वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1231–1240
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1231–1240
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वेदार्थपारिजातः २१२९ मन्त्रः —– मन्त्रगताख्यातशब्द, अभिधानवाची -विधायकाख्यातशब्दाभिहितस्यानुवादकस्यात् । अत्रैव हेतु – प्रयोगसामर्थ्या-, दिति । प्रयोगोऽनुष्ठानम् तन्मध्ये प्रयोक्तृपुरुषस्यान्यस्य वानुष्ठेयार्थे बोधनीये सामर्थ्यात् विधौ चासामर्थ्यादिति । मन्त्रा प्रयोक्तृपुरुषाणामन्येषा वा श्रोतॄणामनुष्ठेयार्थबोधनाय प्रयुज्यन्ते, तत्रैव तेषा सामर्थ्यम् न तु विधान इति भावः । अतश्च मन्त्रगताख्यातम् अभिधायकम् न विधायकमिति सिध्यति । यत्कार्य मन्त्रेण विधातव्यम् तचेत्प्रमाणान्तरेण विहितम् तर्हि ' ' ' मन्त्र केवल तमर्थमभिधत्त इत्यभिधायकम् प्राप्तस्य बोधकमित्यर्थ । भाष्यकार प्रयोगसामर्थ्यात् इत्यस्यार्थ लिखति- ' ( ), ' प्रयोगे क्रियमाणे अस्य मन्त्रस्य सामर्थ्य विद्यते गोयाग गोदानञ्च प्रत्याययितुम् न विधातुम् इति । लेखकस्य सूत्रार्थं पश्याम -' अर्थात् प्रयोग =ब्राह्मणवचन के सामर्थ्य से (ब्राह्मणवचन अनर्थक न हो जावे, इसलिये) ' इति लिखति । ' प्रयोग' शब्दस्य ब्राह्मणवचनमर्थं इति कस्माधीत लेखकेन? कि दयानन्दात्? उत म० म० चिन्नस्वामिशास्त्रिभ्यः? शास्त्रिचरणास्तु नैवमध्यापितवन्तः स्यु. । यदि मन्त्राणा विधायकत्व स्वीक्रियते तर्हि विधिमन्त्राधिकरणस्य का गति? विधिमन्त्राधिकरण- भाष्यस्यानुवाद कथं कुर्या? दधिक्राव्णन् शब्दस्याश्ववाचकत्वमुक्त्वा पदे पदे त मन्त्रमुदाहृत्य तद्विनियोगे त्रुटि विनियोजकवाक्यस्य काल्प- निकत्वञ्च वार वार वदसि । अस्तु तस्य शब्दस्याश्वोऽर्थः । दधिप्राशने तस्य मन्त्रस्य विनियोगे क्रियमाणे शाखतोऽसङ्गतिः का? यथा मन्त्रोऽर्थं वदति न तथा कार्य क्रियत इत्येव खलु तवारोपः । शास्त्रदृष्ट्यात्रेदमुच्यते -मन्त्रा भवन्ति नैकविधा., जपानुमन्त्रणाभिमन्त्रणाप्यायनोपस्थानकरणक्रियमाणानुवादिशखस्तोत्रयाज्यापुरोनुवाक्यादिभेदेन । चिरन्तनैरेतेषा लक्षणान्यपि सन्ति कृतानि ।
'जपमुच्चारणं विद्यात्क्रत्वर्थमपि तद्भवेत् ।
अर्थतः कार्यलाभश्चेदर्थं एव क्रतोर्भवेत् ॥
मन्त्रमुच्चारयन्नेव मन्त्रार्थत्वेन संस्मरेत् ।
शेषिण तन्मना भूत्वा स्यादेतदनुमन्त्रणम् ॥
, =, = ( ) दोनो पद पूर्वपक्ष के व्यावर्तक है । मन्त्रः मन्त्रगत आख्यातशब्द अभिधानवाचो आख्यातरूप विधायक शब्द से अभिहित विहित का अनुवादक होगा, क्योकि प्रयोगसामर्थ्यात् == प्रयोग. = अनुष्ठान, उस समय ( अनुष्ठान करते समय) अनुवादक बना हुआ मन्त्रगत आख्यात शब्द ही अनुष्ठान करनेवाले को तथा अन्य व्यक्ति को भी अनुष्ठेय अर्थ ( पदार्थ ) का बोध कराने मे समर्थ रहता है, विधान करने में उसका सामर्थ्य नही होता । अर्थात् मन्त्रो का प्रयोग, अनुष्ठाताव्यक्ति और अन्य श्रोताओ को अनुष्ठेय पदार्थ का बोध कराने के उद्देश्य से ही किया जाता है । लोगो को बोध कराने का सामर्थ्य मन्त्रो में ही रहता है, विधान करने मे नही । इस कारण मन्त्रगत आख्यात शब्द को अभिधायक कहते हैं, विधायक नही । जो कार्य मन्त्र से विधातव्य है, वह यदि अन्य प्रमाण (प्रमाणान्तर ) से विहित होगया हो, तो मन्त्र, उस अर्थ का केवल अभिधान करता है, इसीलिये उसे अभिधायक अर्थात् प्राप्त हुए का बोधक कहते है । भाष्यकार ' प्रयोगसामर्थ्यात्' का अर्थ लिखते है -'प्रयोगे क्रियमाणे अस्य ( मन्त्रस्य) सामथ्यं विद्यते, गोयाग, गोदानञ्च प्रत्याययितु न विधातुम्' इति । प्रयोग ( अनुष्ठान) करते समय मन्त्रोच्चारण से यह गोयाग हैं, यह गोदान है इतना ज्ञान सबको हो जाता है, सबको पदार्थज्ञान कराने का ही सामर्थ्य मन्त्रो मे है, विधान करने का नही । अब इसी सूत्र का अर्थ, जो लेखक ने किया है, उसे देखिये – ' अर्थात् प्रयोग =ब्राह्मणवचन के सामर्थ्य से ( ब्राह्मण वचन अनर्थक न हो जावे, इसलिये ) । लेखक महोदय ' प्रयोग' शब्द का ब्राह्मण वचन अर्थ करते है । यह अर्थ लेखक ने किससे पढा? क्या दयानन्द से पढा? अथवा म० म० चिन्नस्वामी शास्त्री जी से पढा? हमारे स्व ० गुरुचरण म ० म ० चित्रस्वामी शास्त्री जी ने तो कभी भी ऐसा अर्थ नही पढाया होगा, यह हम विश्वासपूर्वक कह सकते है । यदि मन्त्रों I को विधायक मानोगे तो विधिमन्त्राधिकरण की क्या गति होगी? विधिमन्त्राधिकरण के भाष्य का अनुवाद कैसे करोगे? 'दधिक्राव्णन्' शब्द को अश्व का वाचक बताकर और जहाँ तहाँ उस मन्त्र को सामने रख रहे हो, और उसके विनियोग मे त्रुटि बतलाते हुए बार बार विनियोजक वाक्य को काल्पनिक बतारहे हो । तुम्हारे कथन के अनुसार उस शब्द का अर्थ भले ही } २६७
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२१३० वेदार्थ पारिजातः
एतदेवाभिमन्त्रस्य लक्षणक्षणाधिकम् ।
अद्भिस्सस्पर्शनाधिक्यात्तदेवाप्यायन स्मृतम् ॥
उपस्थान तदेव स्यात्प्रणतिस्थानमयुतम् ।
बाह्य कार्य यदेतेषु मन्त्रकाले क्रियेत तत् ॥
कर्मण करणास्तेस्युर्विहितार्थप्रकाशनात् ।
मन्त्रेण कृत्वा मन्त्रान्ते क्रियते कर्म येषु तु ॥
इद कार्यमनेनेति न क्वचिदृश्यते विधि ।
लिङ्गादेवेदमर्थत्वं येषा ते मन्त्रसज्ञिता ॥
तन्त्रसारे- 'इत्याहोपनिबन्धश्च मन्त्राणा दृश्यते विधि ।
ब्रूमादेशश्वाहशब्द सोऽभिधानाभिधायक ' ॥
