साध्यते? किञ्च युधिष्ठिर एकोऽजातात्रु, अन्ये सर्वे जात- शत्रवः । शत्रूणा हानिर्भवत्विति कामना नासमीचीना । तेन पुत्र्या हीनभावोऽनेन बोध्यत इति कथन कथ सङ्गच्छताम् । अजातशत्रुरेव युधिष्ठिरो लेखक श्रुति मातर भगिनीञ्च मीमासा केशेषु गृहीत्वा कर्षति यदा तदा पुत्र्या हीनभावो नानुचित. । भेद का प्रादुर्भाव बहुत उत्तरकाल में हुआ, यह भेद-भाव प्राचीन काल मे नही था । इस भेद-भाव की परिणति उत्तरकाल मे सद्य उत्पन्न कन्या ( पुत्री) की हत्या में हुईं' । किन्तु वस्तुस्थिति यह नही है । श्रौतयज्ञो का ज्ञान न होने से लेखक ने इस प्रकार लिखा है । मन्त्र के सख्यावाचक शब्दो मे 'एक एका द्वो हे' इस प्रकार पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग वाचक प्रत्यय है । उनमें से पुलिङ्ग वाचक शब्दो से पुत्र बताये गये है और स्त्रीलिंग वाचक शब्दों से पुत्रियाँ बताई गई है । इसी प्रसग में यदि लेखक से पूछा जाय कि यहाँ पर पुल्लिङ्ग शब्दो से वृक्ष क्यो नही कहे जाते, और स्त्रीलिङ्ग शब्दो से लताएँ क्यो नही कही जाती? तो लेखक के पास क्या कोई उत्तर होगा? मन्त्रो मे पुत्र या पुत्री तो कही नही है, पुंस्त्व, स्त्रीत्व के परिचायक प्रत्ययमात्र को हम देख रहे है है । वहाँ पर पुत्र-पुत्री का ही ग्रहण किया जाय ऐसा कोई निबन्ध तो है नही । संख्यावाचक शब्दो मे चतु शब्द तक ही दो लिगो के भिन्न-भिन्न रूप होते है । पञ्च से लेकर आगे के शब्दो मे दोनो लिंगो के रूप समान होते है, यह बताने के लिये ' मन्त्रा इमे सन्ति' इस प्रकार कहने मे क्या दोष है? अतएव शतपथ ब्राह्मण में यह आख्यायिका है- असुर राक्षसों के साथ देवताओ ने अस्त्र-शस्त्रो के द्वारा जब युद्ध किया और देव पराजित हुए, तब सबने मिलकर निश्चय किया कि अब इनके साथ वाग्युद्ध करे । ऐसे शब्दो का उच्चारण किया जाय कि जिनसे मिथुनीभाव प्रतीत हो, ऐसी मन्त्रणा ( समय) करके उन्होने प्रथमत इन्द्र से कहना प्रारम्भ किया । देवो मे से एक ने कहा- ' एको मम', औरो ने कहा- 'एका मम । एक ने कहा- 'द्वौ मम' तब औरो ने कहा- ' द्वे मम' । इसी प्रकार 'त्रयो मम', 'तिस्रो मम ' 'चत्वारो मम ',, 'चतस्रो मम' इस प्रकार क्रमश कहने पर इन्द्र ने 'पञ्च मम' कहा । तब औरो ने भी 'पञ्च मम' कहा । इस प्रकार के वाग्युद्ध से असुर- राक्षस पराजित हुए । अस्तु । एक, एका इत्यादि शब्दों से पुत्र और पुत्री का भी यदि ग्रहण किया जाय तो भी पुत्री के प्रति आपकी हीनभाव की कल्पना क्योकर हुई? मै पुत्र चाहता हूँ, कन्या नही, अन्य व्यक्ति कन्या चाहता है, पुत्र नही 1 । इतनी इच्छा करने मात्र से यह मन्त्र समाज में पुत्री के प्रति हीनभाव को पैदा करता है, यह कहाँ सिद्ध हो रहा है? किञ्च युधिष्ठिर एक अजात शत्रु है, बाकी सभी जातशत्रु है । शत्रुओ की हानि हो, यह इच्छा करना तो असमीचीन नही है । 'इससे पुत्री के प्रति हीनभाव का बोधन हो रहा है, यह कथन कहाँ सगत हो रहा है? धर्मराज युधिष्ठिर तो अजातशत्रु ही है, किन्तु लेखकमात्र भगवती श्रुतिमाता की और मीमासा भगिनी की चोटी पकड कर जब खीचता है, तब पुत्री के प्रति हीनभाव की कल्पना उसे अनुचित प्रतीत J 1 नही होती?
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२११२ वेदार्थपारिजातः पश्वालम्भविषये १७७ पृष्ठे चरकस्य प्रमाणमुद्धृत्य पश्वालम्भो न कर्तव्य, पशुयागा प्राचीनकाले नाक्रियन्त, अधुनैव ते श्रोतयागेषु प्रवेशिता इत्यादिक लिखित लेखकेन । लेखक - अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्याना सात्त्विकत्वमनुष्ठेयत्वञ्च स्वीकरोति । त यदि कश्चन पृच्छेत्-अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादीनामनुष्ठेयत्वेन चरके न कीर्तितम्, वर्हि कथ तेषामनुष्ठेयत्वमङ्गी- करोषि इति 1। लेखकोऽत्र किमुत्तर दद्यात्? विधिनिषेधयोस्स्वरूप किञ्चिदिवावगन्तव्यं लेखकेन -विधय प्रवृत्त्यनुकूलव्यापार- मभिदधत' पुरुषान् इष्टसाधनीभूते कर्मणि प्रवर्त्तयन्ति । निषेधाश्चानिवर्तनाम| भदधत पुरुषात् अनिष्टसाधनीभूतात्कर्मणो निवर्त्तयन्तीति स्थिति । तत्र निषेधवाक्येषु नभो लक्षणया निवर्तनार्थकत्वम्, धात्वर्थस्य च तत्र तात्पर्यग्राहका । तेन निषेध्य- स्यानर्थहेतुत्वाक्षेपद्वारा पुरुषनिवर्तकत्वेन तेषामर्थवत्वम् । यथा 'नानृत वदेत् । 