वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1341–1350
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1341–1350
पृष्ठ 1341
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २२३ ९ गदितवान्, यथा पुर्या राजधान्याः कोशस्य धनसम्पदादेश्च यद्वर्णन क्रियते । तद्यथा राजस्तत्परिपालकस्य प्रभोरेव प्रशस्ति- भवति, तथैव परब्रह्मशतमखादिवर्णनमपि त्वन्माहात्म्यवर्णनमेव भवति । विष्णोः परमेश्वरस्य त्वदायत्तैश्वर्यत्वेऽपि न वैगुण्यम् । यथा माणिक्य स्वकान्त्या महाघं निरवधिकमूल्य भवदपि न विगुण भवति, तथैव कौस्तुभादे कान्तिरिव त्व स्वभावात्तस्य निरुपाधिकात्मस्वभावासि । तेन त्वदायत्तद्धित्वेऽपि सोऽपराधीनविभवोऽभवत् । तदपि तत्रैवोक्तम्-'स्वत श्रीस्त्वं विष्णोः त्वमसि तव एवैष भगवांस्त्वदायत्तद्धित्वेऽप्यभवदपराधीनविभव । स्वय दीप्त्या रत्न भवदपि महघं न विगुण न कुण्ठस्वा- तन्त्र्य भवति च न चान्याहितगुणम् ॥ ' इति ॥ ८॥
गन्धद्वारां दुराधर्षा नित्यपुष्टां करीषिणीम् ॥ ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९ ॥
गन्धो ग्राह्यो गुणो द्वारं लक्षण प्रमानक प्रमाण भवति यस्या सा गन्धद्वारा ताम् । शोभनानि गन्धानि शोभन- गन्धवन्ति द्वाराणि पुरप्रवेशद्वाराणि गृहप्रवेशद्वाराणि वा यस्याः सा गन्धद्वारा ताम् । दुराधर्षा केनापि धर्षयितुमशक्याम् । देव्यदानवाद्यनभिभूतप्रभावां नित्यपुष्टा सदा सस्यादिभि समृद्धा करीषिणी करीषोऽस्त्यस्या आश्रयत्वेनेति करीषिणी ताम् 1। ' गोमये वसते लक्ष्मीः' इति स्मृतेः । यद्वा करोष शुष्कगोमय, तद्वती गवाश्वादिबहुधनोपेता सर्वभूताना सर्वप्राणिनामीश्वरी स्वामिनीम्, आधारभूताम् अधिष्ठानभूता सर्वस्याप्यधिष्ठानस्यैव सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन स्वाध्यायस्तस्य नियामकत्वात् । भूमिरूपां भूशक्तिस्वरूपा वा उपह्वये ॥९॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्वस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ १० ॥
मनस' अन्तःकरणस्य काम मनोरथमभिलाषम् आकूति सङ्कल्प गमनागमनादिचेष्टां वा वाच' वागिन्द्रियस्य सत्यं यथार्थभाषण पशूना गोमहिषादीना रूप क्षीरादि अन्नस्य अदनीयस्य च रूप भक्ष्यादिचतुर्विधं च अशीमहि लभेमहि । त्वदनु- ग्रहेण मनोवाक्कायसङ्कल्पचेष्टादिलक्षणानि कर्माणि शुभानि सफलानि च भवन्त्वित्यर्थः । श्री सम्पत् यशः कीर्तिश्च मयि त्वदुपासके श्रयताम् आश्रयताम् ॥१० ॥
उसके परिपालक राजा की ही प्रशस्ति होती है । उसी तरह से परब्रह्म, शतमुख ( इन्द्र) आदि के वर्णन से भी उस लक्ष्मी के माहात्म्य का ही वर्णन होता है । भगवान् विष्णु का सारा ऐश्वर्य लक्ष्मी के ही अधीन रहे, इससे उनमें कोई वैगुण्य नही आवेगा । जैसे माणिक्य अपनी कान्ति के कारण बहुमूल्य होता है, उसमे कोई वैगुण्य नही मिलता, उसी तरह से कौस्तुभ आदि मणियो की कान्ति भी लक्ष्मी की कान्ति के कारण ही है । अत स्वय लक्ष्मी ही निरुपाधिक कान्ति और ऐश्वर्यवाली है, अन्य सारी समृद्धिया उस लक्ष्मी के ही अधीन है । यह लक्ष्मी भगवान् का ही निरुपाधिक स्वरूप है, अत सब कुछ लक्ष्मीके अधीन रहने पर भी भगवान् का सारा वैभव स्वायत्त ही रहता है, पराधीन नही । इसी बात को गुणरत्न कोशकार ने 'स्वत. श्रीस्त्व ' इस श्लोक में कहा है ॥ ८ ॥
घ्राणेन्द्रिय से ग्राह्य गुणगन्ध जिसका प्रमापक है अथवा जिसके पुर मे या गृह में प्रवेश के साधन दरवाजे सुगन्ध से सुवासित है जो स्वय दुराधर्ष है, देव, दानव प्रभृति जिसके प्रभाव को दबा नही सकते, जो स्वयं धन- धान्यादि से सदा सम्पन्न है, करीष अर्थात् गोमय मे जो निवास करने वाली है अथवा शुष्क गोमय ( गोहरी ) वाली, अर्थात् गाय, घोडा आदि पशुधन से जो संपन्न है, उन सभी प्राणियों की स्वामिनी, सभी आधारों को सत्ता और स्फूर्ति देने वाली शक्तिस्वरूपिणी भगवती लक्ष्मी को मै अपने पास बुलाता हूं ॥ ९ ॥
अन्त. करण की अभिलाषा को संकल्प को अथवा गमन, आगमन प्रभृति चेष्टाओ को, वाणी की सत्यता को, गो, महिष आदि को, क्षीर प्रमृति अदनीय चतुर्विध भक्ष्यादि पदार्थों को हम लक्ष्मी की कृपा से सदा प्राप्त कर सके । हे लक्ष्मी' आपके अनुग्रह से - ही हमारे मन, वाणी और शरीर की संकल्प, चेष्टा लक्षणक्रियाएं शुभ और सफल हो । आपके उपासकों को सम्पत्ति और यश की प्राप्ति - सदा होती रहे ॥ १० ॥
पृष्ठ 1342
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थ पारिजातः २२४०
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥
कर्दमेन कर्दमाख्यपुत्रेण प्रजा प्र प्रकृष्टा जा अपत्य यस्याः सा । कर्दमाख्येन प्रकृष्टापत्येनात्यवती सुपुत्रेत्यर्थः । 'जा अपत्यम्' (नि० ६।९ ) इति यास्कोक्ते: । भूता अभवत् । श्रीः कर्दमाख्येन प्रकृष्टपुत्रेण सपुत्रा अभवत् । अतः हे श्रीपुत्रकर्दम त्वं मयि मदीये गृहे संभव सवस । अतः पद्ममालिनी कमलमालाधारिणी मातरं त्वदीया जननी श्रिय मे मम कुले वशे वासय निवासं कारय । कर्दमस्य प्रजापतेः महातपसः देवहूत्याः सुखार्थ दिव्यविमानगृहादिनिर्मितवतः प्रख्यानमहावैभवस्य श्रीपुत्र- त्वादेव तथात्वं ज्ञातव्यम् । श्रिय पुत्रवात्सल्यात् तदिच्छ्या तदभिमते गृहे वासो नासम्भव ' || ११ ||
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
निच देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥
आपः उदकानि तदभिमानिन्यो देवता आप इत्युच्यन्ते । ताश्च स्निग्धानि स्नेहयुक्तानि कार्याणि सृजन्तु उत्पाद- यन्तु, सोमात्मकानामपा स्नेहमयत्वात् । अग्नीषोमात्मकस्य जगतः सर्वस्यैवाग्नीषोमकार्यत्व प्रसिद्धम् । अग्निप्राधान्येन काठिन्यबलवत्त्वाद्युपेतं कार्य भवति । सोमप्राधान्येन स्नेहप्रधानानि कार्याणि भवन्ति । नहि स्नेहमन्तरा किञ्चिदपि वस्तु वस्त्वन्तरेण संश्लिष्य़ते युज्यते च । स्नेहमन्तरा न परमाणुः परमाण्वन्तरेण द्वयणुकं द्वयणुकाभ्या श्लिष्यते । स्नेहेनैव मित्राणि मित्रैः पत्न्यः पतिभिः संयुज्यन्ते । देवमनुष्यादय. सर्वेऽपि स्नेहाविष्टाः सन्तःस्निग्धानि कार्याणि यज्जनयन्ति तत्सोमात्मकाना- मपा स्नेहनादेवेति । हे चिक्लीताख्य श्रीपुत्र, मे मम गृहे वस निवस । अपि च, देवी क्रीडापरा मातरं श्रियं मम कुले वासय निवासय । वेदवेदान्तवेद्यं सच्चिदानन्दात्मकं मूलतत्त्वमेव सर्वस्य प्रपञ्चस्य निमित्तकारणमुपादानकारणं च । यथैव बीजेऽङ्करोत्पादिनी शक्तिर्भवति, तथैव ब्रह्मणि प्रपञ्चोत्पादिनी शक्तिर्भवति । साधिष्ठाना शक्तिः, शक्तिमद्ब्रह्म चानर्थान्तरमेव । तत्र साधिष्ठाना शक्तिरेव विमर्शप्रधाना प्रकाशः । शक्तिमद्ब्रह्मैव च प्रकाशप्रधानो विमर्श । यथा शीतोष्णाभ्या तन्त्रीभ्यामेव सयुज्य विद्युत्प्र- हे लक्ष्मी, आप कर्दम नाम के प्रकृष्ट गुणसम्पन्न अपने पुत्र के कारण पुत्रवती है । यास्क के निरुक्त में 'जा' का अर्थ पुत्र ( अपत्य) किया गया है । हे कर्दम, आप जैसे सुपुत्र के कारण लक्ष्मी पुत्रवती हुई थी । हे श्री पुत्र कर्दम, आप मेरे घर मे निवास कीजिये और कमल की माला धारण करने वाली अपनी माता लक्ष्मी को भी आप मेरे घर ले आइये । कर्दम प्रजापति ने अपनी तपस्या से देवहूति की सुख -सुविधा के दिव्य विमान का घर बना दिया था और उसमे सारा वैभव इकट्ठा कर दिया था । इसका कारण यही था कि वे लक्ष्मी के सुयोग्य पुत्र थे । पुत्र के वात्सल्य के कारण लक्ष्मी उनको इच्छा के अनुसार किसी घर में निवास करे, इसमें आश्चर्य की कोई बात नही है ॥ ११ ॥
जल की अभिमानिनी देवता 'आप ' नाम से अभिहित हैं । यह जलदेवता स्नेह पूर्ण वातावरण की सृष्टि करे, क्योकि सोमा- त्मक जल देवता स्नेह से ओत प्रोत हैं । यह जगत् अग्नीषोमात्मक है, अत इसमें शोषण और आप्यायन क्रियाए निरन्तर चलती रहती है अग्नि की प्रधानता में काठिन्य और बलसम्पन्न कार्यों की उत्पत्ति होती है और सोम की प्रधानता मे स्नेहप्रधान कार्यो की । बिना स्नेह के कोई भी वस्तु एक दूसरे से मिल या जुट नही सकती । इसके बिना एक परमाणु दूसरे परमाणु से और एक द्वयणुक दूसरे द्व्यणुक से नहीं जुट सकता । स्नेह के कारण ही एक मित्र दूसरे मित्र के साथ और पत्नी पति के साथ स्नेह से रहते है । देव, मनुष्य सभी प्राणी स्नेह से आविष्ट होकर सौहार्दपूर्ण वातावरण की सृष्टि करते हैं, यह सोमात्मक जल देवता का ही प्रसाद है । हे चिक्लीत नामक लक्ष्मी के पुत्र, आप मेरे घर में निवास कीजिये और क्रीडनशीला देवी अपनी माता लक्ष्मी को भी आप - मेरे ही घर निवास केराइये । वेद और वेदान्त से जानने योग्य सच्चिदानन्दात्मक मूलतत्त्व ही सारे प्रपंच का निमित्तकारण और उपा+ दान कारण है । * जैसे बीज में अंकुर को उत्पन्न करनेवाली शक्ति रहती है, उसी तरह से ब्रह्म में प्रपत्र को उत्पन्न करने वाली शक्ति
पृष्ठ 1343
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २२४१ काशो दोप्यते, तथैव प्रकाशविमर्शयोर्ब्रह्मतच्छक्त्योरेवाग्नीपोमात्मनाऽभिव्यक्ति 1। तयोरेव प्रसिद्धसूर्यचन्द्ररूपेणाग्निजलरूपेण चाभिव्यक्तिः । सृष्टिसमयेऽभ्युदयाय स्नेहप्रीतिसामञ्जस्यादिकमपेक्षितम् । मातृषु वात्सल्य पत्नोषु मित्रेषु स्नेहादिक यत् दृश्यते तत्सर्व मूलभूतायाः श्रियः सकाशादेव सम्भवति । यथाधिष्ठानसस्वस्फूर्तिभ्यामेव तदध्यस्तानां नत्तावत्त्व स्फूर्तिमत्त्वं च सम्भवति, तथैव साधिष्ठानायाः शक्ते श्रिय एव स्नेहवात्सल्यप्रीत्यादय सर्वत्र प्रमरन्ति । यथा अस्ति भातीति ब्रह्मण एव रूपद्वयं सर्वत्रानुभूयते, तथैवेष्टमिति वा प्रियमिति वा यद्भाति तदपि ब्रह्मरूपमेव, तस्यैव नर्वप्राणिपरप्रेमास्पदत्वात् । प्रेमास्प-दता च सर्वातिशायिनी प्रतीच्येव पर्यवस्यति, 'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रिय भवति', ( वृ० उ० २।४।५ ) इति श्रुतेः । स च प्रत्यगात्मा चितिरूपाया ब्रह्मात्मिकाया तत्पदार्थात्मिकाया एव रूपान्तरमिति तस्मिन्नेव तत्पुत्रत्वकल्पना भवति । तस्य च परप्रेमास्पदत्वादेव स्निग्धत्वात् प्रेमक्लिन्नत्वात् चिक्लीतकर्दमादिपदवाच्यता । तत एव चिक्लीतकर्दमयोरभेद एव मन्तव्य । निरतिशयपरप्रेमास्पदत्वाभिप्रायेणैवान्यत्र प्रत्यक्परात्मनोरेव दिव्यदम्पतीत्वमपि । यथा व्याजहार तत्र- भवान् कविकुलगुरुः श्रीकालिदासः - ' वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरी ॥ ' श्रीशङ्कराचार्यै. प्रत्यक्परात्मनोर्जलवीचिभाव उक्त. । तरङ्गाणा समुद्रोपर्युपलभ्यमानत्वाभिप्रायेणैव श्रियो विष्णुवक्षःस्थल- स्थायित्वम् । राधायाः श्रीमत्कृष्णाङ्कपर्यङ्कस्थायित्वम्, राजराजेश्वर्यास्त्रिपुरसुन्दर्या कामेश्वराङ्कनिलयात्वमुक्तम् । प्रकृते तु ब्रह्मचिद्रूपाया निरतिशयप्रेमास्पदत्वेन प्रत्यक्समूहरूपस्यैव कर्दमत्व चिक्लीतत्व चोक्तम् । पुत्रवात्सल्यातिशयाद्यथा जननी प्रियपुत्रपराधीना पुत्रेच्छयैव तत्र तत्र तिष्ठति, तथैव कर्दमस्य चिक्लीतस्य वा प्रसादेन तदभीष्टस्थले सर्वेश्वर्यपूर्णायास्तत्पदार्था- विद्यमान है । अधिष्ठान के साथ शक्ति अथवा शक्तिके साथ ब्रह्म इन दोनो वाक्यों से एक ही अर्थ का बोध होता है । इनमे से अधिष्ठान के साथ शक्ति को विमर्शप्रधान प्रकाश और शक्ति के साथ ब्रह्म को प्रकाशप्रधानदिमर्श के नाम से तान्त्रिकगण जानते है । जैसे ठढे और गरम तारो के मिलने पर ही बिजली का प्रकाश होता है, उसी तरह से प्रकाश और विमर्श, ब्रह्म और उसकी शक्ति