उद्देश्याभिमुखत्वे तु स्यात्तदेवाभिमन्त्रणम् । उपस्थितिस्तु बोधस्याद्बोधान्तोच्चारण जपः ॥ इति । स्तोत्रशस्त्राणा स्तौतिशंसतिशब्दाभ्यामभिधानार्थता | स्तुतशस्त्राधिकरणे स्तोत्रशस्त्रयोरदृष्टार्थत्वं यद्यपि व्यवस्था-,, पितम् तथापि तन्मन्त्राणामभिधानरूपदृष्टार्थत्वं न विरुध्यते । हुम्फडादीना न निरर्थकत्वम् कात्यायनादिकृतस्तोमभाष्य- रीत्या अर्थाभिधानार्थतास्त्येव । नवमे यद्यपि स्तोभानामनर्थकत्व वक्ष्यते, तथापि साम्नां योनिभूतॠगेकवाक्यत्वाभिप्रायक नवमाधिकरणमिति तात्पर्य कल्पनीयमिति न दोष । एवञ्च कृत्स्नस्य मन्त्रभागस्य विवक्षितार्थत्वं मन्त्राधिकरणन्याय- सिद्धम् । -?? अत्रेद विचारणीयम् मन्त्रार्थप्रतीति कि प्रयोक्तुः उत श्रोतुः इति । तत्रानुष्ठानहेतुभूतानुष्ठेयस्मरणार्थत्वं करणमन्त्राणामस्तीति मन्त्रजन्यः शाब्दबोधो मन्त्रप्रयोक्तुरेवेति ज्ञायते " किन्तु विचार्यमाणे श्रोतुरेवेति प्रतीयते, शब्दोच्चार- ' अश्व ' रहे | किन्तु दधिप्राशन मे उस मन्त्र का विनियोग करने में शास्त्रत कौन सी असङ्गति है? मन्त्र के अर्थानुसार कार्य नही किया जारहा है, यही तुम्हारा आरोप है न? शास्त्रदृष्टि से हम यह बता रहे है -मन्त्र अनेक प्रकार के होते है, कुछ जपमन्त्र, तो कुछ अनुमन्त्रणमन्त्र, कुछ अभिमन्त्रणमन्त्र, कुछ आप्यायनमन्त्र, कुछ उपस्थानमन्त्र, कुछ करणमन्त्र, कुछ क्रियमाणानुवादीमन्त्र, कुछ शस्त्रमन्त्र, कुछ स्तोत्रमन्त्र, कुछ याज्यामन्त्र, कुछ पुरोनुवाक्यामन्त्र इत्यादि अनेक भंद है । प्राचीन विद्वानो ने उनके लक्षण भी किये हुए है उन सब लक्षणो को ऊपर मूल संस्कृत में दिया गया है । 'स्तौति सति' शब्दो से स्तोत्र-शस्त्र मन्त्रो की अभिधानार्थता बताई जाती है । स्तुतशस्त्राधिकरण मे स्तोत्र-शस्त्र की अदृष्टार्थता यद्यपि व्यवस्थित की गई है । तथापि स्तोत्रमन्त्र तथा शस्त्रमन्त्रो की अभिधानरूपदृष्टार्थता से कोई विरोध नही है । हुम् फडादि मन्त्र भी निरर्थक नही है, कात्यायनादिकृतस्तोभभाष्य के अनुसार उनकी अर्थाभिधानार्थता ही मानी गई है । नवमाध्याय में यद्यपि स्तोभमन्त्रो को अनर्थक कहा गया है, तथापि उसका अभिप्राय सामको योनिभूतऋचा के साथ एकवाक्यता के न होने में है । इस प्रकार नावमिकाधिकरण के तात्पर्य को समझने पर कोई दोष नही दिखाई देता । एवञ्च समस्त मन्त्रभाग विवक्षितार्थक है, यह मन्त्राधिकरणन्याय से सिद्ध होता है । यहाँ विचारणीय बात यह है कि मन्त्रार्थप्रतीति, प्रयोक्ता को होती है या श्रोता को होती है? विचार करने पर यह प्रतीत -- होता है किI अनुष्ठानहेतुभूत अनुष्ठेयस्मरण तो करणमन्त्रो से होता है, उस कारण मन्त्रजन्य शाब्दबोध तो मन्त्रप्रयोक्ता को हो होता होगा, किन्तु सूक्ष्म विचार करने पर वह शाब्दबोध श्रोता को ही होता है, यह कहना पड़ेगा, क्योंकि दूसरे को शाब्दबोध ३
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वेदार्थपारिजातः २१३१ णस्य पर प्रत्येव शाब्दबोधजनकत्वस्वाभाव्यात् । 'अविशिष्टस्तु वाक्यार्थ ' इति सूत्रयन् जैमिनि लौकिकस्य वैदिकस्य च वाक्यस्य चार्थावबोधं निर्विशेष स्वीकरोति, श्रोतुरेव च मन्त्रजन्य शाब्दबोधमभ्युपगच्छति । अन्यथा लोके श्रोतु, वेदे- चोच्चारयितुरिति वैरूप्यापत्तेः । ' इषे त्वोर्जेत्वा' 'विष्णो हव्य रक्षस्व' 'स्योन ते सदन कृणोमि' 'उरु प्रथा उरु प्रथस्व' -- इत्यादय करणमन्त्रा सम्बोध्यविषयाः । सम्बोधन नाम ज्ञापनम् । शाखा प्रत्यध्वर्युर्ज्ञापयति हे शाखे इषे त्वा छिनद्मि इति शाखा चात्र तदभिमानिनी देवता भेदेनोपचर्यते । ततश्च छेदनस्य तज्ज्ञापनस्य चान्वयस्तत्र न विरुध्यते । सर्वमिदं 'अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम्' इति बादरायणसूत्रे तद्भाष्यादौ स्पष्टम् । किच ' मन्त्राणा करणार्थत्वान्मन्त्रान्तेन कर्मादिसन्निपात. स्यात्सर्वस्य वचनार्थत्वात्' इति द्वादशाध्यायाधिकरणे करणमन्त्रेषु मन्त्रान्तेन कर्मादिसन्निपात इति सिद्धान्त. कृतः । मन्त्रार्थस्मरणस्य प्रयोक्तृगतस्यानुष्ठानहेतुत्वे चादौ मन्त्रोच्चारणम् ततोऽनुष्ठेयार्थस्मरणम् ततोऽनुष्ठानमिति क्रमः स्यात् । ततश्चानुष्ठेयार्थस्मरणेन व्यवहितत्वात्कथ मन्त्रान्तेन कर्मादिसन्निपातो घटेत । यदि मन्त्रबोध्यदेवताया एव मन्त्रत शाब्दबोधाभ्युपगमे तु न कश्चिद्विरोध । एव सति करणमन्त्राणामदृष्टार्थत्वा- पत्तिस्स्यात् मन्त्रजन्यदेवतागतशाब्दबोधस्यानुष्ठानहेतुत्वाभावात् तथापि देवतागत शाब्दबोधमादायैव दृष्टार्थत्वसम्भवात् जपानुमन्त्रणमन्त्रादिषु कर्मसमवेतानभिधायिषु तथैवाभ्युपगमात् । इयानत्र विशेष: –लोके वाक्यरचनाया प्रयोक्तृपुरुषाधीनत्वादज्ञाते चार्थे वाक्यरचनायोगात्प्रयोक्तुरर्थज्ञानं नान्तरीयकम्, न तु तत्प्रयोक्तृतात्पर्यविषयीभूतम्, परप्रत्यायनेच्छ्येव वाक्यप्रयोगात् । मन्त्राणान्त्वपौरुषेयत्वेन नित्यसिद्धतया तत्प्रयोक्तुरर्थज्ञान नावश्यकम् । अतोऽव्युत्पन्नस्यापि मन्त्रप्रयोगो न विरुध्यते, वक्तुरथंज्ञानस्य श्रोतुर्वाक्यार्थबोधे प्रयोजकत्वा- भावात् । ' देवदत्त घटमानय' इत्यत्र सम्बोधने प्रथमा । सम्बोधन नामाभिमुखीकृत्य ज्ञापनम् । ज्ञान श्रोतृनिष्ठम् ज्ञापनश्च कराना ही शब्दोच्चारण का स्वभाव होता है । 'अविशिष्टस्तु वाक्यार्थ ' इस सूत्र को बनाकर जैमिनि ने लौकिक और वैदिक वाक्य से समान अर्थावबोध का होना ही स्वीकार किया है । मन्त्रजन्यशाब्दबोध श्रोता को ही होगा, अन्यथा लोकव्यवहार मे श्रोता को और वेद मे उच्चारयिता को मानने पर वैरूप्यापत्ति होगी । 'इषेत्त्वोज्र्जेत्वा' ' विष्णो हव्यल रक्षस्व' 'स्योन ते सदन कृणोमि' 'उरु प्रथा उरु प्रथस्व' इत्यादि करणमन्त्र है । इनका विषय} सम्बोध्य हुआ करता है । सम्बोधन का अर्थ है ज्ञापन | शाखा के प्रति अध्वर्यु ज्ञापन करता है -है शाखे इषे त्वा छिनत्ति, कहकर यहाँ उसको अभिमानिनी देवता को अभेद से उपचरित किया गया है । अत छेदन और उसके ज्ञापक का अन्वय वहाँ विरुद्ध नही है । बादरायणसूत्र 'अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम्' और उसके भाष्य से यह सब स्पष्ट हो जाता है । किञ्च 'मन्त्राणा करणार्थत्वान्मत्रान्तेन कर्मादिसन्निपात स्यात्सर्वस्य वचनार्थत्वात्' इस द्वादशाध्याय के दशमाधिकरण 1के सूत्रानुसार मन्त्र की समाप्तिपर ही कर्मानुष्ठान करने का सिद्धान्त किया गया है । मन्त्रार्थस्मरण मे प्रयोक्ता के अनुष्ठान की हेतुता रहने से प्रथमत मन्त्रोच्चारण, तत अनुष्ठेयार्थस्मरण, तत अनुष्ठान यह क्रम रहेगा । ततश्च मन्त्रान्त और