वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1221–1230
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1221–1230
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वेदार्थपारिजात. २११ ९ पूर्वोक्तस्यापवाद प्रतिपादनीय | क्वचिद्गोणेऽप्यर्थे मन्त्रलिङ्ग विनियोजकमिति प्रतिपाद्यतेऽस्मिन्नधिकरणे । जैमिनिसूत्रष्विदं - वैचित्र्यम् – यत्प्रायस्सूत्रेषु विषयवाक्यमन्तर्निहितमिति । मन्त्रस्तु इन्द्र प्रतिपादयति, विनियोगस्तु तस्य गार्हपत्योपस्थाने । पूर्वाधिकरणन्यायेन इन्द्रदेवताप्रकाशिकया ऋचा इन्द्रोपस्थानमेव कर्तव्यम्, तदनुसारेण' गार्हपत्यशब्दस्य गौण्यावृत्त्येन्द्र बोधकत्वं स्वीकर्तव्यम् तेन च मन्त्रलिङ्ग मुख्येऽर्थे विनियोजक भवतीति पूर्वपक्षे सति सिद्धान्तयति सूत्रकारो जैमिनि –'वचनात्त्वयथा- र्थमैन्द्री स्यात्' इति । अथार्थमिति क्रियाविशेषणम् । अयथा - असदृशो वाधितोऽर्थोयस्य तद्यथा भवति तथा ऐन्द्री ऋगेव - स्यात् । अत्र हेतु –वचनादिति । ' इत्यैन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' इति वचनादित्यर्थः । इद वचनमत्र मन्त्रस्य विनियोजकम् । इद वचन कि जैमिनिना कल्पितम्? उत जैमिने पूर्ववर्तिना? विनियोगो नामाङ्गत्वेनान्वयः । तत्र च प्रमाणानि षड्वर्तन्ते । तेषु श्रुत्या सामर्थ्येन वचनेन समाख्यया च यथायथ मन्त्राणा विनियोग स्वीकृतो मीमासकै । मन्त्रार्थानुसारेण तेषा विनियोग इति सत्यपि उत्सर्गे तदपवादोऽपि भवितुमर्हति । अपवादप्रदर्शनार्थ जैमिनिरिद वाक्यं कल्पयामासेति कथयन् लेखको न लज्जते । अथवा यथाजातस्य कुतो लज्जा? इन्द्रान्महेन्द्रो भिन्न एव । इममर्थ प्रदर्शयितु 'तस्माद्देवतान्तरमिन्द्रान्महेन्द्र ' (शा० भा० २-१-१६ ) इति शाबर भाष्य प्रदर्शयति लेखक । भाष्यकारात्पूर्व सूत्रकार एवेम मर्थमङ्गीकरोति ' न श्रुतिसमवायित्वात्' इति स्तुतशस्त्राधिकरणे सूत्रयन् । यथा लेखको निर्मर्याद गच्छति, न तथा खलु शबर-स्वामी गच्छेत् । शबरस्वामी तु जानाति - द्विधिगतशब्दा एव निगमेषु प्रयोक्तव्या इति । अयञ्च न्यायो दाशमिक | लेखकस्य न विधेरावश्यकता, न नियमस्य3 नापि मर्यादायाः । न तथा खलु भवन्ति मोमासासूत्रभाष्यकारादय । 'तस्माद्देव- तान्तरमिन्द्रान्महेन्द्र.' इति भाष्य प्रदर्शयन् लेखको मन्यते - यदिन्द्रान्महेन्द्रस्य भेद भाष्यकार पश्यति तदा इन्द्राद्गार्हपत्यस्य भेद कुतो न पश्यति भाष्यकार? कथमैन्द्रोमन्त्रं गार्हपत्योपस्थाने विनियुङ्क्ते इति । काल्पनिक विनियोग साधयन् लेखक- वैचित्र्य पाया जाता है कि उनमें विषयवाक्य प्राय अन्तर्निहित रहता है । मन्त्र तो इन्द्र का प्रतिपादन कर रहा है, किन्तुउस मन्त्र का ( )विनियोग मात्र गार्हपत्योपस्थान में किया जाता है । पूर्वाधिकरण न्याय से इन्द्र देवता प्रकाशक ऋचा मन्त्र के द्वारा इन्द्रोपस्थान ही करना चाहिये, और तदनुसार गौणीवृत्ति से गार्हपत्य शब्द को इन्द्रबोधक स्वीकार करना चाहिये । ऐसा करने पर ही मुख्यार्थ में मन्त्रलिङ्ग विनियोजक हो पाता है, इस प्रकार पूर्वपत्र प्राप्त होने पर सूत्रकार जैमिनी सिद्धान्न करते है --"वचनात्त्वयथार्थ मैन्द्रीस्यात्" इति । ' अयथार्थम्' यह क्रियाविशेषण है । अयथा = असदृश, बाधित अर्थ यस्य तत्— अयथार्थम्, अर्थात् बाधित अर्थ वाले को ' अयथार्थ' शब्द से कहा गया है, इस प्रकार का अयथार्थ, जिस प्रकार से भी बने उस प्रकार से ' यथा स्यात् तथा', ऐन्द्री ऋक् ही हो सकेगी, क्योकि ' वचनात्' अर्थात् ' इत्येन्द्या गार्हपत्यमुपतिष्ठते ' यह वचन है । एवञ्च यह वचन ही यहाँ पर मन्त्र का विनियोजक है । क्या यह वचन जैमिनि का अपना कल्पित है? अथवा जैमिनि के किसी पूर्ववर्ती का कल्पित हे? 'विनियोगो नाम अङ्गत्वेनान्वय, अगरूप से किये जाने वाले अन्वय को विनियोग कहते है । छह प्रमाणो की सहायता से विनियोग ( अङ्गत्वेन अन्वय ) किया जाता है । उन छह विनियोजक प्रमाणो मे से औचित्य के अनुसार तत्तत्प्रमाण से किये जाने वाले मन्त्रो के विनियोग को मीमासको ने माना है । 'मन्त्रार्थ के अनुसार मन्त्रो का विनियोग' इस प्रकार का उत्सर्ग रहने पर भी उसका अपवाद भी हुआ करता है । 'अपवाद प्रदर्शनार्थं जैमिनि ने इस वाक्य की कल्पना की ऐसा कुतर्क सीमासक तो कभी नही कर सकता । टिप्पणी मे इन्द्र से महेन्द्र को भिन्न -बताने के लिये 'तस्माद् देवतान्तरमिन्द्रान्महेन्द्र ' ( शा० भा० २।१।१६ ) इस शावरभाष्य को लेखक ने प्रदर्शित किया है । किन्तु भाष्यकार से पूर्व सूत्रकार ही स्तुतशस्त्राधिकरण मे 'न श्रुतिसमवायित्वात्' सूत्र से उक्तार्थ को बता चुके है । शबरस्वामी, लेखक के समान न चलकर मर्यादा का पालन करते हुए चलते हैं । शत्ररस्वामीजानते है कि विधिगत शब्दो का ही प्रयोग करना चाहिये | यह दाशमिक न्याय है । किन्तु आजकल के जो प्रलापी पण्डित है, उन्हे न नियम की, न विधि की और न मर्यादा की आवश्यकता होती है । इन पण्डितो के समान मीमासासूत्रकार, भाष्यकार आदि तो थे नही । 'तस्माद् देवतान्तरमिन्द्रान्महेन्द्र ' इस भाष्य को प्रदर्शित करते हुए लेखक महोदय समझ रहे हैं कि भाष्यकार को इन्द्र और महेन्द्र में भेद यदि दिखाई दे रहा है, तो इन्द्र और गार्हपत्य में भेद क्यो नही दिखाई दिया? ऐन्द्रीमन्त्र का गार्हपत्योपस्थान मे विनियोग भाष्यकार ने कैसे कह दिया । अतः यह
