वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1331–1340

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1331–1340

पृष्ठ 1331

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वेदार्थपारिजातः २२२९ ( पा० सू० ४।३।१६३ ) इत्यादिना लुक् । स्रजेत्यत्र 'आप चैव हलन्तानाम्' इति भागुरिवष्ट्या आप् । सुवर्ण रजतनिमितभूष- णोपेतां वा । यद्वा सुष्ठु वर्ण यस्य तत् सुवर्णं तादृशं यद्रजनं तत् सुवर्णरजत तत्पुष्पस्रजा तत्तद्दिव्यावयवोपचितसुवर्णरजता- दिमयदिव्यभूषणकलापाम् । यद्वा हरिं नयति चेतनामिति हरिणी ताम् भगवदाश्रयणे पुरुषकारभूताम् हरिणीम् । यद्वा 'यद्वाभूद् भार्गवो रामस्तदा श्रीहरिणी स्वयम्' (विष्णुपुराणे, १ ९ | १४३ ) इति विष्णुपुराणात् परशुरामावतारकाले श्रियो हरिणीरूपधारणावगमात् । 'श्रीर्धृत्वा हरिणीरूपमरण्ये सञ्चचार ह' इति । चन्द्रा चन्द्रवत्प्रकाशमाना चन्द्ररूपेणावस्थिता वा । चन्द्रवत् षोडशकलापूर्णां चन्द्रमसो यथा पञ्चदशकला ह्रासविकाशशालिन्य; एका तु कूटस्थनिर्विकाररूपाः तथैव श्रियोऽप्यनन्तानन्तप्रपञ्चरूपा. पञ्चदश कलाः । अधिटानभूता निष्कला निर्विकारा क्षयातिशयरहिता षोडशी कला अनन्तब्रह्मसत्तासामान्यरूपा सीतोपनिषदादावुक्ता । अथवा चन्द्रा मुखे चन्द्रसदृशी तद्वदाह्लादिनी वा । हिरण्मयी हिरण्यस्वरूपा परज्योतिर्ब्रह्मरूपा 'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः तमसः परमुच्यते' (भ ० गी० १३।१७ ), 'तमेव भान्त- ' ( ) मनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिद विभाति मु० २ २ १० इत्यादिस्मृतिश्रुतिभ्य । ज्योतिर्मयविग्रहा वा निर्गुण- निराकारब्रह्मरूपा सगुणनिराकारब्रह्मरूपा सगुणसाकाररूपा च हिरण्यप्रचुराभरणा लक्ष्मी प्रशस्तलक्ष्मवती 'लक्ष्मी लाभाद्वा लक्षणाद्वा' ( नि० ४| १० ) इति यास्को: । एवरूपा श्रिय मे मह्यम् आवह आह्वय । अग्नेर्देवानामाह्वातृत्वात् तदाह्वानमपि तदधीनमिति तदर्थमपि स एव प्रार्थ्यते । 'अग्निर्मुखम् प्रथमो देवतानाम्' (ऐ० ब्रा० ११४ ) 'अग्निर्वे देवाना होता' ( ऐ० ब्रा ० ३| १४ ), 'अग्निर्वा देवाना दूत आसीत्' इत्यादिश्रुतिभ्यः । यद्वा जाता वेदा सर्वेऽपि यस्मात् सोऽत्र सर्ववेदकारणभूतः परमेश्वर एव जातवेद. शब्देनोच्यते । 'तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋच. सामानि जज्ञिरे । छन्दासि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्माद- ' ( ) जायत वा० स० ३१ ७ इति मन्त्रवर्णात् । परमेश्वरस्य विष्णोर्नारायणस्य सर्वजीवान्तर्यामिण स्वरूपभूतायाः प्राणेश्वर्यास्तदीयहृदयेश्वर्याः । श्रिय समाह्वान तदधीनमेव भवति । यद्वा हिरण्मयी 'अस्मिन् कामाः समाहिताः' (छा० ८ ११५ ) इतिवद् हिरण्यस्पृहणीयकल्याणगुणगणप्रचुरा हिरण्यप्रभृतिसकलधनप्रचुरा लक्ष्मी भगवतश्चेतनाना च सम्पदम् । अथवा यह लक्ष्मी हरिणी के समान अत्यन्त चचल स्वभाव की है । सुवर्ण ( सोना ) और रजत ( चाँदी ) के पुष्पों की इसकी माला है ( अथवा यह सोने -चांदी के गहने पहने हुई है । लक्ष्मी ने हरिणी का स्वरूप धारण किया था, इसकी कथा विष्णुपुराण मे भी ( ) वर्णित है । यह हरि को चेतना प्रदान करने वाली है और हरि के आश्रय में आनेवालो को पुरुषकार उद्यम मे प्रवृत्त करती , चन्द्रमा के है, इसलिये भी इसको हरिणी कहते है ॥ यह श्री चन्द्रमा के समान प्रकाशवाली है अथवा चन्द्रमा के रूप में विद्यमान है समान षोडशकलाओ से परिपूर्ण है । चन्द्रमा की पन्द्रह कलाएँ घटती-बढतो रहती है, किन्तु उसको षोडशीरूपा जैसे निर्विकार कूटस्थ नित्य है, उसी तरह से श्री की भी पन्द्रह कलाओ से अनन्तानन्त प्रपत्र की सृष्टि होती है, किन्तु अधिष्ठानभूत षोडशी कला निर्विकार I और क्षयातिशय से रहित होती है । सीतोपनिषद् में इसको ब्रह्मसत्ता का ही सामान्य स्वरूप बताया गया है । अथवा यह लक्ष्मी |, चन्द्रमा के समान आह्लाद को देनेवाली है । हिरण्मयी शब्द का अर्थ है परमज्योति ब्रह्मस्वरूप भगवद्गीता में यह ब्रह्म चन्द्र सूर्यप्रभृति ज्योतियो का भी प्रकाशक कहा गया है और श्रुति कहती है कि इस ब्रह्म के प्रकाश से ही अन्य सभी ज्योतियाँ प्रकाशित , होती है । अथवा इस लक्ष्मी का विग्रह ज्योतिर्मय है । इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह लक्ष्मी निर्गुण निराकार स्वरूप सगुण निराकार ब्रह्मस्वरूप और सगुण साकार स्वरूप वाली भी है । ऐसी सुवर्ण प्रचुर आभूषणो की इस अधिष्ठात्री देवी को हे , अग्निदेवता आप मेरे पास ले आइये । अग्नि सभी देवताओ को यज्ञ मे बुला के ले आने वाला देवता है । अतः उनसे श्रीसूक्त के इस प्रथम मन्त्र मे प्रार्थना की गई है कि आप मेरे पास उस श्री को ले आइये, जिससे कि मैं धन-धान्य से सम्पन्न हो जाऊँ । अथवा , ' ' जिनसे सभी वेदों की उत्पत्ति हुई है वे परमेश्वर यहाँ जातवेदा शब्द से सम्बोधित हुए है । परमेश्वर विष्णुनारायण सभी जीवो , के अन्तर्यामी है लक्ष्मी उन्ही का स्वरूप है । विष्णु की प्राणेश्वरी उनके हृदय की स्वामिनी श्री को बुला ले आना उन्ही के वश , कीबात है । अथवा हिरण्य प्रभृति सकल धनधान्य से परिपूर्ण हिरण्य के समान स्पृहणीय सभी कल्याण गुणगणो से परिपूर्ण लक्ष्मी- भगवान् और चेतन भक्तो को सभी प्रकार की सम्पत्ति से भर देने वाली अथवा इस लक्ष्मी में उत्तम स्त्रियो के सभी 1

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वेदार्थ पारिजातः २२३० यद्वा लक्ष्माण्युत्तमस्त्रीलक्षणानि सन्ति यस्यां सा लक्ष्मीस्ताम् ' चिह्न लक्ष्म च लक्षणम्' ( अमरको ० १।३।१७ ) इत्यमरकोषात् ॥१ ॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।

यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥ २ ॥

हे जातवेदः अग्ने, त्वम् अनपगामिनी अपगमनरहितामनपायिनी सुस्थिरा ता लक्ष्मी मे मह्यम् आवह आह्वय । यस्यां भगवत्यामावाहिताया हिरण्यं सुवर्ण मणिरत्नादिकं गा धेनुम् अश्व वाजिन पुरुषान् पुत्र- कलत्र-मित्र- दास- दासीरूपान् विन्देय प्राप्नुयाम् ।1 यद्वा हे जातवेद', ऋग्वेदादिवेदचतुष्टयकारणभूत परमेश्वर, त्वम् अनपगामिनीम् अखण्डरूपेण त्वय्येव सुस्थिरा - मनपायिनी सीता- राधा श्री लक्ष्म्यादिरूपेण विराजमाना मे मह्यमुपासनार्थम् आवह आह्वय । मम हृदये स्थापय । यद्वा अनपगामिनी वात्सल्याद् दोषभूयस्त्वेऽप्यविमुक्त चेतनजाता भगवन्नित्यनपायिनी शक्ति मम हृदये स्थापय । स्वय च तथा परप्रेमास्पदभूतया सह विराजमानो भव । यस्यामागताया हिरण्य ज्योतिर्मय ब्रह्मात्मविज्ञान गा कामदुघा भक्तिम् अश्वमभीष्ट शक्ति पुरुषान् देवमनुष्याननुकूलान् त्वद्गुणस्मारकान् अह विन्देयं प्राप्नुयाम् । तस्या भगवत्याः कृपाकटाक्षेणैव सर्वाभीष्ट- सौलभ्यात् || २||

अश्वपूर्वा रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।

श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवीर्जुषताम् ॥३॥

अश्वा हयाः पूर्वे प्रथमवाहनाः पुरोगमा वा यस्याः सा अश्वपूर्वा ताम्, रथमध्यां रथा रमणसाधनानि वाहन- विशेषा मध्ये यस्याः सा रथमध्या ताम्, रथा मध्या मध्यवाहना वा यस्याः सा रथमध्या ताम् । यद्वा रथा मध्ये सेनायां यस्यास्ताम् । यद्वा अश्वाः पूर्वे प्रथमप्राकाराजिरस्थिता यस्या सा अश्वपूर्वा ताम्, रथा मध्यमप्राकाराजिरस्था यस्याः सां रथमध्याताम् । हस्तिनादप्रबोधिनी हस्तिना ततोऽपि तृतीयप्राकाराजिरस्थिताना दन्तिना नादैर्बृहितैः प्रबोधिनी जागरण- शोलेति हस्तिनादप्रबोधिनी ताम् । लक्ष्म्या नगरे प्रथमप्राकारावृतवीथ्यामश्वा, द्वितीयप्राकारावृतवीथ्यां रथा., तृतीय-,, - सामुद्रिक शास्त्र में वर्णित लक्षण विद्यमान है । यह सर्वलक्षणसम्पन्न समस्त कल्याणगुणसम्पन्न धन्य धान्य से परिपूर्ण शरीर वाली लक्ष्मी हमारे ऊपर कृपा करे, इस मन्त्र मे अग्नि देवता से यही प्रार्थना की गई है || १ || हे अग्निदेवता, आप कभी न जाने वाली सुस्थिर लक्ष्मी को मेरे लिये बुलाओ, जिसके आने पर कि मै सुवर्ण, मणि, रत्न, गाय, घोडा, हाथी आदि धन-सम्पत्ति को तथा पुत्र, कलत्र ( स्त्री ), मित्र, दास, दासी प्रभृति जन सम्पत्ति को प्राप्त कर सकूं । अथवा हे जातवेदा अग्ने, आप ऋग्वेद प्रभृति चारो वेदो के कारणभूत परमेश्वर है । आप अपने पास ही सदा रहने वाली सीता, राधा, श्री लक्ष्मी आदि रूपो में विराजमान देवी की स्थापना मेरे हृदय मे सुस्थिर कर दीजिये, जिससे कि मैं उनकी उपासना कर सकूँ । अथवा मातृवात्सल्य के कारण अनेक दोषो के रहते हुए भी यह माता जीवो को नही छोडती और वह भगवान् से भी कभी अलग नही होती । उस मा शक्ति को आप मेरे हृदय मे विराजमान कर दीजिये और उसी के साथ आप भी विराजमान होइये | उस माता के हृदय में निवास करने पर मै ज्योतिर्मय ब्रह्मात्म विज्ञान, कामदुधा भक्ति, अभीष्ट भक्ति, देव मनुष्य प्रभृति की अनुकूलता और आपके गुणो को स्मरण करने की सामर्थ्य मै प्राप्त कर सकूं । उस भगवती की कृपादृष्टि से हो सभी अभीष्ट पदार्थ सुलभ हो सकते है ॥२ ॥

जिसके आगे आगे घोड़े चलते हैं, रथ जिसके * मध्य में है, अर्थात् जिसकी सेना के मध्य भाग मे रथ चल रहे हैं । अथवा जिसके परकोटे के पहले आगन मे घोडे और मध्य के आगन में रथ विराजमान है । तृतीय प्राकारस्थित आगन में बंधे हाथियों की चिंघाड में वह लक्ष्मी जागती है अर्थात् उस लक्ष्मी के निवास स्थान के पहले परकोटे से घिरी जगह में घोडे, दूसरे परकोटे से घिरी जगह से रथ और तीसरे परकोटे से घिरी जगह में हाथी बाँधे जाते है । हाथी भगवती के शयनस्थान के पास में बँधे रहते हैं, अतः t

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वेदाथपारिजातः २२२१ प्राकारावृतवीथ्या हस्तिनश्च निवसन्ति ॥ तत्र हस्तिना सान्निध्यात्तन्नादे सुप्ता सती प्रातः प्रबुद्धा भवतीत्यर्थ । अनेन तस्या निरतिशयैश्वर्य सूचितम् । यद्वा -'कोणपत्रगजैर्हेमकमलैरमृतोदकैः । सम्भृतैस्तर्प्यमाणा ता वोध्यमाना च तैर्गजैः ॥ ' इति स्वायम्भुववचनरीत्या स्वासनपद्मदलस्थितहस्तिनादरहरह प्रबुद्धयमानाम्, रथाना मध्या रथसमूहमध्यस्थिता वा हस्तिनादप्रबोधिनी हस्तिना मदस्राविगजाना नादेन बृहितेन गलपुष्करतुर्यनादेन प्रबोधिनी प्रकर्षेण ज्ञापयित्रीम् । यद्वा मदस्राविगजाना नादैः प्रबोधन निद्रातो ब्राह्मे मुहूर्ते जागरण यस्यास्ताम् । गजस्थदुन्दुभिनादेन तद्घण्टानादेन वा प्रबोध- वतीम् । यद्वा चरमवानगजनादेन विकस्वराम् । श्रिय श्रयति भगवन्तमिति श्रीस्ताम् एव निरङ्कुशैश्वर्येऽपि चेतनरक्षण- लालसया भगवन्तमाश्रिताम् ॥ देवी देवयति क्रीडयति कान्तमिति देवी ताम्, भक्तदोषालक्ष्मीहरणाय भगवत क्रीडापारवश्य- मापादयन्तीम् । यद्वा देवी देवनशीला द्योतनात्मिका नित्यस्वप्रकाशब्रह्मात्मसविद्रूपाम् । यद्वा दीव्यति विजिगीषति अविद्या- तत्कार्यात्मक प्रपञ्च ब्रह्मविद्यारूपेणेति देवी ताम् । यद्वा दीव्यति तत्तद्रूपेण महिषशुम्भनिशुम्भरक्तबीजमधुकैटभाद्यसुरैरिति देवी ताम् । अनन्तब्रह्माण्डनिर्माणादिलीलया सदैव क्रीडते या सा श्रीस्ताम् । श्रीयते वा या सा श्रीः, ता श्रियम्, सत्त्वैः शरण्यत्वेन आश्रयणीया सेव्यमाना महालक्ष्मी सेनारूपा वा उपह्वये स्वसमीप प्रत्याह्वये । एतादृशी श्रीदेवी मा मा अत्रागम्य जुषता सेवता प्रीयता वा । विभक्तयलोपश्छान्दसः । - अध्यात्मम् — अश्वपूर्वा सैव कमला लक्ष्मी मीताराधारुक्मिण्यादिरूपेण वर्तमाना पूज्यते । अनन्तब्रह्माण्डजनकत्वेन परमैश्वर्यवत्त्वेन हस्त्यश्वरथाद्यैश्वर्याणि तस्या वर्ण्यन्ते श्री राघवेन्द्रप्राणेश्वरीत्वेनापि श्रीरामस्य सर्वेश्वर्याण्येतस्या एव महा- सम्राज्ञीत्वेनाश्वरथहस्त्यादिमत्त्व तन्मध्यस्थत्व तन्नादप्रबोधवत्त्वादिक तस्यामेव सूपपन्नम् । जगदुत्पत्तिस्थितिलयलीलत्वेन क्रीडित्रीत्वेन भक्ताविद्यादिविजिगीषावत्त्वेन स्वप्रकाशपरमात्मरूपत्वेन वा देवीत्वम् । ता देवी श्रियमुपह्वये सामीप्येन परिचरितुमाह्वये । श्रयते सेवते हरि या सा श्री । श्रयते भजते सर्वनैरपेक्ष्येण स्वानपेक्षमपि हरि या सा श्रीस्ता श्रिय भक्ति वा, तस्या अपि तल्लक्षणत्वात् । 'मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये । मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ ' उनके चिघाडने से प्रात काल भगवती की निद्रा टूटती हैं । इससे भगवती के निरतिशय ऐश्वर्य का बोध होता है । अथवा स्वायम्भुवागम के वचन के अनुसार यह भगवती अपने आसन पद्मदल पर स्थित हाथियो के नाद से प्रतिदिन जागतो है । यह भगवती रथो के समूह बीच में निवास करती है । अथवा मदमाते हाथियो के तेज नाद से यह अपने आने की सूचना देती है । अथवा हाथी के ऊपर विराज- मानदुन्दुभि के अथवा उसके गले में लटके घण्टा के नाद से यह भगवती निद्रा त्याग करती है । भगवती लक्ष्मी भगवान् विष्णु का सहारा लेने से श्री कहलाती है । इनका अपना अनन्त ऐश्वर्य है, तो भी ये भगवान् का आश्रय जीवो के कल्याण के लिये लेती है । यह देवी लक्ष्मी भगवान् के साथ क्रीडा करती है । यह परवशता उन्होने इसलिये स्वीकार की है कि इस तरह से भगवान् को प्रसन्न कर वे जीवो को सब प्रकार के ऐश्वर्य से सम्पन्न कर सके । अथवा लक्ष्मी देवी इसलिये है कि वह नित्य स्वप्रकाश ब्रह्मात्म संवित् स्वरूप है । अथवा यह अविद्या और उसके कार्य प्रपच को ब्रह्मविद्या के सहारे जीत लेने का कारण देवी कहलाती हैं अथवा यह देवी इस लिये हैं ,,,, -, कि यह महिष शुम्भ निशुम्भ रक्तबीज मधु कैटभ प्रभृति असुरो को नष्ट कर देती है । अनन्तब्रह्माण्ड की सृष्टि सहार लीला मे यह सदा लगी रहती है, यह उनका खेल है, इसलिये भी यह देवी कहलाती है । अभावग्रस्त, दुखी प्राणी इनका सहारा लेते हैं, इनकी शरण में आते है, इसलिये भी इनको श्री कहा जाता है । उस ऐश्वर्यशालिनी लक्ष्मी को मैं अपने समीप बुला रहा हूँ । यह श्री देवी यहाँ आकर मुझे धन-धान्य, ऐश्वर्य से सम्पन्न करे, जिससे कि मैं प्रसन्न, सुखी हो सकूँ । इस मन्त्र का आध्यात्मिक अर्थ इस प्रकार से होगा -अश्व आदि के साथ निवास करने वाली वह लक्ष्मी ही सीता, राधा, रुक्मिणी आदि के रूप में पूजी जाती है । यह अनन्त ब्रह्माण्ड की जननी है, परम ऐश्वर्यशालिनी है । हाथी, घोडा, रथ आदि ऐश्वर्य को देने वाली यही है । श्री राघवेन्द्र राम की प्राणेश्वरी यही है । श्रीराम के सारे ऐश्वर्य की यही स्वामिनी है । यह उनकी पट्टमहिषी है । अत: यह उनके उक्त सारे ऐश्वर्य के बीच में रहें और हाथी के नाद के साथ जगे, यह स्वाभाविक है । जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय की लीला करने वाली, इनके साथ खेलने वाली, भक्तो की अविद्या को जीतने वाली, स्वप्रकाशपर-मात्मा के स्वरूप में विद्यमान यह लक्ष्मी देवी पद से संबोधन योग्य है । उस देवी लक्ष्मी को मै अपने समीप बुलाता हूँ । यह श्रीहरि