कर्मादिसन्निपात दोनो के बीच अनुष्ठेयार्थ के स्मरण का व्यवधान उपस्थित हो जाने से मन्त्रान्त के साथ कर्मादिसन्निपात कैसे घटित होगा? यदि मन्त्र से मन्त्रबोध्यदेवता का ही शाब्दबोध माना जाय तो कोई विरोध नही होगा । यद्यपि मन्त्रबोध्य देवता के शाब्दबोध में अनुष्ठान की हेतुता न होने से करणमन्त्रो मे अदृष्टार्थत्वापत्ति होती है, तथापि देवतागत शाब्दबोध को लेकर दृष्ट्यर्थत्व भी सभव है । कर्मसमवेत पदार्थों के अनभिधायक जप मन्त्र और अनुमन्त्रण मन्त्र आदि मे भी वैसा ही स्वीकार किया गया है । यहाँ पर विशेष इतना ही है कि लोक व्यवहार से वाक्य की रचना, प्रयोक्तृ पुरुष के अधीन होने से, और अर्थ के ज्ञान न रहने पर वाक्य की रचना न बन पाने से अर्थज्ञान, प्रयोक्ता के लिये व्यवधायक नही बनता, और न ही उसमे प्रयोक्ता का तात्पर्य रहता है, क्योकि दूसरे व्यक्ति के बोधनार्थ ही वाक्य प्रयोग किया जाता है । किन्तु मन्त्रो के अपौरुषेय रहने से वे नित्य है, उनका प्रयोग करने वाले को अर्थज्ञान रहने की आवश्यकता नही है | अतः अव्युत्पन्न व्यक्ति के मन्त्र प्रयोग करने पर भी कोई विरोध नही है । क्योकि अर्थज्ञान में वक्ता और वाक्यार्थबोध मे श्रोता, प्रयोजक नही है । ' देवदत्त घटमानय' यहाँ पर सम्बोधन में प्रथमा है । सम्बोधन अर्थ हैं
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२१३२ वेदार्थपारिजातः प्रयोक्तरि । एवञ्चाभिमुखीभूतदेवदत्तनिष्ठ यद्घटानयनज्ञानं तदनुकूलप्रयोक्तृगतव्यापारी वाक्यार्थ । एतादृशबोधश्च सम्बो- ध्यस्य तदितरेषा श्रोतॄणा प्रयोक्तुश्च सम्भाव्यमानोऽपि न सर्वेषा कार्यकारी 1 सम्बोध्यगत घटानयनज्ञानमेव कार्यकारि, एव 1 मन्त्रेऽपि । मन्त्रार्थज्ञानाभावेपि सर्वानुक्रमणिकात ऋषिच्छन्दोदेवतापरिज्ञान सुलभमेव । सङ्कर्षकाण्डे चतुर्थतृतीयपादे सर्वमिदमुपपादितम् । तत्र हि ' यस्यै देवतायै हविर्गृहीत स्यात्ता ध्यायेद्वषट्करिष्यन्' इति वाक्यमुदाहृत्य सिद्धान्तितम्- ' आग्नेयम्' ' ऐन्द्रम्' इत्यादिदेवताप्रतिपादकस्याग्न्यादिशब्दस्य श्रवणात् तस्य त्यागे प्रमाणाभावात् शब्दे कार्यासम्भवे सत्येवार्थे कार्यविज्ञानात् इह च शब्दे ध्यानसम्भवाद्देवताशब्दस्यैव ध्यानमिति । अनेन न्यायेन तस्मादेतानि (ऋषिच्छन्दो- दैवतानि) मन्त्रे मन्त्रे विद्यात्' इत्यत्रापि देवताशब्दस्यैव ध्यानम्, न मन्त्रजन्यवाक्यार्थज्ञानमिति सिध्यति । मन्त्रजन्यशाब्द- बोधस्य देवतागतस्यानुष्ठेयक्रियानुपयोगात् कथ मन्त्राणा करणमन्त्रत्वव्यवहार इति चेत् यथा तादृशशाब्दबोधस्य प्रयोक्तृ- गतत्वे मन्त्राणा करणत्वोपपत्तिस्तथैवास्मिन्नपि पक्ष इति न दोष । 'इषे त्वा' इति मन्त्रस्साकाङ्क्ष., ' छिनधि' इत्यध्याहारेणा- काङ्क्षा पूरणीया । अध्याहारश्च 'इति शाखामाच्छिनत्ति' इति विनियोजकवाक्यलभ्य । प्रथम विनियोजकवाक्यत एव शाखाच्छेदनेऽवगते पुनर्मन्त्रतस्स्मरणमदृष्टार्थमवश्यमास्थेयम्, नियमविध्याश्रयणात् । अतश्चातिशयविशेषवत्त्वेनैव मन्त्राणा तत्तत्क्रियासाधनता वक्तव्या ।. अत एव माहेन्द्रस्तोत्रोपाकरणस्य रथघोषोऽङ्ग भवति - 'रथघोषेण माहेन्द्रस्तोत्रमुपाकरोति' इति । एवमनु-, मन्त्रणमन्त्रा अपि तत्स्तुत्यदेवताया एव शाब्दबोधजनका न तु प्रयोक्तु । एवञ्च कर्मकाले कल्पसूत्रादितो विनि- - योगमात्र जानानस्यार्थज्ञानशून्यस्यापि मन्त्रप्रयोग एष्टव्य । किञ्च शस्त्रसम्बन्धिनीनामृचा सान्तत्यं विहितम्—'सन्त- कि दूसरे को अपने सम्मुखकरके ज्ञापन करना । ज्ञान, श्रोतृनिष्ठ होता है और ज्ञापन, प्रयोक्ता मे रहता है । एवञ्च 'देवदत्त घटमानय ' इस वाक्य का अर्थ होगा कि ' अभिमुखीभूत देवदत्तनिष्ठ जो घटानयनज्ञान, तदनुकूलप्रयोक्ता का व्यापार ।' यह बोध (ज्ञान ) सम्बोध्य को, उससे भिन्न श्रोताओ को और प्रयोक्ता को होना यद्यपि सभव है, तथापि वह सबके लिये कार्यकारी नही होता, अपितु सम्बोध्य को होनेवाला जो घटानयन ज्ञान है वह उसके लिये कार्यकारी होता है, उसी प्रकार मन्त्र में भी । मन्त्रार्थ का ज्ञान न रहने पर भी सर्वानु- क्रमणिका से ऋषि, छन्द, देवता का ज्ञान होना सुलभ ही है । सङ्कर्षकाण्ड के चतुर्थाध्याय के तृतीय पाद मे यह सब बताया गया है । वहाँ पर 'जिस देवता के लिये हविर्ग्रहण किया गया हो, उसी देवता का वषट्पूर्वक ध्यान करे' इस वाक्य को उदाहरण के रूप में रखकर सिद्धान्त किया है--' आग्नेयम्' ' ऐन्द्रम्' इत्यादि देवताप्रतिपादक अग्नि आदि शब्द का श्रवण होने से; उसका त्याग करने मे प्रमाण के न होने से, शब्द में कार्य का असभव होने पर ही अर्थ मे कार्य का ज्ञान होने से और यहाँ शब्द में ध्यान का सभव होने से देवता शब्द का ही ध्यान किया जाता है । इसी नियम के अनुसार ' तस्मादेतानि (ऋषिच्छन्दोदैवतानि ) मन्त्रे मन्त्रे विद्यात्' यहाँ भी देवता शब्द का ही ध्यान करना बताया गया है, मन्त्रजन्यवाक्यार्थ का ज्ञान नही, यह सिद्ध होता है । मन्त्रजन्य शाब्दबोध का देवता पर की जानेवाली मे कोई उपयोग न होने से मन्त्रो मे करणमन्त्रत्व का व्यवहार कैसे हो सकेगा? इस प्रश्न के होने पर उत्तर यह होगा कि वह शाब्दबोध प्रयोक्तृगत होने से मन्त्रो मे करणत्व उपपन्न हो जाता है, उसी तरह इस पक्ष में भी समझने पर कोई दोष नही दिखाई देगा । ' इषे त्वा' यह मन्त्र साकाक्ष है, अत ' छिनद्म' का अध्याहार करके आकाक्षापूर्ण करनी होती है । और अध्याहार ' इति शाखामाछिनत्ति' इस विनियोजकवाक्य से लब्ध होता है । प्रथमत विनियोजकवाक्य से ही शाखाच्छेदन का जब ज्ञान होगया, तब भी पुन मन्त्र से उसी का स्मरण करने के लिये जो नियम विधान किया गया है, उसे अदृष्टार्थ ही अवश्य मानना चाहिये । अतश्च मन्त्रो मे अतिशयविशेष के रहने से उन्हें तत्तत् क्रिया का साधन अवश्य करना होगा । अतएव माहेन्द्रस्तोत्रोपाकरण को रथघोष का अग कहते है । कहा भी है-' रथघोषेण माहेन्द्रस्तोत्रमुपाकरोति' इति । इसी प्रकार अनुमन्त्रण मन्त्र भी उनके द्वारा स्तुति किये जानेवाले ( तत्स्तुत्य ) देवता को ही शाब्दबोध कराते है, प्रयोक्ता को नही । एवञ्च कर्मानुष्ठान के समय कल्पसूत्र-आदि की सहायता से विनियोगमात्र जाननेवाला किन्तु अर्थज्ञान से शून्य व्यक्ति भी मन्त्र प्रयोग कर सकता है । किन शस्त्र से सम्बन्ध रखनेवाली ऋचाओं के सतत बोलते रहने (सान्तत्य) का विधान किया गया है-' सन्ततमन्वाह' इति ।
