वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1351–1360
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1351–1360
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वेदार्थपारिजातः २२४ ९ श्चेति भयशोकौ ताभ्यां जनिता भयशोकजास्नादृशास्ते मनस्तापाश्चेति भयशोकमनस्तापा | राजादिभिर्विहित दण्डरूपं भयं प्रियवस्तुवियोगज शोकः । तदुभाभ्या जायमानाचिन्ता मनस्ताप । तत्सर्व तव कृपना मम नश्यत्वित्यर्थ ॥२५॥
श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधात्पवमान महीयते ।
धान्यं धनं पशु बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥ २६॥
श्रीसूक्तजप्नुरुपासकस्य श्रीः लक्ष्मी, वर्चस्वं ब्राह्मादिविशिष्ट तेज स्वीय वा वर्चस्तेज, आयुष्यमारोग्य च आविधात् दध्यात् श्रीरित्यर्थः । किञ्च, पवमानम् उत्तम लोक पवित्र स्थल वा अतिपवित्रता वा महीयते प्रासया मह प्राप्नोति म जापक इति शेषः । 'महीड् पूजायाम्' इति कण्ड्वादिः । धातूनामनेकार्थत्वादत्र प्राप्त्यर्थता । किञ्च धान्यं व्रीह्यादिक धनं मणिहिरण्यादिक पशुं गवाश्वादिक बहुपुत्रलाभं बहुपुत्रपौत्रादिसन्ततीना लाभम् । गतसवत्सर साग्रगत सवत्सर दीर्घमायुश्च प्राप्नोति श्रीसूक्तजापक इति शेषः ॥ यथा भक्ताना कृते भगवान् प्रतिक्षणमपूर्ववत् प्रतीयते-' यद्यप्यसौ पार्श्वगतो रहोगतस्तथापि तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम् । पदे पदे का विरमेत तत्पदान्चलापि यच्छ्रीर्न जहाति यत्परम् ॥ ' ( भा० पु० १| ११ | ३३ ) । तदनन्तमाधुर्यमौन्दर्य- लावण्यादिगुणादिभिः श्रीभगवतोऽपि नवनवायमानत्वेन स्फुरति । स्वस्य विश्वशरीरत्वेन सदानुभूतया 'यो वेत्ति युगपत्सर्व प्रत्यक्षेण सदा स्वत । इतीदृशेन सहजप्रत्यक्षेण सदा साक्षात्कृतया सदा गाढोपगूढयापि गुणेन रूपेण विलामचेष्टितैरपूर्व- वद्विस्मयमादधानया सदा तवैवोचितया श्रिया सहासीन भगवन्तमाश्रये इत्यर्थः । ' देवत्वे देवदेहेयं मनुष्यत्वे च मानुषी । विष्णोर्देहानुरूपा वै करोत्येषात्मनस्तनुम् ॥ देवतिर्यङ्मनुष्येषु पुन्नामा भगवान् हरिः । स्त्रीनाम्नी श्रीश्च विज्ञेया नानयो- विद्यते परम् ॥ ' एवं सर्वदा सर्वरूपैः सर्वरूपा तुल्यशीलवयोवृत्ता सदानुयायिनी सार्वज्ञेनानुभवन्नप्यौत्सुक्यातिशयेन प्रतिक्षण- मपूर्वामेव मन्यते । अतिप्रियत्वादेव भक्ता भगवते श्रियो गुणगणार्णवश्रवणेन भगवतो हर्पातिशयेन भुजयोः कञ्चुकशतस्फुटनं मन्यन्ते । आदि की पीडा से पराभूत होने पर अथवा राजा आदि के द्वारा सर्वस्व अपहरण कर लिये जाने पर ममन्तिक पीडा होती है । इन सबका अपमृत्यु मे समावेश किया जाता है । इसी तरह से हे लक्ष्मी, भय और शोक से उत्पन्न होने वाले मानसिक ताप ( दु ख) भी मेरे सदा सदा के लिये नष्ट हो जाय । राजा प्रभृति के द्वारा दिये जाने वाले दण्ड से भय की उत्पत्ति होती है और प्रिय व्यक्ति या वस्तु के वियोग से शोक उत्पन्न होता है । इनसे उत्पन्न होने वाली चिन्ता को ही मानसिक ताप ( दुःख) कहा जाता है । यह सब नष्ट हो जाय, ऐसी इस मन्त्र से भगवती लक्ष्मी से प्रार्थना की गई है ॥ २५ ॥
श्री सूक्त का जप करने वाले उपासक को लक्ष्मी ब्रह्मा प्रभृति के अथवा अपने विशिष्ट तेज को, आयुष्य और आरोग्य को , प्रदानकरे । साथ ही उत्तम लोक पवित्र स्थल अथवा अत्यन्त पवित्रता के साथ प्रशसा को भी ऐसा व्यक्ति प्राप्त करता है । व्रीहि प्रभृति धान्य, मणि-हिरण्य प्रभृति धन, गाय, घोडा आदि पशु और पुत्र-पौत्र, नाती आदि के रूप में वह बहुसख्यक सन्तति का लाभ ॥ ॥ भी करता है । साथ ही यह श्रीसूक्त का जापक पूरे सो वर्ष की आयु पाता है २६ भक्तों के लिये भगवान् जैसे प्रतिक्षण अनोखे से लगते है, उसी तरह से यह भगवती लक्ष्मी भी अपने अनन्त माधुर्य, , - सौन्दर्य लावण्य प्रभृति गुणो के कारण नये नये रूपो मे उनके सामने उपस्थित रहती है । यह लक्ष्मी चचला होते हुए भी कभी भी -,, उनके चरण कमल को नही छोडती । भगवान् विश्वशरीर है सारे विश्व के साथ लक्ष्मी का भी शरीर उनका ही है अत वे उसको 1, सदा देखते रहते है अपने सहज प्रत्यक्ष से उसका सदा साक्षात्कार करते रहते है । यह लक्ष्मी सदा उनके गाढ आलिंगन मे बँधी ,, रहती है तो भी गुण रूप और अपने हावभाव से वह भगवान् को भी विस्मय मे डाल देती है । इन सब बातो पर विचार करने से यही निष्कर्ष निकलता है कि यह लक्ष्मी सदा आपके पास रहे, यह उचित ही है । उस लक्ष्मी के साथ विराजमान भगवान् विष्णु का मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ । यह लक्ष्मी भगवान् विष्णु के देवदेह २८२
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वेदार्थपारिजातः २२५० तद्यथा -'श्रिय श्री श्रीरङ्गेशय तव च हृद्या भगवती श्रिय त्वत्तोऽप्युच्चैर्वयमिह फणामः शृणुतराम् । दृशौ ते भूयास्तां सुखतरलतारे श्रवणत पुनर्हर्षोत्कर्षात् स्फुटतु भुजयोः कञ्चुकशतम् ॥ ' ( गुणरत्नकोष ९ ) सर्वेषा श्रिय समाश्रयणेन स्वरूप- लाभ. । श्रियोऽपि यदाश्रयेण स्वरूपलाभः स श्रियोऽपि श्रीः । हे रङ्गेशय, तव च हृद्या हृदयङ्गमा वक्ष स्थलनिवासिनी षाड्गुण्यपूर्णा भगवतीश्रिय त्वत्तोऽप्युच्चैवंय फणामः । त्वत्तोऽप्युच्चै श्रियो महत्त्ववर्णनेन श्रवणसुखेन चक्षुषोर्ववश्यम् । सन्तोषा- -'-- तिशयाद् अपरिमितकञ्चुकस्फुटनहेतुर्गात्रपरिपोषः । उत्तरनारायणमुक्तेऽपि श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् । इष्णन्निषाणामुम्म इषाण सर्वलोकम्म इषाण || ' ( वा० स० ३१।