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२१२० वेदार्थपारिजात. स्तस्मिन्नेव ११३ पृष्ठे लिखति टिप्पण्याम् - 'ऐसा साक्षात् वचन हमे उपलब्ध सहिता तथा ब्राह्मणग्रन्थो मे कही नही मिला' इति । एव लिखतोऽस्याशय - यदय विनियोगः काल्पनिक इति । यथाजातस्यास्य जैमिनेश्च मध्ये कियान् कालो व्यतीत । अद्यतनोऽय यथाजातः, अनेन वाक्यमिदI नोपलब्धमितिहेतो काल्पनिकोऽयं विनियोग इति साधन कि युक्तिसङ्गतम्? स्वयमेक चक्षुष्मान् महर्षिजैमिनिमारभ्य म० म० चिन्नास्वामिशास्त्रिचरणपर्यन्त सर्व एव मीमासका अन्धा । अहो! मौर्यस्य पराकाष्ठा 1। बिडालचक्षुर्निमीलनन्यायेनाय सर्वानेवान्धान् पश्यति । स्वस्मै यथा रोचते तथा निर्मर्याद वाक्यानि रचयति । नूनमुन्मत्त इवाभाति । काल्पनिक विनियोगे 'दधिक्राव्णो अकारिषम्, नवग्रहमन्त्राश्च पदे पदे कीर्तयन् तत्रासम्बद्धविनियोग प्रदर्शयति । एवं प्रदर्शयतोऽस्य मनसीद विपरिवर्तमानं स्यादिति ज्ञायते यत्-क्लृप्तविनियोगाः केचन काल्पनिकविनियोगःश्चापरे । तत्र काल्प-, निकविनियोगा भूयासः क्लृप्तविनियोगाश्चाल्पीयास इति । क्लृप्तविनियोगेषु पृच्छामि किं मन्त्रार्थंमनतिक्रम्य मन्त्रार्थमनु- सृत्य वा विनियोगो वर्तते? त्वदभिमतास्सात्विका आडम्बररहिताश्च यागा दर्शपूर्णमासादय । तत्र कि याज्यापुरोनुवाक्यात्वेन विनियुज्यमानाना मन्त्राणा किं तथात्वमस्ति? स्तोत्रशस्त्रेषु ये विनियुक्ता मन्त्रास्तेष्वपि बुद्धि प्रसारणीया, तत्र यादृश कार्य क्रियते तादृशार्थप्रतिपादकता कि तेषामस्ति? त्वन्मते सोमयागश्च तामसिक, तत्र स्तोत्राणा शस्त्राणाञ्च काल्पनिको विनियोग इति निस्सङ्कोच त्व ब्रूया । एकेनैव वाक्येन ब्रूहि- यद्दयानन्देन य पाठविधि प्रवर्तितस्स एव यथार्थः, आश्वलायनकात्यायन- ब्राह्यायणलाट्यायनबौधायनापस्तम्बप्रभृतिभि यः प्रवर्तित क्रमस्स सर्वोऽप्ययथार्थ इति । श्रौतेषु स्मार्तेषु च कर्मसु यः प्रथम. पदार्थ आचमनम्, तस्य समन्त्रकत्वममन्त्रकत्व वेति यो न जानाति पज्ञोपवीतस्वरूयञ्च यो न वेत्ति, आश्वलायना- दीव महर्षीन् तृणायापि मन्यते, सोऽपि यथाजातः शाबरभाष्यमनुवदति, तत्र च लिखति -' मदीयगणनानुसारेणोपलब्ध- ब्राह्मणग्रन्थेषु ऐतरेयब्राह्मण प्राचीनम्, तदिद मदीयव्याकरणेतिहासे समुपपादितम् तद्रष्टव्यमिति (पृ० ११५ ) | सत्यमेवाय विनियोग काल्पनिक है, यह कहते हुए लेखक उसी ११३ पृ० पर टिप्पणी में लिख रहे है --' ऐसा साक्षात् वचन हमे उपलब्ध सहिता तथाब्राह्मण ग्रन्थो में कही नही मिल ' इति । इस प्रकार लिखते हुए लेखक का आशय इस विनियोग को काल्पनिक बताने मे है । लेखक और जैमिनि के मध्य कितना काल व्यतीत हुआ होगा, इसे लेखक ने कभी नही सोचा होगा । आज के आधुनिक लेखक को वाक्य उपलब्ध नही हुआ, अत विनियोग को काल्पनिक कह देना क्या युक्तिसंगत होगा? लेखक महोदय स्वय अपने को ही एकमात्र चक्षुष्मान् समझते है, और महर्षि जैमिनि से लेकर म० म० चिन्नस्वामी शास्त्री जी तक सभी मीमासको को वे अन्ध समझ रहे है । विडालचक्षुर्निमीलन न्याय से लेखक महोदय अपने सिवाय सभी को अन्धा समझते है । लेखक महोदय अपनी रुचि के अनुसार मर्यादा रहित वाक्यों की यथेष्ट रचना करते है । काल्पनिक विनियोग के विषय मे ' दधिक्राव्णो अकारिषम्' और नवग्रह के मन्त्रो को बार बार बताकर उनका असम्वद्ध विनियोग है, लेखक ने कहा है । इसे प्रदर्शित करते हुए लेखक के मन मे कदाचित् यह विचार चल रहा होगा कि कुछ मन्त्रो का विनियोग क्लृप्त है, और कुछ मन्त्रो का विनियोग काल्पनिक है । उनमें भी काल्पनिक विनियोग वाले मन्त्र अधिक है, और क्लृप्त विनियोग वाले मन्त्र कम है । क्लृप्त विनियोगों में हम पूछते है कि विनियोग, मन्त्रार्थ का अतिक्रमण ( उल्लङ्घन ) करके है अथवा मन्त्रार्थ का अनुसरण करके है? तुम्हारे मत के अनुसार तो सात्विक और आडम्बर रहित याग दर्शपूर्णमासादि है । उनमें याज्या- पुरोनुवाक्या के रूप मे विनियुज्यमान मन्त्र क्या वैसे है? स्तोत्र-शस्त्रो मे विनियोग किये जाने वाले मन्त्रो को भी देख लो, वहाँ पर जैसा कार्य किया जाता है, तादृशार्थ प्रतिपादकता क्या उनमे है? तुम्हारे मत मे सोमयाग तो तामसिक है, उसमें स्तोत्र, शस्त्रो के विनियोग को कल्पनिक हो तुम नि सङ्कोच कहोगे । साथ साथ यह भी कह दो कि दयानन्द ने जो पाठविधि प्रवर्तित किया, वही यथार्थ है, और आश्वलायन, कात्यायत, द्राह्मायण, लाट्यायन, बौधायन, आपस्तम्व प्रभृति महर्षियो के द्वारा प्रवर्तित किया सभी क्रम अयथार्थ है । श्रौत और स्मार्त कर्मों मे जो प्रथम पदार्थ आचमन है, वह समन्त्रक हैं या अमन्त्रक है, यह भी जो नहीं जानता, यज्ञोपवीत के ,स्वरूप को भी जो नही जानता और आश्वलायनादि महर्षियो को जो वह व्यक्ति शाबरभाष्य का अनुवाद कर रहा है और लिखता है- "मेरी गणना के अनुसार उपलब्ध ब्राह्मणग्रन्थों में ऐतरेय ब्राह्मण प्राचीन है, यह मेरे व्याकरण के इतिहास में अच्छी तरह बताया
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वेदार्थपारिजातः २१२१ कालगणनायां महाकाल ", अत एवाश्वलायनादीनपि महर्षीन् कबलयति । त्रिकालज्ञ खल्वयम् । भो । त्रिकालज्ञतपस्विन् । —? महामहर्षे । ब्रूहि किमैतरेयब्राह्मणात्पूर्व किमपि ब्राह्मण नासीत् उपलब्धब्राह्मणग्रन्थेष्वपीदं ब्राह्मणं प्राचीनमिति किमुपपादयितुं शक्यते? ब्राह्मणग्रन्थेष्वधीयमानेषु सुमहद्रहस्यमन्तर्निहितमस्तीति विज्ञायते । तच्च रहस्यमन्वेषणयोग्यम् । अद्य जातो यथा जातस्तिष्ठन्मूत्र. कच्छविहीनो झटिति ब्रूयात्— तैत्तिरीयशाखार्वाचीना माध्यन्दिनशाखा च प्राचीनेति । यश्च मन्त्रानपि विरच्य याज्ञिकास्तेषु तेषु ग्रन्थेषु योजितवन्त इति निरर्गल वदति, तेनेद रहस्य कथमवगम्यताम्? स्वैर ब्रूयादिदमपि विरच्य लोकै समायोजितमिति । इदमत्रान्वेषणीयमस्ति रहस्यम्— सर्वत्र ब्राह्मणग्रन्थेषु ' तद्धैके', 'तदु तथा न कुर्यात्' 'तत्त- नादृत्यम्' 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति' इत्यारभ्य तेषा कथनमभिधाय तत्तथा न कार्यम्' 'तदाहु.' 'तत्तन्नादृत्यम्' इत्येव खण्डन- रूपाणि स्थलान्युच्चावचानि दृश्यन्ते । एतेषु विचार्यमाणेषु नून प्रतीयेत--' यद्ब्राह्मणग्रन्था. पूर्वापरकालवर्तिन' इति । किन्त्वस्मा- -, भिर्धेर्यमवलम्ब्य विचारः कर्तव्यः । सहसा बालचापल्य नावलम्बनीयम् अयमर्वाचीनः अय प्राचीन इति । इदमपि निश्चेतव्यम्- तत्तच्छ्रौतसूत्राणि तत्तच्छाखीयब्राह्मणग्रन्थानुसारेण महर्षिभि. कृतानीति । श्रौतसूत्राणामाविर्भावात्पूर्व देशे श्रौतकर्माणि याज्ञिकैर्नानुष्ठीयन्तेस्मेति निश्चेतु न शक्यते ब्राह्मणग्रन्थानधीयाना याज्ञिका यथायथ कर्माण्यन्वतिष्ठन्नित्यत्र सुलभान्युदाहरणानि । स्मृतिशक्तिस्तेषा विलक्षणाभवत् । यदा हि सामाजिकाना स्मृतिशक्तौ न्यूनता तेऽपश्यन् सूत्राणि रचयि- तुमारभन्त । शाखान्तराधिकरणन्यायमनुसर्तु ते शाखान्तरगतपदार्थोपसहाराय शाखान्तराण्यप्यालोड्य तद्गतान् मन्त्रान् पदार्थाश्च स्वस्वसूत्रेषु सङ्गृहीतवन्तः । सौत्रमन्त्रत्वेनाद्यापि