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वेदार्थपारिजातः २१३३ तमन्वाह' इति । पूर्वपूर्वस्था ऋच उत्तरमुत्तरमर्धर्च प्रणवान्तमुक्त्वा अविरतमेवोत्तरोत्तरस्या ऋच पूर्वपूर्वमर्धर्चमुक्त्वा ? विरमतीतिसान्तत्यलक्षणम् । अत्र शसितुर्होतु प्रत्यृचमर्यावबोध कय सम्भवेत् तत्तदृगवमाने तत्तदर्थावबोधव्यापृत- चित्तस्योत्तरोत्तरस्या ऋच. सान्तत्येन स्फुरणासम्भवात् स्तुत्यदेवतामात्रस्य प्रत्यृचमर्थावबोधे तु न किञ्चिद्विरुध्यते । अत एव भट्टपादाः दृष्टफलकेषु कर्मसु 'गुरुरनुगन्तव्य.' इत्यादिष्वप्यदृष्टार्थत्व व्यवस्थापयन्ति- अस्माक लेखकस्य बुद्धाविद सर्व कथ स्थान लभते । येषु च मन्त्रेषु तत्तदर्थप्रकाशनसामर्थ्ये सत्यपि विनियोजकवाक्यै विना विनियोगो नाववोद्ध ., शक्य श्रुतिकल्पनाद्वारैव तस्य विनियोजकत्वात् । इद कार्यमनेन मन्त्रेण कर्तव्यमिति यत्र विधिर्नास्ति तत्रैव मन्त्रगत सामर्थ्य विनियोजकम्, तदपि श्रुतिकल्पनाद्वारेव । एवं सति 'दधिक्राव्ण. ' इत्यस्य 'शन्नो देवीरभीष्ट्ये' इत्यादेश्व विनियोजकवाक्यानुसारेण विनियोगे स्वीक्रियमाणे कामापत्ति पश्यति लेखक? वेदमन्त्राणा विनियोगे न वय स्वतन्त्राः, अलौकिकार्थावबोधकत्वात्तेषाम् ।
आयुर्दा अग्ने हविषा गुणानो घृतप्रतीको घृतयोनिरेधि ।
घृत पीत्वा मधुचारु गव्य पितेवपुत्रमभिरक्षतादिमम् ॥
इति मन्त्रे कीर्तित घृतप्रतीकत्व घृतयोनित्वञ्चाग्नेर्न वय जानीम, दीपशलाकिकया समुत्पादित दाहकमग्निमेव वय पश्यामः । मन्त्रस्त्वलौकिकमेवाग्नि कीर्तयति | आयुर्दातृत्वेनाग्ने परिचयोऽस्माक किमस्ति? 'आयुर्धृतम्' इति लोके गौणीलक्षणाया प्रयुज्यमानमवगत्य मन्त्रस्य किं विनियोग क्रियते? 'अभिरक्षतान्' 'एधि' इति विधिस्त्वत्र वर्तते । किम- नेन विधिना मन्त्रस्य विनियोग प्रतीयते? 'इदमनेन कर्तव्यम् इति खल्वाकारो विनियोगस्य । पित 1। यथा पुत्र रक्षति तथा पूर्वार्धविशेषणविशिष्टस्त्व वर्धस्व, हे अग्ने, त्व घृतं पीत्वा गव्य च मधु ससेव्येम पुत्रमभिरक्षतात् । क पुत्रम् कुत्र? पूर्व-पूर्व ऋचा की उत्तर- उत्तर आधी ऋचा को प्रणवान्त बोलकर बिना साँस टूटे ( अविरत) ही उत्तरोत्तर ऋचा की पूर्व-पूर्व आधी ------ऋचा को बोलकर ही साँस तोडना ( विराम लेना) -यह 'सान्तत्य' का स्वरूप है । इस परिस्थिति मे शसन करते हुए होता को प्रत्येक ऋचा का अर्थावबोध होना कैसे सभव हो सकता है? प्रत्येक ऋचा के अर्थज्ञान मे ही यदि उसका चित्त लगा ( व्यापृत) रहेगा तो उसे तत्तद् ऋचा की समाप्ति पर उत्तर-उत्तर ऋचा का निरन्तर (सान्तत्येन) स्फुरण होना सभव कैसे हो सकेगा? और केवल स्तुत्य देवता को ही प्रत्येक ऋचा से अर्थावबोध मानने पर किसी प्रकार कोई भी विरोध नही होता है । अतएव भट्टपाद कुमारिल स्वामी ने 'गुरुरनुगन्तव्य ' जैसे दृष्टफलवाले कर्मों में भी अदृष्टार्थना का व्यवस्थापन किया है । गुरुसम्प्रदायगम्य यह सब ग्रन्थरहस्य हमारे लेखक महोदय की बुद्धि में कैसे भला आसकता है? जिन मन्त्रो में यद्यपि तत्तदर्थ के प्रकाशन का सामर्थ्य रहता है, तथापि उनका विनियोग विनियोजक वाक्यो के बिना नही जाना जा सकता । विनियोजकत्व श्रुति-कल्पना के द्वारा ही प्राप्त होता है । ' इद कार्यमनेन मन्त्रेण कर्तव्यम्' इस प्रकार का विधि जहाँ नही रहता वही पर मन्त्रगतसामर्थ्य-विनियोजक होता है, किन्तु वह भी श्रुतिकल्पना के द्वारा ही होता है । इस प्रकार के नियमो के रहते ' दधिक्राव्ण ' तथा ' शन्नोदेवी-रभिष्टये' मन्त्रो का विनियोग, विनियोजकवाक्य के अनुसार मान लेने पर लेखक को कौन सी आपत्ति दिखाई पडती है? वेदमन्त्रो के विनियोग करने में कोई वैदिकधर्मावलम्बी स्वतन्त्र नही है, क्योकि वेदमन्त्र, अलौकिकार्थ के बोधक होते है । "आयुर्दा अग्ने हविषा गुणानो घृतप्रतीको घृतयोनिरेधि । घृत पीत्वा मधु चारु गव्य पितेव पुत्रमभिरक्षतादिमम् । " इस मन्त्र में अग्नि को घृतप्रतीक और घृतयोनि बताया गया है । क्या हम जैसे चर्मचक्षु उसके घृतप्रतीकत्व और धूतयोनित्व को जान सकते है? हम तो दीपशलाकिका से उत्पन्न किये गये दाहक अग्नि को ही देखते है । किन्तु मन्त्र, अलौकिक अग्नि को बता रहा है । आयुर्दाता के रूप में क्या अग्नि का परिचय हमे है? लौकिक व्यवहार मे गौणीलक्षणा के द्वारा प्रयोग किये जानेवाले 'आयुर्धृतम्' के समान क्या मन्त्र का विनियोग किया जायगा? मन्त्र मे 'अभिरक्षतात्' 'एवि' यह विधि तो है, तो क्या इस विधि के बल पर मन्त्र का विनियोग प्रतीत होगा? 'इदमनेन कर्तव्यम्' -यह विनियोग का आकार है । जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है, वैसे पूर्वार्धविशेषणविशिष्ट हुए तुम वृद्धिङ्गत हो, हे अग्ने । तुम घृत पीकर, तथा मधुर सुन्दर