२२ ), 'सुमज्जानये विष्णवे ' (तै० ब्रा ० २|४| ३ | ९), ' श्रद्धया देवत्वमश्नुते' ( तै ० ब्रा० ३| १२ | ३| १ ), ' वेदे रामायणे पुण्ये पुराणे भरतर्षभ । आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ ' ( हरिवंशेऽन्तिमेऽध्याये ९३ ) इत्यादिरीत्या सकलसच्छास्त्रेषु यत् परमतत्त्व प्रतिपाद्यते तदेव ब्रह्मविष्णुशिवादिशब्दैस्तत्र तत्र प्रतिपादितम् । तदपि श्रीतस्त्वमेव" तस्या एव सगुणनिर्गुणब्रह्मरूपत्वात् । रामायणमपि सीताचरित्रमेव, ' सीतायाश्चरित महत्' (वा० रा० १२४/७) इति रामायणोक्तेः । पतिव्रतायाश्चरित्राङ्गत्वेन पतिवर्णनमप्या-: वश्यकमिति कृत्वा श्रीरामचरित्रमपि तदङ्गमेव । सीताचरित्रत्वादेव श्रीरामचन्द्रकर्तृक तच्छ्रवणम्, अन्यथा धीरोदात्तनाम- कस्य स्वचरित्रश्रवणे प्रवृत्त्यसम्भव एव । लक्ष्म्याः कृपाकटाक्षितस्यैश्वर्यभाकत्वं तद्वञ्चितस्य विविधदौर्गत्यभाक्त्वमपि प्रसिद्धमेव । तदुक्त गुणरत्नकोश- - कृता एको मुक्तातपत्रप्रचलमणिघणात्कारिमौलिर्मनुष्यो दृष्यद्दन्तावलस्थो न गणयति नतान् यत्क्षण क्षोणि- धारण करने पर देवी और मानव शरीर धारण करने पर मानुषी देह धारण कर लेती है । इस तरह से भगवती लक्ष्मी भगवान् , विष्णु के उस देह के अनुरूप देह धारण कर लेती है । देव तिर्यक् अथवा मनुष्ययोनि में भगवान् पुरुष के रूप मे और भगवती लक्ष्मी स्त्री के रूप में अवतरित होती है । इनसे बढकर इस विश्व मे और कोई नही है । इस तरह से भगवान् विष्णु सदा अपने सभी रूपो से समान रूप वाली, शील वय ( अवस्था ) और वृत्त मे समान, सदा अनुगमन करने वाली लक्ष्मी का अपनी सर्वज्ञता के आधार पर सदा साक्षात्कार करने वाले भी भगवान् विष्णु अत्यन्त उत्कण्ठा के कारण प्रतिक्षण लक्ष्मी को अपूर्व, अनोखे रूप में ही देखते रहते है । भगवान् को लक्ष्मी अत्यन्त प्रिय है, यह जानकर ही भक्तगण लक्ष्मी के अनन्त गुणगणो को सुनाते है और कल्पना करते है कि लक्ष्मी के गुणो को सुनकर भगवान् की बाहे हर्षातिरेक में फूल उठनी है और इस तरह से उनके कपडे सैकडों बार कट जाते है । लक्ष्मी का सहारा लेने से ही भक्त को अपने स्वरूप का बोध होता है । लक्ष्मी को भी स्वरूपलाभ देनेवाले श्रीपति भगवान् नारायण है । हे रगेशय, तुम्हारे वक्षस्थल पर निवास करनेवाली, षाड्गुण्य से परिपूर्ण भगवती लक्ष्मी को हम आप से भी बढकर ,,मानते है । ऐसा करने से हमारे कानो को तो सुख मिलता है किन्तु चक्षु विवश हो जाते है निराश हो जाते है । लक्ष्मी के गुणों को सुनकर भगवान् विष्णु परम सन्तुष्ट हो जाते हैं । इससे अपरिमित कचुको के स्फुटन मे समर्थ गात्रपरिपोष की सूचना मिलती है । उत्तरनारायण सूक्त के ' श्रीश्व ते ' मन्त्र में तथा अन्य मन्त्रों और श्लोको मे कहा गया है कि लक्ष्मी और श्री आपकी ही ,, पत्नियाँ है । वेद रामायण पुराण प्रभृति मे सर्वत्र भगवान् के ही गुणो का वर्णन है । ,,, ब्रह्मा विष्णु शिव प्रभृति शब्दों में इसी परम तत्व का वर्णन किया गया है । यह श्रीतत्त्व सगुण निर्गुण ब्रह्मतत्व के रूप में सर्वत्र वर्णित है । रामायण में प्रवानतया सीता चरित्र ही वर्णित है । पतिव्रता के चरित्र के अग के रूप में पति का वर्णन भी आवश्यक है, अत श्रीराम का चरित्र अंगभूत है । सीता का चरित्र होने से ही श्री रामचन्द्र ने उसका वर्णन लव-कुश से सुना, अन्यथा रामचन्द्र जैसे धीरोदात्त नायक की अपने ही चरित्र के श्रवण में प्रवृत्ति कभी नही हो सकती । लक्ष्मी के कृपा कटाक्ष से मनुष्य ऐश्वर्यशाली बन जाता है और उससे वचित' मनुष्य सदा नाना प्रकार की दुर्गति भोगता रहता है, इस बात को गुणरत्नकोशकार ने 'एको मुक्तातपत्र०' प्रभृति श्लोक मे बहुत ही सुन्दर आलंकारिक भाषा में व्यक्त किया है । वे कहते हैं कि कोई व्यक्ति मतवाले हाथी पर बैठकर घूमता हैं । उसके मस्तक पर मुक्ताजटित छत्र विराजमान रहता है । उसके
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वेदार्थपारिजातः २२५१ पालान् । यत्तस्मै तिष्ठतेऽन्यः कृपणमशरणो दर्शयन् दन्तपडक्ति तत्ते श्रीरङ्गराजप्रणयिनि नयनोदञ्चितन्यञ्चिताभ्याम् ॥ ' (गुणरत्नकोश १६ ) एकः कश्चिज्जनो दृप्यद्दन्तावलस्थ दृप्यन् मत्तो यो दन्तावलो हस्ती दृप्यद्दन्तावलस्तत्र तिष्ठतीति दृप्यद्दन्तावलस्थः मत्तद्विरदमस्तकस्थितः, मुक्तातपत्रप्रचलमणिघणात्कारिमौलि आ समन्ताद् तपतीनि आतपो धूपः तस्मात् त्रायते इति आतपत्रं छत्र मुक्त विकसित च तद् आतपत्र मुक्तातपत्रम् अथवा मुक्ताग्रथित यद् आतपत्र तद् मुक्तातपत्रं तस्मिन् प्रचलाः गमनागमनेन चलन्तो ये मणयः तैः परस्पर घट्टने घणात्कारी ( घणादिति शब्दानुकरणम्) घणात् शब्द कुर्वन् मौलि: किरीटं यस्याऽसौ, तादृशो यो मनुष्यः, नतान् प्रणतानञ्जलीन् कुर्वन. क्षोणिपालान् पृथिवीपतीन् न गणयति । इयमैश्वर्यस्य पराकाष्ठा । अन्यः अशरण. नास्ति शरण गृहं यस्यासौ गृहादिहीन कृपण दीनदीन यथा स्यात्तथा दन्तपङ्क्ति दर्शयन् दन्तावलस्थिताय तिष्ठते स्वदैन्यं प्रकाशयति हे श्रीरङ्गराजप्रणयिनि लक्ष्मि, एतदुभयमपि यत् तत् ते 10 नयनोदञ्चितन्यञ्चिताभ्या उदञ्चित च न्यञ्चित चेति उदञ्चितन्यञ्चिते नयनयोरुदञ्चितन्यञ्चिते नयनोदञ्चितन्यश्चिते ताभ्या नयनकटाक्षोदयसङ्कोचाभ्या भवति । 'इच्छाज्ञानक्रियाशक्तिमयं यद्भावसाधनम् । तद्ब्रह्मसत्तासामान्य सीतातत्त्वमुपास्महे ॥ ' इति सीतोपनिषद्रीत्या , इच्छाज्ञानक्रियाशक्तित्रयेण यस्य भावः साध्यते यथाङ्कुरेण बीजमनुमीयते तथैवानन्तब्रह्माण्डततिसमुद्भूतिर्यस्येच्छादि- शक्तथैव भवति तद्ब्रह्मसत्तासामान्यमेव सीतातत्त्वमिति ज्ञायते । न केवलं ब्रह्मसत्तासामान्यमेव, किन्तु मूलप्रकृतिरूपत्वात् सैव प्रकृतिरपि प्रणवप्रकृतिरूपत्वाच्च प्रकृतिः सीतेति त्रिवर्णात्मा साक्षान्मायामयी भवति । तत्र विष्णुः प्रपञ्चबीज माया च ईकाररूपापि ईकारवाच्यापि च । सत्यममृत प्राप्ति सोमश्च सकाररूपाणि सकारवाच्यानि च । तारो लक्ष्म्यायुक्तो वैराजः प्रस्तरो विराड़ वैभव तकाररूपाणि तद्वाच्यानि च ईकाररूपिणी सीतैव सोमामृतावयव दिव्यालङ्कारखड्मौक्तिकाद्याभरणा- लङ्कृता महामायाऽव्यक्तरूपिणी सती व्यक्ता भवति । एतेन सामान्यराजाद्यारभ्य आविभोरुत्तरोत्तर यदैश्वर्य योन्नतं मेर्वादि, मङ्गलं चन्दनकुसुमादि, उज्ज्वल मणिद्युमणिदीपादि, यश्च गरिमवद् हिमवन्मन्दरादि, पुण्य तत्साधनभूतं यज्ञादि, यच्च पावन तीर्थं गङ्गादि, यच्च धन्य भाग्यफलभूतम् अष्टसिद्धिनवनिध्यादि, यच्चान्यदप्यैश्वर्य तत्सर्वमपि श्रियः कटाक्षकन्द- छत्र मे लगी मणियो के मस्तक के मुकुट पर जटित मणि के साथ सघर्ष होने पर उससे मधुर ध्वनि की सृष्टि होती है । वह अपने चरणो पर नतमस्तक सामान्य भूमिपालो को कुछ नही गिनता । यह ऐश्वर्य की पराकाष्ठा है । इसके विपरीत एक