वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1311–1320
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1311–1320
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वेदार्थपारिजातः २२० ९ वेदशब्दोऽपि रूढो न मन्तव्य, किन्तु ज्ञानपर्यायवाचकत्वेन सर्वत्र यौगिक एव मन्तव्यः । तथा सति वेदशब्दस्य सर्वत्रैव ज्ञानं ज्ञानसाधन वा अर्थः स्यात् । प्रसिद्धसहिताचतुष्ट्ये त्वद्रीत्या वेदशब्दो नियमेन प्रयुज्येत । तस्माद् अष्टाध्याय्या (पा० सू० ६।१।२०३) सूत्रे वृषादिगणे पठितो वेदशब्दो मन्त्रब्राह्मणात्मके वेदे रूढ । (पा ० सू० ६ १ ६० ) इति मूत्रे उच्छादिगणे पठितो वेदशब्दो यौगिकः । वेदे इडा, रन्ता, इत्यादिशब्दा यजुर्वेदे वाजसनेयिसहिताया ( ८१४३ ) इत्यत्र गवा सज्ञावाचका (रूढा) एव सन्ति । सातवलेकरेणापि स्वीये वेदभाष्ये रूढान् यौगिकान् योगरूढान् शब्दानभ्युपगम्यैव व्याख्यान कृतम् । महाभारत- समालोचनाग्रन्थे ११७ पृष्ठे तेनेवोक्तम् –' अस्माकमप्यय पक्षोऽस्ति यदेषा शब्दाना यौगिकोऽर्थ, परन्तु सोऽर्थं आध्यात्मिक- तत्त्वज्ञानविचारसमय उपयुज्यते, नैतिहासिकतत्त्वान्वेषणे । निरुक्तकारोऽप्याध्यात्मिकार्थसूचनायैव यौगिकार्थमङ्गीकृतवान् । ऐतिहासिकं तात्पर्यमपि तत्र तत्र वर्णयत्येव । किञ्च, ये सामाजिका वेदे रूढोऽर्थो नास्तीति वदन्ति त एव स्वार्थसिद्धये रूढार्थग्रहणेऽपि न सङ्कञ्चन्ति । 'हस्त- ग्राभस्य दिधिषो ' ( ऋ ० स ० १० १८२८), ( पुनर्भुवा पर पति ' ( अथर्व० ९ ५ २८ ) इत्यादिमन्त्रेषु मृतस्य पत्युर्विशेषणभूतस्य दिधिषोरितिपदस्य गर्भस्य निधातुरिति यौगिकमर्थमपहाय 'पुनर्भूदिधिषूरूढा द्विस्तस्या दिधिपूपतिः ' (अमरकोषे २।६।२३ ) इत्यमरकोषमाश्रित्य विशेष्यत्वाभावेऽपि रूढशब्दमङ्गीकुर्वन्ति । तथैव पुनर्भूशब्दस्य कश्चन सामाजिक स्तुलसीरामो भास्कर- प्रकाशस्य चतुर्थे समुल्लासे नियोगप्रकरणे पुनर्विवाहप्रसङ्गे रूढनेवार्थमङ्गीकृतवान् । तथैव बुद्धदेवोऽपि मरुत्सूक्तेषु नरो नेतार इत्यर्थमुत्सृज्य रूढार्थमनुष्यमित्यर्थमङ्गीकृतवान् । यत्तु-'यदि वेदे वशिष्ठादिपदाना सज्ञार्थत्वेऽभ्युपगम्यमाने तत्प्रतिपादकस्य वेदस्य अर्वाचीनत्वापत्ति.' इति, तदपि यत्किञ्चित्, परमात्मज्ञानरूपे वेदे भविष्यदृष्ट्या वर्णनेऽपि दोषाभावात् । वेदान्तदर्शने ( १।३।२८ ) सूत्रभाष्ये - ' चिकीर्षितमर्थ- मनुतिष्ठन् तस्य वाचक शब्द पूर्वं स्मृत्वा पश्चात्तमर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषा न प्रत्यक्षमेतत् । तथा प्रजापतेरपि स्रष्टुः सृष्टेः पूर्वं शब्द का मेघ अर्थ भी माना है । वेद मे आया वेद शब्द भी रूढ नही है । अपितु ज्ञानार्थक हैं, अत यौगिक हैं । ऐसा मानने से वेद शब्द का अर्थ ज्ञान या ज्ञान का साधन होगा । प्रसिद्ध चारों सहिताओ मे दयानन्द के मत से वेद शब्द केवल सहिता के अर्थ मे ही आयेगा । वेद शब्द को रूढ और यौगिक उभयविध समझ कर ही पाणिनि मुनि ने अष्टाध्यायी ( ६।१।२०३ ) सूत्र में वृषादिगण में पठित वेदशब्द मन्त्रब्राह्मणात्मक भाग मे रूढ किया है । उच्छादिगण में आया वेद शब्द यौगिक है । इडा, रन्ता, आदि शब्द, यजुर्वेद वाजस- ने ० स ० ( ८।४३ ) मे गौ अर्थ मे रूढ है । सातवलेकरने भी अपने वेदभाष्य में रूढ, यौगिक, योगरूढ, शब्दों को मानकर ही व्याख्यान किया है । महाभारत समालोचना नामक अपने ग्रन्थ के ११७ पृष्ठ पर उन्होने कहा है कि हमारा भी यह मत है कि इन शब्दों का यौगिक भी अर्थ सम्भव है किन्तु वह अर्थ आध्यात्मिक तत्त्व विचार में ही उपयुक्त है, ऐतिहासिक तत्त्व की खोज मे नहीं । निरुक्तकार ने भी आध्यात्मिक अर्थ को सूचित करने के लिये ही यौगिक अर्थ माना है । तत्तत्स्थलो पर निरुक्तकार ने भी ऐतिहासिक तात्पर्य वर्णन किया है । जो आर्यसमाजी लोग वेद मे रूढ अर्थ नही है ऐसा मानते हैं, वे ही स्वार्थ सिद्धि के लिये रूढ अर्थ स्वीकार करने में नही हिचकते । 'हस्तग्राभस्य दिधिषो ' (ऋ ० स ० १० १८१८ ) पूनर्भुवापर पति' ( अथर्व ० ९/ ५ / २८) आदि मन्त्रो में मृतपति के विशेषणभूत दिधिषु पद के गर्भाधान कर्ता इस यौगिक अर्थ को छोडकर अमरकोष के सहारे विशेष्य पद की सम्भावना न रहने पर भी रूढ अर्थ स्वीकार करते है । तुलसीराम नामक एक आर्यसमाजी ने पुनर्भूशब्द का रूढ अर्थ माना है । उसी तरह बुद्धदेव विद्यालङ्कार ने भी मरुत् सुक्त में नरो नेतार इस अर्थ को छोडकर मनुष्य इस रूढ अर्थ को ही माना है । जो लोग ऐसी शङ्का उठाते है कि ' यदि वेद में वशिष्ठ आदि शब्दो को सज्ञार्थक माना जायगा तो वेद की पुराणता (प्राचीनता ) दब जायगी' उनका यह मत निर्मूल है क्योंकि परमात्म ज्ञानरूप वेद में भविष्य की दृष्टि से कुछ' वर्णन कर देना कोई दोषावह बात नही है |। त्रिकाल को जो हस्तामलकवत् जानता है उसके लिये प्राचीन नवीन कुछ मूल्य नहीं रखता । वेदान्त दर्शन ( १।३।२८) सूत्र के भाष्य मे ' अभोष्ट कार्य का अनुष्ठान करते हुए उसके अर्थ का पहले स्मरण करके बाद में उस वस्तु या कार्य का २७७
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वेदार्थपारिजातः २२१० वैदिकाः शब्दा मनसि प्रादुर्बभूवुः । पश्चात्तदनुगतानर्थान् ससर्जेति गम्यते । तथा च श्रुतिः- स भूरिति व्याहरत् स भूमि- मसृजत्' ( तै ० ब्रा० २| २| ४| २) इत्येवमादिका भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यः भूरादिलोकान् सृष्टान् दर्शयति' इति शाङ्करभाष्यानुसारेण तत्समाधानसम्भवात् । अथर्ववेदे — ' सुहवमग्ने कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्रं मृगशिरः शम् आर्द्रा पुनर्वसू सूनृता चारुपुष्यो भानुराश्लेषा अयन मघा भे १७।७।