वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 141–150
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 141–150
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वेदार्थपारिजातः १०४१ भाष्यकारः शबरस्वामी सहस्रशाखात्मकं सामवेद जानाति स्मेति प्रसिद्धिः । शङ्करावतारभूताः श्रीशङ्कराचार्याः शबरस्वामिनं 'तथा चाहुः शास्त्रतात्पर्यविदः इति शब्दे स्मरन्ति । कार्तिकेयावतारभूताः कुमारिलभट्टपादाः सर्वज्ञकल्पाः शङ्कराचार्याश्च पूर्वोत्तरमीमासाव्याख्यानमद्देन समस्तमेव वेदार्थमाञ्जस्येन निरूपयन्ति । एवं वस्तुस्थिती सत्यामपि मुख्यवेदार्थसम्प्रदायो लुप्त आसीदिति कथनमसङ्गतमेव । निरुक्तवृत्तिका रदुर्गाचार्योव्वटसायण- महीधरादिकाः गरम्पर्येणैव वेदार्थ निरूपयन्नि 4 वात्स्यायनदृष्ट्या य एव ॠॠपयो मन्त्रब्रह्मणात्मकस्य वेदन्य द्रष्टारः प्रवक्तार त एवेतिहासपुराणादीना स्मरिच । रामायणभारतेतिहास: पुराणैश्च वेदा. स्पष्ट व्याख्यायन्ते । सामान्यतया मन्त्राणां सूक्ताना च तात्पर्यैक्ये क्वचिदनेकार्यतापि न विरुद्धयते । यथा प्रजापतिना दद्द इत्येकविधेन दकागे-देशेनैव दास्यत दत्त दयनियभिम्यनिनावभेदेन देवा मानवा असुराश्च प्रबोधित, तथैवाध्यात्माविदेवाधिभूतादिभेदेनैतिहासिकादिभेदेन चार्यभेदोऽपि नानुचितः प्रजापतेरिव महर्षीणामप्यभिप्रायभेदन सन्भवात् । अनादिरपौरुषेयो वेद एवं तत्तत्प्रजापत्युत्पादिरूपवरः क्वचित् क्वचिच्च स्वेन रूपेण तत्तदर्थात् प्रतिपादयति । यदि वेदस्वरूपैर्ब्राह्मणैर्वेदाङ्गेर्व्याकरणनिरुक्तकल्पैनिर्धारितः सूक्तार्यो मन्त्रार्थश्चासङ्गतः स्यात्तदा वेदाचारविरुद्धजीवनानां पाश्चात्यानां शब्दसाम्येन चिद अनुमिन्वानाना हादों भावः कथं तात्पर्यतया दृढमूलः, स्यात् स्वजन- श्वजनयोरपि नाम्यदर्शनेन शब्दसाम्यस्यार्थावगमाहेतुत्वात् । क्वचिच्छब्दार्थभेदेऽपि तात्पयभिदो भवत्येव । शाखाभेदेन क्वचिन्मन्त्रभेदः कर्मभेदश्च भवत्येव । शाखासु क्वचित् परस्परं खण्डनमण्डननिन्दास्तुत्यादिक- मणि दृश्यते, तदपि स्वस्वपक्षनिष्ठादाढर्यायोपयुक्तमेव । श्रतिद्वैधे विकल्पपक्षोऽप्यनुमत एव । अत एव –' अतिरात्रे आचाय जैमिनि समस्त मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के कर्मकाण्ड की मीमाना करते हैं और बादरायण मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के उत्तर काण्ड की । आत्रायं क मन्त्रो के कठिन शो की परम्परा प्राप्त व्याख्या उपस्थित करते है । यह प्रसिद्धि है कि मीमासा के भाष्यकार स्वामी सहस्र शाखा वाले सामवेद को जानते थे । भगवान् शंकर के अवतारभूत शकराचार्य शरस्वामी को शास्त्रो के मर्मज्ञ के रूप में बड़े आदर से स्मरण करते है । कार्तिकेय के अवतार स्वरूप कुमारिल भट्टपाद और सर्वशल्प शंकराचार्य पूर्व और उत्तर मोमासा के प्रसग मे समस्त वेदार्थ का बडी सरलता से व्याख्या करते है । वस्तुस्थिति के ऐसा होने पर भी मुख्य वेदार्थ का संप्रदाय लुप्त हो गया, इस तरह का कथन सर्वधा असंगत ही माना जायगा । निरुक्त के वृत्तिकार दुर्गाचार्य, उव्वट, सायण, महीधर प्रभृति विद्वान् परम्परा के अनुसार ही वेदार्थ का निरूपण करते है । वात्स्यायन की दृष्टि से जो ऋषिगण मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के द्रष्टा है और प्रवक्ता है, वे ही इतिहास-पुराण आदि के स्मर्ता भी माने जाते है । रामायण, महाभारत आदि इतिहास ग्रन्यो और पुराण आदि में भी वेदों की स्पष्ट व्याख्या मिलती है । सामान्य रूप से मन्त्रो और सूक्तो का एक ही तात्पर्य रहता है, तो भी कभी कभी उनके अनेक अर्थ होते हों, इसमें भी कोई विरोध की बात नही है । जैसे कि प्रजापति ने एक ही दकार का तीन बार उच्चारण किया, किन्तु देवो, मनुष्यों और असुरो को उसका क्रमशः दम, दान और दया इस तरह से अलग अलग अर्थबोध हुआ । इस तरह से एक मन्त्र का आध्यात्मिक, आधिदैविक, आविभोतिक के भेद से अथवा ऐतिहासिक आदि के भेद से अलग अलग अर्थ हो, इसमे भी कोई बनौचित्य नही प्रतीत होता । प्रजापति की तरह महर्षियों का अभिप्राय भी भिन्न भिन्न हो सकता है । यद्यपि वेद अनादि और अपौरुषेय है, तो भी वह प्रजापति, ऋषि आदि का रूप धारण करके ही अभिव्यक्त होता है । ऐसी परिस्थिति में वह कभी कभी अपने अपने स्वरूपभेद के अनुसार अर्थभेद की भी सृष्टि करता रहता है । यदि वेदस्वरूप ब्राह्मण ग्रन्थों, वेदांगों, व्याकरण, निरुक्त और कल्प सूत्रो के आधार पर निर्धारित सूक्तार्थ और मन्त्रार्थ असंगत है, तो वेदाचार के विरुद्ध जीवन बिताने वाले पाश्चात्य विद्वानों का शब्द की समानता को देख कर अनुमान के आधार पर किया गया मनमाना अर्थ किस तरह से संगत माना जा सकता है? समानता तो ' स्वजन' और 'श्वजन' शब्दों की भी है, तो क्या इसके आधार पर अर्थ का निर्णय हो सकता है? कही कहीं शब्दार्थ के भिन्न रहने पर भी तात्पर्य में एकता दृष्टिगोचर होती है । शाखा के भेद के अनुसार कहीं कही पर मन्त्र का और कर्म का भेद होता ही है । शाखाओ में कही कहीं खण्डन-मण्डन, निन्दा- स्तुति आदि भी दिखाई पड़ते है, यह भी अपने अपने पक्ष में निष्ठा को दृढ करने के लिये आवश्यक है । एक ही विषय पर दो या उससे अधिक श्रुतियों की विद्यमानता में विकल्प पक्ष को भी स्वीकार किया १३१
