वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1321–1330
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1321–1330
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वेदार्थपारिजातः २२१ ९ अनेकार्थे शब्दे शब्दबोध्यो धर्मो लिङ्गम् । यद्यपि मकरध्वजशब्देन समुद्रोऽपि वोध्यते, तथापि न कोपरून लिङ्ग तत्र सम्भव- ' ' ' | 'तीति नात्र स बोध्यते । स्थलारविन्दश्रियम् अत्र स्थलारविन्दशब्दसान्निध्येन श्री गोभा गृह्यते न लक्ष्मी देवः पुरारिः' अत्र देवशब्दसान्निध्यात् पुरारिशब्देन शिवो गृह्यते । 'मधुना मत्त पिक ' अत्र सामर्थ्यात् कोकिलस्य वनन्त एव मत्तत्वान्मधुपदेन वसन्तर्तुर्गृह्यते न मद्यदैत्यादिः । औचिती योग्यता । 'गौरेका तु मनस्विनः' इत्यत्र औचित्यात् गोपदस्य वाणीरूपोऽर्थो न धेनुः । 'विभाति गगने चन्द्र ' अत्राकाशरूपदेशयोगाच्चन्द्रः शशी गृह्यते न कर्पूरम् । 'निशि चित्रभानु ' अत्र निशीथकालयोगाच्चित्रभानुरग्निर्न सूर्यः, रात्रौ सूर्यस्यासम्बन्धात् । 'मित्रो विभाति' अत्र व्यक्तिबलान्मित्रपदेन सूर्यो गृह्यते । व्यक्तिपदेन स्त्रीलिङ्ग-पुल्लिङ्गादिव्यक्तिरुच्यते । यतोत्र मित्रशब्दः पुल्लिङ्गः प्रयुक्तः । मित्रमिति नपुसकलिङ्गेन सुहृद् बोध्यते 1। 'भाति रथाङ्गम्' अत्र नपुंसकलिङ्गप्रयोगात् रथावयवभूत चक्रं बोध्यते न चक्रवाक पक्षी । स्वरेणाप्यर्थो निर्णीयते । 'इन्द्रशत्रो वर्धस्व' इत्यत्र आद्युदात्तत्वे बहुब्रीहिसमासो भवति । तेनेन्द्र शत्रु शातयिता (घातको ) यस्येत्यर्थो भवति । अत्र यजमानस्य इन्द्रस्य शत्रुः शातयितेति तत्पुरुपममासोऽभीष्ट आसीत् । तथा सति ' ( ): समासस्य पा० सू० इत्यन्तोदात्तत्वप्रसक्ति । आद्युदात्तस्वरप्रयोगेण तु विपरीतार्थत्वाद् विपरीतं फल जातम् । ' ' ( ) ' ' ( | | ) गतासुमेतमुपशेष एहि ऋ० स० १०११८।८ अत्रोपशेषे इत्यत्र तिडतिड पा० सू० ८ १ १८ इत्यनेन निघातेन (सर्वानुदात्तेन) शेषे इति क्रिया विज्ञायते, तेन शेते इत्यर्थो भवति । दयानन्देन तु ' शेषे' इति सुबन्तमङ्गीकृत्य पतिदाहार्थ-मागतेषु कञ्चित् पतित्वेन स्वीकुरु इत्यर्थः कृतः । स च स्वरविरुद्धो जातः । शत्रुवाचको भ्रातृव्यशब्दो व्यन्प्रत्ययेन नित्त्वादाद्युदात्तो भवति । भ्रातुष्पुत्रबोधको भ्रातृव्यशब्दो व्यत्प्रत्ययेन तित्त्वात् स्वरितो भवति । एवं स्वरभेदेनार्थभेदो भवति । 'आद्युदात्त क्षयशब्दो' (पा० सू० ६ १२०१ ) निवासवाचको भवति । नाशवाचकः क्षयशब्दोऽन्तोदात्तो भवति । जठरशब्दोऽपि ठकारोपरिस्वरितस्वरयुक्तोऽग्निवाचको भवति, रेफोपरि स्वरितस्वरयुक्त उदरवाचकः । ठकारोपरि स्वरि-तोपेतो ज्येष्ठशब्द प्रशस्तवाचको भवति । ज्ये इत्यत्र इनुदात्तस्वरत्वे महता वाचको भवति । के आधार पर मकरध्वज पद काम का वाचक होगा, समुद्र का नही । 'स्थलारविन्दश्रियम्' इस वाक्य मे स्थलारविन्द शब्द की सन्निधि के कारण लक्ष्मी शब्द शोभा का वाचक होगा, लक्ष्मी का नही । देव शब्द की सन्निधि से पुरारि शब्द से शिव का ग्रहण होगा । कोकिल को मत्त करने की सामर्थ्य वसना ऋतु में ही है, अत मधु शब्द से वसन्त ऋतु का ग्रहण होगा, मद्य, दैत्य आदि का नही । औचिती योग्यता को कहते है । 'गौरेका तु मनस्विन ' यहा औचित्य के आधार पर गोपद का वाणी अर्थ होगा, धेनु नही । 'विभाति , यहा आकाश रूप देश के योग से चन्द्रपद चन्द्रमा का वाचक होगा, कर्पूर का नही । 'निशि चित्रमानु ' यहा रात्रिरूपगगने चन्द्र काल के योग से चित्रभानु पद अग्नि का वाचक होगा, सूर्य का नही । 'मित्रो विभाति' यहा व्यक्ति ( लिंग ) के आधार पर मित्र शब्द सूर्य का वाचक है, क्योंकि पुल्लिंग मित्र शब्द सूर्य का और नपुंसक लिंग सुहृतृ का बोधक होता है । रथाङ्ग शब्द नपुसक लिग के योग से रथ के अवयक चक्र का वाचक होता है, चक्रवाक पक्षी का नही । स्वर से भी अर्थ का निर्णय होता है । 'इन्द्र शत्रु' शब्द मे आद्युदात्त स्वर होने पर बहुव्रीहि समास होता है । तब इसका अर्थ होगा कि इन्द्र जिसका मारने वाला है । यजमान को इन्द्र का शत्रु, अर्थात् इन्द्र को मारने वाला, यह अर्थ अभीष्ट है । इसमे तत्पुरुष समास होगा और तब यह शब्द अन्तोदात्त हो जायगा । आद्युदात्त स्वर के प्रयोग से यजमान को विपरीत फल मिला । इस तरह से स्वर के आधार पर भी अर्थ का निर्धारण होता है । 'उपशेषे' पद मे निघात ( सर्वानुदात्त ) स्वर के आधार पर यह निश्चय होता है कि 'शेष' यह क्रिया है और उसका अर्थ 'सोता है' यह होगा । दयानन्द ने इसको सुबन्त माना है और उसका अर्थ किया है कि पति के दाह के लिये आये हुए पुरुषो मे से किसी को अपना पति बना लो । यह अर्थ उक्त स्वर के विपरीत है । शत्रुवाचक भ्रातृव्य शब्द आद्युदात्त होता है और भाई के पुत्र का बोधक यही शब्द स्वरित होता है । इस तरह से स्वर के भेद से भी अर्थ भिन्न होता है । आद्युदात्त क्षय शब्द निवास का और अन्तोदात्त विनाश का बोधक होता है । जठर शब्द के ठकार पर स्वरित स्वर होने पर यह अग्नि का और रकार पर इसी स्वर के रहने पर वह उदर का वाचक होता है । ठकार के ऊपर स्वरित स्वर रहने पर ज्येष्ठ शब्द प्रशस्त का और ज्ये के ऊपर इसी स्वर के रहने पर महान् का वाचक होता है ।