से ही अग्नी- षोमात्मक जगत् की अभिव्यक्ति होती है । सूर्य और चन्द्र, अग्नि और जल के रूप मे भो ये ही अभिव्यक्त होते हैं । सृष्टि के समय उसकी अभिवृद्धि के लिये स्नेह, प्रीति, सामजस्य आदि की अपेक्षा रहती है । माता का वात्सन्य, पति, पत्नी, मित्र आदि का स्नेह यह सब लक्ष्मी के प्रसाद से ही प्राप्त होता है । जैसे अधिष्ठान की सत्ता और स्फूर्ति से ही उसमे अध्यस्त ममस्त पदार्थ सत्तावान् और स्फूर्तिमान् दिखाई पड़ते है, उसी तरह से साधिष्ठान शक्ति अर्थात् लक्ष्मी से ही स्नेह, वात्सल्य, प्रीति प्रभृति का अन्यत्र स्फुरण (प्रसार) होता है । जैसे अस्ति (विद्यमान है ) और भाति (प्रकाशित हो रहा हैं) ये दो ब्रह्म के ही स्वरूप सर्वत्र अनुभूत होते है, उसी तरह से इष्ट, प्रेमास्पदताप्रिय आदि रूपो मे भासित हो रही वस्तु भो ब्रह्म का ही स्वरूप है । उक्त ब्रह्म हो सभी प्राणियो का परम प्रेमास्पद है । सर्वातिशायिनी अपनी आत्मा में ही पर्यवसित होती है बृहदारण्यक श्रुति भी कहती है कि अपने लिये ही सब कुछ प्रिय होता है । यह प्रत्यगात्मा चितिस्वरूपिणी ब्रह्मात्मिका तत्पदार्थात्मिका लक्ष्मी का ही रूपान्तर है, इसीलिये तत्पदार्थबोध्य जीव को यहाउस लक्ष्मी का पुत्र कहा गया है । वह परम प्रेमास्पद है, उसके ऊपर माता का अत्यन्त स्नेह है, वह उसके प्रेम से क्लिन्न (आई) हैव्यक्तिअत है । लक्ष्मी के पुत्र जीव को यहा चिक्लीत अथवा कर्दम के नाम से जाना जाता है । इस तरह से चिक्लीत और कर्दम का अभिन्न निरतिशय परम प्रेमास्पद होने से ही प्रत्यक् और पराक् आत्मा का अन्यत्र दिव्य दम्पती के रूप मे वर्णन मिलता है । जैसा कि कविकुल- गुरु कालिदास ने रघुवश के प्रथम श्लोक में कहा है-'वाणी ( शब्द) और अर्थ के ज्ञान के लिये मै शब्द और अर्थ के समान सम्पृक्त), जगत् के माता पिता, पार्वती और परमेश्वर (शिव ) को प्रणाम करता हूँ' । भगवान् शंकराचार्य ने प्रत्यक् ( जीव ) और पराग् ( परमेश्वर आत्मा का जल और उसकी तरग के रूप में वर्णन किया है । तरङ्गे जैसे समुद्र के ऊपर लहराती है, उसी तरह से लक्ष्मी भी विष्णुहैंके। वक्षस्थल पर विराजमान रहती है । राधा श्री कृष्ण की गोद मे और राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी कामेश्वर के अंक में निवास करती के नाम सेप्रस्तुत स्थल में ब्रह्म चित्स्वरूपिणी लक्ष्मी के परम प्रेम को आस्पद होने से प्रत्यक् स्वरूप जीवात्मा ही कर्दम अथवा चिक्लीत कहा गया है | अतिशय पुत्रवात्सल्य के कारण माता अपने प्रिय पुत्र के अधीन होकर पुत्र की इच्छा के अनुसार ही सब कुछ करती है, उसी तरह से कर्दम अथवा चिक्लीत के प्रसाद से सब ऐश्वर्यों से परिपूर्ण तत्पदार्थात्मिका (ब्रह्मात्मस्वरूपिणी ) भगवती लक्ष्मी भी माता लक्ष्मीउनकी इच्छानुसार ही जहां वे कहते हैं वहा निवास करती है । अत चिक्लीत से यह प्रार्थना करना उचित ही है कि आप २८१
पृष्ठ 1344
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२४२ वेदार्थपारिजातः मिकाया भगवत्याः श्रियो वासो भवतीति तदेव प्रार्थ्यते ॥ १२॥
आर्द्रा पुष्करिणी पुष्टि पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १३ ॥
आर्द्रा क्लिन्ना क्षीरोदधेरुत्पन्नत्वात् । दयार्द्रहृदया वा । रुद्ररूपां वा । पुष्करिणी पुष्करं पदम् अस्ति अस्याः (हस्ते) इति पुष्करिणी ताम् । यद्वा पुष्कर गजशुण्डाग्रम् अभिषेकार्थम् उद्युक्त दिग्गजाना पुष्कर शुण्डाग्रे यस्याः सा पुष्करिणी ताम् । 'पुष्कर द्वीपतीर्थाहिखगराजौषधान्तरे । तुर्याशेऽसि फले काण्डे शुण्डाग्रे खे जलेऽम्बुजे ॥ ' ( अनेकार्थसङ्ग्रह, ३।६१४-६१५ ) इति अनेकार्थसङ्ग्रहकोषात् पद्मलतारूपा वा । पुष्टि पुष्टिमती चित्साररूपत्वाच्छक्तिरूपत्वाच्च पुष्टिप्रदा वा पुष्टिरूपा पुष्टाभिमानिनी देवता वा, 'या देवी सर्वभूतेषु पुष्टिरूपेण संस्थिता' इति सप्तशतीवचनात् । पिङ्गला पिङ्गलवर्णाम्, तप्तकाञ्चनप्रभामित्यर्थः । पद्ममालिनी पद्ममालाधारिणीम् । चन्द्रा चन्द्रवदाह्लादकारिणी चन्द्रमुखी वा । हिरण्मयी ज्योतिर्मयी सर्वज्योतिषा ज्योति - ब्रह्मरूपां वा । लक्ष्मी दिव्यलक्षणोज्ज्वला विष्णुपत्नी मे मह्यं हे जातवेदः वेदाविर्भावक नारायण, आवह आवाहय ॥ १३ ॥
'आर्द्रा यष्करिणीं यष्टि सुवर्णा हेममालिनीम् ।
सूर्या हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १४॥
आर्द्रा क्लिन्नाम् अकारणकारुण्यद्रवहृदया यष्करिणी यष्टियुक्तकराम् पृषोदरादित्वात् साधुत्वम् । वेत्रहस्तां रत्नाद्य-लडुकृतदण्डधारिणी वा यष्टिदण्डविधात्री शिक्षणकर्त्री वा । यष्टिदण्डरूपा तद्युता धर्मंदण्डस्वरूपिणी सतामालम्बनयष्टिरूपां वा | सुवर्णा शोभनवर्णा सुवर्णसमानवर्णा वा काञ्चनस्वरूपा हेममालिनी हेम्ना हेमविकारैः सुवर्णाभरणैर्मालते शोभत इति हेममालिनी, ता हेमविकृतमणिशृङ्खलादिमालायुक्ताम् । सूर्या सूर्यवत्प्रकाशमानां सूर्यवत् ज्ञानप्रकाशप्रदा सूर्यरूपां वा । अथवा सूर्यवज्जगतो जङ्गमशीलस्य तस्थुषः स्थावरस्य चात्मभूतां आदिकारणभूतां वा ता हिरण्मयी ब्रह्मज्योतीरूपा लक्ष्मी मे मह्यं हे जातवेदः, अग्ने परमेश्वर आवह आनय ॥ १४ ॥
को मेरे कुल में निवास करने के लिये कहिये ॥ १२ ॥