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वेदार्थपारिजातः१०४२ षोडशिनं गृह्णाति', ' नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति', 'उदिते जुहोति, अनुदिते जुहोति, समयाध्युषिते जुहोति' इत्याद्यनेक-विकल्पदर्शनम् । यत्तु कौत्समतेन नैरुक्तनिर्वचनविज्ञान व्यर्थमेवेत्युक्तम्, तदसत् कौत्सरीत्या पाठमात्रेणानर्थका अपि ,मन्त्रा अदृष्टार्था उपयुज्यन्ते अतस्तदर्थनिर्वचनायारभ्यमाणमपि शास्त्रं निरर्थक स्यात् । मन्त्रार्थप्रत्यायना-यानर्थक भवतीति कौत्सः । इत्थं कौत्समतमुपस्थाप्य खण्डितमेव यास्केन । 'तदेतेनोपेक्षितव्यम्' इति । अर्थादुपगम्य वेदं शास्त्र चेक्षितव्यम्, किमसौ सत्यमाचष्टे वृथा वेति परीक्ष्यम्? अर्थवत्त्वे मन्त्राणां यद्धेतुज्ञानं वक्ष्यमाणं तदुप-गम्यार्थवत्त्वं मन्त्राणामीक्षितव्यम् । - ' कया पुनरुपपत्त्या कोत्सो मन्त्राणामानर्थक्यमाहेति तदप्युच्यते नियतवाचोयुक्तयो नियतानुपूर्व्या भवन्तीति' अर्थान्मन्त्रानर्थक्ये कारणानि नियतवाचोयुक्तयो निरूढवाचोयुक्तयः । अभिधाननियता हि ते मन्त्रा भवन्ति 'अग्न आ याहि वीतये' (ऋ० स ० ६ । १६ । १० ) । न पुनविभावसो आगच्छ पानायेति । नियतानुपूर्व्या नियतनिष्ठानुपूर्वी पदप्रयोगस्य तद्यथा अग्न आयाहीति न पुनर्भवति -आ याह्यग्ने इति । लोकेऽर्थवता शब्दानामनियमेन पर्यायवचनता दृष्टा, गवादिप्रयोगे तथा न पौर्वापर्यं दृष्टम् । तद्यथा - गोणीमभ्याज गामभ्याज, आहर पात्रं पात्रमाहर, न च तथा मन्त्रेषु । तस्मादर्थवच्छन्दवैधर्म्यादनर्थका मन्त्राः । अपरोऽपि हेतुरानर्थक्ये मन्त्राणाम् । कतमो हेतुरित्याह- ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते । 'उरु प्रथस्वेति प्रथयति' । अर्थाद् एते मन्त्रा ब्राह्मणेन हि रूपसम्पन्ना अपि सन्तो विधायन्ते । रूप नाम लिङ्ग तेन सम्पन्ता लिङ्गमयुक्ता जाता है | इसी लिये ' अतिरात्र मे षोडशी पात्र का ग्रहण करते है', 'अतिरात्र में षोडशी पात्र का ग्रहण नही करते ' इन परम्पर विरुद्ध दो श्रुतियों की विद्यमानता में अथवा उदित, अनुदित अथवा समयाध्युषित होम की विधायक तीन परस्पर विरोधी श्रुतियो की विद्यमानता में दो या अनेक विकल्प स्वीकार किये जाते है । कौत्स के मत से निरुक्त के द्वारा निर्वचन का ज्ञान व्यर्थ है, यह बात भी ठीक नहीं है, क्योंकि कौत्स के मत से केवल इतना ही सिद्ध होता है कि मन्त्रो का अर्थ न जानकर केवल पाठ करने मात्र से भी अदृष्ट की उत्पत्ति होती है, अत उसके अर्थ के निर्वचन के लिये प्रारंभ किये गये शास्त्र की इस दृष्टि से निरर्थकता सिद्ध होती है । उसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि केवल मन्त्रों के पाठ से ही जब अदृष्ट को उत्पत्ति हो जाती है, तो उसके अर्थ को जानने का प्रयत्न व्यर्थ ही है । इस तरह के कौत्स के मत को उपस्थापित कर निरुक्तकार यास्क ने उसका खण्डन किया है कि 'तदेतेनोपेक्षितव्यम्" । इसका मतलब यह है कि वेद शास्त्र के प्रमाण के आधार पर इस बात की परीक्षा करनी चाहिये कि कोत्स की यह उक्ति ठीक है या नही? मन्त्रों की अर्थवत्ता में आगे हेतु दिये गये हैं, उनके आधार पर मन्त्रों की अर्थवत्ता को स्वीकार करना चाहिये । किस युक्ति के सहारे कौत्स मन्त्रो को अनर्थक मानते है, यह भी निरुक्त में बताया गया है ---नियतवाचोयुक्तयो० इत्यादि । अर्थात् मन्त्र अनर्थक इसलिये होते है कि इनमें वचन क्रम निश्चित रूढि के अनुसार नियत रहता है, ये मन्त्र नियत अभिधान वाले ही रहते हैं, इनमें परिवर्तन नही किया जा सकता । जैसे कि 'अग्न आ याहि वीतये' इस मन्त्र के स्थान पर 'विभावसो आगच्छ पानाय' यह नहीं कहा जा सकता । नियतानुपूर्वी का अर्थ है पद प्रयोग की निश्चित आनुपूर्वी, जैसे कि ' अग्न आ याहि' इसके स्थान पर 'आयाग्ने' ऐसा नही हो सकता । लोक में अर्थवान शब्दो को बिना नियम के रख सकते हैं और उसके पर्यायवाची शब्दो का भी प्रयोग कर सकते हैं । लौकिक गो प्रभृति शब्दों में उच्चारण में पौर्वापर्य देखा जाता है । जैसे कि 'गौणीमभ्याज ' के साथ में 'गामभ्याज' और 'आहर पात्रम्' के स्थान मे ' पात्रमाहर' ऐसा प्रयोग होता है । यह बात मन्त्रो में नही लागू हो सकती । इस तरह से अर्थवान् शब्दों से इनकी समानता न होने से मन्त्रों का कोई अर्थ नही होता । कौत्स के मत से मन्त्रों को अनर्थक मानने का एक दूसरा कारण भी बताया जाता है । वह हेतु हैं- 'ब्राह्मणेन रूप- संपन्ना विधीयन्ते - उरु प्रथस्वेति प्रथयति' । इसका अर्थ है कि इन स्वरूपसंपन्न मन्त्रो का विनियोग ब्राह्मण ग्रन्थों से ज्ञात होता है ।
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वार्थपारिजातः १०४३ प्रकटलिङ्गा अपि सन्तस्तदविवक्षित कृत्वा कर्मसु विधीयन्ते । एव यदि ह्येतेऽर्थवन्तोऽभविष्यत् स्वेनैव लिङ्गेन स्वात्मानमेते विनियोक्तु समर्था इति कृत्वा न ब्राह्मणेन तेषु तेषु कर्मसु व्यधास्यन्त, विहिताश्च । तद्यथा 'उरु प्रथस्वेति' ( श० १| १ | ६८ ) प्रथनलिङ्गो मन्त्रो विहित • प्रथनकर्मणि । 'उरु प्रथस्वोरु ते यज्ञपतिः प्रथताम्' ( वा० सं ० ११२२ ) यजुरिदं पुरोडाश प्रत्युच्यते । हे पुरोडाश, त्वं विस्तीर्णप्रयन सन् विस्तारयात्मानम् । ते तव यज्ञपतिश्चाय यजमानः | ' ' प्रजापशुहिरण्यादिभिश्च प्रथना विस्तीर्णताम तथा प्रोहानीति प्रोहति इति ब्राह्मण द्रोणकलशरोहणविधाय । इदमहमात्मानमेव प्राञ्च प्रोहामि तेजसे ब्रह्मवर्चमायेति । तेजोऽर्थ ब्रह्मवर्चसार्थं चात्मान प्रोहामि प्राञ्चं प्रेरयामीति 'प्रोहाणीति प्रोहति' इनि प्रहणलिङ्गो विहित • प्रोहणनर्मणि " स्नालिङ्गसम्पन्नविधानात् पश्यामो ब्राह्मणेनानर्थक- स्वरूप एव मन् विनियुक्त मन्त्र । एवं सति मन्त्र पुनवदधद्ब्राह्मणमर्थवदनर्थका मन्त्रा । नह्यर्थवन्त सन्तो दासवद् ब्राह्मणेन विधीयेरन्, विहिताश्च । तस्मादनर्थका मन्त्रः । अपिच, ब्राह्मणस्यानर्थक्ये देशकालकर्तृदक्षिणादि-?कर्माङ्गभूतं कुत उपलभ्येन तथा च ब्राह्मणस्यानर्थक्ये ह्यभ्युपगम्यमाने वेदेकदेणस्यात्यन्तमेवानर्थकत्वमभ्युपगतं स्यात् । नहि ब्राह्मणस्य विधिस्तुत्यर्थत्वावृतेऽयं नास्ति । मन्त्राणा तु वाच्यवाचकत्वेनानर्थकानामपि सता विनियोग- मात्रेणाप्यर्थवत्ता स्यादेव । तस्मात् काम्मनर्थका मन्त्राः वाच्यवाचकत्वेन सन्तो विनियोगमात्रेणार्थवन्तः विधेयन्त्रात् । विधायकत्वाच्च ब्राह्मणमर्थवदस्त्विति । अपरोऽपि नन्त्रानर्थक्रत्वे तत्रैव हेतुरुक्त. । अनुपपन्नार्था ह्येते ' ओषधे त्रायस्वनम्' ( वा ० स ० ५।