वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 161–170
वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 161–170
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वेदार्थपारिजाता K नोपचारपर्यवसायिन्यः, निरर्थकत्वे शास्त्रत्वानुपपत्तेः । हितशासनात् शास्तुर्वचनत्वाच्च शास्त्रत्वमृग्वेदादेः, 'शास्त्रयो + नित्वात्' ( ब्र० सू० १११।३ ) इति बादरायणसूत्रात्, शास्त्रमृग्वेदादिरिति शाङ्करभाष्यवचनाच्च । सर्वा देवताः परमेश्व रस्य महतो देवस्य विभिन्नरूपमात्रमिति तु वैदिकाना सिद्धान्त एव । अनेकदेववादो विकासक्रमेणैकेश्वरवादरूपेण परिणत इति कल्पना त्वसङ्गतैव, विकासवादस्य निरस्तत्वात् । अनादिकालादेवाधिकारिभेदेन यथा कर्मोपासनज्ञानानि वैदिकान्येव, तथैवानेकदेवैकदेववादादयोऽपि नित्या एवाधिकारिभेदेन वर्ण्यन्ते । साधर्म्येणैवाग्नेर्वज्रधरत्वोक्तिरपि गौण्या वृत्त्या सङ्गच्छते नाभेदमूलिका, भेदकाना गुणाना सत्वेऽभेदानुपपत्तेः । अग्नेर्वरुणमित्रत्वादिकमपि गोण्यैव वृत्त्या शौर्य क्रौर्यादिगुणयोगादसिंहेऽपि देवदत्ते सिहत्वव्यपदेशवत्, तत्तद्विशेषणसापेक्षत्वेन देवताना भिन्नत्वेऽपि तद्विशेषणोप- लक्षित सच्चिदानन्दब्रह्मात्मना तु सर्वत्रैक्यमेव । ' इन्द्र मित्र वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य. स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्यग्नियमं मातरिश्वानमाहु ॥ ' (ऋ० स ०१।१६४ । ४६ ) । अमुमादित्यमैश्वर्यादिविशिष्टमिन्द्रमाहुः, तथामित्र मरणात् त्रातारमहरभिमानिनं वरुण पापस्य निवारक रात्र्यभिमानिनमग्निमेतन्नामकमाहुः । दिवि भवो दिव्यः सुपर्णः सुपतनो गरुत्मान् पक्षवान् पक्ष्यस्नि, सोऽप्ययमेव । एकमेव वस्तुतः सन्त विप्रा मेधाविनो बहुधा वदन्ति कार्यकारणेनाग्नि वैद्युतं यमं नियन्तार सूर्यस्य ब्रह्मणोऽनन्यत्वात् सार्वात्म्यमुक्तम् । केषाञ्चिद्रोत्याऽत्राग्निरेवोद्देश्यः । यदपि -' देवानामेव न बहुरूपता, किन्तु प्रकृतावपि सा प्रतीयते । यथाऽदितेस्तादात्म्य न केवलं सकल- देवगणैरेव कृतम्, किन्तु मानवैस्तथाकाशवायुमण्डलवर्तिभिः सर्वभूतवर्तमानभाविप्राणिभिरपि वर्णितं दृश्यते (ऋ० सं ० १/ ८९ ) । विश्वोत्पत्तिप्रतिपादके नासदीयसूक्ते (ऋ० स ० १० १२१ ) सर्वस्रष्टा न केवल देवाधिदेवत्वेनैव वर्णितः, रूप में की जाती है । वेदवचन अपौरुषेय और ईश्वर के ज्ञान स्वरूप हैं, इनका केवल औपचारिक प्रयोग मानने पर निरर्थकता के आधार पर शास्त्रता ही नही बन पावेगी । हितावह उपदेश देने से और शास्ता ईश्वर का वचन होने के कारण ऋग्वेदादि में 'शास्त्र' शब्द का प्रयोग होता है । ' शास्त्रयोनित्वात्' इस बादरायण सूत्र पर शङ्कराचार्य का भाष्य है कि 'ऋग्वेदादि शास्त्र कहे जाते हैं' । अन्य सभी देवगण महान् देव परमेश्वर के विभिन्न स्वरूप मात्र है, यह तो वैदिको का सिद्धान्त है ही । अनेकदेववाद विकास के सिद्धान्त के अनुसार एकदेववाद में परिणत हो गया, यह कल्पना सर्वथा असङ्गत है, क्योकि विकासवाद को हम अस्वीकार कर चुके है । अनादि-काल से अधिकारी के भेद के अनुसार जैसे कर्म, उपासना और ज्ञान काण्ड की सब पद्धतियां वैदिक ही मानी जाती हैं, उसी तरह से अवेकदेववाद और एकदेववाद भी अधिकारी के भेद के अनुसार सदा से चले आ रहे है । साधर्म्य के आधार पर ही अग्नि के लिये 'वज्रघर' शब्द का प्रयोग भी गौण वृत्ति के आधार पर किया जा सकता है, अग्नि और इन्द्र की अभिन्नता के आधार पर नही, क्योंकि जब इनमें परस्पर भेदक अनेक गुण विद्यमान है, तो एक दो समानताओं के आधार पर अभेद नही स्थापित किया जा सकता । अग्नि का वरुण प्रभृति देवताओ से अभेद भी गौणी वृत्ति की सहायता से उसी तरह से स्थापित किया जा सकता है, जैसा कि शौर्य, क्रौर्य प्रभृति गुणों के आधार पर देवदत्त प्रभृति माणवक मे सिंह पद का आरोप किया जाता है । उन-उन विशेषणों की सापेक्षता में देवताओ का भेद रहते हुए भी इन सभी विशेषणो से उपलक्षित सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म के रूप में ये सब एक ही है । 'इन्द्रं मित्रं वरुण' इत्यादि मन्त्र का अर्थ यह है— उस ऐश्वर्य प्रभृति गुणो से विशिष्ट आदित्य को इन्द्र कहा जाता है, उसी को मृत्यु से त्राण के रूप में मित्र; पापो से निवारक के रूप में वरुण और रात्रि के अभिमानी देवता के रूप में अग्नि कहते हैं । यही आदित्य आकाश में स्वच्छन्द विचरण करने वाला दिव्य पक्षी है । वस्तुतः यह एक ही है, किन्तु मेधावी विप्र इसकी अनेक रूपों में स्तुति करते है । कार्यकारणभाव के आधार पर इसको वैद्युत अग्नि नियन्ता यम कहते है ।' इस तरह से यहाँ पर ब्रह्म से अभिन्नता के " आधार पर सूर्य की सर्वात्मकता कावर्णन है । कुछ लोगो के मत से यहां पर सूर्य के स्थान पर अग्नि वर्णित है । II 'कभी-कभी हमें प्रतीत होता है कि देवत्व की बहुरूपता केवल देवताओं तक ही सीमित नहीं, परन्तु वह प्रकृति तक जा पहुँचती है । जैसे अदिति का तादात्म्य न केवल सकल देवगण से ही किया गया है, परन्तु मानवों तथा उन सब प्राणियों के साथ भी किया गया है, जो आकाश और वायुमण्डल में उत्पन्न हुए हैं, या होगे (ऋ० ११८ ९) । विश्वोत्पत्ति के प्रतिपादक नासदीय सूक्त (ऋ० 1