२ पुण्य पूर्वाफाल्गुन्यौ चात्र हस्त चित्रा शिवा स्वाति सुखोमे अस्तु ' राधे विशाखे सुहवानुराधा ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्टमूलम्' ( अथर्व ० १ ९ / ७/ ३), 'अन्न पूर्वा रासता मे अषाढा ऊर्ज देवी उत्तरा आवहन्तु अभिजिद मे रासता पुण्यमेव श्रवण श्रविष्ठाः ( धनिष्ठा ) कुर्वता सुपुष्टि' ( अथर्व० १ ९/ ७/४ ), 'आ मे महत् शतभिषक् वरीय आ मे द्वया प्रोष्ठपदा ( पूर्वाभाद्र- पदाउत्तराभाद्रप्रदा । सुशर्म आ रेवती चाश्वयुजा ( अश्विनी । भग मे आ मे रयिं भरण्य आवहन्तु ' ( अथर्व ० १९ ।७।५) इत्यादि- मन्त्रेषु क्रमेण अष्टाविंशति ( २८ ) नक्षत्राणा रूढनाममिः कल्याणार्थ प्रार्थना दृश्यन्ते ॥ 'शन्नो ग्रहाश्चान्द्रमसा शमादित्यश्च राहुणा । शं नो मृत्युर्धूमकेतु.' ( अथर्व० १ ९/ ९ | १० ) इत्यादी रूढनाम्नैव ग्रहप्रार्थनापि । ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाया दयानन्देन यथा पूर्वकाले सूर्यचन्द्रादिरचन कृतमिति व्याख्यातम् । तत्र भूतकालप्रयोगेण --- श्रीशङ्कराचार्येण च — 'यथा पूर्वस्मिन् कल्पे सूर्यचन्द्रम' प्रभृति जगत् क्लप्त तथास्मिन् कल्पे परमेश्वरोऽकल्पयत्' इत्यर्थः कृतः । अत्र सर्वत्र रूढाना शब्दाना प्रयोगः कृतः । भूतकालप्रयोगेणेतिहासश्च वर्णितः । 'नासदासीनो सदासीत्तदानी (ऋ० स० १११२९| १ ), (तम आसीत्तमसा गूढमग्रे अप्रकेतसलिलं सर्वम् आ (आसीत्) इदम्' इत्यत्र भूतकालिकवृत्तान्तवर्णन स्पष्टमेव । 'अग्ने देवेषु प्रवोचः' इति मन्त्रस्य भाष्ये स्वामिदयानन्देन -',लिखितम् हे अनन्तविद्यामय जगदीश्वर देवेषु सृष्ट्यादिजातेषु अग्निवाय्वादित्याङ्गिरस्तु मनष्येषु प्रवोचः प्रोक्तवान्' इति । अत्र तेन ऋषिकर्तृकवेदग्रहणमङ्गीकृतम् । यद्यपि अङ्गिरसमपहाय अग्न्यादयो देवता उक्ता न ऋषयस्तेषा- मृषीणामप्रसिद्धत्वात् । 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता.., (ऋ० स० १०।१ ९ ०३) इत्ययं मन्त्र सूर्यचन्द्ररचनानन्तर निर्मितः पूर्व वा? तथैव अष्टाविंशतिनक्षत्राणा निर्माणानन्तरम् अथर्ववेदो निर्मित पूर्वं वा? (ऋ० स० ११२७/४ ) मन्त्रा अप्यग्न्यादि- निर्माण या सम्पादन किया जाता है यह बात हम सभी के अनुभूत है । ऐसे ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को भी सृष्टि के पूर्व वैदिक शब्दो का मन में पहले स्मरण हुआ बाद में उन्होने उन उन वस्तुओ को बनाया, ऐसा ज्ञात होता है । श्रुति भी इसका समर्थन करती है । ब्रह्मदेव ने पहले भू शब्द का स्मरण तथा उच्चारण किया बाद मे पृथ्वी की रचना की । ( तै० ब्रा० २।२४।२ ) इस तरह किसी वस्तु को सृष्टि के पूर्व मन में उसका उच्चारण करना पश्चात् भू आदि लोको की सृष्टि बतायी गयी है । इस शाङ्करभाष्य के बल पर उक्त शका का समाधान हो जाता है । अथर्ववेद के १७/७/२, १ ९/ ७/ ३, १ ९/ ७/ ४, ५, १० मन्त्रो में ग्रहो नक्षत्रो के रूढ नाम से ही प्रार्थना की गयी है । ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका मे श्री दयानन्द ने 'यथापूर्वमकल्पयत्' मन्त्र का ' जैसे पूर्व समय मे सूर्य चन्द्र आदि को बनाया था' ऐसा अर्थ किया है । वहाँ भूतकाल के प्रयोग से श्री शङ्कराचार्य ने भी जैसे पूर्व कल्प मे सूर्य चन्द्र आदि जगत् को बनाया था उसी तरह ' परमेश्वर ने इस कल्प मे भी बनाया ऐसा अर्थ किया है । यहाँ सब जगह रूढशब्दो का ही प्रयोग किया है । भूतकाल के प्रयोग से इतिहास भी बताया है । 'नासदासीनो सदासीत्तदानीम् (ऋ० स० १।१२ ९ ।१ ) आदि मन्त्रो मे भूतकालिकवृत्तान्तवर्णन स्पष्ट ही है । 'अग्ने देवेषु प्रवोच" इस मन्त्र के भाष्य में स्वामी दयानन्द ने लिखा है कि है अनन्तविद्यामय जगदीश्वर! 'आपने देवताओ को तथा ' अग्निवायु' सूर्य अङ्गिरा आदि( मनुष्यो को सृष्टि/ का रहस्य) बतलाया । यहाँ उन्होने ऋषिकर्तृक वेदज्ञान का स्वीकार? कर लिया है । सूर्याचन्द्रमसौ धाता ऋ० सं० १० १ ९ ०१३ यह मन्त्र सूर्य चन्द्र की सृष्टि के बाद का है या पहले का उसी तरह अठाईस? नक्षत्रों के निर्माण के बाद अथर्ववेद बनाया पहले मन्त्र भी अग्नि आदि ऋषियों के वेदज्ञान के पूर्व के बने है या बाद के
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वेदार्थपारिजातः २२११ ऋषोणा वेदग्रहणात् प्राड् निर्मिता पूर्व वेति पर्यनुयोगे भविष्यद्दृष्ट्या समाधानं चेत्तथैव वशिष्ठादीनामपि 1 भविष्यद्दृष्ट्या वर्णनेन समाधान भवत्येव । पुनर्योगिकताव्याजेन मन्त्रार्थबाध किमर्थ क्रियते? किञ्च, केवलयौगिकत्वाङ्गीकारेण सहस्रशो व्याख्यातार सहस्राणि व्याख्यानानि करिष्यन्ति । अध्याहृताना शब्दाना- नामध्याहारे परस्पर विवदिष्यन्ते । लाहौरनगरस्य दैनिकमिलापपत्रे चमूपतिमहाशयस्य प्रियरत्नमहाशयस्य च परस्परं विवादो दृष्टचर एव, अतियौगिकार्थकरणसम्बन्धिन. परस्परमुपालम्भात् । तथा सति वेदे यौगिकतामालम्ब्य भर्तृपदस्य भ्रात्रर्थत्व भ्रातृपदस्य भर्त्रर्थत्व च स्याताम् । तथैव पितृपदस्य पत्यर्थता पतिशब्दस्य पित्रर्थता च स्यात् । भ्रातृर्भागनीपदाना वेदे पत्न्यर्थता च स्यात् । तथा सत्यव्यवस्थया सर्वत्र वेदार्थेऽराजकर्तव भविष्यति । तथा च वेदाना वेदत्वमेव न स्थास्यति । मानवबुद्धीना नृत्यशालामात्र वेदो भविष्यति । वस्तुतस्तु यौगिकताव्याजमनाश्रित्य सामाजिका वेदेपु न स्वसिद्धान्तं साधयितु प्रभवन्ति । वेदेषु सर्वत्र : ' पौराणिका भावा उपलभ्यन्ते । तदपाकरणायैव सामाजिकानामयमसफल प्रयत्न । पुराण सर्वशास्त्राणा प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गता. ||' ( मत्स्यपुराणे ३| ३-४ तथा ५३| ३ ब्रह्माण्डपुराणे १| १| १ | ४०-४१ ) अस्मिन् वचने पुराणज्ञानस्य स्पष्टमेव वेदकालिकत्वमुक्तम् । तथाङ्गीकारे सामाजिकानां सिद्धान्ताः खपुष्पायिता एव भविष्यन्ति । श्रुतिषु बलात्काराय वेदेषु यौगिका एव शब्दाः सन्तीत्यपसिद्धान्तस्य प्रचार । अनया रीत्या जैनैर्बोद्धैर्मौहम्मदे क्रैस्तवैरपि यौगिकत्वमाश्रित्य वेदैरेव स्वसिद्धान्ताः साधयिष्यन्ते । धर्मकीर्तिना 'अग्निहोत्र जुहुयादि'त्यस्य श्वमास भक्षयेदित्यर्थः कल्पित एव । दयानन्देनापि सौविध्यप्रियाणा सौविध्यसम्पादनायैव नादृशा अर्था परिकल्पिता । आधुनिकाना सामाजिकाना नेदानी दयानन्दीयेष्वर्थेषु सौविध्यं