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२२३२ 'वेदार्थपारिजातः ( भा० पु ० ३।२ ९।११ ) । यथा निर्मलस्य निष्कलङ्कस्य द्रवीभूतस्य गङ्गाम्भसोऽविच्छिन्नप्रवाह समुद्राभिमुखोऽभिसरति, तथैवाह्लादिनीशक्तिविशिष्टस्य भगवद्गुणादिश्रवणेन द्रवीभूतस्य निर्मलस्य मनसो भगवदाभिमुख्येन योऽखण्डप्रवाह' सैव भक्तिरभिधीयते । राधारूपेणाराधनारूपापि सैव या हरि श्रयते । सर्वैश्च श्रीयते सेव्यते या सा श्री । ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्षकामास्तपश्चरन्ति सान्ये श्रयणीयेति कैमुतिकन्यायेन सिद्धयति, ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्षकामास्तपः समचरन् भगवत्प्रपन्नाः । सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता ॥ ( श्री० भा० म० पु० १।१६।३२) । इति श्रीमद्भागवतोक्ते । श्रीयते सर्वैर्गुणैर्वा या सा श्रीः सौन्दर्यमाधुर्यलावण्यसौरस्य सौगन्ध्यसौकुमार्याद्यधिष्ठात्रीणां महाशक्तीना गृहीतदिव्यविग्रहाणा सौन्दर्यादयो गुणा लोकोत्तरा एव । ता अपि दास्यो भूत्वा या श्रयन्ते सा श्रीः । दिमाधिष्ठात्र्या महाशक्ते पादारविन्दसौकुमार्यमालोक्य कमलान्यपि विलज्जन्ते, अरविन्दपरागा अपि तत्पादस्पर्शने सङ्कुचन्ति, कमलकोमलाङ्कराणां मार्दवमपि यत्र कर्कशं प्रतीयते, तस्या करसरोरुहयोः सर्वातिशायि सुस्पर्शत्व लोकोत्तरमेव । सा म्रदिमाधिष्ठात्री महाशक्तिरपि यस्याः पादपङ्कजं सेवितु कामयमाना स्वीयेषु करकमलेषु काठिन्य मन्वाना तादृशैरपि स्वीयै ' करकमलैस्तत् स्प्रष्टुं सङ्कुचती पादपीठमेव सेवते । ' यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः । हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहि ||' ( श्री ० भा० म० पु० ५| १८| १२ ) इति श्रीमद्भागवतोक्तेर्भताना सर्वाभिप्रायान् परमवात्सल्येन शृणोति या सा श्रीः । भगवतोऽप्यधिकपरमवात्सल्येनाकारणकारुण्यात् शरण श्रय इत्याद्युक्तिमप्यनपेक्ष्य रक्षित्रीमेवाश्रित्य यस्या अङ्कमवाप्य बाल इव सर्वोऽपि निःशङ्कं शेते सा श्रीः । अथवा शृणाति हिनस्ति निखिलान् भक्तदोषान् या सा श्री । अथवा पुरुषोत्तमो भगवान् यस्या' कान्त फणिपतिः शेषो यस्याः शय्या वेदात्मा विहगेश्वरो भगवान् गरुत्मान् यस्या वाहन, जगन्मोहिनी माया यस्या यवनिका, ब्रह्मेश्वरादिसुरव्रज सदयितो यस्या आराधकः, श्रीरिति च लोकोत्तर यस्था नाम, तस्या महत्त्व को वर्णयितुं की सेवा में सदा लगी रहती है । सर्वथा निरपेक्षभाव से यह हरि का भजन करती है । अत इसको श्री या भक्ति के नाम से जाना जाता है । जैसे निर्मल स्वच्छ बहते हुए गंगा जल का अविच्छिन्न प्रवाह समुद्र की तरफ ही सदा दौडता है । उसी तरह से ह्लादिनी शक्ति से सबलित, भगवान् के गुणो के श्रवण से द्रवीभूत निर्मल मन की गति भगवान् की ओर ही सदा प्रवाहित होने लगती है । इसी स्थिति को भक्ति के नाम से जाना जाता है । राधा के रूप में आराधन योग्य भी यह लक्ष्मी ही है । अन्य सब प्राणी भी इसी की सेवा करते है । ब्रह्मा प्रभूति देवता गण भी जिसकी कृपादृष्टि की प्राप्ति के लिये अनन्तकाल तक तपस्या करते रहते हैं, उस लक्ष्मी का साधारण जन उपासना करें, यह तो कैमुतिक न्याय से ही सिद्ध है । भागवत मे भी यह बात प्रतिपादित है । सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्य, सौरस्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य आदि गुणो की अधिष्ठात्री महाशक्तियां इन्ही लोकोत्तर गुणो का विग्रह धारण करके अवतीर्ण होती है । ये सब महाशक्तियों लक्ष्मी को दासिया है और उन्ही के आश्रय मे रहती है । म्रदिमा ( मृदुता ) की अधिष्ठात्री महाशक्ति के चरणकमल की सुकुमारता को देखकर कमल भी लज्जित हो जाते हैं, अरविन्द का पराग भी स्पर्श करने में सकोच का अनुभव करता है, कमल के कोमल अङ्करो की मृदुता भी जहाँ कर्कश प्रतीत होती है, उस लक्ष्मीउसकेके चरणकरकमलोका का सर्वातिशायी कोमल अर्थ लोकोत्तर है । वह मृदुता की अधिष्ठात्री महाशक्ति भी उस लक्ष्मी के चरणकमलो की सेवा करते समय अपने करकमलो मे कठोरता का अनुभव करती है और उनसे लक्ष्मी के चरणकमलों का स्पर्श करने में संकोच करते हुए केवल पादपीठ की ही सेवा करती है । भागवत में बताया गया है कि जिसकी भगवान् में भक्ति है, उसके पास अपने सारे गणो के साथ देवगण निवास करते है । ' हरि में जिसको भक्ति नही है, उसमें उत्कृष्ट गुणों का निवास कैसे हो सकता है । हरिभक्तों की सभी अभिलाषाओं को परम वात्सल्य के साथ पूरा करने वाली यह लक्ष्मी ही है । भगवान् से भी यह अधिक स्नेह करने वाली हैं । अपनी अकारण करुणा के कारण यह लक्ष्मी 'मेरी शरण में आओ' इस तरह की उक्तियों पर भी बिना विचार किये सर्वत्र रक्षक रूप में उपस्थित हो जाती है और उनको बालक-