क्षीर सागर से उत्पन्न होने के कारण लक्ष्मी सदा क्लिन्न रहती है । दया से इनका हृदय भरा रहता है । अथवा ये रुद्रदेवता आर्द्रा नक्षत्र स्वरूपिणी है । इनके हाथ मे पुष्कर ( पद्म ) विराजमान हैं । अथवा हाथी की सूड का अग्रभाग अभिषेक के लिये सदा इनके सामने रहता है | अभिधान चिन्तामणि मे पुष्कर शब्द शुण्डाग्र के अर्थ में भी पठिन है । तदनुसार दिग्गजो की सूड का अग्रभाग सदा लक्ष्मी की सेवा मे लगा रहता है, यह अर्थ होगा । अथवा यह लक्ष्मी प्रेमलता रूप है । यह लक्ष्मी चित्तत्व का सार और शक्तिस्वरूपिणी है, अतः यह पुष्टिमती है, पुष्टिप्रद, पुष्टिरूप अथवा पुष्टि की अभिमानिनी देवता है | दुर्गासप्तशती में बताया गया है कि यह देवी सभी प्राणियों मे पुष्टि के रूप में रहती हैं । यह पिङ्गलवर्ण है, तपे हुए सोने के समान इनका वर्ण है । पद्म की माला धारण करने वाली, चन्द्रमा के समान आह्लादित करने वाली अथवा चन्द्रमा के समान मुख वाली, ज्योतिर्मयी सभी ज्योतियों को प्रकाशित करने वाली अथवा ब्रह्म-स्वरूपिणी यह लक्ष्मी दिव्य लक्षण वाली विष्णु की पत्नी है । हे जातवेद, वेद के आविर्भावक नारायण आप मेरे लिये उस लक्ष्मी को बुला दीजिये ॥ १३ ॥
अकारण करुणा से दयार्द्र हृदयवाली, वेत्र दण्ड को हाथ में धारण करनेवाली अथवा रत्न आदि से अलकृत दण्ड को धारण करने वाली अथवा सभी प्राणियों को शिक्षा देने वाली, यष्टि दण्ड को धारण करनेवाली, धर्मदण्ड का स्वरूप धारण करने वाली अथवा सज्जनों को सहारा देने वालो, शोभन वर्णवाली अथवा सुवर्ण के समान वर्णवाली अथवा काञ्चनस्वरूपिणी, सोने के गहनो से सुशो-भित, सूर्य के समान प्रकाशमान, अथवा सूर्य के समान ज्ञान का प्रकाश देनेवाली, अथवा सूर्यस्वरूपिणी, अथवा सूर्य के समान स्थावर और जंगम जगत् की आत्मभूत, अथवा आदिकारणभूत, उस ब्रह्म ज्योतिस्वरूपिणी लक्ष्मी को, हे जातवेद अग्ने, परमेश्वर, मेरे लिये बुला दीजिये ॥ १४ ॥;
पृष्ठ 1345
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २२४३
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्य प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥ १५ ॥
हे जातवेदः, जातप्रज्ञ, जातोपलक्षित जाताजातसर्ववेदित सर्ववेदकारणत्वेन सर्वज्ञानभुक् हे सर्वज्ञ परमेश्वर, ता पूर्वोक्तलक्षणा लोके वेदे च ब्रह्मविद्वरिष्ठगोष्ठ्या वा सर्वकारणत्वेन सर्वश्वर्यवत्त्वेन प्रसिद्धा वा अनपगामिनीम् अनपायिनी नित्या लक्ष्मी मे मह्यम् आवह आनय आवाहय वा । यस्या प्रसन्नायामावाहिनाया वा प्रभूत भूयिष्ठ हिरण्य सुवर्ण गावो गाः धेनू दास्य दासी: सेविकाः । उभयत्र छान्दसत्वात् व्यत्ययेन प्रथमा । अश्वान् हयान् पुरुषान् पुत्रमित्रादीनह विन्देयं लभेय || १५ ||
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
यः पुमानधिकृत उपनीतस्त्रैवर्णिक | श्रीकामः श्रिय लक्ष्मी परब्रह्माकारां वृत्ति वा कामयमानः शुचि बाह्याभ्यन्तरं शुद्धः । मृज्जलाभ्या बाह्यतः, कामक्रोधाहङ्कारादिपरिहारेणान्तरत. पवित्र प्रयत । जितेन्द्रियो भूत्वा अन्वह प्रतिदिवस पञ्चदशभिः पूर्वोक्ताभिर्ऋग्भि, आज्य घृतमाहवनीये आवसथ्ये यथोक्तसस्कारसंस्कृते लौकिके वाग्नौ जुहुयात् होम कुर्यात् सन्ततं निरन्तर च श्रियः श्रीदैवतं पञ्चदशचं जपेत् तस्य पूर्वोक्त वक्ष्यमाणं च फल सम्पादय, हे जातवेद इति शेषः । स सकामश्चेदभीष्टफलसिद्धि निष्कामश्चेन्निरावरणब्रह्मरूप मोक्ष श्रियोऽनुग्रह च प्राप्नोतीत्यर्थ. || १६||
पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षि पद्मसम्भवे ।
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥१७॥
पद्मानने पद्मवद्वर्तुलं सुन्दर सुगन्धि आनन मुख यस्याः सा पद्मानना तत्सम्बुद्धौ । हे लक्ष्मि मे मह्य तत् चतुर्वर्ग तत्तल्लोकोत्तरं प्रेमतत्त्व वा त्व भजसि यच्छसि, धातूनामनेकार्थत्वात् । येनाह मौख्यं सुस्थत्व लभामि प्राप्नुयाम् । पद्मऊरू पद्मवत् कोमले ऊरू यस्याः सा पद्म ऊरूस्तत्सम्बुद्धौ, असन्धिरार्ष: । पद्माक्षि पद्मवदक्षिणी यस्याः सा पद्माक्षी तत्सम्बुद्धौ । हे जातवेद, जातप्रज्ञ, जात ( उत्पन्न) और अजात सभी पदार्थो को जानने वाले, सभी वेदों के कारणभूत अतएव सर्वज्ञानयुक्त हे सर्वज्ञ परमेश्वर, लोक, वेद और वरिष्ठ ब्रह्मवेत्ताओ की गोष्ठी मे सभी जगत् के कारण के रूप में अथवा सारे ऐश्वर्य के देने वाली के रूप मे जो प्रसिद्ध है, उस अनपायिनी नित्यलक्षणवाली लक्ष्मी को आप मेरे लिये बुला दीजिये अथवा मेरे पास ले आइये । उस लक्ष्मी के प्रसन्न होने पर अथवा पास मे बुला लेने पर प्रभूत सुवर्ण, गाय, धेनु, दास, दासी, घोडे और पुरुष अर्थात् पुत्र, मित्र, बान्धव आदि की प्राप्ति होती है ॥ १५ ॥
जो अधिकारी पुरुष, त्रैवर्णिक उपनीत व्यक्ति, लक्ष्मी को चाहता है अथवा परब्रह्म के आकार वाली चित्तवृत्ति को चाहता है वह बाह्य और आभ्यन्तर से पवित्र होकर, अर्थात् मिट्टी, जल आदि से बाह्य शरीर की शुद्धि और काम, क्रोध, अहकार प्रभृति का त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि करके, अपनी इन्द्रियो को अपने वश मे करले । तब प्रतिदिन पूर्वोक्त पन्द्रह ऋचाओ से आहवनीय आवसथ्य अथवा यथोक्त संस्कारो से संस्कृत, लौकिक अग्नि मे हवन करे और सदा उक्त पन्द्रह ऋचाओ वाले श्री देवता वाले सूक्त का पाठ करे । हे जातवेद अग्ने, उसको आप पूर्वोक्त तथा आगे कहे गये फल को प्रदान करें । इस प्रकार श्रीसूक्त का पाठ और उसके हवन करने वाला व्यक्ति यदि सकाम है, तो अभीष्ट फल की सिद्धि होती है और यदि वह निष्काम है, तो उसको निरावरण मोक्ष की अथवा लक्ष्मी के अनुग्रह की प्राप्ति होती है ॥॥ १६ ॥॥
पद्म के समान वर्तुल, सुन्दर और सुगन्धयुक्त मुख वाली हे लक्ष्मि, आप मुझे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को अथवा लोको-त्तर प्रेमतत्त्व को देने वाली है । इससे मुझे सुख और स्थिरता मिलती है । हे पद्म के समान कोमल जंघा वाली, हे पद्म के समान नेत्र-वाली लक्ष्मि, अथवा पद अर्थात् भगवान् नारायण के चरण कमल के सदृशया शोभा जिनके नेत्रों की है, वह पद्माक्षी लक्ष्मी 'पद्माक्षि
