वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1301–1310

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1301–1310

पृष्ठ 1301

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वेदार्थपारिजातः २१ ९९ अथवा ' करत्' इति प्रयोगमनुसृत्य केचनाचार्या स्वादौ इम धातु मन्यन्ते, परन्तु तन्न साधु, 'कृभृहरहिभ्यः' ( पा० सू० ) इत्यविधानसामर्थ्यात् । अत एव पूर्व मया उल्लिखितोऽपि स निराक्रियते |। पाठस्तु यथावत्स्थित एव । आचार्याः कृत्वा न निवर्तन्त इति स्मरणात् । भाषाया करत्यादीना प्रयोगाणामसाधुत्वादपि न स भौवादिकः । देशभेदात् प्रयोगभेदविषये भाष्यकृता राव धातु, हम्म धातु, रह धातुः, दाधातु --इत्येव परिगणिता । यदि कृधातुविषयेऽपीय स्थितिः स्यात् तर्हि भगवता प्रसिद्धत्वादस्याप्युल्लेखस्तत्र कृतः स्यात् । प्राकृतभाषाया प्रयुज्यमानः कृञ्धातुर्न भौवादिकत्वे लिङ्गम्, तेषा भ्वादिगणपठितत्वाभावात् एतच्छास्त्रदृष्ट्याऽसाधुत्वाच्च 1। अधातुसम्बन्धेऽप्य करदादिप्रयोगसिद्ध्यर्थमविधान सार्थकमेवेति कथनं न युक्तम्, तादृशप्रयोगस्यानुपलम्भात् । छन्दसि दृष्टानामेव विधानात् । अङि शपि च स्वरभेदोऽपि न, सति शिष्टस्वर- वलीयस्त्वमन्यत्र विकरणेभ्य इति वार्त्तिकदर्शनात् । अपि शपि धातुस्वर, अडि प्रत्ययस्वर इत्यपलापमात्रमेव । अत एव वेदे 'अकरत्' इति आद्युदात्त एवोपलभ्यते । एव च भौवादिकत्वमेव निरसनीय न तु तानादिकत्वम् । 'सहाव' 'सहतम्' इत्य-नयोर्नाडुस्वर', उक्तवार्तिकविरोधात् । अतो व्यत्ययेनाकारस्योदात्तता बोध्या । यत्तु अत्र ग्रन्ये ४२ पृष्ठे भट्टोजिदीक्षितस्योक्ति. -'स्वरादिपाठादव्ययत्वम्' इति, तस्याः समीचीनत्वमेव, ब्रह्मपरस्य तस्य सत्त्ववाचकत्वात् । आरम्भानुमत्योर्वर्त्तमानस्य ओमशब्दस्य चादित्वे न क्षति, असत्त्वार्थकत्वात् । उत्तरमीमासायाम्— ' अजामेका लोहितशुक्लकृष्णा बह्री प्रजा सृजमाना सरूपा । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येना भुक्तभोगामजोऽन्य. ॥ ' इत्यत्र अजाशब्दस्य कोऽवार्थ इति विचारे अजाशब्दश्छाग्या रूढः, तथापि तदर्थासम्भवाद् यौगिकार्थस्य चासम्भवात् साख्यदृष्ट्या सत्त्वरजस्तमसा साम्यावस्थापन्ना प्रकृति, वेदान्तरीत्या तु लोहितशुक्लकृष्णा तेजोऽबन्नलक्षणा भूतत्रया-त्मिका प्रकृतिविवक्षिता । तदुक्त श्रीमच्छङ्करभगवत्पादैः - 'नन्वजाशब्दश्छाग्या रूढः? बाढम् सा तु रूढिरिह नाश्रयितु शक्या । विद्याप्रकरणात्' (ब्र० सू० ११४१८) । 'ज्योतिरुपक्रमा तु ह्यधीयत एके' ( ब्र ० सू० ) अजाशब्दो यद्यपि छाग्या रूढः, अथवा 'करत्' प्रयोग को देखकर कुछ आचार्य स्वादिगण मे इस धातु का पाठ करते हैं, किन्तु यह ठीक नही है, क्योकि यहाँ कृभृ ०' प्रभृति सूत्र से अप्रत्यय का विधान हुआ है । इसीलिये पहले उल्लिखित विषय का यहाँ निराकरण किया गया है । पाठ तो जैसा का तैसा ही है । यह कहा जाता है कि आचार्यगण किसी कार्य को करने के बाद उसको वापस नही लेते । भाषा मे करति प्रभृति प्रयोग साधु नही माने जाते, इससे भी उसको भ्वादिगण का नही माना गया है । देशभेद से प्रयोग भेद के विषय मे भाष्यकार ने शव, हम्म, रह और दा धातु का परिगणन किया है । यदि कृ धातु के विषय मे भी यदि यही स्थिति होती तो भगवान् पतजलि उसका भी इन धातुओ के साथ परिगणन किया होता । प्राकृत भाषा मे प्रयुज्यमान कृष् धातु उसके स्वादिगण के धातु होने मे प्रमाण नही हो सकती, क्योकि उसका वहाँ पाठ नही है और व्याकरण शास्त्र की दृष्टि से वह अशुद्ध भी है । धातुका सम्बन्ध न रहने पर भी ' अकरत्' इत्यादि प्रयोगो की सिद्धि के लिये अड़ का विधान सार्थक है, ऐसा भी नही कह सकते, क्योकि ऐसे प्रयोग कही उपलब्ध नही होते । छन्द मे अङ् में प्रत्ययस्वर दृष्टविधि ही स्वीकार की जाती है । अङ् और शम् प्रत्यय में स्वरभेद भी नही होता । शप् प्रत्यय मे धातुस्वर और मानना भी सही नही है । इसलिये वेद में ' अकरत्' पद आद्युदात ही उपलब्ध होता है । इस तरह से प्रस्तुत प्रयोग में भ्वादिगण की धातु का ही निषेध माना जायगा, तनादिगण की धातु का नहीं । स्वामी दयानन्द ने प्रस्तुत ग्रन्थ मे भट्टोजिदीक्षित की 'स्वरादि में पाठ होने से यह अव्यय है, इस उक्ति को ठीक नही माना है, किन्तु यह दीक्षित की उक्ति पूरी तरह से समीचीन है, क्योकि ऊँकार ब्रह्म का बोधक होने से सत्त्ववाचक माना जाता है । आरम्भ और अनुमति अर्थ में प्रयुक्त ॐ शब्द के चादि होने में कोई क्षति नही है, क्योंकि इन अर्थों में वह सत्त्व का बोधक नहीं है । उक्त मीमासावह मे' ' अजामेका ० ' श्रुति मे अजा शब्द के अर्थ का विचार करते समय कहा गया है कि यद्यपि 'अजा' शब्द छागी मे रूढ है, औरतथापिवेदान्त 1 अर्थ यहाँ सगत नही हो सकता, अत साख्य की दृष्टि से सत्व, रज और तम नामक त्रिविधगुणो को साम्यावस्थापन प्रकृति कि भगवान् की दृष्टि से लोहित, शुक्ल और कृष्ण, तेज, जल और अन्न लक्षण तीन भूत वाली प्रकृति भजा शब्द से विवक्षितहो सकतीहै ।, क्योंकिजैसा यहाँ विद्या शङ्कराचार्य ने कहा है--' अजा शब्द तो छागी में रूढ है । अवश्य है, किन्तु यह रूढि यहाँ स्वीकार नही

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२२०० वेदार्थपारिजातः तथाप्यध्यात्मविद्याधिकारान्न तत्र वर्तितुमर्हति' इति । यदि वेदे यौगिक एव शब्दो ग्राह्यो न रूढस्तदा कृतं तादृशेन विचारेण । पूर्वमीमासाया विचारः --येषा शब्दाना पिक -नेम तामरसादीनामार्येषु प्रसिद्धोऽर्थो नास्ति कि तेषा निगमादिभ्योऽर्थः कल्पनीयः, उत म्लेच्छप्रसिद्ध एवार्थो ग्राह्य इति सन्देहे शास्त्रस्थत्वान्निगमादिप्रसिद्ध एवार्थो ग्राह्यो म्लेच्छप्रसिद्धेरार्याणा- मर्थप्रतिपत्तौ विप्लवप्रसङ्गादिति प्राप्ते समुदायप्रसिद्धेरवयवप्रसिद्धितो बलवत्वात् पिकादिपदानि यद्रपाणि वेदे दृश्यन्ते तद्रू- पाणामेव तेषा म्लेच्छैरर्थविशेषेषु प्रयुज्यमानत्वात् तदर्थसम्बन्धे च पदाना बाधाभावाद विप्लुतिशङ्कानुत्थानान्म्लेच्छप्रसिद्ध एवार्थो ग्राह्यः पिकः कोकिल, नेम, अर्धम्, तामरसं पद्मम्- इति प्रमाणलक्षणे स्थितम् । यदि म्लेच्छरूढोऽप्यर्थो यौगिकाद् बलवान् भवति, तदा