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वेदार्थपारिजातः २२३३ शक्नोति । तदुक्त चतुः श्लोक्याम् -' कान्तस्ते पुरुषोत्तमः फणिपति गय्यासन वाहनम् । वेदात्मा विहगेश्वरो यवनिका माया जगन्मोहिनी । ब्रह्मेशादिसुरव्रजः सदयितस्त्वद्दासदासीगणः । श्रीरित्येव च नाम ते भगवति ब्रूमः कथं त्वां वयम् ॥ ' तादृशी श्रीदेवी मा मा शरणागतं लीलयैवायोग्यमपि निष्कारणकारुण्यात् जुषता सेवतामनुगृह्यता प्रीयतां वा । बिभक्त्य- लोपश्छान्दसः । यद्वा श्रीयते हरिणा विष्णुरूपेण या सा श्री, सीतारूपेणाश्रीयते या रामेण सा श्री 1 राधारूपेणाश्रीयते कृष्णेनापि या सा श्री । यस्याः कृते समुद्रो मथितः यस्याश्च कृते समुद्रो बद्ध:, सा श्री. । सर्व जगत् स्वगुणैः श्रीणाति वर्धयति या सा श्री । तदुक्त सूरिभिः -( श्रितास्यन्यैः सर्वैः श्रयसि रमण सश्रितगिर शृणोषि प्रयासं श्रितजनवचः श्रावयसि च ॥ शृणास्येतद्दोषान् जननि निखिलान् सर्वजगती गुणैः श्रीणासि त्व तदिह भवती श्रीरिति विदु' ||' इति || ३|| कां सोऽस्मि तां हिरण्यप्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् । || || पद्म स्थितां पद्मवर्णा तामिहोपह्वये श्रियम् ४ श्रुतेः, का ब्रह्मात्मसुखस्वरूपाम्, अथवा का काञ्चिद् मनोवचनातीता दुर्निरूपस्वरूपां 'को ह वै प्रजापतिः' इति 'क ब्रह्म', ' खं ब्रह्म' (छा० ४| १०| ५ ) इति श्रुतेश्च । यथा भूताकाशवाचकोऽप्याकाशशब्दः श्रुतौ 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' (तै० उ० ३।१) इत्यत्र 'सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म' (तै ० उ० २ १ १ ) इति: ब्रह्मलक्षणलक्षितत्वेन ब्रह्मवाचको भवति, तथैवेह ब्रह्मलक्षणलक्षितत्वात् श्रीरपि ब्रह्मरूपैव भवति । यथा विष्णुपदेन निर्गुणं निराकारं सगुणं निराकारं सगुणं साकारं च ब्रह्माभिधीयते, श्रीपदेनापि तदेव त्रिविध ब्रह्माख्यायते, ' सर्वचैतन्यरूपा तामाद्या विद्यां च धीमहि । बुद्धि या नः प्रचोदयात् |' (श्रीमद्देवीभा० १ | १ | १ ) इति श्रीमद्देवीभागवतोक्ते । अनन्तब्रह्माण्डकारणत्वेन सगुणनिराकारब्रह्मरूपा अनन्तप्रपञ्चाधिष्ठानत्वेन सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन सर्वभासकत्वेनाशेषविशेषातीतत्वेन वाङ्मनसयोरगोचरत्वेन के समान अपनी गोद मे बैठा कर भयमुक्त कर देती है । अथवा यह श्री अपने भक्तो के समस्त दोषो को नष्ट कर देती है । अथवा इस लक्ष्मी के पुरुषोत्तम भगवान् प्रियतम है, फणिपति ( नागराज) शेषशय्या है, वेदात्मा विहगेश्वर गरुण वाहन है, जगन्मोहिनी माया यवनिका है, अपनी पत्नियो के साथ ब्रह्मा, ईश्वर (शिव) प्रभृति इसकी आराधना करते है । इस श्री के लोकोत्तर नाम और महिमा का वर्णन कौन कर सकता है? चतु श्लोकी मे श्री के उक्त स्वरूप का वर्णन किया गया है । यह लक्ष्मी मेरे जैसे शरणागत को सारी अयोग्यताओं के रहते हुए भी अपनी अकारण करुणा की लीला के कारण ही सर्वेश्वयं सम्पन्न बना दे । में जो अथवा विष्णुरूप हरि के द्वारा लक्ष्मी के रूप में, भगवान् राम के द्वारा सीता के रूप मे, श्रीकृष्ण द्वारा राधा श्रीके रूपकहते हैं । स्वीकार की जाती है, उसको श्री कहते हैं । जिसके लिये समुद्र मथा गया, जिसके लिये समुद्र बाँधा गया, उसको भी, सारे को बढाने वाली है । किसी विद्वान् ने ठीक ही कहा है कि हे श्री अन्य सब प्राणी आपकी ही सहारा जगत् यह श्री अपने गुणो से सुनती है और उनकी बात को लेते है और आप अपने प्रियतम श्री विष्णु का सहारा लेती है । आप अपने शरण में आये प्राणियो की बात पृथिवी को गुणो अपने प्रियतम को भी सुनाती है । हे जननि, आप शरणागत प्राणियो के सभी दोषो को नष्ट कर देती है और इस सारी से भर देती हैं । इसीलिये विद्वद्गण आपको श्री के नाम से जानते हैं ॥३ ॥

वाली है । 'को ह वै प्रजापतिः ।, हे श्री आप ब्रह्मात्मक सुखस्वरूप है अथवा आप मन और वाणी के अगोचरस्वरूप से लक्षित होने के इत्यादि श्रुतियो द्वारा यह अर्थ प्रतिपादित है । जैसे भूताकाश का वाचक आकाश शब्द श्रुतियो मे ब्रह्म के लक्षण भी ब्रह्मरूप ही माना गया कारण ब्रह्म का वाचक हो जाता है, उसी तरह से ब्रह्म के रूप से लक्षित होने से प्रस्तुत स्थल में श्री को है, उसी तरह से श्रीपद, है । जैसे विष्णु पद से निर्गुण निराकार सगुण निराकार और सगुण साकार यह त्रिविध ब्रह्म प्रतिपादित की जननी होने से, से भी वही त्रिविधब्रह्म बोषित होता है । देवी भागवत में देवी का यह स्वरूप वर्णित है । यह लक्ष्मी अनन्त ब्रह्माण्डसबका प्रकाश करने सगुणनिराकार ब्रह्मस्वरूपा, अनन्त प्रपंच की अधिष्टान स्वरूपा उनको 'सत्ता मे लाने वाली तथा स्फूर्ति देने वालीतथा श्रुतिरूपी सीमन्तिनी वाली, समस्त विशेषताओं से अतीत, वाणी और मन की भी अगोचर होने से निर्गुण निराकार ब्रह्मस्वरूपा f २८०