प्रतीयते । तत एव येषा मन्त्राणा दयानन्देन नियोगपरत्व व्याख्यातम्, तेषामेवेदानीन्तनैः इत्यादि प्रश्नो का समाधान यदि भविष्यकाल की दृष्टि से देना है तो उसी तरह वशिष्ठ आदि ऋषियो को भी भविष्यकाल की दृष्टि से ही समझना चाहिए । फिर वेद मे यौगिक शब्द ही प्रयुक्त होते है इस बहाने से मन्त्रो के अर्थ में बाधा डालना कहाँ तक उचित है? और भी, केवल यौगिक शब्द ही वेद में त्रयुक्त हुए है ऐसा मानकर हजारो व्याख्याता हजारो व्याख्यान करेगे । अध्याहृत होनेवाले शब्दो के अध्याहार को लेकर आपस में लड़ेगे । लाहौर से प्रकाशित होनेवाले दैनिक पत्र ' मिलाप' मे श्री चमूपति तथा श्री प्रियरत्न का आपसी कलह प्रसिद्ध हो हैं । फिर अतियौगिक अर्थ करने से सम्बद्ध विवाद का एक दूसरे का उलाहना सर्व विदित ही है । ऐसा होने पर वेद में यौगिकता के प्रश्न के सहारे पति पद का भाई और भाई पद का पति अर्थ होने लगेगे । उसी |तरह पिता का पति और पति का पिता अर्थ भी सम्भव होगा । भाई बहिन शब्दो का वेद में पत्नी अर्थ होने लगेगा ऐसी अव्यवस्था से सर्वत्र वेद के अर्थ मे अराजकता ही फैल जायगी । तब वेद का महत्त्व नही रहेगा । वेद मानव की बुद्धि का मात्र नाच घर बनकर रह जायगा । सच्चे अर्थो मे यौगिक शब्द का बहाना लेकर आर्यसमाजी वेदो मे अपना सिद्धान्त सिद्ध नही कर पायेगे । वेदो मे सर्वत्र "पौराणिक आख्यानो के भाव वर्णित मिलते है । उसे दूर करने का ही आर्य समाजियो का यह अधूरा प्रयास है ॥ पुराण सर्व- " (,, अनन्तर च व वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गता । मत्स्यपुराण ३1३-४ ५३१३ ब्रह्माण्डशास्त्राणा प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम् । | | | )पु० १ १ १ ४०-४१ इस वचन मे साफ तौर पर पुराणज्ञान को वेद का तिलक माना गया है । ऐसा मानने पर आर्यसमाजियो का 'सिद्धान्त आकाशकुसुम अर्थात् असंभव हो जाते है । वेदो की अनादिमिद्ध महत्ता को धूमिल करने के हेतु वेदो में केवल यौगिक शब्द ',,,ही प्रयुक्त हुए है यह अपसिद्धान्त प्रचारित किया जा रहा है । इस दुर्नीति के चलते जैन बौद्ध मुसलमान ईसाई सभी यौगिकता - ' 'का बहाना पाकर वेदो से ही अपना अपना सिद्धान्त सिद्ध करने को उद्यत हो जायेंगे । धर्मकीर्ति ने अग्निहोत्रं जुहुयात् इस श्रुति का तात्पर्य कुत्ते का मास खाओ ऐसी कुकल्पना करने की दुश्चेष्टा की ही है । दयानन्द ने भी आरामपसन्द लोगो को सुविधा देने के लिए ही ऐसे अर्थ सम्पादन का ढग अपनाया है । वर्तमान आर्य समाजियो को अब दयानन्द के फरमाये अर्थों में कोई सुविधा नहीं
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२२१२ वेदार्थपारिजातः सामाजिकैर्विधवाविवाहपरत्वं व्याख्यायते । यथा सनातनधर्मविरोधाय स्वामिदयानन्देन यौगिकत्वमाश्रित्य यथेष्टोऽर्थः कृतस्तथैव तत्खण्डनायापि तादृश: प्रयासो भविष्यति । किञ्च, सर्वत्र वेदेषु रूढि - योगरूढिशब्दानामनङ्गीकारे यौगिकाः शब्दा विशेषणभूता एव भविष्यन्ति । कश्चिद् विशेष्यो न भविष्यति । सर्वत्र रूढा योगरूढा वा शब्दा एव विशेष्यतामुपगच्छन्ति । यौगिकास्तु शब्दा गुणवाचिनः क्रिया- वाचिनो वा सर्वदा विशेषणभूता एव भवन्ति । तथा सति वेदाना कश्चिदपि व्यवस्थितोऽर्थं एव न भविष्यति । तदागोशब्दस्य गमनशीलार्थत्वेन सर्पा वृश्चिका सिहा व्याघ्राश्च गोशब्दार्था भविष्यन्ति । तस्माद्विशेष्यत्वाय व्यवस्थितार्थस्वीकाराय च रूढा योगरूढाश्च शब्दा अङ्गीकर्त्तव्या एव । अन्यथा आर्यसमाजिनेतारोऽप्यध्वव्यापित्वादश्वा गमनशीलत्वाच्च गावो भवि- व्यन्ति । सूर्यशब्दस्य गमनशीला मनुष्या पशवश्चार्था पशुमनुष्यादिशब्दानामर्था मनुष्या भविष्यन्ति । स्वामिदयानन्देन सस्कारविधिग्रन्थे वेदारम्भसस्कारप्रसङ्गे ११२ पृष्ठे यौगिक-योगरूढ-रूढभेदेन शब्दाना त्रैविध्यस्वीकारात् पाचकयाजकादि- शब्दा यौगिकाः पङ्कजादिशब्दा योगरूढाः, धनवनादिशब्दा रूढा इत्यङ्गीकृतत्वात् तेषा शब्दाना वेदेऽपि दर्शनाद् वेदेषु रूढाः शब्दा न भवन्तीति मिथ्यैवोक्ति' । ' धन न स्यन्द्रम्' (ऋ ० सं ० १०।४२।५ ), ' वनेषु वाय:' ( वा० सं० ४।३१ ) योगरूढास्तु दयानन्देनापि वेदेऽङ्गीकृता एवेत्युक्तमेव । पारिभाषिकग्रन्ये १३ पृष्ठे २२ परिभाषाया तेनैवोक्तम् - 'उणादि प्रातिपदिक अव्युत्पन्न होते है । अर्थात् उनका प्रकृति, प्रत्यय, कारक आदि से यौगिक यथार्थ अर्थ नही लगता । अर्थात् उणादि शब्द बहुधा रूढि होते है । ' एवं च सत्युणादिशब्दा वेदेऽपि दृश्यन्त एवेति को नाम वक्तु प्रभवति वेदे रूढा योगरूढाश्च शब्दा न सन्तीति । तदभावे वेदसम्बन्धि- निघण्टुःशब्दकोषो निरर्थक एव स्यात् । निघण्टुग्रन्थे वेदगतरूढयोगरूढशब्दपर्यायाणामेव सङ्ग्रहः कृतोऽस्ति । यौगिकत्व- मात्राङ्गीकारे केचनापि शब्दा नियतवस्तुवाचका कथमपि न सम्भविष्यन्तीति विदाङ्कुर्वन्तु विपश्चितः । यथाऽमरकोषो मिल पा रही है । यही कारण है कि जिन मन्त्रो को दयानन्द ने नियोग के लिये उपयोग बतलाया था उन्ही मन्त्रो को वर्तमान आर्यसमाजी लोग विधवा विवाह के लिये उपयोग करने लगे है । सनातनधर्म के विरोध के लिये स्वा० दयानन्द ने वेदो मे यौगिक शब्द का सहारा लिया है उनके खण्डन के लिये भी वैसा ही प्रयत्न सम्भव है । और भी, सर्वत्र वेदो मे रूढि -योगरूढि शब्दो को न मानने पर यौगिक शब्द विशेषण होकर रहेंगे कोई विशेष्य नही रहेगा । सर्वत्र रूढ या योगरूढ शब्द ही विशेष्य बनेगे । यौगिक शब्द गुणवाचक या क्रियावाचक होकर सर्वदा विशेषण रहेंगे । ऐसी स्थिति में वेदो का कोई व्यवस्थित अर्थ ही नही हो पायेगा । तब गो शब्द का योगार्थ गमनशीलता को मानकर साप विच्छू सिंह बाघ आदि भी गो शब्द के अर्थ होने लगेगे । इस अनवस्था को रोकने के लिये विशेष्य शब्दो की स्थापना से व्यवस्थित अर्थ करने हेतु रूढ और योगरूढ शब्दों की सत्ता भी वेद मे माननी होगी । नही तो, आर्य समाजी नेता भी रास्ता चलने के कारण घोडे और गतिशील होने के कारण बैल कहे जायेगे । सूर्य का अर्थ मनुष्य और पशुपक्षी मनुष्य सभी मनुष्य कहे जायेगे । सस्कारविधि नामक ग्रन्थ के ११२ पृष्ठ पर स्वा० दयानन्द ने भी विविध शब्द मानकर पाचक याजक आदि यौगिक, पङ्कज योगरूढ, धन वन आदि रूढ मान रखा है वे शब्द वेद मे भी आये है फिर वेदो मे रूढ शब्द न मानना यह एक अनर्गल प्रलाप है । योगरूढ तो दयानन्द ने भी माना है यह कहा जा चुका है । पारिभाषिक नामक ग्रन्थ के १३वे पृष्ठ २२वी परिभाषा में उन्होने कहा है कि-' उणादि प्रातिपदिक अव्युत्पन्न अर्थात् उनका प्रकृति प्रत्ययकारक आदि से यौगिक यथार्थ अर्थ नही लगता । अर्थात् उणादि शब्द बहुषा रूढ होते हैं ।? 