वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 151–160
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 151–160
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वेदार्थपारिजातः1 १० यदप्युक्तम्-'सायणेन तादृशं किमपि महत्त्वपूर्ण तत्त्व नोपदिष्ट यत् संस्कृताध्ययनेन प्राचीनसाहित्यावशेष भाषाविज्ञान सम्बन्धिविविध सिद्धान्तैर्न ज्ञातु शक्येत' इति, तदपि तुच्छम्, अनुक्तोपालम्भात् । य: पारम्पर्येण मन्त्रब्राह्मण त्मकं वेदमधीते, निरुक्तव्याकरणादिक व पारम्पर्येण पठति, त मायणभाष्यमन्तरा वेदार्थं न वेत्तीति को वक्ति? साय रीत्या त्वत्पप्रयासेनापि वेदार्थोंज्ञातुं शक्त्रत इत्येव तुच्यते । पारम्पर्यमन्तरा पाणिनीयं व्याकरणशास्त्र पातञ्जलभार मपि पौरस्त्याः पाश्र्चात्त्वा वा केऽपि नावगन्तु शक्नुवन्नीति तु निश्चप्रच निशङ्कं च वक्तु शक्यते, किमुत ऋदमित यदपि ' राथमहाशय ऋग्वेदार्थानाय सावकाराने भागे विपस्पति तद्रीत्या ऋग्वेदो न केवल भारतीयानामे i किन्तु समग्राया आर्यजातेग्रेन्थ ' इति " तदपि प्रमादविलनिनमेव निर्मूलत्वात् । केयमार्यजातिस्तत्र च कि प्रमाण व च तस्या एव तत्राधिकारः, समग्र मानवजातेरेव वा तत्र कथ नाधिकार इत्यस्य प्रश्नस्यासमाधानात् । वस्तुतस्त्वपो बेयत्वेन मन्त्रब्राह्मणानि वेदास्तेष्वन्यतमां प्रस्थ ऋग्वेद । सूनादीनि वैदिकसाहित्यानि तत्सम्बद्धानि । तद्रीत्योपनी एव वेदाध्ययनाधिकारिणः । उपनयन च ब्रह्मक्षत्रविशामेव विहितन्, नान्येषामिति कुत पापचतानामुपनयना। संस्कारहीनानां तत्राधिकारः । यदपि राथमहाशयो दविष्ठप्राचीनताया निर्जननिखरस्योपरि एकल एव स्थित ऋग्वेदस्य कठिन गूढाशस्पार्था निराधारतया तेरेव ज्ञातव्या इति वदति, तदपि निरर्थकमेव, विकल्पानुपपत्ते । कि दुर्बोधसूतमन्त्राप ??, मर्था दुर्बोधसूक्तमन्त्रैरेव कर्तव्या इत्यर्थ अन्यसूक्तमन्त्रैर्वा तदथाः कर्तव्या इति वा नाद्यः दुर्बोधसूक्तादयः स्व दुर्बोधाश्चेत् कथ तह तैर्दुर्बोधसूक्तादिज्ञान सभवति? सूकान्तरंपचेत्तदापि कि तत्सम्बद्धेस्तदर्थबोधसूक्तमामान्यैर्वा ' सायण ने ऐसी कोई महत्त्व की बात नही बताई जो हमे संस्कृत के अध्ययन से तथा प्राचीन साहित्य के अवशेषो और भाषा-विज्ञान संबन्धी विविध सिद्धान्तो के सहारे स्वयं नमझ में न आये' (पृ० ५१-५२) | यह कथन भी तुच्छ है, क्योकि सायणभा पर यह जबर्दस्ती का आरोप है । जो परम्परा से मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद को पढता है और निरुक्त, व्याकरण प्रभृति को परम्परा पढता है, वह सायण भाष्य के बिना वेदार्थ को नही जान सकता, ऐसी बात कौन कहता है? हमारा केवल इतना ही कहना है सायण भाष्य की पद्धति से थोड़े से प्रयास से वेदार्थ जाना जा सकता है । बिना परम्परा के पाणिनीय व्याकरणशास्त्र और पातंज महाभाष्य को भी sror या पाश्चान्य कोई भी विद्वान् नही समझ सकतं, यह बात निश्चयपूर्वक निःशंक कही जा सकती है, ऋग्वेद की तो बात ही दूसरी है । 'ऋग्वेद का अर्थ करने लिये रॉय ने इन भाष्यकारो को एक तरफ रख दिया । कारण, ऋ भारतीयों का ही नहीं, बल्कि समग्र आर्य जाति का ग्रन्थ है' ( पृ० ५२ ) यह कथन भी निराधार और प्रमाद से भरा है । यह अ जाति नाम की क्या वस्तु है? इसकी सत्ता में क्या प्रमाण है? वेदो पर केवल आर्य जाति का ही क्यो अधिकार है? समग्र मान जाति का अधिकार उन पर क्यो नही नाना जायगा? इन सब प्रश्नो का कोई समाधान सुलभ नही है । वस्तुतस्तु मन्त्रब्राह्मणात्म वेदराशि अपौरुषेय है । उसी का एक ग्रन्थ ऋग्वेद है । सून प्रभूति वैदिक साहित्य भी उससे संबद्ध है । इन सबके अनुसार उपनय संस्कार से संपन्न व्यक्ति ही वेद के अध्ययन का अधिकारी है । उपनयन संस्कार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का ही विहि है, अन्य का नही । इस परिस्थिति मे उपनयन संस्कार से रहित पाश्चात्य विद्वानो का वेदो के अध्ययन में कैसे अधिकार मा जा सकता है? "राय महाशय का यह भी कहना है-'वह अत्यन्त दविष्ठ प्राचीनता के निर्जन शिखर के ऊपर एकदम अकेला ख हुआ है । ऋग्वेद के कठिन और गूढ अंशो के संबन्ध में यही कहा जा सकता है कि उनका अर्थ उन्ही के द्वारा निराधार रूप मे क ' " चाहिये' ( ५०५२ ) यह कथन भी निरर्थक है, क्योंकि इस विकल्प का उनके पास कोई उत्तर नही है कि क्या दुर्बोध सुक्तों का, म का अर्थ दुर्बोध सूक्तो और मन्त्रो की सहायता से किया जाय अथवा अन्य सूक्तों और मन्त्रों की सहायता से किया जाय? इनमें पहल पक्ष इसलिये नही बनेगा कि दुर्बोध सूक्त और मन्त्र यदि स्वयं दुर्बोध हैं तो उनकी सहायता से दुर्बोध सूक्तादि का ज्ञान कैसे हो सकत हैं? यदि सूक्तान्तर अथवा मन्त्रान्तर की सहायता से इसका बोध माना जाय, तो वे उससे संबद्ध अर्थ के बोधक होते हैं या सामान
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वेदार्थपारिजात १०५२ नान्त्योऽसम्बन्धात् । नाप्याद्यस्तथात्वे तद्व्याख्यानभूतसूक्तान्तरलाभे दुर्बोधतानापत्तेः । सामान्येन सजातीयज्ञान सजातीयज्ञानान्तरे सहकारितामापद्यत एव । यदपि - 'भारतीयभाष्यकारशब्देर्वेदः स्वज्योतिषैव स्वयं व्यज्यते' इति, तदपि न, तथात्वे सूर्यादिवत् स्वज्योतिषैव वेदार्थस्य समानत्वे दुर्बोधताकथनासङ्गतेः । लौकिका वैदिकाः सर्वेऽपि शब्दाः स्वमहिम्नेव स्वार्थबोधका भवन्त्येव, तथापि शक्तिग्रहापेक्षा तत्र भवति, अत्यन्तशक्तिग्रहानपेक्षत्वे जनसामान्यस्यापि वेदार्थज्ञत्वापत्तेः । यदपि राथ एकः सुयोग्यो यूरोपवासी ऋग्वेदस्य सत्यार्थावगमे कस्यचिद् ब्राह्मणभाष्यकारस्यापेक्षयाऽधिकं सक्षम:, तन्निर्णयस्येश्वरवादिपरम्परयाऽनिगडितत्वात् । तस्य सविधे भाषाप्रकृतिमानदण्डस्य विद्यमानत्वाच्च । तस्य बौद्धक्षितिजस्याधिक विस्तृतत्वाद् वैज्ञानिकरीत्या भासमानत्वाच्च शास्त्रज्ञताबलवत्त्वाच्चेति । तदपि बालचापलमेव 3 हेतूनामाभाससमानयोगक्षेमत्वात् । अन्यथा ईसायीजनापेक्षया नास्तिकाना भाषाविज्ञानवतामेव वायवलविज्ञानवत्त्वापत्तेः । यदीश्वरवादिपारम्पर्यसंस्कारो वेदार्थज्ञाने वाघकस्तर्हि नास्तिक्यसस्कारस्य वेदार्थनिर्णये