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२२३४ वेदार्थ पारिजातः च निर्गुणनिराकारब्रह्मरूपा श्रुतिसीमन्तसिन्दूरोकृतपादाब्जधूलिका श्रीसीताराधादिरूपेण सगुणसाकारब्रह्मरूपा च । ब्रह्मरूप- त्वादेवानन्तत्वमनन्तमहामहिमवैभवत्वमपि । यथा श्रीहरिरप्यात्ममहिमानमनन्तत्वादेवेयत्तया न मातुमलं तथैव श्रियो- ' ऽप्यनन्तमहिमान नेयत्तया मातुमलमिति । तदप्युक्तं चतुःश्लोक्याम्— यस्यास्ते महिमानमात्मन इव त्वद्वल्लभोऽपि प्रभुर्नालं मातुमियत्तया निरवधिं नित्यानुकूलं स्वतः । तामुक्तलक्षणा वक्ष्यमाणलक्षणां वा भगवतीमुपह्वये । कीदृशी तां सोऽस्मिता आ ईषदुद्गतेन स्मितेन सहिताम् । उदन्त्यलोपरछान्दसः । यद्वा उत् अतिशयितं स्मित- मुत्स्मितम्, उत्स्मितेन सहिता सोस्मिता । उदन्त्यलोपरछान्दस । ता निःसहापराधजननिश्शङ्कसंश्रयणाय नित्यव्यक्तमन्द- हासादिपरमानुग्रहमयीमित्यर्थः । यद्वा ' कमु कान्तौ' इति धातो, कां सोऽस्मिताम्, अर्थात् तां प्रति साकाङ्क्षोऽस्मि । अन्यत्र सर्वत्र निराशोऽपि तस्या गुणानाकर्ण्य तां प्रति आशावानस्मि तस्या आशाकल्पलवाजननीत्वात् । हिरण्यप्राकारा हिरण्यस्य सुवर्णस्य प्राकारो दुर्गपरिखादिरूपो यस्या सा हिरण्यप्राकारा ताम्, अथवा हिरण्यस्य प्राकारो वरणं गृह वर्णो वा यस्याः सा हिरण्यप्राकारा ताम्, तप्तकाञ्चनसोधां तप्तकाञ्चनवर्णाभा वा । अथवा हिरण्यं प्राकारः प्रकृष्ट आकार आकृतिर्यस्या सा हिरण्यप्राकारा ताम् । तथाभूतामनन्ववैभवामपि आर्द्रा क्लिन्नाम्, क्षीरसिन्धोराविर्भावात् । यद्वा आर्द्रानक्षत्ररूपा तस्य रुद्रदैवतत्वाद् रूद्ररूपामित्यर्थः । रुद्रशब्दोऽत्र मूर्धन्यस्वरादिर्बोध्यः, ऋद्र इति यावत् । 'आर्द्रया ऋद्रः प्रथमान एति' इत्यादौ तथा दर्शनात् । बाहुलकाद्रूपसिद्धिः । भक्ताना कष्टेन दयार्द्रहृदयां वा । ज्वलन्ती प्रकाशमाना विश्वं भासयन्ती स्वप्रकाशां ज्योतिषामपि ज्योतिःस्वरूपां तृप्ता नित्यतृप्ता स्वरूपभूतपरमानन्दसुधासिन्धुनैव परिपूर्णामाप्तसमस्तकामा तर्पयन्ती तत्त- न्मनोरथप्रापणेन भक्ताना तृप्तिमापादयन्ती स्वस्वरूपानुभावनेन निःस्पृहान् अलप्रत्ययान् सम्पादयन्तीम् । यद्वा तृप्तां स्वकृतेन भगवत्स्वरूपगुणविभूत्यनुभवेन तत्सश्लेषजनितानन्देन वा तृप्ताम् । तर्पयन्ती भगवत्कृतस्वरूपा- द्यनुभवेन स्वसंश्लेषसुखेन वा तं तर्पयन्तीं स्वस्वकान्तोभयस्वरूपरूपगुणविभूत्यनुभवप्रापणेन संश्रितान् तर्पयन्तीम् । यद्वा (सौभाग्यवती ) जिसकी चरण की धूलि को सिन्दूर की जगह लगाती है, वह लक्ष्मी सीता, राधा आदि के रूप मे सगुण साकार ब्रह्मस्वरूप में अवतरित होती है । ब्रह्मस्वरूपा यह लक्ष्मी अनन्तमहिमा और वैभव को धारण करने वाली है । जैसे श्री हरि अपनी अनन्त महिमा के कारण इयत्ता से परिमित नही हो सकते, उसी तरह से लक्ष्मी को भी अनन्त महिमा इयत्ता से परिच्छिन्न नही की जा सकती । चतु श्लोकी मे भी इसी बात का वर्णन किया गया है । अतः उक्त और वक्ष्यमाण सभी गुणो से सम्पन्न लक्ष्मी को मैं बुलाता हूँ । यह लक्ष्मी कैसी है? मन्दमुसकान से सुशोभित है । अथवा अतिशय स्मित से सुशोभित है । अपराधी जनों को भी बिना शका के अपना सहारा देने के लिये नित्य मन्द हास के सारा अपना अनुग्रह प्रगट करती रहती है अथवा इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि मैं उस लक्ष्मी के प्रति साकाक्ष हूँ, उसका दर्शन करने के लिये लालायित हूँ । सब जगह से निराश होने के बाद भी उस लक्ष्मी के गुणों को सुन कर उसके प्रति आशावान् हूँ, क्योकि वह लक्ष्मी आशारूपी कल्पलता की जननी है । यह लक्ष्मी सुवर्ण के प्राकारवाली है, अथवा इसका गृह अथवा वर्ण सुवर्ण का सा है । इसका प्रासाद सुवर्ण का है अथवा तपे हुए सोने के समान देदीप्यमान इसका वर्ण है । अथवा सुवर्ण ही इस लक्ष्मी की आकृति है । इस प्रकार अनन्त वैभव से सम्पन्न होते हुए भी यह लक्ष्मी करुणा से आर्द्र है, अथवा यह रुद्र स्वरूपवाले आर्द्रा नक्षत्र में प्रसन्न होती है । अथवा भक्तो का कष्ट देखकर कर यह दया से भर जाती है । स्वयप्रकाशमान ग्रह लक्ष्मी सारे विश्व को भी अपने प्रकाश से आलोकित करती है । क्योकि चन्द्र, सूर्य प्रभृति ज्योतियो को भी प्रकाशित करने वाली हूँ । यह लक्ष्मी नित्यतृप्त है, स्व -स्वरूपभूत परमानन्द सुवासिन्धु से परिपूर्ण है, इसकी समस्त कामनाए तृप्त है और यह दूसरो की कामनाओं को भी पूरा करती है, उनको भी उनके वास्तविक स्वरूप का बोध करा देती है, जिससे कि वे भी सब प्रकार से निस्पृह हो जाते हैं । - अथवा यह लक्ष्मी अपने द्वारा किये गये भगवान् के स्वरूप, गुण और विभूति के अनुभव से अथवा उसके आलिंगन से त्पन्न आनन्द से परितृप्त है । वह अपने भक्तों को भी इन्ही अनुभवो से परिपूर्ण कर तृप्त कर देती है । अथवा यह लक्ष्मी भगवद्गीता में प्रतिपादित मार्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी इन चार प्रकार के अधिकारियो को उनका मनोरथ पूरा कर तृप्त करने वाली है ।