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वेदार्थपारिजातः १०६२ किन्तु सर्वात्मत्वमपि तस्योक्तम् ॥ सर्वत्र वैदिकसाहित्येषु बहुदेववादस्य बीज विकसितं जातम्, परन्तु तस्यान्तिम रूप वेदान्तदर्शनरूपेण परिणतम् । यद्विन्दूनां सर्वाधिकजनप्रिय दर्शनम् । ऋग्वेदस्य पूर्वरचितेष्वंशेष्वपि संव पद्धतिर्दृश्यते, यत्र प्रत्येक देवस्य स्तुतिः सर्वेश्वररूपेण कृता दृश्यते । अनया पद्धत्यैव मैक्समूलरस्य सर्वेश्वरवादो जन्म लेभे, यत्रेदमुक्तम् । ऋषिगणः सर्वान् देवान् यथाक्रम सर्वोपरि देव मन्यते स्म । तत्क्षणे तं देव तथा स्तुवन्ति यथाऽयमेव पूर्णस्वतन्त्रः सर्व- सत्ताशालीति प्रतीयेत । वस्तुतस्तु ऋग्वेद रचयितॄणामिय पद्धतिः केवलमत्युक्तिप्रायैव । सैव पद्धतिर्होमरगीतेषु लभ्यते । भक्तः स्वोपास्यमेव सर्वोत्कृष्टरूपेण पश्यतीति सामान्यभावना दृश्यते । एतत्तथ्य सोमयागे दृश्यते, यत्र सर्वेषा देवाना भागाः कल्पिताः । हिन्दूनां सर्वे देवा यज्ञे स्व स्व भागं लभन्ते' ( पृ ० ५८-५९ ) इति, तदपि न किञ्चित्, अदितिपदेना-खण्डिताया: प्रकृतेर्देवमातुः प्रकृतिप्रकृतेः परमेश्वरस्य वा विवक्षितत्वेन तत्कार्याणां तदनयत्वेन तत्तादात्म्योपपत्तौ बाधाभावात् । ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छा ०३ | १४ | १ ), ' तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्य.' ( ब्र ० सू ०२| १ | १४ ), 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्' ( ब्र० सू ० १।२४।३ ) इत्यादिश्रुतिसूत्रादिवचनशतेभ्यः । एव सकलजगदात्मनाऽदितिः स्तूयते । उक्तं च यास्केन ‘ इत्यदितेर्विभूतिमाचष्टे ( नि ० ४ | ३ ) इति । नासदीय सूक्त त्विहैव व्याख्यातम् । देवस्यैकत्वनानात्वा- दिकं तु वैदिकानामधिकारभेदादेव वर्णितम्, पारमार्थिकव्यावहारिकभेदेनोभयोरपि सत्त्वात् । 'एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्' (भ० गी० ९ ११५ ) इति गीतोक्तेश्च । मैक्समूलरस्य सर्वेश्वरवादस्तु तदीय भ्रान्तिनिबन्धन एव । नहीश्वरः क्रमेण निष्पद्यते, तस्य नित्यसिद्धत्वात् । यदपि --- 'वैदिकसूक्तरीत्याऽनादिरजम्मा देवो नास्ति, द्यावापृथिव्योरपत्यत्वात् । केचित्तु देवा देवान्तरेम्य उत्पद्यन्ते । एतेन देवतासु पितृपितामहादिपुरुषा अपि भवन्ति । पूर्ववर्तिनोऽपि देवाः सूक्तेषु वर्ण्यन्ते । मूलतो नैतेऽमृताः । अमरत्वं देवताविशेषात्तेषां प्राप्यते, यथाऽनेः सवितुश्च सोमपानेनामरत्वं जातम् । इन्द्रादयोऽजरास्ते सदैवामरा इत्यत्र १०।१२१ ) में स्रष्टा न केवल देवाधिदेव बताये गये है, परन्तु उन्हे सर्वात्मक भी कहा है । बहुदेववाद का यह बीज सर्वत्र वैदिक साहित्य में विकसित होता रहा. परन्तु उसका अन्तिम रूप जाकर वेदान्तदर्शन में परिणत हुआ, जो हिन्दुओ का सर्वाधिक जनप्रिय दर्शन है । ऋग्वेद के पूर्वरचित अंशो मे भी ऋषियों की यही पद्धति पाई जाती है, जिसमें हर देवता की स्तुति सर्वेश्वर के रूप मे की गई है । इस पद्धति ने आचार्य मैक्समूलर के सर्वेश्वरवाद को जन्म दिया, जिसमे यह माना गया है कि ऋषिगण प्रत्येक देवता को बारी- बारी से सर्वोपरि देव मानते रहे है और उस उस क्षण उस देवता की इस प्रकार स्तुति करते हैं, मानों वह देवता बिलकुल स्वतन्त्र एवं सर्वसत्ताशाली हो । वास्तव में ऋग्वेद के रचयिताओ की यह पद्धति केवल अत्युक्तिमय है, जो होमर के गीतों में भी पाई जाती है । यह एक सामान्य भावना है भक्त की, जो अपने उपास्य देव को सर्वोत्कृष्ट रूप में देखता है । इस बात का तथ्य तो सोमयाग की विधि मे स्पष्ट हो जाता है, जहाँ प्रत्येक देवता के लिये यज्ञ में अपना-अपना भाग कल्पित है और लगभग हिन्दुओ के सभी देवता यज्ञ में भाग पाते है ' ( पृ०५८-५९) । यह कथन भी कुछ नही है, अदिति पद से यहाँ पर देवमाता अखण्डित प्रकृति, जो कि प्रकृति की भी प्रकृति है, अथवा परमेश्वर हैं, विवक्षित है, अत उसके कार्य उससे भिन्न नही होते, अत एव तदात्मक ही है, इसमें क्या विरोध हो सकता है । 'सर्व खन्दियं ब्रह्म', 'तदनन्यत्व०, प्रकृतिश्च० ' इत्यादि श्रुतियो एवं सूत्रो में इसी बात का प्रतिपादन किया गया है । इस तरह से सकल जगत् स्वरूप में अदिति की स्तुति की जाती है । इसीलिये यास्क ने कहा है-' इस तरह से अदिति की विभूति का वर्णन किया जाता है । ' नासदीय सूक्त की अन्यत्र व्याख्या की गई है । एक ही देव का नानात्व अधिकार भेद के अनुसार व्याख्यात है । पारमार्थिक और व्यावहारिक रूप में एकत्व और नानात्व दोनो ही देवताओ का मान्य है । यही बात 'एकत्वेन पृथक्त्वेन' इस गीता वचन में प्रतिपादित है । मैक्समूलर का सर्वेश्वरवाद उसकी भ्रान्त धारणा पर आधारित है, नित्यसिद्ध ईश्वर की क्रम से निष्पत्ति का कोई प्रसंग ही नहीं उठ सकता । 'वैदिक सूक्तकारों के मत से तो देवता अनादि नही, न वे अजन्मा है, कारण वे द्यावापृथिवी के अपत्य कहे जाते हैं और कुछ देवता तो दूसरे देवताओं से उत्पन्न भी माने जाते है । इससे प्रतीत होता है कि देवताओं में पीढियाँ होती है । कई सूतो मे तो पूर्ववर्ती देवताओं का भी वर्णन मिलता है । ये देवता मूलतः अमर नहीं माने जाते थे । कारण, अमरत्व तो उन्हें देवताविशेष के द्वारा
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वेदार्थपारिजातः १०६३ ' ( ) प्रमाणं नोपलभ्यते । वेदोत्तरविचारधाराया त्वेषामजरामरत्वमाभूतसम्प्लवस्थायित्वेनापेक्षिकमेव पृ ०५ ९ इति तदपि यत्किञ्चित्, आजानकर्मदेवादिभेदेन देवानामनेकविधत्वात् । सर्वथानाद्यनन्तस्वलक्षणममृतत्व तु परमेश्वरस्यैव । प्रकरणानुसारेणेन्द्राग्निशब्देरपि स एवाभिधीयते । विष्णुरुद्रादिशब्दैरपि स एवाभिधीयते । तस्य च निर्गुणसगुण- निराकारसाकारभेदा अपि सन्ति । नित्या अपि ते देवाना कार्यसिद्ध्यर्थमुत्पद्यन्ते । 'देवाना कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा । उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ॥ ' ( दु ० स० १६५ ) इत्युक्तेः । वेदोत्तरकालिकत्व वेदान्ताना- मिति कल्पनापि निर्मूलैव तेषामप्यपौरुषेयत्वेन नित्यत्वात् । यदपि - 'वैदिक देवताना मूर्तस्वरूप मानवीयम् $ तेषा हस्तपादघ्राणमस्तकमुखादिमानवावयववर्णनात् । परन्तु देवाना प्रतिमा छायात्मिकैव मन्यते 1। तेषा गात्राण्यङ्गानि वा प्रायेणालङ्कारिकाण्येव तत्तत्क्रियाद्योतकानि । यथाग्नेर्देवस्य जिह्वाऽङ्गानि च ज्वालारूपाण्येव I। नेत्र तु बिम्बमात्रम् । तस्माद् बाह्य रूप प्रकल्पितमेव, तथाप्यान्तरिक- शक्तीना प्राकृतिकतत्त्वैः सम्बन्धोऽन्यत्र स्पष्टमुक्तः । अत एव ऋग्वेदे देवप्रतिमामन्दिरादीना वर्णन नोपलभ्यते । सर्वप्रथम सूत्रेषु प्रतिभावर्णन दृश्यते' ( पृ ० ५ ९ - ६० ) इति, तदप्यपास्तम् विप्रतिषिद्धत्वात् । त्वयाऽङ्गीकृतस्य तेषा हस्तपादादेर्वर्णनं तद्राहित्य चेति विप्रतिषिद्धमेव । 