दूसरा व्यक्ति ,,, भी है जिसके पास अपना घर नही है । वह अपनी दीनहीन दशा के कारण सर्वत्र दाँत दिखाता रहता है घिघियाता रहता है , अपनी दीनता का प्रदर्शन करता रहता है । है रगराजप्रणयिनि लक्ष्मी ये दोनो ही स्थितियाँ आपके कृपाकटाक्ष के उन्मीलन और , निमीलन के कारण होती है । जिस पर आपकी कृपा हो जाती है वह पहली स्थिति मे और जिस पर नही होती वह दूसरी स्थिति में रहता है । सीतोपनिषद् की पद्धति से इच्छा, ज्ञान, क्रियारूप प्रत्यक्ष तीन शक्तियो के सहारे उस सीता तत्व का अनुमान उसी तरह ,,, होता है जैसे कि अकुर से बीज का अनुमान होता है । अनन्त ब्रह्माण्ड की सन्तति की उत्पत्ति सीता तत्व की इच्छा ज्ञान क्रिया शक्ति से ही होती है । ब्रह्म की सत्ता और सीतातत्व की सत्ता एक ही है । केवल ब्रह्मसत्ता सामान्य ही नही, किन्तु मूलप्रकृतिरूप , ( ) होने से यही प्रकृति अर्थात् प्रणव ऊँकार की भी प्रकृति यह सीता तत्त्व हो है । यही मायातत्त्व भी है । इनमे से विष्णु प्रपच ,, के बीजरूप है और माया लक्ष्मी ईकाररूप और ईकार वाच्य भी है । सीता पदस्थित सकार सत्य अमृत प्रभृति और सोम का बाचक , है । लक्ष्मी से युक्त प्रणव विराट् का प्रस्तार और विराट् का वैभव ये सब तकारपद के बाच्य है । ईश्वररूपिणी सीता ही सोम और अमृत के अवयवभूत दिव्य अलकार, माला, मुक्तामणि प्रभृति आभरणो से अलकृत होकर महामाया के रूप मे अव्यक्त रहते हुए भी लक्ष्मी के रूप मे व्यक्त होती है । इससे यह सिद्ध होता है कि सामान्य नृपति से लेकर सम्राड् पर्यन्त जो ऐश्वर्य की अभिवृद्धि दिखाई पडती है, मेरु प्रभृति में उन्नति दिखाई देती है, चन्दन, कुसुम प्रभृति मे मगलप्रद भाव, मणि, सूर्य, दीपक प्रभृति में उज्ज्वलता, हिमालय, मन्दर प्रभृति में गरिमा, यज्ञादि मे पुण्यसाधनता, गंगा प्रभृति तीर्थों में पावनता, अष्टसिद्धि नवनिधि प्रभृति मे भाग्य की
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वेदार्थपारिजातः २२५२ लिता बिन्दव एवेति स्पष्टमुक्तं गुणरत्नकोशकृता । 'आकुग्रामनियामकादपि विभोरासर्वनिर्वाहकादैश्वर्य यदिहोत्तरोत्तरगुणं श्रीरङ्गभर्तुः प्रिये । तुङ्ग मङ्गलमुज्ज्वल गरिमवत्पुण्य पुनः पावन धन्य यत्तददश्च वीक्षणमुतस्ते पञ्चषा विप्रुषः ॥ ' “ प्रथमा सकाररूपा शब्दब्रह्ममयी स्वाध्यायकाले प्रसन्ना उद्भावनकरी सात्मिका, द्वितीया भूतले हलाग्रे समुत्पन्ना, तृतीया ईकाररूपिणी अव्यक्तस्वरूपा भवतीति सीतेत्युदाहरन्ति । श्रीरामसान्निध्यवशाज्जगदानन्दकारिणी । उत्पत्तिस्थिति- सहारकारिणी सर्वदेहिनाम् || सीता भगवती ज्ञेया मूलप्रकृतिसज्ञिता । प्रणवत्वात् प्रकृतिरिति वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ ' सा सर्ववेदमयी सर्वदेवमयी सर्वलोकमयी सर्वकीर्तिमयी सर्वधर्ममयी सर्वाधारा कार्यकारणमयी महालक्ष्मीर्देवेशस्य भिन्नाभिन्नरूपा चेतनाचेतनात्मिका ब्रह्मस्थावरात्मिका तद्गुणकर्मविभागभेदाच्छरीररूपा देवर्षिमनुष्यगन्धर्वरूपा असुर राक्षसभूतप्रेतपिशाच- भूतादिभूतशरीररूपा भूतेन्द्रियमन प्राणरूपेति च विज्ञायते । -,, सा देवी त्रिविधा शक्त्यासनेच्छाशक्ति क्रियाशक्तिः साक्षाच्छक्तिरिति । इच्छाशक्तिस्त्रिविधा भवति । श्रीभूमिनीलात्मिका भद्ररूपिणी प्रभावरूपिणी सोमसूर्याग्निरूपा भवति । सोमात्मिका ओषधीनां प्रभवति । कल्पवृक्षपुष्पफल-लतागुल्मात्मिका औषधभेषजात्मिका अमृतरूपा देवाना महत्स्तोभफलप्रदा || अमृतेन तृप्ति जनयन्ती देवानामन्नेन पशूनां तृणेनवत्तजीवाना सूर्यादिसकलभुवनप्रकाशिनी दिवा च रात्रि कालकलानिमेषमारभ्य घटिकाष्टयामदिवसरात्रिभेदेन पक्ष-मासवयनसंवत्सरभेदेन मनुष्याणा शतायुःकल्पनया प्रकाशमाना चिरक्षिप्रव्यपदेशेन निमेषमारभ्य परार्धपर्यन्त कालचक्रं जगञ्चकमित्यादिप्रकारेण चक्रवत्परिवर्तमानाः सर्वस्यैतस्यैव कालस्य विभागविशेषाः प्रकाशरूपाः कालरूपा भवन्ति । अग्निरूपा अन्नपानादिप्राणिनां क्षुत्तृष्णात्मिका देवाना मुखरूपा वनौषधीना शीतोष्णरूपा काष्ठेष्वन्तर्बहिश्च नित्यानित्यरूपा भवति । श्रीदेवी त्रिविधं रूप कृत्वा भगवत्सङ्कल्पनुगुण्येन लोकरक्षणार्थ रूपं धारयति । श्रीरिति लक्ष्मीरिति लक्ष्यमाणा भवतीति विज्ञायते । भूदेवी सागराम्भःसप्तसमुद्ररूपा वसुन्धरा भूरादिचतुर्दशभुवनानामाधाराधेया प्रणवात्मिका भवति । नीला नाम मुखविद्युन्मालिनी सर्वोषधीनां सर्वप्राणिनां पोषणार्थं सर्वरूपा भवति । सकलभुवनस्याधोभागे जलाकारात्मिका मण्डूकमयेति भुवनाधारेति विज्ञायते । क्रियाशक्तिस्वरूपं तु हरेर्मुखान्नादः, तन्नादाद्विन्दु, बिन्दोरोङ्कारः, ओङ्कारात् परतो रामवैखानसपर्वतः । तत्पर्वते कर्मज्ञानमयीभिर्बहुशाखा भवति । तत्र त्रयीमय शास्त्रमाद्यं सर्वार्थदर्शनम् । ऋग्यजुःसामरूपत्वात् त्रयीति परिकीर्तिता कार्य- सिद्धेन चतुर्धा परिकीर्तिता ॥ ऋचो यजूंषि सामानि अथर्वाङ्गिरसस्तथा । चातुर्होत्रप्रधानत्वात् लिङ्गादित्रितयं त्रयी ॥ अथर्वाङ्गिरसं रूपं सामऋग्यजुरात्मकम् ॥ तथा दिशन्त्याभिचारसामान्येन पृथक् पृथक् ॥॥ एकविंशतिशाखायामृग्वेदः परिकीर्तितः । शतं च नव शाखासु यजुषामेव जन्मनाम् ॥ साम्नः सहस्रशाखाः स्युः पञ्चशाखा अथर्वणः । महिमा तथा इसके अतिरिक्त भी जो कुछ धन्य, यशस्य, ऐश्वर्यमय पदार्थ दिखाई पडते है, वह सब लक्ष्मी के कृपाकटाक्ष के केवल विन्दु मात्र हैं । 'आकुग्राम० ' प्रभृति श्लोक मे गुणरत्नकोशकार ने लक्ष्मी की इस महिमा का वर्णन किया है । सीतोपनिषद् में सीतातत्त्व का वर्णन किया गया है । यह सीतातन्व लक्ष्मी के स्वरूप से अभिन्न है । इसीलिये पूरे ।सीतोपनिषद् को उद्धृत कर यहाँ उसकी व्याख्या प्रस्तुत की जाती है । यह इसलिये आवश्यक है कि पूर्व प्रदर्शित इस बात को सिद्ध किया जाय कि भगवान् विष्णु के रामावतार के अवसर पर लक्ष्मी सीता के रूप में अवतरित होती है और पूरी रामायण मे सीता का ही चरित मुख्य रूप से प्रतिपादित है । पूरी सीतोपनिषद् का संक्षेप से यह अभिप्राय है- जिस संवित्तत्व ( सीता तत्त्व ) के आधार पर इच्छा, ज्ञान और क्रियाशक्ति की सत्ता स्फुरित होती है अथवा उक्त तीनों L, शक्तिया जिसकी सत्ता को सिद्ध करने में समर्थ होती है वह सीतातत्त्व ब्रह्म की सत्ता से अभिन्न है । ब्रह्मतत्त्व सत्ता सामान्य h स्वरूप माना जाता है । सीतातत्त्व का भी यही स्वरूप है । जगत् इससे भिन्न सत्ता विशेष के रूप मे वर्णित है । जैसे मृद्विशेष घटप्रभूति मिट्टी के विकार और मिट्टी उनका सामान्य मूलतत्व है, जैसे जल की तरङ्गादि विशेष स्थितियाँ उसके विकार और जल