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वेदार्थपारिजातः २१३४ कथम्? रक्षनात् इति साकाङ्क्ष एव खलु मन्त्रो भवति । स्वबुध्यनुसारेण विनियोगे क्रियमाणे हे अग्ने । अग्निवत्प्रकाशमान हे राजन्, अथवा प्रधानमन्त्रिपदे वर्तमान, अथवा दयानन्द? त्वमायुर्दाता असि, प्राणदण्डमस्मै न देहि, एनमपराधिन दण्डार्हमपि रक्षस्व इत्यर्थकस्यास्य प्राणदण्डार्हस्यापराधिनस्त स्मान्मोचने विनियोग इति कुतो न कल्प्यते? तत्रापि विनियो- जकवाक्य कल्पनीयमेव 1। कर्मकाण्ड एव कुतो मन्त्राणा सम्बन्ध क्रियते? अन्येष्वपि कार्येषु तेषा सम्बन्धः कुतो नेष्यते? अतो याज्ञिकै स्वेच्छानुसार विनियोगा कल्पिता इति लेखको लिखति । लेखकस्य तव कर्मकाण्डेन सह न कोऽपि सम्बन्ध. | निराकारस्येश्वरस्य भजनमुपदिष्ट गुरुणा । तदेव त्व कुरु । कुतो याज्ञिकविषये दत्तमना भवसि? तत्रापि वार वार 'दधि - क्राव्ण' इति मन्त्रमावर्तयसि तत्र याज्ञिकेषु सूत्रकारेषु मीमासकेषु च दोषानुद्भावयसि । इदानी ' दधिक्राव्ण' इति मन्त्रं पश्य, श्रृणु यदहं ब्रवीमि, अनन्तर स्वलेखमवधारय । त्वश्च न केवल सूत्राणा ब्राह्मणानाञ्च कल्पितत्वमङ्गीकरोषि मन्त्रा अपि रचिताः समायोजिताश्चेति । मदीयारशब्दास्तव कर्णविवर न प्रविशेयः । तथापि वच्मि । मन्त्राणा स्वरूप पूर्वमवोचम् | 'दधिक्राव्णो अकारिषम्' इति मन्त्र ऋग्वेदे यजुर्वेदे सामवेदे अथर्ववेदे च वर्तते । यजुर्वेदेऽपि काण्वशाखाया माध्यन्दिनशाखाया तैत्तिरीयशाखायाञ्च वर्तते । किं सर्वत्र मन्त्रोऽय कल्पितस्समायोजितश्च? अस्य मन्त्रस्य किं रचयितारोऽनेके? उत एक एव रचयिता? रचयित्वा च तत्र तत्र योजनानन्तर किं विनियोगकर्तारोऽनेके? ? उत एक एव प्रायस्सर्वेषु श्रौतसूत्रेष्वस्य मन्त्रस्य विनियोगो दृश्यते । द्राह्यायणाश्वलायनकात्यायनबौधायनापस्तम्ब- प्रभृतयो ' दधिक्राव्ण:' इति प्रतीकं गृहीत्वा विनियोग दर्शयन्ति । त्रिहविष्केष्टो 'दधिक्राव्णे चरुम्' इति तृतीयहविषः पुरो- गव्य का सेवन कर इस पुत्र की रक्षा करो । किन्तु किस पुत्र की, कहाँ कैसे रक्षा करे? इत्यादि विषयो में मन्त्र साकाक्ष ही है । तथापि शास्त्रीय विनियोग करने पर आकाक्षा शान्त हो जाती है । किन्तु साकाक्ष मत्र की आकाक्षाशान्त्यर्थ शास्त्रीय विनियोग को न मानकर अपनी अल्प स्वल्प बुद्धि के अनुसार विनियोग यदि करने लगे तो यही कह सकेंगे कि हे अग्ने । अग्निवत्प्रकाशमान हे राजन्, अथवा प्रधानमन्त्री के पद पर वर्तमान । अथवा हे दयानन्द | तुम आयुर्दाता हो, इसे प्राणदण्ड मत दो, इस दण्डार्ह अपराधी की भी रक्षा करो इत्यादि अर्थवाले मन्त्र का प्राणदण्डार्ह अपराधी को प्राणदण्ड से मोचन करने (छुडाने ) मे विनियोग किया? जारहाहै । क्या इस प्रकार का विनियोग कोई करता है इस प्रकार के विनियोग में भी विनियोजक वाक्य की कल्पना करनी ही पडेगी । मन्त्रो का सम्बन्ध, कर्मकाण्ड में ही क्यो किया जाता है? अन्यान्य कार्यों में भी उनका सम्बन्ध क्यो नही किया जाता? इत्यादि अनेक प्रश्न है, जिनका समाधान लेखक कर ही नही सकता । अत एव लेखक ने लिखा है कि 'याज्ञिको ने स्वेच्छानुसार विनियोगो की कल्पना कर ली है ।' तुम जैसे लेखक का कर्मकाण्ड के साथ क्या सम्बन्ध है? कोई सम्बन्ध ही नही है । तुम्हारे गुरु ने तो तुम्हे निराकार ईश्वर के भजन करने का उपदेश दिया है, उसी को तुम किया करो । याज्ञिको के विषय में तुम अपना मन क्यों लगा रहे हो? तत्रापि बार बार ' दधिक्राव्ण" मन्त्र को ही दोहरा रहे हो, और याज्ञिको में, कभी सूत्रकारो मे तो कभी भीमासको मे न होते हुए भी दोषो की उद्भावना कर रहे हो । अब ' दधिक्राव्ण' मन्त्र को देखो, और जो मै बतारहा हूँ, उसे सुनो, उसके बाद अपने लिखे लेख पर विचार करो । तुमने केवल सूत्रो और ब्राह्मणो को ही कल्पित नही माना है, अपि तु मन्त्रो को भी रचे हुए और जोड दिये गये कहते हो । मैं जानता हूँ कि मेरे शब्द तुम्हारे कर्णविवर में प्रवेश नही करेंगे, तथापि तुम्हारे हित की दृष्टि से तुम्हें बता रहा हूँ । मन्त्रो के स्वरूप को मैं पहले बताचुका । ' दधिक्राव्णो अकारिषम्' यह मन्त्र ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी उपलब्ध होता है । यजुर्वेद में भी उसकी काण्वशाखा तथा माध्यन्दिनशाखा में और तैत्तिरीयशाखा मे यह मन्त्र पाया जाता है । क्या सभी जगह यह मन्त्र, कल्पित किया गया है और जोड़ दिया गया है? इस मन्त्र के अनेक रचयिता है अथवा एक ही हैं? अच्छा; इस मन्त्र को रचकर और जहाँ-तहाँ उसे जोड़ देने पर उसके विनियोग कर्ता अनेक है, या एक ही है? प्राय सभी श्रौतसूत्रो मे इस मन्त्र का विनियोग दिखाई पडता है । द्राह्मायण, आश्वलायन, कात्यायन, बौधायन, आपस्तम्बप्रभृतियो ने 'दधिक्राव्ण.' इस प्रतीक को लेकर उक्त मन्त्र का विनियोग बताया है । विहविष्केष्टि में 'दधिक्राव्णे चरुम्' कहकर तृतीय हवि के पुरोनुवाक्या के रूप में इस मन्त्र का
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वेदार्थपारिजातः ९ १२५ नुवाक्यात्वेनास्य मन्त्रस्य विनियोगो दृश्यते (तै० सं० २-२-५) । ताण्ड्यमहाव्राह्मणे पठिनस्यास्य मन्त्रस्य ( ता० वा० १-७-१७ ) ( ) द्राह्यायणेन दधिभक्षे विनियोग कृत । आश्वलायनोऽप्येवमेव विनियुङ्क्ते आ० श्र० ६ १२ । माध्यन्दिनसहिताया पठि- तस्यास्य मन्त्रस्य ( मा० स० २३ - ३१ ) कात्यायनेनापि दधिद्रप्सप्राणने विनियोग कृत । दधिक्रावन् शब्दस्याश्वोऽर्थो वर्तताम्, तथा दधिकवन् गब्दस्य देवताप्यर्थ । दधिप्रिया सा देवता भवितुमर्हति । प्रयोगसमवेतार्थबोधकत्व मन्त्रस्य नावश्यकमिति ( पूर्वमुक्त शास्त्रीयदृष्ट्या । विनियोजकवाक्याधीन एव च विनियोग इत्यपि प्रतिपादितम् । 'दधिक्राव्णा पुनाति' (तै ० स ० २- २-५ ) इति वाक्येन पावनकर्मण्यपि मन्त्रस्यास्य विनियोगो दृश्यते । एतानि सर्वाणि प्रमाणानि तवाप्रमाणानि त्वदुक्तिरेव प्रमाणमिति कोऽय पन्था । वेदनिन्दकस्य कृते सर्वमप्रमाणमेव । स एवाय लेखक यश्च दिल्लीनगरे अखिलभारतसंस्कृतसाहित्यसम्मेलनतत्त्वावधाने श्रीपट्टाभिरामशास्त्रिणा- माध्यक्ष्ये सम्पन्नाया वेदपरिषदि परिषदध्यक्षेभ्य क्षमा याचितवान् । वैदिकस्वरविषयेऽनेनकृतस्य प्रलापस्य केनचन विदुषा खण्डने कृते स्वय क्षमा प्रार्थितवान् । अय यद्वा तद्वाऽन्यत्र प्रलपतु, शाबरभूष्यभूमिकाया म० म० चिन्नस्वामिशास्त्रिचरणाना शिष्य इत्यात्मान कीर्तयन् शास्त्रविरुद्धमनर्गल प्रलपन महते दुखाय । न केवलमेकैका पक्ति, अस्य लेखस्य प्रत्यक्षरं खण्डन- योग्यम् | भूमिकायामस्येय गतिश्चेत् भाष्यानुवादे कीदृशी गतिस्स्यादित्यूहितुमपि न शक्यते । दयानन्दकालादेव खल्विमे प्रलापा । ततः पूर्वं सख्यातीतानि शतकानि व्यतीतानि सम्प्रदायादागताया वेदतदङ्गाध्ययनपरम्पराया । अद्यैवाय महा- समीक्षकस्समागत, यश्च मन्त्रान् विरचय्य तत्र तत्र योजितवन्तः, विरचिताना मन्त्राणा विनियोजकसूत्राणि ब्राह्मणानि च कल्पयित्वा आडम्बरेण यज्ञाननुष्ठातुं लोकान् प्रेरयामासुरिति कथयति । तत्रापि स्वोन्नीतगणनैव प्रमाणमिति निस्सङ्कोचं वदति । विनियोग हुआ दिखाई देता है (तै० स ० २/२/५ ) । ताण्डय-महाब्राह्मण मे पढे गये इस मन्त्र का (ता ० ब्रा० १।