याज्ञिकेषु प्रसिद्धि । प्रायस्तत्तत्सूत्रकारा स्वस्वशाखागतान् मन्त्रान् प्रतीकरूपेण परशाखागतांश्च समग्रान् सूत्रेषूल्लिखन्ति । गया है ", उसे देख लेना चाहिये --पृ० ११५ । सचमुच कालगणना करने में तो यह महाकाल ही होगा, अतएव आश्वलायनादि महर्षियो : को भी निगल रहा है । अरे । यह तो त्रिकालज्ञ प्रतीत हो रहा है । अजी त्रिकालज्ञ तपस्वीमहर्षिजी । जरा यह तो ,, बताइये क्या ऐतरेयब्राह्मण के पूर्व कोई ब्राह्मण नही था । क्या उपलब्ध ब्राह्मणग्रथो मे भी यह ब्राह्मण प्राचीन है ऐसा उपपादन कर सकोगे? ब्राह्मणग्रन्थो के अध्ययन करने पर ही ज्ञान हो पाता है कि उनमे महान् रहस्य अन्तर्निहित है, जो अन्वेषण के योग्य है | आज का आधुनिक, बैल की तरह खडे खडे मूत्रोत्सर्ग करने वाला कच्छविहीन चट से कह देगा कि तैत्तिरीय शाखा अर्वाचीन है, माध्यन्दिन शाखा प्राचीन है । जो व्यक्ति 'मुखमस्तीति वक्तव्यम्' न्याय से बेधडक होकर यह कह देता है कि 'याज्ञिको ने भी मन्त्रो की रचना कर उन ग्रन्थो मे उन मन्त्रो को जोड दिया है' वह वेदरहस्य को कैसे अवगत कर पायगा? वह तो स्वैर होकर यह भी कह देगा कि लोगो ने अपनी रचना करके उसमे जोड दी है । ज्ञातव्य रहस्य तो यह है- ब्राह्मणग्रन्थो मे सर्वत्र' ' तर्द्धके ', 'तदु तथा न कुर्यात्', 'तत्तन्नादृत्यम्', ' ब्रह्मवादिनो वदन्ति' ऐसा आरम्भ करके और उनके कथन को बताकर ' तत्तथा न कार्यम्', 'तदाहु ' 'तत्तन्नादृत्यम्' इस प्रकार खण्डनरूप स्थल न्यूनाधिकरूप में दिखाई देते हैं । इनको देखने पर ब्राह्मणग्रन्थों की पूर्वापरकालवर्तिता अवश्य आपातत प्रतीत होगी । किन्तु विद्वान् लोग धैर्य के साथ विचार करते है, बालकोचित चञ्चलता का अवलम्बन नही किया करते । अधीर होकर अमुक अर्वाचीन है और अमुक प्राचीन है, ऐसा निर्णय नही किया करते । यहाँ पर यह भी ज्ञातव्य है कि तत्तच्छाखीय ब्राह्मणग्रन्थो के अनुसार महर्षियों ने तत्तच्छ्रौतसूत्रो की रचना की । श्रौतसूत्रो की रचना होने के पूर्व याज्ञिक लोग श्रौतकर्मो का अनुष्ठान नही किया करते थे, यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योकि ब्राह्मणग्रन्थो के अध्येता याज्ञिकलोग श्रोतयज्ञो का अनुष्ठान यथाविधि किया करते थे, इस बात के अनेक उदाहरण सुलभतया उपलब्ध हो सकते है । उनकी स्मरणशक्ति विलक्षण हुआ करती थी । जब उन्होने समाज मे लोगो की स्मरणशक्ति का ह्रास होते हुए देखा, तब उन्होने सूत्रो की रचना करना आरम्भ किया । शाखान्तराधिकरणन्याय का अनुसरण कर उन्होने अन्यान्यशाखाओ के पदार्थों के उपसहारार्थ अन्यान्यशाखाओ का सम्यक् आलोडन किया और तद्गत मन्त्रों और पदार्थों का अपने-अपने सूत्रो मे सग्रह किया । आज भी याज्ञिकसमाज मे सोत्रमन्त्र के रूप में उनकी प्रसिद्धि है । प्राय तत्तत्सूत्रकार अपनी अपनी शाखा के मन्त्रो को प्रतीक रूप में और अन्य शाखागत मन्त्रो को समग्रतया अपने सूत्रो मे लिखा करते है । २६६
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२१२२ वेदार्थपारिजातः 'स्वाध्यायोऽध्येतव्य ' इत्यत्र स्वाध्यायपदस्य स्वशाखार्थ । तस्या एवाध्ययनविषयत्वम् । स्ववेदगतशाखान्तराणि नाधीयन्ते वेदान्तरगतशाखायास्तु अध्ययन भवति, तदपि स्वगाखाध्ययनानन्तरमेव । अतस्स्ववेदगतशाखान्तरमन्त्राणा वा पदार्थाना वा आवश्यकताया सत्या सूत्रकारा समग्रमन्त्रानुपूर्वी लिखन्ति । तदिदमजानानोऽद्यतनो द्राग्ब्रवीनि - मन्त्रोऽय सूत्रकारेण कल्पित इति ।. स्वाध्यायाध्ययनञ्च कर्मानुष्ठानायैव याज्ञिकैरक्रियत, तदपि गुरुमुखोच्चारणानूच्चारणद्वारैव ॥ आसीत्कश्चन कालो यस्मिन् लेखनसामग्रयभावेन सर्व वैदिकवाड्मय वाचोविधेयमभवत् । सहिताब्राह्मणयोरध्ययनद्वारा ( ) यादृशी वाचोविधेयता पूर्वजानामासीत् तथैव कल्पाना सूत्राणामपि ॥ अत एव कल्पसूत्राधिकरणे १।३।७ वेदवाक्यैश्चैषा कल्पाना सूत्राणाञ्च तुल्यमादर विलोक्य पूर्वपक्षी वेदवत्तेषा प्रामाण्य स्वीकरोति । ' ' तत्र जैमिनि नासन्नियमात् इति सूत्रेण वेदवदेतेषा स्वरादिनिबन्धनाभावात् वेदमूलकत्वेनैव प्रामाण्यं सिद्धान्तयति । अत्रेद पर्यालोचनीयम्S - यत्कियन्ति शतकान्येव व्यतीतानि भवेयुरिति । अद्यतनदृष्ट्या नेद विलोकनीयम् । एषु दिनेषु आयसाक्षरैर्वाक्यानि सयोज्य सद्य एव मुद्रणालये मुद्राप्य कतिपयैरेव दिने सर्वत्र भारते तत्पुस्तक प्रचारयितु शक्यते । प्राक्तनकाले नासीदिय सामग्री । वाचोविधानमेकमेव साधन तदानीम् । नात्र मन्त्राणा वा विनियोगस्य वा समायोजनस्यावसर । यदि वाचोविधाने न विश्वास, तर्हि समायोजनकार्येऽपि कथ विश्वास क्रियताम् । अद्य वय यान् सन्दर्भान् पुस्तकाकारेण पश्यामस्ते तदानी वाचोविधेयरूपेणासन्नित्यत्र सन्ति सम्प्रत्यपि बहून्युदाहरणानि । अद्यापि जीवन्ति सलक्षणाध्यायिनो याज्ञिका, येऽग्निहोत्रमारभ्याश्वमेधान्ताना कर्मणा कारयितारः । पुस्तकसहायेन विनैव यथायथ कायितु समर्था । अस्या स्थिता वयं ब्राह्मणभाग आरम्भावस्थाया सङ्कुचितगात्र आसीत् कालान्तरे चोपचय प्राप्त इति, 'स्वाध्यायोऽध्येतव्य ' यहाँ पर स्वाध्याय पद का 'स्वशाखा' अर्थ है । वही अध्ययन का विषय हुआ करती हैं, अर्थात् सर्वप्रथम अपनी शाखा का ही लोग अध्ययन करते है, अपने ही वेद की अन्य शाखा का अध्ययन नही करते । अन्य वेद की शाखा का अध्ययन , -तो किया जा सकता है किन्तु उसे भी स्व शाखा के अध्ययन के पश्चात् ही । यही कारण है कि आवश्यकता पड़ने पर स्व वेद गत शाखान्तर के मन्त्रो या पदार्थों को समग्र आनुपूर्वी को सूत्रकार लिखा करते है । किन्तु आज के आधुनिक अल्पज्ञ लोग इस रहस्य को न जानकर चट से कह बैठते हैं कि यह मन्त्र सूत्रकार का कल्पित है । याज्ञिकलोग कर्मानुष्ठानार्थ ही स्वाध्यायाध्ययन किया करते थे, और वह भी गुरुमुखोच्चारणानुच्चारण द्वारा ही किया करते थे । एक समय था, जिस समय लेखनसामग्री का अभाव रहने से समग्र वैदिक वाङ्मय को कण्ठस्थ रखा जाता था । सहिता-ब्राह्मण के समान ही कल्पसूत्रो को भी हमारे पूर्वजोने कण्ठस्थ कर रक्खा था । अत एव कल्पसूत्राधिकरण मे ( १।३।