'न कलञ्ज भक्षयेत्' इत्यादि । अत्र ममर्थस्य प्रत्ययार्थशब्दभावनायामन्वय । अत्र प्रत्ययार्थशब्दभावनायामन्वये 'तस्य व्रतम्' इति बाधकं भवति तत्र 'नेक्षेतोद्यन्तम्' इत्यादौ पर्युदास -ईक्षण- भिन्नस्सङ्कल्प कर्तव्य इति । यत्र तथान्वये विकल्पप्रसक्तिर्बाधिका 'नानूयाजेषु' इत्यत्र तत्रापि पर्युदास - अनुयाजव्यतिरिक्तेषु ' ये यजामहः ' कर्तव्य इति । विकल्पप्रसक्तावपि यत्र क्रत्वर्थविधिनिषेधयो पर्युदासस्यासम्भवः तत्र 'नातिरात्रे षोडशिन गृह्णाति' इत्यादौ विकल्प एव । यथा ग्रहणस्य ऋतूपकारकत्व तथा ग्रहणाभावस्यापि । यत्र प्राप्ती रागत निषेधश्च पुरुषार्थतया तत्र 'न कलञ्जं भक्षयेत्' इत्यादौ न विकल्प किन्तुप्रतिषेध एव । यत्र पुरुषार्थतया शास्त्रतः प्राप्ति निषेधश्व शास्त्रत क्रत्वर्थतया तत्र 'दीक्षितो न ददाति न पचति' इत्यादौ न विकल्प प्रतिषेधएव । निषेध्यानुष्ठाने तु क्रतोर्वैगुण्यम् । पू० १०७ पर लेखक ने पश्वालभ के विषय में चरक के प्रमाण का उद्धरण देकर 'पश्वालम्भ नही करना चाहिये, पशुयागो का अनुष्ठान --प्राचीन काल मे नही किया जाता था । अर्वाचीनकाल मे ही श्रौतयागो में उनका सन्निवेश किया गया है', इत्यादि प्रलाप किया है । लेखक ने अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य यागो की सात्त्विकता और अनुष्ठेयता को स्वीकार किया है, किन्तु यदि कोई उससे पूछ बैठे कि चरकने अपने ग्रन्थ में कही भी अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास आदि यागो की अनुष्ठेयता तो बताई नही है, तब उनकी अनुष्ठेयता को तुम कैसे स्वीकार कर रहे हो? इस प्रश्न पर लेखक महोदय क्या उत्तर दे पायेंगे? पहले तो विधि- निषेध के स्वरूप को लेखक महोदय थोडा सा समझ ले । विधियाँ प्रवृत्त्यनुकूलव्यापार को बताने वाले पुरुषो को इष्टसाधनीभूत कर्म मे प्रेरित करती है, और निषेध निवर्तना बताने वाले पुरुषों को अनिष्टसाधनीभृत कर्म से निवृत्त ( मना- रोकते ) है । निषेध वाक्यो मे लक्षणया 'नन्' निवर्तनार्थक कहा जाता है, और धात्वर्थ मे तात्पर्यग्राहकता रहती है । उस कारण निषेध्यवस्तु मे अनर्थहेतुत्व का आक्षेप करते हुए पुरुषनिवर्तकत्वेन निषेधो की अर्थवत्ता (सप्रयोजनता) मानी गई है । यथा -'नाऽनृत वदेत्', 'न कलञ्ज' भक्षयेत्' इत्यादि । यहाँ पर नजर्थ का प्रत्ययार्थ शब्द भावना में अन्वय होता है । जहाँ पर प्रत्ययार्थ शाब्दभावना मे ननर्थ का अन्वय करने में 'तस्यव्रतम्' बाधक होता है, ऐसे 'नेक्षेतोद्यन्तम्' इत्यादि स्थलो मे पर्युदास माना जाता है । अर्थात् 'ईक्षणभिन्न सङ्कल्प कर्तव्य.' इति । और जहाँ नञर्थ का प्रत्ययार्थ शाब्दभावना के साथ अन्वय करने में विकल्प प्रसक्ति बाधिका होती है, जैसे 'नानूयाजेषु ' में, वहाँ पर भी पर्युदास माना जाता है । अर्थात् अनुयाजव्यतिरिक्तेषु ये यजामहः कर्तव्य इति । विकल्पप्रसक्ति मे भी जहाँ ऋत्वर्थविधि- निषेधो में पर्युदास का सभव न होता हो, जैसे 'नातिरात्रे षोडशिन गृह्णाति' इत्यादिस्थलो में विकल्प ही माना जाता है । जैसे ग्रहण, ऋतूपकारक है, वैसे ही ग्रहणाभाव भी क्रतूपकारक होता है । जहाँ रागतः प्राप्ति रहती हैं और निषेध, पुरुषार्थ रहता है, जैसे 'न कलख भक्षयेत्' आदि स्थलों में विकल्प न मान कर--प्रतिषेध ही मानाजाता है । जहाँ पर शास्त्र से पुरुषार्थतया प्राप्ति हैं और शास्त्र से ही निषेध, क्रत्वर्थतया प्राप्त है, वहाँ पर जैसे 'दीक्षितो न ददाति न पचति' आदि स्थलो मे विकल्प न मानकर प्रतिषेध ही माना जाता है । क्योंकि निषेध्य का अनुष्ठान करने पर क्रतु मे वैगुण्य
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वेदार्थपारिजातः २११३ यत्र रागत प्राप्ति निषेधश्च कत्वर्थं तत्र 'न स्त्रियमुपेयात्' इत्यादी निषेधातिक्रमे क्रतोर्वगुण्यं पुरुषस्य न प्रत्यवाय । यत्र रागत प्राप्ति निषेधश्च पुरुषार्थतया तत्र क्रनुमध्ये निषेधातिक्रमे सति क्रनोर्न वैगुण्यम्, यथाचोदितस्य क्रतोरनुष्ठानात् 1। पुरुष पर प्रत्यवैति पथा ' न कलज भक्षयेत्' इति । यत्र शास्त्रत क्रत्वर्थतया प्राप्ति निषेधश्च पुरुषार्थस्तत्र तस्य तदतिरिक्तविषयत्वम् । यथा 'नहिस्यात्सर्वाभूतानि' । विधीना निषेधानाञ्च क्रत्वर्थत्वपुरुषार्थत्वव्यवस्था चतुर्थाध्याये जैमिनिना कृता । तदिदं सर्व समवलोक्य विधिनिषे धाना समन्वय कर्तव्यो भवति । निषेधा प्राप्तिमपेक्षन्त इत्यविवादम् । प्राप्तिश्च कि रागत उत शास्त्रत? अथवा क्रत्वर्थतया? आहोस्वित्पुरुषार्थतया? इत्यपि चिन्तनीयम् । सर्वत्र कल्पेषु सुमहद्वैलक्षण्यमस्ति । तत्र पशुयागाः स्वतन्त्रफलका अपि सन्ति केचन, अपरे चाङ्गभूता क्रतुफला । क्वचन सङ्कोच 1 क्वचिद्विकास, कुत्रचिदुपसहार इति विविधा गतिरस्ति । चरके सुश्रुतेवा निषेधा वर्तेरन्, तेषा श्रीतयज्ञानाञ्च कस्सम्बन्ध? दयानन्देन निषेध क्रियत इति चेत्करोतु सः, तस्य शाबर- भाष्यस्य च कस्सम्बन्ध? बौद्धत्रिपिटकस्य श्रोतयागैस्सह कस्सम्बन्ध? विना सम्बन्धेन निषेधा न प्रवर्तेरन्निति यथा-जातोऽपि जानीयात् ॥ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाया 'तस्माद्युक्तिसिद्धो वेदादिविषयप्रमाणानुकूलो मन्त्रार्थानुसृतस्तदुक्तोऽप ' ' ' ( ) विनियोगो ग्रहीतु योग्य इत्यत्र अहो । तदुक्तोऽपि इति कथयन् दयानन्दो महदौदार्य प्रकटीकरोतीव पृ० ३८८ । स एवान्यत्र लिखति -'एतैर्वेदमन्त्रः कर्मकाण्डादिविनियोजितैर्यत्र यत्राग्निहोत्राश्वमेधान्ते यद्यत् कर्तव्य तत्तदत्र ( = वेदभाष्ये ) ? 'विस्तरशो न वर्णयिष्यते । कुतः कर्मानुष्ठानस्यैतरेयशतपथब्राह्मणपूर्वमीमासाश्रौतसूत्रादिषु यथार्थं विनियोजितत्वात् (, )?ऋ० भा ० भू० प्रतिज्ञाविषय पृष्ठ ३८८ शा० भा० भू० पृ० १०८ इति । कि नेद वचनद्वय मिथो विरुद्धार्थप्रतिपादकम् प्राप्त होता है । जहाँ पर रागत प्राप्ति है और निषेध क्रत्वर्थ है, जैसे ' न स्त्रियमुपेयात्' आदि स्थलो में क्रत्वर्थनिषेध ही माना जायगा, निषेध का अतिक्रमण करने पर पुरुष को कोई प्रत्यवाय न होने पर क्रतु मे वैगुण्य अवश्य होगा । जहाँ पर रागत प्राप्ति हो और पुरुषार्थतया निषेध हो, ऐसे स्थल पर क्रतु में निषेधातिक्रमण करने पर भी क्रतु मे कोई वैगुण्य नही होगा, क्योकि यथाविहित क्रत्वर्थ,,, --' ', ऋत्वनुष्ठान उसने किया है तथापि पुरुष प्रत्यवाय का भागी अवश्य होगा जैसे न कलञ्ज भक्षयेत् यह पुरुषार्थनिषेध है माना नही । जहाँ पर शास्त्र से क्रत्वर्थतया प्राप्ति है, और निषेध, पुरुषार्थतया प्राप्त है, वहाँ पर उस निषेध को तदतिरिक्तविषयपरक जाता है, जैसे- 'न हिंस्यात् सर्वाभूतानि' । यह पुरुषार्थनिषेध क्रत्वतिरिक्त स्थल पर लागू होगा । विधि और निषेध की ऋत्वर्थ पुरुषार्थव्यवस्था को जैमिनिने चतुर्थाध्याय मे बताया है । इस ऋत्वर्थपुरुषार्थ विचार को अच्छी तरह समझकर विधि निषेधो का समन्वय किया जाता है । इतना तो निर्विवाद है कि निषेध सर्वदा ही प्राप्ति की अपेक्षा है रखता? किंवाहै । तथापि यह सोचना-विचारना पडता है कि यहाँ पर रागत प्राप्ति है या शास्त्रत प्राप्ति है? अथवा क्रत्वर्थतया प्रासि पुरुषार्थतया प्राप्ति है? सभी पक्षो मे विलक्षणता है । कुछ पशुयाग स्वतन्त्र फल वाले है । कुछ अगभूत पशुयाग है, जिनकाउपसहारअपना स्वतन्त्र फल न होकर ऋतु ( अगी ) के फल से ही वे फलवान् समझे जाते हैं । किसी मे सकोच है तो किसी में विकाससे हैक्या, कहीसम्बन्ध है?, है इस प्रकार अनेक प्रकार के मार्ग है । चरक या सुश्रुत में निषेध भी हो सकते हैं । किन्तु उनका श्रीतयज्ञो से क्या,? स्वामी दयानन्द निषेध करते हैं भले ही करते रहे । उसका शाबरभाष्य से क्या सम्बन्ध है बौद्धत्रिपिटक का श्रोतयाग मे सम्बन्ध है? बिना किसी सम्बन्ध के निषेध लागू नही होता, इतनी बात तो एक बालक भी जानता है । से ॠग्वेदादिभाष्यभूमिकासिद्ध वेदादि प्रमाणो के 'तस्माद्युक्तिसिद्धो विषयप्रमाणानुकूलो मन्त्रार्थानुसृतस्तदुक्तोऽपि विनियोगो ग्रहीतु योग्य ' -इसलिये युक्तिविनियोग ग्रहण करने योग्य अनुकूल और मन्त्रार्थ का अनुसरण करने वाला उन (शाखा -ब्राह्मण-श्रौतसूत्र -पूर्वमीमासा ) मे कहा गया ३८८ । उसी पृष्ठ-है ।' इन पक्तियो मे 'तदुक्तोऽपि' कहकर दयानन्द तो बडी उदारता प्रकट करते हुए से प्रतीत हो रहे है, पृष्ठतत्तदत्र ( = वेदभाष्ये ) ' ( पर उन्होने और भी लिखा है कि एतैर्वेदमन्त्रः कर्मकाण्डादिविनियोजितैर्यत्रयत्राग्निहोत्राश्वमेधान्ते यद्यत् कर्तव्य ऋ० भा० विस्तरशो न वर्णयिष्यते । कुतः? कर्मानुष्ठानस्यैतरेयशतपथ ब्राह्मण -पूर्वमीमांसाश्रौतसूत्रादिषु यथार्थविनियोजितत्वात्प्रतिपादक नही है'? इन दोनो भू० प्रतिज्ञाविषय पृष्ठ ३८८, शा० भा० भू० पृ० १०८) इति । क्या ये दोनो वचन परस्पर विरुद्धार्थ । 1 २६५
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२११४ वेदार्थ पारिजातः तदिद वचनद्वय लेखकोपि प्रमाणयति । एक एव ग्रन्थो यथार्थ विनियोजक, अयथार्थञ्च विनियोजक इति कथन कि न विरुद्धम्? ग्रन्थस्य योऽश: स्वपक्षप्रतिकूल • स प्रक्षिप्त, यश्च साधकस्स समीचीन इति कोऽय न्याय? सर्व एव ब्राह्मणसन्दर्भः कर्मकाण्डप्रतिपादकः, स च संहितागताना मन्त्राणा कार्य प्रतिपादयति । विना ब्राह्मणभागेन केवल मन्त्रार्थावगतिमात्रेण कार्य निश्चेतुं न शक्यते । महर्षीणा विशिष्टमननव्यापारप्रसूता भवन्ति मन्त्रा, तेषा यथायथ विनियोगाय तैरेव महर्षि- भिस्सम्प्रदायतोऽधिगता ब्राह्मणभागा' । मन्त्रब्राह्मणयोमिथो नियतस्सम्बन्ध । उभयोरप्यध्ययनाध्यापनपारम्पर्य चिरात्प्राप्तम् । एव स्थिते पाशुकमन्त्रास्सहिताभागे पाशुकब्राह्मणानि ब्राह्मणभागे केनापि समायोजितानि, अतएवेमान्यवैदिकानि तमोगुण- युक्तानि चेति कथन कथ युक्तियुक्तं भवेत्? वादनक्षत्रमालाया श्रीमदप्पय्यदीक्षितेन्द्र हिसातत्त्वविषये विशेषत परिशीलन कृतम् ॥ मीमासानिकेतनस्य स्तम्भभूतैर्भट्टपादैरस्मिन्विषये भूयान् विचार कृत । क्वचिच्चरके सुश्रुते च पशुहिसाया निन्दा, क्वचिच्च मन्त्रेषु तन्निन्दोल्लेख. कृत इति भूयसो ब्राह्मणभागस्य तन्मूलकश्रौतसूत्राणा कल्पानाञ्च तदवलम्ब्य कृतस्य विचारस्य चाप्रामाण्यम् अथवा प्रक्षिप्तत्वकथन लेखकस्य दुराग्रहमूलकमित्यत्र कस्सन्देह? तत्रापि कि कर्तुमह प्रवृत्तवानिति सुपर्यालोच्य लेखिन्या उपयोग कर्तव्य | शास्त्रेषूत्सर्गापवादानुच्चावचा भवन्ति । अपवादरहितान्येव शास्त्राणि प्रवर्तन्त इति साधन दुष्करम् । ऐष्टिकान्येव कर्माणि प्राचीनानि, सौमिकानि पाशुकानि चार्वाचीनानीति कथयतो लेखकस्यजिह्वा कि न विशीर्यते? निस्सङ्कोच पृष्ठे १०८ लिखति-'स्वामी दयानन्द और याज्ञिकप्रक्रिया' इति । दयानन्दस्य याज्ञिकप्रक्रिया- याश्च कस्सम्बन्ध । किमनेन श्रौतसूत्राणि विरचितानि कल्पा वा प्रणीता:? किमयमनूचान श्रोत्रियो वा? किमय कृता- धानोऽग्निहोत्रादिकमाचरन् याजकोऽभूत्? कुतोऽय याज्ञिकप्रक्रिया प्रवर्तयामास? सन्निकृष्टकालोऽय दयानन्द | अस्य वचनो को लेखक ने भी प्रमाण माना है । एक ही ग्रन्थ को यथार्थ विनियोजक और अयथार्थं विनियोजक कहना क्या विरुद्ध नही है? ग्रन्थ का जो अश अपने पक्ष के प्रतिकूल हो उसे प्रक्षिप्त कहना और जो अश, अपने पक्ष के --- अनुकूल हो उसे समीचीन ( उचित ) कहना, यह कौन सा न्याय है? सम्पूर्ण ब्राह्मण सन्दर्भ ही कर्मकाण्ड का प्रतिपादक है, और यह सहितागत मन्त्रो के कार्य का प्रति-पादन करता है । ब्राह्मण भाग के विना केवल मन्त्रार्थ के ज्ञानमात्र' से कार्य का निश्चय नही किया जा सकता । मन्त्र तो महर्षियो के विशिष्टमननव्यापार से प्रसूत है । उनके यथोचित विनियोग के लिये उन्ही महर्षियो के द्वारा सम्प्रदायपूर्वक अधिगत किये हुए ब्राह्मण भाग है | मन्त्र और ब्राह्मण दोनो का परस्पर नियत सम्बन्ध है । दोनो की हो अध्ययनाध्यापनपरम्परा चिरकाल से चली आ रही है । ऐसी वस्तुस्थिति मे पाशुकमन्त्रो को सहिताभाग मे और पाशुक ब्राह्मणों को ब्राह्मणभाग में किसी ने जोड दिया है, अतएव ये अवैदिक है, और तमोगुण से युक्त है, इत्यादि कथन को कैसे युक्तियुक्त कहा जा सकेगा? वादनक्षत्रमाला मे श्रीमदपय्यदीक्षितेन्द्र जी ने हिसातत्व के सम्बन्ध में विशेष विचार किया है । मीमासाभवन के स्तभभूत भट्टपाद ने भी इस विषय पर विशद सविस्तर विचार किया है । अत. चरक-सुश्रुतादि ग्रन्थों में कही पर पशुहिंसा की निन्दा, उसी तरह मन्त्रो मे कही पर निन्दा के उल्लेख को देखकर विपुल ब्राह्मण भाग और तन्मूलक श्रौतसूत्रो और कल्प के आधार पर किये गये विचार को अप्रमाण बताना या प्रक्षिप्त कह देना लेखक का दुराग्रहमात्र ही है, इसमे किचिन्मात्र भी सन्देह नही है । लेखक को प्रथमत यह सोच लेना चाहिये था कि वह क्या करने जा रहा है, तब लेखनी का उपयोग करना चाहिये था । शास्त्र परिशीलन करने वालो को अच्छी तरह ज्ञात है कि शास्त्रो में उत्सर्गापवाद न्यूनाधिकरूप में रहा करते है । शास्त्रो की प्रवृत्ति अपवादरहित ही हुआ करती है, यह सिद्ध करना कठिन है । ऐष्टिक कर्मो को ही प्राचीन कहना और सौमिक तथा पाशुक कर्मो को अर्वाचीन कहना विद्वान् को तो शोभा नही देता । पृ० १०८ पर लेखक महोदय सकोच का परित्याग करके लिख रहे है -'स्वामी दयानन्द और याज्ञिकप्रक्रिया ' । जरा सोचिये तो, दयानन्द का और याज्ञिकप्रक्रिया का परस्पर सम्बन्ध ही क्या है? क्या दयानन्द ने श्रौतसूत्रो की रचना की है? क्या. कल्पग्रन्थो का निर्माण किया है? क्या वे स्वयं अनूचान श्रोत्रिय है? क्या वे आहिताग्नि है? क्या उन्होने अग्निहोत्र, दर्शपूर्ण, चातुर्मास्येष्टियों का अनुष्ठान किया था? किस अधिकार से उन्होने याज्ञिक प्रक्रिया का प्रवर्तन किया? ये दयानन्द स्वामी तो आधु-निक युग के है । याज्ञिक प्रक्रिया का प्रदर्शन करते समय कोई यज्ञप्रक्रिया तो चलती ही रही होगी । उसके रहते एक और नूतन
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२११५ वेदार्थपारिजातः सत्या तस्या? याज्ञिकप्रक्रियाप्रदर्शनकाले काचन प्रक्रियाऽऽसीदेव । नूतनप्रक्रियाप्रदर्शने को हेतु पूर्व प्रवर्तितप्रक्रियाया सङ्कोच वैपरीत्यञ्च सम्पादयितुमस्य प्रवृत्तिरिति वक्तव्यम् । एव प्रवृत्तौ जनसङ्ग्रह, लोभ द्रव्यलिप्सा, कीर्तिप्रमार वञ्चना च मूल स्वीकर्तव्यम् । श्रुतिस्मृतिविरुद्धाया अस्या प्रक्रियाया लोभादिमूलकत्वेन हेत्वधिकरणन्यायेनाप्रामाण्य भाष्य- कारै शबरस्वामिभि प्रतिपादित स्वीकर्तव्यम् । अस्मिन्नेव सन्दर्भे उपरि पृ० १०९ वेदादिप्रमाणो के प्रतिकूल-वेदमं गौ अश्व अवि पुरुष आदि की न केवल हिंसा का प्रतिषेध ही किया है, अपि तु इनको मारने वालो को गोली से उडा देने का आदेश दिया है' इति लिखित्वा काश्चन मन्त्रान् प्रदर्श्यान्तेऽथर्ववेदमन्त्र 'यदि नो गा हिंसी ' इति प्रादर्शयत् । इमानि प्रमाणानि प्रदर्शयतोऽस्य स्वबुद्धिरेव प्रमाणम्, शिष्ट जगत् सर्वमप्रमाणमित्यभिनिवेश । हिसा निषेद्धमागतोऽय मन्त्र भुसुण्डीप्रयोगद्वारा हिसितार मारयितुमादिशति । क्रत्वङ्गत्वेन पशुयागविधायक वाक्यानामर्वाचीनकाले केनापि समावेश कृत, प्राचीनकाले पशुयागानामभावादिति तव हेतु, अय न्यायो मन्त्रेऽस्मिन् योजयितु किं न शक्यते? सीसेन वेधन नाम न पुष्पवृष्टि । इद वेधन त्वयानुमन्यते क्रत्वङ्गत्वेन अस्मत्सम्ब- प्रवृत्त विधायकं वाक्य नानुमन्यते । कस्य केन सम्बन्ध? अस्मिन् मन्त्रे 'न ' इत्यस्मच्छब्द स्यास्माकमित्यर्थं । से न्धिनो गवादे हिसितार त्वा विद्वेषिण सीसेन विध्याम इति मन्त्रस्यार्थ | विद्वेषी वा भवतु मित्र वा, सीसेन वेधन ( गोली समायोजनं कृतमिति उड़ाना) हिसैव खलु । 'न हिस्यात्सर्वाभूतानि' इति निषेधोऽत्र कि न प्रवर्तेत? मन्त्रार्धस्यास्य केनापि तवन्यायोऽत्र कुतो न प्रवर्तेत? मन्त्रेऽस्मिन् प्राचीनत्वमर्वाचीनत्वश्चेति रूपद्वय कि त्वयानुमन्यते? समाजे तामसिकानीमानिम्रियन्त कर्माणि निषेद्ध प्रवृत्तो दयानन्द किमित्यपत्योत्पादन कर्म न निवारितवान्? अपत्यात्पादनकर्मणि सहस्रश. कीटा हुई कण्ठस्थ- यज्ञ-प्रक्रिया प्रदर्शन करने मे कौन सा हेतु था? इन प्रश्नो के उत्तर में यही कहना होगा कि पूर्वकाल से चली आईकी यज्ञप्रक्रिया मे तथा अर्थज्ञ वैदिक एव श्रौतसूत्र, कल्पादि ग्रन्थो के रचयिताओ तथा स्वय यज्ञानुष्ठान करने वाले आहिताग्नियो ओट) मे क्या रहा सकोच और वैपरीत्य ( उलट फेर, परिवर्तन ) करने के लिये दयानन्दजी प्रवृत्त हुए । किन्तु इस प्रवृत्ति के मूल ( ( ३ ) द्रव्यलिप्सा ( ४ ) कीर्ति-? - - ( ) ( )? होगा तो यही कहना होगा कि इस प्रकार की प्रवृत्ति में मूल रहा होगा १ जनसङ्ग्रह २ लोभ श्रुति स्मृतिविरुद्ध इस प्रसार और ( ५) जनता को ठगना, इन सब दुर्भावनाओ के सिवाय अन्य मूल ( हेतु ) हो हो क्या सकताही कहनाहै होगा, क्योकि लोभादि- दयानन्द प्रवर्तित यज्ञ प्रक्रिया को लोभादि हेतुमुलक होने से हेत्वधिकरण न्याय के अनुसार अप्रमाण मूलक ऐसी प्रक्रियाओ को भाष्यकार शबरस्वामी ने अप्रमाण कहा है । इसी सन्दर्भ मे पृ ० १० ९ पर लेखक ने लिखा है - -'वेदादि प्रमाणो के प्रतिकूल—– वेदआदेशमे गौ, अश्वदिया, हैअवि।', इतनापुरुष आदिलिखकरकी, न केवल हिंसा का प्रतिषेध ही किया है अपितु इनको मारनेवालो को गोली से उड़ा देने का किया है । इन प्रमाणो को, ' ' कतिपय मन्त्रो को प्रदर्शित किया है एक अथववेद के मन्त्र यदि नो गा हिंसी को भी प्रदर्शित और उसके सिवाय अव- प्रदर्शित करते समय लेखक को यह अभिनिवेश हो गया है कि उसकी अपनी ही बुद्धि एकमात्र प्रमाण,है बन्दूक की गोली से हिंसक शिष्ट सम्पूर्ण शिष्ट जगत् अप्रमाण है । अरे, सोचो तो जरा, हिंसा का निषेध करने उपस्थित हुआनेमन्त्रसमावेश कर दिया है, क्योकि1? को मारने का आदेश दे रहा है । ऋत्वगत्वेन पशुयागविधायक वाक्यो का अर्वाचीन काल मे किसी नही लगाया जा सकता सीसे, प्राचीनकाल में पशुयागो का अभाव था यह तुमने हेतु बताया है । क्या इसी न्याय को उक्त मन्त्र में वाक्य को नही मान से वेधन करना कोई पुष्पवर्षा नही है । इस वेधन को तुम मान रहे हो, किन्तु क्रत्वङ्गत्वेन प्रवृत्त विधायकअस्माकम्' है । हमारी गौओ के रहे हो । किसी का किसी से कोई सम्बन्ध नही है । इस मन्त्र में 'नः' इस अस्मत् शब्द का अर्थ से' वेधना ( गोली से उड़ाना ) तो हिंसक तुम जैसे विद्वेषी को सीसे से वेध देगे । यह मन्त्रार्थ है । विद्वेषी हो चाहे मित्र हो, सीसे किसी ने जोड़ दिया होगा' यह हिसा ही है । 'न हिस्यात् सर्वा भूतानि' यह निषेध क्या यहा प्रवृत्त नही होगा? इस मन्त्रार्धइनकोदो रूपो को क्या तुम मान रहे हो? तुम्हारा न्याय यहाँ क्यों नही प्रवृत्त हो रहा है? इस मन्त्र मे प्राचीनता और अर्वाचीनता कर्म का निवारण क्यो नही किया? समाज मे इन तामसिक कार्यो का निषेध करने के लिये प्रवृत्त हुए दयानन्द ने अपत्योत्पादन '
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वेदार्थपारिजातः २११६ इति कि चरके सुश्रुते च नोल्लिखितम्? यदि तथा तर्हि समायोज्यताम् । किम पत्योत्पादन कर्म सात्विकम्? प्राचीनकाले सात्विकान्येव कर्माण्यासन् । किमपत्योत्पादनमर्वाचीनकाले केनापि प्रवर्तितम्? किमनेनासम्बद्धप्रलापेन? अनन्तर ' तथा आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' ( मी० १.२.