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वेदार्थपारिजातः २२५३ शश्वद्ब्रह्ममयं रूपं क्रियाशक्तिरुदाहृता ॥ " साक्षाच्छक्तिर्भगवतः स्मरणमात्ररूपाविर्भावप्रादुर्भावात्मिका निग्रहानुग्रहरूपा शान्तितेजोरूपा व्यक्ताव्यक्तका रणचरणसमग्रावयवमुखवर्णभेदाभेदरूपा भगवतः सहचारिणी अनपायिनी अनवरतसहाश्रयण्यु- दितानुदिताकारा निमेषोन्मेषसृष्टिस्थितिसहारतिरोधानानुग्रहादिसर्वशक्तिसामर्थ्यात् साक्षाच्छक्तिरिनि गीयते । इच्छाशक्ति- स्त्रिविधा | प्रलयावस्थाया विश्रमणार्थ भगवतो दक्षिणवक्षःस्थल श्रीवत्साकृतिर्भूत्वा विश्राम्यतीति सा योगशक्ति । भोग- शक्तिर्भोगरूपा कल्पवृक्षकामधेनुचिन्तामणिशङ्खपद्मनिध्यादिनवनिधिसमाश्रिता भगवदुपासकाना कामनयाऽकामनया वा -भक्तियुक्ता नरं नित्यनैमित्तिककर्मभिरग्निहोत्रादिभिर्वा यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिभिर्वालमनण्वपि गोपुरप्राकारादिभिर्विमानादिभि सह भगवद्विग्रहार्चा पूजोपकरणैरर्चनै स्नानादिभिर्वा पितृपूजादिभिरन्नपानादिभिर्वा भगवत्प्रीत्यर्थमुक्त्वा सर्व क्रियते । अथातो वीरशक्तिश्चतुर्भुजा अभयवरदपद्मधरा किरीटाभरणयुक्ता सर्वदेवैः परिवृता ब्रह्मादिभिर्वन्द्यमाना अणिमा- द्यैश्वर्ययुता सम्मुखे कामधेनुना स्तूयमाना वेदशास्त्रादिभिः स्तूयमाना जयाद्यप्सर स्त्रीभिः परिचर्यमाणा आदित्यसोमाभ्या दीपाभ्या प्रकाश्यमाना तुम्बुरुनारदादिभिर्गीयमाना राकासिनीवालीभ्या छत्रेण ह्लादिनीमायाभ्या चामरेण स्वाहास्वधाभ्या व्यजनेन भृगुपुण्यादिभिरच्यमाना देवी दिव्यसिंहासने पद्मासनारूढा सकलकारणकार्यकरी लक्ष्मीर्देवस्य पृथग्भवनकल्पना । अलचकारस्थिरा प्रसन्नलोचना सर्वदैवतैः पूज्यमाना वीरलक्ष्मीरिति विज्ञायते ।' इत्युपनिषद् | उपर्युक्तसीतोपनिषद्वचनाना संक्षेपेणायमभिप्राय -इच्छाज्ञानक्रियाशक्तयो यस्य भाव सत्ता साधयन्ति. इच्छादि- शक्तित्रयस्य वा सत्त्वं येन संविद्रूपेण सिद्धयति, तद्ब्रह्म सत्तासामान्यं सीतातत्त्वमिति । सत्ताविशेष एव जगत् । यथा मृद्विशेषा घटादयो विकारा मृत्सामान्य मूलतत्त्वम् जलविशेषास्तरङ्गादयो विकारा जलसामान्यात्मका एव, यथा वा सुवर्णविशेषाः कटकमुकुटकुण्डलादय: सुवर्णसामान्यमेव, यथा मृत्सामान्यमेव घटशरावोदञ्चनादिमृद्विशेषरूपेण, यथा वा सुवर्ण- सामान्यमेव कटकमुकुटकुण्डलादिसुवर्णविशेषरूपेण परिणमते, तथैव ब्रह्मसत्तासामान्यमेव सत्ताविशेषप्रपञ्चात्मना विवर्तते । यथा बीजे तदङ्करोत्पादिनी शक्तिर्भवति, तथैव ब्रह्मसत्तासामान्येऽपि प्रपञ्चोत्पादिनी शक्तिर्भवति । तस्यामेवानेके शक्तिभेदा भवन्ति । 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (श्वे ०3० ६।८) इति श्रुत्यन्तरात् । ब्रह्मात्मसत्तारूपे सीतातत्त्वे च काचिन्मूल- प्रकृतिरूपा काचिच्च प्रणवप्रकृतिरूपा शक्ति: । सापि सीतैव । सीतेति त्रिवर्णरूपा विशुद्धसत्त्वरूपत्वात् सैव मायारूपाणि । तत्र प्रपञ्चबीजं माया विष्णुश्च ईकाररूप. सत्यम- मृतमभीष्टप्राप्त्यादिकं सकाररूपः । तारलक्ष्म्या सह प्रस्तरः विस्तृतः वैराजः स्थूलप्रपञ्चविशिष्टचेतनस्तकाररूपः । यथा प्रणवे अ उ म् इति मात्रात्रये विश्वतेजसप्राज्ञा विराड्ढरण्यगर्भेश्वरा अन्तर्भवन्ति । अर्धमात्रा च तुरीयरूपा भवति । तथैव प्रकृतेऽपि उनका सामान्य मूल तत्त्व है, अथवा जैसे कटक, कुण्डल प्रभृति सुवर्ण की विशेष स्थितियां और उनका मूलतत्व सुवर्ण सामान्य है, जैसे मृतसामान्य ही घट, शराव आदि के रूप में, सुवर्ण सामान्य ही कटक, मुकुट, कुण्डलादि के रूप में परिणत होते है, उसी तरह से ब्रह्मसत्ता सामान्य ही सत्ता विशेष स्वरूप जागतिक प्रपत्र के रूप में परिणत हो जाता है । जैसे बीज मे अकुर को उत्पन्न करने की -शक्ति विद्यमान है, उसी तरह से ब्रह्मसत्ता सामान्य में प्रपंच को उत्पन्न करने की शक्ति वर्तमान है । उस ब्रह्मसत्ता मे ही अनेक शक्तियाँ विद्यमान है । श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है कि ब्रह्म में अनेक प्रकार की उत्कृष्ट शक्तियाँ विद्यमान है । , सीतातत्त्व ब्रह्मसत्ता सामान्य है अर्थात् इनकी पृथक् सत्ता न होकर एक ही सामान्य मत्ता है । इस सीतातत्त्व मे मूल प्रकृतिरूप
और प्रणव प्रकृतिरूप शक्तियाँ विद्यमान है । ये भी सीता के ही स्वरूप हैं ॥
सीतातत्त्व त्रिवर्णरूप है । यह विशुद्ध सत्त्वमयीहै । यही माया भी कहलाती है । माया इस प्रपच का बीज है और विष्णु ईकारस्वरूप है । सत्य, अमृत और अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति, यह सकार का रूप है । तार लक्ष्मी के साथ विस्तृत विराट् अर्थात् स्थूल ( ),, -, प्रपच से विशिष्ट चेतन तकार का स्वरूप है । जैमे प्रणव ऊँकार की अ उ म् इन तीन मात्राओं में विश्व तेजस और प्राज्ञ विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर का अन्तर्भाव माना जाता है और अर्धमात्रा की इनसे भिन्न तुरीय तत्त्व के रूप मे गणना होती है, उसी