बाधकत्वमेव कुतो न स्यात्? वस्तुतस्तु क्रिया पुरुषतन्त्रा भवति ज्ञान तु वस्तुतन्त्रम् । यद्यास्तिक्यनास्तिक्यनैरपेक्ष्येण शब्दः स्वार्थमावेदयति, तर्हि ब्राह्मणत्वभारतीयत्वाभ्यामेव किमपराद्धम्? सिद्धान्ते तु निरवद्यचक्षुरुदयापि मच्छेविषया मतियथा पुरुषापराधमलिना सती फलाय न कल्पते, तथैवासम्भावनाविपरीतभावनादिमलिना निर्दोषवेदजनितापि मतिरात्मादिविषयिणी भ्रान्ति न निवर्तयति । रागद्वेषाभिनिवेशादयो न कम्बलादिवदावरकाः, किन्तु भावना-, ' यामेव बाधका भवन्ति न पदार्थज्ञाने । तस्मादेवास्तिकनास्तिका उभावप्यविशेषेणैव अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इति वाक्यश्रवणेन विदितपदतदर्थों कार्यकारणभावमग्निहोत्रहोमस्वर्गयोर्ज्ञातुं प्रभवतः । विषयाबाधात् अर्थ के बोधक होंगे? यहाँ पर अन्तिम पक्ष स्वीकार नही किया जा सकता, क्योकि सामान्य अर्थ का इनसे कोई संबन्ध नहीं है । प्रथम पक्ष भी इसलिये नही माना जा सकता कि यदि एक सूक्त के अर्थ का व्याख्यान करने वाला अन्य सूक्त विद्यमान है, तो उसके अर्थ की दुर्बोधता कैसे मानी जा सकती है । सामान्य रूप से सजातीय का ज्ञान सजातीय ज्ञानान्तर का सहायक हो जाता है । 'एक भारतीय भाष्यकार के शब्दो में कहा जा सकता है कि वेद अपनी ही ज्योति से स्वयं प्रकट होने वाला है' ( पृ० ५२ ) यह कथन भी गलत है, क्योंकि सूर्य के समान यदि अपनी ज्योति से ही वेदार्थ प्रकाशित होता है, तो फिर उसको दुर्बोध कैसे माना जा सकता है? लौकिक और अलौकिक सभी शब्द अपनी महिमा से ही स्वार्थ के बोधक होते है, तो भी वहाँ पर शक्तिग्रह की अपेक्षा रहती है । शक्तिग्रह की अत्यन्त अनपेक्षा मानने पर सामान्य जन को भी वेदार्थ का ज्ञान क्यो न होने लगेगा? राय ने तो यह अभिप्राय प्रकट किया है कि एक सुयोग्य यूरपवासी ही ॠग्वेद का सच्चा अर्थ समझने में किसी भी ब्राह्मण भाष्यकार की अपेक्षा कही अधिक क्षम है । कारण, उसका निर्णय ईश्वरवादी परम्परा से जकड़ा हुआ नही है, उसके पास भाषा की प्रकृति का मापदण्ड है । उसका बौद्धिक क्षितिज कही अधिक विस्तृत और वैज्ञानिक रीति से भासमान है । शास्त्रज्ञता का बल उसके पास पर्याप्त है' ( पृ० ५२ ) । यह कथन बालचापल मात्र है, क्योंकि यहाँ पर दिये गये सभी हेतु गलत हैं । अन्यथा ईसाई धर्म के अनुयायियों की अपेक्षा नास्तिक व्यक्तियो को ही बायबल के अर्थ का सही ज्ञान है, यह भी कोई कहने लगेगा । यदि ईश्वर- वादी परम्परा का संस्कार वेदार्थ के ज्ञान में बाधक है, तो उसी तर्क से नास्तिकता के संस्कार को वेदार्थ के ज्ञान में बाधक क्यों न माना जाय? सही बात यह है कि क्रिया पुरुष के अधीन होती है और ज्ञान वस्तु के अधीन होता है । यदि आस्तिकता और नास्तिकता का विचार किये बिना शब्द निरपेक्ष रूप से अपने अर्थ का बोधन करता है, तो ब्राह्मणत्व और भारतीयत्व ने ही क्या अपराध किया है कि वेद के सही अर्थ का बोध इनको न होकर पाश्चात्यों को होगा? हमारे सिद्धान्त के अनुसार तो निर्दोष चक्षुरिन्द्रिय से उत्पन्न 'मच्छे' विषयक बुद्धि पुरुष के किसी दोष से आवृत होने पर जैसे यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न नही करती, उसी तरह से निर्दोष वेद से उत्पन्न मति भी असंभावना, विपरीतभावना प्रभृति दोषो से मलिन हो जाने पर आत्मादि विषयक भ्रान्ति को नही दूर कर सकती । - राग, द्वेष, अभिनिवेश प्रभूति दोष कंबल आदि की तरह किसी के आवरक नही होते, किन्तु ये भावना में ही बाधक होते है, पदार्थ के ज्ञान में नही । इसी लिये आस्तिक और नास्तिक दोनो ही समान रूप से ' अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम:' इस वेदवाक्य के सुनने के
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वेदार्थपारिजातः १०५३ प्रमाणदोषानवगमाच्चाप्रामाण्यमपि न निश्चेतुं प्रभवतः । भाषाविज्ञानमात्रेणार्थावगमश्चेदसंस्कृतज्ञानामपि वेदार्था-वगमः स्यात् । भाषासाम्यस्य वेदार्थावगमेऽहेतुत्वमुक्तमेव । बौद्धिकक्षितिज विस्तारस्य न पाश्चात्त्येष्वेव योगः, भारतीये ष्वपि तत्सत्त्वात् । विज्ञानमात्र तु सर्वत्रैव समानम् । भौतिकविज्ञानमपि न भारतीयेष्वल्पम्, भारतोच्छिष्टविज्ञानस्यै वान्यैरुपजीव्यमानत्वात् । यथा शिल्पादिज्ञानं वेदार्थज्ञानम् अल्पमेवोपकरोति, तथैव भौतिकविज्ञानमपि । शास्त्रज्ञता तु पारम्पर्याभावात् पाश्चात्त्येषु सीमितव । भारतीयेषु पारम्पर्येण वेदाध्ययनतदर्थज्ञानानुष्ठानसत्त्वेन व्याकरणनिरुक्त पूर्वोत्तरमीमांसादिवेदार्थनिर्णयसंस्काराधिक्यम् । पाश्चात्त्येषु च तदभाव एव । ते चैकमपि मन्त्रं सस्वर शुद्धमुच्चार-यितुमपि न प्रभवन्ति । मीमासाज्ञानमपि तेषां दुर्घटम् । राथः पारम्पर्यहीनत्व भारतीयवेदभाष्यकारेष्वा-, रोपयति परन्तु पूर्वोक्तनीत्या पारम्पर्यं साधितमेव । पाश्चात्त्येषु तु पारम्पर्य कल्पयितुमपि न शक्यते । ब्राह्मणानि सूत्राणि मन्त्राणां नेदिष्ठानीति तु पाश्चात्त्यैरपि मन्यते । यदि तेष्वपि पारम्पर्यं नासीत्, तर्हि पाश्चात्त्येषु तु दूरतोऽपि पारम्पर्यसम्बन्धो नास्ति । तस्माद् यूरोपनिवासी मन्त्रार्थमवगन्तु ब्राह्मणभाष्यकारापेक्षयाऽधिक क्षम इति मनोरथमात्रमेव । यदपि ' राथेन ऋग्वेदादेवंविधाः सर्वेऽशाः पृथक् संकलिता य आकारेण समाना इवाभान्ति । व्याकरणेन निर्वचनेन च तेषां तुलनात्मकमध्ययन कृतम्, परन्तु परम्पराप्राप्तोऽर्थो न तथाऽनुशीलित इति संभाव्यते । एवं संस्कृतस्य माध्यमेन ऋग्वेदस्यैतिहासिकरीत्याऽध्ययन कृतम् । पश्चात्तयैव पद्धत्या भाषाविषययोर्दृष्ट्या ऋग्वेदसाम्यापन्नस्य न केवल मवेस्ताग्रन्थस्याध्ययनं कृतम्, किन्तु भाषाविज्ञानाश्रिताः सिद्धान्ता अपि तत्रोपयोजिताः, ये भारतीयाना भाष्यकाराणां बाद उसके पदो और उनके अर्थों को जानकर अग्निहोत्र और होम का कार्यकारणभाव जानने में समर्थ हो जाते है । विषय का बाध न होने से और प्रमाण में किसी दोष की भी उपलब्धि न होने से वे अप्रामाण्य का निश्चय भी नही कर पाते । भाषाविज्ञान मात्र से यदि वेद के अर्थ की अवगति होती हो तो वह संस्कृत न जानने वाले व्यक्ति को भी होनी चाहिये । भाषा के साम्य को वेदार्थ की अवगति में कारण नही माना जा सकता । बौद्धिक क्षितिज का विस्तार केवल पाश्चात्य विद्वानो के साथ ही जुटा हो, ऐसी बात भी नही है, क्योंकि यह प्रतिभा भारतीयों में भी विद्यमान है । विज्ञान मात्र सर्वत्र समान है । भौतिक विज्ञान का विकास भी भारतीयों में कम नही हुआ है । भारतीयों के उच्छिष्ट विज्ञान का ही दूसरो ने सहारा लिया है । जैसे शिल्प प्रभृति विज्ञान वेदार्थ के ज्ञान के लिये ज्यादा सहायक नही हो सकता, उसी तरह से भौतिक विज्ञान भी इसमें अधिक सहायक नही हो सकता । परम्परा के अभाव में पाश्चात्यों की शास्त्रज्ञता सीमित ही मानी जायगी । भारतीयों मे परम्परा से वेद का अध्ययन और उसके अर्थ का ज्ञान तदनुसार अनुष्ठान की प्रवृत्ति विद्यमान है और व्याकरण, निरुक्त, पूर्व और उत्तर मीमासा की सहायता से वेदार्थ का निर्णय करने के संस्कार भी इनमें अधिक है । पाश्चात्यो में इन सबका अभाव है । वे वेद के एक मन्त्र का भी शुद्ध सस्वर उच्चारण कर सकने में असमर्थ है । इनके लिये मीमासा का ज्ञान कर पाना भी बड़ा कठिन है । राथ1 भारतीय वेदभाष्यकारो पर परम्परा के अभाव का मिथ्या आरोप करते हैं, परन्तु हमने पूर्वोक्त पद्धति से वेदभाष्यकारो में प्राचीन काल से चली आ रही अनुस्यूत परम्परा को सिद्ध कर दिया है । पाश्चात्य विद्वानों में इस प्रकार की परम्परा की कल्पना भी नही की जा सकती । ब्राह्मण और सूत्रग्रन्थ मन्त्रो के बहुत समीप है, इस बात को पाश्चात्य विद्वान् भी मानते है । यदि उनमें भी परम्परा विद्यमान न थी तो पाश्चात्यो में तो सुतरा इस परम्परा का नितान्त अभाव मानना पड़ेगा । इसलिये यूरोपीय विद्वान् ब्राह्मण भाष्यकारों की अपेक्षा मन्त्रार्थ को समझ पाने में अधिक समर्थ है, यह कहना मनोरथ मात्र है । ' राय ने इसी कारण ऋग्वेद से ऐसे सब अंश अलग छांटे जो विषय और आकार में लगभग इक सा दीख पड़े और प्रकरण, व्याकरण और निर्वचन की ओर ध्यान देते हुए उनका तुलनात्मक अध्ययन किया; परन्तु संभवतः उन्होंने पारम्परिक अर्थ की ओर समुचित ध्यान नही दिया हो । इस तरह उन्होंने संस्कृत भाषा के दायरे में ही ऋग्वेद का ऐतिहासिक रीति से अध्ययन किया । इसके पश्चात् उन्होंने तुलनात्मक पद्धति की भी सहायता ली और भाषा तथा विषय में ऋग्वेद से बहुत कुछ मिलती-जुलती अवेस्ता का ही नहीं, अपितु तुलनात्मक भाषाविज्ञान से बने हुए सिद्धान्तों का भी उपयोग किया, जिनका सहारा भारत के प्राचीन टीकाकारों
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वेदार्थपारिजात II: I नोपलब्धा आसन् । एकैकस्य शब्दस्य सम्यङ्निर्वचनं कृत्वा राथेन वैदिकसंहितानां वैज्ञानिकार्थनापनपद्धतिविकास नीता । राथ- वोहलिक सस्कृतशब्दकोषरूपेण तस्या एव परिणति । सप्तभिर्भागं स ग्रन्थः १८५२ ईसवीयकाले प्रकाशितः । वैज्ञानिकार्थजिज्ञासुभिरद्यापि न पद्धनिरङ्गीक्रियते' (पृ० ५२ ) इति, तदपि यत्किञ्चित् भाषान्तरीय- वाक्यार्थनिरूपणे भाषान्तरीयशब्दानामुपयोगे नान्निसम्भवस्यैव बाहुल्येन दर्शनात् । तच्च 'गिरिजा' 'गिर्जा' ' अहमन्नाद' 'अहमद् नाद' इत्यादिस्थलेषु । तथापि यदि दुरुद्देश्यना दोषो न स्यात्तदाऽस्य परिश्रमस्तु प्रशसनीयः । विज्ञानमपि न भारतीयविदुषां कृते नवीनम् । शिल्पज्ञानात्मकं विज्ञानमनुभवयुक्त ज्ञानं विज्ञान वा, उभयोरपि भारतीयैरधिगतत्वात । कलारूपेण विविधभाषाज्ञानमपि भारतीयैर्बहोः कालाद् ज्ञायते स्म । यदपि -- 'नवीनपद्धत्या वैदिकमाहित्येषूपस्थिनानेकग्रन्थिनिवारण आश्चर्यमयी प्रगतिजीता, अल्पसख्याकाना पाश्चात्त्यविदुषां प्रयासात् । तेनैतिहासिकप्रतिभया भारतीयप्राचीनसाहित्यस्य हार्दजाने पर्याप्तं साफल्यमधिगतम | यद्भारतवासिनां विदुषामस्तव्यस्नार्थकरगेत युगेष्यनिरोहितमासोत् । तूनमध्यानिविदुषा कृतेऽद्यापि कर्तव्यमवशिष्यते, विशेषत सूक्ष्मसाङ्गोपाङ्गान्वेषणे । इदं च वैदिकाध्ययन पश्चाशद्वार्षिकम् । अन्यत्र हिब्रूविद्वद्भिरनेका. शनी परि श्राम्यद्भिरपि वायवलस्य पूर्वभागीयाध्यायानान्द्यापि विवादग्रस्तानि विषमस्थलानि मन्यन्ते । तून तात्या विषम- स्थलानि यान्यद्ययावदममाहितानि नैविद्वद्भिः समाधात्यन्ते ये परशियासम्बन्धिन्यः कोलाकुनयो लिपया भारतीयशिला- लेखाश्च पठितुं शिक्षिता: । दुर्बोधलिपीना निगूढभाषाम्वरूप च प्रत्यभिज्ञानम्' ( पृ० ५३ ) इति, तदपि यत्किचित्, विषयान्तरपाण्डित्यस्य विषयान्तरेऽत्यल्पोपकारकत्वेनाव्यापारेषु व्यापारत्वाविशेषात । यथा भारतीयानां वेदार्थाविषये को उपलब्ध न था । एक एक शब्द का ठीक-ठीक निर्वचन कर रॉय ने वैदिक महिनाओ के वैज्ञानिक अर्थ निकालने की नींव खडी की, जो कि 'रॉथ और बोहलिंग कम संस्कृत शब्दकाश के रूप में परिणत हुई । यह सान भागो का ग्रन्थ सन् १८५२ ई ० से सन् १८७५ ई० बीच प्रकाशित हुआ । आज वेद को वैज्ञानिक ढंग से समझने की चेष्टा करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी रॉय की पद्धति को अपनाता है' ( पृ ० ५२) । यह कथन भी केवल इधर-उधर हाथ मारने के समान है, एक भाषा के वाक्यार्थ के निरूपण के लिये दूसरी भाषा के शब्दो का उपयोग करने से भ्रान्ति पैदा हो जाने को हो अधिक संभावना रहती है । 'गिरिजा' शब्द का 'गिर्जा' से सम्बन्ध जोडा जाय अथवा 'अहमन्नाद' शब्द का 'अहमद नाद' अर्थ किया जाय तो वहाँ पर यही स्थिति होगी । इतना होने पर भी यदि इनका उद्देश्य बुरा न हो तो इस तरह के परिश्रम की प्रशंसा करनी ही पडेगी । विज्ञान भारतीयI विद्वानो के लिये कोई नई बात नही है, शिल्पज्ञानात्मक विज्ञान हो, अथवा अनुभवात्मक विशेष ज्ञान रूप विज्ञान हो, इन दोनों का भारतीयों को पर्याप्त ज्ञान था । कला के रूप में विविध भाषाओं के ज्ञान को भी भारतीय विद्वान् बहुत पहले से जानते रहे हैं । 