पृष्ठ 1346
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थ पारिजातः २२४४ यद्वा पदोर्नारायणपदयोर्या शोभा पद्मा तस्यामक्षिणी यस्याः सा पद्माक्षी तत्सम्बुद्धौ । अस्य शब्दस्य द्विरुक्तिरादरार्था । अति- विशालनेत्रत्वेन सर्वद्रष्ट्रीत्व सर्वज्ञात्वं वा भगवत्याः । अर्थाद् हे सर्वज्ञे भगवति पद्मसम्भवे, पद्मात् सम्भवो यस्याः सा पद्मसम्भवा कमलोत्पत्तिका तत्सम्बुद्धौ । यद्वा -' पद्मो व्यूहे निधौ अहौ । सख्याब्जयो' पद्ममिभविन्दौ' ( अनेकार्थसङ्ग्रह ३३२ ) इति अनेकार्थसङ्ग्रहकोशात् पद्मशब्दोऽसख्यातवाचक । आननशब्देन च मुखयुक्त शिरो लक्ष्यते । पद्मानि पद्मसख्यानि असख्यातानि आननानि शिरांसि यस्याः सा पद्मानना तत्सम्बुद्धौ हे सहस्रशीर्षे । विरारूपत्वेन सर्वेषा प्राणिना यानि शिरासि तानि त्वदीयान्येव शिरासि अनन्तशीर्षे । अनन्ताक्षि अनन्तपात् । पद्मसंख्याका ऊरुपदोपलक्षिता पादा यस्या सा पद्मऊरुः, तत्सम्बुद्धौ, अर्थात् हे सहस्रपात् । पद्माक्षि पद्मसंख्यानि अक्षीणि यस्याः सा तत्सम्बुद्धौ हे पद्माक्षि, हे सहस्रलोचने! पद्मसम्भवे पद्मानामनन्ताना जगतामुत्पत्तिर्यस्या' सकाशात् सा पद्मसम्भवा तत्सम्बुद्धौ । यद्वा पद्मपद सर्वनिधीनामुपलक्षणं पद्मानामनन्ताना महापद्मादिनिधीनां सम्भव उत्पत्तिर्यस्याः सकाशात् सा पद्मसम्भवा तत्सम्बुद्धौ । सीतोपनिषदादो
निधीनां तद्विभूतित्ववर्णनात् । हे सर्वनिधीनामादिकारणभूते इत्यर्थ ॥ १७॥
पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥ १८॥
हे पद्मानने पद्मवत्कोमलं सुगन्धि सुन्दरमाननं यस्मा सा पद्मानना तत्सम्बुद्धौ । हे पद्मिनि पद्ममस्ति अस्या आश्रयत्वेनेति पद्मिनी तत्सम्बुद्धौ, पद्मलतारूपे तन्नामिके हे महालक्ष्मि वा । पद्मपत्रे पतन पत्, त्रायत इति त्रम्, पतस्त्रायत इति पत्रम्, स्थित्यधिकरणं पद्म पत्र यस्या सा पद्मपत्रा तत्सम्बुद्धौ । 'पत्र वाहनपक्षयोः ' इति कोषात् । पद्मासने कमलारूढे वा । पद्मप्रिये पद्मस्य पत्रं पद्मम्, पद्मस्य पुष्प वा पद्मम्, तत् प्रिय यस्याः सा पद्मप्रिया तत्सम्बुद्धौ । पद्मदलायताक्षि पद्मस्य दलं पद्मदलं तद्वद् आयते विस्तृते अक्षिणी नेत्रे यस्या' सा पद्मदलायताक्षी तत्सम्बुद्धौ कर्णान्तदीर्घनयने । विश्वप्रिये विश्वस्य जगतः प्रिया प्रीतिविषयेति विश्वप्रिया तत्सम्बुद्धौ । विश्वं प्रीणाति तर्पयति वा या सा विश्वप्रिया तत्सम्बुद्धौ । विश्वमनो- ऽनुकूले विश्वस्य जगतो मनसामनुकूलेति विश्वमनोऽनुकूला तत्सम्बुद्धौ । हे सर्वमनोरथपूरिके दयामयि । त्वत्पादपद्म पादौ पद्धमिवेति पादपद्मं तव पादपद्म त्वत्पादपद्म स्वचरणपङ्कजं पापतापनाशकं मयि मदुपरि सन्निधत्स्व स्थापय । येनाहं कृतार्थः स्यामित्यर्थः ॥ १८॥
शब्द को इस मन्त्र में दूसरी आवृत्ति आदर प्रदर्शन के लिये है अथवा अतिविशाल नेत्र होते से यह भगवती लक्ष्मी सबको देखने वाली ' ,,! अथवा सबको जानने वाली है । अर्थात् हे सर्वज्ञे भगवति पद्मसम्भवे कमल से उत्पन्न होने वाली लक्ष्मि अथवा हेमकोश के अनुसार पद्म शब्द यहा असख्यान वस्तु का वाचक है । आनन शब्द से मुख सहित शिर बोधित होता है । तब पद्मानना शब्द का अर्थ होगा असख्य शिरवाली, अर्थात् सहस्रशीर्षा विराट के समान अनन्त मुखवाली । इसका अभिप्राय यह है कि सभी प्राणियो के शिर आपके हो शिर है ऊरु शब्द पादवाची भी है, अत अनन्त पाद अर्थात् चरण वाली भी आप ही है, सहस्रपात् विराट आपका ही स्वरूप है । 'पद्म संख्या वाली आखें आपके है, अत: आप पद्माक्षि अर्थात् सहस्रलोचन वाली है । अनन्त लोको की उत्पत्ति भी आप से ही होती है, अत आप पद्मसम्भवा है । अथवा पद्मपद सभी निधियो का बोध कराता है । आप अनन्त पद्मापद्म प्रभूति निधियो की उत्पत्ति करने वाली है । सीतोपनिषद् प्रभृति ग्रन्थो मे निधियो का लक्ष्मी की विभूति के रूप में वर्णन है । हे सब निधियो की आदिकारणभूत लक्ष्मी आप मुझे वह सब कुछ दीजिये, जिससे कि मैं सारी सुख-सुविधाओ के साथ जी सकू ॥ १७ ॥
हे पद्मानने पद्म के समान कोमल सुगन्धमय सुन्दर मुख वाली लक्ष्मि, हे पद्मिनि पद्म का आश्रय लेने वाली पद्मलता रूप नायिके महालक्ष्मि, पद्मपत्र पर आसन लगाकर बैठने वाली अर्थात् कमलासन पर आरूढ लक्ष्मी, पद्म के पत्र और पुष्प जिनको अत्यन्त प्रिय हैं जो पद्मपत्र के समान आयतन भी वाली है, कर्णप्रान्त को जिसके नेत्र छूते हैं, जो सारे जगत् को प्रसन्न करने वाली है तृप्त करने वाली है, सारे जगत् के प्राणियों के जो मनोनुकूल है, सबके मनोरथों को पूरा करने वाली है, ऐसी हे दयामयि लक्ष्मी, आप सभी पापों का नाश कर देने वाले अपने चरण कमलो को मेरे ऊपर रखिये, जिससे कि मैं कृतार्थ हो जाऊ ॥ १८ ॥
पृष्ठ 1347
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २२४५
अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने ।
धन मे जुषतां देवि सर्वकामाश्च देहि मे ॥ १ ९॥
अश्वदायि अश्वान् ददाति प्रयच्छतीति अवदायी तत्सम्बुद्धौ । गोदायि गा गोधन ददातीति गोदायी तत्सम्बुद्धौ । धेनुदात्रि वाग्दात्रि पाटवादिगुणयुक्तेन्द्रियदात्रि वा । धनदायि धन ददातीति धनदायी नत्सम्बुद्धी | धनत्ववत्सर्वधनदात्रि । अत्र सर्वत्र ' कर्मण्यण' ( पा० सू० ३।२।१ ) इत्यण् 'आतो युक्, (पा० सू० ७ ३ ३३) इति युक् । ' टिड्ढाणञ् ' ( पा० सू० ४।१।१५ ) इति ङीप् । छान्दसत्वात् समाधानम् । महाधने महद् उत्कृष्टम्, अपरिमितम्, बहुमूल्यं परिमाणतोऽत्यधिकं वा धनं यस्याः सा महाधना तत्सम्बुद्धौ । धन सर्वमपि धनपदवाच्य सुवर्ण- मणि रत्नगवाश्वगजपुरुपरराज्यसाम्राज्यादि, मे मम- गृहम् जुषता सेवताम् । हे देवि क्रीडाकौतुकाय जगन्निर्मात्रि, मे मह्य त्वदुपासकाय । च त्वरया दृढतया वा । सर्वकामान् काम्यन्ते इति कामा अभिलाषा विपया धर्मार्थकाममोक्षरूपा. पदार्थाः । सर्वे च ते कामाः सर्वकामास्तान् । देहि प्रयच्छ ॥१ ९ ॥