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वेदार्थ पारिजातः २२३५ ' आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरत पंभ ॥ ' इति भगवदुक्तेन चतुर्विधाधिकारिणस्तत्तदभिलषितप्रापणन तर्पयन्तीम् । पद्मे स्थिता स्वसौन्दर्यसौगन्ध्यसौकुमार्यानुगुणसुन्दरसुगन्धिसुकुमारसरसिजामीनाम् । पद्मवर्णा ' सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः ॥ ' ( वा० श० १।१।२७) इत्युक्तप्रकारेण उत्तमकान्तत्वेन पद्मारुणपाणिपादतलप्रान्तलोचना पद्मवर्णविग्रहा वा श्रिय सर्वैराश्रयणीयाम् । चन्द्रा चन्दयत्यानन्दयति चेतनानीश्वर च स्वगुणैरिति चन्द्रा ताम् । प्रभासा भासनं भासः प्रकृष्टो भासो यस्याः सा प्रभासा ता भगवदानन्दजनितहर्षसम्भूतत्र कृष्टकान्तिम् । यशसा सविताना सर्वाभीष्टप्रापणकीर्त्या ज्वलन्ती ' अभिषिच्य च लङ्काया राक्षसेन्द्रं विभीषणम् । कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वर. प्रमुमोद ह ||' ( वा० रा० १| १ | ८५ ) इतिवल्लोके च प्रकाशमाना श्रिय जगद्गुणैर्योजयन्तीम् । देवजुष्टा देवे नारायणे 'दिव्यो देव एको नारायण:' ( सुबालोपनिषद् ६) इति श्रुते ' 1। जुष्टा प्रीता प्रेमसम्पन्ना देवैर्ब्रह्मादिभिस्तत्तदभिलषितलाभाय जुष्टा सेविताम् 'जुषी प्रीतिसेवनयो. ' देवं परमात्मान ‘ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा' इति श्रुतेर्जुपते प्रीत्या सेवते या सा जुष्टा । छान्दसत्वात् कर्तरि निष्ठ । यद्वा बाहुलकात् कर्तरि निष्ठा । यद्वा देवेन परमात्मना श्रीरामेण श्रीकृष्णेन वा जुष्टा सेविता देवजुष्टा ताम् । उदारा काडुङ्क्षाधिकदातृत्वलक्षणनिरतिशयौदार्या ता तादृशवैभवयुक्ततया सर्ववेदान्तप्रसिद्धाम् । पद्मे स्थिता कमलवनवासिनी भक्ताना हृत्सरोजे वा विराजमाना पद्मवर्णा सरोजादप्यधिककोमलां सरोजकिञ्ज - ल्कसमानवर्णा वा ता प्रसिद्धा श्रिय सर्वाश्रयणीयाम् इह मम समीपे हृदये वा उपह्वये आह्वये । यद्वा का कं सुखमस्त्यस्या- मिति का वा सुखस्वरूपा भगवतोऽपि सुखदात्री वा । यथा चाहु: - 'देवत्वे देवदेहेय मनुष्यत्वे च मानुषी । ' (वि० पु० १।९।१४२) । राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि । अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ॥ ' ( वि०पु ० ११ ९| १४२ ) इति । इच्छा- कृनोज्ज्वलानेकभगवदभिमतानुरूपविग्रहा हिरण्यप्राकारपरिवृतानन्दमयमहामणिमण्डपान्तर्वासिनीम् । आर्द्रामनुकूलविषये दयार्द्रदृशम् अनुकूलतेजसं प्रतिकूलविषये ज्वलन्ती तदभिभावकतदभिभावकतेजोयुक्ताम्तेजोयुक्ताम्,, 'नित्यानुकूलमनुकूलनृणा परेषामुद्वेजन तव तु तेज उदाहरन्ति' इत्युक्तेः ॥४॥

यह अपने सौन्दर्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य प्रभृति गुणो के अनुरूप सुन्दर, मुगन्धयुक्त, मकुमार कमल पर आसीन है । यह पद्मवर्णा है, वाल्मीकि रामायण के अनुसार सर्वलक्षण सम्पन्न उत्तम नारी है, इसके हाथ, पैर, लोचनप्रान्त अरुण वर्ण के है, अथवा यह पद्म के समान वर्ण और विग्रह वाली है । इसका सब कोई सहारा लेते हैं । यह अपने भक्तों और अपने प्रभु को अपने गुणो से चन्द्रमा के समान आह्लादित करती है । यह प्रभासमात्र है, भगवान् के आनन्द से जनित हर्ष से इसकी कान्ति बढ गई है । यश को ही सब कुछ मानने वालो की सारी अभिलाषाओं को पूरा कर यह प्रकाशमान है, जैसा कि वाल्मीकिरामायण में वर्णित है-'वह राम लका के राज्य पर राक्षसेन्द विभोषण को अभिषिक्त कर कृतकृत्य हो गये और सब प्रकार की चिन्ता से मुक्त हो कर प्रमुदित हो उठे । यह लक्ष्मी भगवान् नारायण के प्रेम से सम्पन्न है, अथवा ब्रह्मा प्रभृति देवगण अपने मनोरथ की पूर्ति के लिये इसकी सेवा करते है । यह सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी परमात्मा की प्रेम से सेवा करती है । अथवा भगवान् श्रीराम अथवा श्रीकृष्ण इसकी सेवा करते है । यह उदार है, इच्छा से अधिक देने के कारण यह परम उदार है, इसका वैभव अनन्त है, सभी वेदान्त इसी का प्रतिपादन करते हैं । अथवा यह लक्ष्मी कमल के वन में अथवा भक्तो के हृदय में निवास करने वाली है । कमल से भी अधिक कोमल है अथवा कमल की परोग के समान वर्णवाली है । उस प्रसिद्ध सर्वाश्रयणीय लक्ष्मी को मै अपने हृदय में बुला रहा हूँ । अथवा यह सुख स्वरूप है, भगवान् को भी सुख देने वाली है । जैसा कि कहा गया है-' भगवान् के देवता का रूप धारण करने पर यह देवी और मनुष्य रूप धारण करने पर यह मानुषी बन जाती है । राघव का अवतार लेने पर सीता और श्रीकृष्ण का जन्म लेने पर यह रुक्मिणी बनी थी । इसी तरह से यह लक्ष्मी अन्य अवतारों में भी सदा उनके साथ रही है । अपनी इच्छा से धारण किये गये अनेक उज्वल भगवान् को अभिप्रेत विग्रह की यह धारण करने वाली है । सुवर्ण के प्राकार ( परकोटा ) से परिवृत आनन्दमय महामणि के मण्डप में यह निवास करने वाली है । अनुकूल विषय में इसकी दृष्टि दया से भरी रहती है । प्रतिकूल विषय में इसकी दृष्टि उसको भस्म कर देने वाली रहती है । किसी ने कहा भी है -है देवि, अनुकूल मनुष्यो पर आपकी दृष्टि दया से भरी रहती है जो आपसे द्वेष करते हैं, उनको आपकी वही दृष्टि उद्विग्न कर देती है ॥४॥

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वेदार्थपारिजातः २२३६

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्ती श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।

तां पद्धिनीमीं शरणं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वा वृणे ॥५॥

चन्द्रां चन्द्रवत्प्रकाशमानां चन्द्रवन्मनोज्ञा चन्द्रवदाह्लादयित्री वा । प्रभासा प्रकृष्टा भाः कान्तिर्यस्या साः प्रभा, ताम् प्रकृष्टतेजोयुक्तां 'आपं चैव हलन्तानाम्' इति भागुरिवष्टेराप् । यशसा कीर्त्या ज्वलन्ती प्रद्योतमानाम् । देवजुष्टा देवे- रिन्द्रादिभिर्जुष्टा प्रीत्या सेविता प्रीतां प्रसन्ना वा । उदारा वदान्यामौदार्यातिशयोपेतां प्रगल्भां वा । पद्भिनी पद्मलतारूपां पद्माकारा पद्ममालिनी वा । पद्मिनीलक्षणोपेता वा । ई कामकलारूपा सानुस्वारचतुर्थस्वररूपा वा । शुद्धप्रकाशबिन्दुना मुखं प्रकाशविमर्शाभ्या स्तनौ तयोः सामरस्येन योनिरिति ब्रह्मचैतन्येन मुख जीवेश्वरतत्त्वपदार्थाभ्या स्तनौ तयो सामरस्येन योनिरिति ध्येयाम् । यद्वा अस्य ( अकारस्य ) विष्णोरियं स्त्री ई तामीम् ईकारवाच्या ता श्रियमिह लोके अहं शरण आश्रयं रक्षित्री वा प्रपद्ये आश्रयत्वेन रक्षित्रीत्वेन वा त्वामहं प्रपन्नोऽस्मि 1| सर्वशेषित्वस्य सौलभ्यातिशयत्वस्य च शरण्यप्रयोजकत्वेन तद्वती सर्वोत्कृष्टा सदयहृदयात्वेन परमसुलभा शरण त्वामह प्रपत्रोऽस्मीति । हे श्रीः मे मम अलक्ष्मीः अभी नश्यता तदर्थं त्वा वृणे सम्भजामि त्व शरणागतत्वेन मा प्रणिपतित स्वीकुरुष्वेति । 'प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा । अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् ॥ ' ( वा० रा ० सु० २७/ ३९ ) इति श्रीरामायणोक्तेः ॥५॥