'वेद मे भी पाये जाते हैं तब वेद मे रूढ योगरूढ शब्द नही होते है ऐसा कौन विचारशील कहेगा ऐसा न होते है । उणादिशब्द , योगरूढ शब्दो के पर्यायशब्दो का संग्रह किया गया है । यौगिक मात्रहोने पर वैदिक निघण्टु-कोष व्यर्थ हो जायगाT । निघण्टुमे रूढ भी शब्द नियतवस्तुवाचक नहीं होगा 1 और कितना अनिष्ट होगा इसे विद्वान् समझे और प्रतीकार करे | अमरकोषके आग्रहलौकिकपर शब्दोंकोई
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वेदार्थपारिजातः २२१३ लौकिकशब्दाना सङ्ग्रहः, तथैव निघण्टुर्वेदिक शब्दाना सग्रह । तत्तदर्थेषु नियतत्वादेवामरकोपगताः शब्दा रूढा अङ्गी- क्रियन्ते यथा, तथैव नियतार्थ. बोधकत्वेन निघण्टुगता वैदिका शब्दाः अपि रूढा एव मन्तव्या । यदि निघण्टुशब्दानां निर्वचनमात्रेण यौगिकत्व योगरूढत्व वा स्वीक्रियते तदा त्वमरकोषेपि तथैवाभ्युपगमापत्ति स्यात्, तदीयशब्दानामपि निर्वचनदर्शनात् । तथात्वेऽमरकोपस्य केवलरूढत्वस्याक्षेपो निरर्थक एव स्यात् । महाभाष्यकारैर्लोकेऽपि न सन्ति यदृच्छाशब्दा इत्युक्त्वा रूढशब्दाना सत्तैव निषिद्धा । अत एव भानुजोदीक्षितेन अमरकोषस्य व्याख्यारम्भे लिखितम् ' यद्यपि चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिरिति पक्षे सज्ञाशब्देषु व्युत्पत्तिर्नावश्यकी, तथापि शाकटायनाद्यभिमतत्रयीपक्षे व्युत्पत्ति' प्रदर्श्यते । एव लोके वेदे च रूढशब्दाना सत्त्वमसत्त्व च सममेव । तथा सत्यमरकोषस्य रूढिमात्रतारोपो व्यर्थ एव । अन्यथा सत्यार्थप्रकाश -स्वामि- दयानन्दगुरुकुलआर्यसमाजादिशब्दानामपि निर्वचन सम्भवत्येव, तथापि तेषा रूढत्वमेवाङ्गीक्रियते । केवलयौगिकत्वे तेषा पृथक्सत्तैव बाधिता स्यात् 1। वस्तुतस्तु साधुत्वप्रदर्शनायैव व्युत्पत्ति प्रदर्श्यते तत्र तत्र रूढशब्देष्वपि । अत एव व्युत्पत्तिनिमित्तार्थासम्भवे प्रवृत्तिनिमित्तोऽर्थं एव गृह्यते । लोके वेदे च सर्वत्रैव विशेषणभूता शब्दा प्रायेण यौगिका एव भवन्ति, विशेष्यभूताश्च रूढा - योगरूढा वा भवन्ति । तदेतत् सामाजिकेन भगवद्दत्तेनापि लिखितम्—“विशेषण यौगिक होते है' ( वैदिक वाङ्मय का इतिहास द्वितीय भाग, पृ० १४५ ), वेदो के शब्द यौगिक या योगरूढ होते है, इसीलिये विशेष्य विशेषण की रीति से विशेषण धात्वर्थमात्र ही होता है । वही विशेषण दूसरे स्थान पर स्वयं नाम अर्थात् योगरूढ बन जाता है ।' ( वही पृ० १५२) । पावक शब्दोऽग्निनामत्वेनामरकोषादिपु प्रसिद्ध । विशेष्यत्वे स एवार्थं । तद्यथा 'तस्मै पावक' (ऋ० स० १ | १२| ९ ) यदि पावकशब्द. कस्यचिद्विशेषणं स्यात्तदा व्युत्पत्तिलभ्यार्थक एव स्वात् । तद्यथा - 'समुद्रार्था याः शुचयः पाव-कास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु' (ऋ ० स० ७ ४ ९। २) । अत्र जलस्य विशेषणत्वात् पावकशब्दस्य पवित्रकारकत्वमर्थः । -- इन्द्रशब्द इन्द्रदेवताया रूढ । स एव विशेषणत्वेन प्रयुक्तो यौगिकवृत्या ऐश्वर्यार्थक एव भवति । तद्यथा–' इन्द्रेण गणेन सन्दिदृक्षसे' (ऋ ० स० १०६। ७) । निरुक्ते ( ४।१२ स्थले ) उद्धृता ऋक् । अत्रेन्द्रशब्दो मरुद्गणस्य विशेषणत्वेन प्रयुक्तः 1। का संग्रह है । निघण्टु वैदिक शब्दो का । जैसे अमरकोष के शब्द रूढ माने जाते हैं, वैसे ही निघण्टुगत वैदिक शब्द भी नियत (निश्चित) अर्थ के बोधक होने से रूढ ही माने जायेगे । यदि निघण्टु गत शब्दो को उनका निर्वचन होने मात्र से यौगिक वा योगरूढ मानेगे, तो अमरकोष के शब्द भी वैसे ही माने जायेगे । उनका भी निर्वचन व्याख्याकारो ने किया है । ऐसी स्थिति में अमरकोष मे केवल साठ शब्द है, ऐसा आक्षेप किस आधार पर होगा । महाभाष्यकार ने भी लोक में भी यदृच्छा शब्द नही है, ऐसा कह कर रूढ शब्दों की सत्ता को नही माना है । इसीलिये भानुजि दीक्षित ने अमरकोश की व्याख्या के आरम्भ मे लिखा है कि यद्यपि शब्दो की प्रवृत्ति चार प्रकार से होती है, इस पक्ष मे सज्ञा शब्दो की व्युत्पत्ति आवश्यक नही है, तथापि शाकटायन प्रभृति आचार्य शब्दो की त्रिविध प्रवृत्ति मानते है, अत तदनुसार यहा व्युत्पत्ति बताई जा रही है । इस तरह से लोक और वेद मे रूढ शब्दों की सत्ता और असत्ता की स्थिति समान है । इस तरह से अमरकोश पर उक्त आक्षेप व्यर्थ है । ऐसा न मानने पर सत्यार्थप्रकाश, दयानन्द, गुरुकुल, आर्यसमाज जैसे शब्दो का भी निर्वचन किया जा सकता है, किन्तु कोई ऐसा करता नही, उनका रूढ अर्थ ही सबको मान्य है । वास्तव मे रूढ शब्दो की भी साधुता को बताने के लिये व्युत्पत्ति बताई जाती है । लोक और वेद मे सर्वत्र विशेषण-भूत शब्द प्राय यौगिक ही होते है और विशेष्यभूत शब्द रूढ अथवा यौगिक माने जाते है । आर्यसमाजी भगवद्दत्त ने भी अपने इतिहास ग्रन्थ मे लिखा है कि विशेषण यौगिक होते है, इत्यादि । पावक शब्द अमरकोश प्रभूति में अग्नि का नाम है । वेद मे भी विशेष्य के रूप में इसका यही अर्थ होगा, किन्तु यदि यह किसी के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता, तब उसका अर्थ व्युत्पत्ति के आधार पर ही किया जायगा । ' समुद्रार्था' प्रभृति ऋङ्मन्त्र मे जल का विशेषण होने से यहाँ 'पावक' शब्द का अर्थ 'पवित्रता सम्पादक' होगा । निरुक्त में उद्धृत ' इन्द्रेण गणेन' इस मन्त्र मे इन्द्र शब्द मरुद्गण के विशेषण के रूप में प्रयुक्त है । यौगिक वृत्ति से इसको यहाँ ऐश्वर्यार्थक माना गया है । स्वसृ शब्द