1 पुत्रपौत्रधनं धान्य हस्त्यश्वाश्वतरीरथैः ।
प्रजानां भवसी माता आयुष्मन्तं करोतु माम् ॥२०॥
हे श्री, पुत्रपौत्रधन पूयते दुर्गन्धिव्रणादिधनतिमिरमय दुखमनुभूयते अस्मिन्निति पुत् तन्नामा नरकः । तस्मात् त्रायते रक्षतीति पुत्र 1॥ पुत्रस्याय पुत्रः पौत्रः । पुत्रश्च पौत्रश्च ( नप्ता च) धन चेति (हिरण्यादि च) एतेषा समाहारः पुत्रपौत्र- धनम् । तद् धान्य व्रीहियवगोधूमादि । हस्त्यश्वाश्वतरीरथै हस्तः शुण्डादण्डोऽस्ति येषा ते हस्तिन । हस्तिनः करिणः च, अश्वा हयाश्च अश्वतर्यो वाम्यश्च रथाश्चेति हस्त्यश्वाश्वतरीरथास्ते । अर्थाद् एतैर्युक्त पुत्रादिक प्रयच्छेति शेष. । हे लक्ष्मि, त्वं प्रजाना लोकाना माता निर्मात्री भवसि । ई इति निपात आश्चर्यार्थकः । आश्चर्यम् असाधना सर्व निर्मिमीषे इति ॥ सर्वशक्तिमतीत्वात् । अतो मह्यं पुत्रादिक प्रयच्छ । तथा मा स्तोतारम् आयुष्मन्तं प्रशस्तदीर्घायुष्ययुक्त -224 विदधातु ॥२०॥
I हे अश्वो को देने वाली, गायो को देने वाली, धन को देने वाली, अथवा धेतु, वाणी और पटुता ( निपुणता) प्रभृति गुणो से युक्त इन्द्रियो को देने वाली, कुबेर के समान सभी प्रकार के ऐश्वर्य का देने वाली, हे महाधनवाली अपरिमित उत्कृष्ट बहूमूल्य धन- धान्य सम्पत्ति से परिपूर्ण करनेवाली हे लक्ष्मी आप मुझे धनपद वाच्य सुवर्ण, मणि, रत्न, गाय, घोडा, हाथी, नौकर- चाकर, राज्य, साम्राज्य आदि समस्त सम्पत्ति मेरे घर मे जुटा दीजिये । हे देवि क्रीडा और कौतुक के लिये जगत् का निर्माण करने वाली लक्ष्मी मेरे जैसे तुम्हारे उपासक की आप जल्दी हो सब कामनाओ को पूरा कर दीजिये, धर्म, अर्थ काम और मोक्ष नामक चतुर्विध पुरुषार्थ को आप मुझे प्राप्त करा दीजिये ॥ १ ९ ॥ हे लक्ष्मी, आप मुझे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, हाथी, घोडा, खच्चर, रथ आदि ऐश्वर्य से सम्पन्न कर दीजिये । पुत्र, पितरो को पु नामक नरक से त्राण दिलाता है । दुर्गन्ध, घाव और भयानक अन्धकार से भरे दुखमय स्थान को पुनामक नरक कहा गया है । -पुत्र के पुत्र को पौत्र कहते हैं । इसमे पुत्री के पुत्र दौहित्र का भी समावेश हो जाता है | सुवर्णादि सम्पत्ति धन कहलाती है । व्रीहि, यव, गोधूम ( गेहू) प्रभृति को धान्य कहते है । हाथी, अश्व, खच्चर और रथ प्रभृति समृद्धि से समन्वित पुत्रादिको हे लक्ष्मी, आप हमे दीजिये है लक्ष्मि, आप सारी प्रजा की माता है । ई निपात आश्चर्य अर्थ में प्रयुक्त हैं । विना किसी साधन-सम्पत्ति के अपने भक्तों को आप यह सब कुछ दे देती है । यह आश्चर्य की बात है । यह इसलिये सम्भव है कि आप समस्त शक्तियो से सम्पन्न है | अतः आप पुत्र प्रभृति ऊपर वर्णित सारे ऐश्वर्य को मेरे लिये जुटा दीजिये और आपकी स्तुति करने वाले मुझ जैसे प्राणियो को आप प्रशस्त दीर्घ आयु प्रदान कीजिये ॥ २० ॥
पृष्ठ 1348
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थपारिजातः २२४६
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धन वसु ।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्विना ॥ २१ ॥
अग्निस्तन्नामको देवो धनाभिमानी धनाधिष्ठाता वा । वायुः सर्वप्राणात्मा देवो धनम् । सूर्य सर्वलोकैकचक्षुरपि धनम् 1। वसु ' अष्टवसवोऽपि धनम् ॥ इन्द्रः परमैश्वर्यशाली देवराजोऽपि धनम् । बृहस्पतिः बृहता महामहीयसा पति. बृहस्पति- स्तन्नामा देवोऽपि धनम् । वरुण व्रियते सर्वैरिति वरुणः क्लीबत्वमार्षम् । सोऽपि धनम् । अश्विना अश्विनौ नासत्यदत्रौ तावपि ' ' ( / ) धनम् । सुपा सुलुक् पा० सू० ७ १ ३९ इति विभक्तेराकार । इति मन्त्रोक्ता सर्वा देवता धनाभिमानिन्यो धनाधिष्ठा- त्र्यश्च । अतः सर्व एवैते धनोत्पत्तिहेतवो धनदातारश्च । यद्वा भूरादीना सप्तव्याहृतीनामग्न्यादिदेवताकत्वेन प्रसिद्धत्वात् ता एव तत्तादात्म्येन सप्तव्याहृतयो वा धनरूपत्वेन विवक्षिताः । सप्तलोका धनरूपा इत्यर्थ. । व्याहृत्यादिद्वारा समस्तवेदादे' सकललोकादेः सकलस्थावरजङ्गमादेर्वा त्वं धनरूपासि । पृथिव्यामेव वज्रं (हीरक ) इन्द्रनीलं (नीलम) गारुत्मतं ( पन्ना) सुवर्ण रजत गोमेद (पुखराज) इत्यादिरत्नान्याग्नेयद्रव्यम् (पेटोल), इङ्गालम् ( कोयला) आदि धनमिति साम्प्रतिका अप्यभ्युप- गच्छन्ति । अत एव कौटल्योऽर्थ परिभाषमाणः. मनुष्यवती भूमिरर्थ. ' इत्युक्तवान् । धिनोति प्रीणाति जनोऽनेनेति धनमिति "युत्पत्त्या प्रीणनहेतुत्वेन प्रीणनकर्त्री लक्ष्मीरपि धनमुच्यते ॥२१ ॥
| वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥२२॥
पूर्वोक्ताः सर्वा देवता धनरूपा उक्ता । तेनैव धनेन यज्ञव्रतदानादयो भवति । तच्च धनमग्नेः प्रसादात्प्राप्तम्, तस्माद्यज्ञप्रशं- सोच्यते वैनतेयेति । हे वैनतेय, विनताया अपत्य पुमान् वैनतेयस्तत्सम्बुद्धौ हे विनतानन्दन गरुड, त्व सोममस्माभिः सम्पादितं सोमरस पिब सोमरसपानं कुरु । तथा वृत्रहा वृत्रं हतवानिति वृत्रहा वृत्रहननकर्ता इन्द्रः सोमं पिबतु । सोमिनः सोमः अस्ति येषा ते, सोमसम्बन्धिनो मह्य मया साकम् । छान्दसो विभक्तिविपरिणामः । सोमिनः सोमयागकर्तारः, मह्यं सोमं ददातु ददतु । यद्वा सर्वे देवा धनरूपा उक्ताः । धनेनैव यज्ञादिक भवति । तत्साधनं च सोमः । तल्लाभरचेन्द्रगरुडाधीनः, अत- अग्निनामक देवता धन का अभिमानी अथवा अधिष्ठाता है । सबको प्राणवायु प्रदान करने वाला वायु देवता भी धन का अधिपति है । इसी तरह से सारे जगत् के नेत्रो को शक्ति प्रदान करने वाला