किमु वक्तव्यमार्यप्रसिद्धिरूपाया रूढैर्योगाद्बलवत्त्वे । ' यवमयश्चरुर्भवति ' ( वाराही उपानही) इत्यत्र यववराहशब्दयोम्लेंच्छेः प्रियङ्गुवायसयोः प्रयोगात्, आर्यैश्च दीर्घशूक सूकरयोः प्रयोगात्, उभयोः प्रयोगयोरनादित्वेन तुल्यबलत्वाद् विकल्पेनाभिधान प्राप्तमेतदप्युक्त प्रमाणलक्षणे- ' समाविप्रतिपत्तिः स्यात्' ( जै ० सू० ११३८ ) इति । अभिधानविप्रतिपत्तिस्तुल्येत्यर्थः । तत्रैव सिद्धान्तोऽप्युक्त -—— शास्त्रस्था वा तन्निमित्तत्वात्' (जै० सू ० १1३1 ९) | यवमय इत्यस्य हि वाक्यशेषे यदान्या ओषधयो म्लायन्त्यथैते मोदमानास्तिष्ठन्ति' इति श्रूयते । यवाश्चान्यौषधिम्लानौ मोदन्ते न प्रियङ्गवः । वसन्ते ह्योषधीना हि जायते पत्रशातनम् । मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः । प्रियङ्गव शरत्पकास्तावद्गच्छन्ति हि क्षयम् । यदा वर्षासु मोदन्ते सम्यग्जाताः प्रियङ्गवः । तदा नान्यौषधिम्लानिः सर्वासामेव मोदनात् ॥ 'वाराही उपानही' इत्यस्य वाक्यशेष: 'वराह गावोऽनुधावन्ति' इति श्रूयते । सूकर च गावोऽनुधावन्ति न वायसम् । तस्माद्यववराहशब्दयोदीर्घशूक सूकरावर्थौ इति । ' राजा स्वाराज्यकामो राजसूयेन यजेत' इति श्रूयते । तं प्रकृत्यामनन्ति -अवेष्टि नामेष्टिम् आग्नेयोऽष्टाकपालो का प्रकरण है, कर्मकाण्ड का नही ' अध्यात्म विद्या का अधिकार होने से यहाँ अजा का अर्थ छागी नही किया जा सकता' । यदि बेद मे यौगिक शब्द ही ग्राह्य होता, तो साख्य और वेदान्त दर्शन का इस तरह का विचार निरर्थक ही माना जाता । पूर्वमीमासा मे विचार किया गया है कि जिन पिक, नेम, तामरस प्रभृति शब्दों की आर्यो मे प्रसिद्ध नही है, उसका अर्थ निगम आदि की सहायता से करना चाहिये या म्लेच्छ प्रसिद्ध अर्थ ही उनका स्वीकार कर लेना चाहिये । इस तरह की सन्देह की स्थिति के उपस्थिति के होने पर शास्त्र में विद्यमान पदो का निगम आदि की सहायता से ही अर्थ करना उचित होगा, म्लेच्छ प्रसिद्धि के आधार पर अर्थ करने पर शास्त्र में विपर्यास उत्पन्न हो जाएगा, यहाँ पूर्वपक्ष किया गया है । अन्त में सिद्धान्त पक्ष बताया गया है कि अवयव प्रसिद्धि से समुदाय की प्रसिद्धि बलवान् होती है । पिक प्रभृति शब्द वेद और म्लेच्छ प्रसिद्धि में समान रूप से प्रचलित है । म्लेच्छ प्रसिद्धि के आधार पर किये गये अर्थ का यदि शास्त्रीय वचनों से कोई विरोध न हो तो उस स्थिति में उसका ग्रहण किया जा सकता है । इसमे शास्त्र के विपर्यास का कोई भी प्रसग नही उठता । तदनुसार पिक का अर्थ कोकिल, नेम का अर्थ अर्ध और तामरस का अर्थ पद्म किया जाय, तो यह प्रामाणिक ही माना जायगा । इस तरह से विचार करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि जब म्लेच्छ रूढि मे प्रसिद्ध अर्थ भी जब यौगिक अर्थ से बलवान् माना जाता है, तब आर्य प्रसिद्धि रूप रूढि यौगिक अर्थ से बलवान् हो, इस विषय मे सन्देह हो कहाँ रह जाता है । यव और वराह शब्दो का अर्थ म्लेच्छप्रसिद्धि में प्रियङ्गु और वायस तथा आर्यप्रसिद्धि मे दीर्घशूक और सूकर किया गया | उभयविध प्रयोग अनादिकाल से चले आ रहे है, अत इनका एक सा प्रामाण्य माना जायगा । इस विषय पर भी मीमासा दर्शन मे विचार किया गया है कि ' यवमयचरुर्भवति' इस वाक्य का अवशिष्ट वाक्य 'यदान्या' इत्यादि है । अन्य औषधियो के मुरझा जाने पर यव ही हरे-भरे रहते हैं, प्रियङ्गु नही । इसी तरह से 'वाराही उपानहौ' वाक्य का अवशिष्ट वाक्य ' वराहं गावः' प्रभृति वाक्य है । गायें सूकर के पीछे दौड़ती है, वायस के पीछे नही । अतः यब और वराह शब्दों का अर्थ दीर्घशूक और सूकर ही माना जायया, प्रियङ्गु और वायस नहीं । श्रुति में बताया गया है कि स्वाराज्यकाम राजा को राजसूय यज्ञ करना चाहिये । इसी प्रकरण में अवेष्टि नामक इष्टि भ

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वेदार्थपारिजातः २२०१ हिरण्य दक्षिणेत्येवमादि । ता प्रकृत्याधीयते यदि ब्राह्मणो यजेत वार्हस्पत्य मध्ये निधायाहुति हुत्वाभिधारयेद्यदि वैश्यो - वैश्वदेव यदि राजन्य ऐन्द्रमिति । तत्र सशयः – कि ब्राह्मणादीना प्राप्ताना निमित्तार्थेन श्रवण मुत ब्राह्मणादीनामय यागो विधीयत इति । अत्र यदि प्रजापालनकण्टकोद्धरणादिकर्म राज्य नस्य कर्ता राजेति राजशब्दार्थः, ततो राजा राजसूयेन यजेतेति राज्यकर्तृ राजसूयेऽधिकार । तस्मात् सम्भवन्त्यविशेषेण ब्राह्मणक्षत्रियवैय्या राज्यस्य कर्तार इति सिद्ध सर्व एवैते राजसूये प्राप्ता इति । यदि ब्राह्मणो यजेतेत्येवादयो निमित्तार्था श्रुतय । अथ तु राज्ञ. कर्म राज्यमिति राजकर्तृयोगात् तत्कर्म राज्य तत को राजेत्यपेक्षायामार्येषु तत्प्रसिद्धेरभावात् पिकनेमतामरमादिशब्दार्थावधारणाय म्लेच्छप्रसिद्धिरिवान्ध्राणा । क्षत्रियजातौ राजशब्दप्रसिद्धिस्तदवधारणे कारणमिति क्षत्रिय एव राजेति न ब्राह्मणवैश्ययोः प्राप्तिरस्तीति राजसूयप्रकरणं भित्वा ब्राह्मणादिकर्तृकाणि पृथगेव कर्माणि प्राप्यन्ते न नैमित्तिकानि । तत्र पूर्वपक्षे नैमित्तिकान्येव कर्माणि । राज्यकर्तृमात्रे राजशब्द आर्यैरान्धैश्च प्रयुज्यत इत्यविवादम् । राज्यमकुर्वति तु क्षत्रियजातिमात्रे || 'वचनाद्रथकारस्याधानेऽस्य सर्वशेषत्वात्' (जै ० सू० ६। १४४ ) इत्यधिकरणेऽवयवार्थलक्षणयोगापेक्षया समुदायार्थ- रूपाया रूढेरेव बलीयस्त्वमङ्गीकृतम् । यौगिकत्वाङ्गीकारेण रथकर्तृत्वेन त्रैवर्णिकानामेव ग्रहण सम्भवति । 'माहिष्येण करण्या तु रथकारः प्रजायते' (या० स्मृ० ११ ९ ५ ) इति समुदायप्रमिद्धया तु जातिविशेषोऽत्रैवर्णिक एव प्राप्यते । एतादृशे सन्देहे सिद्धान्तेऽत्रैर्वाणकस्यापि रथकारस्याधानमङ्गीकृतम् । वचनाद् वचनबलात् । 'नहि वचनस्यातिभार ', 'नहि वचनस्य किञ्चिदलभ्यम्' इति शबरस्वामिवचनात् । ब्राह्मणराजन्यविशा तूक्तमेव वचनान्तरेभ्य आधानम् । परिशेषादत्रैवर्णिको रथका- रोऽत्र ग्राह्यः । तत्र पूर्वपक्ष – न्याय्यो वा कर्मसयोगाच्छूद्रस्य प्रतिषिद्धत्वात् । ' (जै० सू ० ६| १| ४५ ) रथकर्मणा रथनिर्माण- कर्मणा विशेषेण त्रैर्वाणको रथकार उच्यते । शूद्रो ह्यसमर्थत्वात् प्रतिषिद्ध । तस्मात् त्रैर्वाणको रथकारः । 