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वेदार्थपारिजातः २२१४ स्वसृशब्दो भगिन्यर्थे रूढ । विशेषणत्वेन प्रयुक्तस्तु यौगिकार्थक एव भवति । तद्यथा -'सनात्सनीला अवनीरवाता व्रता रक्षन्ते अमृताः सहोभि । पुरु सहस्रधा जनयो न पत्नीर्दुवस्यन्ति स्वसारो अह्रुयाणम् ॥ ' ( ऋक् स० १ १६ २ १० ) अत्राङ्गुलि- नामत्वेन रूढस्य 'अवनी' इत्यस्य विशेषणत्वेन पत्नी पालयित्र्य स्वसार. स्वयमेव सरन्त्य इति यौगिकोऽर्थो भवति । तथैव पुनर्भूशब्दो युवतीशब्दश्च विशिष्टस्त्रीषु रूढौ । ऋग्वेदसहिताया ( १ / ६२/ ९ ) स्थले उषसो विशेषणत्वेन प्रयुक्तौ पुनः पुनः प्रतिदिवस जायमाने युवतीभिरिचते अथवा नवयौवनोपेते इति यौगिकार्थकौ भवतः । हस्तिशब्दोऽपि गजार्थे योगरूढः । 'हस्ती मृगणा' ( अथर्व ० ३| २| ६ ) अत्र योगरूढार्थ एव गृहीतः । 'अशु दुहन्ति हस्तिनः' (ऋ० स० ३।३६/ ७) इत्यत्र केवल- यौगिकत्वेन प्रशस्तहस्तानामृत्विजामर्थे प्रयुक्त । योषित्शब्दोऽपि स्त्रिया रूढो विशेषणत्वेन यौगिकार्थो भवति । यथा -'शुद्धा. पूता योषितो यज्ञिया इमा आप:' ( अथर्व० ११ | १ | १७) अत्रापा विशेषणत्वेन योषितः सेवनार्हा इत्यर्थो भवति । तस्माद्वेदे यौगिका रूढा योगरूढा यौगिकरूढाश्चेति चतुविधा अपि शब्दा. सन्त्येव । वस्तुतस्तु मन्त्रार्थनिर्णयाय पुराणेतिहासव्याकरणनिघण्टुकोपब्राह्मणभागविनियोगप्राचीनलोकव्यवहारमन्त्र- भागदेवतावादस्मृतिदर्शननिरुक्तादय सर्वेऽप्यपेक्षिता भवन्ति । आधुनिकाः सामाजिकब्रुवास्तु पुराणादिप्रसिद्धार्थनिराकरणाय स्वेच्छया क्वचिद् ब्राह्मणभागं क्वचिच्च निघण्टुमाश्रयन्ते । वैदिककोष निघण्टुमपहाय कथं वैदिकार्थनिर्णयः स्यादिति च जल्पन्ति । वस्तुतस्तु वेदाधीना निघण्टवो न निघण्टुवधीना वेदाः । निघण्टवोऽप्यन्यार्थानामुपलक्षणा एव । तत्रेयत्तावधारणं न युक्तम् । नहि सर्वेषा वैदिकशब्दाना निघण्टुषूपलम्भो भवति । अनेकासा संहिताना कालक्रमेण लोपस्तथा निघण्टूनामपि लोपः सम्भवति । यास्कसङ्गृहीत निघण्टावपि तादृगा अनेके शब्दा सन्ति येषा सामाजिकाभिमतासु चतसृष्वपि सहितासु नोपलम्भो भवति । भगिनी के अर्थ में प्रयुक्त है, किन्तु इसको जब विशेषण के रूप में प्रयुक्त किया जायगा तब इसका भी यौगिक अर्थ करना पडेगा । 'सनात्सनीला' प्रभृति मन्त्र मे अगुली के नाम से प्रसिद्ध ' अवनी' शब्द के विशेषण के रूप में प्रयुक्त 'स्वसृ ' शब्द का ' स्वयमेव सरन्त्य.' यह यौगिक अर्थ किया जाता है । इसी तरह से पुनर्भू और युवती शब्द विशिष्ट प्रकार की स्त्रियो के लिये रूढ है | ये ही शब्द ऋग्वेद के मन्त्र मे विशेषण के रूप में प्रयुक्त होने पर बार-बार प्रतिदिवस जायमान तथा युवतियो के द्वारा सचित अथवा नवयौवन युक्त इन यौगिक अर्थो को अभिव्यक्त करते है । हस्ति शब्द गज के अर्थ मे योगरूढ है । 'हस्ती मृणालम्' इस अथर्ववेद के मन्त्र में इसी अर्थ में यह प्रयुक्त है, किन्तु ऋग्वेदसहिता के मन्त्र मे ( ३ | ३६ | ७ ) यह केवल यौगिक अर्थ 'प्रशस्त हस्तवाले ऋत्विक्' में प्रयुक्त है ( योषित् शब्द स्त्री के लिये रूढ है, किन्तु विशेषण के रूप में प्रयुक्त होने पर यौगिक अर्थ को प्रकट करने लगता है । अथर्ववेद ( ११।१।१७ ) के मन्त्र मे जल के विशेषण के अर्थ मे, अर्थात् सेवन योग्य जल, इस अर्थ में प्रयुक्त माना जाता है । इस लिये वेद मे यौगिक, रूढ, योगरूढ और यौगिकरूढ ये चारों प्रकार के शब्द उपलब्ध होते है । इसमें किसी को कोई सन्देह नही रहना चाहिये । वस्तुत. मन्त्रो के अर्थ का निर्णय करने के लिये पुराण, इतिहास, व्याकरण, निघण्टु, कोश, ब्राह्मणभाग का विनियोग, ,,,,,प्राचीन बौद्ध के व्यवहार मन्त्रभाग देवतावाद दर्शन स्मृति निरुक्त प्रभृति सभी शास्त्रो की अपेक्षा रहती है । आधुनिक आर्य-समाजौ पुराण आदि में प्रसिद्ध अर्थ का खण्डन करने के लिये मनमानी करके कही ब्राह्मणभाग और कही निरुक्त-निघण्टु आदि का ,सहारा लेते हैं । वेद के कोश निघण्टु को छोडकर वेद के अर्थ का निर्णय कैसे हो सकता है ऐसा उनका कहना है । वस्तुत निघण्टु वेद के लिये है, वेद निघण्टु के लिये नही है । निघण्टु भी अन्य अर्थों के उप-लक्षण ही है, क्योकि निघण्टु मे बताये अर्थ ही होगे, ऐसी सीमा नही बाँधी जा सकती । सभी वैदिक शब्द वेद में उपलब्ध होते भी नही । वेद की अनेक संहिताएँ है । इनसे सम्बन्ध रखने वाले निघण्टु भी अनेक होगे । जैसे कालक्रम से अनेक सहिताओं का बोध हो गया, उसी तरह से निघण्टुओ के लोप की भी सम्भावना है ही । यास्क के द्वारा सगृहीत निघण्टु में भी ऐसे अनेक शब्द मिलते है, जिनको सामग्रियों के द्वारा स्वीकृत चार सहिताओं" में उपलब्धि नही होती ।
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वेदार्थपारिजातः २२१५ सनातनधर्मालोके आष्ठा ( १६ ) दिड्नामसु शोकी ( १७ ) रात्रिनामसु, वलिशान ( १।१० ) मेघनामसु, वेकुरा · ( १।११ ) वाड्नामसु, सर्णीकम्, स्वृतीकम्, वुर्बुरम्, यहः, भविष्यत् इति जलस्य पश्चनामानि ( १।१२ ) मल्मलाभवन ( १।१७) इति ज्वन्नाम करन्ती । कर्मनाम, साचीवित् ( २।१५) क्षिप्रनाम, निघृष्वः ( ३२ ) ह्रस्वनाम । निघण्टुगतान्येतानि नामान्या-र्यसमाजाभिमतासु चतसृष्वपि सहितासु नोपलभ्यन्ते । यास्कीयनिरुक्तसन्निविष्टनिघण्टु कस्याः सहिताया इति न स्पष्ट विज्ञायते । वेदेषु निघण्टुनिर्दिष्टार्थव्यतिरिक्तोऽर्थ एव न भवतीति न वक्तु शक्यते । निघण्टुग्रन्थे विग इति मनुष्यनामेत्युक्तम्, पर वेदे विश इत्यस्य गण प्रजा वाऽर्थो दृश्यते । 'मानुषीणा विशा देवीनामुत' ( अथर्व २०।११।२), ' देवीविश ' (वा० स ० ६७ ), 'देवीविशो मानुषीश्च' ( वा० स० १७/८६ ), ' मरुतो देवविश ' ( शतपथब्राह्मणे २/५/१/२), 'यदि न घष्टुरी विशः इत्यस्य मनुष्य एवार्थ. स्यात्तदा 'मानुषीणा विशा मानुषीविशश्च' उभयत्र मनुष्यशब्दस्य वैयर्थ्यमेव स्यात्, विश. शब्देनैव तत्कार्यसिद्धेः । 