सूर्य, आठ वसु देवता, परम ऐश्वर्यशाली देवराज इन्द्र, महान् महिमाशाली देवो का स्वामी देवगुरु वृहस्पति, सबका वरणीय वरुण और दोनो अश्विनी कुमार – ये सब देवता भी हमारे लिये धन प्रदान करने वाले है, क्योंकि अग्नि के समान ही ये भी धन के अभिमानी अथवा अधिष्ठाता देवता है । इस तरह से ये सब धन की उत्पत्ति में कारणभूत तथा धन प्रदान करने वाले है । अथवा भू प्रभृति सात व्याहृतियों के देवता अग्नि प्रभृति है, अत इन देवताओ के रूप मे यहा सात व्याहृतिया ही धन के रूप मे विवक्षित है । इसका अभिप्राय यह होगा कि भू प्रभृति सातो लोक धन-धान्य आदि समृद्ध है । अथवा व्याहृति के द्वारा हे लक्ष्मि, आप समस्त वेदराशि, समस्त लोक स्थावर-जगमात्मक समस्त जगत् के ऐश्वर्य के रूप मे विराजमान है । इस पृथिवी मे ही वज्र (हीरा ) इन्द्रनील (नीलम), गारुत्मत ( पन्ना), सुवर्ण, रजत, गोमेद (पोखराज) इत्यादि रत्न तथा पेट्रोल, कोयला आदि धन सम्पत्ति विद्यमान है, इस बात को आजकल के वैज्ञानिक भी मानते है । इसी लिये अर्थ की परिभाषा कौटल्य ने ' मनुष्य द्वारा सेवित भूमि' की है । मनुष्य जिसके द्वारा स्वयं प्रसन्न रहता है और दूसरों को भी प्रसन्न करता है इस व्युत्पत्ति के आधार पर प्रीणनहेतु और प्रीणनकर्त्री लक्ष्मी भी धन पद से बोधित होती है ॥ २१ ॥
पूर्वोक्त सभी देवताओ को धन स्वरूप बताया गया है । उसी धन से यज्ञ, व्रत, दान प्रभृति सत्कर्म सम्पन्न होते हैं । यह धनः -अग्नि के प्रसाद से प्राप्त होता है । अब इस मन्त्र मे यज्ञ की प्रशंसा करते हुए गरुण से प्रार्थना की जा रही है कि हे वैनतेय, हे विनता को आनन्दित करने वाले गरुड़, आप हमारे द्वारा सम्पादित सोमरस का पान कीजिये । आपके साथ वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र भी सोमपान करें । सोमयाग से संबद्ध सोमयाजी ऋत्विग् गण मुझे भी सोमरस का अपना भाग दें । अथवा पहले मन्त्र में देवताओ को धन-स्वरूप बताया गया है घन से ही यज्ञ आदि सम्पन्न होते हैं । इस यज्ञ का साधन सोम है यह सोम गरुड़ और इन्द्र की कृपा से मिल-
पृष्ठ 1349
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेदार्थ पारिजातः २२४७ स्वत्स्तुतिः । यद्वा वैनतेयो विष्णोरिव लक्ष्म्या अपि वाहनभूत । तदुक्तमेव -'कान्तस्ते पुरुषोत्तम फणिपति शय्यासनं वाहनम्, वेदात्मा विहगेश्वरो यवनिका माया जगन्मोहिनी ।' इति । गरुडो लक्ष्म्या वाहनत्वान्निकटवर्तित्वाच्च तद्विशेषकृपा- भाजनमिति गरुडप्रसादनमपि लक्ष्म्या प्रसादहेतु । अत्यार्तस्य भक्तस्येयमुक्ति | हे वैनतेय त्व सोम पिब । इन्द्रोऽप्युपेन्द्ररूपस्य लक्ष्मीपतेर्विष्णोर्भ्रातृत्वात् सोमं पिबतु । वृत्रहपदमन्येषामप्युपलक्षणम् । सोमिनः सोमकर्तार ऋत्विज । सोमिन. सोम' अस्ति अस्येति सोमी तस्य, सोमयागसम्बन्धिनो यागार्थमुपकल्पितस्य धनस्य गवादिदशद्रव्यान्यतमस्य क्रयविक्रयरूपसम्बन्धेन सम्पादितस्य सोमस्य । यद्वा यागस्य निर्वर्तक धनाभिन्न सोमम् आहूतेभ्यो देवेभ्यः प्रयच्छतेति शेषः । यद्वा कायक्लेशादिसाध्य- लक्ष्मीप्रसादजन्यत्वात् सोमे धनत्वारोप इत्यन्ये || २२||
न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत् ॥२३॥
कृतपुण्यानां पुण्यकर्तॄणा भक्तानामास्तिक्यबुद्ध्या श्रीसूक्तजापिना क्रोधो न भवति । मात्सर्य परोत्कर्षासहिष्णुत्वं न भवति । लोभ परकीयवस्तुग्रहणे मनसोऽतीव लौल्यं न भवति । तथा अशुभा मतिर्न भवति । यद्वा कृतपुण्यान्त कृत जन्मान्तरे- Sनुष्ठितं पुण्यं धर्मकर्म यैस्ते कृतपुण्यास्तेषामिह जन्मन्यपि जपपाठादितत्पराणा वाक्चक्षुरादिविकारानुमेयो मनोविकारविशेषो न भवति । लक्ष्मीप्रसादात् श्रीसूक्त जपेत् अर्थात् श्रीसूक्तस्य जप्त किमपि प्रतिबन्धक न भवतीत्यर्थं ॥२३॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ २४॥
सरसिजनिलये सरसिज कमल निलयो निवासस्थानं यस्याः सा सरसिजनिलया तत्सम्बुद्धौ । हे कमलालये! सकता है । अत इस मन्त्र की इतनी स्तुति को गयी है । अथवा गरुड विष्णु के समान लक्ष्मी का भी वाहन है । जैसा कि 'कान्तस्ते ' इस
श्लोक मे प्रतिपादित है । गरुड लक्ष्मी का वाहन है और उनका निकटवर्ती है, इस लिये उसपर लक्ष्मी की विशेष कृपा रहती है । इस
तरह से गरुड को प्रसन्न करना भी लक्ष्मी की प्रसन्नता का एक कारण है । अत्यन्त आर्त भक्त इस तरह की प्रार्थना करता है कि वैनतेय, आप हमारे यज्ञ में सोम पान कीजिये । इन्द्र उपेन्द्र का स्वरूप धारण करने वाले लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के भ्राता है, अत उनसे भी यहा सोम पान की प्रार्थना की जाती है । वृत्रहा पद अन्य देवताओ का भी उपलक्षक है । सोमी पद का अर्थ सोम याग करने वाले ऋत्विक गण है । दूसरा सोमी पद सोमयाग सबन्धी इस अर्थ को अभिव्यक्त करता है । सोमयाग के सम्पादन के लिये सकल्पित धन गो प्रभृति दशविध द्रव्य मे से किसी एक के साथ क्रय -विक्रय रूप सबन्ध से सम्पादित सोम का पान यहा विवक्षित है । अथवा इसका यह अर्थ कर सकते हैं कि याग के सम्पादक धन से अभिन्न रूप मे विद्यमान सोमरस को देवताओ के लिये दिया जाय । अथवा शरीर को क्लेश देकर ही सोमरस निकाला जा सकता है और लक्ष्मी के प्रसाद से ही सोमरस प्राप्त हो सकता है, अत सोम पद का अर्थ भी आरोप द्वारा धन किया जा सकता है, ऐसा कुछ लोगों का विचार हैं ॥ २२ ॥