'अकर्मत्वात्तु नैवं स्यात्' (जै ० सू ० ६।१।४६) इत्यनेन पूर्वपक्षनिराकरणम् । नात्र त्रैर्वाणको रथकारो ग्राह्यः, तस्य शिल्पोपजीवित्वप्रतिषेधात् । विहित है । वहाँ ब्राह्मण, वैश्य और राजन्य के लिये क्रमश वार्हस्पत्य, वैश्वदेव और ऐन्द्र हवि का विधान है । यहाँ सशय उठता है कि प्रकृत में ब्राह्मण प्रभृति के लिये कोई नैमित्तिक विधि है अथवा इस याग में ब्राह्मण प्रभृति को भी अधिकार दिया गया है । यदि प्रजापालन और उनके कष्ट के निवारण को राज्यकर्म माना जाय तो इस कर्म का सपादक जो कोई भी होगा, उस राजा को राजसूय यज्ञ करने का अधिकार प्राप्त हो जायगा । तब ब्राह्मण और वैश्य भी उक्त राज्यकर्म के सम्पादक होगे और इस तरह से उनको भी राजसूय की उक्त विधि में मुख्य अधिकारी ही माना जायगा । इससे उक्त अवान्तर श्रुतियो की भी सार्थकता सिद्ध हो जायगी । अब यदि राजा के कर्म को राज्य कहा जायगा, राजारूप कर्ता के योग से उसके कर्म का निर्धारण होगा, तब यह राजा कौन है? इसको जानना आवश्यक हो जायगा । आर्यो में यह प्रसिद्ध नही, अत पिक, नेम, तामरस प्रभृति शब्दो के अर्थ का निश्चय करने के लिये जैसे म्लेच्छप्रसिद्धि का सहारा लिया जाता है, उसी तरह से आन्ध्र देश में क्षत्रिय जाति के लिये प्रसिद्ध राजा शब्द से उसके अर्थ के निर्धारण में सहायता लेनी पडेगी । तब क्षत्रिय जाति का ही राजा माना जायगा, ब्राह्मण या वैश्य जाति का नही । इस स्थिति में यह निर्णय करना पडेगा कि उक्त अवान्तर प्रकरण में ब्राह्मण आदि द्वारा किये जाने वाले कार्य राजसूय के अग न होकर उससे भिन्न हो कर्म ,है राजसूय के अगभूत नहीं । पूर्वपक्ष के अनुसार तो वे कर्म राजसूय के निमित्त ही विहित माने जायँगे । आर्य और आन्ध्रप्रसिद्धि मे राज्य करने वाले के लिये समानरूप से यह शब्द प्रचलित है, इसमे किसी प्रकार का विवाद नही है । किन्तु जब वह राज्य नही करता, तब उस शब्द से केवल क्षत्रिय जाति का आन्ध्रप्रसिद्धि के अनुसार बोध होता है । यह इस प्रकरण का साराश है । इससे भी यौगिक की अपेक्षा रूढि शब्दों की बलदत्ता सिद्ध होती है । रथकाराधिकरण में अवयवार्थ बोधक योग की अपेक्षा समुदायबोधक रूढि की प्रबलता स्वीकार की गयी है । योगार्थ मानने पर रथकार तीन वर्णों में ही माना जायगा । समुदाय बोधक रूढि के अनुसार वह एक जातिविशेष त्रैर्वाणिक से भिन्न हो ठहरता है । ऐसे सन्दिग्ध स्थलो में त्रिवर्णभिन्न स्थकार का आधान वैध माना गया है । शबरस्वामी के अनुसार उक्त निर्णय है, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों का तो दूसरे वचनों से आधान विहित ही है । परिशेष के बल से यहाँ त्रिवर्णभिन्न रथकार मान लिया जाता है । वहाँ पूर्वपक्ष के रूप में सदेह किया जाता है कि रथ बनाने के कारण त्रैवर्णिक का हो रथकार होना उचित है । अनधिकारी होने के कारण शूद्र प्रतिषिद्ध २७६

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२२०२ वेदार्थपारिजातः अत्रैवर्णिकस्तु 'वर्षासु रथकार आदधीत' (आपश्री० सू० ५| ३| १८ ) इति वचनबलादाधास्यति । 'अनर्थक्य च सयोगात्' (जै० सू० ६| १ | ४७ ) ब्राह्मणादिषु वसन्तादयो नियता आधानकाला: । 'ब्राह्मणो वसन्त आदधीत, क्षत्रियो ग्रीष्म आदधीत, वैश्यो वर्षासु आदधीत' ( श० २ १ ३ ५ ) इति । तान् प्रति वर्षा उच्यमाना अप्यसम्बन्धादानर्थक्य प्राप्नुयु.। तस्मादत्रैवर्णिको रथकार. । 'गुणार्थेनेति चेत्' ( जै० सू० ६।१।४८ ) पुन पूर्वपक्ष । शिल्पीपजीवित्वस्य प्रतिषिद्धत्वेऽपि गुणार्थेन कश्चिद् भविष्यति रथकार । आपदि जीवन भवत्येव रथकरणेनेति चैतस्य वाक्येनानेनाधान विज्ञायते । तस्योत्तरम्— 'उक्तमनि- मित्तम्' ( जै० सू० ६।१।४ ९) । उक्तमेतदस्माभि J न निमित्तार्थान्येतानि श्रवणानीति । किमतो यदि न निमित्तार्थानि । एतदतो भवति प्रापकाणीति । प्रापितत्वात्तेषामाधानस्य पुन प्रापकमनर्थकम् । तेन यस्याप्राप्त तस्य भविष्यतीति । नैतदव- कल्पते वसन्तादिनयुक्त कथमिव वर्षाभि सम्बद्धयेत । अपि च प्रापकपक्षे आधान विधीयते श्रुत्या । निमित्तपक्षे पुनर्वर्षा - विधातव्या वाक्येन । श्रुतिश्च वाक्याद्वलीयसी । तस्मादत्रैवर्णिकस्येद विधानम् | 'सौधन्वनास्तु हीनत्वान्मन्त्रवर्णात्प्रतीयेरन् ' (जै ० सू० ६।१।५० ) । न तु सर्व एवात्रैवर्णिको रथकार. | सोधन्वना इत्येष जातिवचन शब्द | होनास्तु किञ्चित् त्रैवर्णिकेभ्यो जात्यन्तरम्, न तु शूद्रा न वैश्या न क्षत्रियाः । तेषामिदमाधानम् । प्रसिद्धेर्मन्त्रवर्णाच्च । 'सौधन्वना ऋभव सूरचक्षसः' (ऋ० स ० १ | ११०| ४ ), 'ऋभूणातु' (ऋ० स० १० १७६ १ ) इति रथकारस्याधानमन्त्रः । तस्मात् सौधन्वना ऋभव इति । ऋभवश्च रथकारा । अपि च, 'नेमिं नयन्ति ऋभवो यथा' ( तै० सं० २२६| ११ | १ ) इति । ये नेमि नयन्ति ते ऋभव इत्युच्यन्ते । रथकाराश्च नेमि नयन्ति । तस्मादत्रैवर्णिकाना शूद्राणामेतदाराधनम् । एवमवयवार्थापेक्षया समुदायार्थस्य बलवत्त्वमनेन रथकाराधिकरणन्यायेनापि सिद्धयति । 'वेदे यौगिका एव शब्दा भवन्ति न रूढा योगरूढा वा' इति दयानन्दः । तदनुयायिना च प्रचारो वेदार्थाभिव्यक्तौ बाधक एव प्रमाणशून्यश्च । ननु तत्र ' सर्वाण्याख्यातजानि नामानि' इति निरुक्तकारयास्कवचनमेव मानमिति वाच्यम्, तस्य तैरप्यनङ्गीकारात् 'गोक्षीर.." (अथर्ववेदस० २।२६।४ ), ' सूर्य' (अथर्व० १ | १०| ३४ ), पृथिवी ( अथर्व० १२ १ १ ), पिप्पली ( अथर्व० ६। १० ९।१ ), 'गुग्गुल' ( अथर्व० ९९| ३८| १ ), पृश्निपर्णी ( अथर्व० २/२५ | १ ), 'स्त्री' (ऋ० स०५/ ६१/ ६ ), क्रिमि' है । उत्तरपक्ष है कि त्रैवर्णिक रथकार नही हो सकता क्योकि उसके शिल्पोपजीवित्व का निषेध है । अत्रैवर्णिक तो ' वर्षा मे रथकार अग्न्याधान करे' इस वचन के बल से अधान करेगा । ब्राह्मण आदि के लिये आधान काल वसन्तऋतु नियत है । जैसे- ' वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, ' ' ग्रीष्मे राजन्य ', 'शरदि वैश्य.' इत्यादि । ब्राह्मणाकि के लिये वर्षाऋतु कहा गया भी सम्बन्ध न होने से व्यथु ही है । अत त्रिवर्णभिन्न ही स्थाकर है यह निर्णीत हुआ । गौण अर्थ रथकार शब्द का मानने पर फिर सदेह है कि -शिल्प की जीविका के निषिद्धि होने पर भी गुणीभूत अर्थ के द्वारा त्रैवर्णिक भी रथकार हो सकता है । 