७ ) पूर्वपक्षी, वेद और कल्पसूत्र दोनो का समान आदर देखकर वेद के तुल्य ही सूत्रो का स्वत प्रामाण्य समझ रहा है । तब जैमिनि ने सिद्धान्त किया है—'नासन्नियमात्' इति । जैमिनिसूत्र से बता रहे हैं कि वेद के समान सूत्रो मे स्वरादिनिबन्धन न होने से वेदमूलकत्वेन ही सूत्रो का प्रामाण्य स्वीकार करना चाहिये । यहापर यह भी पर्यालोचन करना उचित होगा कि कितनी शताब्दिया इस प्रकार बीती होगी । आज की दृष्टि से मत देखिये । आज तो कम्पोजीटर्स लोग आयसाक्षरो से वाक्यो को सयोजित कर ( कम्पोज कर के ) तत्काल ही मुद्रणालय मे मुद्रित कराकर कुछ ही दिनो में पुस्तक का प्रचार प्रसार सर्वत्र किया जाता है । किन्तु प्राचीनतर काल में यह सब व्यवस्था तो नही थी । ग्रन्थो को सुरक्षित रखने का साधन एकमात्र मुखोद्गत करना ही था । ऐसी स्थिति मे मन्त्रो को अथवा विनियोग को उनमे जोडने (समायोजित करने) का अवसर ही कहाँ था? यदि मुखोद्गत रखने की बात पर विश्वास न किया जाय तो समायोजन कार्य की कहानी पर भी विश्वास कैसे किया जाय? आज हम जिन सन्दर्भों को पुस्तकाकार देखते है, वे ही सन्दर्भ उस काल मे मुखोद्गत किये जाते थे । आज भी इस प्रकार के अनेक उदाहरण अपनी आखों देखे जा सकते है । आज भी ऐसे याज्ञिक जीवित है, जिन्होने सम्प्रदाय पूर्वक सलक्षण वेदाध्ययन कर उसे कण्ठस्थ कर रक्खा है । जो अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेधान्तकर्म का यथाविधि अनुष्ठान पुस्तक की सहायता के बिना ही करा सकते है । ऐसी स्थिति में यह कह देना कि 'यह ब्राह्मणभाग, आरम्भकाल मे संकुचित मात्र या तदनन्तर कालान्तर मे उसमे परिवर्तन-परिवर्धन किया गया, उसी तरह इतना भाग प्राचीन है और इतना भाग अर्वाचीन है, ,
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वेदार्थपारिजातः २१२३ अय प्राचोनोऽयञ्चार्वाचीन इति च साधनं कथङ्कार भवितुमर्हति । अत्रेद द्रष्टव्यम्— शतपथब्राह्मणे दर्शपूर्णमासप्रकरणे 'तद्वैके स्रुक्सम्मार्जनान्यग्नावभ्यादधति तदु तथा न ' ( | | | ) कुर्यात् तस्मादु परास्येदेवेतानि श० ब्रा० १ २ ४ ११ इति दृश्यते । वेदाग्रे जुहूपभृद्धवाणा सम्मार्जन विहितम् — 'स्रुचस्सम्माष्टि' इति । वेदस्य शयानवत्सजान्वाकृतिविशिष्टस्य दर्भमुष्टेरग्रभागा सम्मार्जनानि कथ्यन्ते । स्रुचां सम्मार्जन विधाय कृतकार्याणि तानि केचनाग्नौ जुह्वति तत्तथा न कर्तव्यम् किन्तु तेषा प्रासनमेव कर्तव्यमिति सन्दर्भार्थं । ' ' ',,, ' ' ' तैत्तिरीयब्राह्मणे स्रुक्समार्जनान्यग्नी प्रहरति तान्येकं वृथैवापास्यन्ति तत्तथा न कार्यम् तस्मादेतान्यग्नावेव प्रहरेत् (तै ० ब्रा० ३।३।२) इति दृश्यते । सन्दर्भद्वयेनेद निश्चित भवति पदनयोर्ब्राह्मणयो पौर्वापर्यं निश्चेतु न शक्यत इति । एवविध नेदमेकमेव स्थलम् । सन्त्यन्यानि भूयासि स्थलानि । सति चैव कथ पौर्वापर्यनिचय क्रियताम् । एतादृशेषु स्थलेषु समायोजन परिवर्धनं वा कथमुपपादयितु शक्यम्? शतपथब्राह्मण तैत्तिरीयब्राह्मणमेव, तैत्तिरीयब्राह्मणञ्च शतपथब्राह्मणमेव खण्डयितु प्रवृत्तमिति , न साधयितुं शक्यम् आसन् बहूनि ब्राह्मणानि यानि चेदानी नोपलभ्यन्ते । इयमेव स्थितिरैतरेयब्राह्मणस्यापि । ज्योतिष्टोमे द्वितीयदिने प्रायणीयेष्टि । अत्र पथ्या अग्नि सोम सविता अदितिश्चेति पञ्च देवता भवन्ति । इयमिष्टिः दर्शपूर्ण- मासयोविकृतिः । एवमन्तिमदिने उदयनीयेष्टि, तत्रापीमा एव देवता. याः प्रायणीयेष्टेः । इयमपि दर्शपूर्णमासविकृतिः । प्रकृतितोऽतिदेशेन प्रयाजानूयाजादय पदार्था प्राप्यन्ते । तथापि प्रायणीयेष्टिप्रकरणं वाक्यमेव श्रूयते - ' प्रयाजवदननूयाजं • तत्तन्नादृत्यम् प्रयाजवदेवानुयाजवत्कर्तव्यम् · ' ( ) |. कर्तव्य प्रायणीयमित्याहु ऐ० ब्रा० २/५ केचन शाखिन प्रायणीयं यथा प्रयाजयुक्त क्रियते तथा अनुयाजयुक्त न कर्तव्यमित्याहुः, तत्खण्डयते तन्नादृत्यमिति । यथा प्रयाजयुक्त क्रियते तथाऽनुयाज- युक्तं कर्तव्यम् इति सन्दर्भार्थः । इत्यादि कथन मीमासक कहलाने वाले को शोभा नही देता । यहा पर हम लेखक से पूछते हैं कि शतपथब्राह्मण के दर्शपूर्ण मास प्रकरण मे ' तर्द्धके स्रुक्सम्मार्जनान्यग्नावभ्यादधति ' ' - ( | | | ) ( ) तदु तथा न कुर्यात् तस्मादु परास्येदेवतानि श० ब्रा० १ २ ४ ११ यह वाक्य दृष्टिगोचर होता है । वेद सम्मार्जन कुशमुष्टि के अग्रभाग से जुहू, उपभृत्, ध्रुवा ( यज्ञीय काष्ठपात्र) का सम्मार्जन विहित है-'स्रुच सम्माष्टि' इति । सम्मार्जन कर चुकने पर उनका काम उनका प्रासन ( त्याग ) करना ही उचित , समाप्त हो जाता है, तब कुछ लोग उन्हें अग्नि में होम' कर देते हैं, किन्तु वैसा न करके ' है यह पूरे सन्दर्भ का अर्थ है ॥ तैतिरीय ब्राह्मण मे स्रुक् सम्मार्जनान्यग्नौ प्रहरति तान्येके वृथैवापास्यन्ति तत्तथा न कार्यम् तस्मादेतान्यग्नावेव प्रहरेत्' - ( तै० ब्रा० ३।३।२ ) यह वाक्य दृष्टिगोचर होता है । इन परस्पर विरुद्ध दोनो सन्दर्भों को देखने से यह निश्रित होता है कि इन दोनो ब्राह्मणो का पौर्वापर्य नही है । इस प्रकार का यह एक ही स्थल नही है, बहुत से ऐसे स्थल है । तब ऐसे स्थलो को देखने पर पौर्वापर्य का निर्णय कैसे कोई कर सकता है? ऐसे स्थलो में समायोजन या परिवर्धन का उपपादन भी कैसे कोई कर सकता है? शतपथब्राह्मण तैत्तिरीयब्राह्मण के खण्डनार्थ या ,,, तैत्तिरीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण के खण्डनार्थ प्रवृत्त हुआ है यह भी सिद्ध नही किया जा सकेगा । किसी समय अनेकानेक ब्राह्मण थे जो आज उपलब्ध नही है । यही स्थिति ऐतरेय ब्राह्मण की भी है, उसमे ज्योतिष्टोम के द्वितीय दिन 'प्रायणीयेष्टि ' का अनुष्ठान बताया है । उस दृष्टि मे पथ्या, अग्नि, सोम, सविता और अदिति ये पाच देवता है । यह इष्टि, दर्श-पूर्णमास की विकृतिरूप है । एवं अन्तिम दिन उदयनीयेष्टि बताई गई है । जो प्रायणीयेष्टि की देवता है वे ही देवता इस उदयनीयेष्टि मे भी हैं । यह दृष्टि भी दर्शपूर्णमास की विकृति है । प्रकृति से अतिदेश के द्वारा प्रयाजानूयाजादिपदार्थ विकृति में प्राप्त होते हैं । तथापि प्रायणीयेष्टि के प्रकरण में ' प्रयाजवदनुयाज कर्तव्य प्रायणीयमित्याहु.... तत्तन्नादृत्यम्, प्रयाजवदेवानुयाजवत्कर्तव्यम्' (ऐ ० ब्रा० २।५ ) अन्य शाखा के कुछ विद्वान् कहते है कि 'प्रायणीय को जैसे प्रयाजसहित किया जाता है, वैसे उसे अनुयाजयुक्त नही करना चाहिये' इस मत का तन्नादृत्यम्' से खण्डन करते हैं । अर्थात् जैसे प्रयाज से युक्त करते है, वैसे ही अनुयाजयुक्त उसे भी करना चाहिये' यह सम्पूर्ण सन्दर्भ का अर्थ है । I