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वेदार्थपारिजातः २२२० सनातनपरम्पराप्राप्तस्येतिहासपुराणादिप्रसिद्धस्यार्थस्यापह्नवाय यौगिकताछद्मनाऽर्थान्तरप्रदर्शनपरमेव स्वामि- दयानन्दस्य तदनुयायिना वेदार्थव्याख्यानम् | 'सर्वाण्याख्यातजानि नामानि' इति यास्कवचनस्येतावानेवार्थो यद् रूढा योग- रूढाः सर्व एव शब्दा धातुजा एव भवन्ति । परन्तु दयानन्दस्तु तदाश्रयेण तास्तान् धातून् आश्रित्य स्वेच्छयाध्याहृतैः पदैश्च परम्पराविरुद्धानेवार्थान् व्यञ्जयति । तथात्वे चाश्नुतेऽध्वानमिति व्युत्पत्त्याश्रयेणाश्वपदेन गो-गर्दभ- मनुष्य-मार्जार-महिष -हरिण- धूमयानादयोऽप्यर्था गृह्येरन् । अश्वोऽपि चाध्वानमनश्नुवानोऽनश्वो भविष्यति । तथात्वे निघण्टुकृत नियमनं व्यर्थमेव भविष्यति । अतस्तादृशे स्थले यास्कोऽपि योगरूढिमेवाङ्गीकरोति । अत एव मीमांसादर्शने ( ६२८/४१ ) इत्यत्र मीमासा दृश्यते । 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' (तै ० सं० ६| १ | ११ | ६ ) इति श्रुत्या य. कश्चन पशुरालम्भनीय उत छाग इति विमर्शप्रसङ्गे 'छागो वा मन्त्रवर्णात्' ( जै० सू० ६ ८ ३१ ) इति सूत्रे मन्त्ररीत्या छागालम्भनं सिद्धान्तितम् । तत्रैव वादिना ( ६/८/३६ ) सूत्रे छिन्नगमनोऽश्वः छागः, छिदेर्गमेश्च छागशब्द. प्रसिद्ध इति यौगिकताबलाच्छागशब्देनाश्वग्रहणमाशङ्कितम् । परन्तु सिद्धान्ते ' छागेन कर्माख्यारूपलिङ्गाभ्याम्' (जै० सू० ६| ८| ३८) इति सूत्रेण छागशब्दोऽजे रूढोऽभ्युपगतः । तत्र भाष्यम्– 'समुदायो ह्यसौ पृथगर्थान्तरे प्रसिद्ध, नासावयवप्रसिद्धया बाधितव्य, तस्मान्नाश्वरछागः । न चावयवप्रसिद्धया समुदायप्रसिद्धिर्बाध्यते । ( मीमांसादर्शन ६| ८| ४१ ) । एतेन स्पष्टं वेदे रूढाः शब्दा सन्ति । रूढ्या योगस्य बाधो भवति न योगेन रूढिबाधः । अन्यथा स्वातन्त्र्येण यौगिकतामाश्रित्य व्याख्यायां यथेच्छव्याख्यानेऽनियता अव्यवस्थिता लक्षलक्षार्था भविष्यन्ति वेदस्येत्यनाथैव स्यात् । अत एवार्यसमाजस्थविदुषामपि व्याख्यानेष्वैकमत्य न भवति । वेदाः परमात्मना लोककल्याणार्थ लोकभाषयैव प्रादुर्भाविताः । यदि लोकभाषाऽनिश्चिता स्याच्चेत् तदा वेदार्थोऽप्यनिश्चित एव स्यात् । तथाऽव्यवस्थैव स्यात् । संस्कारविधिग्रन्थे १५५ पृष्ठे वरुणशब्दस्य दयानन्देनोत्कृष्ट- व्यवहारे विघ्नरूपोऽव्यसनपुरुषोऽर्थ उक्त । तत. प्राक् १७ पक्त्या वरुणशब्दस्यैवोदानोऽर्थः कृत । सत्यार्थप्रकाशे ६ समुल्लासे सनातन परम्परा से प्राप्त इतिहास, पुराण आदि में प्रसिद्ध अर्थ का अपलाप करने के लिये यौगिक अर्थ के प्रतिपादन के छल से स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी वैदिक शब्दो का मनमाना अर्थ करते है । केवल एक इसी प्रयोजन को सिद्ध करने के लिये उन्होने वेदो की व्याख्याए की है । सभी नाम आख्यातज है, यास्क के इस कथन का इतना ही अर्थ है कि रूढ और योगरूढ सभी शब्द धातु से बनते है । परन्तु दयानन्द इस वचन को बहाना बनाकर मनमानी धातुओ का सहारा लेकर और मनमाने पदो की कल्पना कर उसका परम्पराविरुद्ध अर्थ निकालते है । उनकी इस पद्धति का अनुसरण करने पर तो अश्व पद से गो, गर्दभ, मनुष्य, मार्जार, महिष, हरिण, धूमयान ( रेल ) प्रभृति का भी बोध होना चाहिये । अश्व भी जब मार्ग पर नही चल रहा है, तब अश्व नही कहा जायगा । तब निघण्टु मे बनाये गये नियम व्यर्थ हो जायगे । ऐसे स्थलो मे यास्क ने भी योगरूढि स्वीकार की हैं । इसी आधार पर मीमासा शास्त्र मे चर्चा चलाई गई है कि ' अग्निषोमीय पशुमालभेत' इस श्रुति में जिस किसी पशु का आलतन विहित है या केवल छाग का और मन्त्रवर्ण के आधार पर यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि छाग का आलभन विहित है । पूर्वपक्षी यहाँ यौगिक उत्पत्ति के आधार पर पर छाग पद का अर्थ अश्व करता है । किन्तु सिद्धान्तवादी का कहना है कि छाग शब्द अज मे रूढ है । शाबरभाष्य में भी इस विषय पर विचार किया गया है । इससे स्पष्ट होता है कि वेद में रूढ शब्द भी होते है । रूढि से योग का बाघ होता है, योग से रूढि का नही हो सकता । इसीलिये 'योगाद् रूढिर्बलीयसी' इस न्याय की प्रवृत्ति मानी जाती है । अन्यथा मनमानी पद्धति से यौगिकता का सहारा लेकर मनमाना अर्थ करने पर अनियत और अव्यवस्थित अर्थो के कारण वेद के प्रति अनास्था उत्पत्र हो जायगी । इसी कारण से आर्यसमाजी व्याख्याओं में कही एकता देखने को नही मिलती । लोक के कल्याण के लिये परमात्मा ने लोकभाषा में ही वेदों को प्रवृत्ति की है । यदि लोकभाषा अनिश्चित हो तो वेदार्थ भी अनिश्चित हो जायगा और है तत्र अव्यवस्था ही हाथ लगेगी । संस्कारविधि में स्वामी दयानन्द ने वरुण शब्द का अर्थ 'उत्कृष्ट व्यवहार में विघ्न को दूर करने वाला पुरुष' किया है । इसी ग्रन्थ में पहले इस शब्द का अर्थ उदान किया गया है । सत्यार्थ प्रकाश में इसी शब्द का बन्धनकर्ता अर्थ किया है और यजुर्वेद भाष्य में वरुण का अर्थ श्रेष्ठ किया है । पुन संस्कार विधि में इसका अर्थ 'उदान के तुल्य सर्वशक्तिमान् लिया है ।
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वेदार्थपारिजातः २२२१ ' '८७ पृष्ठे वरुणशब्दस्य बन्धनकृत् इत्यर्थ उक्त । यजुर्वेदीयभाष्ये २२२६ मन्त्रे वरुणाय इत्यत्र श्रेष्ठ इत्यर्थः कृतः । सस्कारविधिग्रन्थे २०३ पृष्ठे 'वरुणस्य' इत्यत्र उदानेन तुल्यः सर्वशक्तिमान् इत्यर्थं कृतः । एतन्निदर्शनमव्यवस्थायाः । ·आकाशमण्डलस्थजलब्यवस्थापकस्य देवस्य वाचको वरुणशब्दो देवतावादे प्रसिद्ध । तदपह्नोतुमय दयानन्दस्य प्रपञ्चः । यजुर्वेदे ( ३।५८-५९ -६० ) इति मन्त्रेषु रुद्रपदस्येश्वरोऽर्थ उक्त | ( ३ ६१ ) इत्यत्र रुद्रपदस्य शूरवीरोऽर्थ कृतः । ( १६।१ ) इत्यत्र रुद्रपदस्य राजार्थ. कृत । सत्यार्थप्रकाशे १ समुल्लासे परमेश्वरवाचको रुद्रशब्दोऽङ्गीकृत । यजुर्वेदे ( ३३।२४ ) इत्यत्र इन्द्रशब्दस्य ईश्वरोऽर्थ । ( ३३।२५ ) इत्यत्र इन्द्रशब्दस्यानेन तृप्तो विद्वानित्यर्थ । ( ३३।