'इन सिद्धान्तों को लक्ष्य में रखते हुए वैदिक साहित्य मे उपस्थित अनेक ग्रन्थियों के सुलझाने में जो प्रगति हुई है, वह आश्चर्यजनक है, विशेष कर जब इस ओर ध्यान दें कि कितने थोडे विद्वानो ने मिलकर इस कार्य को किया । इसका साधारण परिणाम यह हुआ कि इस ऐतिहासिक प्रतिभा ने भारत के प्राचीन साहित्य का हृदय समझने में काफी सफलता प्राप्त की, जो भारतवासियों के उलट-पुलट अर्थ करने के कारण युगों से तिरोहित हो गया था । निश्चय ही विद्वानों की आती हुई पीढ़ियों के लिये बहुत कुछ काम करना शेष है, विशेषतः सूक्ष्म एव सागोपाङ्ग अन्वेषण के सम्बन्ध में स्मरण रहे कि वैदिक अनुसन्धान पिछले पचास वर्षों की ही उपन है, जहाँ कई शताब्दियों तक अनेक हिब्रू विद्वानो के परिश्रम करने पर भी आज वायबल के पूर्वभाग के अध्यायो मे अनेक स्थल ऐसे हैं जो अगम्य एवं विवादग्रस्त है । निःसन्देह वे सब ग्रन्थियाँ जो अभी तक नही सुलझी थी, वे वर्तमान विद्वानो के द्वारा अवश्य सुलझाई जा सकती हैं, जिन्होंने परशिया की कीलाकृति लिपि और भारत के शिलालेखो को पढना सीख लिया है और इन दुर्बोध लिपियों में निगूढ भाषा का स्वरूप पहचान लिया है' ( पृ ० ५३ ) | यह भी इधर- उधर की उडान मात्र है, विषयान्तर का पांडित्य विषयान्तर के लिये अधिक उपयोगी नही हो सकता, यह सारा व्यापार उसी तरह से अहितकर हो सकता है, जैसा कि पञ्चतन्त्र की कीलोत्पाटक
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बेदार्थपारिजातः १०५५ क्वचिन्मतान्तराणि दृश्यन्ते तथैव पाश्चात्यविचारेष्वपि वैमत्यदर्शनेन सर्वसम्मत्या विवादग्रस्तार्थाना वेदसूक्तानी हार्दावगमस्य वक्तुमशक्यत्वात् । मोमासकदृष्ट्या तु वैज्ञानिकम्मन्यानां वेदार्था आभाससमानयोगक्षेमा एव । अत एवान्ते मैकडानलोऽप्यङ्गीकरोति - 'तथापि भारतीयपरम्पराया उपयोगोऽद्यान्यपद्धत्यपेक्षयाऽऽधिक्येन क्रियते' ( पृ ० ५२ ) इति । दुर्बोधलिप्यध्ययनतद्विषये साफल्ये सत्यपि वेदार्थज्ञानविषये तादृशी शिक्षा पङ्गप्रायैव । यदपि ऋग्वेदस्वरूपशीर्षकेण विद्वत्तास्वर्णकुञ्चिकया वेदमन्दिरद्वारोद्घाटनेन वेदार्थवर्णन प्रस्तुत्योक्तम्-- ' ऋग्वेदस्याधिका अशा धार्मिकसूक्तं पूर्णा । केवल दशममण्डले ऐहिक विषयाणि सुक्तानि । मुख्यतया तत्रत्यानि सूक्तानि वैदिकदेववर्गीया नैकविधा देवताः सम्बोध्य विरचितानि । तत्र देवताना पराक्रमा महत्त्व कृपालुत्व च वणि- तानि । यत्र देवताभ्यो गोधनपुत्रधनाभ्युदयदीर्घायुष्ट्वशत्रुविजयादीनि याच्यन्ते स्म । एतद्देशीयसंस्कृताध्ययनपरि- पाट्या ऋग्वेदो महता कौशलेन निर्मितानां सूक्ताना विशाल: सङ्ग्रहोऽस्ति । स च सोमयागसहकारी यत्र घृतं हूयते ॥ सोमयागविधानं न तादृश सरल यथा कदाचिन्मान्यतासीत् तथापि ब्राह्मणकालप्रचलित सविस्तरयाज्ञिकपद्धत्यपेक्षया निःसशय सरलमासोत्' इति, तत्तु बालचापलमेव, भावानवबोधात् । तथाहि कोऽयं धर्मः कि च तल्लक्षणम्? कथ च सूक्तेषु धार्मिकत्वमिति ज्ञात्वैव सूक्तार्थनिरूपण सुशक स्यात् । ब्राह्मणेभ्योऽन्यत्र यागानां स्वरूपविधान क्वोपलभ्यते? कि मन्त्रेषु किमपि यागविधान वर्णयितुं शक्यते? घृतं कथ हूयते? कीदृशेऽग्नौ हवनम्? निमंन्त्रक समन्त्रकं वा? हवने मन्त्रोच्चारणस्य कि प्रयोजनम्? कि च तत्प्रयोजनसिद्धी प्रमाणम्? यागयज्ञयोश्च को भेदः? पारम्पर्यज्ञानशून्या राथ- प्रभृतयः पाश्चात्त्या नात्र किमपि वक्तु शक्नुवन्ति । वस्तुतस्तु मीमासकाना मन्त्रब्राह्मणात्मके वेदे ब्राह्मणेष्वेव यज्ञादि - वार की कथा में वर्णित है । जैसे भारतीय विद्वानो के वेदार्थ के सम्बन्ध में अनेक मत-मतान्तर है, उसी तरह से पाश्र्चात्य विचारों में भी विभिन्नता देखने को मिलती है । इस तरह से हो वैदिक सूक्तों के विवादग्रस्त स्थलों का सर्वसम्मत निगूढ अभिप्राय भी समझ में आवेगा ही नही । मीमासक की दृष्टि से तो वैज्ञानिक बनने का दम्भ भरने वाले यूरोपीय विद्वानो का किया गया अर्थ मात्र कल्पना- प्रसूत है । इसीलिये अन्त मे मैकडानल को भी स्वीकार करना पड़ता है— ' तथापि भारतीय परम्परा का उपयोग आज उससे कही अधिक किया जाता है, जितना रॉय ने किया था' ( पृ० ५२ ) । दुर्बोध लिपि के अध्ययन के विषय में सफलता मिल जाने पर भी वेदार्थ के ज्ञान के विषय में इस तरह की शिक्षा लगडी ही मानी जायगी । 'ऋग्वेद का स्वरूप' यह शीर्षक देकर कहा गया है कि-'वैदिक विचार सीमा के निकट पहुंच जाने पर अब हम उस मन्दिर के द्वार मे प्रवेश कर सकते हैं, जो कि विद्वत्ता को स्वर्णतालिका से उद्घाटित किया गया है । ऋग्वेद का अधिकाश धार्मिक सूक्तो से भरा हुआ है । केवल दशम मण्डल में ही कुछ रचनाएँ ऐहिक विषयों पर है । ॠग्वेद के सूक्त मुख्यतः वैदिक देववर्ग के विभिन्न देवताओ को संबोधित किये गये है । इनमें उनके पराक्रम, उनकी महत्ता तथा उनकी कृपालुता का वर्णन है, जिनसे गोधन, पुत्रधन, अभ्युदय, दीर्घायु और शत्रुविजय के लिये याचना की गई है । वास्तव में ऋग्वेद प्राथमिक लोकगीतों का संकलन नही, जैसा कि इस देश मे संस्कृत अध्ययन करने की परिपाटी में समझा जाता है । ऋग्वेद बड़ी कुशलता के साथ निर्मित सूक्तो का विशाल संग्रह है, जिसकी रचना एक निष्णात याज्ञिक वर्ग ने की । ऋग्वेद सोमयाग का साथी है, जिसमें घृत की आहुति अग्नि में दी जाती है । इसकी विधि इतनी सरल नही, जैसा कभी मानी जाती थी । जो भी हो, वह ब्राह्मण काल में प्रचलित सविस्तर याज्ञिक पद्धति की अपेक्षा निःसन्देह सरल है' ( पृ० ५३-५४ ) यह सब बच्चों की सी बातें हैं, पाश्चात्य विद्वानो को वेदों का मोटा अभिप्राय भी समझ में नही आया है । यह धर्म क्या है? इसका क्या लक्षण है? सूक्तों में धार्मिकता कैसे है? इन सबको जान लेने पर हो सूक्तो का अर्थ सरलता से किया जा सकता है । ब्राह्मण ग्रन्थों के सिवाय यज्ञ-यागादि के स्वरूप का विधान अन्यत्र कहाँ मिलता है? क्या मन्त्रो में कहो पर भी याविधि का वर्णन बताया जा सकता है । घृत का हवन कैसे किया जाता है? किस तरह की अग्नि में हवन किया जाता है? हवन मन्त्र के साथ किया जाता है, अथवा बिना मन्त्र के? हवन करते समय मन्त्र का उच्चारण करने का क्या प्रयोजन हैं? उस प्रयोजन की सिद्धि इससे होती ही है, इसमें क्या प्रमाण है? याग और यज्ञ मे क्या अन्तर है? इन सब प्रश्नो का उत्तर भारतीय परम्परा के ज्ञान से सर्वथा शून्य राथ प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् कुछ भी नही दे सकते । वस्तुतस्तु मीमांसको को दृष्टि के अनुसार मन्त्र-