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२२५४ वेदार्थपारिजातः सीताशब्दगते स ई ता इति वर्णत्रये प्रकृतिविकारात्मकः प्रपञ्चोऽर्धमात्रारूप च ब्रह्मसत्तारूपं मूलसीतातत्त्वम् । ईकाररूपिणी सोमामृतावयवदिव्यस्रड्मौक्तिक दिव्याभरणालङ्कृता विग्रहवती व्यक्तरूपा भवति । सात्मिका सकाररूपा शब्दब्रह्ममयी स्वाध्यायकाले प्रसन्ना प्रपञ्चोद्भावनकरी भवति, सृष्टेः शब्दपूर्वकत्वात् स भूरिति व्याहरत् स भूमि- मसृजत' (तै० ब्रा० रारा ४(२) इति श्रुते, 'वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वर ' इति स्मृते', 'शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्' ( ब्र ० सू० १ ३ २८ ), 'अत एव च नित्यत्वम्' (ब्र ० सू० १ / ३/ २९) इति सूत्रेभ्यश्च । द्वितीया भूतले हलाये समुत्पन्ना । सा चाभ्युदयहेतुत्वात् कृष्यधिष्ठात्री शक्तिविग्रहवती जनकस्य यज्ञे चयनक्षेत्राकर्षणकाले हलाग्रादा- विर्भूता सीता । तृतीया अव्यक्तरूपिणी ईकाररूपिणी भवति । शक्तिरूपैव सीता ब्रह्मसत्तात्मश्रीरामसान्निध्यवशाद् जगदा- नन्दकारिणी सर्वदेहिनां हिताय उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणी भवति । सैव मूलप्रकृतिसंज्ञिता ज्ञेया । प्रणवरूपत्वाच्च सीता प्रकृतिरुच्यते । सैव च ब्रह्ममयी सर्ववेदमयी सर्वदेवमयी सर्वलोकमयी सर्वकीर्तिमयी सर्वधर्ममयी सर्वाधारा कार्यकारणमयी महालक्ष्मीः सर्वकारणत्वात् सर्वमयी भवति, कारण सूक्ष्म-स्थूल-समष्टिव्यष्टिरूपत्वात् । प्रकारान्तरेण सैव इच्छाशक्तिः, क्रिया- शक्तिः, साक्षाच्छक्तिरिति च गीयते । श्रीरूपा भूरूपा नीलारूपेति त्रिधा इच्छाशक्तेविस्तारः । पूर्वा भद्ररूपिणी, द्वितीया प्रमातृरूपिणी, तृतीया सोमसूर्याग्निरूपा । सोमरूपा सती ओषधीना नियामिका भवति । सैव च कल्पवृक्षपुष्पफललता- गुल्मात्मिका औषधभेषजात्मिका अमृतरूपा देवानां महत्स्तोमफलप्रदा अमृतेन देवाना तृप्तिं जनयन्ती मनुष्याणामन्नेन पशूनां तृणेन तत्तज्जीवाना कल्याणाय पोषणाय च सूर्यादिसकलभुवनप्रकाशिनी दिवारात्र्यादिखण्डकालमहाकालकल्पनया प्रकाशमाना जगद्व्यवहारहेतुर्भवति । सेव बाह्याभ्यन्तराग्निरूपेण किं बहुना सैव बुद्धिनिद्राक्षुधाछायातृष्णाक्षान्तिजाति- शान्तिश्रद्धाकान्तिलक्ष्मीवृत्तिस्मृतिदधातुष्टिपुष्टिमातृ- भ्रान्त्यादिरूपेण सर्वाभ्युदयसर्वजीवनसर्वविश्रामहेतुर्भवति । सैव च भग- तरह से प्रकृत मे 'सीता' पद गत स ई ता इन तीन वर्णों में प्रकृति विकारात्मक प्रपच और अर्धमात्रात्मक स्वरूप में ब्रह्मसत्ता सामान्य मूल सीता तत्त्व विद्यमान है । ईकारस्वरूपिणी सीता सोम और अमृत से उत्पन्न दिव्य माला, मुक्तामणि जटित दिव्य अलकारों से विभूषित व्यक्त शरीर को धारण करती है । सकारात्मका शब्द ब्रह्ममयी सीता स्वाध्याय काल मे प्रसन्न होकर सारे प्रपच की सृष्टि करती है । सृष्टि की शब्दपूर्वकता 'स भूरिति' प्रभूति श्रुतियों में सुनी गई है । स्मृति मे भी बताया गया है कि 'उस महेश्वर ने वैदिक शब्दो से प्रपंच की ' सृष्टि की । ब्रह्मपुत्र मे भी यह विषय प्रतिपादित है । यह सीतातत्त्व का प्रथम स्वरूप है । इसका द्वितीय स्वरूप पृथिवी लोक मे हल के अग्रभाग से प्रादुर्भूत हुआ था । यह देवी का स्वरूप जगत् के अभ्युदय का हेतु है । कृषि की अधिष्ठात्री देवी के रूप में यह शक्ति मानुषी विग्रह धारण कर जनक के यज्ञ में अग्निचयन के स्थान को जोतते समय हल के अग्रभाग से निकली थी और इसका नाम भी सीता रखा गया था । सीता का तृतीय स्वरूप ईकार के रूप मे अव्यक्त रहता है । ब्रह्मसत्ता सामान्य श्रीराम के सान्निध्य से शक्तिस्वरूपिणी यह सीता जगत् को आनन्द देने वाली सब प्राणियो के कल्याण के लिये जगत् की उत्पत्ति, ,स्थिति सहार की लीला करती है । इसलिये इसी को मूल प्रकृति कहते है । प्रणवरूप होने से भी सीता प्रकृति कहलाती है । यह सीता ही ब्रह्ममयी, सर्ववेदमयी, सर्वदेवमयी, सर्वलोकमयी, सर्वकीर्तिमयी, सर्वधर्ममयी, सबकी आधारभूत 3 कार्यकारणमयी महालक्ष्मी ,कहलाती है । सारे प्रपच की कारण होने से यह सर्वमयी है । यही कारण शरीर सूक्ष्म और स्थूल शरीर वाली तथा समष्टि और व्यष्टिस्वरूप वाली भी है । प्रकारान्तर से यही इच्छाशक्ति क्रियाशक्ति और साक्षात्छक्ति के रूप में परिणत होती है । इच्छाशक्ति का त्रिधा विस्तार श्री, भू और नीला देवी के रूप में होता है ॥ श्री देवी भद्र ( कल्याण ) को देने वाली, भू देवी प्रमातृस्वरूपिणी और -,,नीलादेवी सोमसूर्य अग्निस्वरूपिणी है । अपने सोमरूप के कारण यह औषधियों को पुष्टि प्रदान करती है । कल्पवृक्ष पुष्प ,,,फल लता गुल्म प्रभृति इसी के स्वरूप हैं । औषध भेषज के रूप में यह भूलोक में अमृतस्वरूपिणी हैं । अमृतरूप होने से ही यह देवताओं को अमृत से, मनुष्यो को अन्न से, पशुओ को तृण ( घास ) से सन्तुष्ट करती है । अन्य जीवों के कल्याण के लिये और उनको पुष्ट करने के लिये भी यह सूर्य प्रभृति सारे लोकों को प्रकाशित करती है । दिन, रात्रि आदि के रूप मे खण्डकाल और महाकाल की कल्पना के रूप में प्रकाशमान यह देवी सारे जगत् के व्यवहार का सम्पादन करती है । यहीं बाह्य और आभ्यन्तर
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वेदार्थपारिजातः २२५५ चत्सङ्कल्पानुगुण्येन लोकरक्षणार्थ श्रीलक्ष्मीभूदेवीरूपेण विश्व पोषयति । तस्या एव जगन्निर्वाहाय एकविशतिशाखात्मकग्वे- दात्मना नवोत्तरशतशाखात्मकयजुर्वेदात्मना सहस्रशाखात्मकसामवेदात्मना पञ्चशाखात्मना पञ्चाशत्शाखात्मना वा अथर्व- वेदरूपेण प्रादुर्भाव. । ' अथर्वणस्य शाखाः स्युः पञ्चाशद्भेदतो हरे ।' ( मुक्तिकोपनिषद् १३ ) इति मुक्तिकोपनिषदुक्ते. । वस्तुतस्तु ' अनन्ता वै वेदा ' (तै० ना० ३| १० | ११ |४ ) इति तैत्तिरीयसंहितानुसारेण वेदा अनन्ता ईश्वरज्ञानस्यानन्त- त्वात् वदनुगता वेदा अप्यनन्ता एव । 'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञान सर्वं शब्देन भासते ॥ ' (वा० पदीय ब्रह्मकाण्ड १२३ ) इति वाक्यपदीयरीत्या अस्मदादिज्ञानान्यपि शब्दानुविद्धान्येव । ईश्वरज्ञानस्य नित्यत्वात् तदनुविद्धाः शब्दा अपि नित्या एव । नित्या अपौरुषेया शब्दा एव वेदा । ईश्वरज्ञानपूर्विका एव सृष्टिर्भवति । तत एव वेदशब्दपूर्विकाः सर्वा अपि सृष्ट्य । तत्र वेदा यद्यप्यनन्ता एव । तथापि मानवबुद्धिग्राह्या वेदा महाभाष्यादिरीत्या ,, एकत्रिंशदुत्तरैकादशशत सख्याकशाखात्मका सीतोपनिपद्रीत्या पञ्चत्रिंशदुत्तरकादशशतसंख्याकाः मौक्तिकोपनिषद्रीत्या अशीत्युत्तरैकादगरातसख्याकशाखात्मकाः । इदानी तु नवगाखात्मका एवोपलभ्यन्ते वेदाः । देवेषु चतुर्मुखादिपु आदित्ये च - - सर्वाएव शाखास्तिष्ठन्तीति । कल्प- व्याकरण शिक्षा निरुक्तज्योतिषछन्दोरूपाणि षडङ्गानि । न्यायवैशेषिको साख्ययोगी पूर्वोत्तरमीमासे च धर्मशास्त्रमितिहासपुराणवास्तुवेदधनुर्वेदायुर्वेदगान्धवं चैते