२६-२७ ) इत्यत्र तस्येवेन्द्रपदस्य नानारूपः सभापतिरर्थ. कृत । ऋग्वेदे इन्द्रशब्दस्य सूर्योऽर्थः । इत्येव पुराणप्रसिद्धदेवतार्थग्रहणवारणायैव दयानन्दस्यायं निरर्थको व्यापार । आर्याभिविनये शकुनिशब्दस्य ईश्वरोऽर्थः, ऋग्वेदभाष्ये शक्तियुक्तः पुरुषोऽर्थ । यत्र पुराणप्रसिद्धदेवताप्रसङ्गो नास्ति तत्र दयानन्दस्तदीयाश्च रूढ-योगरूढशब्दान् यथाप्रसिद्धि एवाङ्गीकुर्वन्ति । ( ) ( ), ' ' ( | | ), ' ' ( ), ' ' (यथा- गोक्षीर अथर्व० २।२६।४ सूर्य अथर्व० १ १० ३४ पृथिवी अ ० वे ० स० १२११ पिप्पली अ ० वे ० स ० ६।१० ९/ १ ), 'पृश्निपर्णी' (अथर्व० २ २५| १ ), 'स्त्री' ( अ० ० स ० ५| ६१/६ ), ' क्रिमि' ( अ ० वे ० स० ५।३३।३ ), 'चक्रवाक.' ( अ ० वे० स० १४/२/६४ ), 'गृध्र. श्येन:' ( अ ० वे ० स० ११।१०।१२-२४ ), 'शरभ:' (वा० स० १३।५१ ), व्याघ्रः, श्वानः, सिहः ( अ ० वे ० स०४/ ३६/ ६ ), उष्ट्र. ( वा० स० १३। १५ ), 'गवय ' (वा० स० १३।४ ९ ), 'आर्य. दस्युः' ( अ० वे ० स० १/५१1८ ), 'गौ', अजा, अश्व:, अवि., ( वा० सं ० ३।४३, ३१/८ ), 'वाड, मन, चक्षुः श्रोत्रम्' ( वा० स० १८/२), 'अस्थि' (वा ० सं ० ( ), '.,,,,,,,, ( ), ', १८ ३ व्रीहि यवा भाषा तिला मुद्गाः श्यामाका नीवारा गोधूमाः मसूरा वा० स० १८/१२ अश्मा मृत्तिका, गिरय, पर्वताः सिकताः, वनस्पतयः, हिरण्यम्, लोहम्, सीसम्, त्रपु' ( वा० स ०१८ १३ ) इत्यादिषु रूढा योग-रूढाश्च शब्दा स्वीकृताः । यत्र पौराणिकस्यार्थस्य सिद्धिप्रसङ्ग स्यात्तत्रैते (दयानन्दस्तदनुयायिनश्च) यौगिकताश्रयेणाकाण्ड-ताण्डव कुर्वन्ति । बहुत्र मन्त्रेष्वविद्यमानानपि शब्दान् बलात् प्रवेशयन्ति । दयानन्दवत्तदनुयायिनोऽपि यमयमीसूक्तस्य भ्रातृ-भगिनीसंवादरूपस्य पतिपत्नीसंवादरूपत्व कल्पितवन्त । निरङ्कुशैः समाजिभि. 'गन्धर्वा पितरो देवा असुरा रक्षासि' यह एक उदाहरण ही उनकी व्याख्या को अव्यवस्थित सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है । देवतावाद मे वरुण आकाश मण्डल स्थित जल का व्यवस्थापक अधिपति देवता माना जाता है । इस बात को नकारने के लिये ही स्वामी दयानन्द का यह सारा प्रयास है । ऐसा करते समय उन्होने अपनी ही पूर्वापर उक्तियो पर भी विचार करने का कष्ट नही किया है । इसी तरह से स्वामी दयानन्द ने यजुर्वेदभाष्य में रुद्र पद का कही ईश्वर कही शूरवीर और कही राजा अर्थ दिया है । ,सत्यार्थप्रकाश में रुद्र पद का परमेश्वर अर्थ किया है । इन्द्रपद का यजुवेदभाष्य मे ईश्वर अन्न से तृप्त विद्वान् और नाना स्वरूप वाला सभापति अर्थ किया गया है । ऋग्वेद मे इन्द्र पद का सूर्य अर्थ किया है । इस तरह से स्थान-स्थान पर पुराणो मे प्रसिद्ध देवतावाद के निराकरण के लिये स्वामी दयानन्द निरर्थक व्यापार करते रहते है । आर्याभिविनय मे शकुनि शब्द का ईश्वर और ऋग्वेदभाष्य मे शक्तियुक्त पुरुष अर्थ किया है । जहाँ पुराण प्रसिद्ध देवतावाद का कोई प्रसग नही है, वहाँ स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी रूढ और योगरूढ शब्दो ,,,,,,,,,,का अर्थ प्रसिद्धि के अनुसार ही करते है । जैसे कि गोक्षीर सूर्य पृथिवी पिप्पली पृश्निपर्णी स्त्री क्रिमि चक्रवाक गृध्र श्येन शरभ, व्याघ्र, श्वान, सिंह, उष्ट्र, गवय, आर्य, दस्यु, गौ, अजा, अश्व, अवि, वाक्, मन, चक्षु, श्रोत्र, अस्थि, व्रीहि, यव, माष, तिल, मुद्ग, श्यामल, नीवार, गोधूम, मसूर, अश्मा, मृत्तिका, गिरि, पर्वत, सिकता, वनस्पति, हिरण्य, लोह, सीस, त्रपु प्रभृति शब्दो के रूढ और योगरूढ अर्थ हो स्वीकार किये गये है । आर्यसमाजी जहाँ देखते है कि इस वैदिक वाक्य से तो पौराणिक कथन की पुष्टि } , -होती है वही यौगिक अर्थ का सहारा लेने के लिये उछल कूद मचाने लगते है । अनेक स्थलो पर मन्त्रो में अविद्यमान पदों को भी ,,घुसे देते है । इन लोगो ने यमयमी सूक्त को जो कि भाई और बहिन का सवाद है पति और पत्नी का सवाद बना दिया है । इन निरकुश समाजियो ने गन्धर्व, पितर, देव, असुर, राक्षस, इन पञ्चजनो के प्रतिपादक निरुक्त वाक्य को ब्रह्मचर्य गृहस्थ, वानप्रस्थ,
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२२२२ वेदार्थपारिजातः ( नि० ३।८) इति पञ्चजनानां ब्रह्मचर्य -गृहस्थ- वानप्रस्थ-संन्यासाश्रमाः, अनाश्रमश्चार्थः क्रियते । यत्र कथञ्चिदपि स्वानुकूलोऽर्थः कर्तुं न शक्यते तत्र प्रक्षेपोऽङ्गीक्रियते । यत्र तदपि कर्तुं न पारयन्ति तत्रालङ्कारिकमर्थं कल्पयन्ति । अद्यत्वे केचिद् दयानन्दीया वालखिल्यकुन्तापसुक्तसामवेदीयारण्यकपर्वादिवेदाशानामपि प्रक्षिप्तत्व वदन्ति । 'इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा । बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमा नारी प्रजया वर्धयन्तु || ' ( अथर्व० १४/१/५४ ) इति मन्त्रस्य सस्कारविधिग्रन्थे १५४ पृष्ठे दयानन्दो व्याख्यानं करोति W -'हे मत्सबन्धिनो जना यथा विद्युत् प्रसिद्धोऽग्निश्च सूर्यो भूमिश्च अन्तरिक्षस्थो वायु प्राणोदानौ भग ऐश्वर्यम् अश्विनौ सद्वैद्यौ सत्योपदेशकश्च बृहस्पतिः न्यायकृत् बृहत्याः प्रजाया पालको राजा मरुत. सभ्या मनुष्या ब्रह्म सर्वेभ्यो महान् परमेश्वर चन्द्रः सोमलवा ओषधिगण इत्येते सर्वे सर्वप्रजाया वृद्धि पालन च कुर्वन्ति, इमा मदीया स्त्रिय च प्रजया वर्धयन्ति तथैव यूयमपि वर्धयत' इति । अत्र विचारणीय यन्मन्त्रे ' यथा, तथा' इत्यादिशब्दा न सन्ति । किमेषा परमेश्वरस्य त्रुटिरासीत्? 'इन्द्र मित्र वरुणम् अग्निम्' (ऋ ० सं ० २।१६४ (४० ) इत्यत्र तेनैवेन्द्रमित्रवरुणशब्दाना परमेश्वर एवार्थ इत्युक्तम् । एव परस्परविरुद्धार्थाभिधायित्व तदीये वेदव्याख्याने पदे पदे दृश्यते । तद्रीत्या देवविशेषाणा प्रार्थना न सम्भवति परमेश्वरस्यैव प्रार्थनायोग्यत्वात् । परमत्र तेनैवेन्द्रपदस्य विद्युदर्थ' कृत, एव निरङ्कुशत्वमेव तस्य ॥ एवमेव ' इन्द्रः शिर ' (अ० वे ० सं ० ९/ ७/ १-१ ) इत्यत्र मेध्यगो- प्रशंसायाः 'इन्द्रो गोः शिरसि विद्युत् जिह्वाया स्थितौ' इत्युक्तम् । एवं तद्रीत्यैव इन्द्रो विद्युतो भिन्नः सिद्धयति । ऋग्वेदे इन्द्रस्यानेकानि सूक्तानि तद्रीत्या कि तानि विद्युत्स्तुतिरूपाण्येव? तथात्वे रूपान्तरेण मूर्तिपूजैवायाता । 'इमां नारी प्रजया वर्धयन्तु' अत्र वर्धनक्रियाया. कर्तृत्वेनेन्द्रादय उक्ताः । प्रार्थनाया च लोट्लकारोऽस्ति । तथा जडपदार्थाना प्रार्थना । तथा च कथ न दयानन्दो जडपूजको भवेत्? यदि जडप्रार्थनास्तुत्यादयो वेदाना कचित् शैलीति मन्येत तर्हि कथ न मूर्तिपूजाया वैदिकत्व स्यात् । सन्यासाश्रम और अनाश्रम के साथ जोड दिया है । जहाँ ये मनमाना अर्थ नही निकाल पाते तो उस प्रकरण को प्रक्षिप्त बता देते ,, । जिसको ये प्रक्षिप्त भी सिद्ध नही कर पाते उसको ये आलंकारिक अर्थ कह देते है । आजकल के कुछ समाजी बालखिल्यसूक्त कुन्तापसूक्त, सामवेदीय आरण्यक पर्व प्रभृति को भी प्रक्षिप्त कहने लगे हैं । 'इन्द्राग्नी' प्रभृति मन्त्र का सस्कारविधि मे स्वामी दयानन्द ने यह अर्थ किया है - ' हे मेरे सम्बन्धी मनुष्यो, जैसे विद्युत्, प्रसिद्ध अग्नि, सूर्य, भूमि, अन्तरिक्षस्थ वायु, प्राण, उदान, भग ( ऐश्वर्य ), सद्वैद्य अश्विनीकुमार, सत्योपदेशक बृहस्पति, न्याय करने वाला और सारी प्रजा का पालन करने वाला राजा, सभ्य मनुष्य, सबसे महान् परमात्मा, चन्द्र, सोमबल, ओषधिगण – ये सब सारी प्रजा का पालन करते है और उसकी उन्नति में सहायक होते है, साथ ही मेरी इस पत्नी को भी पुत्र आदि देकर इसका सम्मान बढाते ,है उसी तरह से आप लोग भी कीजिये । यहाँ विचारणीय विषय यह है कि मन्त्र मे यथा और तथा शब्द नही है । क्या इसको ?,, परमेश्वर की त्रुटि माना जायगा इन्द्र मित्र वरुण और अग्नि शब्दो का उन्होने केवल ईश्वर अर्थ किया है । इस तरह से परस्पर विरुद्ध अर्थो का प्रतिपादन उनके व्याख्यान में सर्वत्र देखने को मिलता है । उनके मत से केवल परमेश्वर ही प्रार्थना करने योग्य है, अन्य किसी की प्रार्थना नही की जा सकती । किन्तु उन्होने ही सस्कारविधि के उक्त मन्त्र मे इन्द्र पद का विद्युत् अर्थ कर उससे ( )प्रार्थना भी की है ॥ इस तरह से सर्वत्र इनकी निरकुशता देखी जा सकती है । इसी तरह से मेध्य पवित्र गाय को प्रशसा करते हुए स्वामी दयानन्द कहते है कि इसके शिर पर इन्द्र और जिह्वा मे विद्युत् विराजमान है । स्पष्ट है कि इस प्रकरण में ?उन्होने इन्द्र को विद्युत् से भिन्न माना है । ऋग्वेद में इन्द्रपरक अनेक सूक्त है । क्या वे सब विद्युत् की स्तुति मे विनियुक्त है ' 'तब तो यह प्रकारान्तर से मूर्तिपूजा ही हो गई । इमा नारी ० मन्त्र में वर्धन क्रिया के कर्ता इन्द्र प्रभृति माने गये हैं । यहाँ लोट् लकार प्रार्थना के लिये प्रयुक्त है । इस तरह से यह सब जड पदार्थों के प्रति ही तो प्रार्थना हुई । तब दयानन्द को जड पदार्थों का पूजक क्यों न माना जायगा । यदि जड़ पदार्थों की स्तुति आदि करना वेदो की एक विशेष शैली माना जायगा, तो मूर्तिपूजा-वैदिक नहीं है, ऐसा कैसे कहा जा सकता हैं ।
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वेदार्थपारिजातः २२२३ ‘ यत्र तत्र इन्द्रशब्देन परमेश्वरो गृह्यते' (स० प्र० १ समुल्लासपृष्ठ ३ ) अत्र तु विद्युद् गृह्यते । हे मत्सबन्धिनः मरुतः सभ्यमनुष्या इमा मदीया स्त्रिय प्रजया वर्धयन्तु । हे सम्बन्धी लोगो जैसे सभ्य मनुष्य इस मेरी स्त्री को प्रजा से बढाया करते है, वैसे तुम भो बढाया करो । ' विचित्रोऽयमर्थः । देवपूजापनोदने प्रवृत्तेन तेनैतदनौचित्य नालोचितम् ॥ सा स्त्री वरस्य पत्नी सर्वेषा सम्बन्धिना वा? अन्यथा कथ सम्वन्धिन सभ्या मनुष्याश्च कस्यचित् स्त्रिय प्रजया वर्धयेरन् । कि वरोऽसमर्थो येन सन्तानोत्पादनायान्ये प्रार्थ्यन्ते, कि पतिमेकादशं कृधीत्यस्य मन्त्रस्य स्वाभिमतार्थचारितार्थ्याय एष प्रयत्नः? वस्तुतस्तु मरुतो देवविशेषा । 'अश्विनी' इति शब्दस्य सद्वेद्य सदुपदेशकरच कथमर्थ? निरुक्तस्य प्रामाण्यमभ्यु-पगच्छता कथं तद्विपरीतोऽर्थोऽभ्युपगम्यते? 'अथातो द्युस्थाना देवता, तासामश्विनौ प्रथमागामिनी । ( निरु० १२ १ ) इति लोकदेवतात्वेन निरुक्ते स्पष्टमेव । देवयोनिर्मनुष्येभ्यो भिन्नत्वेन सिद्धैव । मरुतः पदस्यापि देवताविशेष एवार्थ । 'अथातो मध्यस्थाना देवताः । तासा मरुत प्रथमागामिनो भवन्ति' (निरु० ११ | ३ ) ( सप्त सप्त मारुतो गण ' ( शतपथे २/५ | १ | १३ ) कि मनुष्या एकोनपञ्चाशत्सख्याका एव भवन्ति? 'मरुतो देवता:' (वा० स० १४।२० ) किमेतानि प्रमाणवचनानि नावलोकितानि? किञ्च, 'इस मेरी स्त्री को प्रजा से बढाया करते है, वैसे तुम भी बढाया करो? इत्यर्थे 'जैसे ' ' वैसे ' इति पदद्वय लिखितम् । कुत एतल्लब्धम्? मन्त्रे तु किमपि तादृश तद्बोधक वा पद नास्त्येव । 'बृहस्पतिशब्दस्य राजा कथमर्थ.? 'बृहस्पतिर्देवता' (वा० सं० १४ २० ), ' तबृहतोः करपत्योश्चोरदेव- तयोः सुट् तलोपश्च' ( पा० सू० ६। १ । १५७- १ ) इति वेद- वेदाङ्गवचनानि कथमुपेक्षितानि । तथैवाग्निपदस्य कचित्परमेश्वरः कचिद् भौतिकोऽग्नि कचिद् विद्वान् कचिद्राजा कचिदमात्यः कचित्सेनापतिरर्थ कृत । किमत्र मूलम्? वस्तुतस्तु एकस्या- सत्यस्य समर्थनायानेकेषामसत्यानायाश्रयण कर्त्तव्यतयाऽऽपतत्येव । तथैवेन्द्रपदस्य कचिदीश्वरः कचिद्राजा कचित्सूर्यः कचिद्विद्युत् कचिदैश्वर्ययुक्तो नियोगी पुरुष कचिदात्मा कचिद्वायु क्वचिदन्योऽर्थः ( सस्कारविधि पृष्ठ १८) । अश्विशब्दस्यापि सत्यार्थप्रकाश मे यत्र तत्र इन्द्र पद का अर्थ परमेश्वर किया है और सस्कारविधि मे उक्त मन्त्र की व्याख्या में इसका अर्थ ' यह अर्थविद्युत किया है । 