'आपत्ति काल में रथ बनाकर जीवन निर्वाह किया जाय' इस वाक्य से आधान विज्ञापित है । इसका उत्तर यह है कि उक्त श्रुतिया निमित्तार्थक नही अपितु प्रापक है । अत एकबार आधान विहित हो गया तो पुन विधान व्यर्थ होगा । अप्राप्त को त्रिवान होता है । यह उत्तर भी सुसगत नही प्रतीत होता । क्योकि विधान वसन्त ग्रीष्म और शरद् मे है तो वर्षा से उसका सम्बन्ध ( अन्वय ) क्लिष्ट कल्पना होगी । और प्रापकपक्ष मे विहित है श्रुति से । निमित्त पक्ष मानने पर वाक्य से वर्षा का विधान करना पडेगा । श्रुति वाक्य से बलवान् होती है । अत. श्रुतिबलात् त्रिवर्णभिन्न रथकार का ही विधान मान्य प्रतीत होता है । सौधन्वन जाति का ही रथकार त्रिवर्णभिन्नजात्यन्तरप्रतीत होता है न कि सभी रथकार त्रिवर्णभिन्न होते है । जात्यन्तर एक विशिष्ट जाति का वाचक है न कि शूद्र वैश्य क्षत्रिय है ऐसे के लिये 'वर्षासु रथकार आदधीत ' यह विधि है । रथ की नेमि बनाने या प्राप्त कराने वाले ऋभु रथकार कहलाते है । अतः त्रिवर्णभिन्न शूद्रो के लिए 'वर्षा ' वाला विधि है । इसतरह रथकाराधिकरण न्याय से भी अवयवार्थ की अपेक्षा समुदायार्थ की बलवत्ता सिद्ध होती है । श्री दयानन्दजी के अनुसार वेद मे केवल यौगिक शब्द ही आये है रूढ या योगरूढ नही । उनका तथा उनके अनुयायियों का यह मत ( प्रचार ) वेद के अर्थ निर्वचन में बाधक और प्रमाणशून्य भी है । यदि कहे कि श्री दयानन्द के उक्त मत मे ' सर्वाण्याख्यात-जानि नामानि यह यास्कृवचन ही प्रमाण हैं, यास्क का मत अस्वीकार करने वाले दयानन्दियों के अनुसार वह भी प्रमाण नही है ।

पृष्ठ 1305

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वेदार्थपारिजातः २२०३ ( अथर्व ० ५। ३३ ' ३ ) ' आर्य' (ऋ० स० ९ ६३ । ५ ) प्रभृतीना शब्दाना दयानन्देनापि रूढत्वयोगरूढत्वाङ्गीकारात् । वेदे यौगिका एव शब्दा, लोक एव रूढा योगरूढाश्च भवन्तीति तेषा कथन नि सारमेव । यास्काचार्येण वैदिकशब्दानामाख्यातजत्वाङ्गी कारेऽपि वेदे केवल यौगिका एव, लोक एव रूढा भवन्नीति नोच्यते, तादृशवचनाभावात् । समेपा संस्कृतशब्दानामाख्यात- जत्वेऽपि रूढत्वयोगरूढत्वयोर्बाधाभावात् । अतएवामरकोषस्य सुधाटीकाकृताऽमरकोपगताना रूढयोगरूढशव्दानामपि प्रकृतिप्रत्ययानाश्रित्य व्युत्पत्तय प्रदर्शिता । यत्राख्यानाश्रितव्युत्पत्त्यनुसारेणार्थो न सङ्घाते तत्राख्यातजन्वेऽपि रूढत्वमेव मन्तव्यम् । अत एव श्रीदयानन्देनैव स्वकीयनामिकग्रन्थस्य द्वितीये पृष्ठे स्पष्टमुक्तम्—' यत्र प्रकृतिप्रत्यययोरर्थो न घटते तेषा शब्दाना रूढत्व सज्ञावोधकत्वमेवेति । यथा खट्वा- माला-शालादिशब्दाः । एतेन रूढशब्देष्वप्यन्येषा शब्दानामिव प्रकृतिप्रत्यययो सत्त्वेऽपि प्रसिद्धार्थासङ्गते समुदाय- प्रसिद्धया रूढत्वमङ्गीक्रियते । यथा चित्रकर्मणि कुशल इत्यत्रापि सर्वाण्याख्यानजानि नामानीति सिद्धान्तानुसारेण कुशान् लातीति व्युत्पत्त्या कुशादानकर्तृत्वमर्थो भवति । तथा प्रकृते तादृगार्थस्यासङ्घटमानत्वेन कुशोत्पाटनचातुर्य माम्येन चित्रकर्मणि चतुर इत्येवार्थो भवति । अत्राख्यातजत्वेऽपि रूढर्नातिक्रमणम् । अतो मीमासाभाष्ये शवरस्वामिनः 'कुशल: प्रवीण इति बहुषु कुशाना लातुर्गुणेषु सत्सु निपुणताया कुशलशब्दो रोहाद् रूढिशब्द एव भवति । बहुषु वीणावादकस्य गुणेषु सत्सु निपुण एव प्रवीणशब्दो वर्तमानो रूढ उच्यते तस्मात् सत्यपि लक्षणात्वे श्रुतिसामर्थ्याद् रोहतिशब्द ' (जै० सू० ६/७/२२) इत्याहु । यथा कस्यचिदन्धस्य कमलनयनेति नामप्रमिद्धावप्याख्यातजत्वसिद्धान्तवशाद् व्युत्पत्तिलभ्यस्यार्थस्यासङ्गतौ रूढत्वमेवाङ्गीक्रियते । अत एव महाभाष्ये प्रत्याहाराह्निके 'ऋलक्' सूत्रे वार्तिककृता यदृच्छाशब्दान् प्रत्याख्याय जाति -गुण- क्रियाशब्दा एवाङ्गीकृताः । महाभाष्यकारैरपि तादृशवार्त्तिकमिद्धान्तमप्रत्याख्याय तत्रानुमति प्रदर्शिता । तथापि तेषां नायमाशयो यद् यदृच्छाशब्दा रूढशब्दा संस्कृतजगति न सन्त्येव, किन्तु यदृच्छाशब्देरपि व्याकरणशास्त्रानुगृहीतैरेव भाव्य- मित्येव तदाशयः । यथा 'ऋलक' इति कस्यचित् संज्ञामकृत्वा 'ॠलक्' इत्येव नामसङ्केतः कर्तव्य इति । एव यदृच्छाशब्दा- ऋग्वेद, तथा अथर्ववेद के 'गोक्षीर, सूर्य, पृथिवी, पिप्पली, गुग्गुल, पृश्निपर्णी, स्त्री, क्रिमि, आर्य,' आदि शब्दो को श्रीदयानन्नजी ने भी रूढ तथा योगरूढ माना है । वेद मे यौगिक तथा लोक मे रूढ तथा योगरूढ प्रयुक्त होते है यह उसका मत निसार ही है । वैदिक शब्दो को आख्यातज मानते हुए भी यास्काचार्य ने वेद में यौगिक और लोक में रूद्र प्रयुक्त होते है ऐसा कही नही कहा है । संस्कृत शब्दो के आख्यातज होने पर भी रूढ या रूढ होने में कोई बाधा नही है । इसीलिए अमर कोष के 'सुधा' नामक टीकाकार ने कोप मे आये शब्दो मे भी रूढ और योगरूढ को मानकर प्रकृति प्रत्यय की कल्पना की है । जहाँ आख्यातज शब्द के अनुसार अर्थ न घटे वहाँ रूढ मानना ही पडता है । इसीलिए श्री दयानन्द ने अपने नामिक ग्रन्थ के दूसरे प्रूष्ठ पर साफ तौर से कहा है 'जहाँ प्रकृतिप्रत्ययजन्य अर्थ सगत न प्रतीत हो वहा जैसे —- खट्वा, माला, शाला, आदि सज्ञा शब्दो को रूढ मानना उचित है' । इसीलिए रूढ शब्दो मे भी अन्य शब्दों की तरह प्रकृति प्रत्यय रहने पर भी प्रसिद्ध अर्थ की संगति न होने से समुदाय की प्रसिद्धि से ही रूढता मानी जाती है । जैसे 'चित्र कर्मणि कुशल ' यहाँ पर उक्त गमक के अनुसार ' ' कुश लाने वाला अर्थ है किन्तु वह अर्थ वक्ता के तात्पर्यानुकूल न होने से चित्र कर्म में चतुर यह अर्थ होता है आख्यातज होने पर भी रूढार्थ का अतिक्रमण सभव नही । इसीलिए मीमासाभाष्य मे शबरस्वामी ने कुशल शब्द का अर्थ प्रवीण, दक्ष, किया है । I जैसे किसी प्रज्ञाचक्षु का नाम कमलनयन होने पर भी आख्यातज अर्थ के अमगत होने से रूढार्थक मान कर उसे अन्धा ही ' ' माना जाता है । इसीलिए पातञ्जल महाभाष्य के प्रत्याहाराह्निक के ऋ सूत्र पर वार्तिककार ने यदृच्छा शब्दो का खण्डन कर जाति गुणक्रियावाचक शब्दों का समर्थन किया है । महाभाष्यकार ने भी वार्तिककारके मत का खण्डन न करते हुए उसका आदर किया है । इसका यह आशय नहीं है कि संस्कृत शब्दों मे यदृच्छावाचक अर्थात् रूढ शब्द नही होते, होते हुए भी वे व्याकरणशास्त्र के नियमों से बँधे रहे यही भाष्य का अभिमत है । जैसे 'ऋलक' यह किसी की सज्ञा नही अपितु स्वय अपनी ॠकारवर्ण की जो तीस