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ विल्वः ।

तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥ ६॥

आदित्यवर्णे आदित्यस्येव वर्णो यस्याः सा आदित्यवर्णा तत्सम्बुद्धौ आदित्यवर्णे, हे आदित्यवत्तेजःपुञ्जस्वरूपे तद्वदन्यप्रकाशानपेक्षस्वयंप्रकाशस्वरूपे वा । आदित्यः सजातीयप्रकाशानपेक्षोऽपि चक्षुर्मनआत्मादिप्रकाश सापेक्षो भवत्येव, किन्तु प्रत्यक्चैतन्याभिनप्रत्यक्चैतन्याभिन्नपरब्रह्मस्वरूपापरब्रह्मस्वरूपा श्रोस्तु सजातीयविजातीयसर्वविधप्रकाशानपेक्षप्रकाशस्वरूपेति निरुपचरितमेव तस्याः स्वप्रकाशत्वम् । हे श्रीः, तव तपसा नियमाद्धेतोः वनस्पतिः 'अपुष्पा फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्मृता ' (म० १/४७) यह लक्ष्मी चन्द्रमा के समान प्रकाशमान, चन्द्रमा के समान मनोरम अथवा चन्द्रमा के समान आह्लाददायिनी, प्रकृष्ट तेजोमयी, यश से प्रकाशमान, इन्द्र प्रभृति देवताओं के द्वारा प्रीतिपूर्वक सेवित अथवा उन देवताओ पर प्रसन्न, अतिशय उदार अथवा प्रगल्भचित्त वाली, पद्मलतारूप, पद्म सदृश आकार वाली, पद्म की माला वाली अथवा पद्मिनी नारी के लक्षणों से युक्त, कामकला स्वरूपिणी अथवा अनुस्वार सहित चतुर्थ स्वर वाली हैं । इसका मुख शुद्धप्रकाशबिन्दु से, स्तन प्रकाश और विमर्शबिन्दुओं से और और उनके सामरस्य से इसकी योनि बनी है अथवा ब्रह्मचैतन्य से मुख, जीव और ईश्वर, तत् और त्वम् पदार्थों से स्तन तथा इनके सामरस्य से योनि बनी है । कामकला का यही स्वरूप तन्त्रशास्त्र मे ध्येय के रूप में वर्णित है । अथवा अकार का अर्थ है विष्णु, उसकी पत्नी लक्ष्मी ई के नाम से बोधित होती है । ईकार से अभिहित होती है । उस श्री की मै इस लोक में शरण में जाता हूँ, उसको अपना सहारा मानता हूँ । वह मेरी रक्षा करने वाली है, इस अभिप्राय से मैं उसकी शरण मे हूँ । सबको उसी की शरण में जाना है और यह सबको सुलभ भी है, इसीलिये मैं उसकी शरण में हूँ । वह सर्वोत्कृष्ट है, उसका हृदय दया से भरा है, यह परम सुलभ है, अतः मैने आपको शरण ली हैं । हे लक्ष्मी, मेरी दरिद्रता को आप दूर करो, इसलिये मैं आपकी सेवा करता हूँ । मुझ शरणागत को आप अपनी शरण में लो । रामायण में कहा गया है -'जनकपुत्री सीता प्रणाम करने मात्र से प्रसन्न हो जाने वाली है । ए राक्षसियो, आनेवाले महान् भय से हमारी रक्षा करने में यही समर्थ हो सकती है ' ॥ ५ ॥

है आदित्य के समान वर्णवाली, सूर्य के समान देदीप्यमान स्वरूप वालो, अथवा सूर्य के समान प्रकाशान्तर निरपेक्ष स्वयं प्रकाश स्वरूप वाली हे लक्ष्मी! सूर्य को सजातीय प्रकाश को अपेक्षा नही रहतो, तो भो चक्षु, मन, आत्मा प्रभूति को सहायता से ही उसका प्रकाश होता है, किन्तु प्रत्यक चैतन्य स्वरूप से अभित्र परब्रह्मस्वरूपिणी श्री सजातीय, विजातीय सर्वविध प्रकाश के बिना अपेक्षा किये ही स्वयं प्रकाश स्वरूपिणी हैं, व्रत. लक्ष्मी में विद्यमान प्रकाश freपाविक हैं । हे श्री, तुम्हारे द्वारा प्रवर्तित नियम के

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वेदार्थपारिजातः २२३७ इत्युक्तलक्षणोऽपुष्प सन् फलोपेतः विल्वनामा वृक्ष तरु अधिजात प्रादुर्भूत' । त्वदीयात्करादिति शेषः । 'विल्वो लक्ष्म्याः करोऽभवत्' इति वामनपुराणात् |। अथ अनन्तर तस्य श्रीवृक्षस्य विल्वस्य फलानि अपक्वानि पक्वानि वा तपसा त्वत्तपसा त्वदनुग्रहेण आन्तराः अन्तरिन्द्रियान्तकरणमनोबुद्धिचित्ताहङ्कारसम्बन्धिन्यो यास्ता बाह्याश्च दारिद्रयादिलक्षणाः माया विभक्तेराकारश्छान्दसः । अलक्ष्मी अश्रियः । नुदन्तु अपनुदन्तु विनाशयन्तु । यद्वा तपसा फलसाधनहोमादिकर्मणा तत्फला- शनकर्मणा च । यद्वा मायान्तराः अन्तःकरणगा मायामज्ञानम् । यद्वा आन्तरा देहाद्यन्तर्गता. माया अलक्ष्मीः नुदन्तु । आन्तराः अन्तरिन्द्रियसम्बन्धिन्यो याः अविद्या याच बाह्या. दारिद्र्यादिलक्षणा अलक्ष्मीस्ताश्च नुदन्तु दूरीकुर्वन्तु । त्वकृपया श्रीवृक्षफलानि मया हुतानि भक्षितानि वा ममाज्ञानदारिद्र्यदु खादिनाश कुर्वन्त्वित्यर्थ. || ६||

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।

प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥

हे श्रीः, देवसख देवो महादेवस्तस्य सखा कुबेरः । कीर्तिः कीर्त्यभिमानिनी देवता दक्षकन्या कुबेरकोषागारवासिनी } - सम्पत्त्यधिष्ठात्री वा मणिना मणिभद्रेण कोषाध्यक्षेण चिन्तामणिना वा सह सार्धं माम् उपैतु उपागच्छतु । यद्वा देवाना सखी भूतः कल्पवृक्षः मणिना चिन्तामण्यादिरत्नेन सार्धं मामुपैतु । देवाना सखीभूतो नारायणो वा मणिना कौस्तुभेन साकं मामुपैतु । आगत्य च अहं यस्मिन् राष्ट्र देशे उत्पन्नोऽस्मि तंत्र कीर्ति यश. कोष वा ऋद्धि रसवद्वस्तुसमृद्धि च मे मह्यं ददातु ॥ यस्मिन् यस्मिन् राष्ट्रे मम प्रादुर्भाव स्यात्तत्र तत्र मा कीर्ति समृद्धि ददातु ॥ यद्वा में मह्यं मदीयराष्ट्राय च कीर्ति समृद्धि ददात्वित्यर्थं । सर्वेश्वर्याः सर्वकारणभूताया सर्वसमर्थत्वात् तदनुग्रहेण रुद्रो वा नारायणो वा सर्वैश्वर्येण भक्ताननु- ग्रहीतुमायात्येव || ७||

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।

अभूतिमसमृद्धिं च सर्वा निर्णुद मे गृहात् ॥८ ॥

क्षुत्पिपासामला क्षुत् क्षुधा बुभुक्षा पिपासा जलतृष्णा च मल मालिन्य यस्याः सा क्षुत्पिपासामलां ताम् । अश- कारण ही वनस्पति मे बिना पुष्प के ही फल लग जाते है । ऐसी वनस्पतियो मे श्रेष्ठ बिल्व फल आप से ही प्रादुर्भुत हुआ है । वामन पुराण में बताया गया है कि लक्ष्मी के हाथ से बिल्व फल की उत्पत्ति हुई है । आप के हाथ से उत्पन्न होने के बाद इस विल्व वृक्ष के पके हुए अथवा बिना पके हुए फल आपके अनुग्रह के कारण ही आन्तर इन्द्रिय मन, बुद्धि, अहङ्कार नामक अन्त करण की और बाह्य दरिद्रता आदि अलक्ष्मी के निवारण मे सदा समर्थ रहते है । अथवा उक्त फलो के द्वारा हवन आदि करने पर अथवा भोजन के रूप मे उनका ग्रहण करने पर अन्त करण स्थित अज्ञान अथवा शरीर के भीतर विद्यमान रोग आदि अशुभो का निवारण हो जाता है । इससे दारिद्र्य भी नष्ट हो जाता है । आपकी कृपा मेरे उपर ऐसी हो कि बिल्व के हवन, भक्षण आदि से मेरा अज्ञान और दारिद्र्य नष्टहो जाय || ६ || हे श्री, महादेव के मित्र कुबेर, कीर्ति की अभिमानिनी देवता दक्षकन्या, जो कि कुबेर के खजाने में निवास करती है, वह सारी सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी मणिभद्र नामक कोषाध्यक्ष के साथ अथवा चिन्तामणि के साथ मेरे समीप मे आजाय । अथवा देवताओ का मित्र कल्पवृक्ष चिन्तामणि प्रभृति रत्नी के साथ मेरे पास आ जाय । अथवा उन देवताओ के मित्र भगवान् नारायण अपनी कौस्तुभमणि के साथ मेरे पास आ जाय । ये सब मेरे पास आकर मैं जिस राष्ट्र में अथवा देश में उत्पन्न हुआ हू, वहाँ भी यश, कोष, धन्य-धान्य आदि से मुझे समृद्ध बनादे । जिस जिस राष्ट्र में मेरा जन्म हो, वहा वहा मेरे पास आकर ये मुझे कोति और , समृद्धि प्रदान करे । अथवा मुझे और मेरे राष्ट्र को भी कीर्ति और समृद्धि प्रदान करें । सर्वेश्वरी सर्वकारणभूता भगवती लक्ष्मी सबसे अधिक सभी कार्यो को सम्पन्न करने में समर्थ है । उसका अनुग्रह होने पर रुद्र अथवा नारायण भी अपने सम्पूर्ण ऐश्वर्य से भक्तो को अनुगृहीत करने आते ही है ॥ ७ ॥