१ ) । अतः ये मन्त्र भी यज्ञो मे प्रवृत्त हिसा के प्रतिषेधक है, न कि यज्ञ से अन्यत्र' इत्यादि लिखति तस्मिन्नेव पृष्ठे १०९ । इद पूर्वपक्षिणस्सूत्रम् । पूर्वस्मिन् प्रथमपादे विधिभागस्य प्रामाण्य व्यवस्थाप्यास्मिन् द्वितीयपादेऽर्थवादादीना प्रामाण्यव्यवस्थापनायोपक्रमः । यद्यपि प्रथमपाद एव सर्वस्यापि वेदस्य विधिमन्त्रनामधेयनिषेधात्मकस्य प्रामाण्यं व्यवस्थापितम्, तथापि विध्यादीना प्रामाण्यप्रकारः कथ्यत इति भाष्यवार्तिका-,, दीनामभिप्रायः । तत्र विधीनामप्राप्तस्य प्रयोजनवतश्चार्थस्य विधानेन अर्थवादाना विधेयार्थस्तावकत्वेन मन्त्राणा प्रयोगसमवेतार्थस्मारकत्वेन, नामधेयाना विधेयार्थपरिच्छेदकत्वेन, निषेधानामनर्थफलकेभ्य कर्मभ्यो निवर्तकत्वेन चोपयोग इति स्थिति. । 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' इति सूत्रप्रवृत्तिवेलाया मन्त्राणा प्रयोगसमवेतार्थस्मारकत्वरूपक्रियार्थत्व न , ' ' ' साधितम् तच्च मन्त्राधिकरणे साधयिष्यते । एवं स्थिते लेखक आम्नायस्य क्रियार्थत्वात् इति सूत्र विलिख्य अत ये , ' मन्त्र भी यज्ञो मे प्रवृत्त हिसा के प्रतिषेधक है न कि यज्ञ से अन्यत्र इति कथ लिखति । न हीदं सूत्र मन्त्रभाग स्पृशति । , यद्यप्याम्नायपद मन्त्रब्राह्मणसाधारणम् तथाप्यत्राम्नायपदं विधिभागमात्रपरम् तस्यैव पूर्वस्मिन्पादे साधितत्वात् । ' ' यद्यत्रत्याम्नायपदं मन्त्रपरमपि तहि मन्त्र ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् इति त्वयाङ्गीकृत स्यात् । यदि वात्रत्याम्नायपदं मन्त्रपरमेव तर्हि नाद्यावधि मन्त्राणा क्रियार्थत्व साधितमिति कथमनेन सूत्रेण । मन्त्राणा क्रियार्थत्वमङ्गीकृत्य वाक्य लिखसि? मन्त्राधिकरणसिद्ध एव सिद्धान्तोऽत्र लिखित इति चेत् 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' इति सूत्र कथ प्रमाणीक्रियते? 'अपत्योत्पादन कर्म मे तो सहस्रश ' कीट मरते है, क्या यह चरक और सुश्रुत में नही लिखा है? यदि बैसा है तो विचार करो, कि क्या अपत्योत्पादन कर्म सात्त्विक है? प्राचीनकाल में सात्त्विक कर्म ही थे । तो क्या अर्वाचीनकाल मे अपत्योत्पादन कर्म को किसी. ने प्रवर्तित किया? इस प्रकार के असम्बद्ध प्रलाप से क्या लाभ? अनन्तर 'तथा आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' ( मी० १ १ २ १ ) अत ये मन्त्र भी यज्ञो में प्रवृत्त हिंसा के प्रतिषेधक है, न कि यज्ञ से अन्यत्र' इत्यादि उसी पृ० १० ९ पर लेखक ने लिखा है । यह पूर्वपक्ष का सूत्र है । इसके पूर्व ' प्रथमपाद मे विधिभाग का प्रामाण्य व्यवस्थापित कर इस द्वितीयपाद में अर्थवादादि वाक्यों के प्रामाण्य का व्यवस्थापन करने के लिये प्रारम्भ किया गया है । यद्यपि प्रथमपाद में ही विधि-मन्त्र नामधेय- निषेधात्मक सम्पूर्ण वेद का प्रामाण्य व्यवस्थापित किया गया है, तथापि विध्यादिको के प्रामाण्य का प्रकार अब कहा जा रहा है । यह भाष्य-वार्तिक आदि ग्रन्थो का अभिप्राय है । उनमे से विधि का उपयोग तो प्रमा-णान्तर से प्राप्त (ज्ञात ) न हो सकने वाले और सप्रयोजन अर्थ के विधान करने से, तथा अर्थवादवाक्यों का विधेयार्थ का स्तावक होने से, एव मन्त्रो का प्रयोग समवेत ( अनुष्ठानकालीन) पदार्थो का स्मारक होने से, और नामधेयो का विधेयार्थ का परिच्छेदक होने से उसीतरह निषेधो का अनर्थफलक कर्मो की ओर से निवृत्ति कराने के कारण ( वेद के तत्तद्भागो का उपयोग) होता है, यह वस्तु स्थिति है । 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' इस सूत्र की प्रवृत्ति के समय मन्त्रो का अनुष्ठेयपदार्थस्मारकत्वरूप क्रियार्थत्व सिद्ध नही 'हो पाया है । उसे तो मन्त्राधिकरण में सिद्ध किया जायेगा । इस वस्तुस्थिति के होते हुए भी लेखक महोदय आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्' इस सूत्र को लिखकर 'अतः ये मन्त्र भी यज्ञो मे प्रवृत्त हिंसा के प्रतिषेध है, न कि यज्ञ से अन्यत्र' यह क्यो लिख रहे है? उक्त सूत्र का मन्त्रभाग से सम्बन्ध नही है । यद्यपि ' आम्नाय' पद मन्त्र ब्राह्मण दोनो के लिये साधारण है, तथापि 'आम्नाय' पद यहा पर विविभागमात्रपरक है । क्योकि पूर्वपाद में उसी को सिद्ध किया गया हुँ । यदि यहा के 'आम्नाय' पद को मन्त्रपरक मानोगे तो 'मन्त्र-ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' का तुमने स्वीकार कर लिया, कहा जायगा । इस पर भी यहा के आम्नाय को यदि मन्त्रपरक ही कहो, तो भो अद्यावधि मन्त्रो का क्रियार्थत्व सिद्ध ही नही हो पाया है, अतः उक्त सूत्र से मन्त्रों पद का क्रियार्थत्व स्वीकार कर कैसे लिख रहे हो? इसपर भी यदि कहो कि मन्त्राधिकरणसिद्धसिद्धान्त को ही हमने यहाँ लिख दिया है, तो बताओ- 'आम्तायस्य क्रियार्थत्वात्' सूत्र को तुमने प्रमाण कैसे मान लिया? यह सूत्र तो जैमिनि का है, और वह तुम्हारे मत के अनुसार