जिन्होने पूर्वजन्म मे या इस जन्म में पुण्य कर्म किये है, ऐसे भक्तो को आस्तिक बुद्धि के साथ, श्रद्धा के साथ श्रीसूक्त का जप करने पर क्रोध नही आता, उनके मन मे मात्सर्य अर्थात् दूसरे की उन्नति को देख कर उनका मन असहिष्णु नहीं बन पाता । दूसरे अपनी बना लेने की इच्छा के रूप में प्रकट होने वाला लोभ भी उनके मन को कलुषित नही कर पाता तथा उनके मन मेकी वस्तुको अन्य भी किसी प्रकार के अशुभ विचार पैदा नही होते । अथवा जन्मान्तर मे जिन्होने धर्म - कर्म किये है, उनके मन मे इस जन्म मे भी उनके जप, पाठ आदि मे लवलीन रहने से किसी प्रकार का विकार नही आता, जिसको जानकारी वाणी या चक्षु के विकार से मिल सकती हो । ऐसा भक्त सदा निर्विकार भाव से श्रीसूक्त का जप करता रहे, अर्थात् उसके इस कार्य में लक्ष्मी के प्रसाद से कोई विघ्न उपस्थित नही होगा ॥ २३ ॥
हे कमल में निवास करने वाली, कमल को हाथो में धारण करने वाली लक्ष्मी, आपकी शोभा धवलतर ( अत्यन्त सफेद ) वस्त्र गन्ध और माला को धारण करने से और भी बढ गयी है । हे अतिशय सौभाग्यशालिनी भगवती लक्ष्मी, अथवा षड्विध ऐश्वर्य से सपन
पृष्ठ 1350
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२४८ वेदार्थपारिजातः सरोजहस्ते सरोज हस्ते यस्याः सा सरोजहस्ता तत्सम्बुद्धौ । धवलतराशुकगन्धमाल्यशोभे अंशुकश्च गन्धश्च माल्यं च शुकगन्धमाल्यानि, अतिशयं धवलानीति धवलत राणि, धवलतराणि च तान्यंशु कगन्धमाल्यानीति धवलतरांशुकगन्धमाल्यानि, तैः शोभत इति धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभा तत्सम्बुद्धौ । अथवा शोभन गोभा, धवलतराशुकगन्धमाल्यैः शोभा यस्याः सा धवलतराशुकगन्धमाल्यशोभा तत्सम्बुद्धौ । भगवति भगः सौभाग्य तदतिशयमस्ति यस्याः सा भगवती तत्सम्बुद्धौ । अति- शायने मतुप् । तदुक्तं शाब्दिकैः -' भूमनिन्दाप्रशसासु नित्ययोगेऽतिशायने । सम्बन्धेऽस्तिविवक्षाया भवन्ति मतुबादय. ॥ ' इति । षड्विधैश्वर्यशालिनि वा । 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णा भग इतीरणा ॥ ' ( ) – ' वि० पु० इति । अथवा उत्पत्तिप्रलयादिज्ञानसम्पन्ने वा । तथा चोक्तम् उत्पत्ति प्रलय चैव भूतानामार्गात गतिम् । ' | वेत्ति विद्यामविद्या च स वाच्यो भगवानिति ॥ इति । हरिवल्लभे हरिवल्लभो यस्याः सा हरिवल्लभा तत्सम्बुद्धी अथवा हरेर्वल्लभा हरिवल्लभा तत्सम्बुद्धौ । हे हरिप्रियतमे! मनोज्ञे रमणीयतमे लोकोत्तरसौन्दर्येण नवनवायमानत्वेन अनेकरूपैर्भगवता सदानुभूताप्यपूर्णवत् विस्मयमादधाति ॥ तदुक्त स्तोत्ररत्ने –'स्ववैश्वरूपेण सदानुभूतयाऽप्यपूर्ववद्विस्मयमाद- धानया । गणेन रूपेण विलासचेष्टितैः सदा तवैवोचितया तव श्रिया ॥' इति । त्रिभुवनभूतिकरि त्रयाणा भुवनानां समाहार- स्त्रिभुवन भूति करोतीति भूतिकरी त्रिभुवनस्य भूतिकरी त्रिभुवनभूतिकरी तत्सम्बुद्धौ । त्रिभुवनैश्वर्यकारिणि हे लक्ष्मि, मह्यं मदर्थ प्रसीद अनुकूलतया सदयहृदया भव ॥२४ ॥
ऋणरोगादिदारिद्र्यं पापं क्षुदपमृत्यवः ।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥ २५ ॥
हे लक्ष्मि, तव प्रसादात् तव भक्तस्य मम सर्वदा सर्वदेशेषु सर्वकालेषु च ऋणरोगादि ऋण च रोगाश्चेति ऋण- रोगास्ते आदौ यस्य तत् । दारिद्र्यं दरिद्राति दुर्गति सदानुभवतीति दारिद्रस्तस्य भावो दारिद्रयम् । पापं पातकम् । क्षुत् क्षुधा तृष्णा च । अपमृत्यव बन्धुवान्धवादिभिरितरैर्वा अपमानजनिता ऋणरोगादिभिः दुःस्थितिजनिता वा चाटुतस्कर- दुर्वृत्तादिभिः पराभवजनिता सम्पदपगमजनिता वा महासाहसिकादिभिः प्रसह्य वित्ताहरणजनिता वा ग्रहादिपीडाजनिता वा राजादिको निबन्धना वा अपमृत्यव', भयशोकमनस्तापा । तप्यते एभिरिति तापाः, मनसः तापा मनस्तापाः, भयं च शोक- लक्ष्मी, अथवा उत्पत्ति, प्रलय आदि के ज्ञान से सम्पन्न लक्ष्मी, हे हरिवल्लभे? हरि जिसका बल्लभ है अथवा हरि की जो बल्लभा है, इन दोनो ही अर्थों को यह सबोधन व्यक्त करता है । हे मनोज्ञे, लोकोत्तरसौन्दर्य के कारण प्रतिक्षण नये नये से प्रतीत हो रहे अनेक रूपों को आप दिखाकर सब लोगों को विस्मय मे डाल देने वाली है । स्त्रोत्ररत्न मे बताया गया है कि वह लक्ष्मी अपनी विश्वरूपता के कारण सदा सबके अनुभव में आतो रहती है और सबको अपने नये नये रूपो से चकित करती रहती है, गुण, रूप और अपने हाव-भाव से सदा सबको भुलावे मे डाले रहती है । यह भी सदा केवल आपके ही पास रह सकती है । इस तरह से यह लक्ष्मी सदा तीनों भुवनो के सारे ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी है, सारा ऐश्वर्य इन्ही के प्रसाद से प्राप्त हो सकता है । उस लक्ष्मी से इस मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि आप मेरे प्रति अनुकूल होइये । भगवती शब्द मे अतिशय अर्थ मे मतुप् प्रत्यय किया गया है । वैयाकरणो का कहना है कि भूम (बहुलता), निन्दा, प्रशसा, नित्ययोग, अतिशयित करना, सबन्ध और अस्ति को विवक्षा मे मतुप् आदि प्रत्ययो का विधान होना है । समग्र ऐश्वर्य धर्म, यश, ज्ञान और वैराग्य इन षड्विध गुणों को शास्त्र मे भग के नाम से अभिहित किया गया है । उत्पत्ति, प्रलय, सभी प्राणियों के आगमन और गमन का स्थान, विद्या और अविद्या --इन सबको जानने वाले को भगवान् कहा जाता है || २४ ॥ है लक्ष्मि, आपके प्रसाद से मेरे जैसे तुम्हारे भक्त के सदा सब देश और काल में ऋण, रोग, दारिद्र्य, पाप क्षुधा (भूख), प्यास और अपमृत्यु ये सब नष्ट हो जाय । सदा दुर्गति का अनुभव करने वाले को दरिद्र कहते हैं लक्ष्मी से इस मन्त्र में प्रार्थना की है कि यह दरिद्रता का भाव मेरा सदा-सदा के लिये नष्ट हो जायें । अपमृत्यु के अनेक प्रकार होते हैं । जैसे कि बन्धु बान्धव आदि अथवा -दूसरे लोग अपमान कर दें, ऋण, रोग आदि के कारण मरण को ऐसी दुस्थिति उत्पन्न हो जाय, चाटुकार, तस्कर ( चोर) अथवा दुष्टो द्वारा पराभूत कर दिये जाने पर अथवा सर्वस्व लूट लिये जाने पर, डाकू लोगों के द्वारा जबरदस्ती सब घन लूट लिये जाने पर ग्रह