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वेदार्थपारिजातः १०५६ विषयः सन्ति । तान्येव विधायकानि, मन्त्रास्तु विधेयाः । यज्ञानुष्ठानापेक्षितद्रव्यदेवतास्मारकत्वेन नियमादृष्टार्थं मन्त्रा विनियुज्यन्ते । ब्राह्मणैः सूक्तं: पारम्पर्यपद्धत्या च यागस्वरूपज्ञानवन्तः सुशिक्षिता ऋत्विजो ब्राह्मणा एव ताननुतिष्ठन्ति । , यदपि च पुनः पुनर्यज्ञियाग्निसोमयोर्द्वयोर्देवतयोः स्तवनेन सुक्तानां सौन्दर्यं नष्ट जातम् तच्च परिस्थित्यालोचनेन स्वाभाविकमिव भवति । देवतास्तु प्रायेण प्राकृतिकवस्तूनां मूर्तरूपा एव, अत एवानेकस्थलेष्वतीवो -दात्तरूपकाणि मनोहारिण्यः कल्पनाश्च प्रयुज्यन्ते । सुक्तानां भाषा: सरलास्तत एव तत्रालङ्कारिकताया भारो न लक्ष्यते । समासाभावात् समस्तपदानां भारोऽपि तत्र नास्ति । लौकिकसंस्कृते तु बृहत्समासबाहुल्य दृश्यते । सूक्तेषु प्रतिपाद्यविषयाणां साक्षाद्वर्णनात्तत्र गूढार्थता नास्ति । क्वचिद्देवतास्वरूपवर्णने रहस्यमयानि रूपकाण्यालङ्कारिकता चाङ्गीकृतानि । विषयस्य सङ्कचितत्वाद् याज्ञिकवर्गेरवश्यं प्रयत्नः सम्भाव्यते यत्संक्षिप्तपदैरेकैव कल्पनाऽऽनेकधाऽवयेत ' ( पृ० ५४ ) इति, तदपि न युक्तम्, अभिमतदेवस्तवस्य सौन्दर्याव्याघातकत्वात् । प्राकृतवस्तूनां मूर्तरूपा देवता इत्यप्य- शुद्धम्, प्राकृतिकवस्तूनामपि मूर्तत्वाविशेषात् । यदि तु मूर्तशब्देन विग्रहवत्त्वमभिप्रेयते तदा तु युक्तमेव । देवताधिकरणे बादरायणेन देवाना विग्रहवत्त्वप्रतिपादनात् । तदैव चेतनावद्द्भ्य ऐश्वर्यशालिभ्यो देवेभ्योऽभीष्टप्रार्थनमपि युज्यते । रूपका अन्ये चालङ्कारा वेदमुपजीव्यैव प्रवर्तन्ते, तेन यथायोग्यं सारल्य वैषम्यं निगूढार्थत्वं च वेदेषु युक्तमेव । मन्त्रेषु ब्राह्मणेषु च सामान्यतया धर्मब्रह्मपरत्वाम्युपगमेऽपि ज्ञातव्यसर्वविषयसन्निवेशादेव सर्वविद्यास्थानमूलत्वं सर्वविद्योप- बृंहितत्वं च सङ्गच्छते । तस्मात् संकुचितत्वविषयत्वकल्पनमपार्थमेव । अत एवोक्तिवैचित्र्यवक्रोक्त्यभिरुच्यादय उत्तर- कालिकसाहित्येषूत्कृष्टरूपेणोपलभ्यमानाः सूक्तोपलब्धवक्रोक्त्यादिमूलका एवेति त्वयाऽप्यभ्युपगम्यते । अत एवोच्च-कोटिककाव्यरचनानिपुणता ऋग्वेदे सर्वत्रोपलभ्यत इति मैकडानलप्रभृतयोऽप्यङ्गीकुर्वन्त्येव । ब्राह्मणात्मक वेद में से याज्ञिक विधियों का वर्णन केवल ब्राह्मण भाग मे ही है । यज्ञानुष्ठान के लिये अपेक्षित द्रव्य और देवता के स्मारक के रूप में नियमादृष्ट की उत्पत्ति में मन्त्रो का विनियोग माना जाता है । ब्राह्मण और सूत्र ग्रन्थों तथा परम्परा के द्वारा भी याग के स्वरूप को जानने वाले सुशिक्षित ऋत्विक ब्राह्मण ही इनका अनुष्ठान कर सकते है । 'इसकी रचना की सुन्दरता बारंबार यज्ञो की ओर संकेत के कारण नष्ट हो गयी है । तथापि यह कहा जा सकता है कि उस समय की परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए वह स्थिति स्वाभाविक सी थी । देवता प्रायः प्राकृतिक वस्तु के मूर्तरूप है । इस कारण कई स्थानों पर बड़े उदात्त रूपक एवं मनोहर कल्पनाएँ प्रयोग में आ जाती हैं । सूक्तों की भाषा बहुधा सीधी- सादी और स्वाभाविक है । उस पर आलङ्कारिकता का बोझ प्रायः नही सा पाया जाता है । प्रायः समास के अभाव के कारण समस्त पदों का बोझ कम है । लौकिक संस्कृत में तो बड़े - बडे समासों का भारी बोझ पाया जाता है । सूक्तों में प्रतिपादित विषय का साक्षात् शब्दों द्वारा कथन है और उसमें कोई पेचीदापन नही । कही कही देवताओ के स्वरूप का वर्णन जहाँ पाया जाता है, वहाँ रहस्यमय रूपक और आलंकारिकता अपनाई गई है । विषय के संकुचित होने से याज्ञिक वर्ग को यह अवश्य प्रयत्न करना पड़ा होगा कि संक्षिप्त पदों के द्वारा एक ही कल्पना अनेक बार दुहराई जाय' ( पृ ० ५४ ) । यह कथन भी ठीक नही है, अभिमत देवता की स्तुति सौन्दर्य की नाशिका नही मानी जा सकती । देवता प्राकृत वस्तु का मूर्त रूप है, यह कथन भी गलत है, क्योंकि प्राकृत वस्तुएं भी समान रूप से मूर्त हैं । यदि मूर्त शब्द का अर्थ शरीरधारी आपको अभिप्रेत है, तो इसको तो हम भी मानते है । देवताधिकरण में बादरायण ने देवताओ को शरीरधारी माना है । उनके शरीरधारी होने से ही चेतना संयुक्त एवं ऐश्वर्यशाली देवताओं से अभीष्ट वस्तु को पाने की प्रार्थना उचित मानी जा सकती है । रूपक अथवा अन्य अलङ्कारो की प्रवृत्ति साहित्य में वेदों के सहारे से ही हुई है । इसलिये वेद में उचित स्थान पर सरलता, विषमता, निगूढार्थता आदि का रहना ठीक ही होगा । मन्त्र और ब्राह्मणो मे सामान्यतया धर्म और ब्रह्म का प्रतिपादन हुआ है, तो भी सभी ज्ञातव्य विषयों का यथोचित संनिवेश होने से वेद को सभी विद्याओ का मूल स्थान और इन सबकी सहायता से उपबृंहित माना जाता है । इस तरह से वेद कुछ संकुचित विषयों का ही प्रतिपादक है, यह कथन सर्वथा व्यर्थ है । इसीलिये उक्ति-वैचित्र्य, वक्रोक्ति प्रभृति परवर्ती साहित्य में उपलब्ध होने वाले उत्कृष्ट गुण वेदों के सूक्तो में उपलब्ध उक्तियों का हो अनुसरण करते हैं, इस बात को आपने भी स्वीकार किया है । इसीलिये उच्च कोटि की काव्यरचना का नैपुण्य ऋग्वेद में सर्वत्र उपलब्ध होता है, इस बात को मैकडानल प्रभूति पाश्चात्य विद्वान् भी मानते है ।