पञ्चोपवेदा भवन्ति । दण्डनीतिश्च वार्ता च वायुजयश्चैव सर्वाणि शास्त्राणि विष्णोर्वाणी । शश्वद्ब्रह्ममयं रूप क्रियाशक्तिरुदाहृता । साक्षाच्छ्रीभगवतः स्मरणमात्ररूपाविर्भावप्रादुर्भावात्मिका निग्रहानुग्रह- रूपा शान्तितेजोरूपा व्यक्ताव्यक्तकारणचरणसमग्रावयवमुखवर्णभेदाभेदरूपा भगवत्सहचारिणी अनपायिनी अनवरतसहा- श्रयिणी उदितानुदिवाकारा निमेषोन्मेषसृष्टिस्थितिसहारतिरोधानानुग्रहादिसर्वशक्तिसामर्थ्यात् साक्षाच्छक्तिरिति गीयते । ,,,,,,,,,,,,,, अग्नि के रूप में विद्यमान है । बुद्धि निद्रा क्षुधा छाया तृष्णा क्षान्ति शान्ति श्रद्धा कान्ति लक्ष्मी वृत्ति स्मृति दया तुष्टि ,,, पुष्टि मति भ्रान्ति आदि रूपो मे यही देवी सबके अभ्युदय जीवन और विश्राम की हेतु है । यही भगवान् के सकल्प के अनुरूप लोक की रक्षा के लिये श्री, लक्ष्मी, भूदेवी का रूप धारण कर विश्व का पोषण करती हैं । जगत् का सुचारू रूप से सचालन करने के लिये यही देवी २१ शाखा वाले ऋग्वेद का, १० ९ शाखा वाले यजुर्वेद का, एकसहस्रशाखा वाले सामवेद का, ५ अथवा ५० शाखावाले अथर्ववेद का रूप धारण करती है । अथर्ववेद की सीतोपनिषद् मे ५ तथा मौक्तिकोपनिषद् मे ५० शाखाएँ वर्णित है । ', वस्तुत तैत्तिरीय सहिता के वचन के अनुसार वेद अनन्त है । ईश्वर के ज्ञान का कोई अन्त नही है अत ईश्वर के , ज्ञान से अनुगत वेद भी अनन्त है । वाक्यपदीयकार का कहना है कि ऐसा कोई ज्ञान नही है जिसके साथ शब्द न जुडा हुआ हो । , इसी पद्धति से हमारा ज्ञान भी शब्द के साथ जुडा हुआ है । ईश्वर का ज्ञान नित्य है अत उससे अनुविद्ध शब्द भी नित्य ही हैं । , नित्य अपौरुषेय शब्द ही वेद है । यह सृष्टि ईश्वर के ज्ञान के साथ जुडी हुई है इसीलिये सारी सृष्टि ईश्वर के ज्ञान से अनुविद्ध वैदिक शब्दो से ही होती है । इस तरह से वेद यद्यपि अनन्त है, तथापि मानव बुद्धि से गृहीत हुए वेद महाभाष्यकार के कथन के अनुसार ११३१ शाखाओ वाले है । सीतोपनिषद् में शाखाओं की सख्या ११३५ और मौक्तिकोपनिषद् मे १ ९ ८० है । आजकल वेद की केवल ९ शाखाएँ उपलब्ध है ॥ चतुर्मुख ब्रह्मा प्रभूति देवता तथा आदित्य मे लुप्त हुई सभी शाखाएँ विद्यमान है । कल्प, ,,, - -,, -,,, व्याकरण शिक्षा निरुक्त ज्योतिष और छन्द ये वेद के षडंग कहे गये है । न्याय वैशेषिक साख्य योग पूर्वोत्तर मीमासा धर्मशास्त्र इतिहास, पुराण, वास्तुवेद, धनुर्वेद आयुर्वेद और गान्धर्ववेद –इनमें पांच उपवेदो का भी समावेश है । दण्डनीति, वार्ता, वायुजय प्रभृति सभी शास्त्र भगवान् विष्णु की वाणी का विलास है । क्रियाशक्ति भी उस शाश्वत ब्रह्म का ही स्वरूप है । भगवान् के स्मरण करते ही साक्षात् लक्ष्मी उनके सामने क्रिया- शक्ति के रूप मे आविर्भूत होकर आविर्भाव और तिरोभाव, निग्रह और अनुग्रह, शान्ति और तेज, व्यक्त और अव्यक्त, कर, चरण, 1 मुख आदि समग्र अवयव के भेदाभेद के रूप में अवस्थित होकर इन सब कार्यों में उनकी सहायिका बनती है, उनसे कभी अलग नही , सदा उनके साथ रहती है तो भी कभी इसका स्वरूप दिखाई पडता है और कभी आँखो से ओझल हो जाता है । निमेष, उन्मेष,I होती सृष्टि, स्थिति, सहार, तिरोधान, अनुग्रह आदि समस्त शक्तियो की सामर्थ्य इसी मे निहित है । अत इसी को साक्षात् शक्ति कहा जाता
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वेदार्थपारिजातः दक्षिणवक्षःस्थले श्रीवत्साकृतिर्भूत्वा विश्राम्यतीति सा२२५६ योगशक्तिः ॥इच्छाशक्तिस्त्रिविधा प्रलयावस्थाया विश्रमणार्थ भगवतो । अथातो वीरशक्तिश्चतुर्भुजा अभयवरद-भोगशक्तिर्भोगरूपा कल्पवृक्षकामधेनुचिन्तामणिशङ्खपद्मनिध्यादिनवनिधिसमाश्रिता रत्नघटैरमृतजलैरभिषिच्यमाना सर्वदैवतैर्ब्रह्मादिभिर्वन्द्य- वेदशास्त्रादिभिः स्तूयमाना जयाद्यप्सर.पद्मधरा किरीटाभरणयुता सर्वदेवैः परिवृता कल्पतरुमूले चतुभिर्गजै स्त्रीभि परिचर्यमाणामाना अणिमाद्यैश्वर्ययुक्ता सम्मुखे कामधेनुना स्तूयमाना राकासिनीवालीभ्या छत्रेण ह्लादिनीमायाभ्यां चामरेणआदित्यस्वाहास्वधाभ्यासोमाभ्या व्यजनेनप्रदीपाभ्याभृगुपुण्यादिभिरच्यमानाप्रकाश्यमाना तुम्बुरुनारदादिभिर्गीयमानादेवी सिहासने पद्मासनारूढा सकलकारणकार्यकरी लक्ष्मीर्देवस्य पृथग्भवन- वीरलक्ष्मीरिति विज्ञायते । कल्पना अलञ्चकार स्थिरा प्रसन्नलोचना सर्वदैवतैः पूज्यमाना याज्ञवल्क्यो भरद्वाजायाह -ॐ. तारसारोपनिषद्रीत्या प्रणवार्थभूत एव साङ्गः सशक्ति परमेश्वरःस्वस्तस्मैश्रीरामःवै। नमोतत्र नमः । ॐ उकारवाच्य उपेन्द्र-यो ह वै श्रीपरमात्मा नारायणः स भगवानकारवाच्यो जाम्बवान् भुर्भुवः शत्रुघ्नः । ॐ नादस्वरूपो भरतः । कलास्वरूपो. स्वरूपो हरिनायकः । ॐ मकारवाच्य शिवस्वरूपो हनुमान् । ॐ बिन्दुरूपः स भगवास्तत्परः परमपुरुषः पुराण- लक्ष्मणः । ॐ कलातीता भगवती सीता चित्स्वरूपा । ॐ यो वै श्रीपरमात्मा नारायणः रामोऽस्मि भूर्भुवः सुवस्तस्मै नमो नमः । राम- पुरुषोत्तमो नित्यशुद्धबुद्धमुक्त सत्यपरमानन्दाद्वयपरिपूर्णः परमात्मा ब्रह्मवाह चरित्राणि नामानि मन्त्राश्च वर्णितानि ।, रहस्योपनिषदि पूर्वोत्तररामतापन्यादिषु च भगवतः श्रीसहितस्य अनन्तमाहात्म्यानि च कर्तुर्महानानन्दो भवति तथा यथा कस्यचित्प्रभो. प्रीत्यै केनचित्प्रयत्नसाध्ये कर्मणि कृते प्रभुणा तद्दर्शनेन तदनुमोदनेन भवति । हरिः सर्वपापानां समस्तचिद्विधानव्यसनिनो हरेरपि तत्प्रयत्ने श्रिया तद्दर्शनेनानुमोदिते तस्यापि महानानन्दो वक्षस्थल पर श्रीवत्स, के रूप, मे विश्राम है । इच्छा शक्ति के भी तीन प्रकार है । पहला स्वरूप प्रलयावस्था मे भगवान् के दक्षिणके लिये यह कल्पवृक्ष कामधेनु चिन्तामणि के,, करता है । इसे योगशक्ति कहते है । दूसरा है भोगशक्ति भोग का सम्पादन करने तृतीय स्वरूप है । इसके चार भुजाएँ है, रूप मे और शख पद्म प्रभृति निधि के रूप में अवतरित होता है । वीर शक्ति इसका हाथी हुए है । यह सारे देवो से परिवृत है । कल्पतरु के नीचे चार अभय, वरद मुद्रा और कमल इसके हाथो मे है, किरीट पहने ब्रह्मा प्रभृति सभी देवगण इसकी स्तुति करते है ॥ अणिमा प्रभृति ऐश्वर्य प्रभृति अप्सराऍ इसकी सेवा मे लगी हुई है रत्नघट मे अमृत जल लेकर इसका अभिषेक करते है ॥