४२ ) । न चौषधिरात्मानमपि त्राल नमर्था किमुत वृक्षम्? तथा 'स्वधिते मैनं हिंसी:' ( वा० स ५| ४२ ) इत्यात्मनैव हिंसनम् | रूप का अर्थ है लिंग, इससे संपन्न प्रकट लिंग वाले मन्त्रो के अथ का अविवक्षित करके प्रत्यक्ष ब्राह्मण श्रुति के आधार पर इनका अन्यत्र विनियोग किया जाना है । यदि ये अर्थवान् होते तो अपने लिंग से स्वयं इनका विनियोग हो सकता था, इस अवस्था में इनका ब्राह्मण वाक्यो के द्वारा उन उन कर्नो मे विनियोग क्यो किया जाता? यह तो किया गया है, जैसे कि 'उरु प्रथस्व' इस शतपथ श्रुति से प्रथन लिंग मन्त्र प्रथन कर्म के लिये विनियुक्त हुआ है । ' उरु प्रथस्व' प्रभृति यजुर्मन्त्र पुरोडाग को संबोधित है । हे पुरोडाश, तुम अपना प्रथन अर्थात् विस्तार करो । तुम जो अपना विस्तार करोगे, उससे तुम्हारा यह यजमान भी प्रजा, पशु, हिरण्य प्रभृति से विस्तीर्ण होगा । इसलिये मैं प्रोहण करता हूँ. ऐसा कह कर ऋत्विक प्रोहण करता है । इस प्रकार यह ब्राह्मण वाक्य द्रोणकलश के प्रोहण का विधायक है । ' इदमहमात्मानमेव ० ' इस श्रुति का अभिप्राय है कि तेज अर्थात् ब्रह्मवर्चस के लिये मै अपने को प्रोहण के लिये प्रेरित करता हूँ । इम तरह से प्रोहण लिङ्ग के विद्यमान रहते हुए भी प्रत्यक्ष शतपथ श्रुति द्वारा इसका पुनः प्रोहण मे विनियोग बताया गया है । इस तरह से लिंग से संपन्न मन्त्रो का भी विनियोग ब्राह्मण वचनों से पुनः बताया जाता है, इससे ज्ञात होता है कि ब्राह्मण वाक्यों की दृष्टि में मन्त्रो का कोई अर्थ नही होता, अतः ब्राह्मणो के द्वारा उनका विनियोग बताया जाता है । इस तरह से मन्त्र का पुनविधान करने वाले ब्राह्मण के वचनो के प्रमाण से मन्त्रो की अनर्थकता सिद्ध हो जाती है । यदि इनका कोई अर्थ होता जो दास की तरह ब्राह्मण वाक्यो से इनका विनियोग नही किया जाता । यह किया गया है, अतः स्पष्ट है कि मन्त्र अनर्थक है । अपि च, यदि हम ब्राह्मण वाक्यो को अनर्थक मानें तो देश, काल, कर्ता, दक्षिणा प्रभृति यज्ञागो की उपलब्धि कहाँ से होगी? इस तरह से ब्राह्मण भाग को अनर्थक मानने पर वेद के एक भाग की अत्यन्त व्यर्थता सिद्ध हो जायगी । विधि की स्तुति के अतिरिक्त ब्राह्मणभाग की दूसरी कोई उपयोगिता नही है । मन्त्रों की तो अनर्थकता होने पर भी वाच्यवाचकभाव के आधार पर विनियोग की कल्पना कर लेने से किसी तरह से सार्थकता बन सकेगी । इसलिये मन्त्रो को भले ही अनर्थक मान लिया जाय, वे वाच्यवाचकभाव के आधार पर विनियोग मात्र से अर्थवान् होते हुए भी विधेय हो रहेगे और उनकी विधायकता के आधार पर ब्राह्मण वाक्य ही वस्तुतः अर्थवान् माते जायेंगे । मन्त्रो की अनर्थकता में वहाँ एक दूसरा भी कारण बताया गया है कि इन मन्त्रो का कोई अर्थ बन भी नहीं सकता । एक मन्त्र में ओषधि से वृक्ष की रक्षा की प्रार्थना की गई है । ओषधि स्वयं अपनी रक्षा करने में भी असमर्थ है, वह वृक्ष की रक्षा
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वेदार्थपारिजात । III वाक्यानि उन्मत्तप्रभृतीनां कोहि नामैवमुक्त्वा स्वयमेव हिस्यादात्मानम्? हिनस्ति च? लोके यान्येवविधानिभवन्ति । अन्यस्य अन्येन विरुद्धार्थेन 1 - ', '. तान्यनर्थकानिप्रनिषेधोऽन्यस्य । चान्येनतथैवेमानिविप्रतिषेधतस्मादनर्थकानिइतरेतरव्याघात। अपरोऽपिइत्यर्थःतत्र। हेतुःतद्यथाविप्रतिषिद्धार्था-'एक एव रुद्रोऽवतस्थे असख्याता सहस्राणि ), 'शतं सेना अजयत्सा- ये रुद्रा अधिभूम्याम्' ( वा० सं ० १६/५४ ), ' अशत्रुरिन्द्र यज्ञिषे ' (ऋ० स ० १०११३३३२, अथासंख्यातानि नैकः । यद्यशत्रुः कमिन्द्रः ' ( ऋ ० १०११०३।१ ) इत्यादीन्युदाहरणानि । यद्येको नासंख्यातानि सहस्राणिवानर्थकानीमानि मन्त्रवाक्यानि । कथं शत सेना अजयत्, अथ शत सेना अजयत् कथमशत्रुः? इत्युन्मनवाक्यानी १ ३ २२) | -- - ' ' ( अपरोऽपि हेतुः जानन्तं सम्प्रेष्यत्यध्वर्युर्होतारम् अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि श० विधाविदं मयानुष्ठातव्यमिति । होता हि बिधिज्ञ एव भवति, नह्यविद्वान् विहितोऽस्तीति । स विजानात्येवामुमिन् ० स० १/ ८ ९ / १० ): यैव तद्विज्ञातुरस्य सतः सम्प्रेषणमनर्थकमेव भवति । एवम्– 'अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षम्' (ऋ परस्परासम्बद्धमुच्यते तस्मादनर्थका मन्त्राः । अभ्यग्,,, द्यौः सान्तरिक्षम् यैव माता स एव पुत्र स एव च पितेति च केचिदर्थवन्तः केचिदनर्थका इति न्याय्यम्. यादृश्मिन् जायनामि काण्डवेति एवमादयः । न ह्येतेषां विस्पष्टार्थता । न मैकडानलराथप्रभृतिभि प्रलपितम् । अर्धवैशसं हि स्यात् । तस्मात् सर्व एवानर्थका मन्त्रा इत्येतत्कोत्समतमविज्ञायैव तादृश यास्केन च न केवलम्- >'नह्येष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति' इत्येवोत्तरितम्, किन्तु पूर्वपमुपस्थाप्योपपाद्य च अर्थवन्तः शब्दसामान्यादेतद्वं यज्ञस्य समृद्ध यद्रूपसमृद्ध यत्कर्म क्रियमाणमृग्यजुर्वाभिददतीति कौन है जो कि इस तरह मे कह कर स्वयं? प्रयोग पागल व्यक्ति ही कर सकता है क्या करेगी इस तरह से स्वधिति से अपनी हिंसा न करने की प्रार्थना की गई है । ऐसा और उनको, अपनी हिंसा कर ले किन्तु यहां ऐसा विधान है । लोक में इस तरह के वाक्यों का की अनर्थकता में एक दूसरा भी कारण है कि अनर्थक माना जाता है । उसी तरह के ये वाक्य भी अनर्थक ही माने जायँगे । मन्त्रोका निषेध करता है और इस तरह से ये परस्पर; इनमें परस्पर विरोधी बातें कही गई है । एक मन्त्र दूसरे मन्त्र मे प्रतिपादित बात है कि रुद्र असंख्य है एक मन्त्र में व्याहत हो जाते है । जैसे कि एक मन्त्र में कहा गया है कि रुद्र एक ही है, दूसराइन्द्र केमन्त्रसी कहनासेनाओ के जीतने की बात करता है । इस,, बताया जाता है कि इन्द्र का कोई शत्रु नही है इसके विपरीत दूसरा मन्त्र एक है तो वह असंख्य सहस्र संख्या वाला नही तरह के परस्पर विरोधी उदाहरण और भी दिये जा सकते है । यहाँ पर यदि रुद्र ' यदि इन्द्र के कोई शत्रु नही है तो सो सेनाओं? होपर सकताविजय औरपावे यदिकी बातअसंख्यका क्यारुद्र मानेतुक हैजाते? अबहैं तोयदिफिरवह वहसेनाओएकपरकैसेविजयमानाप्राप्तजायगाकरता है, तो शत्रुरहित कैसे माना जा सकता है इस तरह से उन्मत्त (पागल) के वाक्यों की तरह ये मन्त्र वाक्य भी अनर्थक है । मन्त्रों की अनर्थकता में एक दूसरा भी कारण बताया गया है - अध्वर्यु सब बातों से सभी तरह से जानकार होता को है, अविद्वान् व्यक्ति को होता बताता है कि समिध्यमान अग्नि की तुम स्तुति करो । होता यज्ञ की सारी विधि- को जानने वालाअनुष्ठानही होताकरना है । जो पहले से सब बातें के रूप में नही रखा जाता । वह जानता है कि अमुक विधि में मुझे अमुक अमुक कर्मों का को द्यौ और अन्तरिक्ष भी बताया गया, जानता है उसको पुनः उन्हीं बातो के लिये कहना व्यर्थ ही