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वेदार्थपारिजातः १०५७ यदपि --'प्राकृतवस्तूना मानवीकरणपद्धत्या देवतारूपप्रदान यदन्यत्र साहित्येषु नोपलभ्यते तन्मानवजाति-विचाराणां प्रारम्भिकं रूपं सूक्ताख्यायिकाभिः प्रदर्श्यते । काभिश्चिद्देवताभिः सूक्तकारेभ्यः काव्यकलाप्रतिभा प्रदत्ता, परन्तु वेदानां स्वयं भासमानतासिद्धान्तसम्बन्धे ऋग्वेदरचयितृभिर्न किञ्चिदवबुद्धम् ( ५५ पृ० ) इति, प्राकृतपदार्थेषु मानवोचितकर्तृत्वरूपं दत्तमृषिभिरिति, तदपि तुच्छम् 'तस्मै नूनमभिद्यवे वाचा विरूप नित्यया । वृष्णे चोदस्व सुष्टट्तम्' (ऋ० सं ० ८।७५। ६ ), 'यज्ञेन वाचः पदवीयमायन् तामन्वविन्दन्तृषिषु प्रविष्टाम्' (ऋ० १०।७१।३ ), ‘ पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतद्वचुः' इत्यादिमन्त्रवर्णैर्वेदानां नित्यत्वस्वयभासमानत्व सिद्धान्तावगमवर्णनात् । अत एव सूक्तान्यृषिभी रचितानोत्यशुद्धमेव, मन्त्रद्रष्टृत्वेनैव ऋपित्वप्रसिद्धे • । तादृशेरपौरुषेयः सूक्तैर्देवतासम्बोधनान्मानवोचितव्यवहाराणा तासा विग्रहवत्त्व चेतनावत्त्वमैश्वर्यवत्त्वञ्च प्रतिपादितम् । तच्च तथैव प्रतिपत्तव्यमिति त्वत्कल्पना निर्मूलैव । यदपि ' प्रकृतिचेष्टाना बालस्वभावविस्मयेनावलोकनम्, यथा कश्चित् कविः पृच्छति सूर्यः कथमाकाशान पतति । तारा नक्षत्राणि ग्रहाश्च प्रतिदिनं क्व गच्छन्ति इत्यालोक्य कश्चिदाश्चर्यचकितो भवति । अन्यस्तु नदीनां जलानि सतत प्रवहमानानि समुद्रमुपयन्ति न च त पूरयितु पारयन्तीति चकितो भवति । सूर्यचन्द्रयोरपरिवर्तितां ---गतिमुषसोऽत्खलितमुदय च वीक्ष्य पुरातनानामृषीणां प्रकृतिचेष्टास्वेकरूपता भाति स्म । अयं नियमः 'ऋत' – शब्देन तेर्व्यवह्रियते स्म । यज्ञानुष्ठानविधिषु शाश्वतनियमेषु चायं शब्दः प्रयुज्यते स्म । ऋग्वेदस्य कथानकान्यपेक्षाकृतमानव-विकासस्यात्यन्तप्राथमिकावस्थां निर्दिशन्ति, तथापि पूर्वतनयुगच्छाया अपि तत्राङ्किता दृश्यन्ते । अवेस्ताग्रन्थ उपलब्धा अनेके सुसदृशाः सन्दर्भा इद प्रकटयन्ति यत्तदानीमनेका देवता ऊरीक्रियन्ते स्म यदा पारसीकानां भारतीयानां च पूर्वजाः समानस्थानवास्तव्या एकजातीयाश्चासन् । तासु देवतासु मृत्युदेवो यम उल्लेखनीयो यः स्वर्गाधिपतेर्यमाद -__ भिन्न' । तथा मित्रं यः पारसीकानां मिश्रनाम्ना प्रख्यातः । मित्रस्य मिश्रस्य वा रोमराज्ये २००-४०० ईसवीयवर्षेषु 'ऋग्वेद के सूक्तो और आख्यायिकाओ में प्राकृतिक पदार्थों को मानवोचित स्वभाव के अनुसार जिस तरह से देवता मान लिया गया है, वह अन्य किसी प्राचीन साहित्य में उपलब्ध नही है । यह मानव जाति के विचारो का प्रारम्भिक रूप है । कई देवताओ ने" यह सत्य है, सूक्तकारों को काव्य- कला की देन दो है, परन्तु वेदो को स्वयं भासमानता के सिद्धान्त के सम्बन्ध मे ऋग्वेद के रचयिता ऋषियो को बोध न था' ( १०५५ ), 'ऋषियों ने प्राकृतिक पदार्थो को मानवोचित कर्तृत्व का रूप दे दिया है' (पृ ० ५५ ), यह कथन भी सर्वथा तुच्छ है, क्योंकि 'तस्मै नूनममिद्यवे ', 'यज्ञेन वाच. पदवी ', ' पूर्वे पूर्वेभ्यो' इत्यादि मन्त्रपदो के द्वारा वेदो की नित्यता और स्वयं भासमानता का सिद्धान्त प्रतिपादित है । इसीलिये ऋषियों ने सूक्तो की रचना की, यह कथन गलत है, क्योकि ऋषिगण मन्त्रो के द्रष्टा के रूप मे ही प्रसिद्ध है । इस तरह के अपौरुषेय सूक्तो के द्वारा ये देवता सम्बोधित है, अतः इनमे मानवोचित व्यवहार, विग्रहवत्त्व, चेतनावत्त्व, ऐश्वर्यवत्त्व का जो प्रतिपादन मिलता है, उसको यथार्थ रूप मे ही स्वीकार करना पड़ेगा और तब आपकी कल्पना सर्वथा निर्मूल मानी जायगी । 'वह प्रकृति की चेष्टाओं को बालसुलभ विस्मय की भावना से देखता है । एक कवि प्रश्न करता है, 'क्योकर सूर्य आकाश से गिर नहीं पडता'? तो दूसरा इसी अचम्भे मे है ' रोज रोज तारे कहाँ जाते रहते हैं'? तीसरा तो इससे चकित है 'सकल नदियो का जल सन्तत बहता हुआ समुद्र मे गिरता है, पर उसको भर नही पाता' । सूर्य और चन्द्र की अपरिवर्तित गति, उषा के अस्खलित उदय जैसी बातों से इन पुरातन कवियों को प्रतीत हुआ कि प्रकृति को चेष्टा मे एकस्वरूपता है और उसका क्रम परिवर्तनशील नही । इस सामान्य नियम की प्राचीन महर्षियो ने 'ऋत' के नाम से प्रकट किया है, जिस शब्द का प्रयोग उन्होने पहिले यज्ञानुष्ठान की निश्चित विधि और उसके पश्चात् सुदाचार के शाश्वत नियमो के लिये किया । ऋग्वेद के कथानक अपेक्षाकृत मानव विकास को बहुत प्रारम्भिक अवस्था का निर्देशन करते हैं । तत्रापि यह स्पष्ट है कि उनमें और भी पूर्वतन युगो की प्रतिच्छाया अङ्कित है । अवेस्ता मे उपलब्ध अनेक सुसदृश सन्दर्भ यह प्रकट करते है कि अनेक देवता उस काल में भी माने जाते थे, जब पारसियों और भारतीयों के पूर्वज एक ही जाति के थे । ऐसे देवताओं में मृत्युदेव यम उल्लेखनीय हैं, जो अवेस्ता के स्वर्गाधिपति यिम से अभिन्न है और खासकर मित्र जो पारसियों के धर्म में मिश्र के नाम से ख्यात है । मित्र अथवा उसके पारसी पर्याय मिश्र का प्रसार सम्पूर्ण रोम राज्य में २००-४०० ई० १३३
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वेदार्थपारिजातः १०५८ सम्यक् प्रचार आसीत् । ईश्वरवादकोटिं यावत् तस्य व्यापकता सिद्धयति स्म, यथा ग्रीकधर्मेऽन्यस्याः कस्याश्चिदपि देवतायास्तथा व्यापकता न जाता । तस्यैव पूर्वतनयुगस्यानेकानि धार्मिकानुष्ठानानि वैदिककालेऽपि प्रचलितान्यासन् । यथाग्निपूजा, सोम- वल्लीयाग' । अवेस्ताग्रन्थे हओमारूपेण यः प्रसिद्धः । गा प्रति पूज्यभावस्तत एव युगादद्ययावत्प्रचलितो विद्यते । धार्मिकसूक्तानां कृतेऽवश्यं तस्मिन् युगे एकदशाक्षरा चतुष्पात् त्रिष्टुप् अष्टाक्षरा चतुष्पदी त्रिपदी वा गायत्री प्रचलितासीदिति सम्भाव्यते, अवेस्ताग्रन्थ ऋग्वेदे च तेषां छन्दसां प्रयोगदर्शनात्' इति, तदपि न किञ्चित्, प्रातीतिक- दृष्टयं व सूक्ष्मतत्त्वबुबोधयिषयैवानादिना वेदेन ऋषिरूपधारिणा तथा व्यवहारेऽपि वेदानां तात्कालिकत्वासिद्धेः । वेदो यथा क्वचिद् गुरुशिष्यरूपधरो वादकथया तत्त्वमवबोधयति क्वचिच्च स्वेन रूपेण निगमयति, तथैव प्रकृतेऽपि बोध्यम् । ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्' (ऋ० १० १ ९ ० ३ ) इति सूर्यचन्द्रयोः परमेश्वर कर्तृकत्वमपि वेद एव ऋषिरूपेण वक्ति । परमेश्वरस्य सर्वान्तर्यामित्वरूपेणैकत्वं तत्तद्देवतारूपेण नानात्वं च वेद एव वक्ति । यथाऽद्यस्वे बाला विद्वांसश्चोभयेऽपि दृश्यन्ते । अद्यापि बाला बालस्वभावसुलभां चेष्टां कुर्वते, वृद्धा विद्वांसस्तु पाण्डित्योचिताम्, न तावताप्यद्य कालभेदकल्पना युक्ता । अद्यत्वेऽपि ग्रामेषु वलीवर्देरुह्यमाना शकटी वायुयानं च दृश्येते । जाङ्गलिकयुग- व्यञ्जकोऽग्निव्यञ्जक ' पाषाणो दीपशलाका चोपलभ्येते । नान्यतरदर्शनेन युगकल्पना प्रामाणिकी, तथैव सर्वज्ञवेददृष्ट्या सर्वे भावा अर्वाचीनाः प्राचीनाश्च द्रष्टुं शक्यन्ते । न तावतापि कस्यचिदेकस्य दर्शनेन वेदस्य प्राचीनत्वमर्वाचीनत्वं वा शक्यावगमम्, हेतोर्व्यभिचारित्वात् । अवेस्ताग्रन्थस्य तु पौरुषेयत्वेन कालिकत्वमृग्वेदानुकारित्व तद्देवतातुल्यदेवानुवादि- सन् के मध्य हो गया था और लगभग एकेश्वरवाद की कोटि तक उसकी ऐसी व्यापकता सिद्ध हो गई थी, जैसी ग्रीक धर्म में और किसी देवता को प्राप्त नही हुई थी । उसी पूर्वतन युग के अनेक धार्मिक अनुष्ठानो की परम्पराएं वैदिक काल में प्रचलित रही, उदाहरणार्थ -अग्निपूजा और और सोमवल्ली का याग, जिसे अवेस्ता में ' हओमा' कहते है । गो के प्रति पूज्यभाव उसी युग से चला आ रहा है । धार्मिक सूक्तो के लिये एकादशाक्षरी चार पाद का त्रिष्टुप् अथवा अष्टाक्षरी चतुष्पदी या त्रिपदी ( अनुष्टुप् और गायत्री) अवश्य ही उस युग मे प्रचलित होगी, जैसा अवेस्ता और ऋग्वेद इन दोनो प्राचीन ग्रन्थो मे इन छन्दो का प्रयोग प्रमाणित करता है' ( पृ० ५५-५६) । यह सारा कथन गलत है, क्योंकि प्रातीतिक दृष्टि से ही सूक्ष्म तत्त्वो का बोध कराने की मशा से अनादि वेद ऋषियो के स्वरूप में आविर्भूत होकर इस तरह के व्यवहार को प्रवृत्त कराते हैं । वेदो की तात्कालिकता किसी तरह से सिद्ध नही की जा सकती । वेद जैसे गुरु और शिष्य का स्वरूप धारण करके वादकथा से तत्त्व का बोध कराता है और कही स्वरूपतः उसका निगमन करता है, उसी तरह से प्रकृत स्थल में भी जानना चाहिये ॥ 'सूर्याचन्द्रमसो' इस मन्त्र में सूर्य और चन्द्र को ईश्वर की कृति माना गया है । यहाँ पर वेद ऋषि के स्वरूप में ही इस बात को कहता है । परमेश्वर सर्वान्तर्यामी के रूप में एक है और उस उस देवता का स्वरूप धारण करने पर अनेक हो जाता है, इस बात को भी वेद ही बताता है । जैसे आजकल बालक ( मूर्ख ) और विद्वान् दोनो ही दिखाई पड़ते हैं । आज भी बालक बालको के स्वभाव के अनुकूल चेष्टाएं करते है और विद्वान् पांडित्योचित | इस स्वभाव भेद के आधार पर काल भेद की कल्पना उचित नही मानी जा सकती । आज भी गावो में बैलो से जुती हुई गाडियां और वायुयान साथ-साथ देखे जाते है । जङ्गली युग की याद दिलाने वाला चकमक पत्थर और दियासलाई आज साथ ही साथ मिलते है । जैसे इनमें से किसी एक चीज को देखकर किसी युग की कल्पना प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती, उसी तरह से सर्वज्ञ वेद की दृष्टि से सभी प्राचीन और अर्वाचीन पदार्थों को देखा जा सकता है, किन्तु इससे किसी एक के दर्शन के आधार पर वेद की प्राचीनता अथवा अर्वाचीनता का समर्थन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस तरह का हेतु व्यभिचारी होता है । अवेस्ता ग्रन्थ तो पौरुषेय माना जाता है, अतः उसका कोई समय निर्धारित किया जा सकता है । ऋग्वेद का अनुकरण कर उसमें ऋग्वेद के समान नाम वाले देवताओं का उल्लेख भी माना जा सकता है । इसीलिये ॠग्वेद में प्राचीन
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वेदार्थपारिजातः १०५६ त्वमपि सम्भवत्येव । अत एव प्राचीनयुगच्छायाङ्कनमृग्वेद इत्यादिकल्पना दुष्कल्पनैव । न केवलमवेस्ताया किन्त्वद्य-तनेष्वपि ग्रन्थेष्वनुवादिच्छन्दसा प्रयोगो दृश्यत एव । यदपि - 'देवकल्पना ततोऽपि प्राचीने भारोपीयकाल उपलभ्यते, दिवस्पतिकल्पनापि तथैव । देवस् लंटिन ,,देउस द्यौपिता ग्रीक उस पेटर लैटिन जुपिटर सम्भाव्यते । ततोऽपि पूर्वतनभावना नूतनस्वर्गसम्बन्धिनी द्यावा-पृथिव्योविश्वस्थ मातापितृत्वकल्पना च तथैव मन्त्रतन्त्रेषु विश्वासोऽप्यतिप्राचीनपरम्परया लभ्यते' इति, तदपि यत्किञ्चित्, अनाद्यपौरुषेयवैदिक संस्कारादेव सर्वत्र देवादिकल्पनाप्रसरसम्भवात् । यदपि -ऋग्वेदीयमहर्षिभिर्विश्व भूपवनाकाशरूपेण त्रिधा विभक्त प्रतीयते । ग्रीकैरपि तज्ज्ञायते स्म । त्रिलोकीकल्पनाभीष्टा ऋग्वेदस्य । नक्षत्रमण्डलस्याकाशेन सम्बन्धो विद्युद्वर्षादीना वायो: । बृहन्तो निर्जला मेघाः क्वचिच्छिलारूपेण क्वचित्पर्वतरूपेण वर्ण्यन्ते, क्वचिदसुरदुर्गरूपेण कल्प्यन्ते, यत्रासुराः सुरंर्युद्धयन्ते । गर्जन्तो मेघा हम्भारवं कुर्वन्तीभिर्गोभिरुपमीयन्ते, यासा पयासि भूमि पोषयन्ति । सूर्य - उषस्- अग्नि-मरुत्प्रभृतयो बृहन्तो देवास्तु प्राकृतिकवस्तूना मूर्तरूपा एव । प्राचीनयुगावशेषभूतान् कतिपयानपहायाधिकाशा देवा भौतिकाधारसम्बन्धा एव । अत एव तेषा पूर्णतया विकासोन जातः । तेषा रूपरेखा चरित्रगतव्यक्तित्व न स्पष्टम् । तन्मूलभूतेषु प्राकृतिक वस्तुषु भेदका धर्मा अल्पा एव । सामान्यगुणधर्माश्च तत्राव- लोक्यन्ते । यथा उषस् सूर्य: अग्निश्चैते सर्वे दीप्तिमन्तोऽन्धकारनाशकाश्च प्रातर्दृश्यन्ते । तेजो दयाभावो बुद्धिश्चेत्येते साधारणा धर्माः सर्वेषा देवानामुपलभ्यन्ते । असाधारणान् गुणानप्येते तिरोधापयन्ति यतो विनयपूर्ण सूक्तेषु साधारणा युग की छाया की बात करना, दुष्कल्पना मात्र है । न केवल अवेस्ता में, किन्तु आजकल के ग्रन्थो में भी ऋग्वेद के अनुकरण पर इन्ही छन्दो का प्रयोग मिलता है । ' देव' की कल्पना तो इससे भी कही अधिक प्राचीन भारोपीय काल से हमें उपलब्ध हुई है और दिवस्पति की कल्पना भी उतनी ही पुरानी है ( देव-स्, लैटिन- देउस, द्योस्-पिता, ग्रीक- झे उस पेटर, लैटिन जुपिटर ) । संभवतः इससे भी अधिक पूर्वतन भावना और स्वर्ग के सम्बन्ध में (द्यावापृथिवी ) रही होगी, जो विश्व के परम माता-पिता माने जाते है । इसी तरह से मन्त्र-तन्त्र में विश्वास भी एक अतिशय प्राचीन परम्परा है' ( पृ० ५६ ) यह कथन भी गलत है, क्योकि अनादि, अपौरुषेय वैदिक संस्कारो से हीभूतल सब जगह इस तरह की देवताविषयक कल्पनाओ का प्रसार हुआ है! 