'हे सम्बन्धी लोगो, जैसे सभ्य मनुष्य इस मेरी स्त्री को प्रजा से बढाया करते है, वैसे तुम भी बढायाहुई । करोवह स्त्री वर भी बडा विचित्र है । देवपूजा के खण्डन करने में प्रवृत्त स्वामी दयानन्द को इस महान् अनौचित्य की प्रतीति नही प्रजा कीकी पत्नी है या सभी मबन्धियो की? अन्यथा सम्बन्धी और सभ्यजन किसी की स्त्री मे प्रजा की वृद्धि कैसे करेंगेअर्थ को। चरितार्थक्या वर करने के वृद्धि करने में असमर्थ है कि वह इनसे प्रार्थना करता है । क्या ' पतिमेकादश कृधि' इस मन्त्र के स्वाभिमत अश्विनौ' पद का भी सद्वैद्य यालिए यह सारा प्रयत्न किया गया है । वस्तुत मरुद्गण एक विशेष प्रकार के देवताओ का समूह हे ।आप' यहाँ किस लिये करते है? सदुपदेशक अर्थ नही हो सकता । जब आप निरुक्त को प्रमाण मानते है तो उसके विपरीत अर्थ हम अनेक स्थलो पर सप्रमाण अश्विनीकुमार द्युलोक के देवता है, यह निरुक्त मे स्पष्ट है । देवयोनि मनुष्ययोनि से भिन्न है, इसका प्रतिपादन कर चुके है । ) देवताओ मे मरुत को प्रधान 'मरुतः' पद का भी अर्थ देवता विशेष ही होता है । निरुक्त मे मध्यस्थानीय ( अन्तरिक्ष स्थित की संख्या ४ ९ ही है? ' मरुतो देवता " जैसे देवता माना है । शतपथ ब्राह्मण में इनके सात सात गणों का वर्णन है । क्या मनुष्यो बढाया करते है, वैसे तुम भी बढाया करो ' इस ' श्रुतिवचन क्या आपकी दृष्टि से ओझल रहे है । आपने इस मेरी स्त्री के जैसे प्रजा से पद विद्यमान नही है । बृहस्पति शब्द अर्थ मे जैसे और तैसे इन दो पदो को लिखा है । ये कहाँ से आये? मन्त्र मे तो इसके बोधक सूत्र के आधार पर यह एक देवता है । इनका अर्थ आप राजा किस प्रमाण के आधार पर करते हैं? वाजसनेय श्रुति और पाणिनि है? आप अग्नि पद का अर्थ कहीं परमेश्वर, कही भौतिक अग्नि, कहीं वेद और वेदाग के वचनो की आप उपेक्षा किस प्रकार कर सकते एक असत्य बात का समर्थन करने के विद्वान्, कही राजाJ कही अमात्य और कहीं सेनापति करते हैं । इसमें क्या प्रमाण है? वस्तुतकही राजा कही सूर्य, कही विद्युत्, कही लिये अनेक असत्यों का सहारा लेना हो पडता है । इसी तरह से इन्द्र पद का कही ईश्वर है । अश्वि शब्द का कही स्त्री और पुरुष, ऐश्वर्ययुक्त नियोगी पुरुष, कही आत्मा कही वायु और कही कुछ दूसरा ही अर्थ किया गया
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वेदार्थ पारिजातः २२२४ कचित् स्त्रीपुरुषी ( सत्यार्थप्रकाशे, पृष्ठ ७१ ), क चिद् वैद्योपदेशकौ ( संस्कारविधि ९ ५५ ), कचित्सूर्यचन्द्रौ, पितृशब्दस्य क्वचित् प्रजारक्षकः (वा० स० १९/ ४५), पित्रादयो महान्तः ( वा० सं ० १ ९ ४ ९ ), कचिच्चान्नविद्यादीनां रक्षकः, जनक ", अध्यापकः (वा० स० १ ९ / ५ ९ ), अन्यत्र विद्वान् । यमशब्दस्य कचिद्यथावन्न्यायकृद्राजा ( वा० स० १ ९ / ४५ ), कचिन्याययोगयुक्तः पुत्रादि: (वा० स० १ ९/ ५९ ), कचिन्मण्डलशासक: ( मजिस्ट्रेट ), कचिद्वायुः, कचित्परमात्मा चार्थः कृत । एव प्रकारेण वेदे सर्वत्र प्रतिपादितस्य सनातनधर्मस्यापह्नवाय स्वकपोलकल्पिता अर्थाः प्रदर्शिताः । यौगिकताव्याजेन प्राचीनप्रामाणिकभाष्य- विरुद्धा अर्थाः कल्पिताः । एवमेव निरुक्तव्याख्यानेऽपि तथैवासङ्गतयः । अग्निः पृथिवीस्थान, वायुर्वा इन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थान, सूर्यो :' ( ) | स्थान निरु० ७/५ पृथिवीस्थानोऽग्निलौकिकोऽग्निः इन्द्रः अन्तरिक्षस्थानः विद्युतामधिष्ठातृदेवोऽपि । सूर्यो धुलो- कस्थो देव ', विस्तरेण तद्व्याख्यानमपि तत्रैव दृश्यते । 'अग्निः पृथिवीस्थानः, त प्रथम व्याख्यास्याम ' ( निरु० ७ १४ ), तस्य अग्निः जातवेदाः वैश्वानर इति त्रीणि पदानि' ( नि० ७।२१ ) इत्यग्नेरेव नामत्रयमुक्तम् । अत्रैव स न मन्येत अयमेवाग्निरिति, अपि एते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते' (नि० ७ १७) इत्यादिना यदि कथञ्चिदग्निगब्देन विद्युतमेव सूर्यमेव तमेव वा गृह्णीयान्न पार्थिवाग्निमिति । यतस्ततो नु मध्यमः (अग्निः) ' अभिप्रवन्त समनेव योषा अग्निः' (ऋ० ४| ५८।८) इति मन्त्रेऽ- ग्निपदेन मध्यमो विद्युद्रूपेण दृष्ट ' (नि० ७ १७) समुद्रादूर्मिर्मधुमान् उदारत्' (ऋ० ४| ५८ १ ) इत्यग्निलिङ्गके मन्त्रे सूर्योऽपि ' • ' ( | ) दृष्टः । तथैव विद्युद्वाचकस्य जातवेदस अभिप्रवन्त हर्यति जातवेदा ऋ ० ४ ५८ ८ इति मन्त्र उद्धृतः । सूर्यवाचकस्य 'उदुत्यं जातवेदसम्' (ऋ० १५० १ ) इत्ययं मन्त्र उदाहृतः । तस्मादग्नेर्न केवल पार्थिवोऽग्निरर्थः, इत्याशड्क्य यास्केन समाहितम् —'यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरूप्यते, अयमेव सोऽग्निः । निपातमेवैते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते ।' (नि० ७ १८ ) वेदसूक्तेषु यस्याग्निशब्देन वर्णनं भवति, यस्मै च यज्ञेषु हविर्दीयते सोऽय पार्थिवोऽग्निः । यदि क्वचिदग्निपदेन कही वैद्य और उपदेशक, कहो चन्द्र ओर सूर्य अर्थ किया गया है । पितृ शब्द का कही प्रजा का रक्षक, कही महान् पुरुष, कही अन्न और विद्या का रक्षक, जनक, अध्यापक और कही विद्वान् अर्थ किया गया है । यम शब्द का कही यथोचित न्याय करने वाला राजा, कही न्याय और योग से युक्त पुत्र आदि, कही मण्डल का शासक ( मजिट्रेट ), कही वायु और कही परमात्मा अर्थ किया गया है । इस तरह से वेद मे सर्वत्र अपनी कपोल कल्पना के आधार पर अराजकता सी मचा दी गई है, एक मात्र इस क्षुद्र प्रयोजन के लिये कि वेद के किसी भी वाक्य से सनातन धर्म की गन्ध न आने पावे । यौगिकता के बहाने इन लोगो ने सभी प्राचीन प्रामाणिक भाष्यो के विपरीत अनोखे अर्थ निकाले है । इनके निरुक्त के व्याख्यान मे भी इसी तरह की असगतिया है । निरुक्त में बताया गया है कि अग्नि पृथिवी स्थान, वायु अथवा इन्द्र अन्तरिक्ष स्थान और सूर्य द्युस्थान का देवता है । अग्नि का तात्पर्य लौकिक अग्नि से है । इन्द्र विद्युत् का भी अधिष्ठाता है । निरुक्त में ही इसकी विस्तृत व्याख्या1 भी मिलती है कि पहले हम अग्नि की व्याख्या करते हैं । तब अग्नि, जात- वेदा और वैश्वानर ये उसके तीन नाम बताये है । तब कहा है कि यह नही मान लेना चाहिये कि यह लौकिक अग्नि ही अग्नि है, किन्तु अन्य दो ज्योतिया भी अग्नि ही कही जाती है । अत विद्युत् और सूर्य को भी अग्नि ही कह सकते है । 