है । इसी तरह से एक मन्त्र में अदिति वही पुत्र या पिता कैसे हो सकती?,,,, है । जो अदिति चोस्थानीय है वह अन्तरिक्षस्थानीय कैसे हो सकती है इसी तरह से जो अदिति माता है यादृश्मिन् जाययामि?, है ये सब परस्पर विरोधी बातें मन्त्रो मे वर्णित है । इसलिये इन मन्त्रो को अनर्थक ही मानना पड़ेगा । अभ्यम् उचित नहीं होगा काण्डवेति- इस तरह के अनेक शब्दो का अर्थ स्पष्ट नही है । कुछ शब्दों को अर्थवान् तथा कुछ को निरर्थक माननाअनर्थक है । कौत्स के इस , क्योकि यह तो अर्धजरतीय न्याय का अनुसरण करना माना जायमा जो कि अनुचित है । इसलिये सभी मन्त्र प्रभृति विद्वानोने इस मत को इस तरह से निरुक्तकार यास्क ने विस्तार से पूर्वपक्ष के रूप मे उद्धृत किया है । लगता है मैकअनल, राथ दिया है । विस्तृत पूर्वपक्ष को और निरुक्तकार यास्क के द्वारा दिये गये उसके विस्तृत उत्तर को देखे बिना ही उन पर आक्षेप कर यास्क ने केवल ' नह्येष स्थाणोरपराधो०' इतना ही उत्तर नही दिया है, किन्तु उपर्युक्त विस्तृत पूर्वपक्ष को उपस्थापित ' ' ' ' कर उनके प्रत्येक तर्क का उत्तर भी दिया है- अर्थवन्तः शब्दसामान्यात् इत्यादि । यहाँ पर अर्थवन्तः शब्दाः यह प्रतिज्ञा वाक्य I
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II बेधार्थपारिजातः च ब्राह्मणमित्यादिभिरुत्तरितम् । तथाहि - अर्थवन्तो मन्त्रा इति प्रतिज्ञा, शब्दसामान्यादिति हेतुः । समान एव हि शब्दो लोके मन्त्रेषु च । तद्यथा य एव गोशब्दो लोके स्वरसंस्कारसयुक्तः सन् स एव मन्त्रेष्वपि । तथा च स एवार्थवांल्लोके स एव चानर्थको मन्त्रेष्विति विशेषहेतुर्नास्ति । असति च विशेषतावर्यवन्त एव मन्त्राः शब्दसामान्यादिति । यत्तु प्रयोगानियमाल्लोकेऽर्थवत्वम्, प्रयोगनियमाच्च मन्त्राणामानर्थक्यमिति तदपि न पितापुत्रौ इन्द्राग्नी इति प्रयोगनियमदर्शनात् । यत्तु ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्तेऽतोऽनर्थका मन्त्र इत्युक्तम् तदप्ययुक्तम् 'एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्ध यत्कर्म क्रियमाणमृग्यजुर्वाभिवदतीति' ( गोपथब्राह्मणे २२६, २४:२) इति रोल्या एतदेव हि कर्मसमृद्धं भवति यज्ञस्य कर्मणो यद्रूपसमृद्धं मन्त्रलिङ्गेरभिधीयते । तदेवमिह समस्तन्ऋद्ध्या युक्तं भवति नान्यत् । तदेव स्पष्टयति - यत्कर्म क्रियमाणमृग्यजुर्वा वदति । तथा च शब्दसामान्याद् ब्राह्मणप्रामाण्याच्चार्थवन्तो मन्त्राः । ब्राह्मणमपि मन्त्राणामर्थवत्त्व दर्शयति - अनर्थका हि कथं कर्माभिवदेयुः? कथ चानभिवदन्तः समर्धयेयुः । अर्थवत्त्वं चाम्युपगतं भवता ब्राह्मणस्य । अथापि ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्त इति, बाह्मणेन सिद्धमेवार्थवत्त्वमुक्त मन्त्राणाम् । किं पुनः समृद्धरूपत्वे मन्त्राणामुदाहरणमिति, तत्रोच्यते — 'क्रीडन्तो पुत्रैर्नप्तृभिरिति इहैव स्तं मा वियोष्टं विश्वमायु- श्नुतम् । क्रीडन्तो पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानो वे गृहे ॥ (ऋ० सं ० १०/८६/४२ ) । सूर्याया आम्, विवाहे विनियुक्ता अनुष्टप् । इहैव स्तं भवतं युवाम् । स्वे गृहे मोदमानो मा वियोष्टं मा च वियुज्यतम् । सर्वमायुर्व्यश्नुत क्रीडस्तो पुत्रैश्च सहेत्याशीराशास्यते । अनेन मन्त्रेण विवाहकर्मण ऋद्धियुक्तता भवति । परपक्षहेतवश्च निराक्रियन्ते । नियतवाचो- युक्तित्वं नियतानुपुव्यं च लौकिकेष्वपि वाक्येषु दृष्टमेव । यथा इन्द्राग्नी पितापुत्राविति च । अतः प्रयोगनियमादनर्थका मन्त्रा इत्यनैकान्तिको हेतुः ॥ यदुक्तम्—ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्त इति, उदितानुवादः स भवति । नासमर्था है, शब्दसामान्यत् यह हेतु है । लोक और मन्त्र में विद्यमान शब्द एक सरीखे है । जैसे कि लोक में विद्यमान गो शब्द ही स्वर से संस्कृत होकर मन्त्र में प्रयुक्त होता है । ऐसी अवस्था में एक ही गो शब्द लोक में अर्थवान होगा और वेद में अर्थवान् नही होगा, इसमे कोई विशेष कारण नही प्रतीत हो रहा है । विशेष कारण के न रहने पर मन्त्रो को अर्थवान ही माना जायगा, क्योकि उनमें भी सामान्य रूप से लोकिक शब्द ही है । प्रयोग की नियतता न रहने से लौकिक शब्दों की अर्थवत्ता और प्रयोग की नियतता रहने से मन्त्रो को अनर्थकता की बात इसलिये गलत है कि लौकिक प्रयोगो मे भी अनेक स्थलो पर, जैसे कि पितापुत्रो, इन्द्राग्नी इत्यादि स्थलो मे यह प्रयोग की नियतता देखी जाती है । ब्राह्मण वाक्यों के द्वारा मन्त्रो का विनियोग बताये जाने से भी मन्त्रो की अनर्थकता की बात इसलिये गलत है कि 'एतद्यज्ञस्य० ' इत्यादि गोपथ ब्राह्मण के वचन के अनुसार वही कर्म समृद्ध जाना गया है, जिसका कि स्वरूप मन्त्रो के आधार पर निर्धारित होता है । वही समस्त ऋद्धियो से युक्त होता है, दूसरा नही । 'यत्कर्म क्रियमाण०' इत्यादि वाक्य से इसी को स्पष्ट किया जाता है । इस तरह से शब्दसामान्य हेतु के आधार पर और ब्राह्मण वचन के प्रमाण से भी मन्त्रों को अर्थवान् ही मानना पड़ेगा । ब्राह्मण भी मन्त्रो की अर्थवत्ता को बताते है, क्योकि यदि मन्त्र अनर्थक होगे तो उनमें कर्मों का प्रतिपादन कैसे माना जायगा? यदि कर्मों का प्रतिपादन नही करते तो उनको समृद्ध कैसे कर पायेंगे? आप ब्राह्मण वाक्यों की अर्थवत्ता को स्वीकार करते है । ब्राह्मण मन्त्रों की रूपसंपन्नता का विधान करते है, इस तरह से ब्राह्मण वाक्य मन्त्रो की स्वतःसिद्ध अर्थवत्ता को बताते है | मन्त्रो की समृद्धरूपता का उदाहरण क्या है? इसका उत्तर है -- 'क्रीडन्तो पुत्रैर्नप्तृभिरिति० ' इत्यादि । यहां पर उद्धृत मन्त्र की ऋषि सूर्या है, इस मन्त्र का विनियोग विवाह में है, छन्द अनुष्टुप् है । इसका अर्थ है -'तुम दोनो यही रहो, अपने घर में प्रसन्नतापूर्वक रहते हुए तुम दोनों का कभी वियोग न हो । तुम दानों की सारी आयु पुत्रो और पौत्रो के साथ खेलते हुए बीते' । इस प्रकार से इस मन्त्र मे आशीर्वाद की आकांक्षा की जाती है । इस मन्त्र से विवाह कर्म ऋद्धिसपन्न होता है । इस तरह से इन सबकी सहायता से कौत्स के अपने पक्ष में दिये गये कारणों का तर्कों का खण्डन हो जाता है कि नियत वाचोयुक्ति और नियत आनुपूर्वी लौकिक वाक्यों में भी दिखाई देती है, जैसे कि इन्द्राग्नी, पितापुत्रौ इत्यादि स्थलो में । अतः 'प्रयोगनियमात्' इस हेतु के आधार पर मन्त्रों को अनर्थकता इसलिये सिद्ध नहीं होगी कि उक्त हेतु अनैकान्तिक हेत्वाभास से ग्रस्त है, क्योकि उक्त नियम एकान्ततः वैदिक मन्त्रों में ही न रहकर