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२११७ वेदार्थपारिजातः - ' -इदञ्च सूत्रं जैमिने । तच्च त्वन्मतेन न स्वत प्रमाणम् त्वमेवोपरि लिखसि दयानन्दमतत्वेन शाखाब्राह्मण श्रौतसूत्र और पूर्वमीमासा आदि समस्त वैदिक वाड्मय को परत प्रमाण ( = वेदानुकूल होने पर ही प्रमाण ) स्वीकार करना है' ?आदि । इदञ्च जैमिनिसूत्र परत प्रमाणम् । आम्नायस्य क्रियार्थत्व बोधयतोऽस्य सूत्रस्य नूलभूतो वेद क येन तस्य प्रामाण्यमङ्गीक्रियते । मूलभूतेन वेदेन सहितारूपेण भवितव्यम् तस्यैव त्वन्मते स्वत प्रमाणत्वात् । कच्चिदस्य तर्हिसूत्रस्यकि तादृशं मूल प्रदर्शयितुं शक्यते? यदि न शक्यते, तर्हि किमिति सूत्र प्रमाणीक्रियते त्वया? यदि शक्यते ?, तन्मन्त्रवाक्यम् यच्चाम्नायस्य क्रियार्थत्व प्रतिपादयति । एव दयानन्दो मर्त्य मृतश्च । तदीय मत मन्त्रसहिता स्यात् १ यावदिद,,,एव वेदा तेषाञ्च स्वतः प्रामाण्यमिति । एव कथयितु किमपि प्रमाण कच्चिदस्ति यच्च मन्त्रवाक्य?,न प्रदर्श्यते तावदस्य वाक्यस्य प्रामाण्य कथ सिध्यतु यच्च वाक्य स्वतो न प्रमाणम् नापि त्वदभिमतवेदमूलक तच्चेत्वया प्रमाणीक्रियते तर्हि कथमिव त्वद्वाक्ये विश्वास क्रियताम्? जो पाठविधि लिखी है, उसमे तस्मिन्नेव ११० पृष्ठे टिप्पण्या लिखति-'स्वामीदयानन्दसरस्वनीने प्राचीन ऋषि- सभी विषयो मे प्राचीन ऋषिमुनियो के ग्रन्थो का ही उल्लेख किया है' इति । दयानन्देन स्वीये पाठविधौ भिर्मुनिभिश्च विरचितानामेवग्रन्थानामुल्लेखेन महाननुग्रह कृत । किमिमेग्रन्था त्वदभिमतसात्विकानामाडम्बररहिताना-? यदि द्वितीय कल्पस्तर्ह्य-? मेवाग्निहोत्रदर्शपूर्णमासादीना प्रतिपादका उत तामसिकाडम्बरयुक्त कर्मणामपि प्रतिपादका कालान्तर इमानि? प्रमाणम् । यदि च प्रथम कल्प तर्ह्यवैदिकाडम्बरयुक्तकर्मणामुल्लेख- कथमागत कि तैरेव ग्रन्थकारै । युगसन्धिकाले कर्माणि स्वग्रन्थेषु योजितानि? उत तदितरैस्तत्तद्ग्रन्थकर्तृनाम्ना योजितानि? कालनिर्णये कुशल खल्वसि सात्त्विकानिकर्माण्यासन्निति निर्णीतवानसि । एवं निर्णीतवतस्तव कालान्तरनिर्णयस्तु न दुष्कर । ब्रूहि? कस्मिन् काल स्वत प्रमाण भी नही है, क्योकि तुमने ही ऊपर लिखा है कि दयानन्द के मत के अनुसार ' शाखा ब्राह्मण श्रौतसूत्र और पूर्वमीमासातो परत आदि समस्त वैदिकवाड्मय को परत प्रमाण ( वेदानुकूल होने पर ही प्रमाण) स्वीकार करना है, इत्यादि । यह जैमिनिसूत्रतुम स्वीकार कर प्रमाण है । आम्नाय की क्रियार्थता को बोधन करनेवाले इस सूत्र का मूलभूत वेद कौन सा है? जिससे उसका प्रामाण्यका वैसा कोई मूल रहे हो । मूलभूत वेद भी सहिता रूप होना चाहिये, क्योकि तुम्हारे मत मे वही स्वत प्रमाण है । क्या इस सूत्र कि कौन सा वह दिखा सकते हो? यदि नही दिखा सकते तो सूत्र को प्रमाण क्यो मानते हो? यदि प्रदर्शित कर सकते हो तो बताओप्राणी हे, और वह मन्त्र वाक्य है? जो आम्नाय के क्रियार्थत्व को बता रहा हो । उसी प्रकार दयानन्द तो एक मर्त्यदेहधारी कहने वाले का कथन मर भी चुके है । उन्ही का मत है कि मन्त्रसहिता ही वेद है और उनका स्वत प्रामाण्य है । इस प्रकार नही कर सकोगे तब तक इसके??, कही प्रमाण हो सकता है क्या उस कथन का मन्त्रवाक्य कहा जा सकेगा जब तक उसे सिद्ध ही है ऐसे वाक्य को भी वाक्य का प्रामाण्य कैसे सिद्ध हो जायगा? जो वाक्य स्वत प्रमाण नही और न त्वदभिमतवेदमूलक यदि तुम प्रमाण मानो, तो तुम्हारे वाक्य पर कैसे भला विश्वास किया जाय?.. 'स्वामी दयानन्द सरस्वती ने जो पाठविधि उसी ग्रन्थ के पृ० ११० पर टिप्पणी मे लेखक ने लिखा है कि ने अपने पाठविधि मे प्राचीन लिखी है, उसमे सभी विषयो मे प्राचीन ऋषि मुनियों के ग्रन्थों का ही उल्लेख किया है' इतिइन। ग्रन्थोदयानन्दमे तुम्हारे अभिमत सात्त्विक एवं ऋषियो ने एव मुनियों ने ही रचित ग्रन्थो का उल्लेख करके महान् अनुग्रह किया है । क्या का ही प्रतिपादन किया गया है? या तामसिक आडम्बरयुक्त कर्मो का भी प्रतिपादन किया? यदि द्वितीय पक्ष, हो तो उन ग्रन्थो को तुम्हारे ही मत के अनुसार अप्रमाण कहना होगा । और आडम्बररहित अग्निहोत्र दर्शपूर्णमासादिकर्मो यदि प्रथम पक्ष हो तो ने इन कर्मों को कुछ काल के अवैदिक आडम्बरयुक्त तामस कर्मों का उल्लेख उन ग्रन्थो में कैसे किया गया? क्या उन्ही ग्रन्थकारोंको उनके ग्रन्थों को जोड़ दिया? लेखक-? पश्चात् अपने ग्रन्थो मे जोड दिया अथवा अन्य लोगो ने उस ग्रन्थकार के नाम पर इन कर्मों लेखक महोदय दे चुके, महोदय कालनिर्णय करने मे तो बडे कुशल है । युग के सन्धिकाल मे सात्त्विक कर्मों का प्रचलन था ऐसा निर्णय हम पूछ रहे है । इस प्रकार का निर्णय देने वाले लेखक के लिये कालान्तर का निर्णय करना भी कोई कठिन नही है । अत' लेखक से