'दैवीश्च विश ', 'दैवीना विशाम्' इत्यत्र विश इत्यस्योपादानं व्यभिचरति च । ( अथर्व ० २०/११/२) इत्यत्र उत शब्देन यजुः १७।८६ इति मन्त्रे च शब्देनोभयोः परस्पर भेद एव सिद्धयति । अतो विश इति शब्दस्य निघण्ट्वनिर्दिष्टोऽपि गणः प्रजा वाऽर्थो भवत्येव । निघण्टौ १।१४ इत्यत्र ब्रध्नशब्दस्य अग्वोऽर्थ उक्त इति स्वामिदयानन्दस्य निघण्टुग्रन्थस्य शब्दानुक्रमणिकाया ' ४८ पृष्ठे स्पष्ट दृश्यते । दयानन्देनैव च मत्यार्थप्रकाशे ८ समुल्लासे १४३ पृष्ठे ब्रध्नशब्दस्य सूर्य इत्यर्थो लिखित' । न केवल- मेतावदेव, किन्तु तत्रैव ११ समुल्लासे १७४ पृष्ठे निघण्ट्वनुसारेणैव कृतस्य मैक्समूलरोक्तस्यार्थस्य खण्डनमपि कृतम् । 'युञ्जन्ति ब्रघ्नम्' (ऋ० स ० १ | १६ | १ ) इति मन्त्रस्य मैक्समूलरेणाश्वोऽर्थ कृत, एतदपेक्षया सायणोक्त. सूर्य एवार्थो युक्तः । अस्य शब्दस्य समीचीनस्त्वर्थः परमात्मैव । ऋग्वेदभाष्यभूमिकाया द्रष्टव्यं दयानन्दभाष्यम् । ऋग्वेदभाष्यभूमिकाया १७० पृष्ठे चितिघण्टा अश्वम्यापि ब्रध्नारुषी नामनी पठिते । परन्त्वस्मिन् मन्त्रे तद् घटना नैव सम्भवति, शतपथादिव्याख्यान-विरोधात्, मूलार्थविरोधात्, एकशब्देनानेकार्थग्रहणाच्च । एवं सति भट्टमोक्षमूलरैर्ऋग्वेदस्य इङ्गलैण्डभाषया व्याख्याने यद् अश्वस्य पशोरेव ग्रहणं कृतं तद्भ्रान्तिमूलकमेव, सायणाचार्येणास्य मन्त्रस्य व्याख्याने आदित्यस्य ग्रहणात् । एकस्मिन्नशे तस्य व्याख्यानं सम्यक्कृतमस्ति, परन्तु न जाने भट्टमोक्षमूलरेणायमर्थ आकाशाद्वा पातालाद्वा गृहीत इति । तथैव भ्रान्तिनिवारणनामके ग्रन्थे शताब्दीसस्करणे ८८२ पृष्ठे महेशप्रसादस्योत्तरं प्रयच्छता दयानन्देन लिखितम्— यद्युच्येत सनातनधर्मालोक मे निघण्टु मे सगृहीन ऐसे शब्दो का सग्रह किया गया है, जिनकी आर्यसमाजी अभिप्रेत चार सहिताओ में से, स्थिति नही है । यास्क के निरुक्त मे सन्निविष्ट निघण्टु किस सहिता का है यह भी स्पष्ट नही है । वेदो मे निघण्टु निर्दिष्टमे गणअर्थअथवा ,, भिन्न अर्थ नही होता ऐसा भी नही कहा जा सकता । निघण्टु मे विश शब्द का अर्थ मनुष्य किया गया है किन्तु वेद प्रजा भी इसका अर्थ है । अनेक उदाहरणो मे यह सिद्ध होता है कि विश शब्द के निघण्टु निर्दिष्ट अर्थ के अतिरिक्त उक्त अर्थ भी होते है । से भी स्पष्ट है । निघण्टु मे ब्रह्म शब्द का अर्थ अश्व किया गया है, यह बात स्वामी दयानन्द के निघण्टु की शब्दानुक्रमणिकामे निघण्टु के आधार पर, दयानन्द ने ही सत्यार्थप्रकाश मे ब्रह्म शब्द का अर्थ सूर्य किया है । केवल इतना ही नही किन्तु उसी ग्रन्थ मैक्समूलर ने अश्व किये गये मैक्समूलर के अर्थ का खण्डन भी किया गया है ॥ 'युञ्जन्ति ब्रघ्नम्' इस मन्त्र के ब्रह्म शब्द का अर्थ है । इस शब्द का सही अर्थ तो परमात्मा ही होता है । है । सायण ने इसका अर्थ सूर्य, किया किया है वही अधिक उपयुक्त के लिये भी ब्रह्म स्वामी दयानन्द का यह कथन ऋग्वेदभाष्यभूमिका मे भी पाया जा सकता है । वहाँ वे कहते है कि निघण्टु मेऔरअश्वमूल के प्रकरण से, नाम मिलता है । परन्तु इस मन्त्र में यह अर्थ घटित नही होता क्योकि यह अर्थ शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या अश्व का पशु भी असबद्ध है । एक शब्द के अनेक अर्थ होते है । ऐसी स्थिति मे भट्ट मोक्षमूलर ने ऋग्वेद के अग्रेजी अनुवाद मे , अर्थ किया है वह भ्रान्तिमूलक हैं । सायण ने यहाँ पर आदित्य अर्थ लिया है । एक अश मे यह सहीनामकहै । ग्रन्थकिन्तुके शताब्दीभट्ट मोक्षमूलरसस्करण -, -ने अर्थ किस आकाश पाताल से निकाला कुछ पता नही चलता । इसी तरह से भ्रान्तिनिवारक
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२२१६ वेदार्थपारिजातः निघण्टुग्रन्थस्थेष्वीश्वरनामस्वग्निनामोल्लेखो नास्तीत्यतो नाग्निशब्द परमेश्वरवाचकः । राष्ट्री, अर्थ, नियुत्वान्, इन:- इत्येतानि चत्वारि नामानि ईश्वरस्य प्रसिद्धानि सन्तीति, तन्त्र, निघण्टौ यानि नामानि तान्येव मन्तव्यानीति नियमा- भावात् । परमेश्वरस्यासख्यातानि नामानि, नहि चत्वार्येव नामानीश्वरस्य । ब्रह्म-परमात्मा ईश्वरादिनामान्यपि निघण्टौ नोपलभ्यन्ते, तथापि तानि नामानि मन्तव्यान्येव । तस्माद्वेदार्थनिरूपणे क्वचिनिघण्टुग्रन्थस्योपयोगे शेषार्थनिरूपणेऽमरकोषादीनामप्युपयोगो युक्त एव । व्याकरण- सूत्राण्यपि लौकिकान्येव, तथापि तेषामुपयोगो वेदार्थनिरूपणे सामाजिकैरप्यभ्युपेयते ॥ अमरकोषोऽपि प्रसिद्धाग्निपुराणमूलक एव, 'समाहृत्यान्यतन्त्राणि सक्षिप्त प्रतिसस्कृतैः । सम्पूर्णमुच्यते वर्गेर्नामलिङ्गानुशासनम् ॥ ' इत्यमरसिंहेनैवोक्तत्वात् । मीमांसादर्शने लोकवेदयोः शब्देक्याधिकरणे ' प्रयोगचोदनाभावादर्थेकत्वमविभागात्' (जै० सू० १ | ३ | ३० ) य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकाः, त एव तेषामर्था इति । न तेषामेषा च विभागमुपलभामहे । 'अविशिष्टश्च वाक्यार्थ ' (जै० सू० १/२/४० ) अविशिष्टस्तु लोके प्रयुज्यमानानां वेदे च पदानामर्थः । 'लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थप्रतीति ' (साख्यसूत्रे ५।४० ) नहि लोके शक्तिभिन्ना वेदे च भिन्ना, य एव लौकिका पदार्थास्त एव वैदिका इति न्यायात् । केचित्सामाजिका अप्यभ्युपगच्छन्ति यन्नहि ब्राह्मणानि मन्त्राणा व्याख्यानानि ब्राह्मणेषु यज्ञप्रक्रिया यज्ञाना फलानि च निरूप्यन्ते । प्रसङ्गात् क्वचित् केषाञ्चिन्मन्त्राणा मन्त्रखण्डाना च व्याख्यानमपि दृश्यते । ब्राह्मणगतैर्विनियोगैश्च मन्त्रार्थः प्रभावितो भवति । तथापि ब्राह्मणे भक्तिवादबाहुल्यात् तदुक्तग्रहणे सावधानेन भवितव्यम् । 