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२१२४ वेदार्थपारिजातः — ' तैत्तिरीयशाखाया षष्ठकाण्डस्य प्रथमप्रपाठके पञ्चमानुवाके सन्दर्भोऽय तथैव दृश्यते ब्रह्मवादिनो · वदन्ति प्रयाजवदननूयाज प्रायणीय कार्यमनुयाजवत् अप्रयाजमुदयनीयमिति तत्तथा न कार्यम् प्रयाजवदेवानू- ' (, ) – याजवत्प्रायणीय कार्य प्रयाजवदनूयाजवदुदयनीयम् तै० स० ६।१।५।३ ४ । अनयोर्ब्राह्मणयोरय भेद ऐतरेयेऽनु- याज इति ह्रस्व, तैत्तिरीये चानूयाज इति दीर्घः, 'प्रयाजवदनूयाजवदुदयनीयम्' इत्येतरेये नास्ति तैत्तिरीयेतु वर्तते । अत्रापस्तम्बाचार्य - –‘आज्यग्रहणकालेऽननुयाजे प्रायणीये चतुर्जुह्वा गृह्णाति, चतुरूपभृतिसमानयनार्थम्' ' अप्रयाजउदयनीये न जुह्वा गृह्णाति, चतुरूपभृत्यनूयार्थम्' 'प्रयाजवदननूयाजमित्युक्तम्' ( आप० श्र ० सू० १०।२१।७-१०) इति सूत्रयति । आश्वलायनश्च 'तदहः प्रायणीयेष्टि. ' इति राजत्र्यदिने प्रायणीयेष्टि विधाय तत्र पञ्चस्वपि यागेषु याज्यापुरोनुवाक्या. प्रदर्श्यान्ते 'शखन्नेयम्' इत्युक्त्वा ' अनाज्यभागा' इति सूत्रयामास । अत्रायं विषयविवेक ' - दर्शपूर्णमासयो प्रयाजार्थ पात्रद्वये आज्यग्रहणं भवति -जुह्वा चतुर्वारम् उपभृतिचाष्ट- वारम् । तत्तथैव प्रायणीयेऽतिदिष्टम् । किन्तु प्रायणीयेऽनुयाजाभावपक्षे उपभृतिचतुर्वारमेवाज्यग्रहण कर्तव्यमत्रानूयाजा- भावात् । उदयनीये प्रयाजाभावपक्षे जुह्वामाज्यग्रहणमेव न कर्तव्यं प्रयाजाभावात्, उपभृतितु चतुर्वारमनुयाजार्थतया ग्राह्यम् । प्रयाजवदननूयाजमिति ब्राह्मण उक्तमित्यापस्तम्बसूत्रार्थः । एव सूत्रयत आपस्तम्बाचार्यस्याशयोऽय यदत्रानयोः पक्षयोर्विकल्प इति, यतश्च तैत्तिरीयशाखाया पक्षद्वयस्याप्युक्तत्वात् । आश्वलायनस्त्वेकमेव पक्ष स्वीकरोतीति । इयता सन्दर्भेणेद निर्ग- लितम् - यदैतरेयब्राह्मणात्पूर्व ब्राह्मणान्तरमासीत्, तच्च तैत्तिरीयब्राह्मण वा भवतु ब्राह्मणान्तर वेति । ब्राह्मणग्रन्यविषये पौर्वापर्यनिश्चय कथमपि कर्तुं न शक्यते । तत्र खण्डनविषयस्थलानि पर्यालोचनीयानि — किमत्र तात्पर्यमिति । युगयुगान्तराद् ब्राह्मणभागा सहिताभागाश्चाध्ययनसम्प्रदायेनागच्छन्ति, सम्प्रदायविच्छेदेन च लुप्ता अनेकारशाखा इति मीमासकाना य. तैत्तिरीयशाखा मे षष्ठकाण्ड के प्रथम प्रपाठक में जो पञ्चम अनुवाक है, उसमे यह सन्दर्भ ठीक वैसे ही दिखाई पडता है— ' ' ब्रह्मवादिनो वदन्ति प्रयाजवदननूयाज प्रायणीय कार्यमनूयाजवत् अप्रयाजमुदयनीयमिति तत्तथा न कार्यम् प्रयाजवदेवानूयाज- वत्प्रायणीयकार्यं प्रयाजवदनूयाजवदुदयनीयम्' (तै० स० ६| १ | ५ | ३ |४ ) उक्त दोनो ब्राह्मणो मे भेद इतना ही है कि ऐतरेय मे ' अनुयाज ' ह्रस्व है, और तैत्तिरीय में ' अनूयाज' दीर्घ है, 'प्रयाजवदनूयाजवदुदयनीयम्' ऐसा ऐतरेय मे नहीं है, तैत्तिरीय में तो है । यहाँ पर आपस्तम्बाचार्य ने इस प्रकार सूत्रित किया है -' आज्यग्रहणकालेऽननूयाजे प्रायणीये चतुर्जुह्वा गृह्णाति, चतुरुपभृति समानयनार्थम्' ' अप्रयाज उदयनीये न जुह्वा गृह्णाति चतुरुपभृत्यनृपाजार्थम् प्रयाजवदननूयाजम् इत्युक्तम्' ( आप० श्री० सू० – १०।२१।७-१०) । और आश्वलायन ने इस प्रकार सूत्रित किया है—' तदह प्राणीयेष्टि ' राजकय के दिन प्रायणीयेष्टि का अनुष्ठान कर वहाँ पाँचो यागो मे याज्यापुरोनुवाक्याओ को प्रदर्शित किया जाता है 'शय्वन्तेयम्' कहकर 'अनाज्य भागा' इति 1 यहाँ का विषयविवेक इस प्रकार है - दर्श और पूर्णमास दोनो मे प्रयाजार्थ दो पात्रो में आज्य का ग्रहण किया जाता है— जुहूपात्र मे चार बार और उपभृत्पात्र में आठ बार । उसको ठीक उसी तरह प्रायणीय मे अतिदिष्ट किया जाता है । किन्तु प्रायणीय { मे जब अनूयाजाभाव रहे तब उपभृत् में चार ही बार आज्यग्रहण कर्तव्य होता है, क्योकि इसमे अनूयाज का अनुष्ठान नही करना है । और उदयनीय में जब प्रयाजाभाव रहे तब 'जुह' में आज्यग्रहण करना ही नही है, क्योकि उसमे प्रयाज का अनुष्ठान नही होना है । किन्तु उपभृत् में अनुयाजार्थ चारबार आज्यग्रहण कर्तव्य है । 'प्रयाज के समान अनूयाजरहित यह है' यह सूत्रार्थ है । इस प्रकार सूत्रकार आपस्तम्ब का आशय यह है कि यहाँ इन दो पक्षो में विकल्प है । क्योकि तैत्तिरीयशाखा में दोनो ही पक्ष बताये हैं । किन्तु आश्वलायन ने एक ही पक्ष को स्वीकार किया है । इतने सदर्भ से क्या यह निष्कर्ष निकला कि ऐतरेयब्राह्मण के पूर्व कोई अन्य ब्राह्मण रहा होगा, चाहे वह तैत्तिरीयब्राह्मण हो या अन्य कोई ब्राह्मण रहा हो । वास्तव में तो ब्राह्मणग्रन्थों के पौर्वापर्य का निर्धारण हो ही नही सकता । जहाँ परस्पर खण्डन सा प्रतीत होता हो, उन स्थलों के तात्पर्य का पर्यालोचन पूर्व परम्परा से प्राप्त शास्त्रीय शैली से करना चाहिए । , आज युगयुगान्तर से संहिताभाग और ब्राह्मणभाग के अध्ययन की अविच्छिन्न परम्परा गुरुसम्प्रदाय पूर्वक चली आरही है । अनेक
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२१२५ वेदार्थपारिजातः पन्था. स एवोपादेय । सर्वमिद परिशील्येव जैमिनिस्सूत्रयति - परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम्' इति । अनन्नर ११५ पृष्ठे 'काल्पनिक मन्त्रो की रचना' इति शीर्षके मन्त्ररचनाया काल्पनिकत्वे 'चरण'चतुष्ट्य प्रदर्श-यति - प्रथमद्वितीयतृतीयचतुर्थ इति । तत्र प्रथमे साधारणपरिवर्तनम् —'एप वो अमी राजा ' (मा० स ९-४०, २०१८) अत्रामी इति स्थाने 'एष वो भरता राजा' इति ( तै० स० १ ८-१० -१२) एष व कुरवो राजा' 'एष पञ्चाला राजा' ( मै ० स० २-६ - ९, काठक १५-१७) इति प्रदर्शयति । अयि तपस्विन्? 'भरता' इति स्थान एव माध्यन्दिनशाखायां 'अमी' इति परिवर्तन कुतो न जातम्? 