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२११८ वेदार्थपारिजातः इमानि कर्माणि ग्रन्थेषु योजितानि? यदि तत्तद्ग्रन्थकर्तृभ्य इतरे योजितवन्तस्तर्हि के ते वञ्चका एवमकुर्वन्? सर्वेय तवकथाऽऽनुमानिकी यदि, तत्राव्यभिचरितो हेतुर्वक्तव्य । पदे पदे चरकवाक्यमेवावर्तयसि1 क्वचिञ्च दयानन्द निर्दिशसि, बौद्धस्य जिनाचार्यस्य वा । किञ्च दयानन्देन य पाठविधि प्रवर्तित, तत्र मूल कि विधिवाक्यम् (ब्राह्मणभाग )? उत सहितावाक्यम्? ब्राह्मणवाक्यन्तु न प्रमाण दयानन्दमते तन्मतावलम्बिनस्तवापि । तस्य च प्रामाण्यं वेदमूलकत्वेन वक्तव्यम् । वेदश्च सहिताभाग एव । सहिताभागस्तु केवलमर्थाभिधायक । नह्यभिधानमात्रेण कस्यापि प्रवृत्तिर्लोके दृष्टचरा ॥ एवमर्थमय मन्त्रोऽभिदधाति, अतोऽनेनेद कर्तव्यमिति दयानन्देन कल्पिते त्वादृशस्य तच्छिष्यस्य तत्र प्रवृत्तिर्भवेत् । पाठविधि प्रवर्तयता केवलमर्थोनाभिहितस्स्यात्। इदमेव कर्तव्यमित्युपदिष्ट स्यात् । ततश्च त्वादृशस्य तत्रप्रवृत्तिरित्यङ्गीकर्तव्यम् । तत्प्रवर्तिततेन प्रलाप ।? ' - पाठविधे पूर्व लोकेऽध्येतार एव कि नासन् तेषामध्ययने प्रवृत्ति कथ समुदभूत् सर्वोऽयमत्रत्यस्सन्दर्भो लेखकस्य एतदग्रे 'काल्पनिकविनियोग' इतिशीर्षक विधाय लिखति - 'उत्तर काल मे जब देश मे यज्ञो प्रभाव बढा, और प्रत्येक कामना की सिद्धि के लिये यज्ञो की सृष्टि हुई' । अत्र लेखक उदाहरति -' निवेशनस्सङ्गका मान तथा वसूनाम् इत्यैन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' इति । पूर्वमीमांसायामैन्द्रीन्यायस्य विषयवाक्यमिदम् । तृतीयद्वितीयपादस्य मनो- ( ऐन्द्रीन्याये ) लिङ्गाधिकरणे सति सम्भवे मत्रलिङ्ग मुख्य एवार्थेविनियोजकमिति व्यवस्थाप्य द्वितीयोऽस्मिन्नैन्द्रयाधिकरणे प्रथमे कि वे जरा बतावे तो कि ग्रन्थकार ऋषि मुनियों ने उन आडम्बर वाले कर्मो को ( ),? के अतिरिक्त भिन्न-इतर लोगो ने उनके ग्रन्थो मे इन कर्मो को जोड दिया किस समय अपने ग्रन्थो मे जोड़ा यदि तत्तद्ग्रन्थकारो कहो तो बताओ, कि वे वञ्चक कौन है?,, किया असल बात तो यह है कि सारी कहानी तुम्हारी मनगढन्त है जिन्होने यह कुकर्म (हेत्वाभासो) से परिपूर्ण है । यदि अपने अनुमानो पर तुम्हे विश्वास हो, तो उनमेकपोलकल्पित है, कुतर्कों से भरी हुई है तथा असद्धेतुओ ( ), ( ) पर प्रतिक्षण चरकवाक्य का सहारा ले रहे हो तो कही दयानन्द का निर्देश कर अव्यभिचरितदेते हेतु सद्धेतु का प्रदर्शन करो । पग पग, जप कर लेते हो । यह तुम्हारी सारी चेष्टा डूबते को तिनके के सहारेवाली कहावत कोहोचरितार्थंऔर कहीकर पररहीबौद्धहै । या जिनाचार्य के नामका किञ्च दयानन्द के द्वारा प्रवर्तित किये गये पाठविधि मे विधिवाक्य? ( ) ( ), है दयानन्द और उनके तुम जैसे अन्धभक्त अनुयायी ब्राह्मणवाक्य को तो ब्राह्मण भाग मूल आधार है या सहितावाक्य मूल प्रमाण कहो तो वेदमूलकत्वेन ही कहना होगा । और वेद तो तुम्हारे मत सेप्रमाणकेवल मानते ही नही हो । अपनी सुरक्षा के लिये यदि उसे, अर्थ का अभिधायक मात्र होता है किन्तु लोक व्यवहार में केवल अभिधान सहिताभाग ही है । लेकिन सहिता भाग तो केवल यह मन्त्र इस अर्थ को कह रहा है, अतः ' अनेन इद कर्तव्यम् - इस मन्त्र करने मात्र से किसी की भी प्रवृत्ति होती नही दिखाई देती । किये जाने पर ही तुम जैसे उसके शिष्य को उस कर्म मे प्रवृत्ति हो पायगीसे यह कर्म करना चाहिये इस प्रकार दयानन्द के द्वारा कल्पना दयानन्द के द्वारा केवल अर्थ का अभिधान न कर, 'इसे इसप्रकार करो, अन्यथा नही होगी । एवञ्च पाठविधि का प्रवर्तन करने वाले ', करना ही होगा । दयानन्द प्रवर्तित पाठविधि के पहले इस संसार कहने पर ही तुम जैसे की उसमे प्रवृत्ति होती यह स्वीकार मे क्या अध्ययन करने वाले थे ही नही??की ओर उनकी प्रवृत्ति कैसे हुआ करती थी उत्तर मे कहना ही यदि थे तो अध्ययन करने, ' ' उनकी प्रवृत्ति हुआ करती थी । अत यहाँ का सम्पूर्ण सन्दर्भ होगा कि इद कर्तव्यम् कुर्यात् इन विधियों के कारण ही लेखक का प्रलापमात्र ही है । ' ' -- आगे चल कर लेखक महोदय पृ ० ११२ पर काल्पनिक विनियोग शीर्षक देकर -',देश में यज्ञो का मान तथा प्रभाव बढ़ा और प्रत्येक कामना की सिद्धि के लिये लिख रहे है उत्तरकाल मे जब 'लेखक महोदय उदाहरण दे रहे है- निवेशनस्सङ्गमनो वसूनाम् यज्ञो की सृष्टि हुई । यहाँ पर 'ऐन्द्रीन्याय का यह विषय वाक्य है । तृतीयाध्यायस्थ द्वितीयपाद के प्रथमइत्यन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते इति । पूर्वमीमासा मे यथा संभव मन्त्रलिङ्ग, मुख्यार्थ में ही विनियोजक होता है, लिङ्गाधिकरण में यह व्यवस्था दी गई है कि पूर्वाधिकरणोक्त का अपवाद बता रहे है कि क्वचिद् गौण अर्थ में भी मन्त्रलिङ्गतदनन्तर इस द्वितीय ऐन्द्रयधिकरण में (ऐन्द्रीन्याय मे ) विनियोजक होता है । जैमिनि सूत्रो मे यह एक 1