'आयुर्वै घृतम्' ( तै ० स ० २३२) नह्यनेन वचनेन घृतायुषोरभेदो मन्तु शक्यते । यास्केनापि विचारितमेतत् ' आदित्योऽग्निर्वैश्वानरः' इति ब्राह्मण- प्रमाणेन सूर्यो वैश्वानर इत्याशड्क्योक्तम्- यथो एतद् ब्राह्मण भवतीति बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति । ' पृथिवी में महेशप्रसाद को उत्तर देते हुए स्वामी दयानन्द लिखते है --यदि कहा जाता है कि निघण्टु मे पठित ईश्वर के नामो मे अग्नि का ,,:- उल्लेख न होने से अग्नि शब्द परमेश्वर का वाचक नहीं हो सकता । राष्ट्री अर्य नियुत्वान् और इन ये चार शब्द ही ईश्वर के अर्थ मे पठित हैं, तो इसका उत्तर यह है कि निघण्टु मे जितने नाम है, वे ही उस अर्थ में प्रयुक्त होगे, ऐसा कोई नियम नही है । ,,, परमेश्वर के तो असख्य नाम है केवल चार ही नही । ब्रह्म परमात्मा ईश्वर प्रभृति नाम भी निघण्टु मे उपलब्ध नही होते तो भी ये ईश्वर के नाम माने ही जाते है । अत. वेदार्थ के निरूपण में कही कही निघण्टु का उपयोग होते हुए भी शेष अर्थ के निरूपण मे अमरकोश प्रभृति का भी उपयोग होता ही है । व्याकरण के सूत्र भी लौकिक ही है, किन्तु उनका उपयोग वेदार्थ के निरूपण में आर्यसमाजी भी करते है । अमरकोश का मूल प्रसिद्ध अग्निपुराण है । स्वय अमरकोशकार अमरसिंह ने कहा है कि इस कोश की रचना अन्य शास्त्रों को सक्षिप्त और प्रतिसस्कृत करके की गई है । मीमांसादर्शन लौकिक और वैदिक शब्दो को और उनके अर्थों को अभिन्न माना है । वहा कहा गया है कि इनमें भिन्नता हम नही खोज पाते । लोक और वेद में प्रयुक्त शब्दो का अर्थ समान ही है । साख्यदर्शन मे कहा गया है कि लोक मे व्युत्पन्न व्यक्ति को वेदार्थ का भी बोध हो जाता है । लोक और वेद के शब्दों की शक्ति भिन्न भिन्न नही होती । लौकिक पदो के जो अर्थ है वे ही वैदिक पदो के भी होते है । कुछ आर्यसमाजी मानते है कि ब्राह्मण ग्रन्थो में मन्त्रो की व्याख्या नहीं है, किन्तु उनमे यज्ञीय पद्धति और उनका फल वर्णित है । प्रसंगवश कही कही कुछ मन्त्रो की अथवा उनके एक भाग की व्याख्या भी कर दी गई है । ब्राह्मणगत विनियोग से भी ” मन्त्रो का अर्थ प्रभावित है । तो भी भक्तिवाद की बहुलता के कारण इनके बताये अर्थ के प्रति सावधानी रखनी चाहिये । आयुर्वे घृतम्' इस उक्ति के प्रमाण पर घृत और आयु का अभेद नही माना जा सकता | 'आदित्योऽग्निवैश्वानर । इस ब्राह्मण वाक्य पर निरुक्त में भी विचार किया गया है कि क्या सूर्य ही वैश्वानर है? बे कहते हैं कि ब्राह्मणों में बहुत से भाक्त (गौण ) प्रयोग मिलते
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वेदार्थ पारिजातः २२१७ वैश्वानरः' ( श ० १३ | ३ | ८| ३), ' सवत्सरो वैश्वानर ' ( श० ५| २| ५| १५ ), 'ब्राह्मणो वैश्वानर ' (तै ० ब्रा० ३।७।३।२) (निरुक्त- ७-२४ ) अतो ब्राह्मणवचनाश्रयणेनापि न पुराणादिप्रसिद्धोऽर्थोऽपलपनीय. । ' लोकव्यवहारेणापि वेदार्थो विज्ञायते, लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थप्रतीते. ' (मा० सू० ५।४० ) अथर्ववेदस्य षष्ठे काण्डे १४० सूक्तस्य शिशूना प्रथमत ऊर्ध्वदन्तद्वयस्योद्गमदोषपरिहारार्थ तिलहोमादौ विनियोग । तत्र तिलहोमो भवति । यवतिल- माषादिधान्यानामुक्तसूक्तेनाभिमन्त्रण कृत्वा ताभ्या दन्ताभ्या कर्तन कारयितव्यम् । तत्रैवायं मन्त्रो भवति । 'यौ व्याघ्रौ अवरूढौ जिघत्सतः पितर मातरं च तौ दन्तौ ब्रह्मणस्पते शिवौ कृणु जातवेद ।' ( अथर्व ० ६। १४० ११ ) अत्रावरूढपदेनो- परिपङ्क्तौ निम्नाभिमुख्येन जातयोर्दन्तयोरशुभफलत्वेन पित्रोर्मृत्युरूपत्वमुक्तम् । दुष्फलनिराकरणार्थमत्र प्रार्थना क्रियते । अध पङ्क्तौ प्रथमतः दन्तोत्पत्तिरेव शुभावहा । 'तस्मादधरे दन्ताः पूर्वे जायन्ते परे उत्तरे' (गो० ब्रा ० १।३।७ ), ' व्रीहिमत्त यवमत्त युवामथो माषमथो तिलम् । एषा वो भागो निहितो रत्नधेयाय दन्नौ मा हिसिष्ट पितर मातर च ॥ ' ( अथर्व० ६। १४०/२) अत्रैवोक्तविनियोगचारितार्थ्यम् । 'अन्यत्र वा घोर तन्वः परैतु दन्तौ मा हिसिष्ट पितर मातर च' ( अथर्व० ६।१४०।३ ) एतत्सर्वं व्यवहारज्ञाः स्त्रियो जानन्ति । 'यत्स्त्रिय आहुस्तत्कुर्वन्ति' ( आपस्तम्बधर्मसूत्र २ १५ ९) । अग्निवेश्यगृह्य- सूत्रेष्वप्युक्तम् । तदनभिज्ञास्तु 'हे दन्तौ युवा धान्य यव माष तिलान् अत्तम्' इत्याहुस्तत्त्वमङ्गतमव द्विवचनवैयर्थ्यात् । गोधूमादीनामवर्णनात्तेषामभक्ष्यत्वापत्तिः, मातृपितृशक्तिरहितनपुसक- वन्ध्यपशूना खाद्यत्वापत्तिश्च स्यात् तस्माद्विनियोग- वशाद्वेदार्थो व्याख्यातव्यः । तत एव श्रौतसूत्र -गृह्यसूत्र- धर्मसूत्रादीना च सार्थक्यम् । विनियोगभेदादेव मन्त्राणां पुनरावृत्तयोऽपि सङ्गच्छन्ते । विनियोगाभावे पुनरुक्तिदोषापत्तिश्च स्यात् । पदपाठेनापि सन्देहनिवृत्तिर्भवति । यथा-'उत शूद्र उतार्ये' ( अथर्व० १ ९। ६२। १ ) अत्र उत अर्ये इति च्छेद, अथवा उत आर्ये इति सन्देहे पदपाठेन पाठो निर्णीयते । येषा पदपाठो न भवति तेपा खिलत्वं भवति । पदपाठानुसारेण उत शूद्रे उत आर्ये इति पदच्छेदो निश्चीयते । सामाजिकैरपि बहुभिस्तथैवाङ्गीकृतम् । एतेन शूद्रार्ययोर्भेद एव सिद्ध्यति । कैश्चित्तु है । पृथिवी सवत्सर और ब्राह्मण को भी वैश्वानर कहा गया है । अत ब्राह्मणो के वचन के सहारे पुराणादि प्रसिद्ध अर्थ का अपलाप नही किया जा सकता । लोक व्यवहार से भी वेदार्थ का ज्ञान होता है । लोक मे व्युत्पन्न व्यक्ति को वेदार्थ का ज्ञान हो सकता है । अथर्ववेद के षष्ठ काण्ड के १४० वे सूक्त का विनियोग बालक के पहले ऊपर के दात निकले तो उस दोष की शान्ति के लिये तिल होम के निमित्त किया जाता है । यहा बताया गया है कि उक्त सूक्त से यव, तिल और उडद को अभिमन्त्रित कर बालक के ऊपर उगे दातों से उनको कटाना चाहिये । ऊपर वाली पक्ति मे निम्नाभिमुख दातो को उगना माता-पिता के लिये अनिष्ट कर माना गया है । इस दुष्फल की निवृत्ति के लिये यहा प्रार्थना की गई है । पहले नीचे की पक्ति मे दात निकलना ही शुभावह माना जाता है । गोपथ ब्राह्मण मे भी इसका उल्लेख है |। व्यवहार को जानने वाली स्त्रिया इन सब से परिचित है । आपस्तम्ब धर्मसूत्र में और अग्निवेश्य गृह्यसूत्र में बताया गया है कि इस तरह के व्यवहार के विषय में स्त्रियों को प्रमाण जानना चाहिये | आर्य समाजी इन सब