'समनेव योषा अग्निः' इस ऋमन्त्र मे मध्यम पद विद्युत् को अग्नि कहा गया है । अग्निलिंग वाले मन्त्र मे सूर्य का भी उल्लेख मिलता है । इसी तरह विद्युत् वाचक अग्नि का उल्लेख 'अभिप्रवन्त० ' प्रभृति ऋमन्त्र में भी किया गया है । 'उदुत्य जातवेदसम्' प्रभृति ऋमन्त्र मे भी सूर्यवाचक अग्नि उल्लिखित है । अत अग्नि पद का अर्थ केवल पार्थिव अग्नि तक ही सीमित नही है । इस तरह से शंका उठाने के बाद स्वयं यास्क ने उसका समाधान भी किया है कि वैदिक सूक्तों में जिसका अग्नि शब्द से वर्णन है और यज्ञों में जिसको हवि अर्पित की जाती है, ' वह पार्थिव अग्नि ही है । यदि कही अग्नि पद से विद्युत् और सूर्य का भी ग्रहण किया जाता है, तो वहा अग्नि पद का प्रयोग गौण ही माना1 जायगा । इस निरुक्त वाक्य के स्पष्ट निर्देश के होते हुए भी इसकी उपेक्षा कर स्वामी दयानन्द कहीँ 1 Jha ईश्वर, कहीं राजा और कही अग्नि इस तरह से स्वतन्त्र मनमाना अर्थ करते हैं ॥ यास्क ने यहा पर 'अग्निमीले' प्रभृति मन्त्र को
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वैदाथपारिजातः विद्युत्सूर्यश्चाभिधीयते, तत्र गौणरूपेणाग्निशब्द प्रयुज्यते । दयानन्दस्तु क्वचिदीश्वरः क्वचिद्राजा क्वचिदग्निरिति स्वातन्त्र्य-मेत्र भजते । यास्केनात्र ' अग्निमीळे पुरोहितम्' (ऋ० स० १ १ १ ) इति मन्त्र उद्धृतः । दयानन्देन तु मूर्तिपूजासिद्धिभीत्या-ऽत्रापि परमेश्वर एवाग्निशब्देन गृहीतः । किन्तु 'अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभि ' (ऋ ० स० १ १ २ ) इति मन्त्रे यास्कानुसारेण पार्थिवोऽग्निर्गृहीत' । दयानन्देन तु तद्विरुद्धमेव परमेश्वरोऽर्थो गृहीत । 'अत्र यज्ञेषु प्रणीयते, अथवा अङ्ग नयतीत्यग्निःभजेते' पृथिवीस्थानः । त प्रथमं व्याख्यास्यामः । स न मन्येतायमेवाग्निरिति । अपि एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन इति निरुक्तवाक्यस्य दयानन्दकर्तृकं बलात्कारेणान्यार्थकरणमपि स्पष्टं दृश्यते । अत्र प्रकरणमतिक्रम्य पूर्वपक्षमुत्तरपक्षतया योजयित्वाऽकाण्डताण्डवमेव कृतमेतेन । 'अग्निर्वा सर्वा देवता ' (नि० ७ १७) इति ब्राह्मणवाक्यमेतदर्थ निरुक्त उद्धृत्याग्नि- शब्दो न केवलपार्थिवाग्निवाचक:, किन्तु इन्द्र (विद्युत्) -सुपर्णगरुत्मदादीनामपि गौण्या वृत्त्याऽग्निपदेन बोधो भवत्येव । ब्राह्मणोक्तस्यार्थस्य पुष्ट्ये 'इन्द्र मित्र वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य स सुपर्णो गस्त्मान् । एक सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं ' ( / ) मातरिश्वानमाहुः ॥ ऋ० सं ० १।१६४ ४६ इति मन्त्रोऽपि यास्केनोपस्थापित । तेनेन्द्रसूर्यादिदेवतानामग्निशब्देन स्तुतिर्भवति । 'निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी (नि० ७।१८) अत्र दयानन्द: -'इन्द्र मित्र वरुणमग्निमाहु · अग्नि यम मात- ' ', परन्तुरिश्वानमाहुः इति मन्त्रेऽग्निपदस्य द्विरावृत्त्या एकेनाग्निपदेन भौतिकोऽग्निरपरेण परमेश्वरो गृह्यतेत्रयस्यैवइत्याहवर्णनं प्राक-यास्कीये प्रकरणे परमेश्वरस्य किञ्चिदपि वर्णनं नास्ति । तत्र तु अग्निविद्युत्सूर्यलक्षणाना ज्योतिषान परमेश्वरः । तस्माद्यास्क- ( ) ' ( / )रणिकम् । उक्तमन्त्रस्य वैदिकयन्त्रालय अजमेर सस्करणनाम्नाऽन्यार्थकरण निरुक्तकण्डिकया बलात्कार एव । दयानन्दरीत्या ऋक्संहिताया'उत्तरेसूर्योज्योतिषीदेवता निर्दिष्टाएतेन नामधेयेन भजेते नि०७ १८ । भ्रान्तिनिवारणे ग्रन्थेऽत्र स्पष्टं प्रकरणं । परमेश्वरस्य मनागप्यत्र चर्चा नास्ति अस्य वचनस्यायमर्थो यद् अग्निनाम्ना भौतिक परमेश्वरश्चेति ज्योतिर्द्वय गृह्यते ।गोपयित्वा धूलिप्रक्षेपः कृतः । अत्र विद्युत्सूर्यश्चेति ज्योतिर्द्वयमेव प्राकरणिकम् होने लगे, इस भय के मारे यहा भी अग्नि पद का अर्थ, ', उद्धृत किया है किन्तु दयानन्द ने कही इस मन्त्र से मूर्तिपूजा न सिद्ध मन्त्र मे भी पार्थिव अग्नि ही गृहीत होता है किन्तु ' परमेश्वर किया है । इसी तरह से निरुक्त के अनुसार अग्नि' पूर्वेभिर्ऋषिभि ' वाक्य का अर्थ । अग्न यज्ञेषु प्रणीयने नामधेयेन भजेन इस निरुक्तदयानन्द ने यहा भी उसका अर्थ परमेश्वर ही किया है ध्यान में रखे पूर्वपक्ष को ही व्याख्या सिद्धान्त पक्ष केदयानन्द ने जबर्दस्ती कुछ दूसरा ही किया है । उन्होने बिना प्रकरण को देवता ' इस निरुक्त उद्धृत ब्राह्मण वाक्य को इस प्रकरण - ', ( ),,रूप में कर दी है । यह उनकी असमय की उछल कूद है । अग्निर्वा सर्वा है किन्तु इन्द्र विद्युत् सुपर्ण गरुत्मान् प्रभृतिका प्रदर्शित अर्थ की पुष्टि के लिये वे ' इन्द्रं के साथ जोडकर वे कहते है कि अग्नि शब्द न केवल पार्थिव अग्नि का वाचक मित्र वरुण ० भी गौणी वृत्ति के सहारे अग्नि पद से बोध होता है । इस ब्राह्मण वाक्य द्वारा भी उद्धृत करते हैं । इससे सिद्ध है कि अग्नि शब्द प्रभृति मन्त्र को भी उद्धृत करते है और कहते है कि इस मन्त्रस्तुतिकोकीनिरुक्तकारजाती हैं । से इन्द्र, सूर्य, वरुण, सुपर्ण, गरुत्मान् प्रभृति सभी देवताओ की है कि ' इन्द्र मित्रं प्रभृति मन्त्र मे अग्नि पद 'निपातमेव ' इस वाक्य खण्ड की व्याख्या करते हुए स्वामी दयानन्दपरमेश्वरकहतेका बोधक है । परन्तु यास्क के निरुक्त के इस दो बार आया है । इनमें से एक अग्नि पद भौतिक अग्नि का तथा औरदूसरासूर्य इन तीन ज्योतियो का ही वर्णन किया गया है । उक्त प्रकरण में परमेश्वर की कोई चर्चा नहीं है । वहा तो अग्नि, विद्युतभी सूर्य हो देवता बताया गया है, परमेश्वर नही । अत यास्क के नाम, ' ' मन्त्र का वैदिक यन्त्रालय अजमेर के ॠग्वेद के सस्करण मे । दयानन्द की पद्धति से उत्तरे ज्योतिषीपर उनके ग्रन्थ का मनमाना अर्थ करना निरुक्त की कण्डिका के साथ ज्यादती ही है होता है । भ्रान्ति निवा-प्रभृति वाक्य का यह अर्थ है कि अग्नि के नाम से भौतिक अग्नि और परमेश्वर दोनो ज्योतियो का ग्रहण विद्युत और सूर्य इन दो रण नामक ग्रन्थ में यहा के स्पष्ट प्रकरण को छिपा कर धूल झोकने का प्रयास किया है । वस्तुत यहा पर २७९
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वेदार्थपारिजातः '२२२६ भौतिकोऽग्निस्तु प्रथम ज्योतिर्नोत्तरम् । एवम्—'अग्निर्वा सर्वा देवता इति निर्वचनाय' (नि० ७ १८) इति निरुक्तवचनस्यार्थ दयानन्दो लिखति - इस वचन का अर्थ निरुक्तकार करते है, जिनको बुद्धिमान् लोग अनेक नामो से वर्णन करते है, जो कि अद्वितीय सबसे बडा सबका आत्मा है उसको अग्नि कहते है ।' परमेतत्सर्वथाऽसत्यमेव, निरुक्तकारेण कापि तथाविधस्यार्थ- स्यानुक्तत्वात् । निरुक्तकारदृष्ट्या महान् आत्मा सूर्य एवेष्ट । एव प्राकरणिकोऽर्थ । मन्त्रस्य देवतापि सूर्य एव । 'इस अग्नि नामधेय से दोनो उत्तर ज्योति, अर्थात् अनन्तज्ञानप्रकाशयुक्त परमेश्वर और जो विद्युत् रूप भौतिक अग्नि है इन दोनों का यथावत् ग्रहण होता है । ' सर्वथाप्ययमर्थो दयानन्दकपोलकल्पित एव । निपातमित्यस्य निरुक्तदृष्ट्या गौणतैवार्थः । दयानन्देन तु सूर्यमपनोद्य तत्स्थाने परमेश्वरः स्थापितः । 'अग्ने यज्ञेषु प्रणीयते । अङ्गं नयतीति' यास्केन भौतिकस्याग्नेनिर्व- चनं कृतम् 1। दयानन्दस्तु –'अग्निशब्द परमेश्वर और भौतिक अर्थो मे लिया जाता है । यह निरुक्त का अभिप्रायार्थ है ' इत्याह । किन्तु वस्तुदृष्ट्या निरुक्तस्यास्मिन् प्रकरणे परमेश्वरचर्चापि नास्ति । ' अग्निः पृथिवीस्थानः' ( नि० ७/५ ) इत्यत्र निरुक्तवाक्ये लौकिकस्याग्नेर्वर्णनं प्रकृतम् । दयानन्दस्तु प्रत्यक्षसिद्धेऽपि धूलिप्रक्षेप कुर्वन् कथयति - 'कि परमेश्वरः सर्वव्यापकत्वात् पृथिवीस्थानो न भवति?"” किन्तु प्रथमं तु परमात्मन उत्तर- ज्योतिष्ट्व साध्यते स्म । इदानी तस्यैव अधरज्योतिष्ट् पृथिवीस्थानत्वमपि साधयितु प्रयत्यते । परन्त्वनेनायासेन मूर्तिपूजापि तेनाङ्गीकृताऽनिच्छतापि । यदि परमेश्वरः पृथिवीस्थानोऽप्यङ्गीकृतस्तदा ' यस्य पृथिवी शरीरम्' (बृ ० ३।७।३ ) इति रीत्या कुतो न पार्थिवमूर्तावपि व्यापकत्वात् तत्र तत्पूजा स्यात्? वस्तुतस्तु यास्कदृष्ट्या पृथिवीस्थान इत्यनेन पार्थिवोऽग्निरेव विवक्षित । नात्र परमात्मगन्धोऽपि । तत्र तस्य चर्चा नास्तीत्युक्तमेव । 'यस्य पृथिवी शरीरम्' इत्यस्य व्याख्याने तत्रैवोक्तम्— 'जिस परमेश्वर के शरीर के समान पृथिवी है, जो पृथिवी मे व्यापक होकर उसमे नियम से रहता है' अत्र तेन परमेश्वरस्य ज्योतियो का प्रकरण होने से उन्ही का ग्रहण होना चाहिये । परमेश्वर की यहा कही भी थोडी सो भी चर्चा नही है । भौतिक अग्नि तो प्रथम ज्योति है, उत्तर नही । इसी तरह से 'अग्निर्वा ० ' प्रभृति निरुक्त वाक्य का दयानन्द यह अर्थ करते है —' इस वचन का अर्थ निरुक्तकार करते है, जिनको बुद्धिमान् लोग अनेक नामो से वर्णन करते है, जो कि अद्वितीय सबसे बडा सबका आत्मा है, उसको अग्नि कहते है । किन्तु यह सब असत्प्रलाप है, निरुक्तकार ने कही भी ऐसा अर्थ नही किया है । निरुक्तकार की दृष्टि से महान् आत्मा सूर्य ही माना गया है । यही प्राकरणिक अर्थ भी होगा । मन्त्र का देवता भी सूर्य ही है । इस अग्नि नामधेय से दोनो उत्तर ज्योति, अर्थात् अनन्तज्ञानप्रकाश युक्त परमेश्वर और जो विद्युत्रूप भौतिक अग्नि है, इन दोनों का यथावत् ग्रहण होता है । यह सारा अर्थ स्वामी दयानन्द की मात्र कपोल-कल्पना है । निपात पद का अर्थ निरुक्तकार की दृष्टि से गौणता होता नन्द ने यहा सूर्य का अर्थ परमेश्वर किया है । 'अग्रे यज्ञेषु ' प्रभृति निरुक्त वाक्य मे भौतिक अग्नि का निर्वचन किया गया है । दयानन्द कहते है कि 'अग्नि शब्द परमेश्वर और भौतिक अर्थों में लिया जाता है, यह निरुक्त का अभिप्रायार्थ है । हम अनेक बार लिख चुके है कि वस्तुत इस प्रकरण मे परमेश्वर की कोई चर्चा नही है । ' ' अग्नि पृथिवीस्थान इस निरुक्त वाक्य में लौकिक अग्नि का वर्णन है । दयानन्द इस प्रत्यक्ष सिद्धि विषय पर भी ? धूलिप्रक्षेप करते हुए कहते है कि क्या सर्वव्यापक परमेश्वर पृथिवी पर भी निवास नही कर सकता पहले परमात्मा को ,उत्तरज्योति सिद्ध किया गया है । अब उसी को अधरज्योति अर्थात् पृथिवी पर निवास करने वाला भी सिद्ध किया जा रहा है । ,स्वामी दयानन्द की इस व्याख्या से मूर्तिपूजा भी सिद्ध हो जायगी इसका उनको ध्यान नही रहा । यदि परमेश्वर को पृथिवी पर निवास करने वाला मान लिया गया तो 'यस्य पृथिवी शरीरम्' इस श्रुति के अनुसार क्यो न वह पार्थिव मूर्ति में भी व्यापक माना J. ' ',जाय और क्यो न वहाँ उनकी पूजा की जाय । वस्तुत यास्क की दृष्टि से पृथिवीस्थान पद से पार्थिव अग्नि का बोध होता है परमात्मा की यहाँ कोई चर्चा नही है ॥ 'यस्य पृथिवी शरीरम्' इसकी व्याख्या दयानन्द ने यह की है-' जिस परमेश्वर के शरीर के समान पृथिवी है, जो पृथिवी में व्यापक होकर उसमें नियम से रहता है । यहाँ उन्होंने परमात्मा का शरीर भी मान लिया है और परमेश्वर के देह के तुल्य पृथिवी को माना है । निरुक्तकार ने इसको हविप्रदान करने की बात कही है । इस तरह से जब