क्षुधा और पिपासा रूपी मलिनता से भरी हुई, भूख और प्यास जीव के धर्म है । परब्रह्म इन मलिनताओं से अतीत है । इसी

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२२३८ वेदार्थपारिजातः नायापिपासे जीवधर्म । परब्रह्मणोऽशनायातीतत्वात् । तत एवेदमैश्वर्यमलमविद्यामूलकम् । तादृशीमशनायातृष्णामलोपेता ज्येष्ठा वृद्धा श्रियः प्रागुत्पन्नाम् अलक्ष्मीमश्रिय दारिद्रयमिति यावत्, अह नाशयामि नाश प्रापयामि । यथा ज्ञानमज्ञानपूर्वकं भवति, तथैव लक्ष्मीरपि अलक्ष्मीपूर्विकैव भवति । देवानपेक्ष्य असुराणा ज्येष्ठत्व बलवत्त्वं भूयस्त्व त, अनादिकालादेव तेषा ससारे बद्धमूलत्वात् । यद्यपि यथा व्रीह्यादिभर्जनसाधने भ्राष्ट्रे व्रीहियवगोधूमादीना स्थितिरपि दुर्लभा, तदङ्कराद्युत्पत्तिस्तु सुतरा दुर्लभा, तथैव अविद्याऽशनायापिपासाकामक्रोधादिमये भ्राष्ट्रोपमेऽन्त. करणे ससारे च ज्ञानभक्तिशान्ति सन्तोषादिदौर्लभ्य- मेव, तथापि यथाऽनादिकालात् गिरिकन्दरादिषु बद्धमूलमपि तमः प्रथमप्रदीपप्रभयैव पलायते, प्रकाशेन सङ्घर्षाय न प्रतिभटो भवति, तथैवानाद्यविद्योपबृहित बद्धमूलमपि कामक्रोधविद्यातृषाशनायादयो भक्तिविद्याशान्तिदान्त्यादीनामाविर्भावमात्रा- देवास्तं यान्ति, बुद्धेस्तत्त्वपक्षपातित्वात् । धर्मकीर्तिबद्धोऽपि तथैवाह- ' निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्ययैः । न बाधो यत्न- ' ( ) वत्त्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपाततः ॥ प्रमाणवार्तिक इति । अत एवान्ते दैवपक्षस्य विजयोऽसुरपक्षस्य पराजयः । तथैव श्रियोऽनुग्रहेऽनादिप्ररूढाया अपि क्षुत्पिपासामलाया ज्येष्ठाया अपि अलक्ष्म्या नाश एव भवति । हे श्रीः, त्वम् अभूतिम् असम्पत्ति सर्वा चासमृद्धिम् असवृद्धि मे मम गृहाद् निर्णुद निवारय । त्वत्कृपाकटाक्षित- स्यैवेश्वरत्वात् । यत्र भूयासस्त्वदपाङ्गाः पतन्ति स एव परब्रह्म परमेश्वरो वा भवति । अमी अपाङ्गा यत्र द्वित्रा पतन्ति स इन्द्रादिर्भवति । तदुक्त गुणरत्नकोशे - 'अपाङ्गा भूयासो यदुपरि परब्रह्म तदभूदमी यत्र द्वित्रा स च शतमखादिस्तदधरात् । अतः श्रीराम्नायस्तदुभय मुशस्त्वा प्रणिजगौ प्रशस्तिः सा राज्ञो यदपि च पुरीकोशकथनम् ॥ ' ( ३० ) । हे श्रीः, भूयासो बहुसख्याका अपाङ्गा. कटाक्षा यदुपरि पतन्ति तद्वस्तु परब्रह्म अभूत् । तव कटाक्षविषयीभूतं वस्तु परब्रह्मत्वमुपागच्छदि- त्यर्थः । अमी अपाङ्गा यत्र द्वित्रा द्वौ वा त्रयो वा द्वित्राः प्रसरन्ति स तदधरात् परब्रह्मणोऽर्वाचीन इन्द्रादिर्भवति । अत- स्त्वत्कटाक्षलब्धविभवत्वात् तदुभयं परब्रह्मशतमखादिरूपम् उशन् कामयमानः वदन्नाम्नायः त्वामेव प्रणिजगी सुस्पष्टं लिये यह सारा ऐश्वर्य मल अविद्यामूलक है । इस तरह की मुधा और पिपासा रूपी मलो से भरी हुई ज्येष्ठा, अर्थात् लक्ष्मी से पहले उत्पन्न हुई अलक्ष्मी का, अर्थात् दरिद्रता का मै नाश कर देना चाहता हूं । जैसे ज्ञान अज्ञान पूर्वक है, उसी तरह से लक्ष्मी भी दरिद्रता के साथ ही रहती है । देवो की अपेक्षा असुर ज्येष्ठ और बलवान् होते है, उनका आधिक्य भी रहता है, क्योंकि अनादि काल से सस्कार मे उनकी जड़े गहरी जमी हुई है । जैसे चावल आदि को भूजने वाली भाड मे चावल, यव, गोधूम आदि भी अपने पूर्व रूप मे नही रह पाते, तब उनसे अकुर आदि की उत्पत्ति होना तो असम्भव ही है, उसी तरह से अविद्या, भूख, प्यास, काम, क्रोध रूपी भाड वाले अन्त -करण में और इस ससार मे ज्ञान, भक्ति, शान्ति, सन्तोष आदि गुणो की स्थिति भी अत्यन्त दुर्लभ है । इस स्थिति मे भी अनादि काल से पहाड को गुफा मे विद्यमान अन्धकार प्रदीप की प्रथम लौ के देखते ही जैसे भागा जाता है, प्रकाश के साथ वह सघर्ष नही कर पाता, उसी तरह से अनादि अविद्या के कारण बढा हुआ काम, क्रोध, अविद्या आदि का आवेग भक्ति, विद्या, शान्ति आदि के प्रादुर्भाव के साथ ही नष्ट हो जाता है, क्योकि बुद्धि सदा सद्गुणों के साथ हो पक्षपात करती है । बौद्धाचार्य धर्मकीर्ति ने भी अपने ग्रन्थ प्रमाण-वार्तिक में इस बात को स्वीकार किया है । इसीलिये अन्त मे देवपक्ष की विजय और असुरपक्ष की पराजय होती है । इसी न्याय से लक्ष्मी का अनुग्रह होने पर अनादि काल से प्ररूढ क्षुत्पिपासामयी ज्येष्ठा अलक्ष्मी का भी नाश हो ही जाता है । हे लक्ष्मी, आप सारी अभूति ( अनैश्वर्य ) और असमृद्धि को मेरे घर से निकाल कर दूर भगा दीजिये । आपकी कृपादृष्टि जिस पर पडती है, वही ईश्वर अर्थात् समर्थ हो सकता है । जहाँ पर आपको कृपादृष्टि अधिक रहती है, वह तो परब्रह्म अथवा परमेश्वर ही हो जाता है । जहाँ पर आप की कृपादृष्टि दो तीन बार पडती है, वह इन्द्र प्रभृति का स्थान ग्रहण करता है । इस विषय का प्रतिपादन गुणरत्नकोशकार ने 'अपाङ्गा भूयासो' इत्यादि श्लोक मे किया है । इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि हे लक्ष्मी, जहा आपके बहुसंख्यक कृपाकटाक्ष बरसते हैं, वह तो परब्रह्म ही बन जाता है । यह कृपा दृष्टि जहाँ दो तीन बार पड़ती है, वह परब्रह्म से नीचे के इन्द्र प्रभृति पदों को प्राप्त कर लेता है । इसलिये उक्त पदों की प्राप्ति के निमित्त के रूप मे आप के कृपा कटाक्ष को ही शास्त्र प्रमुख कारण के रूप में वर्णित करते हैं । इस सम्बन्ध में आप की ही स्तुति में शास्त्र प्रवृत्त है । जैसे किसी राजधानी की धन सम्पत्ति का वर्णन करने से