७।१७ ) ब्राह्यायण ने दक्षिण में विनियोग किया है । आश्वलायन ने भी इसी प्रकार विनियोग किया है (आ ० श्र ० ६ १२) । माध्यन्दिन सहिता मे पढे गये इस मन्त्र का ( मा० स ० २३| ३१ ) कात्यायन ने भी दधिद्रप्सप्राशन में विनियोग किया है । दधिक्रावन् शब्द का अर्थ, 'अश्व ' रहे, किन्तु उसी प्रकार ' दधिक्रावन्' शब्द का अर्थ 'देवता' भी होता है । वह देवता दधिप्रिया है । शास्त्रीय दृष्टि से मन्त्र का प्रयोग सम- वेतार्थ बोधकत्व होना आवश्यक नही है, यह पहले कह चुके है । और विनियोग, विनियोजक वाक्य के अधीन होता है, यह भी बता चुके है । 'दधिक्राव्णा पुनाति' (तै० स ० २/२/५ ) इस वाक्य से पावनकर्म में भी इस मन्त्र का विनियोग दिखाई दे रहा है । इतने सभी प्रमाणो को अप्रमाण मानना और अपनी कपोलकल्पित उक्ति को ही प्रमाण कहना, यह कौन सा मार्ग है? वेद निन्दक के लिये तो सब अप्रमाण ही है । यह वही लेखक है, जिसने दिल्लीनगर मे सम्पन्न हुए अखिलभारतीयसस्कृतसाहित्यसम्मेलन के तत्त्वावधान में हुई वेदपरिषद् में उसके अध्यक्ष श्री पट्टाभिराम शास्त्री जी से क्षमा याचना की थी । वैदिक स्वर के विषय में इसके द्वारा कुछ प्रलाप किये जाने पर किसी विद्वान् ने जब इसके प्रलाप का खण्डन कर समुचित उत्तर दिया तब इसने स्वयं क्षमा प्रार्थना की थी । यह लेखक अन्यत्रभूमिकाभलेहीमे यद्वा तद्वा प्रलाप ' मुखमस्तीति वक्तव्यम्' न्याय से करता रहे, हमे उसकी परवाह नही । किन्तु जब इसने शावरभाष्य की अपने को महामहोपाध्याय श्रीचिन्नास्वामी शास्त्रिचरणो का शिष्य बताकर शास्त्रविरुद्ध अनर्गल प्रलाप करना शुरू किया तब हमे अकथ- ही इस, नीय महान् दुःख हुआ । इस लेखक की एक एक पक्ति ही नही किन्तु एक एक अक्षर खण्डन करने योग्य है । भूमिका मे के लेखक की यह दुर्दशा है तो भाष्य के अनुवाद करने मे इसकी क्या दुर्गति हुई होगी, इसकी कल्पना भी नही कर सकते । दयानन्द समय से ही अनर्गल प्रलाप करना आरम्भ हुआ है । दयानन्द के जन्म से भी पूर्व सख्यातीत शतको से गुरुसम्प्रदायपूर्वक जहाँसागवेदाध्ययनतहाँ जोड की परम्परा चली आ रही हैं, किन्तु आज ही यह महान् समीक्षक प्रकट हुआ है, जो कह रहा है कि ' मन्त्रो को रचकर दिया गया है, और विरचित मन्त्रो के विनियोजक सूत्र और ब्राह्मणो की कल्पना कर महान् आडम्बर के साथ यज्ञानुष्ठान करने में लोगो को प्रेरित किया गया है ।' और उसमे अपनी कपोल कल्पित गणना को ही प्रमाण बताने में जरा भी सकोच नही होता । 1
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२१३६ वेदार्थपारिजातः ----- एव वदतोऽस्य मनसीदमेव विपरिवर्तते - यद् यज्ञेषु पशुयागा क्रियन्ते । हिंसारूपाणि कर्माणि याज्ञिकैर्योजितानि, तदनुकूलाश्च मन्त्रास्तैर्विरचिता इति । अत एव 'श्रौत-पशुयाग-मीमासा' इति (पृ० १२० ) प्रकरणमारभते । अनन्तरञ्च 'वेदप्रतिपादित पशुयज्ञ सृष्टियज्ञ है' । पशुयज्ञाना 'सृष्टियज्ञ' नामधेयमनेन सृष्टमिति प्रतिभाति । प्रथम 'पशुयाग' शब्दः अनन्तरञ्च 'पशुयज्ञ'शब्दः प्रयुक्त ॥ किमनयोरुभयो सृष्टियज्ञ इति नामधेय कृतम्? उत पशुयज्ञस्यैव तन्नाम कृतम् अलङ्कारप्रिय. खलु लेखक. । उत्तरत्र श्लेषालङ्कार मन्त्रस्य कीर्तयिष्यति । तत. पूर्व पशुयज्ञ सृष्टियज्ञ इति शब्दालङ्कारोऽपि सिध्यत्विति दृष्ट्या कि लिखितम्? यागयज्ञशब्दौ यद्येकार्थवाचिनौ तर्हि य एवार्थो यागशब्दस्य स एव यज्ञशब्दस्यापि । यागस्तु देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागे वर्तते, यज्ञशब्देनापि तथैव वर्तितव्यम् । 'पशुयज्ञ' शब्दे ' यज्ञ'शब्दस्तथा, 'सृष्टियज्ञ'शब्दे च 'यज्ञ' शब्दो न तथेति वक्तु न शक्यते । समार्थकावुभावपि शब्दौ । यज्ञस्य च रूप द्रव्यं देवता च । सृष्टियज्ञे कि द्रव्यम्? का च देवता? यष्टा च कः? यश्च देवतामुद्दिश्य द्रव्य त्यजेत् । सृष्टियज्ञस्य किमुत्पत्तिवाक्यम्? किञ्चाधिकारवाक्यम्? सृष्टियज्ञ कि कस्याप्यङ्गत्वेनानुष्ठीयते? उत स्वातन्त्र्येण? यद्यङ्गतया तर्हि कोऽयमङ्गी? यदि स्वातन्त्र्येण तर्हि कि सः प्रकृतियज्ञ? उत विकृतियज्ञ? प्रकृतिश्चेत्तदङ्गानि कानि? विकृतिश्चेत्कस्य? एवमादिप्रश्नानामुत्तराणि देयानि भवेयु | त्वञ्च 'पशुयाग- मीमासा ' करोषि । मीमासायाश्चैवमादय एव विचारा भवन्ति । शाबरभाष्ये चेम एव विचाराः कृता । तस्य भूमिकायास्तदानुरूप्यसिद्धये विचारोऽपि तादृश आवश्यकः । पशुयागविचारस्तु शबरस्वामिना भूयस्स्वधिकरणेषु कृतः, ? सृष्टियज्ञविचारस्तु त्वदीयमीमासाया त्वयैव क्रियते । उभयोरपि वैरूप्य दृश्यते । अन्ततः सृष्टियज्ञशब्देन त्व किमभिप्रैषि कस्यापि वाक्यस्यार्थनिर्णयाय पूर्वोत्तरसन्दर्भा वीक्षणीया भवन्ति । पशुयज्ञं सृष्टियज्ञशब्देन व्यवहर्तुमिच्छसि । पशुयज्ञाः कुत्र इस प्रकार अनर्गल प्रलाप करते हुए इसके मन मे यही विचार चल रहा होगा कि यज्ञो में पशुयाग किये जाते है । याज्ञिको ने हिंसारूप कर्मों को जोड दिया है । तदनुकूल मन्त्रो की रचना की गई । अत एव पृ० १२० पर ' श्रौत - पशुयाग-मीमासा' शीर्षक प्रकरण का आरंभ किया है । उसके बाद 'वेदप्रतिपादित पशुयज्ञ सृष्टियज्ञ है' पशुयज्ञो का नामकरण ' सृष्टियज्ञ' करने की कल्पना लेखक की प्रतीत होरही है । प्रथम ' पशुयाग' शब्द को अनन्तर ' पशुयज्ञ ' शब्द को प्रयुक्त किया है । क्या इन दोनो को ' सृष्टियज्ञ' नाम दिया है? या पशुयज्ञ का ही सृष्टियज्ञ शब्द से नामकरण किया है । लेखक महोदय अलङ्कारप्रिय प्रतीत होरहे है । आगे चलकर मन्त्र के श्लेषालङ्कार को