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वेदार्थपारिजातः २२२७ शरोरमप्यङ्गोकृतम् । अथ च परमेश्वरस्य देहेन तुल्या पृथिवी स्वीकृता । निरुक्तकारण यस्मै हविर्दीयत इत्यप्युक्तम् 1। तथा च मूर्तिपूजाविरोधी सन् मूर्तिपूजकोऽपि 1। यदि सोऽग्निर्मूर्तिद्वारा वरुणाय स्वाहा इन्द्राय स्वाहा इत्यादिमन्त्रैरीश्वराय हविः प्रयच्छति, तदा दयानन्दो मूर्तिपूजकोऽपि । तस्य सर्वथा मन्त्रस्यार्थापते पदे पदे प्रमाद । निरुक्तस्यार्थापने तस्यानभिज्ञता, छद्म, असत्यभाषण वा सिद्धयति । आप यहाँ परमात्मा की चर्चा मानते है तो अगत्या उनकी हवि प्रदान रूप पूजा भी आपको माननी पडेगी । तब तो आप मूर्तिपूजा ' ' ' ' के विरोधी होते हुए मूर्तिपूजक भी बन गये । यदि आप अग्निमूर्ति की पूजा के द्वारा वरुणाय स्वाहा इन्द्राय स्वाहा इत्यादि मन्त्रो से ईश्वर को हवि प्रदान करते है, तो आप मूर्तिपूजक हो ही गये । इस तरह से स्वामी दयानन्द की वेदव्याख्या कही कही स्वयं उनके मत के भी विपरीत पडती है । निरुक्त के उक्त अर्थ को देखने से भी उनकी अनभिज्ञता प्रकट होती है ॥ अथवा यह प्रतीत होता है कि वे छलकपट पूर्वक असत्य भाषण कर लोगो को ठगने का प्रयास कर रहे है । ,
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चतुर्थ परिशिष्टम् श्रीसूक्तभाष्यम् हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम् ॥ चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१ ॥
हिरण्यवर्णामिति पञ्चदशर्चस्य सूक्तस्य आनन्द-कर्दम-चिक्लीतेन्दिरासुता ऋषयः, सूक्तेऽस्मिन्नाद्यास्तिस्रोऽनुष्टुभः का सोऽस्मीति चतुर्थी बृहती, चन्द्रा प्रभासाम्, आदित्यवर्णे इति पञ्चमीषष्ठयो त्रिष्टुभो, ततोऽष्टावनुष्टुभः, ता म आवह इति पञ्चदशी प्रस्तारपङ्क्तिछन्दस्का इति नानाछन्दासि, श्रयग्नी देवते हिरण्यवर्णामिति ऋग्बीजम् का सोऽस्मितामिति शक्तिः, ता म आवह जातवेद इति ऋचौ कीलकम् । पृथ्वीधराचार्यरीत्या ता म आवह जातवेद इति शक्तिः कीर्तिमृद्धि ददातु मे इति कीलकम् । श्री बीजं ह्री शक्तिः क्ली कीलकम् इत्यपरे । श्रीसूक्तस्थहलो बीजानि, स्वराः शक्तय., बिन्दवः कीलकमिति परे । श्रीलक्ष्मीप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे होमे वा विनियोग. । हे जातवेद: । जात उत्पन्न वेदो ऋग्वेदो ज्ञानं वा यस्मादसौ जातवेदाः, तत्सम्बुद्धौ हे जातवेदः, हे जातप्रज्ञ 1 ., अथवा जातानि भुवनानि धनानि वा वेद जानातीति जातवेदा तत्सम्बुद्धौ हे जातवेद अग्ने त्व हिरण्यवर्णा हिरण्यस्य सुवर्णस्य वर्ण इव वर्णो (कान्तिर्वा ) यस्याः सा हिरण्यवर्णा ताम् । तद्वत् पीतभास्वरवर्णविग्रहाम् । अनेन विग्रहस्य निर्मलत्वप्रतीत्या नित्यनिरस्तदोष त्वमवगम्यते । यद्वा हिरण्यमिव स्पृहणीयो वर्ण श्रीरिति शब्दो यस्यास्वाम्, स्थिरा सर्वाधारभूतामिति यावत् । हरिणी हरितवर्णाम् । श्यामतेजोमयस्य हरेर्गौरतेजोमय्या श्रियाः सवलनेन श्रीहरेर्हरितवर्णो भवति, तत्प्रतिफलितरूपत्वात् श्रीरपि हरितवर्णा भवतीति । हरिणीरूपधरा वा हरिणी सुवर्णप्रतिमा तामिवौज्ज्वल्यसौन्दर्य-लावण्यवती हरिणीवद्विशाललोचना वा । ' योषिद्वत्ताप्सरो भेद सुवर्णप्रतिमा मृगी । हरिताश्च हरिण्यश्च स्युः' इति नानार्थ-रत्नमाला | हरिणीवदतिचपलस्वभावा वा । सुवर्णरजतस्रजा सुवर्णस्य पुष्पाणि सुवर्णानि रजतस्य पुष्पाणि रजतानि तेषां स्रजा माला यस्याः सा सुवर्णरजतस्रजा ताम् । अत्र स्रकसाहचर्यात् पुष्पाणीत्यवगम्यते । पुष्पसादृश्यात् ' फले लुक्' 'हिरण्यवर्णाम्' इस पन्द्रह मन्त्रो वाले श्री सूक्त के आनन्द, कर्दम, चिक्लीत और इन्दिरासुत ऋषि है । इस सूक्त की पहली तीन ऋचाएँ अनुष्टुप् छन्द मे, चौथी वृहती, पांचवी और छठी त्रिष्टुप, इससे आगे की आठ ऋचाएँ अनुष्टुप् छन्द मे तथा ,पन्द्रहवी प्रस्तार पंक्ति छन्द में निबद्ध है । इस तरह इस सूक्त के मन्त्र नाना छन्दो वाले है ॥ इसके देवता अग्नि है ॥ बीज शक्ति -और कीलकसम्बन्धी मत मतान्तरो का उल्लेख मूल मे उल्लिखित है । इस सूक्त का विनियोग लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिये किये जानेवाले जप या होम मे किया जाता है । श्रुति मे बताया गया है कि अग्नि से ऋग्वेद की उत्पत्ति होती है । तदनुसार ही प्रस्तुत मन्त्र मे अग्नि को 'जातवेदा' शब्द से सबोधित किया गया है । ज्ञान की भी उत्पत्ति अग्नि के प्रसाद से होती है । यह अग्नि उत्पन्न हुए सभी भुवनो और ,उनमें विद्यमान ऐश्वर्यो को जानता है । इस मन्त्र में उसी अग्नि से प्रार्थना की गई है कि हे अग्निदेवता आप सुवर्णसदृश वर्ण अथवा कान्ति वाली, सुवर्ण के समान पीले चमकीले स्वरूपवाली, यहाँ लक्ष्मी के निर्मल शरीर की चर्चा यह दिखाने के लिये की गई है कि लक्ष्मी का विग्रह सदा समस्त दोषों से रहित होता है । लक्ष्मी का स्वरूप और यह लक्ष्मी शब्द भी अत्यन्त स्पृहणीय है । , ( ), ( )यह सबको महारा देती है । हरितवर्णवाली यद्यपि श्री लक्ष्मी गौर वर्ण की है तब भी श्यामल शरीर हरि विष्णु के वर्ण केL साथ उसके मिलने से श्री हरि हरितवर्ण के हो जाते हैं और श्री हरि के हरित वर्ण मे प्रतिफलित श्री भी हरितवर्ण की हो जाती है । अथवा यह लक्ष्मी हरिणी का रूप धारण कर लेती हैं । अथवा यह सुवर्ण के समान उज्ज्वल सौन्दर्य और लावण्य से विभूषित है । अथवा हरिणी (मृगी के समान विशाललोचनों वाली है । नानार्थरत्नमाला में हरिणी शब्द के ये सब अर्थ बताये है । 5