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१०४६ वेदार्थपारिजातः आत्मानमेते स्वेन रूपेण विधातुमित्यतो ब्राह्मणेन विधीयन्ते, किन्तर्हि - आत्मनियोगाश्रयमुक्तमेव सन्त मन्त्रेणार्थ ब्राह्मणमनुवक्ति विस्तरेण प्रकृतार्थ संतुष्टषया, नह्यनुक्तं स्तोतुं शक्यते । सोऽयमुदितानुवाद एव भवति । अपि चानेके समानलिङ्गा मन्त्राः प्रकरणे भवन्ति । ते ह्यपूर्विकयैक प्रयोग प्रति खलेकपोतन्यायेन युगपत् सम्पतन्ति । तेषा समुच्चये विकल्पे च प्राप्तेऽभिमत एको नियमार्थ ब्राह्मणेन विधीयते । एवमुभयोर्मन्त्रब्राह्मणयोरर्थवत्व सम्पद्यते । —' ', ' " यदुक्तम् ओषधे त्रायस्वैनम् स्वधिते मैनं हिंसी एवमादी मन्त्र अनुपपन्नानि त्रोच्यते- हे ओषधे त्रायस्वेन त्वन्पूर्वको ह्येष वृक्षछिद्यमान सम्मूछिनो भविष्यति च यज्ञे विनियुक्तो विशिष्टमुत्कर्ष मेतस्मात् स्थावरात् प्राप्स्यत इत्येवात्र त्राणमभिप्रेत्योक्तमोषधे त्रायस्वैनमिति । न छेदनं प्रतिपत्स्यतेऽय तस्मादुपपन्न एवार्थः । यदपि चोक्तम्--स्वधिते मैन हिसीरिति, तत्राप्याह- आम्नायवचनादहिंसा एषा प्रतीयते । कथमहिंसा प्रत्यक्षतो हि छिद्यते वृक्षः? शृणु -इयमहिंसेय हिमेत्यागमादेव प्रतीयते । प्रतिविशिष्टश्वायमेव वैदिक आम्नाय आगमः, एतत्पूर्वकत्वादन्यागमानाम् । स एव कृत्स्नस्य जगतः प्रतिविशिष्टाय श्रेयसेऽभ्युद्यतः सन् हिस्ायां विनियोक्ष्यत इति कुत एतत् । तस्मान्नूनमियमहसत्र यतोऽस्या नियुनक्ति कर्तारम् । तदेतदाग प्रत्यक्षमेव यथेयमहिंसेति । अपि चैनदोषधिवनस्पतिपशुमृगपक्षिसरीसृपाः सम्यगुपयुक्ताः सन्तो यज्ञे परमुत्कर्षं प्राप्नुवन्ति, सोऽयमभ्युदय एव सम्पद्यते, न हिंसा तत्र यदुक्तं मैनं हिसीरिति । हिसशपि नासो हिनस्ति, कि तहि अनुगृह्णाति यज्ञविनियोगार्थविधानतश्छि न्दन् । तस्मादुपपन्नार्था मन्त्रा इनि । लौकिक वाक्यों में भी रहता है । ब्राह्मणेन रूपसंपन्ना विधीयन्ते' यह उत्तर भी इस तरह से दिया गया है कि इसको जाता है । ये मन्त्र अपने अर्थ को स्वरूपतः बताने में असमर्थ है, ऐमा मान कर ब्राह्मण वाक्यों के द्वारा इनका विनियोगउदितानुवाद कहा होता, किन्तु मन्त्र के द्वारा अपने से अपने विनियोग को बता देने के बाद भी ब्राह्मण वाक्य उसकी प्रशंसा आदि के साथ विहितपुनः नही विनियोग को विस्तार से बताते है । अनुक्त अथ को स्तुति नही की जा सकती । इस तरह से ब्राह्मण वाक्यो में बताया उसके मन्त्र द्वारा प्रतिपादित अर्थ की प्रशंसा के लिये किया गया उदितानुवाद पहले कही गई बात को स्थूणानिखनन न्याय से पुष्ट गयाकरनेविनियोगके पुनः कहना मात्र है । अनेक समान लिंग के मन्त्र प्रकरण में विद्यमान रहते है । उन सबकी किसी एक प्रयोग मे एक साथ अहंपूर्विकालिये प्रवृति होती है । उनको एक साथ ग्रहण किया जाय अथत्रा विकल्प पूर्वक? इस तरह की समस्या उपस्थित होने पर एक अभिमत नियमन ब्राह्मण वाक्यों से किया जाता है । इस तरह से मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनो की समान रूप से अर्थवत्ता संपन्न होतीअर्थहै का। यह कहना कि औषधि और स्वधिति को संबोधित मन्त्रो का अर्थ किसी तरह से संगत नही हो सकता कि इसका अभिप्राय यह है कि हे ओषधि, इस वृक्ष की तुम रक्षा करो, तुम्हारे साथ इस वृक्ष को काटने से यह अच्छी, इसलियेतरह गलत है त्राण शब्द को मान कर और तब यज्ञ में इसका विनियोग विशिष्ट उत्कर्ष की सिद्धि में सहायक होगा । इसी अभिप्राय में यहाँ पर से कटेगा ओषधि से त्राण करने की बात कही गई है । इस तरह से वृक्ष का छेदन न होने से ओषधि से वृक्ष के त्राण ' ', स्वषिते मैनं हिंसि इस वेद वाक्य पर जो आपत्ति उठाई गई है उसका उत्तर इस प्रकार से है- यहाँ पर शास्त्रकीके प्रमाणबात ठीकपर हीअहिंसाहैं । मानी जाती है । प्रश्न उठता है कि जब प्रत्यक्षतः वृक्ष का छेदन होता है, तो इसको अहिंसा कैसे माना जायगा? उत्तर है, यह हिंसा है, इसका बोध आगम से ही होता है । अन्य प्रत्येक आगम को अपेक्षा यह वैदिक आम्नाय ही सर्वश्रेष्ठ हैहै कि यह अहिंसा की प्रवृत्ति इसका प्रामाण्य मान कर ही होता है । जो शास्त्र समस्त जगत् को विशिष्ट कल्याण के लिये प्रवृत्त करता है,, वहअन्य आगमो हिंसा में कैसे प्रवृत्त करेगा । इसलिये यह मानना पडेगा कि जिस कार्य में वेद किसीसकती । अतः यह आगमसिद्ध अहिंसा मानी जायगी । एक बात और भी है कि ओषधि की, प्रवृत्तिवनस्पतिउत्पन्न, पशु करता है, वह हिंसाव्यक्तिनही कोहो यज्ञ के लिये उपयोग होता है, वे परम उत्कर्ष को प्राप्त करते है । इससे यहाँ पर उनका अभ्युदय सिद्ध होता, मृग, पक्षी, सरीसृप का यदि प्रश्न ही नही है । यहाँ पर हिंसा के निषेध की जो बात कही गई है, उसका अभिप्राय यह है कि यहां हिंसाहै । इसमें हिंसा का कोई नही कही जायगी, किन्तु यश की संपत्ति के लिये विधिपूर्वक किया गया छेदन उस पर अनुग्रह ही माना जायगाहोते हुए भी वह हिंसा कथन सर्वथा असंगत है कि मन्त्रों के अर्थ को उपपत्ति नही बन सकती ॥ इस तरह से यह