लेखक महोदय बतावेगे, उसके पूर्व 'पशुयज्ञ-सृष्टियज्ञ' इसमें शब्दालङ्कार की भी सिद्धि कर लीजिये । याग और यज्ञ दोनो शब्द यदि एक ही अर्थ के वाचक है तो जो अर्थ, याग शब्द का है, वही यज्ञ शब्द का भी होगा । याग तो देवता के उद्देश्य से किये जानेवाले त्याग में रहता है, यज्ञ शब्द को भी उसी तरह रहना चाहिये । यज्ञ की उक्त परिभाषा के अनुसार ' पशुयज्ञ' शब्द में ' यज्ञ' शब्द वैसा ही पाया जाता है, किन्तु ' सृष्टियज्ञ' शब्द में 'यज्ञ' शब्द वैसा नही है, यह नही कह सकते, क्योकि दोनो का अर्थ एक (समान ) ही है । यज्ञ का रूप द्रव्य और देवता बताया गया है । अब बताओ, कि सृष्टियज्ञ में 'द्रव्य' कौन है? और 'देवता' कौन है? और यष्टा' ( यज्ञ करनेवाला) कौन है? जो देवता को उद्देश्य करके द्रव्य का त्याग करे । सृष्टियज्ञ का उत्पत्तिवाक्य कौन सा है? और अधिकार-वाक्य कौनसा है? सृष्टियज्ञ का अनुष्ठान क्या किसी के अगरूप में किया जाता है? अथवा स्वतन्त्ररूप से? यदि अगरूप में किया जाता है तो ' अङ्गी' कौन है? यदि स्वतन्त्ररूप में किया जाता है तो क्या वह प्रकृतियज्ञ है? या विकृतियज्ञ है? यदि प्रकृतियज्ञ हो तो उसके अग कौन कौन है? और यदि विकृतियज्ञ हो तो किसकी विकृति है? इत्यादि अनेक प्रश्नो के उत्तर आपको देते होगे । आप तो 'पशुयागमीमासा' करने चल पड़े है । मीमासा में तो इसी प्रकार ही विचार किये जाते है । शाबरभाष्य में ये ही विचार किये गये है । अत, उसकी भूमिका मे उसका आनुरूप्य लाने के लिये वैसा हो विचार करना आवश्यक है । पशुयाग का विचार तो- शबरस्वामी ने अनेक अधिकरणों में किया है, किन्तु सृष्टियज्ञ का विचार तो तुम्हारी मीमासा में और तुमने ही किया है । दोनों में विरूपता दीख रही है । आखिर यह तो बताओ कि ' सृष्टियज्ञ' शब्द से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? किसी भी वाक्य के अर्थनिर्णयार्थ पूर्वोत्तर सन्दर्भों को देखना होता है । पशुयज्ञ का ' सृष्टियज्ञ' शब्द से व्यवहार करना चाहते हो । कहाँ पशुयज्ञ बताये गये है और कहाँ
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वेदार्थपारिजात' २१३७ समाम्नाताः, सृष्टिश्च कुत्र वर्तते? अनयोरैक्ये कि प्रमाणम्? इत्यादिकमनालोच्य 'अधिदैविकम्' 'आध्यात्मिकम्' इति शब्दा- नावर्त्तयन् लोकान् मोहयसि । सर्वामिदमुपपादन त्वदीयक्षेत्रे सङ्गच्छेत, किन्तु व्यावहारिके कर्मकाण्डे तन्निर्णायकमीमासाशास्त्रे तत्रापि शाबरभाष्ये कथमिदं सर्वमुपपन्न भवेत्? ' ' स्वाभिमतसृष्टियज्ञस्योपपादनाय आलर्भात शब्दार्थचर्चा त्वया कृता । एकस्यास्य शब्दस्यार्थनिर्णयमात्रेणे- तत्सम्बन्धिना सर्वेषा पदार्थानामुपपत्ति कि त्वया सम्पादिता स्यात्? त्वत्सकाशे शस्त्रमेक वर्तते - यदिद केनापि परिकल्प्य संयोजितमिति । यदेव स्वपक्षाननुकूल तत्सर्व कृत्रिमम्, यच्चानुकूलमिव तत्प्रमाणमिति केय नीति? आलभितिशब्दार्थनिर्णं- याय पदे पदे चरकवाक्य प्रमाणमुपस्थापयसि । कि शब्दार्थनिर्णयाय चरकस्य प्रवृत्ति? क्वचिच्चाधुनिकभाषाविज्ञानानुसारेण शब्दाना परिवृत्ति प्रदर्श्य तदनुसारेण शब्दार्थनिर्णयं करोषि । एकस्यालभतिशब्दस्य स्वानुकूलार्थनिर्णयाय प्रवृत्तस्त्व शतश. सहस्रशो वा स्थलेषु कि कुर्या? सर्व तत् कृत्रिमम्, प्रक्षिप्तम्, केनापि सयोजितम् इत्येव खलुत्तर वदे | पृष्ठे १२१ लिखसि—' इसकी व्याख्या साख्यदर्शन और वेदके अन्यत्र निर्दिष्टप्रकरण के आधार पर करनी चाहिए' इति । किमेवं कर्तुमाज्ञापयसि? अथवा किञ्चिदस्ति प्रमाणम्? 'सबसे पूर्व पुरुषमेध को उपस्थित करते हैं' इति लिखित्वा यजुर्वेदगत मन्त्र पुरुषसूक्तभिधमुपस्थापयसि, अपि च साख्यदर्शनानुसारेण मन्त्रस्यार्थ कर्तव्य इत्यादिशसि । कि साख्यदर्शन मन्त्रार्थप्रदर्शनाय प्रवृत्तम्? मन्त्रार्थंनिर्णयाय वाक्यशास्त्र प्रवृत्तमिति शास्त्रविदो जानन्ति । 'ततो विराडजायत' इत्यत्र 'तत ' इत्यस्य 'उस प्रारम्भिक अजायमान सत्त्वरजतम की साम्यावस्थारूप प्रकृति से ) इत्यर्थ वर्णयसि । प्रथम- मन्त्रचतुष्टये किमजायमानस्सत्त्वरजस्तमसा साम्यावस्थारूपः प्रकृतिपदार्थ कीर्तित? तच्छब्दस्य बुद्धिस्थत्वावच्छिन्नपदार्थे शक्तिरिति न्यायविद । पूर्वं यत्प्रधानं तत् तच्छन्दः परामृशति । किमत्र पूर्व प्रकृते. प्राधान्येन निर्देशो वर्तते? 'पुरुष' पदार्थ सृष्टि बताई गई है? दोनो को एक समझने में प्रमाण क्या है? यह सब बिना विचारे ही केवल ' आधिदैविक' 'आध्यात्मिक' आदि शब्दो को पुन पुन लिखकर या बोलकर लोगो को ठगना चाह रहे हो? तुम्हारा किया हुआ यह सब उपपादन तुम्हारे क्षेत्र मे ही चल सकेगा । व्यावहारिक कर्मकाण्ड में तन्निर्णायक मीमासाशास्त्र में तत्रापि शाबरभाष्य में वह सब कैसे उपपन्न हो सकता है? स्वाभिमत सृष्टियज्ञ के उपपादनार्थ ' आलभति' शब्द के अर्थचर्चा तुमने की है । इस एक शब्द के अर्थ का निर्णय कर लेने मात्र से क्या तत्सम्बन्धित समस्त पदार्थो की उपपत्ति लग जायगी? तुमने तो एक वाक्य रट लिया है कि ' यह तो किसी ने कल्पना करके जोड दिया हैं ' । यह वाक्य ही तुम्हारे पास एक शस्त्र है । 'जो अपने पक्ष के अनुकूल न हो, उसे ' कृत्रिम ' कह देना, और जो अनुकूल सा प्रतीत हो उसे 'प्रमाण' मान लेना' -यह कौन सी नीति है? 'आलभति' शब्द के अर्थ का निर्णय करने के लिये जहाँ तहाँ चरकवाक्य को प्रमाण के रूप में उपस्थित करते हो | क्या शब्दार्थनिर्णय के लिये चरक प्रवृत्त हुए है? कही पर आधुनिक भाषा विज्ञान के अनुसार - शब्दों की परिवृत्ति ( परिवर्तन ) को प्रदर्शित कर तदनुसार शब्द के अर्थ का निर्णय करने लगते हो' अच्छा, एक 'आलभति' शब्द का अपने अनुकूल अर्थ निर्णय कर भी लो, तो उससे क्या होगा? सैकडो, हजारों स्थलो पर क्या करोगे? वहाँ पर यही उत्तर दोगे न । कि वह सब कृत्रिम है, प्रक्षिप्त है, किसी ने जोड़ दिया है, इसके सिवाय और क्या उत्तर दे पाओगे | पृष्ट १२१ पर लिख रहे हो कि 'इसकी व्याख्या साख्यदर्शन और वेद के अन्यत्र निर्दिष्ट प्रकरण के आधार पर करनी चाहिये' इति । क्या यह आज्ञा दे रहे हो? अथवा तुम्हारे कथन मे कोई प्रमाण भी है? ' सबसे पूर्व ' पुरुषमेध ' को उपस्थित करते है'-यह लिख कर यजुर्वेदगत पुरुषसूक्त के मन्त्र को उपस्थित कर रहे हो, और दूसरी ओर यह आज्ञा दे रहे हो कि 'साख्यदर्शन के अनुसार -- मन्त्रार्थ करना चाहिये ' । जरा सोचो तो सही कि क्या साख्यदर्शन, मन्त्रार्थको प्रदर्शित करने प्रवृत्त हुआ है? ' मन्त्रार्थ — निर्णय के लिये 'वाक्यशास्त्र' प्रवृत्त हुआ है - यह तो शास्त्रवेत्ता जानते है । 