विधि- विधानो से अपरिचित है, अत इनका उलटा हो अर्थ हो जाता है । उनके अर्थ के अनुसार तो उक्त मन्त्र मे गोधूम ( गेहूँ) आदि का वर्णन न होने से वे अभक्ष्य मान लिये जायगे । प्रजनन शक्ति रहित बन्ध्य पशुओ को उनकी व्याख्या के अनुसार खाद्य मानना पडेगा । अत विनियोग के आधार पर ही वेदार्थ की व्याख्या की जाय, सही पक्ष यही है । इसी मे श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र की सार्थ - कता है । विनियोग के भेद के आधार पर ही मन्त्रो की आवृति भी सार्थक मानी जा सकती है । विनियोग भेद के अभाव मे तो . ऐसी स्थिति मे वेद मे पुनरुक्ति दोष की आपत्ति होगी । पद पाठ से भी सदेह की निवृत्ति होती है । जैसे ' उतायें' इत मन्त्र मे 'उत अर्पे' यह पदच्छेद होगा या 'उत आयें' इसका निर्णय पद पाठ से हो जाता है । जिन मन्त्रो का पद पाठ नही है, उनको खिल कहा जाता है । अनेक आर्यसमाजी भी इस बात को स्वीकार करते है । इससे शूद्र और आर्य का भेद ही माना जाता है । कुछ लोग अर्थ का अर्थ वैश्य कहते है । पद पाठ के विरुद्ध होने २७८
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२२१८ वेदार्थपारिजातः अर्ये वैश्ये इत्यर्थ कृत । स तु पदपाठ विरोधाद्धेय एव । कैश्चिद् बृहदारण्यकस्य मासौदनमित्यस्य स्थाने माषौदनमिति पाठः कल्प्यते । तथैव तैः 'अवसाय पद्वते रुद्र मृड' (ऋ० स० १० १६९ ।१) इति मन्त्रेऽवसशब्दस्य चतुर्थ्यन्तेऽवग्रहो न क्रियते । ' अवसाय अश्वान्' (ऋ ० स० १ १७४( १ ) अत्र ल्यबन्तस्य भिन्नपदत्वात् पदच्छेद क्रियते । मन्त्रोऽपि स्वार्थबोधे प्रमाणम् । एकत्र यं सिद्धान्त प्रतिपादयति स्थलान्तरे कचित् तदनूद्य सङ्केतयति । अत एव तात्पर्यनिर्णयेऽभ्यासस्यापि हेतुत्व मीमांसा- यामुक्तम् । वैदिक देवतावादोऽपि वेदार्थनिर्णयोपयोगी भवति । प्रकरणमपि महत्त्वपूर्ण वेदार्थनिर्णये भवति । अनुक्रमणिका- कारैः प्रकरणानुसारेणैव देवताशब्देन वेदार्थो निर्धारित । अत एव तत्तद्देवतानुसारेण वेदार्थव्याख्यान युक्तम् । दयानन्दस्तु सर्वत्रैवाग्निवाय्वादित्यादिसूतान्यपि परमात्मपरत्वेनैव व्याख्याति । वेदे सर्वाणि सूक्तानि परमात्मपराण्येवेति न वक्तु युक्तम् । यदि सर्वाणि सुकानि परमात्म राज्येव भवेयुस्तदा सर्वानुक्रमण्या बृहद्देवताया च विभिन्नदेवतानिर्धारणानि निरर्थकान्येव स्यु. 1 तदा तु लाघवानुसारेणैक. परमात्मैव देवता स्यात् । संयोगो विप्रयोगश्च साहचर्यं विरोधिता 1। अर्थ. प्रकरण लिङ्ग शब्दस्यान्यस्य सन्निधिः ॥ सामर्थ्यमौचिती देशः ' ( ) कालो व्यक्तिः स्वरादयः । शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्मृतिहेतवः ॥ वा० प ० २।३१६-३१७ इति वाक्यपदीयपद्ये साहित्यदर्पणादावप्युद्धृते । तद्यथा - सशङ्खचक्रो हरिः, अत्र शङ्खचक्रयोगेन हरिशब्दो विष्णुमेवाभिधत्ते न सिहबानरादीन् । अशङ्खचको हरिः, इत्यत्र शङ्खचक्रवियोगेन च तमेव विष्णुम् । तथैव फगाहीनो नाग, अत्रापि फणावियोगेन सर्पवाचक एव नागशब्दो न गजवाचक | भीमार्जुनौ इत्यत्र भीमसाहचर्यात् अर्जुनः पार्थ' न वृक्ष । रामलक्ष्मणौ इत्यत्र रामो दाशरथिर्न बलरामः । कर्णार्जुनौ इत्यत्र विरोधात् कर्णः सूतपुत्रो वैकर्तन, न श्रोत्रम् | 'स्थाणु वन्दे भवच्छिदे' अत्रार्थ (प्रयोजन ) वशात् स्थाणुशब्देन शिव एव ग्राह्यो न पत्रशाखादिहीनो वृक्ष' | ' सर्व जानाति देवः' इत्यत्र प्रकरणवशात् देवो राजादिर्न देवता- विशेषः । वक्तृश्रोत्रोर्बुद्धिस्थमेव प्रकरणम् । 'कुपितो मकरध्वज ' इत्यत्र कोपनालिङ्गान्मकरध्वज कामो न समुद्रः । से यह ग्राह्य नही हो सकता । कुछ लोग बृहदारण्यक के ' मासीदनम्' के स्थान पर 'माषोदनम्' यह पाठ कल्पित करते हैं । इसी तरह से वे ' अवसाय' प्रभृति मन्त्र में चतुर्थ्यन्त पद न मान कर उसको ल्यवन्त पद मान लेते है । किन्तु उनको यह स्मरण रखना चाहिये कि मन्त्र भी अपने अर्थ के बोधन में प्रमाण होता है । एक स्थान पर सक्षेप में प्रदर्शित सिद्धान्त का अन्यत्र विशद निरूपण किया जाता है । इससे पूर्व मन्त्र का अर्थ स्पष्ट हो जाता है । इसी लिये मीमांसा शास्त्र में तात्पर्य के निर्णय में अभ्यास को भी कारण माना है । वैदिक देवतावाद भी वेदार्थ के निर्णय में सहायक होता है । प्रकरण का भी इसमें महत्वपूर्ण स्थान है । अनुक्रमणिकाकार प्रकरण का अनुसरण करके ही वेदार्थ का निर्धारण करते है । इसलिये उन उन देवताओ की पृष्ठ भूमि मे हो वेदार्थ करना उचित है । स्वामी दयानन्द तो सर्वत्र अग्नि, वायु, आदित्यपरक सूक्तो का भी परमात्मपरक अर्थ करते है । वेद मे सभी सूक्त परमात्मपरक है, ऐसा नही कहा जा सकता । यदि ऐसा होता तो सर्वानुक्रमणो, बृहद्देवता आदि ग्रन्थो में विभिन्न देवताओ का वर्णन निरर्थक हो जायगा । तब तो लाघव इसी में है कि एक परमात्मा ही सभी सूक्तों का देवता माना जाय । वाक्यपदीय के पद्य के अनुसार, जिनको कि साहित्यदर्पण प्रभृति में भी उद्धृत किया गया है, सयोग, विप्रयोग, साहचर्य, विविता, अर्थ, प्रकरण, लिङ्ग अन्य शब्द को सनिधि, सामर्थ्य, ओचित्य, देश, काल, व्यक्ति स्वर - इन सबको शब्दार्थ के जानने मे सहायक माना है । जैसे कि शख और चक्र के योग से हरि शब्द विष्णु का वाचक है, सिंह, वानर आदि का नहीं । शख और चक्र से वियुक्त हरि भो विष्णु ही कहे जायगे । इसी तरह से फण से वियुक्त नाग शब्द सर्प का वाचक होगा, गज का नही । भीम के साहचर्य से अर्जुन शब्द पार्थ का वाचक होगा; वृक्ष का नहीं । लक्ष्मण के साहचर्य से राम दशरथ पुत्र का वाचक होगा, बलराम का नहीं । अर्जुन का विरोधी होने से उसके साथ पढ़ा गया कर्ण शब्द सूतपुत्र वैकर्तन का वाचक होगा, श्रोत्रेन्द्रिय का नही । भवच्छेद ( ), ' 'रूप अर्थ प्रयोजन के कारण स्थाणु शब्द शिव का वाचक होगा पत्र शाखा आदि से रहित वृक्ष नही । सर्व जानाति देव इस वाक्य में प्रकरण के अनुसार देव पद राजा आदि का वाचक होगा; देवता का नही । कुपितो मकरध्वज ' इस वाक्य में कोप रूप लिंग