,, इसके पास है । कामधेनु समस्त वेदादि शास्त्र इसके सामने स्तुति कर रहे है जया के नारद प्रभृति इसका यशोगान कर रहे है । राका और सिनीवाली, आदित्य और सोमरूपी दीपक से यह प्रकाशमान है । तुम्बुरु प्रभृति इसकी पूजा कर रहे हैं ।,,, हाथ में छत्र है ह्लादिनी और माया चामर डुला रही है स्वाहा और स्वधा पखा झल रही है भृगु जननी है । यह देवी लक्ष्मी यह देवी ( भोगशक्ति ) सिहासन पर पद्मासन मार कर बैठी हुई हैं, सकल कारण औरको साकारकार्य जगत्करतीकीहै । प्रसन्न लोचनवाली सभी का ही स्वरूप है । इस रूप में यह भगवान् विष्णु के एक से अनेक बनने के संकल्प देवताओ के द्वारा पूजित स्थिर स्वरूप वाली यह लक्ष्मी वीरलक्ष्मी के नाम से मानी जाती है । तारसारोपनिषद् के अनुसार सपरिकर सशक्ति भगवान् श्रीराम प्रणवात्मक ही है । वहाँ याज्ञवल्क्यसुग्रीवभरद्वाज, मकारवाच्यको कहतेशिव-है कि यह जो परमात्मा नारायण है, वही भगवान् अकार के रूप में जाम्बवान्, उकार वाच्य उपेन्द्रस्वरूप सीता चित्स्वरूपिणी और श्री परमात्मा,,,,,; स्वरूप हनुमान् बिन्दुरूप शत्रुघ्न नादरूप भरत कलास्वरूप लक्ष्मण कलातीता भगवती अद्वयतत्त्व से परिपूर्ण परमात्मा नारायण स्वय भगवान् ही परमपुरुष, पुराण पुरुषोत्तम, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, परमानन्दात्मक करता हूँ । रामरहस्यो-.,,, परब्रह्मस्वरूप राम है । भू भुव और सुव इस व्याहृतित्रय का उच्चारण कर मैं इन सभी स्वरूपो को प्रणाम माहात्म्य चरित्र पनिषद्, पूर्वरामतापिनी और उत्तररामतापिनी प्रभृति उपनिषदो मे लक्ष्मी के साथ वर्तमान भगवत्स्वरूप के अनन्त नॉम और मन्त्र वर्णित हैं । जैसे कोई व्यक्ति अपने स्वामी के लिये पूर्ण प्रयत्न कर कोई उत्तम You कार्य करता है और यह जानकर उसको महान् आनन्द होता है कि मेरे स्वामी ने मेरे कार्य को देखा और उसको सराहा, उसी तरह से समस्त चित् और अचित् जगत् का विधान करनेवाले भगवान् के प्रयत्न को भी जब लक्ष्मी देखती है और उसका अनुमोदन करती है तो भगवान् को भी महान् आनन्द होता है । सब सापों का हरैण करने वाले अथवा उनको अपने वश में करने वाले श्रीहरि हैं । वे समस्त चिदचित् जगत् को इन्द्रिय और देह से संयुक्त
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वेदार्थपारिजातः २२५७ हरणाद्वशीकरणाद्वा । समस्ताना चिदचिता करणकलेवरयोजनाय महदहङ्कारभूतकरणग्रामोत्पादनम् । समस्तबद्धमुक्तनित्य- रूपाणा चेतनाना शुद्धसत्त्वमिश्रसत्त्वगून्यलक्षणानामचेतनाना भगवदिच्छात एव सृष्टिस्थितिलया भवन्ति । सूरीणा नित्या- सङ्कुचितज्ञानतया सङ्कल्पनम्, मुक्तानामाविर्भूतापहतपाप्नत्वादिगुणाष्टकतया सङ्कल्पनम् बद्धाना करणादिप्रदानकर्मतारतम्य- ज्ञानोत्पादनादिविधान भवति । अचेतनविषये तु शुद्धसत्त्वस्य स्वेच्छया नित्यविभूतिविमानगोपुरमण्डप प्रासादादिरूपेण परि- णामयितृत्व मिश्रसत्त्वस्य ससारिचेतनान् प्रति भाग्यभोगोपकरणभोगस्थानरूपेणाण्डतदावरणचतुर्दशभुवनसमस्तदेहेन्द्रियादि- रूपेण चोत्पादनम्, सत्त्वशून्यस्य कालस्य चेतनकर्मानुगुण्येन कलाकाष्ठामुहूर्त्तयामदिनपक्षमासवयनसवत्सरादिरूपेण परिणम- यितृत्व च तदिच्छात एव विधान श्रियः प्रमोद | श्रीहरेस्तादृशचिदचिद्विधानव्यसनम्, श्रीश्च कटाक्षैरेव तदनुमोदते । 'स्मित- विकसितगण्ड व्रीडविभ्रान्तनेत्र मुखम्वनमयन्ती स्पष्टमाचष्ट सीता ।' इतिवन्नयनलीलयैवाङ्गीकार सूच्यते । तदेवोक्तं गुणरत्न- कोशे — ‘ श्रियै समस्तचिदचिद्विधानव्यसन हरे । अङ्गीकारिभिरालोकै सार्थयन्त्यै कृताञ्जलि ||' इति । 'क्रीडेय खलु नान्य- थास्य रसदा स्यादेव रस्या तया' इति श्रीस्तवोक्तः । तस्मात् सैव षोढा श्रीर्भवति 'श्रितास्यन्यै सर्वै श्रयसि रमणं सचितगिरः शृणोषि प्रेयास श्रितवच श्रावयसि च । शृणास्येतद्दोषान् जननि निखिलान् सर्वजगती गुणै. श्रीणासि त्वं तदिह भवती श्रीरिति विदु. ॥ ' इति । व्याख्यातमेतत् । श्रीहरेः स्थिरचरसृष्टौ यत्तारतम्य दृश्यते तदपि श्रीभगवत्या भ्रूभङ्गापेक्षयैव । तत्र स्थावरसृष्टी कल्पवृक्षचन्दन-रसालाश्वत्थनारिकेलस्नुहीबराकीडिकण्टकिद्रुमाणा चरेषु देवमनुष्यब्राह्मणक्षत्रियादीना हसगरुडशुकपिकमयूरकोकिलकङ्क-गृध्रकाकादीना यदुच्चावचभावलक्षण तारतम्यं दृश्यते, तत्सर्वं श्रिय. कटाक्षमूलकमेव । यथा धातुर्जंगत्सृष्टौ वेदाः प्रमाण , |, करने के लिये महत् अहङ्कार इन्द्रियगम्य और पच महाभूत की सृष्टि करते है समस्त बद्ध मुक्त और नित्य चेतनो की सृष्टि , शुद्ध सत्त्व और मिश्र सत्त्व से तथा सत्त्वशून्य अचेतनो की सृष्टि स्थिति और लय भगवदिच्छा से ही होते है । नित्यमुक्त सूरीगण को सकल्पना नित्य असकुचित ज्ञान से, मुक्तो की आविर्भूत अपहतपाप्मत्वादि गुणाष्टक से और बद्ध जीवो की इन्द्रिय, शरीर आदि ,की रचना के साथ ज्ञान के तारतम्य के विधान द्वारा सम्पन्न होती है । अचेतन पदार्थो मे से शुद्ध सत्त्व को स्वेच्छया नित्यविभूति ,,,,विमान गोपुर मण्डप प्रासाद रूप से परिणत कर देते है । मिश्रसत्त्व से ससारी चेतन जीवो के लिये भोग्य पदार्थ भोग के उपकरण और भोगस्थान के रूप मे अण्ड और उसके आवरणभूत चतुर्दशभुवन और समस्त देह, इन्द्रिय प्रभृति पदार्थों की उत्पत्ति ,,,,,,,,,करते है । सत्त्वशून्य काल की चेतन जीव के कर्मो के अनुसार कला काष्ठा मुहूर्त मास दिन पक्ष मास ऋतु अयन सवत्सर आदि के रूप मे परिणति होता है । यह सब भगवान् की इच्छा से होता है । इससे लक्ष्मी प्रसन्न होतो है । श्रीहरि को इस तरह के चिदचिद्विशिष्ट जगत् को बनाने की आदत है और लक्ष्मी इसका अनुमोदन करती है । 'लज्जा से अपना मुख नीचा करती हुई सीता ने अपने मनोभाव को स्पष्ट कर दिया उत्तररामचरित की इस उक्ति के अनुसार लक्ष्मी अपने नेत्रो की लीला से हो भगवान् के इन सभी कार्यों का अनुमोदन करती है । 