'अमी' पद स्थान एव 'भरता' इति परिवर्तनावसरे किं त्वमुपस्थितस्तत्रासी? उत त्वा पृष्ट्वा पद परिवर्तितमृषिभि । यदिदानी स्मरसि कच्चित्? तव गणना माध्यन्दिनशाखानन्तर तैत्तिरीयशाखा केनचन प्रवर्तिता, तदनन्तर मैत्रायणीयशाखा, तदनन्तरञ्च काठकशाखेति । पूर्वमेवास्य प्रलापस्योत्तर दत्तम् । द्वितीये लिखति – विभिन्नस्थानेषु विभिन्नवाक्याना सयोजनेन मन्त्रा रचिता इति । अत्र ऋग्वेदस्य खिलपाठ मार्गो वर्ततेउदाहृत । लेखकेन महाभागेन किमिति सङ्कोच क्रियते? पाश्चात्यैस्तदनुसारिभिर्भारतीयैश्चोपदिष्ट प्रशस्तो , । तमवलम्ब्य द्वितीये चतुर्थेऽष्टमे वा मण्डले एतावन्ति सूक्तानि इयन्तस्तृचा एतावन्तो मन्त्राश्च विरचिता ते चएव सयोजिता इति स्पष्ट किमिति न लिखति महाभाग । अथवा गुरुणा दयानन्देन खिलपाठ एवैतादृश इति पाठितवान् स्यात् 1 खिलपाठोऽयमिति मुद्रितपुस्तके लिखित भागमवलोक्य खलु लिखसि त्वम् । कञ्चित्सम्प्रदायेनाध्येतारस्त्वया पृष्टा.? ? | कथमय खिलपाठ इति व्यवह्रियत इति वेदाध्ययनस्य गुर्वध्ययनपूर्वकत्व तावदङ्गीकर्तव्यम् । त्वं यथा मुद्रित पुस्तकमवलोक्य पठसि तदध्ययन न भवति । अध्ययन हि नाम–गुरुमुखोच्चारणातूच्चारण भवति प्रान्ते। तदिदमध्ययनंसम्प्रदाये वैकल्ये । देशे- विभिन्नसम्प्रदायेन प्रवृत्तमभवत् । सम्प्रदायश्चाविच्छेदेन गुरुशिष्यपारम्पर्येण विद्याप्राप्तिः । तत्र क्वचन एव सर्वमान्य है । शाखाओ का सम्प्रदायविच्छेद हो जाने से लोप भी हो गया है, यही सिद्धान्त मीमासको ने किया है, यही उपादेय इसी अभिप्राय को जैमिनि ने ' परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम्' सूत्र से बताया है । रचना को चार चरणो मे पृष्ठ ११५ पर लेखक महोदय 'काल्पनिक मन्त्रो की रचना' शीर्षक देकर काल्पनिक मन्त्रो की ; १०।१८ ) इस मंत्र के ' अमी' प्रदर्शित कर रहे है -प्रथमचरण-आरभ मे साधारण परिवर्तन -जैसे, 'एष वो अमी राजा' ( मा० स ० ९ ४० राजा' -( मैत्रा० स० २।६।९, पद के स्थान मे ' एष वो भरता राजा' (तै० स० १/८/१०/१२ ), 'एष व कुरवो राजा' 'एष पञ्चाला में 'अमी' यह परिवर्तन नही हुआ, काठ ० स० १५/१७) | किन्तु लेखक से यह पूछा जाय कि 'भरता' के स्थान मे ही माध्यन्दिनमहोदयशाखा वहाँ उपस्थित थे? या इनको? ' ' ' ' इसे लेखक ने कैसे जान लिया अभी के स्थान मे भरता पद को रखते समय क्या लेखक का निर्धारण किया है कि ऋषियो ने पदपरिवर्तन किया, जो लेखक को याद आरहा है? लेखक ने जो मनगढन्त कालक्रम माध्यन्दिनशाखा के अनन्तर तैत्तिरीयशाखा का प्रवर्तन किसी ने किया, तदनन्तर मैत्रायणीयशाखा, पूछकर तदनन्तर काठकशाखा का प्रवर्तन किया इत्यादि, यह सब लेखक का प्रलापमात्र है, इसको उत्तर हम पहले ही दे चुके है । की गई है, इसमें द्वितीय चरण में लेखक लिखते है कि मन्त्रो के विभिन्न स्थानो के विभिन्न वाक्य जोडकर मन्त्रो की रचना ? पाश्चात्य और उनके अनुयायी कतिपय ऋग्वेद के खिलपाठ को उदाहरण के रूप मे रखा है । लेखक ने इतना सकोच क्यों किया इतने सूक्त, इतनी ऋचाये, इतने मन्त्र,,, भारतीयो के द्वारा उपदिष्ट प्रशस्त मार्ग है ही उसके सहारे द्वितीय चतुर्थ या अष्ठम मण्डल मे ने खिलपाठ ही ऐसा है विरचित है, और उन्हे जोड दिया गया है, ऐसा स्पष्ट ही क्यो नही लिख मारा? अथवा तुम्हारे गुरु दयानन्द ही तुम लिख रहे हो । क्या कभी ' ' ऐसा कदाचित् कहा होगा । मुद्रित पुस्तक मे खिलपाठोऽयम् इसप्रकार लिखित भाग को देखकर तो गुर्वध्ययनपूर्वक हो हुआ तुमने सम्प्रदायपुर सर अध्ययन करने वालो से पूछा है कि इसे 'खिलपाठ' क्यो कहा जाता है? वेदाध्ययनअध्ययन ही नही है । अध्ययन तो करता है । तुम मुद्रित पुस्तक को देखकर जैसे पढते हो, उसे अध्ययन नही कहा जायगा, वह -भिन्न सम्प्रदाय के द्वारा प्रवृत्त हुआ । गरुमुखोच्चारणानूच्चारणरूप ही हुआ करता है । इसप्रकार का यह अध्ययन देश मे अनेक भिन्न अन्यसम्प्रदाय का अवलम्बन अविच्छिन्न गुरु-शिष्यपरम्परा से विद्याप्राप्ति को सम्प्रदाय कहते है । किसी प्रान्त मे सम्प्रदाय-वैकल्य होने पर
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२१२६ वेदार्थपारिजातः जाते सम्प्रदायान्तरावलम्बिभि खिलपाठ इति व्यवहार. कृतस्स्यात् । एवञ्च व्यवहारप्रयुक्तमिद नाम, न तु केनापि मन्त्रान् विरच्य योजितत्वात्खिलपाठ इति । सूत्रकार आश्वलायन इमान् मन्त्रान् विनियुङ्क्ते । तृतीये लिखति-' तदनन्तर वैदिक ग्रन्थो में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दो का सन्निवेश मात्र करके (जिससे वे वैदिक ) ' ( ) ' ' ' मन्त्रवत् प्रतीत हों मन्त्र रचे गये इति पृ० ११६ । तत्र टिप्पण्या सावित्रीमन्त्रगतं न प्रचोदयात् इति भागमुदाहरति । किमङ्ग? त्वदभिमतसावित्रीमन्त्रगत 'नः प्रचोदयात्' इति भागोऽपि तत्र केनापि योजित इति कथ न ब्रूषे । तेन मन्त्रेण किं पुण्यमाचरितम्? मैत्रायणीयसहितागतैश्च तैः कि पापमाचरितम्? अत्र किं किमपि विनिगमकमुपस्थापयितुं शक्नोषि? अभ्यासाधिकरणन्यायेनात्र मन्त्रभेदः किमिति नाङ्गीक्रियते? कर्मकाण्डम्, अध्यात्मवादञ्च मिश्रीकृत्य क्वचित्किञ्चिदिति कृसरान्नवद्व्यवहारो न कर्तव्यः । उभावपि पन्थानौ भिन्नौ । यदेव निवृत्ति प्रति कारण तदेव न प्रवृत्ति प्रत्यपि । मन्त्रसिद्धिः मन्त्रगतदेवतासिद्धिरिति कर्मकाण्डे सन्ति नैकविधा पन्थान. । तत्र रामगायत्री दुर्गागायत्री रुद्रगायत्रीत्यादयो मन्त्रास्सम्प्र- दायागता नैकविधा । चतुर्णा वेदाना तत्रच्छाखानाञ्चाध्येतॄणा गायत्रीमन्त्र एक एवोपनयनकाल उपदिश्यते पञ्चश', मन्त्रस्यास्य जपस्त्वन्यादृशः । सायप्रातर्मध्यन्दिनेषु कालेषु सन्ध्यायां मन्त्रस्य रूपमेकमेव । वन्दनञ्च प्रकारान्तरम् । सन्ध्यावन्दनमिति- व्यवहारे सन्ध्याया प्रकारो वन्दनस्य च प्रकारो भिन्नः । इदञ्च सम्प्रदायादेवावगन्तु शक्यम् । वीरमित्रोदयकारेण सत्य रामगायत्री प्रदर्शिता, किन्तु रामगायत्र्या पुष्पाञ्जलिर्देयेति न कथितं स्यात् । तवैवेद , वाक्य पुष्पाञ्जलिर्देयेति । वीरमित्रोदयकारेण किम् ततः पूर्वं कृत्यकल्पतरुकारोऽपि गायत्रीमिमा लिखति । त्व तु न ,, राममङ्गीकरोषि न दुर्गाम् न रुद्रम् । निस्सङ्कोच पुष्पाञ्जलिर्देयेति लिखसि । कि दयानन्देनाञ्जलिशब्द स्त्रीलिङ्ग ? इति ग्राहित यथा वदति सः तदेव प्रमाण तव । अथर्ववेदे परिशील्यमाने नाना गायत्र्यः पठिता दृश्यन्ते । सर्वमिदं करने वालो ने उसे ‘खिलपाठ' शब्द से व्यवहार करना