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वेदार्थपारिजातः १०४७ यदुक्तम्-'विप्रतिषिद्धार्था मन्त्रा' इति, तदपि न, 'एक एव रुद्रोऽवतस्थे', ' असख्याताः' इति नंष विप्रति- षिद्धोऽर्थः 1। देवता हि माहाभाग्ययोगादेकापि सती अनेकधा भवति । अनेकोऽपि चैकधा भवति, माहाभाग्याद्देवताया.' (नि० ७१४ ) | यदपि 'अशत्रुरिन्द्र', 'शतसेना अजयत् साकमिन्द्रः' इति विप्रतिषिद्धार्थतेति, तदप्ययुक्तम्, लौकिकेष्वप्यर्थ- वत्सु वाक्येषु तथा प्रयोगदर्शनात् । असपत्नोऽयं ब्राह्मणोऽनमित्रोऽय राजेति । नहि कश्चिदसपत्नो भवति लोके । ' मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः । उत्पद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ' इति, तथापि स्वल्पसपत्नत्वा- दसपत्नोऽयमित्युच्यते । एवमेव कस्मिश्चिदतिप्रवृद्धे सशातिते मेघेऽन्येषामसारतामभिप्रेत्येदमुक्तम् 'अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे ' यस्त्वमेतमेवमतिप्रवृद्धमहन्नहिमिति । यदुक्तं शत सेना अजयद् इत्यनेन विरोधः, नहीन्द्रस्य शत्रवः सन्ति कुतः पुनः शत सेना या जेतव्या इति, तत्रोच्यते -रूपककल्पनयैवैषा युद्धप्रवादा स्तुतिः । वक्ष्यति हि-' अपा च ज्योतिषश्च मिश्री- भावकर्मणो वर्षकर्म जायते । तत्रोपमार्थेन युद्धवर्णा भवन्ति' ( नि० २।१६ ) इति । तदेतन्न भवता दृश्यते, सम्यगन्विष्यतां ' देवतासतत्त्वं नैरुक्त भ्यस्ततो, मन्त्रार्थानविरोधेन सम्यगवभोत्स्यते । नैगमवाक्यतत्त्वज्ञेन मन्त्रार्थोऽवगाहितु शक्यः । तस्मादर्थवन्तो मन्त्राः । यदुक्त जानन्त सम्प्रेष्यतोति, तदपि यत्किञ्चित्, लौकिकेष्वर्थवत्सु शब्देष्वप्येव स्वाभाव्यदर्शनात् । यथा जानन्त गुरुमभिवादयते स्वगोत्रमभिवदन् । तथा जानते मधुपर्क प्राह त्रिर्मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्क:' ( आश्वलायनगृह्यसूत्रे १।२४/ ७) । तदेतदर्थवत्सु लौकिकेष्वपि वाक्येषु विहितार्थख्यापनार्थ शब्दसामान्यादर्थवन्तो मन्त्राः । अथाप्याह-अदिति: मन्त्रो में परस्पर विरोधी बातें है, यह कथन भी इसी तरह से असंगत हैं । एक ही रुद्र है और असंख्य रुद्र है, इसमे परस्पर विरोध की कोई बात नही है, क्योकि देवता अपनी महान् ऐश्वर्य शक्ति के आधार पर एक होते हुए भी अनेक रूप धारण करते रहते है और आवश्यकतानुसार अनेक मे पुनः एक स्वरूप मे ही लोन हो जाते हैं । इन्द्र के शत्रुरहित होने और सैकडो सेनाओ को जीतने की बात को लेकर मन्त्रो पर परस्पर विरोधी बातो के प्रतिपादन का जो आक्षेप किया जाता है, वह भी अयुक्त है, क्योकि लौकिक अर्थवान् वाक्यो मे भी इस तरह का व्यवहार देखा जाता है । जैसे कि इस 'ब्राह्मण का कोई शत्रु नही है, इस राजा का कोई मित्र नही है' । लोक मे ऐसा कोई भी व्यक्ति नही मिलेगा. जिसका कि कोई शत्रु न हो । कहा गया है कि-' वन मे एकान्त में रहकर अपने काम में ईश्वराराधन, तपस्या आदि में लगे हुए तपस्वी के लिये वन मे भी मित्र, शत्रु और उदासोन ये तीन पक्ष उठ खडे होते है' । इस परिस्थिति मे जिसके शत्रु कम हो, उसको ' असपत्न' कहा जाता है । इसी तरह से किसी अत्यन्त प्रभावशाली मेघ की गया है कि हे इन्द्र, अब तुम्हारा कोई शत्रु नहीं है, क्योकि तुमने अपने प्रबल शत्रु अपेक्षा अन्य मेवो की असारता को देखकर यहकहा को मार डाला है । सैकडो सेनाओ को जीतने की बात मे भी कोई विरोध नहीं है । जब इन्द्र के कोई शत्रु नही है तो सेनाओ को जीतने की बात का क्या तुक हैं? अतः इसका अभिप्राय यह है कि रूपक की कल्पना के आधार पर यहाँ पर इन्द्र की स्तुति की गई है । निरुक्त में आगे बताया गया है कि जल और तेज के संयोग से वृष्टि होती है । इस वृष्टि की तुलना युद्ध से करके इन्द्र की स्तुति की जाती है कि जैसे कोई पराक्रमी राजा अपनी मेनाओ की सहायता से सारे शत्रुओ को आच्छादित कर देता है, निस्तेज कर देता है, उसी तरह से इन्द्र अपनी मेघ रूपी, दृष्टि रूपो सेनाओ की सहायता से सबको आच्छादित कर देता है । इस अभिप्राय तक आप पहुँच नहीं पाते । निरुक्त वचनों की सहायता से आप देवता के वास्तविक स्वरूप को पहचानिये, तब आपको मन्त्रो के अर्थ में कोई परस्पर विरोध नही दिखाई पडेगा । निगम वाक्यो के तत्व को जानने वाला ही मन्त्रो के अर्थ को ठीक से समझ सकता है । अतः सभी मन्त्र वान् है । जानकर व्यक्ति को ही पुनः उसी कर्म मे प्रवृत्त कराने का जो आक्षेप है, उसमें भी कोई दम नही है, क्योकि इस तरह का स्वभाव लौकिक अर्थवान् वाक्यों में भी देखा जाता है । जैसे कि गुरु शिष्य का नाम जानते है, तो भी उनको अभिवादन करतेजासमयरहा अपना नाम बताने की परम्परा है । इसी तरह जिसको मधुपर्क दिया जाता है, वह इस बात को जानता है, कि मुझे मधुपर्क दिया वाक्यों में भीहै, तो भी मधुपर्क देते समय ' मधुपर्क' शब्द के तीन बार उच्चारण करने की परम्परा है । इस तरह से लौकिक अर्थवान्
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१०४८ वेदार्थपारिजातः सर्वमिति, तत्राप्युच्यते । द्विविधा शब्दवृत्तिः --मुख्या गोणी च । मुख्यासम्भवे गौण्याश्रीयते स एव भक्तिवादः स्याद् अदितिः सर्वमिति । यथा कश्चिदनेकोपकारे प्रवृत्तं ब्रूयात् त्वमेव मे माता त्व पिता, एवमेतदपि । यथा वा सर्वरसा अनुप्राप्ताः पानीयमिति व्यवह्रियते, ततस्तेषां प्रभवत्वादेवमिहापि ॥ यत्पुनरुक्तम् -अथाप्यविस्पष्टार्था भवन्तीति नैष स्थाणोरपराध , इति नात्र स्थाणुरपराध्यति यदेनं स्थाणुमन्धो न पश्यति एवमिहापि नैष मन्त्राणामपराधो यदशिक्षितेन भवता न विज्ञायन्ते मन्त्रार्थाः । किञ्च, नहि पूर्वपक्षे तथा कौरसमतोपन्यासेन निरुक्तविज्ञानस्य व्यर्थत्वं सिद्धयति, पूर्वोत्तरमीमांसयो सर्वत्राधिकरणेषु पूर्वपक्षोपन्यासस्याधिकरणन्वेनानिवार्यत्वात् । न च तावता पूर्वपक्षस्योपदेश्तानियति । यदपि नासत्या इत्यत्र सत्य मिना नेत्यादिरशा उपस्थापिता इनि तदपि न युक्तम, नासत्यों चाश्विनौ सत्यावेव नासत्यावित्योर्णनाभः सत्यस्य प्रणेताराविकाप्राण नामाप्रभवो वभूवतुरिति वा' (नि० ६.०३ ) इनि विरोधात् । तत्रायमभिप्रायः- ते हि यज्ञेषु पक्षियास ऊना: सम्थं विप नभि सन्ति देवाः । तॉ अध्वर उतो यक्षग्ने ' ( / ) |. श्रुष्टी भगं नाम पुरन्धिम् ॥ ऋ०सं० ७१३ ९ ४ वशिष्ठस्याएं वैश्वदेवी विश्वेदेवा ननजषु राजियास यज्ञ- सम्पादितः ऊम्म अवितारः रक्षितार: अवनीना वा सर्पणाया वा संघस्थ वैवदेवं समानं स्थान्ननितिष्ठन्ते, तान् विश्वेदेवान हे अग्ने, एतस्मिन्नध्वरे यज्ञे उशतः स्वमश कामयमानान् श्रुष्टी क्षिप्रम् अविलम्बमानो यक्षि यज, भग च यज, नासत्यों अश्विनौ च यजप पुरोध च न । एवमत्र यागस्य विघ्नभयात् क्षित्रस्येष्टत्वात श्रुष्टीति क्षिप्रनामेत्यु- पपद्यते । तत्र सत्यानेव नासत्याविद्यार्णवाभो मन्यते । तौ हि सत्यमेव ब्रू- न कदाचिदसत्यमिति । तस्मानासत्यानि- त्युच्यते । द्विः प्रतिषेधः प्रकृतिदाढ्य मापादयति । अथवा सत्यम्नोदकस्य प्रणेचारी नासत्यो इत्याग्रायण आचार्यो मन्यते । अथवा ऐतिहासिकमक्षेण नासिकाप्रभवौ तौ बभूवतुः । विहित अर्थ के ही पुनः स्थापन की बात देनी जानी है, अत इस समानता के आधार पर वैदिक मन्त्रो को भी अर्थवान् ही माना जायगा | 'अदिति हो सब कुछ है' यह थुनि वाक्य पर भी आपत्ति उठाई जाती है । इसका उत्तर यह है कि शब्द की मुख्य और गोण दो तरह को प्रवृत्ति होती है । मुख्य प्रवृत्ति के अभाव में गौणी वृद्धि का महारालिया जाता है । इसी को भक्तिवाद कहा जाता है कि अदिति ही सब कुछ है । जैसे कोई व्यक्ति अपने ऊपर अनेक उपकार करने वाले व्यक्ति को 'आप ही मेरे माता-पिता है' इस तरह के वाक्यो का प्रयोग करता है, अथवा जैसे कहा जाता है कि जल से ही सब रहरों की राप्ति होती है, क्योंकि उनकी उत्पत्ति जल से ही होती है, उसी तरह का गौण प्रयोग 'अदितिः सर्वम्' यह भी है । मन्त्रों के अर्थ के विस्पष्ट न होने की बात भी गलत है, इसी का निरुक्तकार ने उत्तर दिया है-नैष स्थाणोरपराध इति । यह स्थाणु का अपराध नहीं है कि उसको अन्धा नही देख पाता । इसी तरह से यह मन्त्रो का अपराध नही है कि अपने अज्ञान के कारण आप मन्त्रों का अर्थ नही जान पाते । अपि च, पूर्वपक्ष के रूप में इस तरह से कोत्स के मत का उल्लेख मिलने से निरुक्त के विज्ञान की व्यर्थता नही सिद्ध हो सकती । पूर्व और उत्तर मीमासा में सभी अधिकरणों में पूर्वपक्ष का उपन्यास अनिवार्य अङ्ग के रूप में किया जाता है । इससे यह नही सिद्ध हो जाता कि पूर्वपक्ष भी उपादेय है । 'नासत्यों' इस शब्द की व्युत्पत्ति के लिये अनेक पक्षों को उपस्थापित करने वाला आक्षेप भी सही नही है । निरुक्त में यहाँ पर तीन पक्ष बताये गये है-- और्णवाभ नाम के आचार्य का कथन है कि अश्विनीकुमार नामक युगल देव असत्य नहीं, सत्य हो है । आग्रायण आचार्य का मत है कि ये सत्य के प्रणेता है, अथवा इस शब्द की व्युत्पति यह भी हो सकती है कि इनकी उत्पत्ति नासिका से हुई है । इसका वास्तविक अभिप्राय यह है- 'ते हि यज्ञेषु० ' इस ॠ मन्त्र के ऋषि वसिष्ठ है और विश्वदेव देवता है । इस मन्त्र का अर्थ है कि जो विश्वदेव यज्ञो का संपादन करते हैं, उनकी रक्षा करते है, अथवा उनके माध्यम से जो तर्पणीय हैं और जो समान स्थान में निवास करते हैं, उन विश्वेदेवो को हे अग्ने, तुम इस यज्ञ में अपने -अपने अंशों को चाहने पर बिना विलम्ब किये उनकी सहायता करो, तुम भग, नासत्य और पुरन्धि की सहायता करो । इस तरह से यहाँ पर यज्ञ में विघ्न के भय से क्षिप्रता अभीष्ट है, अतः 'श्रुष्टि' यह क्षिप्रता का पर्यायवाची शब्द माना जाता है, यहाँ पर 'ओर्णवाभ' ऋषि का कहना है कि 'नासत्यो ' नामक युगल देवता सदा सत्य बोलते हैं, असत्य कभी नहीं बोलते, इसीलिये इनका यह नाम पड़ा है । किसी बात का दो बार प्रतिषेघ उसकी दृढ़ता का सूचक माना जाता है । अथवा सत्य उदक का पर्यायवाची है । आग्रायण आचार्य का मत है कि 'नासत्यो' उदक के प्रणेता देवयुगल हैं । बथवा
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वेदार्थ पारिजातः १०४६ यदपि च - ' सकलोपलब्धसामग्रीबलाद् यास्कोऽनेकान् गूढानर्थानुद्घाटयितुं सक्षमोऽभूत् याश्चावगन्तुं सायणो न क्षमो बभूव' इति, तदपि तुच्छम्, यास्कस्य सायणपूर्वभावित्वेन तदानी तादृशार्थानां यास्केन समाहितत्वात्, सायण- समक्षे तत्समस्याया एवाभावात् । यदपि - 'सायणेनानेकस्थलेषु यास्कोक्तार्थाद्भिन्नोऽप्यर्थः कृतः । तादृशार्थमवलोक्य प्रश्न उदेति कि प्राचीनाचार्यैः पारम्पर्यं नानुसृतम्? अनेकेषु स्थलेषु यास्काश्रयमन्तरैवैकस्मिन् प्रकरणे प्रकरणान्तरे वाऽनेकेऽर्थाः कृताः । ते च परस्परमसङ्गताः प्रतीयन्ते । यथा शारदपदस्यैकत्र एकवर्षावरुद्धोऽर्थः कृतोऽन्यत्राभिनवोऽर्थः ,कृतः तृतीयस्थले शरन्नामकराक्षससम्बद्धोऽर्थोऽभिप्रेतः । वस्तुतस्तु सायणस्याय महान् दोषो यत्स उपस्थितं मन्त्रमभिलक्ष्य शब्दार्थं कर्तुं प्रयतते । एवं सायणभाष्य यास्कीयनिर्वचन च सूक्ष्मेक्षिकया पर्यालोच्येत तदा स्पष्टमाभाति यदुग्वेदेऽनेकानि विषमपदान्येवंविधानि सन्ति येषा समुचितोऽर्थ उभाभ्यामपि कर्तुं नापारि, तेनोभयोरपि पारम्पर्य व्युत्पत्त्योर्यथार्थज्ञानं नासीदिति । अतः सूक्तेष्वप्रचलितानि दुर्बोधानि तादृशानि कानिचिदपि स्थलानि न सन्ति, यत्र भाष्यकाराणां मतं निर्णायकं स्यात्, यावत्प्रकरणवशात् समानान्तरसूक्तैर्वा तत्पुष्टिर्न स्यात्' इति, तदपि न किञ्चित्, पौर्वापर्यप्रकरणात् प्रमाणान्तरसंवादाच्चार्थावधारणस्यादोषत्वात् । अनेकार्थसम्भवादेव तात्पर्यनिर्धारणा- - - योपक्रमोपसंहारादितात्पर्यनिर्धारकषड्विधलिङ्गविचारापेक्षा भवति । सायणः प्रायेण ब्राह्मण सूत्र निरुक्तानुसारणैव मन्त्रान् व्याख्याति । सति प्रमाण एव यास्कोक्तातिरिक्तार्थमपि व्याख्याति । शारदपदस्य तु प्रकरणानुसारेण भिन्नार्थता न दोषाय । सैन्धवपदस्य प्रकरणानुरोधेनैव क्वचिल्लवणं क्वचिदश्वोऽर्थो गृह्यत एव । न केवलं सायण एव, किन्तु सर्वोऽपि जन उपस्थितं पदं वा वाक्यं वाभिलक्ष्यार्थमन्वेष्टि । श्रुतिपारम्पर्य-व्याकरण-निरुक्त- निघण्टु-,कल्पादय एव मन्त्रार्थगवेषणामूलानि । यद्यपि परमेश्वरीयवेदस्य वास्तवमर्थं परमेश्वर एव जानाति तथापि ऐतिहासिक पक्ष से तीसरी व्याख्या इस शब्द की यह है कि इस देव युगल की उत्पत्ति नासिका से हुई है । अतः इन पक्षो में कोई परस्पर विरोध नही दिखाई पड़ता । 'सकल उपलब्ध सामग्री के बल पर यास्क अनेक गूढ शब्दो का अर्थ निकाल सके, जिन्हें सायण जैसे आचार्य न निकाल सके ' ( पृ० ५१ ) यह कथन भी तुच्छ है, क्योंकि यास्क सायण से पहले हुए थे, सायण के समय से बहुत पहले ही यास्क ने इस तरह की समस्याओ का समाधान कर दिया था, अत: सायण के सामने इस तरह की समस्याएं थी ही नही । 