'श्रियै समस्त० ' इस श्लोक मे गुणरत्नकोशकार ने इसी भाव को व्यक्त किया है । श्रीस्तव में भी कहा गया है कि भगवान् की यह लीला लक्ष्मी को बडी ही सरस लगती है । इसीलिये इसको श्री कहते है । गुणरत्न-कोशकार ने कहा है कि अन्य सभी प्राणी आपका ही सहारा लेते है और आप स्वय लक्ष्मीरमण भगवान् विष्णु का आश्रय ग्रहण करती है । स्तुति करनेवालो की बात आप सुनती है और उन आश्रितो की प्रार्थना को आप भगवान् को भी सुनाती है । हे जननि! अपने आश्रितो के समस्त दोषो को आप नष्ट कर देती है और इस सारे जगत को गुणों से परिपूर्ण कर देती है । इन्ही सब गुणो की समष्टिस्वरूपा भगवती लक्ष्मी को श्री के नाम से जाना जाता है । श्री हरिद्वारा संपादित स्थावर और जगम सृष्टि मे जो तारतम्य दिखाई पङता है, वह भी भगवती के भ्रूभग का ही ,,,,,विलास है । स्थावरसृष्टि मे कल्पवृक्ष चन्दन आम्र अश्वत्थ नारिकेल स्तुही तथा बबूल प्रभृति काटे वाले वृक्षो में तरतम भाव देखने को मिलता है । इसी तरह से देव, मनुष्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय' हस, गरुड शुक, पिक, मयूर प्रभृति में उच्चावच भाव देखने को मिलता है । यह सब लक्ष्मी के कटाक्ष का हो प्रभाव है । जैसे विधाता की सृष्टि मे वेद प्रमाण है, उसी तरह से श्रीहरि के स्थिर २८३
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वेदार्थपारिजातः २२५८ तथैव श्रोहरेः स्थिरचररचतातारतम्ये श्रीभ्रूभङ्गा एव प्रमाणम् । श्रीभ्रूभङ्गतारतम्ये च तत्तत्कर्मतपोयोगोपासनादितारतम्य-समचरन् सापेक्षमेव ॥ तेनैव न तत्र वैषम्यनैर्घृण्यादयो दोषा । तदुक्तमेव —'ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्षकामास्तपः , अल्पत्वतारतम्ये- भगवत्प्रपन्ना ' ( भा ० पु० १| १६| ३२ ) इत्यादिषु । तत्कृपाकटाक्षाणा बाहुल्यतारतम्येनोत्कर्षतारतम्यम्यस्या पादालक्ताङ्के. श्रीहरेः परत्व नापकर्षतारतम्यम् । भगवतः श्रीहरेरुरसि यस्याः पादचित्रैर्वेदान्तास्तत्त्वसशयं तरन्ति । श्रीपदलाक्षालाञ्छनदर्शनेन,, वेदान्ता निर्णयन्ति लक्ष्मीचरणलाक्षाचिह्नेर्यस्य वक्ष स्थलमलङ्कृतम् तस्यैव परतत्त्वत्वमिति भगवत प्रलयसमयाव- अयमेव परतत्त्वमिति निश्चिन्वते । 'एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः' इतीतरनिषेधपूर्वक स्थिति प्रतिपाद्य ' अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजा सृजेय' इति तस्य पुरुषशब्दवाच्यता जगत्सृष्ट्यादिकर्तृता च प्रतिपाद्य 'सहस्रशीर्षा पुरुष ' इत्यारभ्य ' तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरा ' इत्यन्तेन वाक्यजातेन नारायणपुरुषशब्दवाच्यस्य विश्वाक्रमण-. सहस्रशिर पादादिमत्त्व विश्वशरीरत्व मोक्षप्रदत्व महामहिमत्व सर्वतो ज्यायस्त्व सर्वभूतैकपादत्व त्रिपाद्विभूतिमत्त्व तदवतार- कर्तृत्व चराचरोत्पादकनानावयवत्व तमःपरवर्तित्व सर्वनामरूपव्याकर्तृत्व कर्मकृतजन्मरहितत्वलक्ष्मीपतित्वप्रतिपादनालक्ष्मीपतिरेवस्वेच्छाकृतावतारत्व हेत्वपारकारुणिकत्वानि प्रतिपाद्य एव विभवो नारायणशब्दवाच्यश्च भक्त इत्यपेक्षाया वेदान्तपुरुषाश्चिन्ता मुञ्चन्ति । अनेन नारायणपुरुषशब्दवाच्यः पूर्वोक्तसर्ववैभवयुक्तः परतत्त्व चेति श्रोतारो निश्चेष्यन्तीति मुराभ- लक्ष्म्या वेदान्तवेद्यत्वमायाति । तदुक्तम् —'यद्भ्रूभङ्गाः प्रमाण स्थिरचररचनातारतम्ये मुरारेर्वेदान्तास्तत्त्वचिन्ता दुरसि यत्पादचिस्तरन्ति' इति । ' ' यद्यपि एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे इति वचनेऽपीतरनिषेधपूर्वक रुद्रस्यापि प्रलयकालावस्थायित्वा- परमेश्वर प्रभुम्' ( म० दिकमुक्तमेव, यथा पुरुषसूक्ते नारायणस्य लक्ष्मीपतित्वम्, तथैव रुद्रस्योमापतित्व चोक्तम् 'उमासहाय मे उन उन प्राणियो के कर्म, और चर वस्तुओ निर्माणमें लक्ष्मी की भृकुटिभगिमा ही प्रमाण है । श्री के भ्रूभङ्ग के, प्रभृतितारतम्यदोषो की आपत्ति नही आती । उपासना आदि के तारतम्य का सनिवेश रहता ही है । इसी कारण से इनमे वैषम्य,हीनैर्घृण्यब्रह्मा प्रभृति देवताओ ने अनेक वर्षो तक तप भागवतपुराण मे बताया गया है कि भगवती लक्ष्मी के कृपाकटाक्ष की कामना से अल्पता होने पर अपकर्ष का तारतम्य बनता, किया । लक्ष्मी के कृपाकटाक्ष की बहुलता होने पर उत्कर्ष का तारतम्य तथा उनकी नष्ट हो जाता है जिसके चरण के है । भगवान् विष्णु के उदरस्थल पर जिसके पदचिन्हो को देख कर वेदान्तशास्त्र का सशयके चरण की लाक्षा के चिन्ह से जिनका , ' अलक्तक से अकित भगवान् श्रीहरि की सर्वोकृष्टता को वेदान्त निश्चित करते है लक्ष्मी है । केवल एक नारायण ही उस समय,, वक्षस्थल अलकृत है वही वास्तव मे वेदान्त ज्ञेय परमतत्व है यह निश्चित हो जाता श्रुति मे बताया गया है कि, ( ) ' विद्यमान थे ब्रह्मा और शिव की उस समय प्रलयावस्था मे स्थिति नही थी ऐसा कहने के बाद और वही जगत् की 'आदि पुरुष नारायण ने सकल्प किया कि मैं एक से बहुत हो जाऊँ' । इस तरह से नारायण ही पुरुषपदवाच्य है सृष्टि करने वाला हैं, इतना बताने के बाद इसको 'सहस्रशीर्षा ' आदि स्वरूप वाला बताकर कहागया है कि नारायणयह भगवान्, पुरुष आदि शब्दो मे बोधित होने वाला, सहस्रशरीर पाद आदि से युक्त, विश्वशरीर, मोक्षप्रद, महामहिमाशाली है । यह सारे विश्व को सबसे श्रेष्ठ है । इसके एक पाद के रूप में यह सारा जगत् है और यह स्वय त्रिपाद ऐश्वर्य से संपन्न अन्धकार से आक्रान्त करके अवस्थित है । इसीके शरीर के विभिन्न अवयवो से सारे चराचर जगत् की उत्पत्ति होती है नही। यह। इस अवतार से परे है । सभी नाम और रूप का व्याख्याता यही है । इसका जन्म स्वेच्छा से होता है, किही कर्मो के कारण है? इसके इत्तर मे | का प्रयोजन उसकी अपार करुणा ही है श्रुति मे यह सारा वैभव नारायण का वर्णित है । यह नारायण कौन है और वही उसको लक्ष्मी बताया गया है । अत इस इस प्रतिपादन से लक्ष्मीपति नारायण ही उपर्युक्त सभी प्रकार केकीचिन्ताओंवैभव से युक्तसे मुक्त हो जाता ,, परतत्व है ऐसा श्रोतागण अवश्य जान सकेगे इतना निश्चय हो जाने पर वेदान्तशास्त्र सभी प्रकार श्लोक में यही विषय है । इस प्रकार अन्ततः यह सिद्ध हो जाता है कि यह लक्ष्मी भी वेदान्तवेद्य ही है । ' यद्भ्रूभङ्गा ', प्रभृति वर्णित है । यद्यपि 'एको रुद्र:' प्रभूति श्रुति मे इतरनिषेधपूर्वक केवल रुद्र की ही प्रलयावस्था मे स्थिति बताई गई है और जैसे पुरुष- १