'ततो विराडजायत' यहां के 'तत ' का अर्थ ( प्रारम्भिक अजायमान- 1सत्त्व- रज-तम की साम्यावस्थारूप प्रकृति) से -तुम बता रहे हो । क्या प्रथम चार मन्त्रो मे अजायमान सत्त्व-रज-तम की साम्याव-स्थारूप प्रकृतिपदार्थ बताया गया है? 'तत्' शब्द की बुद्धिस्थ पदार्थ शक्ति होती है —यह तो न्यायविदो ने बताया है । पूर्व जो #प्रधान रहा होगा उसी का परामर्श तच्छद करेगा । क्या 'पहले 'प्रकृति' का प्राधान्येन निर्देश किया गया है? पहले मन्त्रो मे तो २६८ 1
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२१३८ वेदार्थपारिजातः एव पूर्वं मन्त्रेषु निर्दिष्ट । किं साङ्ख्यमते पुरुष एव प्रकृति? प्रकृतिस्त्वचेतना, पुरुषस्तु चेतन । उभयोः किमैक्यम्? स्वोक्त- - ' = = ) ' पदार्थनिर्णयायोपरिष्टानिदिशसि इस सूक्त मे श्लेषालङ्कार से प्राकृतिक विराट् पुरुष महदण्ड हिरण्यगर्भ क। इत्यादि । किमलङ्कारस्वरूप जानन् 'श्लेषालङ्कार' इति लिखसि? अथवा दयानन्दानुसृतं पन्थानमवलब्य श्लेषालङ्कार इति लिखसि? अलङ्कारस्वरूपमवबोधयामि शृणुष्व । सर्वस्य पदार्थस्य विवेचनाय शास्त्रकारा विविध पन्थानमाशिश्रियिरे । विवेचका इमे स्वशास्त्रस्य निरूपणीय विषय निश्चित्य तदुपपादनाय शास्त्रन्तरविरुद्धामपि रीति काञ्चन परिकल्प्य स्वस्वसिद्धान्तव्यवस्थापनाय चेष्टन्ते । शास्त्र- कारेषु मिथ खण्डनमण्डनव्यापार स्वाभाविक । अपरेण मदीय मत खण्डितमिति स्वमते हेयदृष्टि निक्षिप्य नोदासते । स्वमतमण्डनायाजस्र यतन्त एव । नैयायिकेनाद्वैतं खण्डितम्, अद्वैतिना नैयायिकमतं खण्डितमिति मन्वानोऽपरो मतद्वयमपि लुप्तमिति नावधारयति, किन्तु तत्र तत्र विद्यमाना युक्ती. परिशीलयन् यदेव युक्तियुक्त तन्मत गृह्णाति । यथा दार्शनिकेषु शास्त्रकारेषु च विवेचका तथालङ्कारिकेष्वपि सन्त्युच्चावचा वादा । तेऽपि शोभन कञ्चन पन्थान निर्माय रीतिञ्च मनोरमा-माश्रित्य गच्छन्ति । नात्र काव्यस्वरूपविवेचका आलङ्कारिका शब्दमय काव्यमिति शब्दार्थोभयमय तदित्यास्थिषत । शब्दमयेऽपि काव्ये रमणीयार्थप्रतिपादकत्व शब्दस्य विशेषणमभिप्रयन्ति ते । 'काव्य परिशीलयति' ' काव्यार्थ परिशीलयति' इति द्वेधा प्रयोगात् शब्दतदर्थयोः प्रधानोपसर्जनभाव एतेषा मते । अन्ये च काव्यशरीरेऽर्थस्यापि प्राधान्यमङ्गीकृत्य तदुपसर्जनतया शब्दमङ्गीकुर्वन्ति । एतेषा मते शब्दस्य प्राधान्येऽर्थो गुणभूतः, अर्थस्य च प्राधान्ये शब्दो गुणभूतः । माधुर्यमोज प्रमा- दश्चेति त्रयो गुणा. शब्दस्य यथा स्वीक्रियन्ते तथार्थस्यापि । गुणा इमे रसपरिपोषकाः परिगण्यन्ते । एवम् अलङ्काराः -----------'पुरुष' पदार्थ का ही निर्देश हुआ है । कि साख्यमत मे - पुरुष को ही प्रकृति कहते है? प्रकृति' तो जड ( अचेतन ) है, किन्तु-'पुरुष ' चेतन है । क्या जड और चेतन दोनो को एकरूपता है? पृ० १२० पर स्वोक्तपदार्थ के निर्णयार्थ लेखक महोदय लिख रहे है- ' इस सूक्त मे श्लेषालङ्कार से प्राकृतिक विराट् पुरुष ( = महदण्ड = हिरण्यगर्भ) का' इत्यादि । स्वय को अलङ्कारस्वरूप का ज्ञाता समझ कर यहाँ 'श्लेषालङ्कार ' लिख रहे हो? अथवा दयानन्द के अनुसृत मार्ग का अवलम्बन कर यहाँ 'श्लेषालङ्कार' बता रहे हो । अलङ्कारस्वरूप को मैं समझता हूँ, सुनो-- समस्त पदार्थों के विवेचनार्थ शास्त्रकारो ने विविध मार्ग अपनाये है । ये विवेचक निश्चित किये हुए स्वशास्त्र के निरूपणीय विषय के उपपादनार्थ शास्त्रान्तर से विरुद्ध भी किसी एक रीति को मानकर अपने अपने सिद्धान्त की स्थापना के लिये प्रयत्नशील रहते है । परस्पर खण्डन-मण्डन की परम्परा शास्त्रकारो मे स्वाभाविकगति से चली आ रही है । दूसरे ने मेरे मत का खण्डन कर दिया, इस कारण स्वमत में हेयदृष्टि करके वे उदासीन नही होते । स्वमत के मण्डनार्थ वे निरन्तर प्रयत्न करते ही रहते है । नैयायिक ने अद्वैत का खण्डन किया, तो अद्वैती ने नैयायिकमत का भी खण्डन किया, यह देखकर कोई जिज्ञासु प्रेक्षक यह नही समझ लेता कि परस्पर दोनो खण्डित होने से दोनो लुप्त हो गये । किन्तु उन दोनो मतो मे विद्यमान युक्तियो का परिशीलन करते हुए जो युक्तियुक्त मत उसे प्रतीत होता है, उसे वह स्वीकार करता है । जैसे दार्शनिको में और शास्त्रकारो मे विवेचक हैं, वैसे ही आलङ्कारिको मे भी उच्चावन्दवादो के विवेचक हैं । वे भी किसी एक सुन्दर मनोहर पद्धति की कल्पना कर, उसके सहारे विवेचना किया करते है । काव्यस्वरूप के विवेचक आलङ्कारिको ने शब्दमयकाव्य को ही शब्दार्थोभयमय नही माना । शब्दमय काव्य में भी रमणीयार्थ प्रतिपादकत्व को उन्होने शब्द का विशेषण ही माना है । 'काव्य परिशीलयति' 'काव्याथं परिशीलयति' दोनो प्रकार के इन प्रयोगो से इनके मत के अनुसार शब्द और उसके अर्थ मे प्रधानोपसर्जन भाव माना जाता है । 'शब्दार्थोभयमय काव्यम्' पक्ष के लोगो ने काव्यशरीर मे अर्थ की भी प्रधानता को मानकर उसके उपसर्जन रूप मे शब्द को माना है । इसके मत मे शब्द की प्रधानता रहने पर अर्थ गुणभूत रहता है, और अर्थ की प्रधानता रहने पर शब्द गुणभूत रहता है । माधुर्य, ओज और प्रसाद ये तीन गुण जैसे शब्द के वैसे ही अर्थ के भी है । गुणो को रसपरिपोषक माना जाता है । इसी प्रकार अलङ्कारो को शब्दगत और अर्थगत माना गया है । इन अलंकारो से काव्य में चमत्कार पैदा होता है । इसी कारण अलङ्कारो को