'ऋग्वेद के ऋषियों को विश्व तीन विभागो में विभाजित प्रतीत हुआ, जो क्रमशः भू, पवन और आकाश है । यह विभाजन संभवतः ग्रीक लोगो को भी विदित था । यह त्रिलोकी ऋग्वेद का अभीष्ट विषय है । नक्षत्र मण्डल का सम्बन्ध आकाश से बताया गया है । विद्युत्, वर्षा और वायु का सम्बन्ध पवन से है । बड़े-बड़े निर्जल मेघ कही-कही चट्टान के रूप में तो कही पहाड़ के रूप में, तो कही वे असुरो के दुर्ग के रूप में कल्पित है, जहाँ वे सुरो से युद्ध करते है । गरजते हुए जलद रम्भाती हुई गायो के रूप में माने गये हैं, जिनका पय भूमि पर बरसता है और भूतल को परिपुष्ट करता है! ऋग्वेद के बड़े देवता तो प्राकृतिक वस्तुओ के मूर्तरूप मात्र है, जैसे सूर्य, उषस्, अग्नि और मरुत् । प्राचान युग के अवशेष कतिपय देवताओं को छोड़ शेष अधिकाश देवता अपने भौतिक आधार से स्पष्टत सम्बद्ध प्रतीत होते हैं । इसी कारण उनका मूर्तरूप पूर्णतया विकसित नही हो पाया । इनकी रूपरेखा और चरित्रगत व्यक्तित्व में स्पष्टता नही है । इस मूर्तरूप के पीछे जो प्राकृतिक वस्तु है, उनमें सच पूछो तो बहुत ही कम विभेदक धर्म है; प्रत्युत वे अपने वर्ग को अन्य वस्तुओं से बहुत कुछ सामान्य गुण धारणहैं । करते हैं । उदाहरणार्थ, उपस्, सूर्य एवं अग्नि- ये सभी देदीप्यमान है, अन्धकार को दूर करने वाले हैं और प्रातः दिखाई पड़ते तेज, दयाभाव और बुद्धि ये साधारण धर्म इन सभी देवताओं मे पाये जाते हैं । ये साधारण 1 गुण देवताओ के असाधारण गुणो को तिरोहित कर देते हैं । कारण, स्तुतिपरक और विनयपूर्ण सूक्तों मे स्वभावतः साधारण गुण ही विशेष महत्त्व धारण कर लेते हैं ।
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१०६० वेदार्थपारिजातः गुणा एव विशेषमहत्त्वं धारयन्ति । अनेकत्र युगलदेवान् सहैव वैदिका वर्णयन्ति । तत एव युग्मदेवेषु यत्रान्यतरस्यापि वर्णन दृश्यते, तत्रैकगुणा अन्यतरस्मिन्नारोप्यन्ते 1। यथाग्निदेवस्य स्वतन्त्रोपासनवर्णनप्रसङ्गेऽपि वृत्रहन्तृत्वमुक्तम् । तत एव समानशक्तित्वभावनया देवेषु परस्परमभेदभावना सहजतामुपगता । एव तादात्म्यमृग्वेदे बहुधोपलभ्यते ॥ यथाग्निस्तवनप्रसङ्ग उक्तम् -हे अग्ने! जम्मसमये वरुणोऽसि, घूमितावस्थायां मित्रो भवसि> हे शक्तिपुत्र! त्वय्येव सर्वे देवाः केन्द्रिताः, यजमानाय त्वमेवेन्द्रोऽसि । एवमग्निसम्प्रदायभक्तैः परमपूज्येऽग्निदेवे तत्स्वभावे च न कानि रूपकाणि कल्पितानि! स एवाकाशे विद्युद्रूपेण सूर्य मध्यगततेजोरूपेण दीप्यते । सूक्तनिर्मातृभिरिमान्येव रूपाण्यन्यत्रापि देवेषूपस्थापितानि येनैव प्रतीयते यद् विभिन्ना देवता कस्यचिदेकस्य देवस्य विविधरूपमात्रम् । प्रथममण्डले केनचित्सूक्तनिर्मात्रा प्रोच्यते - पुरोहितैरेक एव पदार्थो यमोऽनेकै रूपैर्वर्ण्यते । ते तमेवाग्नि यमं मातरिश्वानं च वदन्ति । अन्यत्र च कविभिः पुरोहितैश्च एको विहङ्गमः सूर्य एव नानाशब्दैर्वर्ण्यते (ऋ० सं० १०।११४) । एवंविधाभिरुक्तिभिर्विज्ञायते यद् ऋग्वेदस्य समाप्तिकाले बहुदेव- वाद एकेश्वरवादरूपेण परिणतः' इति, तदपि यत्किञ्चित् साधर्म्यवैधर्म्यवशात् कल्पनाबाहुल्योपपत्तेः । ऋग्वेदस्याना दित्वेन वैदिकजनानां संसर्गादन्यत्रापि त्रिलोकीकल्पनासत्त्वे बाधकाभावात् । मेघेषु पर्वतादिकल्पनास्तु पर्वतसाधर्म्या- नानुपपन्नाः । एवं पयःसेक्तृत्वसामान्याद् गोभिरुपमानमपि नासम्भवि, वायुवेगैस्तेषु विद्यमानावरोधशक्तिभिश्च सघर्षा- नन्तरमवरोधशक्तिनिरोधादृष्टिर्जायत इति देवासुरसग्रामकल्पनापि युक्तैव । सूर्यादयो देवता भौतिकप्रकृतिसम्बद्धा अपि न भौतिकपदार्थमात्रम्, तत्तदधिष्ठातृदेवतरूपेण स्तूयमानत्वात् । अपौरुषेयत्वादीश्वरज्ञानमयत्वाच्च वेदोक्तयो वैदिक ऋषियो ने अनेक जगह युगल देवो का साथ-साथ वर्णन किया है । इसीलिये युग्न देवताओ से पृथक् भी अन्यतर का जहाँ कही वर्णन किया गया, वहाँ भी एक के गुण दूसरे मे आरोपित हो गये हैं । उदाहरणार्थ -अग्निदेव की स्वतन्त्र उपासना के समय भी उसे वृत्रहन्ता बताया गया है । वास्तव में यह गुण वज्रवारी इन्द्र का है, जिसके साथ प्रायः अग्निदेव रहा करते है । प्रायः सभी देवताओं को समान शक्तिसंपन्न मानने को भावना ने एक देवता को दूसरे से अभिन्न समझने की धारणा को सहज बना लिया । ऐसा वादात्म्य ऋग्वेद में बहुधा उपलब्ध होता है । यथा, अग्निदेव की स्तुति करते हुए एक सूक्त में कहा गया है कि-- हे अग्नि, तुम जन्म के समय वरुण हो, सुगलने पर तुम मित्र हो, और ए शक्ति के पुत्र, तुम्हारे में सभी देवता केन्द्रित हैं, यजमान के लिये तो तुम इन्द्र ही हो' । अग्नि-सम्प्रदाय के भक्तो की दृष्टि में परम पूज्य अग्निदेव और उनके स्वभाव के सम्बन्ध मे अनेक रूपको की कल्पना की गई है । भूतल पर कई रूपो में उनके आविर्भाव कल्पित किये गये है । आकाश मे उन्हे विद्युत् रूप और सूर्य के मध्य तेज के रूप में माना गया है । ये रूपक सूक्त-निर्माताओ के द्वारा अनेकत्र उपस्थित किये गये हैं, जिससे यह कल्पना होने लगती है कि ये विभिन्न देवता किसी एक दिव्य वस्तु के विविध रूपमात्र है । ऋग्वेद के पिछले सूक्तो मे यह भाव अनेक स्थानो पर अभिव्यक्त होता है । प्रथम मंडल के एक सूक्त निर्माता ने कहा है- पुरोहित एक ही पदार्थ ' यम' का अनेक रूप से वर्णन करते है; वे उसे अग्नि, यम और मातरिश्वा कहते है । इसी तरह दशम मंडल के एक ऋषि ने कहा है - पुरोहित और कवि शब्दों के द्वारा एक ही विहंगम ( सूर्य ) का अनेक तरह से वर्णन करते है । इस प्रकार की उक्तियाँ यह स्पष्ट करती है कि ऋग्वेद काल के समाप्त होते - होते ऋषियो का बहुदेववाद एकेश्वरवाद में परिणत हो रहा था' (पृ० ५७-५८ ) । यह कथन भी प्रमाण रहित है, क्योकि इस तरह से तो साधर्म्य और वैधर्म्य को देखकर नाना प्रकार की कल्पनाएं की जा सकती है । ऋग्वेद तो अनादि है । वैदिक जनों से सम्पर्क के कारण अन्य देशों में भी त्रिलोकी प्रभृति की कल्पना में कोई बाधा नही दिखाई पडती । मेघो के लिये पर्वतादि की कल्पना उनके साधर्म्य को देखते हुए गलत नही मानी जा सकती । इसी तरह से गाय जैसे दूध देती है, उसी तरह से मेघ जल देता है, अतः इस समानता के आधार पर मेघ की गाय से तुलना करना भी ठीक ही है । वायु के वेग और मेघो में विद्यमान जल की अवरोधक शक्ति में संघर्ष होने के बाद ही अवरोध शक्ति के निरुद्ध हो जाने पर वृष्टि होती है । इस तरह से इसकी तुलना देवासुर संग्राम से करना भी ठीक ही है । सूर्य प्रभृति देवगण भौतिक प्रकृति से सम्बद्ध होते हुए भी केवल भौतिक पदार्थ मात्र नही हैं, क्योकि उनकी स्तुति तत्तद् भौतिक पदार्थों के अधिष्ठाता देवता के