'सायण कई स्थानों पर शास्त्र से भिन्न अर्थ करते है । यह देख हमारे सामने समस्या उठ खड़ी होती है कि क्या प्राचीन आचार्यों ने परम्परा का अनुगमन न किया? ऐसे भी अनेक स्थान हैं, जहाँ यास्क का कोई माश्रय न लेते हुए मायण ने एक ही शब्द के, एक ही प्रकरण में अथवा प्रकरणान्तर में, अनेक अर्थ दिये है, जो परस्पर असंगत प्रतीत होते है । यथा 'शारद' पद का एक स्थान पर उन्होंने 'एक वर्ष के लिये अवरुद्ध' ऐसा , ' ' ' ' |अर्थ किया है तो दूसरी जगह अभिनव और तीसरी जगह तो शारद नामक राक्षस से सम्बन्ध रखने वाला अर्थ बताया सच पूछो तो सायण का यह महान् दोष है कि वह अपने संमुख आये हुए एक ही मन्त्र का ध्यान रखते हुए शब्दार्थ निकालने की चेष्टा करते हैं । यदि सायणभाष्य और यास्क के निर्वचनो का सूक्ष्म अध्ययन किया जाय तो यह स्पष्ट होगा कि ऋग्वेद में ऐसे अनेक कठिन पद हैं, जिनका समुचित अर्थ दोनों ही नही निकाल सके और दोनो को ही न सही परम्परा और न व्युत्पत्ति का निश्चित ज्ञान था । अत एव हम ऐसा कह सकते हैं कि सूक्तो में अप्रचलित, कठिन अथवा दुर्बोध ऐसा कोई स्थान नही, जिसके सम्बन्ध में भाष्यकारो का मत अन्तिम रूप से निर्णायक मान लिया जाय, जब तक प्रकरणवश अथवा समानान्तर अन्य सूक्तों के आधार पर उसकी पुष्टि न हो जाय' (पृ० ५१ ), यह कथन भी अकिंचित्कर है, क्योकि पूर्वापर प्रकरण और प्रमाणान्तर से संपुष्ट किया गया अर्थ का अवधारण निर्दोष माना जाता है । प्रत्येक पद के अनेक अर्थ हो सकते है, इसीलिये उनके तात्पर्य की अवधारणा करने के लिये उपक्रम, उपसंहार आदि तात्पर्य ,के निर्धारक विष लिंग का विचार अपेक्षित रहता है । सायण प्रायः ब्राह्मण ग्रंथो सूत्र ग्रन्थो और निरुक्त की सहायता से मन्त्रों की व्याख्या करते हैं । प्रमाण मिलने पर ही वह यास्काचार्य की व्याख्या से भिन्न अर्थ भी करते हैं । शारद पद के प्रकरण के अनुसार अलग- अलग अर्थ करने में कोई दोष प्रतीत नहीं होता । सैन्धव पद का प्रकरण के अनुसार ही कही लवण और कहीं अश्व अर्थ गृहीत होता हैं । केवल सायण ही नहीं, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति उपस्थित पद या वाक्य को लक्षित करके ही अर्थ करता है । श्रुति परम्परा, व्याकरण, १३२
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वेदार्थपारिजातः तदनुग्रहवशात्१०५० पारम्पर्येणान्ये व्यासजमिनिप्रभृतयो जानन्त्येव वेदार्थम् । तत्पारम्पर्येणान्येऽप्याचार्या वेदज्ञा आसन् सन्ति चाद्यापि । 'किं विधत्तेऽभिधत्ते च किमनूद्य विकल्पयेत् । इत्यस्य हृदय लोके नान्यो मद्वेद कश्चन ॥ इत्यादिश्रीमद्भागवतवचनम् । अपरमिदमपि विज्ञेयं यदेकस्यैव शब्दस्य प्रकरणानुरोधेनार्थभेदा नासङ्गताः । यथा ' विदुष्टे अस्य वीर्यस्थ पूरवः पुरो यदिन्द्र शारदीरवातिरः सासहानौ अवातिर.' (ऋ ० स० १।१३१ ।: ) अत्र शारदोरिति पुरोविशेषणम् । . शरच्छन्दश्च वर्षार्थ दृष्टो यथा जीवेम शरद प्रतनित्यादी। तेन शारदी शरत्सम्बन्धिनी विशेष्यानुरोधेन च ' ' संवत्सरपर्यन्तं प्राकारपरिखादिभिर्दृढीकृत इत्यर्थो युक्त एव दन विश इन्द्र मृधवाच सप्त यत्पुर शर्म शारदीदेर्त (ऋ० १ १७४ । २) अत्र सप्ताना पुरा विशेषणत्वेनोपात्तः शारदाशब्दः प्रत्यग्रार्थक है यद्यदा सप्त पुर शारदी: सर्पणस्वभावात् प्रत्यग्रान् वृष्ट्या जगत्पूरकान् मेघानदारय इति तदर्थो युक्त एव । एवमेव 'सप्त यत्पुर. शर्म शारदोद- र्तन्दाशी: पुरुकुत्साय शिक्षन्' ( ऋ० स ० ३।२१।१०; अत्रापि शारदीरिति पुरोविशेषणम् । तत्रापि दत्त इति विदारित- वानसीति क्रियासम्बन्धादिन्द्रकर्तृक तासा विदारण विज्ञायते । नहि मित्रपुर्यो विवायेते । तस्माच्छरन्नाम्नोऽमुरस्य विदारयितव्याः पुर्योऽभिप्रेयन्ते । यदपि – ' सायण प्रमाणोकृत्य वेदार्थनिर्धारण तथैवासङ्गतम्, यथा हिब्रूभाषाया रचित वायवलपूर्वभाग तल्मूदं व्वीस चाघारीकृत्यागवन्तुं चेष्टा सङ्गता स्यात्' इति, तदपि वेदार्थपद्धत्यज्ञानमूलकम्, सायणभाष्याधारभूत- श्रुतिसूत्रादीनामेव वेदार्थनिर्धारणहेतुत्वात् । नहि तल्मूदरव्वोसौ वायवलपूर्वभागज्ञानदत्वमुपगच्छतः । प्रकृते तु वैदिकानां सर्वसम्मत्या श्रुतिसूत्रसम्मतं व्याख्यान निर्विवादम् । निरुक्त, निघण्टु कल्पसूत्र प्रभृति ग्रंथो की सहायता से हो मन्त्रो का अथ खोजा जा सकता है । यद्यपि परमेश्वर के निःश्वासभूत वेद का वास्तविक अर्थ तो परमेश्वर ही जान सकते है, तथापि उनकी कृपा होने पर परम्परा से व्यास, जैमिनि प्रभूति अन्य ऋषि गण भो वेदार्थ को जान पाते है । उसी परम्परा में अन्य आचार्य भी वेदों के अर्थ को जानते आये है और अब भी है । श्रीमद्भागवत पुराण में बताया गया है कि----- 'यह ईश्वर क्या करता है, क्या कहता है और किसका अनुवाद अथवा विकल्प के रूप म विधान करता है, ईश्वर की इस हृदय की बात को ऐसा कोई व्यक्ति नही है, जो कि यथार्थ रूप में जान सके' । इस प्रसङ्ग में एक बात यह भी जान लेने लायक है कि एक ही शब्द के विशेष कर सम्बन्धी शब्द क प्रकरणवश अनेक अर्थ असङ्गत नही माने जाते । जैसे कि 'विदुष्टे अस्य वीर्यस्य० ' इस ऋचा को हम उदाहरण के रूप में देखें । यहाँ पर 'शारदी ' पद नगर का विशेषण है । शरत् शब्द का अर्थ वर्ष होता है, जैसा कि 'जीवेम शरदः शतम्' इत्यादि स्थलो में देखा गया है । किन्तु यहाँ पर 'शारदी:' पद का 'नगर संबन्धिनी' यह अर्थ होता है । यहाँ पर विशेष्य के अनुरोध से ' संवत्सर पर्यन्त प्राकार, परिखा प्रभूति से सुरक्षित नगर' यह अर्थ करना उचित ही है । 'दनो विश इन्द्र' इस मन्त्र मे सात नगरो के विशेषण के रूप मे स्वीकृत ' शारदा' शब्द 'प्रत्यक्ष' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है कि 'इन सातों नगरो में सर्पण स्वभाव वाले और वृष्टि से जगत् को भर देने वाले मेघो का तुमने विदारण कर दिया' । इसी तरह से ' सप्त यत्पुर ' इस मन्त्र में भी 'शारदी' पद पुर का विशेषण है । यहाँ पर भी 'दर्त्त' अर्थात् विदारित किया है, इस क्रिया के सम्वन्ध से ' इन्द्रकर्तृक पुरो का विदारण' यह अर्थ ज्ञात होता है । मित्र की पुरियो का विदारण नही किया जाता । अतः यहाँ पर 'शरत्' नाम के असुर की पुरियों के विदारण वाला अर्थ किया जाता है । ' सायण को प्रमाण मानकर चलना उतना ही असंगत होगा, जितना हिब्रू भाषा में रचित ' वायबल' के पूर्व भाग को तल्मूद और रब्बीस के आधार पर समझने की चेष्टा करना' ( पृ ० ५१ ) | यह कथन भो वेदार्थ की पद्धति को न समझ पाने के कारण है, क्योंकि सायणभाष्य के आधारभूत ग्रंथ श्रुति, सूत्र प्रभृति हो है, जिनकी सहायता से कि वेदार्थ का निर्धारण होता है | बायबल के पूर्वभाग का ज्ञान तल्मूद और रब्बीस की सहायता से नही मिल सकता, किन्तु प्रकृत स्थल मे तो वैदिक गण सर्वसंमति से यह मानते हैं कि वेदों का श्रुति- सूत्र संमत अर्थ ही प्रामाणिक है ।