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वेदार्थपारिजातः २२०४ नामपि व्याकरणानुशिष्टत्वे तेषामपि गुणक्रियाजातिष्वन्तर्भाव एव भवति । न ते पृथक्त्वेन परिगणनीया भविष्यन्ति । गुणशब्दक्रियाशब्दाभ्युपगमेऽपि यत्र गुणक्रिये नोपलभ्येते तत्र यदृच्छाशब्दा रूढा एव भवन्ति । यथा ऋऌकुशब्दः । शब्दत्वेऽपि यदृच्छाशब्दा रूढा एव । एवं गुणक्रिययोर्बोध्यम्, लतक इव कस्यचित् सज्ञामकृत्वा ऋतद इत्येव सकेतः कर्तव्यः । यत्र ऋतकनामके पुरुषे ऋतिक्रिया न दृश्यते तदा स गुणक्रियाशब्दोऽपि रूढ एव मन्तव्य. । यथा कस्यचित्तुलसीरामेति नामत्वेऽपि यदि तुलस्या रमण मनोरञ्जकत्व च स्यात् तदा गुणशब्दत्वं क्रियाशब्दत्वं वा सभ्भवति । यदि तादृशो गुणो वा तादृशी क्रिया वा न घटेत तदा गुणक्रियाशब्दत्वेऽपि यदृच्छाशब्दा एव । अत एव मम्मटाचार्येण काव्यप्रकाशस्य द्वितीयोल्लासेसङ्केतग्रहनिरूपणप्रसङ्गे न सन्ति यदृच्छाशब्दाश्चतुर्था ' इति महाभाष्यकारोक्ति जानतापि 'चतुष्टयी शब्दाना प्रवृत्ति ' इति महाभाष्यकारमतमुक्तम् । महाभाष्येऽपि सन्ति यदृच्छाशब्दा इति कृत्वा तत्प्र- योजनयुक्तम् । न सन्तीति परिहार उक्तः । समाने चार्थे शास्त्रान्वितोऽशास्त्रान्वितस्य व्यावर्तको भवतीति । यथा देवदत्त- शब्दो देवदिण्णशब्दं गोशब्दो गाव्यादीन् व्यावर्तयति । अस्य पूर्वपक्षस्य नैष दोष, पक्षान्तरैरपि परिहारा भवन्तीति शिथिलोत्तरेण रूढशब्दाना संज्ञात्वं सिद्धयति । यस्य शब्दस्याख्यातजत्वेऽपि यस्य वाच्ये आख्यातानुसार्यर्थो न घटते स रूढ ' 'एव । वेदेऽपि याज्ञिकाः संज्ञा कुर्वन्ति स्फ्यो यूपश्चषाल इति । तत्रभवतामुपचाराद् अन्येऽपि जानन्ति इयमस्य संज्ञेति (महाभाष्ये १। १। १ ) एतेन वेदेऽपि संज्ञाशब्दा इति सिद्धयति । यत्तु केनचिदुक्तम्-' यास्को यौगिकतावादस्य परमपोषकः । तदीयानि समस्तानि निर्वचनानि तत्र प्रमाणम्' इति, 'अयमपि इतरः शिर एतस्मादेव' ( नि ० ) इति यास्कानुसारेण वेदमात्रे शिर शब्द केवलस्य सूर्यस्य वाचको भवति न शिरसो वाचक इति तु न वक्तुं शक्यते । 'इन्द्रः शिरो अग्निर्ललाटम्' ( अथर्व० ९/ ७/ १ ) इत्यादिषु बहुषु मन्त्रेषु शिर. शब्दस्य प्रकार का है सज्ञा है । वैसे ही ऌकार स्वयं अपनी सज्ञा है जो बारह प्रकार का है । इसी तरह यदुच्छा शब्द भी व्याकरणानुशासना-नुसार जाति गुण क्रिया वाचक शब्दो मे समाविष्ट हो जाते है । उनका स्वतंत्र अस्तित्व नही । गुणक्रियावाचक शब्दो की मान्यता रहने पर भी जहाँ गुण क्रिया नही सभव है वहाँ पर यदृच्छा शब्द रूढ ही होते और माने जाते हैं । जैसे 'ऋलुक्' शब्द | शब्द होते हुए भी यदृच्छा शब्द रूढ ही होते है । इसी तरह गुण क्रिया वाचक शब्दो मे भी रूढता मानी जाती है जहा 'ऋतद' नाम पुरुष मे ऋति क्रिया नही है वहा वह गुण क्रिया वाचक ऋतद शब्द भी रूढ मानना पडता है । 'लतद' यह किसी की सज्ञा न मानकर 'ऋतद' यही सज्ञा मानना उचित है । जैसे किसी का तुलसी राम यह नाम है और यदि उसमें तुलसी में रमण अर्थात् मनोरञ्जकता का गुण भी हो तब उसमे गुण क्रियावाचक शब्दता संभव है यदि उसमे वैसे गुण या क्रिया सभव न हो तो गुणक्रियावाचक शब्द होने पर भी वह यदृच्छा शब्द ही है इसीलिए काव्यप्रकाशकार मम्मटाचार्य ने महाभाष्यकारका मत ' यदृच्छाशब्द नही होता है ' यह जानते हुए भी महाभाष्यकार के मत के चौथे यदृच्छा शब्द को सत्ता माना है 1। महाभाष्य में भी यदृच्छा शब्द है मानकर उसका प्रयोजन कहा है और नही मान कर उसका परिहार भी कहा है । एकार्थक दो शब्दो मे शास्त्रसम्मत तद् भिन्न का व्यावर्तक होता है यही उसका प्रयोजन है । जैसे देवदत्त >शब्द देव, दिण्ण शब्दो का तथा गो शब्द गावी गोणी गोता आदि का व्यावर्तक माना जाता है । इस पूर्व पक्ष को दोषयुक्त नही कह सकते क्योकि अन्य पक्षो से परिहार सम्भव हैं ऐसे शिथिल उत्तर से रूढ शब्दों का संज्ञात्व सिद्ध हो जाता है । आख्यातज शब्द का अर्थ का यदि सम्भव नही है तो उसे रूढ मानना ही पडता है । वेद में भी वैदिक लोग स्पय, यूप, चषाल, ऐसी संज्ञाए मानते हैं महाभाष्कार आदि लोगों के व्यवहार से अन्यलोग 'यह अमुकवस्तु की सज्ञा है' ऐसा मानकर व्यवहार करते है । जो किसी ने कहा कि 'यास्क यौगिकतावाद का परमपोषक हैं उनकी सभी निरुक्तियाँ इसमे प्रमाण है, यह भी दूसरा सिर Iहै इसीलिए हो ' ऐसे यास्क वचन से वेदो में शिर शब्दIIII सूर्य का वाचक है शिर का नहीं ऐसा नहीं कह सकते । 'इन्द्रः शिरोऽग्नि-ललाटम्' (अर्व ९१७१ ) आदि बहुत मन्त्रों में शिरशब्द लोकप्रयोग्रवत् शिर का ही वाचक है । यास्क ने भी लोकप्रसिद्ध शिर शब्द 3

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वेदार्थपारिजातः २२०५ लोकवत् शिर एवार्थः । यास्केनापि लोकप्रसिद्धशिर. शब्देऽपि स एव धातुरङ्गीकृतो य आदित्यवाचकगिरःशब्दे भवति । तेन लोके वेदे च सर्वत्रैव यौगिकता योगरूढिता च भवत्येव । लोके रूढशब्दो वेदेऽपि लोकरूढार्थक एव दृष्टः । वेदाङ्गनिर्माता पाणिनिरपि दयानन्दस्य मान्य एव । पाणिनेश्च औणादिका शब्दा प्रकृतिप्रत्ययरहिता अव्युत्पन्ना एवाभिमताः । अत एव— ' कमिस, (पा० सू० ८| ३| ४६) इति सूत्रे कमुधातोरेव ग्रहणेन कस इत्यस्यापि ग्रहणं सम्भवत्येव, यथा 'कृ ' इत्यनेन धातुना कार इत्यस्यापि ग्रहण भवति । पुनर्गौरव सोद्वापि कंस इत्यस्य पृथग्ग्रहण कृतम्, तस्येदमेव कारण यद् औणादिकाः शब्दा ये वेदेऽपि समुपलभ्यन्ते, ये रूढा अव्युत्पन्ना एव भवन्ति तेन न कमिग्रहणेन कस इत्यस्य ग्रहण भवतीति पृथक् कंस- शब्दग्रहणं कृतम् । अत एव पाणिनिना कृत्तद्धितभिन्नानामव्युत्पन्नशब्दाना 'अर्थवदधातुरप्रत्यय. प्रातिपदिकम्' ( पा ० सू० १२/४५) इत्यनेन सूत्रेण प्रातिपदिकसंज्ञा कृत्वा विभक्ति सयोजिता । अतः पाणिनिरीत्यापि वेदेऽपि रूढशब्दा सन्त्येव । नहि वेदेषु सर्वे शब्दा कृदन्तास्तद्धितान्वा एव वा भवन्ति । अत एव दयानन्देनापि नामिकग्रन्थस्य द्वितीये पृष्ठे ' पाणिन्यादयो रूढिमपि मन्यन्ते' इत्युक्तम् । पाणिनेरष्टाध्याय्या वेदाङ्गत्वाभ्युपगन्तॄणा वादिना तद्रीत्या रूढशब्दाना सत्तावश्यं स्वीकार्या । निरुक्तकारैरपि वैयाकरणेषु शाकटायनस्यैव सर्वशब्दाना यौगिकत्वाभ्युपगन्तृत्वमुक्तम् ॥ नैरुक्तेष्वपि गार्ग्यस्य रूढत्वाभ्युपगन्तृत्वयुक्तम् । अत एव न सर्वाण्याख्यातजानि नामानीत्येतस्य पक्षस्य नैरुक्तेषु गार्ग्यस्योल्लेख कृत्वा 'वैयाकर-गाना चैके ' (नि० १ | १२) इत्युक्तया स्वप्राग्भवाना वैयाकरणानामपि तत्पक्षपोषकत्वमुक्तम् । महाभाष्यकारैरपि ' आयनेयी-नियियः फढखछघा प्रत्ययादीनाम्' ( पा० सू० ७ ११२) इति सूत्रे 'उणादयोऽव्युत्पन्नानि प्रातिदिकानि' इति स्पष्टमेवोक्तम् । ' आदेशः प्रत्यययो. ' ( पा० सू० ८| ३ | ५९) इति सूत्रे तैरौणादिकशब्देषु प्रकृतिप्रत्ययविभागाः सन्ति न सन्तीति पक्षद्वय- मप्युक्तम् । एतेन वेदेऽपि रूढा योगरूढाश्च शब्दाः सन्तीति पाणिनि । किञ्च यस्य शब्दस्य व्युत्पत्तिलभ्योऽर्थो वाच्येऽन्यत्र चातिव्याप्नोति चेत्तत्रातिव्याप्तिवारणाय नियमन' योगरूढ्यैव मे वही धातु स्वीकार किया है जो सूर्यवाचक शिर शब्द में है । अत. लोक और वेद सर्वत्र ही यौगिक और योगरूढ शब्द होते है । लोक मे जो शब्द जिस अर्थ मे रूढ हैं वेद में भी उसी अर्थ मे रूढ देखा जाता है । वेदाङ्ग प्रणेता पाणिनिमुनि भी श्री दयानन्द के मान्य है । पाणिनि औणादिक शब्दो को प्रकृतिप्रत्ययरहित अव्युत्पन्न मानते है । इसीलिए 'कृकमिकस " (पा० अ० ८ ३४६) सूत्र मेकमुधातु के ग्रहण से कसशब्द का भी ग्रहण हो जाता है जैसे कृ धातु से कार का ग्रहण हो जाता है । फिर गौरव सहकर कस का अलग से पाठ करना इस बात का ज्ञापक है कि औणादिक शब्द जो वेद मे भी मिलते है जो रूढ और अव्युत्पन्न होते हैं उनसे कमि ग्रहण से कस का बोध नही होगा अत. कस का पृथक् पाठ करना सार्थक हुआ इसीलिए पाणिनि ने कृत्तद्धित भिन्न अव्युत्पन्न शब्दो की ' अर्थवदधातुरप्रत्यय प्रातिपदिकम्' सूत्र से प्रातिपदिक सज्ञा करके उन्हे विभक्ति से जोड़ दिया । इससे सिद्ध हुआ कि पाणिनि के मत मे भी वेद में रूढ शब्द है होते है । वेद मे भी सभी शब्द कृदन्त या तद्धितान्त ही नही होते । इसलिए श्री दयानन्द ने भी नामिक ग्रन्थ के दूसरे पृष्ठ पर 'पाणिनि आदि भी रूढि को मानते है' ऐसा कहा है । पाणिनि की अष्टाध्यायी को वेदाङ्ग मानने वाले वादियों को इस प्रकार रूढ शब्दो की सत्ता अवश्य माननी पडती है । निरुक्तकारो ने भी वैयाकरणो मे शाकटायन को ही सभी शब्दो में यौगिकता वादी माना है । निरुक्त-कारो में भी केवल गार्ग्य ही रूढता के पक्षधर है । इसीलिये सभी नाम आख्यातज नही है, इस पक्ष में निरुक्तकारो में गार्ग्य का जिक्र करके, 'वैयाकरणाना चैके' यह सूत्र कह कर अपने पूर्ववर्ती वैयाकरणों को भी उसपक्ष का पोषक बताया है । महाभाष्यकार ने भी '( *") ', ' ' आयनेयीनीयियः इस सूत्र भाष्य में उणादि अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है ऐसा साफ तौर पर कहा है । आदेशप्रत्यययोः इस सूत्रभाष्य मे औणादिक शब्दो मे प्रकृतिप्रत्यय विभाग होते है नही भी होते है ये दोनों पक्ष कहे गये है । इस तरह वेद मे रूढ और योगरूढ शब्द होते है यह महर्षि पाणिनि का मत है । और भी, जिस शब्द का व्युत्पत्ति से प्राप्त होने वाले अर्थ वाच्यार्थ लक्ष्यार्थ आदि में अतिव्याप्ति दोषग्रस्त होने लगें वहाँ दोष निराकरण के हेतु योगरूढ के नियम से ही चलना पड़ता है । दूसरे शब्दों में जब किसी शब्द के धातुज होने पर साधारण अर्थ

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• २२०६ वेदार्थपारिजातः सम्पद्यते । अर्थात् शब्दस्य धातुजत्वेऽपि यदा सामान्यार्थबोधकत्वे सति विशेषार्थबोधकत्व स्यात्तदा योगरूढत्वमेव मन्तव्यम् । यथा धातुजत्वे सत्यपि रूढत्वविरोधो नास्ति तथा योगरूढत्वेऽपि न विरोध । प्रकृतिप्रत्ययाश्रयेण यौगिकत्वप्रदर्शनं तु साधुत्वसिद्ध्यर्थमेव, शास्त्रपूर्वकशब्दप्रयोगस्य विशिष्टपुण्यजनकत्वात् । व्युत्पत्तिनिमित्तोऽन्योऽर्थः प्रवृत्तिनिमित्तस्त्वन्य इति शिष्टाभ्युपगमात् । अत एव पङ्कजपदस्य यौगिकत्वेन कीट -कुमुद-कमलाद्यनेकार्थवाचकत्वेन रूढ्या ( समुदायशक्तया) कमले शक्तिर्नियम्यते । तेनैव पङ्कजपदस्य योगरूढत्वम् । स्वामिदयानन्देन योगरूढस्योदाहरणतया नामिकग्रन्थस्य द्वितीयपृष्ठे दामोदरशब्द उक्तः । यास्काचार्येण च 'तक्षा, परिव्राजक, भूमिज (नि० १।१४।७) इति शब्दा उक्ता । विल्वादः, लम्ब- चूडक इत्यादयोऽपि यास्कोदाहृता वेदितव्या । परिव्रजन्नपि कश्चिन्न परिव्राजक उच्यते । अन्योऽपरिव्रजन्नपि शयानोऽपि परिव्राजक उच्यते । तक्षन्नपि ब्राह्मणो न तक्षोच्यते कश्चिदतक्षन्नपि तक्षोच्यते । गच्छन्नपि मनुष्यो न गौर्गौरुच्यते । तेन धातुजोऽपि यः सर्वत्र विशेषणत्वेन प्रयुज्यते स यौगिको भवति । स्वामिदयानन्देन नामिकग्रन्थस्य द्वितीयपृष्ठे ' यत्र प्रकृति- प्रत्ययार्थो न घटते तस्य रूढत्व सज्ञाबोधकत्व चोक्तम् । तदुदाहरणतया खट्वा-माला-शालादिशब्दा उदाहृताः । यदि वेदेऽपि ते शब्दा उपलभ्येरन् तदा वेदेऽपि रूढा शब्दाः सन्तीति तदनुयायिभिरभ्युपगन्तव्यमेव । वेदेऽपि 'शालाया विश्ववार' ( अथर्व- वेदसंहिता ९ | ३ | १ ) इत्यत्र शालाशब्दः । सस्कारविधेः २१६ पृष्ठान्वेषणेन बहवो रूढा योगरूढारच शब्दा उपलप्स्यन्ते । वेदारम्भसंस्कारे ११२ पृष्ठे धनवनादिशब्दा रूढा इत्यङ्गीकृतं दयानन्देन । वेदेऽपि वनशब्दो यजुर्वेदसहिताया ४| ३१, अथर्ववेदसहिताया ( ११ १/२८, १२/ २/ ५१ ) इत्यत्रोपलभ्यते । एवं वेदेऽपि तद्रीत्यापि रूढा शब्दा सन्त्येव । महा- भाष्यस्य तृतीयाह्निके स्पय-यूप-चषालादिशब्दाः सज्ञा (रूढ) शब्दाः स्वीकृता एव । व्युत्पत्तौ क्रियमाणायामन्यार्थवाचकाः स्यू रूढितायामन्यार्थवाचकाः स्युस्ते यौगिकरूढा भवन्ति । तेऽपि वेदे सन्त्येव । ' उद्भिद' पद वेदे प्रसिद्धमेव । 'उद्भिदा यजेत' इति श्रुतिः मीमासादर्शने ( १।४।