'नमो हिरण्यबाहवे', 'नीलग्रीवाः', 'शितिकण्ठा:' इत्यादिवर्णनेन मूर्तिमत्वमुक्तमेव । मन्त्रेषु सूत्रभूतमेवोच्यते । यज्ञस्यापि साङ्गोपाङ्गवर्णन क्व मन्त्रेषूपलभ्यते? ब्राह्मणेषु पुराणेषु च तदुपबं हितमेव, न तु नवीनं किञ्चिदुच्यते । अग्नेर्ब्राह्मणरूपेण खाण्डवदहनेऽर्जुन प्रति साहाय्ययाचनाद् देवताधिकरणे बादरायणेन विग्रहवत्त्वमैश्वर्यवत्त्व चोक्तमेव । विस्तरेणैतदुपपादित शङ्करभगवत्पादः । प्राप्त हुआ है । उदाहरणार्थ – अग्नि और सविता को सोमपान से अमरता मिलती है । इन्द्र और कुछ देवता अजर बताये गये है, परन्तु 'वे सदा अमर है ' इसके लिये कोई प्रमाण उपलब्ध नही । वेदोत्तर विचारधारा में तो इनका अजरत्व और अमरत्व केवल अपेक्षाकृत है । कारण, वह एक कल्प तक सीमित है ' (पृ० ५ ९ ) यह कथन भी कुछ नही है, क्योंकि आजानदेव, कर्मदेव प्रभृति के भेद से देवता अनेक तरह के होते हैं । सर्वथा अनादि, अनन्त लक्षण अमरत्व केवल परमेश्वर में ही विद्यमान है । प्रकरण के अनुसार इन्द्र अग्नि प्रभृति शब्दो से यह परमेश्वर ही अभिहित होता है । इस परमेश्वर के निर्गुण, सगुण निराकार, साकार प्रभृति भेद भी होते है । ये नित्य है, तो भी देवताओं के कार्य को पूरा करने के लिये उत्पन्न होते रहते हैं । दुर्गा सप्तशती में कहा गया है कि - ' देवताओ के कार्य की सिद्धि के लिये जब यह भगवती आविर्भूत होती है, तब इसकी नित्यता के रहते हुए भी इसमें उत्पन्न हुई, इस प्रकार का व्यवहार होता है । वेदो की रचना के बाद वेदान्त दर्शन की कल्पना की गई, यह बात भी सर्वथा निर्मूल हैं, क्योकि ये उपनिषद् भी अपौरुषेय है, अत एव नित्य है । 'वैदिक देवताओं का मूर्त स्वरूप मानवीय है । उनके हाथ, पाँव, नाक, भुजा, सिर, मस्तक, मुख आदि मानव शरीर के अवयव बताये गये है । परन्तु उनकी प्रतिमा केवल छायात्मक मानी जाती है । उनके गात्र या अङ्ग प्राय: आलङ्कारिक रूप में वर्णित हैं, जो उन उन क्रियाओ के द्योतक है । उदाहरणार्थ -अग्निदेव की जिह्वा और गात्र केवल ज्वालाएं और उनकी आँख तो बिम्ब मात्र है । इस तरह इनका बाह्य स्वरूप स्पष्ट रूप से प्रकल्पित था । परन्तु इनकी आन्तरिक शक्ति का प्राकृतिक तत्त्व से सम्बन्ध कई जगह बिल्कुल स्पष्ट है । यही कारण है कि ऋग्वेद मे न कही देवताओं की प्रतिमा का वर्णन है और न कहीं मन्दिरों का उल्लेख है । प्रतिमा का वर्णन सबसे पहले हमें सूत्रों में ही मिलता है' ( पृ० ५ ९ -६० ) । इस तरह के परस्पर विरुद्ध वचन अपने आप खंडित हो जाते हैं । आप उन देवताओं के हस्तपादादि का वर्णन भी करते हैं और फिर उनका निषेध भी करते हैं । यह बात परस्पर विरुद्ध है । 'नमो हिरण्यबाहवे', 'नीलग्रीवा', शितिकण्ठा' इन वर्णनो में देवताओं की मूर्तिमत्ता स्पष्ट प्रतिपादित है । मन्त्रों में सूत्र रूप में ही, संक्षेप से ही कोई बात कही जाती है । कही कही यज्ञों का सागोपाङ्ग वर्णन भी मन्त्रो में मिलता है । ब्राह्मण और पुराणो में उनका ही उपबृंहण किया जाता है । कोई नवीन विषय इनमे प्रतिपादित नही है । अग्नि खाण्डव वन को जलाने में सहायता करने के लिये अर्जुन के पास ब्राह्मण के स्वरूप में आता है । देवताधिकरण में बादरायण ने देवताओ की विग्रहवत्ता और ऐश्वर्यवत्ता का स्पष्ट प्रतिपादन किया है । शङ्कराचार्य ने अपने भाष्य में इसका विस्तार से प्रतिपादन किया है । I १
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वेदार्थपारिजातः १०६४ यदपिच-–' केचिद्वरभटरूपेण वर्ण्यन्ते ये कवचं शिरस्त्राण परशुं धनुर्बाणादीनि शस्त्राणि धारयन्ति दिव्यरथारूढा आकाशे चरन्ति । तेषा रथवाहकाः क्वचिदश्वाः क्वचिद्वृषभा अजा हरिणाश्च । यज्ञभागग्रहणार्थं ते यज्ञमुपगच्छन्ति । क्वचिदग्निनैव भागा उह्यन्ते । ते स्नेहवन्तः साम्मनस्येन तिष्ठन्ति । क्वचिदिन्द्रो युद्धमानो दृश्यते' ( पृ ० ६० ) इति, तदपि त्वद्रीत्या पूर्वापरविरुद्धमेव, सिद्धान्ते तु महाभाग्यात्तेषां तदुपपद्यत एव । यदपि - ' वैदिका देवा उपकारका दीर्घायुष्यादिकं प्रयच्छन्ति । बलाद्रुद्रादेवापत्तयः सम्भवन्ति । व्याध्याद- यस्तु क्षुद्रेभ्यो दानवेभ्यः समायान्ति । अनावृष्ट्यादयस्तु वृत्रादिव शक्तिशालिनोऽसुरादेव भवन्ति । देवाः सत्यवादिनो धर्मन्यायपक्षपातिनः । सर्वापेक्षया सुशीलो वरुणस्तथा नीतिमानस्ति यश्छद्मप्रायः शत्रुभिरपि छलकरणे सङ्कचति । सामान्यतया नैतिकोच्चतायास्तथा न महत्ता यथा तेषां शक्ते महत्ता' ( पृ० ६० ) इति, तदपि यत्किञ्चित्, देवानां सौशील्यस्य बहुधा वर्णनात् । रुद्रस्तु परमेश्वर एव । तस्य प्राणिकर्मानुरूपेण घोरायास्तन्वा भयहेतुत्वेऽप्यघोरायाः शिवायास्तन्वाः सर्वकल्याणकरत्वोपपत्तेः । --- यदपि च– 'कामनासिद्ध्यर्थ देवताभ्यो बलिप्रदान सोमरसाहुतिश्च क्रियते 1। अत्रैव पौरोहित्यदम्भस्य बीजमुपलभ्यते, यद्वैदिकयुगे शनैः शनैर्वृद्धिमुपागमत् । शुक्लयजुर्वेदे एवमपि वचनमुपलभ्यते यद् देवता यथार्थज्ञानवतां ब्राह्मणानां वशे तिष्ठन्तीति । ब्राह्मणग्रन्थेषु ततोऽप्यधिकतया दम्भो वृद्धिमुपागात् । जगति द्विविधा देवताः सन्ति, एको देवोऽन्यो ब्राह्मणः । ब्राह्मणो भूदेवः । ब्राह्मणग्रन्थे यागः सर्वशक्तिमत्त्वेन वर्णितः । यागद्वारा न केवल देवताः, किन्तु ' ( ), प्राकृतनियमा अपि वशीक्रियन्ते पृ ० ६१ इति तदपि पाश्चात्यानां दुरभिसन्धिरेव वेदस्वरूपतन्माहात्म्यानवगम- विजृम्भितत्वात् । मन्त्रब्राह्मणात्मकाः सर्वे वेदा अपौरुषेयत्वादपास्त समस्तपुंदोषशङ्काकलङ्कपङ्कत्वेनानाशङ्कनीयत्वाद् 'कुछ देवता हमारे सामने वीर भट के रूप मे उपस्थित होते है, जो कवच पहिनते है, शिरस्त्राण धारण करते है, भाले लिये हुए है, उनके पास फरसे है और धनुर्बाण भी है । वे दिव्य रथो मे आरूढ होकर आकाश मे संचार करते हैं । उनके रथ प्रायः घोड़े हाकते हैं । कही कही वृषभ, अज और हरिण भी रथ हाकते हुए बताये गये है । इन रथो पर आरूढ़ होकर के यज्ञ में भाग लेने जाते हैं, जो अन्यथा उन्हें स्वर्ग में भी अग्नि देव द्वारा पहुंचा दिया जाता हैं । आम तौर पर ये देवता आपस में स्नेहपूर्वक रहते बताये गये हैं । हा, कभी-कभी लड़ते- भिडते इन्द्र पाये जाते है' ( पृ ० ६० ) | यह सारा कथन आपकी पहले कही गई बात से विरुद्ध पडता है । हमारे मत से तो यह सब इसलिये सम्भव हो सकता है कि देवतागण महान् ऐश्वर्यशाली होते है । 