आरंभ कर दिया हो, यह कह सकते है । एवञ्च व्यवहारप्रयुक्त यह नामकरण है । किसी ने मन्त्रो की रचनाकर पहले मे उन्हे जोड दिया, इसलिये उसे 'खिलपाठ' नही कहने लगे । क्योकि सूत्रकार आश्वलायन- महर्षि ने उन मन्त्रो का विनियोग बताया है । पुन. लेखक महोदय पृ० ११६ पर तृतीय चरण मे लिखते है कि ' तदनन्तर वैदिक ग्रन्थो में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दो का सन्निवेशमात्र करके ( जिससे वे वैदिकमन्त्रवत् प्रतीत हो ) मन्त्र रचे गये । वही पर टिप्पणी में सावित्रीमन्त्रगत 'न प्रचोदयात्' भाग को उदाहरण के रूप में उपस्थित किया है । किन्तु लेखक जी । जरा यह तो बताइये, कि क्या तुम्हारे अभिमत सावित्रीमन्त्रगत 'न प्रचोदयात्' भाग को भी किसी ने जोडदिया है? यह क्यों नही कह रहे हो? क्या उस मन्त्र ने कोई पुण्य किया है? और मैत्रायणीयसहिता के मन्त्री ने कोई पाप किया है क्या? इस विषय में क्या कोई विनिगमक उपस्थित कर सकोगे? अभ्यासाधिकरण न्याय से यहा मन्त्र- भेद को क्यो नही स्वीकार करते? कर्मकाण्ड और अध्यात्मवाद दोनो का कही किञ्चित् सम्मिश्रण कर खिचड़ी करदेना उचित नही है । दोनो मार्ग भिन्न भिन्न है । जो निवृत्ति के प्रति हेतु है, वही प्रवृत्ति के प्रति हेतु नही हो सकता । मन्त्रसिद्धि मन्त्रगतदेवतासिद्धि आदि अनेक मार्ग कर्मकाण्ड मे हुआ करते है । उसी में रामगायत्री, दुर्गागायत्री, रुद्रगायत्री इत्यादि अनेकविधमन्त्र सम्प्रदायगत है । किन्तु चारो वेदो की तत्तत्शाखाओ के अध्ययन करने वालो का गायत्री मन्त्र एक ही है, और उसका पादश उपदेश उपनयनकाल में ही किया जाता है । और इस मन्त्र के जप का प्रकार भी कुछ अन्य ही है । साय, प्रात, मध्याह्नकाल की सध्या में मन्त्र का रूप एक ही है । किन्तु वन्दन का प्रकार भिन्न है | ' सध्यावन्दनम्' इस व्यवहार मे संध्या का और वन्दन का प्रकार भिन्न हो है । यह सबसा सम्प्रदाय से ही जाना जा सकता है । वीरमित्रोदयकार ने रामगायत्री को प्रदर्शित किया है, इतना तो सच है, किन्तु रामगायत्री से पुष्पाञ्चलि देने को उसने नही कहा होगा | ' पुष्पाञ्जलिर्देया ' यह वाक्य तुम्हारा ही है । वीरमित्रोदयकार ने ही क्यों, उसके भी पूर्व कृत्यकल्पतरुकार ने भी इस गायत्री को लिखा है । तुम तो राम, दुर्गा या रुद्र किसी को मानते नही हो, किन्तु 'पुष्पाञ्जलिर्देया' वाक्य नि सकोच लिख रहे हो । क्या ' '?दयानन्द ने अञ्जलि शब्द को स्त्रीलिङ्ग मे तुम्हे बताया है क्योकि जैसा वह बतावे वही तुम्हारे लिये प्रमाण है । अथर्ववेद का "
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वेदार्थपारिजातः २१२७ केनापि समायोजितमिति कथन निर्मूलम्, अध्ययनसम्प्रदाये तेषामध्ययनमधुनापि वर्तते । सम्प्रदायस्त्वन्धश्रद्धाविजृम्भित ,? इति त्व ब्रूया तथापि त्व यद्यद् वदसि लिखसि च तत्रान्धश्रद्धाविजृम्भितत्व कि नास्ति यदेव दयानन्देन बोधित तदेव खलु त्वमपि वदसि लिखसि च । उलूखलकिसलयमते यथा जात? 'चतुर्थ' इत्यारभ्य लिखसि 'ओ ही हु फट् स्वाहा, आदि सर्वथा अर्थरहित तान्त्रिक मन्त्रो की रचना में परिणत हुई' (पृ० ११७ ) इति । धूर्तशिरोमणि ओङ्कारमपि न परित्यक्त- वान्, तस्याप्यर्थरहितत्वमुल्लिखति । यद्यमीषामक्षराणा वर्णानाचार्थं ज्ञातुमिच्छसि तर्ह्यागच्छ, तान्त्रिकान् शुश्रूषस्व । अस्मिन् जन्मनि तव कदाचिदर्थावबोधो न जायेत, तर्हि जन्मान्तर गृह्णीष्व । जन्मान्तरे च त्वादृशस्य कथ विश्वास? अमीषा बीजाक्षराणामर्थापरिज्ञानेन म्रियस्व, अथवा ब्रह्मराक्षसो भव ॥ तव बुद्धेविषयो न जात इत्येतावन्मात्रेण निरर्थ- कानीमानि बीजाक्षराणि न भवेयुः । 'याज्ञिकवाद की मन्त्रानर्थक्यवाद मे परिणति' इत्युपक्रम्य ( पृ० ११७ ) भगिन्या मीमामाया. शीलभङ्गमपि चिकीर्षति हठ । तत्र लिखति -'ब्राह्मण ग्रन्थो की मुख्यता यहा तक बढी कि 'उरु प्रथस्व' आदि मन्त्रो मे विद्यमान साक्षात् विधायक लोट् लिङ् और लेट् लकारो को विधायक न मानकर ब्राह्मण ग्रन्थो के प्रथयति' आदि पदो को ' ही विधि अर्थवाला माना गया इति । लिड्लोट्लेट्श्रवणमात्रेण सर्वत्र विधायकत्वमङ्गीकुर्वस्त्व मातरि भगिन्या , वध्वा भार्यायाञ्च स्त्रीत्वं समान पश्ये । स्त्रीत्वमुपभोगसाधनम् तच्च सर्वत्र समान दृश्यत इति महदनिष्ठ भवेत् । - –' ' मन्त्राधिकरणे मन्त्राणामविवक्षितार्थत्वपूर्वपक्षावसरे मन्त्रोऽयमुदाहृत उरु प्रथस्वोरु ते यज्ञपतिः प्रथताम् इति अस्य मन्त्रस्य विनियोजक ब्राह्मणम्– 'उरु प्रथस्वेति पुरोडाश प्रथयति' इति यदा वर्तते तदा मन्त्राणा विवक्षितार्थत्व कुत इति पूर्वपक्ष । अत्रत्य पूर्वपक्ष समर्थयन् ब्राह्मणभागस्य कल्पितत्वं द्रढयितुमिच्छति लेखकः । 'उरु प्रथस्व' इति मन्त्रे सत्यमेव लोट् लकारः, सच विधायक इत्यपि सत्यमेव, किन्त्वत्र मध्यमपुरुषैकवचनमस्ति । तच्च हे पुरोडाश, त्व प्रथस्वेति पुरोडाश सम्बोध्य वदति । अर्थात् पुरोडाश? त्व प्रथस्व वृद्धिंगतो भवेति विधत्ते । कि पुरोडाशः स्वय वृद्धिगतो भवेत्, पुरोडाशस्तु परिशीलन करने पर अनेक गायत्रियाँ उससे पढी हुई दिखाई देगी । 'यह सब किसी ने जोड दिया है' इत्यादि कथन निर्मूल है । अध्ययनसम्प्रदाय मे उनका अध्ययन आज भी किया जाता है । यद्यपि तुम सम्प्रदाय को अन्धश्रद्धाविजृम्भित कहोगे, तो क्या तुम्हारा बोलना और लिखना अन्धश्रद्धाविजृम्भित नही है? जो कुछ दयानन्द ने समझा दिया, उसीको तुम भी बोलते लिखते हो पृ० ११७ पर ' चतुर्थ' ऐसा आरंभकर लेखक लिख रहे है कि ओ ही ह्र, फट् स्वाहा आदि, सर्वथा अर्थरहित तान्त्रिकमन्त्रो की रचना में परिणत हुई' इति । इस धूर्तशिरोमणि ने ओकार को भी नही छोडा, उसे भी अर्थरहित लिख रहा है । यदि इन अक्षरो का वर्णों का अर्थ जानना ६ चाहते हो तो आओ, तान्त्रिको की सेवा करो । इस जन्म में तुम्हे कदाचित् अर्थज्ञान न हो पाय तो दूसरा जन्म लो । किन्तु तुम जैसे को पुनर्जन्म मे विश्वास कैसे हो पायगा? तुम्हे इन बीजाक्षरो का अर्थज्ञान नही हो पाया, इस कारण ये बीजाक्षर निरर्थक नही हो जायेगे 1 'याज्ञिकवाद की मन्त्रानर्थक्यवाद मे परिणति' ऐसा उपक्रमकर लेखक महोदय ने लिखा है कि 'ब्राह्मणग्रन्थो की मुख्यता यहाँ तक बढी कि 