१-२) सूत्रभाष्ये समुद्धृता । उद्भिदुशब्दस्य यौगिकताया वृक्षवाचकत्वं रूढिताया यज्ञविशेषस्य वाचकत्वम् । यदि वेदे रूढशब्दा न स्युस्तदा 'अपि वा नामधेय स्यात्' (जै० सू० १/४/२ ) इति सूत्रे शबर- न कहा जाय और विशिष्टार्थबोधकता ही होने लगे तब योगरूढ मानना ही पडता है । जब धातुज होने पर भी रूढि का विरोध न आवे तब योगरूढ होने पर भी कोई हर्ज नही है । प्रकृति प्रत्यय के सहारे यौगिक शब्द साधन साधुत्व ज्ञापनार्थ है क्योकि साधु शब्द प्रयोग सेपुण्य प्राप्ति होती है? अर्थाभिव्यक्ति मे व्युत्पत्ति का निमित्त भित्र और प्रकृति का निमित्त भिन्न होता है, ऐसा शिष्टजनो की मान्यता है । इसीलिए पङ्कज शब्द यौगिकता के आधार पर कीट, कुमुद, कमल आदि अनेकार्थ वाचक है फिर भी रूढि के बल पर कमल अर्थ मे नियन्त्रित है । इसी लिए पङ्कज शब्द योगरूढ है । स्वामी दयानन्द ने योगरूढ का उदाहरण नामिक ग्रन्थ के दूसरे पृष्ठ मे दामोदर शब्द को माना है । यास्क ने तक्षा, परिव्राजक, भूमिज आदि योगरूढ का उदाहरण दिया है । घूमता फिरता भी कोई परिव्राजक नही कहलाता | कोई सोता हुआ भी परिव्राजक कहलाता है । ब्राह्मण लकडी चीरता हुआ भी तक्षा नही कहा जाता दूसरा न चीरने पर भी तक्षा कहलाता है | मनुष्य चलता हुआ भी गौ नही है गाय बिना चलती और सोती हुई भी गौ कहलाती है । इसलिये धातुज शब्द भी जो विशेषण होता हो वह यौगिक है । स्वामी दयानन्द ने नाभिक के दूसरे पृष्ठ पर 'जिस शब्द में प्रकृतिप्रत्ययार्थ न घंटे उसे रूढ और सज्ञा माना है । उदाहरण-खट्वा-माला-शाला आदि दिया है । यदि वेद मे भी वे शब्द मिले तो वेद में भी रूढ शब्द प्रयुक्त है ऐसा उनके अनुयाथियो को मानना अनिवार्य होगा । सस्कार विधि के २१६ पृष्ठ के अन्वेषण से अनेक रूढ और योगरूढ शब्द मिल सकेगे । वेदारम्भ सस्कार के ११२ पृष्ठ पर धनवन आदि शब्दों को श्री स्वा ० दयानन्द ने रूढ माना है । यजुर्वेद अथर्ववेद में भी वन शब्द मिलता है सिद्ध है कि वेद में भी उनके मतानुसार रूढ शब्द होते हैं । महाभाष्य के तीसरे आह्निक स्पय-यूप-चषाल आदि सज्ञा (रूढ) शब्द माने गये हैं । व्युत्पत्ति करने पर भिन्न अर्थ और रूढ होने पर भिन्न अर्थ वाले शब्द योगरूढ कहलाते है । ऐसे शब्द- भी वेद में प्राप्त और प्रयुक्त है । उद्भिद शब्द वेद मे प्रसिद्ध ही हैं । 'उद्भिदा यजेत' यह श्रुति मीमांसादर्शन के ( १।४।१-२ ) सूत्र के भाष्य में उद्धृत है । यौगिक उद्भिद शब्द वृक्ष वाचक और रूद्र यज्ञ विशेष का वाचक है । यदि वेद में रूढ शब्द न होते तो 'अपि वा

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 1309 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः २२०७ स्वामिना उद्भिदादिशब्दाना कर्मविशेषवाचकत्व कथमङ्गीकृत स्यात्? तथा च रूढा योगरूढा यौगिका यौगिकरूढाश्चेति चतुविधा अपि शब्दा यथा लोके भवन्ति, तथैव वेदेऽपि सन्त्येव । तथा च वेदे यौगिका एव शब्दा भवन्तीति रिक्त वादिना वच । ' मर्यं इव योषाम्' ( अथर्व० १४| २ | ३७) इति मन्त्रे मर्यशब्दो मनुष्ये रूढ । स एव मर्यशब्दो 'समर्य' ' (ऋ० स० १।७७।३ ) इत्यत्राग्नेर्विशेषणत्वेन भारकार्थे यौगिक । रूढो वा योगरूढो वा शब्दो यदि कस्यचिद्विशेषणत्वेन प्रयुक्तः स्यात्तदा ' ( ) स यौगिको भवति । अत एव यत्रा नरो देवयन्त अथर्व ० २०।१०७।१५ इति मन्त्रे नृशब्दो मनुष्येषु रूढः । दिवो नर ' ( अथर्व ० १।६४।४ ) इत्यत्र नेतार इत्यर्थे यौगिकोऽपि भवति । तथैव 'नृणा नृतम, (ऋ० सं ० ६।३३।२) इतीन्द्रदेवताके मन्त्रे नेतॄणा मध्येऽतिशयेन नेत इत्यर्थे यौगिको भवति । 'पुरुषः पशु. ' ( अथर्व० ८ २ २५ ) इत्यत्र पशु शब्दो गजादिषु रूढ । ' विद्वान् अनष्टपशुः' (ऋ० स० १०।१७ ३ ) इति पूषदेवताके मन्त्रे पशुशब्दो ज्ञानार्थे यौगिक एव । अनष्टपशुरित्यस्य अप्रतिहतज्ञान इत्यर्थो भवति । तस्मै पावक: ' (ऋ ० स० १ १३/ ९) अत्र पावकशब्दोऽग्नौ रूढ । 'समुद्रार्था या. शुचयः पावकाः ता आपो देवीरिह मामवन्तु' (ऋ० स० ७।७९।२) अत्र पावकशब्दो यौगिकः । 'पुरन्धिर्योषा' ( वा० स० २२ २२) अत्र मन्त्रे योषाशब्द स्त्रीषु रूढः । 'शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा आप: ' ( अथर्व० १ १| १ | १७) इत्यादिमन्त्रेषु योषित्- शब्दो जलार्थे यौगिक' । ‘देवान् मनुष्यान् असुरान्' ( अथर्व० ८/ ९/ २४ ) अत्रासुरशब्दो देवविरोधिषु दैत्येषु रूढ. । ‘ ये च देवा रक्षा नृन् पाहि असुरत्वमस्मान्' (ऋ० सं० १ ९ ७४ ( १ ) अत्र असुरशब्द इन्द्रविशेषणत्वेन बलवानित्यर्थे प्रयुक्तत्वाद् यौगिकः । 'मध्यस्थान महिषे अवदानात्' (ऋ० स० १० १०६। २) इत्यत्र महिषशब्दः पशुविशेषे रूढः । ' अपामुपस्थे महिषा' (ऋ० सं० ६।८।४ ) इत्यत्र महानित्यर्थे यौगिक, निरुक्ते 'महान्तो माध्यमिका देवगणा' ( नि० ७/२६) इत्युक्तेः । वह्निशब्दोऽपि वेदे 'वह्नियशसम्' (ऋ० स० १/६०११ ) इत्यादिमन्त्रेषु अग्नौ रूढः । 'यदी मातरो जनयन्त वह्निम् ऋ( ० स० ३| ३१।२) इति मन्त्रे वह्निशब्दः पुत्रार्थे यौगिकः । तस्माद्वेदेषु यौगिका रूढा योगरूढा यौगिकरूढाश्च शब्दाः सन्त्येव । नामधेय स्यात्' इस सूत्र मे शबर स्वामी उद्भिद आदि शब्दो को कर्मविशेष वाचक क्यो स्वीकार करते? इससे स्पष्ट है कि रूढ, योगरूढ, यौगिक, यौगिकरूढ, भेद से चार प्रकार के शब्द लोक की तरह ही वेद में } भी है । ऐसी स्थिति मे ' वेद मे केवल यौगिक शब्द ही होते है ' ऐसी वादियों की कल्पना निरर्थक ठहरती है । 'मर्य इव योषाम्' (अथर्व० १४ । ७। ३७ । ) इस मन्त्र में मर्यशब्द मनुष्य अर्थ मे रूढ है । 'समर्यः ' (ऋ ० स ० १२७७।३ । ) इस मन्त्र मे आया मर्य शब्द अग्निका विशेषण होकर प्रयुक्त होने से मारक अर्थ मे यौगिक है । रूढ या योगरूढ जो शब्द किसी के विशेषण रूप में प्रयुक्त हो तब वह यौगिक होता है । इसीलिए ' यत्रा नरो देवयन्त ' ( अथर्व० २० | १०७ १५ ) इस मन्त्र मे नृ शब्द मनुष्यवाची है । 'दिवो नर ' ( अथर्व० ११६४/४ ) इसमे नेता के अर्थ मे यौगिक है । उसी तरह ' नृणा नृतम्' (ऋ० स ० ६ । ३३ । २) इस इन्द्र देवता वाले मन्त्र मे नेताओ मे अतिशय नेता अर्थात् श्रेष्ठ नेता अर्थ मे यौगिक भी होता है । पशुशब्द गजबैल आदि चौपायों मे रूढ हैं । किन्तु 'विद्वान् अनष्टपशु ' (ऋ ० स० १०।