'वैदिक युग के देवता हमेशा उपकारक और दीर्घायु तथा अभ्युदय प्रदान करने वाले थे । एकमात्र देवता जिससे हानि का भय हो सकता था, वह रुद्र थे । मानव में छोटी - बडी आपत्तिया, व्याधि आदि तो क्षुद्र दानवों के कारण उत्पन्न होती थी और अनावृष्टि आदि विपत्तियां वृत्र जैसे शक्तिशाली असुर से पैदा होती थी । देवता सत्यवादी, कभी छल न करने वाले और सदा धर्म तथा न्याय के पक्षपाती माने गये है । सबसे सुशील देवता वरुण का नीति के साथ इतना संयोग है कि वह कपटी शत्रु के साथ भी छल करने से हिचकिचाते है । सामान्यतः नैतिक उच्चता में देवताओं को उतना ऊँचा स्थान नही दिया गया है, जितना उनकी शक्ति की महत्ता को दिया है' ( पृ० ६० ) | यह कथन भी सारहीन है, क्योंकि देवताओं के सुशील स्वभाव का अनेक स्थानों में वर्णन है । रुद्र तो स्वयं परमात्मा है । प्राणियों के कर्म के अनुसार रुद्र का घोर स्वरूप भयङ्कर और अघोर स्वरूप कल्याणकर होता है । 'यह आशय भी बहुधा प्रकट किया गया है कि देवताओ को बल और स्फूर्ति इन सूक्तो, बलिदानों से और विशेषकर सोमरस की आहुति से प्राप्त होती है । यही हमें पौरोहित्य के दम्भ का बीज प्राप्त होता है, जो कि वैदिक युग में धीरे- धीरे बढता ही गया । शुक्ल यजुर्वेद में ऐसा वचन भी मिलता है कि देवता उस ब्राह्मण के वश में है, जिसे यथार्थ ज्ञान प्राप्त है । ब्राह्मण प्रन्थ तो इससे भी अधिक आगे बढ गये हैं और कहते हैं कि दुनियाँ में दो प्रकार के देवता है— एक देव और दूसरे ब्राह्मण, जिन्हें नरदेव अथवा भूदेव समझना चाहिये । ब्राह्मण ग्रन्थों में भी यज्ञ की महत्ता सर्वोपरि है । वे याग को सर्वशक्तिमान् मानते हैं, जिसके द्वारा न केवल देवता ही, अपितु प्राकृतिक नियम भी वश में किये जा सकते है ' ( पृ० ६१ ) यह सब पाश्चात्यों की दुरभिसन्धि मात्र है । मूलतः वे वेद के स्वरूप और उसके माहात्म्य को ठीक से समझ ही नही पाये है । मन्त्रब्राह्मणात्मक समस्त वेद अपौरुषेय है, अतः पुरुषकृत दोषों की
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वेदार्थपारिजातः १०६१ दोषशून्याः परमप्रमाणभूताः । दम्भस्य को वा हेतुः? ये कठिनतपस्यया शिलोञ्छवृत्त्या जीवन यापयन्ति, अश्वस्तनिक- वृत्त्यैव च तुष्यन्ति । अपरिग्रहा लोककल्याणपरायणा सन्यासेन सर्वत्यागेन सर्वमुपेक्ष्य परमार्थतत्त्वमेवाभिलषन्ति । राज्यशासने धनाध्यक्षत्वेऽन्यान् योजयन्ति ते किमभिलक्ष्य दन्भ कुर्वन्तीति चेति न्यायकुसुमाञ्जली महताटोपेनोदयना- चार्यनिराकृतत्वात् । मैकडालाद्वर्षसहस्रादपि प्राचीना उदयनाचार्या. मा कश्चिन्मन्दधीर्मैकडानलात् परभावित्वमुदय- नाचार्यस्य शङ्किष्टेति । पूर्वमपि तथाविधाना नास्तिकशङ्कानामुदयात् तत्समाधानाच्च । सदा नास्तिकानां शङ्का जाग्रति सदैव च तन्निराकरणार्थमास्तिकाः प्रयतन्ते । सृष्टावेव चक्र परिभ्राम्यत्येव । इहाप्यपौरुषेयत्वं समर्थतमेव! ब्राह्मणवादकल्पानु पाश्चात्यानां दुरभिसन्धिमूलिका, तादृशवादस्य वैदिकसाहित्ये क्वाप्यदर्शनात् । किञ्च, यदि वेदा: पौरुषेया. स्युस्तदेव कस्यचित्पुरुषस्य दम्भो वेदे व्यक्तिमियात ॥ ऋषयस्तु मन्त्रद्रष्टार एव न कर्ताय इत्यसकृदुक्तम् । अपि च, देवताना वल स्फूर्तिश्चैतेः सूक्तं सामरसाहुत्या च जायत इत्यनेन, यथार्थज्ञानवता ब्राह्मणानां देवता वशे भवन्ति इत्यनेन ब्राह्मणाना भूदेवत्वमित्यनेन च कथनेन कथं दम्भस्त्वया ज्ञायते? तथार्थस्य बाघाद्दम्भेन तत्कथन मिथ्येति वक्तुं शक्यते, बाधस्तु कथ त्वया ज्ञायते? यस्य देवता प्रत्यक्षा तद्बल स्फूर्तिश्च प्रत्यक्षे स्याताम्, तेनैव तदभावोऽपि ज्ञातुं शक्यते । न च युष्माकं देवता प्रत्यक्षा तत एव तदभावोऽपि न प्रत्यक्षस्तथा च कथ बाघः? नाप्यागमेन तद्वाघस्तथाविधागमादर्शनात् नाप्यनुमानेन लिङ्गाभावात् । सूक्तैः सोमाहुत्या देवानां बलस्फूर्त्यभावोऽपि युष्माभिः कथं ज्ञायते? मनुष्यविलक्षणेषु देवेषु युष्माक विश्वासो नास्ति । तथा च लौकिका एव देवा न ब्राह्मणा आशंका का लवलेश भी प्रसर इनमे नही माना जा सकता । इस तरह से समस्त दोषो से रहित होने से ये परम प्रमाणभूत माने जाते | यहाँ दम्भ का प्रसंग ही कहा उठता है । जो कि ऋषिगण कठिन तपस्या करते है, शिलोञ्छ बृत्तियो से जीवन यापन करते हैं और कल की, आगे की चिन्ता नही करते । अपरिग्रही, लोक के कल्याण मे सदा निरत, सन्यास के द्वारा सर्वस्व का त्याग करने वाले ये ऋषिगण सभी सासारिक सुखो की उपेक्षा कर परमार्थ तत्त्व के अन्वेषण में हो सदा लगे रहते हैं । जो राज्य का शासन चलाने के लिये और घनाध्यक्ष के पद पर अन्य व्यक्तियों की नियुक्ति करते है, वे क्या सोचकर दम्भ करेंगे? इस तरह के आक्षेपो का न्यायकुसुमाञ्जलि के रचयिता उदयनाचार्य ने प्रबल युक्तियो के सहारे खंडन किया है । उदयनाचार्य मैकडानल से एक हजार वर्ष पहले हो चुके है । किसी को यह शंका नही रहनी चाहिये कि उदयनाचार्य मैकडानल के बाद हुए । इस तरह की नास्तिक जनो की शंकाएँ पहले भी उठती रही है और उनका यथोचित समाधान भी किया जाता रहा है । इस तरह नास्तिक जन सदा शंका उठाते रहते है और आस्तिक जन उनके निराकरण का उपाय करते रहते है । इस तरह का चक्र सृष्टि मे निरन्तर चलता रहता है । इसीलिये हमने इस ग्रन्थ में वेदो की अपौरुषेयता का पुनः पुन. समर्थन किया है । ब्राह्मणवाद की कल्पना पाश्चात्य विद्वानों की एक दुरभिसन्धि मात्र है । वैदिक साहित्य में इस तरह का ब्राह्मणवाद कहीं नही दिखाई पड़ता । अपि च, यदि वेदो को पौरुषेय माना जाय, तभी किसी पुरुष का दम्भ वहाँ दिखाई पड सकता है । यह हम बार बार कह चुके हैं कि ऋषिगण मन्त्रो के द्रष्टामात्र है, कर्ता नही । दूसरी बात देवताओ को बल और स्फूर्ति इन सूक्तो से और सोमरस की आहुति से प्राप्त होती है, ' देवता उस ब्राह्मण के वश मे रहते है, जिसे यथार्थ ज्ञान प्राप्त है', 'ब्राह्मण भूदेव है ' इन वाक्यों में दम्भ की गन्ध आपकी कैसे मिलती है? यहाँ पर प्रतिपादित अर्थ का यदि बाघ हो तो उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह कथन मिथ्या है, दम्भ प्रयुक्त है । किन्तु इस अर्थ का बाघ होता है, इस बात को आप कैसे जान सकते है? जिस व्यक्ति को देवता का प्रत्यक्ष ज्ञान होता हो और जो उनमे बल और स्फूर्ति का भी दर्शन करता हो, वही उसके अभाव को जान सकता है । आपको तो देवता का प्रत्यक्ष है नही, तब उसके अभाव की प्रतीति आपको कैसे हो सकती है और यह बाघ-ज्ञान भी आपको कैसे हो सकता है? आगम प्रमाण से भी इसका बाध नही हो सकता, क्योकि ऐसा कोई आगम उपलब्ध नही है । हेतु के अभाव में अनुमान प्रमाण से भी इसका ज्ञान नहीं हो सकता । सूतो और सोम की आहुति से देवों में स्फूर्ति का संचार नहीं होता, इस बात को भी आप कैसे जानते है? मनुष्यो से विलक्षण देवताओं में आप विश्वास नहीं करते । इस परिस्थिति में यद्यपि देवगण लौकिक ही हैं, तो भी वे ब्राह्मण नही है, १३४