'उरु प्रथस्व' आदि मन्त्रो मे विद्यमान साक्षात् विधायक लोट्, लिङ् और लेट् लकारो को विधायक न मानकर ब्राह्मणग्रन्थो के ' प्रथयति' आदि पक्षो को ही विधि अर्थवाला माना गया । ' लिङ्ग, लोट्, लेट् के श्रवणमात्र से ही सर्वत्र विधायकत्व समझना, माँ, बहन, भार्या, पुत्रवधू, कन्या आदि सभी मे स्त्रीत्व को समानरूप से देखने के बराबर ही होगा । उपभोग के साधनभूत 'स्त्रीत्व ' को सबमे तुल्य देखने के समान अन्य महापाप नही । मन्त्राधिकरण में मन्त्रो की अविवक्षितार्थता का पूर्वपक्ष करते समय ' ' -' मन्त्र का उल्लेख इस प्रकार किया गया है- उरु प्रथस्वोरु ते यज्ञपति प्रयताम् इति । इस मन्त्र का विनियोजक ब्राह्मण उरु प्रथस्वेति पुरोडाश प्रथयति' है । ऐसी स्थिति मे मन्त्रो की विवक्षितार्थता कैसे हो सकती है? यह पूर्वपक्षी ने पूर्वपक्ष किया है । किन्तु लेखक महोदय इतनी सी बात को नही समझ पाये, अत पूर्वपक्ष का ही समर्थन करने लग गये, और ब्राह्मणभाग को कल्पित कहने लगे । 'उरु प्रथस्व ' मत्र मे लोट् लकार है, यह तुम्हारा कहना सच है, और वह विधायक है, यह भी सच है किन्तु वह यहाँ पर मध्यमपुरुष के एक वचन में है । वह पुरोडाश को संबोधित कर यह बता रहा है कि ' हे पुरोडाश । त्वं 'प्रथस्व ' अर्थात् हे पुरोडाश । तुम ' स्व' बृद्धि को प्राप्त हो, यानी विस्तृत हो जाओ, अब सोचना यह है कि क्या पुरोडाश, स्वयं अपने आप बढ जायगा? सम्यक्
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वेदार्थपारिजातः २१२८ सम्यक्सयुतेन पिष्टेन निर्मित द्रव्यम्, तस्य प्रथनञ्चाग्नौ सेकेन भवितुमर्हति । कि स्वय पुरोडाशोऽग्निसेक स्वस्य कृत्वा प्रथन कुर्यात्? पुरोडाशस्य प्रथनकार्यमध्वर्यु कुर्यात् । अध्वर्यु मन्त्रार्थ जानाति - 'त्व उरु विपुल यथा स्या तथा प्रथस्वेति । ' किं मन्त्रस्यास्य जपेन पुरोडाशस्य प्रथन स्यात् । अध्वर्युणा सेकक्रियाया क्रियमाणाया पुरोडाशस्य प्रथन भवेत् । तदर्थं विधेरावश्यकताया 'इति पुरोडाश प्रथयति' इति । अनेन मन्त्रेण अर्थादिक मन्त्रमुच्चार्याध्वर्युः पुरोडाश प्रथयेदिति विधिः प्रवृत्त | मन्त्राणा विनियोगे सामर्थ्य प्रमाणम् । तञ्च सामर्थ्य श्रुति कल्पयित्वैव विनियोजकम् । कल्प्यमानायाः श्रुतेरेव अत्र च क्ल्पनाया -, ' ' विधायकत्वम् अनेन मन्त्रेणेद कार्य कर्तव्यमिति । आवश्यकता नास्ति इति पुरोडाश प्रथयति - ' ' इति प्रत्यक्षविधेरेव सत्वात् । लेखको मन्यते यदय सर्वोऽपि विधिभाग केनचन कल्पित इति । बहिर्देवसदनं दामि इति मन्त्रो बहिर्लवनप्रकाशनसमर्थं } अत्रानेन मन्त्रेण बहिर्लवन कुर्यादिति विधिः कल्प्यत एव । मीमासकेन यद्वाक्यं कल्प्यते तच्छतिवाक्यमेव । अत एवोक्त न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकाकारैः —
' मीमासासंज्ञकस्तर्कस्सर्वो वेदसमुद्भव ।
सोऽतो वेदो रुमाप्राप्तकाष्ठादिलवणात्मवत् ॥
पूजितविचारवचनो हि मीमासाशब्दः । अयुक्तप्रतिषेधेन युक्ताभ्यनुज्ञान तर्क । प्रमाणेतिकर्तव्यतात्वेन च प्रमाणाद्वेदादभेद उक्त, सोऽतो वेद इति' ( पृ० ४१ ) । महर्षिजैमिनिः तानि द्वैधाधिकरणे गुणकर्मविधानेन प्रधानकर्मविधानेन चाख्याताना द्वैविध्यमभिधायप्रसङ्गात् तृतीयमपि प्रकारान्तरमनुवादकत्वरूपं केषाञ्चिदाख्याताना निरूपयितु विधिमन्त्राधिकरण प्रवर्तयामास । तत्रत्यमिदं सिद्धान्त- - 'अपि वा प्रयोगसामर्थ्यात् मन्त्रोऽभिधानवाची स्यात्' इति । सूत्रस्यायमर्थ -अपि वेति पदद्वयं पूर्वपक्षव्यावर्तकम् । सूत्रम्- जलमिश्रित पिष्ट से निर्मित द्रव्य को पुरोडाश कहते है । उसका प्रथन ( विस्तार, फूलना ) अग्नि मे सेकने पर होता है । क्या पुरोडाश स्वय अग्निसेक कर अपना प्रथन कर लेगा? पुरोडाश का प्रधनकार्य अध्वर्यु करता है | अध्वर्यु मन्त्रार्थ -'त्व उरु विपुल यथा स्या तथा प्रथस्व ' - को जानता है । क्या मन्त्र का जप करते रहने से पुरोडाश का प्रथन हो जायगा? अध्वर्यु जब अग्नि से पुरोडाश पर सेकक्रिया करेगा तब पुरोडाश का प्रथन होगा । तदर्थविधि की आवश्यकता पडने पर ' इति पुरोडाश प्रथयति' यहाँ 'इति' का अर्थ होगा ' अनेन मन्त्रेण ' इस मन्त्र से अर्थात् इस मन्त्र का उच्चारण करके 'अध्वर्यु पुरोडाश का प्रथन करें' यह कहने के लिये विधि प्रवृत्त हुआ हैं । मन्त्रो के विनियोग मे सामर्थ्य को प्रमाण माना गया है । सामर्थ्य मे स्वतन्त्ररूप से विनियोजक शक्ति नही रहती, अपितु उसे , श्रुति की कल्पना करने पर ही सामर्थ्य विनियोजक हो पाता है । कल्प्यमान श्रुति मे ही विधायकत्व*श्रुति की कल्पना करनी पडती है शक्ति रहती है । 'अनेन मन्त्रेण इदं कार्यं कर्तव्यम्' यही विधान का स्वरूप है । प्रस्तुत प्रसग में कल्पना करने की आवश्यकता ही नही है, क्योकि 'इतिपुरोडाश प्रथयति' यह प्रत्यक्षविधि हो विद्यमान है । लेखक महोदय समझ रहे है कि सम्पूर्ण विधिभाग ही किसी से कल्पित किया गया है । बहिर्देवसदन दामि' यह मन्त्र बहिर्लवनरूप अर्थ का प्रकाश करने में समर्थ है । इस प्रकार मन्त्र में सामर्थ्य रहने पर भी, उस सामर्थ्य को विनियोजक बनने के लिये 'अनेन मन्त्रेण बहिर्लवन कुर्यात्' 'इस प्रकार के विधि की कल्पना करनी ही पडती है । मीमासक जिस वाक्य की कल्पना करता है, उसे ही श्रुतिवाक्य कहते है । अत एव न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकाकार ने कहा है- " मीमासासज्ञकस्तर्क सर्वो वेदसमुद्भव । ||" सोऽतो वेदो रुमाप्राप्तकाष्ठादिलवणात्मवत् ' मीमासा' शब्द पूजित विचार का वाचक है, अर्थात् पूजित विचार को ' मीमासा' कहते है । ' पूजित विचारवचनो हि मीमासाशब्द ' | अयुक्तप्रतिषेधेन युक्ताभ्यनुज्ञानं तर्क । प्रमाणेतिकर्तव्यतात्वेन च प्रमाणाद्वेदादभेद उक्त 3 सोडतो वेद इति' -- ( १० ४१ ) । महर्षिजैमिनि ने ' तानि द्वैधाधिकरण' मे गुणकर्म के विधान और प्रधान कर्म के विधान के द्वारा आख्यातो के द्वैविध्य को बताकर प्रसंगात् आख्यातो के अनुवादकत्वरूप एक तृतीय प्रकार को भी बताने के लिये 'विधिमन्त्राधिकरण' की रचना की । वहाँ का यह सिद्धान्तसूत्र है-' अपि वा प्रयोगसामर्थ्यात् मन्त्रोऽभिधानवाची स्यात्' इति । सूत्र का अर्थ इस प्रकार है - 'अपि' और 'वा' ये