१७।३ ) इस पूष देवता वाले मन्त्र मे ज्ञानार्थ में यौगिक है । अनष्ट पशु इसका अप्रतिहतज्ञान अर्थ होता है । 'तस्मै पावक ' (ऋ ० स० १ | १३ | ९ ) इस मन्त्र में पावक शब्द अग्नि अर्थ मे रूढ है । किन्तु ' समुद्रार्थी या शुचय पावका.' (ऋ० स० ७ ७ ९१८) इस मन्त्र में यौगिक है । 'पुरन्ध्रियषा' (वा० स ० २२ २२) मे योषा स्त्री अर्थ मे रूढ है । किन्तु शुद्धा पूता ( ) ' ' ( ) योषितो यज्ञिय अथर्व ० ११। १ । १७ मन्त्र में जल अर्थ में यौगिक है । देवान् मनुष्यान् असुरान् अथर्व ० ८।९।२४ यहाँ असुर शब्द दैन्य अर्थ मे रूढ है । किन्तु 'ये च देवा '...'असुरत्वमस्मान्' (ऋ० सं ० १ ९ ७४ । १) यहाँ बलवान् अर्थ में यौगिक है । " मप्यस्थानं महिषे अवपानात्' (ऋ० सं ० १०।१०६ ) यहाँ पर महिष शब्द पशु विशेष में रूढ है । किन्तु ' अपामुपस्थे महिषा' (ऋ ० सं ० ६१८४ ) यहाँ महान् अर्थ मे यौगिक है । क्योकि निरुक्त मे ' महान्तो माध्यमिका देवगणा' ( नि० ७।२६) इस वचन से उक्त अर्थ की पुष्टि होती है । वह्नि शब्द भी ' वह्नि यशसम्' (ऋ ० स० १६० ११ ) आदि मन्त्रों में अग्नि अर्थ मे रूढ है । किन्तु ' यदी मातरो जनयन्त वह्निम्' (ऋ ० स ० ३।३१।२ ) यहाँ पुत्र अर्थ में यौगिक है । उपर्युक्त उद्धृत श्रुति वचनो के आधार पर वेदो मे यौगिक रूढ, योगरूढ 'यौगिक रूढ, शब्दो का होना प्रमाणित है ।

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 1310 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः२२०८ स्वामिदयानन्देनापि नामिकग्रन्थे लिखितम्- 'शब्दास्त्रिविधा, यौगिका रूढा योगरूढारच | परन्तु यास्कादि-निरुक्तकारैः, वैयाकरणेषु शाकटायनेन च सर्वे शब्दा धातुजा अर्था यौगिका योगरूढा एवाभ्युपगम्यन्ते । पाणिन्यादिभिस्तु रूढिरप्यङ्गीक्रियते । परन्तु सर्वे मुनयो वैदिकशब्दान् यौगिकान् योगरूढान् लोके रूढि चापि मन्यन्ते । ' इति, निघण्टुवैदिक-कोषनामक पुस्तकस्य भूमिकायां लिखितम् - ' एते सर्वे वेदेषु यौगिका योगरूढाश्चायान्ति । केवलरूढिशब्दा वेदे न भवन्ति ।' अत्र स्पष्ट दयानन्देन वेदेषु योगरूढशब्दा अङ्गीकृताः । आधुनिकाः सामाजिकास्तु तन्नाभ्युपगच्छन्ति, किन्तु पूर्वोक्तरीत्या केवलरूढशब्दा अपि वेदे सन्तीति प्रदर्शितमेव । ऐतरेयालोचने ३५ ' एवमपि एवमादिषु योगरूढ्यैवार्थ. सर्वत्र विवक्षितः' इति । वैदिकवाड्मय का इतिहास' इति ग्रन्थे १०९ पृष्ठे- सर्वत्र वेदविदो मन्त्रेषु यौगिकानि योगरूढानि च पदानि मन्यन्ते ’ इति । निरुक्तभूमिकायामन्येन समाजिना स्पष्टमङ्गीकृतम् । योगरूढशब्दा सङ्कुचितार्था भवन्ति । अत एव पङ्कजशब्दः ।,,कमलस्यैव वाचको भवति न तु पङ्कोत्पन्नाना सर्ववस्तूनामिति । वस्तुतस्तु विशेषणानि प्रायेण यौगिकानि भवन्ति विशेष्याश्च रूढशब्दा भवन्ति । दयानन्देन तत्रैव लिखितम्— 'वेदे पर्वतशब्दस्य यौगिकताया मेघोऽर्थो भवति । पौराणिकैर्भूधरोऽ ( पहाड़ )र्थोऽभ्यु-पेयते ' इति । परन्तु दयानन्देनापि यजुर्वेदस्य १७१, १८ १३ इत्यादिमन्त्रेषु पर्वतशब्दस्य भूधरार्थको रूढोऽप्यर्थोऽङ्गीकृतः । अन्योऽप्याह -- ' अन्यार्थमन्तरा सम्पूर्णः शब्दः कस्मिश्चिदर्थे प्रसिद्धः स्यात्तदा स रूढो भवति । यथा पर्वशब्दस्य योगोऽर्थः परमस्यावयवार्थोऽय न भवति । सायणाचार्यैस्तु प्रकरणानुसारेण पर्वतशब्दस्य मेघार्थताप्यङ्गीकृता । दयानन्देन लिखितम् — ' वेदे अहिशब्दस्य मेघोऽर्थो भवति, पौराणिकैः सर्पार्थे प्रयुज्यतेऽहिशब्द:' इति, तदप्यसत् वेदेऽप्यहिशब्दस्योभयार्थत्वदर्शनात् । 'अरसास इह अहय:' ( अथर्व० १०१४१९) इहाहिशब्दस्य सर्पार्थतैव प्रतीयते 1। अत्रैव मन्त्रे वृश्चिकशब्दः प्रसिद्ध वृश्चिकार्य एव प्रयुक्तः । सायणाचार्येणाप्यहिशब्दस्य प्रकरणानुसारेण मेघार्थतापि स्वीकृता । वेदगतो स्वामी दयानन्द ने भी नामिक मे लिखा है-शब्द तीन प्रकार के होते है, यौगिक, रूढ, योगरूढ | किन्तु यास्क आदि निरुक्तकार तथा शाकटायन नामक वैयाकरण सभी शब्दो को धातुज ही मानते हैं । अर्थ यौगिक और योगरूढ भी है । पाणिनि आदि शब्दो को रूढ भी मानते है । किन्तु सभी मुनियो ने शब्दो को यौगिक, योगरूढ तथा लौकिक शब्दो को रूढ माना है । निघण्टु वैदिक कोष नामक पुस्तक की भूमिका मे लिखा है --'ये सभी शब्द वेदो मे यौगिक और योगरूढ चले आरहे है । केवल वेद मे रूढशब्द नही होते । इस ग्रन्थ में साफ शब्दों में वेदो मे योगरूढ शब्दो का होना अङ्गीकार किया है । आधुनिक समाजी लोग उसे नही मानते लेकिन पूर्वोक्त रीति के अनुसार केवल रूढशब्दो को ही वेदो मे माना है । ऐतरेयालोचन के ३५ पृष्ठ पर 'ऐसे सभी प्रसगो मे योगरूढ मानकर ही अर्थ करना वेदवक्ता को अभीष्ट है । वैदिक वाड्मय का इतिहास नामक ग्रन्थ के १० ९ वे पृष्ठ पर लिखा है-'सभी जगह वेदवेत्ता लोग मन्त्रो में यौगिक, योगरूढ पदो की सत्ता स्वीकृत करते है । निरुक्त की भूमिका में एक अन्य आर्यसमाजी ने सुस्पष्टतया स्वीकार किया है- ' योगरूढ शब्द सङ्कुचित अर्थ के होते है । इसलिए पङ्कजशब्द कमल अर्थ मे ही नियत है । न कि कीचड से उत्पन्न अन्य वस्तुओं के अर्थ मे । वास्तव मे विशेषण यौगिक और विशेष्य रूढ होते है । स्वामी दयानन्द ने वहाँ लिखा है -' वेद मे पर्वत शब्द को यौगिक मानने पर उसका मेघ अर्थ है । पौराणिको ने पहाड़ अर्थ माना है । किन्तु दयानन्द ने भी यजुर्वेद के १७११, १८/१३, आदि मन्त्रो मे पर्वत का भूधर यह रूढ अर्थ माना है । दूसरे ने भी कहा है- ' अन्य अर्थ को छोड़ कर यदि पूरा शब्द किसी अर्थ में रूढ हो तो वह मान्य है । जैसे पर्व शब्द का अर्थ 'योग' है लेकिन: उसका अवयवार्थ यह नही है । सायणाचार्य ने प्रकरणानुसार पर्वत शब्द को मेघार्थक भी माना है । दयानन्द ने लिखा है कि-' वेद में अहि शब्द का अर्थ ' मेघ' होता है लेकिन पौराणिक लोग सर्प अर्थ में प्रयोग करते है ' । यह कथन ठीक नहीं, वेद में भी दोनो अर्थों में प्रयोग देखा जाता है । 'अरसास इह अहय.' (अथर्व १० / ४/ ९ ) यहाँ अहिंसा का अर्थ सर्प ही प्रकरणानुगत है । इसी मन्त्र में वृश्चिक शब्द का लोकप्रसिद्ध विच्छू अर्थ मे ही आया है । सायण ने भी प्रकरणानुरोधेन अहि.