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वेदार्थपारिजात । १०६६ इत्यपि युष्माभिः कथं वक्तु शक्यते? एवमेवान्या अपि पाश्चात्त्यानां दुष्कल्पना वेदापोरुषेयत्व-देवतातत्त्वनिरूपण- प्रसङ्गे निराकृता एव । यदपि मैकडानलो वक्ति—' वर्तमाने हिन्दूधर्मे शिवविष्णू समकोटिकत्वेन वर्ण्यते, किन्तु त्रिसहस्रवर्षप्राचीने ऋग्वेदे प्रमुखदेवताभ्यो निम्नस्तरीयत्वेनोक्तो । ऋग्वेदे शिवस्य प्रथमं रूपं रुद्र एव । तेनैव रूपेणाद्यापि रुद्रो भयङ्करो देवो विष्णुश्च दयासागरत्वेन वर्ण्यते' ( पृ ० ६१ ) इति, तदपि वेदार्थाज्ञानविजृम्भितमेव, कर्मकाण्डविषयबाहुल्येन तत्सम्बद्धदेवानां स्तवनबाहुल्येऽपि विष्णुशिवयोरपकर्षाभावात् । न च विष्णुशिवयो सम्बन्धिसूक्तानामल्पत्वेऽपि तदपकर्षः सम्भवति, कर्मकाण्डोपासनाकाण्डसम्वन्धिसूक्तानां मन्त्राणां च बाहुल्येऽपि ज्ञानकाण्डसम्बन्धिसूक्तानामल्प- त्वेऽपि तयोरपेक्षया ज्ञानकाण्डस्यैवोत्कर्षाभ्युपगमात् । साध्यापेक्षया साघनानां बाहुल्यमिवान्यदेवसूक्तबाहुल्यमपि न विष्णुशिवयोरपकर्षं साधकम् । - ', ' ( ), यदपि आकाशदेवतासु पूर्वं प्राचीनो देवो द्योस् ग्रीकाणां तदेव उस पदेनोच्यते पृ ० ६२ इति तदपि तुच्छम्, नामसाम्यस्याभेदव्यभिचारित्वात् । 'तत्र पितृत्वभावनात् प्रारम्भिकरूपान्न तद्वर्णनविस्तरः । जगज्जननी- रूपेण द्यावापृथिव्योः सम्बन्धीनि षट् सूक्तानि लभ्यन्ते । कस्मिंश्चित् सूक्ते पीनपुङ्गवरूपेण तद्वर्णनम्, स पीतवर्ण: सदैव निम्नाभिमुखो रौति । अनेन रूपकेण वर्षणशक्तिः सङ्केत्यते । तेन साकं विद्युद् गर्जनशील गगन च भवतः । क्वचिन्मुक्तालङ्कृताऽश्वेनापि द्यौरुपमिता 1। तेन तारकाङ्कित सन्तममाच्छन्न नभोऽनुसूच्यते । केनचिदृषिणा वज्रधरोऽय देव उक्तः । यथा लौकिकसंस्कृते स्मितमित्यनेन शुभ्रश्वेतिमा लक्ष्यते तद्वत्' ( पृ० ६२ ) इति, तदपि न किञ्चित् दिवः पृथिव्याश्च जडत्वेन पूज्यत्व -स्तुत्यत्वाभावेऽपि तत्तच्छक्त्यवच्छिन्न चैतन्यस्यैश्वर्य वत्वेन तदधिष्ठातृदेवानां स्तुत्यत्वो- इस बात को आप कैसे कह सकते है? इस तरह की पाश्चात्यों की अनेक दुष्ट कल्पनाओ का खण्डन हमने वेदो की अपौरुषेयता के और देवताओ के निरूपण के प्रसग में किया है । मैकडानल का यह कथन भी कि-' वर्तमान हिन्दू धर्म के प्रधान देवता, विष्णु और शिव समकोटि के होते हुए भी तीन हजार वर्ष पूर्व ऋग्वेद के प्रमुख देवताओं में बहुत निम्न स्तर पर रखे गये थे । ॠग्वेद में शिव का प्रथम रूप रुद्र हो वर्णित है और उमी रूप में बाज भी रुद्र एक भयंकर देवता और विष्णु दया के सागर माने जाते है' ( पृ ० ६१ ), वेदार्थ का ज्ञान न होने के कारण है, क्योकि वेद मे कर्मकाण्ड का विशेष प्रपंच होने से कर्मकाण्ड से सम्बद्ध देवताओ की ही स्तुति विशेष रूप से मिलती है, किन्तु इसका मतलब यह नही है कि शिव और विष्णु उनकी अपेक्षा अपकृष्ट कोटि के देवता है । विष्णु और शिव सम्बन्धी सूक्तों की अल्पता के कारण भी इनका अपकर्ष नही सिद्ध किया जा सकता । कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड सम्बन्धी सूक्तों और मन्त्रो का बाहुल्य रहते हुएभी और ज्ञानकाण्ड सम्बन्धी सूक्तों की अल्पता होते हुए भी इन दोनों की जब तुलना की जाती है, तो ज्ञानकाण्ड का ही उत्कर्ष माना जाता है । साध्य की अपेक्षा साधनो की बहुलता रहती है, अतः साधनस्थानीय अन्य देवताओं के सूक्तों की बहुलता के आधार पर साध्यस्थानीय विष्णु और शिव का अपकर्ष नहीं सिद्ध किया जा सकता । ' आकाश के देवताओं में सबसे पुराना देव ' द्यौस्' है, जो कि ग्रीक 'झेडस्' से अपृथक् है' ( पृ० ६२ ), यह कथन भी सारहीन है, क्योकि नाम की समानता के आधार पर किसी वस्तु का अभेद नही सिद्ध किया जा सकता । 'आकाश का यह मूर्त रूप ऋग्वेद में वर्णित प्रारम्भिक रूप से आगे न बढ़ 1 सका, कारण उसके सम्बन्ध में भावना केवल पितृत्व की रही । जगत् के जनक-जननी के रूप में वर्णित द्यावापृथिवी पर छः सूक्त है । कुछ सूक्तों में 'द्यौस्' को एक पीन पुंगव ( वृषभ ) कहा गया है, वह पीला और सदा नीचे की ओर रंभाता है । इस रूपक से वर्षण शक्ति की ओर संकेत है और उसके साथ विद्युत् और गर्जनशील गगन रहते है । एक स्थान पर मुक्ता से अलंकृत घोडे से भी तुलना की गई है, जिसका स्पष्ट संकेत तारकाकित तमसाच्छन्न नभ की ओर है । एक ऋषि ने इसे वज्रधारी देवता बताया है । किसी दूसरे ने 'द्योस्' को मेघों द्वारा मुस्कराते हुए वर्णन किया है । जैसे लौकिक संस्कृत में 'स्मित ' शुभ्र श्वेतिमा का द्योतक माना गया है' ( पृ० ६२ ) यह कथन भी तथ्यहीन है, क्योंकि आकाश और पृथिवी दोनों जड़ हैं, इनमें पूज्यत्व
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ववार्थपारिजातः १०६७ पपत्तेः । तदभिप्रायेणैव -' मृदब्रवीत्', 'आपोऽब्रुवन्' इति श्रुतिवचनानि प्रवृत्तानि । 'अभिमानिव्यपदेशस्तु' ( २| १| ५ ) इति ब्रह्मसूत्रेण तद्व्याख्यातृभिः श्रोशङ्करभगवत्पादादिभिश्व तदेव समर्थितम् । अत एवाद्यापि यज्ञयागादी पृथिवी - ' शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचरा:' इति युक्त्यनुगृहीतेन पौराणिकवचनेन दिवः पृथिव्याश्च पूजन प्रचलति । सर्वमातापितृत्वेन तदधिष्ठातृ चैतन्ययोरपि देवत्व पूज्यत्वमभीष्टफलदातृत्व च न विरुद्ध्यते । 'नभोमण्डलस्यान्यो देवो वरुण, तस्य मूर्तं रूपमेवं व्यापक विद्यते यस्य प्राकृतिक दृश्य रूपं कतिपयं- र्लक्षणैविज्ञायते । भारतीयकथाया अविषयत्वादेवास्य गूढता प्रतोयते । पुरातनयुगीयदेवत्वादप्यस्य गूढत्वम् । दिव्शब्दवद् वरुणशब्दः कस्यचित्प्राकृतिकतत्त्वस्य वाचको न भवति, तताऽप्यस्य गूढार्थता । मूलतोऽय वरुणशब्दो व्यापकस्याकाशस्य वाचक: सम्भवतः ग्रोक 'ओरेनोज्' इत्यस्य तत्समः प्रतीयते । यद्यपि ध्वनिनियमानुसारेणो- भयोस्ताद्रूप्य विषममिवाभाति । इन्द्राग्निसोमापेक्षया स्वल्पान्येव सूक्तानि वरुणं सम्बोधयन्ति तथापीन्द्रसहचरेषु वैदिकदेवेषु निःसंशयोऽय महान् देवः । इन्द्रो महान् रोद्धा | वरुणस्तु शारीरिकनैतिकशक्तिरूपस्य ऋतस्य महान् पोषकः । इतरसूक्तापेक्षया वरुणपराणि सुक्तानि नैतिकानि भक्तिबोधकानि च । तानि चात्यन्तमुदात्तानि । अधिकाश तया तानि हिब्रूस्तोत्रस्तुलनामर्हन्ति । वरुणस्य प्रान्ताधिकार आकाशीयनक्षत्रमण्डलभ्रमणेन तत्सदृशैरन्यंश्च यथाकालनियमितदृश्यै. स्फुटयते । इन्द्रस्य स्वच्छन्दो युयुत्सुस्वभावः सदा परिवर्तनशीलैरनिश्चितः प्राकृतिकैस्तत्त्वाना व्यवहारैर्व्यज्यते । वरुणस्वभावस्तु निम्नोक्तवैदिकपदावलीभिर्वर्ण्यते— 'वरुणस्य शासनेन द्यावापृथिव्यो पृथगवस्थितौ । तेनैवाकाशद्योतनाय स्वर्णचक्रं ( सूर्यः ) निर्मितम् । एतच्चत्रार्थमेव विस्तृतपथनिर्मितिः । गगने प्रवहमाणः पवनो वरुणस्य निःश्वासः । तदध्यादेशेनैव दीप्यमानश्चन्द्रो और स्तुत्यत्व के अभाव मे भी उस उस शक्ति ने अवच्छिन्न चैतन्य की ऐश्वर्यवत्ता के आधार पर उनके अधिष्ठाता देवताओ की स्तुति संभव हो पाती है । इसी अभिप्राय से वेदो मे 'मृदब्रवीत्', ' आपोऽब्रुवन्' इस तरह के वचन प्रवृत्त होते है । ' अभिमानिव्यपदेशस्तु' इस ब्रह्मसूत्र के शांकरभाष्य में इसी का समर्थन किया गया है । इसीलिये आज भी यज्ञ-यागादि के अनुष्ठान मे पृथ्वीपूजन की परम्परा प्रचलित है । ' सभी पदार्थों की शक्तियाँ अचिन्त्य होती है, इनका परिचय अतीन्द्रिय ज्ञान से ही मिल सकता है' तर्क के सहारे संपुष्ट इस पौराणिक वचन के प्रमाण पर आकाश और पृथिवी को सबके माता-पिता के रूप में माना जाता है और इनके अधिष्ठाता चैतन्य में देवत्व, पूज्यत्व और अभीष्ट फलदातृत्व मानने मे कोई विरोध नही है । 'नभोमण्डल का और एक देवता वरुण है । उसका मूर्त रूप इतना व्यापक है कि उसके प्राकृतिक दृश्य का केवल कतिपय लक्षणो के द्वारा ही अनुमान किया जा सकता है । इस गूढ रूप का कारण यह है कि वह भारतीय कथाओं का ही विषय नही रहा, परन्तु वह उससे भी पुरातन युग की देन है । यह भी एक कारण है कि उनका नाम ' द्यौस्' की तरह किसी प्राकृतिक तत्त्व का वाचक नही । मूलत: वरुण यह शब्द ' व्यापक' आकाश का वाचक है । संभवतः यह ग्रीक 'ओरेनोज़' का तत्सम प्रतीत होता है, यद्य ध्वनि- नियमो के अनुसार इन दो शब्दो का ताद्रूप्य कुछ कठिन मालूम पडता है । इन्द्र, अग्नि और सोम की तुलना में, वरुण को बहुत ही कम सूक्त संबोधित किये गये है । तथापि इन्द्र के सहचर वैदिक देवताओ मे यह निःसन्देह सबसे बड़ा देव है । जहाँ इन्द्र महान् योद्धा है, वहीं वरुण शारीरिक और नैतिक शक्ति अर्थात् ऋत का महान् पोषक है । वरुण को सम्बोधित सूक्त कुछ अधिक नैतिक है और इतर सूक्तों को अपेक्षा अधिक भक्तिपरक हैं । वेद में संकलित सूक्तों में वरुण सूत बहुत उदात्त हैं । अधिकाश ये हिब्रू ( यहूदी ) स्तोत्रो से मिलते जुलते है । वरुण का प्रशान्त अधिकार ( शासन ) आकाश में नक्षत्रमण्डल के भ्रमण और तत्सदृश अन्य यथाकाल नियमित रूप से प्रकट होने वाले दिव्य दृश्यों से स्फुट लक्षित होता है और इन्द्र का स्वच्छन्द एवं युयुत्सु स्वभाव सदा परिवर्तनशील एवं अनिश्चित प्राकृतिक तत्त्वों के व्यवहार से प्रकट होता है । वरुण के स्वभाव और सामर्थ्य का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित वैदिक पदावली में किया गया है:- "वरुण के शासन से द्यौः और पृथिवी पृथक् पृथक् रहते हैं । उसी ने स्वर्णचक्र ( सूर्य ) आकाश को चमकाने के लिये बनाया और इसी चक्र के लिये विस्तृत पथ का निर्माण किया । गगन मण्डल में जो पवन बहता है, वह वरुण का निःश्वास है । उसी के
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वेदार्थपारिजातः १०६८ रात्रौ सञ्चरति । रात्रावेव च नक्षत्राणि दीप्यन्ते दिवा च लुप्यन्ते । वरुण एव नदी प्रवाहयति, तच्छासनेनैव ताः प्रवहम्ति । तच्छक्त्यैव रहस्यमय्यो नद्यो वेगेन समुद्रमुपयान्ति । तथापि समुद्रो न वर्धते । स एव परिवर्त्य स्थापितात्पात्रात् पानीयं विन्दुशश्च्यावयति भूमि चार्द्रयति । तत्प्रेरणयैव पर्वता मेवैश्छाद्यन्ते । समुद्रेणास्याल्प एव सम्बन्धः' । ' वरुणस्य सार्वश्यं बाहुल्येनोल्लिख्यते । स उत्पततां पक्षिणामुड्डयनमवगच्छति । स कृतानि क्रियमाणानि च गुप्तानि कर्माणि पश्यति । मानवानां सत्यासत्यसाक्षी च । एतमन्तरा कश्चित् चलितुमनि न शक्नोति । नैतिक- प्रशासकरूपेण वरुणस्यान्यदेवापेक्षयाऽत्युच्चस्थानम् । स पापात् कुप्यति । यतः पातक तच्छासनभङ्गः । तदर्थं स उग्र शास्ति दण्डयति च । पातकिबन्धनार्था वरुणपाशा बहुधा वर्ण्यन्ते । सोऽसत्यं विप्रकर्षयति । असत्याद् घृणा करोति । पाश्चात्तापाच्च दयते । तान् पूर्वजन्मपातकेभ्योऽपि मोचयति । तन्नियमोल्लङ्घनशीलाननुतापशीलांश्च प्राणिनो रक्षति । अविवेकेनाविदिततया चादेशपालनबहिर्मुखान् प्रत्यपि स कारुण्य दर्शयति । वरुणसूक्तेष्वेकमपि तादृशं सूक्तं नोपलभ्यते यत्र कृतानां पातकाना सम्बन्धे क्षमा न प्रार्थिता स्यात्, यथान्येभ्यो देवेभ्यः सर्वत्र सम्पत्तयो याच्यन्ते । विश्वस्रष्टः प्रजापतेः सर्वोत्कृष्टत्वमान्यतावृद्धो जातायां वरुणस्य सार्वभौमिकता शनैः शनैर्विगलिता । ' तस्य निजक्षेत्रजलपर्यन्तमेव साम्राज्यं शिष्टमथर्वकाले । पुराणकाले च स समुद्रदेवतामात्रशेषः सञ्जातः । (पृ० ६२-६४ ) इति । अत्र चोदाहरणरूपेण निम्नोक्ता मन्त्रा उद्धृत्य व्याख्याता: --' मो षु वरुण मृन्मयं गृहं राजन्नहं गमम् । मृळा सुक्षत्र मृळय ॥ ', ' अपा' मध्ये तस्थिवांस तृष्णाविद जरितारम् । मृळा सुक्षत्र मृळय ॥ ', ' यत्किञ्चेदं वरुण देव्ये अध्यादेश से चमकीला चाँद रात में संचार करता है और रात मे तारे चकतते है, जो दिन मे लुप्त हो जाते है । वरुण ही नदियो को प्रवाहित करता है, उसो के शासन से वे सतत बहती है । उसी की रहस्यमयी शक्ति के कारण नदियाँ वेग से समुद्र मे जा मिलती हैं और फिर भी समुद्र में बाढ नही आती । वह उलटे रखे हुए पात्र से पानी टपकाता है और भूमि को आर्द्र करता है । उसी की प्रेरणा से पर्वत मेघ से आच्छन्न होते है । समुद्र से तो इसका सम्बन्ध बहुत स्वल्प है' । 'वरुण की सर्वज्ञता का बहुत उल्लेख मिलता है । वह उडने वाले पक्षियों की उडान को समझता है, समुद्रगामी पोत का मार्ग जानता है और दूर- दूर तक बहने वाली वायु का पथ भी पहचानता है । वह कृत एवं क्रियमाण सकल गुप्त कार्यो को देखता रहता है । वह मानवो के सत्यासत्य का साक्षी है । वस्तुतः कोई भी प्राणी इसके बिना हिल भी नही सकता । नैतिक प्रशासक के रूप में वरुण का ध्यान अन्य देवताओ की अपेक्षा कही उच्च है । वह पाप से कुपित हो जाता है । कारण पाप इसके शासन का अंग है, जिसके लिये वह कठोर दण्ड देता है । पापियो को बाँधने वाले वरुण के पाश का बहुधा वर्णन मिलता है । वह असत्य को दूर करने वाला, दंड देनेवाला और असत्य से घृणा करनेवाला है । परन्तु वह पश्चाताप करनेवाले पर दया भी करता है और न केवल अपने ही, परन्तु उन्हे अपने पूर्वजो के पापो से भी मुक्त करता है । उसके नियमों का भंग करनेवाले परन्तु अनुतापशील व्यक्ति की वह रक्षा भी करता है । वह ऐसे लोगो की ओर करुणा भी दर्शाता है, जिन्होंने अविवेक के कारण अविदित रूप से उसके आदेशों का पालन नहीं किया । सच पूछो तो, ऋग्वेद मे वरुण को सम्बोधित एक भी ऐसा सूक्त नहीं, जिसमें कृत पापों के लिए क्षमा-याचना नही की गई हो, ठीक उसी तरह, जैसे अन्य देवताओं को संबोधित सूक्तों में लौकिक सम्पत्ति के लिये सर्वत्र याचना दिखाई पडती है । farsar प्रजापति को सर्वोपरि देवता मानने की धारणा बढ़ते ही वरुण की सार्वभौमिकता धीरे-धीरे विगलित हुई और अपने निजी क्षेत्र, जल- पर्यन्त ही उसका साम्राज्य शेष रह गया । यह स्थिति अंशतः अथर्ववेद के काल में बन चुकी थी, पर वेदोत्तर पुराणकाल में तो वरुण केवल समुद्र का देवता, अर्थात् भारतीय नेव्यून मात्र रह गया ।' (पृ० ६२-६४) । मैकडानल ने अपने इस कथन के समर्थन में उदाहरण के रूप में निम्न मन्त्रों को उद्धृत कर उनकी व्याख्या की है । वे मन्त्र है —' मो षु वरुण० ', ' अषां मध्ये ० ', ' यत्किचेदं वरुण०' । इनकी व्याख्या इस तरह से की गई है -'हे राजन् वरुण, मृत्तिका से
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वेदार्थपारिजातः १०६२ जनेऽभिद्रोहं मनुष्याश्चरामसि । अचित्ती यत्तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः ॥ ' हे राजन् वरुण, त्वदीयं मृत्तिकानिर्मित गृहं मा न प्राप्नोतु, परन्तु सुन्दर गृह प्राप्यताम् । हे ईश्वर, मा सुखिनं कुरु मयि दया कुरु । हे वरुण, जलमध्ये स्थितमपि त्वद्भक्त तृषा तापयति । हे ईश्वर, मा सुखिन कुरु । हे वरुण, मर्त्यत्वाद्देवगणान् प्रति यदपराद्धं यच्चाविवेकवशान्नियमा अतिक्रान्तास्तदर्थं क्षम्यताम् । सकलकल्मषेभ्यो मा मोचय' ( पृ ० ६४) इति । तदेतत्सर्वं पारम्पर्यशून्यस्वैरावैधाध्ययन दुष्परिणाममात्रम्, वेदेषु कर्मकाण्डप्रसङ्गे परमेश्वर एव तत्तदैश्वर्य वद्देवतारूपेण सूक्तेषु स्तूयते । अत एव क्वचिद् व्यापकत्व परमेश्वरत्व च वर्ण्यते । सायणरोत्या मन्त्रार्था उच्यन्ते- हे राजन्नीश्वर वरुण, त्वदीयं मृण्मय मृदादिभिनिर्मित गृह मा उ मेव अह गमम् गतोऽस्मि, अपि तु सुशोभन सुवर्ण- मयमेव त्वदीय गृह प्राप्तवानस्मि । स त्व मा मृडय सुखय । हे सुक्षत्र शोभनधन वरुण, मृडय दयाव कुरु । (ऋ ० स० ७।८९ ।१ ) । अपां समुद्राणामुदकाना मध्ये तस्थिवास स्थितवन्तमपि जरितार तब स्तोतार मा तृष्णा पिपासा अविदत् आप्तवती, लवणोत्कटस्य समुद्रजलस्य पानानर्हत्वात् । अतस्तादृश मा मृडय सुखय । अन्यत् पूर्ववत् । (ऋ ० स ० ७।८९।४) । हे वरुण, दंव्ये देवसमूहरूपे जने यद् इदं किञ्चन अभिद्रोह अपकारजातं मनुष्या वय चरामसि चराम: , निर्वर्तयामः । तथा अचित्त्या अज्ञानेन तव त्वदीयं यद् धर्मं धारक कर्म युयोपिम वय विमोहितवन्तः । हे देव तस्मादेनसः पापाद् नः अस्मात् मा रीरिषः मा हिंसी: । (ऋ० स० ७।८९।५) इति । अत्र विचार्यते – वेदानामपौरुषेयत्वानादित्वाभ्यां पूर्वयुगीयत्वकथनमसगतमेव । वरुणशब्दस्य ' ओरेनोज्' इति शब्दसमत्वकल्पनमप्यसङ्गतमेव निर्मूलत्वात् । वरुणशब्दस्य व्यापकाकाशवाचकत्वमपि न सङ्गतम्, निर्मूलत्वात् । धात्वर्थानुरोधेन तु पापवारकत्वात् सर्वावरकत्वाद्वा वरुणः । जलस्य सर्वकारणत्वात् सर्वावस्कत्व तदधिष्ठातृदेवत्वाद् वरुणस्य तत्र साम्राज्यं स्वाभाविकमेव । जलस्य शामकत्वात शान्तप्रकृतित्वेन वरुणस्याकोधनत्वं क्षमाशीलत्वमपि निर्मित आपका गृह मुझे प्राप्त न हो ( परन्तु मुझे सुन्दर घर मिले ) । हे ईश्वर, तू मुझे सुखी बना, मुझ पर दया कर । हे वरुण, जल के मध्य स्थित होते हुए भी तुम्हारे भक्त को तृषा सता रही है । हे ईश्वर तू मुझे सुखी बना, मुझ पर दया कर ॥ हे वरुण मर्त्य होते के नाते जो भी कुछ अपराध देवगण के प्रति हमसे हुए हो और अविवेकवश जो भी कुछ नियमो का उल्लंघन हमने किया हो, हमें क्षमा करो । हे ईश्वर, सकल कल्मष से मुक्त करो' ( २०६४ ) । यह सारा कथन बिना परम्परा के अवैध पद्धति से मनमाने ढंग से वेदों के अध्ययन का दुष्परिणाम मात्र है । वेदों में कर्मकाण्ड के प्रसङ्ग में परमेश्वर की ही उस उस ऐश्वर्य से युक्त देवता के रूप में उन-उन सूक्तों में स्तुति की जाती है । अत एव इनकी व्यापकता और परमेश्वरता का वर्णन भी कही.कही मिल जाता है । वस्तुतः सायण की पद्धति से इन मन्त्रों का अर्थ इस प्रकार से है---हे राजन्, परमेश्वर वरुण, आपके मृष्मय घर पर मैं नही गया हूँ, किन्तु सुन्दर सुवर्णमय गृह में ही मैं आया हूँ । आप मुझे सुखी बनाइये । हे शोभन धन वाले वरुण, आप मेरे ऊपर दया कीजिये । समुद्र के जल के बीच में निवास करने वाले और तुम्हारी स्तुति करने वाले इस भक्त को प्यास सता रही है, क्योकि समुद्र का खारा पानी पिया नही जा सकता, अत: इस अवस्था में आप मुझे सुखी बनाइये, हे शोभन धन वाले वरुण, आप मेरे ऊपर दया कीजिये ॥ हे वरुण, हम मनुष्यगण देवगणो के प्रति जो जाने अनजाने अपकार करते हैं, अज्ञान से आपके धर्मों से जो हम विमोहित हो जाते है, हे देव, उस पाप से आप हमारी रक्षा कीजिये । यहाँ पर विचारणीय बात यह है कि वेद जब अपौरुषेय और अनादि हैं, तो उनमें परस्पर पूर्व युग और उत्तर युग की कल्पना कैसे की जा सकती है? वरुण शब्द की ग्रीक 'ओरेनोज्' शब्द से तुलना करना भी सर्वथा असङ्गत है, निर्मूल है । वरुण शब्द को व्यापक आकाश का वाचक मानना भी गलत है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नही है । धातु के अर्थ के अनुसार पापवारक अथवा सर्वावर ही वरुण शब्द का अर्थ है । जल इस सारी सृष्टि का कारण है, अतः वह सर्वावरक माना जाता है । उस जल के अधिष्ठात देवता वरुण है, अतः जल पर सर्वत्र वरुण का साम्राज्य माना जाय, यह स्वाभाविक है । जल अग्नि का शामक है । जल की इस शान्त प्रकृति के कारण वरुण क्रोध से रहित एवं क्षमाशील हो, यह उचित ही है । वेद में विकास क्रम के अनुसार परवर्ती काल में विश्व के
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१०७० वैवार्थपारिजातः युक्तमेव । वेदे न विकासक्रमेण विश्वस्रष्टुः परवर्तिकाले सर्वोत्कृष्टत्वमान्यता, तस्य सर्वदेव सर्वोत्कृष्टत्वाविशेषात् । तदभेदविवक्षयैवेन्द्रवरुणादिष्वपि सर्वोत्कृष्टत्वाद्युक्तिः । यदपि - 'ऋग्वेदे सौराः पञ्च देवाः सूर्यस्य विभिन्नचेष्टास्वरूपाणा प्रतीकतया वर्ण्यन्ते । सर्वप्राचीनो मित्रो देवः, येन सूर्यस्य मङ्गलमयी शक्तिर्व्यज्यते । भारतीय - ईरानीयुगस्य सिंहावलोकनेन विज्ञायते यद्वेदे मित्रेण स्वव्यक्तित्वं लोपितम्, वरुणकल्पनायामन्तर्भावितत्वात् । अत एव सर्वत्र वरुणेन सार्धमेव मित्रस्यावाहनं क्रियते । केवलस्य मित्रस्यावाहनबोधकमेकमेव सूक्तम् (ऋ० स० ३।५ ९)' ( पृ० ६५ ) इति, तदप्यसङ्गतम्, कर्माङ्गतया देवत- स्वरूपनिर्णयात् । यत्र कर्माङ्गतया मित्रावरुणौ स्तोतव्यो, तत्र सम्मिलितयोरेव दैवत्यम् । यत्र केवलस्यैकस्यैव कर्माङ्गता तत्र तस्यैव स्तुतिः । 'मित्रो जनान्' इति नवर्च षष्ठं वैश्वामित्र त्रैष्टुभम् । अग्निहोत्रार्थे पयसि बिन्दुपतने समिदाधाने विनियुक्तम्, ‘मित्रो जनान् यातयति ब्रुवाण इति समिदाधानम्' ( ३| ११ ) इत्याश्वलायनसूत्रात् । यदपि - 'सूर्यो ग्रीक ' हेलियास' पर्याय: सौरदेवेषु सर्वाधिकसत्ताशाली, तन्नामैव प्रकाशबोधकम्, प्रकाशेन तस्य शाश्वतः सम्बन्धः, सूर्यस्यापि चक्षुरस्ति । स सर्वस्य गूढो द्रष्टा । सूर्योदयेन प्रबोधितो मानवः स्वस्वकार्येषु युज्यते । च जगतस्तस्थुषश्चात्मा अभिभावकश्च । स रथारूढो भवति । तस्य रथे सप्ताश्वा युज्यन्ते । यस्या वेलाया- मश्वा मुच्यन्ते, तदा रजनी चतुर्दिक्षु स्वात्मान प्रसारयति । 'यदेदयुक्त हरितः सधस्थाद् आद्रात्रो वासस्तनुते सिमस्मे' । सूर्यश्चन्द्रबदन्धकारमपनयति । तारागणाश्चौरवन्निलीयन्ते । सन्ध्याया अङ्कात्सूर्यः समुत्तिष्ठते । अत एव स उषस्पति- रुच्यते । अग्नेरेकमूर्तित्वाद्देवेगंगने तस्मं स्थान दीयते । तस्य विहङ्गमगरुडरूपेण वर्णनम् । यस्मादेकस्थानात् स्थानान्तर- स्रष्टा परमात्मा की सर्वोत्कृष्ट मान्यता नही निश्चित हुई है, किन्तु वह तो सदा से ही सर्वोत्कृष्ट देव माना जाता रहा है । उस परमात्मा से अभेद को आरोपित करके ही इन्द्र, वरुण प्रभृति में सर्वोत्कर्ष मान्य होता है । 'ऋग्वेद में सौर देवता पाँच है, जो सूर्य की विभिन्न चेष्टाओ के स्वरूपों के प्रतीक है । इनमे सबसे प्राचीन है -मित्र -ईरानी युग का सिंहावलोकन करें, तो यह ( ), भारतीय सुहृत् जिसकी भावना सूर्य की मङ्गलमय शक्ति को प्रकट करती है यदि हम पता चलेगा कि मित्र ने अपना व्यक्तित्व खो दिया था और वह वरुण की कल्पना मे अन्तर्भावित सा हो चुका था । अत एव मित्र का आवाहन सर्वत्र वरुण के साथ पाया जाता है । अकेले मित्र का आवाहन करता हुआ केवल एक ही सूक्त ( ३।५ ९ ) है' (पृ० ६५) । यह कथन भी मसङ्गत है, क्योकि देवता के स्वरूप का निश्चय कर्म के अङ्ग मे होता है । जहाँ पर कर्माङ्ग के रूप मे मित्र और वरुण की एक साथ स्तुति की जाती है, वहाँ पर वे सम्मिलित रूप से ही उस कर्माङ्ग के देवता माने जायेंगे और जहाँ पर केवल एक की कर्मागता होगी, वहां पर उनकी अलग - अलग स्तुति की जायगी । 'मित्रो जनान्' यह नौ ऋचाओ वाला सूक्त है । इसमें छठी ऋचा का ऋषि विश्वामित्र और छन्द त्रिष्टुप् है । अग्निहोत्र करते समय दूध की बूंद गिर जाने पर समिधा के ग्रहण में इसका विनियोग होता है, जैसा कि आश्वलायन सूत्र मे कहा गया है कि 'मित्रो जनान्' इस ऋचा से समिधा का आधान किया जाय । ' सूर्य, जो ग्रीक 'हेलियास' का पर्याय है, सौर देवताओ में सबसे अधिक सत्ताशाली है । उसका नाम ही प्रकाश को दर्शाता है । उसका सम्बन्ध प्रकाश से शाश्वत है । सूर्य को चक्षु भी है । वह समस्त विश्व का गूढ द्रष्टा है । वह सकल प्राणियों की तथा उनके सुकृत और दुष्कृतो की परीक्षा करता रहता है । सूर्योदय के द्वारा प्रबोधित हो मानव अपने-अपने काम में जुटता है । सूर्य समस्त चराचर का आत्मा और अभिभावक है । वह एक रथ पर आरूढ रहता है, जिसमें सात घोड़े जुड़े होते है । अस्तमयन वेला पर वह अपने घोड़ों को खोलता है । तब चारो ओर रजनी आवरण को प्रसारित करती है । जैसा कि 'यदेदयुक्त' इस मन्त्र में कहा गया है कि ज्यों ही सविता देवता अपने घोड़ो को विश्राम देने लगता है, रात एक दम अपने प्रावारक ( आवरण ) को सर्वत्र प्रसारित कर देती है । ' सूर्य चन्द्र की भाँति अन्धकार को गोल कर देता है और तारागण तो उसके सामने चोर की भांति छिप जाते है । वह सन्ध्या की गोद से उठ खड़ा होता है । उसे उषस्पति भी कहा है । देवताओं ने उसे अग्नि की ही मूर्ति होने के नाते गगन में स्थान दिया । उसका वर्णन प्राय: एक विहंग अथवा गरुड के रूप में किया जाता है, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर संचार करता है ।